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राष्ट्रीय एकीकरण के नए प्रतीक

भारत में अंगरेजों के 200 साल के राज की एक ओर तो भर्त्सना की जाती है जबकि दूसरी ओर कुछ मामलों में तारीफें भी होती हैं. जब भी कानून व्यवस्था बिगड़ने या महंगाई बढ़ने की बात होती है तो कई पुराने लोग झट से यह मत देने से नहीं चूकते कि इस से बेहतर तो अंगरेजी हुकूमत थी. यह बात सही नहीं है कि उस दौर में इतने रेप और गैंगरेप तो नहीं होते थे जितने आज स्वतंत्र भारत में हो रहे हैं. अंगरेजों ने रेलवे नैटवर्क का निर्माण किया जिस के कारण देश के एक कोने से दूसरे कोने तक लोग आसानी से पहुंचने लगे. भले ही उन्होंने यह कदम अपने विशाल साम्राज्य को सहीसलामत रखने, उसे और मजबूत बनाने के मद्देनजर किया हो लेकिन देश के एकीकरण में इस सुविधा ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की.

इसी तरह पोस्ट ऐंड टैलीग्राफ के विकास ने भी एकीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. लोग दूरदराज के अपने रिश्तेदारों से फोन पर बात कर सकते थे. पोस्टकार्ड व चिट्ठी अपने गंतव्य तक पहुंच सकती थीं. ये तमाम सुविधाएं राष्ट्रीय एकीकरण की प्रतीक बन गई थीं. विविध रहनसहन, विविध भाषाएं बोलने वाले, आचारविचार वाले लोगों को एकदूसरे से मिलनेजुलने, उन्हें समझने का मौका मिला. एकदूसरे की संस्कृति, खानपान के बारे में जानकारी मिली. अंगरेजों ने सिविल सर्विस का गठन किया. इस ने भी देश के एकीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. वह हुकूमत वर्क टू रूल व कानून का शासन को मानने व लागू करने को ही अपना कमिटमैंट मानती थी.

बहुत से ऐसे अधिनियम, नियम आदि अंगरेजों ने बनाए जोकि पूरे देश में लागू किए गए. इस से भी एकीकरण में मदद मिली. अब यह बात हो गई आजादी के पहले की. आजादी के पहले के राष्ट्रीय एकीकरण के मानक या सूत्र कुछ और थे और जैसे ही देश को आजादी मिली कि उस का दुरुपयोग शुरू हो गया. लेकिन इस का एक फायदा यह रहा कि एकीकरण के कुछ नए अखिल भारतीय स्तर के मानक अपनेआप निर्मित हो गए. किसी को प्रयास ही नहीं करने पड़े. भले ही कोई कहे कि ये नकारात्मक मानक या सूत्र हैं लेकिन देश के एकीकरण में इन की भूमिका रेल, डाक व तार से कम नहीं है. हालांकि, इन मानकों के स्थापित होने में सरकार की कोई भूमिका नहीं है. ये अपनेआप ही कालांतर में विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के आपसी घालमेल से पैदा हो गए हैं. एक की आदत चाहे अच्छी हो या बुरी, दूसरे ने अख्तियार कर ली और इस तरह देश के आजादी के

बाद के एकीकरण के मजबूतीकरण में स्वाभाविक योगदान हो रहा है, भले ही इतिहासकार इस को मान्यता दें या न दें. आइए गंगू आप को इन मानकों की ओर एकएक कर के ले चलता है –

सब से बड़ा योगदान तो हिंदी फिल्मों के आइटम गीतों ने किया है. ‘मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए…’ व  ‘यूपी बिहार लेले …’ जैसे आइटम गीत पूरे भारत की एकता को मजबूत करते हैं. कोई शक है क्या? इडली, डोसा, वड़ा आदि व्यंजन पहले केवल दक्षिण भारत में ही लोकप्रिय थे, आज पूरे भारत में लोकप्रिय हैं. इडली, डोसा, वड़ा ने जितना राष्ट्रीय एकीकरण में योगदान दिया है उतना क्या किसी ने दिया होगा? और यही हाल पावभाजी आदि का है.अब पूरे देश में वह चाव से खाई जाती है. छोलेभठूरे भी पूरे देशभक्त निकले, पूरे देश को एकीकृत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. चाय गरम और चना गरम का भी योगदान कम है क्या?

अब जरा खानपान को छोड़ कर पानतंबाकू, गुटखा की बात करते हैं. जब इन की बात हो तो पाउच की बात तो आनी ही है. आज देश के हर कोने के आदमी को मुंह में तंबाकू रखने का ऐब लग चुका है. सब से बड़ा एकीकरण ये किस्मकिस्म के गुटखा, सेहत के लिए नुकसानदेह प्रचारित होती पानसुपारी टाइप चीजें कर डालती हैं. सिगरेट का भी अपना योगदान है. कश्मीर से कन्याकुमारी तक के लोग कई ब्रैंड्स की सिगरेटों का उपयोग करते हैं. यहां 7 साल क्या, 7 माह की अबोध बच्ची से लगा कर 50 क्या, 90 साल की वृद्ध महिला के साथ रेप होता है और यह भारत के हर कोने में होता है. इस मामले में हर क्षेत्र एकदूसरे से सुरताल मिला रहा है. यह इस देश का एक खास लक्षण हो गया है जितना इस दरिंदगी को दूर करने, इसे कोसने का काम हो रहा है उतना ही यह बढ़ रहा है. पूरा भारत एक है, हर क्षेत्र में रेप की, गैंगरेप की घटनाएं धड़ल्ले से हो रही हैं. कोई भी कसबा, शहर, प्रांत इस से अछूता नहीं है.

एक और चीज हम लोगों को मजबूती से एकीकृत करती है, वह है सरकार को कोसने का काम. कुछ भी हो जाए, मौका मिलते ही सरकार को जम कर कोस लें और इस कोसने के समय आप के आसपास बैठेखड़े सारे लोग ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ की तर्ज पर तुकबंदी के लिए आ मिलते हैं. गालियां जो गलीकूचे में गूंजती हैं, श्रीमानों के श्रीमुख की शोभा बढ़ाती हैं. उन का कम योगदान है क्या, यदि आप की आंखों में पट्टी बांध दी जाए और दूरदराज में छोड़ दिया जाए तो भी आप वहां की गालियां सुन कर बता सकते हैं कि आप भारत में ही हैं. हर जगह इन गालियों के थोड़ेबहुत संशोधनों के साथ स्थानीय संस्करण सुनने को मिल ही जाएंगे.

एकीकरण के और भी मापदंड हैं. आज भारत का कोई ऐसा कोना नहीं है, कोई ऐसा प्रांत नहीं है, कोई ऐसा विभाग नहीं है जहां कि भ्रष्टाचार नहीं हो. यह भी पूरे देश को एकसूत्र में पिरोता है. किसी भी कार्यालय में, चाहे वह देश के किसी भी कोने में क्यों न हो, बिना वजन रखे, बिना लिएदिए काम नहीं होता है. आजाद भारत का एक और सूत्र है शौच करने की आजादी. जहां मरजी हुई वहां हम बैठ गए. कहीं भी टौयलेट कर हम पर्यावरण व स्वच्छता को ठग रहे हैं. लेकिन क्या करें, ये ठग पूरे भारत में हर जगह पटरियों के किनारे, सड़क के दोनों ओर, खेतों के किनारे बैठे हुए मिल जाते हैं. क्या एकीकरण है, सब दिशाओं के लोग इस आदत को त्यागने को बिलकुल तैयार नहीं हैं. ये सब हैं आजाद भारत के नए एकीकरण के सूत्र, जो भारत की एकता व अखंडता को बढ़ावा दे रहे हैं. इसे अक्षुण्ण बनाए रखने में सभी अपना योगदान दे रहे हैं. अब तक तो आप, गंगू की इन बातों से थोड़ाबहुत सहमत तो हो ही गए होंगे.       

दिन दहाड़े

मेरी चचेरी बहन तालेचाबी वाले भैया से अपनी अलमारी का ताला ठीक करवा रही थीं. जीजाजी अंदर बैठे टीवी देख रहे थे. तभी, दीदी ने जीजाजी से कहा कि बच्चों की स्कूल बस आ गई होगी, इसलिए वे उन्हें जा कर ले आएं. जीजाजी बच्चों को लेने चले गए. उन के जाते ही फोन की घंटी बज उठी. दीदी दूसरे कमरे में फोन सुनने चली गईं. थोड़ी देर बाद जब जीजाजी बच्चों को ले कर आए तब देखा कि दीदी अलमारी के पास बैठी रो रही थीं. पूछने पर दीदी ने बताया कि फोन पर बात खत्म कर के वे जैसे ही कमरे में आईं तो अलमारी खुली पड़ी थी और उस के लौकर में से गहने गायब थे. चाबी वाला भैया भी नदारद था.

नेहा कोचर

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हमारी कालोनी के एक पेड़ में मधुमक्खियों का छत्ता लगा था. एक दिन दोपहर साढ़े 12 बजे 3 ग्रामीण महिलाएं और 4 ग्रामीण पुरुषों ने कालोनी के सभी घरों में जा घंटी बजा कर सब को सावधान किया और कहा कि हम लोग छत्ता उतारने के लिए आए हैं. आप सब लोग अपनीअपनी खिड़कियां बंद रखें और जब तक हम न कहें तब तक बाहर न निकलें. एक घंटे बाद वे फिर से सभी कालोनीवासियों के घर एकएक कर के गए और कहा कि हम ने छत्ता हटा दिया है और यह ताजा शहद है. यदि लेना हो, तो ले लीजिए. कालोनीवासियों ने खरीद लिया. उन लोगों के जाने के बाद पता चला कि छत्ता तो अपनी जगह यथावत है और गुड़ की चाशनी को ताजा शहद बता कर वे लोग दिनदहाड़े उन्हें चपत लगा कर चले गए.       

मधु पांडेय

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मेरे घर की बिजली अचानक बंद हो गई. मैं ने बिजली विभाग के जेई से संपर्क किया तो उस ने आश्वासन दिया कि वह शीघ्र ही किसी कर्मचारी को भेज कर बिजली की गड़बड़ी ठीक करवा देगा. वहां से मैं सीधा अपने दफ्तर चला गया. शाम को घर लौटा तो मां ने बताया, ‘‘दोपहर में बिजली विभाग का आदमी आया था. हमारा मीटर खराब था, सो वह खोल कर ले गया है तथा कल नया मीटर लगाने को कह गया है.’’ दूसरे दिन काफी इंतजार के बाद भी जब मीटर लगाने कोई नहीं आया तो मैं फिर बिजली विभाग के दफ्तर में गया. मुझे देखते ही जेई महोदय ने कहा, ‘‘कल मैं किसी को नहीं भेज सका, अभी भेजता हूं.’’ तब मुझे एहसास हुआ कि कोई व्यक्ति हमारा मीटर चुरा ले गया. शायद उस ने कल की हमारी बातचीत सुन ली थी.

मुसकान गर्ग

ऐसा भी होता है

मैं अपने रिश्तेदार परिवार के साथ कार से कहीं जा रही थी. सामने से आती कार से हलकी सी टक्कर लगी. उतर कर देखा, कार में थोड़ी सी खरोंच आई थी, कोई खास नुकसान नहीं हुआ था. दूसरी कार ड्राइव करने वाले सज्जन ने कार से उतर कर हम से माफी मांगी. इतने में उन का बेटा पास की दुकान से हमारी रिश्तेदार बच्ची के लिए उपहार व चौकलेट ले आया. उन के बारबार आग्रह करने पर ही हम ने वे चीजें स्वीकार कीं. आज के माहौल में जरा सी बात पर लोग मारपीट पर उतर आते हैं, अपनी गलती नहीं मानते. ऐसे में अगर खुशनुमा पल मिल जाते हैं तो दिल खुश हो जाता है.

शशि कटियार

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मैं कोलकाता की एक प्राइवेट मोटर कंपनी की दुकान के कार्यालय में काम करता था. शाम का समय था. एक बुजुर्ग अपना टोकरा जमीन पर रख कर दोनों हाथ जोड़ कर लगे गिड़गिड़ाने कि बाबूजी, आज एक धेले का भी काम न मिला. बड़ी जोर की भूख लगी है. मुझे कुछ खाना खिला दीजिए. मैं उन को अपने साथ ले गया. सड़क के किनारे सत्तू बेचने वाले के पास जा कर बोला, ‘‘आप इन को भरपेट सत्तू खिला दीजिए. पैसे मैं दे दूंगा.’’

थोड़ी देर बाद वे बुजुर्ग भोजन कर के आए और मेरा हाथ थाम लिया, फिर बोले, ‘‘बाबूजी, आज भरपेट भोजन किया.’’ मैं ने उन से कहा, ‘‘अगर कभी ऐसा अवसर आ जाए तो मेरे पास अवश्य आइएगा.’’ उन भूखे बुजुर्ग को भोजन खिला कर मुझे जो संतुष्टि हुई, उस का बयान शब्दों में नहीं किया जा सकता.

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कैलाश राम

अपनी बिटिया को इंटरव्यू दिलाने के लिए उस के साथ मुझे दिल्ली जाना पड़ा. उस दिन गरमी अधिक थी, सो उसे इंटरव्यू के लिए छोड़ इंटरव्यू खत्म होने तक मैं समय बिताने के लिए पास के पार्क में जा कर बैठ गई. वहां घने पेड़ों की छांव में बैठ कर काफी सुकून मिल रहा था. परंतु यह देख कर बड़ा दुख हुआ कि वहां के स्थानीय बाश्ंिदे चुपचाप आते व पार्क के एक कोने में मूत्र कर चले जाते थे. स्वच्छता के प्रति लोगों की ऐसी मानसिकता ‘स्वच्छ भारत’ के नारे का मजाक उड़ाती प्रतीत हो रही थी.

सुनंदा गुप्ता

गठबंधन में गांठ

इस साल के पद्म पुरस्कार भी चीन्ह चीन्ह कर बांटे गए. बंटवारा पूरी तरह भगवा न लगे, इसलिए एनसीपी मुखिया शरद पवार को भी एक बड़ी सी रेवड़ी थमा दी गई जो उन्होंने प्रसाद की तरह ग्रहण भी कर ली. इस पुरस्कार की जितनी खुशी शरद पवार को हुई होगी उस से ज्यादा कसमसाहट ठाकरे ब्रदर्स को हुई. एकदो नहीं, बल्कि दर्जनों वजहें ऐसी हैं जिन के चलते मुद्दत से उद्धव और राज ठाकरे दोनों भाजपा से खफा चल रहे हैं. इन में से सब से अहम है शिवसेना मुखिया बाल ठाकरे को कुछ न देना. सो, विरोधस्वरूप उन्होंने गठबंधन तोड़ लिया. इस टूटन का दायरा अभी प्रायोगात्मक तौर पर मुंबई तक ही सिमटा रहेगा जिस में निष्कर्ष ये समझ आएंगे कि भाजपा व शिवसेना अगर अलगअलग लड़ें तो राज ठाकरे की मनसे सहित कांग्रेस व एनसीपी की स्थिति क्या रहेगी और भविष्य में शरद पवार अगर भाजपा से हाथ मिलाते हैं तो क्या ठाकरे बंधु एक हो कर महाराष्ट्र में हाथ रख पाएंगे?  

 

सिद्धू बने बुद्धू

खुद को कांग्रेसी नर्सिंग होम में पैदा हुआ बता रहे नवजोत सिंह सिद्धू बड़े ड्रामाई अंदाज में यह कहते हुए कांग्रेसी नाव में सवार हुए थे कि भाजपा तो उन की कैकेयी मां जैसी थी. यह पौराणिक मिसाल देना उन के भाजपाई संस्कार थे. उम्मीद थी कि माता कौशल्या की गोद में आ कर उन्हें सुरक्षा महसूस होगी, लेकिन हुआ उलटा. कांग्रेस ने कैकेयी से भी ज्यादा क्रूरता और सौतेलापन दिखाते उन्हें कुरसी वाला वह खिलौना नहीं दिया जिस के लिए वे मुद्दत से मचलते सौदेबाजी कर रहे थे. पहले क्रिकेट और फिर छोटे परदे पर लोगों को हंसा कर शोहरत बटोरने वाले सिद्धू राजनीति में भी एक दायरे में सिमट कर रह गए हैं जिन का पंजाब चुनावप्रचार में कांग्रेस अधिकतम इस्तेमाल कर रही है. कौमेडी शो में सारा क्रैडिट कपिल शर्मा के खाते में जाता रहा तो क्रिकेट में श्रेय सुनील गावस्कर लूटते रहे और अब राजनीति में भी कैप्टन ने कप्तानी का मौका छीन लिया तो इसे बदकिस्मती के अलावा कुछ और कहा भी नहीं जा सकता. वे प्रकट तो हुए पर कृपाला और कौशल्या हितकारी नहीं बन पाए.

निया शर्मा का ये हॉट एंड बोल्ड वीडियो आग लगा देगा

एशिया की तीसरी सबसे सेक्सी महिला का खिताब जीतकर सुर्खियों में आने वाली इंडियन गर्ल निया शर्मा ने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर कर आग लगा दी है, जिसे देखने वालों के रोगटें खड़े हो जा रहे हैं.

निया शर्मा द्वारा शेयर किये गए इस वीडियो ने सोशल मीडिया पर कहर ढा दिया है. इस वीडियो को एक तरफ तो धड़ल्ले से शेयर किया जा रहा है, तो वहीं दूसरी ओर इस वीडियो को लेकर निया पर तरह-तरह के कमेंट भी आ रहे हैं.

निया शर्मा ने अपने सोशल अकाउंट पर अपना एक बेहद बोल्ड वीडियो शेयर किया है, जिसमें निया वेसलेटी कलर के स्ट्रेपलेस टॉप में दिख रही हैं. निया ने जो ड्रेस पहना हुआ है वो काफी रिविलिंग है और इसी ड्रेस में निया सेक्सी डांस मूव्ज करती नज़र आ रही हैं, जिसकी वजह से ये वीडियो और ज्यादा हॉट हो गया है.

निया द्वारा इस वीडियो को शेयर किये जाने के बाद से इस वीडियो को लाखों लोग देख चुके हैं. एक तरफ तो लोग निया के सेक्सी लुक की तारीफ कर रहे हैं, वहीं कुछ इस वीडियो को चीप और बहुत ज्यादा हॉट बता रहे हैं. वहीं कुछ यूजर्स ने तो इतना तक लिख दिया कि निया तुम्हें पोर्न इंडस्ट्री चले जाना चाहिए.

आपको बता दें कि पहली बार निया ने 2014 में ‘जमाई राजा’ नाम के सीरियल से एक्टिंग की दुनिया में कदम रखा था. जिसमें वो चर्चित ‘रौशनी’ का किरदार करती थी. निया शर्मा कई बार बेहद बोल्ड और सेक्सी अवतार में दिखीं हैं, उन्हें ब्रिटेन के एक अखबार ने एशिया की टॉप थ्री सेक्सी औरतों की लिस्ट में जगह दी थी. हाल ही में दिसंबर 2016 में निया को शर्मा को एशिया की तीसरी सेक्सी महिला का खिताब मिला था.

भ्रष्ट, भ्रष्टाचार और कानून

कालेधन पर यज्ञ का आह्वान करने वाले नरेंद्र मोदी का वादा खोखला और बनावटी है, यह इस बात से स्पष्ट है कि प्रिवैंशन औफ करप्शन ऐक्ट 1988 के तहत सूर्यनारायण मूर्थि बनाम आंध्र प्रदेश मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के मद्देनजर उन की सरकार कालेधन की शेष शय्या पर निद्रा में हैं और लक्ष्मी उन के पैर दबा रही हैं. इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि सरकारी अफसर पर रिश्वत लेने का अपराध तभी माना जाएगा जब अदालत में यह साबित हो जाए कि उस ने रिश्वत मांगी थी. अगर कोई नागरिक खुदबखुद किसी अफसर को कुछ दे जाए तो यह रिश्वत न होगी, न्यायालय ने व्याख्या की है.

सर्वोच्च न्यायालय ने रिश्वत विरोधी कानून में एक छोटी खिड़की ही नहीं छोड़ी, उस ने चारों ओर की दीवारें ही हटा लीं क्योंकि रिश्वत लेने के किसी मामले में यह साबित करना असंभव है कि रिश्वत कब और कैसे मांगी गई. कोई अफसर लिखित में परचा तो नहीं देगा कि काम कराना है तो 5 लाख रुपए बैंकड्राफ्ट से पत्नी के नाम भेज दो और अफसर परचे पर हस्ताक्षर कर दे.

आमतौर पर रिश्वत के वे मामले पकड़े जाते हैं जिन में नागरिक शिकायत करता है और भ्रष्टाचार विरोधी अफसर निशान लगे नोट संबंधित अफसर को दिलवाते हैं और उसी समय भ्रष्ट अफसर को पकड़ लिया जाता है. सर्वोच्च न्यायालय ने इन मामलों में अभियुक्त अफसरों को बरी कर नौकरी पर पुनर्नियुक्त कर दिया है और नरेंद्र मोदी, जो अध्यादेश प्रेमी हैं, कालेधन के नाम पर देश को कतारों में खड़ा तो कर देते हैं, लेकिन इस कानून को ठीक करने की बात तक नहीं कर रहे.

भ्रष्टाचार विरोधी कानून में वैसे भी सजा 6 माह की ही है और अदालतें अफसरों के विरुद्ध यदाकदा ही फैसला देती हैं. यही कारण है देश का कालाधन 8 नवंबर के बाद भी वैसा का वैसा रहा है क्योंकि अफसरों ने तो पुराने नोटों को बैंकरों से मिल कर बिना कमीशन के बदलवा लिया था. उन्हें तो आयकर अफसर भी नोटिस न भेजेंगे और न ही कोई लोकायुक्त या लोकपाल उन का कुछ बिगाड़ सकेगा.

सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला कि जब तक रिश्वत मांगी न जाए, रिश्वत नहीं है, सरकारी अफसरों की पहुंच और निडरता का सुबूत है. देश की जनता को हांकने में नेता और अफसर हर रोज और ज्यादा मुखर होते जा रहे हैं.

चाइनीज कुंगफू और इंडियन योगा

भारत चीन व्यापार फोरम के समझौते के अंतर्गत दोनों देशों के बीच 3 फिल्मों का निर्माण संयुक्तरूप से किए जाने का करार हुआ और इसी करार की पहली फिल्म जैकी चैन की ‘कुंग फू योगा’ है. इस फिल्म के प्रचार के लिए जैकी भारत आए. यहां के टीवी शोज में खूब शिरकत की. कहने को तो इस फिल्म में सोनू सूद, दिशा पटानी, अमायरा दस्तूर जैसे भारतीय कलाकार हैं लेकिन सारे लीड रोल चाइनीज अभिनेताओं व अभिनेत्रियों को ही मिले हैं.

भारतीय फिल्मों का बाजार और कमाई हौलीवुड को मुंबई तक खींच लाई है, ऐसे में चीन भी इंडियन बौक्स औफिस पर मोटी कमाई के चलते प्रचारप्रसार में लगा है और इस फिल्म को वह भारतीय फिल्म बता रहा है. जबकि प्रोमो देख कर अंदाजा हो जाता है कि इस फिल्म में इंडियन कास्ट का इस्तेमाल लगभग वैसा ही हुआ है जैसा हौलीवुड के मेकर्स करते हैं.

ऐसे में यह कयास लगाया जाना गलत नहीं होगा कि जिस तरह चाइनीज सामानों से भारतीय बाजार पटे हैं, वैसे ही कहीं यहां चाइनीज फिल्में न पट जाएं.

किसानों को लूट रही मंडियां

हमारे देश में मंडी कानून लागू हैं, जिन के तहत किसानों को अपनी उपज मंडी में ही बेचनी होती है. मंडियों में उन आढ़तियों की दुकानें होती हैं, जिन्हें मंडी कमेटी लाइसेंस देती है और हर सौदे पर उन से टैक्स लेती है. मंडियां करोड़ों में खेलती हैं, गरीब किसानों से उन की खूब आमदनी होती है. इन मंडियों का संचालन करने वाली कमेटियां कहींकहीं चुनावों से बनती हैं, पर ज्यादातर राज्य सरकारें मंडियों में अपनी मरजी के लोग तैनात करती हैं.

नेताओं के घरों पर आज किसान टाइप के लोगों की जो भीड़ होती है उन में से ज्यादातर मंडी कमेटी में सदस्य बनने की सिफारिश के लिए आए होते हैं. सदस्य बनने के बाद इलाके में उन का विधायक सा रोब हो जाता है और दुकानदार, आढ़़ती, किसान जीहुजूरी करने पर मजबूर हो जाते हैं. नोटबंदी के बाद आढ़तियों को जम कर लाभ हुआ है, क्योंकि उन्होंने अनाज तो ले लिया पर ‘नोट नहीं हैं’ कह कर भुगतान नहीं किया. कहींकहीं चैक पकड़ा दिए, जो निर्धारित सीमा के कारण हाथों पर कागजी पुरजा बन कर रह गए.

इन मंडियों में तैनाती के मामले अकसर अदालतों में जाते रहते हैं कि राज्य सरकार मनमानी कर रही है. कानून की बारीकी का लाभ उठा कर अदालत अगर मंडी कमेटी के सदस्यों, आढ़तियों, किसानों, उत्पादकों को कोई छूट दे भी दे तो राज्य सरकार तुरंत अध्यादेश जारी कर के उस फैसले को बदल देती है, ताकि मंडियों में पैदा होने वाले कालेधन की उपज में कहीं कमी न हो. नरेंद्र मोदी ही नहीं, सभी मुख्यमंत्री इस कालेधन की भरपूर फसल को रोकने की कोशिश नहीं कर रहे. उलटे, न्यायालयों के साथ मिल कर उस जमीन को खूब खादपानी दिया जा रहा है, क्योंकि ये मंडियां अफीम के उत्पादन से भी ज्यादा लाभकारी हैं.

किसानों पर अत्याचार जमींदार या महाजन कम करते हैं, मंडियां ज्यादा करती हैं. पर किसान वोट देते समय मंडी कानूनों को भंग किए जाने की मांग तक करने की जुर्रत नहीं कर पाते, क्योंकि कोई भी दल उन की बात को मानने को तैयार नहीं होता, किसानों को होने वाली दिक्कतों को उन के मजदूर भी नहीं समझते और न ही इस में किसी और को कोईर् रुचि होती है. किसानों को किस तरह मंडियां लूट रही हैं, ये बातें न सुर्खियां बनती हैं औन न ही जंतरमंतर पर इस को ले कर धरना दिया जाता है.

किसानों की गरीबी का कारण मंडियां हैं, पर सब मिल कर उन्हें बचाए रखना चाहते हैं. अब मल्टीनेशनल कंपनियां इन से और लाभ उठाने के लिए आ गई हैं. उन्हें हर किसान से निबटना नहीं पड़ता, मंडी अध्यक्ष को खिलापिला कर उन का काम चल जाता है. वे ऊंचे नेताओं से मिल कर इन मंडियों पर अपना कब्जा चाहते हैं, जो उन्हें मिलने वाले मुनाफे के बहुत थोड़े से हिस्से से मिल जाएगा.

मंदाना की दोबारा शादी

ईरान से भारत आई मंदाना फिल्म ‘भाग जौनी’ में काम कर चुकी हैं. हाल में उन्होंने अपने बौयफ्रैंड गौरव गुप्ता से शादी कर ली. शादी की घोषणा करने के लिए उन्होंने सोशल मीडिया का सहारा लिया और अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर अपने पति के साथ तसवीर शेयर करते हुए लिखा, ‘मंदाना गुप्ता.’

वैसे, कोर्ट मैरिज करने वाली मंदाना की यह पहली शादी नहीं है. इस से पहले उन्होंने 2011 में ललित तेहलान से शादी की थी. हालांकि यह शादी लंबी नहीं चली क्योंकि शादी के बाद उन्हें अपने पति के गे होने की खबर मिली. बहरहाल, कुछ लोगों ने कहा कि मंदाना ने पहली शादी सिटिजनशिप के लिए की थी. एक तरह से पहली शादी उन्होंने अपने फायदे के लिए की और काम निकल जाने के बाद गे वाला विवाद पैदा किया.

खैर, सच जो भी हो, उम्मीद है कि मंदाना की इस दूसरी शादी में कोई अड़चन नहीं आएगी.

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