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चुनाव प्रबंधन और वाक पटुता में भारी भाजपा

चुनाव में जीत के लिये प्रबंधन और वाक पटुता का सबसे अहम रोल हो गया है. अब यह पार्टी संगठन और कार्यकर्ताओं के बस की बात नहीं रह गई है. इसके लिये प्रोफेशनल टीम बेहतर काम करती है. यह टीम पूरी तरह से अपने काम पर फोकस करती है. जिससे पार्टी हर जगह सबसे आगे दिखती है. प्रोफेशनल टीम के चुनाव प्रबंधन और नेताओं की वाकपटुता के मामले में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भाजपा अपने विरोधी बसपा और सपा-कांग्रेस गठबंधन पर हावी है.

मीडिया के साथ बेहतर तालमेल सबसे अधिक भाजपा की टीम कर रही है. बसपा में सारा तालमेल पार्टी प्रमुख मायावती के आसपास घूमता है. कांग्रेस में काफी अच्छी तरह से तालमेल रखा जाता है. कांग्रेस की परेशानी यह है कि हाईकमान के आदेश नीचे के कार्यकर्ताओं को सीधे नहीं मिल रहे जिससे ग्राउंड पर काम करने वाले को ऊपर की नीतियों का पता ही नहीं होता है.

उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार होने के कारण समाजवादी पार्टी से यह उम्मीद थी कि वहां पर चुनाव प्रबंधन बेहतर होगा. खासकर मीडिया को हर जानकारी समय पर सटीक तरह से मिल सकती है. सपा में मीडिया की भीड़ तो बड़े स्तर पर दिखती है पर बिना किसी भेदभाव के सटीक जानकारी नहीं मिलती. पार्टी प्रवक्ताओं का बड़ा फोकस केवल अखिलेश यादव के करीब रहता है. जिसकी वजह से भाजपा के हमलों का सही जवाब वहां तैयार नहीं किया जाता. आज के दौर में मीडिया का मतलब केवल अखबार या टीवी चैनल नहीं रह गये हैं. वेब मीडिया सबसे बडे हथियार के रूप में काम कर रही है. वेब मीडिया को लेकर सपा और बसपा में कोई नीति नहीं है. जबकि भाजपा में यह बडी प्रमुखता के साथ देखा जा रहा है.

यह सच है कि जमीनी जनाधार और वोटबैंक के स्तर पर बात करे तो उत्तर प्रदेश में जो प्रभाव मायावती का है या अखिलेश यादव का है वह भाजपा और कांग्रेस दोनो का नहीं है. दोनो ही दलों में प्रदेश स्तर पर एक भी ऐसा नेता नहीं है जो मायावती और अखिलेश यादव की लोकप्रियता का मुकाबला कर सके. सबसे बड़ा वोटबैंक भी इन दोनो दलों के पास ही है. इसके बाद भी यह लड़ाई में पीछे दिखते हैं. इसका यही कारण है कि वाक पटुता और चुनाव प्रबंधन में अखिलेश और मायावती दोनो ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से बहुत पीछे हैं. अखिलेश और मायावती दोनो के ही पास बोल पाने की वह कला नहीं है जो नरेंद्र मोदी के पास है.

अखिलेश और मायावती कोई अकुशल नेता नहीं हैं. दोनों की जमीनी पकड़ है. चुनाव में पैसा दोनों दल भी खर्च कर रहे हैं. अंतर केवल यह है कि भाजपा से चुनाव प्रबंधन और वाकपटुता के मामलें में दोनों ही दल पिछड़ रहे हैं. जिस प्रभावी ढंग से भाजपा अपनी बात को रख रही है चुटीले संवादों से सुनने वालों को प्रभावित कर रही है उस तरह से मायावती और अखिलेश नहीं कर पा रहे हैं. इंटरनेट से लेकर प्रचार के सभी साधनों में सबसे आगे भाजपा है. अब सपा बसपा अगर यह समझ रहे हैं कि उनके कार्यकर्ता गांव में रहते हैं उनको इंटरनेट देखने, अखबार और पत्रिकायें पढ़ने से कोई मतलब नहीं तो वह गलत सोच रहे हैं.

लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की हार का सबसे प्रमुख कारण यही था कि वहां चुनाव प्रबंधन और वाकपटुता का अभाव था. यही हालत उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में सपा-बसपा के सामने है. 2 फेस के विधानसभा चुनाव होने के बाद अभी 5 फेस के चुनाव बाकी हैं. अगर इस स्तर पर भी सपा-बसपा कुछ बदलाव कर सके तो बेहतर है. चुनावी बाजी को जीतने के लिये चुनाव प्रबंधन और वाक पटुता का होना भी जरूरी है. केवल कुशल नेता होने भर से चुनाव नहीं जीते जा सकते.                     

मोबाइल गेम कराएगा आपको अंतरिक्ष की सैर

बहुत से मोबाइल यूजर्स को गेम खेलने का काफी शौंक होता है. लोग ऑफिस जाते समय बस या मेट्रों ट्रेन में विभिन्न प्रकार के गेम खेलते हैं. मोबाइल गेम के शौकीन लोगों के लिए बाजार में एक ऐसा गेम आने वाला है जो उन्हें की सैर करायेगा.

फिनलैंड की कंपनी कोहू इंटरटेनमेंट ने स्पेस नेशन एस्ट्रोनॉट प्रोग्राम के लिए 2.2 मिलियन यूरो जुटा लिए हैं. कंपनी ने यह राशि मोबाइल गेम के लिए, क्राउड फंडिंग के जरिए मात्र 2 दिन में जुटाई है. यह भी सुना जा रहा है कि कोहू इंटरटेनमेंट कंपनी मोबाइल गेम इस्तेमाल करने वाले यूजर में से किसी एक यूजर को अंतरिक्ष में भेजेगी.

स्पेस नेशन एस्ट्रोनॉट प्रोग्राम जो की एक मोबाइल गेम है वह लोगों को असली अंतरिक्षयात्री की तरह ट्रैनिंग देगा. उन्हें रियल वर्ल्ड के एडवेंचर में हिस्सा लेना होगा और लीडरबोर्ड पर आगे बढ़ना होगा. ऐप में तीन किस्म की चुनौतियों का सामना करना पडे़गा- शारीरिक, मांसिक और सामाजिक.

सुना गया है कि, प्वाइंट जुटाने के लिए यूजर को उन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा जिनसे उनका शारीरिक, मांसिक और सामाजिक विकास होता है. ऐप का सबसे बेहतरीन उम्मीदवार एक एस्ट्रोनॉट ट्रैनिंग प्रतियोगिता में हिस्सा लेगा. और हर साल एक शख्स को अंतरिक्ष में ले जाने के लिए चुना जाएगा.

कोहू इंटरटेनमेंट कम्पनी ने यूजर्स के लिए योजना बनाई है कि सबसे पहले मोबाइल गेम के टॉप 100 यूजर्स का रियल एस्ट्रोनॉट ट्रैनिंग में आकलन किया जाएगा. और उन्हें अगले साल की शुरुआत में दो हफ्ते के लिए ट्रैनिंग बूट कैंप के लिए आमंत्रित किया जाएगा. इसके बाद 12 चुने गए खिलाड़ी एक इनटरेक्टिव फिल्म सीरीज का हिस्सा बनेंगे. यहां पर एक शख्स को चुना जाएगा जो अंतरिक्ष में जाएगा. क्राउडफंडिंग के जरिए कोहू का लक्ष्य 4.9 मिलियन यूरो जुटाना है.

अभी इस गेम को रिलीज नहीं किया गया है. लेकिन जल्द ही इसे बाजार में लाया जायगा. कोहू इंटरटेनमेंट कम्पनी द्वारा गेम के रिलीज की सभी तैयारियां कर ली गई है.

पटना का खुजली गैंग

पटना कोतवाली के अंतर्गत आने वाले एक बड़े बैंक के बाहर 5-6 लड़के इस तरह खड़े थे, मानो किसी का इंतजार कर रहे हों. कुछ देर तक वे आपस में बातें करते रहे. करीब 10 मिनट बाद उन में से 2 लड़के बैंक में दाखिल हो गए तो बाहर खड़े उन के बाकी साथी मेन गेट के पास ही इधरउधर फैल गए.

सभी बारबार अपनी घडि़यां देख रहे थे और अपने साथियों से इशारों में कुछ बातें कर रहे थे. कुछ ही देर में एक अधेड़ व्यक्ति बैग लिए बैंक से बाहर निकला तो बैंक में दाखिल हुए दोनों लड़के भी उस के पीछेपीछे बाहर आ गए. बाहर खड़े उन के साथियों में से एक लड़का उस अधेड़ के पास आया और कोई पता पूछने लगा. अधेड़ उसे पता बताने लगा, तभी उन लड़कों में से एक लड़के ने उस के शरीर पर कोई पाउडर छिड़क दिया. वह अधेड़ पता बताने में मशगूल था, इसलिए उस की कुछ समझ में नहीं आया.

एकदम से उस के शरीर में तेज खुजली होने लगी, जिस से वह बैग जमीन पर रख कर पीठ, गर्दन आदि पर खुजली करने लगा.

उसी बीच उन लड़कों ने अधेड़ को चारों ओर से घेर लिया और उस की जेब से मोबाइल फोन, पर्स, अंगुली से सोने की अंगूठी निकाल ली और जमीन पर रखा बैग ले कर वहीं खड़ी गाड़ी में बैठ कर भाग निकले. अधेड़ चिल्लाया तो लोग उस के पास जमा हो गए.

उस ने सभी को आपबीती बताई तो किसी ने पुलिस को सूचना दे दी. उस अधेड़ को लूटने वाले लड़कों ने लूट के बाद पटना ही नहीं, बिहार ही छोड़ दिया था. वे दूसरे राज्य में जा कर छिप गए थे. पटना समेत बिहार के अन्य जिलों में पुलिस उन्हें ढूंढ़ती रही, पर किसी का कुछ पता नहीं चला.

पुलिस ने उन की खोज में जहांतहां छापा मारा, उन के पकड़े जाने की कौन कहे, कोई सुराग तक हाथ नहीं लगा.

यह एक खुजली गैंग था, जो इसी तरह लोगों को लूटता था. लूट कर वे बिहार छोड़ कर किसी अन्य राज्य में जा कर छिप जाते थे और पुलिस उन्हें ढूंढती रह जाती थी. महीने, 2 महीने में मामला शांत हो जाता और पुलिस थकहार कर बैठ जाती तो वे लड़के बिहार लौट आते और नए शिकार की तलाश में लग जाते. वे जिस तरह वारदात कर रहे थे, इस से लोग इसे खुजली गैंग कहने लगे थे.

खुजली गैंग के ये लड़के किसी को अपना शिकार बनाने से पहले अच्छी तरह से रेकी करते थे. ये बैंक से रकम या गहने ले कर निकलने वालों को अपना निशाना बनाते थे. गैंग के 2 सदस्य बैंक के अंदर जाते थे तो बाकी लोग बैंक के बाहर इधरउधर फैल जाते थे.

अंदर जाने वाले युवकों की नजरें कैश काउंटर पर जमी रहती थीं. लोगों को शक न हो, इसलिए वे भी कोई पर्ची या विदड्राल ले कर भरते रहते थे. जब वे देखते थे कि कोई मोटी रकम निकाल रहा है तो वे उस के पीछे लग जाते थे.

इसी के साथ वे अपने मोबाइल फोन से बाहर खड़े गैंग के अन्य सदस्य के मोबाइल फोन पर मिस्डकाल कर के शिकार के बाहर आने की जानकारी दे देते थे. मिस्डकाल आते ही बाहर खड़े सदस्य खुजली पाउडर ले कर तैयार हो जाते थे.

शिकार अपनी मोटरसाइकिल या कार के पास पहुंचता था, उन में से एक सदस्य उस के पास जा कर कोई पता पूछता था. वह आदमी पता बताने लगता, तभी गैंग का कोई सदस्य उस के शरीर पर खुजली पाउडर छिड़क देता. आदमी खुजली करते हुए परेशान होने लगता तो गैंग के सभी सदस्य उसे घेर लेते और उसे लूट कर अपनी गाड़ी से भाग खड़े होते.

पटना पुलिस को मुखबिरों से सूचना मिली कि शास्त्रीनगर के एक मकान में कुछ लड़के रह रहे हैं, जिन की गतिविधियां संदिग्ध लग रही हैं. एसएसपी मनु महाराज के निर्देश पर पुलिस ने छापा मार कर उन्हें पकड़ा तो पता चला कि वे सभी लड़के खुजली गैंग के सदस्य थे. इन्हें कोढ़ा गिरोह भी कहा जाता था.

इस गिरोह ने पटना कोतवाली, शास्त्रीनगर, राजवंशीनगर, पटेलनगर, बेली रोड, बोरिंग रोड, राजाबाजार, दानापुर आदि इलाके में आतंक मचा रखा था.

पटना के थाना शास्त्रीनगर पुलिस ने कोढ़ा गैंग के सरगना अमर कुमार समेत 7 लोगों को लूट की योजना बनाते हुए राजाबाजार की चौधरी गली से पकड़ा था. पूछताछ में पता चला कि अमर कुमार और उस के साथी विशाल कुमार, सिकंदर यादव, कबीर, आयुष, मिथलेश कुमार बिहार के जिला कटिहार के रहने वाले थे.

मुन्ना ग्वाला पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी का रहने वाला था. पुलिस ने गैग के पास से 2 पिस्तौलें, 4 जिंदा कारतूस, लूटी हुई 2 मोटरसाइकिलें, 7 मोबाइल फोन, 2 चाकू, मास्टर चाबी, ताला तोड़ने का सामान और खुजली पाउडर जब्त किया था.

गैंग के सरगना अमर कुमार ने पुलिस को बताया कि वह पटना से लूटी गई मोटरसाइकिल को नंबर बदल कर मुजफ्फरपुर और हाजीपुर में बेच दिया करता था. पटना के एसएसपी मनु महाराज के अनुसार, खुजली उर्फ कोढ़ा गैंग के सदस्यों की तलाश काफी दिनों से चल रही थी. इस गैंग के सभी सदस्य नएनए अपराधी बने थे, जिस से पुलिस रिकौर्ड में इन का नाम नहीं था, इसलिए पुलिस को इन्हें पकड़ने में परेशानी हो रही थी.

मासूम की बलि

अशोक कुमार पंजाब के जिला जालंधर के गांव मलको में पत्नी रजनी और 2 बच्चों 7 वर्षीय गुरप्रीत चुंबर उर्फ गोपी एवं 4 वर्षीय मनप्रीत के साथ रहता था. वह कौंप्लेक्स स्थित एक फैक्ट्री में खराद मशीन का मिस्त्री था.

फैक्ट्री के लिए वह सुबह 8 बजे घर से निकलता तो रात को लगभग 8 बजे ही घर आता था. उस का बड़ा बेटा गांव के ही सरकारी स्कूल में कक्षा 2 में पढ़ता था. उसे स्कूल तक पहुंचाने और छुट्टी के बाद घर लाने की जिम्मेदारी रजनी की थी. गुरप्रीत बड़ा ही खूबसूरत, मासूम दिखने वाला हंसमुख स्वभाव का था, इसलिए मोहल्ले के सभी लोग उस से स्नेह रखते थे.

अशोक कुमार के पड़ोस में 2-4 मकान छोड़ कर जीतराम और उस के बेटे राजकुमार का मकान था. जुलाई 2016 के अंतिम सप्ताह में राजकुमार के मकान में मंगतराम पत्नी के साथ किराए पर रहने आया. वह मूलरूप से  फाजलवाल का रहने वाला था.  वह मकान बनाने के ठेके लेता था, इसीलिए गांव के लोग उसे मंगत ठेकेदार कहते थे.

मंगत के बगल वाले कमरे में इंद्रजीत रहता था. वह मंगतराम के साथ ही काम करता था. दोनों साथ ही काम पर जाते थे और साथ ही रात को घर लौटते थे. मंगतराम की पत्नी जानकी हंसमुख और मिलनसार स्वभाव की थी, इसलिए पड़ोस की औरतों से उस की खूब पटती थी.

जानकी शाम को मोहल्ले के बच्चों को घर बुला कर नि:शुल्क ट्यूशन पढ़ाती थी. इस से उस का समय भी कट ही जाता था और बच्चों को भी फायदा होता था. अशोक कुमार का बेटा गुरप्रीत चुंबर भी रोजाना शाम को जानकी के घर ट्यूशन पढ़ने जाने लगा था.

जानकी ने 8 अगस्त, 2016 को मोहल्ले में सब से कह दिया कि वह अपने पति के साथ माता चिंतपूर्णी मंदिर जा रही है. उस के लौटने तक उस का देवर इंद्रजीत बच्चों को ट्यूशन पढ़ाएगा. उस दिन शाम को तय समय पर ट्यूशन पढ़ने के बाद बच्चे घर नहीं पहुंचे तो उन के घर वाले मंगतराम के घर जा पहुंचे. सब ने देखा इंद्रजीत बच्चों को पढ़ा रहा था. उस ने कहा कि थोड़ी देर में वह बच्चों को घर भेज देगा.

15 मिनट बाद सभी बच्चे अपनेअपने घर पहुंच गए, पर गुरप्रीत नहीं आया. रजनी को जब पता चला कि उस के बेटे के अलावा सभी बच्चे ट्यूशन पढ़ कर घर आ गए हैं तो वह मंगतराम के घर गई.

मकान का दरवाजा अंदर से बंद था. दरवाजा खटखटाने पर इंद्रजीत बाहर निकला तो पूछने पर उस ने बताया कि बस 2 प्रश्न रह गए हैं. उन्हें पूरा करने के बाद वह खुद गुरप्रीत को घर पर पहुंचा देगा. उस की बात से संतुष्ट हो कर रजनी घर लौट आई. पर आधे घंटे बाद भी जब गुरप्रीत नहीं आया तो रजनी को चिंता हुई.

वह उसे लेने के लिए बड़बड़ाती हुई घर से निकली कि ऐसी कौन सी पढ़ाई है, जो खत्म नहीं हो रही है. वह फिर से मंगतराम के घर पहुंची तो दरवाजे पर लगा ताला देख कर उस का माथा ठनक गया. उस के मुंह से निकला, ‘अरे ताला डाल कर ये कहां चले गए और मेरा गोपी कहां है?’

रजनी ने घबरा कर शोर मचा दिया तो मोहल्ले के तमाम लोग जमा हो गए. पूछने पर रजनी ने अपने बेटे और इंद्रजीत के गायब हो जाने की बात बता दी. मोहल्ले वाले भी सोच में पड़ गए कि इंद्रजीत बच्चे को ले कर पता नहीं कहां चला गया है? किसी अनहोनी की कल्पना से रजनी का दिल बैठा जा रहा था. उस समय शाम के साढ़े 7 बज रहे थे. मोहल्ले वाले गोपी को इधरउधर खोजने लगे.

एक दुकानदार ने बताया कि करीब सवा 6 बजे के करीब इंद्रजीत गुरप्रीत को ले कर उस की दुकान पर आया था. उस ने गुरप्रीत को 2 चौकलेट और 2 कुरकरे के पैकेट दिलाए थे.

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’ रजनी ने कहा, ‘‘सवा 6 बजे से 7 बजे तक मैं ने खुद गुरप्रीत को इंद्रजीत के यहां ट्यूशन पढ़ते देखा था.’’

दुकानदार ने विश्वास दिलाते हुए कहा कि सवा 6 बजे के करीब ही वह दुकान पर आया था. अब रजनी को मामला गड़बड़ नजर लगने लगा. वह सोचने लगी कि जब वह सवा 6 बजे के करीब इंद्रजीत के घर गई थी तो वहां घर में कौन था? लोगों ने कुछ ही देर में गांव का कोनाकोना छान मारा गया, पर गुरप्रीत और इंद्रजीत का कहीं पता नहीं चला. अब रजनी रोने लगी. गांव के एक आदमी ने मंगतराम और जानकी को फोन कर सारी बात बताई. मंगतराम ने कहा कि इस समय वह चिंतपूर्णी माता के मंदिर में है. इसलिए इस मामले में कुछ नहीं कर सकता. बात खत्म कर के उस ने अपना फोन स्विच्ड औफ कर दिया.

संयोग से उस समय अशोक घर पर नहीं था. उस की नाइट ड्यूटी थी. गुरप्रीत को ढूंढतेढूंढते रात के 11 बज गए थे. बेटे के गायब होने की सूचना रजनी ने फोन द्वारा पति को दी तो वह तुरंत घर आ गया और बेटे की खोज में लग गया. जब वह कहीं नहीं मिला तो रात करीब साढ़े 12 बजे मोहल्ले के कुछ लोग पड़ोसी की छत से मंगतराम के घर में पहुंचे.

मकान के अंदर कमरों के दरवाजे खुले हुए थे. एक कमरे का नजारा बड़ा ही रहस्यमयी था. कमरे के बीचोबीच एक हवनकुंड बना था, जिस में अधजली लकडि़यां और हवन सामग्री पड़ी थी. कुछ हवन सामग्री हवनकुंड के बाहर भी पड़ी थी. वहीं एक छुरी, कुछ कटे नींबू, लौंग, जायफल, सिंदूर और किसी जानवर के बाल और 7 हड्डियां पड़ी थीं.

यह सब देख कर सभी हैरान थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह सब क्या है और गुरप्रीत कहां है? इस के बाद सभी दूसरे कमरे में पहुंचे तो उस कमरे का ज्यादातर सामान गायब था. एक कमरे में एक तख्त पड़ा था और लोहे की एक पुरानी अलमारी रखी थी.

जब उस अलमारी को खोल कर देखा गया तो सभी के होश उड़ गए. अलमारी खुलते ही उस के अंदर रखी गुरप्रीत की लाश फर्श पर गिर पड़ी. अपने जिगर के टुकड़े की हालत देख कर अशोक की चीख निकल गई. लोगों ने लाश उठा कर तख्त पर लिटा दी. मकान का मेनगेट खुलने पर रजनी भी अंदर आ गई थी. बेटे की लाश देख कर वह भी दहाड़े मार कर रोने लगी. फौरन पुलिस को सूचना दी गई.

सूचना मिलते ही थाना लंबड़ा के थानाप्रभारी सरबजीत सिंह टीम के साथ घटनास्थल पर आ पहुंचे थे. घटनास्थल पर पूरा गांव जमा था. थानाप्रभारी ने इस घटना की सूचना डीसीपी और क्राइम इन्वैस्टिगेशन टीम को दे दी थी. गांव वाले बच्चे की हत्या पर उत्तेजित थे. कुछ ही देर में एडिशनल डीसीपी परमिंदर सिंह भंडाल सहित अन्य अधिकारी भी वहां आ गए थे.

एडिशनल डीसीपी भंडाल ने गांव वालों को समझा कर शांत किया और भरोसा दिया कि जल्द ही हत्यारों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा.

घटनास्थल का बारीकी से मुआयना किया गया. बरामद सामान और माहौल देख कर साफ लग रहा था कि कमरे में तांत्रिक क्रिया की गई थी. मृतक बच्चे के माथे पर काला तिलक लगा था. गले में फूलों की माला, हाथों पर सिंदूर और गरदन पर खून के निशान थे. लाश को गोटा लगी लाल सुर्ख रंग की चुनरी में लपेट कर अलमारी में रखा गया था. उस के हाथपैर लाल रंग के मौली धागे से बंधे थे. सिर पर किसी भारी चीज के मारने की चोट थी.

अब तक की जांच से स्पष्ट हो गया था कि इंद्रजीत या किसी तांत्रिक ने गुरप्रीत की बलि दी गई थी. बहरहाल मौके की जरूरी काररवाई पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज कर कमरे से जरूरी सबूत कब्जे में ले लिए गए. इस के बाद अशोक कुमार के बयानों के आधार पर पुलिस ने इंद्रजीत के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर उस की तलाश शुरू कर दी.

एडिशनल डीसीपी परमिंदर सिंह भंडाल ने आरोपी की गिरफ्तारी के लिए अतिरिक्त थानाप्रभारी विजय कुमार, एएसआई गुरमेज सिंह, हैडकांस्टेबल जोगिंदर सिंह, तलविंदर सिंह, कांस्टेबल बलजीत  कुमार, कुलदीप सिंह की एक टीम बनाई बनाई, जिस का निर्देशन थानाप्रभारी सरबजीत सिंह को सौंपा गया.

गांव के लोगों को ले कर ले कर टीम माता चिंतपूर्णी के लिए रवाना हो गई. इस के अलावा थानाप्रभारी ने पूरे शहर में इंद्रजीत की तलाश में मुखबिरों को भी लगा दिया था. सरबजीत सिंह ने क्षेत्र में प्रमुख स्थानों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी निकलवा कर देखी. एक फुटेज में इंद्रजीत गुरप्रीत को ले कर जाता दिखाई दिया. उस के हाथ में कुरकुरे के पैकेट थे, एक अन्य फुटेज में इंद्रजीत हैंडबैग ले कर कहीं जा रहा था. शायद यह उस के फरार होने के समय का था.

पुलिस दिनरात इंद्रजीत की तलाश में जुटी थी. माता चिंतपूर्णी गई टीम खाली हाथ लौट आई थी. 4 दिनों बाद मुखबिर ने इंद्रजीत के बारे में पुख्ता सूचना दी. सूचना के आधार पर बस्ती जोधेयाल में दबिश दे कर इंद्रजीत को गिरफ्तार कर लिया गया. वह थका हुआ सा दिखाई दे रहा था.

पूछताछ शुरू करने से पहले ही उस ने अपना अपराध स्वीकार कर के कहा कि उस ने एक ऐसा पाप कर दिया है, जिस की माफी शायद ही उसे मिले. इस के बाद गुरप्रीत की हत्या की उस ने जो कहानी बताई, वह कोई नई नहीं थी. चालाक और शातिर लोग सदियों से दूसरों की कमजोरी का फायदा उठा कर अपना मनचाहा काम करवाते रहे हैं, यह भी उसी का नतीजा थी.

मंगतराम जालंधर में पिछले कई सालों से काम कर रहा था. उस की लगभग 4-5 महीने पहले इंद्रजीत से मुलाकात हुई थी. वह राजमिस्त्री का काम करता था. दोनों की जल्दी ही अच्छी जानपहचान हो गई और उस ने उसे रहने के लिए अपने घर पर जगह दे दी. मंगतराम की पत्नी ने उसे अपना देवर मान लिया और उस का खाना भी वही बनाने लगी. इंद्रजीत को पतिपत्नी ने अपने चक्रव्यूह में फंसा लिया.

इंद्रजीत कपूरथला के गांव रावलपिंडी के एक गरीब परिवार का लड़का था. उस की एक बहन थी जो शादी लायक थी और उस का रिश्ता भी तय हो गया था. 2 महीने बाद उस की शादी होने वाली थी. इंद्रजीत के पिता वृद्ध और कमजोर थे, पर जैसेतैसे वह घर के लिए दो जून की रोटी का इंतजाम कर लेते थे.

3-4 सौ रुपए रोज की मजदूरी में बहन की शादी करनी असंभव थी. शादी के लिए लाखों रुपए की जरूरत थी, इसलिए इंद्रजीत किसी ऐसे बड़े आदमी या बड़े ठेकेदार की तलाश में था, जो उसे लाखों का कर्ज ब्याज पर दे सके या कोई ठेकेदार उसे लाखों रुपए एडवांस दे सके. वह हर महीने एक मुश्त रकम चुकाता रहेगा. यही एक तरीका था बहन की शादी करने का.

इस बात का पता जब मंगतराम को चला तो एक दिन शाम को उस ने घर पर बोतल मंगवा कर इंद्रजीत के साथ पीते हुए पूछा, ‘‘तुम्हें 2 लाख रुपए की जरूरत है न?’’

‘‘हां,’’ इंद्रजीत बोला, ‘‘बहन की शादी के लिए 2 लाख रुपए जल्द चाहिए.’’

‘‘मैं तुम्हें 2 लाख रुपए दे सकता हूं.’’ मंगतराम ने जाल फेंकते हुए कहा.

‘‘क्या?’’ इंद्रजीत ने कुछ कहना चाहा तो मंगतराम ने उसे रोकते हुए कहा, ‘‘पहले मेरी पूरी बात सुन लो, मैं तुम्हें 2 लाख रुपए बिना ब्याज के दूंगा. मतलब 2 लाख रुपए दे कर वापस भी नहीं लूंगा, पर तुम्हें मेरा एक काम करना होगा.’’

‘‘कौन सा काम?’’ इंद्रजीत ने पूछा तो मंगतराम ने कहा कि शादी के कई साल बीत जाने के बाद भी उस की भाभी को औलाद नहीं हुई है. इस की कोख पर किसी जिन्न का साया है. वह खुद तांत्रिक है. उस ने अपनी तंत्र विद्या से जिन्न का साया हटा दिया है. अब उस से किसी ने कहा है कि वह एक 7 साल के बच्चे की बलि दे तो उस की आत्मा उस की पत्नी की कोख से जन्म ले लेगी.

मंगतराम ने बताया कि उस की पत्नी जानकी ने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के चक्कर में पूरा माहौल तैयार कर लिया है. जिस बच्चे की बलि दी जानी है, उसे चुन लिया है. उसे बस उस के कहे अनुसार उस की बलि देनी है.

बच्चे की बलि की बात सुन कर इंद्रजीत एकबारगी घबरा गया. पर जब उस ने अपने घर में झांक कर देखा तो बच्चे की बलि से अधिक उसे अपनी जरूरत बड़ी लगी. काम कैसे करना है, यह सब मंगतराम ने उसे समझा दिया और सामान आदि के लिए 10 हजार रुपए भी दे दिए.

योजना के अनुसार, 7 अगस्त 2016 को जानकी ने मोहल्ले में कह दिया कि वह चिंतपूर्णी मंदिर जा रही है. उसी दिन मंगतराम पत्नी के साथ घर छोड़ कर चला गया. वे चिंतपूर्णी गए या कहीं और इस बात का अभी तक पता नहीं चला है.

बहरहाल अगले दिन योजना के अनुसार इंद्रजीत ने ट्यूशन पढ़ाने के बहाने सभी बच्चों घर बुला लिया. इस के पहले दोपहर को वह बाजार से पूजा की सामग्री ले आया था, जो उसे मंगतराम लिख कर दे गया था.

कुछ देर बाद उस ने सभी बच्चों की छुट्टी कर दी और गुरप्रीत को रोक लिया. गुरप्रीत से उस ने कहा कि वह सब से अच्छा बच्चा है, इसलिए वह उसे इनाम देगा. इनाम के लालच में गुरप्रीत वहीं रुक गया. वह गुरप्रीत को एक दुकान पर ले गया और वहां से उसे चौकलेट और कुरकुरे के पैकेट दिलवा दिए.

दुकान से सामान दिला कर वह गुरप्रीत को घर ले आया और उसे पीने के लिए पानी दिया, जिस में नशे की दवा मिली थी. पानी पीने के कुछ देर बाद गुरप्रीत बेहोश हो गया. इस के पहले कि वह अपना काम शुरू करता, गुरप्रीत को पूछने के लिए उस की मां आ गई.

रजनी को इंद्रजीत ने बहाना बना कर वापस भेज दिया और हवन कुंड में जल्दी से लकडि़यां जला कर मंगतराम द्वारा बताई गई क्रियाएं खत्म कर एक सूआ गुरप्रीत की सांस नली में घुसेड़ कर खून निकाला और बाद में सिर में ईंट मार कर जान ले ली. वह जिंदा न रह जाए, इस के लिए मंगतराम द्वारा बताए तरीके से उस की बलि चढ़ा हत्या कर के उस की लाश एक लाल रंग की चुनरी में लपेट कर अलमारी में रख दी और फरार हो गया.

पुलिस ने इंद्रजीत को अदालत में पेश कर पूछताछ के लिए रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि के दौरान उस की निशानदेही पर सूआ और ईंट बरामद कर ली गई, रिमांड खत्म होने पर उसे फिर से 18 अगस्त, 2016 को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

पुलिस इस बलिकांड के सूत्रधार मंगतराम और उस की पत्नी की सरगर्मी से तलाश कर रही है, पर उन के मिलने की संभावनाएं न के बराबर हैं.

इस कांड से इंद्रजीत की बहन की शादी में तो समस्या आएगी, साथ ही रजनी को उस का बेटा गुरप्रीत कभी नहीं मिलेगा. तांत्रिक मंगतराम को औलाद होगी या नहीं? यह तो बाद की बात है, पर उस की इस घटिया सोच और अपराध ने एक मां से उस का बेटा जरूर छीन लिया है.  

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित घटना का नाटकीय रूपांतरण किया गया है.

फरजी थानेदारनी

हमेशा की तरह 25 जुलाई, 2016 की सुबह कंवलजीत कौर तैयार हो कर घर से निकली और कलानौर से बस पकड़ कर गुरदासपुर पहुंच गई. उस ने को फोन कर के राजीव बुला रखा था, इसलिए बसअड्डे पर बस के रुकते ही वह उतर कर सीधे उस गेट पर पहुंच गई थी, जहां वह मोटरसाइकिल लिए खड़ा था. उस के पास जा कर उस ने कहा, ‘‘जल्दी करो, पहले पुलिस लाइंस चल कर हाजिरी लगवा लूं, उस के बाद कहीं घूमने चलेंगे. अगर एब्सैंट लग गई तो बड़ी मुश्किल होगी.’’ मोटरसाइकिल स्टार्ट ही थी, कंवलजीत के पिछली सीट पर बैठते ही राजीव ने मोटरसाइकिल पुलिस लाइंस की ओर बढ़ा दी. जिला गुरदासपुर के कस्बा कलानौर के मोहल्ला नवांकटड़ा निवासी मेहर सिंह की बेटी कंवलजीत कौर ने सब को यकीन दिला दिया था कि उसे सरकारी नौकरी मिल गई है, वह भी कोई साधारण नहीं, पंजाब पुलिस में थानेदार की यानी असिस्टैंट सबइंसपेक्टर (एएसआई) की. सितारों वाली लकदक खाकी वरदी पहन कर वह 2 सालों से शहर में घूम कर रौब जमा रही थी. पिछले 2 सालों से कंवलजीत कौर गुरदासपुर में ही तैनात थी. इधर वह लोगों से कहने लगी थी कि अब कभी भी उस का ट्रांसफर किसी दूसरे शहर में हो सकता है. अगर उस का तबादला हो गया तो उस के लिए मुश्किल हो जाएगी. अभी तो वह घर में ही है, इसलिए उस के लिए चिंता की कोई बात नहीं है.

कंवलजीत कौर ड्यूटी पर जाने के लिए घर से पैदल ही कलानौर बसअड्डे पर आती थी और वहां से बस पकड़ कर  गुरदासपुर पहुंच जाती थी. जानने वालों को उस ने बता रखा था कि गुरदासपुर में उसे सरकारी गाड़ी मिल जाती है, जिस से वह ड्यूटी करती है. उस का कहना था कि उस का इलाके में ऐसा दबदबा है कि बदमाश उस के नाम से कांपते हैं. न जाने कितने गुंडों की पिटाई कर के उस ने उन्हें जेल भिजवा दिया है. यही वजह थी कि बड़े अफसर भी उस के बारे में चर्चा करने लगे हैं कि पुलिस डिपार्टमेंट में यह लड़की काफी तरक्की करेगी.

राजेश के साथ कंवलजीत कौर पुलिस लाइंस पहुंची तो पता चला कि वहां आने वाले स्वतंत्रता दिवस पर होने वाली पुलिस परेड की जोरदार तैयारियां चल रही हैं. अंदर रिहर्सल हो रहा था. गेट पर काफी भीड़ थी. सुरक्षा की दृष्टि से पुलिसकर्मियों को भी पूरी जांचपड़ताल के बाद ही अंदर जाने दिया जा रहा था.

कंवलजीत कौर पहले भी वहां कई बार आ चुकी थी. लेकिन कभी किसी ने कोई रोकटोक नहीं की थी. इत्मीनान से अंदर जा कर पूरी पुलिस लाइंस घूम कर वह आराम से बाहर आ गई थी, लेकिन उस दिन तो वहां की स्थिति ही एकदम अलग थी.

कंवलजीत कौर बाहर ही रुक कर सोचने लगी कि इस स्थिति में अंदर जाना चाहिए या नहीं?

दूसरी ओर राजीव की समझ में नहीं आ रहा था कि बसअड्डे पर पुलिस लाइंस पहुंचने की जल्दी मचाने वाली कंवलजीत कौर अब अंदर क्यों नहीं जा रही है?

उस ने इस बारे में कंवलजीत कौर से पूछा तो उस ने कहा, ‘‘मैं सोच रही हूं कि आज अंदर न जाऊं. क्योंकि अंदर जाने पर फरलो (अनाधिकृत छुट्टी) पर मैं जल्दी बाहर नहीं निकल पाऊंगी. उस के बाद हमारा घूमनेफिरने का प्रोग्राम बेकार जाएगा.’’

‘‘कंवल, हमारा घूमनाफिरना इतना जरूरी नहीं है, जितना ड्यूटी. कहीं तुम्हारी नौकरी न खतरे में पड़ जाए. पहले भी कई बार तुम इस तरह हाजिरी लगवा कर मेरे साथ घूमने जा चुकी हो. बसस्टैंड पर तुम कह भी रही थी कि एब्सैंट लग गई तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी.’’ राजीव ने कहा.

‘‘वही तो सोच रही हूं. अगर एब्सैंट लग गई तो मुश्किल और अंदर चली गई तो बाहर आने में मुश्किल. मैं बाहर नहीं आ सकी तो मेरे इंतजार में खड़ेखड़े तुम बोर होते रहोगे. अब तुम्हीं बताओ, मैं क्या करूं?’’

‘‘मेरी समझ से तो यही ठीक रहेगा कि मैं लौट जाऊं और तुम अंदर जा कर अपनी ड्यूटी करो. खाली होने के बाद फोन कर देना, मैं आ जाऊंगा.’’

‘‘अगर मैं अंदर चली गई तो शाम से पहले नहीं निकल पाऊंगी. ऐसे में आज हम ने जो घूमनेफिरने का प्रोग्राम बनाया है, वह चौपट हो जाएगा.’’

‘‘कोई बात नहीं, तुम अंदर जा कर अपनी ड्यूटी करो. मैं गुरदासपुर में ही रहूंगा. तुम्हारा फोन आते ही मैं तुम्हें लेने आ जाऊंगा.’’

राजीव और कंवलजीत आपस में बातें कर रहे थे, तभी अधिकारियों की गाडि़यां आ गईं. उन के लिए गेट खोलने के साथ ही वहां खड़े सिपाहियों ने गेट के पास खड़े तमाम लोगों को अंदर धकेल दिया. उन में कंवलजीत और राजीव भी थे.

दोनों असमंजस की स्थिति में थे कि अब क्या करें, तभी वहां मौजूद एक थानेदार ने उन के पास आ कर कंवलजीत कौर से कहा, ‘‘मैडम, जल्दी करो, एंट्री करवा कर परेड ग्राउंड में पहुंच जाओ.’’ इस के बाद उस ने राजीव से कहा, ‘‘तुम बिना वरदी के ही आ गए. किस रैंक पर हो और क्या नाम है तुम्हारा?’’

राजीव कुछ कहता, उस से पहले ही कंवलजीत कौर ने कहा, ‘‘सर, यह मिस्टर राजीव मेरे साथ आए हैं. यह नौकरी नहीं करते. इन की बहन मेरी बैस्ट फ्रैंड है और उस की आज शादी है. इसलिए मैं इन्हें साथ ले कर आज की छुट्टी लेने आई हूं.’’

‘‘छुट्टियां तो आजकल बिलकुल नहीं मिल रही हैं मैडम. फिर जिस काम के लिए तुम्हें छुट्टी लेनी है, उस के लिए तो पहले ही सैंक्शन करवा लेना चाहिए था. वह देखिए, उस तरफ लाइंस इंसपेक्टर बैठे हैं. चलिए, मैं उन से तुम्हारी बात करवा देता हूं.’’

कंवलजीत कौर आनाकानी करने लगी तो राजीव खीझ कर बोला, ‘‘तुम तो आज एकदम बच्चों जैसा व्यवहार कर रही हो.’’

राजीव का इतना कहना था कि कंवलजीत कौर नाराज हो कर अनापशनाप बकने लगी. उस का कहना था कि उस के प्यार में पड़ कर उस ने जो कुछ किया है, वह उसे बिलकुल नहीं करना चाहिए था. क्योंकि अब वह उस की भावना की कदर न कर के उसे उसी के विभाग वालों के सामने जलील करने की कोशिश कर रहा है.

दूसरी ओर राजीव का कहना था कि उस ने जो कुछ भी कहा है, उस की भलाई के लिए कहा है. लेकिन कंवलजीत कौर का गुस्सा शांत नहीं हुआ. वह राजीव को जलील करने लगी तो वहां मौजूद थानेदार उन्हें चुप कराने का प्रयास करते हुए दोनों को लाइंस इंसपेक्टर दलबीर सिंह के पास ले गया.

थानेदार की बात सुन कर दलबीर सिंह ने कंवलजीत कौर को सवालिया नजरों से घूरते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारी पोस्टिंग कहां है?’’

‘‘जी…जी यहीं है.’’ कंवलजीत कौर ने हकलाते हुए कहा.

‘‘यहां…कहां? यहां तो मैं ने पहले कभी नहीं देखा. आज पहली बार देख रहा हूं, वह भी बदतमीजी करते हुए.’’

‘‘नहीं सर, बदतमीजी नहीं, वह तो सर यह राजीव…’’

‘‘कौन है यह? पुलिस का आदमी तो नहीं लग रहा?’’

‘‘नहीं सर, यह पुलिस में नहीं है. ये लोग तो जमींदार हैं, बहुत जमीनजायदाद है इन के पास.’’

‘‘तो फिर यहां क्या लेने आया है यह?’’

‘‘यह मेरे साथ आया है सर. इस की बहन मेरी बैस्ट फ्रैंड है. आज उस की शादी है, जिस में शामिल होने के लिए मैं छुट्टी लेने आई थी.’’

‘‘छुट्टी लेने आई थी तो वरदी पहन कर आने की क्या जरूरत थी?’’

‘‘सर, इसलिए कि अगर छुट्टी नहीं मिली तो ड्यूटी कर लूंगी.’’

‘‘हां, इस तरह छुट्टी मिलने वाली नहीं, तुम्हें ड्यूटी करनी पड़ेगी. चलो, अपना आईकार्ड दिखाओ.’’

‘‘आईकार्ड, मतलब पहचानपत्र सर?’’

‘‘बड़ी अंजान बन रही हो, कह तो रही हो सीधे एएसआई भरती हुई हो?’’

दरअसल, 2-3 दिनों पहले दलबीर सिंह को उन के किसी मुखबिर ने बताया था कि एएसआई की वरदी पहन कर एक लड़की गुरदासपुर में घूम रही है. वह पैसे तो किसी से नहीं ऐंठती, पर थानेदारनी होने का रौब खूब दिखाती है. उस के रौब की वजह से कुछ दुकानदार उसे स्वेच्छा से नियमित रूप से पैसे दे रहे हैं. उस नकली थानेदारनी का हुलिया भी उस ने उन्हें बताया था. इस बारे में दलबीर सिंह काररवाई करने की योजना बना रहे थे. लेकिन कंवलजीत कौर को देख कर उन्हें लगा कि कहीं यही वह नकली थानेदारनी तो नहीं, जिस के बारे में मुखबिर ने बताया था. क्योंकि उस का हुलिया मुखबिर द्वारा बताए हुलिए से काफी हद तक मिल रहा था.

 दलबीर सिंह ने कंवलजीत कौर से परिचय पत्र मांगा तो इधरउधर की बातें करते हुए अंत में उस ने कहा कि उस का आइडेंटिटी कार्ड खो गया है. इस से वह संदेह के दायरे में आ गई. दलबीर सिंह ने इस विषय पर अधिकारियों से बात की तो उन्होंने कहा कि फिलहाल लड़की को एक किनारे कर के पहले उस के साथ आए लड़के से विस्तार से पूछताछ करो. संभव है, वह भी उस के साथ शामिल हो. वहां की बदलती स्थिति को देख कर लड़का यानी राजीव काफी घबरा गया था. पुलिस ने उसे अलग ले जा कर पुलिसिया अंदाज में पूछताछ की तो वह बुरी तरह से घबरा गया, क्योंकि इस के पहले उस का पुलिस से कभी वास्ता नहीं पड़ा था.

पूछताछ में उस ने अपना नाम राजीव कुमार बताया. वह नई आबादी, कलानौर, जिला गुरदासपुर के रहने वाले सुरेश कुमार का बेटा था. उस के पिता इलाके के खातेपीते जमींदार थे. वह मांबाप की अकेली औलाद था. 3 साल पहले वह फिल्म देखने गया था, तभी उस की मुलाकात कंवलजीत कौर से हुई थी. उसी पहली मुलाकात में दोनों में प्यार हो गया था, जो जल्दी ही परवान चढ़ गया. कंवलजीत कौर ने उसे बताया था कि वह साधारण परिवार से संबंध रखती है, पर अपनी मेहनत से जिंदगी में बड़ा मुकाम हासिल करना चाहती है. उस ने बीसीए कर रखा था. वह काफी खूबसूरत थी और भाईबहनों में सब से बड़ी थी.

राजीव ने जब उस के बारे में अपने घर वालों से बात की तो पिता ने कहा कि उन के पास सब कुछ है, वह बिना दानदहेज के उस से शादी कर लेंगे. लेकिन अंतिम निर्णय उस की मां को लेना है. राजीव की मां किरनबाला ने सब कुछ तो मान लिया, लेकिन एक शर्त रख दी कि लड़की सरकारी नौकरी में होनी चाहिए. अगर पुलिस अफसर हुई तो और भी अच्छा होगा. राजीव ने सारी बात कंवलजीत कौर को बताई तो वह काफी मायूस हुई. लेकिन उस ने राजीव से संबंध बनाए रखे. फिर एक दिन उस ने राजीव को फोन कर के बताया कि उसे पंजाब पुलिस में एएसआई की नौकरी मिल गई है. उस ने अपनी तैनाती भी गुरदासपुर की ही बताई. इस के बाद वह जब भी राजीव से मिली, एएसआई की वरदी में ही मिली.

कंवलजीत कौर से उस का चक्कर चल ही रहा था कि उसी बीच उस के घर वालों ने उस की शादी कौलेज की एक लैक्चरर से तय कर दी. वह कंवलजीत कौर को धोखा नहीं देना चाहता था, इसलिए मम्मीपापा को मनाने की कोशिश में लगा था. वह कंवलजीत को दिल से पसंद करता था और उसी से शादी करना चाहता था. इसीलिए वह जब भी उसे जहां बुलाती थी, वह काम छोड़ कर उस से मिलने पहुंच जाता था.

उस दिन भी ऐसा ही हुआ था. राजीव से पूछताछ चल ही रही थी, उसी के साथ पुलिस ने कंवलजीत कौर के बारे में पता कराया तो उस का झूठ खुल कर सामने आ गया. वह कभी भी पुलिस में भरती नहीं हुई थी. पुलिस की वरदी पहन कर वह सब को बेवकूफ बना रही थी. इस के बाद उस के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कर एएसआई की वरदी में ही गिरफ्तार कर के चेहरा ढांप कर उसे पत्रकारों के सामने पेश किया गया. उस ने स्वीकार किया कि प्रेमी राजीव से शादी करने के लिए वह फरजी दारोगा बनी थी. पूछताछ के बाद पुलिस ने कंवलजीत कौर को अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.   कथा लिखे जाने तक उस की जमानत हो चुकी थी. पुलिस ने राजीव को बेकसूर मानते हुए इस मामले में गवाह बना लिया था. कथा लिखे जाने तक पुलिस ने कंवलजीत कौर के खिलाफ आरोप पत्र तैयार कर के अदालत में पेश कर दिया था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

यूपी में एमपी का प्रचार कर गये शिवराज

मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव अगले साल हैं. वहां के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अभी से चुनावी प्रचार सा करने लगे हैं. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में शिवराज सिंह चौहान चुनावी प्रचार के लिये औरया में जनसभा करने के बाद राजधानी लखनऊ में मीडिया से मिलने आये तो उत्तर प्रदेश से ज्यादा मध्य प्रदेश के गुणगान गाते नजर आये. शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि उत्तर प्रदेश में जो पार्टी का घोषणापत्र है मध्य प्रदेश में पहले से लागू है. शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश से विकास के मामले में बहुत आगे है.

केन्द्र सरकार ने बुन्देलखंड को ले कर जो पैकेज दिया उसको लेकर उत्तर प्रदेश में काम ही नहीं शुरू हुआ. मध्यप्रदेश में 99 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है. खेती को लेकर मध्य प्रदेश में दी जाने वाली सुविधाओं को विस्तार से बताया. मध्य प्रदेश में बढ़े हुये अपराध पर सफाई देते शिवराज सिंह चौहान ने कहा मध्य प्रदेश में अपराधों पर रिपोर्ट औन लाइन दर्ज होते हैं इसलिये आंकड़े ज्यादा दिखते है. यूपी में अपराध अधिक है पर यहां रिपोर्ट ही दर्ज नहीं होते है. भाजपा की सरकार बनने के बाद यूपी में भी विकास का रथ मध्य प्रदेश की तरह दौडेगा.’

शिवराज सिंह चौहान की परेशानी यह है कि अगले साल वहां पर विधानसभा के चुनाव हैं. मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा लगी हुई है. मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस की सीधी टक्कर है. अगर कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल होगी, तो मध्य प्रदेश कर राजनीति पर उसका प्रभाव पड़ेगा.

मध्य प्रदेश में लंबे समय से भाजपा की सरकार है. पार्टी पर पूरी तरह से शिवराज सिंह चौहान का कब्जा है. शिवराज सिंह चौहान ने भाजपा में किसी को नम्बर दो के नेता की हैसियत बनाने नहीं दी है. मध्य प्रदेश में व्यापम घोटाले को लेकर शिवराज सरकार की बहुत किरकिरी हो चुकी है. लोकसभा चुनाव के बाद केन्द्र सरकार की धूमिल होती छवि और प्रदेश सरकार पर व्यापम की छाया मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के लिये मुसीबत बन सकती है. ऐेसे में शिवराज सिंह चौहान उत्तर प्रदेश के लोगों को मध्य प्रदेश के अच्छे दिनो का हवाला दे रहे हैं.

मध्य प्रदेश की सीमा से लगा उत्तर प्रदेश का बुन्देलखंड इलाका इस सच को देखता और परखता है. सीमा के करीब उसे दोनों में कोई बहुत फर्क नहीं दिखता. अब शिवराज सिंह चौहान अपने काम काज का प्रचार करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते. यही वजह है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में हर सवाल के जवाब में वह मध्य प्रदेश से तुलना करने लगते थे. शिवराज सिंह चौहान मंझे हुये पुराने नेता हैं. प्रचार के हर मौके का लाभ उठाना चाहते हैं.        

टीन क्रश : जिम्मेदारी का एहसास

किशोरावस्था मनुष्य के जीवनकाल का वह समय है, जब न तो बचपन रहता है और न ही जवानी आई होती है. यह दौर किशोरों में शारीरिक व मानसिक परिवर्तन व विकास का होता है. बदलावों के इस दौर से गुजर रहे किशोरों में क्रश के भाव उपजना आम बात है. क्रश एक तरह का आकर्षण है, जो उस के साथ पढ़ने वाले किशोर या किशोरी किसी के प्रति भी उपज सकता है. 

क्रश को ज्यादातर लोग प्यार की श्रेणी में ही रख कर देखते हैं, लेकिन यह प्यार से एकदम अलग होता है, क्योंकि प्यार एक बार हो गया तो यह जीवन भर बना रहता है. किशोरों में होने वाला क्रश जनून की हद तक जा सकता है. क्लास में एकदूसरे के हावभाव, बौडी लैंग्वेज, पढ़ाई में तेजतर्रार होने, अलग पहनावा व हेयरस्टाइल, बनसंवर कर रहने के चलते भी हो सकता है. कभीकभी किसी की मासूमियत देख कर भी क्रश हो सकता है.

किशोरावस्था में होने वाले क्रश के दौर में अगर सावधानी न बरती जाए तो यह कैरियर व पढ़ाई को तो बरबाद करता ही है साथ ही जिस के प्रति आकर्षण है उस की पढ़ाई व कैरियर भी चौपट हो सकता है. ऐसे में क्रश विपरीत लिंग के प्रति मात्र आकर्षण ही नहीं बढ़ाता बल्कि जिम्मेदारी का एहसास कराने की पहली सीढ़ी भी माना जाना चाहिए. अगर आप के किशोर मन में किसी के प्रति आकर्षण है तो उस के प्रति अपनी जिम्मेदारियां निभा कर उस की नजर में अच्छे बन सकते हैं.

क्रश को बनाएं जिम्मेदारी

आप को जब भी किसी के प्रति क्रश हो तो उस के पीछे न भागें और न ही उसे ले कर पढ़ाई व कैरियर से मुंह मोड़ें बल्कि उसे भी समझने की कोशिश करें और जरूरत पड़ने पर उस की पढ़ाईलिखाई में भी मदद करें. कई बार देखा गया है कि जिस के प्रति आप क्रश के भाव रखते हैं वह अपनी पढ़ाई व कैरियर को ले कर निर्णय लेने की स्थिति में नहीं होता. ऐसे में उसे एहसास करा सकते हैं कि आप उस के करीबियों में से हैं और उस की समस्या का निदान आसानी से कर सकते हैं. अगर आप को उस के पढ़ाई व कोर्स से जुडे़ सवालों के जवाब न भी पता हों तो अपने किसी जानने वाले की मदद से उस की मदद कर सकते हैं.

कभीकभी पढ़ाई के बीच कैरियर का सवाल आप के क्रश के लिए असमंजस की स्थिति पैदा कर देता है. ऐसे में आप उसे उबारने में बेहतर मददगार साबित हो सकते हैं. आप उसे समझा सकते हैं कि उस का मन जिस कैरियर को चुनने के लिए गवाही दे रहा हो, वह उसे चुने.  

आप की यह जिम्मेदारी आप के क्रश को एहसास करा सकती है कि आप उस का भला ही सोचते हैं. जैसा कि जाहनवी के साथ हुआ. 11वीं कक्षा में पढ़ने वाली जाहनवी का अपने सहपाठी नीरज के साथ क्रश था, जिस के चलते वह स्कूल जल्दी पहुंच जाती और स्कूल के गेट पर खड़ी हो कर नीरज का इंतजार करती. नीरज के स्कूल आने के बाद जाहनवी का मन गुलजार हो जाता, लेकिन  जिस दिन नीरज स्कूल न आता उस दिन जाहनवी का मन पढ़ाई में नहीं लगता.

जब नीरज को जाहनवी के इस लगाव के बारे में पता चला तो उस का भी जाहनवी के प्रति आकर्षण बढ़ गया. परंतु वह समझदार निकला. उसे लगा कि इस के चलते जाहनवी की पढा़ई व कैरियर पर प्रभाव पढ़ रहा है. अत: उस ने उसे सचेत किया और कहा कि हम एकदूसरे को पसंद करते हैं, लेकिन इस का हमारी पढ़ाई पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए.

साथ ही उस ने उस की पढ़ाई में भी मदद की. इस से जाहनवी अपनी क्लास के बच्चों के समकक्ष पहुंच गई. इस प्रकार जिम्मेदारी का एहसास हो तो क्रश मजबूत बनता है वरना बरबादी का कारण.

बुरी आदतों को छुड़ाने में करें मदद

अगर आप के साथ किसी का क्र्रश है तो आप सिर्फ उस की पढ़ाईलिखाई या कैरियर के मामले में ही मदद नहीं कर सकते बल्कि आप उस में आई बुराई को भी दूर करने में मदद कर सकते हैं. आप के क्रश को तंबाकू, सिगरेट, गुटका, शराब आदि व्यसनों की लत है तो उस की इस बुरी लत को छुड़ाने में अपनी जिम्मेदारी निभाएं. आप इन से होने वाली हानि से बचाने के लिए उस से जुड़ी जागरूकता सामग्री, पत्रपत्रिकाएं, साहित्य, गिफ्ट कर उन की मदद कर सकते हैं. अगर आप के प्रयास के चलते आप का क्रश इन बुरी आदतों को छोड़ता है तो निश्चित ही उस का लगाव आप के प्रति और बढ़ जाएगा.

सोशल मीडिया से डालें मदद करने की आदत

अगर आप खुद के क्रश के लिए सचमुच समर्पित हैं तो इस में सोशल मीडिया आप का बेहतर मददगार साबित हो सकता है. आप सोशल मीडिया के जरिए अपने साथी के सवालों का समाधान चैट बौक्स या वीडियो कौलिंग के जरिए कर सकते हैं.

सैक्स संबंध बनाने से बचें

चिकित्सक डा. श्यामनारायण चौधरी के अनुसार किशोरावस्था में अपने से विपरीत लिंग के प्रति क्रश होना और उस को ले कर सैक्स संबंध बनाने के सपने देखना आम बात है. इस का एक बड़ा कारण किशोरों में कई तरह के हारमोनल चेंज

होना है. ऐसी स्थिति में किशोर जिस से क्रश रखते हैं उस के साथ सैक्स अपराध करने में भी नहीं हिचकते. ऐसे में जब तक आप इस स्थिति में न पहुंच जाएं कि आप परिपक्व सैक्स के बारे में पूरी तरह से जानकारी प्राप्त कर लें, इन चीजों से दूरी बना कर रखना ही ज्यादा उचित होगा.   

क्रश के चलते जिम्मेदार बनें व निम्न बातों का ध्यान रख कर आदर्श प्रस्तुत करें : 

– अपने क्रश को ले कर खुद की भावनाओं पर संतुलन बनाना सीखें.

– अपने क्रश की रुचि और पसंदनापसंद को जानें, इस से आप को उस की मदद करने में आसानी होगी.

– अगर आप का क्रश अत्यधिक शरमीला है तो आप आत्मविश्वास जगाने में उस की मदद करें.

– आप अपने क्रश की दिनचर्या की जानकारी रखें. इस से आप को उस की मदद करने में आसानी होगी.

– क्रश पर भरोसा करना सीखें.

– अच्छे कपडे़ पहनें, अच्छा हेयरस्टाइल रखें, खुद साफसफाई रखें और क्रश को भी इस के लिए प्रेरित करें.

– जब भी क्रश के साथ बैठें तो पढ़ाई से जुड़ी बातों से शुरुआत करें ताकि वह भी अपनी पढ़ाई व कैरियर से जुड़ी समस्याओं को आप से शेयर करे, जिस से आप उस की मदद कर पाएंगे, लेकिन जब लगे कि वह आप की बातों को गंभीरता से नहीं ले रहा, तो टौपिक चेंज करें और हलकीफुलकी बातें करें.

प्रेम में क्यों डूबती हैं किशोरियां

किशोरावस्था में विपरीत लिंग से प्यार होने के कारणों में सब से महत्त्वपूर्ण है इस उम्र में हारमोंस का विकास होना. इस बारे में मनोरोग विशेषज्ञों का कहना है कि सात तालों में बंद करने के बाद भी इस वर्ग की किशोरियों को किसी के प्यार में पड़ने से नहीं रोका जा सकता. उन के अनुसार, ‘‘इस उम्र में किशोरकिशोरियों का शारीरिक विकास होता है और ऐसे हारमोंस की वृद्धि होती है जिन से मस्तिष्क प्रभावित होता है. इस के अलावा इसी बीच जननांगों का भी विकास होता है.’’

इन्हीं परिवर्तनों के कारण किशोरकिशोरियों में अपने जननांगों के प्रति उत्सुकता जागती है और किशोरियां कल्पनालोक में खोई इस परिवर्तन से आत्ममुग्ध होती रहती हैं. वे अपना अक्स किसी दूसरे में भी देखना चाहती हैं. उन की अपनी प्रशंसा उन्हें सतरंगी ख्वाब दिखाने लगती है. उम्र का यही पड़ाव उन में विपरीत सैक्स के प्रति आकर्षण पैदा करता है.

किशोरकिशोरियां इन शारीरिक परिवर्तनों से परस्पर आकर्षित होते हैं. यही झुकाव उन्हें प्यार की मंजिल दिखा देता है. वे दोनों अपना अधिकतर समय छिपछिप कर बातें करने व एकदूसरे की जिज्ञासाएं शांत करने में बिताते हैं. उन का यह सामीप्य उन में एक सुखद अनुभूति पैदा कर देता है, जिस से वे उन्मुक्त हो कर प्यार के बंधन में बंध जाते हैं.

आखिर कुछ किशोरकिशोरियां ही इस मार्ग को क्यों अपनाते हैं? समाजशास्त्रियों का मानना है कि बच्चे के सामाजीकरण में सामाजिक, पारिवारिक संस्थाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान है. मनोरोग विशेषज्ञों का कहना है, ‘‘इस उम्र में किशोरियों की स्थिति गरम लोहे के समान होती है और जब उन का माहौल उन पर चोट करता है तो वह उसी रंग में रंग जाती हैं.’’

पारिवारिक वातावरण का प्रभाव

किशोरियों को घरेलू तनाव, हर वक्त की नोकझोंक से उत्पन्न तनाव प्रभावित करता है, इस से जूझते बच्चे प्यार का सहारा खोजते हैं. ऐसे में दूसरे के प्रति आकर्षित होना सहज है. एक किशोरी ने बताया कि वह कैसे कच्ची उम्र में ही प्यार करने लगी थी. उस की सौतेली मां का व्यवहार अच्छा न था. उस के दिन भर काम करने पर भी उसे प्यार के दो मीठे बोल सुनने को नहीं मिलते थे. इसी दौरान एक लड़का उसे विशेष रुचि से निहारता था, कई बार स्कूल जाते समय उस की प्रशंसा करता था, जबकि वह अपने घर के कड़वाहट भरे जीवन से उकता रही थी. इस लड़के से उसे असीम प्यार व सहानुभूति मिली तो वह भी उस से प्यार करने लगी.

स्कूल के माहौल का प्रभाव

स्कूल का माहौल भी काफी हद तक प्रभावित करता है. स्कूल में कुछ किशोरियां अपने प्यार के किस्से को बढ़ाचढ़ा कर सुनाती रहती हैं. सहेलियों की संगत उन्हें अपने रंग में रंग लेती है. ऐसे में छात्राओं में प्यार की प्रतिस्पर्धा होती भी देखी गई है. ऐसी परिस्थितियों में मांबाप की लापरवाही आग में घी का काम करती है. इस उम्र में किशोरियों को प्यार, सहानुभूति व उचित शिक्षा की जरूरत होती है. कभीकभी स्कूल जैसी पवित्र संस्था से जुड़े कुछ लोग इन किशोरियों के साथ गलत सलूक करते हैं. चूंकि बच्चे भयग्रस्त होते हैं अत: कुछ कह नहीं पाते. ऐसी परिस्थितियों पर निगाह रखना या जानकारी रखना मांबाप का कर्तव्य है. कच्ची उम्र में भय और भावना दोनों ही खतरनाक होते हैं.

मीडिया का प्रभाव

मीडिया भी किशोरियों को इस राह पर पहुंचाने के लिए काफी हद तक उत्तरदायी है. आज हमारे सशक्त मीडिया दूरदर्शन पर शिक्षा की अपेक्षा मनोरंजन पर अधिक बल दिया जा रहा है, जिस में उत्तेजक दृश्यों की भरमार रहती है. उत्तेजक दृश्यों से उत्पन्न वासना किशोरियों को गुमराह करती है.

अश्लील साहित्य का प्रभाव

साहित्य समाज का प्रतिबिंब होता है लेकिन आज हमारा साहित्य किशोरों की उत्तेजना भड़काने वाला अधिक होता जा रहा है. उस में अश्लील लेखन व चिंत्राकन की भरमार रहती है. रहीसही कसर अब इंटरनैट व मोबाइल ने पूरी कर दी है. इस स्थिति से निबटने के लिए किशोरियों को उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता है. इस मार्गदर्शन में मां का उत्तरदायित्व सब से अधिक होता है.

बचाव के उपाय

पेरैंट्स को चाहिए कि बेटी के साथ मित्रता का भाव रखें. उस की समस्याओं को जान कर उन का निवारण करें. किशोर बेटी के प्रति लापरवाही न बरतें. समयसमय पर मां उस से यह जानकारी लेती रहें कि उसे कोई गुमराह तो नहीं कर रहा तथा उस की कोई समस्या या जिज्ञासा तो नहीं है.

घर की समस्याओं से भी किशोरियों को दूर न रखें, क्योंकि इस से वे अछूती रहती हैं तो उन्हें अपनी जिम्मेदारियों का ज्ञान नहीं हो पाता है. उसे बच्ची कहने मात्र से आप का दायित्व खत्म नहीं होता बल्कि उस पर दायित्व डाल देना ज्यादा बेहतर है. छोटे भाईबहनों को पढ़ाना, उन्हें स्कूल के लिए तैयार करना या घर के कामों में मां का हाथ बंटाना आदि ऐसे ही दायित्व हैं.

किशोरावस्था में किशोरियों को नितांत अकेला न छोडे़ं, क्योंकि एकांत कुछ न कुछ सोचने पर मजबूर करता है. जहां तक हो सके उन्हें व्यस्त रखें. व्यस्त रखने का मतलब उन से भारी काम लेना नहीं अपितु कुछ रुचिकर काम उन से लिया जा सकता है. खाली समय में व्यावसायिक शिक्षा भी दी जा सकती है. नाचगाने, पिकनिक, पर्वतारोहण, कंप्यूटर आदि का ज्ञान किशोरकिशोरियों की महत्त्वपूर्ण सामाजिक क्रियाएं हैं.

अगर किसी किशोरी को किसी किशोर से प्यार हो जाता है तो उसे प्यार से समझाएं कि यह वक्त पढ़नेलिखने का है, प्रेम करने का नहीं. उन्हें मारेंपीटें नहीं और न ही जरूरत से ज्यादा पाबंदियां लगाएं. उन का ध्यान किसी क्रिएटिव काम को करने में लगाएं.    

16 का प्यार, आकर्षण आधार

‘प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है…’ यह आम धारणा है पर यह प्यार नहीं आकर्षण होता है.

आमतौर पर पहली नजर में हमें किसी का चेहरा पसंद आ जाता है, किसी की आंखें पसंद आ जाती हैं या किसी का बात करने का स्टाइल पसंद आ जाता है या फिर किसी का व्यवहार. इसे पहली नजर का प्यार कहते हैं. स्कूल कालेज के दिनों में या कम उम्र में होने वाला यह प्यार ज्यादातर आकर्षण ही होता है.

आकर्षण ज्यादातर एक अस्थायी प्यार होता है, जो एकसाथ कई लोगों से हो सकता है. यह जरूरी नहीं कि हमें जिस के प्रति आकर्षण हो रहा है, उसे भी हमारे अंदर कोई बात पसंद आ जाए या फिर हम से प्यार हो जाए. थोड़ी बातचीत शुरू हो गई तो हम सामने वाले पर अपना हक समझने लगते हैं और यह जाने बिना कि उस की सोच हमारे बारे में क्या है, हम उस पर अधिकार जताते हैं, लेकिन यदि वह हमारी अपेक्षाओं पर खरा न उतरा तो बहुत जल्दी ही यह आकर्षण खत्म भी हो जाता है, या फिर एक जनून और जिद में बदल जाता है, जिस का नतीजा अच्छा नहीं होता. इसलिए यह जरूरी है कि प्यार और आकर्षण के फर्क को समझते हुए ही आगे बढ़ें.  

यह प्यार है या कुछ और : यह उम्र ऐसी होती है जिस में प्रेमीप्रेमिका को यह पता नहीं होता कि वे प्यार में हैं या फिर यह महज आकर्षण ही है. अपने इसी आकर्षण को प्यार मान कर वे आगे बढ़ने लगते हैं, लेकिन फिर जब एक साथी को एहसास हो जाता है कि यह प्यार नहीं था तो दोनों के लिए हजार मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं. इसलिए यह अटकले न लगाएं कि आप प्यार में हैं बल्कि अपने रिश्ते को समय दें और अपना ध्यान सिर्फ अपने कैरियर पर लगाएं.

जीवन भर का साथ नहीं है यह : कई लोग इस तरह की रिलेशनशिप को ले कर बहुत सीरियस हो जाते हैं और सोचने लगते हैं कि आज जो हमारा साथी है वह जीवन भर रहेगा, उम्र बढ़ने के साथसाथ मैच्योरिटी आती है और हमारे विचारों में आई परिपक्वता हमें इस बात का एहसास दिलाती है कि हमारे लिए क्या सही है और क्या नहीं. इसलिए हर परिस्थिति के लिए तैयार रहें.

सीरियस न हों : अगर आप अपने साथी को ले कर बहुत ज्यादा गंभीर हैं तो भी क्या कर लेंगे. अभी शादी तो कर नहीं सकते, लेकिन ये बातें सोचसोच कर अपना वक्त जरूर बरबाद कर लेंगे. इसलिए लड़की से दोस्ती हो गई है और वह आप को अच्छी लगने लगी है तो कोई बात नहीं, इस बारे में ज्यादा न सोचें कि कहीं आप उसे प्यार तो नहीं करते आदि बल्कि यह सोचें कि अभी मुझे उस के काबिल बनना है और अपना फोकस प्यार पर न कर के कैरियर पर करना है.

फिजिकल न हों : इस उम्र में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण होना स्वाभाविक है और फिजिकल आकर्षण के चलते किशोर जानकारी के अभाव में कुछ ऐसे कदम उठा लेते हैं जिस से बाद परेशानी खड़ी हो जाती है.

यह कैरियर बनाने का समय है : प्यार के झंझट में न ही पड़ें तो अच्छा है वरना बेकार की टैंशन तो होगी ही साथ ही घर में किसी को पता चल गया तो एक और बवाल से निबटने के लिए तैयार रहना होगा. 

वैसे भी यह समय कैरियर बनाने का है. ये सब करने के लिए तो पूरी उम्र पड़ी है, लेकिन अगर पढ़ाई में पिछड़े तो सब दोस्तों और भाईबहनों से पीछे रह जाएंगे और जिंदगी भर पछताने के सिवा कुछ नहीं बचेगा.   

आकर्षण और प्यार में फर्क समझें

– प्रेम समय के साथ धीरेधीरे आगे बढ़ता है लेकिन आकर्षण अचानक पहली नजर में ही हो जाता है.

– आकर्षण तीव्र मगर थोड़़े समय के लिए होता है लेकिन प्यार होने में समय लगता है. 

– प्रेम में व्यक्ति पार्टनर को गुणअवगुणों के साथ स्वीकारता है लेकिन आकर्षण की स्थिति में उस की आइडियल इमेज दिमाग में रहती है.

– आकर्षण में किशोर अपनी रिलेशनशिप को रियल फीलिंग्स के बजाय कल्पना पर टिकाता है.

– आकर्षण में 2 लोग लवर्स हो सकते हैं लेकिन रियल फ्रैंड्स नहीं, जो एकदूसरे की भावनाओं को अच्छे से समझ सकें.

– आकर्षण में फिजिकल रिलेशनशिप पर ज्यादा जोर रहता है, उन के लिए इस का इंतजार करना मुश्किल ही नहीं असंभव होता है और ऐसे में वे अपनी सीमाएं पार कर जाते हैं.

 आकर्षण हो तो क्या करें

– आकर्षण में इतना न खो जाएं कि बाकी सब भूल जाएं. पढ़ाई और कैरियर की कीमत पर कुछ न करें. 

– अकेले मिलने से बचें. दोस्तों के ग्रुप में मिलें.

– अनजानी जगहों पर एकसाथ जाने से बचें. मिलना भी है तो पब्लिक प्लेस पर मिलें ताकि भावनाओं पर नियंत्रण रखा जा सके.

– दोस्त या पार्टनर की किसी भी गलत मांग या जिद को पूरा न करें.

अप्रैल में चीन लौंच करेगा मालवाहक अंतरिक्ष यान

चीन इसी साल अप्रैल में अपने पहले मालवाहक अंतरिक्ष यान या स्पेसक्राफ्ट को प्रक्षेपित करने की योजना बना रहा है. खबरों के अनुसार 2022 तक स्थायी रूप से एक आबाद अंतरिक्ष स्टेशन की स्थापना के लक्ष्य को पूरा करने की की दिशा में यह कदम उठाया गया है. इस अंतरिक्ष यान की पहली यात्रा के विषय में जानकारी चीन के एक आधिकारिक अखबार के पहले पन्ने पर दी गई है. अखबार की खबर के अनुसार यह अंतरिक्ष यान 6 टन सामान, 2 टन ईंधन ले जा सकता है और साथ ही ये तीन महीने के लिए मानव रहित रह कर अंतरिक्ष में उड़ सकता है.

चीनी राष्ट्रपति जी जिनपिंग ने अंतरिक्ष कार्यक्रम को आगे बढ़ाने और इनके विकास को प्राथमिकता दी है. उनके अनुसार राष्ट्रीय सुरक्षा में वृद्धि करने की जरूरत है. Tianzhou cargo-1 को मार्च-7 Y2 रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में ले जाया जाएगा. इसका प्रक्षेपण दक्षिणी चीन के ननहाई द्वीप प्रांत के वेंचांग उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र से किया जाएगा. चीन के जेड रेबिट मून रोवर 2013 में चंद्रमा पर उतरे थ, लेकिन जल्द ही उन्हें वहां गंभीर तकनीकी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था.

चीन ने अब तक वैज्ञानिक, सैन्य और वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए अपने जितने भी अंतरिक्ष कार्यक्रमों को पूरा किया है, वे अभी भी संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस से पीछे ही है. अमेरिकी रक्षा विभाग चीन की इन बढ़ती अंतरिक्ष क्षमताओं पर प्रकाश डालते हुए कहता है कि यह एक संकट ही है, क्योंकि चीन का अंतरिक्ष आधारित परिसंपत्तियों का उपयोग करने वाली गतिविधियों का मतलब दूसरे देशों को ऐसा करने से रोकना ही हो सकता है.

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