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ऐंटरटेनमैंट एवं मीडिया के क्षेत्र में ब्राइट कैरियर

ग्लोब्लाइजेशन और लिब्रलाइजेशन के वर्तमान युग में ऐंटरटेनमैंट और मीडिया का जिस तेज रफ्तार से प्रसार होता जा रहा है, उसी तेजी से मानव जीवनशैली में भी परिवर्तन होता जा रहा है. सच पूछें तो मीडिया और ऐंटरटेनमैंट के क्षेत्र में अद्भुत तरक्की के कारण तकनीक से ले कर लाइफस्टाइल और फूड से ले कर कल्चर तक सभी अविश्वसनीय परिवर्तनों के दौर से गुजर रहे हैं. इन सभी परिवर्तनों के कारण रोजगार के नए अवसर भी बड़े पैमाने पर उपलब्ध हो रहे हैं. आइए, देखते हैं कि 21वीं सदी के इनफौर्मेशन टैक्नोलौजी के युग में मीडिया और ऐंटरटेनमैंट के क्षेत्र में जौब्स और कैरियर के महत्त्वपूर्ण विकल्प क्या हैं :

ग्राफिक डिजाइनिंग में कैरियर

ग्राफिक डिजाइनर का मुख्य काम कम्युनिकेशन को विजुअल रूप देना होता है. इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए ग्राफिक डिजाइनर में क्रिएटिविटी और कल्पनाशक्ति का होना जरूरी होता है. न्यूजपेपर्स, पत्रिकाएं, वैब पेपर्स के अतिरिक्त सभी प्रकार के इलैक्ट्रौनिक और प्रिंट मीडिया में आप जिस ग्राफिक और इमेज कौंबिनेशन को देखते हैं वे सभी उन में कार्य करने वाले ग्राफिक डिजाइनर्स के क्रिएशन होते हैं. ऐडवरटाइजिंग एजेंसीज से ले कर टैलीविजन इंडस्ट्री तक में ग्राफिक डिजाइनर की डिमांड बडे़ पैमाने पर होती है और यही कारण है कि हाल के वर्षों में ग्राफिक डिजाइनर के लिए जौब के अवसर काफी बढ़ रहे हैं.

कोर्स कहां से करें

ग्लोबल मार्केट के मौडर्न युग में ग्राफिक डिजाइनिंग का कोर्स एक फैशनेबल कोर्स माना जाता है. ग्राफिक डिजाइनिंग का कोर्स प्लस टू के बाद किया जा सकता है. वैसे इस क्षेत्र में कैरियर में काफी अधिक सक्सैस के लिए ग्रैजुएट और पोस्टग्रैजुएट डिग्री के साथ डिप्लोमा एवं पीजी डिप्लोमा भी किया जा सकता है.

ग्राफिक डिजाइनिंग के मुख्य कोर्स हैं

–       फाइन आर्ट्स ऐंड ग्राफिक डिजाइनिंग में बैचलर डिग्री.

–       पोस्टग्रैजुएट डिप्लोमा इन डिजाइन, विजुअल कम्युनिकेशन डिजाइन प्रोग्राम.

–       ग्रैजुएट डिप्लोमा इन डिजाइन.

–       पोस्टग्रैजुएट डिप्लोमा इन ऐडवरटाइजिंग ऐंड विजुअल कम्युनिकेशन कोर्स.

–       पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा इन एप्लाइड आर्ट्स ऐंड डिजिटल आर्ट्स.

–       पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा इन प्रिंटिंग ऐंड मीडिया इंजीनियरिंग.

–       डिप्लोमा इन विजुअल कम्युनिकेशन.

ग्राफिक डिजाइनिंग कोर्स के प्रमुख संस्थान

ग्राफिक डिजाइनिंग के लिए उपरोक्त कोर्सेज के लिए कईर् प्रसिद्ध संस्थान देश में कार्य कर रहे हैं, जिन में कुछ प्रमुख हैं :

सृष्टि स्कूल औफ आर्ट, डिजाइन ऐंड टैक्नोलौजी, बेंगलुरु, नैशनल इंस्टिट्यूट औफ डिजाइन, अहमदाबाद, इंडस्ट्रियल डिजाइन सैंटर, आईआईटी मुंबई, आईआईटी कानपुर, आईआईटी गुवाहाटी. डिपार्टमैंट औफ डिजाइन, महाराष्ट, इंस्टिट्यूट औफ टैक्नोलौजी, पुणे.

ग्राफिक डिजाइनर के लिए जौब्स के अवसर कहां उपलब्ध हैं

वर्तमान इनफौर्मेशन टैक्नोलौजी युग में मीडिया का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो जहां कि ग्राफिक डिजाइनर के लिए अवसर मौजूद न हों. ग्राफिक डिजाइनर के लिए प्रिंट मीडिया एवं विजुअल मीडिया में रोजगार के बेशुमार अवसर उपलब्ध हैं. ग्राफिक डिजाइनिंग में डिग्री और डिप्लोमा के साथ कैंडिडेट क्रिएटिव डायरैक्टर, आर्ट डायरैक्टर, लोगो डिजाइनर, लेआउट आर्टिस्ट, ब्रैंड आइडैंटिटी डिजाइनर, फ्लैश डिजाइनर, मल्टीमीडिया डिजाइनर और अन्य संबंधित क्षेत्रों में भी लुक्रेटिव पोस्ट्स के रूप में जौब्स पा सकता है.

एनीमेशन में कैरियर की अपार संभावनाएं

आप ने बच्चों को कार्टून चैनल्स पर डोरेमोन, मिक्की माउस, डोनाल्ड डक, छोटा भीम, मोटूपतलू और न जाने कितने कार्टून्स से चिपके देखा होगा. इन कार्टून्स का जादू इतना होता है कि सिर्फ बच्चे ही नहीं बल्कि बड़े भी इन के दीवाने होते हैं. इन सभी कार्टून्स के करैक्टर्स के रूप में डोरेमोन, सिंचन आदि तो घरेलू नाम जैसे ही लोकप्रिय हो गए हैं. कार्टून्स बनाने की इस प्रक्रिया में विभिन्न करैक्टर्स में आवाज और मूवमैंट के माध्यम से टैलीविजन के परदे पर जीवित करने की कला ही एनीमेशन की कला कहलाती है. जाहिर है कि कार्टून्स के निर्माण से ले कर करैक्टर्स को जीवित रूप में प्रैजेंट करने के लिए एनीमेटर में अव्वल दर्जे की क्रिएटिविटी का होना एक अनिवार्य शर्त है. कल्पनाशीलता का गुण एनीमेशन के क्षेत्र में सफलता के लिए दूसरा महत्त्वपूर्ण गुण है.

जिस तरह से पूरी दुनिया टैक्नोलौजी ऐडवांसमैंट की दिशा में आगे बढ़ रही है उसी रफ्तार से एनीमेशन की दुनिया में भी चौंकाने वाले परिवर्तन हो रहे हैं. इनफौर्मेशन टैक्नोलौजी के फास्ट डैवलपमैंट के कारण एनीमेशन और ऐडवरटाइजिंग इंडस्ट्रीज में जिस प्रकार से तेजी से विकास हो रहा है उसी तेजी से इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं.

आवश्यक ऐजुकेशनल क्वालिफिकेशंस

एनीमेशन में प्रोफैशनल कोर्स की शुरुआत 12वीं के बाद हो जाती है. एनीमेशन में कोर्स कर लेने के बाद इस क्षेत्र में जौब्स के अवसरों की कोई कमी नहीं है. 

महत्त्वपूर्ण कोर्सेज

इस क्षेत्र में निम्नांकित कोर्स काफी फेमस हैं :

बीए (औनर्स) इन 3 डायमैंशन एनीमेशन, एनीमेशन ऐंड ग्राफिक डिजाइन में बीए, एनीमेशन में बीएससी, एनीमेशन और गेम टैक्नोलौजी में बीएससी, एनीमेशन ऐंड मल्टीमीडिया में बीएससी, ऐडवांस डिप्लोमा इन 3 डायमैंशन एनीमेशन, ऐडवांस डिप्लोमा इन एनीमेशन ऐंड विजुअल इफैक्ट्स, ऐडवांस डिप्लोमा इन एनीमेशन इंजीनियरिंग, एनीमेशन ऐंड मल्टीमीडिया में एमएससी, 3 डायमैंशन एनीमेशन में एमएससी, 3 डायमैंशन एनीमेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन, 3 डायमैंशन कम्युनिकेशन में पोस्टग्रैजुएट डिप्लोमा.

प्रमुख संस्थान

एनीमेशन के कोर्स के लिए प्रमुख संस्थान हैं :

ग्लोबल इंस्टिट्यूट औफ गेमिंग ऐंड एनीमेशन, चेन्नई, अकादमी औफ डिजिटल आर्ट्स, नई दिल्ली, प्राण मीडिया इंस्टिट्यूट, नईर् दिल्ली, माया अकादमी औफ ऐडवांस्ड सिनेमाटिक्स, मुंबई, नैशनल इंस्टिट्यूट औफ डिजाइन, अहमदाबाद, इंडस्ट्रियल डिजाइन सैंटर, आईआईटी मुंबई, इंस्टिट्यूट औफ कम्युनिकेशन ऐंड मीडिया टैक्नोलौजी, कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी.

रोजगार के अवसर

एनीमेशन की डिग्री होल्डर्स के लिए अवसरों की कोई कमी नहीं है. टैलीविजन चैनल्स के साथसाथ गेमिंग इंडस्ट्री में एनीमेशन में डिग्री और डिप्लोमा होल्डर्स के लिए रोजगार के अनगिनत अवसर खुले हुए हैं. इस के अतिरिक्त एनीमेशन के डिग्री होल्डर्स ऐडवरटाइजिंग एजेंसीज के साथसाथ वैब कंपनियों के लिए भी काम करते हैं.

ब्रौडकास्टिंग इंजीनियरिंग

मीडिया और ऐंटरटेनमैंट वर्ल्ड के लिए ब्रौडकास्टिंग और टैलीकास्टिंग सैग्मैंट्स फाउंडेशन स्टोन का काम करती हैं. इस की अनुपस्थिति में हम टैलीविजन के सैकड़ों चैनल्स पर किसी भी प्रोग्राम की कल्पना नहीं कर सकते, क्योंकि ब्रौडकास्टिंग इंजीनियर ही टैलीविजन और रेडियो के कार्यक्रमों को लाखोंकरोड़ों लोगों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं. ऐंटरटेनमैंट और न्यूज चैनल्स में प्रतिदिन जिस तेजी से वृद्धि हो रही है और एफएम रेडियो की लोकप्रियता भी बढ़ती जा रही है, तो ऐसी स्थिति में एक ब्रौडकास्टिंग इंजीनियर के कैरियर प्रोस्पैक्ट में भी काफी वृद्धि हुई है.

ब्रौडकास्टिंग इंजीनियर के रूप में अपना कैरियर निर्माण के लिए हमें कुछ महत्त्वपूर्ण बातें जाननी जरूरी हैं :

किस कोर्स की जरूरत होती है

पहली महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि ब्रौडकास्टिंग इंजीनियरिंग स्ट्रीम वास्तव में इंजीनियरिंग की कोई स्पैशल स्ट्रीम नहीं है. यह इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की ही एक सबडिवीजन है. ब्रौडकास्टिंग इंजीनियर में कैरियर के लिए किसी स्टूडैंट को मैथमैटिक्स और फिजिक्स सब्जैक्ट्स के साथ ‘प्लस टू’ पास होना जरूरी होता है. इस के साथ ही इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग या ब्रौडकास्ट टैक्नोलौजी में ग्रैजुएशन की डिग्री भी अनिवार्र्य होती है.

इस के अतिरिक्त ब्रौडकास्ट इंजीनियरिंग के कैरियर में इच्छुक कैंडिडेट के लिए इलैक्ट्रौनिक्स ऐंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग, कंप्यूटर इंजीनियरिंग, इनफौर्मैशन टैक्नोलौजी एवं औडियो इंजीनियरिंग में 4 साल के बैचलर कोर्र्स भी काफी महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं. वैसे ब्रौडकास्ट इंजीनियरिंग के अंतर्गत कुछ और महत्त्वपूर्ण डिग्री कोर्स हैं, इलैक्ट्रौनिक्स, टैलीकम्युनिकेशन, ब्रौडकास्ट टैक्नोलौजी, कंप्यूटर इनफौर्मैशन टैक्नोलौजी में बीई या बीटैक. इस के अतिरिक्त इंजीनियरिंग के क्षेत्र से हट कर भी कुछ अन्य कोर्स हैं जिन के माध्यम से ब्रौडकास्ट इंजीनियरिंग के कैरियर में प्रवेश पाया जा सकता है. ये कोर्स निम्न हैं :

कंपेरिंग, डबिंग एवं ब्रौडकास्टिंग में सर्टिफिकेट कोर्स. वैसे ब्रौडकास्ट मीडिया में डिप्लोमा भी किया जा सकता है. ब्रौडकास्ट जर्नलिज्म या प्रिंट ब्रौडकास्ट एवं औनलाइन मीडिया जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा कोर्स के माध्यम से ब्रौडकास्टिंग इंजीनियरिंग में कैरियर बनाया जा सकता है.                       

अभिभावकों के लिए शुजीत की शॉर्ट फिल्म

विक्की डोनर, मद्रास कैफे और पीकू जैसी हिट फिल्म बनाने वाले डायरेक्टर शुजीत सिरकार अपनी एक शॉर्ट फिल्म के साथ दर्शकों के सामने आए हैं. ये फिल्म उन बच्चों के बारे में हैं जो बोर्ड परीक्षा दे रहे हैं या उनके ऊपर उनके माता-पिता और टीचर्स का दबाव तरुरत से ज्यादा होता है इग्जैम को लेकर. शुजीत का कहना हैं, कि सभी माता-पिता को ‘रिलीज द प्रेशर’ जरूर देखना चाहिए, अपने बच्चों के लिए यह फिल्म देखना बहुत जरूरी है.

शुजीत सिरकार की इस शॉर्ट फिल्म में उन बच्चों के दुख के बारे में बताया है, जिनके माता-पिता उन पर परीक्षा का दबाव कुछ ज्यादा डाल रहे हैं. और अभिभावकों को उनके बच्चों की परिस्थिति से अवगत कराया गया है.

जब इन बल्लेबाजों का कैच छोड़ना पड़ा महंगा

क्रिकेट में कहा जाता है कैचेज विन मैचेज (catches win matches). यानी मैच जीतने के लिए कैच पकड़ना बेहद जरुरी है. अकसर ही देखा गया है कि कभी कभी ड्रॉप्ड कैच टीम को इतना मंहगा पड़ जाता है कि मैच का नतीजा ही बदल जाता है. लगभग सभी बल्लेबाज अपनी लंबी पारी में कभी न कभी कैच के मौके देते ही हैं. आइए एक नजर डालते हैं कैच छूटने से किस खिलाड़ी या टीम को हुआ फायदा और किसे हुआ नुकसान.

इंजमाम-उल-हक

अब तक का सबस मंहगा कैच पाकिस्तान के इंजमाम-उल-हक का रहा है. लाहौर में 2002 में न्यूजीलैंड के खिलाफ इंजमाम ने 329 रन बनाए थे लेकिन जब वह 32 के स्कोर पर थे, उनका कैच छूट गया था. मतलब इंजमाम का ये कैच न्यूजीलैंड को 297 रनों की चपत लगा गया.

महेला जयवर्धने

इस मामले में महेला जयवर्धने का रिकॉर्ड कमाल का है. उन्होंने 2006 में कोलंबो टेस्ट में साउथ अफ्रीका के खिलाफ 374 रन बनाए थे लेकिन कैच का एक भी मौका नहीं दिया.

मार्क टेलर

वैसे इतिहास में और भी मंहगे कैच साबित हुए हैं. 1998 में पेशावर टेस्ट में सईद अनवर ने मार्क टेलर (नाबाद 334) का 18 रन पर कैच छोड़ा था.

सचिन तेंदुलकर

ड्रॉप्ड कैच के मामले में भारत के सचिन तेंदुलकर की भी किस्मत अच्छी रही. 2004 में ढाका में सचिन ने अपना सर्वाधिक स्कोर 248 बनाया था लेकिन उनका भी शून्य पर कैच छोड़ा गया था.

ब्रेन लारा

लारा ने 2004 में इंग्लैंड के खिलाफ नबादा 400 रन बनाए थे और इस दौरान उन्होंने कैच के मौके लगभग न के बराबर दिए थे.

कुमार संगकारा

ड्रॉप्ड कैच के मामले में श्रीलंका के कुमार संगकारा सबसे किस्मतवाले रहे हैं. 2004 में बुलावायो टेस्ट में संगकारा ने 270 रन बनाए थे लेकिन जब उन्होंने खाता भी नहीं खोला था तब उनका कैच ड्रॉप हुआ था.

ग्राहम गूच

1990 में भारत के विकेट कीपर किरण मोरे ने लॉर्ड्स टेस्ट में ग्राहम गूच का 36 के स्कोर पर कैच छोड़ा था. इसके बाद गूच ने 333 की पारी खेली.

4 बल्लेबाज ऐसे भी हैं जिन्हें एक पारी में 5 बार मिला जीवनदान

2004 में जिंबाब्वे के एंडी ब्लिगनॉट (नाबाद 84) भारत के खिलाफ पांच बार जीवन दान मिला था. तीन कैच तो उनके लगातार छूटे थे और बदकिस्मत बॉलर थे जहीर खान. इसके अलावा हाशिम अमला (253, नागपुर, 2010), तौफीक उमर (135, सेंट किट्स, 2011) और केन विलियम्सन (नाबाद 242, वेलिंगटन, 2014) पर भी फील्डर मेहरबान रहे हैं. वीरेंद्र सहवाग के सबसे ज्यादा 68 कैच छोड़े गए हैं.

जब पाकिस्तान से पिछड़ गया भारत…

देश में बड़े-बड़े पदों पर बैठे नेता और नौकरशाह ये दावा करते आए हैं कि देश की आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर हो गई है. पर विश्वस्तर के सूचकांक तो कुछ और ही बयां कर रहे हैं. देश के कुछ आर्थिक विशेषज्ञ इस तरह की रैंकिंग को निराधार मानते हैं. पर सच्चाई यही है कि विश्वस्तरीय रैकिंग में भारत का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा है. हाल ही में एक और सूचकांक में तो भारत पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से भी पिछड़ गया है.

आर्थिक स्वतंत्रता के एक वार्षिक सूचकांक में भारत का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है और यह 143 के स्थान पर रहा है. एक अमेरिकी शोध संस्थान ‘द हेरिटेज फाउंडेशन’ की ‘इंडेक्स ऑफ इकनॉमिक फ्रीडम’ में भारत की रैकिंग पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान समेत कई दक्षिण एशियाई देशों से पीछे है. इसका प्रमुख कारण भारत में बाजार को ध्यान में रखकर किए गए आर्थिक सुधारों से होने वाली प्रगति का ‘असमान’ होना बताया गया है.

इस कंजरवेटिव राजनीतिक विचारधारा के शोध समूह की रपट में भारत को ‘अधिकांशतया गैर-खुली’ अर्थव्यवस्था की श्रेणी में रखा गया है क्योंकि भारत में बाजार आधारित सुधारों से हुई प्रगति ‘असमान’ रही है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि राज्य ने लोक उपक्रमों के माध्यम से कई क्षेत्रों में ‘अपनी एक व्यापक उपस्थिति बनाए रखी है’. इसके अलावा प्रतिबंधात्मक और भारी-भरकम नियामकीय वातावरण से उद्यमिता हतोत्साहित होती है. पिछले साल इस सूचकांक में भारत की रैंकिंग 123 थी.

इस सूचकांक में हांगकांग, सिंगापुर और न्यूजीलैंड शीर्ष पर रहे हैं. दक्षिण एशियाई देशों में भारत से नीचे अफगानिस्तान 163 और मालदीव 157वें स्थान पर हैं, जबकि इस सूचकांक में नेपाल का स्थान 125, श्रीलंका का 112, पाकिस्तान का 141, भूटान का 107 और बांग्लादेश का 128 है.

क्या है आर्थिक स्वतंत्रता सूचकांक ?

आर्थिक स्वतंत्रता सूचकांक या ‘इंडेक्स ऑफ इकनॉमिक फ्रीडम’ द हैरिटेज फाउंडेशन और द वॉल स्ट्रीट जर्नल द्वारा जारी किया गया एक सूचकांक है. इस सूचकांक में विश्व के विभिन्न देशों को आर्थिक स्वतंत्रता के आधार पर सुचिबद्ध किया जाता है. 1995 में इस इंडेक्स को पहली बार जारी किया गया था. 

मैं एक युवक से प्यार करती हूं. वह अकसर मुझ से सैक्स की मांग करता है. मैं क्या करूं.

सवाल

मैं 22 वर्षीय युवती हूं. पिछले एक वर्ष से एक युवक से प्यार करती हूं. वह भी मुझे काफी प्यार करता है. हम अकसर कौफी हाउस, रैस्टोरैंट वगैरा में भी साथ समय बिताते हैं. वह अकसर मुझ से सैक्स की मांग करता है, लेकिन मैं मना कर देती हूं. साथ ही जब भी मैं शादी की बात करती हूं तो वह टाल जाता है, जबकि वह अपने पैरों  पर भी खड़ा है. मैं भी जौब कर रही हूं. इधर मेरे लिए रिश्ते भी आ रहे हैं. मैं क्या करूं?

जवाब

आप जिस युवक से प्यार करती हैं उसे समझने की कोशिश करें. आखिर क्या कारण है कि वह आप से सैक्स की इच्छा तो रखता है पर शादी टाल रहा है. उस से कहें कि मेरे लिए रिश्ते आ रहे हैं. अगर वह सीरियस होगा तो अपने घर बात कर आप के पेरैंट्स के पास अपने पेरैंट्स को भेजेगा वरना समझ लीजिए कि वह टाइम पास कर रहा है.

भूल कर भी उस से सैक्स संबंध न बनाएं. जब वह संबंध बनाने की इच्छा जाहिर करे तो कहें कि पहले शादी कर ले सैक्स तो शादी के बाद ही सही रहता है. इस पर यदि वह नाराज हो तो परवा न करें वरना खुद के पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार बैठेंगी.

 

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आईपीएल से जुड़े इन 10 रोचक तथ्यों के बारे में नहीं जानते होंगे आप

आईपीएल 2017 का मुकाबला कुछ दिनों में शुरू ही होने वाला है. फटाफट क्रिकेट के इस फार्मेट में कौनसी टीम किस पर भारी पड़ जाए कहा नहीं जा सकता है. आईपीएल में अब हुए मुकाबले काफी रोमांचक हुए हैं. तो आइए जानते हैं उन रोचक तथ्य और रिकॉर्ड्स के बारे में.

1. चेन्नई सुपर किंग्स ही एकमात्र ऐसी टीम रही है जिसने अपना कप्तान नहीं बदला. धोनी शुरु से ही चेन्नई के कप्तान रहे हैं. चेन्नई पर दो साल का प्रतिबंध लगने के बाद धोनी अब नयी टीम राइजिंग पुणे सुपरजाइंट्स के कप्तान हैं.

2. हरभजन सिंह सबसे ज्यादा बार जीरो पर आउट हुए हैं. वह 12 बार बिना खाता खोले पवैलियन लौटे हैं.

3. चेन्नई सुपर किंग्स आईपीएल के सात सीजन में सबसे ज्यादा बार फाइनल में हारने वाली टीम है. वह 2008, 2012 और 2013 में फाइनल में पहुंची थी लेकिन हार गई.

4. यूसुफ पठान तीन बार विजेता टीम के सदस्य रहे हैं. वह 2008 की चैंपियन राजस्थान रॉयल्स, और फिर 2012 और 2014 की चैंपियन कोलकता नाइट राइडर्स के सदस्य रहे हैं.

5. आईपीएल 2014 के मैच में अंपायर ने जब कीरन पोलार्ड को शांत रहने की सलाह दी तो वे मुंह पर टेप बांधकर आ गए थे.

6. डेहली डेयरडेविल्स अंक तालिका में तीन बार सबसे नीचे रही है. वह 2011, 2013 और 2014 में सभी टीमों से पिछड़ गई थी.

7. आईपीएल-9 में एक मैच में धोनी रन लेना चाहते थे, लेकिन ब्रावो ने अच्छी फील्डिंग करके उन्हें रन लेने से रोक दिया. इसके बाद दोनों खिलाड़ी क्रीज पर पहुंचे, कुछ बात की और हंसते हुए अपनी जगह पर चले गए.

8. आईपीएल-8 में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु और दिल्ली डेयरडेविल्स के बीच मैच बारिश के कारण रुका गया था. तभी मजाक में क्रिस गेल बैट लेकर युवराज सिंह को मारने दौड़े थे.

9. आईपीएल-2 में चेन्नई सुपर किंग्स और मुंबई इंडियंस के बीच हुए मैच में एक कुत्ता मैदान पर आया गया था.

10. आईपीएल-8 में प्रैक्टिस के दौरान ही फील्ड पर युवराज सिंह ने सचिन तेंडुलकर के पैर पकड़ लिए थे.

ये ऐप्स रखेंगे आपके ऐंड्रॉयड फोन को सुरक्षित

आज कल हमारा स्मार्ट फोन हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुका है. हमारे ऐंड्रॉयड फोन्स से हमारा जीवन अब डिजिटल जीवन बन चुका है. अब ऐसे में अपने फोन के व्यक्तिगत डेटा को सुरक्षित रखना बहुत जरुरी हो गया है.

ऐंड्रॉयड सिस्टम्स के कुछ वर्जन्स में से तो पहले से ही ऐप्लीकेशन लॉकर मौजूद रहते हैं, जो आपके डेटा को सुरक्षित बनाते हैं. और अगर आपके फोन में ऐसी ऐप्स मौजूद नहीं है तो मैं आज हम आपको कुछ बेहतरीन ऐप्लीकेशन लॉकर के बारे में जानकारी देंगे जिनका उपयोग करके आप अपने फोन के प्राइवेट डाटा को दूसरों की अपेक्षा अधिक सुरक्षित रख सकते हैं.

1. CM Security App Lock Antivirus: ऐंड्रॉयड फोन के लिए इसे बेस्ट ऐप लॉकर भी कहा जाता है. यह ऐप न सिर्फ आपके फोन के ऐप्लीकेशन्स को लॉक करती है बल्कि एक ऐंटीवायरस के रूप में भी काम करती है. अगर आप एक साथ ऐप लॉकर और ऐंटीवायरस ऐप दोनों एक ही ऐप में चाहते हैं तो आपके पास इससे बेहतर कोई आप्शन नहीं होगा. इस ऐप की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि ये ऐप ऐंड्रॉयड फोन के प्ले स्टोर पर 4.7 स्टार के साथ सबसे ज्यादा रेटेड ऐप है.

2. LEO Privacy Guard: अगर आप ऐंड्रॉयड फोन का इस्तेमाल करते हैं तो ये ऐप वास्तव में आपके लिए ही है. इस ऐप के जरिए आप, अपने फोन के ऐप्स, फोटोज और विडियोज इत्यादि को लॉक कर सकते हैं. इस ऐप का एक अच्छा फीचर ये भी है कि इसका उपयोग करके आप अपने खोये हुए मोबाइल को भी ट्रैक कर सकते हैं. इस ऐप को फोन में डाउनलोड करने के बाद अगर आपके द्वारा लॉक किये गए डेटा को कोई खोलना चाहेगा और ऐसा करने के प्रयास में जब वो इसमें दो या दो से से अधिक बार गलत पासवर्ड डालेगा तो ये ऐप उस व्यक्ति की फोटो खींचकर सुरक्षित कर लेगा और आप जब इस ऐप्लीकेशन को खोलेंगे तो देखकर उस आदमी के बारे में जानकारी प्राप्त कर पाऐंगे. लियो प्राइवेसी गार्ड नाम को ये ऐप साइज में बहुत छोटा है इसीलिए ये आपके ऐंड्रॉयड फोन की स्पीड पर कोई प्रभाव नहीं डालता.

3. Hotspot Shield Privacy App Lock: हॉटस्पॉट शील्ड प्राइवेसी ऐप लॉक का साइज बाकी ऐप्स की अपेक्षा थोडा सा ज्यादा होता है, पर अपने बेहतरीन गुणों की वजह से लिए ये अच्छा माना गया है. इस ऐप में भी ढेर सारे आप्शन उपलब्ध होता हैं जिनके द्वारा आप अपने ऐंड्रॉयड फोन को सुरक्षित रखते हैं.

4. FingurePrint AppLock: ये ऐप भी अच्छी ऐप्स में से एक है. फिंगरप्रिंट ऐप लॉक अपने बेहतरीन गुणों के ऐंड्रॉयड लिए जानी जाती है. ये ऐप भी साइज में छोटी है और बिना किसी ऐड्स के आपके फोन को सुरक्षित रखने में मदद करती है. इस ऐप का बेहतरीन फीचर यही है कि आपके बिना आपका फोन कोई और खोल ही नहीं सकेगा क्योंकि आपके फिंगरप्रिंट्स इसे खोलने के लिए जरुरी होंगे.

5. App Lock: ऐप लॉक एक अच्छा फोन प्रोटेक्टर ऐप है. अपने मोबाइल को बिलकुल सुरक्षित रखने के लिए और किसी अन्य आदमी से अपने डेटा को बचाने के लिए, ये ऐप आपके फोन में एक साथ सारे ऐप्लीकेशन को लॉक कर देता है. इस ऐप की मदद से आप जैसे चाहें और जब चाहें अपने फोन के ऐप्लीकेशन्स को इस्तेमाल में ले सकते हैं.

विधानसभा चुनाव में भी मोदी नाम

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भाजपा के चुनाव प्रचार देखकर ऐसा लगता है जैसे यह लोकसभा के चुनाव हों. भाजपा पूरी तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मांग रही है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस तरह से अपने भाषण दे रहे हैं जैसे वह खुद मुख्यमंत्री पद के दावेदार हों. भाजपा के स्टार प्रचारकों के नामों वाली सूची में वैसे तो बहुत सारे नाम हैं पर सबसे अहम नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का है. इनके प्रभाव के सामने उत्तर प्रदेश के भाजपा नेता फकत तमाशाई नजर आ रहे हैं. विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के बढ़ते महत्व ने प्रदेश स्तर के नेताओं को हाशिये पर ढकेल दिया है.

खुद प्रधानमंत्री मोदी भी अपने बयानों से यही जाहिर कर रहे हैं कि विधानसभा चुनावों के बाद उत्तर प्रदेश के विकास की जिम्मेदारी उनकी अपनी है. राजधानी लखनऊ से लगे बाराबंकी जिले में चुनाव प्रचार करते प्रधानमंत्री मोदी ने कहा ‘मैं उत्तर प्रदेश का गोद लिया बेटा हूं. यह गोद लिया बेटा मां बाप को छोड़ेगा नहीं. जो खुद का बेटा नहीं कर पाया वह गोद लिया बेटा कर दिखायेगा.’ प्रधानमंत्री के बयान से साफ है कि उत्तर प्रदेश में जो भी नेता मुख्यमंत्री बनेगा वह नाम का होगा. असल राज नरेन्द्र मोदी ही करेंगे.

विरोधी नेता प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी के बयान को अपने अंदाज में पेश कर रहे हैं. बसपा नेता मायावती कहती हैं ‘गोद लिया बेटा बताना मोदी का नाटक है. लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश ने सबसे अधिक सीटें भाजपा को दी थी. लोकसभा चुनावों के बाद उत्तर प्रदेश को क्या मिला? मोदी ने लोकसभा चुनाव में किया अपना कौन सा वादा निभाया? यह उत्तर प्रदेश की जनता देख रही है. लोकसभा चुनाव की ही तरह मोदी विधानसभा चुनाव में भी वादा कर रहे हैं. प्रदेश के लोग अब इस झांसे में आने वाले नहीं है.’

सपा नेता और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मोदी के बयानों का जवाब देते कहा कि मोदी जी केवल अचछा बोलते हैं. अच्छे दिन लाने का वादा करके लोकसभा में वोट हासिल किया और फिर अच्छे दिन के नाम पर लोगों को लाइन में लगाने का काम किया. विधानसभा चुनाव में लोकसभा वाला झांसा नहीं चलेगा. यह चालू पार्टी के लोग हैं झूठ बोल कर वोट लेने में महिर हैं. अब इनकी पोल खुल चुकी है.

राजनीतिक समीक्षक योगेश श्रीवास्तव कहते हैं ‘विधानसभा चुनाव में इसके पहले किसी प्रधानमंत्री ने इतना अधिक व्यापक प्रचार नहीं किया है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि भाजपा ने विधानसभा चुनावों में किसी नेता को अपना चुनावी चेहरा नहीं बनाया. अब विधानसभा चुनावों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी मोदी-शाह की जोड़ी पर है. उत्तर प्रदेश का न होने के बाद भी दोनों ही नेता उत्तर प्रदेश की बोली में भाषण कर जनता का दिल जीतने की कोशिश में रहते हैं. कांग्रेस-सपा गठबंधन पर ही उनका सबसे बड़ा हमला हो रहा है. बसपा पर भाजपा के यह नेता सीधे हमले से बच रहे है. इससे यह लगता है कि चुनाव के बाद के लिये भाजपा बसपा के साथ तालमेल का रास्ता खुला रखना चाहती है. बसपा इस बात से बचना चाहती है इसीलिये प्रधानमंत्री के बयान की पहली आलोचना मायावती की तरफ से आती है. बसपा को यह डर है कि भाजपा के साथ पुराने रिश्तो के चलते मुसलिम मतदाता बसपा से दूरी न बना ले.’     

              

‘नोटा’ के प्रचार में लखनऊ के कारोबारी

अगर आपको अपने चुनाव क्षेत्र का कोई प्रत्याशी पसंद नहीं है, तो आप ‘नोटा’ का बटन दबा सकते हैं. चुनाव सुधार के तहत वोटर को यह अधिकार मिल गया है. यह बात अलग है कि वोटर के इस अधिकार का कोई प्रचार नहीं कर रहा है. राजनीतिक दल और चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी तो इसका प्रचार कर ही नहीं सकते. चुनाव आयोग भी इसका व्यापक ढंग से प्रचार नहीं कर रहा है. यही कारण है कि जिन लोगों को चुनाव से कोई लाभ नहीं दिख रहा वह वोट डालने घर से नहीं निकल रहे. चुनाव आयोग द्वारा वोट डालने के प्रचार में लाखों करोडों खर्च करने के बाद भी शतप्रतिशत मतदान दूर की कौडी है. चुनाव सुधारों के लिये काम कर रहे लोकतांत्रिक मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष प्रताप चन्द्रा कहते हैं ‘चुनाव आयोग को नोटा का प्रचार करना चाहिये. जिससे राजनीतिक दलों से नाराज लोग वोट देने के अपने विकल्प को जान सके.’

चुनाव आयोग भले ही नोटा का प्रचार न कर रहा हो, पर लखनऊ में कुछ कारोबारी ‘नोटा’ के प्रचार के लिये पूरे शहर में होर्डिंग लगा रहे हैं. यह कारोबारी ज्यादातर लखनऊ के अमीनाबाद बाजार के रहने वाले हैं. कारोबारियों को शिकायत है कि चुनाव के समय सभी दल इस बात के लिये तैयार हो जाते हैं कि चुनाव के बाद अमीनाबाद बाजार में सुधार करेंगे. चुनाव जीतने के बाद कोई इस दिशा में काम नहीं करता है. इससे परेशान कारोबारी अब चुनाव में ‘नोटा’ का प्रचार कर रहे हैं. यह लोग अपने स्तर से भी प्रचार कर रहे हैं और होर्डिंग लगाकर पूरे शहर को भी जागरुक कर रहे हैं.

चुनाव का बहिष्कार पहले भी बहुत सारे चुनाव क्षेत्रों में होता रहा है. ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में इस तरह के कदम लोग गुस्से में आकर उठाते रहे हैं. कई जगहों में वोट मांगने वालों को वापस जाने को कहा जाता है. बैनर पोस्टर लगाने से खबरे छप जाती हैं तो प्रशासन कुछ इस क्षेत्र का ख्याल रख लेता है. प्रदेश की राजधानी के अंदर पहली बार इस तरह का प्रचार ‘नोटा’ को लेकर किया जा रहा है. चुनाव आयोग के मुताबिक अगर किसी क्षेत्र में 50 फीसदी वोटर ‘नोटा’ का बटन दबा देंगे तो इलाके का चुनाव रद्द हो जायेगा.

प्रताप चन्द्रा कहते हैं ‘अगर जनता को लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया से जोडे रखना है तो कई सुधार करने की जरूरत है. नोटबंदी का असर चुनाव पर नहीं दिख रहा है. सभी दल पहले की ही तरह जोरशोर से खर्च कर रहे हैं. इससे यह बात साफ हो गई कि नोटबंदी की पाबंदी केवल जनता के लिये थी, राजनीतिक दलों पर इसका असर नहीं पडा. आज भी चुनाव जीतना गरीब आदमी के बस की बात नहीं है. चुनाव में हर कोई बराबरी से तभी चुनाव लड़ पायेगा जब वोट डालने के लिये ईवीएम मशीन पर केवल प्रत्याशी का नाम दर्ज हो. किसी पार्टी का चुनाव चिन्ह न हो. निर्दलीय को एक सप्ताह पहले सिंबल दिया जाता है और पार्टी के प्रत्याशी के पास पहले से चुनाव चिन्ह होता है. ऐसे में चुनाव मैदान में मुकाबला बराबरी का नहीं होता. यही कारण है कि प्रत्याशी काम न करके दलों से किसी भी तरह टिकट हासिल करने के प्रयास में रहता है.’        

शिवराज तम्बू बाकी सब बम्बू

आप लोग किसी मुगालते में न रहें, सरकार तो अकेले शिवराज के दम पर चल रही है, शिवराज तम्बू हैं ,विधायकों और कार्यकर्ताओं को बम्बू बनना होगा, तभी सरकार ठीक से चल सकती है. संगठन के पास सबकी परफ़ार्मेंस रिपोर्ट है, उसी के आधार पर टिकिट दिये जाएंगे, ये उद्गार मध्य प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नन्दकुमार सिंह चौहान ने पचमढ़ी में सम्पन्न विधायक  प्रशिक्षण वर्ग में व्यक्त किए, तो कई बातें एक साथ उजागर हुईं. इनमे से पहली जो आखिरी भी है यह है कि हाल फिलहाल मध्य प्रदेश भाजपा में शिवराजसिंह पहले और आखिरी विकल्प हैं, इसलिए किसी और को मुंगेरीलाल सरीखे सपने देखने की जहमत नहीं उठानी चाहिए. दूसरा संदेशा यह दिया गया कि ये बातें महज बकवास और कोरी अफवाहें हैं कि आरएसएस और शिवराज के बीच कोई अनबन है. तीसरी अहम बात यह थी कि इसके बाद भी जिसे  सपने आना बंद न हों, तो उसकी नींद रिपोर्ट कार्ड नाम के चिट्ठे के जरिये उड़ा दी जाएगी, अब जिसे जो करना हो कर ले.

विधायकों के लिए यह प्रशिक्षण वर्ग चेतावनी और मुख्यमंत्री के लिए वरदान साबित हुआ, जिसमे हमेशा की तरह हीरो शिवराजसिंह चौहान ही रहे. लाख टके के इस सवाल का जबाब किसी के पास नहीं कि आखिर क्यों भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को शिवराज की सर्वमान्यता का नवीनीकरण कराना पड़ा, वह भी धोंस धपट बाले लहजे में. दरअसल में एमपी में सब कुछ ठीक ठाक नहीं है. बहुत कुछ होने के बाद भी कुछ होता नहीं दिख रहा है, जिससे जनता त्रस्त हो चली है. सिवा शिवराज के किसी के पास कोई अधिकार नहीं है, नौकरशाही हावी हो रही है और सूबे की कानून व्यवस्था चरमराने लगी है. अगला साल चुनावी है लिहाजा भाजपा ने अपने इस गढ़ को बनाए रखने कसरत अभी से शुरू कर दी है और यह ऐलान भी कर दिया है कि भाजपाई जिम के ट्रेनर शिवराज ही रहेंगे.

इधर परेशानी वे राजनैतिक विश्लेषक खड़ी कर रहे हैं जो दबी जुबान में यह मशवरा देने लगे हैं कि अगर भाजपा को प्रदेश अपने हाथ में रखना है तो सीएम बदल देना चाहिए, क्योंकि लोग शिवराज से ठीक वैसे ही ऊब चले हैं जैसे साल 2003 में दिग्विजयसिंह से ऊब गए थे. इतिहास तो नहीं पर हालात अपने आप को दोहरा रहे हैं, मसलन कर्मचारी सातवां वेतन आयोग लागू न होने से खफा हैं, उन्हे मालूम है कि सरकार यह घोषणा चुनाव के पहले कर देगी, पर यह हक वक्त पाए दे दे तो उसमें निष्ठा बनाए रखी जा सकती है. किसानों की परेशानियां जस की तस हैं और दलित वर्ग भाजपा से छिटकने लगा है और काम उतने हुये नहीं हैं जितने कि गिनाए जाते हैं.

यह ठीक है कि कांग्रेस की हालत पतली है पर लोकतन्त्र में कुछ भी हो सकता है. अरविंद केजरीवाल ने सूबे पर नजरें गड़ा दी हैं और अगर कमलनाथ या ज्योतिरादित्य सिंधिया में से किसी एक ने प्रदेश  कांग्रेस की कमान संभाल ली, तो बदलाव की मानसिकता में आ रहा वोटर उनसे चेटिंग शुरू न कर दे. लेकिन भाजपा शिवराज के बारे में कुछ सुनने तैयार नहीं तो कुछ विधायकों और कई कार्यकर्ताओं को भी महसूस होने लगा है कि पार्टी में आंतरिक लोकतन्त्र नाम की व्यवस्था खत्म हो चली है. अगर शिवराज की ही पालकी ढोने मजबूर किया जा रहा है, तो दूसरे दर्जे के नेताओं से मौका छीनना इसे क्यों न कहा जाये. चुनाव के वक्त जिन कार्यकर्ताओं की तारीफ में कसीदे गढ़े जाते हैं, आज उसके कहने पर राशन कार्ड भी नहीं बन रहा, तो प्रचार के वक्त वोटर को क्या मुंह दिखाएंगे.

पचमढ़ी में कुछ विधायकों ने मंत्रियों की शिकायत की तो उन पर ध्यान नहीं दिया गया उलटे नसीहत विधायकों को ही दे दी गई. ऐसे में इसी तम्बू के नीचे बम्बू बनकर खड़े रहने की मजबूरी बड़ी उठा पटक की भी वजह बन सकती है. एक पूर्व भाजपा विधायक की मानें तो पार्टी अति आत्म विश्वास का शिकार हो चली है. पचमढ़ी में किसी को मुंह खोलने की इजाजत नहीं थी, पर  कान खुले रखने सभी को निर्देश थे. हमने सुना पर हमारी कौन सुनेगा, वे अध्यक्ष महोदय जो सीएम की चाटुकारिता करते रहे, ताकि अध्यक्ष बने रहें, तो बेहतर होगा कि अध्यक्ष भी शिवराज को ही बना दिया जाये. इस नेता के मुताबिक जब बुरा वक्त आता है तो अच्छे अच्छे  तम्बू उखड़ जाते हैं. शिवराज का जरूरत से ज्यादा गुणगान और महिमामंडन यूं ही होता रहा तो उनसे चिढ़ने वालों की तादाद और बढ़ेगी, इसलिए वक्त रहते पार्टी को संभल जाना चाहिए .    

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