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धार्मिक विरोध झेलते खिलाड़ी

भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी ने अपनी मौडल पत्नी के साथ फोटो क्या शेयर की कि वे अचानक कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गए. धर्म के नाम पर उन को ले कर शर्मनाक टिप्पणियां होने लगीं, दूसरे क्रिकेटर मोहम्मद कैफ अपने कसरत करने के तरीके को ले कर धर्मगुरुओं का शिकार हो गए. खिलाडि़यों की व्यक्तिगत जिंदगी में, दकियानूसी सोच के शिकार कट्टरपंथी, जबतब अपनी टांग अड़ाते रहते हैं. कई खिलाड़ी उन के फतवों का शिकार हुए. कुछ कट्टरपंथी इस अंदाज में हस्तक्षेप करते हैं. जैसे उन्होंने ही खिलाडि़यों को जिंदगी जीने, खानेपीने, पहननेओढ़ने और संस्कृति का सलीका सिखाने का ठेका ले लिया हो. दरअसल, ऐसे ठेकेदार धर्म की आड़ में अपनी पहचान को कायम रखने और जम्हूरियत को भड़काने के लिए ही ऐसे कृत्य करते हैं.

इस आजादनुमा हकीकत से भला कोई कैसे अंजान हो सकता है कि लोग अपनी पसंद का खानपान कर सकते हैं, पहनावा अपना सकते हैं और अपने अंदाज में जिंदगी बसर कर सकते हैं. आधुनिक युग में सभी करते भी ऐसा ही हैं. अपनी प्रतिभा से लाखों लोगों को फैन बनाने वाले भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी भी इस से जुदा नहीं थे. शोहरत की बुलंदियों व अपने परिवार से वे खुश थे. सोशल साइट पर उन्होंने अपने साथ पत्नी व मासूम बेटी की कुछ तसवीरें पोस्ट कर के खुशियों का इजहार किया. लेकिन उन्हें झटका तब लगा जब उन की ये खुशियां कट्टरपंथियों को खटक गईं. धर्म के नाम पर उन्होंने तीखे बयानों के चुभते तीर चला दिए.

दकियानूसी सोच

मोहम्मद शमी ने 25 दिसंबर, 2016 को जो फोटो पोस्ट किए थे उन में मौडल रह चुकी उन की पत्नी हसीन जहां ने लाल रंग का आकर्षक स्लीवलैस गाउन पहना हुआ था. भला किसी के पहनावे से किसी का क्या लेना, लेकिन दकियानूसी सोच के शिकार कट्टरपंथियों ने तमाम टिप्पणियां कर डालीं. किसी ने धर्म का वास्ता दिया, किसी ने शर्म करने, धर्म की इज्जत करने, तो किसी ने पर्दानशीं होने की नसीहत दे डाली.

तुर्रा यह था कि तसवीरें धर्म के खिलाफ थीं. शमी को अपनी पत्नी को परदे में रखना चाहिए था. इस विवाद में धर्म के नाम पर कुछ भी बोलने की छूट की मानसिकता के शिकार लोगों को मुंह की खानी पड़ी, क्योंकि शमी ने जवाब दिया कि वे अपनी जिंदगी में क्या करते हैं, यह वे जानते हैं. बुराई करने वालों को अपने अंदर देखना चाहिए. कई खिलाडि़यों के साथसाथ बौलीवुड गीतकार जावेद अख्तर और अभिनेता फरहान अख्तर भी शमी के पक्ष में खड़े हो गए.

जावेद अख्तर ने साफ भी किया, ‘‘जो पोशाक मिसेज शमी ने पहनी है वह बेहद सलीके की और खूबसूरत है. अगर किसी को दिक्कत है तो यह उस की सोच का छोटापन है.’’

उत्तर प्रदेश के अमरोहा में रहने वाले शमी के पिता तौसीफ अहमद ने कहा कि दुनिया कहां से कहां पहुंच गई लेकिन ऐसे कट्टर लोग दूसरों के मामले में दखलंदाजी करने से आगे नहीं बढ़ पाए. ऐसे लोगों को अपना मन साफ रखना चाहिए. शमी को आज दर्द है कि कट्टरपंथियों ने उन्हें निशाना बनाया.

बेतुके तर्क

शमी कोई पहले या आखिरी खिलाड़ी नहीं थे जो कट्टरपंथियों के निशाने पर आए थे. क्रिकेटर मोहम्मद कैफ को शमी का समर्थन करना भारी पड़ गया. जब धर्म के ठेकेदार शमी को ले कर पाठ पढ़ा रहे थे, तो कैफ ने इसे शर्मनाक बताते हुए कह दिया था कि ‘देश में अन्य बड़े मुद्दे भी हैं. उम्मीद करता हूं ऐसे लोगों को समझ आएगी.’ कैफ के शब्दों में यों तो कुछ गलत नहीं था, बल्कि नसीहत थी उन लोगों के लिए जो धर्म के नाम पर लोगों की सोच को गुलाम बना कर उन्हें अपने तरीके से चलाए रखना चाहते हैं, लेकिन उन की बात शायद धार्मिक ठेकेदारों को कांटे की तरह चुभ कर राह में रोड़े जैसी लगी थी.

ज्यादा वक्त नहीं बीता और चंद दिनों बाद ही 2 जनवरी को उन्हें ले कर भी मुसलिम समाज की रहनुमाई का दंभ भरने वाले धर्मगुरु मैदान में उतर आए. उन्होंने एक बयान जारी कर दिया. वैसे, कैफ का गुनाह इतना था कि उन्होंने अपनी कसरत करते हुए कुछ फोटो सोशल साइट्स पर डाल दीं. जिसे सूर्य नमस्कार की संज्ञा दी गई.

इसलामिक संस्था दारुल उलूम देवबंद ने बयान में कहा, ‘‘इसलाम इस की इजाजत नहीं देता. यह तरीका नाजायज है. कैफ ने गलत किया और उन्हें तोबा करनी चाहिए. एक धर्मगुरु का तर्क हास्यास्पद था जिस में उन्होंने कहा, ‘जो फोटो में दिख रहा है वह कैफ ने कसरत समझ कर किया है, तो भी यह धर्म में नकारा जाएगा.’ तंदुरुस्त रहने की और भी कसरतें हैं.’’

वैसे इन सब बातों से न मोहम्मद कैफ का खेल बिगड़ा, न सेहत. कैफ के चाहने वालों ने भी उलेमा के खिलाफ जम कर हल्ला बोला. अब ऐसे लोगों को कौन समझाए कि जब खिलाड़ी कसरत ही नहीं करेगा, तो वह अच्छा प्रदर्शन कैसे करेगा.

कट्टरपंथी जबतब टांग अड़ाते रहते हैं. एक मामले में तो उन्होंने ऐसा किया कि महिला खिलाडि़यों को निराशा का सामना करना पड़ा.

दरअसल, 1 साल पहले पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के चांचल इलाके में स्थित एक स्थानीय क्लब के 50वें स्थापना दिवस के मौके पर लड़कियों की कोलकाता एकादश व उत्तर बंगाल एकादश नामक 2 टीमों के बीच आयोजक रजा आमिर आदि द्वारा एक फुटबौल मैच का आयोजन किया जाना था. इस मैच में कई राष्ट्रीय महिला खिलाड़ी भी शामिल होनी थीं. इस का पता स्थानीय कट्टरपंथियों को लगा, तो उन्होंने यह कहते हुए तुगलकी फतवा जारी कर दिया कि इस दौरान महिला छोटे कपड़े पहनती हैं. चुस्त व छोटे कपड़े पहन कर खेलना व देखना दोनों ही शरीयत कानून के खिलाफ हैं. इसलाम इस बात की इजाजत नहीं देता कि महिलाएं छोटे कपड़े पहन कर मैदान में मैच खेलें. लिहाजा, मैच पर प्रतिबंध लगाया जाए.

खामोशी क्यों

स्थानीय प्रशासन ने कट्टरपंथी ताकतों के आगे घुटने टेक दिए और अशांति की आशंका में मैच पर पाबंदी लगा दी. एक खिलाड़ी नौसबा आलम ने हैरानी से सवाल खड़ा किया कि उसे विश्वास नहीं हो रहा कि क्या यही 21वीं सदी का भारत है. नौसबा का सवाल जायज था, लेकिन देश की कड़वी सचाई यह भी है कि कट्टरपंथियों से कोईर् उलझना नहीं चाहता. लोग भी खोमाश रहना बेहतर समझते हैं, क्योंकि धर्म के नाम पर बहुतकुछ हो जाता है और धर्म के ठेकेदार अपनी दुकानें आबाद रखने के लिए उकसाने को तैयार रहते हैं. और धर्मगुरुओं की भी कमी नहीं जो उन के इशारों पर बिना सोचेसमझे कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं.

वर्ष 2005 में भारतीय महिला टैनिस स्टार सानिया मिर्जा को ले कर भी कुछ कट्टरपंथियों ने उन के खिलाफ फतवा जारी कर दिया था कि वे स्कर्ट मतलब छोटे कपड़े पहन कर मैच न खेलें. इस पर सानिया ने करारा पलटवार कर के ऐसे धार्मिक गुरुओं की बोलती बंद कर दी कि वे लोग स्कर्ट नहीं, उन का खेल देखें. सानिया ने धर्मगुरुओं को किनारे किया और अपने खेल पर ध्यान दिया. यह तय करना मुश्किल हो गया कि क्या फतवा धर्म के नाम पर प्रतिभाशाली खिलाड़ी को दबाने, पीछे घसीटने की कोशिश थी या कुछ और?

बेवजह के फतवे

बुलंदियां हासिल करने वाली सानिया इस तरह की ताकतों के कब्जे में नहीं आईं. इस बात को धर्म के ठेकेदार शायद भूले नहीं और उन्होंने सानिया को निकाह के समय फिर घेरे में लेने की कोशिश की. दरअसल, पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक निकाह के लिए आए थे और बतौर मेहमान उन्हें सानिया के परिवार द्वारा ठहराया गया था. इस पर फतवा जारी कर के कहा गया कि दोनों खिलाड़ी निकाह से पहले नजदीक रह कर अपनी गतिविधियों के जरिए धर्म को बदनाम कर रहे हैं जोकि हराम है.

इतना ही नहीं, उन्होंने लोगों से होने वाली शादी से भी दूर रहने को कहा. लोगों ने इस फतवे को एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया.

ऐसे मामलों पर सामाजिक कार्यकर्ता ताहिरा हसन कहती हैं कि देश कानून से चल रहा है. कुछ लोग मुसलमानों के ठेकेदार बने रहना चाहते हैं, इसलिए वे ऐसी बातें करते हैं. मुसलिम समाज में तमाम कुरीतियां हैं और लोग बदतर जिंदगी बसर करते हैं, उन पर कट्टरपंथी कभी आवाज नहीं उठाते, जबकि खुद मलाई खाते हैं. इसलाम की परिभाषा को अपने हिसाब से गढ़ लेना कहां की अक्लमंदी है.

वहीं, डा. फरीदा खान कहती हैं कि ऐसे लोग परिवार, समाज और देश की तरक्की की बात करें, तो अच्छा है. समाज आज काफी आगे बढ़ चुका है और अब, उन की बंदिशों को झेलना हर किसी की मजबूरी नहीं है. सब को पूरी आजादी से अपनी जिंदगी जीने का हक है.

बीमा कंपनियों के विनिवेश की प्रक्रिया शुरू

सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों के विनिवेश की प्रक्रिया को अमली जामा पहनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. इस की घोषणा वित्त मंत्री अरुण जेटली ने चालू वित्त वर्ष का बजट पेश करते हुए अपने बजट में ही कर दी थी.

वित्त मंत्री की घोषणा के अनुसार, जनवरी के दूसरे पखवाड़े की शुरुआत में ही मंत्रिमंडल ने सरकारी क्षेत्र की 5 कंपनियों नैशनल इंश्योरैंस कंपनी, ओरियंटल इंश्योरैंस, यूनाइटेड इंश्योरैंस, न्यू इंडिया इंश्योरैंस तथा जनरल इंश्योरैंस कौर्पोरेशन औफ इंडिया को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने की अनुमति दे दी. इस के साथ ही सरकार इन कंपनियों के विनिवेश की प्रक्रिया शुरू कर के इन पांचों कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी 100 प्रतिशत से घटा कर महज 75 प्रतिशत करना चाहती है. सरकार का कहना है कि विनिवेश की प्रक्रिया धीरेधीरे क्रियान्वित की जाएगी.

न्यू इंडिया इंश्योरैंस का मुनाफा 478 करोड़ रुपए तथा नैशनल इंश्योरेंस का लाभ 128 करोड़ रुपए है. शेष सभी कंपनियां घाटे में चल रही हैं. यूनाइटेड इंश्योरैंस का घाटा 428 करोड़ रुपए है जबकि ओरियंटल इंश्योरैंस का घाटा 382 करोड़ रुपए है. बीमा क्षेत्र की इन कंपनियों के शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने से जहां बाजार से पैसा जुटाया जा सकेगा वहीं सरकार की निवेश की प्रक्रिया में एक कदम आगे भी बढ़ा जा सकेगा. सरकार की योजना सूचीबद्ध की प्रक्रिया को इसी वित्त वर्ष में पूरा करने की है.

अब सवाल यह है कि इन कंपनियों के सूचीबद्ध होने से बीमाधारकों को किस तरह का फायदा होगा. बाजार से अच्छा पैसा जुटाया जाता है तो बीमाधारकों को भी इस का लाभ जरूर मिलना चाहिए.

सहकारी बैंकों पर कसी लगाम

कालाधन मामले में सहकारी बैंकों पर सरकार की नजर और तीखी हुई है. सरकार को यह विश्वास हो गया है कि नोटबंदी के दौरान इन बैकों ने कालेधन को बढ़ावा दिया है. बैंकों पर सरकार का भरोसा कम हुआ है क्योंकि नोटबंदी के दौरान 8 से 14 नवंबर, 2016 के बीच इन बैंकों में 500 तथा 1,000 रुपए के नोटों के साथ 16,000 करोड़ रुपए जमा किए गए. इन बैंकों को पुराने नोटों को नए नोटों में बदलने का अधिकार नहीं दिया गया. फिर 16 नवंबर को सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर के सहकारी बैंकों को प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना यानी पीएमजीकेवाई शुरू की.

योजना के तहत कालाधनधारकों को अघोषित नकदी को बैकों में जमा कर, उस पर 50 प्रतिशत कर देने के अलावा जमा राशि का 25 प्रतिशत बैंक में ही जमा रखना था. इस राशि पर जमाकर्ता के लिए ब्याज की सुविधा नहीं है. कर का भुगतान करने और निश्चित राशि जमा करने के बाद व्यक्ति अपने इस खाते से 25 प्रतिशत ही निकाल सकता है.

कर विभाग तथा अन्य संबद्ध पक्षों ने नोटबंदी के बाद सहकारी बैंकों में जमा पैसे की जांच शुरू की तो बड़ी गड़बड़ होने की आशंका सामने आई. जांच का कार्य विभिन्न स्तर पर चल रहा है लेकिन फिलहाल सरकार ने पीएमजीकेवाई के तहत इन बैंकों में रुपए जमा करने पर प्रतिबंध लगा दिया है. सरकार ने इस के लिए बाकायदा एक अधिसूचना जारी की है.

नोटबंदी के बाद निजी क्षेत्र के कुछ बैंकों और सहकारी बैंको की विश्वसनीयता पर संकट खड़ा हुआ है. इन बैंकों की गतिविधियों के संदेह के घेरे में आने के बाद संदेहास्पद बिंदुओं की जांच का काम जारी है. लंबे समय से जनता के बीच काम करने वाले संस्थानों द्वारा इस तरह भरोसा कम करने वाली गतिविधियों को संचालित करने से करोड़ों लोगों का विश्वास डगमगाया है. लोगों का भरोसा सरकार से अधिकृत संस्थानों पर बना रहे, इस के लिए इन संस्थानों को पाकसाफ हो कर सामने आना पड़ेगा.

शेयर बाजार में ट्रंप का कहर

अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शेयर बाजार के लिए आफत बन कर आए. न सिर्फ भारतीय शेयर बाजार बल्कि पूरी दुनिया के शेयर सूचकांक पर ट्रंप का कहर बरपा है. उन की ताजपोशी तक पूरी दुनिया के बाजारों में हाहाकार मचा रहा. इस दहशत को तब और बल मिला जब खुद अमेरिका में नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के विरोध में प्रदर्शन हुए. अमेरिका में किसी राष्ट्रपति की ताजपोशी पर शायद इस तरह के प्रदर्शन पहले कभी नहीं हुए.

डोनाल्ड ट्रंप को शेयर बाजार के लिए अनुकूल नहीं माना जाता रहा है, इसलिए जिस प्रांत में वे जीतते, बाजार को झटका लगता. ट्रंप की जीत के झटकों के ये परिदृश्य भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में देखने को मिले हैं.

डोनाल्ड ट्रंप ने 20 जनवरी को राष्ट्रपति पद व गोपनीयता की शपथ ली और इधर भारतीय बाजार ने गिरावट का रुख किया. गिरावट का यह रुख हालांकि उन की ताजपोशी के पहले से ही जारी था लेकिन उन की ताजपोशी पर दुनियाभर के बाजारों को झटका लगा और बीएसई में भी इस का असर देखने को मिला.

लेकिन जानकारों का दावा है कि बाजार का यह रुख ज्यादा दिन नहीं चलेगा. देश की अर्थव्यवस्था को ले कर विकास दर के बारे में जो अनुमान व्यक्त किए जा रहे हैं अब उन्हीं का असर बाजार पर है. बाजार ने भले ही डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के चलते डुबकी लगाई हो लेकिन भारत का आम बजट पेश किए जाने और बजट घोषणाओं से बाजार में उत्साह दिखा है और बौंबे स्टौक एक्सचेंज का सूचकांक 28 हजार अंक के पार पहुंच गया.

फिल्मी सर्जिकल स्ट्राइक

भारत-पाक संबंधों के बीच की कड़वाहट को अकसर दोनों देशों में बनी युद्ध फिल्मों ने सतही कथानक से काम लिया है. ‘गदर’, ‘अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों’, ‘दीवार’ से ले कर हालिया बनी फिल्म ‘द गाजी अटैक’ उसी ढर्रे पर चल रही हैं. हालांकि, फिल्मकार  ‘द गाजी अटैक’ की कहानी को बढ़ाचढ़ा कर 1971 के उन जवानों की देशभक्ति की गाथा बता रहे हैं जो पाकिस्तान के पीएनएस  गाजी सबमैरीन को भारत में आईएनएस विक्रांत को डुबोने से रोकते हैं और विशाखापटनम को पाकिस्तान के कब्जे में जाने से बचाते हैं. फिल्म में राना दग्गुबाती, अतुल कुलकर्णी, के के मेनन हैं. अभिनेता ओम पुरी संक्षिप्त भूमिका में हैं.

ऐसी फिल्में सरकार के सर्जिकल स्ट्राइक प्रचार सरीखी होती हैं जो छद्म नफरत की भावना पर सवार हो कर 2 देशों की जनता के बीच की दूरियां बढ़ाती हैं. 

भंसाली पर हमला

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब पाकिस्तानी कलाकारों को देश से निकालने को ले कर कुछ कट्टर ताकतों ने हल्ला मचाया था और अब जयपुर के जयगढ़ किले में चल रही संजय लीला भंसाली की पीरियड ड्रामा फिल्म ‘पद्मावती’ की शूटिंग के दौरान राजपूत करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने निर्देशक संजय लीला भंसाली को थप्पड़ भी मार दिया. कथित तौर पर करणी सेना को अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्मावती के बीच कथित रूप से फिल्माए जा रहे लवसीन पर आपत्ति है.

फिल्में पूरी तरह से कल्पना पर आधारित होती हैं और निर्देशक अपने हिसाब से सिनेमैटिक लिबर्टी लेते हैं. ऐसे में अगर फिल्म में कुछ आपत्तिजनक होता है तो उस के लिए सैंसर बोर्ड गठित है. कट्टर ताकतों का यूं कानून अपने हाथ में लेना न सिर्फ प्रशासन और सुरक्षा की चूक बताता है बल्कि यह भी जताता है कि कहीं न कहीं उन्हें सरकारी सरंक्षण हासिल है.

भाजपा की चुनौतियां : अखिलेश, राहुल, केजरीवाल

भारतीय जनता पार्टी की नजर में राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल की इमेज किसी मसखरे नेता जैसी है. देश के सब से बडे़ प्रदेश में 5 साल मुख्यमंत्री की कुरसी संभालने वाले अखिलेश यादव को भाजपा ने कभी पूरा मुख्यमंत्री ही नहीं माना. चुनावी रणनीति में इन तीनों ने अब भाजपा के सामने चुनौतियों के पहाड़ खडे़ कर दिए हैं. इस से भाजपा के त्रिलोक विजयी की छवि दांव पर लग गई है. अपनी छवि को बचाने के लिए भाजपा ने परिवारवाद से ले कर दलबदल की नीतियों तक को अपना लिया है. इस से भाजपा को अपने अंदर से ही चुनौती मिलने लगी.  

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोआ और मणिपुर के विधानसभा चुनाव केंद्र की भाजपा सरकार के लिए चुनौतियों से भरे हैं. चुनौतियों का आभास भाजपा को भी है. इसलिए अब वह अपने सारे सिद्धांतों को दरकिनार कर हर समझौता कर रही है. परिवारवाद से ले कर दलबदल तक के सभी समझौते उस ने कर लिए. भाजपा में जहां पहले सभी फैसले पार्टी के संगठन द्वारा लिए जाते थे, वहीं अब भाजपा हाईकमान अकेले फैसले लेने लगा है. नोटबंदी से ले कर चुनावी रणनीति तक में आपसी विचारविमर्श नहीं दिखा. 

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में जिस तरह के फैसले भाजपा ने टिकट वितरण में किए हैं उन से पार्टी में व्यापक स्तर पर विरोध हो रहा है. पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के सामने केवल तब की सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ही थी. वह चुनाव असल में भाजपा की जीत के लिए नहीं, कांग्रेस की हार के लिए याद रखा जाएगा. कांग्रेस ने 10 साल के राजकाज में जनता को राहत देने वाले फैसले कम किए पर भ्रष्टाचार खूब किया. सरकार ने अगर अच्छे काम किए भी तो उन को जनता तक पहुंचाया नहीं जा सका. भाजपा नेता नरेंद्र मोदी ने प्रचार और भाषण की जोरदार शैली के बल पर जनता के कांग्रेसविरोध को अपनी ओर करने का काम किया था. दूसरी पार्टियां बिखरी हुई थीं. ऐसे में भाजपा ने मौके का फायदा उठाया और बहुमत से जीत कर सरकार बना ली.

बाद में कई राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए और जहां भाजपाकांग्रेस की टक्कर थी वहां तो भाजपा जीत गई पर जहां भाजपा के सामने दूसरे दल थे उसे वहां हार का सामना करना पड़ा. दिल्ली विधानसभा के चुनाव सब से अहम थे जहां अरविंद केजरीवाल की अगुआई में आम आदमी पार्टी ने भाजपा को करारी मात दी. उस के बाद बिहार विधानसभा चुनावों में विरोधी दलों राजद, जदयू और कांग्रेस ने मिल कर भाजपा को घेरा और मात दे दी. अब यही फार्मूला उत्तर प्रदेश के चुनाव में कांग्रेस व समाजवादी पार्टी ने अपनाया है. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जहां राहुलअखिलेश फैक्टर भाजपा को परेशान कर रहा है वहीं गोआ और पंजाब में आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल उस के लिए चुनौती बने हुए हैं.

केजरीवाल की रणनीति

पंजाब और गोआ की सब से खास बात यह है कि वहां भाजपा की सरकारें हैं. पंजाब में भाजपा और अकाली दल की मिलीजुली सरकार है. इस चुनाव में भी भाजपा-अकाली गठजोड़ मिल कर चुनाव लड़ रहा है. परेशानी का सबब यह है कि भाजपा और अकाली दल के बीच आपसी मतभेद हैं. इसी का नतीजा है कि भाजपा के स्टार नेता, क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू को भाजपा छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा. अकाली दल और भाजपा के मुकाबले कांग्रेस मजबूती से चुनाव लड़ रही थी. आम आदमी पार्टी के चुनावी मैदान में आ जाने से मामला और भी रोचक हो गया. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बड़ी चतुराई से अपनी पार्टी को पंजाब और गोआ के विधानसभा चुनावों में उतारा है. वे उत्तर प्रदेश जैसे बडे़ प्रदेश के चुनावी संग्राम से बाहर रहे हैं. यह उन की रणनीति का एक हिस्सा है.

अरविंद केजरीवाल ने गोआ और पंजाब में युवाओं व महिलाओं पर सब से अधिक फोकस करते हुए जुआ व नशे के खिलाफ आवाज उठाई है. लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को सब से अधिक पंजाब से ही सफलता मिली थी. पंजाब में अकाली दल और भाजपा के विरोध में सत्ताविरोधी हवा चल रही है. अकाली दल के बादल परिवार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं. पंजाब दिल्ली के करीब है. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने जिस तरह से सरकार चलाई है उस से पंजाब के लोग प्रभावित हैं. अरविंद केजरीवाल ने पंजाब में किसानों, दलितों, सिखों, महिलाओं के बीच अपने जनाधार को बढ़ाया है. अरविंद केजरीवाल ने इस को ले कर विरोध जताया है. अरविंद केजरीवाल की छवि और उन की सादगी सब से बड़ा हथियार है. केजरीवाल का रिकौर्डेड मैसेज पंजाब के लोगों को खूब पसंद आ रहा है. इस में अरविंद केजरीवाल पंजाब में अकाली दल के नेता विक्रम मजीठिया पर सब से ज्यादा आरोप लगाते हैं. अरविंद कहते हैं कि मजीठिया ने घरघर नशा पहुंचाने का कृत्य किया है. उन की सरकार बनने पर मजीठिया को जेल में डाला जाएगा.

पंजाब में नशे को मुद्दा बनाने वाले अरविंद केजरीवाल ने गोआ में कैसीनों को निशाने पर लिया है. अरविंद केजरीवाल का आरोप है कि भाजपा के राज में गोआ में कैसीनों खोले गए. कैसीनों में जुआ खेला जाता है. कैसीनों के चलते युवा जुए का शिकार हो रहे हैं. गोआ में अपराध बढ़ रहा है. अब विदेशी पर्यटक भी गोआ आने से कतराने लगे हैं. गोआ में पहली बार विधानसभा चुनाव में कैसीनों मुद्दा बन रहे हैं. इस मुद्दे पर गोआ की जनता अरविंद केजरीवाल का समर्थन भी कर रही है.

भाजपा में ‘नो सीएम फेस’

पंजाब और गोआ की ही तरह उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भी भाजपा को अपनी साख बचाने के लिए हर तरह के फैसले लेने पड़ रहे हैं. उत्तर प्रदेश में सपाकांग्रेस गठजोड़ के तहत सपा 298 और कांग्रेस 105 सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के युवा नेता व राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव कहते हैं, ‘‘प्रदेश की जनता साइकिल की सवारी कर रही है. हमारी सरकार ने जिस तरह से 5 साल विकास के काम कर अपने चुनावी वादों को पूरा किया है, उस से लोग फिर से साइकिल की हवा बनाने लगे हैं. कांग्रेस के साथ आने से हमारी साइकिल की रफ्तार और भी तेज हो गई है.’’

अखिलेश यादव की गणना कुछ समय पहले तक ऐसे सुसंस्कृत नेता की थी जो पिता का मानसम्मान करता था. सत्ता के 5 सालों ने इस चेहरे को इतना बदल दिया कि उस ने पिता को जबरन कुरसी से उतार कर पार्टी को हथिया लिया. मुलायम सिंह लगातार इस बात को कह रहे हैं कि अखिलेश उन की नहीं सुनते. अब सरकार और संगठन दोनों अखिलेश के पास हैं. चुनाव चिह्न की लड़ाई भी वे जीत चुके हैं. इतनी सारी जीत के बाद अगर वे कुछ हारे हैं तो वह उन की अपनी छवि है. यह बात और है कि पूरी कोशिश इस बात की है कि पिता मुलायम को बुरे लोगों से घिरा दिखा कर अपनी छवि को बचाया जाए. अखिलेश के करीबी लोग मानते हैं कि इस लड़ाई में वे निखर कर सामने आए हैं. राजनीति को जाननेपरखने वाले लोग समझते हैं कि यह सही आकलन नहीं है. चाटुकारिता में लोग इस तरह की बातें कर रहे हैं.

चुनाव के मैदान में अखिलेश के सामने मुश्किलें अभी बाकी हैं. सब से अहम लड़ाई सपा के खास यादव बिरादरी को एकजुट करने की है. मुलायम का हताश, निराश और बेबस चेहरा यादव बिरादरी भूल जाएगी, यह संभव नहीं लगता. कोई भी पिता यह नहीं चाहता कि पुत्र इस तरह से सत्ता के लिए पिता को बेबस कर दे. यादव बिरादरी में इस तरह की सोच और भी मजबूत है. मुलायम सिंह यादव के साथ पुरानी पीढ़ी का भावनात्मक रिश्ता है. सपा के कुछ वरिष्ठ नेता अपने बेटों के भविष्य के लिए भले ही अखिलेश को सही और मुलायम को गलत कह रहे हों, पर यादव वोटबैंक के लोगों को अखिलेश के साथ ऐसा कोई स्वार्थ नहीं है. ऐसे में वे खुल कर अखिलेश के साथ खड़े होंगे, ऐसा संभव नहीं लगता है.

सपा की लड़ाई चुनावभर की नहीं है. यह आगे तक जाएगी. इस का सही आकलन चुनाव के बाद ही हो पाएगा. अखिलेश की जीत और हार दोनों ही पार्टी का भविष्य तय करेगी. असल में अभी अखिलेश और मुलायम के बीच सीधा मुकाबला नहीं था.अखिलेश सत्ता के शिखर पर थे तो मुलायम लाचार, हथियारविहीन थे. चुनाव के बाद अखिलेश और मुलायम के बीच बराबर का मुकबला होगा. सत्ता के चलते जो लोग अखिलेश के साथ में अपना भविष्य देख रहे हैं, कल बदले हालात में वे कितना अखिलेश के करीब होंगे, यह समझने वाली बात है. भारत में लोकतंत्र जरूर है पर यहां जाति, बिरादरी, धर्म और भावनाओं पर वोट पड़ते हैं. यह बात अखिलेश भी समझते हैं. यही वजह है कि वे कांग्रेस और दूसरे दलों से तालमेल कर अपने दरकते जनाधार की कमी को पूरा करना चाहते हैं.

अब मुलायम सिंह यादव ने अखिलेशराहुल के गठबंधन को नकार दिया है. ऐसे में सपा का बड़ा वोटबैंक अखिलेश के खिलाफ खड़ा हो सकता है. यह समाज ऐसा है कि खुद चाहे कितनी भी गलती करे पर दिखावे में वह सब से बड़ा ईमानदार बनता है. ऐसे में मुलायम के बयान अखिलेश की राह मुश्किल करेंगे और विरोधी दलों को हमले का एक अवसर देंगे. अब जीत और हार ही अखिलेश की छवि को बदल सकती है. पिता मुलायम का बेबस, लाचार चेहरा बारबार नए सवाल उठाता रहेगा. इस से निबटना सरल नहीं होगा.

हालांकि, परिवार के विवाद को सुलझाने और उस से बाहर निकलने के बाद अखिलेश यादव के निशाने पर भाजपा और उस की अगुआई में चलने वाली केंद्र की मोदी सरकार है. अखिलेश यादव लगातार भाजपा द्वारा लोकसभा चुनाव में किए गए वादों और केंद्र सरकार के फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं.अखिलेश यादव जनता के बीच जा कर पूछ रहे हैं, ‘अच्छे दिन कहां आए?’ और ‘नोटबंदी से क्या हासिल हुआ?’ ये दोनों सवाल भाजपा के लिए परेशानीभरे साबित हो रहे हैं. भाजपा के बडे़ नेताओं के पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं. ऐसे में एक बार  फिर से वे राममंदिर के मुद्दे पर आ रहे हैं.

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य ने कहा, ‘‘अगर प्रदेश में भाजपा बहुमत से सरकार बनाएगी तो राममंदिर जरूर बनेगा.’’ यह बात और है कि प्रदेश की जनता को अब भाजपा के वादों पर यकीन नहीं है. भाजपा केवल अखिलेश यादव के सवालों का जवाब ही नहीं दे पा रही बल्कि उन की तरह लोकप्रिय, साफसुथरा और स्मार्ट नेता भी अपने लिए खोज नहीं पाई है. बहुत सारे समीकरण बनाने के बाद भाजपा को उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री लायक कोई चेहरा नहीं मिल पा रहा है.  उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा दोनों के पास अपने मुख्यमंत्री के चेहरे हैं. भाजपा ने बहुत प्रयास किया पर उस को ऐसा कोई नहीं मिला जिस को वह मुख्यमंत्री का चेहरा बना सकती. ऐसे में पार्टी ने मुख्यमंत्री पद को चुनाव बाद के हालात पर छोड़ दिया है. ऐसा नहीं है कि भाजपा ने पहले मुख्यमंत्री का चेहरा आगे कर चुनाव नहीं लड़ा है. दिल्ली में किरन बेदी, बिहार में सुशील मोदी, हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर के नाम सामने हैं. उत्तर प्रदेश में अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी ने यहां के नेताओं पर कम भरोसा किया है. जिस की वजह से गुटबाजी में भाजपा पूरी तरह से फंस गई है. भाजपा ने भीतरघात की परेशानी से बचने के लिए मुख्यमंत्री पद के लिए नाम की घोषणा नहीं की है.

आलोचनाओं को दरकिनार करते राहुल

कांग्रेस नेता के रूप में राहुल गांधी भाजपा की आलोचना का सब से अधिक शिकार हुए. भाजपा ने अपने मजबूत प्रचारतंत्र के दम पर राहुल गांधी को ‘पप्पू’ साबित करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी. चुनावी हार के चलते हवा राहुल के विरोध में बनीरही. इस के बाद भी राहुल गांधी ने हार नहीं मानी. लोकसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस के सामने चुनाव में खडे़ रहने की सब से बड़ी चुनौती थी.बडे़बडे़ राजनीतिक समीक्षकों ने यह मान लिया कि पूरे देश से कांग्रेस का सफाया हो गया. अब कांग्रेस की वापसी संभव नहीं है. गांधी परिवार को पूरी तरह से हाशिए पर ढकेल दिया गया. कांग्रेस के लिए वह चुनौतीभरा दौर था. कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी बीमारी के कारण पार्टी को पहले जैसा समय और नेतृत्व नहीं दे पा रहीं. राहुल गांधी लगातार असफल होते दिख रहे थे. प्रियंका गांधी वाड्रा राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए आगे नहीं बढ़ रही थीं.

कांग्रेस को आगे बढ़ाने व उस को एकजुट रखने के लिए गांधीनेहरू परिवार की सब से अधिक जरूरत होती है. विरोधी दलों को यह पता है कि बिना गांधीनेहरू परिवार के कांग्रेस बिखर जाएगी. भाजपा ने मान लिया था कि125 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी लोकसभा में विपक्षी पार्टी बनने भर की संख्या में संसद सदस्य नहीं ला पाई, इसलिए वह अब वापस नहीं आ सकती. वहीं, अपनी सभी अलोचनाओं को दरकिनार कर राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुकाबले कचुनौती को स्वीकार किया. भाजपा हमेशा कहती थी कि राहुल गांधी को लोकसभा में बोलना नहीं आता, वे दूसरों का लिखा भाषण पढ़ते हैं. ऐसे समय में राहुल गांधी ने केंद्र की ताकतवर मोदी सरकार पर हमला बोला और उस को ‘सूटबूट वाली सरकार’ का नाम दिया.

लोकसभा चुनाव के बाद दूसरे प्रदेशों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार का सिलसिला जारी रहा. इस के बाद भी राहुल गांधी ने अपने मनोबल को टूटने नहीं दिया. वे भाजपा से मुकाबले की धुन में लगे रहे. कांग्रेस को अपनी कमजोरी का आभास हो चला था. प्रदेश स्तर पर वह लगातार जनाधार खोती जा रही थी. कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता सत्ता से बाहर रहने के कारण संतुलन खोते जा रहे थे. ऐसे में राहुल गांधी ने बिहार विधानसभा के चुनाव में भाजपा के खिलाफ महागठबंधन तैयार किया. इस में कांग्रेस के साथ जदयू और राजद जैसे प्रमुख सहयोगी साझीदार बने. बिहार में अपनी जीत पक्की मान रही भाजपा को हार का सामना करना पड़ा. दिल्ली में केजरीवाल के बाद बिहार की हार से साबित हो गया कि नरेंद्र मोदी के विजयरथ को रोका जा सकता है.

बहुत सारे विरोधों को दरकिनार करते उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और राहुल गांधी की पहल पर भाजपा के खिलाफ एक ताकतवर मोरचा बना है. भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश की लड़ाई सब से अहम है. सब से बड़ी वजह यह है कि उत्तर प्रदेश में लोकसभा की सब से अधिक सीटें हैं. यहां का विधानसभा चुनाव जीतने का अलग प्रभाव पड़ता है. लोकसभा चुनाव में भाजपा को 73 सीटें मिली थीं. इस प्रदर्शन को दोहराना किसी चुनौती से कम नहीं है. उत्तर प्रदेश में अयोध्या है. जहां पर रामजन्मभूमि मंदिर की राजनीति कर के ही भाजपा ने लोकसभा में 2 सीटों से शुरू हो कर बहुमत की सरकार बनाने तक के सफर को पूरा किया है. उत्तर प्रदेश में हार से भाजपा का मनोबल टूटेगा. कांग्रेस को यह पता चल जाएगा कि भाजपा की चुनावी जीत पानी के बुलबुले जैसी थी. उत्तर प्रदेश में चुनावी जीत के लिए भाजपा ने जिस तरह से दलबदल करने वाले नेताओं को अहमियत दी है उस से पार्टी के संगठन से जुडे़ कार्यकर्ता और नेता बेहद क्षुब्ध हैं. भाजपा के नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि कांग्रेस को खत्म कर भाजपा का कांग्रेसीकरण हो गया है. जब तक भाजपा में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं तब तक लोग चुप हैं. अनुशासन के नाम पर दबी विरोध की आवाज 2019 के चुनाव परिणामों को तय करेगी. जिस कांग्रेस को खत्म हुआ मान लिया गया था वह फिर से मुकाबले में इतनी जल्दी खड़ी हो जाएगी, इस बात की उम्मीद भाजपा को नहीं थी.      

अरविंद केजरीवाल की जुझारू छवि

16 अगस्त, 1968 को हरियाणा के सिवानी में पैदा हुए अरविंद केजरीवाल आईआईटी खड़गपुर से बीटैक करने के बाद 1989 में टाटा स्टील से जुडे़. 1992 में वहां से इस्तीफा दे दिया. 1995 में वे असिस्टैंट कमिश्नर, इनकम टैक्स के रूप में भारतीय राजस्व सेवा से जुडे़. 2006 में नौकरी छोड़ कर आरटीआई ऐक्टिविस्ट के रूप में सूचना अधिकार कानून के लिए काम करना शुरू किया. यहीं से वे अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का हिस्सा बने. 2012 में आम आदमी पार्टी बनाई. इस में वे राष्ट्रीय संयोजक बने. पार्टी बनाने के एक साल के अंदर ही 2013 में दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़ा और कांग्रेस, जदयू व निर्दलीय विधायकों के साथ मिल कर सरकार बनाई. 38 साल की उम्र में वेदिल्ली के सब से युवा मुख्यमंत्री बने. यह सरकार ज्यादा नहीं चली. 2014 में मुख्यमंत्री की कुरसी छोड़ कर वे दोबारा चुनाव मैदान में उतरे. 2015 में पूरे बहुमत से दिल्ली में सरकार बनाई. दोबारा मुख्यमंत्री बने.

जहां सारे नेता मुख्यमंत्री बनने के बाद सब से अधिक विभाग अपने पास रखते हैं वहां अरविंद केजरीवाल ने एक भी विभाग अपने पास नहीं रखा. पंजाब और गोआ विधानसभा चुनावों में अगर अरविंद केजरीवाल जीत हासिल कर लेते हैं तो वे राष्ट्रीय राजनीति में अपना दखल बढ़ा लेंगे.

अखिलेश की बेदाग छवि

उत्तर प्रदेश में 5 साल सरकार चलाने के बाद भी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की छवि साफसुथरी और बेदाग है. अखिलेश के पास संसद से ले कर विधानसभा तक का पर्याप्त अनुभव है. अखिलेश साल 2000 में पहली बार कन्नौज लोकसभा सीट से संसद सदस्य चुने गए. वे केंद्र सरकार की कई महत्त्वपूर्ण समितियों में सदस्य बने. 2004 और 2009 में वे दोबारा लोकसभा सदस्य चुने गए. इंजीनियरिंग से पढ़ाई कर चुके अखिलेश अपनी पत्नी डिंपल और बच्चों के साथ सुखद परिवारिक जीवन जी रहे हैं. समयसमय पर परिवार के साथ बिताए पलों की फोटो वे सोशल मीडिया पर पोस्ट करते रहते हैं.

2012 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अखिलेश यादव को अपना चेहरा बनाया. अखिलेश ने उस समय उत्तर प्रदेश में पार्टी का खूब प्रचार किया. प्रदेश के लोगों को अखिलेश पसंद आए. जनता ने अखिलेश पर भरोसा करबहुमत की सरकार दी. 15 मार्च, 2012 को अखिलेश सब से कम उम्र में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. 5 साल सरकार चलाने के दौरान अखिलेश ने अपने चुनावी वादों को पूरा किया. अपने काम पर भरोसा ही था, जिस के चलते अखिलेश ने परिवार के विवाद के बाद भी अलग रहते हुए चुनाव लड़ने का साहस दिखाया था. बहरहाल, जाहिरी तौर पर परिवार में अब एकजुटता है.

अलग छवि की पहचान है राहुल

अमेठी लोकसभा से 2004 में पहली बार सांसद चुने गए राहुल गांधी ने कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को बहाल करने की शुरुआत की तो पार्टी में उन का विरोध शुरू हुआ. अपनी धुन के पक्के राहुल गांधी ने विरोध को दरकिनार कर युवा नेताओं को तरजीह देने का काम जारी रखा. राहुल ने 2009 और 2014 में भी लोकसभा चुनाव जीता. 2009 के लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को बेहद मजबूत आधार दिया. कांग्रेस ने उम्मीद से उलट 22 लोकसभा सीटों पर कब्जा कर सभी को चौंका दिया था. विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी को वह सफलता नहीं मिली. राहुल गांधी ने यूथ कांग्रेस में संगठनात्मक बदलाव की पहल की. 2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रचार की शुरुआत राहुल गांधी ने ‘खाट सभा’ से की. इस को प्रदेश के लोगों ने पूरा समर्थन दिया. प्रदेश में सब से अधिक यात्रा करने वाले नेताओं में राहुल गांधी का नाम आता है. किसानों के पक्ष में उन की भट्ठा परसौल यात्रा बेहद सफल रही है.

तमाम विरोधों के बाद भी राहुल गांधी की पहल पर उत्तर प्रदेश में गठजोड़ बना जो भाजपा के लिए परेशानी का बड़ा सबब है. राहुल गांधी 2013 में कांग्रेस के उपाध्यक्ष बने. लोकसभा में भले ही कांग्रेस के सदस्य कम हों पर राहुल गांधी ने भाजपा के विरोध के सुर को कमजोर नहीं होने दिया. नोटबंदी के मौके पर जहां दूसरे नेता विरोध में स्वर उठाने में संकोच कर रहे थे वहीं राहुल गांधी ने संसद से ले कर सड़क तक अपनी आवाज को बुलंद कर भाजपा को घेरने का काम किया. भाजपा लोकसभा में नोट से जुडे़ मुद्दों पर जवाब देने से बचती रही. 

स्टार प्रचारक बनीं प्रियंका और डिंपल

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी की बहन प्रियंका गांधी वाड्रा और अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव स्टार प्रचारक होने के साथ ही साथ सहयोगी भी हैं. प्रियंका के प्रचार की बात करते ही भाजपा में खलबली मच गई. भाजपा के बडे़ नेता विनय कटियार तो यहां तक कह गए कि प्रियंका से सुदंर भाजपा नेता स्मृति ईरानी हैं. उन को देखनेसुनने के लिए ज्यादा भीड़ आती है. कांग्रेस और सपा के गठबंधन में अखिलेश और राहुल के अलावा प्रियंका व डिंपल का भी बड़ा अहम रोल रहा है. ऐसे में चुनावप्रचार अभियान और आगे की रणनीति में इन की भूमिका प्रभावी रहेगी. खुद प्रियंका और डिंपल के बीच मधुर संबंध हैं. इन दोनों का सौम्य व्यवहार जनता को भी पसंद आता है. कांग्रेस और सपा दोनों ही दलों में लंबे समय से प्रियंका और डिंपल को आगे करने का दबाव रहा है. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में इन की भूमिका अलग दिखेगी.

अखिलेश यादव की दोस्ती जितनी राहुल गांधी से है, उस से कहीं अधिक दोस्ती प्रियंका से है. अखिलेश की पत्नी और सांसद डिंपल यादव राहुल से अधिक उन की मां सोनिया गांधी के करीब हैं. संसद में सदन के दौरान सोनिया और डिंपल अकसर आपस में बात करती दिखती रही हैं. राहुल की बहन प्रियंका भी डिंपल के साथ मधुर रिश्ते रखती हैं. आपसी बातचीत में दोनों ही बहुत सहज रही हैं. उत्तर प्रदेश की राजनीति में डिंपल खामोशी से पति अखिलेश यादव के कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं तो बहन प्रियंका, अपने भाई राहुल गांधी के साथ खड़ी नजर आती हैं.

चुनावी जुमला साबित हुई मोदी की सीख

परिवारवाद पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीख चुनावी जुमला साबित हुई. नरेंद्र मोदी ने सांसदों से अपने करीबी रिश्तेदारों को चुनावी टिकट दिलाने की पैरवी करने से मना किया था. प्रधानमंत्री ने इस बहाने पार्टी में परिवारवाद को रोकने का दिखावा ही किया था. भाजपा ने केवल अपने ही दल के नेताओं और उन के परिवार वालों को ही टिकट नहीं दिया, बल्कि दलबदल करने वाले नेताओं के परिवार वालों को भी टिकट दिया. भाजपा चुनावी हमाम में दूसरे दलों से भी बदतर साबित हुई है. पार्टी जिस तरह सेअपने उसूलों और सिद्धांतों की दुहाई देती रही है वे इस चुनाव में तारतार नजर आ रहे हैं. लखनऊ में मलिहाबाद सीट से भाजपा से मोहनलालगंज लोकसभा सीट के सांसद कौशल किशोर की पत्नी जय देवी को टिकट दिया है. विधानसभा चुनाव में बसपा छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए स्वामी प्रसाद मौर्य को भाजपा ने पडरौना से और उन के पुत्र उत्कर्ष मौर्य को ऊंचाहार सीट से टिकट दिया है. उत्तराखंड में भी भाजपा ने यही किया है. कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में आए यशपाल आर्य के बेटे संजीव को नैनीताल से और विजय बहुगुणा के बेटे सौरभ को सितारगंज से टिकट दिया है. इसी तरह भाजपा ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज सिंह, कल्याण सिंह के पौत्र संदीप सिंह, प्रेमलता कटियार की बेटी नीलिमा कटियार, हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह, ब्रहमदत्त द्विवेदी के बेटे मेजर सुनील दत्त द्विवेदी, लालजी टंडन के बेटे आशुतोष टंडन और भुवनचंद्र खंडूरी की बेटी रितुयमकेश्वर को भी चुनावी मैदान में उतारा है.

अपने अपने लोकतंत्र

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप निहायत ही उद्दंड और विलासी व्यक्ति हैं, यह ज्यादा गौर करने लायक बात नहीं थी, इसलिए अमेरिकी वोटर ने उन्हें चुना. लेकिन चुनने के बाद उन की मनमानी पर नकेल कसने के लिए अमेरिकियों सड़कों पर आने से परहेज भी नहीं किया. झल्लाएबौखलाए ट्रंप को आखिरकार कहना ही पड़ा कि जब राष्ट्रपति नहीं बनाना था तो मुझे वोट ही क्यों दिया.

लोकतंत्र में वाकई जनता ही सर्वोपरि होती है बशर्ते वह अमेरिकियों जितनी शिक्षित और जागरूक हो, जो चुनने के बाद भी शासक को नियंत्रित रखने के गुर जानती है. अब होगा यह कि जब भी डोनाल्ड ट्रंप बेकाबू और बेलगाम होंगे तबतब उन्हें ऐसे ही विरोधप्रदर्शनों का सामना करना पड़ेगा और जनता उन्हें सधा व वैसा शासक बना कर रहेगी जैसा कि वह चाहती है.

 

हंगामा है क्यों बरपा

प्रियंका गांधी वाड्रा के विधानसभा चुनावप्रचार में आ जाने की खबर भर से भाजपा खेमे में कितनी बौखलाहट मची है, इस की मिसाल राज्यसभा सदस्य और उग्र हिंदूवादी नेता विनय कटियार के मुंह से निकली, यह तात्कालिक प्रतिक्रिया थी कि प्रियंका उतनी सुंदर हैं नहीं, जितना कि उन्हें प्रचारित किया जा रहा है. वे यह तो कह नहीं सकते थे कि प्रियंका उतना असर नतीजों पर डाल नहीं पाएंगी जितना कि आंका जा रहा है. भाजपा को डर इस बात का है कि भोलाभोला भारतीय जनमानस कहीं सचमुच इस सुंदर और आकर्षक महिला में इंदिरा गांधी न देखने लगे.

सच कुछ भी हो और नतीजे जो भी आएं लेकिन साफ दिख रहा है कि प्रियंका को सहज ढंग से भाजपा नहीं ले पा रही है. पौराणिकवादी सुंदर महिलाओं से शाश्वत ईर्ष्या रखते हैं, उन के संस्कार तो यही रहे हैं कि सुंदर महिला को अपने पाले में ले लो और ऐसा कर पाना मुमकिन न हो तो अंगभंग कर देने से भी परहेज नहीं करना चाहिए. अब इस मानसिकता का लोकतांत्रिक संस्करण कैसा होगा, यह देखना दिलचस्प बात होगी.

लेट मेजर

लेट-जीव,

अब लुप्त है, दूर है

गहरी, तीव्र पीड़ा

अश्रु बन बहे नयन

मेजर का तमगा

अस्थिर हुआ सफर में

छोड़ कुछ मझधार में

किसी प्रहार में

अंगरेजी के दो शब्द

और हो गई मैं स्तब्ध

एक गर्वित नौजवान

कर अपना जीवनदान

देश पर हुआ कुरबान

पुष्प और नारे

यही मोल हम ने निकाले

धधकते जज्बात के

रक्तभरे चुभते एहसास के

क्यों न उस के घर तक जाएं

बूढ़े मांबाप, बेबस बच्चे

उदास बेवा को ढांढ़स बंधाएं

पर, हम भी तो मजबूर हैं

जीवनकार्य में चूर हैं

बच्चों के नखरे, बुढ़ापे की चिंता

और बहुत से ख्वाब हैं

आजाद धरा में लेते सांस हैं

क्यों डरें हम जब

सरहद पे खड़ा एक जवान है

हर वीर पर हैं हम इठलाते

पर, शहीद हम को हैं भाते

दूर के मकान में

नाम की तख्ती पर अब तक

नहीं लिखा कि ‘लेट’ है

रंग गहरे दर्शाती जीवनस्लेट है

किस ने कहा अभी ‘लेट’ हैं…    

– अंशु अरोड़ा

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