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क्या गूगल से है आपको खतरा

सर्च इंजन गूगल से हम वो सारी जानकारी ले सकते हैं जो अखबार और न्यूज चैनल हमें नहीं दे पाते है. लेकिन कुछ ऐसी चीजें भी हैं जिनको गूगल पर सर्च करने से आपके गूगल बाबा से आपको खतरा भी हो सकता है.

क्‍या आपको पता है गूगल पर जो भी आप सर्च करते हैं, गूगल उसका पूरा रिकॉर्ड रखता है. फिर वह एजुकेशन, न्‍यूज या किसी विशेष विषय की ही जानकारी क्‍यों न हो. अब हो सकता है कि आप कुछ ऐसा सर्च करें कि आप भी किसी परेशानी में पड़ जाएं. ऐसे में गूगल पर सर्च करने से पहले ये जान लिजिए कि कौन सी चीजें गूगल पर सर्च करने से बचना चाहिए.

गूगल पर कभी भी कुछ संदिग्ध या संदेह की चीजें सर्च करने से बचें. क्योंकि गूगल के पास आपकी सर्च हिस्ट्री का पूरा रिकॉर्ड होता है. इस तरह के सर्च को बार-बार करने से कई बार जानकारी लीक भी हो सकती है. क्योंकि साइबर पुलिस की नजर अक्सर ऐसे लोगों पर टिकी होती है जो कि कुछ संदिग्ध सर्च कर रहे हैं, और ऐसे में आपको जेल भी जाना पड़ सकता है.

अगर आप गूगल पर कोई मेडिसिन या फिर ड्रग्स से जुड़ी चीजों को सर्च करते हैं तो सर्च का डाटा थर्ड पार्टी को ट्रांसफर कर दिया जाता है. जिसके बाद आपको लगातार उस बीमारी और उसके ट्रीटमेंट से संबंधित विज्ञापन दिखाए जाते हैं.

गूगल पर भूल से भी कभी असुरक्षा से जुड़ी कोई भी जानकारी सर्च नहीं करनी चाहिए. अगर आप ऐसा करते है तो आपको उस विषय से संबधित विज्ञापन आने लगते हैं, इससे आप समझ सकते हैं कि कोई आपका इंटरनेट पर पीछा कर रहा हैं.

कभी भी गूगल पर अपनी पर्सनल ईमेल को सर्च नहीं करना चाहिए. ऐसा करने से अकाउंट हैक हो सकता है और आपका पासवर्ड भी लीक होने का खतरा बना रहता है.

बेटे से हलकान लालू

अपनी उलजलूल हरकतों और बयानों से अकसर अपनी सरकार और पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी करने वाले बिहार के स्वास्थ्य मंत्री तेज प्रताप यादव अब खुद मुश्किलों में घिर गए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने राजद सुप्रीमो लालू यादव के दुलारे तेज प्रताप यादव के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया है. पिछले दिनों जेल में बंद राजद के बाहुबली नेता शहाबुद्दीन के शार्प शूटर और सिवान के पत्रकार राजदेव की हत्या के मुख्य आरोपी मोहम्मद कैफ के साथ तेज प्रताप की तस्वीरें अखबारों में छपी थी. उसी आधार पर राजदेव की बीबी आशा रंजन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. याचिका में कहा गया है कि राजदेव की हत्या के आरोपी को शहाबुद्दीन और तेज प्रताप ने पनाह दिया हुआ है. गौरतलब है कि 13 मई 2016 को सिवान में राजदेव की हत्या कर दी गई थी.

तेज प्रताप कभी कृष्ण का रूप धर कर बांसुरी बजाते नजर आते हैं तो कभी हलवाई की दुकान में जलेबी छानने लगते हैं. कभी कुम्हार की चाक पर हाथ साफ कर मिट्टी के बर्तन बनाने लगते हैं. इस साल एक जनवरी के मौके पर उन्होंने अपने सिर पर पगड़ी बांधी और उसमें मोर का पंख जड़ डाला. उसके बाद गायों के साथ बांसुरी बजाने लगे. काफी देर तक भाव विभोर होकर बांसुरी बजाते रहे और उसके बाद खुद को कृष्ण का वंशज बताया. पिछले एक फरवरी को सरस्वती पूजा के मौके पर वह हलवाई के साथ चूल्हे के पास जा बैठे और लगे जलेबियां छानने. जलेबी छानने के बाद उन्होंने स्कूली बच्चों को जलेबियां खिलाई और खुद भी उसका लुत्फ उठाया. पिछले 6 फरवरी को पटना पुस्तक मेले में घूमने पहुंचे तो कुम्हार का चाक देख कर वहीं बैठ गए और चाक को घूमा कर मिट्टी के बर्तन बनाने लगे.

हमेशा सुर्खियों में रहने वाले तेज प्रताप ने पिछले दिनों गो हत्या पर रोक लगाने की मांग कर अपनी पार्टी के लिए ही मुसीबत खड़ी कर दी थी. वृंदावन पहुंच कर उन्होंने केंद्र के मोदी सरकार से अपील कर डाला कि नोटबंदी की तरह से गायों की हत्या पर भी रोक लगाई जाए. उन्होंने यह भी कहा कि बिहार में शराब को बंद कर दिया गया है, अब गो हत्या को भी बंद किया जाएगा. उनकी इस बयानबाजी से उनके पिता लालू यादव और ‘चाचा’ नीतीश कुमार सकते में आ गए. गौरतलब है कि लालू और नीतीश का बड़ा मुस्लिम वोट बैंक है और तेज प्रताप ने गाय को मारने पर रोक लगा का मुसलमानों को नाराज कर डाला.

पिछले दिनों भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने चुटकी लेते हुए कहा था कि लालू यादव ने अपने बेटों को राजनीति में सेटेल कर दिया है और अब उनकी शादी कर देनी चाहिए. मोदी के इस मजाक पर तेज प्रताप तैश में आ गए और कह डाला कि मोदी अपने बेटे का विवाह क्यों नहीं करते हैं? क्या वह नपुंसक है? उनके इस बात पर बिहार की सियासत गरमा गई तो लालू और नीतीश को उस पर पानी डालने के लिए आगे आना पड़ा. पार्टी की बैठकों या किसी सभा में वह बात-बेबात फोटोग्राफरों से उलझ पड़ते हैं. पार्टी की एक बैठक में वह किसी फोटोग्राफर का कैमरा लेकर फोटो खींचने लगे. उनका फोटो खींचता फोटो किसी फोटोग्राफर ने खींच लिया तो इस पर वह बिदक गए और फोटोग्राफर को धमकाने लगे. कैमरा छीन कर तोड़ने की धमकी दे डाली. उनकी इस हरकत पर पत्रकारों और फोटोग्राफरों ने राजद के कार्यक्रमों के बहिष्कार का ऐलान कर डाला. आखिर लालू ने बीच में कूद कर मामले को शांत कराया.

अकसर अपने ललाट पर चंदन-टीका लगा कर घूमने वाले 28 साल के तेज प्रताप राजद की टिकट और महुआ विधान सभा सीट से पहली बार 2015 में विधायक बने थे. बिहार में महागठबंधन की सरकार में उन्हें स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया था. राजद के सूत्रों की मानें तो वह अपने छोटे भाई तेजस्वी को उप मुख्यमंत्री बनाए जाने से खासे नाराज हैं. इस बात को लेकर वह अपने पिता लालू यादव से भी नाराज रहते हैं. अकसर वह मंदिरों के चक्कर लाने लगे हैं. कई बार देर रात को उठ कर भी किसी मंदिर की ओर निकल पड़ते हैं.

फिल्म रिव्यू के बाद अब पढ़ें ‘इरादा’ की पूरी कहानी

औद्योगिक कंपनियां किस तरह रिवर्स बोरिंग कर अपनी फैक्टरी से निकलने वाली जहरीली गैस व जहरीले रसायन जमीन की सतह से नीचे फेंक कर जमीन के नीचे के पानी को विशाक्त बनाती हैं. इस गंभीर मुद्दे पर बनी एक घटिया स्तर की फिल्म का नाम है-‘‘इरादा’’.

‘‘इको क्राइम’’ पर आधारित फिल्म की कहानी पंजाब के भटिंडा शहर की है, जहां आर्मी से रिटायर्ड परबजीत वालिया (नसिरूद्दीन शाह) रहते हैं. उनकी बेटी रिया (रूमान मोल्ला) अपने करियर को पुख्ता करने के लिए सीडीएस परीक्षाओं की तैयार कर रही होती है. लेकिन एक फैक्टरी ‘‘पीपीएफपीएल’ द्वारा रिवर्स बोरिंग कर अपनी कंपनी के जहरीले रासायनिक पदार्थ पुनः जमीन के नीचे बोरिंग करके फेंकने से शहर का पानी विषाक्त हो गया है और इस पानी की वजह से पंजाब के लोग कैंसर के मरीज बन रहे हैं. इसी पानी की वजह से रिया को भी फेफड़े का कैंसर हो जाता है और एक दिन उसकी मौत हो जाती है. अब परबजीत वालिया अपनी बेटी की मौत के लिए जिम्मेदार तथा पूरे राज्य को कैंसर का मरीज बना रही कंपनी व फैक्टरी ‘‘पीपीएफपीएल’’ के मालिक पैडी शर्मा (शरद केलकर) के खिलाफ अपने अंदाज में मुहीम छेड़ते हैं. वह स्वतंत्रता सेनानी शहीद भगत सिंह के इस कथन में यकीन करते हैं कि, ‘बहरों को सुनने के लिए धमाकों की जरुरत होती है.’’

इस कहानी के समानांतर पत्रकार सिमी (सागरिका घाटगे) की कहानी चलती है, जो कि अपने प्रेमी अनिरूद्ध की मौत के लिए न्याय मांग रही है. अनिरूद्ध ने पैडी व उनकी फैक्टरी में जिस तरह से विषैला जहर पानी में मिलाया जा रहा है, उसको लेकर पूरी सच्चाई जुटा ली थी. इस बात की भनक लगते ही पैडी शर्मा, अनिरूद्ध को मौत देता है, पर उससे पहले पैडी शर्मा, अनिरूद्ध से कहता है कि कालेज के दिनों से उनकी आदत रही है कि जो उसकी बात न माने उसे मौत की नींद सुला दो और सबूत न छोड़ो.

जैसे कहानी आगे बढ़ती है, वैसे पता चलता है कि राज्य की मुख्यमंत्री रमन दीप (दिव्या दत्ता) और व्यवसायी पैडी शर्मा (शरद केलकर) की साठ गांठ की वजह से रिवर्स बोरिंग का शिकार पूरा प्रदेश हो रहा है. सिमी ने अपने तरीके से पैडी की फैक्टरी के काले करनामों का वीडियो भी बना लिया है. मगर सिमी व परबजीत के सारे प्रयास विफल हो जाते हैं. तब परबजीत, पैडी की ही फैक्टरी में कार्यरत भगतसिंह नामक युवक के जरिए पैडी की फैक्ट्री में ब्लास्ट करवा देता है. भगत सिंह की पत्नी कैंसर की मरीज है. बेटे की पढ़ाई रूकी हुई है. उस पर कर्ज बहुत है. इसलिए भगत सिंह, परबजीत से पैसा लेता है.

अब पैडी चाहता है कि उसकी छह हजार करोड़़ की फैक्टरी का एक सप्ताह के अंदर बीमा मुख्यमंत्री दिलवा दें. तब मुख्यमंत्री उसे आश्वस्त करते हुए इस हादसे की जांच के लिए एनआईए आफिसर अर्जुन मिश्रा (अरशद वारसी) की ड्यूटी उसी शहर में लगाती हैं. मुख्यमंत्री अपनी तरफ से अर्जुन मिश्रा को आदेश देती है कि जांच रिपोर्ट पैडी से लेकर इस मामले को बंद कर दे और इसके बदले में उसे पीएमओ में भेज दिया जाएगा. अर्जुन खुश है. इसलिए जब सिमी उसे पैडी के खिलाफ सारे सबूत देती है, तो अर्जुन सिमी के पीछे पुलिस लगा देता है. वह जांच शुरू करता है.

एक दिन अर्जुन, परबजीत की अनुपस्थिति में उसके घर की तलाशी लेता है. भगतसिंह के मोबाइल से पता चल जाता है कि वह कहां है. भगत सिंह अपनी गिरफ्तारी से पहले ही आत्महत्या कर लेता है. फिर परबजीत सच स्वीकार लेते हैं और अर्जुन से कहते हैं कि वह दूसरे शहर के अस्पताल जाकर भगत सिंह की पत्नी से इकबालिया बयान ले आए. अर्जुन भगतसिंह की पत्नी से इकबालिया बयान लेता है. बयान देने के बाद भगतसिंह की पत्नी अर्जुन से कहती है कि वह भटिंडा कार की बजाय ट्रेन से वापस जाए. पता चलता है कि यह पूरी ट्रेन कैंसर के मरीजों से भरी हुई है. उधर अर्जुन का बेटा फोन पर उससे कहता है कि उसे तो सिंघम जैसा पुलिस वाला पसंद है. उसके बाद कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. मुख्यमंत्री, अर्जुन को बुलाकर धमकाती है. मगर हालात ऐसे बदल जाते हैं कि प्रेस काफ्रेंस में मुख्यमंत्री अपना त्यागपत्र दे देती हैं. पैडी गिरफ्तार हो जाता है.

एक बेहतरीन विषय पर एक स्तरहीन व कैरीकेचर जैसे किरदारों वाली फिल्म कैसी हो सकती है, उसका नाम है-‘‘इरादा’’. इस फिल्म को देखना सिरदर्द के अलावा कुछ नहीं है. कैंसर मरीजों से भरी पूरी ट्रेन इस तरह से परदे पर दिखायी गयी है कि उसे देखकर भी कोई भावना नहीं जगती. किसी के भी साथ सहानुभूति नही जगती है. इंटरवल से पहले तो फिल्म की गति बहुत धीमी है. फिल्म में शायरी काफी हैं, मगर वह भी फिल्म को बांध नहीं पाती. पूरी फिल्म टीवी पर प्रसारित हो रहे किसी अपराध आधारित सीरियल का एपीसोड नजर आती है. हकीकत यही है कि फिल्म ‘इरादा’ देखकर ‘क्राइम पेट्रोल’ या ‘सीआईडी’ का कोई एपीसोड याद आ जाएगा.

पटकथा लेखक व निर्देशक की अपनी कमजोरी के चलते फिल्म में रिवर्स बोरिंग, औद्योगिक फैक्टरियां किस तरह हवा व पानी को दूषित कर रही हैं, जमीन के नीचे प्रदूषित होते पानी और रासायनिक पदार्थ किस तरह आम इंसान के जीवन में जहर घोल रहे हैं, अति खतरनाक व भयंकर मुद्दे भी फिल्म में उभर नहीं पाते. राजनेता या सरकार और उद्योगपतियों के बीच का गठजोड़ भी महज कैरी केचर बनकर ही रह गया.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो नसिरूद्दीन शाह व अरशद वारसी ने अपनी तरफ से बेहतरीन परफार्मेंस दी है, मगर पटकथा व किरदार ऐसे नहीं थे कि फिल्म को इनकी परफार्मेंस से फायदा होता. सागरिका घाटगे प्रभावित नहीं करती हैं. शरद केलकर अपने किरदार में उपयुक्त नजर नहीं आते हैं. भ्रष्ट मुख्यमंत्री के किरदार में दिव्या दत्ता जंची हैं.

एक घंटा पचास मिनट की फिल्म ‘‘इरादा’’ का निर्माण फाल्गुनी पटेल व प्रिंस सोनी, लेखन व निर्देशन अपर्णा सिंह ने किया है. संगीतकार नीरज श्रीधर, कलाकार हैं- नसिरूद्दीन शाह, अरशद वारसी, सागरिका घाटगे, रूमान मोल्ला, दिव्या दत्ता, शरद केलकर.

फिल्म रिव्यू : इरादा

‘इरादा’ एक इको फ्रेंडली थ्रिलर फिल्म है, जिसे निर्देशक अपर्ना सिंह ने लिखा और निर्देशन किया है, फिल्म में निर्देशक ने एक गंभीर मुद्दा जो खासकर बड़ी-बड़ी फैक्टरियों के द्वारा छोड़े गए दूषित कैमिकल को बिना ट्रीट किये जलधाराओं और जमीन में सीधा छोड़ देते है. जिससे आज शहर और गांव का हर परिवार प्रभावित है. हर परिवार में कोई न कोई सदस्य कैंसर का पेशेंट है. ये विषाक्त पानी हर घर में, फल सब्जियों में किसी न किसी रूप मे आ रहा है, लेकिन हमारी सरकार और कुछ मौका परस्त लोग इसे अपने एशो-आराम के लिए नज़र अंदाज कर रहे है और विरोध करने वाले हर इंसान को अपने पैसे और ताकत के बल पर चुप करा रहे हैं.

फिल्म को मनोरंजक रूप में पेश करने की कोशिश की गयी है, लेकिन निर्देशक ऐसा करने में पूरी तरह सफल नहीं रहे, फिल्म का पहला भाग काफी धीमा था. इंटरवल के बाद फिल्म की पकड़ कुछ ठीक रही. फिल्म में अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने पिता की भूमिका में उम्दा अभिनय किया है. अरशद वारसी ने भी अपनी जगह सही अभिनय किया. लेकिन अभिनेत्री सागरिका घाटगे कुछ खास असर नहीं छोड़ पायी. मुख्यमंत्री की भूमिका में दिव्या दत्ता और विलेन की भूमिका में शरद केलकर ने अच्छा अभिनय किया है. कहानी इस प्रकार है.

रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर परबजीत वालिया (नसीरुद्दीन शाह) अपनी एकमात्र बेटी रिया (रूमान मोल्ला) को पायलट बनाने के सपने लिए उसे हर दिन फिटनेस ट्रेनिंग देते हैं, उसमें वह स्विमिंग भी करती है, लेकिन एक दिन वह पानी में तैरती हुई बेहोश हो जाती है. डॉक्टरी चेक करने के बाद पता चलता है कि उसे लंग कैंसर है. उसकी मृत्यु नजदीक है. परबजीत बेटी की इस बीमारी की वजह जानने के लिए उसके बालों का लैब टेस्ट करवाते हैं और पता चलता है दूषित पानी की वजह से उसकी बेटी को कैंसर हुआ है. गुस्से से वह एक ब्लास्ट फैक्ट्री में करवाता है.

एक जर्नालिस्ट सिमी (सागरिका घाटगे) भी अपने बॉयफ्रेंड को न्याय दिलाने के लिए आगे आती है, उसका बॉयफ्रेंड ऐसे लोगों को सजा दिलाने की कोशिश करता है, जिन्होंने पानी को प्रदूषित किया है. लेकिन वह कंपनी के मालिक विलेन पैडी शर्मा (शरद केलकर) और उसकी पार्टनर और मुख्यमंत्री रमनदीप (दिव्या दत्ता) के गुंडों के हाथों मारा जाता है. समस्या को गंभीर होता देख रमनदीप, एनआईए ऑफिसर अर्जुन मिश्रा (अरशद वारसी ) को शहर में बुलाती है और सबकुछ चुपचाप स्पैम में डाल देने को कहती है, लेकिन कई ट्विस्ट के बाद अर्जुन को इसकी हकीकत का पता चलता है और वह सच्चाई का साथ देता है. इस तरह कहानी अंजाम तक पहुंचती है.

फिल्म में गाने खास नहीं हैं. नसीरुद्दीन शाह की शेरो शायरी कहने का अंदाज अच्छा था. बहरहाल फिल्म एक बार देखने लायक है. इसे टू एंड हाफ स्टार दिया जा सकता है.

 

 

फिल्म रिव्यू : रनिंग शादी

फिल्म ‘‘रनिंग शादी डॉट कॉम’’ तीन साल तक प्रदर्शन का इंतजार करती रही और अब ‘‘रनिंग शादी’’ के नाम से प्रदर्शित हो पायी है. फिल्म देखकर इस बात का अहसास हो गया कि आखिर इस फिल्म को वितरक क्यों नहीं मिल रहे थे. इस फिल्म में दर्शक के लिए ऐसा कुछ नहीं है, जिसकी वजह से इस फिल्म को सिनेमा घर में प्रदर्शित किया जाता. पर फिल्म प्रदर्शित हो ही गयी. आखिर कभी न कभी घूरे/ कुडे़ के भी दिन बहुर/अच्छे जाते हैं. पूरी फिल्म देखकर आश्चर्य होता है कि इस फिल्म के निर्माता शुजीत सरकार जैसे संजीदा फिल्मकार और निर्देशक अमित राय हैं, जो कि कैमरामैन के तौर पर ‘सरकार’ व ‘सरकार राज’ सहित 15 से अधिक बड़ी फिल्में व कई विज्ञापन फिल्में निर्देशित कर चुके हैं.

पटना का एक तेइस वर्षीय भोला भाला ईमानदार लड़का राम भरोसे पांडे उर्फ छोटू उर्फ लिटिल (अमित साध) काम की तलाश में बिहार से पंजाब के अमृतसर शहर पहुंचता है. और वहां एक लहंगे की दुकान में गोटा लगाने का काम करता है. वह जिस दुकान में नौकरी करता है, उस दुकान के मालिक सरदार जी कठोर स्वभाव के हैं. मालिक की बेटी निम्मी (तापसी पन्नू) अपने पिता से बहुत डरती है. मगर उसके लिए कंडोम खरीदना, शराब का सेवन और खुला सेक्स आम बात है. वह अपने साथ स्कूल में पढ़ने वाले एक लड़के के साथ सेक्स संबंध बनाती है और गर्भवती हो जाती है. तब वह छोटू की मदद से दूसरे शहर जाकर गर्भपात करवाकर आती है.

उधर राम भरोसे जिस इमारत में रहते हैं, उसी इमारत की पहली मंजिल पर इंटरनेट व फेसबुक के दीवाने सरबजीत सिधाना (अर्ष बाजवा) से राम भरोसे की अच्छी दोस्ती है. एक दिन सरदार जी रामभरोसे को अपनी दुकान की नौकरी से बाहर कर देते हैं. इस बीच किसी न किसी बहाने निम्मी, राम भरोसे से भी बात करती रहती है. तो वहीं स्कूल व अन्य दोस्तों के साथ उसका घूमना जारी है. नौकरी छूटने के बाद राम भरोसे व उसका दोस्त एक शादी में पहुंचते हैं. पता चलता है कि लड़की भाग गयी है, इसलिए शादी व खाना पीना रद्द. जब दोनों एक ढाबे पर खाना खा रहे होते हैं, तभी भागी हुई लड़की अपने प्रेमी के साथ पकड़ी जाती है और प्रेमी की पिटाई होती है. यह सब देखकर राम भरोसे अपने दोस्त के साथ मिलकर एक वेबसाइट इस सोच के साथ बनाता है कि जो लोग अपने घरों से भागकर शादी करना चाहते हैं, उनकी मदद की जाए.

उधर निम्मी मन ही मन राम भरोसे से प्यार करने लगी है. पर निम्मी की बात से निराश होकर राम भरोसे पटना में अपने मामा से कह देता है है कि वह नेहा से उसकी शादी तय कर दें. इधर राम भरोसे व उसके दोस्त की वेब साइट ‘‘रनिंग शादी’’ सफल हो जाती है. वह 49 शादी करवा देते हैं. एक दिन निम्मी उससे कहती है कि वह उसका व उसके प्रेमी शंटी को भगाकर शादी करवा दे. बड़ी मुश्किल से राम भरोसे राजी होते हैं. भरोसे के साथ घर से भागने के बाद रास्ते में निम्मी कबूल करती है कि शंटी नहीं आएगा, वह तो भरोसे के साथ शादी करेगी. पर भरोसे तैयार नहीं. मगर हालात कुछ ऐसे बन जाते हैं कि राम भरोसे को अपने दोस्त व निम्मी के साथ भागना पड़ता है. अंततः यह भागकर पटना पहुंचते हैं. तब भरोसे को अहसास होता है कि वह तो निम्मी से प्यार करने लगा है. कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. राम भरोसे व निम्मी मिलकर नेहा की शादी उसके प्रेमी से करवा कर खुद शादी करते हैं.

फिल्म की घटिया पटकथा के चलते इस हास्य व रोमांटिक फिल्म के किसी भी दृष्य पर हंसी नहीं आती. बल्कि दर्शक सोचता है कि यह फिल्म कब खत्म होगी. शादी व्याह की समस्या हो या परप्रांतीय का मुद्दा हो या रोमांस हो, कुछ भी ठीक से उभर नहीं पाता. वास्तव में वेब साइट बनने के बाद कहानी खत्म हो जाती है, पूरी फिल्म बिखर जाती है. हकीकत में भागने वालों की शादी कराने की वेबसाइट बनाने का मुद्दा ही अनूठा है, मगर फिल्म के शुरू होते ही आधे घंटे में यह मुद्दा खत्म हो जाता है और फिर वही घिसी पिटी कहानी चलती रहती है. परदे पर अमित साध व तापसी पन्नू की केमिस्ट्री भी इस फिल्म को उबार नहीं पाती है.

निर्देशक अमित राय ने फिल्म में तापसी पन्नू के किरदार को उस रूप में पेश किया है, जिस रूप में फिल्म की हीरोईन को पेश करने से हर फिल्मकार डरता रहा है कि इससे पारिवारिक दर्शक दूर हो जाएंगे. निर्देशक अमित राय ने बेवजह इस फिल्म को एक घंटे 54 मिनट तक खींचा. बेवजह ही मैथिली, हिंदी, भोजपुरी व पंजाबी भाषा के संवाद रखकर ज्यादा से ज्यादा दर्शक बटोरने का असफल प्रयास किया. फिल्म में कहानी की बनिस्बत कुछ घटनाक्रम हैं, जो कि वर्तमान समय के टीवी सीरियलों की याद दिलाते है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो अमित साध और तापसी पन्नू ने अपने हिसाब से बेहतरीन पराफर्मेस दी है, मगर जब पटकथा व किरदार ही घटिया हों, तो बेहतरीन परफार्मेंस से क्या होगा? पंजाबी लड़की के किरदार में तापसी पन्नू और भोले भाले ईमानदार युवक के किरदार में अमित साध जमे हैं.

एक घंटा चौवन मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘रनिंग शादी’’ का निर्माण शुजीत सरकार और क्राउचिंग टाइगर मोशन पिक्चर्स ने किया है. फिल्म के निर्देशक अमित राय, लेखक नवजोत गुलाटी व अमित राय, संगीतकार अनुपम राय, अभिषेक अक्षय और जेब तथा कलाकार हैं-अमित साध, तापसी पन्नू, अर्ष बाजवा.

भारत घूमना चाहते हैं जस्टिन बीबर

दुनिया भर में पहचाने जाने वाले और ग्रेमी पुरस्कार विजेता जोशीले पॉप सिंगर जस्टिन बीबर अपने वर्ल्ड टूर के उद्देश्य से मई में भारत आने वाले हैं. उनकी ये य़ोजना पूरी तरह तय है. 22 साल के कैनेडियन गायक और गीतकार जस्टिन भारत के डीवाई पाटिल स्टेडियम में 10 मई को अपने हिट गानों जैसे “वेयर आर एक नाओ”, “बॉयफ्रैंड”, "लव योरसेल्फ", “एज लांग एज यू लव मी”, “कंपनी“ आदि की प्रस्तुति देंगे.

जस्टिन बीबर एक बहुत बड़े कलाकार है और सभी उम्र के प्रशंसकों के बाच लोकप्रिय हैं. बतौर अर्जुन जैन जो कि ‘’व्हाइट फॉक्स इण्डिया’’ के निदेशक हैं, जस्टिन का भारत भ्रमण भारत की वर्तमान सांस्कृतिक को आगे दुनिया में प्रदर्शित करने में भी मदद करेगा. जस्टिन बीबर का ये टूर एक बहुत सफल टूर है.

इस कार्यक्रम के आयोजक जस्टिन बीबर के साथ, इस कार्यक्रम को भारत का अब तक का सबसे बड़ा लाइव म्यूजिक ईवेंट बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं. संभावनाऐं यहीं हैं कि ये साल का सबसे बड़ा कार्यक्रम होगा. भारत में जस्टिन के बहुत से फैंस हैं.

जस्टिन बीबर के इस टूर और 10 मई को उनके साथ भारत में होने वाले कार्यक्रम से भारत को यकीनन दुनिया के नक्शे पर एक अच्छी जगह मिलेगी. उनका ये भारत दौरा, हमारे देश के अन्य कलाकारों के लिए भी कई रास्ते खोल सकता है.

बीबर की ये सैर उनके नवीनतम चौथे एलबम "परपज” के समर्थन के लिए है. इस एलबम में उन्होंने कई अलग-अलग इलेक्ट्रॉनिक ध्वनियों के साथ नये प्रयोग किये हैं. भारत के अलावा जस्टिन बीबर के इस एशिया दौरे में इसराइल का तेल अवीव और यूएई का दुबई शामिल हैं.

जस्टिन के प्रशंसकों के लिए अच्छी खबर ये है कि वे 22 फरवरी से www.bookmyshow.com पर इस कार्यक्रम के की टिकट के लिए पूर्व रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं, भारत में, ये कीमत 4,000 रुपये तक तय की गई है.

कुख्यात बनती औरत

‘बबली और बंटी’ से प्रसिद्ध हुई बबली की जैसी और कहानियां आजकल सुर्खियां बनने लगी हैं. पहले भी औरतों को अपराधों में शामिल किया जाता था पर पहले वे अपनेआप में गैंग की मालिक नहीं बन पाती थीं. अब वे अपराध का कखग सीखपढ़ कर खुद के गैंग बनाने लगी हैं और खुद ही प्लानिंग कर के धावा बोलने लगी हैं. शहद की मक्खी की तरह शहद के छत्ते की तरफ आकर्षित करने वाली इन लड़कियों को हनीट्रैप रैकेट चलाने में पकड़ा जाने लगा है. अब एक बड़ी सामाजिक समस्या उभर रही है कि इन स्वतंत्र, स्मार्ट और सैक्सी अपराधिन औरतों को कैसे पहचाना जाए और किस तरह से निबटा जाए.

औरतों के लिए बने सुरक्षात्मक कानून, जैसे बलात्कार, छेड़खानी, पीछा करना, ब्लैकमेल करना, विवाह बाद प्रताड़ना करना आदि अपराधिन औरतों के कानूनी हथियार बन गए हैं. उन के लिए बिना छुरीचाकू चलाए अब आम ही नहीं, अच्छेभले, होशियार, खास लोगों को भी फंसाना संभव हो रहा है. आज शिकार ढूंढ़ने के लिए इंटरनैट मौजूद है जिस पर फेसबुक अकाउंट बनाने के साथ असलीनकली फोटो दिखा कर एकसाथ दसियों को फरेब में जकड़ा जा सकता है. यदि कोई मोटी आसामी मिल जाए तो उसे धमकियां दे कर आसानी से लूटा जा सकता है. हाल में हौंगकौंग में पैदा हुई एक युवती को राजस्थान के छोटे शहर कोटा में पकड़ा गया. उस ने एक रईस युवक से विवाह कर लिया था पर फिर उसे ब्लैकमेल कर रही थी.

औरतों का अपराधीकरण देश के लिए काफी खतरनाक होगा क्योंकि हमारे यहां जहां एक तरफ उन्हें पूजने का स्वांग रचा जाता है वहीं दूसरी ओर उन्हें पैर की जूती के नीचे रखा भी जाता है. ऐसे में सक्षम, पुरुषों से तेज औरत के अस्तित्व, सोच और व्यवहार पर खतरा मंडरा रहा है. कोई भी समाज आज तक अपराधों को समाप्त नहीं कर पाया है और चाहे जेल हो या मृत्युदंड, पुरुष अपराध करते ही हैं, औरतें उन का पूरा साथ देती हैं चाहे वे सामने न आती हों. अब, वे सरगना बन रही हैं क्योंकि बराबरी के अवसरों, शिक्षा, घरों की चुनौतियों और जिंदादिली से रह पाने की लालसा अब हर दिन बढ़ रही है. अब उन की सोच है कि अगर बातों, जिस्म और मुसकानों से रिवौल्वरों का काम लिया जा सकता है तो वे क्यों न लें.

यह समस्या ऐसी है जिस का हल आसान नहीं है क्योंकि हमेशा डर रहेगा कि अति करने पर कहीं बेगुनाह, बेजबान, कमजोर औरतें पिस न जाएं. कठिनाई यह है कि नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक, विकास के मोहपाश में पड़ी सरकार को घरघर की इस समस्या पर दिमाग लगाने की न फुरसत है और न ही वह जरूरत महसूस करती है.

 

सस्ते टूर का साइबर क्राइम

उत्तराखंड राज्य की राजधानी देहरादून में रहने वाले सागर चांदना ने परिवार के साथ गोवा घूमने का प्रोग्राम बनाया. इस के लिए उन्होंने इंटरनैट पर एक वैबसाइट के शानदार औफर देखे, तो रजिस्ट्रेशन कर दिया. जल्द ही कंपनी के लोगों ने उन से बात कर ली और स्पैशल पैकेज दे कर उन से पैसा भी वसूल लिया, लेकिन चंद रोज में ही उन के सारे सपने बिखर गए, क्योंकि जिस वैबसाइट के वे झांसे में आए, वह फर्जी निकली. साइबर ठगी के शिकार सागर चांदना ने पुलिस में शिकायत की. पुलिस ने जांचपड़ताल के बाद ठगों की पूरी मंडली को खोज कर गिरफ्तार कर लिया. पुलिस दंग रह गई, जब उसे पता चला कि ये ठग इसी तरह लोगों को अपना शिकार बना कर हर महीने लाखों रुपए कमाते थे.

साइबर क्राइम करने वाले गिरोह के सदस्य इतने शातिर थे कि वे ऐसे मनचाहे औफर देते थे कि उन के शिकार को अपने साथ हो रही ठगी का पता ही नहीं चलता था. इस गोरखधंधे में वे पहले कभी पकड़े भी नहीं गए थे. दरअसल, सागर चांदना नए साल पर गोवा घूमना चाहते थे. 29 नवंबर, 2016 को उन्होंने डील्स ए ट्रैवल डौट कौम नामक वैबसाइट पर 4 लोगों के गोवा जाने के लिए अच्छा पैकेज हासिल करने के लिए अपना मोबाइल नंबर व ईमेल आईडी दे कर औनलाइन रजिस्टे्रशन कराया. अगले दिन मैजिक यात्रा कंपनी की तरफ से एक आदमी ने खुद को सैल्स अधिकारी बता कर उन से मोबाइल फोन पर बात की. उस ने 22 जनवरी से

26 जनवरी तक के लिए 4 रात 5 दिन का टूर पैकेज बताया. इस पैकेज में होटल में रहना और हवाईजहाज से आनाजाना शामिल था. 36 हजार रुपए खर्चा बता कर कंपनी ने टूर की डिटेल उन की ईमेल पर भेज दी. सागर चांदना ने दूसरी ट्रैवल एजेंसियों के पैकेज देखे. वे महंगे थे. लिहाजा, मैजिक कंपनी का औफर उन्हें पसंद आ गया. वे लोग फोन कर के यात्रा में किसी भी तरह की परेशानी न होने का विश्वास भी दिला रहे थे. इस के बाद तथाकथित सेल्स अधिकारी ने 5 दिसंबर, 2016 को उन से टूर खर्च की आधी रकम अकाउंट में ट्रांसफर करने को कहा. उस ने यह भी बताया कि कंपनी के अकाउंट की लिमिट चूंकि ओवर हो चुकी है, इसलिए वे एक्सिस बैंक के उन के निजी खाते में रकम जमा करें.

सागर चांदना ने रकम जमा कर दी. इस के 3 दिन बाद कंपनी के लोगों ने बताया कि फ्लाइट उन की कन्फर्म हो चुकी है, इसलिए वे 21 हजार रुपए ट्रांसफर कर दें. तत्काल रकम जमा कराने पर 5 हजार रुपए की छूट देने की बात भी बताई, तो सागर चांदना ने 16 हजार रुपए जमा कर दिए और उन्हें विश्वास दिलाया कि बुकिंग शाम तक कन्फर्म कर दी जाएगी. जब बुकिंग कन्फर्म नहीं हुई, तो सागर चांदना ने बात की, लेकिन तरहतरह के बहाने बनाए जाते रहे व टालमटोल की जाती रही.

सागर चांदना को शक तो हुआ, जब उन लोगों ने पैकेज न बुक होने की बात कही, साथ ही रकम वापस देने पर आनाकानी करते रहे. कंपनी से रकम लेने का तरीका ही कुछ ऐसा था कि सागर समझ ही नहीं पाए कि वे किसी जाल में उलझ रहे हैं.

बाद में सागर चांदना को विश्वास हो गया कि उन्हें ठगी का शिकार बनाया गया है. इस के बाद उन्होंने पुलिस का रुख किया और थाने प्रेमनगर में मुकदमा दर्ज करा दिया. नए तरीके से की गई ठगी का यह मामला साइबर क्राइम से जुड़ा था. एसएसपी स्वीटी अग्रवाल व एसपी अजय सिंह ने थाना प्रभारी नरेश राठौर व क्राइम ब्रांच प्रभारी अशोक राठौर को इस मामले में कार्यवाही करने को कहा. प्राथमिक जांच में ही साफ हो गया कि कुछ लोग सस्ते टूर का लालच दे कर छोटीछोटी किस्तों में रकम ले कर लोगों को ठगने का काम कर रहे हैं. साइबर क्राइम करने वालों को पकड़ना आसान नहीं होता. पुलिस ने फर्जी वैबसाइट, मोबाइल नंबर, सागर चांदना के पास आई ईमेल आईडी को सर्विलांस के माध्यम से ट्रैक करना शुरू किया. इस के साथ ही बैंक अकाउंट की डिटेल हासिल कर ली गई. पुलिस ने बारीकी से काम किया और 4 जनवरी, 2017 को दिल्ली से लगे नोएडा के सैक्टर-62 से एक लड़की समेत 4 लोगों को गिरफ्तार कर लिया.

गिरफ्तार आरोपियों में लवप्रीत, अनिल कुमार, मनीष मिश्रा व सुनील कुमार शामिल थे. पूछताछ के दौरान जो सच सामने आया, उसे सुन कर पुलिस भी चौंक गई.

दरअसल, सस्ते टूर पैकेज देने के नाम पर लोगों को ठगने वालों का यह गोरखधंधा पूरे भारत में फैला हुआ था. इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड करनाल का रहने वाला गिरफ्तार आरोपी लवप्रीत था. वह जल्द ही अमीर बनने का सपना देखता था. उस के दिमाग में कई तरह के साइबर क्राइम करने के आइडिया आए, लेकिन वह बिलकुल नए तरीके से लोगों को ठगना चाहता था.

लवप्रीत ने टूर पैकेज के बहाने लोगों को ठगने की योजना बनाई और अपने दोस्तों के साथ मिल कर तकरीबन 6 महीने पहले ही मैजिक यात्रा वैबसाइट बनाई, उस ने किराए पर जगह ले कर दफ्तर भी खोला और स्टाफ भी रखा.

गिरोह के लोग ऐसे लोगों पर नजर रखते थे, जो टूर कराने वाली दूसरी वैबसाइटों पर टूर पैकेज की पूछताछ करते थे. यहीं से वे अपना शिकार ढूंढ़ते थे. इस के बाद वे मोबाइल नंबर और ईमेल के जरीए लोगों को सस्ते टूर का झांसा देते थे.

लोगों को बाकी कंपनियों के पैकेज महंगे लगते थे. इस के बाद वे पैसा जमा करा लेते थे. शिकार को उन पर किसी तरह का शक न हो, इसलिए एक लड़की को भी उन्होंने फोन करने के लिए नौकरी पर रखा था. वह कई तरह के औफर दे कर लोगों को लुभाती थी.

जिन लोगों से रकम ली जाती थी, लौटाई नहीं जाती थी और वे मोबाइल नंबर बदल देते थे. कोई उन तक इसलिए नहीं पहुंच पाता था, क्योंकि मोबाइल नंबर फर्जी पते पर हासिल किए जाते थे.

लवप्रीत और उस के साथी अपने ग्राहकों को मौजमस्ती कराने की बात भी करते थे. उन्हें औफर देते थे कि कंपनी किसी कमसिम हसीन लड़की को भी उन के साथ भेजेगी, जो हर तरह से उन की सेवा करेगी.

रंगीनमिजाज लोगों को वे इंटरनैट से चुराई गई लड़कियों की फोटो पसंद करने के लिए भेजते थे. इन में विदेशी लड़कियां भी होती थीं. जो लोग लड़कियों के साथ मस्ती की इच्छा जताते थे, उन से उसी हिसाब से रकम वसूली करते थे. कंपनी ऐयाशी की ख्वाहिश रखने वाले लोगों की पहचान गुप्त रखने का वादा भी करती थी. ऐसे लोग ठगे जाने पर शिकायत भी नहीं करते थे. जो लोग ज्यादा दबाव बनाते थे, उन्हें ईमेल और बातचीत उजागर करने की धमकी दी जाती थी. बदनामी के डर से वे लोग चुप हो जाते थे. दर्जनों लोगों को उन्होंने इसी तरह ठगा था. एक महीने में वे 10 से 12 लाख रुपए इसी तरह कमाते थे. पुलिस ने कंपनी के 22 कंप्यूटर, 5 मोबाइल फोन और तमाम दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिए. ठगों का शिकार हुए सागर चांदना ने पुलिस में शिकायत न की होती, तो शायद ही मामला पकड़ में आता. देरसवेर सागर चांदना के रुपए भी वापस हो जाएंगे, लेकिन हर दिन कोई दूसरा सागर इस तरह के साइबर क्राइम के जाल में उलझ रहा होता है.

इंटरनैट के जरीए शातिर लोगों को ठगने के लिए तरहतरह के हथकंडे अपनाते हैं. ऐसे लोगों से सावधान रहने की जरूरत है. इस तरह के औफर देने वाली कंपनी की अच्छी तरह से जांचपड़ताल कर लेनी चाहिए. लुभावने औफर के पीछे के राज को भी बारीकी से समझना चाहिए. पुलिस ने कंपनी के ईमेल चैक किए, तो सैकड़ों लोगों की शिकायतों का अलग फोल्डर बना हुआ था. ऐसे लोगों ने पुलिस से संपर्क शुरू कर दिया था. पुलिस ने उन खातों को सीज करा दिया, जिन में वे रकम डलवाते थे.

देहरादून के एसपी अजय सिंह कहते हैं कि साइबर अपराधियों से बचने का एकमात्र तरीका सावधानी बरतना ही है. लोगों को इस तरह के झांसे में आने से बचना चाहिए. अगर कोई गड़बड़ हो, तो तुरंत पुलिस में शिकायत करनी चाहिए.

नोटबंदी के बाद नरेंद्र मोदी सरकार कैशलैस इकोनोमी की तो वकालत ही नहीं कर रही, बल्कि इसे जबरन थोप रही है. पर नागरिकों को यह भरोसा नहीं दिला रही कि वह उन के पैसों की हिफाजत करेगी. यदि यह सब बुकिंग कैश दे कर की जाती, तो लुटे जाने का डर बहुत कम होता.                   

नदियों में भरे सिक्के, बाजार से गायब

अंधविश्वासियों और पोंगापंथ में यकीन करने वाले गंगा नदी समेत कई नदियों में सिक्के फेंक कर यह समझते हैं कि उन्होंने झटके में काफी पुण्य कमा लिया या ईश्वर को खुश कर दिया. नदी के उपर बने पुलों से गुजरने वाले ज्यादातर लोग नदियों में चंद सिक्के फेंक यह समझते हैं कि उन्होंने मां के समान नदी में चढ़ावा चढ़ा कर उसे खुश कर दिया. उन सिक्कों के फेंकने के बाद उनकी सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी, मन की हर मुराद पूरी हो जाएगी, ईश्वर उसके घर धन-दौलत की बरसात कर देगा आदि आदि. याने जितने दिमाग उतने ही तरह के भरम और बेबकूफी की मिसाल. पोंगापंथियों की इस अंधी सोच की वजह से जहां हजारों-लाखों सिक्के बर्बाद हो रहे हैं जिसकी वजह से बाजार में छोटे कारोबारी और आम आदमी सिक्कों की भारी कमी से जूझ रहे हैं.

समाज सेवी आलोक कुमार कहते हैं कि अंधविश्वास की वजह से हजारो-लाखों सिक्के रोज ही नदियों में फेंके जाते हैं. किसी भी पुल से गुजरते हर छोटी-बड़ी गाड़ियों से दनादन सिक्के नदियों में फेंके जाते हैं. पोंगापंथ के जाल में फंसे लोग समझते हैं कि नदियों में सिक्का डालने से उन्हें पुण्य मिलेगा या उनका सफर महफूज होगा. लोग यह नहीं समझते हैं कि इस तरह से पुण्य कमाने के चक्कर में रोज ही हजारों सिक्के नदियों में फेंक दिए जाते हैं, जिससे बाजार में सिक्कों की भारी किल्लत मची रहती है. आज तकनीक और विज्ञान के जमाने में भी इस तरह की मूर्खता पर रोना ही नहीं शर्म भी आती है.

पुल को पार करते समय हर बस, ट्रक, कार और रेलगाड़ियों से कई सिक्के नदी में लोग फेंकते हैं. पोंगापंथ की वजह से बाजार में सिक्कों की भारी कमी हो जाती है. बैंक औफ इंडिया में सीनियर मैनेजर सुरेश प्रसाद कहते हैं कि बाजार में हमेशा ही सिक्कों की कमी रहती है, जबकि रिजर्व बैंक बड़े पैमाने पर सिक्के बनाता रहता है. नदियों में सिक्का फेंकने, सड़कों के किनारे बने मजारों पर फेंकने, मंदिरों की दान-पेटी में डालने से हजारो लाखों सिक्के डम्प हो कर चलन से बाहर हो जाते हैं. इसके अलावा गुल्लकों में 5 और 10 के सिक्कों का जमा करने से भी लाखों सिक्के बाजार से गायब हो जाते हैं. इससे व्यापारियों के साथ-साथ आम लोगों को भी सिक्कों की कमी की वजह से परेशानियों से जूझना पड़ता है.

नदियों में जमा सिक्कों के खजाने को देखना है तो किसी भी नदी के किसी घाट पर 2-3 घंटे खड़ा हो जाइए. वहां पर दर्जनों बच्चे नदियों के अंदर छलांग लगाते रहते हैं और सिक्के ढूंढते रहते हैं. पटना के कलेक्टेरियट घाट समेत कई घाटों पर सुबह से लेकर शाम तक नंग-धडंग बच्चों का हूजूम गंगा नदी में छलांग लगाता दिख जाता है. हर बच्चे के हाथ में एक चुंबक होता है. नदी में कूदने के बाद वे उसके तल तक पहुंच जाते हैं और चुंबक को इधर-उधर घुमाते हैं. कई सिक्के चुबंक से चिपक जाते हैं. बच्चे चुबंक से छुड़ा कर सिक्कों को अपने मुंह में डाल लेते हैं और चुबंक को सतह पर इधर-उधर घुमाने लगते हैं. इस बीच कुछ और सिक्के उससे चिपक गए तो ठीक वरना सांस लेने के लिए वे पानी के सतह पर आ जाते हैं. अपने-अपने मुंह से सिक्के उगल कर उसे गिनते हैं और उसे अपने साथी को थमा देते हैं. कुछ देर तक फेफड़ों को ताजा हवा देने के लिए लंबी-लंबी सांसे खींचते है और सिक्कों की तलाश में दुबारा नदी के भीतर डुबकी लगा देते हैं.

स्कूल जाने के लिए घर से निकले 12 साल के विमल को सिक्कों की खनक गंगा के किनारे खींच लाती है. उससे पूछा गया कि वह स्कूल क्यों नहीं गया तो वह कहता है- ‘पढ़-लिख कर का करेंगे  गंगा नदी में डुबकी लगाने से कुछ पैसा मिल जाता है, जिससे उसके घर में रोटी बनती है. मेरा बाप नहीं है. अम्मा दाई का काम करती है, पर कुछ दिनों से बीमार है. 8-10 दफे नदी की गहराई में गोता लगाने पर 50-60 रूपए मिल जाते हैं.’

बाजार में सिक्कों की कमी की वजह से ‘चौकलेट सिक्का’ धडल्ले से चलने लगा है. इस सिक्के से करीब-करीब हर किसी का पाला पड़ चुका होगा. जब भी बाजार में कुछ छोटी-मोटी चीजें खरीदने जाते हैं तो दुकानदार खुल्ले पैसे की मांग करता है. खुल्ले पैसे नहीं रहने पर या तो दुकानदार नाक भौं सिकोड़ता है, या फिर खरीददार को सामान देने से मना कर देता है. बाजार में सिक्कों की भारी कमी को दूर करने के लिए दुकानदारों ने ‘चौकलेट सिक्का’ का चलन शुरू कर दिया है. अगर आप 47 रूपए की कोई चीज खरीदते हैं और दुकानदार को 50 का नोट थमाते हैं तो वह खुल्ले पैसे का रोना रोते हुए एक-एक रूपए का 3 चौकलेट थमा देता है. 4-5 रूपए लौटाने के बजाए दुकानदार खरीदार को उतने ही कीमत का चौकलेट थमा देता है. बेचारे ग्राहक के पास उसे चुपचाप ले लेने के सिवा और कोई चारा ही नहीं रहता है.

पटना के एक्जीविशन रोड में गिफ्ट के सामानों का कारोबार करने वाला सोमू मुखर्जी कहता है कि रोज सुबह से रात तक हम जैसे दुकानदार खुल्ले सिक्कों की कमी से जूझते रहते हैं. हरेक दिन दुकान आने के बाद सबसे पहले 5 सौ या हजार रूपए के सिक्के बैंकों से मंगवाते हैं, पर वह 2-4 घंटे में ही खत्म हो जाता है. उसके बाद तो ‘चौकलेट सिक्का’ ही उन जैसे कई दुकानदारों को फजीहत से बचाता है. कुछ लोग सिक्कों के बदले चौकलेट लेने से मना कर देते हैं, जिससे दुकानदारों और खरीदार के बीज बेवजह की तू-तू मैं-मैं भी होती रहती है.

परीक्षा के दिनों में बच्चे रहें एक्टिव

बच्‍चों की परीक्षा का समय यानी बच्चो के साथ मांओं के लिए भी तनाव का समय. इन दिनों मांओं को  बच्‍चों की परीक्षा के साथ साथ  उनकी सेहत की चिंता ज्‍यादा सताती है क्योंकि तनाव के चक्‍कर में बच्चों की सेहत बिगड़ जाती है. ऐसे में इन दिनों में तनाव कम करने के लिए बच्चों के खानपान और लाइफस्टाइल में क्या बदलाव करें जिस से बच्चे इन दिनों एक्टिव और उत्साहित रहें बता रही हैं, डाईटिशियन शिल्पा ठाकुर .

खानपान हो सही

परीक्षा के दिनों में खानपान सही रहने से बच्चो का दिमाग शांत और एक्टिव रहता है और उनका पढ़ाई में भी मन लगता है. इन दिनों में बच्चों को ब्रेकफास्ट में कुछ है हेल्दी  खाने को दें. जैंसे- ओट्स, उपमा, इडली आदि. इनमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है जिससे लगातार ग्लूकोज की सप्लाई होती रहती है. इसके अलावा इस समय उनको कुछ ऐसा खाना दें जिसे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़े और परीक्षा के दौरान बच्चे बीमार न पड़ें. जिस दिन परीक्षा हो और बच्चे का मन कुछ खाने का न हो तो उसे प्रोटीन शेक या स्मू्दी पिला कर परीक्षा देने के लिए भेजें. परीक्षा के दिनों में खानपान सही रहने से बच्चो का दिमाग शांत और एक्टिव रहता है और उनका पढ़ाई में भी मन लगता है. एक्‍जाम के दिन बच्‍चे को मैदे से बनी चीज़ें जैसे, कुकीज़, पिज़्ज़ा या बर्गर आदि  ना खिलाएं. जंक फ़ूड खाने से बच्चे को आलस आएगा और और  वह परीक्षा में अपना ध्यान नहीं लगा पायेगा.

डीहाइड्रेशन से बचाएं

इन दिनों बच्चे तनाव के कारण पानी कम पीते हैं और उन्हें डीहाइड्रेशन की समस्या हो जाती है और इस कारण वे एकाग्र हो कर पढ़ाई नहीं कर पाते. इसलिए एग्जाम के दौरान  उन्हें ताजे फलों का जूस, नींबू पानी, छाछ या ग्रीन टी पीने को दें.

व्यायाम है ज़रूरी

पूरे टाइम एक ही जगह बैठ कर पढने से बच्चा बोर जाता है इसके लिए ज़रूरी है कि वह बीच बीच में ब्रेक ले और थोड़ी देर के लिए बाहर  टहलने जाए या अपनी पसंद का कुछ काम जैसे मनपसंद संगीत सुने ऐसा करने से उसका मूड रिफ्रेश हो जाएगा और वह दोबारा पढाई में मन लगा सकेगा.

नींद हो पूरी

बच्चे परीक्षा के दौरान अच्छा प्रदर्शन करें इसके लिए बच्चो के लिए पूरी नींद लेना भी बहुत ज़रूरी होता है. नींद पूरी न होने के कारण बच्चे का दिमाग एकाग्र नहीं रह पायेगा और उसका पढाई में मन नहीं लगेगा. इसके लिए ज़रूरी है कि बच्चे रात को समय से सो जाएँ ताकि वे समय पर उठ सकें.  
गेजेट्स से रहें दूर

परीक्षा के दिनों में ध्यान रखें कि बच्चे मोबाइल का इस्तेमाल न करें इससे उनका ध्यान बंटता है और समय भी बर्बाद होता है.

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