Download App

जब कुर्सी ने कर दिया खिलाड़ी को आउट

इस महीने के आखिर में भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच टेस्ट सीरीज का आगाज होने वाला है. इस कड़ी टक्कर के लिए ऑस्ट्रेलियाई टीम भारत पहुंच चुकी है. इस दौरे पर आने से पहले कंगारूओं की ये फौज पूरी तैयारी करके आई है.

4 टेस्ट मैच की सीरीज से पहले ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी दुबई में अभ्यास करके आई है ताकि वो खुद को भारत की आबो-हवा में अच्छे से ढाल सके.

दुबई में प्रैक्टिस के दौरान ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने अभ्यास मैच खेला. आपस में खेले गए इस मैच के दौरान ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने कुछ ऐसा कर दिया जिसे देखकर हर कोई दंग रह गया. ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के इस प्रैक्टिस मैच में प्लास्टिक की कुर्सी को फील्डर बनाया गया. इस अभ्यास मैच का वीडियो अब सोशल मीडिया पर वाइरल हो रहा है.

क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने इस वीडियो को शेयर किया है. ऑस्ट्रेलिया इंट्रा-स्क्वायड प्रैक्टिस मैच के पहले दिन की हाईलाइट में आप देख पाएंगे कि किस तरह शॉर्ट लेग पर फील्डर की जगह कुर्सी को रखा गया है. इतना ही नहीं इस कुर्सी की वजह से एक बल्लेबाज को अपना विकेट गंवाना पड़ा. आपको यकीन नहीं हो रहा तो लीजिए आप खुद ही देख लीजिए.

इन कलाकारों ने अब तक नहीं चखा है शादी का लड्डू

भारत में विवाह को समाज का हमेशा ही एक जरुरी भाग माना गया है. लेकिन समय के साथ बहुत कुछ बदलने लगा है! आज के समय की बात की जाए तो लोग उम्र बढ़ने के बावजूद भी वर्तमान पीढ़ी के साथ आगे बढ़ने में विश्वास रखते हैं. ठीक किसी आम आदमी की तरह ही हमारे बॉलीवुड के हस्तियों को भी यही लगता है कि किसी गलत व्यक्ति के साथ शादी करने से बेहतर है सही जीवन साथी का इंतजार करना.

लगता है कि बॉलीवुड के कुछ दिग्गज हस्तियों को अब भी जीवन में अपने प्यार का इंतजार है. आज हम यहां कुछ पुरुष अभिनेता और बॉलीवुड की कुछ हस्तियों की बात कर रहे हैं जो अपने चालीसवें साल में चल रहे हैं या इससे भी ऊपर हैं और वे अभी भी अविवाहित होने का आनंद ले रहे हैं. हालांकि भविष्य में कुछ भी हो सकता है और हम सभी तो अच्छी खबर सुनने के लिए बेताब हैं. तो एक नजर है डालते हैं ऐसे पुरुष कलाकारों पर..

तुषार कपूर

तुषार कपूर बीते समय के बेहतरीन अभिनेता जीतेंद्र कपूर के बेटे हैं. तुषार का जन्म साल 1976 में हुआ था. फिल्म 'मुझे कुछ कहना है' से करियर की शुरुआत करने वाले तुषार को इस फिल्म के लिए साल 2002 में फिल्मफेयर अवार्ड फॉर बेस्ट मेल डेब्यू भी मिला. पर बावजूद इसके तुषार कपूर अपने कोई खास प्रशंसक नहीं बढ़ा सके थे. परदे पर एक रोमांटिक हीरो के रूप में अस्वीकार कर दिये जाने पर उन्होंने अपने कर्यर को कॉमेडी फिल्मों की ओर खुद को स्थानांतरित किया. उन्होंने ऐसा शायद इस विचार के साथ किया कि अब वे दर्शकों को अपना व्यंग्य पक्ष दिखाऐंगे. लेकिन उनका यह प्लान भी अच्छी तरह से फ्लाप हुआ.

इन सब के बीच राधिका आप्टे और अमृता राव के साथ तुषार के लिंक-अप्स की अफवाहें भी उड़ी. हालांकि अब ऐसा कुछ लगता नहीं है. अब लगता है कि तुषार कपूर ने पूरी तरह से अपने आप को स्थिर कर लिया है. अब तो वे अपने सरोगेट बेटे लक्ष्य के पिता भी हैं.

रणदीप हुड्डा

रणदीप हुड्डा आज के एक लोकप्रिय अभिनेता हैं. रणदीप हुड्डा साल 1976 में पैदा हुए थे. वे बॉलीवुड में आने से पहले भी कॉफी लोकप्रिय थे और उनकी उपस्थिति को बॉलीवुड में महसूस किया जा चुका था और ऐसा उनके सुष्मिता सेन के साथ कथित संबंधों की वजह से था. लेकिन बाद में दोनों ही कलाकारों ने अज्ञात कारणों से अलग होने का फैसला ले लिया. ये उनका प्यार में एक बुरा अनुभव हो सकता है. सूत्रों के मुताबिक रणदीप, अभिनेत्री नीतू चंद्रा से शादी करने वाले थे, जिन्हें वे तीन साल से डेट कर रहे थे. लेकिन बाद में दोनों ने ही इस रिश्ते को बिना किसी स्पष्टीकरण के बीच में ही छोड़ दिया.

अक्षय खन्ना

वैरागी प्रकृति के अक्षय का जन्म 1975 में हुआ था. हाल ही में 41 वर्षीय अक्षय ने 2016 की फिल्म 'डिसूम' के साथ अपने अभिनय करियर को पुनर्जीवित किया है. एक दशक से अपने अभिनय करियर से दूर और शायद अपने निजी जीवन में व्यस्त अक्षय ने हमेशा अपने जीवन में एक मर्यादा को बनाए रखा. मीडिया को भी हमेशा इस सेलिब्रिटी को समझने में मुश्किल होती है. आज भी उनकी शादी की कोई योजना नहीं है और वे अपनी दुनिया में खुश हैं.

राहुल खन्ना

सन 1972 में जन्म लेने वाले राहुल खन्ना भी विनोद खन्ना और अक्षय खन्ना वाले सभ्य अभिनेताओं के परिवार से आते हैं. बॉलीवुड में कुछ खास तो नहीं पर राहुल ने अपने लिए चमकदार या तेजतर्रार प्रसिद्धि हासिल की है. अक्षय खन्ना के विपरीत वे परदे पर बहुत कम दिखाई दिये हैं. लेकिन अगर करियर की बात की जाए तो एक अभिनेता के लिए उसके प्रशंसक ही मायने रखते हैं और वो भी  विशेष रूप से महिला प्रशंसकों के बीच. लेकिन अगर वास्तविक जीवन की बात करें तो 44  साल के राहुल बिल्कुल अपने भाई के समान हैं और वे भी अब तक सिंगल हैं.

करण जौहर

कहते हैं कि हिन्दी सिनेमा के निर्माण कार्यों में सुधार के लिए करण जौहर को भेजा गया है. फिल्म 'कुछ कुछ होता है' के साथ निर्माता करण जौहर हिन्दी सिनेमा के निर्माण जगत में आऐ. करण के जीवन में कामों की सूची में बहुत सी बातें शामिल हैं इसीलिए शायद ही वे उनके रोमांटिक जीवन के बारे में कुछ सोच पाते होंगे. बहु प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के करण के शुरुआती 40 साल भी में सिंगल ही बीत रहे हैं और अब तो  संभावना भी कम है कि वो अपने लिए कोई 'मिस राइट' खोज भी पाऐंगे.

साजिद खान

'हमशकल्स' और 'हिम्मतवाला'  जैसी असफल फिल्मों के निर्माता साजिद 47 साल के हो चुके हैं. उनके मामले में ये बहुत आश्चर्य की बात है कि अपनी फिल्मों की अभिनेत्रियों के साथ, ऑफ स्क्रीन मिंगल होने की प्रथा को  साजिद ने ही शुरु किया है. हालांकि वे इसमें से भई सफलता नहीं पा सके. वे सिंगल है, यह हमें लगता है कि अपनी अगली फिल्म की अभिनेत्री मिल जाने के बाद भी वे ऐसे ही रहेंगे.

राहुल बोस

50 साल के हो चुके राहुल, ये बात स्वीकार करते हैं कि शादी बर्बादी है. उन्होंने अब तक शादी नहीं की. खैर हमें लगता है कि वे अपने ही कुछ फिल्मों जैसे 'प्यार के साइड इफेक्ट्स' और 'कुछ लव जैसा'  से प्रभावित हो गये हैं.

सलमान खान

अपने जीवन के 50 साल पूरे कर चुके अभिनेता सलमान खान, बॉलीवुड के सबसे योग्य बेचलर कहे जाते हैं. करियर की शुरुआत से ही सलमान के काफी महिला प्रशंसक हैं और जब सलमान ने वो कमीज वाला सीन स्क्रीन पर दर्शकों के सामने किया तब उनकी प्रशंसाओं का तांता अन्य स्तर पर पहुंच गया. हालांकि, रील लाइफ के बाहर सलमान की कोई ऐसी खास महिला प्रशंसक नहीं है, जिसे वे अपना जीवन साथी बना सकें. संगीता बिजलानी, ऐश्वर्या राय और कैटरीना कैफ जैसी अभिनेत्रियों के साथ कुछ कमय तक उनके संबंधों की चर्चा थी, पर बाद में सलमान अकेले ही रह गए.

मनीष मल्होत्रा

भारतीय सिनेमा के अधिकतम अभिनेताओं और कलाकारों के लिए ग्लैमर की दुनिया में रीढ़ की हड्डी हैं 52 वर्षीय मनीष मल्होत्रा. मनीष की असाधारण प्रतिभा के साथ वे फैशन उद्योग के जीवन में सांस देने के काम कर रहे हैं. वे अपने साथ काम करने वाले लोगों की टीम को अपना परिवार ही समझते हैं. इस दुनिया को ही उन्होंने अपनी दुनिया मान लिया है. उन्होंने अब तक शादी नहीं की है.

संजय लीला भंसाली

आज के समय के एक बहुत ही काबिल फिल्मकार संजय लीला भंसाली भी, दूसरे फिल्मनिर्माता करण जौहर की तरह जीवन जी रहे हैं. अपने जीवन के 55 साल पूरे कर चुके संजय, जीवन में सफलता और अपने काम की पूर्णता के उच्च शिखर को पा चुके हैं और उन्हें भी जीवन में एक साथी की आवश्यकता, अनावश्यक ही महसूस होती है. तो जाहिर है कि वे अब तक सिंगल हैं और अपने जीवन की प्रेम कहानी में जरा भी रुचि नहीं लेते हैं.

सेवा के बदले शुल्क अदा करने की आदत डालें

दूरसंचार कंपनियों में इन दिनों मोबाइल सेवाप्रदाता रिलायंस जियो इंफो कौम लिमिटेड और उस के द्वारा निशुल्क दिया जा रहा उस का सिमकार्ड ‘जियो’ ही चर्चा में हैं. जनसामान्य के लिए ‘जियो’ इंटरनैट दुनिया का आनंद लेने का सब से बड़ा जरिया बन गया है. मिस्डकौल कर के दूसरी तरफ से कौलबैक का इंतजार करने वाले भी अब खूब बातें करते हैं और ‘जियो’ का सिम है, इसलिए फोन नहीं काटने की हिदायतें देते हैं.

पिछले वर्ष सितंबर में जब रिलायंस ने जियो सिम 3 माह के लिए निशुल्क जारी किया तो इस के लिए लंबी कतारें लग गईं. क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों में निशुल्क सुविधा वाला यह सिम ब्लैक में बिकने लगा. अब फिर इस निशुल्क सेवा की अवधि 31 दिसंबर से 31 मार्च तक बढ़ा दी गई है. हर हाथ तक लगभग जियो की पहुंच हो चुकी है. ऐसे में अन्य सेवाप्रदात्त कंपनियों में प्रतिस्पर्धा आ गई और उन्हें दरों में कटौती के प्लान पेश करने को मजबूर होना पड़ा.

देश की सब से बड़ी सेवाप्रदाता एयरटेल को दिसंबर में जियो के कारण 55 फीसदी का नुकसान हुआ. 3 साल में कंपनी का यह सब से बड़ा नुकसान है. उस का कुल राजस्व भी 3 फीसदी तक घटा है, उस का तीसरी तिमाही का मुनाफा पिछले वर्ष इस अवधि के 1,108. 2 करोड़ रुपए से घट कर 503.6 करोड़ रुपए रह गया है. दूसरी सेवाप्रदाता कंपनियों का भी ऐसा ही हाल है.

फ्री की सेवा का लाभ उठाने में सब को आनंद आता है और हमारे लिए फ्रीसेवा तो ज्यादा ही लुभावनी होती है. इसी का फायदा राजनीतिक दल चुनाव के समय भी उठाते हैं. निशुल्क चावल, कंप्यूटर, बिजली आदि की बात कर के मतदाताओं को लुभाया जाता है.

हमें यह जरूर विचार करना चाहिए कि  निशुल्क सेवा देने की बात करने वाला इस का कैसे फायदा उठा रहा है. कोई भी बिजनैसमैन तब तक फ्री कुछ नहीं दे सकता जब तक उसे लाभ नहीं मिल रहा हो वरना उस का कारोबार ठप हो जाएगा. हमें फ्री पाने की मानसिकता से परहेज करना होगा और स्वस्थ भारत के निर्माण के लिए सेवा के बदले शुल्क अदा करने की आदत विकसित करनी होगी.     

जेएनयू की सोच पर कट्टर दृष्टि

कट्टरपंथी पौराणिकवादियों की आंखों में दिल्ली का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय किरकिरी बना हुआ है और अगर यह सरकार लंबे दौर तक चली तो यह विश्वविद्यालय गुरुकुल कांगड़ी जैसा बन जाएगा. कन्हैया कुमार का मामला न तो पहला था और न अंतिम. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की वामपंथी, उदार, धर्मविरोधी और सरकारविरोधी नीतियों ने उसे एक अलग आभा दे रखी थी. ये नीतियां हर सरकार को खटकती रही हैं. कांग्रेस इन को सहन करती रही है जबकि भारतीय जनता पार्टी इन्हें ईशनिंदा और देशविरोधी मानती है.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जिसे जेएनयू भी कहा जाता है, में जिस तरह से तरहतरह के विचारों को खुलेआम व्यक्त करने की छूट रही है, वैसी हर विश्वविद्यालय में होनी चाहिए. अफसोस, अधिकांश विश्वविद्यालयों में केंद्र या राज्य सरकार समर्थित पार्टियां छात्रसंघों पर कब्जा कर लेती हैं और फिर विश्वविद्यालय को सत्तारूढ़ दल के लिए भीड़ मुहैया कराने व युवा कार्यकर्ता तैयार करने की फैक्टरी बना डाला जाता है. भाजपा के नेतृत्व में केंद्र पर काबिज राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार इस विश्वविद्यालय को मिलने वाली आर्थिक सहायता, यहां के प्रवेश के नियमों में बदलाव, होस्टलों में दाखिले के नियम बदलने के साथ अनुशासन के नाम पर तरहतरह के नियम बना कर यह कोशिश कर रही है कि यहां नए स्वतंत्र विचारों की जगह न हो.

किसी भी समाज की उन्नति तब होती है जब वहां के ठहरे पानी को खंगाला जाता रहे और वहां नए पानी का स्वागत हो. नए विचार, भिन्न लोग, खुली बहस, दूसरों की राय से अलग होने की आजादी आदि दकियानूसी सोच से बाहर निकालती हैं पर यह आजादी सत्ताधारियों को खतरा लगती है चाहे वह पूरे समाज के लिए उपयोगी हो. हाल ही में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रवेशनीति पर विरोध करने पर वहीं की प्रोफैसर निवेदिता मेनन को अनुशासन भंग करने का नोटिस भेजा गया ताकि उन का मुंह बंद कर दिया जाए. कट्टरपंथी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में ऐसे युवाओं को प्रवेश ही नहीं देना चाहते जो आगे चल कर. मौजूदा सरकार की सोच के लिए खतरा बन सकें. नियमों और सरकारी आदमियों से भरी विश्वविद्यालय की एकेडेमिक काउंसिल अब ऐसे नियम बनाने में जुट गई है जो पीएचडी और एमफिल करने के इच्छुक छात्रों को, उन के इंटरव्यू के आधार पर ही प्रवेश देती है ताकि पहले से ही छंटनी हो सके. इंटरव्यू के बहाने मुखर व दूसरों से असहमत होने वाले छात्रों को छांट दिया जाता है. यह सिर्फ सरकार के लिए तो अच्छा हो सकता है पर लंबे समय बाद यह निर्णय समाज के लिए घातक ही साबित होगा, इस में जरा भी संदेह नहीं है.

कैसे करें एसएससी परीक्षा की तैयारी

स्टाफ सिलैक्शन कमीशन यानी कर्मचारी चयन आयोग ने हाल में लोअर डिवीजन क्लर्क, कोर्ट क्लर्क, डाटा ऐंट्री औपरेटर, पोस्टल असिस्टैंट या सोर्टिंग असिस्टैंट के पदों पर कंबाइंड हायर सैकंडरी लैवल ऐग्जामिनेशन (सीएचएसएल) द्वारा नियुक्ति के लिए वेकैंसी नोटिफाई की है. यह परीक्षा 3 चरणों में आयोजित की जाती है.

वैसे तो गवर्नमैंट सैक्टर में अधिकतर नौकरी के लिए ग्रैजुएशन अनिवार्य होती है, लेकिन स्टाफ सिलैक्शन कमीशन द्वारा अयोजित की जाने वाली त्रिस्तरीय सीएचएसएल (कंबाइंड हायर सैकंडरी लैवल) ऐग्जामिनेशन के लिए 10वीं पास होना अनिवार्य है.

अनिवार्य योग्यता

इस परीक्षा में शामिल होने के लिए उम्मीदवार को किसी भी संकाय तथा बोर्ड से मात्र 12वीं कक्षा पास होना जरूरी होता है. इस के लिए उम्र 18 से 27 वर्ष के बीच होनी चाहिए.

परीक्षा में प्रश्नों का स्तर प्लस 2 लैवल का ही होता है, लेकिन परीक्षार्थियों की बड़ी संख्या और महज 5 हजार के करीब रिक्त पदों के लिए कंपीटिशन को ध्यान में रखते हुए यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इस परीक्षा में सफलता की राहें आसान नहीं होतीं. इस के लिए ठोस रणनीति के साथसाथ टाइम मैंनेजमैंट और कड़ी मेहनत की नितांत आवश्यकता है.

वेतनमान

इन सभी पदों के लिए वेतनमान 5,200 से 20,200 रुपए होता है और ग्रेड पे में थोड़ी सी भिन्नता पाई जाती है. पोस्टल या सोर्टिंग असिस्टैंट और डाटा ऐंट्री औपरेटर के लिए ग्रेड पे रुपए 2,400 है जबकि शेष पदों के लिए यह 1,900 रुपए है.

रोजगार के अवसर

कर्मचारी चयन आयोग के द्वारा आयोजित संयुक्त उच्च माध्यमिक स्तर (10+2) में चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्ति केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और कार्यालयों में की जाती है. परीक्षा में सफल उम्मीदवारों को ग्रुप ‘सी’ के अंतर्गत आने वाले पदों उदाहरण के लिए लोअर डिवीजन क्लर्क, कोर्ट क्लर्क, डाटा ऐंट्री औपरेटर, पोस्टल असिस्टैंट या सोर्टिंग असिस्टैंट आदि पर नियुक्त किया जाता है.

परीक्षा का प्रारूप

भारत सरकार के मंत्रालयों और अन्य विभागों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए एसएससी ने सीएचएसएल की परीक्षाओं के पैटर्न में 2015 से काफी परिवर्तन किए हैं. कुछ महत्त्वपूर्ण परिवर्तन इस प्रकार हैं :

टीयर-1 की परीक्षा कंप्यूटर बेस्ड होगी और यह औनलाइन टैस्ट होगा जोकि कई शिफ्ट्स में आयोजित की जाएंगी.

टीयर-2की परीक्षा में 100 अंकों के डिस्क्रिप्टिव टैस्ट को इंट्रोड्यूस किया गया है, जिस के लिए 60 मिनट का समय तय किया गया है.

टीयर-1 की परीक्षा की समय अवधि 120 मिनट से घटा कर 75 मिनट कर दी गई है.

टीयर-1 की परीक्षा में प्रश्नों की संख्या 200 से कम कर के 100 कर दी गई है. नैगेटिव मार्किंग 0.5 के बराबर होगी अर्थात 3 गलत जवाब के लिए एक अंक काट लिया जाएगा.

टीयर-2और टीयर 3 की परीक्षाओं में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है.

सीएचएसएल की परीक्षाएं निम्नांकित 3 चरणों में आयोजित की जाती है :

1. टीयर-1 : यह कंप्यूटर बेस्ड लिखित परीक्षा होती है जो 200 अंकों की होती है.

2. टीयर-2: इस परीक्षा का नेचर डिस्क्रिप्टिव टैस्ट का होता है. यह टैस्ट 100 अंकों का होता है.

3. टीयर-3 : इस के अंतर्गत टाइपिंग टैस्ट या स्किल टैस्ट का आयोजन किया जाता है.

टीयर-1 की तैयारी

इस परीक्षा को सीएचएसएल में सफलता का ‘आयरन गेट’ माना जाता है, क्योंकि इस में परफौरर्मैंस के आधार पर अगले स्टेज की परीक्षा में ऐंट्री निर्भर करती है. यह परीक्षा 200 मार्क्स की होती है और इस में औब्जैक्टिव टाइप के प्रश्न पूछे जाते हैं. यह औनलाइन आयोजित की जाती है.

इस में परीक्षा जनरल इंटैलिजैंस, अंगरेजी लैंग्वेज, मैथमैटिक्स और जनरल अवेयरनैस के सेग्मैंट्स के 25-25 प्रश्न पूछे जाते हैं और प्रत्येक प्रश्न 2 अंक का होता है. इन प्रश्नों को हल करने के लिए 75 मिनट का समय दिया जाता है. यह परीक्षा कंप्यूटर बेस्ड है.

जनरल इंटैलिजैंस

इस के अंतर्गत वर्बल और नौनवर्बल दोनों प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं. यही कारण है कि इस सेगमैंट में अभ्यर्थी को सेमेंटिक एनालौजी, फिगरल एनालौजी, वेन डायग्राम, वर्ड बिल्डिंग, नंबर क्लासिफिकेशन, नंबर सीरीज, कोडिंग और डिकोडिंग पर आधारित प्रश्नों का नियमित रूप से अभ्यास करने की आवश्यकता है.

इंगलिश लैंग्वेज

इस सेगमैंट में मुख्य रूप से एरर फाइंडिंग, सिनौनिम्स, अंटोनिम्स, मिस्सपेल्ड वर्ड्स की पहचान, इडियम्स ऐंड फ्रजेज, डायरैक्ट और इनडायरैक्ट नरेशन, कौंप्रिहैंशन पैसेज, ऐक्टिव ऐंड पैसिव वौइस से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं.

क्वांटिटेटिव ऐप्टिट्यूड

गणित पर आधारित क्वांटिटेटिव ऐप्टिट्यूड के प्रश्नों को हल करने के लिए कठिन परिश्रम और नियमित अभ्यास की जरूरत होती है. इस के अंतर्गत नंबर सिस्टम, ट्रिग्नोमैट्री, अरिथ्मैटिकल औपरेशन, मैंसुरेशन, अलजेब्रा, ज्योमैट्री, स्टैटिस्टिकल चार्ट्स से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं.

जनरल अवेयरनैस

जनरल अवेयरनैस का क्षेत्र काफी विस्तृत है और यही कारण है कि इसे किसी सीमा में आसानी से नहीं बांधा जा सकता. फिर भी इस खंड के अंतर्गत इतिहास, जियोग्राफी, साइंस, इकौनौमी, गेम्स ऐंड स्पोर्ट्स, बुक्स और राइटर्स, करंट अफेयर्स और विज्ञान की अन्य विधाओं से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं.

टीयर-2की तैयारी

टीयर-2की लिखित परीक्षा उन अभ्यर्थियों के लिए होती है जो टीयर फर्स्ट की परीक्षा में सफल हो जाते हैं. यह पेपर निबंधात्मक प्रश्नों का होता है जो कैंडिडेट्स की राइटिंग कैपेसिटी को टैस्ट करता है.

पैन और पेपर वाला यह टैस्ट 100 मार्क्स का होता है, जिस में सफलता परीक्षार्थियों के निबंध और पत्र लेखन स्किल पर निर्भर करती है. निबंध और पत्र 200 से 250 शब्दों में लिखना होता है.

इस स्टेज की परीक्षा में क्वालिफाई करने के लिए कम से कम 33 प्रतिशत अंक प्राप्त करना अनिवार्य होता है. इस टीयर में प्राप्त अंकों को मैरिट लिस्ट में शामिल किया जाता है इसलिए इस चरण की परीक्षा की तैयारी बड़ी संजीदिगी से करने की जरूरत होती है.

टीयर-3 की तैयारी

यह टैस्ट क्वालिफाइंग नेचर का होता है और इस के अंक फाइनल मैरिट लिस्ट बनाने में काउंट नहीं किए जाते. इस टैस्ट के अंतर्गत टीयर- ढ्ढढ्ढ में सफल उम्मीदवारों का स्किल टैस्ट या टाइपिंग टैस्ट लिया जाता है.

डाटा ऐंट्री औपरेटर के लिए डाटा ऐंट्री स्पीड और पोस्टल असिस्टैंट या सोर्टिंग असिस्टैंट, लोअर डिवीजन क्लर्क और कोर्ट क्लर्क के लिए टाइपिंग टैस्ट्स आयोजित किए जाते हैं. 

वर्चुअल क्रश की ऐक्चुएलिटी

फेसबुक पर फोटो देखा और देखते ही विपरीत लिंग के प्रति आकर्षित हो गए, टीनऐज में ही नहीं बल्कि हर उम्र में ऐसा होना आम बात है. दीपा राहुल की फेसबुक पर प्रोफाइल पिक देख कर अट्रैक्ट हुई और बिना सोचेसमझे उसे फ्रैंड रिक्वैस्ट भेज दी. राहुल बहुत ही शातिर लड़का था इसलिए 1-2 दिन तो उस ने दीपा की फै्रंड रिक्वैस्ट ऐक्सैप्ट नहीं की फिर तीसरे दिन यह सोच कर ऐक्सैप्ट की कि अब तो दीपा के मन में विश्वास पैदा हो गया होगा कि मैं ऐसावैसा लड़का नहीं हूं. अगर ऐसावैसा होता तो झट से लड़की की रिक्वैस्ट देखते ही ऐक्सैप्ट कर लेता.

फ्रैंड रिक्वैस्ट ऐक्सैप्ट करने के बाद दोनों के बीच खूब चैट होने लगी. यहां तक कि राहुल दीपा से अश्लील बातें करने से भी बाज न आता, लेकिन दीपा इस बात को इग्नोर कर बस उस की स्मार्टनैस की ही दीवानी थी.

फिर एक दिन राहुल ने दीपा को किसी होटल में मिलने को कहा. दीपा भी उस से मिलने को बहुत उत्सुक थी इसलिए तुरंत हामी भर दी. जैसे ही उस ने रूम में ऐंटर किया वैसे ही उस के होश उड़ गए, क्योंकि फेसबुक पर वह जिस युवक से चैट कर रही थी वह तो यह युवक था ही नहीं बल्कि उस की उम्र तो 45-50 के आसपास थी. दीपा की आंखों के सामने जैसे ही पूरी पिक्चर क्लीयर हुई वैसे ही उस व्यक्ति ने उसे अपने आगोश में ले कर उस के साथ शारीरिक संबंध बना लिए और उसे ब्लैकमैल करने के लिए उस का वीडियो भी बना लिया.

जब दीपा को होश आया तब उसे वर्चुअल क्रश की ऐक्चुएलिटी का पता चला, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. ऐसा सिर्फ दीपा के साथ ही नहीं बल्कि अधिकांश लड़केलड़कियों के साथ होता है. इसलिए सावधान हो जाएं वर्चुअल क्रश की दुनिया से.

जानिए क्या है वर्चुअल क्रश की ऐक्चुएलिटी

पहले से कमिटिड या मैरिड हो

जिस अकाउंट से आप को रिक्वैस्ट भेजी गई है वह काफी हैंडसम है और आप यह सोच कर कि यार, मुझ में कोई तो बात होगी जो इतने हैंडसम युवक ने मुझे फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजी है, आप ने बिना एक पल गंवाए रिक्वैस्ट ऐक्सैप्ट कर ली. हो सकता है वह पहले से ही कमिटिड हो या मैरिड और आप से सिर्फ टाइमपास के लिए दोस्ती कर रहा हो. इस से उस का मकसद तो पूरा हो जाएगा, लेकिन जब सचाईर् सामने आएगी तो आप का दिल टूट जाएगा. इसलिए सोचसमझ कर ही इस दिशा में आगे बढ़ें.

औनलाइन पैसा ऐंठना भी मकसद

आजकल अधिकांश लड़कियां दोस्ती सिर्फ पैसा ऐंठने के लिए करती हैं. ऐसे में अगर आप उन के जाल में फंस गए तो वे आप की जेब ढीली किए बिना नहीं रहेंगी. अकसर जब आप उन से चैट कर रहे होते हैं तो वे यह कह कर चैट बंद करने की बात कहती हैं कि डियर, बाद में बात करूंगी, नैट पैक खत्म हो गया है. ऐसे में बेचारा लड़का बात करने के चक्कर में तुरंत उस का नैट रिचार्ज करवा देता है या फिर आएदिन आप से किसी न किसी चीज की डिमांड करे. इस से नुकसान हर हाल में आप का ही होगा. इसलिए औनलाइन दोस्ती खुद पर भारी न पड़े सोचसमझ कर कदम बढ़ाएं.

फंसाने या धोखा देने वाला गैंग

जिस वर्चुअल क्रश के चक्कर में आप पड़े हो, हो सकता है उस के पीछे किसी बड़े गैंग का हाथ हो और वह आप को अपनी मीठीमीठी बातों में फंसा कर अपने ठिकाने पर बुला कर आप का किडनैप कर ले और फिर गलत हाथों में बेच दे या आप की पूरी जिंदगी तबाह कर दे.

काम निकालने के लिए बनाए फूल

आप के सभी सब्जैक्ट्स के नोट्स बहुत अच्छे हैं लेकिन आप किसी को नहीं दिखातीं, जबकि आप की वीकनैस फेसबुक पर किसी से भी दोस्ती करना है और इस बात से क्लास के सभी छात्र वाकिफ हैं. ऐसे में क्लास का कोई भी लड़का आप की इस कमजोरी से आप को बेवकूफ बना सकता है.

पहले तो वह फेसबुक पर अपनी अच्छी सी डीपी लगा कर आप को अपना फ्रैंड बनाएगा, फिर जब आप को उस पर विश्वास हो जाएगा तो आप को यह कह कर कि डियर, मेरी मम्मी की तबीयत खराब होने के कारण मैं पढ़ाई पर फोकस नहीं कर पा रहा हूं. अगर तुम अपने नोट्स मुझे दिखा दो तो मेरी काफी हैल्प हो जाएगी, आप से नोट्स मांग लेगा.

आप भी दोस्ती की खातिर अपने नोट्स उस से शेयर कर देंगी और जैसे ही उस का मतलब निकल जाएगा वह आप को ब्लौक कर देगा. ऐसे में आप के लिए यह पता लगाना भी मुश्किल हो जाएगा कि किस ने आप को चीट किया है.

बदला लेने के लिए भी दोस्ती

हो सकता है कि आप के किसी फै्ड ने आप को औफर दिया हो या फिर वह बारबार आप से दोस्ती करने की जिद कर रहा हो, जिस से परेशान हो कर आप ने उसे गुस्से में थप्पड़ मार दिया हो, जिस का बदला लेने के लिए अब वह अपना नाम व फोटो बदल कर आप से फ्रैंडशिप कर के आप का दिल तोड़़े. हो सकता है कि वह आप की प्रोफाइल पिक में एडिटिंग कर के आप को कहीं मुंह दिखाने लायक न छोड़े.

आप का कोई कजिन हो

घर में सभी आप की शराफत की तारीफ करते न थकते हों ऐसे में आप का कोईर् कजिन ईर्ष्या के मारे आप को चैक करने के लिए भी वर्चुअल माध्यम से आप के सामने फ्रैंडशिप का प्रस्ताव रख सकता है. ऐसे में अगर आप फंस गए तो फिर तो वह आप को सब के सामने नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ेगा और आप अपनों की नजरों में गिर जाएंगे.

फेक आईडी से लोएल्टी टैस्ट

जिस के साथ आप की फ्रैंडशिप है, हो सकता है वह ही आप का लोएल्टी टैस्ट करने के लिए अपनी किसी फेक आईडी से आप को रिक्वैस्ट भेज कर फंसाए. ऐसे में अगर आप ने यह सोच कर कि कौन सा मेरे पार्टनर को पता चलेगा उस से दोस्ती कर ली. फिर तो आप उस की नजरों में गिर जाएंगी.

खुद को गम से उभारने के लिए

कई लड़केलड़कियां ऐसी सोच के होते हैं कि उन्हें हमेशा कोई न कोई साथी चाहिए होता है. ऐसे में अगर उन का ब्रेकअप हो जाता है तो वे अकेले नहीं रह पाते और खुद को उस गम से उभारने के लिए, खुद की आत्मसंतुष्टि के लिए भी औनलाइन दोस्ती का रास्ता चुनते हैं. ऐसी दोस्ती में उन की दिल की भावनाएं नहीं जुड़ी होतीं.

इसलिए आप वर्चुअल क्रश के चक्कर में न पड़ें और अगर आप ने किसी अनजान की रिक्वैस्ट ऐक्सैप्ट कर ली है तो यहां बताई बातों पर अमल करें.

डिटेल्स चैक करें

सोशल साइट पर किसी की भी फैं्रड रिक्वैस्ट ऐक्सैप्ट करने से पहले उस का पूरा प्रोफाइल चैक कर लें कि कहीं हाल ही में तो उस ने अकाउंट नहीं बनाया है और साथ ही उस के प्रोफाइल में फैमिली व फ्रैंड्स के फोटो तो हैं न. किस तरह के मैसेज हैं, इस से भी आप को अंदाजा लग जाएगा कि रिक्वैस्ट भेजने वाला किस तरह की सोच रखने वाला है.

चैट की लैंग्वेज से लगाएं अंदाजा

जब भी आप से बात करे, हमेशा गंदे शब्दों का ही प्रयोग करे. यहां तक कि हर मैसेज में किसिंग, लविंग वाले इमोटीकौंस बना कर भेजे. अगर ऐसा है तो समझ जाएं कि वह सही नहीं है.

हर समय औनलाइन तो नहीं

हर समय अगर आप को मैसेज ही भेजता रहे या फिर आप से हमेशा औनलाइन रहने की जिद करे तो ऐसे व्यक्ति को ब्लौक करने में ही समझदारी है वरना उस से दोस्ती के कारण आप का कैरियर व पर्सनैलिटी दोनों ही इफैक्टिड होंगी.

हौट डीपी लगाने की करे डिमांड

आप से हौट डीपी लगाने की डिमांड करे तो समझ जाएं कि उसे आप से ज्यादा दिलचस्पी आप की बौडी में है.

अपनी पर्सनल चीजें रखे हाइड

अगर आप को लगता है कि वह आप से तो हर बात पूछ लेता है लेकिन जब आप उस से कुछ पूछती हैं तो वह टाल जाता है. ऐसे में आप उस से अपनी कोई भी पर्सनल बातें शेयर न करें वरना वह पर्सनल इंफौर्मेशन से आप का फायदा उठा सकता है.                                         

 

किशोरी जब अच्छी लगने लगे

किशोरावस्था में स्कूल व ट्यूशन में कब कोईर् किशोरी अच्छी लगने लगती है, इस का पता ही नहीं चलता लेकिन उसे देख कर हमें कुछकुछ होने लगता है. हम उस से बात करने का बहाना ढूंढ़ते हैं, फ्रैंडशिप की कोशिश करते हैं. यहां तक कि फेसबुक पर सर्च कर उसे फैंरड रिक्वैस्ट तक भेज देते हैं.

कभीकभी हम जल्दबाजी में कई ऐसी गलतियां कर देते हैं जिन से सब के बीच हम मजाक के पात्र बन जाते हैं. कई बार तो किशोरी हमें ठीक से जानती भी नहीं है, लेकिन हम अपने दिल की बात उसे बता देते हैं और वह इसे डिफ्यूज कर देती है, इस से सबकुछ गड़बड़ हो जाता है.

अगर आप को कोई किशोरी अच्छी लगने लगी है तो उसे तुरंत प्रपोज करने के बजाय पहले उस से दोस्ती करें. यदि दोस्ती के बाद भी आप को समझ नहीं आ रहा कि कैसे शुरुआत करें तो कुछ बातों का ध्यान रखें:

अच्छा व्यवहार करें

आप अपने क्रश से अच्छा व्यवहार करें. ऐसा न हो कि उस के आते ही आप की बौडी लैंग्वेज और आवाज बदल जाए. आप के लहजे से ऐसा लगे कि आप किसी राजकुमारी से बात कर रहे हैं. आप उस के साथ भी वैसे ही बरताव करें जैसा आप अपने बाकी दोस्तों के साथ करते हैं.

साफसुथरे नजर आएं

यदि आप किसी लड़की को पसंद कर रहे हैं तो आप का साफ और अच्छा दिखना बहुत जरूरी है, क्योंकि हमारा ध्यान किसी भी आकर्षक पर्सनैलिटी पर जाने से पहले कई चीजों पर जाता है जैसे मुंह की बदबू, पसीने की बदबू, इसलिए अच्छी हाइजिन हैबिट बनाएं ताकि किशोरी आप से बात करने में हिचकिचाए नहीं बल्कि खुद भी दोस्ती की पहल करे.

पौजिटिव नजरिया रखें

हमेशा लोग उन के साथ रहना पसंद करते हैं जो खुश रहते हैं और पौजिटिव नजरिया रखते हैं, इसलिए आप भी अच्छा बनने की कोशिश करें. दूसरों की बुराई करने के बजाय उन की अच्छाइयों को देखें.

नर्वस न हों

अकसर हम जब किसी को पसंद करते हैं तो उस के सामने आते ही हमारी धड़कन तेज हो जाती है और हम नर्वस हो जाते हैं. समझ नहीं पाते कि क्या करें. इसी वजह से छोटीछोटी गलतियां कर बैठते हैं, इसलिए यदि आप चाहते हैं कि कोई गलती न हो तो बजाय नर्वस होने के कौन्फिडैंट हो कर दिल जीतने की कोशिश करें.

प्रपोज करने के बजाय दोस्ती करें

जब आप को कोई किशोरी अच्छी लगने लगे तो उसे एकदो मुलाकातों के बाद ही प्रपोज न करें बल्कि दोस्ती करें. उसे जानने की कोशिश करें तथा उस की पसंदनापसंद को जानें. एकदम से प्रपोजल मिलने से लड़कियां थोड़ी घबरा जाती हैं और दोस्ती करने से मना कर देती हैं.

दिल की बात जानने की कोशिश करें

आप के लिए यह बहुत जरूरी है कि आप सामने वाले के दिल की बात जानें. ऐसा भी हो सकता है कि आप जिसे लाइक कर रहे हैं वह किसी और को लाइक करती हो और आगे जा कर आप को तकलीफ हो इसलिए बातोंबातों में पहले ही दिल की बात जानने की कोशिश करें.

सरप्राइज दें

आप अपनी बौंडिग बढ़ाने के लिए सरप्राइज प्लान करें. उस के पसंदीदा काम करें जिसे देख वह खुश हो जाए, पर ध्यान रहे ऐसा सरप्राइज न प्लान करें कि वह सरप्राइज के बजाय शौक्ड हो जाए.

प्रोत्साहित करें

हर किसी को प्रोत्साहन अच्छा लगता है. ऐसा लगता है कि कोई है जिसे हमारा काम पसंद आता है. अगर वह किसी काम को नहीं कर पा रही है तो उस में विश्वास पैदा करें कि वह कर सकती है. यदि उसे किसी चीज से फोबिया है तो उस का फोबिया दूर करने की कोशिश करें. यकीन मानिए आप का केयरिंग नेचर देख कर किशोरी जरूर इंप्रैस होगी.

हौबी में दिखाएं रुचि

हर किसी की हौबी अलग होती है, लेकिन फिर भी आप किशोरी की हौबी में रुचि दिखाएं, इस से आप दोनों को बातचीत करने और एकदूसरे को जाननेसमझने का मौका तो मिलेगा ही, साथ ही आप कुछ नया भी सीख पाएंगे. लेकिन ऐसी बातें न करें जिन में आप को मजा न आता हो.

पढ़ाई को बनाएं प्यार का टूल

जब आप को क्लास की कोई लड़की अच्छी लगने लगती है तो आप अपने प्यार का एहसास कराने के लिए पढ़ाई को टूल बनाएं. पढ़ाई के बहाने उस के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं. एकदूसरे से नोट्स शेयर करें. इस से आप की पढ़ाई भी हो जाएगी और आप एकदूसरे के करीब भी आ जाएंगे.

तारीफ से मिटाएं दूरियां

अपनी तारीफ सुनना भला किसे अच्छा नहीं लगता. आप भी तारीफ से दिल में जगह बना सकते हैं, लेकिन ध्यान रहे जब तारीफ करें तो ऐसा नहीं लगना चाहिए कि आप चापलूसी कर रहे हैं.

खास अवसरों को रखें याद

किशोरियों को बहुत अच्छा लगता है जब कोई उन्हें उन के स्पैशल डे पर सरप्राइज देता है, इसलिए अपने क्रश के खास दिन को याद रखें. आप चाहें तो फोन में रिमाइंडर लगा सकते हैं या डायरी में नोट कर के रख सकते हैं ताकि आप भूलें नहीं.

क्या न करें

चिपकू बनने की गलती न करें

जब कोई लड़की हमें अच्छी लगने लगती है तो हम उस के आसपास मंडराने का बहाना ढूंढ़ते हैं. वह जहां जाती है उस के पीछेपीछे चले जाते हैं. उस का बात करने का मन हो चाहे न हो, लेकिन फिर भी किसी न किसी बहाने उस से बात करते हैं. अगर आप ऐसा करते हैं तो अब मत करिए, क्योंकि ऐसा कर के आप खुद को चिपकू साबित करते हैं. अत: ऐसा माहौल बनाएं कि वह खुद आप के पास आने की कोशिश करे.

क्लास में न पीटें ढिंढोरा

अगर आप को क्लास की कोई लड़की अच्छी लगती है तो सब को इस बारे में न बताएं, क्योंकि जब किशोरी को क्लास के किसी स्टूडैंट से पता चलेगा तो वह सब के सामने आप को भलाबुरा कह देगी, इसलिए अपने दिल की बात अपने तक ही सीमित रखें. यदि आप किसी को बताना भी चाहते हैं तो अपने किसी ऐसे दोस्त को बताएं जिस पर आप को भरोसा हो कि वह यह बात किसी से नहीं कहेगा.

पढ़ाई के समय न करें चैटिंग से डिस्टर्ब

आप को कोई लड़की अच्छी लगती है तो इस का यह मतलब नहीं कि आप हर समय मैसेज करते रहें, खासकर पढ़ाई के समय. ऐसा कर के आप न केवल सामने वाले को डिस्टर्ब करते हैं बल्कि इस से आप की पढ़ाई पर भी असर पड़ता है इसलिए हर वक्त मैसेज करने के बजाय एक समय तय करें.

महंगे गिफ्ट्स में न करें पैसे बरबाद

किशोर सोचते हैं कि गिफ्ट दे कर ही दिल जीता जा सकता है और इस के लिए वे अपने दोस्तों से पैसे उधार लेते हैं. आप ऐसा कुछ न करें, अगर गिफ्ट देना ही चाहते हैं तो हैंडमेड चीजें दें, ताकि सामने वाले को आप की मेहनत व प्यार दिखे.

रिजैक्शन खुद पर हावी न करें

अगर किसी लड़की ने आप के प्रपोजल को ठुकरा दिया है तो इस रिजैक्शन को खुद पर हावी न होने दें, न ही उलटीसीधी हरकतें करें. कईर् बार ऐसा होता है कि किशोर रिजैक्शन से डिप्रैशन में चले जाते हैं, दोस्तों से मिलना छोड़ देते हैं, ऐसा न करें बल्कि अपने दिल का दरवाजा खोल कर रखें, क्या पता कब कौन दस्तक दे दे.   

कुछ जरूरी बातें

– करीब आने के लिए कभी भी बौडी टचिंग का सहारा न लें.

– ईमानदार बनें. इंप्रैस करने के लिए झूठ का सहारा न लें.

– अपने बारे में वास्तविक बातें बताएं. ऐसा न सोचें कि आप अगर अपनी या पेरैंट्स की सचाई बता देंगे तो वह आप से दोस्ती नहीं करेगी.

‘विलुप्त कला को साड़ियों में लाना चाहती हूं’

काम करने की कोई उम्र नहीं होती. जब मन बना लो, काम शुरू कर दो. कुछ ऐसा ही कर दिखाया है मुंबई की 60 वर्षीय डिजाइनर और उ-मी चित्रलेखा दास ने. उन के ब्रैंड का नाम ‘सुजात्रा’ है. 8 सालों से उन्होंने भारत में ही नहीं, बल्कि विश्व के तमाम देशों में अपने द्वारा डिजाइन की अलगअलग तरह की डिजाइनर साडि़यां, कुरते, दुपट्टे, शालें आदि तैयार कर अपनी एक अलग पहचान बनाई है. वे पुरानी और न पहनी जाने वाली साडि़यों को भी नया लुक देती हैं. इतना ही नहीं, इस काम के लिए उन्होंने काम करने वाली महिलाओं को ट्रैनिंग भी दी है ताकि उन की रोजी बढ़े. 2 बच्चों की मां होने के बावजूद चित्रलेखा ने अपनी यह सृजनात्मक रुचि नहीं छोड़ी. उन के पति आर्मी में थे. उन का तबादला होता रहता था, इसलिए उन्हें विभिन्न जगहों की संस्कृति और कला से रूबरू होने का मौका मिलता रहा. इसी कला और अलगअलग संस्कृति को उन्होंने अपनी साडि़यों की डिजाइनों में उतारा. पेश हैं विनम्र स्वभाव की चित्रलेखा से बातचीत के अंश:

इस क्षेत्र में कैसे आना हुआ?

बचपन से ही मुझे क्रिएटिव काम करने में मजा आता था. उस समय मैं त्रिपुरा के अगरतला में रहती थी. शादीविवाह में मुझे हर कोई दुलहन को सजाने या फिर रंगोली बनाने के लिए बुला लेता था. उस समय ब्यूटीपार्लर नहीं थे. इसलिए मेरे द्वारा सजाई गई दुलहन काफी सराही जाती थी. वहां की कला मुझे बहुत आकर्षित करती थी. वहां की सुंदरता से मैं बहुत प्रभावित थी. वहीं से मेरी एस्थैटिक सैंस का विकास हुआ. मैं ने रविंद्र भारती से स्नातकोत्तर की है. मुझे संगीत का भी शौक है. पति के डिफैंस सर्विस में होने की वजह से शादी के बाद मैं उन के साथ पूरा देश घूमी. हर जगह की कला को मैं खुद में आत्मसात करती थी. इस के अलावा मैं हर जगह की प्रदर्शनी को बारीकी से देखती थी. 5-6 घंटे वहां बिताती थी. वहां देश भर की कला को देख कर मैं मुग्ध हो जाती थी. चेन्नई रहने के दौरान मैं ने एक छोटा सा बुटीक घर में खोला, जहां मैं खुद डिजाइन कर खुद सिलती थी, क्योंकि तब दर्जी मेरे हिसाब से काम करने के लिए राजी नहीं होते थे. मुझे यह काम पसंद था, इसलिए रात भर डिजाइन बना कर कपड़े काट कर सिलती थी. इस में पति का पूरा सहयोग था. अगर कपड़ा खराब हो जाता था, तो वे कभी कुछ नहीं कहते थे. इस तरह काम की शुरुआत हुई.

कब लगा कि आप एक अच्छी डिजाइनर बन सकती हैं?

मेरे घर के पास एक व्यक्ति ऐक्सपोर्ट किए जाने वाले कपड़े बेचता था. मैं उस से अलगअलग रंगों के कपड़े खरीद कर लाती थी. धीरेधीरे उन कपड़ों को जोड़ कर मैं ने एक बैड कवर बनाया, जिसे अपनी पड़ोसिन को दिखाया. उस ने बड़ी तारीफ की. अगले दिन सुबह वे मेरे पास आईं और बोलीं कि वह बैड कवर उन्हें बेटी को गिफ्ट में देने के लिए चाहिए. मैं ने उन्हें दे दिया. उस से मुझे

150 रुपए मिले, जिस में मेरा लाभ भी शामिल था. मुझे बहुत खुशी हुई कि मेरी कलाकारी सब को पसंद आ रही है. मैं ने 700 रुपए की सिलाई मशीन खरीदी और काम शुरू कर दिया. यह मुश्किल नहीं था. मैं ने केवल सही रंगों का प्रयोग कर पैच वर्क के द्वारा बैड कवर बनाए. इस तरह मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और मैं तरहतरह के मैटीरियल बना कर अपने दोस्तों और जानपहचान वालों को देने लगी.

क्या आप ने डिजाइनिंग का कोई कोर्स किया है?

शुरूशुरू में मैं पुणे आ कर घर पर संगीत की क्लास लिया करती थी. एक दिन मैं अपनी दोस्त के साथ एक शौप में गई. वहां मैं ने एक दुपट्टा देखा, जिस में काफी अच्छी पेंटिंग बनी थी. वहां से पेंटर सिद्धार्थ का नंबर ले कर मैं उन से मिली. वे जेजे स्कूल औफ आर्ट्स के पढ़े हुए थे. उन्होंने हमारे पुणे के लेडीज क्लब में आ कर 10 दिन का कोर्स करवाया. उन्होंने सहज तरीके से डिजाइन बनाने की तकनीक और कला बताई, यहीं से मेरी जिंदगी बदल गई. यही मेरी ट्रैनिंग थी, मुझे कलर कौंबिनेशन समझ में आ गया. दिनरात काम कर मैं ने इसे सीख लिया.

अधिकतर आप किस तरह की पोशाकें तैयार करती हैं?

मैं साड़ी अधिक बनाती हूं. मैं सब से पहले अलगअलग वैराइटी के प्लेन कपड़े मुंबई, कोलकाता और प्रदर्शनी आदि स्थानों से खरीदती हूं. इस के बाद उन में तरहतरह की पेंटिंग्स और अलगअलग रंग के कपड़े जोड़ कर एक नया लुक देती हूं. मैं हर राज्य की खास शैली को मिक्स कर बनाती हूं.

व्यवसाय में सब से अधिक समस्या कहां आती है?

किसी भी व्यवसाय में मार्केटिंग और मांग के अनुसार सामान की आपूर्ति आवश्यक है. मेरे पास लोगों की मांग तो है पर टेलरों की समस्या अधिक है. कोई भी टेलर अधिक दिनों तक नहीं टिकता. उन्हें काम सिखाने के बाद वे काम छोड़ कर दूसरी जगह चले जाते हैं. ऐसे में मैं ने अपने घर में काम करने वाली महिलाएं रखीं, उन्हें ट्रैंड किया. तब पाया कि उन्हें पुरुष टेलरों से कहीं अधिक समझ है. वे सिलती भी अच्छी हैं और उन की सोच भी अच्छी है. मैं ने उन्हें मशीनें भी खरीद कर दी हैं. उन में से कईर् तो अब डिजाइन, सिलाई, कटाई सब करती हैं. मैं बाद में देख लेती हूं. अपने घर काम करने वाली ये महिलाएं महीने में 10-12 हजार कमाती हैं.

आप के पहनावे की खासीयत क्या है?

मैं कलर कौंबिनेशन पर काम करती हूं. इस में मैं हर राज्य की कला और हैंडलूम, जो कपड़े पर बनाई जाती है, उसे मिला कर साड़ी में जोड़ती हूं, जिस में कलमकारी, इकत, तांत, चंदेरी, काथा, स्टिच आदि सभी मिलाती हूं. मसलन, कोलकाता के बौर्डर को इकत के साथ मिला कर नया रूप देती हूं. इस प्रकार हर साड़ी में अलगअलग राज्य की कला और टैक्स्चर देखने को मिलता है. आजकल हैंडलूम का प्रचलन बहुत है. उस पर मैं कारीगरी अधिक करती हूं. अब मेरे काम में मेरा छोटा बेटा वेद प्रकाश दास भी जुड़ चुका है. इस काम में मेरी बहुओं की भी काफी प्रेरणा है. इसीलिए उन के नाम सुष्मिता, सुजाता और मेरा नाम चित्रलेखा सब को जोड़ कर मैं ने अपना बैं्रड ‘सुजात्रा’ बनाया है. इस काम में क्लौथ मर्चेंट मंगेश का भी काफी सहयोग रहा.

खुद को कैसे अपडेट करती हैं और आगे क्या प्लानिंग है?

अभी मैं राज्यों की विलुप्त होती जा रही कला को साडि़यों में लाने की कोशिश कर रही हूं. आजकल मैं मध्य प्रदेश की ‘गोंड’ आदिवासी कला पर काम कर रही हूं. वहां के कारीगरों को बुला कर उन्हें काम समझा कर वापस भेजती हूं. हर बार वे 20-25 हजार कमा कर जाते हैं. इस से पहले मैं ने गुजरात की अजरक, चंदेरी और कोलकाता की बाटिक प्रिंट पर काम किया था. आगे भी सभी राज्यों की कला पर काम करूंगी.

कभी लगा कि यह व्यवसाय आप को और पहले शुरू कर देना चाहिए था? कभीकभी लगता है कि उम्र अधिक हो चुकी हैं पर मैं उस पर ध्यान नहीं देती, क्योंकि मेरा मन अभी भी यंग है. मैं घर पर रहने वाली महिलाओं से कहना चाहती हूं कि अकेली न बैठें. बाहर निकलें और अपने हिसाब से कुछ करें. 99% महिलाएं मेरी उम्र में अकेली हो जाती हैं. लेकिन मेरे साथ हर दिन कोई नया जुड़ता है, जो मुझे प्रेरित करता है.       

सरकार परिवार का दुखद अंत

सेना के रिटायर्ड कर्नल डा. सुकांतो सरकार के परिवार के 5 लोग 8 अक्तूबर, 2016 की दोपहर को रांची के कोकर मोहल्ले में अपने रिश्तेदार के फ्लैट पर मृत पाए गए थे. परिवार के मुखिया डा. सुकांतो ने भी खुद को चाकू मारमार कर बुरी तरह घायल कर लिया था. गंभीर हालत में उन्हें रांची के राजेंद्र इंस्टीट्यूट औफ मैडिकल साइंस अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उन की जान तो बच गई है, पर अब वह तरहतरह के आरोपों और मुकदमों में उलझ कर रह गए हैं. उन का परिवार कुछ दिनों पहले ही उत्तर प्रदेश के नोएडा से रांची आ कर अपने रिश्तेदार डा. एस. चौधरी के फ्लैट में ठहरा था. 8 अक्तूबर को डा. चौधरी किसी काम से बाहर गए थे. काम निपटा कर वह दोपहर को फ्री हुए तो उन्होंने अपने घर फोन किया. जब किसी ने फोन नहीं उठाया तो उन्हें चिंता हुई. घर पहुंचे तो दरवाजा अंदर से बंद था. डुप्लीकेट चाबी से लौक खोल कर वह अंदर पहुंचे तो कमरे का दृश्य देख कर उन के होश उड़ गए.

कमरे में 5 लाशें पड़ी थीं और उन्हीं के बीच डा. सुकांतो लहुलूहान हालत में पड़े थे. उन की सांसें चल रही थीं, इसलिए आननफानन में उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया. कमरे में डा. सुकांतो सरकार की पत्नी अंजना सरकार, बेटे समीर सरकार, पोती समिता सरकार, भतीजे पार्थिव की पत्नी मौमिता सरकार और उन की बेटी सुमिता सरकार की लाशें पड़ी थीं.

कमरे से पुलिस ने एक सुसाइड नोट बरामद किया था, जिसे अंजना, समीर और सुकांतों ने लिखा था.  2-3 लाइनों के उस सुसाइड नोट में सभी ने लिखा था कि प्रताड़ना, मानसिक उत्पीड़न और संदेहों की वजह से त्रस्त हो कर वे अपनी जिंदगी खत्म कर रहे हैं. उन के साथ जो हो रहा था, अब वह उन से सहा नहीं जा रहा था.

सुसाइड नोट के अनुसार, वे मधुमिता से परेशान थे. कई सालों से वह उन्हें परेशान कर रही थी. अब उन में टौर्चर सहन करने की हिम्मत नहीं रह गई, इसलिए अब वे जान दे रहे हैं.

रांची के सिटी एसपी कौशल किशोर के अनुसार, घटनास्थल से एक सीरिंज और कंपोज के इंजेक्शन की शीशी बरामद की गई थी. बाथरूम से खून से सना एक चाकू भी बरामद किया गया था, जिस से सुकांतो ने खुद को मारने की कोशिश की थी. सुकांतो के घर वालों की मौत कंपोज का हैवी डोज इंजेक्शन लेने से हुई थी.

जैसेजैसे कंपोज का असर शरीर के अलगअलग हिस्सों में हुआ होगा, वैसेवैसे वे निढाल हो गए होंगे. कुछ दिनों पहले ही डा. सुकांतो सरकार और उन के घर वालों ने रांची के लोअर बाजार पुलिस थाना में अपनी बहू मधुमिता के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज कराई थी. वह शिकायत नहीं, बल्कि पुलिस को किसी खतरे के बारे में सूचना दी गई थी.

पुलिस जांच से पता चला है कि डा. सुकांतो के बेटे समीर की अपनी पत्नी से काफी समय से अनबन चल रही थी. यह अनबन तालाक तक पहुंच गई थी. दोनों के बीच बेटी को साथ रखने को ले कर भी झगड़ा चल रहा था. समीर और डा. सुकांतो बच्ची को अपने साथ रखना चाहते थे, जबकि मधुमिता बेटी को अपने साथ रखना चाहती थी.

इन बातों को ले कर विवाद इतना बढ़ गया था कि मधुमिता ने पति समेत पूरे परिवार के खिलाफ उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज कर दिया था, जिस से पूरा परिवार परेशान था और पुलिस के डर से भागताछिपता फिर रहा था.

दहेज उत्पीड़न के झूठे मुकदमे और बच्ची को साथ रखने की कोशिश में पूरा परिवार थाने और अदालतों के चक्कर लगातेलगाते परेशान हो चुका था.

पुलिस जांच से पता चला है कि समीर के अवैध संबंध चचेरे भाई पार्थिव की पत्नी मोमिता सरकार से थे. उन के इन संबंधों की जानकारी पूरे परिवार को हो चुकी थी. डा. सुकांतो और परिवार के अन्य लोग इस बात को ले कर काफी तनाव में रहते थे.

समीर की मां और पत्नी ने समीर को समझाने की काफी कोशिश की थी, पर भाभी के प्यार में उलझा समीर किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था. लेकिन डा. सुकांतो ने पुलिस को जो बयान दिया है, उस में इस अवैध संबंध का जिक्र नहीं किया. घटना के बाद रांची पुलिस ने नोएडा पुलिस से संपर्क कर के मधुमिता को हिरासत में लेने का अनुरोध किया है. लेकिन नोएडा पुलिस मधुमिता को हिरासत में लेने उस के घर पहुंची तो वह घर मे नहीं मिली. पड़ोसियों से पता चला कि परिवार के 5 लोगों की मौत की खबर मिलते ही वह कहीं चली गई थी.

गौरतलब है कि मधुमिता मुंहबोली छोटी बहन मौमिता के रवैये से काफी आहत थी. मामले की जांच कर रही पुलिस को मौमिता ने मैसेज के जरिए जानकारी दी थी कि उस ने अपने पति पार्थिव को बताया था कि वह अपनी बड़ी बहन के व्यवहार से काफी दुखी है, जिस की वजह से जीना नहीं चाहती.

मामले की जांच कर रही पुलिस के मुताबिक, मधुमिता ने मौमिता के म्यूजिक टीचर से कहा था कि उस का संबंध उस के पति और ससुर से है. जांच में पुलिस को इस बारे में सुराग भी मिले हैं. नोएडा पुलिस द्वारा रांची पुलिस को दी गई जानकारी के अनुसार, डा. सुकांतो के परिवार में अवैध संबंधों को ले कर काफी तनाव चल रहा था.

डा. सुकांतो के पड़ोस में रहने वालों ने पुलिस को परिवार में चल रहे अवैध संबंधों के बारे में जानकारी दी थी. राजेंद्र इंस्टीट्यूट औफ मैडिकल साइंस में भरती डा. सुकांतो की हालत में कुछ सुधार हुआ तो पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में उन्होंने बताया कि उन के घर वालों ने एकदूसरे को इंजेक्शन लगाया था, जिस से उन सब की मौत हो गई थी.

उन का कहना था कि सभी मधुमिता के इमोशनल अत्याचार से इस तरह तंग आ चुके थे कि उन के पास आत्महत्या के अलावा कोई दूसरा उपाय ही नहीं बचा था. सुकांतो के बयान से ही पुलिस की समझ में आ गया था कि यह खुदकुशी का सीधासादा मामला नहीं है. इस में कई पेंच और परतें हैं. डा. सुकांतो का जिंदा बच जाना और जहरीला इंजेक्शन न लेना भी एक बड़ी पहेली बनी हुई है.

जब घर के अन्य लोगों ने जहरीला इंजेक्शन ले लिया था तो आखिर डा. सुकांतो ने खुद इंजेक्शन क्यों नहीं लिया? उन्होंने खुद को चाकू से मारने की कोशिश क्यों की? खुदकुशी करने के लिए उन्हें नोएडा से रांची आने की जरूरत क्यों पड़ी? जब मधुमिता उन्हें काफी दिनों से परेशान कर रही थी तो इस की शिकायत नोएडा के किसी थाने में करने के बजाए डा. सुकांतो ने रांची आ कर लोअर बाजार थाने में क्यों दर्ज कराई थी?

पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है कि यह पूर्व नियोजित हत्याकांड तो नहीं है? कहीं पुलिस को भटकाने के लिए डा. सुकांतो ने किसी तरह की चाल तो नहीं चली है? डा. सुकांतो ने पुलिस को बताया है कि 8 अक्तूबर की शाम 7 बजे दोनों बच्चे सुमिता और समिता खाना खा कर सो गए तो समीर, मौमिता और अंजना ने कहा कि अब सभी को जान देनी होगी.

उन्होंने सभी को ऐसा करने से मना किया तो उन्होंने कहा कि उन्हें जिंदा रहना है तो रहें, पर अब वे लोग जिंदा नहीं रहना चाहते. मधुमिता अब सभी को जेल भिजवा कर रहेगी. ऐसे में जिंदा रहने से फजीहत ही होगी. उन का दावा है कि उन्होंने तीनों को खुदकुशी करने से रोकने की भरपूर कोशिश की थी.

उन्हें समझाया भी था कि कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा. इस के बाद भी तीनों ने उन की बात नहीं मानी और कंपोज का इंजेक्शन ले लिया. वह निराश और खामोश अपने घर वालों को मरते देखते रहे. अंजना और समीर ने सुसाइड नोट लिख कर डायनिंग टेबल पर रख दिया था.

डा. सुकांतो ने पुलिस को बताया कि सुसाइड नोट लिखने के बाद रात 11-12 बजे के बीच सब से पहले समीर ने अपनी बेटी समिता को कंपोज का इंजेक्शन लगाया, उस के बाद भतीजे की पत्नी मौमिता ने अपनी बेटी सुमिता को. इस के बाद अंजना ने अपने बेटे समीर को इंजेक्शन लगाया. अंत में अंजना और मौमिता ने खुद ही इंजेक्शन लगा लिया था.

इंजेक्शन लगाने से एकएक कर सभी गहरी नींद में सोते चले गए. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला है कि सभी को कंपोज का एकएक इंजेक्शन लगाया गया था, जबकि समीर के हाथ में 9 इंजेक्शन लगाने के निशान थे. मौमिता डा. सुकांतो के परिवार के साथ ही रहती थी. पर्थिव का तबादला नोएडा से भोपाल हो गया था, इसलिए उस ने डा. सुकांतो से आग्रह किया था कि वह मौमिता और उस के बच्चे को कुछ दिनों तक अपने साथ रख लें.

मौमिता ने 7 अक्तूबर को अपने पति और पिता समेत कुछ रिश्तेदारों को भी मैसेज किया था कि दीदी (मधुमिता) ने उस के जीवन को तबाह कर दिया है. उस की प्रताड़ना से पूरा परिवार सदमे में था और खुदकुशी करने की सोच रहा था.

खुदकुशी करने से एक दिन पहले मौमिता के पति पर्थिव भोपाल से गो एयर के विमान से रांची पहुंचे थे. रांची में वह मौमिता के पास जाने के बजाए अपने रिश्तेदार डा. एस. चौधरी के घर पर चले गए थे. वह वहां क्यों गए, पुलिस के लिए यह पहेली बनी हुई है.

मौमिता के डा. सुकांतो के घर आने के कुछ दिनों के बाद ही मधुमिता शक करने लगी थी कि मौमिता का उस के पति समीर से गलत संबंध है. वह मौमिता को मानसिक रूप से परेशान भी करती थी.

नोएडा से रांची आने के सवाल पर डा. सुकांतो ने पुलिस को बताया था कि मधुमिता के गलत आरोपों से नोएडा में उन की काफी बदनामी हो रही थी, इसलिए वह परिवार के साथ रांची चले आए थे. वह अपने परिवार के साथ नोएडा के सेक्टर-61 के चमत्कार होम्स के बी ब्लौक में रहते थे.

डा. सुकांतो के अनुसार, जिस रात उन का परिवार खुदकुशी कर रहा था, उस समय उन्हें लगा था कि यह पारिवारिक विवाद नहीं, बल्कि सामाजिक विसंगतियां हैं. एक शादीशुदा लड़की जो कहती है, उसे कानून और समाज सही मान लेता है. इसी के बाद उन्होंने जान देने का फैसला लिया था और खुद को चाकू से गोदगोद कर जान देने की कोशिश की थी ताकि कानून और समाज उन की स्थिति का भयानक चेहरा देख सके.

उन्होंने 6 इंच के चाकू से खुद के दिल और गले पर प्रहार किए थे. इस के बाद भी वह कैसे बच गए? उन की समझ में नहीं आ रहा था. वह हर साल दिसंबर महीने में परिवार के साथ रांची आते थे और 8-10 दिन अपने भांजे डा. एस. चौधरी यानी डा. सुब्रतो चौधरी के फ्लैट पर ठहरते थे.

अब सच उगलवाने के लिए पुलिस डा. सुकांतो का पौलीग्राफी, नार्को और लाई डिटेक्टर टेस्ट कराने का विचार कर रही है. इस टेस्ट के बाद ही असली गुनहगार का चेहरा सामने आ सकेगा और उसे सजा दिलाई जा सकेगी.

दुर्गा पूजा के समय कानून व्यवस्था में उलझी पुलिस अपार्टमेंट के सीसीटीवी फुटेज को नहीं देख सकी थी और 72 घंटे के बाद फुटेज डिलीट हो थी. पुलिस अब सीसीटीवी का डीवीआर कब्जे में ले कर जांच कर रही है साइबर एक्सपर्ट की मदद से 8 और 9 अक्तूबर का डाटा रीस्टोर कराया जाएगा.

मधुमिता ने पुलिस को बताया है कि उस के पति समीर ने 6 अक्तूबर की रात उसे मैसेज किया था कि वह अपने परिवार के साथ कोलकाता जा रहे हैं. 10 अक्तूबर को वह उस के पिता से मिल कर झगड़े को खत्म करने की कोशिश करेंगे. लेकिन वह कोलकाता जाने के बजाय रांची चले गए. नोएडा की एक कंपनी में वेब डिजाइनर का काम करने वाली मधुमिता ने अपने ससुर पर सभी की हत्या का आरोप लगाया है. उस का कहना है कि अगर डा. सुकांतो को उस से नफरत थी तो वह उसे सजा देते, उस की बच्ची और पूरे परिवार को क्यों खत्म कर दिया. सभी का अंतिम संस्कार कर दिया गया और उसे खबर तक नहीं दी गई. उस का दावा है कि डा. सुकांतो ने ही सब को जहरीला इंजेक्शन लगाया है.

मधुमिता के बताए अनुसार, उस के पति समीर का चरित्र ठीक नहीं था. उस ने मौमिता के साथ गलत संबंध होने की बात से इनकार किया है. वह दिल्ली में अपने ससुर के खिलाफ हत्या का केस दर्ज कराने गई थी, लेकिन पुलिस ने मामला दर्ज करने से मना कर दिया था. दिल्ली पुलिस का कहना था कि खुदकुशी की घटना रांची में घटी थी, इसलिए यह मुकदमा वहीं दर्ज होगा. मधुमिता के बयान के बाद मामले की जांच की सुई डा. सुकांतो की ओर घूम गई है. रांची के एसएसपी कुलदीप द्विवेदी का कहना है कि डा. सुकांतो और मधुमिता के बयानों के बाद मामले की नए सिरे से जांच की जा रही है. 23 नवंबर, 2006 को समीर का विवाह मधुमिता से हुआ था. सन 2010 में मौमिता का विवाह सुकांतो के भतीजे पार्थिव सरकार से हुआ. पार्थिव बैंक औफ बड़ौदा में एचआर मैनेजर है. मधुमिता और मौमिता दोनों ही दक्षिणेश्वर के आश्रम में पलीबढ़ी है.

दरअसल, डा. सुकांतो किसी जरूरतमंद लड़की से ही बेटे की शादी करना चाहते थे, ताकि उस की जिंदगी संवर सके. लेकिन कोई जरूरी नहीं कि सोची हुई बात पूरी हो ही जाए.     

खिलाड़ी, जिनके नाम पर मनाया जाता है खेल दिवस

भारत में क्रिकेट इतना लोकप्रिय है कि लोगों का ध्यान किसी दूसरे खेल की तरफ जाता ही नहीं. फिर चाहे वह देश का राष्ट्रीय खेल ही क्यों न हो. तो आइए जानते हैं भारत के राष्ट्रीय खेल हॉकी के जादूगर, मेजर ध्यानचंद के बारे में.

ध्यानचंद तीन बार ओलंपिक के स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के सदस्य रहे हैं. इनमें से 1928 का एम्सटर्डम ओलंपिक, 1932 का लॉस एंजेल्स ओलंपिक और 1936 का बर्लिन ओलंपिक शामिल है.

ध्यानचंद ऐसे खिलाड़ी थे जिनके नाम पर 29 अगस्त को खेल दिवस मनाया जाता है.

ध्यानचंद की जिंदगी के कुछ रोचक किस्से

16 साल की उम्र में सेना में भर्ती

ध्यानचंद के पिता सेना में थे, जिस वजह से बार-बार ट्रांसफर के कारण वह छठी क्लास तक ही पढ़ पाए. वर्ष 1922 में वह 16 की उम्र में ही सेना में भर्ती हो गए. सेना में लोगों को खेलते देख उनके मन में भी खेलने की ख्वाहिश जागी. सुबेदार बाले तिवारी ने उन्हें खेल की बारीकियां सिखाईं और फिर एक दिन वह देश के बेस्ट हॉकी खिलाड़ी बन गए.

पहला विदेशी दौरा

वर्ष 1926 में सेना चाहती थी कि हॉकी टीम न्यूजीलैंड जाए, जिसके लिए खिलाड़ियों की तलाश शुरू हुई. इस दौरान ध्यानचंद अपनी प्रैक्टिस में जुटे रहे और मन को समझाया कि अगर काबिल हूं, तो मौका मिल ही जाएगा. फिर एक दिन कमांडिग ऑफिसर ने बुलाया और कहा, ‘जवान, तुम हॉकी खेलने के लिए न्यूजीलैंड जा रहे हो.’ ध्यानचंद को खुशी इतनी थी कि मुंह से एक शब्द नहीं निकला.

यह पहला मौका था जब भारत की हॉकी टीम विदेश दौरे पर गई. न्यूजीलैंड में टीम ने कुल 21 मैच खेले और 18 में जीत का परचम लहराया. भारत ने कुल 192 गोल दागे, जिनमें 100 गोल सिर्फ ध्यानचंद के थे.

क्रिकेटर डोनाल्ड ब्रैडमैन से मिली तारीफ

ऑस्ट्रेलिया के महान क्रिकेटर सर डोनाल्ड ब्रैडमैन ने 1935 में एडिलेड में एक हॉकी मैच देखने के बाद कहा था, “ध्यानचंद ऐसे गोल करते हैं जैसे क्रिकेट में रन बनता है.” ब्रैडमैन हॉकी के जादूगर से उम्र में तीन साल छोटे थे. अपने-अपने खेल में माहिर ये दोनों हस्तियां केवल एक बार एक-दूसरे से मिलें.

ध्यानचंद के सेलेक्शन में आई दिक्कत

ध्यानचंद का तबादला 1928 में नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस वजीरिस्तान (अब पाकिस्तान) में कर दिया गया, जहां हॉकी खेलना मुश्किल था. इस वजह से 1932 ओलंपिक में ध्यानचंद के सेलेक्शन को लेकर भी दिक्कतें आईं.

अब किसी से नहीं हारेंगे

न्यूजीलैंड को हराकर हॉकी टीम के भारत लौटने पर जब कर्नल जॉर्ज ध्यानचंद से पूछते हैं कि भारत की टीम एक मैच क्यों हार गई तो ध्यानचंद का जबाब होता है कि उन्हें लगा कि उनके पीछे बाकी 10 खिलाड़ी भी हैं. अगला सवाल, तो आगे क्या होगा. जवाब आता है कि किसी से हारेंगे नहीं. इस प्रदर्शन और जवाब के बाद ध्यानचंद लांस नायक बना दिए गए.

पहली बार कहा 'जादूगर'

26 मई 1928 को ध्यानचंद समेत कई खिलाड़ियों की तबीयत खराब थी. लेकिन उनके हौसले में किसी तरह की कमी नहीं थी. तबीयत खराब होने बावजूद भी चीम चैंपियन बनीं. इसी ओलंपिक के बाद पहली बार ध्यानचंद के नाम के साथ ‘जादूगर’ शब्द जोड़ा गया. विदेशी अखबारों ने मैच में ‘जादू, जादूगर, जादू की छड़ी’ जैसे अल्फाज इस्तेमाल किए.

विदेशी महिला ने कहा, मे आई किस यू?

जर्मनी ने इंडिया को मैसेज भिजवाया कि अगर आपकी टीम हमारे यहां आएगी तो खर्चा हम उठाएंगे. फिर इंडियन टीम ने वहां कई मैच खेले और आखिरी मैच में बर्लिन-11 को 4 गोलों से हराया. अब तक तो विदेशी भी ध्यानचंद के दीवाने हो गए थे. चेकोस्लोवाकिया में ध्यानचंद के खेल से इम्प्रेस होकर एक युवती उनके पास आकर बोली, ‘तुम किसी एजेंल की तरह लगते हो, क्या मैं तुम्हें किस कर सकती हूं?’ ये सुनते ध्यानचंद सकपका गए और बोले, ‘सॉरी मैं शादीशुदा हूं. मुझे माफ करें.’

नाम के पीछे क्यों लगा चंद

ध्यानचंद का असली नाम ध्यान सिंह था लेकिन वह रात को चन्द्रमा की रोशनी में प्रैक्टिस करते थे इसलिए इनके साथियों ने उनके नाम का पीछे चंद लगा दिया.

जब ध्यानचंद का हॉकी स्टिक तोड़ दिया गया

एक बार कुछ ऐसा हुआ कि नीदरलैंड में एक मैच के दौरान उनकी हॉकी स्टिक तोड़कर देखी गई, इस शक के साथ कहीं स्टिक में कोई चुम्बक तो नहीं लगी. लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा क्योंकि जादू हॉकी स्टिक में नहीं ध्यानचंद के हाथों में था.

24 घंटे रुका जहाजों का ट्रैफिक

1928 में ओलपिंक में गोल्ड लेकर भारतीय हॉकी टीम बंबई लौटी. स्वागत में बंबई के डाकयार्ड पर जहाजों की आवाजाही 24 घंटे नहीं हो पाई थी.

गोल से लगाया गोलपोस्ट का अंदाजा

एक बार मेजर साहब ने शॉट मारा तो वह पोल पर जाकर लगा तब उन्होनें रेफरी से कहा की गोल पोस्ट की चौड़ाई कम है. जब गोलपोस्ट की चौड़ाई मापी गई तो सभी हैरान रह गए वह वाकई कम थी.

घायल होकर भी खेले ध्यानचंद

1936 ओलंपिक में भारत का मुकाबला हिटलर के देश की टीम जर्मनी से था. बारिश होने पर मैच 15 अगस्त तक के लिए टाल दिया गया. 15 अगस्त को मैच शुरू हुआ, तो जर्मनी खिलाड़ियों ने आक्रामक रुख अपनाया. ध्यानचंद के दांत में चोट लगी, जिसके चलते उन्हें कुछ वक्त के लिए मैदान छोड़ना पड़ा. इसके बाद ध्यानचंद चोटिल हालत में ही मैदान में लौटे और साथियों को समझाया कि बदले के लिए नहीं, बढ़िया खेल खेलो. बस फिर क्या ध्यानचंद ने वापसी के साथ ताबड़तोड़ गोल दागने शुरू किए.

मैदान छोड़ भागा हिटलर

भारत और जर्मनी के बीच हुए फाइनल मुकाबवे के शुरूआती मिनटों में ही ध्यानचंद की टीम ने जर्मनी की ऐसी धुलाई की कि मैच देख रहा हिटलर स्टेडियम छोड़कर चला गया. भारत ने जर्मनी को 1 के मुकाबले 8 गोल से शिकस्त दी.

ध्यानचंद ने ठुकराया हिटलर का ऑफर

16 अगस्त को ओलंपिक समापन में हिटलर से ध्यानचंद का सामना होना था. भारतीय हॉकी टीम गोल्ड मेडल पहनने वाली थी. हिटलर जब ध्यानचंद से मिला तो उनसे इतना इम्प्रेस हुआ कि उन्हें अपनी सेना में जनरल पद का ऑफर दिया. लेकिन ध्यानचंद ने सहज भाव से ये ऑफर ठुकरा दिया.  

पद्मभूषण से सम्मानित

हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को फुटबॉल में पेले, क्रिकेट में ब्रैडमैन और बॉक्सिंग में मोहम्मद अली के बराबर का दर्जा दिया गया है. उन्हें 1956 में भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें