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यूपी में देखिए समाजवादी ‘दंगल’

उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी में छिड़ा दंगल खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. जहां दूसरे राजनीतिक दल आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर अपनी रणनीति बना रहे हैं, वहीं ये पार्टी चाचा-भतीजे के बीच चल रही जंग में ही उलझी हुई है. रविवार को सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने पिता और पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव से मुलाकात करके 403 उम्मीदवारों की सूची सौंपी. सूत्रों के अनुसार अखिलेश ने मुलायम को बताया है कि प्रत्याशियों की जो सूची वह सौंप रहे हैं, उसका आधार आंतरिक सर्वेक्षण है.

इससे पहले पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव पहले ही 175 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर चुके हैं. अब अखिलेश की सूची में कुछ नाम तो शिवपाल की सूची से मेल खाते हैं लेकिन ज्यादातर नाम उसमें से गायब हैं. सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि अखिलेश की सूची में पूर्वांचल के बाहुबलियों का नाम गायब है. मुख्यमंत्री ने बाहुबली मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद का टिकट काट दिया है. ये नाम शिवपाल द्वारा जारी सूची में शामिल थे.

इसके अलावा अखिलेश ने अपनी टीम के युवा सदस्यों अतुल प्रधान जैसे करीबियों को शामिल किया है, जिनका टिकट शिवपाल यादव ने काट दिया था. सूची में मौजूदा 35 से 40 मंत्री-विधायकों के टिकट काट दिए गए हैं.

हालांकि इस लड़ाई की शुरुआत अभी नहीं हुई है. दो महीने पहले चाचा-भतीजे ने एक दूसरे को अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की थी लेकिन सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के हस्तक्षेप के बाद एक बार लगा कि विवाद थम गया है. लगा कि अब दोनों नेता मिलकर प्रदेश में पार्टी का जनाधार बढ़ाने का काम करेंगे पर अब भी वह पार्टी में अपना कद बढ़ाने में लगे हुए हैं.

समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में जिस तरीके से आगामी चुनाव अभियान में लगी है, वह कार्यकर्ताओं के लिए बहुत उत्साहजनक नहीं कहा जा सकता है. चाचा-भतीजे के अलावा भी सारे बड़े नेता अपनी ढपली अपना राग अलाप रहे हैं. इन सारे नेताओं में कोई भी समन्वय नहीं दिख रहा है. सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने अभी तक सिर्फ गाजीपुर और बरेली में ही रैली की है. इन दोनों ही रैलियों में शिवपाल तो उपस्थित थे लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव नहीं दिखे थे.

दूसरी ओर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव रोज नई योजनाओं के उद्घाटन और शिलान्यास में व्यस्त हैं. वह चुनाव आयोग द्वारा आचार संहिता लागू किए जाने से पहले घोषणाओं का अंबार लगा देना चाह रहे हैं. तीसरी ओर कहने के लिए शिवपाल यादव संगठन को मजबूत करने में जुटे हुए हैं लेकिन इस बहाने वह पार्टी से सिर्फ अखिलेश यादव समर्थकों को बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं. शिवपाल ने अभी करीब एक दर्जन भर जिलाध्यक्ष बदल दिए हैं. साथ ही आधा दर्जन ऐसे प्रत्याशियों के टिकट काट दिए हैं. इन सबको अखिलेश का करीबी माना जाता है.

चौथी ओर यादव परिवार के अन्य सदस्य राम गोपाल यादव हैं. उन्हें अक्टूबर में पार्टी से निकाल दिया गया था लेकिन नवंबर में ही दोबारा पार्टी में शामिल कर लिया गया. दोबारा पार्टी में शामिल होने के बाद वह शांत होकर बैठे हुए हैं. चुनाव सिर पर होने के बावजूद उनकी सक्रियता बहुत सीमित दिखाई दे रही है.

आजम खान, अमर सिंह और समाजवादी पार्टी के दूसरे नेता भी इस दौरान कभी सक्रिय तो कभी निष्क्रिय दिख रहे हैं. इन सबमें भी समन्वय का अभाव साफ दिख रहा है. ऐसा लग रहा है पार्टी के वरिष्ठ नेता इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि शीर्ष पर चल रही यह लड़ाई शांत हो तब वे लोग सक्रिय हों. हालांकि इसमें लंबा वक्त निकल जा रहा है.

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बुरे हालात सपा से टिकट के लिए लाइन में लगे या हासिल कर चुके उम्मीदवारों का है. उन्हें यह समझ में ही नहीं आ रहा है कि चुनाव प्रचार में पैसा खर्च करने के बाद अगर उनका टिकट काट दिया जाता है तो वे क्या करेंगे. मजबूत उम्मीदवार टिकट कटने के बाद निर्दलीय या फिर दूसरी पार्टियों से टिकट के लिए दांव लगाएंगे. इसके संकेत भी मिल रहे हैं. यह स्थिति पार्टी के लिए परेशानी वाली है.

सबसे बड़ी बात यह है कि चाचा-भतीजे के वर्चस्व की इस लड़ाई में कोई भी हार मानने के लिए तैयार नहीं है. अखिलेश यादव के मुलायम को सूची देने के बाद शिवपाल ने ट्वीट करके अपनी राय जाहिर कर दी. शिवपाल ने ट्वीट करके कहा कि सीएम का चुनाव विधायक दल ही करेगा. उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी में अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी. यानी अब फैसला मुलायम सिंह यादव को करना है. मुलायम सिंह यादव को ऐसी सियासी ड्रामेबाजी से निपटने का मास्टर माना जाता रहा है पर यह ड्रामेबाजी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है.

हालांकि जानकारों का एक धड़ा यह भी मानता है कि इस ड्रामेबाजी से मुलायम सिंह यादव और समाजवादी पार्टी को ही फायदा हो रहा है. पिछले महीने जब चाचा-भतीजे की लड़ाई में अल्पविराम लगा तो सर्वेक्षणों में अखिलेश एक ब्रांड के रूप में उभरकर सामने आए. एक ही झटके में अखिलेश विकास पुरुष बन गए जो कि वह पिछले करीब पांच सालों के कार्यकाल में खुद को साबित नहीं कर पाए थे. वहीं शिवपाल यादव की छवि कुछ हद तक विकास में अड़ंगा लगाने वाले, कार्यकर्ताओं का मान रखने और अपराधियों को संरक्षण देने वाली बन गई.

अगर यूपी की राजनीति को हम समझे तो ये दोनों ही बातें पार्टी के लिए फायदेमंद हैं. यहां की राजनीति में जाति, धर्म, अपराध का ऐसा मकड़जाल बना हुआ है कि आप सिर्फ विकास के नाम पर राजनीति करके सफलता नहीं हासिल कर सकते हैं. वहीं दूसरी ओर जहां तक बात ब्रांड अखिलेश की है तो मुलायम सिंह यादव ने पिता का फर्ज पूरी तरह से निभा दिया. अखिलेश ने जिस तरह से 403 उम्मीदवारों की सूची मुलायम सिंह यादव को सौंपी है उससे लग रहा है कि वह समाजवादी पार्टी की कमान संभालने को बेकरार हैं.

यानी अब फैसला मुलायम सिंह यादव को करना है. मुलायम सिंह यादव को ऐसी सियासी ड्रामेबाजी से निपटने का मास्टर माना जाता रहा है पर यह ड्रामेबाजी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है.

क्या है बसपा के 104 करोड़ रुपये का राज

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बसपा से संबंधित एक खाते में 104 करोड़ रुपये और पार्टी प्रमुख मायावाती के भाई आनंद के खाते में 1.43 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि जमा कराये जाने का पता लगाया है. अधिकारियों ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय ने बैंकों में संदिग्ध और भारी रकम राशि जमा किये जाने की जांच और सर्वे अभियान के तहत यूनियन बैंक की करोल बाग शाखा का दौरा किया और पाया कि नोटबंदी के बाद इन दो खातों में बड़े पैमाने पर रकम जमा करायी गयी है. इस पर बसपा का जवाब हासिल करने का प्रयास सफल नहीं हो पाया.

ईडी ने कहा कि अधिकारियों ने बसपा के खाते में पैसे जमा कराये जाने की जानकारी मांगी और पाया कि 102 करोड़ रुपये की राशि एक हजार के पुराने नोटों में जमा करायी गयी है और तीन करोड़ रुपये की राशि 500 रुपये के पुराने नोटों में जमा करायी गयी है. अधिकारियों ने कहा कि वे यह जानकारी पाकर हैरान रह गये कि हर दूसरे दिन 15-17 करोड़ रुपये की राशि जमा करायी गयी है.

प्रवर्तन निदेशालय ने यूनियन बैंक की इसी शाखा में एक और खाते के बारे में पता लगाया जिसका ताल्लुक मायावाती के भाई आनंद से है. इस खाते में 1.43 करोड़ रुपये की राशि मिली है. नोटबंदी के बाद 18.98 लाख रुपये पुराने नोटों में जमा कराये गये.

एजेंसी ने बैंक से इन दोनों खातों के बारे में पूरा ब्योरा मांगा है. समझा जा रहा है कि एजेंसी आयकर विभाग को इस बारे में लिखेगी, जिसे राजनीतिक दलों को मिले चंदे और अनुदान की वैधानिकता की जांच का अधिकार हासिल है. ईडी ने बैंक से सीसीटीवी फुटेज और खाते खोलने के लिए इस्तेमाल किये गये केवाइसी दस्तावेज भी मांगे हैं. माना जा रहा है कि आनंद के खातों के संदर्भ में एजेंसी जल्द ही आनंद को नोटिस जारी करेगी और कर चोरी विरोधी कानून के तहत जांच के लिए आयकर अधिकारियों से भी कहेगी. ईडी नोटबंदी के बाद हुए हवाला और धनशोधन के मामलों की जांच के लिए 50 से अधिक शाखाओं में पड़ताल कर रही है.

जांच से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक ईडी की टीम नोटबंदी के बाद खातों में जमा हुए रकम की रूटीन जांच के लिए करोल बाग पहुंची थी. वहां यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की एक ब्रांच में दो अलग-अलग खातों में बड़ी रकम के जमा होने का मामला सामने आया.

दिलचस्प बात यह है कि नोटबंदी के बाद हर एक दिन के अंतराल पर बसपा के इस खाते में 15-17 करोड़ रुपये जमा किए गए. इसी ब्रांच में मायावती के भाई आनंद कुमार का भी खाता पाया गया. उनके खाते में 1.43 करोड़ रुपये जमा किए गए. इनमें से 18.98 लाख रुपये पुराने नोटों की शक्ल में जमा किए जाने की बात कही जा रही है.

मामले के सामने आने के बाद ईडी ने यूनियन बैंक से इन दोनों खातों की पूरी जानकारी मांगी है. आयकर विभाग को भी इस मामले के बारे में बताया जा रहा है. क्योंकि इसी विभाग को राजनीतिक दलों के चंदे के बारे में जांच का हक है. वहीं आनंद कुमार के खिलाफ कुछ और गैरकानूनी लेनदेन के बारे में पहले से ही ईडी और आयकर विभाग जांच कर रही है.

इससे पहले ही आयकर विभाग ने मायावती और आनंद कुमार के खिलाफ आयकर न देने के मामले में 5 याचिकाएं सुनवाई के लिए दोबारा सूचीबद्ध कर दी है. इन याचिकाओं में बीजेपी नेता किरीट सोमैया की 2012 में दर्ज कराई गई शिकायत शामिल है.

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन : किसानों तक नहीं पहुंच रहा फायदा

सरकार किसानों के भले के लिए अनेक योजनाएं लाती है, लेकिन प्रचारप्रसार के अभाव में ज्यादातर योजनाएं किसानों तक पहुंच नहीं पातीं और वे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं या आधीअधूरी ही पहुंचती हैं. ऐसी ही एक योजना राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन 2016-17 है, जिस का हाल भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. इस योजना का पूरा फायदा किसानों तक नहीं पहुंच रहा है. देश में खाद्य सुरक्षा पक्की करने के लिए शुरू किया गया राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन राज्यों के सहयोग न करने के कारण अपना निर्धारित मकसद पाने में नाकाम हो रहा है. केंद्र सरकार ने मिशन के लिए 231 करोड़ रुपए की रकम तय करते हुए बताया कि गेहूं, चावल और दाल की पैदावार बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा किसानों को राज्यों के जरीए विशेष सहायता दी जाती है, लेकिन पिछले साल जारी की गई राशि अभी तक खर्च नहीं की गई है, जबकि साल 2017 आ चुका है.

आंकड़ों के मुताबिक धान की पैदावार बढ़ाने के लिए 128.42 करोड़ रुपए तय किए गए हैं. इन में से 82.27 करोड़ रुपए जारी किए जा चुके?हैं, लेकिन राज्य सरकारों ने अभी तक 46.15 करोड़ रुपए खर्च नहीं किए हैं. इसी तरह से दालों की पैदावार बढ़ाने के लिए कुल 102.99 करोड़ रुपए जारी किए गए. राज्यों ने अभी तक 72.80 करोड़ रुपए खर्च नहीं किए है. किसानों तक महज 40.75 करोड़ रुपए ही पहुंचे हैं. बहरहाल इस मिशन के तहत अभी तक 32105.8 लाख रुपए तय किए जा चुके हैं और 8227.2 लाख रुपए जारी हो चुके?हैं. आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल सूबों में यह मिशन चल रहा?है.

किसानों को किया जाता प्रोत्साहित : खाद्य संकट से निबटने के लिए शुरू किए गए राष्ट्रीय खाद्य मिशन के तहत गेहूं, चावल और दाल की बोआई के लिए किसानों को बढ़ावा दिया जाता?है और उन्हें इस के तहत विशेष सहायता दी जाती है, ताकि वे अपनी खेती से अच्छी पैदावार ले सकें अैर उन पर आर्थिक बोझ भी कम रहे. इस मिशन को 3 खास भागों गेहूं, चावल और दाल में बांटा गया है. कृषि मंत्रालय के अधिकारियों का कहना?है कि इस मिशन का मकसद एक ओर जहां देश की बड़ी आबादी को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाना होता?है, वहीं किसानों की आमदनी बढ़ाना भी है. यह योजना 11वीं पंचवर्षीय योजना के तहत देश के 14 राज्यों के 168 जिलों में चलाई जा रही है.

योजना के खास लक्ष्य : योजना शुरू करने के लिए राष्ट्रीय स्तर से ले कर ग्राम पंचायत स्तर तक एक तंत्र तैयार किया गया है और इस की बराबर निगरानी की जाती है. हर किसान को उस की जरूरत के मुताबिक सरकार द्वारा आर्थिक, तकनीकी और कारोबारी सहायता मुहैया कराई जाती है. किसानों को कृषि उपकरण खरीदने के लिए 50 फीसदी तक की आर्थिक मदद दी जाती है. उन की कृषि भूमि का परीक्षण किया जाता?है और उन्हें जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्त्वों और अन्य रसायनों के इस्तेमाल की सलाह दी जाती है और किसानों के लिए तमाम जरूरी चीजें मुहैया कराई जाती हैं. इस मिशन में ग्राम पंचायतों का भी खासा योगदान रहता है. उन्हें भी ध्यान रखना चाहिए कि योजना के लिए जमीन किसान या परिवारों का चयन करते हुए समाज के सभी वर्गो का ध्यान रखें. सरकारी नियमों के मुताबिक उन्हें मदद व जानकारी दें. जिले के लिए कुल तय रकम का 33 फीसदी लघु, सीमांत और महिला किसानों के लिए आरक्षित होगा. ग्राम पंचायतें इस बात पर नजर रखेंगी कि किसी भी किसान को किन्हीं 2 योजनाओं का लाभ एकसाथ न मिले. मिशन के तहत भूमि संरक्षण के लिए राज्य सरकारों को जिम्मेदारी दी गई?है. इस के लिए अखिल भारतीय मृदा और भूमि उपयोग सर्वेक्षण को नोडल एजेंसी बनाया गया है.

इस के अलावा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण और भूमि नियोजन ब्यूरो नागपुर और भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान भोपाल इस काम में सहयोग करेंगे. इस योजना में उत्पादकता बढ़ाने पर खास ध्यान दिया जा रहा?है, इसलिए किसानों को प्रमाणित बीज मुहैया कराए जाते हैं और उन को इस के लिए खास माली मदद दी जाती है. यह मदद प्रति क्विंटल 1200 रुपए तय की गई है. धान और गेहूं में सूक्ष्म तत्त्वों को बढ़ावा देने के लिए किसानों को 500 रुपए प्रति हेक्टेयर दिए जाएंगे. धान के किसानों को चूना का इस्तेमाल करने के लिए 500 रुपए अलग से दिए जाएंगे. यह राशि परीक्षण के आधार पर दी जाएगी. इसी तरह गेहूं के किसानों को जिप्सम के लिए 500 रुपए प्रति हेक्टेयर की दर से मदद दी जाएगी. दलहन के किसानों को सूक्षम पोषक तत्त्वों और चूने के लिए 1250 रुपए प्रति हेक्टेयर की दर से मिलेंगे. ऊपर बताई गईं. बातों से पता चलता?है कि किसानों के भले के लिए तो बहुत कुछ हो रहा है, लेकिन उन तक फायदा पहुंचे तभी कुछ बात बनेगी.

किसानों का भला सोचने के लिए योजनाएं बनती?हैं, तो उन्हें लागू कराना भी सरकार का काम?है. लेकिन नेताओं को अपनी राजनीति करने और एकदूसरे की टांगखिंचाई से फुरसत मिले तभी कुछ होगा. कोई भी योजना को लागू करने के लिए नियम बनाने होंगे और उन्हें अमल में लाना होगा. अधिकारियों व कर्मचारियों को काम करना होगा. तभी कुछ नतीजा निकलेगा, नहीं तो योजनाएं बनेंगी और कागजों में सिमट कर रह जाएंगी.

अलसी की खेती से लाभ कमाएं

अलसी तेल वाली फसलों में दूसरी खास फसल है. अलसी के पूरे पौधे से पैसा कमाया जा सकता है. इस के तने से लिनेन नामक बहुत महंगा रेशा मिलता है और बीज का इस्तेमाल तेल प्राप्त करने के साथसाथ  दवाओं में किया जाता है. आयुर्वेद में अलसी को रोज का भोजन माना जाता है. अलसी के कुल उत्पादन का करीब 20 फीसदी खाने के तेल के रूप में और बचा 80 फीसदी उद्योगों में इस्तेमाल होता है. अलसी के बीज में ओमेगा 3 वसीय अम्ल 50 से 60 फीसदी पाया जाता है. साथ ही इस में अल्फा लिनोलिनिक अम्ल, लिग्नेज, प्रोटीन व खाद्य रेशा आदि भी होते हैं. ओमेगा 3 वसीय अम्ल मधुमेह गठिया, मोटापा, उच्च रक्तचाप, कैंसर, मानसिक तनाव (डिप्रेशन), दमा आदि बीमारियों में लाभदायक होता है. दुनिया में अलसी के उत्पादक के तौर पर भारत का तीसरा स्थान है, जबकि पहले स्थान पर कनाडा व दूसरे स्थान पर चीन हैं. करीब 448.7 हजार हेक्टेयर जमीन पर इस की खेती की जा रही है व कुल उत्पादन 168.7 हजार टन व औसतन पैदावार 378 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है. भारत में खासतौर पर मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, राजस्थान, ओडिशा, महाराष्ट्र व कर्नाटक आदि प्रदेशों में इस की खेती की जाती है. अलसी के कुल उत्पादन का लगभग 20 फीसदी खाद्य तेल के रूप में और बचा 80 फीसदी तेल उद्योग जैसे सूखा तेल, पेंट बनाने में, वारनिश, लेमिनेशन, तेल कपड़े, चमड़े, छपाई की स्याही, चिपकाने, टेपिलोन साबुन आदि में किया जाता है.

जमीन और जलवायु : अलसी की फसल के लिए काली भारी व दोमट मटियार मिट्टी मुनासिब होती है. जमीन में उचित जल निकासी का इंतजाम होना चाहिए. अलसी की फसल को ठंडी व सूखी जलवायु की जरूरत पड़ती है.

खेत की तैयारी : अलसी के अच्छे जमाव के लिए खेत भुरभुरा व खरपतवार मुक्त होना चाहिए. लिहाजा खेत में 2 से 3 बार हैरो चला कर पाटा लगाना जरूरी है, जिस से नमी बनी रह सके. अलसी का दाना छोटा व पतला होता है. अच्छे जमान के लिए खेत का भुरभुरा होना जरूरी है.

बोआई का समय : असिंचित क्षेत्रों में अक्तूबर के पहले पखवाड़े और सिंचित क्षेत्रों में नवंबर के पहले पखवाड़े में बोआई करनी चाहिए जल्दी बोआई करने पर अलसी की फसल को फली मक्खी व पाउडरी मिल्ड्यू आदि से बचाया जा सकता है.

बीजों की मात्रा

अलसी की बोआई 20 से 25 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से करनी चाहिए. कतार से कतार के बीच की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधे की दूरी 5 से 7 सेंटीमीटर रखनी चाहिए. बीजों को 2 से 3 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए. बोआई से पहले बीजों को कार्बेंडाजिम की 3 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए.

उर्वरकों की मात्रा : असिंचित क्षेत्र में बेहतर उपज लेने के लिए नाइट्रोजन 50 किलोग्राम, फास्फोरस 40 किलोग्राम व पोटाश 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से और सिंचित क्षेत्रों में  नाइट्रोजन 100 किलोग्राम व फास्फोरस 75 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से डालें. असिंचित दशा में नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा और सिंचित दशा में नाइट्रोजन की आधी मात्रा व फास्फोरस की पूरी मात्रा बोआई के समय चोगे द्वारा 2-3 सेंटीमीटर नीचे प्रयोग करें. सिंचित दशा में नाइट्रोजन की बची आधी मात्रा टाप ड्रेसिंग के रूप में पहली सिंचाई के बाद इस्तेमाल करें. फास्फोरस के लिए सुपर फास्फेट का इस्तेमाल ज्यादा फायदेमंद है.

खरपतवार प्रबंधन : खरपतवार नियंत्रण के लिए बोआई के 20 से 25 दिनों बाद पहली निराईगुड़ाई व 40 से 45 दिनों बाद दूसरी निराईगुड़ाई करनी चाहिए. अलसी की फसल में रासायनिक विधि से खरपतवार की रोकथाम के लिए एलाक्लोर 1 किलोग्राम सक्रिय तत्त्व को बोआई के बाद व जमाव से पहले 500 से 600 लीटर पानी में मिला कर खेत में छिड़काव करें.

सिंचाई : अलसी के अच्छे उत्पादन के लिए 2 से 3 सिंचाई की जरूरत पड़ती है. पहली सिंचाई 4 से 6 पत्ती निकलने पर, दूसरी सिंचाई शाखा फूटते समय, तीसरी सिंचाई फूल आते समय व चौथी सिंचाई दाने बनते समय करनी चाहिए. सिंचाई के साथसाथ जल निकास का भी सही इंतजाम होना चाहिए.

अलसी के खास कीट

कर्तन कीट (एग्राटिस एप्सिलान) : गरमी के मौसम के अंत में मादा अंडे देती है. कर्तन कीट अलसी के पौधे को पूरी तरह या उसे जमीन के भाग से काट देता है. इस की सूंड़ी दिन के समय जमीन में रहती है और रात के समय निकल कर खाती है. जमीन की सहत से सूंड़ी करीब 3 से 5 हफ्ते तक खाती है, जिस से पौधा पूरी तरह से मर जाता है या कमजोर होने के कारण बीमार हो जाता है.

रोकथाम

* खेतों के पास प्रकाश प्रपंच 20 फेरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से लगा कर प्रौढ़ कीटों को आकर्षित कर के खत्म किया जा सकता है.

* खेतों के बीचबीच में घासफूस के छोटेछोटे ढेर शाम के समय लगा देने चाहिए. रात में जब सूंडि़यां खाने को निकलती हैं, तो बाद में इन्हीं में छिपेंगी, जिन्हें घास हटा कर असानी से खत्म किया जा सकता है.

* सूंडि़यों का असर बढ़ने पर क्लोरपायरीफास 20 ईसी का 1 लीटर प्रति हेक्टेयर या नीम के तेल का 3 फीसदी प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

अलसी की कली या गालमिज मक्खी (डाईनूरिया लिनी बारनस) : अलसी की कली के पैर लंबे होते हैं और पंख के पीछे वाले भाग पर बाल पाए जाते हैं. मादा दिन के समय एकल या गुच्छों में फूलों की बाहरी पत्ती पर अंडे देती है. अंडों से 1 या 2 दिनों में फूट कर मैगेट निकलते हैं. मैगेट कली में छेद कर के अंदर घुस जाते हैं और अंदर से फूल को खा जाते हैं. ये पूरी फसल को नष्ट कर देते हैं और फूल को बीज बनाने से रोकते हैं.

रोकथाम

* मैगेट परजीवी चालसिड तैयतैंयां सिसटैसिस डैसूनेरी मैगट की मात्रा को कम करने में सहायक होगा.

* जरूरत के हिसाब से कीटनाशी रसायन साइपरमेथ्रिन 25 फीसदी की 350 मिलीलीटर मात्रा या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 1 मिलीलीटर मात्रा या डाइमिथोएट 30 ईसी या मेटासिसटाक्स 25 ईसी की 1.25-2.0 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

* कार्बारिल 10 फीसदी डीपी का 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकाव करें.

लीफ माइनर या पर्ण सुरंगक कीट (फाइटोमाइजा होर्टीकोला) : लीफ माइनर अलसी का बहुभक्षी कीट है. भारत में वयस्क मक्खी चमकीले गहरे रंग की होती है. लीफ माइनर अलसी की फसल की 25 फीसदी पत्तियों को नुकसान पहुंचाता है. इस का प्रकोप अधिकतर फरवरी व मार्च में होता है. लीफ माइनर के मैगेट पत्ती के निचले व ऊपर के बीच को खाते हैं और पत्ती की शिराओं में सुरंग बना लेते हैं.

रोकथाम

* प्रकोप होने पर 5 फीसदी एनएसकेई का छिड़काव करें.

* ज्यादा प्रकोप होने पर?थायोमिथाक्सोम 25 डब्ल्यूपी 100 जी या क्लोथिनीडीन 50 फीसदी डब्ल्यू डीजी की

20-24 ग्राम मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें या डाईमिथोएट 30 ईसी का 1.0-1.5 लीटर या मेटासिसटाक्स का 1.5-2.0 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

फलभेदक कीट (हेलिकोवर्पा आर्मीजेरा) : इस कीट की मादा अलसी की पत्तियों व बाह्यदल पुंज की निचली सतह पर हलके पीले रंग के खरबूजे की तरह धारियों वाले अंडे एकएक कर के देती है. इस की सूंड़ी चढ़ने वाली सूंड़ी से अलग होती है. नवजात सूंड़ी फूल, कली और एक समय के लिए कैपसूल में घुस जाती है और कैपसूल के अंदर का न्यूट्रैंट खा जाती है. सूंड़ी कैपसूल से बाहर निकल कर पत्ती खाती है और फिर दूसरे कैपसूल में घुस जाती है.

रोकथाम

सूंड़ी की पहली अवस्था दिखाई देते ही 250 एलई के एचएएनपीवी को 1 किलोग्राम गुड़ व 0.1 फीसदी टीपोल में मिला कर छिड़काव करें. फिर 5 फीसदी एनएसकेई का छिड़काव करें. प्रकोप बढ़ने पर क्विनोलफास 25 ईसी या क्लोरपायरीफास 20 ईसी का 2 मिलीमीटर प्रति लीटर या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल का 1 मिलीमीटर प्रति लीटर की दर से छिड़काव करें. स्पाइनोसैड 45 एससी व थायोमेंक्जाम 70 डब्ल्यूएससी का 1 मिलीमीटर प्रति लीटर की दर से इस्तेमाल करें.

सेमीलूपर (प्लूसिया ओरिचेल्सिया) : इस कीट की सूंड़ी पीठ को ऊपर उठा कर या अर्धलूप बनाती हुई चलती है, इसलिए इसे सेमीलूपर कहा जाता है. सूंड़ी की आखिरी अवस्था अलसी के फूल, कली व पत्ती को खाती है. ऊपर चढ़ने वाली सूंड़ी हमेशा जमीन से ऊपर के पौधे के हर भाग को काटती है. सेमीलूपर भारत के विभिन्न भागों में पाई जाती है. यह फलसब्जी की फसल के साथ ही अलसी की फसल को भी खाती है.

रोकथाम : खेत में 20 फेरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से लगाएं. खेत में परजीवी पक्षियों के बैठने के लिए 10 ठिकाने

प्रति हेक्टेयर के हिसाब से लगाएं. प्रकोप बढ़ने पर क्लोरपायरीफास 20 ईसी 1 लीटर

प्रति हेक्टेयर या नीम का तेल 3 फीसदी की दर से छिड़कें.

बिहारी बालदार सूंड़ी (स्पाइलोसोपा ओबलिक्वा) : मादा अपने जीवनकाल में 800 से 1000 अंडे देती है. अंडे 3-5 दिनों में फूट जाते हैं. अंडों से निकली छोटी सूंडि़यां शुरू में एक जगह पर झुंड में चिपकी रहती हैं. फिर 1-2 दिनों में अलगअलग बिखर जाती हैं. विकसित सूंड़ी गहरे नारंगी या काले रंग की होती है, जिस के शरीर पर चारों तरफ घने बाल होते हैं. ये पौधे की पत्तियों की निचली सतह को खा जाती है.

रोकथाम : सूंड़ी दिखाई देते ही एसओएनपीवी की 250 एलई या 3 ग 1012 पीओबी का प्रति हेक्टेयर की दर से 7-8 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें. फसल में फालिडाल धूल 2 फीसदी का 20-25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए. स्पाइनोसैड 45 एससी, इंडोक्सकार्ब 14.5 एससी व थायोमेंक्जाम 70 डब्ल्यूएससी का 1 मिलीमीटर प्रति लीटर की दर से इस्तेमाल करें.

कटाईमड़ाई व भंडारण : जब फसल की पत्तियां सूखने लगें और कैप्सूल भूरे रंग के हो जाएं और बीज चमकदार बन जाएं, तब फसल की कटाई करनी चाहिए. बीजों में 70 फीसदी तक सापेक्ष आर्द्रता और 8 फीसदी नमी की मात्रा भंडारण के लिए अच्छी है.

उपज : अलसी की उपज सामान्यतया 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.        

अलसी  फसल में होने वाले खास रोग

गेरुआ रस्ट : यह रोग मेलाम्पेसोरा लाईनाई नाम के कवक के कारण होता है. रोग का प्रकोप शुरू होने पर चमकदार नारंगी रंग के धब्बे पत्तियों के दोनों ओर बनते हैं. धीरेधीरे ये पौधे के सभी भागों में फैल जाते हैं. इस की वजह से उपज व बीज में तेल की मात्रा में कमी आ जाती है.

रोकथाम : 15 से 20 किलोग्राम गंधक का बुरकाव करें या 2 किलोग्राम डाईथेन जेड 78 को 500 से 700 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें. रोग से बचाव के लिए फरवरी में घुलनशील गंधक 0.2 फीसदी या मैंकोजेब का छिड़काव करें. रोगरोधी किस्में आर 552 टी 397 जेएलएस 9 को लगाएं और जंगली अलसी के पौधे अगर खेत के आसपास हों तो उन्हें उखाड़ दें.

उकठा विल्ट : यह अलसी का खास नुकसानदायक रोग है. इस रोग का प्रकोप अंकुरण से ले कर पकने तक कभी भी हो सकता है. रोगी पौधों की पत्तियों के किनारे अंदर की ओर मुड़ कर मुरझा जाते हैं. इस रोग का फैलाव फसल अवशेषों द्वारा होता है. इस के रोगजनक मिट्टी में मौजूद फसल अवशेषों और मिट्टी में रहते हैं और साथ सही वातावरण में पौधों पर संक्रमण करते हैं.

रोकथाम : फसल पर रोग के लक्षण दिखाई देते ही आइप्रोडियोन की 0.2 फीसदी या मैंकोजेब की 2.25 फीसदी या कार्बेंडाजिम 12 फीसदी मैंकोजेब 63 फीसदी की 2 ग्राम पत्तियों का पत्ती पर छिड़काव करना चाहिए.

अल्टरनेरिया अंगमारी : इस रोग से अलसी के पौधे का पूरा भाग प्रभावित होता?है. लेकिन सब से ज्यादा असर फूलों व खास भागों पर दिखाई देता है. फूलों की पंखुडि़यों के निचले हिस्सों में गहरे रंग की लंबाई में गहरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. माकूल वातावरण में धब्बे बढ़ कर फूल निकलने से पहले ही सूख जाते हैं. इस प्रकार रोगी फूलों में दाने नहीं बनते हैं.

रोकथाम : बीजों को बोआई से पहले कार्बेंडाजिम या थार्योफलेट मिथाइल की 3 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए. फसलों पर रोग के लक्षण दिखाई देते ही आइप्रोडियोन की 0.2 फीसदी या मैंकोजेब की 2.25 फीसदी या कार्बेंडाजिम 12 फीसदी मैंकोजेब 63 फीसदी की 2 ग्राम मात्रा का पर्णिल छिड़काव करना चाहिए.

पाउडरी मिल्ड्यू : यह कवक से होने वाला रोग है. इस के कारण पौधों की नई शाखाओं के सिरों पर भूरा या सफेद आटे जैसा पाउडर दिखाई देता है और बाद में पत्तियों व फलों पर फफूंद का आक्रमण होता है. रोगी पौधों की पत्तियां गिरने लगती हैं और दाने सिकुड़ जाते हैं.

रोकथाम : इस रोग का पहला लक्षण देखते ही फसल पर 2.5 किलोग्राम घुनशील गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से 650 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए. सल्फेक्स या कार्बेंडाजिम 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल कर पत्तियों पर छिड़काव करना भी काफी फायदेमंद होता है.

नकदी फसल: तंबाकू की खेती

आमतौर पर किसानों के लिए नकदी फसलें कम लागत व कम समय में ज्यादा लाभ देने वाली मानी जाती हैं. नकदी फसलों की प्रोसेसिंग व मार्केटिंग के बारे में जानकारी ले कर किसान अच्छा फायदा ले सकते हैं. इन्हीं नकदी फसलों में तंबाकू की खेती खास है. तंबाकू की खेती न केवल कम समय में की जाती है, बल्कि इस के मामले में किसानों को मार्केटिंग के लिए इधरउधर भटकना नहीं पड़ता है. तंबाकू की फसल की कटाई व प्रोसेसिंग के बाद किसान के खेत से ही फसल की बिक्री आसानी से हो जाती है. भारत में तंबाकू की कई किस्में उगाई जाती हैं. किन किस्मों को उगाना है, यह उस के अलगअलग इस्तेमाल पर निर्भर करता है. घाटे की खेती से उबरने के लिए तंबाकू की खेती एक अच्छा तरीका साबित हो सकती है.

तंबाकू की खेती कई तरह की मिट्टियों में की जा सकती है. हलकी दोमट, मध्यम दोमट, मिश्रित लाल व कछारी मिट्टियां इस के लिए ज्यादा मुफीद मानी जाती हैं, लेकिन ऐसी मिट्टियों में तंबाकू की पत्तियां मोटी, खुरदरी व बड़ी हो जाती हैं. ऐसे में इस फसल का इस्तेमाल हुक्का व बीड़ी बनाने के लिए किया जा सकता है. तंबाकू की खेती के लिए हलकी भुरभुरी मिट्टी ज्यादा अच्छी मानी गई है. इस में पैदा किए जाने वाले तंबाकू की गुणवत्ता व स्वाद ज्यादा अच्छा माना जाता?है, जिस का इस्तेमाल सिगार व सिगरेट वगैरह में किया जाता है.

खेती की तैयारी : तंबाकू की खेती के लिए सब से पहले नर्सरी डाली जाती है. नर्सरी के लिए हलकी भुरभुरी मिट्टी ज्यादा अच्छी होती है. नर्सरी डालने से पहले खेत की अच्छी तरह से जुताई कर के मिट्टी भुरभुरी बना लेनी चाहिए. 12 एकड़ खेत में तंबाकू की फसल रोपने के लिए 1 बीघे रकबे में नर्सरी डाली जाती है, जिस के लिए 1 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. नर्सरी में बीज डालने से पहले खेत को समतल कर के पाटा लगा देना चाहिए और सही नमी की अवस्था में रोपे जाने वाले खेत के रकबे के अनुसार नर्सरी में बीज की मात्रा डालनी चाहिए. क्षारीय मिट्टी में तंबाकू की फसल लेने से बचना चाहिए, क्योंकि इस मिट्टी में काली जड़ गलन बीमारी का प्रकोप पाया जाता है. तंबाकू की अलगअलग किस्मों के अनुसार इस की नर्सरी का समय तय किया जाता है. आमतौर पर नर्सरी डालने के लिए अगस्त के आखिरी हफ्ते से नवंबर के दूसरे हफ्ते तक का समय ज्यादा अच्छा माना जाता है. नर्सरी डालने के डेढ़ महीने बाद नर्सरी से तंबाकू के पौधों को उखाड़ कर खेत में रोपाई की जाती है. नवंबर महीने में डाली गई नर्सरी की रोपाई जनवरी के पहले हफ्ते तक की जा सकती है.

तंबाकू की प्रमुख किस्में : खाने वाले तंबाकू की खास किस्मों में पीटी 76, हरी बंडी, कोइनी, सुमित्रा, रंगपुर, ह्यइट वर्ले, भाग्य लक्ष्मी, सोना, गंडक बहार, पीएन 70, एनपी 35, प्रभात, डीजी 3 व डीजी 47 वगैरह प्रमुख मानी गई हैं. वहीं हुक्का, बीड़ी, सिगार व चुरुट के लिए एनपी 220, टाइप 23, टाइप 49, टाइप 238, पटुवा, फरुखाबाद लोकल, मोतीहारी, कलकतिया, पीएन 28, एनपीएस 219, पटियाली, सी 302 लकडा, एनपीएस 2116, चैथन, हरिसन स्पेशल, वर्जिनिया गोल्ड, जैश्री, धनादयी, कनकप्रभा, सीटीआरआई स्पेशल, जीएसएच 3, के 49, जी 6 आनंद 119, लंका 27, डीआर 1, भवानी स्पेशल व ओके 1 वगैरह उम्दा किस्में मानी गई हैं. इन किस्मों को अगस्त से नवंबर तक नर्सरी में डाला जा सकता है.

रोपाई की तैयारी : तंबाकू के पौधों की रोपाई 1 से डेढ़ महीने के भीतर खेत में कर देनी चाहिए. पौधों की रोपाई के लिए खेत में प्रति एकड़ की दर से 4 ट्राली गोबर की खाद, 50 किलोग्राम डीएपी, 25 किलोग्राम पोटाश व 10 किलोग्राम यूरिया का बुरकाव करना चाहिए. इस के बाद इस खाद को मिट्टी में मिला कर अच्छी तरह से जुताई कर के पाटा लगा देना चाहिए. नर्सरी से पौधों को उखाड़ने से 2 दिन पहले खेत की हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए. इस के बाद खेत में नमी की सही मात्रा रहते ही लाइन से लाइन व पौध से पौध की दूरी ढाई फुट रख कर रोपाई करनी चाहिए. 1 एकड़ खेत में रोपाई के लिए करीब 10000 तंबाकू के पौधों की जरूरत पड़ती है. रोपाई के करने के बाद हजारे से पौधों को पानी देना चाहिए. ज्यादा रकबे की रोपाई के तुरंत बाद हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए.

खाद व उर्वरक : रोपाई के 1 महीने बाद 80 किलोग्राम यूरिया प्रति एकड़ की दर से डेढ़ महीने के अंतर पर व दूसरी व तीसरी बार 20-20 किलोग्राम की मात्रा देनी चाहिए. तंबाकू की गुणवत्ता अच्छी हो, इस के लिए कोशिश करें कि फसल में रासायनिक खादों की जगह वर्मी कंपोस्ट, कंपोस्ट खाद व गोबर की खाद का इस्तेमाल किया जाए.

सिंचाई व खरपतवार : तंबाकू की रोपाई के बाद हर 15 दिनों पर सिंचाई करते रहना चाहिए. फसल कटाई के 15 दिनों पहले खेत की सिंचाई रोक दी जाती है. फसल की अच्छी पैदावार व गुणवत्ता के लिए पहली निराई 10-15 दिनों बाद करनी चाहिए. फसल में घासफूस के नियंत्रण के लिए जरूरत के हिसाब से 3 बार निराई करना जरूरी होता है.

बीमारियां व कीट : तंबाकू की फसल में मोजैक बीमारी का ज्यादा प्रकोप देखा गया है. इस के अलावा शुरुआती अवस्था में आग्र पतन, चित्ती, पडकुंचन रोगों का प्रकोप पाया जाता है. इस के अलावा तंबाकू की सूंड़ी, इल्ली, गिडार, तना छेदक, माहू, कटुआ व दीमक कीटों का प्रकोप देखा गया है. ये सभी कीट व रोग पौधों को पूरी तरह खत्म कर देते हैं. कीटों की रोकथाम के लिए कार्बेनिल 10 फीसदी धूल का छिड़काव फसल में कीट का प्रकोप दिखाने के समय ही कर देना चाहिए. इस के अलावा क्लोर पायरीफास 20 ईसी या प्रोफेनोफास 50 ईसी का छिड़काव करना चाहिए. बीमारी की रोकथाम के लिए कार्बेंडाजिम, मैंकोजेब, थीरम, मेटालेक्जिल, डीनोकेप दवाओं का इस्तेमाल करना चाहिए. तंबाकू की फसल के लिए ज्यादा पाला व ज्यादा बारिश भी नुकसानदेह होती है. ज्यादा पाले व बारिश की दशा में फसल के सूखने व बरबाद होने के आसार बढ़ जाते हैं. ऐसे में ज्यादा बारिश व पाले वाली जगहों पर तंबाकू की खेती करने से बचना चाहिए.

फुनगों की तोड़ाई : तंबाकू की फसल में अच्छी गुणवत्ता व पैदावार बढ़ाने के लिए उस के फुनगों की तोड़ाई करना जरूरी होता है. जब फसल 60 दिनों की हो जाए, तो हर 10 दिनों के बाद 3 बार फुनगों की तोड़ाई की जानी चाहिए. यह कोशिश करें कि पौधों में 9 से 10 पत्ते ही आने पाएं.

पौधों की कटाई : खाने वाले तंबाकू की फसल 120 दिनों में, बीड़ी वाले तंबाकू की फसल 140 से 150 दिनों में और सिगार व चुरुट वाले तंबाकू की फसल 90 से 100 दिनों में कटाई के लायक हो जाती है. पौधों की पत्तियां जब हरी हों तभी उन की कटाई कर देनी चाहिए और कटाई के बाद 3 दिनों तक पौधों को खेत में ही छोड़ देना चाहिए. जब पत्तियां पीली पड़ जाएं तो उन को खेत से उठा कर सही जगह पर दोबारा फैला कर सूखने के लिए छोड़ देना चाहिए. इस दौरान खाने वाले तंबाकू की नसों पर चीरा लगाना जरूरी होता है. सूखने के दौरान तंबाकू में नमी व सफेदी जितनी ज्यादा आती है उतना ही अच्छा गुण, रंग, स्वाद व गंध पैदा होती है. ऐसे में तंबाकू की पलटाई समय से करते रहना चाहिए. इस से किसानों को तंबाकू का अच्छा मूल्य मिल जाता?है. घर पर करीब 1 हफ्ते तक सुखाने के बाद पत्तियों में चीरा लगा कर अलगअलग किया जाता है. उस के बाद कुछ दिनों के लिए पत्तियों को पालीथीन से ढक कर सुगंध पैदा करने के लिए छोड़ दिया जाता?है. जब उन मेंअच्छी सुगंध उठने लगती है, तो इस की गठिया बांध कर इस में पानी का छिड़काव कर के छटका जाता है. जब इस में सफेदी आने लगे तो यह मान लिया जाता है कि तंबाकू की गुणवत्ता अच्छी स्थिति में हो गई है.

मार्केटिंग व लाभ : तंबाकू किसान ओमप्रकाश का कहना है कि ज्यादातर मामलों में खेत में खड़ी फसल ही बिक जाती है, जिसे व्यापारी करीब 25000 रुपए प्रति बीघे की दर से लेते हैं. तंबाकू की 1 एकड़ फसल के लिए करीब 15000 रुपए की लागत आती है, जबकि 1 एकड़ से फसल अच्छी होने की दशा में 4 महीने में करीब 1 लाख रुपए की आमदनी होती है. इस प्रकार लागत मूल्य को निकालने के बाद शुद्ध आमदनी करीब 85 हजार रुपए प्रति एकड़ हो जाती है. भारतीय तंबाकू की ज्यादा मांग बाहरी देशों में होने के कारण अच्छा मूल्य मिलता है. भारत द्वारा उत्पादित तंबाकू अमेरिका, रूस, फ्रांस, अफ्रीका, ब्रिटेन, सिंगापुर, बेल्जियम, हांगकांग, चीन, नीदरलैंड व जापान वगैरह देशों को भेजा जाता है. ऐसे में किसान विदेशी निर्यातक व्यापारियों से संपर्क कर के अपनी उपज का अच्छा दाम पा सकते हैं.

तंबाकू की खेती से किसान हुआ मालामाल

बस्ती जिले के परशुरामपुर ब्लाक की पश्चिमी सीमा पर स्थित गांव मदनापुर के रामराज वर्मा के परिवार में कुल 25 लोग हैं. 40 साल पहले उन के पास केवल 12 बीघे जमीन थी, जिस पर वे पारंपरिक रूप से धान व गेहूं की फसल ले रहे थे. लेकिन उन्हें इस खेती से कोई खास फायदा नहीं मिल रहा था. ऐसे में वे अपने आसपास के किसानों से व्यावसायिक खेती के बारे में पता करते रहते हैं. एक बार वे किसी काम से गोंडा जिले के नवाबगंज ब्लाक में गए थे. उन्होंने वहां किसानों को तंबाकू की खेती करते देखा. जब उन्होंने वहां के किसानों से तंबाकू की खेती के बारे में जानकारी ली, तब उन्हें पता चला कि तंबाकू की खेती से कम समय में अच्छा फायदा मिल सकता है. ऐसे में घर आ कर उन्होंने परिवार के लोगों से तंबाकू की खेती किए जाने पर बातचीत की. सभी लोगों की रजामंदी के बाद उन्होंने अपने 2 एकड़ खेत में तंबाकू की खेती की शुरुआत की. पहली बार उन्हें कोई खास फायदा नहीं हुआ, लेकिन तंबाकू की तैयार फसल बेचने में किसी तरह की परेशानी नहीं आई.

तंबाकू बाजार ने बढ़ाया जोश : किसान रामराज वर्मा ने तंबाकू की बिक्री को देखते हुए इस की व्यावसायिक व वैज्ञानिक खेती का फैसला ले दिया था. तंबाकू की फसल से उन्हें 2 एकड़ खेत से साल 1974 में करीब 5000 रुपए की आमदनी हुई. उन्होंने तंबाकू की खेती से हुई आमदनी के पैसे से 15 एकड़ खेत लीज पर ले कर तंबाकू की खेती की. इस बार उन्हें करीब 25000 रुपए की आमदनी हुई. वे तंबाकू की गुणवत्ता का विशेष खयाल रखते थे, जिस से तंबाकू व्यापारी उन के घर से तैयार फसल को खरीद कर ले जाते थे. किसान रामराज के परिवार के 25 लोग लगातार तंबाकू की खेती में लगे रहे और करीब 5 सालों में वे किराए की 25 एकड़ जमीन पर तंबाकू की खेती करने लगे थे.

3 एकड़ खेत से 50 एकड़ खेत के बने मलिक

यह किसान रामराज वर्मा  की मेहनत का ही फल था कि उन्हें लगातार तंबाकू की खेती से फायदा मिलता रहा. ऐसे में उन्होंने तंबाकू की खेती से कुछ ही सालों में अच्छा फायदा लेना शुरू कर दिया था. फायदे के इस पैसे का इस्तेमाल उन्होंने परिवार के सदस्यों की संख्या को देखते हुए जमीन की खरीदारी में किया और वे हर साल तंबाकू की फसल से होने वाले फायदे के पैसे से कुछ न कुछ जमीन खरीदते रहे. अपनी मेहनत की वजह से वे करीब 40 सालों में 200 बीघे खेत के मालिक बन गए. 2 एकड़ खेत में शुरू की गई तंबाकू की खेती वर्तमान में 15 एकड़ तक पहुंच गई है, जिस से वे अच्छी आमदनी ले रहे हैं.

इस के अलावा उन्होंने खेती व उस से जुड़े रोजगारों में भी परिवार के सदस्यों को जोड़ लिया. तंबाकू की खेती के अलावा वे बागबानी फसलों की तरफ भी मुड़े. आजकल वे 25 बीघे खेत में टिश्यूकल्चर विधि से तैयार की गई केले की जी 9 व रोबेस्टा प्रजाति की खेती कर रहे हैं. केले की खेती से अच्छा फायदा लेने के लिए उन्होंने परिवार के सदस्य ओमप्रकाश को जिम्मेदारी सौंप रखी है. ओमप्रकाश तैयार केले की फसल को नजदीकी मंडी में ले जाते हैं, जिस से बिचौलियों की वजह से नुकसान नहीं होने पाता है.                         

जैविक खेती के लिए पशुपालन

किसान रामराज वर्मा ने अपने खेतों में बोए गए तंबाकू व बागबानी फसलों में कैमिकलयुक्त खादों व उर्वरकोें के इस्तेमाल में कमी लाने के लिए 16 दुधारू पशुओं को पाल रखा है, जिन से प्राप्त होने वाले मलमूत्र का इस्तेमाल वे गोबर गैस प्लांट में करते हैं और गोबर गैस से प्राप्त अवशिष्ट का प्रयोग जैविक खाद के रूप में करते हैं. किसान रामराज वर्मा ने यह साबित कर दिया है कि अगर व्यावसायिक फसलों की खेती उन्नत तरीके से की जाए तो न केवल वह किसान के लिए फायदेमंद बन सकती है, बल्कि उस से दूसरे लोगों को भी जोड़ा जा सकता है. उन की तंबाकू की खेती से होने वाले लाभ को देखते हुए गांव के तमाम लोगों ने तंबाकू की खेती को अपना कर अपनी माली हालत को मजबूत किया है.

किसान रामराज वर्मा से तंबाकू की खेती के गुर सीखने के लिए दूसरे जिलों के लोग भीउन के खेतों तक चल कर आते हैं. दूसरे जिलों से आए किसानों को रामराज वर्मा न केवल तंबाकू की खेती से जुड़ी तकनीकी जानकारी देते हैं, बल्कि उस की प्रोसेसिंग, गुणवत्ता निर्धारण व मार्केटिंग के बारे में भी बताते हैं.

जड़ की पूजा जीवित की उपेक्षा

मंदिरों में घंटियां बजती हैं, मसजिदों में अजान होती है, चर्चों में प्रार्थना होती है कि समस्याएं दूर हो जाएं, लेकिन थानों में रपट लिखाने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही है, अस्पतालों के भवन बनते जा रहे हैं फिर भी मरीजों के लिए बैडों की कमी पड़ रही है, न्यायालयों में मुकदमों का अंबार लगा है. आखिर माजरा क्या है? ऐसा क्यों है? क्या यह सोचने की बात नहीं है?

मनुष्य की उत्पत्ति और सभ्यता के विकास से अब तक जितनी जीव हत्याएं बाघ, भालू, सांप, बिच्छू आदि जंगली जानवरों के मारनेकाटने से नहीं हुईं, उस से ज्यादा आदमी की धर्मांधता से हुईं. दूसरों पर अपने विचारों को जबरन थोपने, लादने की कोशिश से हुईं. चाहे वे पुराने यूरोप में धर्म के नाम पर लड़े गए दीर्घकालिक युद्ध हों या साम्यवादी नरसंहार या हिरोशिमा और नागासाकी की भयानक त्रासदी.

आज के युग में ओसामा बिन लादेन और तालिबान तथा आईएसआईएस के बगदादी और उस के बेवकूफ लड़ाके, सभी मनुष्य और मनुष्यता को ही नष्ट कर रहे हैं. प्रकृति का अनमोल सृजन ‘मनुष्य’ नजरअंदाज कर दिया गया है.

आदमी जो अनगढ़ धरती को सुघड़, सुंदर और जीवन को कल्याणकारी बनाने का सतत प्रयास करता रहा है, वह आज विचारणीय विषयों के केंद्र बिंदु से दूर कहीं उपेक्षित रह गया है.

मनुष्य, जिस की सृजनशीलता, पांवों में गड़ने वाली काठ की खड़ाउओं से आगे बढ़ कर नरम, आरामदेह जूतों, चप्पलों, गुफाओं कंदराओं से निकल कर सर्वसुविधासंपन्न सुंदर भवनों, जंगलों के कंटीले झाड़झंखाड़ों से आगे बढ़ कर मनमोहक फूलों से सजे पार्कों, वनों से जीवन को मधुवन बनाती है. आज धर्म की आग में जल जाने के खतरे में है. मनुष्य जो चिकनी सड़कों, आरामदेह सवारियों, नयनाभिराम दृश्यों, मधुर संगीत वाली फिल्मों का निर्माता है, आदरभाव से वंचित हो रहा है. जगत और जीवन में जो कुछ आकर्षक और रसमय है, वह मनुष्य की क्रियाशीलता, सृजनशीलता को दर्शाता है. कहने का मतलब दुनिया में जीवन को जीने लायक जो भी प्रयास तथा उपक्रम किया गया है, वही जीवित प्राणी मनुष्य के लिए पूजने के लायक है.

कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सुरक्षा, आराम और शांति के क्षेत्र में हो रहे नित्य नए शोध और उन से प्राप्त प्रशंसनीय परिणाम किस बात के द्योतक हैं? निसंदेह ये मनुष्य के जड़ता से चेतना की ओर सतत अग्रसर होने के घोतक हैं. ये जीवन में सत्यं, शिवम और सुंदरम की ओर की यात्रा की निशानी हैं. उसे पा लेने की ललक के परिणाम हैं.

प्राचीन चिंतकों, विचारकों या मसीही विचारकों, उपदेशकों या इसलाम धर्म के प्रवर्तक पैगंबर सब के चिंतन के केंद्रबिंदु में जीवन और जगत कहां गया. पर साथ ही उसे थोपने की कोशिश भी थी सत्य, अहिंसा, दया, प्रेम भाव, सेवा भाव और रहमान का रहम किस के लिए? संसार की सामाजिक, आर्थिक विसंगतियों और उन का कुपरिणाम भोग रहे गरीब, मजदूर, निरीह लोगों की दुर्दशा देख कर ही तो कार्ल मार्क्स का मन कड़वाहट से भर गया होगा.

बुराइयों, कमियों, दोषों को दूर करते रहना लगातार काम है. ठहरा पानी गंदा होगा ही पर आधुनिक विज्ञान और टैक्नोलौजी ने इस सफाई को और अधिक आसान बनाया है. इंटरनैट के गूगल, फेसबुक आदि की वैबसाइट पर किसी विचार अथवा बात को डालिए और देखिए कितनी तेजी से वह वायरल हो जाता है. कितनी तेजी से और कितनी जल्दी उस पर प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो जाती हैं जो कुछ काम की होती हैं पर ज्यादातर की जानकारी वाले लोगों की पोल खोलने वाली होती है. जो भी आदमी दकियानूसी विचारों से बंधा रहेगा, वह तेजी से बदलती इस दुनिया में पिछड़ जाएगा. आसपास अनेक उदाहरण मिल जाएंगे.

कुछ वर्ग, मजहब, संप्रदाय के लोग अपने पुरातनपंथी, पोंगापंथी, दकियानूसी विचारों से बंधे होने के कारण ही पिछड़े हैं. उन का पिछड़ापन केवल उन के लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी नुकसानदेह है. आधुनिक ज्ञानविज्ञान की बात उन की सोच और समझ से परे है. जिस अंधभक्ति में वे अटकेभटके हैं, वह अपनी स्थापना के समय भले ही उपयुक्त और उपयोगी रही हो लेकिन आज वह अशांति, आतंकवाद और अराजकतावाद का कारण बन गई है. इंसानियत कराह रही है. जो पूंजी व साधन जीवन को और अधिक सुखमय, सुंदर बनाने में लगता, वह संकीर्ण विचारों से उत्पन्न तोड़ने के अभियानों से निबटने में लग रहा है. बाबाओं और मुल्लाओं आदि के विचार और व्यवहार कभी भी नए, स्वस्थ व सुंदर नहीं हो सकते.

अच्छी जिंदगी के लिए संसार में शांतिव्यवस्था चाहिए. परंतु फिलिस्तीन, इराक, सीरिया, अफगानिस्तान आदि देशों में शांतिव्यवस्था है? और नहीं तो एक खास तरह के रूढि़वादी विचारों की विषबेल यूरोप, अमेरिका तक फैलने लगी है. चीन का एक खास प्रांत, बंगलादेश और भारत भी इस से पीडि़त है.

संसार अपार है और जीवन क्षणभंगुर है जैसे नैगेटिव विचारों के उलट प्रकृति और सृष्टि के अनमोल और अनूठे उपहार जीवन से प्यार करना होगा. पलपल को आनंद की अतल गहराई तक जी लेना होगा. जीवन निरर्थक है, जैसे निराशावादी चिंतन करतेकरते, सुना जाता है काफ्का जैसे कुछ विचारकों ने आत्महत्या कर ली थी.

सदियों पुराने आरण्यक, उपनिषदों, वेदांतों और पैगंबर की पैदाइश से समय तथा संसार दूर, बहुत दूर आ गया है और आगे चल रहा है व चलता जाएगा. बहता पानी साफ रहता है. चारों तरफ से बंधों से घिरा पानी सड़ जाता है, उस में काई लग जाती है, सेवार उग आता है. प्रकृति का यही नियम सोच के साथ भी लागू है. जो विचार समय के हिसाब से ढलते नहीं हैं, उन में सीमेंट जम जाती है.                       

दर्द जो नासूर बन कर रहेगा

अकेली औरतें चाहे कितनी ही बोल्ड, शिक्षित व समर्थ हों, जब यौन हिंसा की बात हो तो वे किस आसानी से शिकार हो सकती हैं यह उस अमेरिकी युवती के मामले से साफ है जिस का 5 माह पहले 5 लोगों ने, जिन में से एक उन का गाइड भी था, उसी के पांच सितारे होटल के कमरे में बलात्कार किया और इस बुरी तरह डराया कि वह अगले ही दिन अमेरिका चली गई और अब जा कर उस में शिकायत करने की हिम्मत आई और उस ने ईमेल से शिकायत भेजी. अकेली युवतियों को यात्रा के दौरान बहुतों को अपना साथी बनाना पड़ता है पर वे साथी कब धोखा दे दें, बलात्कार कर लें, लूट लें, इमोशनल व एकतरफा प्यार में बांध लें या केवल यूज ऐंड थ्रो कर डालें पता नहीं चलता. पुरुष चाहे कितना सभ्य, सुसंस्कृत दिखे, कब धोखा दे दे और औरत के अकेलेपन का लाभ उठा ले, यह कहा नहीं जा सकता.

इस तरह का मामला केवल भारत में होता हो, ऐसा नहीं, बलात्कार दुनिया भर में होते हैं और अमेरिकी राष्ट्रपति चुने गए डोनाल्ड ट्रंप ने तो एक वीडियो क्लिप में उन के जननांग को अकारण पकड़ लेने तक की हिम्मत का रौब मार डाला था और फिर भी वह जीत गए. अमेरिकी समाज ने ऐसे व्यक्ति को चुना जो अपनी मर्दानगी का सुबूत औरतों को मनचाहे ढंग से इस्तेमाल करने में विश्वास करता हो. इस औरत को न्याय दिलाने के चक्कर में हो सकता है कि पांचों को ढूंढ़ निकाला जाए और उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया जाए पर उस औरत ने जो उन घंटों में, जब उस का बारबार 5 जनों द्वारा बलात्कार हुआ, जो दहशत सही वह किसी भी सजा से कम नहीं हो सकती.

हमारा समाज, दुनिया भर का, ऐसा है कि वह बलात्कार को केवल शारीरिक हिंसा नहीं मानता, कहीं न कहीं औरत को दोषी मानता है और इसी का दंश औरत को अंदर तक चोट सहने में मजबूर करता है. सैकड़ों पुरुष मारपीट में घायल होते हैं, दुर्घटनाओं में उन का अंग भंग हो जाता है, लंबी बीमारियां हो जाती हैं पर औरत को बलात्कार के दौरान जो वेदना होती है और बाद में जो आत्मग्लानि होती है वह शारीरिक देन नहीं, सामाजिक देन है. समाज, कानून, पुलिस, अदालतों,  मीडिया और घरों ने ऐसा माहौल बनाया है कि जो शारीरिक क्रिया औरतें खुशीखुशी करती हैं यकायक बोझ बन जाती है. बलात्कार और सहमति से बने  यौन संबंधों में फर्क है तो वह सामाजिक, मानसिक देन है. यह थोपी हुई है.

उस अमेरिकी औरत का भारत की गंदी सामाजिक कानून व्यवस्था पर इतना ज्यादा अविश्वास था कि वह महीनों चुप रही. अमेरिका में भी औरतें बलात्कार के बाद दिनों, महीनों और सालों चुप रहती हैं, क्योंकि डर समाज का है जो अब पुरुष को दंड तो दिलवाने लगा है पर फिर भी विक्टिम को भी मानसिक जेल में ठूंस देता है. बहुत औरतें इस जहर को पी कर आगे चलना चाहती हैं पर असल में ऐसा हो नहीं पाता, क्योंकि माहौल ऐसा है कि बलात्कार की शिकार को जानेअनजाने एहसास दिलाया जाता है कि वह खुद भी गलत ही होगी और अब वह दूषित है, कुलटा है, त्याज्य है, अहिल्या है, सीता है, अक्षभ्य है.

स्टाकिंग एक अपराध

कुछ समय पहले गाजियाबाद की 24 वर्षीय युवती दीप्ति सरना, जो एक नामीगिरामी कंपनी में लीगल ऐग्जिक्यूटिव थीं, सुर्खियों में रहीं. कारण था, दीप्ति का दफ्तर से घर लौटते समय गायब होना, फिर 36 घंटे बाद घर लौटना, पता चला कि आपराधिक रिकौर्ड वाले देवेंद्र जिस का दिल दीप्ति पर आ गया था, के साथियों ने दीप्ति को अगवा कर लिया था.

पिछले एक साल में देवेंद्र ने दीप्ति का 150 बार पीछा किया था. दीप्ति कुछ दिन तक सदमे में रही और डर के मारे नौकरी छोड़ने तक की सोच चुकी थी. पुलिस की पूछताछ में सामने आया कि देवेंद्र ने फिल्म ‘डर’ से प्रेरित हो कर इस घटना को अंजाम दिया.

फिल्म ‘रांझना’ में भी इसी तरह हीरो को हीरोइन का पीछा करते, उसे अपने प्यार के लिए मनाने हेतु जबरदस्ती अपनी कलाई काटते दिखाया गया है, तो क्या यह भावना कि ‘होंठों पर तेरे ना है लेकिन दिल में हां है’, हमेशा बरकरार रहेगी? क्या हमारा समाज पश्चिमी समाज की भांति एक युवती की ना का मतलब ना स्वीकारना नहीं सीखेगा?

1996 में दिल्ली विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई कर रही छात्रा प्रियदर्शनी मट्टू की उस के अपने ही घर में बलात्कार के बाद गला घोंट कर हत्या कर दी गई थी. अपराध करने वाला संतोष सिंह कालेज में प्रियदर्शनी का सीनियर था और 2 वर्ष से उस का पीछा कर रहा था. प्रियदर्शनी ने उस के खिलाफ पुलिस में एफआईआर भी दर्ज कराई थी और उसे पुलिस द्वारा संरक्षण भी दिया गया था, लेकिन मौका पा कर उस ने अपराध को अंजाम दे दिया. इसी तरह 2011 में दिल्ली विश्वविद्यालय की एक और छात्रा 20 वर्षीय राधिका तंवर की उस का पीछा करने वाले 25 वर्षीय विजय ने गोली मार कर हत्या कर दी थी. कारण था बदला. विजय राधिका को करीब ढाई साल से परेशान कर रहा था और कुछ समय पूर्व राधिका के मित्रों ने विजय को राधिका का पीछा करने के लिए पीट दिया था.

क्या है कानूनी नजरिया

पीछा करना या स्टाकिंग का अर्थ है किसी की ओर दूसरे इंसान का अवांछित या जनूनी तौर से ध्यान देना. स्टाकिंग व्यवहार का संबंध उत्पीड़न और धमकी से भी है. पीडि़त का पीछा करना व उस पर निगरानी रखना भी इस के दायरे में आता है. स्टाकिंग अब कानूनी अधिकार क्षेत्र में आपराधिक आरोप के दायरे में आता है.

आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013, जो दिसंबर 2012 के निर्भया कांड के बाद आया, में स्टाकिंग को भी शामिल कर दिया गया. इस के अनुसार स्टाकिंग करना एक अपराध है और इस के तहत पकड़े जाने पर 3 साल तक की सजा व जुर्माना होगा. दूसरी बार पकड़े जाने पर 5 साल की सजा व जुर्माना होगा.

ऐसे कानून की काफी समय से आवश्यकता थी. पाकिस्तान में भी ऐसा कानून भारत से पहले लागू किया जा चुका है. अप्रैल, 2013 में यह कानून भारत में एक संशोधन द्वारा पारित किया गया और 9 माह की अवधि में पुलिस ने स्टाकिंग के 916 केस दर्ज किए.

आंकड़ों का सच

2014 की रिपोर्टों के अनुसार दिल्ली में रोज औसतन 4 स्टाकिंग की वारदातें होती हैं. अपराधिक कानून के संशोधन से पूर्व स्टाकिंग से निबटने का कोई कानून नहीं था और केस दर्ज ही नहीं हो पाते थे, लेकिन अब युवतियां आगे आ रही हैं.

मतों के अनुसार

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी का मानना है कि इस तरह के अपराधों से जुड़ी हर संभावना को ठीक से संभालने की तीव्र आवश्यकता है. वे चाहती हैं कि कोर्ट के पास ऐसे और्डर पास करने की शक्ति हो जिस से पीडि़त को किसी भी नुकसान से बचाया जा सके.

निवारक कार्यवाही के अभाव में जुर्म और भी बढ़ सकता है. अपराध विज्ञान में इसे ब्रोकेन विंडो थ्योरी कहते हैं. मान लीजिए किसी ने पत्थर फेंक कर किसी की खिड़की का कांच तोड़ दिया और मालिक ने खिड़की ठीक कराई, तो अगली बार वह अपराधी और बड़े जुर्म को अंजाम देगा. यह मानना है राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पूर्व मुख्य निदेशक संस्कार सेन का जो यूनिवर्सिटी औफ इंजीनियरिंग ऐंड मैनेजमैंट, जयपुर तथा इंस्टिट्यूट औफ इंजीनियरिंग ऐंड मैनेजमैंट, कोलकाता द्वारा आयोजित चर्चा ‘महिलाओं के प्रति बढ़ रहे अपराध’ पर बोल रहे थे. साथ ही उन्होंने दो बातों पर जोर दिया, ‘ऐसे कानून पूरी तरह लागू किए जाएं ताकि अपराधियों को जल्द से जल्द पकड़ा जा सके और अधिक महिला पुलिसकर्मियों की भरती हो.’

वाशिंगटन के नैशनल इंस्टिट्यूट औफ जस्टिस की शोधकर्ता कटरीना बौम ने 2009 में 3,41,6,460 पीडि़तों से पूछने पर पाया कि 36.6त्न लोग मानते हैं कि उन के स्टाकर का लक्ष्य था बदला व क्रोध, 32.9त्न का उत्तर था काबू पाना और 23.4त्न का उत्तर था दिमागी असंतुलन.

क्या सिर्फ कानून बना देना पर्याप्त है

कुछ छोटेमोटे अपराधी शायद मान जाएं और जेल या जुर्माने के डर से पीछे हट जाएं, लेकिन उन का क्या जो मानसिक कठोर किस्म के अपराधी हैं, वे आसानी से पीछे नहीं हटते, अपने शिकार को यह जताना कि उन में कितनी शक्ति है या फिर बदला लेने हेतु वे बलात्कार या हत्या करने पर अडिग रहते हैं. राधिका तंवर या प्रियदर्शनी भट्ट के केस इस का उदाहरण हैं.

क्या है इस का इलाज

अपराधी को पकड़ कर सिर्फ जेल में डाल देना इस समस्या का हल नहीं है. जब वह बाहर आएगा तब क्या होगा? जब तक अपराधी की मानसिकता का इलाज नहीं होगा, समस्या नहीं सुलझेगी. इस के लिए हम निम्न तरीके से आगे बढ़ सकते हैं :

– युवकों को यह सिखाते रहना कि युवतियां भी उन्हीं के बराबर हैं, वे कोई जोर आजमाइश की वस्तु नहीं. इस में कुछ वर्ष अवश्य लग सकते हैं, लेकिन यह करना आवश्यक है. – महिलाओं के प्रति हुए अपराधों को जल्द से जल्द निबटाना, उन का जल्द फैसला करने हेतु फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाना ताकि अपराधी इस बात से निश्चिंत न रह पाए कि यदि सजा हुई भी तो उस में सालों लग जाएंगे.

साइबर स्टाकिंग

जैसा कि नाम से ही समझ आता है. साबइर स्टाकिंग वह जुर्म है जब किसी व्यक्ति का दूसरा व्यक्ति औनलाइन पीछा करे, उस की निजी जिंदगी में दखल दे व उसे डराएधमकाए. भारत के पहले साइबर स्टाकिंग केस में मनीष कथूरिया को दिल्ली पुलिस ने हाल ही में पकड़ा. मनीष एक महिला ऋतु के छद्म नाम से अश्लील चैटिंग करता था, जिस के कारण ऋतु को कई अश्लील फोन आने लगे. सदमे में आई ऋतु ने पुलिस का सहारा लिया और पुलिस ने मनीष को गिरफ्तार कर लिया.

खुद को कैसे बचाएं

  1. साइबर स्टाकर लोगों की कमजोरियां ढूंढ़ता है. दोस्त बनाना, प्यार की खोज इत्यादि से वह अपना निशाना ढूंढ़ता है.
  2. वयस्कों को अपने परिवार, अपने साथी को फौरन बताना चाहिए. बिना यह सोचे कि शुरुआत किस की थी और गलती कहां हुई.
  3. बच्चों और टीनएजर्स को अपने अभिभावकों को फौरन बताना चाहिए. हो सकता है मातापिता से आप को डांट पड़ जाए कि क्यों बातचीत शुरू की, किंतु आगे होने वाली मुश्किलों से वे आप को बचा लेंगे.
  4. अपने शहर के पुलिस कमिश्नर के पास एक लिखित शिकायत दर्ज कराएं. अपने आईएसपी विक्रेता (जैसे बीएसएनएल) तथा ईमेल विक्रेता (जैसे याहू, हौटमेल) के यहां भी उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराएं.    

“दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी बन सकती हैं सिंधु”

पूर्व ऑल इंग्लैंड चैम्पियन प्रकाश पादुकोण ने कहा कि पीवी सिंधु निकट भविष्य में दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी बन सकती हैं. वहीं साइना नेहवाल के कोच विमल कुमार का मानना है कि ये दोनों ओलंपिक पद विजेता खिलाड़ी अगले पांच से छह साल तक विश्व बैडमिंटन में दबदबा बना सकती हैं.

साइना ने लंदन ओलंपिक 2012 में कांस्य पदक जीता था और ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बनी थी. सिंधु ने इस साल रियो ओलंपिक में रजत पदक जीता और यह उपलब्धि हासिल करने वाली पहली भारतीय महिला बनीं.

जूनियर खिलाड़ियों के लिए ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट की कार्यशाला के दौरान पादुकोण ने कहा कि निश्चित तौर पर सिंधु नंबर एक रैंकिंग हासिल करने में सक्षम हैं.

ट्रूकॉलर ने लॉन्च किया ‘कॉल मी बैक’ फीचर

पॉप्युलर एप ट्रूकॉलर ने एक नया फीचर 'कॉल मी बैक' लॉन्च किय  है. अभी इस फीचर को सिर्फ एंड्रॉयड यूजर्स के लिए पेश किया गया है. इसकी मदद से आप कॉल कनेक्ट न होने पर सामने वाले शख्स को कॉल बैक का रिक्वेस्ट भेज सकते हैं.

अगर आप किसी शख्स को कॉल करते हैं और वह किसी वजह से कॉल नहीं उठा पाता या उसका नंबर बिजी आता है तो आपको दो ऑप्शंस मिलेंगे. पहला फीचर है कॉल बैक करने का नोटिफिकेशन भेजने का और दूसरा है दोबारा कॉल करने का. यह फीचर आम यूजर्स के साथ-साथ ई-कॉमर्स और कूरियर कंपनियों के लिए भी सुविधाजनक होगा. इससे कंपनियों को डिलिवरी करने में सुविधा होगी.

ट्रूकॉलर के इस फीचर को इस्तेमाल करने के लिए कोई भी डायलर एप इस्तेमाल किया जा सकता है. अगर कोई ट्रूकॉलर यूजर किसी अन्य ट्रूकॉलर यूजर से कनेक्ट नहीं कर पाता है तो उसे दो ऑप्शंस मिलेंगे 'आस्क टु कॉल बैक' (Ask to all back) और 'कॉल ऐनीवे' (Call anyway). पहला विकल्प चुनने पर सामने वाले को नोटिफिकेशन मिलेगी कि कॉल बैक करे. दूसरे ऑप्शन को चुनने पर दोबारा कॉल लग जाएगा.

'आस्क टु कॉल बैक' और 'कॉल ऐनीवे' के ऑप्शंस तभी नजर आएंगे, जब रिसीवर का नंबर बिजी हो, कॉल वेटिंग पर हो, वह कॉल को रिजेक्ट कर दे या फिर किसी वजह से कनेक्शन न लग पाए. यह फीचर एंड्रॉयड एप के वर्जन 7.82 पर ही मिलेगा. अगर आपके स्मार्टफोन में यह वर्जन नहीं है तो आप इसे अपडेट कर सकते हैं.

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