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एक्टिंग के लिये मुश्किल था घर वालो को राजी करना

मुम्बई की रहने वाली सोनाली निकम के परिवार में कोई भी एक्टिंग की फील्ड में नहीं था. उनके पिता पुलिस ऑफिसर हैंऔर मम्मी हाउस वाइफ. ऐसे में एक्टिंग की फील्ड में जाना सरल नहीं था. 12वी की पढ़ाई के बाद सोनाली को कुछ विज्ञापन शूट करने का ऑफर मिला. यहां से उसने सोचा की उसे एक्टिंग की फील्ड में जाना चाहिये. सोनाली के लिये सबसे मुश्किल काम अपने पिता को इसके लिये राजी करना था. इस बीच 2009 में जीटीवी पर उसे ‘गोद भराई’ सीरियल में काम मिल गया. इसमें उसकी एक्टिंग और काम को देखकर पिता ने आगे एक्टिंग में करियर बनाने के लिये हां कर दिया. 8 साल के अपने एक्टिंग कैरियर में सोनाली निकम ने पत्नी, बहू और भाभी जैसे हर किस्म के घरेलू किरदार को निभा लिया है. एंड टीवी के फिक्शन शो ‘एक विवाह ऐसा भी’ में सोनाली विधवा बहू का किरदार निभा रही हैं.

8 साल के करियर में सोनाली ने बड़े नाम वाले कम से कम 10 सीरियलों में अलग-अलग तरह के रोल किये पर उसकी वह पहचान अभी भी बननी बाकी है, जिसके लिए एक एक्ट्रैस तरसती है. एक सीधी-साधी भूमिका वाले किरदार ही सोनाली के खातें में आते हैं. इस बारे में सोनाली कहती हैं ‘मेरी पहचान शुरू से ही इस तरह की भूमिकाओं वाली बन गई है. मेरे अपने दर्शक मुझे पहचानते हैं. सबसे अच्छी यह बात है कि जो परिवार मुझे एक्टिंग की फील्ड में भेजना नहीं चाहता था वह अब मेरी एक्टिंग को पसंद कर रहा है. उसे भी अब यह अच्छा लग रहा है.’

सोनाली को डांस करना, गाने गुनगुनाना अच्छा लगता है. उसे खाने पकाने का भी अच्छा शौक है. वह हर फेस्टिवल को बहुत धूमधाम से मनाना चाहती है.

क्या टीवी ने उसको केवल घरेलू भूमिका में टाइप्ड कर दिया है?

इस विषय में सोनाली कहती हैं ‘ऐसा नहीं कह सकते. मैंने अपने हर शो में अलग तरह के किरदार निभाये है. आगे भी मेरा प्रयास है कुछ अलग कर दर्शकों का दिल जीत सके. मुझे फिल्मों के रोल भी ऑफर हुये है. अगर कोई अच्छा किरदार मिला तो मैं जरूर उसे करूगी. मुझे अपने पर भरोसा है. जिस भी तरह का रोल होगा मैं उसके साथ पूरा इंसाफ करूगी.’

विधवा विवाह पर अपनी सोंच जाहिर करते सोनाली कहती है ‘विधवा विवाह को समाज में स्वीकृति मिलनी चाहिये. विधवा होना किसी दुर्घटना सा है. इसमें लड़की की कोई गलती नहीं होती. सजा सबसे अधिक उसे ही मिलती है. उसे उपेक्षा के भाव से देखा जाता है. अगर उसके बच्चे या कुछ और जिम्मेदारियां है तो दूसरी शादी भी मुश्किल हो जाती है. काफी कुछ हलात बदल रहे है. इसके बाद भी अभी विधवा विवाह को लेकर सोच दकियानूसी है. इसे बदलना जरूरी है. इसको लगातार सामने ला कर बदलने की कोशिश जारी करनी पडेगी.’

औरत तांत्रिकों का बढ़ता नैटवर्क

भूतप्रेत, टोनाटोटका व पेट से न होने के नाम पर झाड़फूंक की दुकान चलाने वाले ठग तांत्रिकों के निशाने पर ज्यादातर औरतें ही रही हैं, क्योंकि उन को तमाम ऐसी अंदरूनी व दिमागी बीमारियां होती हैं, जिन को ठग तांत्रिक ऊपरी साया बता कर आसानी से बेवकूफ बना देते हैं. इन पाखंडी तांत्रिकों के जाल में फंस कर औरतें न केवल खुद की सेहत के साथ खिलवाड़ करती हैं, बल्कि अपना पैसा, समय और इज्जत भी गंवा बैठती हैं. कभीकभी ऐसी औरतों के साथ हमबिस्तरी का वीडियो बना कर शातिर तांत्रिक उन्हें ब्लैकमेल भी करते हैं. झाड़फूंक के नाम पर बाबाओं के पास जाने वाली औरतों में ज्यादातर दलित व पिछड़े तबके की औरतें होती हैं, जिन के मन में बचपन से ही यह भर दिया जाता है कि इन की हर समस्या की वजह ऊपरी साया व टोनाटोटका ही है. ऐसे में ढोंगी तांत्रिकों द्वारा खास तरह की पूजा का ढोंग किया जाता है. इस दौरान ये बाबा औरतों की इज्जत लूटने में कोई गुरेज नहीं करते हैं.

ढोंगी बाबाओं द्वारा इज्जत के साथ खिलवाड़ किए जाने के मामलों में औरतें इसलिए विरोध नहीं कर पाती हैं, क्योंकि उन्हें यह भरोसा होता है कि हो सकता है कि बाबा के साथ हमबिस्तरी से ही उन की गोद भर जाए. किसीकिसी मामले में लोकलाज के डर से भी औरतें अपने साथ हुई ज्यादती की बात छिपा जाती हैं, लेकिन झाड़फूंक के नाम पर कई औरतों के साथ सैक्स करने की वजह से इन बाबाओं को भी इन्फैक्शन व एड्स जैसी बीमारियां लग जाती हैं, जो औरतों में भी आ जाती हैं. चूंकि अब झाड़फूंक के नाम पर पाखंडी तांत्रिकों द्वारा औरतों के साथ हमबिस्तरी के कई मामले सामने आ रहे हैं, ऐसे में मर्द अपने घर की औरतों को उन के पास ले जाने में कतराने लगे हैं. औरतों की तादाद में आई कमी को देखते हुए बाबा भी अपने इस धंधे को चलाने के लिए दूसरा जरीया ढूंढ़ने लगे हैं. वे औरतों को विश्वास में लेने के लिए अपने घर की औरतों या चेलियों को आगे कर उन्हें बड़ा तांत्रिक साबित कर रहे हैं, ताकि धंधा चलता रहे.

औरत तांत्रिकों की तादाद व उन की कमाई में इजाफे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के नामीगिरामी टैलीविजन चैनलों, अखबारों व पत्रपत्रिकाओं में महंगेमहंगे इश्तिहार छपवा कर बड़ी से बड़ी समस्याओं के समाधान का दावा किया जा रहा है.

आसानी से झांसे में

औरत तांत्रिकों द्वारा पीडि़त औरतों को आसानी से झांसे में ले लिया जाता है, क्योंकि ये तांत्रिक उन से जुड़ी अंदरूनी व घरेलू समस्याओं को आसानी से समझती हैं. यहां तक कि हमबिस्तरी की बातों को भी उगलवाने में वे कामयाब होती हैं. इस के बाद झाड़फूंक के नाम पर पीडि़त औरतों का जिस्मानी, माली व दिमागी शोषण शुरू हो जाता है.

मर्द तांत्रिकों की चाल

झाड़फूंक के नाम पर ठगी की दुकान चलाने वाली औरत तांत्रिकों के पीछे शातिर किस्म के मर्दों का हाथ होता है. ऐसे में जब कोई पीडि़त औरत पेट से न होने की समस्या ले कर इन तांत्रिकों के पास पहुंचती है, तो ये उन के ऊपर दुष्ट आत्मा का साया बता कर उसे नष्ट करने के लिए विशेष पूजा, अनुष्ठान वगैरह कराने की सलाह देती हैं. अंधविश्वास में जकड़ी औरतें बच्चा पाने की चाह में इन तांत्रिकों पर आसानी से आंखें मूंद कर विश्वास कर लेती हैं और फिर तय समय पर ये तांत्रिक अकेले में अनुष्ठान के नाम पर उन्हें बुलाते हैं. पेट से होने के लालच में औरत के परिवार वाले भी उसे पूजा के नाम पर अकेला छोड़ देते हैं. इस की वजह यह भी होती है कि झाड़फूंक करने वाली एक औरत होती है, जिस से इज्जत लुटने का खतरा नहीं हो सकता, लेकिन ये औरत तांत्रिक ऐसे अनुष्ठान उन कमरों में करती हैं, जहां घुप अंधेरा होता है.

झाड़फूंक के दौरान पीडि़ता को नशीली दवा मिला कर प्रसाद दे दिया जाता है, जिस से वह अपनी सुधबुध खो बैठती है. इस के बाद हवस के भूखे औरत तांत्रिक के गुरु व परिवार के मर्द उस की इज्जत लूट लेते हैं. अगर इज्जत लूटने वाले के वीर्य में बच्चा पैदा करने की कूवत होती है, तो वह पीडि़ता पेट से हो जाती है. चूंकि झाड़फूंक के दौरान वह अपने होश में नहीं होती है, ऐसे में उसे यह नहीं पता चल पाता कि उस के पेट से होने का राज क्या है और वह तांत्रिक की चमत्कारी शक्तियों का असर मान कर उस की मुरीद बन बैठती है. कभीकभार अगर बाबाओं द्वारा इज्जत से खिलवाड़ के मामले में पीडि़ता होश में आ भी जाती है, तो वह इस वजह से खुल कर विरोध नहीं कर पाती कि हो सकता है कि उसे बाबा की वजह से ही बच्चे का सुख मिल जाए और उसे बांझपन के ताने से नजात मिल जाए.

इश्तिहारों पर बेहिसाब खर्च

झाड़फूंक से होने वाली मोटी कमाई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि औरत तांत्रिकों के बड़ेबड़े इश्तिहार टैलीविजन चैनलों, अखबारों व पत्रपत्रिकाओं में दिखाए व छापे जाते हैं, जिस के लिए औरत तांत्रिकों द्वारा भारीभरकम रकम का भुगतान किया जाता है, जो झाड़फूंक के दौरान कई गुना के रूप में वापस आ जाती है. देश की नामीगिरामी पत्रिका में छपे एक औरत तांत्रिक के इश्तिहार का मजमून इस तरह था: ‘फ्री… फ्री… फ्री…’ समस्या कैसी भी हो, जड़ से खत्म. 5 घंटे में समस्या का समाधान. सौ फीसदी गारंटी.  गुरु मां गायत्री देवी घर बैठे गारंटी समाधान. एक औरत ही औरत का दुख समझती है. कृपया दुखी माताएं व बहनें ही फोन करें. धोखा नहीं पक्का वादा. मैं कहती नहीं कर के दिखाती हूं केवल एक फोन ही आप के जीवन की दिशा व दशा बदल सकता है, ब्लैक मैजिक व ब्लैकमेलिंग से परेशान अवश्य फोन करें.

लव मैरिज, कारोबार, विदेश में रिश्ता करवाना, सौतन दुश्मन से छुटकारा, जिस को चाहोगे तुरंत वश में कर के दूंगी, काम नहीं होने पर पैसा वापस. नोट: आप का पति, प्रेमी, बेटा किसी के वश में हो, प्यार में धोखा, निराश प्रेमीप्रेमिका, एक बार अवश्य फोन करें, लाटरी, सट्टा नंबर हासिल करें. स्थायी पता चंडीगढ़ मोबाइल नंबर 0988895×××. दुख की बात है कि इस तरह के इश्तिहारों में लोग फंस कर लुटने को तैयार बैठे होते हैं.

सभी बनते हैं शिकार

इन औरत तांत्रिकों के पास पढ़ेलिखे व अनपढ़ लोग समान रूप से ठगी का शिकार बनते हैं. क्योंकि इन के मन में बचपन से ही भूतप्रेत व ऊपरी साए के प्रति इस तरह का डर बिठा दिया जाता है, जिसे वे मन से नहीं निकाल पाते हैं. इस तरह का एक उदाहरण गोंडा व बस्ती जिले की सीमा से लगने वाले मेहदिया ढडौवा गांव में देखने को मिला, जहां दिल्ली से 8 सौ किलोमीटर की दूरी तय कर बीएड पास एक औरत ‘बड़की माई’ नाम से विख्यात किस्मती देवी नाम की अनपढ़ औरत तांत्रिक के पास झाड़फूंक कराने आई थी. इस औरत की समस्या यह थी कि इसे शादी के 6 साल बाद भी बच्चे नहीं पैदा हो रहे थे. अंधविश्वास की शिकार इस औरत को विश्वास था कि यहां आने से उस की यह मुराद पूरी होगी. यहां हर सोमवार व शुक्रवार को झाड़फूंक कराने के लिए ऐसे तमाम लोग आते हैं, जो पढ़ेलिखे होते हैं, लेकिन अपनी आंखों पर चढ़े अंधविश्वास के चश्मे के चलते ठगी का शिकार होते हैं.

यहां एक दिन में तकरीबन 50 हजार लोगों की भीड़ इकट्ठा होती है. ऐसे में अगर हर पीडि़ता से 10 रुपए की औसत कमाई को देखा जाए, तो भी यह हफ्ते के 2 दिनों को मिला कर 10 लाख रुपए आसानी से इकट्ठा कर लेती है. इसी तरह की झाड़फूंक की दुकान चलाने वाली बडगो गांव की पिछड़े तबके की एक अनपढ़ औरत काली माई के नाम पर झाड़फूंक का धंधा चलाती है, जहां रोजाना हजारों की तादाद में लोग बेवकूफ बनने चले आते हैं.

महज कोरी कल्पना

बस्ती जिला चिकित्सालय में डाक्टर वीके वर्मा का कहना है कि भूतपे्रत, तंत्रमंत्र व ऊपरी साया महज कोरी कल्पना है. इस की वजह न तो कभी थी और न है, बल्कि सदियों से पोंगापंथ की दुकान चलाने वाले लोगों ने जनता के मन में इस तरह का वहम बिठा कर उन्हें लूटने का जरीया बनाया है  डाक्टर वीके वर्मा के मुताबिक, बचपन में भूतप्रेतों की कहानियां, डरावनी फिल्में देखसुन कर लोग मन में यह वहम पाल बैठते हैं कि हमारे आसपास भी बुरी आत्माएं मौजूद होती हैं, जिन की जद में हम कभी न कभी आ ही जाते हैं, लेकिन यह मन का वहम  होता है, क्योंकि बुरी आत्माओं व तंत्रमंत्र का वजूद है ही नहीं. कैटाटोनिया व साइकोसिस जैसी बीमारियों के चलते औरतें अजीबोगरीब हरकतें करना शुरू कर देती हैं, जिसे घर के लोग आत्माओं का साया मान बैठते हैं. वहीं गर्भाशय में गांठ होना, प्रजनन अंगों में संक्रमण वगैरह के चलते पेट से न होने की समस्या जन्म लेती है, जिसे पाखंडी तांत्रिक भूतप्रेत का साया साबित कर देते हैं.

वकील कृष्ण कुमार उपाध्याय का कहना है कि झाड़फूंक करने वाला चाहे औरत हो या मर्द दोनों ही जुर्म में बराबर के भागीदार होते हैं. ऐसे में लोगों को भूतप्रेत व झाड़फूंक के नाम पर उन का शोषण करना और कभीकभी समस्या के समाधान के लिए तांत्रिकों द्वारा नरबलि के लिए उकसावा देना अपराध की श्रेणी में आता है. इन बाबाओं पर धोखाधड़ी, छलप्रपंच, हत्या या हत्या की कोशिश आदि धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर इन्हें जेल भेज देना चाहिए, जिस से अंधविश्वास को फैलने से रोका जा सके.

गंदगी का आलम

गंदगी हमारे देश में लोगों के जीवन का इतना बड़ा हिस्सा बनी हुई है कि यहां साफसफाई को जीवन में दखल मान लिया जाता है. दिल्ली की जामिया कालोनी के पास के एक रिहायशी कौंप्लैक्स की औरतों ने खुद पैसा जमा कर, खुद मजदूरों के साथ मिल कर एक गली की सफाई कराई, तो वहां खड़ी होने वाली गाडि़यों के मालिकों और वहां रोज कूड़ा फेंकने वालों ने साफसफाई करने पर न सिर्फ झगड़ा किया, 2 सौ लोगों को जमा कर साफ की गई जगह को गंदा कर डाला.

गरीबी और गंदगी आमतौर पर साथ चलती हैं. दुनिया के सभी गरीब देश या अमीर देशों के गरीब इलाके गंदे ही रहते हैं. सड़कोंगलियों पर कूड़ा, टूटे शीशे, मैले मकान, बिखरे डब्बे, गंदभरी नालियां, बदबूदार माहौल आंखों को ही नहीं सुहाता, बल्कि वह बीमारियां भी पैदा करता है और लोग आमतौर पर आधाअधूरा काम करते हैं. अब गंदगी गरीबी को पैदा करती है या इस का उलटा होती है, इस चकरघिन्नी में न पड़ कर समझा जाना चाहिए कि गरीबी हटाना आसान नहीं है, पर गंदगी हटाना बेहद आसान है. हमारे हिंदू धर्म में गंदगी को ही जाति के भेदभाव का तरीका बताया गया है, पर आज जब नीची जातियां, जिन में गरीब पिछड़े, दलित, गरीब मुसलिम व ईसाई शामिल हैं, गंदगी के खिलाफ मुहिम अपनी ओर से शुरू करें. सरकार ने तो 2 साल पहले स्वच्छ भारत का नाटक कर के छोड़ दिया था और अब नोटबंदी कर के गरीबों पर और गरीबी थोप दी है, पर सरकार या ऊंची जातियां और धर्म की जाति व्यवस्था का इस्तेमाल गंदगी थोपने के लिए नहीं कर सकतीं. गंदगी हटा कर गरीबी में शान से जीने लायक बनाया जा सकता है.

गंदगी हटाने के लिए बहुतकुछ नहीं करना होता. यह ठीक है कि हमारे देश में गंदगी फेंकने की जगहें आसानी से नहीं मिलतीं. गलियों और महल्लों से कूड़ा हटा कर ले जाना आसान नहीं है. पहले घोड़ागाड़ी, बैलगाड़ी मिल जाते थे, जो सस्ते में कूड़े को हटा देते थे. अब ट्रक लगाने पड़ते हैं, पर उन का इंतजाम करना और उन्हें चलाना मुश्किल है. शहरी निकायों, पंचायतों के पास ये हों तो भी मुश्किल से मिलते हैं, क्योंकि या तो खराब रहते हैं या चलाने वाले निकम्मे बने रहते हैं. यह एक तरह से साजिश का हिस्सा है. शहरों की बात हो या कसबोंगांवों की, अमीर लोगों की इच्छा रहती है कि साफसफाई और गंदगी एक लाइन की तरह इस्तेमाल हो–जाति दिखाने की. गंदगी का मतलब है नीची जाति. अफसोस यह है कि बराबरी की मांग करने वाली नीची जातियां महात्मा गांधी की शुरू की गई सफाई का मतलब नहीं समझीं. महात्मा गांधी सफाई से जाति की खाई को पाटना चाहते थे, पर गंदगी में रहने को आदी हो गए नीची जातियों के लोगों ने गंदगी को तमगा बना कर सीने से लगा लिया, इसीलिए दिल्ली की मुसलिम गरीब बस्ती में सफाई को जाति व्यवस्था पर हमला समझ लिया. समाज का पिछड़ों का ही एक वर्ग नहीं चाहता कि उन से निचले सफाई को अपनाने की जुर्रत करें.

पैठणी साड़ी के नए अंदाज

2 हजार साल पुरानी महाराष्ट्र की पैठणी साड़ी को ‘साडि़यों की रानी’ कहा जाता है. हर दुलहन के पास ऐसी साड़ी उस के वार्डरोब में अवश्य देखने को मिलती है. यह साड़ी हर महिला को किसी भी रूप में पसंद है. बदलते समय के  साथ इस के रंग, पैटर्न और पहनावे में अंतर आया पर आज भी यह साड़ी अपनी उस मर्यादा और शान को समेटे हुए है जो सालों पहले हुआ करती थी. दरअसल, पैठणी साड़ी की एक वैराइटी है जो औरंगाबाद के एक शहर पैठन से उत्पन्न हुई है. यह हाथ से बुनी हुई ‘फाइन सिल्क’ है, जो भारत की सब से उत्तम प्रकार की साड़ी मानी जाती है. इस के किनारे और पल्लू अपनी खास डिजाइन के लिए प्रसिद्व हैं. चौकोर और तिरछे आकार वाले पल्लू में तोतामैना, कमल, हंस, नारियल, मोर आदि खास होते हैं.

दूसरी साडि़यों से अलग

ये साडि़यां हर अवसर पर पहनने वाली को खास अनुभव कराती हैं. पहले ये साडि़यां असली सोने और चांदी के तार से बनाई जाती थीं, जो काफी हैवी होने के साथसाथ महंगी भी होती थीं और बनाने में 6 महीने से ले कर साल भर तक का समय लगता था. पेशवाओं में ऐसी साडि़यों का खास महत्त्व हुआ करता था. उस समय की साडि़यां असली सोने और चांदी के तार से बनाई जाती थीं. 1 किलोग्राम सोने में एक तोला तांबे के तार मिला कर फिर बुनी जाती थी. ‘नार्ली’ और ‘पांखी’ पल्लू उस समय खास प्रचलित थे. समय के साथसाथ महिलाओं का टेस्ट भी बदला और आज ये साडि़यां सूती से ले कर सिल्क सभी तरह की बाजार में उपलब्ध हैं. ये साडि़यां 200-250 ग्राम जरी, 700 ग्राम सिल्क के साथ बनाई जाती हैं जो वजन में 800 से 900 ग्राम तक होती हैं. अधिक हैवी नहीं होती. ये साडि़यां कुछ इस तरह से बुनी जाती हैं कि इन का बहुमूर्तिदर्शी रूप दिखे. ये दूसरी साडि़यों से अलग पहचान रखती हैं.

बढ़ रही है मांग

इस बारे में डिजाइनर श्रुति संचेती कहती हैं, ‘‘समय के साथ इन साडि़यों ने भी अपना रूप बदला. इन की बुनाई काफी कठिन होती है. अलगअलग रंगों के धागों को मिला कर इन्हें बुना जाता है, जो थ्री डाइमैंशन लुक देती हैं. आजकल की महिलाएं हैवी साड़ी नहीं पहनना चाहतीं और महंगी होने की वजह से भी खरीदना नहीं चाहतीं. ऐसे में मैं ने उसी रूप में जरी की जगह ‘टेस्टेड गोल्ड’ का प्रयोग कर पैठणी डिजाइन बनाई. यह साड़ी सस्ती होने के साथसाथ ग्लैमर और ऐलिगैंसी को भी दिखाती है. ऐसी डिजाइन की साडि़यों की मांग आजकल खूब है.’’

श्रुति कहती हैं, ‘‘ये डिजाइनें सूती और सिल्क दोनों में समान रूप से बनाई जाती हैं. साथ ही, पहले जो बौर्डर 6-7 इंच चौड़ा होता था अब उसे कम कर 3 इंच कर दिया गया है. आज के ‘कंटैंपरेरी मोटिफ्स’ जो अधिक डैलिकेट होते हैं, उन का प्रयोग किया जाता है ताकि साड़ी हलकी रहे. इस के अलावा ये साडि़यां एक बार खरीद लेने पर हर अवसर पर अलगअलग तरीके से ‘मिक्स ऐंड मैच’ कर पहनी जा सकती है. जिस में जैकेट, अलग चोली, ब्लाउज आदि सभी उपयोगी होते हैं. साथ ही, साड़ी को नया रूप दिया जा सकता है. ये साडि़यां अधिकतर डार्क कलर की होती हैं, जिन में नीला, लाल, औरेंज, गुलाबी मोरपंखी, पीला आदि रंग काफी पौपुलर हैं.’’

फ्यूजन है उपयोगी

साडि़यां हमेशा महिलाओं के व्यक्तित्व को उभारती हैं. कितनी भी मौडर्निटी आ जाए, पर साडि़यां हमारे देश में हमेशा पहनी जाएंगी. डिजाइनर गौरांग कहते हैं, ‘‘मैं पैठणी की प्राचीन कला को नए रूप में पेश करने की कोशिश करता हूं या फिर कंटैंपरेरी डिजाइन बनाता हूं ताकि सभी आयुवर्ग की महिलाओं को पसंद आएं. डिजाइन में नयापन लाने के लिए टैक्सचर, कलर और क्रौस बौर्डर का इन्फ्लुएंस काफी महत्त्व रखता है. पैठणी के बुनकर पूरे महाराष्ट्र में हैं. मेरे साथ करीब 100 बुनकर काम करते हैं. वे मेरी ही बताई डिजाइनों को बुनते हैं.’’

‘‘हमेशा नई डिजाइन किसी को भी आकर्षित करती है, इसलिए मैं ने पैठणी में बंगाल की जामदानी का मिश्रण कर नई तकनीक से महिलाओं का परिचय करवाया है. इसलिए मुझे डिजाइन को एक्स्प्लोर करने में आसानी होती है. कोई भी डिजाइन अलग और सुंदर होने पर आप को आकर्षित कर सकती है. मैं अलगअलग टेक्स्चर, रंग और मोटिफ्स से हमेशा नया लुक देने की कोशिश करता हूं. विदेश में रहने वाले भारतीय भी इस की कद्र जानते हैं और मंगवा कर पहनते हैं. हां, विदेशी इसे नहीं पहचान पाते, पर अब धीरेधीरे ‘इंडियन टैक्सटाइल’ दुनियाभर में पहुंच रहा है.’’

पैठणी साडि़यां महिलाओं के बीच और अधिक पौपुलर हों, इसलिए फैशन शो के साथसाथ कई प्रदर्शनियां भी समयसमय पर लगाई जाती हैं. ‘न्यूवैब पैठणी’ साडि़यों का फैस्टिवल हर साल मुंबई या आसपास के क्षेत्र में लगाया जाता है. इस फैस्टिवल के आयोजक सनिंदा भिडे कहती हैं, ‘‘हर साल महिला खरीदारों की संख्या बढ़ रही है. इसलिए साडि़यों के बनाने वाले कारीगर भी अच्छा कमा रहे हैं.’’ 

ध्यान रहे

– साड़ी के पहनने के बाद खुली हवा में सुखा कर ही अलमारी में रखें.

– अगर साड़ी पर कुछ गिर जाए तो तुरंत साफ कर सुखाएं.

– सीलन और नमीयुक्त हवा से बचाएं.

– मलमल के कपडे़े में पैक कर रखें.

– साल में 1 बार हलकी धूप में सुखाएं.

– जरी को हरे रंग के मलमल के कपड़े से ढक कर रखें. जरी काली नहीं पड़ेगी.

हेयर कलर फौर वैलेंटाइन डे

माना प्यारमुहब्बत के इजहार के लिए रैड कलर को प्रतीक माना जाता है, लेकिन इस खातिर बाकी कलर्स को अवौइड करना गलत है. इस वैलेंटाइन डे पर अपनी पर्सनैलिटी को अट्रैक्टिव बनाने के लिए आप अपने बालों में कलर्स का जादू बिखेर सकती हैं, कैसे? बता रही हैं गुंजन गौड़:

वेवी मिंट ग्रीन हेयर: 2017 का पैंटोन्मैंट कलर है ग्रीनरी, जिस की झलक बालों में भी देखने को मिलेगी. यह पेस्टल ग्रीन शेड आप को काफी गर्लिश लुक देगा. बीची वैब्स के साथ शेडेड मिंट ग्रीन लुक आप को बिलकुल बार्बी डौल जैसी झलक देगा.

रैवन हेयर विद हाईलाइट्स: एमटीवी वीडियो म्यूजिक अवार्ड्स के लिए अपनाया कैटी पैरी का यह लुक इस साल इन रहेगा. बालों में रैवन यानी ग्लौसी ब्लैक कलर के साथ पिंक, पर्पल और ब्लू शेड्स की स्ट्रीक्स रखी जाएंगी. कलर्स का ऐसा कौंबिनेशन और वाइब्रेट शेड्स का ऐसा कंट्रास्ट काफी यूनीक नजर आएगा.

यूनीकौर्न हेयर: गौर्जियस व मैजिकल अपील देने वाली ग्रे या पर्पल कलर की स्ट्रैंट्स को भी काफी पसंद किया जाएगा. बालों में अपनाई जाने वाली ये ग्रे स्ट्रैंड्स सिर्फ गे्र ही नहीं, बल्कि पेस्टल व डार्क शेड्स के आउटफिट्स के साथ भी खूबसूरत नजर आएंगी.

डैनिम ब्लू हेयर कलर: नाम से ही जाहिर है कि हेयर कलरिंग का यह नया व कूल पैटर्न डैनिम जींस से इंस्पायर्ड है. आने वाले सीजन में सिल्वरिश ब्लू हेयर्स का ट्रैंड काफी हौट नजर आएगा. हालांकि यह कलर नैचुरल नहीं है, तो इसे बैलेंस करने के लिए आप को अपने ओवरऔल लुक पर ध्यान रखना होगा.

रेनबो हेयर: बालों में मल्टीपल कलर्स  यूज कर के आप रेनबो लुक पा सकती हैं. यह स्टाइल आप को डिफरैंट लुक देने के साथसाथ आप की पर्सनैलिटी को भी बोल्ड व स्मार्ट दिखाएगा.

टरक्वाइश ब्लैक हेयर: इस में कोईर् शक नहीं कि टरक्वाइश कलर का ब्लैक के साथ कौंबिनेशन बहुत ही खूबसूरत नजर आता है. यह कलर कौंबो लौंग स्ट्रैंड्स के साथ बेहतरीन नजर आता है. अपने हेयर कलर को खूबसूरती के साथ रिफ्लैक्ट करने के लिए आप हाफ हेयर ट्विस्ट कर के क्लचर से टाई कर दें और बाकी के बालों को खुला छोड़ दें.                

– गुंजन गौड़, ब्यूटी ऐक्सपर्ट व ऐग्जीक्यूटिव डायरैक्टर औफ एल्प्स कौस्मैटिक क्लीनिक

होमियोपैथी : मीठी गोलियों के नाम पर गोरखधंधा

सैंट्रल कौंसिल औफ होमियोपैथी (सीसीएच) के चेयरमैन रामजी सिंह होमियोपैथी कालेजों को मान्यता देने की डीलिंग तो खुद करता था, पर वह ‘नजराना’ अपने कुछ खास चेलों के जरीए ही लेता था. रामजी सिंह की गिनती पटना और दिल्ली के अच्छे होमियोपैथी डाक्टरों में होती है. सीसीएच का अध्यक्ष बनने से पहले वह बिहार हौमियोपैथ चिकित्सा बोर्ड का सदस्य भी रह चुका था. सीसीएच होमियोपैथी चिकित्सा शिक्षा की नियामक संस्था है और पिछले 5 सालों से रामजी सिंह उस का चेयरमैन बना हुआ था. पटना के कदमकुआं महल्ले में ही रामजी सिंह का प्राइवेट क्लिनिक चलता है और उस ने रामकृष्णा नगर में जीडी मैमोरियल होमियोपैथी कालेज भी खोल रखा है.

पिछले दिनों राजकोट के एक प्राइवेट होमियोपैथी कालेज मैनेजमैंट से 20 लाख रुपए घूस लेने के चक्कर में वह सीबीआई के चंगुल में फंस गया. सीबीआई के सूत्रों के मुताबिक, चेयरमैन के बदले उस के किसी खास आदमी ने रकम वसूल की. उस के बाद हवाला के जरीए 20 लाख रुपए रामजी सिंह के पास पहुंचा दिए गए थे. दरअसल, राजकोट की एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी ने होमियोपैथी कालेज की मान्यता के लिए सीसीएच में आवेदन दिया था. कालेज के पक्ष में निरीक्षण रिपोर्ट देने के लिए कालेज का वाइस प्रैसिडैंट लगातार रामजी सिंह और उस के एजेंट के संपर्क में था.  कालेज की जांच के लिए रामजी सिंह ने 3 लोगों की कमेटी बनाई थी. जबलपुर होमियोपैथी कालेज के प्रोफैसर राहुल श्रीवास्तव, कोलकाता के नैशनल इंस्टीट्यूट औफ होमियोपैथी के प्रोफैसर अशोक कोनार और रोहतक होमियोपैथी कालेज के प्रोफैसर अश्विनी आर्य को इस कमेटी का मैंबर बनाया गया था.

कमेटी ने कालेज का मुआयना कर लिया था और दिल्ली में ही ‘नजराने’ की रकम के भुगतान की बात तय हो चुकी थी. उस के बाद ही सीबीआई ने रामजी सिंह के दिल्ली के दफ्तर में ही जाल बिछा कर उसे और उस के एजेंट को दबोच लिया था.

कभी किराए के एक छोटे से कमरे में क्लिनिक की शुरुआत करने वाले रामजी सिंह की हैसियत को पिछले 20 सालों के दौरान मानो पंख लग गए थे. साल 2001 में उस ने पटना के न्यू बाईपास से सटे रामकृष्णा नगर में जीडी मैमोरियल होमियोपैथी कालेज खोला था. कालेज को भी उसने गैरकानूनी कमाई का जरीया बना रखा था. छात्रों का शोषण करने में रामजी सिंह कोई कोरकसर नहीं छोड़ता था. छात्रों के क्लास से गैरहाजिर रहने पर जुर्माने के तौर पर वह सालाना लाखों रुपए वसूल लेता था. एक दिन गैरहाजिर रहने पर छात्र से 2 सौ रुपए फाइन लिया जाता था. दूसरे राज्यों के छात्र सालभर में 2 सौ से ज्यादा दिन गैरहाजिर रहते थे. हर साल मई महीने में इम्तिहान का फार्म भरने के समय गैरहाजिर रहने का फाइन वसूला जाता था.

इस से यह साफ हो जाता है कि कालेज को छात्रों की पढ़ाईलिखाई या कैरियर से कोई मतलब नहीं रहता था. सारी कोशिश केवल जेब गरम करने की ही रहती थी. कालेज के कई छात्रों ने पूछताछ के दौरान पुलिस को बताया कि एडमिशन के समय डोनेशन के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती थी. दूसरे राज्यों के काफी छात्र उस के झांसे में आसानी से फंस जाते थे. रामजी सिंह सीसीएच का अध्यक्ष भी था, इसलिए छात्र और उस के परिवार वाले उस की बातों पर आसानी से भरोसा कर लेते थे. छात्रों को यह लालच भी दिया जाता था कि कोर्स पूरा होने के बाद नौकरी भी लगवा दी जाएगी.

गौरतलब है कि जीडी मैमोरियल होमियोपैथी कालेज में बिहार से ज्यादा जम्मूकश्मीर और उत्तर प्रदेश के छात्र हैं. सीबीआई ने होमियोपैथी कालेजों को मान्यता देने के एवज में रिश्वतखोरी का भंडाफोड़ किया है. इसी के तहत रामजी सिंह और बिचौलिए हरिशंकर झा को दबोचा गया है. रामजी सिंह ने घूस लेने के लिए हरिशंकर झा को दलाल बना रखा था. मान्यता के लिए आवेदन करने वाले कालेजों से हरिशंकर झा ही डीलिंग करता था और रिश्वत की रकम तय करता था. घूस की रकम तय हो जाने के बाद रामजी सिंह अपने खास डाक्टरों की टीम को कालेज की जांच करने के लिए भेजता था. रामजी सिंह की मरजी के मुताबिक ही टीम रिपोर्ट बनाती थी और उस के बाद कालेज को आसानी से मान्यता दे दी जाती थी. गुजरात के राजकोट के एक प्राइवेट होमियोपैथी कालेज को मान्यता देने के लिए रामजी सिंह ने अपने खास लोगों की टीम बनाई थी और टीम ने उस के मनमुताबिक रिपोर्ट दे दी थी. उस के बाद कालेज प्रबंधन से 20 लाख रुपए की रिश्वत की रकम ली जा रही थी. उसी समय सीबीआई ने रामजी सिंह के दलाल हरिशंकर झा को रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया था.

हरिशंकर झा के बयान के आधार पर रामजी सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया गया. उस के बाद सीबीआई ने दिल्ली, गुड़गांव, रोहतक, राजकोट, गांधीनगर, पटना, जबलपुर और कोलकाता में रामजी सिंह के ठिकानों पर छापे मारे और कई दस्तावेज बरामद किए. पटना के कंकड़बाग इलाके में द्वारका कालेज के सामने अशोक नगर के रोड नंबर-4 पर रामजी सिंह का आलीशान बंगला है. मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के रहने वाले रामजी सिंह ने अपने सीसीएच के अध्यक्ष के तौर पर पिछले 5 सालों में देशभर में सैकड़ों होमियोपैथी कालेजों को मान्यता देने के बदले करोड़ों रुपए की दौलत बटोरी है.

पटना के रामकृष्णा नगर में उस ने 5 मकान और तकरीबन 6 एकड़ जमीन खरीद रखी है. बलिया में भी उस ने करोड़ों रुपए की जमीन खरीद रखी है. बिहार के मुजफ्फरपुर के रायबहादुर टुनकी साह होमियोपैथी कालेज से डिगरी लेने के बाद रामजी सिंह ने साल 1990 में होमियोपथी इलाज की प्रैक्टिस शुरू की थी. जब प्रैक्टिस नहीं चली, तो उस ने पटना के पटेल नगर इलाके में रहने वाले मशहूर होमियोपैथी डाक्टर बी. भट्टाचार्य के असिस्टैंट के तौर पर काम करना शुरू किया.

रामजी सिंह के एक भाई की दिल्ली में होमियोपैथी दवाओं की कंपनी है. उस कंपनी की बनी दवाएं बिहार में खूब बिकती हैं. केंद्रीय आयुष मंत्रालय ने सीसीएच द्वारा मान्यता दिए गए होमियोपैथी कालेजों में नामांकन पर रोक लगा रखी है. मंत्रालय का मानना है कि सीसीएच ने कई ऐसे होमियोपैथी कालेजों को मान्यता दे दी है, जो मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं.

दिल्ली के महीपालपुर इलाके में हरिशंकर झा के 2 होटल हैं. एक का नाम ‘मोनार्क’ और दूसरे होटल का नाम ‘हनुमंत पैलेस’ है. रामजी सिंह जब दिल्ली जाता था, तो वह होटल ‘हनुमंत पैलेस’ में ही डेरा जमाता था. सीबीआई इस बात की भी जांच कर रही है कि हरिशंकर झा के होटलों में भी तो होमियोपैथी घोटाले के रुपए नहीं लगे हुए हैं? इस से पता चलता है कि होमियोपैथी की मीठीमीठी गोलियों की आड़ में रामजी सिंह होमियोपैथी को कड़वा और काला बनाने की जुगत में लगा हुआ था.                           

बलात्कार से बच्चा नाजायज और बोझ क्यों?

वाकिआ 9 नवंबर, 2016 का है. मध्य प्रदेश के खंडवा जिला अस्पताल में 16 साला कल्पना (बदला नाम) ने एक बच्ची को जन्म दिया, लेकिन उसे अपनाने से इनकार कर दिया और अपने मांबाप के साथ घर लौट गई.

वह नवजात बच्ची जिला अस्पताल में बिन मां के रही, बाद में उसे बच्चों की परवरिश करने वाली एक संस्था को सौंप दिया गया. कल्पना एक साल पहले मांबाप के साथ अपने गांव सिंगोट से महाराष्ट्र गई थी, जहां उस के मांबाप मजदूरी कर पेट पालते थे. एक दिन पड़ोस में ही रहने वाले सतीश नाम के नौजवान ने उस का बलात्कार किया, जिस से वह पेट से हो गई. सतीश ने उसे सख्त लहजे में धौंस दी थी कि अगर बलात्कार की बात किसी को बताई, तो वह उस के छोटे भाई को जान से मार डालेगा. यह बात सुन कर कल्पना डर गई और किसी को नहीं बताया, लेकिन जब उस के पेट से होने की बात उजागर हुई, तो बात छिपी नहीं रह सकी.

उस ने वापस खंडवा आ कर सच बताया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और बच्चा गिराया नहीं जा सकता था. बच्ची के पैदा होने पर हकीकत पता चली, तो पुलिस ने सतीश को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. बलात्कार से पैदा हुई बच्ची से कल्पना का कोई मतलब नहीं, जो बच्चा पालने वाली संस्थाओं में जैसेतैसे पल तो जाएगी, लेकिन उस का कोई भविष्य नहीं है, जबकि उस के मांबाप दोनों जिंदा हैं. ऐसे में कानूनी पेचीदगियों के चलते उसे आसानी से किसी जरूरतमंद मियांबीवी को गोद भी नहीं दिया जा सकता.

क्या करती कल्पना

क्या कल्पना ने गलत किया? इस सवाल पर बहस की गुंजाइशें मौजूद हैं, जो एक हद तक उस के हक में ही जाती हैं कि एक नाबालिग, कम पढ़ीलिखी लड़की कैसे एक दुधमुंही बच्ची को पालती, जो खुद अपना पेट पालने के लिए अपने मांबाप की मुहताज है? यह गलती कल्पना की गरीबी के अलावा सामाजिक हैसियत के साथसाथ हवस के मारे सतीश की ज्यादा थी, जिस ने कल्पना की मजबूरी का फायदा उठाया और उसे जिंदगीभर के लिए जिस्मानी व दिमागी तकलीफ भोगने के लिए मजबूर कर दिया. समाज ऐसे पैदा हुए बच्चों को किस नजरिए से देखता है, यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं कि उसे नाजायज कहा जाता है. जाहिर है, ऐसे में कल्पना के कान ताने सुनसुन कर पक जाते और उस का इज्जत और सुकून से जीना दूभर हो जाता, क्योंकि यह नाजायज बच्ची एक ऐसे ढोल की तरह उस के गले में पड़ी रहती, जिसे लोग अपना दिल बहलाने के लिए बजाते रहते. अब कुछ साल बाद मुमकिन है कि कल्पना की शादी कहीं हो जाए. यह हालांकि मौके की बात है कि बात छिपी रहे और कोई दरियादिल नौजवान सच जानने के बाद उसे जीवनसाथी बनाने को तैयार हो जाए.

अगर ऐसा हुआ तो कल्पना का भविष्य तो संवर जाएगा, पर वह बेगुनाह बच्ची जिंदगीभर एक ऐसे जुर्म की सजा भुगतती रहेगी, जो उस ने किया ही नहीं था. वह तो एक जुर्म की उपज थी. हालांकि मुमकिन यह भी है कि उसे भी कोई जरूरतमंद मियांबीवी गोद ले लें, उस की अच्छी परवरिश करें, तालीम दिलाएं और अपना नाम दें, पर इस से बलात्कार से पैदा हुए बच्चों की दिनोंदिन बढ़ती परेशानियां सुलझने वाली नहीं, क्योंकि देश में हर साल घूरों, डस्टबिनों, बसअड्डों और रेलवे स्टेशनों पर लाखों नाजायज बच्चे मरे हुए मिलते हैं.

हिम्मती पार्वती

उस के उलट एक मामला दिल्ली के पौश इलाके का है, जहां पढ़ेलिखे और सुलझे दिलोदिमाग वाले लोग रहते हैं. ऐसी ही एक कालोनी में तकरीबन 15 साल पहले पार्वती (बदला नाम) अपनी दुधमुंही बच्ची को ले कर आई थी और काम की तलाश में भटक रही थी. पार्वती की दिक्कत कल्पना सरीखी ही थी. उस की बच्ची के बाप का कोई अतापता नहीं था. दिल्ली जैसे बड़े शहर में बच्ची को गोद में लटकाए वह काम की तलाश में घूमती रही और कामयाब भी रही. अच्छी बात यह थी कि यहां लोग कुरेदकुरेद कर बच्ची के पिता के बारे में नहीं पूछते थे. एक साहब ने उसे सहारा दिया, तो पार्वती की जिंदगी ढर्रे पर आ गई. वह घरों में काम करने लगी और बच्ची धीरेधीरे बड़ी होती गई. अब वह बच्ची 12 साल की है और कोई पार्वती से यह नहीं पूछता कि उस का बाप कौन है. पार्वती के साथ बलात्कार हुआ था या उस ने प्यार में धोखा खाया था, ये बातें उतनी अहम नहीं हैं, जितनी यह कि वह अपनी गुजरी जिंदगी के हादसे को भूल कर बच्ची की बेहतर परवरिश कर रही है और खुश है.

पार्वती की हिम्मत तो दाद देने के काबिल है ही, पर तारीफ उन लोगों की भी करना जरूरी है, जिन्होंने पार्वती के गुजरे कल से वास्ता न रखते हुए बच्ची को पालने में उस की मदद की.

दरअसल, कल्पना और पार्वती थीं तो एक ही हादसे की शिकार, पर उन्हें माहौल अलगअलग मिला था. कल्पना उस समाज में रहती थी, जहां बलात्कार से पैदा हुए बच्चे को हिकारत से देखा जाता है, साथ ही, पीडि़ता को किसी भी लैवल पर नहीं बख्शा जाता. इस के उलट पार्वती को उन लोगों का सहारा मिल गया था, जो ऐसे हादसों को अपने एक अलग नजरिए से देखते हैं और कोई भेदभाव न रखते हुए हमदर्दी और इनसानियत से पेश आते हुए किसी की जिंदगी संवारने में अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं.

क्या कहता है कानून

बलात्कार से पैदा हुए बच्चों के बारे में अब अदालतें भी पीडि़ता और बच्चे से हमदर्दी रखने लगी हैं, क्योंकि इस में उन की कोई गलती नहीं होती है. 13 दिसंबर, 2016 को दिल्ली हाईकोर्ट ने एक चर्चित मुकदमे में फैसला सुनाते हुए कहा था कि बलात्कार से जन्म लेने वाली औलाद निश्चित रूप से अपराधी के गंदे काम की उपज है और वह उस की मां को मुआवजे में मिली रकम से अलग मुआवजे की हकदार है. इस मामले में एक पिता ने अपनी नाबालिग सौतेली बेटी से बलात्कार किया था, जिस पर उसे अदालत ने कुसूरवार पाए जाने पर उम्रकैद की सजा सुनाई थी. लेकिन बच्ची का क्या होगा, इस पर जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस आरके गाबा की बैंच ने उस बच्ची के भविष्य के बाबत अलग से मुआवजे की बात कही है.

ऐसे ही एक मामले में 4 नवंबर, 2015 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी कहा था कि बलात्कार से पैदा हुई औलाद अपने असल पिता यानी बलात्कारी की जायदाद में बतौर वारिस हकदार होगी. तब जस्टिस शबीहुल हसनैन और जस्टिस डीके उपाध्याय की बैंच ने पहल करते हुए यह हिदायत दी थी कि बलात्कार से पैदा हुई औलाद को दुराचारी की नाजायज औलाद माना जाएगा और उस का पिता की जायदाद पर हक होगा. अदालत ने अपने फैसले में यह भी जोड़ा था कि अगर कोई और ऐसे बच्चे को गोद ले लेता है, तो उस का अपने असल पिता की जायदाद में कोई हक नहीं रह पाएगा. इस मामले में भी गरीब परिवार की एक 13 साला लड़की साल 2015 की शुरुआत में बलात्कार के चलते पेट से हो गई थी. घर वालों को जब इस बात का पता चला, तब तक सुरक्षित गर्भपात की मीआद यानी 21 हफ्ते से ज्यादा का वक्त बीत चुका था.

हालांकि लड़की के घर वालों ने बच्चा गिराने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था और लड़की का कहना यह था कि वह अपने साथ हुए इस बलात्कार के भयावह हादसे की निशानी को साथ ले कर नहीं जी सकती. आखिरकार उसे बच्चे को जन्म देना ही पड़ा, पर बच्चे को साथ रखने से उस ने भी इनकार कर दिया था.

तो क्या करें

हालांकि कानून अब बलात्कार से पैदा हुए बच्चों से हमदर्दी दिखा रहा है और बलात्कारी की जायदाद में से हिस्सा दिलाने की भी बात कर रहा है. पर उस समाज का नजरिया बदलने का कोई जरीया उस के पास भी नहीं है, जहां रह कर पीडि़ता और बच्चे को जिंदगी गुजारनी होती है. ऐसे में बलात्कार से मां बनी ये लड़कियां क्या करें? कल्पना की तरह अस्पताल में बच्चा छोड़ कर कहीं भाग जाएं या पार्वती की तरह हिम्मत दिखाते हुए हालात से लड़तेजूझते उस की परवरिश करें, उसे मां का प्यार दें, उस की जिंदगी बचाएं. इन में से कोई एक रास्ता पीडि़ता को चुनना पड़ता है. ज्यादातर पीडि़ता कल्पना वाला रास्ता चुनने को मजबूर रहती हैं.

पर अब समाज का नजरिया बदल रहा है, इसलिए पीडि़ता को हिम्मत न हारते हुए बच्चे की परवरिश करना ही एक बेहतर उपाय है. यह हालांकि बेहद मुश्किल भरा काम है, लेकिन नामुमकिन नहीं है, इसलिए बच्चे को दूर ले जा कर परवरिश करना एक कारगर उपाय है. पर इस के लिए जरूरत हिम्मत और दिमाग के साथसाथ हमदर्दी हासिल करने की होती है, जो अकसर बड़ी कालोनियों के बड़े लोगों से मिल जाती है, लेकिन अपने माहौल और समाज के लोगों से नहीं मिलती. प्यार में धोखा खाई लड़कियां भी कई दफा इसी तरह मां बन जाती हैं. हर कहीं ऐसी पीडि़ताएं मिल जाती हैं और अखबारों की सुर्खियां भी बनती हैं. ऐसा जमाने से होता चला आ रहा है कि वासना के मारे मर्द गरीब लड़की जो अकसर छोटी जाति की होती थी, को अपनी हवस का शिकार बना कर उन्हें मां बना देते थे और अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेते थे.

अब जमाना लोकतंत्र का है और कानून ऐसी पीडि़ताओं के साथ है, जो पीडि़ता और बच्चे को हक भी दिलाता है. ऐसे में समाज भी लड़की की बेगुनाही समझते हुए उसे इज्जत से रहने दे, तो 2 जिंदगियां संवर सकती हैं, जो आम लोगों की तरह इज्जत से जीने की हकदार होती है. कई हिंदी फिल्मों में इस बात को फिल्माया गया है कि कैसे हीरो हीरोइन को धोखा देता है और मां बना कर मुंह छिपा कर भाग जाता है. बाद में हीरो बड़ा हो कर अपने नाजायज बाप से अपनी मां के साथ हुई ज्यादती का बदला लेता है. अमिताभ बच्चन की हिट फिल्में ‘त्रिशूल’ और ‘लावारिस’ भी इसी मुद्दे पर बनी थीं. लेकिन वे फिल्में थीं, जिन का हकीकत में एक हद तक ही लेनादेना होता है, इसलिए नजरिया आम लोगों को ही बदलना होगा कि बलात्कार के मामलों में लड़की या बच्चे का क्या कुसूर? वे गुनाहगार या नाजायज क्यों?

कोई जायज पिता बच्चे पैदा कर अपनी जिम्मेदारियों से मुकर जाए, तो भी औरत को बच्चे की परवरिश करनी पड़ती है, ताने सुनने पड़ते हैं और तरहतरह की ज्यादतियां सहन करनी पड़ती हैं. जब उन के बच्चे नाजायज नहीं, तो बलात्कार पीडि़ता के बच्चे नाजायज क्यों?

नरगिस के अवतार में मनीषा कोइराला की वापसी

कुछ समय पहले मनीषा कोइराला ने फिल्ममेकर राजकुमार हिरानी के साथ एक तस्वीर पोस्ट की थी और उनकी प्रशंसा में कुछ शब्द लिखे, 'अनोखे डायरेक्टर और शानदार इंसान.' जनवरी से राजकुमार हिरानी संजय दत्त की बायॉपिक में व्यस्त हैं, जिसमें रणबीर कपूर, संजय दत्त की भूमिका में नजर आएंगे और दीया मिर्जा उनकी पत्नी मान्यता दत्त की भूमिका में होंगी. खबर है कि इस फिल्म से मनीषा कोइराला भी जुड़ गई है.

फिल्म में सोनम कपूर भी होंगी, जो संजय की पुरानी लव इंटरेस्ट के रूप में अपनी भूमिका अदा करेंगी, विकी कौशल संजय दत्त के अमेरिका वाले दोस्त और अनुष्का शर्मा एक पत्रकार के किरदार में होंगी. इस फिल्म में संजय दत्त के पिता सुनील दत्त की भूमिका परेश रावल निभा रहे हैं. और अभी हाल ही में खबर आई है कि संजय दत्त की मां नरगिस का किरदार मनीषा कोइराला.

राजकुमार हिरानी ने भी इस खबर को कन्फर्म कर दिया है कि मनीषा नरगिस जी का किरदार निभा रही हैं.

राजकुमार हिरानी का मानना है कि नरगिस इंडियन सिनेमा की खूबसूरत महिला थीं और उनके किरदार को निभाने के लिए उतनी ही खूबसूरत महिला का होना बहुत जरूरी है. हालांकि, मनीषा वाकई प्यारी और शानदार ऐक्ट्रेस हैं, लेकिन उन्हें इस फिल्म में लेने की मुख्य वजह उनका कैंसर से लड़ना था, क्योंकि नरगिस भी कैंसर से लड़ती रही थीं.

मनीषा, संजय दत्त के साथ कई फिल्मों में काम कर चुकी हैं, जिनमें 'कारतूस', 'खौफ', 'यलगार', 'सनम', 'अचानक', 'बागी', 'महबूबा' जैसी फिल्म शामिल है.

दूल्हा बनने जा रहे हैं नील नितिन मुकेश

पिछले साल यानि कि साल 2016 में गुपचुप तरीके से सगाई करने वाले अभिनेता नील नितिन मुकेश, इस साल शादी के बंधन में बंधने वाले हैं. 7 फरवरी 2017 से उनके शादी के कार्यक्रमों की शुरुआत राजस्थान के ऐतिहासिक नगरी उदयपुर से हो चुकी है.

इस शाही शादी की शुरुआत, न्यू कपल की सगाई के लिए रखे गए रॉयल सगाई प्रोग्राम से हुई. 7 फरवरी को राजस्थान के उदयपुर स्थित रेडिसन ब्लू होटल में इस फंक्शन का आयोजन किया गया. आपको एक बार फिर बता दें कि बॉलीवुड एक्टर नील नितिन मुकेश दूल्हा बनने वाले हैं. वे अपनी मंगेतर रुक्मिणी सहाय से 9 फरवरी को शादी करेगें.

इस कार्यक्रम के मौके पर नील नितिन मुकेश ने टक्सीडो सूट पहन रखा था और उनकी मंगेतर रुकमणी भी डिजाइनर गाऊन में बेहद खूबसूरत लग रही थीं. इस पूरे कार्यक्रम के दौरान नील नितिन मुकेश के पिता नजर आते रहे, जिन्होंने फिरोजी और गोल्डन कॉम्बिनेशन का कुर्ता पजामा पहना हुआ था.

नील नितिन मुकेश द्वारा इंस्टाग्राम पर शेयर किए गए एक वीडियो में नितिन की मंगेतर रुकमणी अपने होने वाले ससुर जी यानि कि नितिन मुकेश जी के पैर छूते हुए भी नजर आ रही हैं.

नील के पिता नितिन मुकेश ने उदयपुर में उनके बेटे के वैवाहिक समारोह के आयोजन पर गहरी खुशी जाहिर की है. नितिन मुकेश ने इस बात पर भी अपनी खुशी जताई कि उनका बेटा अरैंज मैरिज के लिए राजी हो गया

इस फंक्शन के बाद अब 8 फरवरी को मेहंदी की रस्म और संगीत सेरेमनी के कार्यक्रम होने वाले हैं. इसके तुरंत बाद, अगले ही दिन 9 फरवरी 2017 को दोनों शादी के बंधन में बंध जाएंगे. इस विवाह समारोह में शिरकत करने वाले कई फिल्मी हस्तियों का जमावड़ा लेकसिटी में पहले ही होना शुरू हो गया है.

क्रिकेट इतिहास में आपने आज तक नहीं देखी होगी ऐसी बॉलिंग

क्रिकेट एक ऐसा खेल है जिसमें आए दिन अजीबोगरीब रिकॉर्ड्स बनते रहते हैं. कभी कोई बल्लेबाज एक ओवर में 36 रन बनाता है तो कई 72 बॉल में 300, कोई किसी पारी के सारे विकेट अपने नाम कर लेता है तो कोई लगातार 4 विकेट झटक लेता है. क्रिकेट के नाम ऐसे ही कई अद्भुत रिकॉर्ड हैं.

इस खेल में हमेशा अच्छे ही नहीं बुरे रिकॉर्ड्स भी बनते हैं. कुछ खिलाड़ियों ने तो ऐसा भी कारनामा किया है जिसके वजह से सिर्फ उन्हें ही नहीं उनकी टीम को भी खामियाजा भुगतना पड़ा है.

ऐसा ही एक रिकॉर्ड है जिसे देख आप सभी हैरान रह जाएंगे. दरअसल बात उस वक्त की है जब ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच 2005 में वनडे सीरिज खेला जा रहा था.

26 फरवरी, 2005 को ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच हुए तीसरे वनडे में कुछ ऐसा रिकॉर्ड बना जिस पर यकीन कर पाना मुश्किल है.

जब मैदान में ऑस्ट्रेलियाई टीम बल्लेबाजी करने आई, पहले ही ओवर में गेंदबाजी कर कीवी गेंदबाज डैरल टफी ने ऐसा कारनामा किया जिसे देख सभी आश्चर्यचकित हो गए. इनींग का पहला ओवर देख कर ऐसा लग रहा था कि टफी बॉलिंग करना ही भूल गए हैं. पहले ही ओवर में उनंहोंने 4 नो बॉल और 4 वाइड गेंदें फेंकी. ओवर में एक भी गेंद फेंके बिना ही ऑस्ट्रेलिया के खाते में 10 रन जुड़ गए थे.

इडेन पार्क, ऑकलैंड में हुए इस मैच में ऑस्ट्रेलियाई टीम ने 264 रन बनाया था. लक्ष्य का पीछा करते हुए न्यूजीलैंड की टीम 178 रन पर ही ढ़ेर हो गई थी. ऑस्ट्रेलिया ने 86 रनों से यह मैच अपने नाम कर लिया था.

देखिए कैसे ओवर के पहले ही गेंद पर 14 रन बन गए.

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