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इसलिए बैतूल में लड़खड़ाए भागवत

मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिले बैतूल में आर एस एस द्वारा आयोजित हिन्दू सम्मेलन पर देश भर की निगाहें थीं. इस आयोजन की तैयारियां संघ के कार्यकर्ता पिछले छह महीनो से करते गांव गांव घूम घूम कर आदिवासियों को इसमें शामिल होने पीले चावल बांटते उन्हें हिन्दू सम्मेलन की मंशा बता रहे थे कि यह उनके भले के लिए है. यह और बात है कि बैतूल ही नहीं बल्कि देश के अधिकतर आदिवासी नहीं जानते कि मोहन भागवत कौन हैं और आर एस एस के लोग क्यों उन्हें हिन्दू बनाने जताने और साबित करने पर तुले हुये हैं. यह बात भी किसी सबूत की मोहताज नहीं कि देश के दूर दराज के दुर्गम इलाकों में रहने वाले आदिवासियों ने कभी खुद को हिन्दू नहीं माना, न आज मानने तैयार हो रहे.

8 फरवरी को बैतूल के हिन्दू सम्मेलन में मोहन भागवत क्या बोले और उनकी मंशा क्या थी उसे समझने से पहले संक्षेप में यह जान लेना जरूरी और अहम है कि क्यों आदिवासी हिन्दू नहीं हैं. दरअसल में यह मसला या फसाद आर्यों के भारत आगमन से जुड़ा है. आदिवासी जंगलों में रहते हैं और किसी हिन्दू देवी देवता को अपना आराध्य नहीं मानते. तमाम इतिहासकर इस मुद्दे पर दो राय नहीं हैं कि आदिवासी प्रकृर्ति के उपासक हैं, वे सूर्य धरती और पेड़ पौधों को ही सब कुछ मानते हैं और इसी तरह के वास्तविक प्रतीकों की उपासना करते हैं, मूलत उनका कोई धर्म नहीं है. आदिवासी देवी देवताओं के नाम पर सिर्फ बूड़ा या बड़ादेव की पूजन करते हैं जिसे आर्य शंकर कहकर प्रचारित करते रहे.

इतिहासकारों का एक बड़ा तर्क यह भी है कि आदिवासियों को हिन्दू न मानने की एक अहम वजह यह भी है कि उनमे वर्ण व्यवस्था नहीं है और न ही उनका उल्लेख हिन्दू धर्म या उसके धर्म ग्रन्थों में है. वामपंथी इतिहासकर तरह तरह से यह साबित कर चुके हैं कि आदिवासी ही भारत का मूल निवासी है. आर्यों ने भारत आकर कुटिलता से उनका शोषण दोहन किया और धर्मग्रंथ रचकर उन्हे तरह तरह से प्रताड़ित किया. ये इतिहासकार यह भी कहते रहे हैं कि आदिवासी द्रविड़ हैं और द्रविड़ ही आदिवासी हैं, जो आर्यों यानि ब्राहणों को अपना स्वाभाविक शत्रु और आक्रांता मानते हैं. आर्यों और द्रविडों के युद्धों और वर्चस्व के संघर्षों से इतिहास भरा पड़ा है. गांधी जी ने आदिवासियों को गिरिराज संबोधन देने की कोशिश की थी, जिसका तत्कालीन वामपंथी इतिहासकारों ने जमकर विरोध किया था.

कई प्रमाण ऐसे मिलते हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि आदिवासी एक संस्कृति और सभ्यता हैं. हां कालांतर में बड़े पैमाने पर आदिवासियों ने बौद्ध धर्म अपना लिया था, इस बात के भी कई पुख्ता ऐतिहासिक सबूत हैं. अंग्रेज जब भारत आए तो उन्होंने बड़े पैमाने पर इन्हें ईसाई बनाना शुरू कर दिया, लेकिन इस बाबत उन्हे प्रताड़ित नहीं किया गया, बल्कि प्रलोभन लालच और सहूलियतें दी गईं और गले में क्रास लटकाकर उन्हे चर्च जा कर प्रार्थना करना सिखा दिया. यह सिलसिला आज भी जारी है, पर हैरानी की बात यह है कि आदिवासियों को इसमे कोई खास एतराज नहीं है.

भोपाल के एक सरकारी महकमे में नौकरी कर रही गोमती तिरकी (बदला नाम) की माने तो ऐसा इसलिए कि क्रिश्चियन मिशनरीज़ भले ही हमे ज्यादा सम्मान दें न दें पर किसी भी तरह या स्तर पर हमारा तिरिस्कार नहीं करतीं. बचपन में ही ईसाई धर्म अपना चुकी गोमती बताती हैं कि छत्तीसगढ़ के आधे आदिवासी ईसाई बन चुके हैं और रायगढ़ जशपुर जैसे कुछ जिलों में तो 90 फीसदी आदिवासी ईसाई बन चुके हैं. एवज में इन्हे आर्थिक मदद (बहुत ज्यादा नहीं) के अलावा चिकित्सा सुविधाएं और शिक्षा के अवसर मिलते हैं, जिसके जरिये आरक्षण के चलते गोमती जैसे लाखों युवा सरकारी नौकरी कर मुख्य धारा से जुड़कर सम्मानजनक ज़िंदगी जी रहे हैं.

निगाहें कहीं निशाना कहीं

आर एस एस की नजर जब आदिवासियों के धर्मांतरण पर पड़ी, तो उसने उन्हे हिन्दू कहना शुरू कर दिया ,लेकिन इस बाबत उसके पास ठोस तर्क या वजहें नहीं थी सिवाय इसके कि जिस बड़ा या बूड़ा देव की पूजा आदिवासी करते हैं, वह दरअसल में हिंदुओं का आदि देवता शंकर है. इस नाते आदिवासी हिन्दू हुये, लेकिन अतीत में हुआ आर्य द्रविड़ संघर्ष आदिवासी आज भी नहीं भूला है और न ही उनके द्वारा किए अत्याचार विस्मृत कर पाया है, इसलिए वह खुद को हिन्दू कहने और कहलाने से आतंकित और आशंकित ही रहता है. वह यह मानने को भी तैयार नहीं कि शंकर और बूड़ा या बड़ा देव एक ही हैं, अलावा इसके आदिवासियों के रीति रिवाज हिंदुओं के रीति रिवाजों से एकदम भिन्न हैं. मसलन हिन्दू शव को जलाते हैं और आदिवासी दफनाते हैं, आदिवासी हिंदुओं की तरह कर्मकांड नहीं करते आदि.

आर एस एस और हिंदुवादी संगठनों का प्रभाव उत्तर भारत तक ही सीमित रहा, जहां वे लगातार घर वापसी के नाम पर ईसाई बने. आदिवासियों को समारोहपूर्वक हिन्दू बनाते रहे ओड़ीशा बिहार झारखंड मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ में 80-90 के दशक में ऐसा बड़े पैमाने पर हुआ छत्तीसगढ़ के एक हिंदुवादी नेता दिलीप सिंह जूदेव तो ऐसे आयोजनों के लिए कुख्यात हो गए थे, पर हिंदुवादियों को घर वापसी या शुद्धिकरण अभियान में उल्लेखनीय सफलता आज तक नहीं मिली. इतना जरूर हुआ कि इसाइयों और हिंदुओं में जमकर हिंसक झड़पें और भीषण नरसंहार तक हुये, जिनसे आदिवासी इन दोनों धर्मों के बीच फुटबाल बनकर रह गया. दक्षिण भारत में द्रविड़ों का दबदबा रहा, लिहाजा वहां आर एस एस जैसे संगठनों को एंट्री ही नहीं मिली.

केरल के भी 90 फीसदी आदिवासी ईसाई धर्म कम्युनिस्ट राज में अपना चुके हैं और तमिलनाडू में तो द्रविड़ आंदोलन इतने जबरजस्त तरीके से पनपा कि एम जी रामचंद्रन और जयललिता ने अपने सी एम रहते आर एस एस को प्रतिबंधित सा ही रखा. प्रसंगवश यह दिलचस्प बात दोहराना जरूरी है कि ये दोनों ही ब्रामहन थे लेकिन दलितों और आदिवासियों के पैरोकार बनकर ही सत्ता में बने रह पाये. अब हालांकि जयललिता की मौत के साथ ही द्रविड़ आंदोलन भी दम तोड़ चुका है और पनीरसेल्वम और शशिकला कुर्सी की छीना छपटी में लगे हैं, जिससे एआईएडीएमके खत्म हो जाना तय दिख रहा है, जिसे लेकर भाजपा और आर एस एस दोनों खासे उत्साहित हैं.

भागवत उवाच के माने

कल और आज के इन हालातों का आर एस एस प्रमुख मोहन भागवत द्वारा दिये बैतूल में दिये गए भाषण का गहरा ताल्लुक है, जिसमे अधिकांश आदिवासी शहरी थे. गौरतलब है कि हिन्दू सम्मेलन को लेकर मीडिया यह आशंका जता चुका था कि भागवत बैतूल में आरक्षण पर बोलेंगे और आरक्षण खत्म करने का माहौल बनाएंगे. बात कम दिलचस्प नहीं कि नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद से ही आर एस एस आरक्षण के बारे में लगातार बयानबाजी करता रहा है, जिसका बड़ा खामियाजा बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा हार की शक्ल में भुगत भी चुकी है. आरक्षण के बाबत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के पहले भी ऐसा ही बयान आया था तो भाजपाई खेमे में खलबली मच गई थी और यूपी भी उसे हाथ से जाता दिखाई देने लगा था. भागवत के बयानों को बसपा प्रमुख मायावती चुनाव प्रचार में तुरुप के पत्ते की तरह इस्तेमाल कर रहीं हैं कि भाजपा अगर सत्ता में आई तो आरक्षण छीन लेगी. भागवत बैतूल में क्या बोलेंगे इसे लेकर खासा तनाव और सस्पेंस भगवा खेमे मे था. हिन्दू सम्मेलन के पहले पहली दफा बैतूल आए मोहन भागवत का वहां उम्मीद से बाहर जाकर विरोध कोई 20 आदिवासी संगठनो ने किया था और ऐसा पहली दफा हुआ था कि भाजपा और हिन्दुत्व के गढ़ मध्यप्रदेश में उनका पुतला फूंका गया था, जिसकी अगुवाई एक आदिवासी नेता कल्लू सिंह ने की थी.श्‍

इन संगठनों का विरोध इन 2 प्रमुख बातों को लेकर था कि आर एस एस जबरिया हिन्दू बनाने पर उतारू हो आया है और आदिवासियों को हिन्दू बनाकर उनसे आरक्षण छीनने की साजिश रची जा रही है. इस तरीके के विरोध से सभी भोंच्चक और डरे हुये थे कि कहीं मोहन भागवत के आने पर भी उनका विरोध न किया जाये लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ उलटे भागवत का स्वागत वैदिक काल के ऋषि मुनियों की तरह किया गया. विरोधियों की अगुवाई कर रहे कल्लू सिंह गधे के सर से सींगो की तरह गायब हो गए तो लोगों की हैरानी और बढ़ी. बैतूल के एक युवा पत्रकार मनोज देशमुख की माने तो वे कल्लू सिंह का मोबाइल नंबर 2 दिन तक लगाते रहे पर वह हर बार बंद मिला. क्या कल्लू सिंह की आर एस एस से कोई डील हुई है या वे डर गए हैं, इस सवाल का जबाब न तो मनोज के पास है न ही किसी और के पास.

पहली दफा मोहन भागवत ने ऐसा भाषण हिन्दू सम्मेलन में दिया जिससे कांग्रेसी बू भी आई और आर एस एस का नया एजेंडा भी साफ दिखा, बजाय आदिवासियों के मोहन मुसलमानों पर ज्यादा बोले. उन्होंने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि मुसलमान इबादत से मुसलमान हैं पर आदत से हिन्दू हैं, वे इबादत भले ही खुदा की करें पर आरती भी करें तो क्या हर्ज है. अपनी मंशा और स्पष्ट करते उन्होंने कहा कि भारतीय मुस्लिम भारत माता की आरती करें तो  क्या हर्ज है, हिन्दू और हिंदुस्तान की व्याख्या करते भागवत ने फिर दोहराया कि हर भारतीय हिन्दू है. भारत माता की जय कोई भाषा नहीं है, बल्कि ह्रदय की भाषा है, हर एक में राम का अंश है.

भाषा और जात पात के भेद को खत्म करने की अपील करते भागवत ने आदिवासियों के धर्म और आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर खामोशी ओढ़े रखी तो साफ लगा कि वे पहली दफा लड़खड़ाते राजनीति की भाषा बोल रहे हैं और समझ भी रहे हैं कि कुछ भी हो जाये आदिवासी हिन्दू देवी देवताओं को नहीं मानेगा, तो उसे भारत माता का झुनझुना थमा रहे हैं और आदिवासियों के मातृ भूमि प्रेम को एक हिन्दू देवियों सरीखी दिखने वाली भारत माता की पूजा अर्चना उनसे कराना चाह रहे हैं. गौरतलब है कि आर एस एस के कार्यकर्ताओं ने गणतन्त्र दिवस पर बैतूल के कोई 1400 गांवो के 2500 स्थानों पर भारत माता की हिन्दू पद्धति से पूजा अर्चना आरती की थी. इसके वीडियो वायरल हुये थे, तब समझने वालों को समझ आ गया था कि आदिवासियों को भारत माता के नाम पर हिन्दू बनाने का नया और नायाब तरीका ढूंढ निकाला गया है, जिसे लेकर काफी बवाल पहले मच चुका है और आगे भी मचता रहेगा. हालाकि मुस्लिम बाहुल्य पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे 11 फरवरी की वोटिंग के मद्देनजर वे मुसलमानो को भी राष्ट्रीयता की नाम पर फिर पुचकारते दिखे आरक्षण पर उनकी खामोशी की एक वजह उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव ही थे, जहां भाजपा को उम्मीद है कि उसे कुछ अपग्रेड होते जा रहे दलितों का समर्थन मिलेगा जो खुद को हिन्दू कहलाने का आधार धार्मिक होना और घंटे घड़ियाल बजाना समझने लगे हैं यही हाल 8-10 फीसदी आदिवासियों का भी है.

मोहन भागवत और आर एस एस की मंशा बैतूल से खुलकर सामने आ गई है कि सब भारतीय हिन्दू हैं और सबकी नई देवी भारत माता है, जिसके नए नए मंदिर बनेंगे. नए पंडे वैदिक रीति से उसका पूजा पाठ कर दक्षिणा बटोरेंगे और यह धार्मिक टेक्स अब मुसलमानो इसाइयों और आदिवासियों को भी देना पड़ेगा, क्योंकि राष्ट्र और धर्म का अंतर खत्म किया जा रहा है और जो यह हुक्म जो हाल फिलहाल एक मशवरा है नहीं मानेगा उसे राष्ट्रद्रोही भी करार दिया जा सकता है.

क्या आप जानते हैं बॉलीवुड हस्तियों की इन अजीब आदतों के बारे में

हमें यकीन है कि आप बॉलीवुड हस्तियों की इन अजीबो-गरीब आदतों के बारे में नहीं जानते होंगे जो आज हम आपको बताने जा रहे हैं.

शाहरुख खान

बॉलीवुड के बादशाह कहे जाने वाले शाहरुख खान के दुनिया भर में  कई प्रशंसक हैं. शाहरुख के फेन्स को ये बात जानकर हैरानी होगी कि किंग खान खुद को जूतों के साथ रहने का जैसे जुनून सवार है. शाहरुख खान एक साक्षात्कार में ये बात स्वीकार कर चुके हैं कि वे दिन में केवल एक बार ही बार अपने जूते उतारा करते हैं. और कई बार वे अपने जूतों के साथ ही सो भी जाया करते हैं.

सन्नी लियोनी

बॉलीवुड की सेक्सी दीवा कही जाने वाली अभिनेत्री सन्नी लियोनी की एक असामान्य आदत जानकर आपको हैरानी होगी. जिस आदत के कारण कई बार सनी उनकी फिल्मों के शूट भी लेट करा देती हैं. सनी को अपने पैरों को बार बार धोने की आदत है. उनकी यह कुछ ऐसी जरुरत है जिसे वे अनदेखा भी नहीं कर पाती हैं. जिस्म 2 की शूटिंग के दौरान, वे सेट को हर 15 मिनट में छोड़ कर चली जाती थी, जाहिर तौर पर वे ऐसा अपने पैरों को साफ करने के लिए ही करती थी.

करीना कपूर खान

यहां हम आपको बता देना चाहते हैं कि बेबो करीना कपूर खान खुद को अपने नाखून खाने से नहीं रोक सकती. कई लोगों ने उनकी ये आदत छुड़ानी की कोशिश की पर सभी की सारी मेहनत बेकार गई. तो जाहिर सी बात है कि अपनी फिल्मों में वे कृतिम नाखून पहनने के लिए मजबूर हो जाती हैं.

आयुष्मान खुराना

हम सभी हमारे दांत दिन में दो बार ब्रश करते है या कम से कम दो बार करने का प्रयास तो हम करते ही हैं. दूसरी ओर दिलों की धड़कन चुरा लेने वाले आयुष्मान अपने दांतों को दिन में जितनी बार ब्रश कर सकते हैं, करते हैं. सुनने में तो यही लगता है जैसे आयुष्मान हमेशा रोमांस के लिए तैयार रहते हैं. ऐंसा लगता है कि आयुष्मान को अपने दांतों को ब्रश करना बेहद पसंद है. उन्हें इसमें आनंद मिलता है. तो ऐसे वे हमेशा ताजा सांसों के लिए कभी भी, कैसे भी तैयार रहते हैं.

जॉन अब्राहम

सुंदर कहे जाने वाले स्टड अभिनेता जॉन की जो आदत है वो वास्तव में काफी आम है. कि इस सूची में जगह बनाता है। जॉन लगातार अपने पैर हिला, वह कहाँ है की परवाह किए बगैर की कष्टप्रद आदत है। एक नाटक है कि उसके आसपास के लोगों को परेशान, जॉन के मामले में यह सिर्फ रोक नहीं सकते

अमिताभ बच्चन

यह वास्तव में एक बहुत ही अजब आदत है पर इसके पीछे  बहुत सारा प्यारा छुपा हुआ है. हमारे बिग बी एक कलाई पर एक बार मे दो घड़ियां पहनते हैं. दरअसल जब अभिषेक या ऐश्वर्या कहीं यात्रा कर रहे होते हैं तो बिग बी एक घड़ी भारतीय समयानुसार सेट करके पहनते हैं और दूसरी को उस क्षेत्र के समय के अनुसार निर्धारित करते हैं जहां वे लोग यात्रा कर रहे होते हैं.

सुष्मिता सेन

आपको जानकर हैरानी तो होगी ही, खूबसूरत अभिनेत्री सुष्मिता सेन के घर की छत पर ही बाथटब लगा हुआ है. वास्तव में बात ऐसी है कि उन्हें खुले में नहाने की आदत है. वे कहती हैं कि इससे उन्हें ज्यादा सुविधा होती है.

इस हमाम में सब रेनकोट में हैं

दूसरे कई कामों और क्रियाओं की तरह नहाना वह भी अपने  खुद के  बाथरूम में निहायत ही व्यक्तिगत बात और मामला है, जिसका कम से कम स्वच्छ भारत अभियान से कोई ताल्लुक अभी तक तो सरकारी या गैर सरकारी स्तर पर नहीं था पर अब हुआ तो देश भर में हंगामा मचा हुआ है. कोई दूसरा बाथरूम में कैसे नहाता है इस पर जिज्ञासा हो सकती है लेकिन कोई सर्वे या शोध अभी तक इस क्षुद्र विषय पर नहीं हुआ है. नहाने का सबका अपना एक अलग स्टाइल होता है, कोई बाथरूम में घुसते ही नल या फव्वारा चलाकर हर हर गंगे जैसे मंत्रोच्चारण शुरू कर देता है तो कोई बहुत देर तक पानी छपाछप कर अपने आप में नहाने की हिम्मत पैदा करता है कई कई लोग बाथरूम सिंगर होते हैं जो शरीर की सफाई फिल्मी गानों के साथ करते हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह रेनकोट पहन कर शावर के नीचे खड़े होकर नहाते हैं, यह गोपनीय रहस्य राज्यसभा में पीएम नरेंद्र मोदी ने खुलासा किया तो कांग्रेसियों ने अपने नेता की प्रायवेसी भंग होने पर बवाल मचा डाला. सियासी हमाम में आमतौर पर सब नंगे ही माने जाते रहे हैं पर मनमोहन सिंह के लिए बक़ौल मोदी यह एक कला है जिसकी उपयोगिता मंशा या मकसद भ्रष्टाचार के दाग धब्बे ढकना या छुपाना है. खुद नरेंद्र मोदी कैसे नहाते हैं यह न उन्होंने बताया न किसी ने उनसे पूछा. मुमकिन है सूचना के अधिकार के तहत कोई होनहार जिज्ञासु आरटीआई एक्टिविस्ट यह जानकारी भी मांग डाले पर तब तक गंगा जी का करोड़ों क्यूसेक पानी बह चुका होगा.

नहाने के पर्यायवाची शब्दों में अब भ्रष्टाचार करना भी शामिल किया जाना चाहिए, जो शावर के नीचे रेनकोट पहन कर नहाये उसके लिए मनमोहन सिंह का उदाहरण शब्दों के वाक्यों के प्रयोग में करना चाहिए, जो छाता लगाकर नहाये उसे अर्ध-भ्रष्टाचारी माना जाना चाहिए, जो तौलिया लपेटकर स्नान करे उसे एक चौथाई और जो चड्डी यानि अंडरवियर धारण कर नहाये उसे एक तिहाई से कुछ कम भ्रष्टाचारी माना जाना चाहिए. पूर्ण प्राकृतिक अवस्था में नहाने वाले को ईमानदार होने का सर्टिफिकेट देने में हर्ज नहीं और इस बाबत जरूरी है कि सभी नेताओं के बाथरूमों में सीसीटीवी कैमरे फिट किए जाएं और कोई सरकारी एजेंसी नहाने के तरीकों की रिकार्डिंग कर तय करे कि कौन नेता किस हद तक भ्रष्ट है.

नरेंद्र मोदी ने कोई गरिमा भंग नहीं की है बल्कि यह जताने की कोशिश की है कि दैनिक क्रियाओं का भी घपले घोटालों से संबंध होता है या हो सकता है, इसलिए न केवल नहाने बल्कि मंजन ब्रश करने,  बालों में तेल या क्रीम कलर लगाने और कान खुजलाने के तरीके भी नेता के भ्रष्ट होने के पैमाने हो सकते हैं. इस स्नान पुराण की एक गंभीर और चिंतनीय बात मोदी की वह मंशा हो सकती है जिसके तहत सिक्ख समुदाय के लोगों का चुटकुलों के जरिये मजाक बनाया जाता है. सुप्रीम कोर्ट भी  अभी तक इस मसले पर कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दे पाया है, अगर ऐसा है तो वाकई नरेंद्र मोदी ने बेहद घटिया हरकत की है और उनकी मंशा ऐसी नहीं थी तो उन्हें सार्वजनिक रूप से यह कहने बाध्य किया जाना चाहिए कि वे एक स्वस्थ परिहास कर रहे थे.

अजब राजनीति की गजब लीला

तमिलनाडु में जे जयललिता के निधन के बाद अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम पार्टी में एक रोचक स्थिति पैदा हो रही है. जैसे पहले सिने स्टार एमजी रामचंद्रन की मृत्यु के बाद उन की कोस्टार जे जयललिता और विधिवत पत्नी वीएन जानकी रामचंद्रन के बीच विरासत की लड़ाई हुई थी, वैसी ही अब जयललिता की मृत्यु के बाद उन की बहुचर्चित मित्र शशिकला और अब तक गुमनाम रही जयललिता की भतीजी दीपा जयकुमार के बीच पनप रही है.

एआईडीएमके के बहुत से कार्यकर्ता शशिकला से खुश नहीं हैं और उन का खयाल है राजनीति में नईनवेली दीपा को हांकना आसान होगा. जिस राज्य में मुख्यमंत्री और नेता को देवी की तरह पूजा जाता हो वहां जो स्थान साथी को मिलेगा, उस से बड़ा व्यापक खून के रिश्तेदार को मिलेगा. अगर दीपा जयकुमार ने राजनीतिक पैतरेबाजी सीख ली तो वह शशिकला के लिए चुनौती बन सकती है.

जयललिता ने जीतेजी शशिकला को केवल घर तक सीमित रखा था. कुछ समय के लिए तो दोनों में अनबन भी हो गई थी पर अंतत: अंतिम सालों में शशिकला से ही जयललिता का पीयर्स गार्डन घर चलता था. हर राजनीतिक फैसले में उस की सलाह ली जाती थी पर जयललिता ने कभी उसे पार्टी के नेताओं से नहीं मिलने दिया. जब जयललिता ने एमजी रामचंद्रन की मृत्यु के बाद सत्ता संभाली थी, तब तक वे राजनीति में मंज चुकी थीं और राज्य सभा तक में रह आई थीं.

शशिकला और दीपा दोनों जयललिता का नाम मुनाफा चाह रही हैं बिना राजनीति की दलदल का अनुभव किए. राजनीति इतनी आसान नहीं खासतौर पर तब जब भारतीय जनता पार्टी, द्रविड़ मुनेत्र कषगम और दूसरी दसियों पार्टियां खाली हुई जगह को घेरने के लिए बेचैन हो रही हों. फिर भी 2 नौसिखियों के बीच यह कुश्ती ‘दंगल’ की तरह हो सकती है. देश को महिला कुश्ती में अब आनंद आने लगा है और शशि बनाम दीपा कुश्ती रोचक होगी भले मैडल इन में से एक को मिले या किसी को भी नहीं.             

जब बिस्तर पर पकड़े जाएं

बेंगलुरु के एक 31 वर्षीय सौफ्टवेयर इंजीनियर को काफी समय से अपनी पत्नी पर शक था कि उस का किसी के साथ अफेयर चल रहा है और वह ये सब छिपा कर उसे धोखा दे रही है. इंजीनियर को कई बार घर से सिगरेट के कुछ टुकड़े मिलने के साथसाथ और भी कई ऐसी चीजें मिली थीं जिन से पत्नी पर शक और पुख्ता हो गया था. इन सब के बावजूद जब पत्नी ने अपने संबंध की बात नहीं कबूली तो उस ने अपनी पत्नी की गतिविधियों को ट्रैक करने की ठानी. इस के लिए उस ने लिविंग रूम की घड़ी के पीछे एक कैमरा सैट किया, लेकिन उस की यह कोशिश नाकाम रही. दूसरी बार उस ने 2 अन्य कैमरे लिविंग रूम में डिफरैंट ऐंगल्स पर सैट किए. साथ ही अपनी पत्नी के फोन को अपने लैपटौप पर ऐप के माध्यम से और रिमोट सैंसर से कनैक्ट किया, जिस से उसे पत्नी के फोन की चैट कनैक्ट करने में आसानी हुई और वौइस क्लिप के माध्यम से पता चला कि उस की पत्नी अपने बौयफै्रंड से कंडोम लाने की बात कह रही थी. उस ने कैमरों की मदद से बैडरूम में उन्हें संबंध बनाते हुए भी पकड़ा.

इन्हीं पुख्ता सुबूतों के आधार पर पति ने तलाक का केस फाइल किया. अदालत में पत्नी ने भी अपनी गलती स्वीकारी, जिस के आधार पर दोनों का तलाक हुआ. ऐसा सिर्फ एक मामला नहीं बल्कि ढेरों मामले देखने को मिलते हैं जिन में बिस्तर पर रंगेहाथों अवैध संबंध बनाते पकड़े जाने पर या तो रिश्ता टूट जाता है या फिर ब्लैकमेलिंग की जाती है. इतना ही नहीं आप समाज की नजरों में भी गिर जाएंगे. ऐसा भी हो सकता है कि आप का कोईर् फ्रैंड आप को रिलेशन बनाते हुए पकड़ ले. भले ही आप उसे दोस्ती का वास्ता दें लेकिन अगर उस का दिमाग गलत सोच बैठा तो वह आप को इस से बदनाम कर के आप को कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ेगा. ऐसे में अगर आप पार्टनर के साथ संबंध बनाने की इच्छा रखते भी हैं तो थोड़ी सावधानी बरतें ताकि आप ब्लैकमेलिंग का शिकार न होने पाएं.

करीबी का रूम न लें

आप का बहुत पक्का फ्रैंड है और आप उस पर ब्लाइंड ट्रस्ट कर के अपने फ्रैंड का रूम ले लें और बेफिक्र हो कर सैक्स संबंध बनाने लगें. लेकिन हो सकता है कि फ्रैंड ने पहले से ही रूम में कैमरा वगैरा लगाया हो, जिस से बाद में वह ब्लैकमेल कर के आप से पैसा ऐंठे या फिर आप के पार्टनर से सैक्स संबंध बनाने की ही पेशकश कर दे. ऐसे में आप बुरी तरह फंस जाएंगे. इसलिए करीबी का रूम न लें.

सस्ते के चक्कर में न फंसें

हो सकता है कि आप सस्ते के चक्कर में ऐसे होटल का चुनाव करें जिस की इमेज पहले से ही खराब हो. ऐसे में आप का वहां सैक्स संबंध बनाना खतरे से खाली नहीं होगा. वहां आप के अंतरंग पलों की वीडियो बना कर आप को ब्लैकमेल किया जा सकता है.

नशीले ड्रिंक का सेवन न करें

पार्टनर्स को नशीले पदार्थ का सेवन कर के सैक्स संबंध बनाने में जितना मजा आता है, उतना ही यह सेहत और सेफ्टी के लिहाज से सही नहीं है. ऐसे में जब आप नशे में धुत्त हो कर संबंध बना रहे होंगे तब हो सकता है आप का कोईर् फ्रैंड आप को आप के पेरैंट्स की नजरों से गिराने के लिए ये सब लाइव दिखा दे. इस से आप अपने पेरैंट्स की नजरों में हमेशाहमेशा के लिए गिर जाएंगे.

न लगने दें किसी को भनक

अगर आप अपने पार्टनर के साथ संबंध बनाने का मन बना चुके हैं तो इस की भनक अपने क्लोज फ्रैंड्स को न लगने दें वरना वे भी सबक सिखाने के लिए आप को अपने जाल में फंसा सकते हैं.

कहीं रूम में कैमरे तो नहीं

जिस होटल में या फिर जिस भी जगह पर आप गए हैं वहां रूम में चैक कर लें कि कहीं घड़ी, अलमारी वगैरा के पास कैमरे तो सैट नहीं किए हुए हैं. अगर जरा सा भी संदेह हो तो वहां एक पल भी न रुकें वरना आप के साथ खतरनाक वारदात हो सकती है.

मुहब्बत का शिकायतनामा

युवतियों का शिकायतनामा जब युवकों को हम से दोस्ती करनी होती है, तो वे आगेपीछे घूमते हैं, पर बाद में सारी अटैंशन व प्यार छूमंतर हो जाता है. पहलेपहल तो आसमान से तारे तोड़ कर लाने को तैयार रहते हैं, प्यार निछावर करते हैं, पर बाद में कद्र नहीं करते. एक बार दोस्ती हो जाने पर वे हम पर अपनी बातें व पसंदनापसंद तक थोपना शुरू कर देते हैं, यह पहनो, यह मत पहनो, यह क्यों खाती हो, मोटी हो रही हो आदि. केयर हम उन की करते हैं, वे हमारी नहीं करते. कहीं घूमने जाने को कहो तो आनाकानी करते हैं. हमारी नई ड्रैस, फुटवियर या पर्स की कभी प्रशंसा नहीं करते, झूठी भी नहीं.

जब खुद का मिलने का मन हो तो जिद पर उतर आते हैं और बस हुक्म देना जानते हैं. वे कभी टेक केयर शब्द का इस्तेमाल नहीं करते हैं. हम उन की खुद से भी ज्यादा केयर करते हैं, जो उन्हें भी मालूम होता है कि हम उन्हें कितना चाहते हैं, पर वे कभी इजहार नहीं करते. जब भी मिलने आते हैं खाली हाथ आते हैं, न कोईर् फूल न चौकलेट.

युवकों की सफाई

ऐसा नहीं है कि हम उन की परवा नहीं करते. हम भी उन की उतनी ही चिंता करते हैं, पर शो नहीं करते. जब तक रोज 10-20 बार आई लव यू न कहो उन्हें लगता ही नहीं कि हम उन्हें प्यार करते हैं.  एक तरफ तो शिकायत रहती है कि हम उन पर ध्यान नहीं देते, पर जब उन्हें कम खाने अथवा ड्रैसेज के बारे में कोई सुझाव देते हैं, तो कहती हैं कि हुक्म चलाते हो. केयर से उन का मतलब गुडनाइट, गुडमौर्निंग का मैसेज भेजने से होता है.

मिलने हेतु इतनी देर से आती हैं, मूड औफ हो जाता है. वे झूठी प्रशंसा से भी खुश हो जाती हैं, जो हमें पसंद नहीं. हां, उन की ड्रैस आदि की हमें समझ नहीं होती. प्यार में मिलना कितना जरूरी होता है यह तो बस प्रेमी ही जान सकते हैं. विदा लेते समय प्यार से गाल छूने या हाथ दबाने का यही अर्थ है. हम अपनी इस कमजोरी को उन से छिपा कर रखना चाहते हैं कि हम उन के बगैर कुछ नहीं या उन से दूर हो कर रह नहीं सकते. हमारे प्यार को देखें चौकलेट व फूल समयसमय पर देते ही रहते हैं.

युवकों का शिकायतनामा

इजहार हो जाने के बाद वे हमें अपनी उंगलियों पर नचाना चाहती हैं.

अगर कोई बात काट दो या न मानो तो मुंह फुला कर बैठ जाती हैं, कईकई दिन तक फिर बात नहीं करतीं, उन की हर बात मानना हमारे लिए मानो अनिवार्य हो.

जब उन का मन होता है तभी मिलने का नाम लेती हैं वरना आनाकानी करती व बहाने बनाती हैं.

किसी दूसरी युवती या फ्रैंड से बात भी करो तो उन्हें परेशानी होने लगती है. वे हमें अपने पल्लू से बांधे रखना चाहती हैं.

प्यार करने के नाम पर उन्हें पेटदर्र्द शुरू हो जाता है.

अगर झगड़ा हो जाए और बातचीत भी बंद हो तब हमें जलाने में उन्हें बड़ा मजा आता है. जो बातें हम उन्हें मना करते हैं, तब वे जानबूझ कर वही करती हैं. मसलन, कालेज के किसी लोफर युवक से बातें करना या उस के साथ घूमना.

किसी दिन ज्यादा तव्वजो न दो तो ‘कोई और मिल गई है क्या?’ जैसे ताने देती हैं.

बिजी होने पर यदि फोन या मैसेज का रिप्लाई न करो तो झगड़ा होना तय समझो.

वे बस अपनी फीलिंग्स को ही महत्त्व देती हैं, हमें समझने की कोशिश नहीं करतीं.

फोन करो तो उठाती नहीं, ‘रात है, वीकैंड है’ जैसे बहाने उन के पास हमेशा तैयार रहते हैं.

युवतियों की सफाई

दरअसल, हम उन की केयर करती हैं, मसलन शेव न बढ़ाने देना आदि.

दरअसल, अपनी थोड़ी इंपोर्टैंस तो दिखानी ही पड़ती है. फिर रूठना तो युवतियों का अधिकार है और हमें मनाना उन की जिम्मेदारी.

ज्यादा मिलनेमिलाने से वह जोश नहीं रहता इसलिए थोड़ा गैप देती हैं ताकि उत्साह और मिलने की बेचैनी बनी रहे.

एक सीमा तक ही किसी युवती से मिलनामिलाना, बात करना ठीक रहता है, पर जब यह ओवर हो जाता है, तब हमें मुंह खोलना ही पड़ता है.

ये एक बार में ही प्यार की सारी डोज दे और ले लेना चाहते हैं, जो हम पसंद नहीं करतीं.

यही तो समय होता है यह जानने का कि वह हमारी कितनी परवा करता है. उस के चिढ़ने, हमें फौलो करने का मतलब है कि वह हम पर जान छिड़कता है. इसी जलानेचिढ़ाने में तो मजा है.

मिलने पर ऐसा दिखावा करते हैं मानो मिलने की बेचैनी सिर्फ हमें रहती है उन्हें नहीं. ध्यान ही नहीं देते हम पर.

फोन रिसीव न कर सकें तो कम से कम एक मैसेज तो डाल ही सकते हैं कि बिजी हूं. टौक टू यू लेटर.

ये कभी मन की बातें शेयर नहीं करते. कुछ जानना चाहो तो ‘लीव इट यार’ कह कर बात टाल जाते हैं.

इन का मन रात को ही बातें करने का अधिक होता है. परिवार वालों की मौजूदगी में यह कठिन होता है.

युवतियों हेतु टिप्स

युवतियों के लिए टिप्स, ताकि उन के बौयफ्रैंड के साथ हमेशा प्यारा भरा रिश्ता कायम रहे और वे हमेशा उन की बांहों में झूलती रहें :

– बौयफ्रैंड पर बंदिश लगाने के बजाय उसे आजाद घूमने दें, अगर आप का प्यार सच्चा और रिश्ता मजबूत है तो आप के बीच कोई नहीं आएगा, इसलिए अपने मन से इस डर को निकाल दें कि कहीं वह किसी और का न हो जाए.

– छोटीमोटी बातों को तूल न दें, अगर वह वास्तव में बिजी है या किसी परेशानी में घिरा है तो उस का साथ दें.

– दूर चली जाने अथवा रिश्ता तोड़ देने की धमकी दे कर अपनी हर जायजनाजायज बात उस पर थोपने की कोशिश न करें.

– उस के सामने बनावटीपन न दिखाएं. आप जैसी हैं वैसी ही बनी रहें.

– उस के सामने ओवरस्मार्ट बनने का प्रयास कर के उस की हर बात को बीच में ही न काटें.

– उस के सामने हर वक्त अपनी छोटीछोटी परेशानियों का रोना न रोएं इन्हें आप खुद सुलझाना सीखें, इस से आप का आत्मविश्वास बढ़ेगा.

– अगर वह आप को टेक केयर नहीं कहते हैं, तो आप इस की शुरुआत कर दें, कुछ दिन में वे आप को खुद टेक केयर कहने लगेंगे.

– किसी दूसरी युवती से बात करें, तो आप जलें नहीं, बल्कि बातचीत में शामिल हो कर उन के बीच अपनी उपस्थिति व बड़प्पन दर्ज करवाएं. इस से आप के पार्टनर को भी अच्छा फील होगा और वह भी आप से कोई बात नहीं छिपाएगा.

युवकों हेतु टिप्स

युवकों के लिए कुछ टिप्स, ताकि उन की गर्लफ्रैंड को भरोसा हो जाए कि आप भी उन की उतनी ही परवा व प्यार करते हैं, जितनी वे आप की :

–       युवतियां युवकों से बिलकुल अलग होती हैं, इसलिए उन्हें खास अटैंशन दें. उन की फीलिंग्स की हमेशा कद्र करें व उन्हें वैसा ही रिस्पौंस दें, जैसा वे आप से चाहती हैं.

–       उन की हर बात, ख्वाहिश व सलाह को इग्नोर न करें, अगर वे कहीं घूमने जाने अथवा ढेरों बातें करने के मूड में हैं तो उन्हें बीच में टोक कर या मना कर के उन का दिल न तोड़ें.

–       वे आप को प्यार करती हैं इस नाते आप से उन्हें कुछ उम्मीदें भी बंध जाती हैं. इसलिए उन्हें टेक केयर कहना कभी न भूलें, इस से उन्हें महसूस होता है कि आप उन की कितनी परवा करते हैं.

–       अगर गलती हुई है तो सौरी बोल कर मना लें. यदि गलती उन की भी हो, तो भी यह इंतजार न करें कि वे आप से माफी मांगें.

–       गर्लफ्रैंड की किसी भी समस्या को एक कान से सुन कर दूसरे से निकालने की आदत न बनाएं, बल्कि समाधान ढूंढ़ें.

– जो बातें उन्हें तकलीफ पहुंचाती हैं, उन्हें कभी न दोहराएं. भूल कर भी उन का मजाक न उड़ाएं.

–       अगर वे आप को अपनी नई ड्रैस, पर्स, सैंडिल या ईयररिंग्स दिखा कर तारीफ का इंतजार कर रही हैं, तो इन चीजों को दूर से देख कर ‘हां अच्छी है’ कह कर न टालें.

–       डेटिंग के बाद उन्हें घर, यदि घर नहीं जा सकते तो घर के निकट कहीं ड्रौप करें व फोन अथवा मैसेज कर के अवश्य पूछें कि वे सकुशल घर पहुंच गईं.                            

बॉलीवुड सितारों की अश्लील हरकतें देखकर आप हो जाएंगे हैरान..!

वैसे तो आपने बॉलीवुड के तमाम उन पार्टियों के फुटेज या वीडियो देंखें होंगे, जिनमे हीरो व हीरोइन गजब ढाते दिखाई देते हैं. खासकर हीरोइन जो की अपने हुस्न के जलवे से सबको दीवाना कर देती हैं.

लेकिन शायद ही आपने इन लोगों की गोपनीय पार्टियों की कोई वीडियो या फुटेज देखी हो, क्योंकि वहां पर लाखों दिलों पर राज करने वाली एक्ट्रेस या ऐक्टर एक खास अंदाज व खास मूड में शामिल होते हैं.

इन पार्टियों में ये हीरोइनें अपने जबर्दस्त फिगर और खास अंदाज से लोगों को अपना दीवाना बना लेती है. हालांकि कई बार उनकी हरकतें अश्लीलता की सारी सीमाएं पार कर जाती हैं. आज हम भी आपके लिए लाए हैं एक ऐसा वीडियो, जिसे देखकर आप रह जाएंगे हैरान.

आप भी देखिये ये वीडियो…

खुल गई पुलिस की पोल

उस दिन छोटी दीपावली थी और तारीख थी 29 अक्तूबर, 2016. दोपहर साढ़े 3 और 4 बजे के बीच राजस्थान पुलिस के हैडकांस्टेबल सुभाषचंद्र मीणा ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर के बताया, ‘‘अलवर के जिला अस्पताल से 2 कैदी कुलदीप यादव उर्फ डाक्टर और कृष्ण गुर्जर उर्फ लादेन पुलिस हिरासत से भाग गए हैं. दोनों ही कैदी हरियाणा और राजस्थान के कुख्यात गैंगस्टर हैं.’’ कैदियों के भागने की यह घटना काफी गंभीर थी, इसलिए कंट्रोल रूम से वायरलैस द्वारा दोनों कैदियों के भागने की सूचना पूरे जिले में प्रसारित कर दी गई. दोनों कैदियों के अलवर से भाग कर हरियाणा जाने की आशंका थी. इसलिए हरियाणा के पुलिस अधिकारियों को भी इस घटना की सूचना दे दी गई.

इसी के साथ पूरे जिले में ए-श्रेणी की नाकेबंदी कर दी गई. खासतौर से अलवर से हरियाणा की तरफ वाले रास्तों पर प्रत्येक वाहन की जांच शुरू कर दी गई. अलवर से हरियाणा की ओर जाने के लिए मुख्यरूप से 2 सड़क मार्ग हैं, एक अलवर से रामगढ़-फिरोजपुर झिरका, मेवात, गुड़गांव वाली रोड और दूसरी अलवर से किशनगढ़बास, तिजारा-भिवाड़ी, धारूहेड़ा, गुड़गांव की रोड. इसे अलवर-भिवाड़ी हाईवे भी कहते हैं.

सूचना मिलते ही एडिशनल एसपी, डीएसपी के अलावा कोतवाली प्रभारी भी जिला अस्पताल पहुंच गए. अस्पताल में हैडकांस्टेबल सुभाषचंद मीणा, कांस्टेबल ओमप्रकाश वर्मा और कृष्णकांत जाटव मिले. तीनों ने बताया कि वे चालानी गार्ड हैं और किशनगढ़बास उपकारागृह से दोनों कैदियों को वहां ले कर आए थे.

उन के बताए अनुसार, कैदी कुलदीप यादव के कंधे में चोट लगी थी और कृष्ण गुर्जर की दाढ़ में दर्द था. इसलिए उन्होंने दोनों को अस्पताल में अलगअलग डाक्टरों को दिखाया था. इस बीच उन की हथकड़ी खोल दी गई थी.

डाक्टरों को दिखा कर कांस्टेबल ओमप्रकाश कैदियों की दवा लेने चला गया. उस के जाने के बाद सवा 2 बजे के करीब दोनों कैदी हैडकांस्टेबल सुभाषचंद व कांस्टेबल कृष्णकांत को धक्का दे भाग गए थे.

कैदियों के भागने पर पुलिसकर्मियों ने काफी शोर मचाया था, लेकिन वे पकडे़ नहीं जा सके. एडिशनल एसपी के निर्देश पर कोतवाली के थानाप्रभारी ने जांच की तो पता चला कि अलवर के इस सरकारी अस्पताल में ओपीडी का समय सुबहशाम है. अक्तूबर के आखिर में अस्पताल का सुबह का समय 9 बजे से दोपहर एक बजे तक था. दोपहर में केवल आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं ही उपलब्ध होती थीं.

जबकि पुलिसकर्मियों ने बताया था कि दोनों कैदी सवा 2 बजे के करीब भागे थे. उस समय अधिकांश डाक्टरों के कमरे बंद हो चुके होते थे और अस्पताल में कोई भीड़भाड़ नहीं होती थी.

कोतवाली प्रभारी ने अस्पताल के कर्मचारियों व अन्य लोगों से पूछताछ की तो किसी ने भी नहीं बताया कि उन्होंने किसी कैदी को भागते देखा था. वहां कोई ऐसा आदमी नहीं मिला, जिस ने कैदियों के भागने पर पुलिसकर्मियों को शोर मचाते सुना हो. कहीं से भी अस्पताल से कैदियों के भागने की पुष्टि नहीं हुई.

इस अस्पताल में पुलिस चौकी बनी हुई थी. अस्पताल में कोई भी घटना होने पर चौकी के कर्मियों को सब से पहले जानकारी मिलती थी, पर चालानी गार्डों ने कैदियों के भागने की सूचना पुलिस चौकी पर भी नहीं दी थी. उन्होंने सीधे पुलिस कंट्रोल रूम को फोन किया था.

कैदियों के भागने के बारे में कोतवाली प्रभारी ने अस्पताल के वाहन स्टैंड के कर्मचारियों से भी पूछताछ की. वहां से उन्हें एक नई बात पता चली. स्टैंड के एक कर्मचारी ने बताया कि सुबह पौने 10 बजे के करीब एक कार आई थी, जिस से 3 पुलिसकर्मी और हथकड़ी पहने 2 कैदी उतरे थे. तीनों पुलिसकर्मी दोनों कैदियों को अस्पताल ले गए थे. करीब आधेपौने घंटे बाद वे पुलिसकर्मी और दोनों कैदी आ कर उसी कार में बैठ कर चले गए थे.

कर्मचारी की बात से पता चला कि दोनों कैदी अस्पताल से नहीं भागे थे. कोतवाली प्रभारी ने अपनी यह जांच रिपोर्ट एडिशनल एसपी को सौंप दी. इस से पुलिस अधिकारियों का माथा ठनका. उन्हें दाल में साफसाफ काला नजर आ रहा था.

यह बात तो तय थी कि दोनों कैदी फरार हो चुके थे, पर वे अस्पताल के बजाय कहीं और से भागे थे. अब आशंका लग रही थी कि कहीं दोनों कैदी पुलिसकर्मियों की मिलीभगत से तो नहीं भागे. खुद को बचाने के लिए इन्होंने अस्पताल की कहानी गढ़ी हो. एडिशनल एसपी ने सच्चाई का पता लगाने के लिए तीनों चालानी गार्डों हैडकांस्टेबल सुभाषचंद, कांस्टेबल ओमप्रकाश और कृष्णकांत को अस्पताल की पुलिस चौकी में बुला लिया. वहां तीनों से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने कैदियों के फरार होने की जो कहानी सुनाई, वह हैरान करने वाली थी.

पता चला कि तीनों पुलिसकर्मियों की लापरवाही और विश्वास का फायदा उठा कर दोनों कैदी उन के सामने ही कार से भागे थे. दोनों बदमाश कौन थे और उन्होंने पुलिस की चूक का कैसे फायदा उठाया, इस बारे में जब किशनगढ़बास उपकारागृह के जेलर शैलेंद्र फौजदार से पूछताछ की गई तो जो जानकारी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

राजस्थान के जिला अलवर के थाना कोटकासिम के खेड़ा गांव का रहने वाला कृष्ण गुर्जर उर्फ लादेन 27 दिसंबर, 2014 से जेल में था. उस पर दौलतपुर के रहने वाले शिक्षक हीरालाल की हत्या का आरोप था. इस के अलावा थाना तिजारा के मौसमपुर गांव के रहने वाले प्रौपर्टी डीलर शीशराम यादव की हत्या के आरोप से वह बरी हो चुका था. उस पर फायरिंग, मारपीट आदि के और मुकदमे थे.

पिछले 2 सालों से जेल में होने की वजह से उसे जेल की तमाम खामियों का पता चल चुका था. वह जेलकर्मियों की आदतें और व्यवहार भी जान गया था. पेशियों पर आनेजाने से चालानी गार्डों के मिजाज से भी पूरी तरह परिचित हो चुका था. जेल में दूसरे कैदियों के अलावा जेल के तमाम कर्मचारियों से भी उस ने दोस्ती गांठ रखी थी. उस के व्यवहार को देखते हुए जेल प्रशासन ने उसे नंबरदार बना दिया था.

लादेन की जेल में ऐसी चौधराहट चलती थी कि कैदियों को पेशी पर भेजने से ले कर उन के दिन भर के कामकाज वही तय करता था. वह जब भी पेशी पर अदालत जाता, यही तीनों चालानी गार्ड उसे ले जाते थे. तीनों पुलिसकर्मियों को उस पर इतना विश्वास हो गया था कि पेशी से निपटने के बाद वे उस के घर भी ले जाते थे. घर पहुंच कर लादेन उन की खूब खातिरदारी करता था.

कुलदीप उर्फ डाक्टर को अलवर की कोटकासिम थाना पुलिस 25 अक्तूबर, 2016 को हरियाणा की झज्जर जेल से एक पुराने मुकदमे के सिलसिले में लाई थी. कुलदीप के खिलाफ 2 फरवरी, 2014 को थाना कोटकासिम में रंगदारी का मुकदमा दर्ज हुआ था. पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे 25 अक्तूबर को किशनगढ़बास उपकारागृह भेज दिया गया था.

कुलदीप हरियाणा के महेंद्रगढ़ के समीप गांव खायरा का रहने वाला था. वह नामी गैंगस्टर था. महेंद्रगढ़, नारनौल, रेवाड़ी, गुड़गांव से ले कर दिल्ली तक उस के नाम की तूती बोलती थी. उस के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, जमीनों पर कब्जे से ले कर मारपीट और अमीर लोगों से रंगदारी वसूलने के करीब डेढ़ दर्जन मामले दर्ज थे.

किशनगढ़बास जेल में ही कुलदीप की मुलाकात कृष्ण गुर्जर उर्फ लादेन से हुई थी. पहली ही मुलाकात में वह समझ गया था कि लादेन उस के काम का आदमी हो सकता है. लादेन भी कुलदीप के बारे में सब जानता था, इसलिए दोनों में गहरी दोस्ती हो गई थी.

कहा जा रहा था कि कुलदीप ने अपने कंधे में और लादेन ने अपने दांत में दर्द की शिकायत जेल प्रशासन से की तो दोनों कैदियों को जेल कर्मचारियों ने 28 अक्तूबर को किशनगढ़बास कस्बे के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में दिखाया. स्वास्थ्य केंद्र के डाक्टर प्रवीण गुप्ता ने दोनों को अलवर के जनरल अस्पताल के लिए रेफर कर दिया था.

अगले दिन यानी 29 अक्तूबर को दोनों कैदियों को अलवर के जिला अस्पताल में संबंधित डाक्टरों को दिखाने की बात तय हुई. किशनगढ़बास से अलवर करीब 35 किलोमीटर दूर है, इसलिए उन्हें जिला अस्पताल ले जाने के लिए टैक्सी स्टैंड से सतपाल की इंडिका कार किराए पर ली गई.

इस के बाद दोनों कैदियों को हथकड़ी लगा कर अलवर ले जाया गया. ये सभी सुबह करीब साढ़े 9, पौने 10 बजे अलवर के जिला अस्पताल पहुंच गए. पुलिस उन्हें डाक्टरों के पास ले गई. उस दिन छोटी दीपावली थी, इसलिए अस्पताल में मरीजों की भीड़ नहीं थी. इसलिए जल्दी ही वे अस्पताल से फारिग हो गए. अलवर में उन्हें और कोई काम नहीं था, इसलिए वे सुबह तकरीबन साढ़े 10 बजे ही अलवर किशनगढ़बास के लिए चल पड़े.

किशनगढ़बास जाते समय रास्ते में कृष्ण गुर्जर उर्फ लादेन ने पुलिस गार्डों से कहा, ‘‘हवलदार साहब, गांव में मेरी मां बीमार है. अगर आप की मेहरबानी हो जाए तो मैं गांव चल कर मां से मिल लूं.’’

‘‘तुम्हें पता है न कि तुम पुलिस हिरासत में हो. इसलिए घर नहीं जा सकते. अगर तुम भाग गए तो कौन जिम्मेदार होगा? हमारी तो नौकरी चली जाएगी.’’ हैडकांस्टेबल सुभाषचंद ने कहा.

‘‘हवलदार साहब, आप भी कैसी बातें करते हैं. लादेन को हम कैसे भागने देंगे. ऐसा करते हैं कि हम सब लादेन के गांव चलते हैं. यह हमारी आंखों के सामने रहेगा तो भागने की हिम्मत नहीं होगी.’’ कुलदीप ने कहा.

‘‘हवलदार साहब, डाक्टर ठीक कह रहा है. आप सब मेरे गांव चलिए. मैं मां से मिल लूं. अगर मां को कुछ हो गया तो मन में जिंदगी भर यही कसक रहेगी कि आखिरी समय में मां से मिल नहीं सका.’’ लादेन ने कहा.

सुभाषचंद और दोनों पुलिसकर्मियों को चुप देख कर लादेन ने ड्राइवर से कहा, ‘‘गाड़ी को खेड़ा गांव ले चलो.’’

ड्राइवर सतपाल ने कहा, ‘‘खेड़ा गांव जाने के पैसे अलग से लगेंगे. खेड़ा गांव हरियाणा की सीमा पर है.’’

लादेन और कुलदीप ने एक साथ कहा, ‘‘तू पैसे की चिंता मत कर, जितना मांगेगा, हम देंगे.’’

कार ड्राइवर खेड़ा की ओर चलने लगा तो हवलदार सुभाषचंद ने कहा, ‘‘तू अपनी मां से जल्द मिल लेना, क्योंकि हमें समय पर जेल भी पहुंचना है.’’

‘‘आप चिंता न करें हवलदार साहब, हम टाइम पर जेल में पहुंच जाएंगे.’’ लादेन ने आश्वस्त करते हुए कहा.

दोपहर करीब 12, सवा 12 बजे वे खेड़ा गांव पहुंच गए. गांव पहुंच कर पुलिसकर्मियों ने दोनों की हथकड़ी खोल दी. लादेन घर वालों से मिलने चला गया. उस के घर वालों ने पुलिसकर्मियों की खूब आवभगत की. खाना खा कर लादेन और कुलदीप पुलिस वालों के साथ घर से बाहर निकले तो घर के बाहर हरियाणा नंबर की एक कार खड़ी थी.

लादेन और कुलदीप उस कार में बैठ गए. उनके बैठते ही वह कार चल पड़ी. पुलिस वाले चुपचाप देखते रह गए. न वे उन दोनों को रोक सके और न ही उन्होंने कोई शोर मचाया और न ही गोली चलाई. 2-3 मिनट में ही वह कार आंखों से ओझल हो गई.

तीनों पुलिस वाले 5-10 मिनट तक सोचविचार करते रहे, उस के बाद उस कार में सवार हो गए, जिस से खेड़ा गांव आए थे. वे दोपहर साढ़े 3 बजे अलवर पहुंचे. जहां, सीधे जिला अस्पताल गए. अस्पताल के बाहर कार छोड़ कर चालक सतपाल से कहा कि वे थोड़ी देर में आते हैं. उस के पैसे आ कर देंगे और फिर वापस किशनगढ़बास चलेंगे.

इस के बाद उन तीनों ने आपस में बात कर के दोनों कैदियों के भाग जाने की कहानी रची और पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर 2 कैदियों के पुलिस अभिरक्षा से भाग जाने की सूचना दे दी.

असलियत सामने आने पर तीनों पुलिसकर्मियों को 29 अक्तूबर की रात को ही गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया. इस की बाद एसपी राहुल प्रकाश ने तीनों पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया. पुलिस अधिकारियों ने हरियाणा पुलिस को दोनों कुख्यात गैंगस्टरों के भाग जाने की सूचना दे दी. साथ दोनों फरार कैदियों की तलाश में जुट गई.

अलवर पुलिस कई दिनों तक दोनों कैदियों को तलाश करती रही, लेकिन उन का कोई सुराग नहीं मिला. बाद में पुलिस ने दोनों फरार बदमाशों पर 10 हजार रुपए का इनाम घोषित कर दिया.

माना जा रहा था कि फरारी की साजिश किशनगढ़बास जेल में रची गई थी. कुख्यात गैंगस्टर कुलदीप ने इस के लिए लादेन का सहारा लिया था. इसी साजिश के तहत पहले स्थानीय डाक्टर से दोनों कैदियों को अलवर के जिला अस्पताल के लिए रैफर कराया गया. किशनगढ़बास उपकारागृह के जेलर शैलेंद्र फौजदार की बातें भी विरोधाभासी रहीं.

जेलर ने बताया था कि दोनों कैदियों को जेल से उस दिन सुबह 10 बज कर 35 मिनट पर ले जाया गया था. जबकि हकीकत यह थी कि 10 बज कर 35 मिनट पर तो तीनों पुलिस वाले दोनों कैदियों को अलवर के जिला अस्पताल में डाक्टरों को दिखा कर वापस हो चुके थे.

नियमानुसार कैदियों को जेल के वाहन से ही अस्पताल या कोर्ट ले जाया जाता है, जेल का वाहन न होने पर रोडवेज बस से दोनों कैदियों को अलवर ले जाना चाहिए था. जबकि पुलिस वाले उन्हें किराए की टैक्सी से ले गए थे और गैरकानूनी ढंग से वे लादेन के घर गए.

फरार हुए कैदियों में कुलदीप यादव उर्फ डाक्टर ज्यादा कुख्यात है. उस की फरारी से हरियाणा में गैंगवार की आशंका भी जताई जा रही थी. हरियाणा के अलगअलग इलाकों में अलगअलग अपराधियों का वर्चस्व है. पुलिस मानती है कि डाक्टर के गैंग की मुख्य दुश्मनी सुरेंद्र उर्फ चीकू गैंग से है.

गैंगवार में कुलदीप के गैंग के निक्कू बावनिया, शक्ति सिंह एवं अभय सिंह की मौत हो चुकी है. गिरोह का सदस्य बबलू  जेल में है, जबकि अनिल उर्फ खड्डा फरार है. वहीं सुरेंद्र जाट उर्फ चीकू के गिरोह के संदीप सिंह व आजाद सिंह की मौत हो चुकी है. चीकू के गिरोह में नरेश उर्फ पोलड़, बब्बू, प्रवीण, धर्मवीर उर्फ टाइगर, जोगेंद्र उर्फ जोगड़ आदि शामिल हैं. सुरेंद्र उर्फ चीकू फिलहाल जेल में है. उस के खिलाफ भी कई मामले दर्ज हैं.

महेंद्रगढ़ शहर से 2 किलोमीटर दूर स्थित गांव खायरा निवासी कुलदीप यादव एक प्रतिभाशाली छात्र था. वह सन 2005 में प्री-मैडिकल टेस्ट में स्टेट टौपर रहा था.

रोहतक पीजीआई में उस ने एमबीबीएस में प्रवेश लिया था और डाक्टरी की पढ़ाई करतेकरते गैंगस्टर बन गया. रोहतक में एमबीबीएस में दाखिला लेने के बाद वह बदमाशों से मिलने लगा और उस का नाता अपराध की दुनिया के लोगों से हो गया.

इस की वजह से वह अपनी मैडिकल की पढ़ाई भी पूरी नहीं कर सका. बाद में वह महेंद्रगढ़ आया तो उस का साथ बड़े अपराधियों से हो गया. आज वह दक्षिणी हरियाणा के नामी बदमाशों में से एक है.

कुलदीप और बब्बू जमीनों पर कब्जा कर के उस से मुनाफा कमाते थे. उसी बीच पैसे के बंटवारे और वर्चस्व को ले कर दोनों में विवाद हो गया. वर्चस्व की लड़ाई में कुलदीप ने 18 अक्तूबर, 2012 को बब्बू को गांव खायरा में गोली मार दी.

इस के बाद दोनों में दुश्मनी बढ़ गई और गैंगवार शुरू हो गई. बब्बू पक्ष ने कुलदीप के पक्ष के अभय सिंह निवासी नांगल सिरोही की 7 नवंबर, 2012 को हत्या कर दी. इस के बाद 3 मार्च, 2014 की रात को सुरेंद्र उर्फ चीकू निवासी मोहनपुर ने अपने साथियों के साथ शक्ति की हत्या उसी के घर में कर दी.

गैंगवार के चलते दोनों पक्ष एकदूसरे के सदस्यों को अपना निशाना बनाने लगे. फरवरी, 2014 में कुलदीप ने अपने साथियों के साथ मिल कर महेंद्रगढ़ कोर्ट में पेशी पर आए बब्बू और प्रवीण खायरा पर गोलीबारी की. इस गोलीबारी में एक पुलिसकर्मी भी घायल हो गया था.

पुलिस के अनुसार, कुलदीप महेंद्रगढ़ के अलावा रेवाड़ी और राजस्थान से भी व्यापारियों और धनी लोगों से रंगदारी वसूलने लगा. एक बार रेवाड़ी शहर में सर्राफा व्यापारी से पैसे लेने के लिए आए उस के 2 साथी पुलिस के हत्थे चढ़ गए थे.

 कथा लिखे जाने तक फरार दोनों गैंगस्टरों को राजस्थान और हरियाणा पुलिस तलाश रही थी.       

– कथा पुलिस सूत्रों और अन्य रिपोर्ट्स पर आधारित

इसे कहते हैं सच्चा प्यार

मुंबई की ग्लोबल सिटी विरार वेस्ट के गोकुल, राऊत सोसायटी की गोकुल एंपायर इमारत में 40 साल की शिल्पी वर्मा अपने 50 साल के पति सरवेंद्र वर्मा और 20 साल की एकलौती बेटी के साथ रहती थी. सरवेंद्र वर्मा एक कंपनी में मैनेजर थे तो बेटी पढ़ाई कर रही थी. 2 फरवरी, 2016 को शिल्पी सहेली नूपुर श्रीवास्तव के साथ विरार के एक मौल से शौपिंग कर के लौट रही थी, तभी पुराने विभा कालेज और केएफसी रेस्टोरैंट के बीच उन की कार एक आदमी से टकरा गई.

उस आदमी की उम्र 30-35 साल रही होगी. टक्कर लगते ही वह आदमी जमीन पर गिर पड़ा. इस हादसे से शिल्पी और नूपुर घबरा गईं. दोनों सहेलियां अपनी गलती के लिए माफी मांगतीं, उस के पहले ही वह आदमी उठ कर कार का बोनट पीटते हुए चिल्ला कर कहने लगा, ‘‘आप लोग आंखें बंद कर के कार चलाती हैं. आप लोगों को सड़क पर चलने वाला आदमी दिखाई नहीं देता?’’ नूपुर और शिल्पी ने सौरी कहा तो वह आदमी और जोर से चिल्लाया, ‘‘आप के सौरी कह देने से मेरी टांग ठीक हो जाएगी क्या? चलिए आप लोग चल कर मेरी टांग का इलाज कराइए. उस के बाद जाइए.’’ यह कह कर वह आदमी कार का पिछला दरवाजा खोल कर कार के अंदर बैठ गया. शिल्पी और नूपुर उस आदमी को कुछ पैसे दे कर अपना पीछा छुड़ाना चाहती थीं, पर वह नहीं माना. जब उस आदमी ने देखा कि वहां भीड़ इकट्ठा हो रही है तो उस ने शिल्पी को डांट कर कार आगे बढ़ाने को कहा.

शिल्पी उसे ले कर कुछ दूर गई होगी कि उस आदमी ने रूमाल में छिपी रिवौल्वर जैसी कोई चीज दिखाते हुए कहा, ‘‘मैं जैसा कहूं तुम वैसा ही करो, वरना मैं तुम दोनों को गोली मार दूंगा.’’

‘‘नहीं, आप को ऐसा कुछ भी करने की जरूरत नहीं है.’’ शिल्पी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘आप जैसा कहेंगे, मैं वैसा ही करूंगी.’’ इस के बाद वह आदमी जैसे कहता रहा, शिल्पी उसी तरह कार चलाती रही. करीब 2 घंटे तक वह उस आदमी के कहे अनुसार नवनिर्माण ग्लोबल सिटी की सड़कों पर कार को घुमाती रही. करीब 5 बजे उस की कार विरार के डोंगर पाड़ा रोड़ पर पहुंची तो कार का अगला टायर फट गया और कार बिजली के खंभे से टकरा गई.

कार रुक गई तो उस आदमी ने दोनों महिलाओं को कार से नीचे उतारा और एक औटो रुकवा कर उस में शिल्पी को बैठा कर नूपुर को इस तरह धक्का दिया कि वह जमीन पर गिर पड़ी. वह उठ पाती, उस के पहले ही वह शिल्पी को ले कर चला गया.  फिल्मी स्टाइल में घटी इस घटना से नूपुर हैरान थी. उस ने शोर भी मचाया, पर लोगों के इकट्ठा होने तक वह आदमी शिल्पी को ले कर चला गया था. नूपुर ने जब यह बात शिल्पी के घर जा कर उस के पति सरवेंद्र वर्मा और बेटी को बताई तो दोनों परेशान हो उठे. उस समय तक रात के साढ़े 8 बज चुके थे. वे नूपुर श्रीवास्तव को साथ ले कर थाना आगासी अरनाला पहुंचे और असिस्टैंट इंसपेक्टर संदीप शिवले को सारी बात बता कर शिल्पी वर्मा के अपहरण का मुकदमा दर्ज करा दिया. मामला एक संभ्रात परिवार की महिला के अपहरण का था, इसलिए संदीप शिवले ने तुरंत घटना की जानकारी एसपी शारदा राऊत, एएसपी श्रीकृष्ण कोकाटे और डीएसपी नरसिंह भोसते के अलावा पुलिस कंट्रोल रूम को दे कर थाने में मौजूद स्टाफ को मामले की जांच में लगा दिया. आमतौर पर अपहरण जैसे मामले पैसों के लिए या दुश्मनी में किए जाते हैं. शुरू में पुलिस को यही लगा कि यह अपहरण भी पैसे के लिए किया गया होगा, इसलिए पुलिस अपहर्त्ता के फोन का इंतजार करने लगी. लेकिन जब अगले दिन तक अपहर्त्ता का कोई फोन नहीं आया तो संदीप शिवले को लगा कि यह अपहरण पैसे के लिए नहीं किया गया. इस में कोई और ही बात है.

वह इस मामले का हल ढूंढ ही रहे थे कि मीडिया ने इस मामले को हवा दे दी, जिस की वजह से पुलिस जांच में तेजी आ गई. संदीप शिवले ने हैडकांस्टेबल मंदार दलवी, आर.डी. बेलधर, मुकेश पवार, अमोल तटकरे, प्रियंका पाटिल, योगिता भोईर और अमोल कांटे की एक टीम बना कर ग्लोबल सिटी की सड़कों पर लगे सारे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखने को कहा. इस से उस औटो के बारे में पता चल गया, जिस से शिल्पी को ले जाया गया था.

औटो वाले से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि दोनों को उस ने बसई के परिजात गेस्टहाउस के पास छोड़ा था. वे हड़बड़ी में अपना एक मोबाइल फोन उस के औटो में ही छोड़ गए थे. उस ने गलती मानते हुए कहा कि उस मोबाइल का सिम निकाल कर उस में अपना सिम डाल कर वह उस का उपयोग करने लगा था. लेकिन उस ने पुलिस को हैरान करने वाली बात यह बताई कि उस के औटो से जो महिला और आदमी गए थे, वे औटो में पतिपत्नी जैसा व्यवहार कर रहे थे, जबकि उस से कहा जा रहा कि आदमी ने महिला का अपहरण किया था. उन के बातव्यवहार से उसे अपहरण जैसा कुछ नहीं लग रहा था. इस से संदीप शिवले को शिल्पी का चरित्र संदिग्ध लगा. लेकिन शिल्पी की उम्र को देखते हुए उन के मन में एक बार यह भी आया कि औटो वाले को भ्रम भी तो हो सकता है, उन्होंने सरवेंद्र वर्मा और उन की बेटी को थाने बुला कर औटो वाले को मिला मोबाइल दिखाया तो उन्होंने बताया कि यह मोबाइल शिल्पी का ही है.

पुलिस ने बसई के परिजात गेस्टहाउस जा कर वहां के कर्मचारियों को शिल्पी का फोटो दिखा कर पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि यह महिला उन के गेस्टहाउस में अपने पति के साथ पिछले 3 दिनों से ठहरी थी. पुलिस के आने के कुछ घंटे पहले ही दोनों वहां से गए थे. पुलिस को जैसी उम्मीद थी कि दोनों ने गेस्टहाउस के रजिस्टर में अपना सही नामपता नहीं लिखा होगा, वह सच था. रजिस्टर में जो नामपता लिखा था, उस की जांच की गई तो वह झूठा पाया गया. इस के बाद जांच आगे बढ़ाने के लिए पुलिस ने शिल्पी के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस में एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर 3 महीने पहले सिर्फ एक बार फोन किया गया था.

वह नंबर पुलिस को संदिग्ध लगा तो पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया. पता चला कि वह नंबर आगरा के किसी अमरीश कुमार का था, लेकिन वह नंबर अब बंद हो चुका था. मुंबई पुलिस आगरा पहुंची तो पता चला अमरीश कुमार तो 3 महीने पहले दुबई चला गया था. पुलिस खाली हाथ लौट आई. इसी तरह 10 दिन बीत गए, पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा. 14 फरवरी, 2016 को मोबाइल के आईएमईआई नंबर की मदद से पुलिस पंजाब के लुधियाना शहर की एक दुकान पर पहुंची और वहां से शिल्पी और अमरीश कुमार को गिरफ्तार कर लिया.

अमरीश कुमार ने उस दुकान पर अपना मोबाइल फोन ठीक कराने के लिए दिया था. दोनों को मुंबई ला कर थाना आगासी पुलिस ने वसई की अदालत में मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रैट श्रीमती धारे के समक्ष पेश कर विस्तार से पूछताछ के लिए 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड के दौरान की गई पूछताछ में पता चला कि प्रेमी के साथ रहने के लिए शिल्पी ने खुद ही अपहरण का ड्रामा रचा था.

30 साल का अमरीश कुमार उत्तर प्रदेश के आगरा शहर का रहने वाला था. वह वहां के एक थ्री स्टार होटल में सेफ था. शिल्पी वर्मा से उस की जानपहचान कोई 4 साल पहले सोशल मीडिया फेसबुक के माध्यम से हुई थी. दोस्त बनने के बाद पहले दोनों के बीच फेसबुक द्वारा चैटिंग शुरू हुई, उस के बाद सीधे फोन से बात होने लगी. इस का नतीजा यह निकला कि दोनों में प्यार हो गया. उस समय शिल्पी पति और बेटी के साथ कोलकाता में रहती थी. उसे पता था कि शिल्पी उस से 10 साल बड़ी थी. इस के बावजूद अमरीश के प्यार में जरा भी कमी नहीं आई. मूलरूप से बिहार के पटना शहर की रहने वाली शिल्पी की शादी सन 1993 में दिल्ली के रहने वाले सरवेंद्र वर्मा के साथ हुई थी. सरवेंद्र कोलकाता में रहते थे, इसलिए वह भी पति के साथ वहीं रहने लगी थी. सरवेंद्र वहीं एक प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी करते थे.

पति के नौकरी और बेटी के स्कूल जाने के बाद शिल्पी घर में अकेली रह जाती तो बोर होने लगती. इस के अलावा न जाने क्यों पति और बेटी का व्यवहार भी उस के प्रति ठीक नहीं था. चैटिंग और बातचीत के बाद शिल्पी और अमरीश एकदूसरे के काफी करीब आ गए. बातचीत में उन के बीच मर्यादा की कोई सीमा नहीं रह गई थी. दोनों एकदूसरे से खुल कर बातें करने लगे थे. इस का नतीजा यह निकला कि दोनों मिलने के लिए बेचैन हो उठे. उन की यह बेचैनी तभी शांत हुई, जब अमरीश कोलकाता जा पहुंचा. शिल्पी ने अपनी दोनों बांहें फैला कर उस का स्वागत किया. जब तक अमरीश कोलकाता में रहा, शिल्पी ने उस का हर तरह से खयाल रखा. एक बार दोनों की मुलाकात हुई तो सिलसिला ही चल निकला. अमरीश को जब भी मौका मिलता, वह शिल्पी से मिलने कोलकाता पहुंच जाता. फिर तो दोनों साथसाथ रहने के सपने देखने लगे.

अपने इस सपने को पूरा करने के लिए शिल्पी जब सन 2013 में कोलकाता से पति और बेटी के साथ दिल्ली अपनी ससुराल आ रही थी तो दिल्ली पहुंचने से पहले ही गायब हो गई. 4 दिनों की अथक कोशिश के बाद पुलिस ने शिल्पी और अमरीश को उस के मोबाइल फोन के जरिए कानपुर के  एक लौज से बरामद किया. शिल्पी की यह हरकत सरवेंद्र और उस के घर वालों को काफी नागवार लगी. अब वह शिल्पी को अपने साथ रखना नहीं चाहते थे, लेकिन रिश्तेदारों के समझाने पर उसे चेतावनी दे कर साथ रख लिया था. पर शिल्पी पर उन की चेतावनी का कोई असर नहीं हुआ. वह अमरीश को भूल नहीं पाई आौर मौका मिलने पर अमरीश से फोन पर बातें करती रही.

पत्नी की हरकतों से तंग आ कर सरवेंद्र ने सन 2015 में अपना ट्रांसफर मुंबई करा लिया. मुंबई में उन्हें विरार की नवनिर्माण ग्लोबल सिटी में रहने के लिए बढि़या फ्लैट मिला ही था, आनेजाने के लिए कार भी मिली थी. हर सुखसुविधा होने के बावजूद शिल्पी का मन नहीं लग रहा था. उस का मन तो अमरीश में बसा था. वह उस के साथ खुले आकाश में उड़ने के लिए तड़प रही थी. बापबेटी शिल्पी की हर गतिविधि पर नजर रख रहे थे, लेकिन उस की हरकतें बंद नहीं हुईं. वह किसी न किसी तरह अमरीश से बातें कर ही लेती थी. इस के लिए वह अलग मोबाइल रखती थी, जिस से वह सिर्फ अमरीश से ही बातें करती थी. मुंबई आने के बाद वह अमरीश से मिल नहीं पा रही थी, इसलिए उस ने उस के साथ भाग जाने की योजना बनाई. इस बार वह उस के साथ इस तरह भागना चाहती थी कि घर वालों की तो छोड़ो, पुलिस उन तक न पहुंच सके. इसीलिए इस बार उस ने भागने को अपहरण के ड्रामे में बदल दिया. लेकिन इस बार भी वह मोबाइल नंबर के जरिए ही पकड़ी गई.

योजना के अनुसार, अमरीश ने 3 महीने पहले यह कह कर घर छोड़ दिया कि उसे दुबई में नौकरी मिल गई है. घर वालों से झूठ बोल कर वह पंजाब के शहर लुधियाना चला गया. वह शेफ का काम जानता ही था, इसलिए उसे वहां एक रेस्टोरेंट में नौकरी मिल गई. इस के बाद वह शिल्पी को भगाने की तैयारी करने लगा. शिल्पी को भगाने के 3 दिन पहले यानी 30 जनवरी को अमरीश लुधियाना से मुंबई पहुंचा तो शिल्पी उस के साथ भागने की तैयारी करने लगी. घर वालों को अमरीश के साथ भाग जाने का संदेह न हो, इस के लिए उस ने सीधे भागने के बजाय अपने अपहरण का ड्रामा रचा, जिस में वह सफल भी रही.

 लुधियाना पहुंच कर अमरीश और शिल्पी निश्चिंत हो गए थे और देश छोड़ कर दुबई जाने की तैयारी कर रहे थे. लेकिन शिल्पी ने 3 महीने पहले जो गलती की थी, उसी की वजह से पुलिस ने उसे पकड़ लिया. शिल्पी और अमरीश कुमार ने किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था, वे बालिग भी थे, इसलिए उन पर कोई अपराध नहीं बनता था. लेकिन अपने अपहरण का ड्रामा रच कर उस ने पुलिस को गुमराह करने का अपराध किया था. इसलिए पुलिस ने उसी का मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया. चूंकि उन का यह अपराध जमानती था, इसलिए जल्दी ही उन की जमानतें हो गईं. जमानत होने के बाद शिल्पी ने पति के साथ जाने से मना कर दिया और प्रेमी अमरीश से विवाह कर के उसी के साथ रह रही है.

मेरी जिंदगी का काला अध्याय : आयशा राउत

मेरा नाम आयशा राउत है और मैं एक गरीब परिवार से हूं. 17 साल की उम्र में मेरे साथ जो घटना घटी, मैं उसे आप सब से शेयर करना चाहती हूं. मैं नहीं चाहती कि मेरे साथ जो कुछ हुआ, वह किसी और के साथ हो. फरेबी और धोखेबाज लोगों से आप सावधान रहें. फरेबी लोग आप के अपने या पड़ोसी भी हो सकते हैं, जिन पर आप आंखें बंद कर के विश्वास करते हैं.

मेरा परिवार उड़ीसा के जिला सुंदरगढ़ के एक छोटे से गांव रानी बगीचा में रहता है. परिवार में मांबाप के अलावा मैं और मेरी बड़ी बहन पिंकी थी. मांबाप बड़े किसानों के खेतों में दिन भर काम करते थे, उस के बदले में जो अनाज मिलता, उस से ही जैसेतैसे घर का गुजारा हो पाता था. जब घर में खाने तक के लाले पड़े हों तो ऐसे में पढ़ाई के बारे में सोचना हास्यास्पद था. गांव के जब कुछ बच्चे स्कूल जाते तो मैं भी सोचा करती थी कि काश मैं भी स्कूल जाती. पर मेरी यह इच्छा दबी रह गई.

मेरी मां और बाप दोनों ही शराबी थे. जब वे मजदूरी पर नहीं जाते तो चावल के मांड से बनाई शराब पी कर नशे में धुत पड़े रहते थे. हम दोनों बहनें उन्हें शराब पीने को मना भी करती थीं, पर हमारी बात माननी तो दूर, वे हमें डांट देते थे. हम लड़कियां थीं, इसलिए हमारी सही बात पर भी तवज्जो नहीं दी जाती थी.

बड़ी बहन जवान हुई तो उस की शादी रानी बगीचा के ही सुनील कुल्लू से कर दी. बहन के ससुराल जाने के बाद घर में मेरा मन नहीं लगता था. उस से बातचीत कर के मेरा दिन कट जाता था. मैं जब घर पर अकेली होती तो गांव के लड़के मेरे घर के आसपास जुटे रहते. मेरी उम्र यही कोई 17 साल हो चुकी थी. उन लड़कों के वहां मंडराने का मतलब मैं अच्छी तरह जान गई थी. मैं समझ गई थी कि वे मेरी गरीबी और मजबूरी का फायदा उठाना चाहते हैं. इसलिए जब तक वे घर के बाहर खड़े रहते, मैं अपने घर से बाहर नहीं निकलती थी.

तमाम अभावों के बीच मेरा बचपन कब गुजर गया, पता नहीं चला. मेरा मन भी करता कि मैं गांव की लड़कियों के साथ गपशप करूं. शहर देखना तो दूर, मेरी जिंदगी घर में ही सिमट कर रह गई थी. हमारे घर पर औनी नाम की एक महिला आती थी. वह बहुत पैसे वाली थी. हमारा घर कच्चा था, पर उस का घर आलीशान था. उस के पास सारी सुखसुविधाएं मौजूद थीं. औनी का हमारे यहां ही नहीं, बल्कि गांव के तमाम गरीबों के यहां आनाजाना था. वह अम्माबापू को कभी शराब पिला देती तो कभी थोड़ेबहुत पैसे खर्चे के लिए दे देती. इस तरह गांव के सभी लोग औनी का बहुत सम्मान करते थे. औनी मुझ से भी बड़े प्यार से बात करती थी. वह पढ़ाई के बारे में मुझे बताती थी कि पढ़ने से क्याक्या फायदे हैं. पढ़ाई के बाद ही लोग अच्छीअच्छी नौकरियां कर पाते हैं.

भले ही मैं घर वालों की मजबूरी की वजह से नहीं पढ़ पाई, पर पढ़ाई में मेरी रुचि थी, इसलिए औनी आंटी की बातें मुझे अच्छी लगती थीं. एक दिन औनी ने मुझ से पूछा, ‘‘आयशा, यदि तुम्हें अब पढ़ने का मौका मिले तो क्या तुम पढ़ सकती हो?’’

मैं ने खुश हो कर कहा, ‘‘हांहां, क्यों नहीं, मैं अब भी पढ़ लूंगी.’’

तब औनी आंटी ने कहा कि जब तुम्हें पढ़ाई में इतनी रुचि है तो मैं तुम्हारे बारे में सोचती हूं. इतना कह कर वह चली गई.

इस के बाद औनी आंटी का हमारे यहां आनाजाना बढ़ गया. एक दिन उस ने मेरे अम्माबापू से कहा, ‘‘तुम अपनी बेटी आयशा को किसी काम पर क्यों नहीं लगवा देते. जब यह चार पैसे कमा कर लाएगी तो वे घर में काम आएंगे.’’

‘‘यहां की हालत तुम देख ही रही हो. यहां काम है ही कहां. बेटी सयानी हो गई है, इसलिए कहीं दूर शहर में भेजने का मन नहीं करता. अब सोच रहे हैं कि कहीं कोई लड़का मिल जाए तो इस के हाथ पीले कर दें. इस की शादी के बाद घर में हम 2 लोग रह जाएंगे. हमारी इतनी उम्र कट गई. बचीखुची भी कट जाएगी.’’ बापू ने कहा.

इस के बाद औनी आंटी बोली, ‘‘आप ने अपनी बड़ी बेटी की शादी कम उम्र में कर दी थी, इस की मत करो. अगर तुम चाहो तो मैं इस की दिल्ली वगैरह में कहीं नौकरी लगवा दूंगी. वहां से हर महीने तुम्हारे पास पैसे आ जाया करेंगे. पैसे इकट्ठे कर के इस की शादी कर देना.’’

‘‘हमारी आयशा इतनी सीधीसादी है, इसे कौन नौकरी पर रखेगा.’’ बापू ने मेरे बारे में बताया.

औनी आंटी बोलीं, ‘‘कोई बात नहीं, कुछ दिनों में यह तेज हो जाएगी. बच्चा तभी तक भोला होता है, जब तक वह घर से न निकले. तुम इस की चिंता मत करना, मैं इस की नौकरी ऐसी जगह पर लगवा दूंगी, जहां इसे कोई परेशानी नहीं होगी.’’

यह सुन कर मैं मन ही मन खुश हो रही थी. सच में मैं गांव से बाहर कभी नहीं गई थी और आंटी मुझे दिल्ली भेजने की बात कर रही थीं. मैं ने दिल्ली का केवल नाम सुना था. मेरे दिमाग में दिल्ली की जो तसवीर बनी हुई थी, वह यह थी कि वहां बहुत ऊंचीऊंची इमारतें होंगी और ज्यादातर लोगों के पास कारें होंगी. वहां पैसे वाले लोग रहते होंगे. चमचमाती सड़कें होंगी.

बापू से बात करने के बाद औनी आंटी मेरे पास आई और मेरी ठुड्डी पकड़ कर बोली, ‘‘अब तू अपने कपड़े तैयार रखना. तुझे दिल्ली ले चलूंगी. वहीं पढ़ना और नौकरी भी करना.’’

आज के जमाने में कौन किस की भलाई के बारे में सोचता है. पर औनी आंटी मेरी पढ़ाई और नौकरी लगवाने की बात कर रही थीं, इसलिए वह मुझे किसी देवी से कम नहीं लग रही थीं. मेरे पास कुल 3 जोड़ी कपड़े थे. एक जोड़ी तो बिलकुल नए रखे थे, जिन्हें केवल किसी त्यौहार पर या किसी की शादी वगैरह के मौके पर पहनती थी.

बाकी 2 जोड़ी मेरे रोजाना के पहनने वाले थे. औनी आंटी के  कहने पर मैं ने अपने कपड़े आदि घर में रखे एक पुराने बैग में रख लिए. एक दिन आंटी हमारे यहां सुबहसुबह आईं, उन्होंने मेरे अम्माबापू को चावल के मांड से बनी शराब खूब पिलाई. ताज्जुब की एक बात यह थी कि आंटी शराब नहीं पीती थी.

कुछ ही देर में अम्माबापू नशे में धुत हो गए तो आंटी ने मुझ से कहा, ‘‘आयशा, तुम ने अपने कपड़े रख लिए हैं? हमें आज ही यहां से दिल्ली के लिए निकलना है.’’

‘‘ठीक है आंटी.’’ मैं चहक कर बोली.

‘‘मैं एक घंटे में आ रही हूं. तुझे मेरे साथ चलना है.’’ वह बोलीं.

आंटी के जाते ही मैं फटाफट नहाधो कर नए कपड़े पहन कर तैयार हो गई. ठीक एक घंटे बाद औनी आंटी हमारे यहां फिर आ गई. उस के साथ गांव की 4 लड़कियां और थीं. मुझे तैयार देख कर वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘आज तो बड़ी सुंदर लग रही हो.’’

जिंदगी में पहली बार किसी ने मेरी तारीफ की थी, इसलिए मैं बहुत खुश हुई.

वह बोली, ‘‘चलो, अपना बैग उठाओ, जल्दी चलते हैं वरना ट्रेन निकल जाएगी.’’

‘‘अभी तो अम्माबापू इस हाल में हैं. इन से पूछे बिना…’’

‘‘इन से अब क्या पूछना. उस दिन तुम्हारे सामने ही इन्होंने तुम्हारे जाने की अनुमति दे दी थी.’’ मेरी बात पूरी होने से पहले ही औनी ने कहा.

मेरा मन कर रहा था कि जाने से पहले एक बार अम्माबापू से बात कर लेती तो अच्छा रहता. पर वे जितने गहरे नशे में थे, उस से लग रहा था कि शाम से पहले होश में नहीं आएंगे.

लिहाजा उन से बिना बताए ही मैं हाथ में बैग ले कर औनी आंटी के पीछेपीछे चल दी. कुछ दूर पैदल चलने के बाद एक घोड़ाबुग्गी से हम पक्की सड़क तक आए. वहां से बस पकड़ कर हम रेलवे स्टेशन पहुंचे. फिर रात को हम सब दिल्ली जाने वाली ट्रेन में बैठ गए.

मैं पहली बार ट्रेन में बैठी थी. आंटी से कह कर मैं खिड़की के पास वाली सीट पर बैठी. हालांकि बाहर अंधेरा था, पर जैसे ही ट्रेन चली, मैं खिड़की से बाहर का नजारा देखने की कोशिश करती रही. औनी आंटी ने ट्रेन में सभी पांचों लड़कियों को खूब खिलायापिलाया. उन के साथ रहने पर हमें महसूस नहीं हो रहा था कि हम अपने मांबाप से दूर हैं.

दिल्ली पहुंचने पर स्टेशन पर औनी आंटी ने एक आदमी से बात की और 3 लड़कियों को उस के हवाले कर दिया. आंटी ने बताया कि इन तीनों की नौकरी मुंबई में लग रही है, इसलिए इन्हें मुंबई भेजा जा रहा है. तुम दोनों को दिल्ली में ही रखा जाएगा. इस के बाद वह हमें एक होटल में ले गईं. किसी होटल में मैं पहली बार गई थी. आंटी ने होटल से ही किसी को फोन किया तो एक व्यक्ति वहां आया. मेरे साथ वाली लड़की को उन्होंने उस के साथ भेज दिया.

अब मैं अकेली रह गई थी. होटल में खाना खिलाने के बाद औनी आंटी मुझे एक औफिस में ले गई. वहां बैठे आदमी ने मेरे नाम का एक फौर्म भरा. मुझे उस औफिस में बिठाने के बाद औनी मुझ से यह कह कर चली गई कि यह कहीं न कहीं तुम्हारी नौकरी लगवा देंगे. समयसमय पर मैं मिलती रहूंगी.

औनी आंटी के जाने के बाद औफिस में बैठा व्यक्ति मुझ से बातें करने लगा. उस ने मेरे परिवार के बारे में पूछा. उस ने यह भी पूछा कि मुझे क्याक्या काम आता है. मैं घर के सब काम करना जानती थी. तब उस व्यक्ति ने कहा, ‘‘फिलहाल तुम्हें एक कोठी में काम करने के लिए भेजा जाएगा. तुम्हें वहां खाना बनाने से ले कर सारे काम करने होंगे. रहनाखाना फ्री होगा. अगर वहां से तुम्हारी कोई शिकायत सुनने को नहीं मिली तो तुम्हें दूसरी अच्छी जगह भेज दिया जाएगा.’’

उस औफिस का एक लड़का मुझे एक कोठी में छोड़ आया. वह एक आलीशान कोठी थी. वहां परिवार में केवल 4 लोग थे, लेकिन इस से ज्यादा वहां नौकर थे. कोठी की मालकिन ने मुझे घर के छोटेमोटे काम करने की जिम्मेदारी दी. अपनी जिम्मेदारी के साथ मैं कोठी के काम निपटा देती. मुझे उस कोठी में काम करते हुए 5-6 महीने बीत गए तो एक दिन मैं ने मालकिन से अपनी तनख्वाह के बारे में पूछा. उन्होंने बताया, ‘‘तुम यहां एक प्लेसमेंट एजेंसी के जरिए आई हो. प्लेसमेंट एजेंसी वाला तुम्हारी सैलरी तुम्हारे घर भेजता है.’’

इस बात से मुझे भी तसल्ली हो गई कि हर महीने पैसे मेरे घर भेजे जाते हैं. कोठी में जितने नौकर थे, सब की मुझ पर गिद्ध दृष्टि रहती थी. मेरी उम्र 18 साल हो चुकी थी. मैं उन की नजरों को अच्छी तरह समझती थी. वहां के ड्राइवर और माली कभीकभी मुझ से मजाक भी करते और शारीरिक छेड़छाड़ भी. इस की शिकायत मैं ने मालकिन से इसलिए नहीं की कि कहीं वह उलटे मुझे ही नौकरी से न निकाल दें. उस कोठी में मैं ने 2-3 साल काम किया.

इस के बाद उस प्लेसमेंट एजेंसी द्वारा मुझे अलगअलग घरों में काम पर भेजा गया. मैं ने लोगों से खुद को बचाने की भरसक कोशिश की, पर मैं अपनी कोशिश में सफल नहीं हो सकी. मैं असहाय थी. दिल्ली में मेरा कोई नहीं था, इसलिए न चाहते हुए भी मैं सब सहती रही. कई लोगों ने मुझे भोगा. मुझे केवल प्लेसमेंट एजेंसी का पता मालूम था. मैं कभी उस से अपने घर वालों के बारे में पूछती तो वह कह देता कि औनी तुम्हारी तनख्वाह तुम्हारे घर वालों तक पहुंचा आती है.

करीब दोढाई साल पहले प्लेसमेंट एजेंसी ने मुझे एक ऐसी कोठी में काम करने के लिए भेजा, जहां एक बूढ़ी बीमार महिला थी. मेरा काम उस महिला की सेवा करना था.

मेरी सेवा से सभी संतुष्ट थे. बीते साल अक्तूबर के दूसरे सप्ताह में उस बूढ़ी महिला की मौत हो गई. उन की मौत के सप्ताह भर बाद ही कोठी वालों ने मुझ से कह दिया कि अब यहां तुम्हारी जरूरत नहीं है. फिर पहली नवंबर को मैं प्लेसमेंट एजेंसी पहुंची तो वहां पर ताला लटका हुआ मिला.

मैं ने सोचा कि ये लोग कहीं गए होंगे. उन के लौटने का इंतजार करने के लिए मैं वहीं बैठ गई. भूखीप्यासी मैं दोपहर तक बैठी रही. मेरे इस तरह बैठे रहने पर पड़ोसी दुकानदार ने मेरे वहां बैठने की वजह पूछी. मैं ने जब उसे बताया कि मैं प्लेसमेंट एजेंसी वालों के इंतजार में हूं, तब उस ने बताया कि वे तो औफिस खाली कर के यहां से चले गए.

यह सुन कर मेरे जैसे होश उड़ गए. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि अब मैं क्या करूं. दिल्ली में कहां जाऊं. मन कर रहा था कि अपने मांबाप के पास ही चली जाऊं, लेकिन वहां से आए हुए मुझे 10 साल हो चुके थे. अपने घर का पता तक मुझे नहीं मालूम था. हाथ में बैग उठाए मैं वहां से एक लालबत्ती के पास आ कर बैठ गई. बाद में पता चला कि वह जनकपुरी की लालबत्ती थी.

कहीं जाने या पेट भरने के लिए मेरे पास पैसे भी नहीं थे. लिहाजा मैं दिन भर वहीं बैठी रही. गाडि़यों के रुकते ही कुछ बच्चे और महिलाएं भीख मांगने लगते थे, पर ऐसा करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई. मैं लाचार निगाहों से गाड़ी चलाने वालों की तरफ देखती कि शायद किसी की दयादृष्टि मुझ पर पड़ जाए. लोग मेरी तरफ देखते तो थे, पर ग्रीन लाइट होते ही निकल जाते थे. मुझे उस लालबत्ती के पास ऐसे ही भूखेप्यासे बैठे 3 दिन हो गए. वहां भी हवस के भेडि़यों की मुझ पर नजरें जमी रहीं. रात होते ही भीख मांगने वाले और आवारा किस्म के लड़के मेरे पास आ कर बैठ जाते थे.

चूंकि वहां स्ट्रीट लाइटों की पर्याप्त रोशनी थी, इसलिए मेरे साथ मनमरजी करने की उन की हिम्मत नहीं होती थी, पर वे मुझे लालच दे कर वहां से कहीं दूसरी जगह चलने को कहते थे. मैं उन का असली मकसद समझ चुकी थी, इसलिए मैं उन के साथ जाने को मना कर देती. मैं ने तय कर लिया था कि भले ही मैं भूख से मर जाऊं, पर अब ऐसे लोगों के बहकावे में नहीं आऊंगी.

4 नवंबर, 2016 को भी मैं उसी लालबत्ती के पास बैठी थी. तभी एक कार से एक खूबसूरत युवती उतरी. उन की आंखों पर चश्मा लगा हुआ था और वह जींसटौप पहने हुए थीं. मैं उन्हें टुकुरटुकुर देख रही थी. कार से उतरने के बाद वह सीधे मेरी तरफ आने लगीं. मैं सोचने लगी कि पता नहीं यह मेरे पास ही क्यों आ रही हैं. वह मेरे पास ही उकड़ूं बैठ कर बोलीं, ‘‘मैं कई दिनों से देख रही हूं कि तुम बैग लिए यहीं बैठी मिलती हो. तुम्हें भीख मांगते हुए भी नहीं देखा. तुम कौन हो और यहां क्यों बैठी हो?’’ उन की बात सुन कर मुझे लगा कि वह हमदर्द हैं. मैं ने उन्हें अपनी पूरी कहानी बता दी. मेरी कहानी सुन कर उन्होंने अपना नाम मीनाक्षी मल्होत्रा बताते हुए आगे कहा कि वह एक एनजीओ चलाती हैं, मुझे मेरे घरवालों से मिलाने में पूरी सहायता करेंगी. मैं बड़ी खुश हुई. फिर वह मुझे अपनी कार में बिठा कर अपने औफिस ले गईं.

मैं कई दिनों से नहाई नहीं थी. नहाने के बाद उन्होंने मुझे खाना खिलवाया. कई दिनों की भूखी थी, इसलिए मैं ने पेट भर कर खाना खाया. इस के बाद मेरे शरीर में जान आई. खाना खा कर मैं उन के औफिस में बैठ गई. औफिस में उस समय एक युवक और 2 युवतियां और बैठी थीं. मीनाक्षी मैडम ने उन युवतियों का परिचय शालू वर्मा और अनिता वर्मा के रूप में कराया और उन के साथ जो सज्जन बैठे थे, उन्हें वरिष्ठ पत्रकार विक्रम गोस्वामी बताया. मीनाक्षीजी ने बताया कि वे सब सभी एनजीओ में उन के साथ ही काम करते हैं.

उन्होंने मुझ से पूछा तो मैं ने बता दिया कि मैं उड़ीसा के सुंदरगढ़ की हूं. तब वे सभी मुझे मेरे घर पहुंचाने के बारे में बातें करने लगे. उन्होंने मेरे सामने ही तय किया कि वे कार से मुझे उड़ीसा ले जाएंगे. बात मेरे घर जाने की थी, इसलिए मैं ने उन के साथ जाने के लिए हां कर दी. वह अपने साथियों के साथ मुझे कार में बैठा कर 9 नवंबर की रात 12 बजे दिल्ली से चल दीं. बीचबीच में रुकतेरुकते हम तीसरे दिन उड़ीसा पहुंच गए. मैं अपने घर वालों के पास जा रही थी, इसलिए उड़ीसा पहुंचने के बाद मेरी उन से मिलने की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी.

मुझे अपने घर के बारे में सही जानकारी नहीं थी, इसलिए वे सुंदरगढ़ में मेरे परिवार के बारे में पूछने लगे. पर सफलता नहीं मिली. तब पत्रकार विक्रम गोस्वामी ने उड़ीसा के पत्रकार मोहम्मद शब्बीर और डंबरू से संपर्क किया. ये दोनों किसी अखबार में थे. वे भी मेरे मांबाप के नाम से उन का पता नहीं लगा पाए. मैं भी परेशान हो रही थी कि अब घर वालों से कैसे मिल पाऊंगी. बातोंबातों में मेरे मुंह से निकल गया कि औनी आंटी मुझे और 4 अन्य लड़कियों को ले कर दिल्ली गई थी. यह सुन कर पत्रकार मोहम्मद शब्बीर चौंके. उन्होंने बताया कि औनी को यहां सभी जानते हैं. वह गरीब परिवार की लड़कियों को बेचने का धंधा करती है. करीब 5 साल पहले उन की शिकायत पर स्थानीय पुलिस ने उसे सुंदरगढ़ के बसअड्डे से कई लड़कियों के साथ गिरफ्तार किया था. औनी रानी बगीचा में रहती थी, इसलिए वे सभी मुझे रानी बगीचा ले गए. गांव के रास्ते पर पहुंचते ही मुझे अपना गांव याद आ गया. गांव पहुंचने पर पता चला कि मेरी अम्मा और बापू गांव से कहीं चले गए हैं. उसी गांव में मेरी बड़ी बहन पिंकी रहती थी. मीनाक्षी मैडम और उन के साथी लोगों से पूछताछ कर के मुझे मेरे जीजा सुनील कुल्लू के यहां ले गए. अपनी बहन और जीजा को देखते ही मेरी आंखों से आंसू निकल पड़े. मैं बहन के गले लग कर रोने लगी.

10 सालों बाद मैं गांव पहुंची थी. वहां बहुत कुछ बदल गया था. जीजा ने बताया कि जब आयशा कई साल बाद भी गांव नहीं आई और न ही इस का कोई समाचार मिला तो उस ने औनी से उस के बारे में पूछा था. औनी ने उन्हें बताया था कि आयशा जहां काम करती थी, वहां से किसी के साथ भाग गई है. यह जानकारी मिलने पर सुनील दिल्ली गया. अपने जानने वालों के साथ उस ने मुझे तलाशने की कोशिश की, जब कहीं पता नहीं चला तो वह निराश हो कर लौट आया.

मीनाक्षी और उन के साथियों ने एसपी निखिल कनोडिया के समक्ष आयशा राऊत को उस के जीजा सुनील कुल्लू और बहन पिंकी के सुपुर्द कर दिया. उन्होंने औनी के खिलाफ सख्त काररवाई करने की मांग करते हुए उन 4 लड़कियों का भी पता लगाने की मांग की, जो 10 साल पहले आयशा के साथ दिल्ली गई थीं. औनी की तरह और भी अनेक माफिया उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल, बिहार आदि राज्यों से लड़कियों को बहलाफुसला कर दूसरे शहरों में बेचने के धंधे में लगे हुए हैं. ह्यूमन ट्रैफिकिंग देश में एक गंभीर समस्या बनी हुई है. सरकार को इस समस्या पर ध्यान देने की जरूरत है

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