रोज की तरह 27 सितंबर, 2016 की सुबह भी किरण रावत उठ कर अपने कामकाज में लग गई थीं. कोई 6 बजे उन के मोबाइल फोन की घंटी बजी तो उन्हें हैरानी हुई कि इतने सवेरे किस ने फोन कर दिया. लेकिन जब स्क्रीन पर नंबर देखा तो वह चौंकी भी और परेशान भी हुईं कि कैसा कम्बख्त और बेशर्म लड़का है, जो हाथ धो कर पीछे पड़ गया है. फोन रिसीव न करना और काट देना उन्हें ठीक नहीं लगा, क्योंकि वह जानती थीं कि लड़का दोबारा ही नहीं, न उठाने तक फोन करता रहेगा. लिहाजा मन मार कर उन्होंने फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘आंटी, मैं अमित बोल रहा हूं और अभीअभी गूजरखेड़ा से आया हूं. प्लीज एक बार आप मुझे प्रिया से 5 मिनट बातें कर लेने दें, उस के बाद मैं कभी उसे या आप को फोन नहीं करूंगा.’’ किरण पसोपेश में पड़ गईं कि क्या करें? अमित के फोन सुन कर वह खुद भी तंग आ चुकी थीं. हर बार घिसे हुए रिकार्ड की तरह गिड़गिड़ा कर वह एक ही बात की रट लगाए रहता था. अमित के बारे में वह उतना ही जानती थीं, जितना उन की बेटी प्रिया ने उन्हें बताया था.

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