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मेरी जिंदगी का काला अध्याय : आयशा राउत

मेरा नाम आयशा राउत है और मैं एक गरीब परिवार से हूं. 17 साल की उम्र में मेरे साथ जो घटना घटी, मैं उसे आप सब से शेयर करना चाहती हूं. मैं नहीं चाहती कि मेरे साथ जो कुछ हुआ, वह किसी और के साथ हो. फरेबी और धोखेबाज लोगों से आप सावधान रहें. फरेबी लोग आप के अपने या पड़ोसी भी हो सकते हैं, जिन पर आप आंखें बंद कर के विश्वास करते हैं.

मेरा परिवार उड़ीसा के जिला सुंदरगढ़ के एक छोटे से गांव रानी बगीचा में रहता है. परिवार में मांबाप के अलावा मैं और मेरी बड़ी बहन पिंकी थी. मांबाप बड़े किसानों के खेतों में दिन भर काम करते थे, उस के बदले में जो अनाज मिलता, उस से ही जैसेतैसे घर का गुजारा हो पाता था. जब घर में खाने तक के लाले पड़े हों तो ऐसे में पढ़ाई के बारे में सोचना हास्यास्पद था. गांव के जब कुछ बच्चे स्कूल जाते तो मैं भी सोचा करती थी कि काश मैं भी स्कूल जाती. पर मेरी यह इच्छा दबी रह गई.

मेरी मां और बाप दोनों ही शराबी थे. जब वे मजदूरी पर नहीं जाते तो चावल के मांड से बनाई शराब पी कर नशे में धुत पड़े रहते थे. हम दोनों बहनें उन्हें शराब पीने को मना भी करती थीं, पर हमारी बात माननी तो दूर, वे हमें डांट देते थे. हम लड़कियां थीं, इसलिए हमारी सही बात पर भी तवज्जो नहीं दी जाती थी.

बड़ी बहन जवान हुई तो उस की शादी रानी बगीचा के ही सुनील कुल्लू से कर दी. बहन के ससुराल जाने के बाद घर में मेरा मन नहीं लगता था. उस से बातचीत कर के मेरा दिन कट जाता था. मैं जब घर पर अकेली होती तो गांव के लड़के मेरे घर के आसपास जुटे रहते. मेरी उम्र यही कोई 17 साल हो चुकी थी. उन लड़कों के वहां मंडराने का मतलब मैं अच्छी तरह जान गई थी. मैं समझ गई थी कि वे मेरी गरीबी और मजबूरी का फायदा उठाना चाहते हैं. इसलिए जब तक वे घर के बाहर खड़े रहते, मैं अपने घर से बाहर नहीं निकलती थी.

तमाम अभावों के बीच मेरा बचपन कब गुजर गया, पता नहीं चला. मेरा मन भी करता कि मैं गांव की लड़कियों के साथ गपशप करूं. शहर देखना तो दूर, मेरी जिंदगी घर में ही सिमट कर रह गई थी. हमारे घर पर औनी नाम की एक महिला आती थी. वह बहुत पैसे वाली थी. हमारा घर कच्चा था, पर उस का घर आलीशान था. उस के पास सारी सुखसुविधाएं मौजूद थीं. औनी का हमारे यहां ही नहीं, बल्कि गांव के तमाम गरीबों के यहां आनाजाना था. वह अम्माबापू को कभी शराब पिला देती तो कभी थोड़ेबहुत पैसे खर्चे के लिए दे देती. इस तरह गांव के सभी लोग औनी का बहुत सम्मान करते थे. औनी मुझ से भी बड़े प्यार से बात करती थी. वह पढ़ाई के बारे में मुझे बताती थी कि पढ़ने से क्याक्या फायदे हैं. पढ़ाई के बाद ही लोग अच्छीअच्छी नौकरियां कर पाते हैं.

भले ही मैं घर वालों की मजबूरी की वजह से नहीं पढ़ पाई, पर पढ़ाई में मेरी रुचि थी, इसलिए औनी आंटी की बातें मुझे अच्छी लगती थीं. एक दिन औनी ने मुझ से पूछा, ‘‘आयशा, यदि तुम्हें अब पढ़ने का मौका मिले तो क्या तुम पढ़ सकती हो?’’

मैं ने खुश हो कर कहा, ‘‘हांहां, क्यों नहीं, मैं अब भी पढ़ लूंगी.’’

तब औनी आंटी ने कहा कि जब तुम्हें पढ़ाई में इतनी रुचि है तो मैं तुम्हारे बारे में सोचती हूं. इतना कह कर वह चली गई.

इस के बाद औनी आंटी का हमारे यहां आनाजाना बढ़ गया. एक दिन उस ने मेरे अम्माबापू से कहा, ‘‘तुम अपनी बेटी आयशा को किसी काम पर क्यों नहीं लगवा देते. जब यह चार पैसे कमा कर लाएगी तो वे घर में काम आएंगे.’’

‘‘यहां की हालत तुम देख ही रही हो. यहां काम है ही कहां. बेटी सयानी हो गई है, इसलिए कहीं दूर शहर में भेजने का मन नहीं करता. अब सोच रहे हैं कि कहीं कोई लड़का मिल जाए तो इस के हाथ पीले कर दें. इस की शादी के बाद घर में हम 2 लोग रह जाएंगे. हमारी इतनी उम्र कट गई. बचीखुची भी कट जाएगी.’’ बापू ने कहा.

इस के बाद औनी आंटी बोली, ‘‘आप ने अपनी बड़ी बेटी की शादी कम उम्र में कर दी थी, इस की मत करो. अगर तुम चाहो तो मैं इस की दिल्ली वगैरह में कहीं नौकरी लगवा दूंगी. वहां से हर महीने तुम्हारे पास पैसे आ जाया करेंगे. पैसे इकट्ठे कर के इस की शादी कर देना.’’

‘‘हमारी आयशा इतनी सीधीसादी है, इसे कौन नौकरी पर रखेगा.’’ बापू ने मेरे बारे में बताया.

औनी आंटी बोलीं, ‘‘कोई बात नहीं, कुछ दिनों में यह तेज हो जाएगी. बच्चा तभी तक भोला होता है, जब तक वह घर से न निकले. तुम इस की चिंता मत करना, मैं इस की नौकरी ऐसी जगह पर लगवा दूंगी, जहां इसे कोई परेशानी नहीं होगी.’’

यह सुन कर मैं मन ही मन खुश हो रही थी. सच में मैं गांव से बाहर कभी नहीं गई थी और आंटी मुझे दिल्ली भेजने की बात कर रही थीं. मैं ने दिल्ली का केवल नाम सुना था. मेरे दिमाग में दिल्ली की जो तसवीर बनी हुई थी, वह यह थी कि वहां बहुत ऊंचीऊंची इमारतें होंगी और ज्यादातर लोगों के पास कारें होंगी. वहां पैसे वाले लोग रहते होंगे. चमचमाती सड़कें होंगी.

बापू से बात करने के बाद औनी आंटी मेरे पास आई और मेरी ठुड्डी पकड़ कर बोली, ‘‘अब तू अपने कपड़े तैयार रखना. तुझे दिल्ली ले चलूंगी. वहीं पढ़ना और नौकरी भी करना.’’

आज के जमाने में कौन किस की भलाई के बारे में सोचता है. पर औनी आंटी मेरी पढ़ाई और नौकरी लगवाने की बात कर रही थीं, इसलिए वह मुझे किसी देवी से कम नहीं लग रही थीं. मेरे पास कुल 3 जोड़ी कपड़े थे. एक जोड़ी तो बिलकुल नए रखे थे, जिन्हें केवल किसी त्यौहार पर या किसी की शादी वगैरह के मौके पर पहनती थी.

बाकी 2 जोड़ी मेरे रोजाना के पहनने वाले थे. औनी आंटी के  कहने पर मैं ने अपने कपड़े आदि घर में रखे एक पुराने बैग में रख लिए. एक दिन आंटी हमारे यहां सुबहसुबह आईं, उन्होंने मेरे अम्माबापू को चावल के मांड से बनी शराब खूब पिलाई. ताज्जुब की एक बात यह थी कि आंटी शराब नहीं पीती थी.

कुछ ही देर में अम्माबापू नशे में धुत हो गए तो आंटी ने मुझ से कहा, ‘‘आयशा, तुम ने अपने कपड़े रख लिए हैं? हमें आज ही यहां से दिल्ली के लिए निकलना है.’’

‘‘ठीक है आंटी.’’ मैं चहक कर बोली.

‘‘मैं एक घंटे में आ रही हूं. तुझे मेरे साथ चलना है.’’ वह बोलीं.

आंटी के जाते ही मैं फटाफट नहाधो कर नए कपड़े पहन कर तैयार हो गई. ठीक एक घंटे बाद औनी आंटी हमारे यहां फिर आ गई. उस के साथ गांव की 4 लड़कियां और थीं. मुझे तैयार देख कर वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘आज तो बड़ी सुंदर लग रही हो.’’

जिंदगी में पहली बार किसी ने मेरी तारीफ की थी, इसलिए मैं बहुत खुश हुई.

वह बोली, ‘‘चलो, अपना बैग उठाओ, जल्दी चलते हैं वरना ट्रेन निकल जाएगी.’’

‘‘अभी तो अम्माबापू इस हाल में हैं. इन से पूछे बिना…’’

‘‘इन से अब क्या पूछना. उस दिन तुम्हारे सामने ही इन्होंने तुम्हारे जाने की अनुमति दे दी थी.’’ मेरी बात पूरी होने से पहले ही औनी ने कहा.

मेरा मन कर रहा था कि जाने से पहले एक बार अम्माबापू से बात कर लेती तो अच्छा रहता. पर वे जितने गहरे नशे में थे, उस से लग रहा था कि शाम से पहले होश में नहीं आएंगे.

लिहाजा उन से बिना बताए ही मैं हाथ में बैग ले कर औनी आंटी के पीछेपीछे चल दी. कुछ दूर पैदल चलने के बाद एक घोड़ाबुग्गी से हम पक्की सड़क तक आए. वहां से बस पकड़ कर हम रेलवे स्टेशन पहुंचे. फिर रात को हम सब दिल्ली जाने वाली ट्रेन में बैठ गए.

मैं पहली बार ट्रेन में बैठी थी. आंटी से कह कर मैं खिड़की के पास वाली सीट पर बैठी. हालांकि बाहर अंधेरा था, पर जैसे ही ट्रेन चली, मैं खिड़की से बाहर का नजारा देखने की कोशिश करती रही. औनी आंटी ने ट्रेन में सभी पांचों लड़कियों को खूब खिलायापिलाया. उन के साथ रहने पर हमें महसूस नहीं हो रहा था कि हम अपने मांबाप से दूर हैं.

दिल्ली पहुंचने पर स्टेशन पर औनी आंटी ने एक आदमी से बात की और 3 लड़कियों को उस के हवाले कर दिया. आंटी ने बताया कि इन तीनों की नौकरी मुंबई में लग रही है, इसलिए इन्हें मुंबई भेजा जा रहा है. तुम दोनों को दिल्ली में ही रखा जाएगा. इस के बाद वह हमें एक होटल में ले गईं. किसी होटल में मैं पहली बार गई थी. आंटी ने होटल से ही किसी को फोन किया तो एक व्यक्ति वहां आया. मेरे साथ वाली लड़की को उन्होंने उस के साथ भेज दिया.

अब मैं अकेली रह गई थी. होटल में खाना खिलाने के बाद औनी आंटी मुझे एक औफिस में ले गई. वहां बैठे आदमी ने मेरे नाम का एक फौर्म भरा. मुझे उस औफिस में बिठाने के बाद औनी मुझ से यह कह कर चली गई कि यह कहीं न कहीं तुम्हारी नौकरी लगवा देंगे. समयसमय पर मैं मिलती रहूंगी.

औनी आंटी के जाने के बाद औफिस में बैठा व्यक्ति मुझ से बातें करने लगा. उस ने मेरे परिवार के बारे में पूछा. उस ने यह भी पूछा कि मुझे क्याक्या काम आता है. मैं घर के सब काम करना जानती थी. तब उस व्यक्ति ने कहा, ‘‘फिलहाल तुम्हें एक कोठी में काम करने के लिए भेजा जाएगा. तुम्हें वहां खाना बनाने से ले कर सारे काम करने होंगे. रहनाखाना फ्री होगा. अगर वहां से तुम्हारी कोई शिकायत सुनने को नहीं मिली तो तुम्हें दूसरी अच्छी जगह भेज दिया जाएगा.’’

उस औफिस का एक लड़का मुझे एक कोठी में छोड़ आया. वह एक आलीशान कोठी थी. वहां परिवार में केवल 4 लोग थे, लेकिन इस से ज्यादा वहां नौकर थे. कोठी की मालकिन ने मुझे घर के छोटेमोटे काम करने की जिम्मेदारी दी. अपनी जिम्मेदारी के साथ मैं कोठी के काम निपटा देती. मुझे उस कोठी में काम करते हुए 5-6 महीने बीत गए तो एक दिन मैं ने मालकिन से अपनी तनख्वाह के बारे में पूछा. उन्होंने बताया, ‘‘तुम यहां एक प्लेसमेंट एजेंसी के जरिए आई हो. प्लेसमेंट एजेंसी वाला तुम्हारी सैलरी तुम्हारे घर भेजता है.’’

इस बात से मुझे भी तसल्ली हो गई कि हर महीने पैसे मेरे घर भेजे जाते हैं. कोठी में जितने नौकर थे, सब की मुझ पर गिद्ध दृष्टि रहती थी. मेरी उम्र 18 साल हो चुकी थी. मैं उन की नजरों को अच्छी तरह समझती थी. वहां के ड्राइवर और माली कभीकभी मुझ से मजाक भी करते और शारीरिक छेड़छाड़ भी. इस की शिकायत मैं ने मालकिन से इसलिए नहीं की कि कहीं वह उलटे मुझे ही नौकरी से न निकाल दें. उस कोठी में मैं ने 2-3 साल काम किया.

इस के बाद उस प्लेसमेंट एजेंसी द्वारा मुझे अलगअलग घरों में काम पर भेजा गया. मैं ने लोगों से खुद को बचाने की भरसक कोशिश की, पर मैं अपनी कोशिश में सफल नहीं हो सकी. मैं असहाय थी. दिल्ली में मेरा कोई नहीं था, इसलिए न चाहते हुए भी मैं सब सहती रही. कई लोगों ने मुझे भोगा. मुझे केवल प्लेसमेंट एजेंसी का पता मालूम था. मैं कभी उस से अपने घर वालों के बारे में पूछती तो वह कह देता कि औनी तुम्हारी तनख्वाह तुम्हारे घर वालों तक पहुंचा आती है.

करीब दोढाई साल पहले प्लेसमेंट एजेंसी ने मुझे एक ऐसी कोठी में काम करने के लिए भेजा, जहां एक बूढ़ी बीमार महिला थी. मेरा काम उस महिला की सेवा करना था.

मेरी सेवा से सभी संतुष्ट थे. बीते साल अक्तूबर के दूसरे सप्ताह में उस बूढ़ी महिला की मौत हो गई. उन की मौत के सप्ताह भर बाद ही कोठी वालों ने मुझ से कह दिया कि अब यहां तुम्हारी जरूरत नहीं है. फिर पहली नवंबर को मैं प्लेसमेंट एजेंसी पहुंची तो वहां पर ताला लटका हुआ मिला.

मैं ने सोचा कि ये लोग कहीं गए होंगे. उन के लौटने का इंतजार करने के लिए मैं वहीं बैठ गई. भूखीप्यासी मैं दोपहर तक बैठी रही. मेरे इस तरह बैठे रहने पर पड़ोसी दुकानदार ने मेरे वहां बैठने की वजह पूछी. मैं ने जब उसे बताया कि मैं प्लेसमेंट एजेंसी वालों के इंतजार में हूं, तब उस ने बताया कि वे तो औफिस खाली कर के यहां से चले गए.

यह सुन कर मेरे जैसे होश उड़ गए. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि अब मैं क्या करूं. दिल्ली में कहां जाऊं. मन कर रहा था कि अपने मांबाप के पास ही चली जाऊं, लेकिन वहां से आए हुए मुझे 10 साल हो चुके थे. अपने घर का पता तक मुझे नहीं मालूम था. हाथ में बैग उठाए मैं वहां से एक लालबत्ती के पास आ कर बैठ गई. बाद में पता चला कि वह जनकपुरी की लालबत्ती थी.

कहीं जाने या पेट भरने के लिए मेरे पास पैसे भी नहीं थे. लिहाजा मैं दिन भर वहीं बैठी रही. गाडि़यों के रुकते ही कुछ बच्चे और महिलाएं भीख मांगने लगते थे, पर ऐसा करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई. मैं लाचार निगाहों से गाड़ी चलाने वालों की तरफ देखती कि शायद किसी की दयादृष्टि मुझ पर पड़ जाए. लोग मेरी तरफ देखते तो थे, पर ग्रीन लाइट होते ही निकल जाते थे. मुझे उस लालबत्ती के पास ऐसे ही भूखेप्यासे बैठे 3 दिन हो गए. वहां भी हवस के भेडि़यों की मुझ पर नजरें जमी रहीं. रात होते ही भीख मांगने वाले और आवारा किस्म के लड़के मेरे पास आ कर बैठ जाते थे.

चूंकि वहां स्ट्रीट लाइटों की पर्याप्त रोशनी थी, इसलिए मेरे साथ मनमरजी करने की उन की हिम्मत नहीं होती थी, पर वे मुझे लालच दे कर वहां से कहीं दूसरी जगह चलने को कहते थे. मैं उन का असली मकसद समझ चुकी थी, इसलिए मैं उन के साथ जाने को मना कर देती. मैं ने तय कर लिया था कि भले ही मैं भूख से मर जाऊं, पर अब ऐसे लोगों के बहकावे में नहीं आऊंगी.

4 नवंबर, 2016 को भी मैं उसी लालबत्ती के पास बैठी थी. तभी एक कार से एक खूबसूरत युवती उतरी. उन की आंखों पर चश्मा लगा हुआ था और वह जींसटौप पहने हुए थीं. मैं उन्हें टुकुरटुकुर देख रही थी. कार से उतरने के बाद वह सीधे मेरी तरफ आने लगीं. मैं सोचने लगी कि पता नहीं यह मेरे पास ही क्यों आ रही हैं. वह मेरे पास ही उकड़ूं बैठ कर बोलीं, ‘‘मैं कई दिनों से देख रही हूं कि तुम बैग लिए यहीं बैठी मिलती हो. तुम्हें भीख मांगते हुए भी नहीं देखा. तुम कौन हो और यहां क्यों बैठी हो?’’ उन की बात सुन कर मुझे लगा कि वह हमदर्द हैं. मैं ने उन्हें अपनी पूरी कहानी बता दी. मेरी कहानी सुन कर उन्होंने अपना नाम मीनाक्षी मल्होत्रा बताते हुए आगे कहा कि वह एक एनजीओ चलाती हैं, मुझे मेरे घरवालों से मिलाने में पूरी सहायता करेंगी. मैं बड़ी खुश हुई. फिर वह मुझे अपनी कार में बिठा कर अपने औफिस ले गईं.

मैं कई दिनों से नहाई नहीं थी. नहाने के बाद उन्होंने मुझे खाना खिलवाया. कई दिनों की भूखी थी, इसलिए मैं ने पेट भर कर खाना खाया. इस के बाद मेरे शरीर में जान आई. खाना खा कर मैं उन के औफिस में बैठ गई. औफिस में उस समय एक युवक और 2 युवतियां और बैठी थीं. मीनाक्षी मैडम ने उन युवतियों का परिचय शालू वर्मा और अनिता वर्मा के रूप में कराया और उन के साथ जो सज्जन बैठे थे, उन्हें वरिष्ठ पत्रकार विक्रम गोस्वामी बताया. मीनाक्षीजी ने बताया कि वे सब सभी एनजीओ में उन के साथ ही काम करते हैं.

उन्होंने मुझ से पूछा तो मैं ने बता दिया कि मैं उड़ीसा के सुंदरगढ़ की हूं. तब वे सभी मुझे मेरे घर पहुंचाने के बारे में बातें करने लगे. उन्होंने मेरे सामने ही तय किया कि वे कार से मुझे उड़ीसा ले जाएंगे. बात मेरे घर जाने की थी, इसलिए मैं ने उन के साथ जाने के लिए हां कर दी. वह अपने साथियों के साथ मुझे कार में बैठा कर 9 नवंबर की रात 12 बजे दिल्ली से चल दीं. बीचबीच में रुकतेरुकते हम तीसरे दिन उड़ीसा पहुंच गए. मैं अपने घर वालों के पास जा रही थी, इसलिए उड़ीसा पहुंचने के बाद मेरी उन से मिलने की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी.

मुझे अपने घर के बारे में सही जानकारी नहीं थी, इसलिए वे सुंदरगढ़ में मेरे परिवार के बारे में पूछने लगे. पर सफलता नहीं मिली. तब पत्रकार विक्रम गोस्वामी ने उड़ीसा के पत्रकार मोहम्मद शब्बीर और डंबरू से संपर्क किया. ये दोनों किसी अखबार में थे. वे भी मेरे मांबाप के नाम से उन का पता नहीं लगा पाए. मैं भी परेशान हो रही थी कि अब घर वालों से कैसे मिल पाऊंगी. बातोंबातों में मेरे मुंह से निकल गया कि औनी आंटी मुझे और 4 अन्य लड़कियों को ले कर दिल्ली गई थी. यह सुन कर पत्रकार मोहम्मद शब्बीर चौंके. उन्होंने बताया कि औनी को यहां सभी जानते हैं. वह गरीब परिवार की लड़कियों को बेचने का धंधा करती है. करीब 5 साल पहले उन की शिकायत पर स्थानीय पुलिस ने उसे सुंदरगढ़ के बसअड्डे से कई लड़कियों के साथ गिरफ्तार किया था. औनी रानी बगीचा में रहती थी, इसलिए वे सभी मुझे रानी बगीचा ले गए. गांव के रास्ते पर पहुंचते ही मुझे अपना गांव याद आ गया. गांव पहुंचने पर पता चला कि मेरी अम्मा और बापू गांव से कहीं चले गए हैं. उसी गांव में मेरी बड़ी बहन पिंकी रहती थी. मीनाक्षी मैडम और उन के साथी लोगों से पूछताछ कर के मुझे मेरे जीजा सुनील कुल्लू के यहां ले गए. अपनी बहन और जीजा को देखते ही मेरी आंखों से आंसू निकल पड़े. मैं बहन के गले लग कर रोने लगी.

10 सालों बाद मैं गांव पहुंची थी. वहां बहुत कुछ बदल गया था. जीजा ने बताया कि जब आयशा कई साल बाद भी गांव नहीं आई और न ही इस का कोई समाचार मिला तो उस ने औनी से उस के बारे में पूछा था. औनी ने उन्हें बताया था कि आयशा जहां काम करती थी, वहां से किसी के साथ भाग गई है. यह जानकारी मिलने पर सुनील दिल्ली गया. अपने जानने वालों के साथ उस ने मुझे तलाशने की कोशिश की, जब कहीं पता नहीं चला तो वह निराश हो कर लौट आया.

मीनाक्षी और उन के साथियों ने एसपी निखिल कनोडिया के समक्ष आयशा राऊत को उस के जीजा सुनील कुल्लू और बहन पिंकी के सुपुर्द कर दिया. उन्होंने औनी के खिलाफ सख्त काररवाई करने की मांग करते हुए उन 4 लड़कियों का भी पता लगाने की मांग की, जो 10 साल पहले आयशा के साथ दिल्ली गई थीं. औनी की तरह और भी अनेक माफिया उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल, बिहार आदि राज्यों से लड़कियों को बहलाफुसला कर दूसरे शहरों में बेचने के धंधे में लगे हुए हैं. ह्यूमन ट्रैफिकिंग देश में एक गंभीर समस्या बनी हुई है. सरकार को इस समस्या पर ध्यान देने की जरूरत है

61 साल से नहीं टूटा है टेस्ट का ये रिकॉर्ड

इंग्लैंड के दिग्गज क्रिकेटर जिम लेकर को क्रिकेट जगत में एक इनिंग में सभी 10 विकेट लेने के लिए याद किया जाता है. भले ही उनके इस रिकॉर्ड की बराबरी भारत के अनिल कुंबले ने कर ली हो, लेकिन जिम का एक रिकॉर्ड ऐसा भी है जो 61 साल से नहीं टूटा है.

एक टेस्ट में सबसे ज्यादा विकेट

जिम लेकर ने 26 जुलाई, 1956 को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट मैच में 20 में से 19 विकेट लिए थे. उनका एक मैच में सबसे ज्यादा 19 विकेट झटकने का रिकॉर्ड आज भी कायम है.

ये वही मैच था जिसमें उन्होंने दूसरी इनिंग में सभी 10 विकेट लिए थे, जबकि पहली इनिंग में जिम को 9 विकेट मिले थे.

ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ इंग्लैंड ने ये टेस्ट मैच एक इनिंग और 170 रन से जीता था.

आइए एक नजर डालते हैं टेस्ट में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले बॉलर्स पर..

खिलाड़ी

टीम

खिलाफ

विकेट

साल

जिम लेकर

इंग्लैंड

ऑस्ट्रेलिया

19

1956

सिडनी बैनर्स

इंग्लैंड

साउथ अफ्रीका

17

1913

नरेंद्र हिरवानी

भारत

वेस्टइंडीज

16

1988

बॉबी मेस्सी

ऑस्ट्रेलिया

इंग्लैंड

16

1972

मुथैया मुरलीधरन

श्रीलंका

इंग्लैंड

16

1998

जॉनी ब्रिग्स

इंग्लैंड

साउथ अफ्रीका

15

1889

जॉर्ज लॉहमैन

इंग्लैंड

साउथ अफ्रीका

15

1896

कॉलिन ब्लेथ

इंग्लैंड

साउथ अफ्रीका

15

1907

हेडली वैरिटी

इंग्लैंड

ऑस्ट्रेलिया

15

1934

रिचर्ड हेडली

न्यूजीलैंड

ऑस्ट्रेलिया

15

1985

 

अपने मोबाइल को बनाएं प्रोजेक्टर

मोबाइल, आज हमारी ज़िन्दगी में इतना महत्वपूर्ण है कि इसके बिना हम खाना-पीना सब भूल जाते है. मोबाइल के बिना हम ऐसा समझते हैं कि कोई भी काम नहीं हो सकता, चाहे फिल्म देखना हो या कंप्यूटर पर कुछ काम करना हो. सारी चीजे हम मोबाइल पर करना ही पसंद करते हैं. अगर आप अपने मोबाइल में फिल्में देखना पसंद करते हैं तो आपका मोबाइल घर की कुछ साधारण सी चीजों के इस्तेमाल से बहुत आसानी से प्रोजेक्टर में तब्दील हो सकता है.

इस प्रोजेक्टर की मदद से आप अपने घर में थिएटर का मजा ले सकते हैं. यह पैसे के साथ-साथ बिजली बचाने में भी आपकी मदद करेगा.

* गत्ते का बॉक्स

* साफ लेंस वाला मैग्निफाइंग गिलास

* एक पेपर क्लिप

* पेंसिल और रूलर

* पॉकेट नाइफ

* सिलिकॉन ग्रिप पेड

* डक्ट टेप

* एंड्राइड स्मार्टफोन

3.5" X 5.75" साइज के मोबाइल के लिए गत्ते के बॉक्स का साइज 7" X 6.75" X 4" होना चाहिए. इसे आप अपने मोबाइल की लम्बाई-चौड़ाई के हिसाब से भी काट सकते हैं.

पेंसिल की मदद से लेंस का व्यास (diameter) मार्क करें. और उसे काट कर छेद बना लें. मैग्निफाइंग गिलास का हैंडल हटा कर उसे बॉक्स में चिपकाएं. गिलास हिले नहीं इसके लिए उसमें डक्ट टेप लगा दें।

फोन रखने के लिए पेपर क्लिप का इस्तेमाल कर उसका स्टैंड बना लेंडार्क रूम में बॉक्स को दीवार से उचित दूरी पर रखें. फोकस को सेट कर आप अपने मोबाइल को प्रोजेक्टर बना कर फिल्म का आनंद उठा सकते हैं

अगर आप अपने मोबाइल की स्क्रीन को रोटेट करना चाहते हैं तो स्क्रीन रोटेशन कन्ट्रोल एप्लीकेशन की मदद से आसानी से कर सकते हैं. इसके बाद फोन की ब्राइटनेस को फुल कर दें. इसकी मदद से दीवार पर इमेज ज्यादा साफ दिखाई देगी.

ये कंगना का बड़बोलापन है या अंदर का फ्रसट्रेशन

बॉलीवुड में संघर्ष कर कंगना रनौत ने बतौर अदाकारा अपना एक मुकाम बना लिया है, जबकि उनके अभिनय को सराहने वाली फिल्मों में ‘क्वीन’, ‘तनु वेड्स मनु’ और ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न’ का ही जिक्र होता है. इसके बावजूद कंगना रनौत तो जैसे हवा में उड़ रही हैं. वे दावे कर रही हैं कि उनकी फिल्म ‘क्वीन’ के कारण भारतीय सिनेमा बदला है. वह दावे के साथ कहती हैं कि उनकी वजह से अब फिल्मों से टैग खत्म हो गए.

जी हां! हाल ही में एक खास मुलाकात के दौरान कंगना रनौत ने अपने करियर की चर्चा करते हुए कहा कि -‘‘मेरे करियर में क्वीन ही अति महत्वपूर्ण मोड़ कही जाएगी, इस फिल्म से नाम, शोहरत, स्टारडम और एक उत्कृष्ट अदाकारा के रूप में उन्हें पहचान मिली. इस फिल्म में एक मूवमेंट नजर आया. मेरी फिल्म ‘क्वीन’ ने न सिर्फ मुझे रास्ता दिखाया, बल्कि फिल्म इंडस्ट्री के लिए भी टर्निंग प्वाइंट रही है. मूवमेंट के साथ ही एक पैरलल सिनेमा, जो कि नीश दर्शकों के लिए ही विकसित हुआ है. इसी तरह की बहुत ज्यादा फिल्में बनने लगी हैं. अब तो ‘पीकू’,‘नीरजा’, ‘पिंक’, ‘बेबी’ जैसी फिल्मों के लिए रास्ता खुल गया है. अब सिर्फ महिला प्रधान ही नहीं, बल्कि खास मुद्दों पर आधारित फिल्मों का निर्माण शुरू हो चुका है. अब कंटेंट पर आधारित फिल्में बनने लगी हैं.

2014 से पहले आप जो सिनेमा देख रहे थे, उस वक्त कटेंट फिल्म का अर्थ था जिन्हें असफल फिल्मों का दर्जा दिया गया हो. मगर ‘क्वीन’ फिल्म के बाद कंटेंट फिल्म का टैग हट गया है. पहले यदि कोई फिल्म फेस्टिवल में चली जाती थी, तो उस फिल्म का सिनेमा घरों में प्रदर्शन असंभव हो जाता था. फेस्टिवल फिल्म के लिए पूरे देश में दो सौ स्क्रीन मिलना भी मुश्किल था, तो ऐसी फिल्मों को बुरा माना जाता था. पहले राष्ट्रीय पुरस्कार को भी अहमियत नहीं दी जाती थी.

आगे कंगना कहती हैं कि मुझसे एक सुपर स्टार ने कहा था- ‘‘जब राष्ट्रीय पुरस्कार मिल जाता है, तो करियर खत्म हो जाता है.’’ यानि कि राष्ट्रीय पुरस्कार को भी सम्मान नहीं दिया जाता था. ‘क्वीन’ से यह सब चीजें बदली हैं. जिन चीजों को सम्मान मिलना चाहिए, उन चीजों को सम्मान भी मिला. मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, मैने जिस अंदाज में उसे सम्मान दिया, दुनिया भी उसे उसी अंदाज से देखने लग गयी है, क्योंकि मैं किसी व्यावसायिक अवार्ड समारोह में नहीं जाती हूं. वास्तव में मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार और व्यावसायिक अवार्ड के अंतर की समझ है, इसलिए मैने राष्ट्रीय पुरस्कार को सम्मान दिया.’’

कंगना रनौत ही क्यों हर कलाकार को अपने करियर को लेकर बडे़ बड़े दावे करने का पूरा हक है. मगर हर कलाकार को यह भी याद रखना चाहिए कि एक सफल फिल्म देने के बाद उन्होने किस तरह की फिल्में की.

जहां तक कंगना रनौत के करियर का सवाल है, तो कंगना की फिल्म ‘‘तनु वेड्स मनु’’ 2011 में प्रदर्शित हुई थी, जिसमें उन्होने नारी प्रधान किरदार निभाया था. इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाड़ दिये थे और उनके अभिनय की खूब तारीफ हुई थी. पर इसके बाद ‘गेम’, ‘रास्कल्स’, ‘मिले ना मिले हम’, ‘तेज’, ‘षूट आउट एट वड़ाला’, ‘कृष 3’, ‘रज्जो’ आदि फिल्में बॉक्स ऑफिस पर कमाल दिखाने में असफल रहीं.

2014 में कंगना रनौत की फिल्म ‘क्वीन’ आयी, जिसके संवाद भी कंगना ने खुद ही लिखे थे. मगर ‘क्वीन’ के बाद कंगना की दो फिल्में ‘रिवाल्वर रानी’ और ‘उंगली’ प्रदर्षित हुई और इन दोनों फिल्मों ने बाक्स आफिस पर पानी नहीं मांगा. इसके बाद 2015 में ‘तनु वेड्स मनु’ की सिक्वल फिल्म ‘‘तनु वेड्स मनु रिटर्न’’ ने एक बार फिर उन्हे शोहरत दिलायी. मगर इस फिल्म के बाद आई उनकी फिल्में ‘‘आई लव एन वाई’, ‘कट्टी बट्टी’ ने बॉक्स ऑफिस पर पानी तक नहीं मांगा, जिसके चलते 2016 में कंगना की एक भी फिल्म रिलीज नहीं हुई. अब 24 फरवरी 2017 में कंगना की फिल्म ‘‘रंगून’’ आ रही हैं, जिसमें उनके साथ सैफ अली खान व शाहिद कपूर हैं. फिलहाल हालात यह है कि ‘रंगून’ को वह अकेले ही प्रमोट कर रही हैं. सैफ व शाहिद इस फिल्म को प्रमोट ही नहीं कर रहे हैं, इसके पीछे की वजह तो कंगना ही ज्यादा बेहतर बता सकती हैं.

मजेदार बात यह है कि कंगना रनौत को सबसे पहले 2009 में फिल्म ‘‘फैशन’’ के लिए सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था, पर वह इस फिल्म को अपने करियर में टर्निंग प्वांइट मानती ही नही हैं. खैर 2014 में फिल्म ‘‘क्वीन’’ और 2015 में फिल्म ‘‘तनु वेड्स मनु रिटर्न’’ के लिए उन्हे सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, मगर राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद बॉक्स ऑफिस पर उनकी फिल्मों का जो हश्र हुआ है, उसको लेकर वह कुछ कहना ही नहीं चाहती हैं.

इतना ही नहीं, साल 1954 से ही राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की अहमियत रही है. मगर कंगना का दावा है कि उन्होने ही राष्ट्रीय पुरस्कार को सम्मान देना शुरू किया. उनसे पहले कोई भी कलाकार राष्ट्रीय पुरस्कार को अहमियत नहीं देता था. क्या कंगना रनौत का मकसद इस तरह की गलत बयानबाजी कर खुद को विवादों में लाकर, अखबारों और टीवी न्यूज चैनलों में सूर्खियां बटोरना है? वैसे अपने गाल पर अपने हाथ से थप्पड़ मार कर अपने लाल गालों की प्रदर्शनी करना तो फिल्म वालों की पुरानी आदत रही है.

युवा और महिलाओं की बात पर नहीं दिखा साथ

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिये कांग्रेस ने जब घोषणापत्र जारी किया तो युवाओं और महिलाओं की जोरशोर से बात की. घोषणा पत्र जारी करने वालों में युवा तो कोई था ही नहीं और महिला के नाम पर दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ही मौजूद थी. 125 साल पुरानी कांग्रेस में युवा नेताओं को उपर आने नहीं दिया जा रहा. यही नहीं इन नेताओं में ज्यादातर उत्तर प्रदेश के बाहर के हैं. जिनका उत्तर प्रदेश से कोई भावनात्मक लगाव नहीं है. ऐसे में यह लोग लोकल युवा नेताओं को मंच तक पहुंचने ही नहीं देते. एक नजर डालिये घोषणाप़त्र जारी करने वाले इन नेताओं और उनकी उम्र पर.

एक तरफ नजर डाले तो पूर्व प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री, राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, उत्तर प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर, प्रभारी गुलाम नबी आजाद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद, पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और राज्यसभा सदस्य प्रमोद तिवारी खडे दिखते है. आधे से अधिक नेता ऐसे है जो उत्तर प्रदेश के लिये बाहरी है.

असल में यह नेता उत्तर प्रदेश की जनता से कम और कांग्रेस हाई कमान के ज्यादा नजदीक है. यह युवा कर्मठ और जमीनी स्तर के नेताओं को कांग्रेस हाई कमान से दूर रखना चाहते हैं. कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में युवाओं, महिलाओं और मजदूरों की बात की है. घोषणापत्र को जारी करते समय मंच पर ऐसे लोग दिखते तो जनता को उम्मीद होती कि चुनाव के बाद कांग्रेस इन लोगों की तरक्की के लिये काम करेगी. इसके अभाव में घोषणापत्र महज एक दिखावा बन कर रह गया. इस पर भरोसा करने को कोई तैयार नहीं है. घोषणापत्र को हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी में जारी किया गया. घोषणापत्र के जारी करने के बाद वहा मौजूद कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने कहा कि पार्टी में केवल उम्र दराज लोगों के मंच पर होने से यह संदेश जाता है कि पार्टी में नये चेहरों का अभाव है.

कांग्रेस ने महिलाओं को पंचायतों में 50 फीसदी आरक्षण देने की बात कही है. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 10 फीसदी महिलाओं को भी विधानसभा का टिकट नहीं दिया है. कांग्रेस इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ रही है. उसे अगर अपने संगठन और जनाधार को विस्तार देना है तो केवल राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के नाम से काम नहीं चलने वाला उसे उत्तर प्रदेश में युवा नेताओं और महिलाओं को संगठन में आगे लाना होगा. कांग्रेस अभी विपक्ष में है उसके पास अवसर है. अगर वह अभी तैयारी नहीं करेगी तो लोकसभा चुनाव के समय दोबारा से अपने पैरों पर खड़ा होना मुश्किल होगा. कांग्रेस पार्टी की नीतियों से पार्टी का कार्यकर्ता निराश है.

कांग्रेस का उत्तर प्रदेश कार्यालय राजधानी लखनऊ की कैंट विधानसभा क्षेत्र में आता है. जहां पर कांग्रेस से विधायक रही रीता बहुगुणा जोशी अब भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं. रीता के प्रचार में कांग्रेस के लोग लगे हैं. यह बात संगठन को नहीं दिख रही. इससे साफ पता चलता है कि कांग्रेस के हवाहवाई नेताओं को उस विधानसभा की सच्चाई भी नहीं पता है जहां उनके प्रदेश कार्यालय बना है. अगर लोकल नेताओं को प्रमुखता दी गई होती तो वह ऐसी परेशानियों को समझ अपने कार्यकर्ताओं को अनुशासन में रख सकता था.                         

 

 

क्या आप भी हैं इंस्टाग्राम तस्वीरों के शौकीन

अगर आप हर बार बहुत सारी फोटोज को लेकर क्नफ्यूज हो जाते हैं कि इनसें से कौन सी फोटो आप अपने इंस्टाग्राम एकाउण्ट पर पोस्ट करेंगे, तो हम आपको बता दें कि इंस्टाग्राम जल्दी ही आपकी ये परेशानी दूर करने वाला है.

जब कभी आप बाहर घूमने जाते हैं या किसी उत्सव या फंक्शन में जाकर बहुत सारी सेल्फीज लेते हैं. तब आपको यहां एक साथ सारी तस्वीरें अपने दोस्तों के साथ शेयर न कर पाने का दु:ख तो होता ही होगा. इंस्टाग्राम पर अब तक, एक साथ सारी तस्वीरें सांझा करने की सुविधा नहीं दी गई है. जिसकी कमी, फोटोज पोस्ट करने के शौकीन लोगो को खलती ही रहती है.

अब ऐसे में ये आपके लिए ये एक खुशखबरी हो सकती है. खबरों के मुताबिक, इंस्टाग्राम अपने स्मार्टफोन यूजर्स और तस्वीरों के शैकीन लोगों को एलबम पोस्ट करने वाला नया फीचर देने वाला है. इसकी टेस्टिंग साल की शुरुआत में ही शुरु की जा चुकी थी और ये अभी भी जारी है. अब इस नए फीचर की मदद से से आप अपने फोन की गैलरी से अलग-अलग तस्वीरें सेलेक्ट कर उनका एक सिंगल एलबम बनाकर, इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर सकेंगे.

खबरों के अनुसार इस एलबम के लिए आप एक बार में केवल 10 फोटोज सेलेक्ट कर पाएंगे. अच्छी बात ये है कि हर फोटो पर आपको फिल्टर और इडिटिंग का ऑप्शन भी अगल से उपलब्ध रहेगा. अभी तक सोशल मीडिया यूजर्स ऐसे फीचर का उपयोग फेसबुक पर कर रहे हैं. अब देखना ये है कि अगर सचमुच इंस्टाग्राम खुद को बदलेगा और अपने नए फीचर के साथ एलबम पेश करेगा तो लोगों को और क्या सुविधाऐं होंगी और इंस्टाग्राम कितना और पसंद किया जाऐगा.

यह एक प्रकार का परिक्षण ही है जो इसके उपयोगकर्ताओं की अधिक सुविधा और कहना चाहिए कि इंस्टाग्राम ऐप को और अधिक होनहार बनाने के लिए किया जा रहा है. यहां एक बात ध्यान देने योग्य है कि अभी तक इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इंस्टाग्राम पर यह सुविधा कब तक लाइव हो सकेगी लेकिन इस परिक्षण को देखते हुए आप इसे एक इंस्टाग्राम के वादे के तौर पर ले सकते हैं.

फुटबॉल से जुड़ी इन 20 बातों को नहीं जानते होंगे आप

एसोसिएशन फुटबॉल जिसे आमतौर पर सिर्फ फुटबॉल कहा जाता है, दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेलों में से एक है. यह एक सामूहिक खेल है और इसे ग्यारह खिलाड़ियों के दो दलों के बीच खेला जाता हैं. यदि दुनिया में सबसे ज्यादा खेले जाने वाले और सबसे लोकप्रिय खेलों की बात की जाए तो यह फुटबॉल ही है.

तो आइए जानते है फुटबॉल से जुड़े कुछ रोचक फैक्ट्स…

1. फुटबॉल का खेल 476 B.C. के करीब चीन में शुरू हुआ था. वे इसे कुजू खेल कहते थें. ये दुनिया का सबसे ज्यादा खेला और देखा जाने वाला खेल है.

2. प्रोफेशनल फुटबॉल की शरुआत 31 अगस्त, 1895 को हुई थी. यह मैच लैटरोब (Latrobe) और जीन्नेट (Jeannette) के बीच खेली गई थी.

3. दुनियाभर की 80% से ज्यादा फुटबॉल सिर्फ पाकिस्तान में बनती हैं. यहां पर हैंडमेड फुटबॉल बनाई जाती हैं.

4. फुटबॉल के खेल को केवल अमेरिका और कनाडा में सॉकर कहा जाता है. जबकि दुनियाभर में इसे फुटबॉल कहते हैं.

5. साल 1950 के विश्वकप में भारतीय टीम को इस प्रतियोगिता से बाहर निकाल दिया गया था. वजह जान आप भी हैरान हो जाएंगे. खिलाड़ियों के पास जूते नहीं होने की वजह से उन्हें विश्वकप से निकाल दिया गया था.

6. सिंगल मैच में किसी एक खिलाड़ी द्वारा लगाए गए सबसे ज्यादा 16 गोल हैं. दिसंबर, 1942 में फ्रांस के स्टीफन स्टेनिस ने रेसिंग क्लब डी लेंस की तरफ से खेलते हुए ये कारनामा किया था.

7. फुटबॉल के खेल को केवल अमेरिका और कनाडा में सॉकर कहा जाता है. जबकि दुनियाभर में इसे फुटबॉल कहते हैं.

8. प्रोफेशनल फुटबॉल का साइज बीते 120 सालों से एक जैसा है. इसका साइज 28 इंच परिधि वाला और वजन करीब 450 ग्राम है.

9. 2 मई, 1964 को पेरू में मैच रेफरी के डिसीजन पर मैदान में दंगा हो गया था, जिसमें करीब 300 लोगों की मौत हो गई थी.

10. साल 1913 तक गोलकीपर अपनी टीम से अलग रंग के कपड़े नहीं पहनते थे.

11. चांद पर कदम रखने वाले पहले इंसान नील आर्मस्ट्रांग अपने साथ फुटबॉल लेकर जाना चाहते थे, लेकिन नासा ने इसकी अनुमति नहीं दी.

12. चिली के कार्लोस केजली ऐसे पहले फुटबॉल खिलाड़ी थे जिन्हें साल 1974 के विश्वकप में रेड कार्ड दिखाया गया था.

13. 10. साल 1998 में अफ्रीका में बिजली गिरने से एक टीम के 11 खिलाडियों की मौत हो गई थी, जबकि दूसरी टीम को कुछ नहीं हुआ.

14. फुटबॉल मैच का पहला लाइव कवरेज टेलीविजन पर साल 1937 में दिखाया गया. यह एक तरह का अभ्यास मैच था.

15. साल 1962 से 1996 तक यूरोपीय और दक्षिण अमेरिकी देशों ने विश्वकप का खिताब अपने नाम ही किए रखा.

16. फुटबॉल के इतिहास में सबसे जल्दी रेड कार्ड मिलने का रिकॉर्ड ली टोड के नाम है. उन्हें मैच शुरू होने के 2 सेकेंड का भीतर ही रेड कार्ड मिल गया था.

17. यूरोपियन टीम 1930 और 1950 साल को छोड़ कर हर बार फाइनल में पहुंची है.

18. पेले 17 साल की उम्र में फुटबॉल वर्ल्ड कप जीतने वाले सबसे छोटे प्लेयर हैं. वहीं डीने जौफ 40 साल की उम्र में फुटबॉल वर्ल्ड कप जीतने वाले सबसे उम्रदराज प्लेयर हैं.

19. विश्व युद्ध-2 के समय होने वाले बहुत से फुटबॉल मैच को ‘द डेथ मैच’ का नाम दिया गया था. इसे जर्मनी कंट्रोल करता था.

20. पहला बास्केटबॉल का खेल फुटबॉल से खेल गया था.

बौआ देवी : मधुबनी पेंटिंग की जादूगर

बौआ देवी बिहार के मधुबनी जिला मुख्यालय से 10 किलोमीटर दूर के रहिका प्रखंड के नजीरपुर पंचायत के जीतावरपुर गांव की रहने वाली हैं. जीतावरपुर गांव मधुबनी पेंटिंग का गढ़ माना जाता है. इस गांव की 3 मधुबनी पेंटिंग की कलाकारों को पद्मश्री सम्मान मिल चुका है. बौआ से पहले सीता देवी और जगदंबो देवी को भी पद्मश्री मिल चुका है. 800 परिवार वाले इस गांव में करीब 150 लोग मधुबनी पेंटिंग कर रहे हैं. मधुबनी पेंटिंग को मिथिला पेंटिंग भी कहा जाता है.

73 साल की बौआ बताती हैं कि वह जब 13 साल की थीं, तभी से मधुबनी पेंटिंग कर रही हैं. पिछले 60 सालों से लगातार मधुबनी पेंटिंग कर रही बौआ जब हाथ में कूची थामती हैं तो वह जादू की तरह कागज और कपड़ों पर चलने लगती है. वह बताती हैं कि पहली बार उनकी 3 पेंटिंग 14 रूपए में बिकी थी. आज उनकी एक पेंटिंग के लाखों रूपए मिल रहे हैं. बिहार के मिथिलांचल इलाकों के औरतों द्वारा शुरू की गई घरेलू और अनगढ़ चित्राकारी को इंटरनेशनल आर्ट मार्केट में खासी जगह मिल चुकी है.

पुराने दिनों को याद करते हुए वह कहती हैं कि पेंटिंग करने के लिए वह किसी न किसी तरह समय निकाल ही लेती थी. दिन भर का समय तो घर के कामकाज में ही लग जाता था. रात को पति ओर बच्चों को खाना खिला कर सुला देती थी और उसके बाद वह पेंटिंग बनाना शुरू करती थी. दीये की रोशनी में मधुबनी पेंटिंग जैसा बारीक काम करने में काफी दिक्कतें आती थी, पर बौआ के जूनून के सामने सारी मुश्किलें काफूर हो जाती थीं. तड़के 3-4 बजे तक लगातार पेंटिंग करती थी उसके बाद 2-3 घंटे की नींद लेकर अपने घर के काम में लग जाती थीं.

जापान, स्पेन, पेरिस और लंदन में कई पेंटिंग प्रदर्शनी लगा चुकी बौआ बताती हैं कि पिछले कछ सालों से मधुबनी पेंटिंग में भी आधुनिकता ने पैठ बना ली है. सितंबर 2001 में जब अमेरिका के ट्विन टावर पर हवाई जहाज से हमला हुआ था तो बौआ ने उस वाकये को कागज कर उकेरा था.

गौरतलब है कि मधुबनी पेंटिंग में आमतौर पर लोक कथाओं के प्रसंगों को ही उकेरा जाता है. हाथी, सांप, पेड़, मां-बच्चा, दुल्हन, कहार, डोली, पक्षी आदि ही     मधुबनी पेंटिंग में नजर आते हैं. बौआ ने सामयिक घटनाओं को भी मधुबनी पेंटिंग का रंग दिया है, जिससे उन्हें इंटरनेशनल लेवल पर पुख्ता पहचान मिली है.

बिहार में मिथिलांचल इलाकों में ज्यादातर परिवार में मधुबनी पेंटिंग जम कर की जाजी है. दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, समस्तीपुर समेत नेपाल के तराई इलाकों में मधुबनी पेंटिंग की जाती है. इस पेंटिंग में पहले प्राकृतिक रंगों का ही इस्तेमाल किया जाता था. कोयला से काला रंग, हरे पत्तों से हरा रंग, सिंदूर से लाल रंग, पत्थरों को घिस कर गेरूआ रंग बनाए जाते थे. रंगों को टिकाऊ बनाने के लिए बबूल के गोंद का उपयोग किया जाता था. गिलहरी की पूंछ की बाल से ब्रश बनाए जाते थे. इसके अलावा उंगलियों और माचिस की तिली की मदद से भी रंग भरे जाते थे. बौआ देवी जैसी कई पुरानी कलाकार आज भी प्राकृतिक रंगों का ही इस्तेमाल करती हैं. अब तो फ्रेब्रिक पेंट, एक्रेलिक पेंट, एनामल पेंट और आयल कलर से भी मधुबनी पेंटिेग बनाए जा रहे हैं.

60 के दशक में भारतीय हस्तकरघा बोर्ड की डायरेक्टर रही पुपुल जयकर ने मधुबनी पेंटिंग को राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी. साल 1966 में जयकर ने मधुबनी पेंटिंग के बारे में जानकारी एकत्रित करने के लिए एक टीम को मधुबनी भेजा था. जयकर ने ही मधुबनी पेंटिंग कलाकारों को इस बात के लिए प्रेरित किया था कि वे दीवारों के बजाए कागज और कपड़े पर पेंटिंग करें. इससे उनकी कलाकारी ज्यादा समय तक महफूज रह सकती है और उसे आसानी से देश-विदेश के कला बाजारों तक पहुंचाया जा सकता है.

मधुबनी पेंटिंग को दुनिया के सामने लाने में साल 1934 में बिहार में आए भयंकर भूकंप का बहुत बड़ा योगदान है. भूकंप से सबसे ज्यादा नुकसान मिथिलांचल के इलाकों को ही हुआ था. अंग्रेज अफसरों की टीम मधुबनी पहुंची तो वहां दीवारों पर की गई मधुबनी पेंटिंग को देखकर हैरान रह गई थी. भूकंप से हुए नुकसान के आकलन के साथ-साथ टीम ने मधुबनी पेंटिंग से जुड़ी जानकारियों को भी जमा किया था. साल 1949 में विलियम आर्चर का मधुबनी पेंटिंग पर लिखा लेख इंडियन आर्ट जरनल में  छपा. उसके बाद यह कला दुनिया के सामने आई थी.

साल 1970 में इसे विधिवत पहचान तब मिली जब मधुबनी पेंटिंग कलाकार जगदंबो देवी को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया. उसके बाद महासुंदरी देवी, सीता देवी, गोदावरी दत्त, मालती दयाल और बौआ देवी को भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. बौआ देवी कहती हैं कि मधुबनी पेंटिंग की वजह से वह 11 बार जापान जा चुकी हैं. उन्होंने अपने बेटे अमरेश कुमार और बिमलेश कुमार समेत बेटी रामरीता, सविता और नविता को भी मधुबनी पेंटिंग में ट्रेंड कर दिया है. 

अब हर हफ्ते एटीएम से निकालें 50,000 रुपए

भारतीय अर्थव्यवस्था में पैठ जमा चुके काले धन पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने नोटबंदी की घोषणा की थी. इसी के साथ ही आरबीआई ने एटीएम और बैंकों से कैश निकालने की सीमा पर भी रोक लगा दी थी. जैसे जैसे दिन बीतते गए आरबीआई ने नकदी निकासी की सीमा भी बढ़ दी. पर आरबीआई अब जल्द ही नकदी निकासी की सीमा खत्म करने वाली है.

नोटबंदी के कारण लोगों को बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था. इन परेशानियों का पूरी तरह से निवारण करने के लिए आरबीआई ने 20 फरवरी से 1 हफ्ते की नकद निकासी की सीमा को बढ़ाकर 50 हजार रुपये कर दिए हैं. इसके साथ ही यह भी कहा कि 13 मार्च के बाद नकदी निकालने पर कोई नियम लागू नहीं होंगे. एटीएम से निकासी की रकम को भी भी सेविंग खाते से निकासी में गिना जाता है.

 

एक्टिंग के लिये मुश्किल था घर वालो को राजी करना

मुम्बई की रहने वाली सोनाली निकम के परिवार में कोई भी एक्टिंग की फील्ड में नहीं था. उनके पिता पुलिस ऑफिसर हैंऔर मम्मी हाउस वाइफ. ऐसे में एक्टिंग की फील्ड में जाना सरल नहीं था. 12वी की पढ़ाई के बाद सोनाली को कुछ विज्ञापन शूट करने का ऑफर मिला. यहां से उसने सोचा की उसे एक्टिंग की फील्ड में जाना चाहिये. सोनाली के लिये सबसे मुश्किल काम अपने पिता को इसके लिये राजी करना था. इस बीच 2009 में जीटीवी पर उसे ‘गोद भराई’ सीरियल में काम मिल गया. इसमें उसकी एक्टिंग और काम को देखकर पिता ने आगे एक्टिंग में करियर बनाने के लिये हां कर दिया. 8 साल के अपने एक्टिंग कैरियर में सोनाली निकम ने पत्नी, बहू और भाभी जैसे हर किस्म के घरेलू किरदार को निभा लिया है. एंड टीवी के फिक्शन शो ‘एक विवाह ऐसा भी’ में सोनाली विधवा बहू का किरदार निभा रही हैं.

8 साल के करियर में सोनाली ने बड़े नाम वाले कम से कम 10 सीरियलों में अलग-अलग तरह के रोल किये पर उसकी वह पहचान अभी भी बननी बाकी है, जिसके लिए एक एक्ट्रैस तरसती है. एक सीधी-साधी भूमिका वाले किरदार ही सोनाली के खातें में आते हैं. इस बारे में सोनाली कहती हैं ‘मेरी पहचान शुरू से ही इस तरह की भूमिकाओं वाली बन गई है. मेरे अपने दर्शक मुझे पहचानते हैं. सबसे अच्छी यह बात है कि जो परिवार मुझे एक्टिंग की फील्ड में भेजना नहीं चाहता था वह अब मेरी एक्टिंग को पसंद कर रहा है. उसे भी अब यह अच्छा लग रहा है.’

सोनाली को डांस करना, गाने गुनगुनाना अच्छा लगता है. उसे खाने पकाने का भी अच्छा शौक है. वह हर फेस्टिवल को बहुत धूमधाम से मनाना चाहती है.

क्या टीवी ने उसको केवल घरेलू भूमिका में टाइप्ड कर दिया है?

इस विषय में सोनाली कहती हैं ‘ऐसा नहीं कह सकते. मैंने अपने हर शो में अलग तरह के किरदार निभाये है. आगे भी मेरा प्रयास है कुछ अलग कर दर्शकों का दिल जीत सके. मुझे फिल्मों के रोल भी ऑफर हुये है. अगर कोई अच्छा किरदार मिला तो मैं जरूर उसे करूगी. मुझे अपने पर भरोसा है. जिस भी तरह का रोल होगा मैं उसके साथ पूरा इंसाफ करूगी.’

विधवा विवाह पर अपनी सोंच जाहिर करते सोनाली कहती है ‘विधवा विवाह को समाज में स्वीकृति मिलनी चाहिये. विधवा होना किसी दुर्घटना सा है. इसमें लड़की की कोई गलती नहीं होती. सजा सबसे अधिक उसे ही मिलती है. उसे उपेक्षा के भाव से देखा जाता है. अगर उसके बच्चे या कुछ और जिम्मेदारियां है तो दूसरी शादी भी मुश्किल हो जाती है. काफी कुछ हलात बदल रहे है. इसके बाद भी अभी विधवा विवाह को लेकर सोच दकियानूसी है. इसे बदलना जरूरी है. इसको लगातार सामने ला कर बदलने की कोशिश जारी करनी पडेगी.’

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