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रोबोट बना पत्रकार, लिखा 1 सेकेंड में 300 शब्द

चीन के एक अखबार के लिए रोबोट पत्रकार ने एक सेकेंड में 300 शब्दों का आर्टिकल लिखा है. वसंत उत्सव में होने वाली भीड़ पर ‘शिआओ नान’ ने सिर्फ 1 सेकेंड में 300 शब्दों का आर्टिकल लिख दिया.

वैज्ञानिकों का कहना है कि ‘शिआओ नान’ छोटे और बड़े दोनों तरह के रिपोर्ट लिखने में सक्ष्म है. इस रोबोर्ट को बनाने वाले टीम के प्रोफेशर वॉन शिआओजून के अनुसार ‘अखबार के ऑफिस में कार्यरत रिपोर्टरों की तुलना में यह रोबोर्ट तेजी से डेटा ऐनालिसस कर लेता है और आर्टिकल भी जल्दी लिख लेता है. पर इसका मतलब यह नहीं कि रोबोट पत्रकारों की जगह ले लेंगे.’

‘शिआओ नान’ साक्षात्कार लेने में, फॉलो अप प्रश्नों के उत्तर देने में और किसी बातचीत या साक्षात्कार से खबर निकालने में समर्थ नहीं है. पर शिआओजून का मानना है कि रोबोट भी अब संपादकों और रिपोर्टों के सहायक की तरह काम कर सकेंगे.

यह पहली बार नहीं है जब किसी रोबोट ने अखबार के लिए आर्टिकल लिखा हो. अमरीकी अखबार 'दि लॉस ऐंजलिस टाइम्स' रोबोट द्वारा लिखी खबर प्रकाशित करने वाला पहला अखबार है. 2014 में एक रोबोट ने 'दि लॉस ऐंजलिस टाइम्स' के लिए भूंकप के बारे में खबर लिखी थी.

 

जब गेंद बाउंड्री पार भेजे बिना लग गया छक्का

क्रिकेट इतिहास में एक बल्लेबाज को 6 रन हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करती पड़ती है. लेकिन अगर बल्लेबाज गेंद को बिना सीमा रेखा के पार पहुंचाए ही एक गेंद में 6 रन हासिल करे, तो क्या ऐसा मुमकिन है? जी हां बिलकुल, एक बल्लेबाज गेंद को बिना बाउंड्री पार भेजे भी एक गेंद में 6 रन हासिल कर सकता है.

ऐसा ही कुछ नजारा 2002 में श्रीलंका में आयोजित हुई आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी में पाकिस्तान और श्रीलंका के बीच एक मैच में देखने को मिला. जब पाकिस्तानी टीम की ओर से उसके विकेटकीपर बल्लेबाज राशिद लतीफ 26वां ओवर खेल रहे थे और श्रीलंका की तरफ से स्पिनर उपुल चंदना गेंदबाजी कर रहे थे उस वक्त एक अजीबोगरीब नजारा देखने को मिला था. जैसे ही उपुल चंदना ने गेंद को लेग साइड की दिशा में डाला तब लतीफ ने स्वीप किया और गेंद विकेटकीपर संगकारा के पीछे रखे हैलमेट पर जा लगी. तब अम्पायर स्टीव बकनर ने पेनल्टी के रूप में 5 रनों का इशारा कर दिया.

वह पांच रन बल्लेबाजी करने वाली टीम पाकिस्तान के खाते में जुड़े, चूंकि दोनों बल्लेबाज गेंद हेलमेट पर लगने से पहले ही एक रन के लिए दौड़ पड़े थे इसलिए बल्लेबाज के खाते में एक रन और पेनाल्टी के पांच अतिरिक्त रन पाकिस्तान के खाते में जुड़े. इस तरह यह 6 रन क्रिकेट इतिहास का सबसे छोटा छक्का बन गया.

आपको बता दें की अगर गेंद के हेलमेट पर लगने से पहले बल्लेबाज़ दौड़कर एक रन पूरा कर लेते हैं तो बल्लेबाज के खाते में 1+5 रन जोड़े जाते हैं.

नोटबंदी का काला अध्याय

रेखा गणित से संबंधित एक कहावत है कि किसी बड़ी रेखा को बिना छेड़े छोटी करना हो तो उस के समानांतर उस से बड़ी रेखा खींच दो. ऐसा करने से पहली रेखा खुदबखुद छोटी दिखने लगेगी. 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी के ऐलान के बाद मोदी सरकार भी यही करती दिखी. बैंकों और एटीएम के सामने लगी लंबीलंबी लाइनों को कम करने के लिए सरकार ने नित नए हथकंडे अपनाए. कभी कुछ तो कभी कुछ. कभी रकम थोड़ी ज्यादा तो कभी कम. लेकिन इस का कोई नतीजा नहीं निकला. एटीएम और बैंकों के सामने कतारें और लंबी होती गईं. अपना ही पैसा पाने के लिए, लोग कईकई घंटों तक बैंकों और एटीएम के सामने भिखारी की तरह झोली फैलाए लाइनों में खड़े रहे. कुछ को 2-4 हजार रुपए मिल जाते तो कुछ को बैंकों या एटीएम में रकम खत्म हो जाने की सूचना के साथ खाली हाथ लौटना पड़ता. डेढ़ महीने बाद लाइनें अगर कम हुईं तो इसलिए क्योंकि सरकार के फैसले गिरगिट की तरह रंग बदल रहे थे. यानी बड़ी लाइनों को छोटा करने के लिए उन से बड़ी लाइनें खींची जा रही थीं. बहरहाल, लाइनें तो अब खत्म हो गईं, लेकिन लोगों की परेशानियां अभी खत्म नहीं हुईं. खत्म होने के आसार भी नहीं लगते.

नोटबंदी के पीछे सरकार की मंशा भले ही सही रही हो, जिसे शुरुआती दिनों में ज्यादातर लोगों ने सराहा भी. लेकिन लंबी परेशानियां झेल कर अब अधिकांश लोगों के सिर से इस तथाकथित अच्छाई का भूत उतर चुका है. अब बात डिजि धन पर आ कर ठहर गई है. जो इस मुहिम का शायद अंतिम चरण है. डिजि धन यानी डिजिटल लेनदेन. जाहिर है, डिजिटल लेनदेन की प्रक्रिया 50 प्रतिशत से ज्यादा लोगों के लिए आसान नहीं होगी. जो डिजिटल लेनदेन करेंगे उन के लिए दूसरे तरह के खतरे मुंह बाए खड़े हैं. इन में सब से बड़ा खतरा साइबर अपराधियों का है.

8 नवंबर, 2016 की रात को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब न्यूज चैनल्स पर घोषणा की थी कि आज रात 12 बजे से 500 और 1000 रुपए के नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे, तभी से देश में आर्थिक आपातकाल जैसी स्थिति बन गई थी. चूंकि तब तक 12 बजने में काफी समय था, इसलिए कितने ही लोग हजार और पांच सौ के नोट ले कर बाजार की ओर दौड़े ताकि थोड़ीबहुत खरीदारी कर के बड़े नोटों का खुल्ला करा सकें.

जिन के पास ज्यादा नोट थे, उन्होंने सोने के जेवरात खरीदे. हालात यह रहे कि कितने ही ज्वैलर्स की दुकानें रात 2 बजे तक खुली रहीं, जिस के चलते उस रात करोड़ों का सोना बिका. वह भी मनमाने रेट पर. अनुमान है कि उस रात ज्वैलर्स ने 5000 करोड़ के गहने और गोल्ड बार बेचे.

8 नवंबर को नोटबंदी के बाद देश में कुछ वैसी ही स्थिति बन गई थी, जैसी संजय गांधी के नसबंदी अभियान की घोषणा और इंदिरा गांधी की आपातकाल की घोषणा के बाद बनी थी. नोटबंदी का उद्देश्य था, लोगों के पास पड़े काले धन को बाहर निकालना और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना.

हकीकत यह है कि जितना काला धन बाहर नहीं आया, उस से ज्यादा बैंक वालों ने अंदर ही अंदर काले को सफेद कर दिया. पैसा चूंकि बैंकों में जा रहा था, इसलिए अंदर होने वाले काले कारनामों की उन रसूखदारों के अलावा किसी को खबर नहीं थी, जो अपने काले धन को सफेद करा रहे थे. दूसरी ओर बैंकों के बाहर लाइनों में खड़ा आम आदमी इस सब से अनभिज्ञ अपना नंबर आने के इंतजार में बैंक के गेट को हसरत भरी नजरों से देख रहा था.

नोटबंदी की घोषणा के बाद एक डेढ़ माह तक लोगों ने बैंक और एटीएम के बाहर लाइनों में लग कर जिस त्रासदी को झेला, उसे देख कर लगता था जैसे आम आदमी का कोई वजूद ही नहीं है. उन की स्थिति बिलकुल भेड़बकरियों जैसी होती है, जिन्हें गड़रिया जिधर हांक दे, वे उधर ही चलती जाती है. हकीकत भी यही है, वोट देने के बाद आम आदमी की स्थिति ऐसी ही तो हो जाती है. बागडोर हाथ में आ जाने के बाद सरकार जनता पर कोई भी फैसला थोप सकती है और अगर बहुमत वाला शासक निरकुंश हो तो फिर तो कहना ही क्या. गुजरे दिनों की स्थिति को देख कर तो ऐसा ही लगा.

मोदीजी ने काले धन को बाहर निकालने के लिए देश पर नोटबंदी का जो फैसला थोपा, वह आम जनता के लिए निरंकुश शासक जैसा ही था. हां, उद्योगपतियों, बिजनैसमैनों, रसूखदार लोगों और नेताओं पर इस का कोई असर नहीं पड़ा, जबकि काला धन ऐसे ही लोगों के पास होता है. जिन के पास काला धन था, उन में से ज्यादातर का काला धन बड़े आराम से सफेद हो गया.

शुरुआती दौर में जो लोग नोटबंदी को प्रधानमंत्री का कड़ा कदम और जनता के हित में मान रहे थे, जहांतहां करोड़ों रुपए की नई करेंसी पकड़ी जाती देख उन्होंने खुद को ठगा सा महसूस किया. जाहिर है यह सब बैंक कर्मचारियों की वजह से हुआ था.

नोटबंदी के चक्कर में देश के करोड़ों लोगों ने महीनों तक लंबीलंबी लाइनों में लग कर जो मुसीबत झेली, वह किसी से छुपी नहीं है. लेकिन दूसरी ओर हजारों लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने नोटबंदी से जम कर फायदा उठाया. इस मौके का लाभ उठाने वालों में तमाम बैंक कर्मचारी भी हैं और काले धन के वे कुबेर भी, जिन्होंने बैंक कर्मचारियों से मिल कर अपने काले धन को सफेद कराया.

दरअसल, मोदी सरकार को शायद यह उम्मीद नहीं थी कि बैंकों में भी हेराफेरी हो सकती है. इस मामले में सरकार तब चेती जब जहांतहां लाखों रुपए की नई करेंसी पकड़ी जाने लगी. दुख की बात यह कि इसे रोकने के लिए सरकार ने कदम उठाए भी तो काफी देर से और अपर्याप्त.

इस तरह की हेराफेरी की एक वजह यह भी रही कि कोई भी बैंक छोटे खाता धारकों से नहीं चलता. उसे जरूरत होती है बडे़ खाता धारकों की. ऐसे खाताधारक जिन का ट्रांजेक्शन लाखोंकरोड़ों में होता है. ये लोग अपने किसी कर्मचारी को भेज कर लाखों रुपए बैंकों में जमा भी कराते हैं और निकलवाते भी हैं. बैंक मैनेजर या कर्मचारी उन के एक फोन पर सारा काम कर देते हैं.

जाहिर है, बैंक मैनेजर या कर्मचारी सारे नियमों को ताक पर रख कर पहले उन का काम करते हैं. नए नोटों के मामलों में भी ऐसा ही हुआ. 2-4 हजार रुपयों की चाह रखने वालों को जहां 2 से 5-6 घंटे तक लाइनों में लगना पड़ा, वहीं बड़े खाताधारकों को बैकडोर से लाखों की नई करेंसी बड़े आराम से मिलती रही. पुराने नोट बदलने के मामले में भी ऐसा ही हुआ.

अगर यह कहा जाए कि नई करेंसी की सब से ज्यादा हेराफेरी बैंकों में हुई तो गलत नहीं होगा. क्योंकि लाखोंकरोड़ों की करेंसी बैंक से ही बाहर जा सकती थी. यह रकम उद्योगपतियों, बिजनैसमैनों, रसूखदारों, नेताओं या नंबर-2 का धंधा करने वालों के पास ही गई.

टीवी चैनलों पर नोटबंदी को ले कर रोज डिबेट होती रहीं. सभी बड़ी पार्टियों के प्रवक्ता एकदूसरे की खूब छीछालेदर करते रहे, जनता के स्वयंभू मसीहा बन कर उस की परेशानियों का रोना रोते रहे. लेकिन उन्होंने कभी भी एकदूसरे से ये नहीं पूछा कि तुम्हारे पास नई करेंसी कहां से आई, जो ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे हो. यह सवाल किसी एंकर की लिस्ट में भी नहीं था कि आप में से किसी के परिवार का कोई आदमी लाइन में लगा क्या? मतलब सीधा सा है कि जो खुद को आम आदमी का नुमाइंदा समझते हैं, उन में कोई भी न तो आम आदमी है और न आम आदमी का रहनुमा. ये लोग सारे खेल बैठेबैठे खेलते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की योजना 6 लोगों की टीम के साथ मिल कर बनाई थी. टीम के सभी सदस्य विश्वसनीय थे. इस बात का पूरा ध्यान रखा गया था कि नोटबंदी की घोषणा तक योजना की गोपनीयता पूरी तरह बनी रहे. मोदी के बाद इस टीम के मुखिया थे वित्तीय सेवाएं सचिव हसमुख अढि़या.

58 वर्षीय अढि़या गुजरात में नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में 2003 से 2006 तक प्रमुख सचिव रह चुके हैं. उसी दौरान दोनों के रिश्ते मजबूत हुए. अढि़या ने अपनी निष्ठा और विवेक से नरेंद्र मोदी की नजरों में अपनी खास इमेज बना ली थी. सितंबर 2015 में हसमुख अढि़या का नाम राजस्व सचिव के रूप में सामने आया. हालांकि यह पद वित्तमंत्री अरुण जेटली के अधीन आता है, लेकिन अढि़या सीधे नरेंद्र मोदी के संपर्क में रहते थे.

6 महीने में बनी इस योजना में प्रधानमंत्री निवास के 2 कमरों का इस्तेमाल किया गया. जहां रिसर्च चल रही थी, वहां जब कोई खास बात होती थी तो मोदी और अढि़या गुजराती में बात करते थे, जिसे कोई नहीं समझ पाता था. इस काम में लगाए गए अन्य लोग प्रधानमंत्री के सोशल मीडिया अकाउंट और ऐप संभालते थे. इस टीम का फीडबैक मिलने पर ही मोदी ने 8 नवंबर को नोटबंदी से पहले कैबिनेट की मीटिंग बुलाई.

उस मीटिंग में अपनी योजना बताने के बाद नरेंद्र मोदी ने मौजूद सदस्यों से कहा कि अगर नोटबंदी फेल होती है तो जिम्मेदारी सिर्फ मेरी होगी. इस के बाद 8 नवंबर की रात को नोटबंदी की घोषणा कर दी गई. इस के समर्थन में पहला ट्वीट भी हसमुख अढि़या ने ही किया.

बताया जाता है कि काले धन के खिलाफ पिछले एक साल से काम चल रहा था. इस के तहत रिजर्व बैंक से अलगअलग समय पर कई सवाल भी पूछे गए. लेकिन इस तरह कि कोई समझ न सके. अगस्त 2016 में 2000 के नोट डिजाइन करने की बात भी सामने आई. नोटबंदी का ऐलान 18 नवंबर को होना था, लेकिन योजना लीक होने के डर से 10 दिन पहले ही नोटबंदी का ऐलान कर दिया गया, बिना पूरी तैयारी के. यह शायद बंपर जीत के बाद सत्ता में आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कौंफीडेंस था, जो पूरे देश पर भारी पड़ा.

प्रधानमंत्री मोदी ने इलेक्शन से पहले जो वादे किए थे, उन में एक वादा यह भी था कि वे विदेशों में जमा धनपतियों और नेताओं का काला धन लाएंगे. अगर वह धन आ गया तो इतना होगा कि देश के हर खाते में डाला जाए तो हरेक के हिस्से में 15-15 लाख रुपए आ जाएंगे. निस्संदेह, न तो यह असान था और न ही प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ऐसा कर पाए.

कोई और नेता होता तो भी यह संभव नहीं था. मोदी के इस वादे को विरोधी पार्टियां पकड़ कर बैठ गईं. चुनाव प्रचार के बाद उन्होंने इस वादे को अपने हिसाब से डायवर्ट कर के पूछना शुरू कर दिया कि मोदी हर खाते में जो पंद्रह लाख रुपए डालने वाले थे, उस का क्या हुआ? जब बारबार यह बात उठी तो अमित शाह ने कह दिया कि वह चुनावी जुमला था. इस के बाद विरोधी पार्टियों ने दोनों बातों को जोड़ कर प्रधानमंत्री पर तंज कसने शुरू कर दिए.

संभवत: प्रधानमंत्री के मन में यह बात गहरे तक बैठी थी. इसी के चलते उन्होंने विदेश न सही तो देश के धनकुबेरों का ही काला धन निकालने का फैसला कर लिया. इस में शायद वह कामयाब भी हो जाते अगर सोचविचार कर अथवा पूरी तैयारी कर के फैसला लिया गया होता. इस सब का खामयाजा भोगना पड़ा आम आदमी को, गरीबों को, मेहनतकश लोगों को. इस के बाद भी ज्यादातर लोग मोदीजी के इस फैसले को सही बताते रहे तो सिर्फ इसलिए क्योंकि वे जल्दी ही स्थिति सामान्य होने की उम्मीद लगाए बैठे थे.

स्थिति कुछ हद तक सामान्य हो भी जाती अगर सरकार ने 500 रुपए के पर्याप्त नोट छापे होते और बैंकों में मौजूद 100 रुपए के नोटों का सही वितरण हो पाता. कुछ लोगों के हाथों में आए भी तो 2000 के नोट, जो तब तक किसी काम के नहीं थे, जब तक बाजार में पर्याप्त मात्रा में छोटी मुद्रा न हो, जो थी ही नहीं. इस का सब से ज्यादा असर गरीब, मेहनतकश तबके पर पड़ा.

शादियों का सीजन होने की वजह से पैसे के अभाव में कितनी ही शादियां रुक गईं. बीमार लोग इलाज से वंचित रह गए. कितने ही चूल्हे ठंडे पड़े रहे, मजदूरों को काम मिलना बंद हो गया. छोटेछोटे उद्योग बंद हो गए. कामगरों की छुट्टी कर दी गई. किसानों की रबी की फसल ठीक से नहीं बोई जा सकी.

इतनी परेशानियों के बाद भी जब प्रधानमंत्री ने सब कुछ ठीक कर देने के लिए 50 दिन का समय मांगा तो भी लोगों ने उन की बातों पर भरोसा कर लिया. लेकिन उन का भरोसा तब दरकने लगा जब देश के कोनेकोने में लाखों करोड़ों की नई करेंसी पकड़ी जाने लगीं, काला धन पकड़ा जाने लगा. इस का मतलब था कि मोदी का नोटबंदी अभियान फेल हो गया था. लाइनों में लगे लोगों को जहां 2-4 हजार रुपए नहीं मिल रहे थे, वहीं कुछ लोग लाखों करोड़ों की नई करेंसी लिए घूम रहे थे.

24 नवंबर, 2016 को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर पीतमपुरा के रहने वाले अजितपाल सिंह और राजेंद्र सिंह को 27 लाख रुपए की नई करेंसी के साथ पकड़ा. सारी करेंसी 2000 के नोटों में थी, जिसे ये लोग मुंबई से लाए थे. पता चला ये हवाला करोबारी अब तक इसी तरह मुंबई से 1 करोड़ 5 लाख रुपए ला चुके थे.

इसी तरह करोलबाग के एक होटल से 14 दिसंबर को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की टीम ने हवाला कारोबार से जुड़े 5 लोगों अंसारी आफाम, फैजल कौशर खान, अंसार अबू जार, लाडू राम और महावीर सिंह को पकड़ा. ये लोग होटल तक्ष के कमरा नंबर 202, 206 और 106 में ठहरे थे. इन लोगों के पास से 3 करोड़ 25 लाख रुपए के पुराने नोट बरामद हुए, जो इन्होंने 4 सूटकेसों और एक कार्ड बोर्ड कार्टन बौक्स में रख रखे थे.

ये लोग विभिन्न राज्यों से पुराने नोट मुंबई के ललितभाई भोलू भाई के पास ले जाते थे. वह कमीशन के आधार पर पुराने नोटों की जगह नए नोट दे देता था. इस से पहले ये लोग दिल्ली से इसी तरह 3 बार करोड़ों की रकम मुंबई ले जा चुके थे.

खास बात यह कि ये लोग इतनी बड़ी रकम हवाई जहाज से ले जातेलाते थे. एयरपोर्ट पर इन के पकड़े न जाने की वजह यह थी कि ललितभाई के एक्सपर्ट्स रुपयों की गड्डियों को सूटकेसों में नीचे रख कर ऊपर से डबल साइडेड टेप चिपका देते थे और उस के ऊपर काला कपड़ा रख कर इंटरनेट का तार या केबल डाल देते थे. इस तरह एयरपोर्ट का विशेष स्कैनर भी इस रकम को नहीं पकड़ पाता था. पकड़े जाने तक ये लोग इसी तरह 20 करोड़ की रकम मुंबई ले जा चुके थे.

पकड़े गए लोगों ने बताया कि नोटबंदी के बाद से हवाला करोबार का तरीका बदल गया है. 8 नवंबर से पहले हवाला का काम जहां कोडवर्ड या नंबर के आधार पर होता था, जब यह बंद हो गया तो हवाला कारोबारी पुरानी करेंसी की जगह नए नोट दे कर अपना काम चलाने लगे. आफान ने बताया कि दिल्ली के हवाला कारोबारी नेताओं, अफसरों और बिजनैसमैनों का काला धन मुंबई भेज कर नई करेंसी मंगा रहे थे.

जिस तरह से नोटबंदी के बाद नई करेंसी पकड़ी गई, उस से साफ पता चलता है कि सारी हेराफेरी बैंकों में ही हुई. आयकर अधिकारियों ने औचक छापों में कर्नाटक सरकार के 2 इंजीनियरों और 2 ठेकेदारों के बेंगलुरु स्थित घरों से 4.7 करोड़ की नई करेंसी, 6 करोड़ के पुराने नोट और 7 किलो सोना जब्त किया.

कर्नाटक के आयकर अधिकारी एलेक्स मैथ्यू के अनुसार सब से ज्यादा जब्ती पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर ए.सी. जयचंद्रन के फ्लैट से हुई. उस के बहुमंजिला अपार्टमेंट के बेसमेंट में खड़ी 2 महंगी कारों लेंबोरगिनी और पोर्शे लिमोजिन को भी इस केस में अटैच कर दिया गया.

इनकम टैक्स के एक इसी तरह के छापे में 9 दिसंबर को चेन्नै के एक ज्वैलर्स से 106 करोड़ रुपए की रकम और 127 किलोग्राम सोना जब्त किया गया. बरामद की गई रकम में 10 करोड़ के नए नोट भी शामिल थे. इस से पहले आयकर विभाग ने बेंगलुरु में 5.7 करोड़ रुपए के नए नोट जब्त किए थे.

ओडिसा के संबलपुर की पुलिस टीम ने 4 दिसंबर को नोट बदलने वाले एक गिरोह से 1 करोड़ 42 लाख 91 हजार रुपए के 500 रुपए के नए और पुराने नोट पकड़े. पकड़े गए लोगों से पता चला कि इस गड़बड़झाले में शराब व्यवसाई जियारत अली और भारतीय स्टेट बैंक की शाखा के जनसंपर्क अधिकारी रश्मि रंजन राउत भी शामिल हैं.

पुलिस और आयकर विभाग ने आगे की जांच में जियारत अली, उस के बेटे मोहम्मद कजाफी और रिफत अली, सबतिन अली, स्टेट बैंक की प्रमुख शाखा के जनसंपर्क अधिकारी रश्मि रंजन राउत व उस के भाई पंकज कुमार राउत को गिरफ्तार किया. इन लोगों के पास से 85 लाख 62 हजार रुपए के 500 और 2000 रुपए के नए नोट मिले. ये लोग कमीशन ले कर पुराने नोटों को नए में बदलते थे.

रविवार 11 दिसंबर को क्राइम ब्रांच ने दिल्ली के गे्रटर कैलाश स्थित ला फार्म ‘टी ऐंड टी’ पर छापा मार कर 13 करोड़ 50 लाख रुपए की करेंसी बरामद की. इन में ढाई करोड़ 2000 के नोटों की शक्ल में थे. यह फर्म सुप्रीम कोर्ट के वकील रोहित टंडन की थी. बताया जाता है कि रोहित के एक बिल्डर और एक कांग्रेसी नेता से करीबी संबंध थे. उस के पास दिल्ली और एनसीआर में 125 करोड़ की प्रौपर्टी भी बताई जाती है.

दिल्ली की क्राइम ब्रांच को सूचना मिली थी कि छावला में रहने वाले प्रौपर्टी डीलर सुखवीर शौकीन के पास बड़ी संख्या में नए नोट हैं. क्राइम ब्रांच ने इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के साथ छापा मारा तो 64 लाख 84 हजार रुपए की रकम मिली. इन में 11 लाख 34 हजार रुपए के नए नोट थे. साथ ही एक करोड़ की ज्वैलरी भी बरामद हुई. उसी दिन घारूहेड़ा में एक स्विफ्ट कार में सवार 2 युवकों के पास से 6 लाख के नए नोट बरामद किए गए.

8 दिसंबर को आयकर विभाग ने चैन्नै में रेत खनन कारोबारी एस रेड्डी के 8 ठिकानों पर छापा मार कर 142 करोड़ की नकदी और 36.29 करोड़ कीमत का 127 किलोग्राम सोना जब्त किया. रेड्डी के पास पूरे राज्य में रेत खनन का लाइसेंस है. छापे में मिली रकम में 9.63 करोड़ के 2000 रुपए के नए नोट थे. रेत खनन व्यवसाई ने दावा किया है कि यह रकम और सोना उस का है.

8 दिसंबर को ही सूरत पुलिस ने 4 लोगों को कार में 2000 रुपए के नए नोटों की शक्ल में 76 लाख रुपए ले जाते हुए पकड़ा. इन में एक फैशन डिजाइनर युवती भी थी. इसी दिन पुलिस ने पोरबंदर के राणावाव में 25 लाख रुपए के नोट बरामद किए. पकड़े गए तीनों लोग गुजरात के थे. 6 दिसंबर को ही क्राइम ब्रांच ने गुड़गांव में 10 लाख की नए नोटों की करेंसी पकड़ी. यहां भी सारे नोट 2000 के ही मिले. इसी तारीख मे मुंबई क्राइम ब्रांच ने दादर क्षेत्र की हिंदू कालोनी से 85 लाख रुपए के नए नोट पकड़े.

इसी तरह 11 दिसंबर को फरीदाबाद पुलिस ने 2 अलगअलग मामलों में 64 लाख रुपए के नए नोटों के साथ 6 लोगों को पकड़ा. इन में से सेक्टर 30 की क्राइम ब्रांच ने 27.30 लाख रुपए के साथ 2 युवकों को पकड़ा. ये 20-25 प्रतिशत कमीशन ले कर पुराने नोटों की जगह नए नोट देते थे. पकड़े गए युवक दिल्ली के थे. बाकी रकम मुजेसर की पुलिस ने पकड़ी थी, जो 2 हजार के नोटों की शक्ल में थी.

काले धन के कुबेरों ने बैंक वालों से मिल कर धांधलियां तो खूब की, लेकिन सब न सही कुछ लोग कानूनी शिकंजे में फंसते रहे. नोटबंदी के 32 दिन बाद 10 दिसंबर को आयकर विभाग ने कर्नाटक के चित्रदुर्ग के एक हवाला एजेंट के घर छापा मारा तो 5.7 करोड़ रुपए के नए नोट, 90 लाख रुपए के 500 और 1000 रुपए के नोट और 32 किलोग्राम सोना मिला. 

यह रकम और सोना बाथरूम में एक गुप्त तिजोरी बना कर रखे गए थे. स्टील की तिजोरी वाश बेसिन के ऊपर टाइलों के पीछे छिपाई गई थी. इसे खोलने के लिए विंडो के पास एक सीक्रेट बटन था. बटन दबाने पर तिजोरी टाइल के साथ खुल जाती थी.

उसी दिन आयकर विभाग की काररवाई में 3 शहरों चैन्नै, हैदराबाद और दिल्ली में अलगअलग जगहों से 33.56 करोड़ की नई करेंसी जब्त की गई, जो साफ इशारा करती थी कि सारी गड़बड़ी बैंकों से ही हुई है.

हिमाचल प्रदेश की सीमा पर स्थित कालाअंब में पुलिस ने सिंडीकेट बैंक की पावटा साहिब शाखा के मैनेजर रोहित की मारुति कार से एक ट्रंक बरामद किया जिस में 30 लाख की नई करेंसी थी. ट्रंक में 24 लाख के 2-2 हजार के नोट थे और 5 लाख कीमत के 500-500 के नेट. बाकी रकम सौ-सौ के नोटों में थी. जाहिर है, बैंकों के अधिकारी जनता की चिंता छोड़ कर अपनी जेबें भरने में लगे थे.

बैंकों की बात करें तो सब से बड़ा घोटाला एक्सिस बैंक की शाखाओं में हुआ. इसी के चलते बैंक के 27 अफसरों को सस्पैंड कर दिया गया. दरअसल, मंगलवार 13 नवंबर को उत्तरी जिला पुलिस ने शाम को एक्सिस बैंक की कश्मीरी गेट शाखा के बाहर एक ज्वैलर, एक चार्टर्ड एकाउंटेंट और उस के सहायक को दबोचा. इन के पास से 3 करोड़ 70 लाख रुपए के पुराने नोट बरामद हुए.

पूछताछ में ज्वैलर ने बताया कि एक्सिस बैंक के मैनेजर से उस की सांठगांठ है और इस से पहले भी वह मैनेजर के माध्यम से करोड़ों के पुराने नोट बदलवा चुका है. उस ने यह भी बताया कि इस के एवज में वह बैंक के 2 मैनेजरों को सोने की ईंट दे चुका है. पुलिस ने यह बात इनकम टैक्स रेवेन्यू इंटेलिजेंस के असिस्टेंट डायरेक्टर को बता दी. असिस्टेंट डायरेक्टर की टीम ने तीनों व्यक्तियों से 8 घंटे पूछताछ की. इस के बाद उन का 3 लाख 70 हजार रुपया जब्त कर के उन्हें छोड़ दिया गया. प्रवर्तन निदेशालय ने इस सब की लंबी जांच कर के केस दर्ज कराया और 5 दिसंबर, 2016 को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीम ने एक्सिस बैंक के 2 मैनेजरों विनीत गुप्ता और शोभित सिन्हा को गिरफ्तार कर लिया.

इन लोगों ने ऐसी फर्जी कंपनियों के खातों में 39 करोड़ रुपए के पुराने नोट जमा करवाए थे, जिन का डायरेक्टर मजदूर और गरीबों को बनाया गया था. इस के बदले में इन मैनेजरों ने सोने की 2 ईंट ली थीं. साथ ही इन्हें 2 पर्सेंट कमीशन अलग से मिलना था. इन खातों में जमा पैसा आरटीजीएस से वापस कर दिया गया, जो ज्वैलर को मिल चुका था.

शोभित सिन्हा के लखनऊ स्थित घर से 2 किलो सोने की ईंट बरामद भी हो गई. इस मामले से जुड़े ज्वलैर से 1 किलो सोने की ईंट पहले ही जब्त कर ली गई थी. दोनों मैनेजरों को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर के जेल भेज दिया गया. ज्वैलर ने बताया कि नोटबंदी के अगले दिन ही एक दलाल ने उसे इन मैनेजरों से मिलवाया था. इस के बाद वह मैनेजरों से अपना और दूसरे ज्वैलर्स का काला धन बोगस खातों में जमा कराने लगा था. शाम के 5 बजे के बाद बैंक का शटर गिरा कर यही गोरखधंधा होता था.

ज्वैलर की पुराने नोटों वाली रकम को वर्किंग आवर में ही जमा दिखाया जाता था. अगले दिन फर्जी खातों में जमा रकम आरटीजीएस के जरिए ज्वैलर के खातों में भेज दी जाती थी, जिसे वह 31 से 32 हजार रुपए प्रति दस ग्राम की दर से सोने की बिक्री में दिखा देता था. हकीकत में यह सोना पुराने नोट वालों को 45 हजार से 50 हजार रुपए प्रति 10 ग्राम के हिसाब से बेचा जाता था.

चांदनी चौक का एक्सिस बैंक भी पीछे नहीं था. आयकर विभाग ने एक्सिस बैंक की चांदनी चौक शाखा में ऐसे 44 खाते पकड़े, जिन से 100 करोड़ रुपए निकाले गए थे. इन में से किसी भी खाते ने केवाईसी मानक पूरा नहीं किया था.

इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने नोएडा के सेक्टर 51 स्थित एक्सिस बैंक पर छापा मार कर 40 फर्जी एकाउंट पकड़े. नोटबंदी के बाद इन खातों में पुरानी करेंसी जमा कर के आरटीजीएस के जरिए 60 करोड़ रुपए दूसरे खातों में भेजे गए थे. फर्जी खातों में 20 खाते फर्जी सेल्स कंपनियों के नाम पर खुलवाए गए थे. एक खाता धारक को फोन कर के पूछा गया तो वह हैरान रह गया. उस ने बताया कि वह तो मजदूर है. यहां भी कई बैंक कर्मचारियों को सस्पेंड किया गया. एक्सिस बैंक की कृष्णानगर शाखा में भी इसी तरह की गड़बड़ी पाई गई.

सीबीआई ने बेंगलुरु में भी पुराने नोटों के बदले नए नोट देने वाले एक बड़े सिंडीकेट का परदाफास किया. सीबीआई द्वारा 10 जगह डाले गए छापों में कर्नाटक बैंक और धनलक्ष्मी बैंक के मैनेजरों की भूमिका भी पाई गई थी. इस साजिश में एटीएम में नोट डालने वाली कंपनी सिक्योर वैल्यू इंडिया भी शामिल थी. ये लोग एटीएम में भरने के लिए लाए गए नोटों को सीधे काले धन के कारोबारियों के पास पहुंचा देते थे और उन से पुराने नोट ले कर बैंकों में जमा करा देते थे.

सिक्योर वैल्यू इंडिया ने इस के लिए शहर भर में अपने एजेंट फैला रखे थे, जो कमीशन के बदले पुराने नोट बदलने के इच्छुक लोगों को ढूंढ कर लाते थे. इस रैकेट का तब भंडाफोड़ हुआ जब 1 दिसंबर को आयकर विभाग के छापे में 6 करोड़ रुपए के नए नोट पकडे़ गए. जांच में इन लोगों के पास 152 करोड़ रुपए के काले धन का पता चला.

ईडी ने इन आरोपियों के खिलाफ मनी लांडिं्रग रोकथाम कानून के तहत केस दर्ज कर लिया है. सीबीआई अलग से इस मामले की जांच कर रही है.

मोदी सरकार ने 8 नवंबर को नोट बंदी के ऐलान के बाद सारी जिम्मेदारी बैंकों पर छोड़ दी थी. सफेद स्याह जो भी करना था, उन्हें ही करना था. यानि आदेश सरकार का, उसे पूरा करने की जिम्मेदारी बैंकों की. बस यहीं से गड़बड़ शुरू हुई. मौकापरस्त लोग आम आदमी की परेशानियों को परे रख कर काले धन को सफेद करने के नएनए हथकंडे ढूंढने लगे. इस में काफी हद तक वह कामयाब भी रहे. आइए जाने उन के हथकंडों की हकीकत.

बेंगलुरु के इंदिरा नगर स्थित कर्नाटक बैंक के चीफ मैनेजर सूर्य नारायण बेरी को जब सीबीआई ने स्याह को सफेद करने के आरोप में पकड़ा तो पता चला ये जनाब अपने कस्टमर्स से उन के आधार कार्ड, पहचान पत्र अथवा पैनकार्ड की फोटोकापी वगैरह ले कर बैंक में कैश न होने का बहाना कर देते थे. बाद में इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर चोरी छुपे काले धन को सफेद कर देते थे.

कुछ बैंक अधिकारियों ने काले धन को सफेद करने के लिए पुराने नोट ले कर डिमांड ड्राफ्ट बना दिए. फिर उन्हें कैंसल कर के नए नोट दे दिए गए. इस तरह की हेराफेरी खूब जम कर हुई. सेंट्रल बैंक औफ इंडिया की बासवमुंडी ब्रांच में 149 डिमांड ड्राफ्ट्स के जरिए 71 लाख रुपए जमा कराए गए जो बाद में नए नोटों में लौटा दिए गए.

बेंगलुरु में सीबीआई के हत्थे चढ़े रिजर्व बैंक औफ इंडिया के रीजनल औफिस में वरिष्ठ विशेष सहायक के. माइकल ने लोगों से बिना आईडी प्रूफ लिए ही नए नोट दे दिए. जो पुराने नोट जमा हुए, उन्हें माइकल ने पहले से ही बैंक में मौजूद रकम बता कर उस की जगह नई करेंसी ले ली. माइकल ने हेराफेरी का यह खेल चमराजपेट जिले के कोल्लेगज स्थित स्टेट बैंक औफ मैसूर में खेला जहां बैंक की चेस्ट थी. उस ने 1.51 करोड़ की करेंसी बदली थी. ऐसा और भी तमाम कैशियरों ने किया. उन्होंने कमीशन ले कर पुराने नोटों को नई करेंसी में बदल दिया. पुराने नोटों को उन्होंने बैंक में पहले से मौजूद पुरानी रकम बता दिया.

कुछ बैंक कर्मचारियों ने ईमानदार खाताधारकों के आईडी प्रूफ ले कर उन के नाम पर नए खाते खोले और उन में जमा रकम दिखा कर खूब हेराफेरी की. ऐसे खातों में पुराने नोट जमा कर के नए नोट निकाले गए. ज्ञातव्य हो, एकाउंट में जीरो बैलेंस होने पर वह खुद ब खुद अमान्य हो जाता है. 8 नवंबर के बाद खोले गए ऐसे खातों की जांच हो रही है.

दुकानदारों से रोज छोटे नोट जमा करने वाले माइक्रो फाइनैंस एजेंट्स ने भी स्वयं सहायता समूहों के अकाउंट्स में पैसे डाल कर खूब हेराफेरी की. इन एजेंट्स ने दुकानदारों से नए नोट लिए. जबकि इन्होंने स्वयं सहायता समूह के अकाउंट्स में पुराने नोट डाल कर काले धन को सफेद किया. ऐसे कम से कम 5000 स्वयं सहायक समूह और एजेंट्स जांच के दायरे में हैं.

इंडियन फाउंडेशन औफ ट्रांसपोर्ट रिसर्च एंड ट्रेनिंग के संयोजक एस.पी. सिंह के मुताबिक, ज्यादातर ट्रांसपोर्टरों के पास 500 और 1000 रुपए के नोटों का भंडार था. पेट्रोल पंपों पर पुराने नोट चलाने की सुविधा दिए जाने का इन्होंने इस का भरपूर फायदा उठाया. इस में ज्यादातर काला धन था. इंडियन फाउंडेशन रिसर्च ऐंड ट्रेनिंग के अनुसार नोटबंदी के बाद ट्रांसपोर्टरों ने पेट्रौल पंपों को मिली पुराने नोट लेने की सुविधा का लाभ उठाते हुए अपना ही नहीं, अपने परिचितों और रिश्तेदारों का करोड़ों का काला धन सफेद कराया.

आरटीओ यानी रीजनल ट्रांसपोर्ट औफिस और उन के मुखिया अफसरों के हाथों में प्रदेश के किसी जिले के ट्रांसपोर्ट महकमे की नकेल होती है. इस के चलते ट्रांसपोर्टरों के साथ उन के घनिष्ठ रिश्ते बन जाते हैं. ट्रांसपोर्टरों ने इन अफसरों के काले धन को भी खूब सफेद कराया.

और तो और इस मामले में डीटीसी यानी दिल्ली ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन भी पीछे नहीं रही. 8 नवंबर को नोटबंदी के ऐलान के बाद 9 नवंबर को डीटीसी ने घोषणा कर दी थी कि डीटीसी बसों में 1000 और 500 के नोट नहीं लिए जाएंगे. इस के बावजूद डीटीसी के डिपो से 8,14,85,500 रुपए पुराने नोट जमा कराए गए.

काले धन को सफेद करने का खेल हर जगह, हर स्तर पर और हर तरह से खेला गया. जिस तरह बैंकों में पुराने नोट आए उसे देख कर सरकार भी हतप्रभ रह गई. दरअसल, सरकार को उम्मीद थी कि 3-4 लाख करोड़ की करेंसी काले धन के रूप में है. लेकिन उस की यह धारणा गलत साबित हुई. पुराने नोट बदलवाने में एक बड़ी भूमिका दलालों की भी रही जो 30-35 प्रतिशत कमीशन ले कर विभिन्न तरीकों से लोगों के पुराने नोट बदलवा रहे थे.

इस के अलावा कुछ कंपनियों ने अपने कैश इन हैंड के जरिए भी लोगों का काला धन सफेद कराया. दरअसल 8 नवंबर की रात को इन कंपनियों के खातों में जितना कैश इन हैंड शो हो रहा था, उतना उन के पास था ही नहीं. खातों में ज्यादा कैश इन हैंड जान बूझ कर दिखाया जाता है ताकि बैंकों से लोन वगैरह लेने की सुविधा रहे. कुछ लोगों ने इसी रास्ते से स्याह को सफेद किया.

काले धन को सफेद करने के लिए सीसी एकाउंट भी बड़ा हथियार बना. दरअसल, सीसी अकाउंट किसी कंपनी या फर्म की बैंक से लोन लेने की लिमिट होती है. मसलन अगर किसी कंपनी या फर्म ने सीसी अकाउंट से 15-25 लाख का लोन ले रखा है तो वह लोन की यह रकम पुराने नोटों में जमा करा सकती है. हालांकि यह जरूरी था कि नोटबंदी की रात को उस के रिकौर्ड में उतना कैश इन हैंड हो.

रीयल टाइम ग्रास सेटलमेंट यानी आरटीजीएस और ओवर ड्राफ्ट भी काले धन को सफेद करने के माध्यम बने. आरटीजीएस ट्रांजेक्शन में कम से कम 2 लाख रुपए ट्रांसफर किए जा सकते हैं. जबकि अधिकतम की कोई सीमा नहीं है. कई कंपनियों या फर्मों ने भी अपने करंट अकाउंट में इसी तरह पैसा जमा कराया. यहां भी शर्त वही थी कि नोटबंदी की रात को उन के पास कितना कैश इन हैंड दिखाया गया था. उस रकम को वह 30 दिसंबर तक पुराने नोटों के रूप में जमा करा सकते थे. इस तरह दूसरों का काला धन सफेद करने के लिए ऐसे लोगों ने 20 से 25 प्रतिशत कमीशन लिया.

बड़े बिजनैसमैन कई फर्जी कंपनियां बना कर रखते हैं ताकि बैंक से कर्ज ले सकें या फिर टैक्स की चोरी कर सकें. ऐसी फर्जी फर्मों या कंपनियों के माध्यम से काले धन को सफेद किया गया. इस में भी शर्त यही थी कि 8 नवंबर की रात को क्लोजिंग में उतना कैश दिखाया गया हो. ऐसे लोगों को भी 30 दिसंबर तक पुराने नोटों में रकम जमा करने की छूट थी.

सच्चाई यह है कि नरेंद्र मोदी की नोटबंदी की योजना को उन्हीं बैंकों ने पलीता लगाया, जिन पर भरोसा कर के यह योजना शुरू की गई थी. एक सच्चाई यह भी है कि कुछ ऐसे भाजपाई नेता इस योजना के फेल होने से खुश भी हैं, जिन्हें मोदी का बढ़ता हुआ कद अच्छा नहीं लगता.

अगर आम लोगों की बात करें तो डेढ़ महीने तक लाइनों में लग कर थक चुका यह वर्ग यह सोचसोच कर परेशान है कि मोदी सरकार जिस ई-बैंकिंग और प्लास्टिक मनी की बात कर रही है, उसे वह कैसे हैंडल करेगा? उस के साथ कहीं धोखाधड़ी हुई तो वह क्या करेगा?

उधर आमूलचूल परिवर्तन का सपना ले कर नोटबंदी करने वाले नरेंद्र मोदी अपनी योजना के फेल होने के बाद एक और लंबी रेखा खींचने के लिए ई-बैंकिंग और प्लास्टिक मनी लाने पर अड़े हैं. नरेंद्र मोदी की इस महत्वाकांक्षी योजना के फेल होने की एक वजह यह भी रही कि सरकार के आंकलन में गड़बड़ी हो गई.

दरअसल आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार करीब 14.5 लाख करोड़ की रकम के 500 और 1000 के नोट मार्केट में थे. नोटबंदी के बाद सरकार को उम्मीद थी कि 500 और 1000 रुपए के नोटों के जरिए छिपाया गया करीब 4-5 लाख करोड़ रुपए का काला धन बाहर आएगा.

लेकिन जिस तरह लोग बैंकों में पैसा जमा करा रहे हैं, उस से लगता है कि 30 दिसंबर तक जमा होने वाली रकम का आंकड़ा 4-5 लाख करोड़ की जगह लगभग 14 लाख करोड़ तक पहुंच जाएगा. मजे की बात यह कि इस में नकली करेंसी भी होगी, क्योंकि कई बैंकों ने जमा करते समय असली नकली को नहीं देखा.

जब कई बार प्यार से तो कई बार धौंस देने पर भी लोगों ने काला धन बाहर नहीं निकाला तो मोदी सरकार ने अपनी असल लाइन बदल कर ई-बैंकिंग और प्लास्टिक मनी की लाइन पकड़ ली. लेकिन यह इतना आसान नहीं होगा. क्योंकि यह ऐसा काम है, जिस में डाटा चुरा कर साइबर क्रिमिनल्स पलभर में किसी का भी खाता खाली कर सकते हैं.

कहने का अभिप्राय यह है कि मोदी जी ने फर्जी करेंसी, काला धन, आतंकवाद की फंडिंग जैसे जिन महत्वपूर्ण मुद्दों पर नोटबंदी की शुरुआत की थी, उन में से एक भी पूरा नहीं हो पाया.

रही बात धन की परेशानी की तो लोगों को यह परेशानी 6-7 महीने से पहले समाप्त नहीं होगी, क्योंकि मोदी सरकार ने ई-बैंकिंग को सफल बनाने के लिए कम नोट छापने का फैसला कर लिया है. जब बैंकों में पैसा नहीं होगा तो लोगों को मजबूरी में ई-बैंकिंग की तरफ जाना ही पड़ेगा. लेकिन यह भी सच है कि सारे काम ई-बैंकिंग या ई-वालेट से नहीं हो सकते. कुछ कामों के लिए नकद रकम चाहिए ही. 

किससे नफरत करते हैं अमित साध

बौलीवुड में हर कलाकार सफलता की ऊंचाइयां छूना चाहता है, पर हर कलाकार के लिए सफलता के अलग अगल मापदंड हैं. कुछ कलाकार सफलता पाते ही कई तरह की महंगी गाड़ियां खरीदकर शो बाजी करते हैं कि वे कितनी  सफलता पा चुके हैं. पर ‘काई पो चे’, ‘सुल्तान’ सहित कई फिल्मों का हिस्सा रहे अभिनेता अमित साध की सोच अलग है.

वह कहते हैं-‘‘एक ही चीज को देखने का नजरिया हर किसी का अलग होता है. कुछ लोगों के लिए नयी कार, बड़ी महंगी कार खरीदना सफलता की निशानी हो सकती है. पर मेरे लिए वह सफलता नही है. मैं आज भी सेकंड हैंड कार में घूमता हूं. क्योंकि मुझे गाड़ियों का कोई शौक ही नहीं है. मुझे गाड़ियों से सख्त नफरत है. मैं तो उस दिन का इंतजार कर रहा हूं, जब हिंदुस्तान में सड़क पर से गाड़िया गायब हो जाएंगी. सिर्फ साइकल पर लोग सवारी करेंगें. मुझे तो कार के अंदर शीशे बंद करके चलने में घुटन महसूस होती है. मुझे भीड़ में रहना पसंद है.’’

कामयाबी की डगर से फिसलते शाहरुख खान

एक लंबे अर्से से बॉलीवुड पर अपनी धाक जमाये बैठे किंग खान यानि अभिनेता शाहरुख खान ने अपने कैरियर की शुरुआत टीवी से की थी. उन्हें कभी पता नहीं था कि अपने करियर के इस मुकाम पर एक दिन वे बॉलीवुड के बादशाह कहलायेंगे. दिल्ली से निकले शाहरुख खान ने मुंबई आकर जब जो अभिनय मिला करते गए, फिर चाहे वह रोमांस, कॉमेडी, एक्शन, थ्रिलर या कुछ भी हो, उन्होंने हर चरित्र को एक दूसरे से अलग बनाने के लिए खूब मेहनत की. वे पूरे दिन में तीन से चार घंटे सोते हैं और अपनी हर कमिटमेंट को पूरी करते हैं. उन्होंने केवल फिल्मों में ही नहीं, बल्कि छोटे पर्दे पर भी कई शो को होस्ट किया है, वे विज्ञापनों में भी काफी प्रसिद्ध माने जाते हैं.

शाहरुख खान जितनी मोहब्बत अपनी फिल्मों से करते हैं, उतनी ही मोहब्बत वे अपने परिवार से भी करते हैं. अपनी कामयाबी में वे अपने पूरे परिवार का हाथ मानते हैं. जिन्होंने हमेशा उन्हें सुकून की जिंदगी दी. उनकी पत्नी गौरी ने हमेशा उनके साथ हर परिस्थिति में सहयोग दिया है. वे एक अच्छे पिता भी जाने जाते हैं, जो समय मिलते ही अपने तीनों बच्चों आर्यन, सुहाना और अबराम के साथ समय बिताते हैं. पॉपुलरिटी के साथ-साथ शाहरुख खान कई बार अपने व्यवहार के लिए विवादों में भी घिरे, पर उन्होंने अपने गलत व्यवहार के लिए माफ़ी भी मांगी. अभी वे शांत स्वभाव के हैं और वैसा ही रहना चाहते हैं. इस समय वे एक्शन फिल्म ‘रईस’ के प्रमोशन पर हैं, जिसमें उन्होंने फिर से एक अलग अवतार का रूप धारण किया है. जिसमें उन्हें काफी चोटें आई, पर उन्होंने काम पूरा किया. काफी इंतज़ार के बाद उनसे मिलना हुआ, पेश है बातचीत के कुछ अंश.

प्र. पहले की एक्शन फिल्म से ‘रईस’ कितनी अलग है?

ये थोड़ी अलग तरह की एक्शन फिल्म है. ये टिपिकल एक्शन फिल्म नहीं है. जिसमें विलेन होता है, जो हीरो को  परेशान करता है और हीरो बदला लेने चला जाता है, ऐसे कुछ भी सिक्वेंस नहीं हैं. यह एक ऐसे शख्स की कहानी है, जो किसी भी हालत में सफलता को हासिल करता है. इसमें एक्शन विलेन वाले नहीं हैं. थोड़ी रीयलिस्टिक एक्शन है. निर्देशक राहुल ढोलकिया खुद एक रीयलिस्टिक फिल्म बनाते हैं और वैसी ही कोशिश उन्होंने इस फिल्म को बनाने में की है. जैसे कि अगर फाइट हुई है, तो हीरो को भी लगा है ऐसा नहीं है कि आज लड़ाई हुई और कल हीरो गाना गा रहा है. एक्शन के पांच सीक्वेंस इसमें है, जिसे बहुत बेहतरीन तरीके से शूट किया गया है.

प्र. फिल्म को स्वीकार करने की खास वजह क्या है?

ये एक अलग फिल्म एक जर्नलिस्ट द्वारा काफी रिसर्च के बाद लिखी गयी है. लोगों को इसके ट्रेलर अच्छे भी लग रहे हैं, क्योंकि सारी बातें रियल लाइफ से उठाई गयी हैं. चरित्र की डिग्निटी को बनाकर रखने की कोशिश इस फिल्म में की गयी है. मसलन, वह व्यक्ति जानता है कि वह गलत काम कर रहा है. लेकिन वह इसे स्वीकारता भी है, भागता नहीं है.

प्र. इसमें माहिरा खान को लेने की वजह क्या रही?

हमें फिल्म में एक अलग तरह की चरित्र चाहिए थी. जिसने मेरे साथ पहले काम न किया हो. काफी ऑडिशन हुआ और निर्देशक ने एक नए चेहरे को लाने की कोशिश की और माहिरा मिली. जो सुंदर होने के साथ-साथ साइलेंट स्ट्रेंथ का भी काम करें. रियल लाइफ में ऐसा अधिकतर सभी परिवार के मां, बहन या पत्नी में होता है. जो किसी भी परिवेश को आसानी से हैंडल कर लेते हैं. इसमें अधिकतर नए कलाकारों को लेने की कोशिश की गयी है. ताकि मेरा अभिनय भी अलग हो.

प्र. अभिनय के इस मंजिल पर आप साथी कलाकारों का कितना सहयोग अपने अभिनय में मानते हैं?

नवाज़ुद्दीन एक थिएटर आर्टिस्ट हैं और बहुत उम्दा अभिनय करते हैं और ये सही है कि अगर आपके साथी कलाकार अच्छा काम करते हैं तो आपको भी काम करने में मजा आता है.

प्र. फिल्म के कौन से भाग में काम करना आपके लिए कठिन था?

एक्शन सीन्स में मुझे चोट लग गयी थी, इसलिए दो एक्शन सीन्स बाद में हुए थे. वो कठिन थे, जो एक जो छत पर पीछा करते हुए था. उसमें मैंने डुप्लीकेट का सहयोग लिया है. मुझसे वह दृश्य नहीं हो पा रहा था, क्योंकि मैं पूरी तरह ठीक नहीं हो पाया था.

प्र. आप महिला निर्देशक या पुरुष निर्देशक किसके साथ काम करने में अधिक अच्छा महसूस करते हैं?

महिला निर्देशक के साथ काम करना हमेशा बेहतर होता है. अभी तो इंडस्ट्री में महिला निर्देशक कम हैं और अधिक होनी चाहिए, क्योंकि मुझे महिला निर्देशक के साथ किसी बात की चर्चा करना पसंद है, वे किसी भी बात को अलग नजरिये से देख सकती हैं. विषय चाहे कुछ भी हो, उनकी सोच हमेशा पुरुषों से अलग होती है. पुरुषों की सोच मेरे अंदर है, ऐसे में अगर महिला की सोच भी साथ मिले तो चीजे बेहतर बनती हैं. फिल्म ‘डिअर जिंदगी’ के समय सेट पर सारी औरते थी, जिसमें गौरी शिंदे, आलिया भट्ट प्रमुख थी. निर्देशक फरहा खान की ‘सेन्स ऑफ़ ह्यूमर’ भी एक पुरुष निर्देशक से काफी अच्छी है. निर्देशक जोया अख्तर के साथ भी समय मिलने पर बात करता हूं. लेकिन मैं एक महिला निर्देशक के साथ एक्शन फिल्म करना चाहता हूं.

प्र. कामयाबी के इस मुकाम में जहां आपकी कुछ फिल्में हिट तो कुछ फ्लॉप भी रही. ऐसे में आप अपने आपको कहां पाते हैं? क्या जीवन में अभी भी कुछ मलाल रह गया है?

एक कलाकार के रूप में मैं हमेशा अपने काम से असंतुष्ट रहता हूं. अगर मैं कहूं कि यहां तक पहुंचना मेरा उद्देश्य था, तो वह मेरा कभी नहीं था, क्योंकि ‘गोल’ अंत होता है. ‘माइलस्टोन’ अगर बन जाये, तो अच्छी बात है. मैं ऐसा सोचता भी नहीं हूं कि मेरी फिल्म सफल हो रही है या नहीं. फ्राइडे ख़त्म होने के बाद में आगे निकल जाता हूं. मैं 15 से 20 घंटे रोज़ काम करता हूं. हर दिन सुबह मेरे लिए एक्साइटिंग कुछ होना चाहिए और वह होने के लिए कुछ नया होना चाहिए. अगर मैं सिर्फ पैसे को सोचकर फिल्मों में काम करूं तो वह भी एक दिन पुराना हो जाता है. जॉब हो जाती है. मैं अपने आप को भाग्यशाली मानता हूं कि मुझे क्रिएटिव होने का अवसर मिला. मैं अपनी क्रिएटिविटी को खोना नहीं चाहता, क्योंकि वह करते-करते मेरी जिंदगी अच्छी गुजर रही है. हालांकि मेरी ‘ऐज’ और ‘स्टेज’ दोनों ही अलग है, उसके अंदर कुछ नया करने की कोशिश हमेशा करता रहता हूं. अभी मैं निर्देशक इम्तियाज़ के साथ ‘द रिंग’ एक लव स्टोरी कर रहा हूं, पर उसके लव स्टोरी कहने का अंदाज़ नया है.

प्र. क्या जीवन के इस मोड़ पर किसी बात से डर लगता है?

पिता बनने के बाद यही चिंता सबसे अधिक रहती है कि मेरे बच्चों का स्वस्थ्य ठीक रहे, वे अच्छी तरह पढ़-लिखकर स्थापित हो जायें. जब आप एक मुकाम तक पहुंच जाते हैं तो आपको बहुत धीरज रखना पड़ता है, क्योंकि तब आपकी लाइफ, आपकी अपनी नहीं रह जाती. पब्लिक की हो जाती है, ऐसे में मैं उनसे लड़ नहीं सकता. अगर लड़ भी लिया तो बाद में समझ में आती है कि ऐसी जिंदगी मैंने खुद चुनी है. इसलिए मैं कुछ भी गलत न कहूं, ऐसा सोचता हूं. अगर लोग मुझे आकर जन्मदिन की बधाइयां देते हैं तो मुझे अच्छा लगता है. लेकिन उसमें ऐसे भी कुछ लोग होंगे जो मुझे बुरा भी कहते होंगे. उसे स्वीकारना पड़ता है. जब जिंदगी इतना देती है, तो आप किसी भी बात को जो आपको अच्छा न भी लगे, छोड़ देना ही बेहतर होता है.

प्र. इतना काम करने के बावजूद अपने स्वास्थ्य का ख्याल कैसे रखते हैं?

मैं खाना बेसिक खाता हूं, अभी में 51 वर्ष का हो चुका हूं. मैं पकवान, मीठा नहीं खाता. चावल और रोटी कम खाता हूं. दाल, बीन्स, स्प्राउट्स ये सब अच्छा लगता है. थोड़ी वर्क आउट भी करता हूं ताकि पसीना निकले. अभी सब चोट की वजह से बंद है. समय मिलने पर बच्चों के साथ खेलता हूं. मैंने अपने बच्चों और पत्नी सभी को सलाह दी है कि बेसिक खाने के साथ थोड़ी व्यायाम अवश्य करें.

मजबूत प्रधानमंत्री कौन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी के ऐलान के बाद 16  नवंबर को शुरू हुआ लोकसभा का शीतकालीन सत्र विपक्ष के हंगामे की भेंट चढ़ गया. यानि हर दिन जनता से टैक्स में वसूला गया करोड़ों रुपया व्यर्थ में खर्च होता रहा. कुल मिला कर 114 घंटे चले इस सत्र में महज 20.8 घंटे काम हो पाया. नरेंद्र मोदी इस सत्र में केवल 3 दिन मौजूद रहे, लेकिन बोले आखिरी दिन यानी 16 दिसंबर को.

उन्होंने अपने अंतिम दिन के भाषण में यह कह कर खुद को इंदिरा गांधी से भी मजबूत और दृढ़ इच्छाशक्ति वाला प्रधानमंत्री बताने की कोशिश की कि 1971 में इंदिरा गांधी को नोटबंदी की सलाह दी गई थी. इस के जवाब में उन्होंने कहा था कि क्या कांग्रेस को चुनाव नहीं लड़ना? उन के लिए देश नहीं, पार्टी बड़ी है.

नरेंद्र मोदी शायद यह कहना चाहते थे कि उन के लिए देश बड़ा है, पार्टी नहीं. इसलिए उन्होंने 5 राज्यों पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर के चुनावों से पहले नोटबंदी का फैसला ले कर अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय दिया है. यानी उन के लिए पार्टी से बड़ा देश है और उन का नोट बंदी का फैसला देश हित में है. इस से पार्टी को नुकसान होता है तो हो. लेकिन इस बात को भाजपाई और देश ही नहीं पूरी दुनिया जानती है कि स्वर्गीय इंदिरा गांधी में जो दृढ़ इच्छाशक्ति थी, वह नरेंद्र मोदी तो क्या, किसी भी नेता में नहीं हो सकती. इसी दृढ़ इच्छाशक्ति की वजह से उन्होंने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान का धूल चटा कर उसे दो हिस्सों में बांट दिया था. इसी इच्छाशक्ति की बदौलत उन्होंने 1975 में इमरजेंसी लगाई और इसी इच्छाशक्ति से उन्होंने आपरेशन ब्लूस्टार जैसा कड़ा फैसला लिया, भले ही उन्हें काफी आलोचना भी झेलनी पड़ी और जान भी देनी पड़ी.

जीत के बाद भी क्यों नाखुश हैं कोहली!

कटक वनडे मैच में इंग्लैंड को 15 रनों से हराकर अपनी कप्तानी में पहली ही सीरीज जीतने वाले नए कप्तान विराट कोहली ने जीत पर खुशी तो जताई, लेकिन सलामी बल्लेबाजी और गेंदबाजी में कमी की ओर भी इशारा किया. साथ ही वह शीर्ष क्रम के प्रदर्शन से नाखुश दिखे.

भारत ने दूसरे वनडे में इंग्लैंड के सामने जीत के लिए 382 रनों का विशाल लक्ष्य रखा था, लेकिन इंग्लैंड ने दमदार प्रदर्शन करते हुए लक्ष्य के काफी करीब तक पहुंचे लेकिन मैच गवां बैठा.

बतौर कोहली, 'दो खिलाड़ी अश्विन और जडेजा ने इससे पहले टेस्ट श्रृंखला में दमदार प्रदर्शन किया था, आज भी उन्होंने आगे आकर मोर्चा संभाला और अगर सही समय पर वे हमें विकेट न दिलाते तो मुझे नहीं पता कि मैच का क्या हश्र होता. मैं सिर्फ यही कहना चाहूंगा कि हमने अपनी क्षमता का 75 फीसदी ही दिया.'

दरअसल टॉस हारकर बल्लेबाजी करने उतरी भारतीय टीम 25 के स्कोर तक तीन अहम विकेट गंवा चुकी थी. लेकिन इसके बाद युवराज सिंह (150) और पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी (134) ने तूफानी साझेदारी करते हुए टीम को बड़े स्कोर तक पहुंचाया.

कोहली ने युवराज सिंह और महेंद्र सिंह धोनी की शतकीय पारियों की तारीफ की. लेकिन वह शीर्ष क्रम के प्रदर्शन से नाखुश दिखे और उन्होंने कहा कि चैंपियन्स ट्रॉफी से पहले बेहतर संयोजन तैयार करने के लिए इंग्लैंड के खिलाफ तीसरा वनडे महत्वपूर्ण होगा.

कोहली ने कहा कि, 'हम यह सोच रहे थे कि अगर हम अच्छी शुरुआत करते तो हमारा स्कोर और क्या होता? भारत के दो शानदार बल्लेबाज खड़े थे और उन्होंने बेहतरीन पारी खेली. 25 रन पर तीन विकेट से 381 तक का स्कोर अद्भुत है. हमें पता था कि किसी न किसी समय हम विकेट हासिल कर लेंगे, लेकिन यहां गेंदबाजी करना बेहद कठिन काम था.

इस मैच में यूं तो महेंद्र सिंह धोनी की खूब चर्चा हो रही है, लेकिन युवराज सिंह की इस दमदार पारी के मायने ही कुछ अलग हैं. यह ऐसे क्रिकेटर की कहानी है जिन्होंने 2011 वर्ल्ड कप में अपने 'भगवान' (सचिन तेंदुलकर) का सपना पूरा करने में जी-जान लगा दिया और 'मैन ऑफ द टूर्नामेंट' भी बनें.

खुद को किया साबित

टीम इंडिया से बाहुर हुए तो पांच रणजी मैचों में 672 रन ठोक डाले. इस बीच हेजल कीच से सात फेरे लिए तो टीम इंडिया में आने का दरवाजा भी खुल गया.

वापसी के बाद दूसरे ही मैच में जब टीम इंडिया 25 रन पर तीन विकेट खोकर संघर्ष कर रही थी तो धमाकेदार पारी खेल एक बार खुद को साबित कर दिया. युवराज ने 150 रनों की पारी में 127 गेंदों का सामना किया. इस पारी में युवराज ने 21 चौके और तीन छक्के जड़े.

युवी की इस पारी की बदौलत भारत ने 50 ओवर में छह विकेट खोकर 381 रन बनाए. साथ ही युवराज ने साबित कर दिया कि जून में होने वाली आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी में टीम इंडिया की तैयारी पूरे शबाब पर है.

युवी पर कोहली का भरोसा

वैसे टी-20 टीम में वापसी के बाद युवराज को खास मौके नहीं मिले. एशिया कप और टी-20 वर्ल्ड कप में मिले मौके वैसे नहीं थे, जिसमें युवराज खुद को साबित कर सके.

इसी बीच विराट कोहली को जब वनडे और टी-20 टीम की कप्तानी मिली तो उन्होंने चयनकर्ताओं से साफ-साफ कहा, 'हमलोग मिडिल ऑर्डर में अकेले महेंद्र सिंह धोनी पर बोझ नहीं डाल सकते हैं.' मतलब साफ था कि हमें युवराज सिंह चाहिए.

यही वजह रही कि एक बार टीम इंडिया में युवराज सिंह ने कमबैक किया और फिर आगे की कहानी सबको पता है. पिछले छह साल में युवराज का यह पहला शतक है. 2011 के वर्ल्ड कप में युवराज ने वेस्ट इंडीज के खिलाफ 113 रनों की पारी खेली थी.

ये रिकॉर्ड भी युवी के नाम

इसी मैच में महेंद्र सिंह धोनी एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 200 छक्के जड़ने वाले दुनिया के पांचवें बल्लेबाज बने, जबकि युवराज सिंह ने इंग्लैंड के खिलाफ सर्वाधिक रन बनाने का सचिन तेंदुलकर का रिकॉर्ड अपने नाम किया.

धोनी ने 134 रन की पारी खेली और इस दौरान छह छक्के लगाए. अपना 285वां मैच खेल रहे धोनी के नाम पर अब 203 छक्के दर्ज हो गए हैं. वह यह उपलब्धि हासिल करने वाले पहले भारतीय और दुनिया के पांचवें बल्लेबाज हैं.

करियर का सर्वोच्च स्कोर

युवराज ने 150 रन बनाए जो उनके करियर का सर्वोच्च स्कोर है. वह इंग्लैंड के खिलाफ 150 रन की संख्या तक पहुंचने वाले पहले भारतीय बल्लेबाज हैं. अपनी इस पारी के दौरान युवराज ने इंग्लैंड के खिलाफ वनडे में अपने कुल रनों की संख्या 1478 रन पर पहुंचाई, जो नया रिकॉर्ड है.

युवराज ने तेंदुलकर (1455 रन) के रिकॉर्ड को तोड़ा. इनके बाद धोनी (1400 रन) का नंबर आता है. युवराज ने इंग्लैंड के खिलाफ चौथा शतक लगाकर विराट कोहली के तीन शतकों के रिकॉर्ड को भी तोड़ा.

उलटी पड़ी प्रधानमंत्री जनधन योजना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 अगस्त, 2014 को प्रधानमंत्री जनधन योजना शुरू की  थी, जिस के तहत देश के सभी प्राइवेट और सरकारी बैंकों को जीरो बैलेंस पर गरीब कमजोर लोगों के खाते खोलने का आदेश दिया गया. इस आदेश का पालन हुआ और जो बैंक 25 या 10 हजार रुपए से कम में खाता नहीं खोलते थे,उन्होंने भी जीरो बैलेंस पर खाते खोले, शहरों में भी, ग्रामीण क्षेत्रों में भी.

परिणामस्वरूप 1 जून, 2016 तक देश भर में 22 करोड़ जनधन खाते खुल गए. 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी से पहले तक इन में से अधिकांश खाते खाली पड़े थे लेकिन नोटबंदी होते ही इन खातों में पैसों की बहार आ गई.

आलम यह रहा कि गरीबों के इन खातों में 25 नवंबर, 2016 तक 64,250 करोड़ रुपए की रकम जमा हो गई थी. 

इन खातों के कई खातेदार तो करोड़पति बन गए हैं, लेकिन सिर्फ खाते में. क्योंकि यह रकम उन की अपनी नहीं है. उन्हें मिलेगा भी कुछ नहीं, क्योंकि उन के खातों में या तो बैंक की गलती से रकम आई या फिर दूसरों की हेराफेरी से.

बहरहाल, सरकार भले ही अपनी इस महत्त्वाकांक्षी योजना को ले कर अपनी पीठ थपथपाए, सब से ज्यादा काला धन इन्हीं खातों की बदौलत सफेद हुआ है, वह भी उस स्थिति में जबकि इन खातों की एक साल के ट्रांजैक्शन की लिमिट डेढ़ लाख रखी गई थी. अब ये ही खाते भाजपा सरकार के गले की फांस बन गए हैं.

दरअसल, काले धन के कुबेरों और कालाधन रखने वाले रसूखदार लोगों को यही खाते और इन के खातेदार सौफ्ट टारगेट लगे, इसलिए उन्होंने जनधन खाते वाले गरीब खाताधारकों को कमीशन की घुट्टी पिला कर उन के खातों के माध्यम से अपना काला धन सफेद करा लिया. शुरुआती दौर में जब पुराने नोटों के बदले नए नोट दिए जा रहे थे, तब भी गरीब कमजोरों का ही सहारा लिया गया.

जैसे तैसे नोटबंदी का कारवां आगे बढ़ा. कुल मिला कर स्थिति यह रही कि 1000 और 500 रुपए के पुराने नोटों के रूप में इन खातों में करीब 75 हजार करोड़ रुपए जमा हो गए. यह देख कर सरकार के भी होश उड़ गए कि गरीब और कमजोर लोगों के इन खातों में अचानक इतनी बड़ी रकम कहां से आ गई. यह करिश्मा नोटबंदी के बाद केवल 14 दिनों में ही शुरू हो गया था.

इन खातों में गड़बड़ी की आशंका के तहत सरकार ने मोटी रकम वाले खातों की रकम की जांच का फैसला कर लिया. साथ ही लोगों को अगाह भी कर दिया कि दूसरों की रकम अपने खातों में न जमा कराएं. वरना इनकम टैक्स की जांच में फंस जाएंगे.

हालांकि प्रधानमंत्री ने अपने एक भाषण में कहा कि जिन्होंने अपने जनधन खातों में दूसरों की रकम जमा कराई है, उन्हें वापस न लौटाए.

लेकिन प्रधानमंत्री की यह घोषणा इसलिए मायने नहीं रखती क्योंकि जनधन खाताधारकों ने थोडे़ से लालच में जिन लोगों की रकम जमा कराई है, वे दबंग और रसूख वाले हैं. वे अपना पैसा वापस लेने का माद्दा रखते हैं. अलबत्ता, इस मामले में कुछ खाता धारक जरूर कानूनी पचड़ों में फंस जाएंगे.    

17 संदेश जीवन को बेहतर बनाने के

जिंदगी में हम कई दफा उतने खुश नहीं रह पाते जितना रह सकते हैं. दरअसल, हम जीवन को उस के बेहतरीन रूप में नहीं स्वीकारते. कहीं न कहीं हम स्वयं ही इस के लिए जिम्मेदार होते हैं. यदि हम कुछ बातों का ध्यान रखें तो यकीनन हमारी जिंदगी पहले से कहीं ज्यादा खूबसूरत और मकसदपूर्ण  बन सकती है. जानिए, कुछ ऐसी ही बातें:

बच्चों से 17 साला की सी बातें करें

तुलसी हैल्थकेयर के डायरैक्टर, डा. गौरव गुप्ता कहते हैं कि जब आप के बच्चे 17-18 साल के हो जाएं तब उन के साथ मां की तरह नहीं, बल्कि एक बड़ी बहन की तरह व्यवहार करें. ऐसा करने से उम्र का अंतर खत्म हो जाएगा. उन के मन में आप के लिए सम्मान तो हो लेकिन वे बिना किसी झिझक के अपने दिल की बात आप से साझा कर सकें.

यह उम्र बड़ी नाजुक होती है. बच्चे युवावस्था की दहलीज पर कदम रख रहे होते हैं. उन में जोश तो भरपूर होता है, लेकिन जीवन की समझ उतनी नहीं होती. कई बार इस उम्र के बच्चे कुछ ऐसा कदम उठा लेते हैं, जिस के परिणाम गंभीर होते हैं. ऐसे में बहुत सावधानी की जरूरत है.

बच्चों पर अपनी बातें थोपें नहीं, बल्कि उन का नजरिया समझने की कोशिश करें. उन्हें आप के साथ व सुरक्षा की जरूरत है पर विकसित होने के लिए उन्हें पूरा स्पेस भी दें. 17-18 साल की उम्र के बच्चों की अपनी एक समझ विकसित

हो जाती हैं. उन्हें उन के तरीके से सोचने और काम करने दें, लेकिन उन्हें अच्छेबुरे का अंतर जरूर समझाएं.

17 साला मानसिकता जरूरी

डा. अतुल कहते हैं कि बड़े होने पर सामान्यतया हम जिंदगी के बनेबनाए नियम फौलो करने लगते हैं. इस से हमारी रचनात्मकता कहीं गुम हो जाती है. हमें सदैव यह याद रखना चाहिए कि हम सभी के अंदर एक बच्चा है, जो अपनी मनमानी करना चाहता है, नएनए तरीकों से हर तरह के काम करना चाहता है. आप किसी भी उम्र में हों, यही मानसिकता बनाए रखें. तभी आप के अंदर पहले जैसी ऊर्जा व उत्साह कायम रहेगा और आप एक बेहतर जिंदगी जी सकेंगे.

दिमाग व मन को रखें चुस्त

आप 25 के हों या 55 के, दिमाग और मन स्वस्थ रखना जरूरी है. दिमाग को चुस्त रखने के लिए नियमित रूप से मैंटल ऐक्सरसाइज करते रहें. समयसमय पर दिमाग को चैलेंज करें. नए शब्द, नई बातें सीखें. नया सीखने की ललक कायम रखें. कभीकभी काम से ब्रेक ले कर परिवार व दोस्तों के साथ कहीं घूमने निकल जाएं. खानपान पर ध्यान दें. सकारात्मक सोच रखें. मुसकराने की आदत डालें व सोशल बनें. फिजिकल ऐक्टीविटीज भी भरपूर करें.

17 घंटों का बेहतर प्रयोग करें

हम सामान्यतया दिन के 24 घंटों में से 7 घंटे सोने में गुजारते हैं. बचे हुए 17 घंटों को बेहतर उपयोग करने के लिए जरूरी है छोटीछोटी बातों का ध्यान रखना. मसलन:

– व्हाट्सऐप, फेसबुक, ईमेल वगैरह चैक करने का काम दोपहर में लंच टाइम में करें ताकि सुबह के वक्त जब आप की ऐनर्जी सब से अधिक होती है, जरूरी काम निबटा लें.

– कम समय में बेहतर काम करना चाहते हैं, तो घर या औफिस अपने काम की जगह को साफसुथरा व व्यस्थित रखें. इस से न सिर्फ जरूरी चीजें, फाइल्स, कागजात वगैरह ढूंढ़ने में समय की बरबादी नहीं होती वरन काम करने में मन भी लगता है.

– काम के साथसाथ शरीर को आराम भी दें. 90 मिनट काम के बाद 10 मिनट का ब्रेक आप को रिफ्रैश करने के लिए जरूरी है.

– हमेशा सभी के लिए उपलब्ध न रहें. न कहना भी सीखें. दुनिया की भीड़ से अलग किसी एकांत जगह पर कभीकभी सिर्फ अपने साथ रहें. मोबाइल, कंप्यूटर वगैरह बंद कर आत्मचिंतन करें, रचनात्मक काम करें.

– तनाव न लें. जितना समय हम दूसरों के साथ वादविवाद या काम बिगड़ने के तनाव में गुजारते हैं, उस से कम समय में हम बिगड़े काम और बिगड़े रिश्तों को सुधार सकते हैं.

औफिस में 17 साला जोश से करें काम

कहा जाता है कि 17 की उम्र का जोश कुछ अलग ही होता है, गलत नहीं है. यही वह उम्र है जिस में व्यक्ति अपनी प्राथमिकताओं को समझने लगता है और उन्हें पूरा करने की भरपूर कोशिश करता है. इस उम्र में वह अपने साधनों व लक्ष्यों को ले कर काफी उत्साहित रहता है. पर उम्र बढ़ने के साथसाथ व्यक्ति थोड़ा आलसी हो जाता है. वह बेमन से काम करने लगता है. यह उचित नहीं, इनसान को अपने अंदर 17 साला जोश और कुछ कर दिखाने का जज्बा सदैव कायम रखना चाहिए. तभी वह किसी भी उम्र में उपलब्धियों का आसमान छू सकेगा.

बजाय पुरानी पत्नी के 17 साला प्रेमिका बनें

उम्र बढ़ने के साथसाथ महिलाएं भौतिक सुखसुविधाएं  जुटाने व घरगृहस्थी के कामों में उलझ जाती हैं. घर व बच्चों की जिम्मेदारियों के बीच अपनी चाहत और जीवनसाथी के प्रति अपने प्रेम को प्रकट नहीं कर पातीं, पर यह रवैया सही नहीं. पतिपत्नी के रिश्ते में ताजगी बनाए रखना भी जरूरी होता है. अपनी फिटनैस पर ध्यान दें. शारीरिक व मानसिक रूप से फिट रहें. जिम जौइन करें. अपने लुक के साथ पहले की तरह ही नएनए ऐक्सपैरिमैंट करें. ट्रैंडी कपड़े और फुटवियर खरीदें. ऐसी किताबें पढ़ें, जो आप को प्रेरित करें. पति के साथ बीचबीच में चुहलबाजियां और रिश्तों की गरमाहट बनाए रखें.

खुश रहने की वजह ढूंढें

खुश रहना एक भावनात्मक और मानसिक प्रक्रिया है, जो आप की जिंदगी को खुशहाल बनाने में बहुत अहम भूमिका निभाती है.

खुश रहने का मतलब यह नहीं कि आप की जिंदगी में सब कुछ ठीक चल रहा है. इस का मतलब यह है कि आप अपनी परेशानियों को भूल कर भी खुशीखुशी जी सकते हैं. इस से आप को परेशानियों से लड़ने की शक्ति मिलती है. खुश रहने से इनसान को अपने आसपास की हर चीज अच्छी लगने लगती है, जिस से उस के मन के नकारात्मक खयाल दूर भागने लगते हैं और वह एक बेहतर जिंदगी जी सकता है.

खुश रहने के कारण ढूंढ़ें.

बड़ी खुशियां ही नहीं, छोटीछोटी खुशियां भी महसूस करें.

 

खुश रहें, सोचें कि आप के पास किसी चीज की कमी नहीं. हाथपैर सहीसलामत हैं, दोस्त नातेरिश्तेदार हैं, घर है, पैसा है, बच्चे हैं,

 

कामधंधा है, तो फिर क्यों न अपने पास जो चीजें हैं, उन्हीं में खुश रहें.

 

दोस्तों के साथ करें 17 साला मस्ती

 

क्लीनिकल साइकोलौजिस्ट डा. अतुल कहते हैं, ‘‘जैसेजैसे हमारी उम्र बढ़ती है, हमारी जिम्मेदारियां भी बढ़ने लगती हैं. कम उम्र में जिस तरह से हम खुल कर दोस्तों से अपने मन की बात कहते थे, घूमतेफिरते, हंसीमजाक करते थे, उस से हमें नई ऊर्जा मिलती थी. मगर समय के साथ सब छूटता चला जाता है.’’

 

पुराने दास्तों के साथ उसी बेफिक्री के साथ मिल कर देखिए. यह एक थेरैपी की तरह आप को नई ऊर्जा और फ्रैश फीलिंग से भर देगा और आप का जिंदगी को देखने का नजरिया बदल जाएगा.

 

पति को 17 साला ढांचे में रखें

 

पति की सेहत, रूटीन, पहनावे व खानपान का ध्यान आप को ही रखना है. प्रयास करें कि उन्हें पौष्टिक भोजन दें. शुगर/कोलैस्ट्रौल बढ़ाने वाली चीजों से परहेज कराएं. सही समय पर सारे काम करने को प्रेरित करें. उन के लिए ऐसे सलीकेदार पहनावे चुनें, जिस से वे स्मार्ट व सौम्य दिखें. ऐक्सरसाइज व अधिक से अधिक पैदल चलने के लिए प्रेरित करें.

 

17 की तर्कशीलता जरूरी

 

इस संदर्भ में क्लीनिकल साइकोलौजिस्ट डा. अतुल कहते हैं, ‘‘कम उम्र में हम किसी भी बात को सहजता से नहीं स्वीकारते. हम इस पर गहराई से विचार करते हैं कि क्या सही है और क्या गलत. सामाजिक बंधनों व रीतिरिवाजों को तोड़ कर वही करते हैं, जो हमें सही लगता है. किसी भी बात को तर्क की कसौटी पर जांचते हैं.

 

‘‘मगर उम्र बढ़ने के साथसाथ हम बातों को जैसा है, वैसा ही मानने लगते हैं. कम उम्र में हमें अधिक अनुभव नहीं होता पर उम्र बढ़ने के साथसाथ अनुभव और ज्ञान बढ़ते जाते हैं. ऐसे में हमें बैलेंस रखना होगा. अनुभव के साथ हम तर्क का प्रयोग भी करें, तो पुरातनपंथी सोच से किनारा करते हुए अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं.’’

 

17 तरीकों से परिवार में आएं खुशियां

 

– औफिस से घर लौटते वक्त कभीकभी खानेपीने की चीजें या बच्चों के लिए खिलौने वगैरह ले लें.

 

– जीवनसाथी को बीचबीच में सरप्राइज गिफ्ट देते रहें.

 

– परिवार के साथ कभी अचानक घूमने जाने का प्रोग्राम बनाएं.

 

– परिवारिक झगड़े का समाधान प्रेमपूर्वक करें.

 

– हर सदस्य को परिवार में उस के स्थान और उपयोगिता का एहसास कराएं.

 

– छुट्टियों का वक्त मोबाइल/इंटरनैट/दोस्तों के साथ बिताने के बजाय परिवार के साथ बिताएं.

 

– परिवार में सभी को एकदूसरे की इज्जत करने का पाठ पढ़ाएं.

 

– कभीकभी घर में खाना बनाने के बजाय खाना और्डर करें और घर में ही पार्टी का माहौल बनाएं.

 

– घर के हर सदस्य के जन्मदिन या अन्य खास मौकों को यादगार बनाएं.

 

– घर पहली पाठशाला है. बच्चों को ईमानदारी और संस्कार की अहमियत सिखाएं.

 

– घर के बुजुर्गों का सम्मान करें.

 

– टीवी देखने का समय निर्धारित कर दें.

 

– घर में अुनशासन रखें.

 

– रिश्तेदारों के यहां सीमित आनाजाना रखें.

 

– लड़केलड़की में भेद न करें.

 

– कोई समस्या आने पर घर के सभी सदस्यों से शेयर करें और उन की राय लें.

 

– घर में सभी को बचत करने की आदत डालें.

 

रिश्तों में करें निवेश

 

जिंदगी में हम नहीं जानते, कब कौन हमारे काम आ जाए. इसलिए बिना लाभहानि की परवाह किए, जितना हो सके, दूसरों के साथ रिश्ते को प्रगाढ़ करें. महीने में एक बार ही सही, पर अपने रिश्तेदारों को याद जरूर करें. दास्तों के काम आएं और अनजानों की भी मदद करें.

 

सीखें हर पल कुछ नया

 

सीखने की कोई उम्र नहीं होती, जिंदगी में जब मौका मिले, कुछ नया सीखने से गुरेज नहीं करना चाहिए. आज के समय के युवाओं की तरह समय के साथ नईनई तकनीकों से दोस्ती कीजिए और देखिए, कैसे आप को छोटेबड़े कामों के लिए अपने बच्चों/पति का मुंह नहीं देखना पड़ेगा.

 

डा. अतुल कहते हैं कि हालफिलहाल नोटबंदी की स्थिति में सभी के लिए जरूरी हो गया है कि वह कैशलैस ट्रांजैक्शन के तरीके सीखे. यह आज के समय की मांग है. पर आज यदि इस से जुड़ी जानकारियां और बारीकियां समझने का प्रयास यह सोच कर नहीं करेंगी कि इस उम्र में इन लफड़ों व झंझटों में कौन पडे़, तो यह आप की गलत सोच है. आप इसे अपनाएंगी, तो आप की ही जिंदगी आसान हो जाएगी.

 

जब बच्चे 17 के होने लगे

 

प्राइमस सुपर स्पैशियालिटी हौस्पिटल के डा. संजू गंभीर कहते हैं कि यह बहुत जरूरी है कि जब आज के बच्चे 17 के होने लगें, तब आप उन से अच्छे से जुडे़ रहें क्योंकि यही उम्र होती है, जब बच्चे सही और गलत के बीच फर्क नहीं कर पाते. ऐसे में यदि किसी बड़े का साथ हो तो बहुत अच्छा होता है.

 

खुद के साथ समय बिताएं

 

कभीकभी किसी ऐसी जगह जा कर बैठें, जहां कोई आप को डिस्टर्ब न कर सके. अपने मोबाइल/कंप्यूटर वगैरह बंद कर दें और फिर शांत मन से आगे का प्लान सोचें.   

 

17 बातें जो जीवनसाथी से कभी न कहें

 

– आप की ड्रैसिंग सैंस अच्छी नहीं.

 

– तुम से नहीं होगा, छोड़ो मैं कर लूंगी.

 

– तुम मेरी थोड़ी भी केयर नहीं करते.

 

– देखो न मैं मोटी हो गई हूं.

 

– मुझे तुम से शादी करनी ही नहीं चाहिए थी.

 

– मुझे तुम्हारे दोस्त अच्छेनहीं लगते.

 

– नौकरी कब बदलोगे.

 

– व्हाट इज रौंग विद यू.

 

– रुको, मैं बताती हूं, यह काम कैसे करना है.

 

– डोंट टच मी, दूर रहो.

 

– काश, तुम थोड़ा ज्यादा कमा रहे होते.

 

– मेरा ऐक्स मेरे लिए हमेशा मेरी पसंद की साड़ी लाता था. मेरी चौइस की बहुत परवाह थी उसे.

 

– तुम बिलकुल अपने पिता जैसे जिद्दी हो.

 

– यदि तुम सचमुच मुझ से प्यार करते, तो ऐसा नहीं करते.

 

– मेरी मां ने पहले ही वार्निंग दी थी कि तुम से निभ नहीं सकती.

 

– तुम्हारी मां कितना बोलती हैं.

 

– तुम्हारी बहनों ने मेरी जान खा ली है.

 

17 चीजें जिन से दूर रहें

 

इन 17 चीजों को घर और मन से दूर रखना जरूरी है:

 

1. ईर्ष्या

 

2. क्रोध

 

3. पछतावा

 

4. नकारात्मक सोच

 

5. टालने की प्रवृत्ति

 

6. चिंता

 

7. चुगलखोर दोस्त

 

8. बुराइयां निकालने वाले लोग

 

9. हतोत्साहित करने वाले लोग/रिश्तेदार

 

10. अंधविश्वासी सोच

 

11. झूठा दंभ

 

12. कृतघ्नपूर्ण व्यवहार

 

13. हारने का खौफ

 

14. अनिश्चय की स्थिति

 

15. गलत सोच वाले व्यक्ति का साथ

 

16. फुजूलखर्ची

 

17. प्रतिकार की भावना

 

विंटर वैडिंग के लिए ब्राइडल ड्रैसेज

शादीब्याह की तैयारी में दुलहन की ड्रैस भी अहम स्थान रखती है. लेटैस्ट फैशन, बढि़या डिजाइन, बजट, कलर सभी चीजों को ध्यान रख कर अपने लिए ब्राइडल वियर चुनती हैं. हर साल की तरह इस साल भी दुलहनों के लिए ब्राइडल वियर में नया क्या है, इस बारे में बता रही हैं फैशन डिजाइनर अनुभूति जैन.

लहंगाचोली: यह स्टाइल विंटर्स के लिए बिलकुल नया और इन है. दुलहन के लिए यह बहुत कंफर्टेबल भी है. यह आउटफिट स्पैशली उन दुलहनों के लिए है,

जो ठंड के मौसम में गरम रहना चाहती हैं. इस में ब्लाउज के साथ यह लौंग या शौर्ट जैकेट होती है. इस जैकेट के किनारों पर लहंगे जैसी ही बहुत सुंदर ऐंब्रौयडरी हकी होती है, जो इसे और भी रौयल बनाती है.

लहंगा विद टेल: इस लहंगे में लहंगे का घेर पीछे से बहुत ज्यादा होता है. वह पीछे से जमीन को टच करता होता है. इसे पीछे से किसी को पकड़ कर चलना पड़ता है और यही चीज दुलहन की चाल में नजाकत और एक अदा लाती है.

जैकेट लहंगा: यह बहुत कुछ शरारे जैसा होता है और इस में लहंगे के ऊपर एक हैवी जैकेट होती है जोकि पूरे लहंगे को हैवी लुक देती है. यह जैकेट लहंगे के कलर की या फिर कंट्रास्ट भी हो सकती है.

नैट का लहंगा: यदि आप के पसंदीदा रंगों में से पिंक एक है, तो आप के लिए नैट का लहंगा जिस पर महीन हस्त कारीगरी से डिजाइन बनाए  गए हों बेहद खूबसूरत लगेगा. इस के साथ फुल बाजू की कोटी अच्छी लगेगी. इस पर गोल्डन तार से काम किया जाता है, जो लहंगे को सोने जैसी चमक देता है.

लहंगा विद मिरर ऐंड क्रिस्टल: इस पूरे लहंगे पर मिरर और क्रिस्टल का काम होता है, जिस से इस की चमक कई गुना बढ़ जाती है. इस दिन दुलहन सब से अलग दिखना चाहती है. अत: इस काम का लहंगा भी लिया जा सकता है.

लौंग स्लीव्स लहंगा: विंटर की दुलहन के लिए यह अच्छा औप्शन है. इस में नैट या फिर सिल्क की स्लीव्स हो सकती हैं. डैस्टिनेशन वैडिंग के लिए भी यह परफैक्ट है. इस लहंगे में ऐंब्रौयडरी नीचे की तरफ होती है वही काम स्लीव्स पर भी होता है.

वैल्वेट का लहंगा: वैल्वेट का लहंगा एक बार फिर इन है. इस पर पैच वर्क होता है, जो कि अधिकतर गोल्डन कलर में किया जाता है. मैरून रंग के लहंगे पर गोल्डन कलर का पैच वर्क खूब फबता है.

रिसैप्शन के लिए: अगर आप को अपनी शादी के बाद रिसैप्शन में ग्लैमर और लीक से हट कर कुछ चाहिए तो आप गोलडन कलर की साड़ी पहनें. इस कलर की साड़ी के साथ सुविधा यह होती है कि इस में आप ज्वैलरी के साथ ऐक्सपैरीमैंट कर सकती हैं. इस के अलावा रौयल और कंटैंपररी लुक के लिए रा सिल्क, जरदोजी में नीले रंग की साड़ी इस मौके पर अच्छी रहेगी. अपने लुक को और भी बोल्ड और ब्राइट बनाने के लिए इस में पीला या लाल रंग भी जोड़ें या फिर अलग से चुन्नी. इन कलर की साड़ी के साथ मिक्स ऐंड मैच कर सकती हैं. गोटापट्टी वर्क की प्योर शिफौन साड़ी वैसे तो हलकी होती है, लेकिन अपने हैवी गोटापट्टी के काम की वजह से इस फंक्शन के लिए खूब हैवी लगेगी. इस के अलावा बनारसी सिल्क साड़ी भी दुलहन पर खूब फबती है, क्योंकि इस का लुक सब से हट कर होता है.

दुलहन नए रंग भी ट्राई करें. जब बात शादी की आती है तो दुलहन अकसर एक ही रंग पहनती है और वह है रैड. लेकिन बदलते समय के साथ दुलहन के लहंगे का कलर भी बदलने लगा है. अब दुलहनें ऐक्सपैरीमैंट करने से घबराती नहीं हैं वे अलगअलग रंगों के साथ प्रयोग कर रही हैं. वे पेस्टल से ले कर न्योन तक हर रंग के लहंगे ट्राई कर रही हैं. लेकिन आप फिर पारंपरिक रैड मैरून रंग से किसी भी तरह का समझौता नहीं करना चाहतीं और वही पहनना चाहती हैं, तो उस में दुपट्टा या चोली अलग रंग की ले कर एक नया कलर कौंबिनेशन फ्यूजन के जरीए बना सकती है. बबलगम पिंक, स्काई ब्लू, लाइट ग्रीन, लीफ ग्रीन, औरेंज, रैड, पंपकिन औरेंज, गोल्डन आदि कलर ट्राई कर सकती हैं.

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