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लोग मुझे चौकलेटी हीरो समझते हैं : अरविंद अकेला

बिहार के बक्सर जिले के अहिरौली गांव में पलेबढ़े 9 साल की उम्र से ही भोजपुरी गीतों के गायन में तहलका मचाने वाले अरविंद अकेला ‘कल्लूजी’ अब 19 साल के हो चुके हैं. भोजपुरी गायन के इन 10 सालों के पड़ाव में उन्होंने कई सुपरहिट गीत गाए हैं. अब वे भोजपुरी फिल्मों में अपनी ऐक्टिंग का भी लोहा मनवा रहे हैं. अरविंद अकेला ‘कल्लूजी’ की चौकलेटी इमेज का ही कमाल है कि उन के पास ऐक्शन, प्यार व रोमांस से सजी फिल्मों की भरमार है. उन्होंने लीड रोल में ‘हुकूमत’, ‘त्रिदेव’, ‘दिल भईल दीवाना’, ‘मंगिया सजाई दा हमार’, ‘दिलदार सजना’ जैसी सुपरहिट फिल्में दी हैं. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश:

9 साल की बेहद कम उम्र में आप का भोजपुरी गायन के क्षेत्र में कैसे आना हुआ?

इस का श्रेय मेरे पिता चुन्नूजी चौबे को जाता है, क्योंकि मेरे पिताजी पहले अपने गांव में रंगमंच के लिए भोजपुरी पटकथा लेखन व निर्देशन का काम करते थे. मैं उन के साथ मंच पर बचपन में भोजपुरी में गीत गाता था, जिसे लोगों ने खूब सराहा. इसी बात से खुश हो कर मेरे पिताजी ने बिहार की बी सीरीज नाम की एक कैसेट कंपनी से 9 साल की उम्र में मेरा पहला अलबम ‘गवनवा कहिया ले जइवा’ रेकौर्ड कराया और उन्होंने खुद घरघर जा कर मेरे अलबम के कैसेट को पहुंचाया, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया.

आप कौन से म्यूजिक अलबम से मशहूर हुए?

मुझे भोजपुरी गायकी में मुकाम दिलाने का श्रेय वेव कैसेट से आए मेरे अलबम ‘लभ के टौनिक पियल करा’ और इस के बाद ‘लगाई देता चोलिया में हुक राजाजी’ को जाता है.

आप भोजपुरी गायन के साथसाथ कई फिल्मों में भी ऐक्टिंग कर चुके हैं. क्या अपने गायन की वजह से आप फिल्मों में आए?

भोजपुरी फिल्म जगत में जितने भी हीरो हैं, उन में से ज्यादातर भोजपुरी गायकी के सुपरस्टार हैं. मेरे भोजपुरी गायन को ही भोजपुरी फिल्में दिलाने का सारा श्रेय जाना चाहिए.

आप ने भोजपुरी फिल्मों के कई बड़े फिल्म स्टारों के साथ बतौर सहकलाकार के रूप में काम किया है. अब आप भोजपुरी की फिल्मों में लीड रोल भी कर रहे हैं. ऐसे में अपनी इस कामयाबी के पीछे किस हीरो को श्रेय देंगे?

वैसे तो मैं ने भोजपुरी फिल्मों की शुरुआत पवन सिंह, मनोज तिवारी ‘मृदुल’, विराट भट्ट, रानी चटर्जी, पाखी हेगड़े, अक्षरा सिंह, नेहाश्री, मोनालिसा, निशा दुबे सरीखे कलाकारों के साथ की और इन सब ने फिल्म सैट पर मेरा भरपूर सहयोग किया, लेकिन मेरी कामयाबी में सब से बड़ा योगदान पवन सिंह का है.  वे मेरे मार्गदर्शक ही नहीं, बल्कि गुरु भी हैं.

आप की उम्र अभी 19 साल है और आप की इमेज भी एक चौकलेटी हीरो के तौर पर है. ऐसे में आप को फिल्में मिलने में भी आसानी रही है. अभी तक आप ने किन विषयों पर ज्यादा फिल्में की हैं?

लोग मुझे चौकलेटी हीरो और गायक के रूप में देखते हैं, ऐसे में मेरी इमेज के मुताबिक ही मुझे रोल भी मिल रहे हैं, जिन में प्यार, रोमांस, मारधाड़ होती है.

आप वर्तमान में किन फिल्मों में काम कर रहे हैं?

मेरी आने वाली फिल्म ‘रंग’ प्यार, रोमांस और ऐक्शन से भरपूर है. इस फिल्म में मेरे साथ रितिका शर्मा ने काम किया है. मेरी एक और फिल्म ‘त्रिशूल’ भी आने वाली है.

आप फिल्म की कहानी को कितनी अहमियत देते हैं?

जितनी भी फिल्में करता हूं, उस की कहानी पढ़ने के बाद ही मैं फिल्में करने की हामी भरता हूं.

आप को अगर किसी फिल्म में नैगेटिव रोल का औफर मिले, तो क्या उस फिल्म को करना चाहेंगे?

अगर मुझे किसी फिल्म की कहानी अच्छी लगी, मैं जरूर नैगेटिव रोल करना चाहूंगा.

भोजपुरी फिल्में बौलीवुड की हिंदी फिल्मों की तरह कमाई में पीछे छूट जाती हैं. इस पर क्या कहेंगे?

अगर राज्य सरकारें टैक्स में छूट दे कर भोजपुरी फिल्मों को भी बढ़ावा दें, तो ये भी हिंदी फिल्मों की तरह कमाई करने लगेंगी.

भोजपुरी फिल्मों में आने के बाद आप के गायन पर कोई असर?

जी नहीं, मैं आज भी गायन को उतनी ही तवज्जुह देता हूं.

आप ने सामाजिक बुराइयों पर चोट करता भोजपुरी अलबम लौंच किया है. इस में किस तरह के गीतों को शामिल किया है?

मैं ने अलबम ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ लौंच किया है, जिस में मैं ने बेटियों के साथ होने वाले भेदभाव पर चोट की है.

आप अभी 19 साल के हैं और 11वीं जमात में पढ़ भी रहे हैं. ऐसे में जब कभी आप स्कूल जाते हैं, तो क्या आप को अपने फैंस की वजह से परेशानी का सामना करना पड़ा?

बिलकुल नहीं. मैं अपने फैंस की वजह से ही आज इस मुकाम पर पहुंच पाया हूं. वर्तमान में मैं बनारस के बीएमसी कालेज में 11वीं का छात्र हूं और स्कूल के दोस्तों के साथ मिल कर आम आदमी की तरह ऐंजौय करता हूं.

खाली समय में मन बहलाने के लिए आप क्या करते हैं?

जब भी मेरे पास खाली समय होता है, तो मैं अपने गांव में जा कर मम्मीपापा के साथ समय बिताना पसंद करता हूं. इस के अलावा टीवी देखना और खाली समय में ‘सरस सलिल’ पत्रिका जरूर पढ़ता हूं.                          

देश को मिला दूसरा धोनी, वीडियो देखकर आप भी रह जाएंगे हैरान

भारतीय क्रिकेट में कई विकेटकीपर बल्लेबाज़ आये लेकिन शायद ही कोई, महेंद्र सिंह धोनी की काबिलियत की बराबरी कर सका है. धोनी ने न सिर्फ बतौर विकेटकीपर एक अलग अंदाज पेश किया, बल्कि बल्लेबाजों को चकमा देने का उनका अंदाज़ ऐसा है जिसपर सभी उनके कायल हैं.

धोनी को दुनिया का सबसे तेज़ विकेटकीपर कहा जाता है और भारतीय टीम काफी समय से धोनी का विकल्प खोज रही है. धोनी ने जितना भारतीय टीम के लिए किया है उस हिसाब से तो शायद कभी भी भारत में उनका कोई विकल्प नहीं है.

हालांकि घरेलू क्रिकेट से एक बड़ी खबर सामने आई है, जिसने क्रिकेट की दुनिया में बड़ा धमाका किया है. रणजी ट्राफी में आंध्र प्रदेश और पंजाब के बीच मैच के दौरान आंध्रा के विकेटकीपर कोना श्रीकर ने पंजाब के जीवनज्योत सिंह को धोनी के अंदाज़ में स्टंप आउट कर सभी को चौका दिया.

श्रीकर का यह विडियो काफी वायरल हो रहा है और हमे धोनी के बाद ऐसा कुछ क्रिकेट के मैदान पर पहली बार देखने को मिला है. इस मैच में हालांकि पंजाब ने सात विकेट से आसानी से जीत हासिल की, लेकिन श्रीकर की उस स्टंपिंग ने सभी का ध्यान उनकी ओर केन्द्रित किया.

अभी उनके भारतीय टीम में चुने जाने की बात करना जल्दबाजी होगी लेकिन हमे फिलहाल धोनी जैसा एक और विकेटकीपर देखने को मिल रहा है और ये भारतीय क्रिकेट के हिसाब से सबसे बड़ी बात है.

कोना श्रीकर भारत 22 साल के युवा विकेट कीपर और बल्लेबाज़ हैं. आन्ध्र प्रदेश की ओर से खेलते हुए कोना श्रीकर ने 18 प्रथम श्रेणी मैच में 47 की औसत से 1,361 रन बनाए.  जिसमे 2 शतक और 8 अर्धशतक शामिल हैं. कोना श्रीकर को दिल्ली ने 10 लाख देकर अपनी टीम के साथ खेलने का मौका दिया था. दिल्ली की ओर से खेलते हुए 12 मैच में कोना ने 210 रन बनाए हैं, जिसमे एक अर्ध शतक शामिल है. श्रीकर का विकेट के पीछे का रिकॉर्ड भी काफी अच्छा है. अपनी विकेट कीपिंग से उन्होंने 84 बल्लेबाजों का शिकार किया है. 

‘लड़कियों को है अपनी मर्जी के कपड़े पहनने का हक’

 

लगातार सफलता की ओर अग्रसर श्रद्धा कपूर ने जब से अभिनय के साथ साथ गायन को भी महत्व देना शुरू किया है, तब से उनके करियर में काफी गड़बड़ी शुरू हो गयी है.

श्रद्धा पिछली फिल्म ‘रॉक ऑन 2’ बॉक्स आफिस पर बुरी तरह से मात खा गयी. मगर उन्हें इस बात की परवाह नहीं है. उनका मानना है कि सफलता असफलता तो आती जाती रहती है. इन दिनों वह आदित्य रॉय कपूर के संग अपनी दूसरी फिल्म ‘ओके जानू’ को लेकर काफी उत्साहित हैं, जो कि मणिरत्नम निर्देशित तमिल की सफलतम फिल्म ‘ओ कंधाल कंमानी’ का रीमेक है.

अपनी पिछली फिल्म ‘रॉक ऑन 2’ की असफलता पर क्या कहना चाहेंगी?

सफलता-असफलता आती जाती रहती है. मेरे करियर की पहली दो फिल्में ही असफल थीं. असफलता से हम बहुत कुछ सीखते हैं.

पर आप भी कुछ तो विश्लेषण करती होंगी?

देखिए, जब मुझे ‘रॉक ऑन 2’ का ऑफर मिला, तो मैं बहुत खुश थी. मुझे कहानी बहुत रोचक लगी थी. फिल्म में मैं तीन गाने भी गा रही थी. बहुत अच्छी लोकेशन पर इसे फिल्माया जाना था. इसलिए मुझे कहीं से भी नहीं लगा कि मैंने गलत निर्णय लिया. मुझे कहानी व किरदार इतना पसंद आया था कि मैं बहुत खुश थी कि मैं ‘रॉक ऑन 2’ का हिस्सा बनने जा रही हूं. 

मुझे लगता है कि ‘रॉक ऑन 2’ में आपकी गायकी हावी हुई और अभिनय दब गया?

यह आपकी राय हो सकती है. लेकिन मैं खुद अपनी परफॉर्मेंस को लेकर कोई राय नहीं दे सकती. मैं तो परफॉर्म करने के बाद उस पर सही गलत सोचने का काम दर्शकों व पत्रकारों पर छोड़ देती हूं.

‘आशिकी 2’ के बाद अब आपने आदित्य रॉय कपूर के साथ दूसरी फिल्म ‘ओके जानू’ की है. आपने उनमें क्या बदला महसूस किया?

कोई बदलाव नहीं आया. वह सिनेमा के प्रति फोकस है. वह सिनेमा देखने के काफी शौकीन है.

तो क्या आप फिल्मों के शौकीन नहीं है?

मैं भी फिल्मों की शौकीन हूं पर मैंने बहुत कम फिल्में देखी हैं. मैं जितनी फिल्में देखना चाहती हूं, देख नहीं पाती हूं. काष! मैंने और अधिक फिल्में देखी होती. पिछले तीन वर्षो से फिल्में देखने का तो वक्त ही नहीं मिला. अभी पिछले दिनों मैंने ‘दंगल’ देखी. उम्मीद करती हूं कि इस वर्ष मुझे ज्यादा फिल्में देखने का मौका मिले.

फिल्म ‘ओके जानू’ क्या है?

यह मणिरत्नम निर्देशित तमिल फिल्म ‘ओ कंधाल कंमनी’ का हिंदी रीमेक है, जिसे निर्देशक शाद अली ने तमिल फिल्म के फ्लेवर को बेरकरार रखते हुए बनाया है. उन्होंने इसमें कोई खास बदलाव नहीं किए. यह एक रोमांटिक फिल्म है, मगर बहुत अलग किस्म की. इसमें दो लोग छोटे शहरों से बड़े सपने लेकर बड़े शहर आते हैं. यह एक दूसेर से मिलते हैं, एक दूदरे से प्यार करते हैं. मगर इनकी प्रधानता करियर है, इसलिए यह शादी नहीं करना चाहते. तो आज की युवा पीढ़ी की समस्या को इस फिल्म में चित्रित किया गया है.

फिल्म ‘ओके जानू’ करने की वजह क्या रही?

वास्तव में हर बार होता यह है कि निर्देशक आपको फिल्म की कहानी सुनाता है या आपको पटकथा पढ़ने को देता है. लेकिन शदा अली ने मुझसे कहा कि यह फिल्म देखकर बताओ कि इस फिल्म की लड़की का किरदार मैं निभाना चाहूंगी. क्योंकि अभी हमने पटकथा नहीं लिखी है. फिल्म देखकर मैं बहुत खुश हुई और मैंने हां कर दिया था.

आप अपने पापा के किस रीमेक फिल्म में अभिनय करना चाहेंगी?

डैड की किसी फिल्म का रीमेक न बने. वह महान कलाकार हैं. उनकी फिल्में इतनी अच्छी हैं कि उनका रीमेक नहीं होना चाहिए.

दूसरी कौन सी फिल्में कर रही हैं?

मेरी दो फिल्में आ रही हैं. एक फिल्म है ‘हाफ गर्ल फ्रेंड’, जो कि मशहूर उपन्यासकार चेतन भगत के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है. यह बिहार की पृष्ठभूमि की कहानी है. इसकी शूटिंग पूरी हो चुकी है. दूसरी फिल्म है ‘हसीना’, जो कि अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद की बहन हसीना पारकर के जीवन पर एक काल्पनिक कथा है. इसकी शूटिंग शुरू करने वाली हूं.

फिल्म ‘हसीना’ के लिए तैयारी करते हुए अंडरवर्ल्ड को समझने या जानने का अवसर मिल रहा होगा. तो अब अंडरवर्ल्ड को लेकर आपकी क्या सोच है?

देखिए, हमारी फिल्म अंडरवर्ल्ड पर नहीं है. एक काल्पनिक कहानी है. पर अंडरवर्ल्ड के बारे में जो कहानी लोग सुनते रहते हैं, वही मैंने भी सुनी है. मेरी कोशिश है कि मैं जिस तरह से हसीना का किरदार निभाउं, वह लोगों को विष्वसनीय लगे.

फिल्म ‘हसीना’ के किरदार के लिए किस तरह की तैयारी कर रही हैं?

मैं एक बार हसीना के पारिवारीक सदस्यों से मुलाकात कर चुकी हूं. दोबारा फिर से मिलने वाली हूं. इसके लिए कुछ एक्टिंग वर्कशॉप भी करने वाली हूं. इस फिल्म में मेरा भाई ही हसीना के भाई दाउद का किरदार निभा रहे हैं.

कुछ दिन पहले एक तमिल फिल्म निर्देशक ने तमन्ना भाटिया का नाम लेकर हीरोइनों के पहनावे पर कमेंट किया है. क्या सही है?

मुझे इसकी जानकारी नहीं इसलिए कुछ नही कहूंगी.

बंगलुरू में एक लड़की के साथ जो हादसा हुआ उसके लिए अब्बू आजमी व फरहान आजमी ने लड़की के पहनावे को दोश ठहराया है? इस पर आपकी राय?

यह बहुत अचरज की बात है. मैंने वह वीडियो देखा है. जब लड़की के साथ छेड़खानी हो रही थी, तब तमाम पुरूष वहां खड़े होकर तमाशा देख रहे थे. कोई भी उसकी मदद के लिए आगे नहीं आया. पर कोई नेता हो अभिनेता हो या आम इंसान जो यह कह रहा है कि लड़की की पोशाक सही नहीं थी, छोटी थी या भड़काने वाली थी, वह गलत कह रहा है. इस तरह के विचार किसी पुरूष को नहीं रखने चाहिए. हर किसी को अपनी पसंद अपनी रूचि के अनुसार पोशाक पहनने का हक है. लोगों को यह देखना चाहिए कि हरकत करने वाला कौन है? लेकिन लोग छेड़खानी करने वाले पर कोई बात नहीं करते. सीधे लड़की के पहनावे को दोषी ठहरा देते हैं.

पर जिन लोगों ने मदद नहीं किया. उनकी संजीदगी खत्म हो गयी है या इंसानियत खत्म हो रही है, समाज में ?

मुझे नहीं पता कि ऐसा क्यों हो रहा है. पर मुझे सदमा लगा कि लोग चुपचाप खड़े देखते रह गए. मैंने खुद कईयों से सवाल किया कि लोग देखते रहे और लड़की परेशान होती रही.

दिशा पाटनी के हॉट योगा का हॉट वीडियो आपके होश उड़ा देगा

अभिनेत्री दिशा पाटनी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं और जो लोग उन्हें नहीं जानते होंगे, वो लोग भी इस वीडियो को देखने के बाद जानने लगेंगे. जी हां, MS Dhoni : the untold story फिल्म से बॉलीवुड में डेब्यू करने वाली दिशा पाटनी ने यूं तो टाइगर श्रॉफ की गर्लफ्रेंड के तौर पर हमेशा सुर्खियां बटोरी हैं, लेकिन इधर उनके अभिनय की भी चर्चा होने लगी है. इन दिनों वो 3 फरवरी को रिलीज होने वाली चाइनीज फिल्म ‘कुंग फू योगा’ में भी अहम किरदार निभा रही हैं. वह इस फिल्म में दिग्गज चीनी अभिनेता जैकी चेन के अपोजिट नजर आएंगी.

इसी फिल्म के प्रमोशन के लिए दिशा ने समंदर के अंदर किए गए योगा का एक वीडियो हाल ही अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर पोस्ट किया है, जिसे लेकर बवाल खड़ा हो गया है. इस वीडियो में वो बिकिनी में नजर आ रही हैं और समुद्र में योग कर रही हैं. इसके साथ ही दिशा ने फिल्म के कई और वीडियो पोस्ट किए हैं, लेकिन उन्हें कोई खास तवज्जो नहीं मिली, जितनी की उनके हॉट योगा को मिल रही है.

आप भी वीडियो में देखिए दिशा का बोल्ड अवतार

मायावती को भारी न पड़ जाये ‘मुस्लिम कार्ड’

दलितों में बहुत सारी जातियां अगड़ों की ही तरह पूजापाठ और धार्मिक कर्मकांड करती हैं. बहुजन समाज पार्टी ने राजनीति में दखल बढ़ाने के बाद धार्मिक कर्मकांड, रूढिवादिता के खिलाफ अपनी लड़ाई को छोड़ दिया है. ऐसे में अब दलित जातियां भी धार्मिक रूप से मुसलिमों के खिलाफ खड़ी हो जाती हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा ने चुनाव को धार्मिक धुव्रीकरण का रंग दिया तो भाजपा के विरोधी सभी दलों ने मुसलिम आरक्षण को लेकर अपनी आवाज को बुलंद किया. ऐसे में भाजपा के पक्ष में हिन्दू मतों का धुव्रीकरण हो गया.

समाजवादी पार्टी में आपसी विवाद के बाद मुसलिम मतदाता को अपनी ओर खींचने के लिये मायावती ने विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक मुसलिम प्रत्याशी को टिकट दिया है. बसपा प्रमुख इस बात को अपने स्तर से प्रचारित भी कर रही हैं. अगर मुसलिम कार्ड के विरोध में हिन्दू मतों का धुव्रीकरण हो गया तो दलित जातियां बसपा से दूर जा सकती हैं. आर्थिक रूप से दलित और मुसलिम भले ही एक जैसी हालत में हो, पर जहां धर्म की बात आती है दलित हिदू के पक्ष में खड़ा नजर आने लगता है.

दलित चिंतक रामचंन्द्र कटियार कहते हैं ‘बसपा का दलित समाज के उत्थान से कोई बहुत सरोकार नहीं रह गया. बसपा की सरकार के दौरान ही दलित संगठनों पर दबाव डाला गया कि वह दलित महापुरूषों को लेकर संवेदनशील विचारधारा की बात न करे. दलित महापुरूष पेरियार को लेकर बसपा ने दूरी बनाई. उस समय बसपा को ब्राहमण मतों की दरकार थी. ऐसे में वह दलित विचारधारा को दबाने में लग गई. ब्राहमण-दलित गठजोड़ की मजबूरी में बसपा ने अपनी दलित नीतियों से कदम पीछे खींच लिये. जिसके बाद दलित भी ब्राहमणों की राह पर चल दिये. अब दलित की यही सोच धार्मिक आधार पर मुसलिमों के साथ मेल नहीं खाती. ऐसे में दलितों पर मुसलिमों को तरजीह देने की सोच बसपा पर भारी पड़ सकती है. बसपा के दलित नीतियों से हटने के कारण अब दलित बसपा के साथ उस तरह से एकजुट नहीं है जैसे पहले थे’.

राजनीतिक समीक्षक रजनीश राज कहते हैं ‘जो लोग मुसलिम को वोटबैंक समझते हैं वह गलत सोचते हैं. अब मुसलिम वोटबैंक नहीं है. यह बात जरूर है कि वह भाजपा के खिलाफ उस प्रत्याशी को वोट देता है जो उसे हराने में सक्षम होता है. ऐसे में मायावती के पक्ष में मुसलिम वोट पड़ेगा यह सोच सही नहीं है. मुसलिमों की पंसद को देखा जाये तो सपा और कांग्रेस के बाद ही बसपा का नम्बर आता है. अगर सपा-कांग्रेस गठजोड़ बन गया तो बसपा पर मुसलिम कार्ड उलटा पड़ सकता है. मुसलिम के साथ दलित भी उसके हाथ से फिसल सकता है. विधानसभा चुनावों में वोट का धार्मिक धुव्रीकरण भाजपा के पक्ष में जाता है. इसलिये ही भाजपा उस दिशा में काम करती है. दूसरे दल अगर वोटों के धार्मिक धुव्रीकरण की राह पर चलेंगे तो उनका नुकसान होगा.

सपा में समझौते की ये है सबसे बड़ी बाधा

मुलायम और अखिलेश के बीच समझौते की बाधा अमर सिंह नहीं प्रोफेसर राम गोपाल यादव हैं. मुलायम सिंह यादव ने समझौते की राह पर आगे बढ़ते हुये अमर सिंह को पार्टी से बाहर करने का मन बना लिया था. अमर सिंह अपनी ओर से सुलह के लिये इस्तीफा देने को तैयार हो गये थे. 6 जनवरी को अमर सिंह के इस्तीफा देने के बाद सुलह समझौते की राह खुल जानी थी. मुलायम खेमे की ओर से इस बात की घोषणा के लिये विक्रमादित्य मार्ग मुलायम के आवास पर शाम 4 बजे मीडिया को बुला भी लिया गया था. मुलायम सिंह यादव चाहते थे कि अगर वह एक कदम पीछे हटे तो अखिलेश खेमा भी पीछे हटे. मुलायम खेमे की ओर से कहा गया कि अमर सिंह के साथ रामगोपाल यादव का भी इस्तीफा हो.

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इस बात के लिये तैयार नहीं हुये. जिसके बाद मुलायम सिंह यादव ने भी अपने कदम पीछे खींच लिये. इसके बाद सुलह के दरवाजे बंद हो गये. मीडिया को मैसेज भेज कर प्रेस कांफेंस के कैसिंल करने की घोषणा कर दी गई. रामगोपाल इस बात के लिये पूरी तरह से अखिलेश पर दबाव बनाये हैं कि वह मुलायम से सुलह न करे. समाजवादी पार्टी और साइकिल सिंबल उनका ही होगा. अखिलेश केवल साइकिल सिंबल और समाजवादी पार्टी की वजह से ही पिता मुलायम से समझौते की बात कर रहे हैं. अगर चुनाव तक दोनो में समझौता नहीं हुआ तो चुनाव के बाद पार्टी दो हिस्सों में बंट जायेगी.

मुलायम सिह को बेटे अखिलेश से अधिक भाई रामगोपाल पर गुस्सा है. वह मानते हैं कि रामगोपाल की वजह से ही अखिलेश से विद्रोह किया है. कई अवसरों पर राम गोपाल की टिप्पणी मुलायम को आहत करने वाली रही है. यादव परिवार में जहां बाकी लोग मुलायम के साथ एकजुट हैं वहीं रामगोपाल मुलायम के विरोध में खड़े हो जाते हैं. मुलायम इसे अपना अपमान करने वाला मानते हैं. सुलह के लिये मुलायम अमर सिंह को पार्टी से बाहर करने को तैयार थे पर जब मुलायम की तरफ से रामगोपाल को बाहर करने की बात कही गई तो अखिलेश पीछे हट गये.

राजनीतिक समीक्षक शिवसरन सिंह गहरवार कहते हैं ‘समाजवादी पार्टी में कलह का कारण आपसी परिवार के अंदर ही रहा है. अमर सिंह मुलायम के लिये इतना अहम रोल नहीं रखते कि उनको बाहर न किया जा सके. यह बात मुलायम भी जानते हैं कि सपा की इस सरकार में अमर सिंह शुरू से ही हाशिये पर रहे हैं. अखिलेश सरकार में उनका दखल न के बराबर ही रहा है. ऐसे में बारबार अमर सिंह का नाम लेकर निशाना लगाया जा रहा है. असल में यादव परिवार की लड़ाई में आपसी टकराव है. रामगोपाल और शिवपाल एक दूसरे को सहन करने का तैयार नहीं हैं. इन दोनों की लड़ाई में ही मुलायम-अखिलेश आमने सामने हैं.’

अमर सिंह ने यह कह कर अपना पक्ष उजागर कर दिया है कि वह समझौते के लिये पार्टी से इस्तीफा देने को तैयार हैं. अगर मामला केवल अमर सिंह के इस्तीफे से हल होने वाला होता तो यह समझौता हो गया होता. राम गोपाल का नाम बीच में आते ही सुलह का मसला लटक गया. अब जब तक इस पेंच का हल नहीं होता सुलह की राह मुश्किल हो गई है.      

सुहाग पर भारी प्यार

उस महिला की शक्ल देख कर ही उत्तर प्रदेश के जिला इलाहाबाद के थाना झूंसी के थानाप्रभारी विजय प्रताप सिंह को लगा कि यह किसी भारी मुसीबत में है. उन्होंने उसे बैठा कर उस की परेशानी पूछी तो उस ने रोते हुए कहा, ‘‘साहब, कल रात से मेरे पति का कुछ पता नहीं है.’’

‘‘क्या नाम है तुम्हारा, तुम रहती कहां हो?’’ विजय प्रताप सिंह ने पूछा तो महिला ने रोते हुए कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम आरती है और मैं यहीं पड़ोस में शिवगंगा विहार कालोनी में रहती हूं.’’

‘‘अपने पति के बारे में पूरी बात बताओ. वह कब घर से गए, कहां गए और कब तक रोज घर आते थे? वह करते क्या हैं, उन का नाम क्या है?’’

‘‘साहब, उन का नाम विजयशंकर पांडेय है. वह कल दोपहर बाद घर से निकले थे. शाम तक घर नहीं आए तो मैं ने उन के मोबाइल पर फोन किया. लेकिन बात नहीं हो सकी, क्योंकि उन का फोन बंद था. एक तो पानी बरस रहा था, दूसरे बात नहीं हो पा रही थी, इसलिए मुझे चिंता हो रही थी. घर के पिछले हिस्से में बाढ़ का पानी भी भरा था, ऐसे में उन का न आना परेशान कर रहा था. बरसात की वजह से मैं उन्हें कहीं खोजने भी नहीं जा सकी. जब वह सवेरे भी नहीं आए और बात भी नहीं हो सकी तो मैं थाने आ गई.’’

‘‘ठीक है, मैं तुम्हारे पति की गुमशुदगी दर्ज करा कर आगे की काररवाई करता हूं.’’ विजय प्रताप सिंह ने कहा और विजयशंकर पांडेय की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

लेकिन जब उन्होंने आरती से आगे पूछताछ की तो उन्हें उस की विरोधाभासी बातों से उसी पर ही संदेह हुआ, क्योंकि उस ने उन के तमाम सवालों के जवाब इस तरह दिए थे, जो पहले दिए जवाबों से मेल नहीं खा रहे थे. इस से उन्हें लगा कि यह कुछ छिपा रही है.

कुछ दिशानिर्देश दे कर विजयप्रताप सिंह ने इस मामले की जांच की जिम्मेदारी एसआई काशीप्रसाद कुशवाहा को सौंप दी. उन्होंने कहा था कि पहले वह आरती के बारे में पता करें कि उस का चरित्र कैसा है? काशीप्रसाद कुशवाहा सिपाहियों को ले कर शिवगंगा विहार कालोनी जाने की तैयारी कर रहे थे कि उन्हें फोन द्वारा सूचना मिली पति की गुमशुदगी दर्ज कराने वाली आरती के घर से थोड़ी दूरी पर बाढ़ के पानी में एक लाश तैर रही है.

काशीप्रसाद ने तुरंत यह जानकारी थानाप्रभारी को दी और खुद मोटरवोट तथा गोताखोरों की व्यवस्था कर के घटनास्थल पर पहुंच गए. लाश को निकलवा कर बाहर लाया गया तो पता चला कि वह लाश आरती के पति विजयशंकर पांडेय की थी, जिस की कुछ देर पहले ही उस ने गुमशुदगी दर्ज कराई थी.

लाश मिलने की सूचना पा कर कालोनी वाले तो इकट्ठा थे ही, आरती भी अपने तीनों बच्चों और कुछ शुभचिंतकों के साथ वहां पहुंच गई थी. सूचना पा कर विजय प्रताप सिंह भी आ गए थे.

लाश की शिनाख्त हो ही चुकी थी. पुलिस लाश का निरीक्षण करने लगी तो मृतक के सिर में एक बड़ा सा घाव दिखाई दिया. इस का मतलब था कि मृतक पानी में डूब कर नहीं मरा था, उस के सिर पर किसी भारी चीज से वार कर के उसे मारा गया था. उस के गले पर भी कसने के निशान थे.

इन बातों से साफ हो गया था कि यह हत्या का मामला था. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भिजवा दिया.

अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो पता चला कि विजयशंकर की कनपटी और सिर के पिछले हिस्से पर किसी भारी चीज से कई वार किए गए थे, इस के अलावा उस के गले में कोई चीज लपेट कर कसा गया था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साफ हो गया था कि यह हत्या का मामला था. इस के बाद विजय प्रताप सिंह ने विजयशंकर की गुमशुदगी को हत्या में तब्दील कर आगे की जांच शुरू कर दी. चूंकि उन्हें मृतक की पत्नी आरती पर संदेह था, इसलिए उन्होंने पूछताछ के लिए उसे थाने बुला लिया.

आरती से पूछताछ की जाने लगी, लेकिन वह कुछ भी बताने को राजी नहीं थी. वह अपने पहले वाले बयान को ही बारबार दोहराती रही. जबकि पुलिस को पूरा विश्वास था कि हत्या उसी ने कराई है या खुद ही की है, इसलिए पुलिस ने उस के पिछले बयान पर विश्वास न कर के जब उस के साथ थोड़ी सख्ती की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि प्रेमी रामेंद्र सिंह उर्फ मिंटू और उस के दोस्त चंद्रमा सिंह उर्फ चंदन के साथ मिल कर उसी ने पति विजयशंकर पांडेय की हत्या की थी. इस के बाद उस ने पति की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

कौशांबी का रहने वाला विजयशंकर पांडेय 8-10 साल पहले परिवार सहित इलाहाबाद आ कर वाराणसी की ओर जाने वाले रोड पर स्थित झूंसी में इलाहाबाद प्राधिकरण द्वारा बनवाई गई शिवगंगा विहार कालोनी में रहने लगा था. उस के परिवार में पत्नी आरती के अलावा 3 बच्चे थे.

गुजरबसर के लिए विजयशंकर ने मकान में ही किराए पर फिल्मों की सीडी देने की दुकान खोल ली थी. इस के अलावा वह थोड़ाबहुत प्रौपर्टी डीलिंग का भी काम कर लेता था. जब कभी वह बाहर चला जाता था, दुकान पर उस की पत्नी आरती बैठ जाती थी.

विजयशंकर दुकान पर अश्लील फिल्मों की भी सीडी रखता था. इस बात की जानकारी आरती को भी थी. मनचले उन्हें लेने आते थे तो वह उन्हें देती भी थी. जो महिलाएं इस का शौक रखती थीं, वे आरती से ही ऐसी फिल्मों की सीडी ले जाती थीं.

विजयशंकर का पड़ोसी रामेंद्र सिंह उर्फ मिंटू भी अश्लील फिल्मों का शौकीन था. चूंकि वह आरती को भाभी कहता था, इसलिए दोनों में हंसीमजाक भी होता रहता था. इसलिए रामेंद्र को आरती से अश्लील सीडी मांगने में संकोच भी नहीं होता था. एक दिन रामेंद्र सीडी लेने आया तो आरती ने कहा, ‘‘देवरजी, कब तक इस तरह की फिल्में देख कर दिन काटोगे? अरे कहीं से घर वाली ले आओ.’’

‘‘भाभी, घरवाली मिलती तो जरूर ले आता. जब तक कोई नहीं मिल रही, फिल्में देख कर ही संतोष करना पड़ रहा है.’’ रामेंद्र ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘जब तक घरवाली नहीं मिल रही, इधरउधर से व्यवस्था कर लो.’’ आरती ने रामेंद्र की आंखों में आंखें डाल कर कहा.

‘‘कौन पूछता है भाभी. भूखे को कोई भोजन नहीं देता. जिस का पेट भरा रहता है, उसी को सब पूछते हैं.’’ रामेंद्र ने सकुचाते हुए कहा.

‘‘कभी किसी से अपनी परेशानी कही है?’’

‘‘कोई फायदा नहीं भाभी, लोग हंसी ही उड़ाएंगे.’’

‘‘जब तक कहोगे नहीं, कोई तुम्हारी मदद कैसे करेगा?’’ आरती ने कहा.

‘‘आप से कहूं तो क्या आप मेरी मदद करेंगी? 4 गालियां जरूर दे देंगी.’’ रामेंद्र ने आरती के चेहरे पर नजरें गड़ा कर कहा.

आरती ने चेहरे पर रहस्यमयी मुसकान ला कर कहा, ‘‘एक बार कह कर तो देखो. अरे मैं तुम्हारी पड़ोसन हूं. पड़ोसी पड़ोसी की मदद नहीं करेगा तो क्या दूर वाला मदद करने आएगा.’’

अब इस से ज्यादा आरती क्या कहती. रामेंद्र भी बेवकूफ नहीं था. वह उस की बात का मतलब समझ गया. उस समय न विजयशंकर घर में था और न बच्चे. रामेंद्र आरती के घर में घुस गया. उस के बाद निकला तो बहुत खुश था. पत्नी की मौत के कई सालों बाद उस दिन उसे स्त्रीसुख मिला था.

दूसरी ओर आरती भी खुश थी. रामेंद्र ने उसे पूरी तरह खुश कर दिया था. एक बार दूरी मिटी तो सिलसिला चल निकला. जब भी उन्हें मौका मिलता, इच्छा पूरी कर लेते. दोनों अगलबगल रहते थे, इसलिए उन्हें मिलने में परेशानी भी नहीं होती थी.

आरती और रामेंद्र के बीच अवैध संबंध बने तो उन के बातचीत और हंसीमजाक का लहजा बदल गया. अब आरती उस का खयाल भी खूब रखने लगी, इसलिए आसपड़ोस वालों को संदेह होने लगा तो लोग इस बात को ले कर चर्चा करने लगे. नतीता यह निकला कि इस बात की जानकारी विजयशंकर को भी हो गई.

विजयशंकर को पत्नी पर पूरा विश्वास था, इसलिए उस ने चर्चा पर विश्वास न कर के खुद सच्चाई का पता लगाने का निश्चय किया. वह जानता था कि अगर वह इस बारे में पत्नी से पूछेगा तो वह सच्चाई बताएगी नहीं, बल्कि उस के पूछने से होशियार हो जाएगी. सच्चाई का पता लगाने के लिए वह बाहर जाने के बहाने घर से निकलता और छिप कर पत्नी तथा रामेंद्र पर नजर रखता.

उस की इस मेहनत का उसे जल्दी ही फल मिल गया. एक दिन दोपहर को उस ने आरती और रामेंद्र को रंगेहाथों पकड़ लिया. गुस्से में आरती को वह लातघूंसों से पीटने लगा. आरती के पास सफाई देने को कुछ नहीं था, इसलिए वह गलती के लिए माफी मांगते हुए भविष्य में फिर कभी ऐसा न करने की कसम खाने लगी. रामेंद्र की भी उस ने पिटाई की.

आरती विजयशंकर की पत्नी ही नहीं, उस के 3 बच्चों की मां भी थी, इसलिए बच्चों के भविष्य की चिंता करते हुए उस ने दोबारा ऐसी गलती न करने की चेतावनी दे कर उसे माफ कर दिया. लेकिन जिस का पैर एक बार फिसल चुका हो, उसे संभलना मुश्किल होता है. यही हाल आरती का भी था. कुछ दिनों शांत रहने के बाद वह फिर चोरीछिपे रामेंद्र से मिलने लगी.

इस बात का पता विजयशंकर को चला तो अपना घर बचाने के लिए उस ने वह घर छोड़ दिया और शिवगंगा विहार कालोनी में जमीन खरीद कर अपना मकान बनवाया और उसी में परिवार के साथ रहने लगा.

दूर हो जाने से आरती और रामेंद्र का मिलना कम जरूर हो गया, लेकिन बंद नहीं हुआ. उन्हें मिलने में परेशानी होने लगी तो एक दिन आरती ने कहा, ‘‘रामेंद्र, मुझ से तुम्हारी दूरी बरदाश्त नहीं होती. ऐसा करो, तुम मुझे भगा ले चलो. अब मैं विजय के साथ नहीं रहना चाहती.’’

‘‘विजय के रहते यह संभव नहीं है आरती.’’

‘‘अगर ऐसा है तो उसे ठिकाने लगा दो. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. इस समय घर के पीछे बाढ़ का पानी भरा ही है. अगर उसे मार कर इस पानी में फेंक दिया जाए तो वह बह कर कहीं दूर चला जाएगा. उस की लाश का भी पता नहीं चल पाएगा. वह शराब पीता ही है. खाना खा कर बेसुध हो जाता है. इसलिए उस की हत्या करना भी आसान है.’’

इसी के साथ विजयशंकर की हत्या की योजना बन गई. इस योजना में मदद के लिए रामेंद्र ने अपने दोस्त चंद्रमा सिंह उर्फ चंदन को शामिल कर लिया.

21 अगस्त, 2016 की रात आरती ने उस की शराब में नींद की गोलियां मिला दीं. विजयशंकर शराब पी कर जल्दी ही सो गया. इस के बाद आरती ने रामेंद्र को फोन किया तो वह चंदन को ले कर आ गया. आरती ने मसाला कूटने वाली मूसली से विजय का सिर फोड़ दिया तो रामेंद्र और चंद्रमा ने उस के गले में बिजली का तार लपेट कर कस दिया.

विजय की मौत हो गई तो उस की लाश को चादर में लपेट कर सीढ़ी से छत पर ले गए और घर के पीछे भरे बाढ़ के पानी में फेंक दिया. लेकिन लाश बहने के बजाय वहीं एक झाड़ी में फंसी रह गई, जिस से सभी पकड़े गए.

आरती से पूछताछ के बाद पुलिस ने अपराध संख्या 297/2016 पर धारा 302, 301 के तहत मुकदमा दर्ज कर आरती के प्रेमी रामेंद्र और उस के दोस्त चंदन सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया. उन्होंने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद तीनों को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. विजय के बच्चों को उस की बहन अपने साथ ले गई है.

लालच में 81 लाख की चपत

उत्तरीपश्चिमी दिल्ली के पीतमपुरा के रहने वाले प्रवीण कुमार अग्रवाल केंद्रीय लोकनिर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) में इंजीनियर थे. सन 1957 से 1985 की सेवा के दौरान उन की पोस्टिंग देश के विभिन्न शहरों के अलावा लीबिया और नेपाल में भी रही. नौकरी से रिटायर होने के बाद वह अपने परिवार के साथ खुशी से अपनी बाकी की जिंदगी गुजार रहे थे. लेकिन पिछले कई महीनों से वह कुछ ज्यादा ही परेशान थे. अपनी परेशानी की वजह उन्होंने अपने बहूबेटों को भी नहीं बताई. वह उस परेशानी को ले कर अंदर ही अंदर घुट रहे थे. 82 साल के प्रवीण अग्रवाल की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी इस समस्या का कैसे समाधान करें.

तनाव इंसान की भूख और नींद तक उड़ा देता है. प्रवीण कुमार एक तो पहले से ही उम्रदराज थे, ऊपर से चिंता का असर उन के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा था. जब उन्हें लगा कि टेंशन से उन की समस्या का समाधान नहीं हो सकता तो वह सितंबर, 2016 के दूसरे सप्ताह में तत्कालीन डीसीपी विजय सिंह के पास जा पहुंचे. डीसीपी को एक प्रार्थनापत्र देते हुए उन्होंने बताया कि उन के साथ बहुत बड़ी धोखाधड़ी की गई है. एक कंपनी के पदाधिकारी एस.आर. शर्मा, सोनकर आप्टे ने अपने साथियों के सहयोग से उन से 81 लाख रुपए ठग लिए हैं.

अग्रवाल ने बताया कि इन लोगों ने कालातीत हो चुकी जीवन बीमा पौलिसियों को चालू करा कर उन का बोनस दिलाने, डेविस वैल्यू कार्ड, ड्रीमलैंड डेवलपर, वैल्यू क्लब सर्विस की विभिन्न योजनाओं में उन से पैसे लगवाए और अब इन लोगों के मोबाइल फोन स्विच्ड औफ आ रहे हैं. इन लोगों के कहने पर वह करीब 81 लाख रुपए इन के बताए बैंक खातों में जमा करा चुके हैं. प्रवीण कुमार ने उन लोगों के फोन नंबर भी डीसीपी को बता दिए, साथ ही उन्होंने खातों में पैसा जमा कराने के सबूत भी दिए.

प्रवीण कुमार की बात सुन कर डीसीपी विजय सिंह चौंके. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि इतने अनुभवी और वरिष्ठ अधिकारी रह चुके प्रवीण कुमार आखिर उन लोगों के ठगी के जाल में कैसे फंस गए.

प्रवीण कुमार के साथ हुई ठगी को डीसीपी ने गंभीरता से लिया. उन्होंने यह केस स्पैशल स्टाफ यूनिट के हवाले कर दिया. उन के आदेश पर 22 सितंबर, 2016 को थाना मौर्य इनक्लेव में अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 419, 420, 468, 471, 120बी, 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली गई. इस मामले की जांच के लिए उन्होंने एसीपी ओमवीर सिंह के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी.

इस टीम में इंसपेक्टर अरुण कुमार, सबइंसपेक्टर राममनोहर मिश्रा, हैडकांस्टेबल सुरेशचंद्र, अशोक कुमार, कांस्टेबल संजय, सुशील, सोमवीर, मुकेश, धीरज आदि को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने सब से पहले प्रवीण कुमार अग्रवाल से मिल कर उन से 81 लाख रुपए ठगे जाने की कहानी सुनी, साथ ही जिन फोन नंबरों से उन के पास फोन आते थे, उन फोन नंबरों को नोट कर लिया. प्रवीण कुमार ने जिन खाता नंबरों में पैसे जमा कराए थे, उन की डिटेल्स भी ले ली. वे खाते एक्सिस बैंक और यस बैंक के थे. इस के बाद पुलिस टीम ने इस केस की जांच शुरू कर दी.

एसआई राममनोहर मिश्रा ने आरोपियों के फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. प्रवीण कुमार ने एक्सिस बैंक और यस बैंक के जो खाता नंबर दिए थे, उन की जांच कराई तो जानकारी मिली कि एक्सिस बैंक का खाता नंबर पूर्वी दिल्ली की लक्ष्मीनगर शाखा का था और यस बैंक का खाता नंबर पूर्वी दिल्ली की ही शकरपुर शाखा का था. ये दोनों खाते अंकुर तोमर नाम के किसी व्यक्ति के थे, जो उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी का रहने वाला था.

राममनोहर मिश्रा को उक्त दोनों बैंकों के शाखा प्रबंधकों से पता चला कि एक्सिस बैंक के खाते में मार्च, 2015 से जून, 2016 तक 27 लाख 29 हजार 326 रुपए जमा हुए थे, जबकि यस बैंक के खाते में अक्तूबर, 2015 से जून, 2016 तक 1 करोड़ 26 लाख 41 हजार 742 रुपए जमा हुए थे. इस जानकारी से उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि इन लोगों ने प्रवीण कुमार के अलावा अन्य लोगों से भी ठगी की थी. यह जानकारी उन्होंने इंसपेक्टर अरुण कुमार और एसीपी ओमवीर सिंह को दी. एसीपी ने आगे की काररवाई के निर्देश दिए. उन के निर्देश पर एसआई राममनोहर ने उक्त दोनों खाता नंबरों को सीज करा दिया.

पुलिस टीम ने बुराड़ी निवासी अंकुर तोमर के घर दबिश दी तो वह घर पर ही मिल गया. उसे हिरासत में ले कर पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि वह रोहित कुमार मिश्रा और पंकज नायक की कंपनी में बतौर रिसैप्शनिस्ट नौकरी करता था. वहां उसे 10 हजार रुपए महीने तनख्वाह मिलती थी. नौकरी के समय इन लोगों ने उस के आईडी प्रूफ वगैरह जमा कर लिए थे, बाद में उन लोगों ने उन्हीं के आधार पर उस के नाम से उक्त दोनों बैंकों में खाते खुलवा लिए.

उस ने बताया कि इन खातों में कितने रुपए जमा होते थे, कितने निकाले जाते थे, इस की उसे कोई जानकारी नहीं थी. रोहित मिश्रा खाली चैकों पर उस से साइन करा कर ले जाता था और बाद में उन चैकों में एमाउंट भर कर बैंकों से पैसे निकाल लाता था.

अंकुर की बात सुन कर पुलिस को लगा कि कहीं यह झूठ तो नहीं बोल रहा, इसलिए उस के अन्य बैंक के खाते को चैक किया गया तो उस के खाते में एक्सिस और यस बैंक से निकाली गई रकम जमा करने का विवरण नहीं मिला.

उक्त दोनों बैंक खातों से निकाली गई मोटी रकम कहां जाती थी, यह बात पंकज नायक या रोहित मिश्रा से पूछताछ के बाद ही पता लग सकती थी. अंकुर को यह भी नहीं पता था कि पंकज और रोहित रहते कहां हैं. लेकिन उस ने पुलिस को दोनों के फोन नंबर उपलब्ध करा दिए.

एक पुलिस टीम पंकज और रोहित के फोन नंबरों के आधार पर उन के ठिकानों तक पहुंचने की कोशिश में जुट गई. पता चला कि वे दोनों गाजियाबाद की खोड़ा कालोनी के रहने वाले थे. पुलिस ने मुखबिरों से पता कराया तो जानकारी मिली कि पंकज और रोहित अपने घरों पर नहीं हैं. दिल्ली पुलिस की टीम गोपनीय रूप से उन के घर पर निगरानी करने लगी.

22 सितंबर, 2016 की सुबह पुलिस को पंकज नायक खोड़ा कालोनी में दिखाई दिया. वह घर से निकल कर बसस्टैंड पर पहुंच गया. पुलिस ने उसे उस समय छेड़ना उचित नहीं समझा. दरअसल पुलिस यह देखना चाहती थी कि वह सुबहसुबह कहां जा रहा है. कुछ दूरी बना कर पुलिस भी उस के पीछेपीछे लग गई. वहां से एक आदमी की मोटरसाइकिल पर बैठ कर वह दिल्ली के निर्माण विहार मेट्रो स्टेशन पहुंच गया.

दिल्ली पुलिस की जो टीम उस का गाजियाबाद से पीछा करती आ रही थी, उस ने यह जानकारी इंसपेक्टर अजय कुमार को दे दी थी. पुलिस टीम रास्ते में ही अजय कुमार को अपनी लोकेशन बताती हुई आ रही थी. निर्माण विहार मेट्रो स्टेशन पर पंकज को एक युवक मिला. वह रोहित मिश्रा था. ये दोनों काफी देर तक वहीं पर खड़े रहे. तब तक इंसपेक्टर अजय कुमार और एसआई राममनोहर भी पुलिस टीम के साथ निर्माण विहार मेट्रो स्टेशन पहुंच गए. उन के साथ अंकुर तोमर भी था.

दोपहर बाद पंकज और रोहित प्रीत विहार मेट्रो स्टेशन की तरफ गए. वहां पर उन्हें 2 युवक और मिले. पुलिस के साथ आए अंकुर ने उन दोनों युवकों की पुष्टि मनीष ठाकुर और विशाल वर्मा के रूप में की. पुलिस टीम ने उन चारों को हिरासत में ले लिया.

स्पैशल स्टाफ के औफिस ला कर उन चारों से प्रवीण अग्रवाल के साथ की गई ठगी के बारे में पूछताछ की गई तो उन्होंने बिना किसी हीलाहवाली के अपना अपराध स्वीकार कर लेने में ही भलाई समझी. उन्होंने ठगी का जाल बुनने की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी.

23 वर्षीय पंकज नायक गाजियाबाद की खोड़ा कालोनी में रहता था. वह दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्राचार से बीकौम कर रहा था, साथ ही नोएडा के कई कालसेंटरों में नौकरी कर चुका था. खोड़ा कालोनी में ही रोहित मिश्रा रहता था. उस ने गाजियाबाद के आईएमटी इंस्टीट्यूट से एमबीए किया था. दोनों अच्छे दोस्त थे. बात अक्तूबर, 2015 की है. उस समय दोनों ही बेरोजगार थे.

दोनों मिल कर किसी ऐसे धंधे के बारे में सोचने लगे, जिस में कम समय में अच्छी आमदनी हो. बातोंबातों में रोहित ने सुझाव दिया कि अखबारों में आए दिन इंश्योरेंस बोनस दिलाने के नाम पर लोगों को ठगने के मामले छपते रहते हैं. बोनस के नाम पर लोग आसानी से पैसा देने को तैयार भी हो जाते हैं.

सुझाव अच्छा था, लेकिन पंकज को इस में आशंका इस बात की थी कि जिस बैंक खाते में टारगेट बनाए गए व्यक्ति से पैसे जमा कराएंगे, उस बैंक खाते की मार्फत पुलिस उन तक पहुंच जाएगी. पंकज की इस शंका पर रोहित हंसते हुए बोला, ‘‘अरे भाई, हम ऐसी बेवकूफी वाला काम नहीं करेंगे, जैसा दूसरे लोग करते हैं. हम बैंक खाता अपने नाम पर खुलवाएंगे ही नहीं तो पुलिस हमारे पास तक कैसे पहुंचेगी.’’

‘‘फिर बिना एकाउंट के पैसे कैसे आएंगे?’’ पंकज ने पूछा.

‘‘खाता किसी दूसरे के नाम पर होगा, उस में से पैसे हम निकालेंगे.’’ रोहित ने कहा.

‘‘वह कैसे, क्या फरजी आईडी पर एकाउंट खुलवाना है?’’ पंकज ने सवाल किया.

‘‘इस की चिंता तुम मत करो. तुम बस काम करने का मूड बनाओ. आगे के रास्ते खुदबखुद बनते चले जाएंगे.’’ रोहित बोला.

आसान और सुरक्षित तरीके से पैसा कमाने का रास्ता दिखते ही पंकज ने हां कर दी. इस के बाद इन लोगों ने पावर इफैक्ट सर्विस नाम की एक फर्म बनाई, जिस का औफिस स्कूल ब्लौक शकरपुर में खोला. यह औफिस इन्होंने 6 हजार रुपए प्रति महीने के किराए पर लिया था. रिसैप्शनिस्ट के पद पर इन्होंने मनोज रावत नाम के एक लड़के को नौकरी पर रखा. मनोज से इन लोगों ने उस के आईडी प्रूफ वगैरह जमा करा लिए.

उन्हीं कागजातों के आधार पर इन्होंने शकरपुर की यस बैंक और लक्ष्मीनगर की एक्सिस बैंक में खाते खुलवाने को मनोज से कहा, पर मनोज ने खाते खोलने के लिए मना कर दिया. मनोज को मामला संदिग्ध लगा तो वह 4-5 दिन बाद ही नौकरी छोड़ कर चला गया.

इस के बाद इन लोगों ने औफिस के लिए किसी ईमानदार लड़के की तलाश शुरू कर दी. पंकज ने इस बारे में अपने दोस्त सौरभ शुक्ला से बात की. सौरभ ने उत्तरी दिल्ली के रहने वाले अंकुर तोमर के बारे में बताया. सौरभ अंकुर को व्यक्तिगत रूप से जानता था. वह मेहनती और ईमानदार था. अगले दिन सौरभ ने अंकुर की मुलाकात पंकज और रोहित से करा दी. रोहित को अंकुर सही लगा तो उस ने 10 हजार रुपए प्रति महीने के वेतन पर उसे अपने औफिस में बतौर रिसैप्शनिस्ट रख लिया.

उन्होंने पंकज का आईडी प्रूफ और अन्य कागजात अपने पास रख लिए. अंकुर को उन्होंने टूर और ट्रैवल्स का औफिस बताया था. अंकुर को विश्वास में ले कर उन्होंने उस के नाम से यस बैंक शकरपुर और एक्सिस बैंक लक्ष्मीनगर में एकाउंट भी खुलवा लिए.

औफिस तो शुरू हो गया पर लोगों से मीठीमीठी बातें कर के उन्हें झांसे में लेने के लिए उन्हें ऐसे युवकों की तलाश थी, जो लोगों की जेब से पैसे निकलवा सकें. ऐसे में पंकज के दिमाग में सोनू गिरि और देवेंद्र कुमार उर्फ विशाल त्यागी का नाम आया.

24 साल का सोनू गिरि उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले का निवासी था. वह नोएडा के कई कालसेंटरों में काम कर चुका था. लोगों से फोन पर बात कर के उन्हें फंसाने में वह माहिर था. देवेंद्र भी गाजियाबाद का था. वह दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्राचार से बीए कर रहा था. वह फंड वैल्यू सोल्यूशन, सैंट्रल यूनियन फंड नाम की कंपनियों के कालसेंटर में काम कर चुका था. पंकज के कहने पर ये दोनों अपनी शर्तों पर काम करने के लिए तैयार हो गए.

इसी तरह रोहित मिश्रा ने दूसरे कालसेंटरों में काम कर चुके 25 वर्षीय मनीष ठाकुर और ग्रेटर नोएडा के विशाल वर्मा को शामिल कर लिया. इस तरह इन की एक पूरी टीम तैयार हो गई. ठगी गई रकम का बंटवारा कैसे होगा, इस बात का फैसला उन्होंने पहले ही कर रखा था.

तय हुआ ठगी की जितनी भी रकम आएगी, उन में से औफिस का किराया खर्चा निकाल कर सब से पहले 10 हजार रुपए अंकुर की सैलरी और 42 हजार रुपए पंकज नायक को सैलरी के रूप में दिए जाएंगे. शेष बची रकम का 70 प्रतिशत सोनू गिरि और देवेंद्र कुमार को देने का फैसला हुआ. इस 70 प्रतिशत को दोनों के आपस में बराबरबराबर बांटने की बात तय हुई. क्योंकि कालिंग का काम सोनू और देवेंद्र को ही सौंपा गया था.

शेष बची 30 प्रतिशत रकम में से 11 प्रतिशत रोहित मिश्रा 10 प्रतिशत विशाल वर्मा और 9 प्रतिशत मनीष ठाकुर को देने की बात तय की गई थी.

पूरी योजना बनाने के बाद इन्होंने काम करना शुरू कर दिया. पंकज और रोहित ऐसे लोगों के डाटा जुटाने लगे, जिन्होंने किसी भी लाइफ इंश्योरेंस कंपनी की पौलिसी ले रखी हो. उन में से वह ऐसे लोगों का चयन करते जो सरकारी नौकरी से रिटायर हों. इस के पीछे इन की सोच यह थी कि सरकारी नौकरी से रिटायर होने वाले व्यक्ति को रिटायरमेंट के बाद अच्छाखासा फंड मिलता है. उस फंड को वह ऐसी जगह निवेश करना चाहता है, जहां से अच्छा रिटर्न मिले.

डाटा जुटाने के बाद मनीष ठाकुर और विशाल वर्मा टारगेट किए गए व्यक्ति के बारे में और भी कई तरह की जानकारियां जुटाते थे. मसलन वह पुलिस, सीबीआई आदि एजेंसी का तो रिटायर्ड नहीं है. सारे डाटा कलेक्ट कर के सोनू और देवेंद्र कुमार को दे दिए जाते थे. पहले चरण में ये लोग उस व्यक्ति की सर्विस के दौरान कटा पूरा इनकम टैक्स उस के बैंक खाते में वापस कराने की बात करते थे.

सरकारी कर्मचारियों को जो इनकम टैक्स कटता है, वह रिफंडेबल नहीं होता. पूरी सर्विस के दौरान उन के लाखों रुपए टैक्स के रूप में कट चुके होते हैं. इस रकम के वापस मिलने के लालच में वह और भी पैसे खर्च करने को तैयार हो जाते थे.

इस के अगले चरण में सोनू और देवेंद्र उस व्यक्ति को इंश्योरेंस पौलिसी का बीमा धन बढ़ाने और पौलिसी का ज्यादा बोनस दिलाने की बात करते थे. लालच में फंस कर कभीकभी लोग ऐसे रास्ते पर कदम बढ़ा देते हैं, जिस का उसे बाद में बड़ा पछतावा होता है. इसी लालच में लोगों को फंसा कर वह एक्सिस बैंक और यस बैंक के खातों में लोगों से लाखों रुपए की रकम जमा करा लेते थे.

इस के बाद इन्होंने डेविस क्लब और ड्रीमलैंड डेवलपर के नाम पर भी लोगों से लाखों रुपए इकट्ठे किए. ठगी का कारोबार तो चल निकला, लेकिन कुछ दिनों बाद ही पैसों को ले कर पंकज का रोहित से विवाद हो गया. अपनी 42 हजार रुपए सैलरी ले कर वह औफिस छोड़ गया और नोएडा की किसी कंपनी में जौब करने लगा. उस के जाने के बाद ये सभी लोग अपने काम को अंजाम दे कर ठगी करते रहे.

इसी कड़ी में इन लोगों ने उत्तरपश्चिमी दिल्ली के पीतमपुरा के प्रवीण अग्रवाल को अपने जाल में फांस लिया. वह केंद्रीय लोकनिर्माण विभाग में इंजीनियर के पद से रिटायर हुए थे. इस बात की जानकारी उन लोगों ने पहले ही हासिल कर ली थी.

प्रवीण अग्रवाल के टच में सोनू और देवेंद्र ही नहीं थे, बल्कि इन के अन्य साथी भी अलगअलग कंपनियों के नाम पर उन से बात करते थे. प्रवीण अग्रवाल को इन लोगों ने अपने असली नाम नहीं बताए थे, बल्कि इन से कोई सक्सेना, कोई भार्गव, कोई सोनकर आप्टे, कोई एस.आर. शर्मा, कोई चौहान तो कोई झा बता कर बात करता था. ये सभी अलगअलग फोन नंबरों से बात करते.

निवेश किए पैसे पर ज्यादा ब्याज और ज्यादा बोनस मिलने के लालच में प्रवीण कुमार ने करीब 81 लाख रुपए जमा करा दिए. पर जब मई, 2016 से उन लोगों के फोन नंबर बंद हो गए तो प्रवीण अग्रवाल के होश उड़ गए. तब उन्हें महसूस हुआ कि वह ठगे जा चुके हैं. कुछ दिनों तक तो वह यही सोचते रहे कि इस मामले में वह क्या करें. फिर सितंबर, 2016 के दूसरे हफ्ते में वह तत्कालीन डीसीपी विजय सिंह के पास पहुंचे और अपने साथ घटी ठगी की वारदात के बारे में बताया.

पुलिस ने पंकज नायक, देवेंद्र कुमार, रोहित मिश्रा, मनीष ठाकुर और विशाल वर्मा से पूछताछ के बाद 23 सितंबर, 2016 को रोहित कुमार मिश्रा को नोएडा सेक्टर-2 से और सोनू गिरि को 25 सितंबर 2016 को मोदीनगर, गाजियाबाद से गिरफ्तार कर पूछताछ की.

इन सब की निशानदेही पर पुलिस ने 5 मोबाइल फोन, एक लैपटौप, एक पेनड्राइव और 40 हजार रुपए नकद बरामद किए. पुलिस ने सभी अभियुक्तों से पूछताछ के बाद उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. मामले की जांच एसआई राममनोहर मिश्रा कर रहे हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. प्रवीण कुमार परिवर्तित नाम है.

वर्जिनिटी : भ्रम न पालें

किसी भी युवती के लिए पहले सैक्स के दौरान उस की वर्जिनिटी सब से ज्यादा माने रखती है. युवती की योनि के ऊपरी हिस्से में पतली झिल्ली होती है जो उस के वर्जिन होने का प्रमाण देती है, लेकिन किसी भी युवती की योनि और उस के ऊपरी सिरे में स्थित हाइमन झिल्ली को देख कर यह पता लगाना कि वह वर्जिन है कि नहीं न तो संभव है न ही ठीक. सैक्स के दौरान अकसर पार्टनर द्वारा युवती की योनि से रक्तस्राव की उम्मीद की जाती है लेकिन ज्यादातर मामलों में पाया गया है कि पहली बार सैक्स के दौरान युवती के वर्जिन होने के बावजूद उस की योनि से रक्तस्राव नहीं होता, फिर भी साथी  द्वारा यह मान लिया जाता है कि युवती पहले भी सैक्स कर चुकी है, जबकि पहली बार सैक्स के दौरान युवती की योनि से स्राव होने या न होने को उस के वर्जिन होने का सुबूत नहीं माना जा सकता, क्योंकि पहली बार में बहुत सी युवतियों को इसलिए रक्तस्राव नहीं होता, क्योंकि खेलकूद, साइकिल चलाना आदि की वजह से उन की योनि में स्थित झिल्ली कब फट जाती है उन्हें स्वयं नहीं पता चलता. इस का कारण हाइमन झिल्ली का बहुत पतला व लचीला होना है. कभीकभी युवती में जन्म के समय से ही यह झिल्ली मौजूद नहीं होती. ऐसे में पहले सैक्स के दौरान योनि से रक्तस्राव न होने के आधार पर युवती के चरित्र पर संदेह करना गलत होता है.

पहली बार सैक्स के दौरान युवक अपने साथी से उस के कुंआरी होने का सुबूत भी मांगते हैं, जबकि वह खुद के कुंआरे होने का सुबूत देना उचित नहीं समझते. इस वजह से पहला सैक्स जिसे हम वर्जिनिटी का नाम देते हैं, आगे चल कर सैक्स संबंधों में बाधा बन जाता है. युवती की वर्जिनिटी पर शक की वजह से कई तरह की गलतफहमियां जन्म लेती हैं. इस का प्रमुख कारण कुंआरेपन को ले कर लोगों से सुनीसुनाई बातें हैं.

किसी भी युवक या युवती के लिए पहली बार किए जाने वाले सैक्स का जो रोमांच होता है, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह एक ऐसी स्टेज है जहां युवकयुवती एकदूसरे के सामने अपने सारे कपड़े उतारने और सैक्स को ले कर होने वाली झिझक को दूर करने की शुरुआत करते हैं. यहीं से युवकयुवती के कुंआरेपन की समाप्ति होती है और यही वह स्टेज है जहां दोनों अपनी वर्जिनिटी खोते हैं.

युवती को अपने कुंआरेपन का सुबूत देने के लिए कई तरह की परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है जोकि सरासर गलत है. अगर युवती पुरुष से कुंआरे होने का सुबूत नहीं मांगती तो उसे भी चाहिए कि अपने साथी पर विश्वास करते हुए उस के कुंआरेपन पर सवाल खड़ा न करे. अकसर युवती के कुंआरेपन को ले कर घरेलू ंिहंसा व तलाक जैसी नौबत भी आ जाती है. अपने चरित्र का प्रमाण देने के लिए युवती को तमाम तरह के सुबूत पेश करने के लिए कहा जाता है.

सैक्स के दौरान वर्जिनिटी को ले कर आने वाले खून की कुछ बूंदों के प्रति पुरुषवर्ग इतना गंभीर होता है कि वह वर्षों से चले आ रहे इस दकियानूसी खयाल से बाहर आने की सोच भी नहीं सकता, जबकि अपने कुंआरेपन को गृहस्थी के बीच का मुद्दा बनाना गलत है. इसलिए युवकयुवतियों को चाहिए कि वे पहले सैक्स को यादगार बनाएं न कि वर्जिनिटी के चक्कर में पड़ कर संबंधों में दरार पैदा करें.

प्यार और भरोसे से करें शुरुआत

नीरज की अरेंज्ड मैरिज थी, अत: वह अपनी होने वाली पत्नी से कभी मिला नहीं था. ऐसे में नीरज के दोस्त शादी की पहली रात को ले कर नीरज को तमाम तरह की सलाह देने में लगे हुए थे. उस के एक दोस्त ने कहा कि वह अपनी पत्नी के साथ पहली रात के सैक्स यानी सुहागरात में पत्नी के वर्जिन होने का पता लगाने के लिए योनि से रक्तस्राव होने पर जरूर ध्यान दे. अगर रक्तस्राव हुआ तो समझ ले कि पत्नी ने किसी के साथ सैक्स नहीं किया है, अगर नहीं हुआ तो वह पहले सैक्स कर चुकी है.

लेकिन नीरज ने दोस्त की इस बात पर ध्यान न दिया, क्योंकि वह जानता था कि पहले सैक्स में रक्तस्राव होना जरूरी नहीं. इस से यह पता चलता है कि वर्जिन होने के लिए सुबूत देने की जरूरत नहीं होती बल्कि पहली बार किए जाने वाले सैक्स की शुरुआत प्यार और भरोसे के साथ की जाए तो यह न केवल ज्यादा मजा देने वाला होता है, बल्कि इस से रिश्ता और भी गहरा व विश्वसनीय बन जाता है.

बातचीत है जरूरी

सैक्स व मनोरोग विशेषज्ञ डा. मलिक मोहम्मद अकमलुद्दीन का कहना है कि कौमार्य खोने के पहले एकदूसरे के बारे में अच्छी तरह से जान लें, क्योंकि सैक्स आनंद के लिए किया जाता है न कि भूख मिटाने के लिए. इसलिए सैक्स को मजेदार बनाने की कोशिश करें, आपस में कामुक बातचीत की शुरुआत हो और धीरेधीरे यह बातचीत शर्म से ऊपर उठ कर सैक्स संबंध के रूप में आगे बढे़. इस तरह सैक्स का मजा दोगुना हो जाता है और पतिपत्नी के बीच शर्म का परदा भी उठ जाता है.

पहले सैक्स को ज्यादा मजेदार व यादगार बनाने के लिए वर्जिनिटी जैसे दकियानूसी खयाल से ऊपर उठ कर शारीरिक व मानसिक संतुष्टि को ज्यादा महत्त्व देना चाहिए. इस के अलावा किसी तरह की अजीबोगरीब उम्मीदें नहीं पालनी चाहिए जिन से जीवन साथी को किसी तरह की ठेस पहुंचे.                      

कैसी प्रेमिका की चाहत

एक सर्वे के अनुसार 51त्न युवा प्रेमियों को प्रेमिका की ब्यूटी, 36त्न को ब्रेन और 15त्न को प्रेमिका की ब्यूटी विद ब्रेन दोनों का कौंबिनेशन प्रभावित करता है.

प्रेमी प्रेमिका की तरह अपनी पसंद और नापसंद के आधार पर प्रेमिका को चुनते हैं.

आइए जानें वे क्या पसंद करते हैं अपनी प्रेमिका में :

–       युवा प्रेमी को साफसफाई का खयाल रखने वाली प्रेमिका अधिक पसंद आती है.

–       युवा प्रेमी को प्रेमिका की बौडी लैंग्वेज, बाल, आंखें, मुसकराहट भी अपनी ओर आकर्षित करती है.

–       युवा प्रेमी बहुत होनहार प्रेमिका की चाहत नहीं रखते बल्कि उन्हें हर सामान्य कार्य में रुचि रखने वाली प्रेमिका ज्यादा पसंद आती है.

–       51% युवाओं का मानना है कि उन्हें प्रेमिका की खूबसूरती के अलावा उस का केयरिंग नेचर बहुत प्रभावित करता है.

–       आत्मविश्वासी प्रेमिका युवा प्रेमी को ज्यादा पसंद आती है.

–       अकसर युवक ऐसी प्रेमिका को पसंद करते हैं जो अपना अधिकांश समय उन्हें ही दे.

–       बातबात पर इमोशनल होने वाली पे्रमिका से वे दूरी बनाने में ही भलाई समझते हैं.

–       युवा प्रेमी अकसर ऐसी प्रेमिका चाहते हैं, जो सैक्सी और कौपरेट करती हो.                    

          

– रुचि सिंह

फेसबुक फ्रैंड की घर में घुस कर हत्या

रोज की तरह 27 सितंबर, 2016 की सुबह भी किरण रावत उठ कर अपने कामकाज में लग गई थीं. कोई 6 बजे उन के मोबाइल फोन की घंटी बजी तो उन्हें हैरानी हुई कि इतने सवेरे किस ने फोन कर दिया. लेकिन जब स्क्रीन पर नंबर देखा तो वह चौंकी भी और परेशान भी हुईं कि कैसा कम्बख्त और बेशर्म लड़का है, जो हाथ धो कर पीछे पड़ गया है. फोन रिसीव न करना और काट देना उन्हें ठीक नहीं लगा, क्योंकि वह जानती थीं कि लड़का दोबारा ही नहीं, न उठाने तक फोन करता रहेगा. लिहाजा मन मार कर उन्होंने फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘आंटी, मैं अमित बोल रहा हूं और अभीअभी गूजरखेड़ा से आया हूं. प्लीज एक बार आप मुझे प्रिया से 5 मिनट बातें कर लेने दें, उस के बाद मैं कभी उसे या आप को फोन नहीं करूंगा.’’ किरण पसोपेश में पड़ गईं कि क्या करें? अमित के फोन सुन कर वह खुद भी तंग आ चुकी थीं. हर बार घिसे हुए रिकार्ड की तरह गिड़गिड़ा कर वह एक ही बात की रट लगाए रहता था. अमित के बारे में वह उतना ही जानती थीं, जितना उन की बेटी प्रिया ने उन्हें बताया था.

17 साल की प्रिया होनहार छात्रा थी. इन दिनों वह आईआईटी की तैयारी कर रही थी. उस ने अमित के बारे में मां से कुछ भी नहीं छिपाया था. वह उस का फेसबुक फ्रैंड जरूर था, लेकिन फ्रौड था. उस ने प्रियांशी के नाम से अपना फेसबुक एकाउंट बना कर उसे फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजी थी. उस ने अमित को प्रियांशी नाम की लड़की समझ कर उस की फ्रैंड रिक्वैस्ट ऐक्सैप्ट कर ली थी. प्रिया अमित को लड़की समझ कर उस से कुछ महीनों तक चैटिंग भी करती रही. उसी बीच उस ने खुद का और मां का मोबाइल नंबर उसे दे दिया था. लेकिन जब उसे प्रियांशी यानी अमित की हकीकत पता चली तो उस ने उसे ब्लौक कर दिया. ब्लौक किए जाने के बाद अमित उसे मोबाइल पर फोन ही नहीं करने लगा, बल्कि प्यार का इजहार भी कर दिया.

प्रिया के लिए यह परेशानी वाली बात थी. वह इस बात पर खार खाए बैठी थी कि पहले तो अमित ने फेक एकाउंट के माध्यम से उस से दोस्ती गांठी और जब वास्तविकता सामने आई तो फोन पर प्यार का इजहार करने लगा. अमित के इस दुस्साहस से नाराज प्रिया ने उसे जम कर लताड़ा और आइंदा कभी फोन न करने की हिदायत दी. अमित नहीं माना और फोन न उठाने पर मैसेज करने लगा. इस से प्रिया को लगा कि यह सिरफिरा मानने वाला नहीं है, इसलिए उस ने उस पर ध्यान देना बंद कर दिया और पढ़ाई में मन लगाने लगी. जब प्रिया अनदेखी करने लगी तो अमित उस की मां किरण को फोन करने लगा.

उन से उस ने अपनी मनोस्थिति बताई कि जब से प्रिया ने उस से फोन पर बात करना बंद कर दिया है, तब से वह काफी तनाव में रहता है. उस तनाव में उस का सिर फटने लगता है. अगर वह एक बार आमनेसामने बैठा कर प्रिया से बात करा दें तो शायद उस की परेशानी दूर हो जाए. शुरूशुरू में तो सख्ती दिखाते हुए किरण ने बात कराने से मना कर दिया था, पर जब अमित के फोन बारबार आने लगे तो उन्हें लगा कि यह लड़का एकतरफा प्यार और गलतफहमी का शिकार हो गया है. ऐसे में अगर उस की इच्छा या जिद पूरी नहीं की गई तो वह इसी तरह प्रिया को ही नहीं, उन्हें भी परेशान करता रहेगा. 27 सितंबर, 2016 की सुबह जब अमित का फोन आया तो किरण ने सोचा कि आखिर इस अमित नाम की गले पड़ी मुसीबत से एक बार बात करने में हर्ज ही क्या है? लिहाजा उन्होंने उसे घर आने की इजाजत इस शर्त के साथ दे दी कि उसे जो भी बात करनी है, वह खिड़की से होगी. अमित इस पर भी तैयार हो गया और ठीक साढ़े 10 बजे उन के घर पहुंच गया.

किरण पेशे से ब्यूटीशियन हैं और उन के पति श्यामबिहारी एक कोचिंग इंस्टीट्यूट में काम करते हैं. प्रिया इन दोनों की एकलौती बेटी थी. वह काफी होशियार और समझदार थी. उस का पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई और कैरियर पर रहता था. इंजीनियर बनने की अपनी तमन्ना पूरी करने के लिए वह एलेन कोचिंग इंस्टीट्यूट से कोचिंग भी ले रही थी. गीतानगर इंदौर का रिहायशी इलाका है. इस के कृष्णानगर अपार्टमेंट के थर्ड फ्लोर पर 3 सदस्यों वाला यह रावत परिवार सुकून से रह रहा था. हंसमुख और सुंदर प्रिया का ज्यादातर समय पढ़ाई में बीतता था. दिन में कुछ वक्त वह सोशल मीडिया, उस में भी फेसबुक पर बिता लेती थी.

फेसबुक इस्तेमाल करते समय क्याक्या सावधानियां रखी जानी चाहिए, उन्हें वह जानती थी. इसलिए अंजान लोगों और लड़कों से वह दोस्ती नहीं करती थी. पर वह अमित को प्रियांशी समझने की भूल कर बैठी, जिसे समय रहते उस ने अपने हिसाब से सुधार भी लिया था. लेकिन अमित से चैटिंग के दौरान प्रिया ने कुछ अंतरंग बातें कर ली थीं, जो स्वाभाविक भी थीं, क्योंकि वह तो उसे प्रियांशी नाम की लड़की और सहेली समझ रही थी. साढ़े 10 बजे कालबैल बजी तो किरण को समझते देर नहीं लगी कि अमित आ गया है. उन्होंने दरवाजा खोला और उसे देख कर रूखी आवाज में कहा, ‘‘जो भी बात करनी है, बाहर से और जल्दी करो.’’ पेशे से सौफ्टवेयर इंजीनियर 24 साल के अमित को इतना तो पता था कि जिस विनम्रता से वह अपनी प्रेमिका के घर के दरवाजे तक आ पहुंचा है, उसी का सहारा ले कर वह अंदर भी जा सकता है और ऐसा हुआ भी. उस ने गिड़गिड़ाते हुए गुजारिश की कि ज्यादा नहीं, वह सिर्फ 5 मिनट लेगा, इसलिए उसे अंदर आ कर इत्मीनान से बात कर लेने दें तो ज्यादा अच्छा रहेगा.

 किरण चूंकि अपने घर में थीं, इसलिए उन्हें किसी तरह का खतरा अमित से महसूस नहीं हुआ. क्योंकि वह देखने में ठीकठाक यानी शरीफ लग रहा था. उन का सोचना था कि एक बार यह प्रिया से बात कर लेगा तो इस की गलतफहमी या जिज्ञासा, जो भी है, खत्म हो जाएगी, इस के बाद हमेशा के लिए उस का इस बला से पिंड छूट जाएगा. यही सोच कर उन्होंने अमित को अंदर आने दिया. तब उन्हें कतई इस बात का अहसास नहीं था कि इस मासूम से चेहरे के पीछे हैवानियत और वहशीपन छिपा है. वह उन का घर उजाड़ने की मंशा से आया है. उस की मंशा कुछ और है. अंदर आ कर खुद को बेचैन दिखाते हुए अमित ने बाथरूम जाने की बात कही तो भी किरण को उस के खतरनाक मंसूबे का पता नहीं चला कि उन्होंने महज शिष्टाचार निभाते हुए कितनी बड़ी आफत मोल ले ली. इजाजत पा कर अमित बाथरूम की तरफ लगभग भागा तो वह ड्राइंगरूम में उस के वापस आने का इंतजार करने लगीं कि वह आए और अपनी बात कह कर जाए.

फ्लैट के भूगोल से अंजान अमित जाने कैसे प्रिया के कमरे तक पहुंच गया. उस समय वह स्कूल जाने के लिए अपना बैग तैयार कर रही थी. वह दबे पांव प्रिया के पीछे पहुंचा और साथ लाया चाकू निकाल कर उस के ऊपर हमला कर दिया. अचानक हुए हमले से प्रिया चीखी तो उस की चीख सुन कर किसी अनहोनी की आशंका से घबराईं किरण उस के कमरे की तरफ भागीं. अंदर अमित प्रिया पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर रहा था. उस हालत में यह सोचने का समय नहीं था कि क्या किया जाए, इसलिए बगैर समय गंवाए किरण ने बेटी को बचाने की कोशिश की तो अमित ने उन पर भी हमला कर दिया. मां के आने पर मौका मिला तो प्रिया खुद को बचाने के लिए बाथरूम में घुस गई और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया.

किरण और प्रिया की चीखें सुन कर अपार्टमेंट के लोग उन के फ्लैट की तरफ भागे तो उन्होंने देखा कि एक लड़का हाथ में चाकू लिए भाग रहा है. अमित अभी सैकेंड फ्लोर तक ही आ पाया था कि उसे नीचे से भी लोग आते दिखे. उसे लगा कि लोगों ने उसे देख लिया है. अगर वह भीड़ के हत्थे चढ़ गया तो खासी धुनाई होगी. लिहाजा बचने की गरज से उस ने दूसरी मंजिल से छलांग लगा दी. पड़ोसी जब किरण के फ्लैट पर पहुंचे तो जल्द ही वहां की स्थिति उन की समझ में आ गई. किरण के इशारे पर वे बाथरूम की तरफ भागे और दरवाजा तोड़ा तो प्रिया मरणासन्न हालत में पड़ी थी. उस के शरीर का काफी खून बह गया था. लोग उसे कार में डाल कर अस्पताल के लिए भागे. इसी बीच किसी ने फोन से इस घटना की खबर पुलिस को कर दी थी. इंदौर के सुयश अस्पताल में प्रिया का इलाज शुरू हुआ. लेकिन इलाज के दौरान ही उस ने दम तोड़ दिया. अमित ने उस की पीठ, पेट, आंख, कान, गले और सीने पर लगभग दर्जन भर वार किए थे. श्यामबिहारी को जब एकलौती बेटी की हत्या की सूचना मिली तो वह बेहोश हो गए.

अमित दूसरी मंजिल से कूदा तो फिर उठ नहीं सका. उस के हाथपैर में फ्रैक्चर हो गया. उसे गिरफ्तार कर के एम.वाय. अस्पताल में इलाज के लिए भरती कराया गया. वह पूरे होश में था. उस के चेहरे पर डर या पछतावा जैसी कोई चीज नहीं थी. लगता था, वह यही करना चाहता था. प्रिया की हत्या ही उस का मकसद था. गूजरखेड़ा गांव के रहने वाले अमित की फ्रैंडसर्किल कोई बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन सोशल मीडिया की उस की दुनिया काफी बड़ी थी. वह दिनरात स्मार्टफोन से चिपके हुए चैटिंग करता रहता था. लड़कियों से दोस्ती करने की गरज से उस ने प्रियांशी के नाम से एकाउंट बना कर तमाम लड़कियों से दोस्ती कर ली थी. प्रिया से दोस्ती की जगह प्यार हो गया तो उस ने उस से दिल की बात कह डाली. लेकिन प्रिया ने उस धोखेबाज को झिड़क दिया तो एकतरफा प्यार की गिरफ्त में आए इस सिरफिरे ने उसे दुनिया से ही विदा कर दिया.

पूछताछ में अपने बचाव के मकसद से अमित गोलमोल जवाब देता रहा. वह अपने पिता सुनील यादव से झूठ बोल कर निकला था कि इंटरव्यू देने जा रहा है. वह पुलिस से यह कह कर उसे भ्रमित करने की कोशिश कर रहा था कि जब वह प्रिया के कमरे में पहुंचा तो वह उस पर ज्यादती का आरोप लगाने लगी. जबकि फोरैंसिक रिपोर्ट से यह साफ हो गया है कि प्रिया ने खुद पर कोई वार नहीं किया था. अमित का कहना था कि प्रिया ने उस का चाकू छीन कर खुद पर वार किए थे. एक दूसरा बयान उस ने यह भी दिया था कि उसे आशंका थी कि प्रिया के घर जाने पर उस के साथ कोई भी अनहोनी हो सकती है, इसलिए उस ने ही खुद पुलिस को 100 नंबर पर फोन कर के बुलाया था.

किरण पर हमले की बात से मुकरते हुए उस ने कहा कि भागते हुए जब वह बीच में आ गईं तो हाथ में पकड़े चाकू से उन्हें जख्म हो गया. जबकि हकीकत यह थी कि अमित प्रिया से एकतरफा प्यार करने लगा था और उस के मना करने पर जलभुन गया था. फेसबुक की दोस्ती पर ऐसे अपराध अब आम हो चले हैं, जिन का शिकार प्रिया जैसी लड़कियां हो रही हैं. ऐसे में उन्हें और संभल कर रहने की जरूरत है. प्रिया उस का पहला प्यार था और उस के ठुकरा देने से वह उस से नफरत करने लगा था, जिस की वजह से उस ने एक हंसताखेलता घर उजाड़ दिया.  

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