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कीबोर्ड के इन शार्टकट्स से आसान हो जाएगा आपका काम

कम्प्यूटर पर काम करने वाले अधिकांश लोग माउस का इस्तेमाल करने के आदी होते हैं. कोई भी पुरानी फाइल ढूंढ़नी हो, कोई विंडो को छोटा करना हो, दो विंडो एक साथ ओपन करनी हों या फिर मॉनीटर पर चालू सभी प्रोग्राम को बंद करना हो इसके लिए अब आपको माउस छूने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

हम आपको कुछ ऐसे की-बोर्ड शार्टकट्स बताएंगे जो आपको लंबे प्रोसेस को शार्ट कर आपका काफी सारा वक्त बचाएंगे. जानिए कम्प्यूटर के ऐसे शार्टकट्स जिनका इस्तेमाल आप शायद अब तक नहीं करते थे.

Windows Key + Arrow

यह विंडो 7 का एक बहुत ही अच्छा फीचर है यह फीचर विंडो 8 में भी उपलब्ध है. इस कीवर्ड की सहायता से आपकी स्क्रीन दो हिस्सों में बंट जाती है जिससे की आपको काम करने में परेशानी नहीं होती और आप आसानी से काम कर सकते है.

Windows + Left Arrow को दबाने से  कम्प्यूटर के लेफ्ट जगह पर आपकी विंडो खुल जाएगी और Windows + Right Arrow को दबाने से कम्प्यूटर के राइट जगह पर विंडो खुल जाएगी. Windows + Up  Arrow से आप किसी भी विंडो को मेक्सिमाइज़ कर सकते हैं. तथा Window + Down Arrow ले आप किसी भी विंडो को मीनिमाइज़ कर सकते हैं.

Shift + Arrow

इसके इस्तेमाल से आप अपने लिखे गए किसी भी चीज को हाईलाइट कर सकते है. अगर आर cntrl का इस्तेमाल करते है तो एक वर्ड की बजाए आप पूरी लाइन को हाईलाइट कर सकते है. cntrl+b से आप वर्डस को बोल्ड भी कर सकते है.

Alt + F4

किसी विंडो को बिना माउस को छुए बंद करने के लिए आप इस कीवर्ड का इस्तेमाल कर सकते है ALT+F4 को दबाने से आपकी विंडो के सारे प्रोग्राम बंद हो जाएंगे.

Windows Key + L

अगर आपको काम करते करते अचानक से कुछ याद आता है और आप अपना कम्प्यूटर तो बंद नहीं करना चाहते तो आर उसे लॉक करके जा सकते हो. आपको अपने कीबोर्ड को छूने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी.

Windows Key + M

जब आपके पास बहुत सारी विंडो खुली हुई होती हैं तो एक -एक कर सभी विंडो को बंद करने में बहुत समय लग जाता है. Windows Key + M को दबाने से आपकी सारी विंडो बंद हो जाती है.

Shift + Space

एक्सल पर काम करते समय बहुत बड़ी बड़ी फाइल्स होती है जिसपर चीजें ढूंढ़ना बहुत ही मुश्किल होता है लेकिन  Shift + Space दबाने से आप पूरी लाइन को सलेक्ट कर सकते है और अगर आप इस लाइन को डिलीट करना चाहते है तो आप CNTRL+DEL को दबा सकते हैं.

ALT + S / CTRL + Enter

अगर आप किसी को भी जल्दी से मेल करना चाहते है तो इसके लिए बहुत ही आसान कीवर्ड है मैसेज लिखने के बाद आप ALT + S / CTRL + Enter को दबाकर अपना मेल जल्दी से भेज सकते है.

R / CTRL + R

किसा को रिप्लाई करने के लिए जरूरी नहीं की आप रिपलाई का बटन दबाएं आप आसान तरीके से भी रिपलाई कर सकते है R / CTRL + R दबाने से आप झट से रिपलाई कर सकते है.

CTRL + D

अगर आप अपने द्वारा पढ़ें हुए किसी भी चीज़ को बुकमार्क करना चाहते है तो उसके लिए आपको इस पर बने स्टार के साइन को नहीं छूना पड़ेगा आप केवल CTRL + D जरिए अपने पेज को बुकमार्क कर सकते है.

CTRL + Shift + B/O

अपनी मनलपसंद साइट को क्रोम में बुकमार्क करने के बाद उन्हें ढूंढ़ना बहुत ही मुश्किल होता है लेकिन CTRL + Shift + B/O को दबाने से आप अपनी बुकमार्क की हुई चीजें आसानी से ढूंढ़ सकते है.

ये प्रोडक्ट्स और सर्विसेज हैं बड़े काम के

गूगल की सेल्फ ड्राइविंग कार, स्मार्ट कॉन्टैक्ट लेंस और इंटरनेट वाले गुब्बारों जैसे बड़े प्रॉजेक्ट्स के बारे में आपने सुना होगा. मगर इन चर्चित प्रॉजेक्ट्स के अलावा कंपनी के कुछ ऐसे प्रॉडक्ट्स और सर्विसेज भी हैं, जिन्हें बहुत से लोग यूज नहीं करते. क्योंकि बहुत से लोगों को इन प्रोडक्ट्स के बारे में पता ही नहीं है.

Google Art

अगर आप कलाप्रेमी हैं और आर्ट, पेंटिंग का शौक रखते हैं, तो ये सर्विस खास आपके लिए है. गूगल आर्ट पर आप दुनिया के विभिन्न संग्रहालयों में रखे आर्ट वर्क की हाई रेजॉलूशन तस्वीरें देख सकते हैं. अब पूरी दुनिया घूमना नामुमकिन सा है. तो ये प्रोडक्ट आपके काम आ सकता है.

Google Sky

अंतरिक्ष की सैर करने का सबसे अच्छा मौका आपको यहां मिलेगा. Google.com/sky पर जाकर आप NASA के सैटलाइट, सलोन डिजिटल स्काई सर्वे और हबल टेलिस्कोप की तस्वीरों के जरिए ब्रह्मांड के कुछ हिस्सों को देख सकते हैं.

Google Scholar

अगर आप नई खोजों के के बारे में पढ़ने का शौक रखते हैं, तो इस सर्विस का इस्तेमाल जरूर करें. प्रोफेशनल जर्नल्स और पेपर्स से इन्फर्मेशन सर्च करना गूगल स्कॉलर से बहुत आसान है.

Google Keep

कभी कभी हमारे पास इतना सारा काम आ जाता है कि हमें कब क्या करना है, ये भूल जाते हैं. इस ऐप की मदद से आपका कोई भी काम पेंडिंग नहीं रहेगा. गूगल कीप एक बेहतरीन 'नोट्स' और 'रिमाइंडर' ऐप है. यह डेस्कटॉप और स्मार्टफोन्स दोनों पर काम करता है.

Timer

आप गूगल पर टाइमर सेट कर सकते हैं. इससे टाइम अप होने पर अलार्म भी बचेगा. इसके लिए आपको Timer के बाद वह टाइम लिखना होगा, जब आप अलार्म बजाना चाहते हैं. जैसै Timer 1 minute. सर्च के साथ साथ स्टोपवाच की भी सुविधा देता है गूगल.

Google Books

किताबी किड़ों के लिए है खास है यह प्रोडक्ट. Google Books n Gram Viewer एक फन टूल है, जिसके जरिए आप देख सकते हैं कि 1500 से लेकर साल 2008 तक के बीच छपी 5 करोड़ 20 लाख किताबों में शब्दों को कैसे इस्तेमाल किया गया है.

Google Input Tools

गूगल इनपुट टूल्स की मदद से आप 80 विभिन्न भाषाओं में टाइप कर सकते हैं. अलग-अलग भाषाओं के लिए अलग कीबोर्ड डाउनलोड करने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

जानिए क्या है ग्रेच्युटी?

किसी भी कंपनी में कार्यरत कर्मचारी के वेतन का एक भाग ग्रेच्युटी के रूप में डिडक्ट किया जाता है. पर यह किसी तरह का टैक्स नहीं है. ग्रेच्युटी वेतन का वह हिस्सा है जो आपको आपकी सेवाओं के बदले एक निश्चित अवधि के बाद दिया जाता है. यह रिटायरमेंट के बाद कंपनी की तरफ से कर्मचारी को उसकी सेवा के बदले दिया जाता है.

कई कर्मचारी रिटायरमेंट के पहले नौकरी छोड़ देते हैं, उस वक्त भी ग्रेच्युटी मिलती है. आयकर अधिनियम की धारा 10(10) के मुताबिक किसी भी निगम या कंपनी में न्यूनतम पांच वर्ष की सेवा अवधि पूरी करने वाला हर कर्मचारी ग्रेच्युटी हासिल कर सकता है. कर्मचारी को उसकी सेवा के प्रत्येक वर्ष के बदले 15 दिनों का वेतन ग्रेच्युटी के तौर पर दिया जाता है. इसमें मूल वेतन और महंगाई भत्ता का योग शामिल होता है. ग्रेच्युटी के तहत मिली राशि पर कर देना पड़ता है. केंद्र, राज्य सरकार और स्थानीय निकायों के तहत आने वाले कर्मचारियों को मिलने वाली ग्रेच्युटी पूरी से टैक्स फ्री होती है.

कुछ नियुक्तिकर्ता ग्रेच्युटी भुगतान को कॉस्ट टू कंपनी(सीटीसी) पैकेज के तहत दिखाते हैं, ऐसे में आपको सीटीसी ऑफर में ग्रेच्युटी कटौती देखने को मिलती है, जिसका कारण है कि नियुक्तिकर्ता द्वारा इसे अपने खर्च के तौर पर देखा जाता है.

लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों के बारे में जानते हैं आप?

शायद ही किसी ने ऐसा सोचा होगा कि बीसीसीआई पर सुप्रीम कोर्ट इस तरह से अपना चाबुक चलाएगा. बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर को पद से हटाए जाने के पीछे मुख्य वजह उनकी ओर से सुप्रीम कोर्ट की लगातार की जा रही अवमानना रही, वहीं सचिव अजय शिर्के ने भी कुछ ऐसा ही रुख अपनाया था.

दरअसल इन दोनों पर ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बीसीसीआई में सुधार को लेकर लोढा पैनल की सिफारिशों के लागू कराने की जिम्मेदारी थी, लेकिन इन्होंने राज्य क्रिकेट संघों का हवाला देकर सुधारों का लागू नहीं किया, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए कई बार फटकार भी लगाई थी.

पिछले करीब डेढ़ साल से बीसीसीआई और लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों को लेकर तनातनी चल रही थी. हालांकि, बीसीसीआई ने कुछ सिफारिशों को मान लिया था. लेकिन कोर्ट के दबाव के बावजूद बोर्ड ने लोढ़ा पैनल की कुछ सिफारिशों को मानने से इनकार कर दिया था जिसके चलते सुप्रीम कोर्ट को सख्त कदम उठाना पड़ा.

लोढ़ा पैनल की चार सिफारिशों को न मानने के चलते अनुराग ठाकुर को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी.

70 साल से ज्यादा उम्र के पदाधिकारियों की छुट्टी

लोढ़ा कमेटी ने सिफारिश की थीं कि 70 साल से ज्यादा उम्र के पदाधिकारियों की छुट्टी करें. जिसे बोर्ड ने नहीं माना था.

वन पर्सन, वन पोस्ट

बीसीसीआई के कई बड़े अफसर दो पोस्ट पर हैं. जैसे बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं. इसके अलावा बीसीसीआई सेक्रेटरी अजय शिर्के महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन में प्रेसिडेंट हैं. बोर्ड में ट्रेजरर अनिरुद्ध चौधरी हरियाणा क्रिकेट एसोसिएशन में जनरल सेक्रेटरी हैं. इन ऑफिशियल्स को एक न एक पोस्ट छोड़नी होगी. इस सिफारिश को बीसीसीआई ने मानने से इंकार कर दिया था.

वन स्टेट, वन वोट

बोर्ड को एक राज्य से एक वोट पर एतराज था. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि महाराष्ट्र और गुजरात को रोटेशनल बेसिस पर वोटिंग राइट्स मिलेंगे, जहां एक से ज्यादा एसोसिएशन हैं. जिसे बीसीसीआई ने नहीं माना.

सिलेक्शन पैनल में तीन मेंबर्स

बीसीसीआई ने हाल ही में पांच मेंबर्स की चयनकर्ता टीम चुनी थी. जिसमें चीफ सिलेक्टर एसएसके प्रसाद को बनाया गया है. जबकि लोढ़ा कमेटी ने सुझाव दिया था कि सिलेक्शन पैनल में तीन ही मेंबर्स होने चाहिए.

जानिए लोढ़ा कमेटी बनने की वजह

आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग से हुई थी शुरुआत

दरअसल बीसीसीआई के लिए मुश्किलों का दौर साल 2013 में शुरू हुआ था, जब आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग और मैच फिक्सिंग के मामले ने जोर पकड़ा. दिल्ली पुलिस ने आईपीएल टीम राजस्थान रॉयल के तीन खिलाड़ियों को गिरफ्तार किया. इन पर मैच के दौरान स्पॉट फिक्सिंग में लिप्त होने का आरोप था.

इसके कुछ ही दिन बाद उस समय के बीसीसीआई प्रमुख एन श्रीनिवासन के दामाद और उनकी आईपीएल टीम चेन्नई सुपर किंग्स के सीईओ गुरुनाथ मयप्पन और अभिनेता बिंदु दारा सिंह भी हिरासत में ले लिए गए. इस मामले ने तूल पकड़ा और वह सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा.

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इसकी जांच के लिए जस्टिस मुकुल मुद्गल के अध्यक्षता में एक कमेटी बना दी, जिसने साल 2014 में अपनी रिपोर्ट सौंपी.

मुद्गल कमेटी की रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई में सुधारों की जरूरत महसूस करते हुए कुछ सख्त निर्देश दिए और इसके लिए जनवरी, 2015 को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस आरएम लोढा के नेतृत्व में तीन सदस्यों की कमेटी गठित कर दी. फिर जस्टिस लोढ़ा कमेटी ने 4 जनवरी, 2016 को बीसीसीआई में सुधारों के लिए कई् अहम सिफारिशें रखीं.

बीसीसीआई ने इनमें से कई सिफारिशों पर तो हां कह दिया, लेकिन कुछ को लेकर अड़ियल रुख अपना लिया. बस तब से इस पर कई दौर की सुनवाई हो चुकी थी और बीसीसीआई अपने रुख से डिगने को तैयार नहीं था. सुप्रीम कोर्ट ने उसे कई बार चेतावनी भी दी, उसका फंड भी रोका, लेकिन बोर्ड अपनी समस्याओं का रोना रोता रहा.

लोढा पैनल की कुछ मुख्य सिफारिशें

9 सदस्यों वाली परिषद

लोढा पैनल ने यह सिफारिश की थी कि बीसीसीआई की 14 सदस्यों वाली कार्यकारिणी कमेटी की जगह 9 सदस्यों वाली शीर्ष परिषद बनाई जाए.

70 साल से अधिक वाले पद छोड़ दें

एक अहम सिफारिश यह थी कि 70 साल से अधिक की उम्र का कोई भी व्यक्ति बीसीसीआई या राज्य बोर्ड की किसी भी कमेटी का सदस्य न बने.

एक राज्य-एक संघ

पैनल ने कहा था कि किसी भी राज्य में सिर्फ एक ही संघ होना चाहिए और एक राज्य सिर्फ एक वोट कर सकता है. अगर एक राज्य में एक से ज्यादा क्रिकेट संघ है तो वह रोटेशन के तहत वोट दें.

3 सदस्यों वाली चयन समिति

बीसीसीआई की कार्यकारिणी कमेटी में कोई भी मंत्री या सरकारी अधिकारी न हो. टीम चयन के लिए पांच सदस्यों की जगह तीन सदस्य वाली चयन समिति बने.

3 साल का कार्यकाल

पैनल ने कहा कि एक पदाधिकारी एक बार में केवल तीन साल के लिए ही बीसीसीआई की कार्यकारिणी का सदस्य रहे और ज्यादा से ज्यादा तीन बार बीसीसीआई का चुनाव लड़े. लगातार दो बार कोई भी पदाधिकारी किसी भी पद पर नहीं रह सकता.

अलग-अलग संचालन

आईपीएल और बीसीसीआई की अलग-अलग संचालन संस्था हो. आईपीएल और राष्ट्रीय कैलेंडर के बीच 15 दिन का अंतर होना चाहिए यानी आईपीएल खत्म होने के 15 दिन के बाद खिलाड़ी कोई भी अंतरराष्ट्रीय मैच खेल सकता है.

सट्टेबाजी को वैधता

लोढा पैनल ने सट्टेबाजी को वैध करने की सिफारिश की थी, लेकिन यह भी कहा था कि कोई खिलाड़ी, प्रबंधक और पदाधिकारी सट्टेबाजी का हिस्सा न हो. पैनल ने यह भी सिफारिश की कि मैच फिक्सिंग और स्पॉट फिक्सिंग को अपराध माना जाए. 

एक व्यक्ति-एक पद

एक सदस्य सिर्फ एक पद पर रहे चाहे वह राज्य क्रिकेट बोर्ड के किसी समिति का हो या बीसीसीआई की मूल समिति का.

आरटीआई के दायरे में लाना

बीसीसीआई को आरटीआई एक्ट के दायरे में लाया जाए. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इसे संसद का मामला बताया था और इसे नहीं माना. खिलाड़ियों के हित के लिए एक संघ बनाए जाए और उसकी फंडिंग बीसीसीआई करे.

नए साल में ‘फीस भरा’ तोहफा

देश के तमाम हिस्सों में अब भी नोटबंदी का असर देखने को मिल रहा है. इस बीच लोग एटीएम इस्तेमाल करने के चार्ज दोबारा शुरू होने से परेशान हैं. इसके अलावा डेबिट कार्ड ट्रांजैक्शंस फीस में भी सरकार ने किसी तरह की छूट का ऐलान नहीं किया है. लोगों को उम्मीद थी कि एटीएम ट्रांजैक्शंस पर सरकार 31 दिसंबर के बाद भी छूट को जारी रखेगी. लेकिन आरबीआई ने इस बारे में अभी कोई निर्देश जारी नहीं किया है. इसके चलते बैंकों ने एक बार फिर ट्रांजैक्शन फीस चार्ज करना शुरू कर दिया है.

पहली 5 ट्रांजैक्शंस पर कोई चार्ज नहीं लगेगा. इसके बाद यह फैसला बैंकों के विवेकाधिकार और कस्टमर की कार्ड कैटिगिरी पर निर्भर करेगा. आमतौर पर बैंकों का ग्राहकों से चार्ज को लेकर अग्रीमेंट होता है. कई बैंक नोटबंदी से पहले प्रीमियम कस्टमर्स से एटीएम चार्ज नहीं वसूल रहे थे.

नोटबंदी से पहले स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, पंजाब नैशनल बैंक और आईसीआईसीआई बैंक 5 ट्रांजैक्शंस के बाद प्रति ट्रांजैक्शन पर 15 रुपये की फीस वसूल रहे थे. इन तीनों ही बैंकों का अन्य बैंकों की तुलना में देश में एटीएम का बड़ा नेटवर्क है. इसके अलावा ज्यादातर अन्य बैंक प्रति एटीएम ट्रांजैक्शन 20 रुपये वसूल रहे थे. एटीएम के इस्तेमाल पर चार्ज लगने को लेकर पूछे गए सवालों का एसबीआई और पीएनबी ने कोई जवाब नहीं दिया है.

 

पटना बुलाकर मार्बल कारोबारियों का अपहरण

पटना शहर से बाहर निकलते ही दिल्ली के मार्बल कारोबारी कपिलदेव शर्मा और सुरेशचंद्र शर्मा को लगा था कि कुछ गड़बड़ जरूर है. लेकिन वे न कुछ कह पाए और न कुछ कर पाए. करीब एक घंटे के सफर के बाद उन के हाथपैर बांध दिए गए और उन के मोबाइल फोन, लैपटौप, घड़ी, सोने की चेन, पर्स, जूते, बैग और एटीएम कार्ड छीन लिए गए. रास्ते में ही एटीएम का पिन पूछ कर उन के खातों से ढाई लाख रुपए निकाल लिए गए. इतना सब होने के बाद अब कोई संदेह नहीं रह गया था कि दोनों भाई अपराधियों के चंगुल में फंस चुके थे. रास्ते में एक ढाबे पर गाड़ी रोक कर सभी ने चाय पी. इस के बाद लखीसराय में गाड़ी को हाइवे से दाईं ओर मोड़ कर कच्चे रास्ते पर ले लिया गया.

कुछ दूर जा कर गाड़ी रुकी तो वहां जंगल था. वहां पहले से ही 8-10 लोग खड़े थे. जैसे ही कपिल और सुरेश को गाड़ी से उतारा गया, वहां खड़े लोगों ने उन की पिटाई शुरू कर दी. ऐसा शायद दोनों भाइयों को डराने के लिए किया गया था. अब तक वे समझ चुके थे कि उन का अपहरण हो चुका है. पिटाई के बाद उन के कपड़े उतरवा दिए गए और उन के हाथों को बांध कर आंखों पर भी पट्टी बांध दी गई. इस के बाद उन्हें कुछ दूर पैदल ले जा कर एक कमरे में बंद कर दिया गया. कमरे में उन्हें नींद का इंजेक्शन दे दिया गया, जिस से वे सो गए. उस रात उन्हें खाना भी नहीं दिया गया.

सवेरा होने पर कुछ लोग आए और नाश्तापानी देने की कौन कहे, उन की पिटाई करने लगे. अब तक कपिल और सुरेश काफी डर गए थे. उन्होंने कुछ खाने को मांगा तो उन्हें फरही (चावल का भुंजा) और अचार दिया गया. उन्होंने शौच जाने की बात कही तो डांट कर चुप करा दिया गया.

23 अक्तूबर, 2016 की सुबह अपहर्त्ताओं ने कपिल की बात उस के बहनोई से करा कर 5 करोड़ रुपए फिरौती मांगी. रकम न देने पर जान से मारने की धमकी दी. इस के बाद कपिल और सुरेश को नींद का इंजेक्शन दे कर सुला दिया गया. दोनों भाइयों की देखरेख के लिए जो लोग वहां थे, वे लगातार कफ सीरप पी रहे थे. 23 अक्तूबर को दिन भर उन्हें वहीं रखा गया. लेकिन रात को उन्हें दूसरी जगह ले जाया गया. अगले दिन यानी 24 अक्तूबर की सुबह उन्हें रंजीत डौन नाम के आदमी से मिलवाया गया. उस ने दोनों से बातचीत कर के उन्हें कपड़े पहनाए और स्टेशन पर छोड़ देने की बात कह स्कौर्पियो पर बैठा कर चला तो काफी देर तक चलने के बाद भी स्टेशन नहीं आया. स्कौर्पियो जहां रुकी, वहां घना जंगल था.

स्कौर्पियो से उतार कर एक बार फिर कपिल और सुरेश की पिटाई की गई. इस के बाद उन्हें पहाड़ी पर चढ़ा कर काफी घने जंगल में ले जाया गया. उस दिन और अगले दिन उन्हें खुले जंगल में रखा गया. रात में उन से कहा गया कि अब यहां से भागना होगा, क्योंकि माओवादियों ने उन्हें घेर लिया है. अपहर्त्ता उन्हें ले कर भागते, उस के पहले ही जंगल तेज लाइट से जगमगा उठा. सुरेश ने कपिल से कहा कि यह पुलिस द्वारा छोड़ा गया पैरा बम है. लगता है, पुलिस आ गई है. इस के बाद एक के बाद एक पैरा बम की लाइट होने लगी, जिस से उस घने जंगल में करीब एक किलोमीटर की परिधि में तेज रोशनी फैल गई.

अपहर्त्ताओं ने गोली चलानी शुरू कर दी थी. कुछ देर तक दोनों ओर से गोलियां चलती रहीं. उसी बीच एक अपहर्त्ता ने कपिल के सिर से पिस्तौल सटा कर नींद का इंजेक्शन लगाने की कोशिश की तो उस ने अपहर्त्ता को धक्का दे कर गिरा दिया और ‘पुलिस वाले भैया, हमें बचा लो’ चिल्लाते हुए दोनों भाई उस ओर भागे, जिधर उन्हें पुलिस वालों के होने की संभावना थी. पुलिस वाले भी आवाज की दिशा में तेजी से दौड़ पड़े थे. करीब 2 सौ मीटर आगे बढ़ने पर कपिल और सुरेश की मुलाकात पुलिस वालों से हो गई. पुलिस को देख कर दोनों भाइयों की जान में जान आई.

नक्सलियों का गढ़ कहे जाने वाले कजरा के जंगल में कपिल और सुरेश को ढूंढ निकालना बिहार पुलिस के लिए आसान नहीं था. 25 अक्तूबर को जब कपिल और सुरेश समेत अपहर्त्ताओं के मोबाइल फोनों की लोकेशन कजरा के जंगल की मिली तो पुलिस ने अपना औपरेशन शुरू कर दिया. पटना के एसएसपी मनु महाराज पुलिस टीम के साथ लखीसराय पहुंच गए थे. लखीसराय के एसपी अशोक कुमार और सीआरपीएफ की 131वीं बटालियन के कमांडेंट के साथ मिल कर यह औपरेशन चलाया. रात 10 बजे शुरू हुआ था. 16-17 किलोमीटर जंगल के अंदर जा कर पुलिस अपहर्त्ताओं के ठिकाने तक पहुंची और जैसे ही पैरा बम दागा, अपहर्त्ताओं ने घबरा कर गोली चलानी शुरू कर दी.

अपहर्त्ताओं को पता नहीं था कि पुलिस ने उन्हें चारों तरफ से घेर रखा है, जबकि पुलिस अपहर्त्ताओं के काफी करीब तक पहुंच चुकी थी. यही वजह थी कि पुलिस ने एक अपहर्त्ता को पकड़ लिया था, जिस का नाम पिंटू था. उस ने पुलिस को बताया कि लाइट देख कर रंजीत, ललन उर्फ लालू, मनोज यादव समेत 8 लोग जंगल में अंदर की ओर भाग गए हैं.

पुलिस ने जंगल में तलाश कर के संजीत, कारू और उस के बेटे बिरजू को गिरफ्तार कर लिया. इन के पास से पुलिस ने 4 पिस्तौलें, 15 कारतूस, नशीली दवा, फेंसाडिल सीरप की कई शीशियां और खानेपीने का सामान बरामद किया था. इस मामले का मास्टरमाइंड रंजीत मंडल उर्फ रंजीत डौन पुलिस को चकमा दे कर भागने में सफल रहा था. वह जिला लखीसराय के थाना रामगढ़ चौक के बोधनगर का रहने वाला था.

दिल्ली के बड़े मार्बल कारोबारी बाबूलाल शर्मा के 2 बेटों सुरेशचंद्र शर्मा और कपिलदेव शर्मा को बिहार के खड़गपुर में खुल रहे पौलिटेक्निक कालेज में 12 करोड़ रुपए के मार्बल लगाने का ठेका देने के लिए दिल्ली से पटना बुलाया गया था. 21 अक्तूबर, 2016 की शाम को जब दोनों भाई पटना एयरपोर्ट पर पहुंचे तो उन्हें बिना नंबर की इंडिगो कार से ले जाया गया. कार में जब दोनों भाइयों को बैठाया गया था, उस समय उस में केवल ड्राइवर था.

पटना से 22 किलोमीटर आगे बढ़ने पर फतुहा में उन की कार में 2 अन्य लोग सवार हुए. इस के बाद उन्हें बख्तियारपुर, बाढ़, मोकामा होते हुए हवेली खड़गपुर ले जाया गया. दोनों भाइयों के मोबाइल फोन की लोकेशन से उन की आखिरी लोकेशन खड़गपुर की मिली थी.

अपहर्त्ताओं ने कपिल और सुरेश के पिता बाबूलाल शर्मा से बंगाल के टीकागढ़ के नंबर से, दिल्ली के 2 नंबरों से और उत्तर प्रदेश के एक नंबर से फोन कर के फिरौती मांगी गई थी. अपहरण की सूचना मिलने पर बिहार पुलिस ने पटना एयरपोर्ट से ले कर जीरो माइल तक लगे तमाम सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली, पर उन के बारे में कोई सुराग नहीं मिला.

पुलिस को जब पता चला कि इस अपहरण कांड में नक्सलियों का हाथ है तो पुलिस हैरान रह गई. बाद में पता चला कि इस अपहरण कांड में नक्सलियों और अपहर्त्ताओं में समझौता हुआ था कि फिरौती के रूप में 5 करोड़ रुपए वसूले जाएंगे, जो दोनों में आधाआधा बंटेगा. यह समझौता फरार चल रहे कुख्यात नक्सली मनोज यादव से हुआ था. कजरा के जंगल में मनोज के ही अड्डे पर दोनों भाइयों को छिपा कर रखा गया था. मनोज पर मुंगेर, लखीसराय और जमालपुर के थानों में दर्जनों मुकदमे दर्ज हैं.

पुलिस ने गिरफ्तार किए गए अपहर्त्ताओं कारू यादव, उस के बेटे बिरजू यादव, पिंटू उर्फ सिंटू ठाकुर, संजीत उर्फ सिंटू ने पूछताछ में स्वीकार किया है कि इस अपहरण कांड में नक्सलियों से फिरौती की रकम के बंटवारे के लिए समझौता किया गया था. पूछताछ के बाद गिरफ्तार किए गए चारों अपहर्त्ताओं को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया था.

पुलिस के बताए अनुसार, रंजीत 21 अक्तूबर, 2016 को पटना पहुंचा और सुरेश तथा कपिल को रिसीव करने के लिए ड्राइवर अजीत राय को एयरपोर्ट भेजा. वह खुद स्कौर्पियो ले कर बाईपास पर उन का इंतजार करता रहा. दोनों भाइयों को खड़गपुर के कजरा के जंगल ले जाया जा रहा था तो वह आगेआगे चल रहा था. कजरा के जंगल ले जाने से पहले रंजीत ने हथियार के बल पर दोनों भाइयों को अपनी स्कौर्पियो में बैठा लिया था और जंगल के अंदर ले गया था.

अपहर्त्ताओं की चंगुल से मुक्त कराने के बाद पुलिस ने कपिलदेव शर्मा और सुरेशचंद्र शर्मा को अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी आर.के. सिंह की अदालत में पेश किया, जहां उन का बयान कलमबद्ध किया गया. अदालत के आदेश पर प्रथम श्रेणी की न्यायिक दंडाधिकारी सुप्रिया गोस्वामी ने दोनों भाइयों का बयान धारा 164 के तहत दर्ज किया. इस मामले में एक अन्य व्यक्ति नारायण राय की भी गवाही उन्हीं की अदालत में कलमबद्ध कराई गई. इसी के साथ इस अपहरण कांड में गिरफ्तार किए गए अभियुक्तों कारू यादव, उस के बेटे बिरजू यादव, पिंटू तथा संजीत को कोर्ट में पेश किया गया, जहां से सभी को 9 नवंबर तक के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

अपहरण की सूचना मिलने के बाद पुलिस ने अपहर्त्ताओं तथा शर्मा बंधुओं के फोन सर्विलांस पर लगाए तो 24 अक्तूबर, 2016 को उन की लोकेशन मिल गई. पुलिस अपहर्त्ताओं तक पहुंचती, उस के पहले ही वे वहां से निकल गए. 25 अक्तूबर, 2016 को पुलिस को कजरा के जंगल में अपहर्त्ताओं की लोकेशन मिली. यह नक्सलियों का इलाका था, इसलिए पटना के एसएसपी मनु महाराज ने शाम को विशेष रणनीति बनाई और लखीसराय की पुलिस तथा सीआरपीएफ की मदद से औपरेशन शुरू किया. इसी का नतीजा था कि 25 अक्तूबर, 2016 की रात कपिल और सुरेश को जंगल से सकुशल बरामद कर लिया गया. पुलिस का दावा है कि दोनों भाइयों के किसी करीबी ने ही बिचौलिए की भूमिका निभाई थी. उसी की जानकारी पर दोनों कारोबारी भाइयों को पटना बुला कर एयरपोर्ट से रिसीव कर के उन का अपहरण कर लिया गया था.

एयरपोर्ट से बाहर आ कर दोनों भाइयों ने पिता को फोन कर के बताया था कि उन्हें पटना से 2 सौ किलोमीटर पूरब की ओर जाना है, लेकिन कुछ देर बाद ही कपिल ने पिता को फोन कर के बताया कि उन का अपहरण कर लिया गया है. पुलिस ने कपिल और सुरेश के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि पिछले एक महीने में उन के फोन नंबरों पर 5-6 नंबरों से लगातार फोन आ रहे थे. इस से अंदाजा लगाया गया कि अपहर्त्ता एक महीने से उन के अपहरण की कोशिश कर रहे थे.

पटना पुलिस भले ही कह रही है कि अपहर्त्ताओं ने 5 करोड़ रुपए की फिरौती नहीं मांगी, लेकिन पुलिस सूत्रों से ही पता चला है कि तुरंत बाबूलाल शर्मा के विभिन्न नंबरों पर फिरौती की रकम के लिए फोन आने लगे थे. पुलिस की साइबर सेल उन सभी नंबरों के बारे में पता कर रही है. इसी साल गया के बाराचट्टी के डा. पंकज गुप्ता का अपहरण किया गया था. इस मामले में पुलिस ने अजय सिंह को गिरफ्तार किया था. अजय सिंह ने लखनऊ के गोमतीनगर में अपना ठिकाना बना रखा था. वहां भी कपिल और सुरेश का काम चल रहा था. इस से पुलिस को इन के अपहरण में अजय का हाथ होने का संदेह है.

पुलिस ने इस अपहरण कांड में 4 लोगों को गिरफ्तार किया है, लेकिन इस मामले का मास्टरमाइंड रंजीत डौन फरार है. समूचे औपरेशन की अगुवाई कर रहे पटना के एसएसपी मनु महाराज का कहना है कि कपिल और सुरेश को मुक्त करने के लिए अपहर्त्ताओं ने 5 करोड़ रुपए की फिरौती मांगी थी. राजस्थान के करनैल के मूल निवासी सुरेश और कपिल दिल्ली के बदरपुर में रहते हैं.

कपिल के बताए अनुसार, सितंबर, 2016 के अंतिम सप्ताह में किसी ने फोन कर के उन के एक परिचित इंजीनियर का नाम ले कर कहा था कि वह बिहार के गोपालगंज से बोल रहा है. वहां एक पौलिटेक्निक कालेज में फिनिशिंग का काम है, उसे आ कर देख लें. उन्होंने भाई से बात कर के बताने को कहा था. भाई सुरेश से बात कर के कपिल ने तय किया कि दिवाली के बाद वे साइट देखने जाएंगे.

19 अक्तूबर, 2016 को दोबारा फोन आया कि कालेज के डायरेक्टर आ रहे हैं, इसलिए वे आ कर जल्दी साइट देख लें और काम फाइनल कर लें. यही नहीं, फोन करने वाले ने 21 अक्तूबर, 2016 को दिल्ली से पटना का फ्लाइट का टिकट भी कपिल के पास भिजवा दिया था. इस के बाद दोनों भाई 21 अक्तूबर, 2016 की शाम साढ़े 6 बजे पटना एयरपोर्ट पर पहुंचे तो उन के मोबाइल फोन पर ड्राइवर अजीत ने अपने मोबाइल नंबर का संदेश भेजा कि एयरपोर्ट के बाहर वह उन का इंतजार कर रहा है.

अपहर्त्ताओं तक पहुंचने में इलाहाबाद के रहने वाले नारायण राय से पुलिस को काफी मदद मिली थी. 17 अक्तूबर, 2016 को इलाहाबाद के मुट्ठीगंज के रहने वाले नारायण राय और उन के भतीजे शिवपाल का भी रंजीत ने इसी तरह अपहरण किया था. लेकिन 18 अक्तूबर, 2016 को दोनों चकमा दे कर भागने में सफल रहे थे. नारायण और उन के भतीजे शिवपाल को भी इसी तरह ठेका दिलाने के नाम पर रंजीत ने पटना बुलाया था. नारायण ने रंजीत और उस के साथियों के खिलाफ अपहरण, फिरौती मांगने और मारपीट का मुकदमा दर्ज कराना चाहा था, पर उन का मुकदमा थाना पीरी बाजार पुलिस ने दर्ज नहीं किया था. थानाप्रभारी हरिशंकर कश्यप ने इस मामले को मारपीट की मामूली धाराओं में दर्ज कर के दबाने की कोशिश की थी. नारायण की शिकायत के बाद लखीसराय के एसपी अशोक कुमार ने हरिशंकर कश्यप को सस्पैंड कर दिया था.

कपिल और सुरेश के अपहरण के बाद पुलिस ने जब अपहर्त्ताओं के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवा कर खंगाली तो उस में नारायण का भी नंबर मिला था. पुलिस को लगा कि कहीं इस नंबर धारक का अपहर्त्ताओं से संबंध तो नहीं है, यह पता करने पुलिस इलाहाबाद पहुंची और नारायण को अपने साथ पटना ले आई. तब नारायण ने पुलिस को बताया कि शर्मा भाइयों की तरह उन का भी अपहरण हुआ था.

नारायण ने पुलिस को बताया कि उन्हें अगवा करने वाले अपहर्त्ता का नाम रंजीत था और उस के एक साथी की 4 अंगुलियां कटी थीं. रंजीत का नाम सामने आते ही पुलिस को अंदाजा लग गया कि कपिल और सुरेश को कजरा के जंगल में रखा गया होगा. नारायण ने जिस आदमी की 4 अंगुलियां कटी होने की बात कही थी, उस का नाम पिंटू था. कपिल और सुरेश की तलाश में वही सब से पहले पकड़ा गया था.

सुरेश और कपिल की गरदन, हाथ, पैर, जांघ और पीठ पर इंजेक्शन लगाने के 37 निशान पाए गए थे. दोनों के शरीर पर डंडों से पिटाई के काले निशान बता रहे थे कि उन्हें कितनी बेरहमी से पीटा गया था. दोनों 5 दिनों तक अपहर्त्ताओं के चंगुल में फंसे रहे. इस बीच उन्होंने जिंदा घर लौटने की उम्मीद छोड़ दी थी. सुरेश के बताए अनुसार, सितंबर, 2016 में रंजीत गोपाल गोयल बन कर उस से दिल्ली में कई बार मिला था. वह बिहार में मार्बल का बड़ा ठेका दिलाने की बात करता था. उस की बातों से उसे कई बार शक भी हुआ, लेकिन कई बार मिल कर अपनी चिकनीचुपड़ी बातों में उस ने सुरेश को अपने जाल में फंसा ही लिया.

पुलिस के अनुसार, रंजीत के नक्सलियों से भी संबंध थे. वह अपने शिकार को नक्सलियों के ठिकानों वाले जंगल में छिपाता था और बदले में फिरौती का एक बड़ा हिस्सा नक्सलियों को देता था. रंजीत और उस के गैंग को नक्सली पूरी सुरक्षा देते थे.

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने लखीसराय में रंजीत के 6 प्लौट, गैरमजरुआ जमीन पर बनाए गए मकान, एक ट्रक और एक स्कौर्पियो गाड़ी जब्त कर ली है. यह सारी संपत्ति उस ने अपनी पत्नी रागिनी देवी, पिता शिवदानी मंडल, बसंत मंडल तथा संतोष मंडल के नाम से खरीदी थी.

रंजीत के आतंक से आजिज आ कर बिहार पुलिस ने ईडी को प्रस्ताव भेजा था. ईडी ने जब उस की सारी संपत्ति जब्त कर ली तो अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए उस ने दिल्ली के मार्बल कारोबारी बाबूलाल शर्मा के बेटों कपिलदेव और सुरेशचंद्र के अपहरण की योजना बनाई थी.

कपिलदेव और सुरेशचंद्र का दिल्ली से पटना का टिकट 20 अक्तूबर को बुक कराया गया था. बुक करने वाले एजेंट का नाम मोहम्मद अयूब था. पटना पुलिस की सूचना पर दिल्ली पुलिस ने अयूब को गिरफ्तार कर लिया है. पटना पुलिस ने दिल्ली पहुंच कर अयूब से पूछताछ की तो वारदात से जुडे़ लोगों का लिंक मिल गया. रंजीत के खिलाफ पहले से कई आपराधिक मामले दर्ज हैं. लखीसराय के अलगअलग थानों में आर्म्स एक्ट, अपहरण, लूट, धमकी के 6 मामले दर्ज हैं. दिल्ली के संगम विहार थाने में दुष्कर्म का केस दर्ज है. इस मामले में वह कई महीने तक तिहाड़ जेल की भी हवा खा चुका है.

रंजीत और उस के गिरोह ने 8 साल पहले पटना के राजीवनगर इलाके से मोबाइल टावर लगाने का काम करने वाले ठेकेदार आलोक सिंह के बेटे संतोष सिंह का अपहरण किया था. बदले में उस ने 75 लाख रुपए की फिरौती की मांग की थी. पुलिस ने लखीसराय के उसी इलाके में छापामारी कर के संतोष को बरामद किया था, जहां से दिल्ली के कारोबारी भाइयों को बरामद किया गया था. पिछले 3 सालों में रंजीत ने पटना, दिल्ली, मुंबई, राजस्थान, हरियाणा के 15 कारोबारियों का अपहरण किया है.

मोबाइल लूटने वाली दिलकश हसीना

पहली अक्तूबर, 2016 की बात है. उस दिन भी शाम के वक्त कालेज बस ने लवलीन को माडलटाउन-1 के बसस्टैंड पर उतारा. वहां से कुछ दूरी पर स्थित परमानंद कालोनी में उस का घर था. बस से उतरने के बाद वह पैदल ही अपने घर जा रही थी. जब वह टैगोर पार्क के नजदीक पहुंची, तभी किसी ने अचानक ठीक उस के पीछे पहुंच कर उस की पीठ पर कोई सख्त चीज सटा कर सख्त लहजे में धमकी दी, ‘‘ऐ लड़की, तेरे पास जो कुछ नकदी और मोबाइल है, उसे फौरन मेरे हवाले कर दे वरना अपनी जान से हाथ धो बैठेगी.’’

वह आवाज किसी युवती की थी. लेकिन उस ने जिस तरह धमकी में उस से बात की थी, उस से लवलीन बुरी तरह सहम गई. उस की इतनी भी हिम्मत नहीं हुई कि वह एक बार पीछे मुड़ कर उस युवती या अपनी पीठ पर सटाई गई कठोर वस्तु को एक नजर देख ले. वह जस की तस खड़ी रह गई. लवलीन के ठिठक कर खड़े होते ही पीछे खड़ी युवती ने झट से उस की जेब में अपना दूसरा हाथ डाल दिया और उस की जेब में रखा एचटीसी का महंगा मोबाइल निकाल लिया.

उसी दौरान एक सफेद रंग की कार तेजी से उस के पास आ कर रुकी, उस की ड्राइविंग सीट पर एक युवक था. जिस युवती ने उस की जेब से मोबाइल फोन निकाला था, वह उसी कार में उस युवक के बराबर में जा कर बैठ गई. उस के सीट पर बैठते ही कार माडलटाउन के प्रिंस रोड की ओर बढ़ गई. उस कार के नजरों से ओझल हो जाने के बाद जैसे लवलीन को होश आया.

महंगा मोबाइल फोन लुट जाने पर लवलीन बहुत परेशान हुई. जिस जगह पर उस के साथ वारदात हुई थी, वहां से थोड़ी ही दूरी पर माडलटाउन पुलिस स्टेशन था. वह सोचने लगी कि जिस तरह उस के साथ वारदात हुई थी, वैसे में तो वे लोग अगर उस का अपहरण भी कर लेते तो वह क्या कर सकती थी.

बहरहाल, इस वारदात की रिपोर्ट लिखवाने के लिए वह माडनटाउन थाने पहुंच गई. ड्यूटी अफसर को उस ने अपने साथ घटी घटना की जानकारी दी तो ड्यूटी अफसर ने इस बारे में थानाप्रभारी प्रदीप पालीवाल से बात की. उन के निर्देश पर अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 382 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली गई और जांच एसआई देवेंद्र कुमार को सौंप दी गई.

एसआई देवेंद्र कुमार ने लवलीन से बदमाश युवक और युवती के कदकाठी और कार के बारे में पूछा तो लवलीन ने बताया कि उस लड़की की उम्र कोई 25 से 30 साल थी. जो युवक सफेद रंग की होंडा ब्रियो कार से आया था, उस का चेहरा वह ठीक से नहीं देख पाई थी. लेकिन उस कार के पीछे की नंबर प्लेट पर कोई नंबर नहीं लिखा था. लवलीन से घटना के बारे में पूछताछ करने के बाद देवेंद्र कुमार ने उसे अपने घर जाने की इजाजत दे दी.

लवलीन से पुलिस को केवल उस लड़की की उम्र आदि के बारे में ही जानकारी मिली थी. यदि उन की कार का नंबर मिल जाता तो उस के सहारे उन दोनों तक पहुंचा जा सकता था. आगे की कारवाई के संबंध में एसआई देवेंद्र कुमार ने थानाप्रभारी प्रदीप पालीवाल से बात की. थानाप्रभारी ने देवेंद्र कुमार को कुछ जरूरी हिदायतें देने के बाद इस वारदात की सूचना उत्तरपश्चिमी दिल्ली के डीसीपी मिलिंद दुबड़े को दी.

डीसीपी मिलिंद दुबड़े ने इस घटना को काफी गंभीरता से लिया. बात सिर्फ एक मोबाइल फोन के लूटे जाने भर तक सीमित नहीं थी, बल्कि इस से ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि यह घटना दिल्ली के बेहद पौश कहे जाने वाले इलाके माडलटाउन थाने के नजदीक घटी थी. वैसे भी यह घटना इस प्रकार की पहली घटना नहीं थी.

माडलटाउन, मुखर्जीनगर, मौरिसनगर और रूपनगर थानाक्षेत्र में इस तरह की अनेक वारदातें सितंबर, 2016 के बाद हो चुकी थीं. सभी वारदातों में युवक और युवती वारदात कर के कार से ही भागे थे. उन वारदातों में युवक और युवती बात करने के बहाने किसी लड़की का फोन लेते थे और बात करते करते कार में बैठ कर फरार हो जाते थे.

जानकारी में यह बात भी सामने आई थी कि युवती फर्राटेदार अंगरेजी बोलती थी. इसलिए डीसीपी ने वारदात करने वाले युवक युवती की तलाश के लिए माडलटाउन के एसीपी रविंद्र कुमार त्यागी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी प्रदीप पालीवाल, अतिरिक्त थानाप्रभारी सुधीर कुमार, एसआई देवेंद्र कुमार, हैडकांस्टेबल जितेंद्र, कांस्टेबल सतीश आदि को शामिल किया गया.

पुलिस टीम में शामिल सभी सदस्य अपनेअपने स्तर से युवकयुवती को तलाशने लगे. 22 अक्तूबर की रात 8 बजे माडलटाउन थाने के हैडकांस्टेबल जितेंद्र और कांस्टेबल सतीश मैकडोनाल्ड्स की तरफ जाने वाले रास्ते पर बैरिकेड लगा कर उधर से आनेजाने वाले वाहनों को रोक कर रूटीन चैकिंग कर रहे थे. उन की नजरें खासतौर पर उस सफेद रंग की कार को तलाश रही थीं. उसी दौरान होंडा ब्रियो कार आ कर रुकी. वह भी सफेद रंग की थी. कार की अगली सीट पर एक युवती और युवक बैठे थे. हैडकांस्टेबल जितेंद्र ने कार की नंबर प्लेट की ओर नजर डाली तो वह चौंके, क्योंकि उस कार के आगे कोई नंबर प्लेट नहीं लगी थी.

जब उन से पूछताछ की गई तो वे दोनों पहले इधरउधर की बातें करने लगे. शक होने पर हैडकांस्टेबल जितेंद्र ने एसआई देवेंद्र कुमार को फोन कर के उन्हें इन दोनों के बारे में बताया. कुछ ही देर में देवेंद्र कुमार भी वहां पहुंच गए. उन्होंने उन दोनों से कार के कागजात दिखाने के लिए कहा. युवक ने कार के कागज दिखाए तो आरसी में कार नंबर दर्ज था, जबकि कार के आगेपीछे नंबर प्लेट नहीं लगी थी. कार पर नंबर प्लेट लगी न होने के बारे में उस से पूछा गया तो वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका.

मामला संदिग्ध देख कर पुलिस ने कार की तलाशी ली तो कार के अंदर से 10 महंगे मोबाइल फोन के अलावा ब्रांडेड लेडीज कपड़े और एक बुर्का मिला. पूछताछ के लिए उन्हें थाने ले जाया गया. दोनों से गाड़ी में मिले मोबाइल फोन और बिना नंबर की होंडा ब्रियो कार के बारे में सघन पूछताछ की गई तो दोनों ने स्वीकार कर लिया कि ये मोबाइल अलगअलग जगहों से लूटे गए हैं. युवती ने अपना नाम सोनम और युवक ने नीरज बताया.

दोनों ही शादीशुदा थे. लेकिन अपनेअपने जीवनसाथी को छोड़ कर दोनों लिवइन रिलेशन में रह रहे थे. इस प्रेमी जोड़े ने मोबाइल लूटने की जो कहानी बताई, वह बड़ी ही दिलचस्प निकली. सोनम के पिता एक पुलिस अधिकारी थे और मजलिस पार्क के एक फ्लैट में रहते थे. मजलिस पार्क में ही नीरज के पिता पत्नी और बड़े बेटे के साथ रहते थे. वह भी पुलिस की नौकरी में थे. एक ही महकमे में कार्यरत होने की वजह से उन के घरों में एकदूसरे का आनाजाना एक सामान्य सी बात थी.

सोनम और नीरज बचपन से ले कर जवानी तक साथसाथ पलेबढ़े. जवानी की दहलीज पर पांव रखते ही सोनम और नीरज की दोस्ती प्यार में बदल गई. कुछ ही दिनों में उन की हरकतों को देख कर उन के घर वाले समझ गए कि वे एकदूसरे से प्यार करते हैं. बात आगे बढ़ी तो नीरज ने कह दिया कि वह सोनम से ही शादी करेगा. लेकिन सोनम के मातापिता उस का हाथ नीरज के हाथ में नहीं देना चाहते थे.

बेटी जवान थी, कहीं वह गुस्से में कोई गलत कदम न उठा बैठे, इसलिए पिता ने सोनम के ग्रैजुएट होते ही उस की शादी शालीमारबाग में रहने वाले विक्रम से कर दी. विक्रम एक खातेपीते घर का लड़का था. वह वजीरपुर  स्थित नेताजी सुभाष पैलेस में किसी निजी कंपनी में अच्छे पद पर नौकरी करता था. सोनम और विक्रम शादी के बाद कुछ सालों तक एकदूसरे को बेहद प्यार करते रहे. 2 साल हंसीखुशी के साथ गुजारने के बाद सोनम ने एक बेटे को जन्म दिया. बेटे के जन्म पर विक्रम बेहद खुश हुआ. वह सोनम को पहले से भी ज्यादा प्यार करने लगा, लेकिन सोनम नीरज को अपने दिल से कभी नहीं निकाल सकी और एक बार जब उस का आमनासामना नीरज से हुआ तो नीरज ने बताया कि वैसे तो उस की भी शादी हो चुकी है, लेकिन वह अब भी उसे प्यार करता है.

वह नीरज से किनारा नहीं कर सकी. कुछ सालों के अंतराल के बाद उन का सोया प्यार फिर जाग उठा और वे लोगों की नजरों से बच कर एकदूसरे से फिर मिलने लगे. कुछ समय तक तो विक्रम को सोनम की बेवफाई का कुछ पता नहीं चला, लेकिन सोनम के बारबार घर से गायब रहने से उसे उस पर शक हो गया. तब उस ने सोनम के घर से बाहर जाने पर बंदिश लगा दी. लेकिन इश्क पर आज तक किसी का कोई जोर चला है, जो इन पर चलता. लिहाजा इन का मिलनाजुलना लगातार जारी रहा. नीरज और सोनम एकदूसरे से बदस्तूर प्यार करते रहे.

आखिरकार पत्नी की बेवफाई से तंग आ कर विक्रम अपने से 14 साल छोटी युवती नीरजा को अपना दिल दे बैठा. नीरजा भी उसी के औफिस में काम करती थी. नीरजा बेहद हसीन युवती थी और रंगरूप के मामले में सोनम से कहीं ज्यादा सुंदर थी. विक्रम न केवल नीरजा के साथ ज्यादा वक्त बिताता, बल्कि उसे महंगे तोहफे भी देता. नीरजा से नजदीकी बढ़ने के बाद विक्रम ने सोनम की तरफ ध्यान देना बंद कर दिया. सोनम को जब यह जानकारी मिली तो उस ने सारी बात प्रेमी नीरज को बताई. इस समस्या से निजात दिलाने में नीरज ने उस का हर तरह से सहयोग करने का वायदा किया. लेकिन ऐसा करने में नीरज के साथ एक अहम समस्या आड़े आ रही थी.

नीरज एक बेटी का पिता था. कुछ दिनों बाद नीरज की पत्नी शैफाली को जब पता चला कि नीरज के संबंध सोनम से हैं तो उस ने नीरज से नाराजगी जाहिर करते हुए सोनम से संबंध खत्म करने को कहा. जबकि नीरज को पत्नी शैफाली से ज्यादा सोनम की फिक्र रहती थी, इसलिए उस ने शैफाली की बातों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी.

पति की तरफ से हो रही उपेक्षा से आहत हो कर शैफाली ने अपना रास्ता अलग कर लिया और फिर वह भी अपने बौयफ्रैंड के साथ मजलिस पार्क में अलग मकान ले कर रहने लगी. पत्नी के अलग रहने पर नीरज को दुख नहीं हुआ, बल्कि उस ने सोचा कि अच्छा हुआ. क्योंकि अब उसे रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था. उस ने आव देखा न ताव, सोनम को अपने साथ रहने के  लिए राजी कर लिया. सोनम भी इस अवसर की ताक में थी. वह अपने बेटे को ले कर नीरज के पास मजलिस पार्क में रहने लगी. नीरज दुकानों में खिलौने वगैरह सप्लाई करने लगा. इस से उसे ठीकठाक आमदनी होने लगी.

उधर विक्रम को जब पता चला कि उस की पत्नी सोनम नीरज के साथ रह रही है तो उसे बड़ा बुरा लगा. वह पहले से ही नीरज को अपना दुश्मन समझता था. वह नीरज को सबक सिखाना चाहता था.

10 अक्तूबर, 2016 को उसे इस का मौका मिल गया. उस ने नीरज को भाडे़ के गुंडों से पिटवा दिया. इस में नीरज को काफी चोटें भी लगीं. काफी दिनों तक सोनम ने उस की सेवा की तब जा कर वह ठीक हुआ. नीरज के ठीक होने के बाद उस ने अपने पति से बदला लेने का निश्चय किया.

उधर विक्रम की प्रेमिका नीरजा ने 8 अक्तूबर, 2016 को नीरज के खिलाफ मारपीट और पीछा करने की रिपोर्ट थाना आदर्शनगर में दर्ज करा दी. महंगे लाइफस्टाइल को अपनाने तथा विक्रम से नीरज का बदला लेने के लिए उसे एक बड़ी रकम की जरूरत थी, जो उस के पास नहीं थी. इसलिए दोनों ने मिल कर मोबाइल लूटने की योजना बनाई. नीरज अपने पिता की होंडा ब्रियो कार का उपयोग करता था. वारदात को अंजाम देने के लिए उस ने कार की नंबर प्लेटें हटा दीं, जिस से किसी को कार का नंबर पता न चल सके. होंडा ब्रियो कार में सवार हो कर सोनम और नीरज शिकार को तलाशते, इन्हें कोई अकेली युवती सड़क पर चलती मिल जाती तो सोनम फर्राटेदार अंगरेजी बोल कर उस से यह कह कर उस का फोन मांग लेती कि उस के फोन की बैटरी डाउन हो चुकी है और उसे किसी से जरूरी बात करनी है. उस का फोन ले कर बात करतेकरते वह कार में बैठ कर प्रेमी नीरज के साथ फरार हो जाती. अक्तूबर, 2016 से उन्होंने वारदातों को अंजाम देना शुरू कर दिया था.

अब तक की तहकीकात के बाद एसआई देवेंद्र कुमार को सोनम और नीरज के खिलाफ दिल्ली में दर्ज 13 मुकदमों की जानकारी मिली है. यह मामले यहां के माडलटाउन, मुखर्जीनगर, मौरिसनगर और रूपनगर थानों में दर्ज हैं.  दोनों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 23 अक्तूबर को रोहिणी कोर्ट के ड्यूटी मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया. जहां से दोनों को एक दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया. देवेंद्र कुमार ने 24 अक्तूबर को दोनों को फिर से मेट्रोपौलिटन मजिस्ट्रैट सुनील कुमार की अदालत में पेश कर 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया.

रिमांड अवधि में पुलिस ने उन से 6 आईफोन तथा एक एचटीसी का फोन बरामद किया. 26 अक्तूबर को दोनों को कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. नीरजा परिवर्तित नाम है.

लेखक : प्रफुल्लचंद्र सिंह

नसबंदी का मर्म

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने नसबंदी लागू करने की वकालत की तो हल्ला मच गया कि देखो, फिर से इसलाम विरोधी बात की जा रही है. कट्टर हिंदूवादी इंदिरा गांधी के आपातकाल के बाद से ही मुसलिम आबादी को थामने की मंशा से नसबंदी का हौआ दिखाते रहते हैं.

किसी ने गिरिराज सिंह की मंशा या व्यथा पर ध्यान नहीं दिया कि यह बयान उन्होंने भुवनेश्वर स्थित कलिंग इंस्टिट्यूट औफ सोशल साइंस के दौरे के बाद बाकायदा उस का जिक्र करते दिया था जिस के मुखिया डाक्टर अच्युत सामंत हैं. सामंत ने अपनी जिंदगी बदहाल आदिवासियों के बच्चों को शिक्षा दिला कर मुख्यधारा से जोड़ने में खपा दी है. इस में वे सफल भी रहे हैं. गिरिराज सिंह उन के कार्य देख कर हैरान थे और इसी हैरानी ने उन के ज्ञानचक्षु खोले कि सुदूर इलाकों में हिंदुत्व की इस बुनियाद यानी आदिवासियों की जिंदगी बेहद भयावह है जिस का इकलौता इलाज उन्हें नसबंदी लगा, तो इस पर हल्ला क्यों.

 

अब सर्विस टैक्स देना या न देना आपकी मर्जी

नए साल में सरकार आम लोगों के लिए सौगात लेकर आई है. अब होटल, कैफे, बार या रेस्त्रां में खाने के बिल पर सर्विस चार्ज देना अनिवार्य नहीं होगा. कई बड़े होटल और रेस्त्रां 5 से लेकर 20 फीसदी तक सर्विस चार्ज वसूलते हैं. सर्विस चार्ज वैसे तो ग्राहक की इच्छा पर निर्भर करता है लेकिन ज्यादातर होटल और रेस्त्रां संचालक कुल बिल का 10 से 20 फीसदी तक सर्विस चार्ज के तौर पर लेते हैं. इसे आप टिप भी मान सकते हैं. 

केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि कोई भी कंपनी, होटल या रेस्त्रां ग्राहकों से जबर्दस्ती सर्विस चार्ज नहीं वसूल सकती. कन्ज्यूमर अफेयर्स मिनिस्ट्री ने सभी राज्य सरकारों से कहा है कि वह कंपनियों, होटलों और रेस्त्रां को इस बारे में सचेत कर दें. गौरतलब है कि यह प्रावधान पहले से ही था. मंत्रालय को उपभोक्ता की मर्जी के बिना सर्विस टैक्स वसूले जाने की शिकायतें मिलीं तो उसने स्पष्टीकरण जारी किया.

क्या है वैट, सर्विस चार्ज?

वैट एक सेल्‍स टैक्‍स है, जिसे संबंधित राज्‍य सरकार लगाती है और यह सरकार के पास जमा होता है. चंडीगढ़, पंजाब और हरियाणा में खाने पर वैट की दर 12.5 फीसदी है. शराब पर वैट की दर अलग होती है. वैट खाने, शराब और सर्विस चार्ज मिलकार बनने वाले कुल बिल राशि पर वसूला जाता है.

सर्विस टैक्स क्या है?

केंद्र सरकार सर्विस टैक्स लगाती है. इसकी दर 15 फीसदी है. यह कुल अमाउंट के 40 फीसदी हिस्‍से पर लगाया जाता है. इसलिए सर्विस टैक्‍स की प्रभावी दर (40 फीसदी हिस्‍से पर 15 फीसदी) कुल अमाउंट पर 5.6 फीसदी होगी. फूड बिल और सर्विस चार्ज को मिलाकर कुल एमाउंट पर सर्विस टैक्‍स लगता है.

जीएसटी से क्‍या होगा बदलाव

जीएसटी लागू होने के बाद एक्‍साइज ड्यूटी के साथ ही सर्विस और वैल्‍यू एडेड टैक्स की व्‍यवस्‍था खत्‍म हो जाएगी. फिलहाल माना जा रहा है कि सरकार जीएसटी की दर 18 फीसदी के आसपास तय कर सकती है. मौजूदा समय में देखा जाए तो हम 15 फीसदी सर्विस टैक्स के अलावा राज्‍य सरकार को वैट का भी भुगतान करते हैं. जीएसटी लागू होने के बाद 18 फीसदी जीएसटी के भीतर ये दोनों समाहित हो जाएंगे. ऐसे में आपका होटल बिल भी कम हो सकता है.

दूल्हे की सफाई

वह जमाना कब का खत्म हो चुका जब अपनी शादी की बात पर लड़के भी लड़कियों की तरह शरमा उठते थे. लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजप्रताप ने उड़ती अफवाहों को विराम देते हुए बयान यह दिया कि उन की शादी योगगुरु और कारोबारी बाबा रामदेव की भतीजी से नहीं हो रही है. रामदेव तो पापा की तबीयत का हालचाल जानने के लिए घर आए थे. सत्ता के खेल में शादियों की भूमिका और इतिहास के बारे में शायद ही तेजप्रताप कुछ जानते हों.

बकौल तेजप्रताप, उन की शादी वहीं होगी जहां मातापिता तय कर देंगे. यानी सफाई के साथसाथ संस्कारों की मिसाल भी उन्होंने दे दी. तेजप्रताप जैसे आज्ञाकारी बेटे मिलना अब दुर्लभ बात हो चली है जो जमाने की हवा के साथ नहीं बहते. इस की राजनीतिक वजहें भी हैं. रामदेव भाजपा के नजदीक हैं और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की आस्था भी अपने पूर्व दुश्मन नरेंद्र मोदी में जागृत हो रही है, ऐसे में रामदेव की भतीजी से शादी की अफवाह बेवजह तो नहीं कही जा सकती.

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