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क्रिकेट से संन्यास लेने वाले बूम बूम अफरीदी के कुछ अनोखे रिकॉर्ड्स

पाकिस्तान के दिग्गज खिलाड़ी और पूर्व कप्तान शाहिद अफरीदी ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से रिटायरमेंट का एलान कर दिया है. इस धुआंधार ऑलराउंडर ने अपने 21 साल के लंबे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर पर विराम लगा दिया.

पिच पर आते ही बॉलर्स की धुनाई के लिए मशहूर शाहिद अफरीदी अपने फैंस के बीच बूम-बूम के नाम से तो टीम के साथी खिलाड़ियों के बीच लाला के नाम से जाने जाते हैं.

अफरीदी टेस्ट और वनडे क्रिकेट को पहले ही अलविदा कह चुके थे और सिर्फ टी-20 क्रिकेट खेल रहे थे. अफरीदी ने साल 2016 में भारत में हुई वर्ल्ड टी20 चैंपियनशिप में पाकिस्तान की कप्तानी भी की थी. इस टूर्नामेंट के बाद उन्होंने पाकिस्तान टीम की कप्तानी छोड़ दी थी लेकिन खेलते रहने की बात की थी. हालांकि तभी से ही अफरीदी के संन्यास लेने के अटकलें लगाई जाने लगी थी.

शाहिद अफरीदी साल 1996 में तब सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने श्रीलंका के खिलाफ वनडे में सिर्फ 37 गेंद में शतक जमाकर विश्व क्रिकेट में तहलका मचा दिया था. इतना ही नहीं अफरीदी ने इस कमाल को अपने दूसरे ही वनडे मैच में कर दिया था. अफरीदी की इस तूफानी सेंचुरी का रिकॉर्ड 17 साल तक बरकरार रहा था.

बल्ले के साथ-साथ शाहिद अफरीदी गेंद से भी कमाल करने में माहिर रहे. उनकी अपनी गेंदबाजी की बदौलत भी पाकिस्तान की झोली में बहुत सी जीत डाली. इसमें साल 2009 का वर्ल्ड टी20 भी शामिल है. बल्लेबाजी में जिस तरह अफरीदी अपने छक्के मारने के स्टाइल के लिए जाने जाते ठीक उसी तरह स्पिन गेंदबाजी करते हुए तेज गेंद फेंकने की उनकी कला बल्लेबाजों को होश उड़ा देती थी.

अफरीदी ने पाकिस्तान की तरफ से खेलते हुए 27 टेस्ट में 1176 रन बनाए और 48 विकेट झटके. उनका बेस्ट स्कोर 156 रन है. वहीं 398 वनडे में उन्होंने 8064 रन बनाए और 395 विकेट लिए. टी20 क्रिकेट में अफरीदी ने 1405 रन बनाए और 97 विकेट लिए. वनडे क्रिकेट में सर्वाधिक छक्के लगाने का रिकॉर्ड भी शाहिद अफरीदी के ही नाम है.

अफरीदी अपनी आक्रामक बल्लेबाजी और क्रिकेट के कई वर्ल्ड रिकॉर्ड्स को ध्वस्त करने की वजह से न केवल पाकिस्तान, बल्कि भारत समेत कई मुल्कों में क्रिकेट प्रेमियों के चहेते रहे. आइए जानते हैं उनके कुछ खास रिकॉर्ड.

 1. शाहिद अफरीदी के नाम 16 साल से अधिक समय तक वनडे क्रिकेट में सबसे तेज शतक का रिकॉर्ड रहा. श्रीलंका के खिलाफ 1996 में उन्होंने केवल 37 गेंदों पर यह रिकॉर्ड बनाया. बाद में कोरी एंडरसन ने 36 गेंदों पर यह कारनामा कर अफरीदी का रिकॉर्ड तोड़ा. हालांकि 18 जनवरी 2015 को एबी डिविलियर्स ने केवल 31 गेंदों पर यह रिकॉर्ड बड़े अंतर से अपने नाम कर लिया है. इस लिस्ट में अफरीदी अब भी तीसरे नंबर पर मौजूद हैं.

2. अफरीदी ने वनडे में सबसे अधिक छक्के जड़े. उनके नाम 351 छक्के दर्ज हैं. दूसरे नंबर पर 270 छक्के के साथ सनथ जयसूर्या का नाम है. क्रिस गेल 238 छक्कों के साथ तीसरे, जबकि महेंद्र सिंह धोनी मैक्कुलम 204 छक्कों के साथ चौथे स्थान पर हैं.

3. 2014 एशिया कप में अफरीदी ने छह छक्कों की मदद से केवल 18 गेंदों पर अर्धशतक बनाया. यह तीसरा मौका था, जब अफरीदी ने केवल 18 गेंदों पर अर्धशतक जड़ा. हालांकि वनडे में सबसे तेज अर्धशतक का रिकॉर्ड डिविलियर्स (16 गेंद) के नाम पर दर्ज है.

4. लगभग पिछले 21 सालों से शाहिद अफरीदी वनडे क्रिकेट में शतक जड़ने वाले सबसे युवा क्रिकेटर्स की लिस्ट का नेतृत्व कर रहे हैं. उन्होंने 4 अक्टूबर 1996 को केवल 16 साल 217 दिनों की उम्र में श्रीलंका के खिलाफ 102 रन बनाया.बना कर पाकिस्तान के ही सलीम इलाही को पीछे छोड़ा. फिलहाल अफगानिस्तान के उसमान गनी 17 साल 242 दिनों में शतक बना कर अफरीदी के बाद सबसे कम उम्र में शतक हासिल करने वाले बल्लेबाज हैं.

5. अफरीदी के नाम दूरी के लिहाज से सबसे बड़ा छक्का लगाने का रिकॉर्ड भी दर्ज है. उन्होंने जोहनिसबर्ग वनडे में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 17 मार्च 2013 को 48 गेंदों पर 88 रन बनाए. इस दौरान उन्होंने सात छक्के जड़े जिनमें से एक 158 मीटर की दूरी तक गया.

6. वनडे में 1000 से अधिक रन बनाने वाले क्रिकेटर्स में शाहिद अफरीदी का स्ट्राइक रेट भी पाकिस्तान के किसी भी क्रिकेटर से कहीं अधिक है. अफरीदी ने 398 मैच में 117 की स्ट्राइक रेट के साथ 8064 रन बनाए हैं. दूर दूर तक दूसरा कोई पाकिस्तानी क्रिकेटर उनके आस पास भी नहीं है.

7. सबसे अधिक मैन ऑफ द मैच जीतने वाले पाकिस्तानी क्रिकेटर हैं शाहिद अफरीदी. उन्हें उनके शानदार प्रदर्शन के लिए 32 बार यह पुरस्कार मिल चुका है. हालांकि वर्ल्ड रिकॉर्ड के लिहाज से वो इस लिस्ट में 5वें नंबर है.

8. कप्तान के रूप में क्रिकेट वर्ल्ड कप 2011 में अफरीदी ने 22 विकेट लिए थे. यह किसी भी कप्तान के द्वारा किसी एक एकदिवसीय वर्ल्ड कप टूर्नामेंट में लिया गया सर्वाधिक विकेट का रिकॉर्ड है.

9. अफरीदी सबसे अधिक विकेट लेने वाले वनडे क्रिकेटर्स की लिस्ट में पांचवें नंबर पर हैं. उन्होंने 398 मैचों में 395 विकेट लिए हैं. उनसे आगे केवल चार क्रिकेटर्स मुथैया मुरलीधरन (534 विकेट), वसीम अकरम (502 विकेट), वकार यूनिस (416 विकेट) और चमिंडा वास (400 विकेट) हैं.

10. अफरीदी तीन मौकों पर वनडे मैचों में पांच विकेट और अर्धशतक का रिकॉर्ड (वेस्टइंडीज, श्रीलंका और इंग्लैंड के खिलाफ) बना चुके हैं. ऐसा करने वाले वो एकमात्र क्रिकेटर हैं.

11. वनडे क्रिकेट में अफरीदी के नाम दूसरा सबसे बेहतरीन बॉलिंग फिगर का रिकॉर्ड दर्ज है. 2013 में वेस्टइंडीज के खिलाफ उन्होंने 12 रन देकर सात विकेट लिए थे.

12. अफरीदी के नाम दुनिया से सबसे बेहतरीन वनडे ऑलराउंडर होने का रिकॉर्ड अंकित है. वो 8,000 से अधिक रन और 350 से अधिक विकेट लेने वाले एकमात्र वनडे क्रिकेटर हैं.

13. इंटरनेशनल क्रिकेट में दो ही ऑलराउंडर हैं, जिनके नाम 10000 रन और 500 विकेट हैं. पहले जैक्स कैलिस (25534 रन और 577 विकेट) और दूसरे शाहिद अफरीदी (11185 रन, 540 विकेट)

14. पाकिस्तान की ओर से सबसे ज्यादा वनडे मैच खेलने का रिकॉर्ड भी अफरीदी के नाम ही है. वो पाकिस्तान के लिए 398 वनडे खेल चुके हैं. हालांकि ओवरऑल लिस्ट में वो पांचवें स्थान पर हैं.

15. टी-20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सबसे अधिक विकेट लेने वाले क्रिकेटर भी शाहिद अफरीदी ही हैं. उन्होंने सर्वाधिक 97 विकेट लिए हैं.

16. अफरीदी टेस्ट क्रिकेट में शतक लगाने वाले 7वें सबसे युवा क्रिकेटर हैं. 18 साल 333 दिन की उम्र में अफरीदी ने भारत के खिलाफ चेन्नई में 28 जनवरी 1999 को यह शतक जड़ा.

17. वर्ल्ड टी20 क्रिकेट टूर्नामेंट में भी सबसे अधिक विकेट लेने वाले क्रिकेटर शाहिद अफरीदी ही हैं. अब तक वो टी20 वर्ल्ड कप में 39 विकेट ले चुके हैं.

18. 2004-05 में अफरीदी ने भारत के खिलाफ बंगलुरु टेस्ट में 26 गेंदों पर अर्धशतक लगाया. यह टेस्ट क्रिकेट में पाकिस्तान के क्रिकेटर द्वारा लगाया गया दूसरा सबसे तेज अर्धशतक है. तब यह टेस्ट क्रिकेट में भी लगाया गया दूसरा सबसे तेज अर्धशतक था. हालांकि अब यह चौथा सबसे तेज अर्धशतक है. यह रिकॉर्ड मिसबाह-उल-हक (21 गेंद) के नाम है, जबकि वॉर्नर (23), कैलिस (24 गेंद) दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं.

19. 2006 में अफरीदी ने हरभजन सिंह को चार छक्के लगाकर टेस्ट क्रिकेट में लगातार गेंदों पर छक्के जड़ने के रिकॉर्ड की बराबरी की. कपिल देव ने लॉर्ड्स टेस्ट में यह रिकॉर्ड बनाया था. 2008-09 में एबी डिविलियर्स ने भी इस रिकॉर्ड की बराबरी की.

20. 2007 में अफरीदी ने श्रीलंका के खिलाफ एक ओवर की छह गेंदों पर तीन छक्के और दो चौके समेत 32 रन बनाए थे. ये तब वनडे क्रिकेट में एक ओवर में बनाया गया दूसरा सबसे बड़ा स्कोर था. तब हर्शल गिब्स सभी छह गेंदों पर छक्के जड़कर यह रिकॉर्ड पहले ही अपने नाम कर चुके थे. अफरीदी इसके अलावा दो बार एक ओवर में 28 रन और एक बार 27 रन भी बना चुके हैं.

बर्थडे स्पेशल : 61 के हुए अन्नू कपूर

बॉलीवुड को 3 दशकों से भी ज्यादा समय देने वाले अभिनेता अन्नू कपूर का आज जन्मदिन है. 20 फरवरी 1956 को मध्यप्रदेश के भोपाल शहर में पैदा हुए अन्नू, सिनेमा जगत के एक जाने माने चेहरे हैं.

आज उनके जन्मदिन पर आइऐ जानते हैं अन्नू कपूर के जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें..

1. क्या आप ये बात जानते हैं कि अन्नू कपूर के पिताजी की एक थिएटर कंपनी थी. उस वक्त तक वे और उनका परिवार एक खानाबदोश जीवन व्यतीत कर रहे थे. एक थियेटर कंपनी को चलाने की वजह से लोगों द्वारा उन्हें नौटंकीवाला नाम दे दिया गया था और उन्हें और उनके परिवार को कुछ हद तक समाज से निकाला भी दे दिया गया.

2. फिल्मों में काम करने के साथ-साथ अन्नू 92.7 एफएम अर्थात रेडियो पर एक शो सुहाना सफऱ का एक हिस्सा भी रहे. संगीत और बॉलीवुड दोनों ही उद्योग में अन्नू कपूर एक बहुत ही चर्चित चेहरा हैं.

3. ये बात आपको अवश्य जाननी चाहिए कि अन्नू कपूर, उनके साथी अभिनेता ओम पुरी के पहले साले हुआ करते थ. अन्नू की बहन सीमा कपूर ने अभिनेता ओम पुरी से शादी की थी, पर 3 साल बाद ही दोनो को डायवोर्स हो गया था.

4. अन्नू कपूर के आज बॉलीवुड में एक प्रसिद्ध नाम हैं और गर्व से अपने परिवार का भरण पोषण कर सकते हैं. लेकिन उनके जीवन में एक दिन वो भी था जब उन्हें भोजन भी नहीं मिला करता था. उनके शब्दों में सुने तो "एनएसडी (नेशनल स्कूल जहां वे नाटक का अध्ययन किया करते थे) जब छुट्टियों में बंद हुआ करता था, तब उनके पास खाना खरीदने के लिए भी पैसे नहीं हुआ करते थे. एक दिन जब वे दो दिनों से भूखे थे और अचानक उनकी एक सीनियर ने उन्हें और उनके दोस्तों को पंजाब भवन में अपने साथ भोजन के लिए आमंत्रित किया था, तो खाना खाए बड़े लंबे दिन होने के कारण वे वहां जल्दी पहुंच गए और आप विश्वास नहीं करेंगे कि उस दिन वे पंजाब भवन में 17 रोटी अकेले ही खा गए. वे कहते हैं कि इसीलिए वे जानते हैं कि भूख किसे कहते हैं.

5. अन्नू कपूर के जन्म के बाद उनका नाम अनिल कपूर रखा गया था, पर साल 1982 में बॉलीवुड में प्रवेश लेने के बाद उन्होंने अभिनेता अनिल कपूर से किसी भी तरह के कन्फ्यूजन से बचने के लिए अपनe नाम अन्नू रख लिया.

6. अन्नू कपूर बचपन से एक सर्जन या आइएएस बनना चाहते थे लेकिन घर में पैसे की कमी होने की समस्या की वजह से उन्हें 10वीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी.

हसबैंड बनाम बौयफ्रैंड: भाग 2

इस पर रंजन या ससुराल के किसी दूसरे सदस्य ने ऐतराज नहीं जताया तो यह उन का बड़प्पन ही था. संगीता के पति रंजन से कड़वे रिश्तों की बात जरा भी सतीश से छिपी नहीं रह गई थी. संगीता ने सतीश को जब यह बताया कि वह किस तरह पति को सबक सिखाना चाहती है तो वह अनमना हो उठा. एक अच्छे दोस्त की भूमिका निभाते हुए उस ने संगीता को ऊंचनीच समझाई, पर वह अपनी जिद पर अड़ी रही.

वह 22 दिसंबर का दिन था, जब संगीता दोनों बेटों सहित कार द्वारा कटनी से जबलपुर पहुंची. कार हमेशा की तरह ग्रोवर परिवार का भरोसेमंद ड्राइवर सूर्यप्रकाश पांडेय चला रहा था, जो मैडम के मिजाज को बेहतर समझने लगा था. जबलपुर में दाखिल होते ही संगीता ने ड्राइवर को समदडिया मौल चलने को कह कर यह बता दिया कि वह वहां मैटिनी शो देखेगी.

इसी बीच वह कुछ देर के लिए एक सहेली के साथ रुकी, फिर एक पुराने परिचित की दुकान पर कार रुकवा कर उस ने कुछ दवाइयां खरीदीं. समदडिया ग्रुप महाकौशल इलाके का जानामना नाम है. यह सिविक सैंटर में बना है, जो जबलपुर का अपने आप में एक लैंडमार्क हो गया है. सूर्यप्रकाश ने कार पार्किंग में खड़ी की तो संगीता दोनों बेटों के साथ मौल में चली गई.

सूर्यप्रकाश पांडेय के अंदाजे के मुताबिक संगीता को 5-6 बजे तक वापस आ जाना चाहिए था. लेकिन जब वह 7-8 बजे तक नहीं आई तो उसे चिंता होने लगी. शायद मैडम और बच्चे शौपिंग में लग गए होंगे, यह सोच कर उस ने और इंतजार करना ही मुनासिब समझा. उस ने रात 9 बजे तक इंतजार किया.

10 बजतेबजते सूर्यप्रकाश का सब्र टूटने लगा तो उस ने डरतेडरते संगीता के मोबाइल पर फोन किया तो वह स्विच औफ मिला. कुछ नहीं सूझा तो वह मालकिन को ढूंढने मौल में जा घुसा, पर काफी देर ढूंढने के बाद भी संगीता और बच्चे कहीं नहीं दिखे तो वह घबरा गया. कुछ सोच कर उस ने तय किया कि इस की खबर मैडम की मां सुषमा कोहली को प्रेमनगर स्थित उन के घर जा कर दी जाए.

ऐसा ही उस ने किया भी. बुजुर्ग सुषमा सब कुछ तो नहीं, काफी कुछ बेटीदामाद के संबंधों के बारे में जानती थीं. संगीता गायब है और उस का फोन भी बंद है, यह सोच कर ही वह किसी अनहोनी की आशंका से कांप उठीं और तुरंत ओमती थाने पहुंच कर बेटी की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखा दी. फोन पर यह खबर दामाद रंजन को भी उन्होंने दे दी. रंजन तुरंत कटनी से जबलपुर के लिए रवाना हो गए.

ओमती थानाप्रभारी अरविंद चौबे का माथा ठनका. क्योंकि मामला एक संभ्रांत करोड़पति परिवार की बहू और 2 बेटों के गायब होने का था, जिस में अपहरण की आशंका भी थी. वह तुरंत समदडिया मौल पहुंचे और किसी सुराग की उम्मीद में गार्डों से ले कर समदडिया मौल के मुलाजिमों से संगीता और उस के बच्चों के बाबत पूछताछ की.

लेकिन कोई खास बात हाथ नहीं लगी, सिवाय इस तसल्ली के कि उन का अपहरण नहीं हुआ है. क्योंकि जबलपुर जैसे बड़े शहर के व्यस्ततम इलाके के मौल से एक साथ 3 लोगों का अपहरण इतनी शांति से संपन्न हो जाना संभव नहीं था. सीसीटीवी फुटेज से पता चला कि संगीता दोपहर 3 बजे के लगभग मौल के दूसरे दरवाजे से बाहर गई थीं.

पर वह है कहां, इस सवाल का जवाब ढूंढने की चुनौती अब पुलिस वालों के सामने थी. इधर जैसे ही मीडिया वालों को एक धनाढ्य परिवार की बहू के मौल से बगैर कुछ बताए लापता हो जाने की खबर मिली, संगीता और उस के गुमशुदा बेटों को ले कर खासा बवाल मच गया. तरहतरह के सवाल न्यूज चैनल्स पर पूछे जा रहे थे और आशंकाएं भी जताई जा रही थीं. दूसरे दिन के समाचार पत्र भी संगीता ग्रोवर की रहस्यमय गुमशुदगी से रंगे पड़े थे.

संगीता के मायके व ससुराल वालों ने भी उसे खोजना शुरू कर दिया था. परिचितों के अलावा संगीता की सभी सहेलियों से पूछताछ की गई, पर कोई भी उस के बारे में खास जानकारी नहीं दे सका.

दूसरे दिन दोपहर 12 बजे जा कर इस राज से परदा हटा, जब यह अफवाह उड़ी कि संगीता ग्रोवर ने खुदकुशी कर ली है. दरअसल लगभग 12 बजे दोपहर को एसपी कटनी को कोरियर द्वारा संगीता का 12 पृष्ठों का सुसाइड नोट मिला, जिस में विस्तार से संगीता ने अपने ससुर को संबोधित करते हुए अपनी व्यथा लिखी थी और पति रंजन ग्रोवर पर तरहतरह के गंभीर अरोप लगाए थे.

आमतौर पर इतना लंबा सुसाइड नोट कोई नहीं लिखता कि वह उपन्यास जैसा हो, इसलिए पुलिस वाले इस बात को ले कर निश्चिंत हो चुके थे कि संगीता ने बेटों सहित खुदकुशी नहीं की है. पर वह है कहां, यह जानना जरूरी हो चला था, जिस से जबलपुर कटनी में बढ़ते बवाल और सवालों की रफ्तार को रोका जा सके.

अपनी खोजबीन में पुलिस टीम जबलपुर के डुमना एयरपोर्ट गई और वहां के सीसीटीवी फुटेज खंगाले तो संगीता दोनों बेटों सहित दिल्ली जाने वाली हवाई जहाज में सवार होती दिखी, साथ ही दिखा रंजन ग्रोवर का दोस्त या संगीता का प्रेमी सतीश कोटवानी. टिकिटों की खोजबीन की गई तो 2 अहम बातें ये पता चलीं कि टिकिट 15 दिसंबर को ही बुक करा लिए गए थे और संगीता नाम बदल कर सफर कर रही थी.

उस का टिकिट जसप्रीत कोटवानी के नाम से बुक था. बताने और छिपाने को अब कुछ खास नहीं रह गया था, सिवाय इस के कि संगीता पति के दोस्त या अपने प्रेमी सतीश कोटवानी के साथ अपनी मरजी से दिल्ली गई या भागी थी और इस की वजह भी उस ने विस्तार से अपने सुसाइड नोटनुमा पत्र में लिख दिया था.

संगीता का पकड़ा जाना जरूरी था, इसलिए एसपी एम.एस. सिकरवार की हिदायत पर टीआई अरविंद चौबे ने पुलिस की एक टीम तुरंत दिल्ली के लिए रवाना कर दी. संगीता के मोबाइल फोन की लोकेशन भी दिल्ली की ही मिल रही थी.

यह पुलिस टीम दिल्ली पहुंच भी नहीं पाई थी कि संगीता के मोबाइल फोन की लोकेशन गुजरात के भावनगर की मिलने लगी. पुलिस वाले कटनी के व्यापारियों के बढ़ते गुस्से के चलते परेशान थे, इसलिए खासतौर से उन्होंने संगीता और सतीश के मोबाइल ट्रेस किए हुए थे. दिल्ली के बजाए चारों भावनगर में हैं, यह जान कर पुलिस वालों को तुरंत समझ आ गया कि इतनी जल्दी ये लोग रेल या सड़क के रास्ते तो दिल्ली से भावनगर जा नहीं सकते, जाहिर है उन्होंने फिर हवाई यात्रा की है. नाकाम चालाकी दिखाते हुए संगीता और सतीश, दोनों ने अपने सिम बदल लिए थे. पर वे मोबाइल फोन पुराना ही इस्तेमाल कर रहे थे, इसलिए उन के ईएमआईई नंबरों के जरिए उन की लोकेशन आसानी से पकड़ में आ रही थी.

तीसरे दिन पुलिस टीम ने भावनगर जा कर एक फाइव स्टार होटल से इन लोगों को पकड़ लिया. यहां भी संगीता जसप्रीत कोटवानी के नाम से ही ठहरी थी. भावनगर से अलगअलग कारों से उन्हें जबलपुर लाया गया तो मामले की सनसनी खत्म हुई, जिस का सार यह था कि खोदा पहाड़ निकली चुहिया. क्योंकि ऐसा तो आजकल बेहद आम हो चला है कि लड़कियां या बहुएं कभीकभार अपने यार के साथ भाग जाती हैं. जबलपुर आ कर संगीता ने ससुराल और पति के पास जाने से सख्ती से इनकार कर दिया तो उसे अपनी मां के पास भेज दिया गया. सतीश को उस के घर जाने दिया गया. दोनों बालिग थे और अपनीअपनी मरजी से गए थे, इसलिए उस पर किसी तरह का कोई आपराधिक कृत्य नहीं बनता था.

जबलपुर में भी संगीता अपने सुसाइड नोट वाले कथनों पर अड़ी रही, जो अब बयानों की शकल में दर्ज हुए कि उस का पति रंजन क्रूर और अय्याश है. पति से वह किस हद तक नफरत करने लगी थी, यह उस के लिखने में भी झलकता था कि उस के हाथों अंतिम संस्कार होना भी उसे गवारा नहीं. रंजन ने 5 बार उस का अबौरशन करवाया और कुछ दिनों पहले कान्हा किसली नेशनल पार्क में उसे शराब पी कर दोस्तों के साथ नाचने को मजबूर किया. अपने ससुर को संबोधित करते हुए उस ने यह भी लिखा था कि जब आप झूठे गवाह खड़े कर के हत्या के मामले से अपने भांजे को रिहा करवा सकते हैं तो बेटे की करतूत ढंकने के लिए क्या कुछ नहीं कर सकते. संगीता को डर था कि अगर वह कटनी या जबलपुर में आत्महत्या करती तो सच दुनिया के सामने नहीं आ पाता और यह सच उतना वीभत्स नहीं होता, जितना कि वह बताना चाह रही थी. पीनापिलाना आजकल आम बातें हैं. रही बात पतिपत्नी के बीच कलह की तो सिवाय बारबार गर्भपात कराए जाने के दूसरे आरोप बहुत ज्यादा गंभीर नहीं हैं.

रंजन ज्यादती और गलती कर रहा था, इस में कोई शक नहीं, पर वे कितनी गंभीर थीं, इस का फैसला अब अदालत में होगा, जहां काम भावुकता से नहीं, बल्कि गवाहों और सबूतों की बिना पर होता है. जबलपुर वापस आ कर जितना जहर पति के खिलाफ संगीता ने उगला, उस से ज्यादा अपने दोस्त सतीश की वकालत की. वह यह कहती रही कि सतीश की वजह से ही वह और उस के बेटे जिंदा बच पाए, नहीं तो उस ने खुदकुशी का इरादा कर लिया था. जाहिर है, उस की मुमकिन कोशिश यह है कि कोई उस की और सतीश की दोस्ती को गलत नजरिए से न देखे. उलट इस के पति की लड़कियों से दोस्ती को ले कर वह दुखी रहती थी तो यह दोहरापन नहीं तो और क्या है.

जवानों को मिले सही माहौल

देश सेवा और सुरक्षा में लगे एक सैनिक के फेसबुक पर आए वीडियो, जिस में उस ने अपने खानेपीने और रहनसहन की पोल खोल डाली है, से हड़कंप मच गया है. अभी कुछ दिन पहले सैनिकों का नाम ले कर देशसेवा की दुहाई देने वाली सरकार को सांप सूंघ गया है कि वह अपने उन जवानों के साथ कैसा व्यवहार करती है, जिन के नाम पर वह नोटबंदी की कतारों में खड़े लोगों को दुत्कार रही थी. देश की सेना के साथ दुर्व्यवहार की शिकायतें अकसर आती रहती हैं और बहुत जवान खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर लेते हैं, क्योंकि उन के अफसर उन्हें सही सुविधाएं नहीं देते. जब भी भरती होती है, भरती केंद्रों पर हजारों की भीड़ उमड़ जाती है, क्योंकि सेना की नौकरी आज भी सुरक्षित व कमाऊ मानी जाती है. सेना में अनुशासन और कड़ी मेहनत होती है पर जवान उसे सहने को तैयार हैं पर इस का मतलब यह नहीं कि उन के साथ मनमाना व्यवहार किया जाए.

हमारे यहां युवाओं को खासतौर पर गांवों के युवाओं को हर जगह हांका जाता है. उसी का नतीजा है कि या वे आधीअधूरी पढ़ाई कर पाते हैं या फिर बेकाबू और उद्दंड बन जाते हैं. सेना में जाने पर भी उन में वह सोच और बैलेंस नहीं पैदा होता जो युवाओं में होना चाहिए. उन के जोश और कुछ करने की इच्छा को दफन कर दिया जाता है. सेना में सारा खेल युवाओं का होता है. उन्हीं के बल पर सेनाएं चौकन्नी रहती हैं. उबाऊ दिन और डरावनी रातों में यदि गुस्सा रहे तो सैनिकों का मानसिक बैलेंस बिगड़ ही जाएगा. उन्हें सुविधाएं न दो पर जीने का साधन तो देना ही होगा. हमारे यहां का निकम्मापन सेना में भी घुसा पड़ा है जो इस बीएसएफ के जवान ने फेसबुक पर  पोस्ट किया गया है. ऐसी नौबत आना ही गलत है और चाहे सेना हो, सरकारी या प्राइवेट नौकरियां हों, जवानों को सही माहौल मिले यह जरूरी है.

देश की तरक्की के लिए जरूरी है कि युवावर्ग शांत रहे और अपनी शक्ति गुस्सा प्रकट करने में नहीं, क्रिएटिविटी दिखाने में लगाए. यदि लोग युवाओं को अनुशासन के नाम पर दबाएंगे तो देश में कुछ नया नहीं होगा, कुछ प्रगति नहीं होगी.

गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई का प्रेम

वह शक्लसूरत से भी सुंदर हैं और मन से भी. उन का पूरा नाम है सुंदर पिचाई. सुंदर देखने में भले ही भोलेभाले लगते हैं, लेकिन उन की गिनती दुनिया की प्रमुख हस्तियों में होती हैं. वह दुनिया के सब से बड़े सर्चइंजन गूगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) हैं. पिचाई के हुनर और योग्यता को पूरी दुनिया जानती है.

सुंदर अपने काम से जरूर प्रेम करते हैं, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि उन्हें अपने परिवार से प्रेम नहीं है. मजाकिया स्वभाव के सुंदर अपनी पत्नी अंजलि और दोनों बच्चों पर जान छिड़कते हैं. ऐसा हो भी क्यों न, अंजलि उन का प्यार हैं, जिन के लिए उन्हें सालों तक तपस्या करनी पड़ी थी.

सुंदर पिचाई दक्षिण भारत के रहने वाले थे, जबकि अंजलि राजस्थान के कोटा शहर की थीं. दोनों की भाषा भी अलग थी और संस्कृति भी. यहां तक कि रहनसहन और खानपान भी अलगअलग थे. सुंदर की आर्थिक स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी.

लेकिन जब प्यार परवान चढ़ता है तो न भाषा आड़े आती है, न जातिधर्म की दीवार और न अमीरीगरीबी. अंजलि और सुंदर के मामले में भी यही हुआ. सुंदर ने 23 साल पहले सन 1993 में खड़गपुर आईआईटी से ही बीटेक की डिग्री हासिल की थी. डिग्री मिलने के 23 साल बाद वह आईआईटी खड़गपुर पहुंचे थे. इसी आईआईटी के कैंपस में सुंदर और अंजलि के बीच प्यार के अंकुर फूटे थे. यहीं पढ़ाई करते हुए उन का प्यार परवान चढ़ा और दोनों ने एकदूसरे के साथ जीवन बिताने का फैसला कर लिया. लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था.

नए साल 2017 की खुशियां मनाने अमेरिका के कैलिफोर्निया से भारत आए सुंदर पिचाई ने बीती 5 जनवरी को पश्चिम बंगाल के खड़गपुर स्थित आईआईटी (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान) में अपने कैरियर, जीवन और प्रेमप्रसंग के कई किस्से सुनाए.

आईआईटी कैंपस के उन पेड़ों के झुरमुट और हाल के कोनों में जा कर झांका, जहां वह कभी अंजलि से मिला करते थे. उन्होंने पुरानी यादों में खो कर हंसते हुए कहा, ‘‘भारत में बहुत कुछ बदल गया है और तेजी से बदल रहा है, लेकिन आईआईटी का नेहरू हाल आज भी वैसा ही है, जैसा 25 साल पहले था. उस में कुछ भी नहीं बदला.’’

सुंदर पिचाई ने अपने प्यार का किस्सा सुनाते हुए कहा, ‘‘मैं अंजलि से पहली बार इसी आईआईटी कैंपस में मिला था. वह यहां मेरी क्लासमेट थी. यह गर्ल्स हौस्टल में रहती थी और मैं बौयज हौस्टल में. उस समय आज की तरह किसी के पास यूं ही चले जाना और बातें करना आसान काम नहीं था. आज हमारे पास संचार के तमाम साधन हैं, लेकिन तब न तो मोबाइल फोन थे और न ही ईमेल.

‘‘मैं ने आईआईटी में ही पहला कंप्यूटर देखा था. तब यहां बात करने में भी बड़ी परेशानी होती थी. जब कभी अंजलि से बात करने का मन होता तो हम गर्ल्स हौस्टल के सामने जा कर खड़े हो जाते थे. हौस्टल से जब कोई लड़की बाहर निकलती या अंदर जाती दिखती तो उसे अंजलि को बाहर भेजने के लिए कहते थे. वह लड़की अंदर जाती और चिल्ला कर कहती, ‘अंजलि, बाहर सुंदर खड़ा है. बुला रहा है, जा कर मिल लो.’

सुंदर ने अपने जौब की याद ताजा करते हुए कहा, ‘‘गूगल में मेरा इंटरव्यू 1 अप्रैल, 2004 को हुआ था. अप्रैल फूल वाले दिन. गूगल ने तब जीमेल लौंच किया था. 3 इंटरव्यू में मुझ से जीमेल के बारे में पूछा गया तो मुझे यही लगता रहा कि मुझे अप्रैल फूल बनाया जा रहा है. चौथे इंटरव्यू में मुझे जीमेल दिखाया गया, तब मैं कुछ बता पाया.’’

सुंदर पिचाई ने क्लास बंक करने के अपने अनुभव भी आईआईटी विद्यार्थियों को सुनाए. उन्होंने एक वाकया याद करते हुए कहा, ‘‘मैं ने स्कूल में हिंदी सीखी थी, लेकिन ज्यादा बोल नहीं पाता था. मैं चेन्नै से आया था. आईआईटी में एडमिशन लिए कुछ ही हफ्ते बीते थे. यहां मैं ने कई लोगों को आपस में ‘साले…’ बोलते हुए सुना. एक दिन मैस में किसी को बुलाने के लिए मैं ने कह दिया, ‘अबे साले…’ तब मैं समझ रहा था कि सामान्य रूप से ऐसे ही बोला जाता है. लेकिन मेरे ‘अबे साले’ कहने पर नाराज हो कर मैस वाले ने कुछ देर के लिए मैस बंद कर दी. मैस में मेरे साथी मुझ से खाने के बारे में कई तरह के सवाल करते थे. वे पूछते थे कि यह दाल है या सांभर?’’

सुंदर ने बताया कि उस समय भी रैगिंग होती थी. रैगिंग में मुझे सीनियर साथियों के लिए खड़गपुर रेलवे स्टेशन के लंबे प्लेटफार्म पर उन का लगेज उठाना पड़ा था.

सुंदर राजन पिचाई का जन्म 12 जुलाई, 1972 को मदुरै के एक तमिल ब्राह्मण परिवार में हुआ था. सुंदर की मां लक्ष्मी स्टेनोग्राफर थीं, जबकि पिता रघुनाथ पिचाई चेन्नै में बिजली उपकरण बनाने वाली एक कंपनी में वरिष्ठ इलैक्ट्रिकल इंजीनियर के पद पर काम करते थे. उन का बचपन मद्रास में बीता, जिसे अब चेन्नै कहा जाता है.

उन का परिवार चेन्नै के अशोकनगर में 2 कमरों के मकान में रहता था. सुंदर ने 10वीं तक की पढ़ाई आईआईटी मद्रास कैंपस स्थित जवाहर विद्यालय से की. इस के बाद उन्होंने चेन्नै के वानावाणी मैट्रिकुलेशन हायर सैकेंडरी स्कूल से हायर सैकेंडरी की पढ़ाई की. उस दौर में सुंदर अपने स्कूल की क्रिकेट टीम के कप्तान थे.

सुंदर आईआईटी में प्रवेश लेना चाहते थे. इस के लिए वह पढ़ाई में खूब मेहनत कर रहे थे. वह चाहते थे कि किसी तरह मद्रास आईआईटी में इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में एडमिशन मिल जाए, लेकिन उन की रैंक उस के अनुरूप नहीं थी. फलस्वरूप उन्हें आईआईटी खड़गपुर में मेटालर्जिकल इंजीनियरिंग में एडमिशन लेना पड़ा.

दक्षिण भारतीय सुंदर पिचाई के प्यार में रंग कर उन की अर्द्धांगिनी बनी अंजलि के पिता होलाराम हरियानी राजस्थान के कोटा में राजकीय पौलीटेक्निक में अध्यापक थे. अंजलि की मां का नाम नीलू था. होलाराम के एक बेटा और एक बेटी थी. उन का बेटा अमित न्यूजर्सी में एक कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर है.

अंजलि ने हायर सैकेंडरी की पढ़ाई के बाद सन 1989 में खड़गपुर आईआईटी में एडमिशन लिया था. वह कैमिकल इंजीनियरिंग में बीटेक कर रही थीं. आईआईटी में ही उन की मुलाकात सुंदर से हुई थी. उन्होंने भी सन 1989 में ही आईआईटी खड़गपुर में एडमिशन लिया था. वह मेटालर्जिकल इंजीनियरिंग में बीटेक कर रहे थे.

तमिलनाडु के रहने वाले सुंदर राजन पिचाई के लिए पश्चिम बंगाल के शहर खड़गपुर स्थित आईआईटी पूरी तरह से अंजान था. यही हाल अंजलि का भी था. कोटा से खड़गपुर पहुंची अंजलि भी इस शहर से अंजान थी. आईआईटी में देश के विभिन्न राज्यों के विद्यार्थी पढ़ते थे. स्कूल से निकल कर एकदम नए शहर, नए माहौल और नए दोस्तों में खुद को एडजस्ट करने में सभी को परेशानी आती है.

सब का रहनाखाना बोलीभाषा और पहनावा अलगअलग था. सभी अलगअलग माहौल में पढ़ कर आए थे. कोई गांव में पढ़ा था तो कोई शहर में. किसी ने इंगलिश मीडियम से पढ़ाई की थी तो किसी ने हिंदी से.

उम्र भी ऐसी कि जीवन का कोई अनुभव नहीं था. किशोरावस्था से निकल कर जवानी की दहलीज पर खड़े युवाओं को हौस्टल की दुनिया कुछ अजीब सी लगती है. ऐसी स्थितियों में खुद को नए माहौल में एडजस्ट करने के लिए हर विद्यार्थी अपने लिए कोई ऐसा सहयोगी तलाशता है, जो पढ़ाई में मदद कर सके.

आईआईटी में सुंदर और अंजलि की फैकल्टी अलगअलग थी. फिर भी दोनों के कुछ सब्जेक्ट कौमन थे. सुंदर की याद्दाश्त गजब की थी. वह एक बार जो पढ़ लेते थे, याद हो जाता था. क्लासरूम में वह जवाब देने में सभी साथियों से आगे रहते थे. इस मामले में अंजलि भी कुछ कम नहीं थी.

बीटेक के पहले साल में ही अंजलि सुंदर की कुशाग्रता को ले कर प्रभावित हो गईं. कभी कोई कठिन सवाल होता तो वह सुंदर से पूछ लेतीं. सुंदर उन्हें अच्छे तरीके से समझा देते. अंजलि को उन का सवाल समझाने का तरीका पसंद आ गया. अगर सुंदर को भी कोई सवाल कठिन लगता तो वह अंजलि से पूछ लेते.

आईआईटी की पढ़ाई सब से कठिन मानी जाती है. केवल क्लासरूम की पढ़ाई से ही काम नहीं चलता. घर हो या हौस्टल, सब कुछ भूल कर ज्यादा से ज्यादा समय पढ़ाई करनी होती है. जो वास्तव में कुछ बनना चाहते हैं, वे केवल सोने और जरूरी दिनचर्या के कामों के अलावा पढ़ाई में ही लगे रहते हैं. यहां तक कि वे खेल और मनोरंजन से ज्यादा महत्त्व पढ़ाई को देते हैं.

जाहिर है इस स्थिति में घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर हौस्टल में रह कर पढ़ाई करने वाले स्टूडेंट काफी परेशान रहते हैं. सुंदर और अंजलि भी परेशान थे. इसलिए क्लासरूम के बाहर भी वे आईआईटी कैंपस में किताबों में खोए रहते थे. इसी पढ़ाई के दौरान दोनों कब एकदूसरे को चाहने लगे, पता ही नहीं चला. बीटेक का पहला साल इसी तरह बीत गया.

दूसरे साल की पढ़ाई शुरू होतेहोते उन की चाहत और भी बढ़ गई. लेकिन 25 साल पहले किसी लड़की से मिलना आसान नहीं था. वह भी खड़गपुर आईआईटी में, जहां काफी सख्त अनुशासन था. वैसे भी दोनों के हौस्टल अलगअलग थे. आईआईटी खड़गपुर का कैंपस बहुत बड़ा है. कैंपस में सैकड़ों विशाल पेड़ हैं. मनभावन हरियाली और जगहजगह फूलों की क्यारियां.

पढ़ाई के बहाने सुंदर और अंजलि आईआईटी के कैंपस में ही पेड़ों के झुरमुट के बीच मिलते. दोनों साथसाथ पढ़ाई भी करते और बीचबीच में मन की बातें भी. दोनों ही मध्यमवर्गीय परिवारों से थे, इसलिए उन्हें हमेशा पैसों की समस्या रहती थी.

मातापिता जो पैसे भेजते या देते थे, उसी में से खर्च चलाना पड़ता था. उन की माली हालत भले ही ज्यादा अच्छा नहीं थी, लेकिन उन के सपने बहुत ऊंचे थे. एक बार सुंदर ने मजाक करते हुए अंजलि ने कहा था, ‘‘मैं यहां से बीटेक करने के बाद 7 समंदर पार चला जाऊंगा. तब तुम क्या करोगी?’’

अंजलि ने भी सुंदर को चिढ़ाते हुए कहा था, ‘‘7 समंदर पार क्या साइकिल या स्कूटर से जाओगे? वहां जाने के लिए प्लेन में बैठना पड़ेगा. कभी बैठे हो प्लेन में?’’

‘‘आज तक तो नहीं बैठ सका हूं, लेकिन मेरा सपना है कि एयरोप्लेन में बैठूं.’’ सुंदर ने आसमान की ओर ताकते हुए कहा, ‘‘देख लेना, एक दिन मेरा यह सपना जरूर पूरा होगा. एक दिन मैं अपने इस सपने को हकीकत में बदल दूंगा.’’

अंजलि सुंदर का हौसला बढ़ाते हुए बोली, ‘‘मैं दुआ करूंगी कि तुम्हारी काबिलियत तुम्हें तुम्हारी मंजिल तक पहुंचा दे.’’

हंसीमजाक और पढ़ाई के बीच सुंदर और अंजलि की प्रेमकहानी रफ्तारफ्ता आगे बढ़ती ही गई. बीटेक के दूसरे और तीसरे साल में उन का प्यार और भी ज्यादा फलताफूलता गया. इस बीच एकदो बार वे दोस्तों के साथ हौस्टल से बाहर निकल कर खड़गपुर शहर के बाजार में घूम आए और साथसाथ फिल्म भी देखी.

आईआईटी में चौथे और अंतिम वर्ष में एक दिन जब सुंदर की क्लास खत्म हो गई तो उन्होंने क्लासरूम के बाहर मिली अंजलि को इशारे से कैंपस से बाहर चलने को कहा. एक पेड़ के नीचे पहुंच कर सुंदर ने कहा, ‘‘अंजलि, आज मुझे तुम से कुछ खास बात करनी है.’’

‘‘ऐसी क्या खास बात है?’’ अंजलि ने पूछा.

कुछ क्षण चुप रह कर सुंदर ने बिना किसी भूमिका के अंजलि को प्रपोज करते हुए कहा, ‘‘मैं तुम से प्यार करने लगा हूं. आई लव यू अंजलि.’’

सुंदर की यह बात सुन कर अंजलि झेंप गईं. वह भी सुंदर से प्यार करती थी. लेकिन कभी उन्होंने यह बात किसी पर जाहिर नहीं की थी. वैसे भी वह कोटा से सैकड़ों किलोमीटर दूर खड़गपुर में प्यार करने नहीं, बीटेक की पढ़ाई करने आई थीं.

अंजलि को चुप देख कर सुंदर ने उन का हाथ अपने हाथों में ले कर कहा, ‘‘मैं जानता हूं, तुम्हारी और हमारी संस्कृति, बोलीभाषा और रीतिरिवाज बिलकुल अलगअलग हैं, लेकिन हम दोनों का मन एक है. इन 4 सालों में मैं ने तुम्हें करीब से समझा है, इसलिए सोचसमझ कर तुम्हें प्रपोज किया है.’’

सुंदर की बातें अंजलि के दिलोदिमाग में जादू सा असर कर रही थीं. वह तो पहले से ही अपने दिल में सुंदर को बसाए थीं. बहरहाल कुछ शरमाते हुए और कुछ अदा दिखाते हुए अंजलि ने सुंदर को अपनी सहमति दे दी.

उस दिन दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ कर काफी देर तक रोमांस की बातें करते रहे. जब सूरज डूबने लगा तो उन्हें समय का अहसास हुआ. इस के बाद सुंदर बौयज हौस्टल चले गए और अंजलि गर्ल्स हौस्टल. फाइनल ईयर की पढ़ाई थी. दोनों ही अपने हौस्टल के कमरों में रात को पढ़ाई करते थे. लेकिन उस रात न तो सुंदर का मन पढ़ाई में लग रहा था और न ही अंजलि का. दोनों अपनेअपने कमरे में एकदूसरे की बातों को, शरारतों को याद करते हुए भविष्य के सपने बुनते रहे.

अगले दिन जब दोनों आईआईटी कैंपस में मिले तो सुंदर ने पूछा, ‘‘कैसी हो अंजलि?’’

‘‘मैं तो पूरी रात नहीं सो सकी.’’ अंजलि बोलीं, ‘‘लेकिन तुम जरूर रातभर खर्राटे लेते रहे होंगे.’’

‘‘अरे नहीं यार, मैं भी रात भर नहीं सो सका.’’ सुंदर ने जवाब में कहा.

कुछ देर प्रेमप्यार की बातें करने के बाद सुंदर बोले, ‘‘अभी हम लोगों की फाइनल ईयर की पढ़ाई है, जो सब से टफ है. हमें पूरी मेहनत करनी है, ताकि अच्छे मार्क्स आ सकें. अच्छे मार्क्स आ गए तो जौब भी अच्छी और जल्दी मिल जाएगी. एक बार बढि़या जौब मिल जाए, उस के बाद हम अगला कदम बढ़ाएंगे.’’

‘‘तुम ठीक कहते हो सुंदर. हमारा यह समय सब से कठिन है. इस में हमें पढ़ाई करनी है. किसी तरह अच्छे मार्क्स हासिल कर लें तो फिर कोई परेशानी नहीं होगी. अभी हम प्रेमप्यार में खोने लगे तो जिंदगी कठिन हो जाएगी.’’

रोजाना अपने प्यार के दीदार करने और छोटीमोटी बातें करने के साथ दोनों अपनी पढ़ाई में लगे रहे. सुंदर रात भर पढ़ाई करने के बाद सुबह देर तक सोते थे तो कई बार क्लास बंक कर देते थे. फिर भी सुंदर की मेहनत रंग लाई. उन्होंने बीटेक की पढ़ाई अच्छे मार्क्स से पूरी कर ली.

अंजलि को भी अच्छे मार्क्स मिले. सुंदर ने अपने बैच में सिल्वर मैडल हासिल किया. बीटेक की डिग्री हासिल कर अंजलि अपने घर कोटा चली गईं और सुंदर अपने घर चेन्नै. खड़गपुर रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़ कर चेन्नै पहुंचने पर सुंदर को पहली बार बहुत बुरा लगा था. यह बात उन्होंने इसी 5 जनवरी को खड़गपुर आईआईटी में 23 साल बाद विद्यार्थियों के सवालों के जवाब में कही.

खैर, बीटेक की डिग्री हासिल कर सुंदर जब चेन्नै पहुंचे तो वहां उन का मन नहीं लगा. एक ओर उन का मन अंजलि में उलझा था तो दूसरी तरफ वह आगे पढ़ाई करना चाहते थे. आखिर उन्होंने पढ़ाई करने का फैसला किया. उन्होंने पिता रघुनाथ पिचाई को अपने मन की बात बताई, साथ ही अंजलि से प्रेम करने की बात भी मां को बता दी. उस समय सुंदर के मातापिता ने कहा, ‘‘पहले कैरियर बना लो, फिर शादी कर लेना.’’

सुंदर आगे की पढ़ाई अमेरिका जा कर करना चाहते थे. लेकिन इस के लिए जितने पैसे चाहिए थे, उतने पिचाई परिवार के पास नहीं थे. रघुनाथ पिचाई ने बेटे सुंदर की आगे पढ़ने की ललक और उस के भविष्य को देखते हुए कर्ज लिया. कर्ज की रकम से सुंदर सन 1993 में अमेरिका पहुंच गए. वहां स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी में उन्होंने एमएस में एडमिशन लिया.

अच्छे मार्क्स होने के कारण सुंदर को स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी से स्कौलरशिप मिल गई. इस से उन्हें वहां रहने में काफी आसानी हो गई. इस के बाद उन्होंने पेंसिलवेनिया यूनिवर्सिटी के व्हार्टन स्कूल से एमबीए किया.

इस बीच मौका मिलने पर सुंदर भारत आए तो जरूर, लेकिन उन का आना बहुत कम हो पाता था. कारण यह था कि अमेरिका से हवाई यात्रा से भारत आने और वापस जाने के लिए जितना पैसा चाहिए होता था, उतना सुंदर और उन के घर वालों के पास नहीं होता था. सुंदर जब भी आते थे, अंजलि से जरूर मिलते थे. अंजलि यही शिकायत करती रहतीं कि तुम से बात करना भी मुश्किल हो गया है.

उस समय लैंडलाइन फोन का जमाना था. भारत और विदेश में बात करना बेहद मुश्किल भरा काम था. भारत में एसटीडी या विदेश में आईएसडी पर इंटरनैशनल काल करने में बहुत ज्यादा खर्च आता था. इस के अलावा लाइन मिलने में भी बहुत समय लगता था. अंजलि शिकायत करती थीं कि कई बार पास में पैसे नहीं होने के कारण वह 6-6 महीने तक उस से फोन पर बात नहीं कर पातीं.

इन सब अभावों के बावजूद अंजलि को अपने प्यार पर पूरा भरोसा था. यही हाल सुंदर का भी था, उन्हें सात समंदर पार रह रहे अपने प्यार पर खुद से ज्यादा विश्वास था. एकदूसरे के विश्वास पर ही वे अपने प्यार की कहानी आगे बढ़ाते रहे. प्यार की इस कहानी का एक छोर राजस्थान के कोटा शहर में था और दूसरा छोर अमेरिका में. दोनों के बीच हजारों मील की दूरियां थीं. लेकिन सच्चे प्यार ने दोनों में किसी को कमजोर नहीं होने दिया.

पढ़ाई पूरी करने के बाद सुंदर को अमेरिका में ही सब से पहले एक सेमी कंडक्टर बनाने वाली कंपनी में ठीकठाक नौकरी मिल गई. उस समय तक सुंदर के पास अमेरिका में न तो अपनी कार थी और न ही मकान. किराए के उस घर में सुंदर के पास टीवी भी नहीं था. नौकरी मिलने के बाद सुंदर के हाथ में पैसे आने लगे तो आर्थिक स्थिति सुधरने लगी.

इस के बाद सुंदर ने भारत आ कर दोनों परिवारों की सहमति से अंजलि से शादी कर ली. करीब 10 साल बाद उन की प्रेम तपस्या पूरी हुई. शादी के कुछ समय बाद सुंदर अंजलि को अमेरिका ले गए.

पुरानी कहावत है कि किसी भी सफलतम पुरुष के पीछे किसी न किसी महिला का हाथ होता है. सुंदर की सफलता के पीछे भी अंजलि का हाथ रहा. अंजलि से शादी के बाद सुंदर की तरक्की के रास्ते खुलते चले गए. सब से पहले उन के घर बेटी ने जन्म लिया, बेटी अब करीब 13 साल की है.

बेटी के जन्म के बाद ही सुंदर को गूगल से जौब का औफर आया. यह संयोग था कि उस समय तक गूगल के कोफाउंडर लैरी पेज इंटरव्यू लेना छोड़ चुके थे. सुंदर आज भी मजाक में कहते हैं कि गूगल में मुझे जौब इसीलिए मिली, क्योंकि लैरी ने मेरा इंटरव्यू नहीं लिया था.

यह अलग बात है कि आज सुंदर ही लैरी पेज के सब से विश्वस्त सहयोगी हैं. गूगल में जौब मिलने पर सब से पहले सुंदर को प्रोडक्ट और इनोवेशन अफसर की जिम्मेदारी दी गई. गूगल में नौकरी करते हुए ही सुंदर और अंजलि का एक बेटा हुआ. अब वह 9 साल का है.

बाद में सुंदर अपने काम, हुनर और मेहनत से तरक्की हासिल करते रहे. सन 2008 में लौंच हुए गूगल क्रोम में सुंदर की बड़ी भूमिका रही. एंड्रायड औपरेटिंग सिस्टम के डेवलपमेंट में भी सुंदर की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी. बाद मे सुंदर पिचाई गूगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) बने. उसी दौरान ट्विटर ने सुंदर को जौब औफर की, लेकिन अंजलि ने उन्हें गूगल न छोड़ने की सलाह दी.

सुंदर पिचाई आज दुनिया के जानेमाने टेक्नो लीडर हैं. अब वह अपने पूरे परिवार के साथ कैलिफोर्निया में रहते हैं. लौस अल्टोस हिल पर उन का विशाल बंगला है. क्रिसमस और नए साल की खुशियां मनाने के लिए सुंदर अपने परिवार के साथ दिसंबर, 2016 के आखिर में भारत आए.

इस दौरान उन्होंने 25 दिसंबर से 5 दिनों तक जयपुर और आसपास के इलाकों में परिवार के साथ सैरसपाटा किया. बारबार प्रयास के बावजूद उन्होंने मीडिया से बातचीत नहीं की. सुंदर की पर्सनल सिक्युरिटी के अधिकारियों के अनुसार जयपुर प्रवास के दौरान वह किसी सरकारी अधिकारी से भी नहीं मिले. 29 दिसंबर को वह जयपुर एयरपोर्ट से वापस लौट गए.

अंजलि के पिता होलाराम हरियानी की भी अनूठी प्रेम कहानी है. गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई के ससुर होलाराम हरियानी ने 73 साल की उम्र में 12 सितंबर, 2015 को 65 साल की माधुरी शर्मा से शादी की. दरअसल अंजलि की मां नीलू का सन 2013 में निधन हो गया था. उन के निधन के बाद होलाराम अकेले रह गए थे. बेटी अंजलि सुंदर के साथ कैलिफोर्निया में रहती है और बेटा न्यूजर्सी में. अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए होलाराम ने माधुरी से शादी की.

माधुरी शर्मा के पति राजेश की 4 साल पहले मौत हो गई थी. दोनों में बात हुई और फिर उन्होंने आर्यसमाज मंदिर में शादी कर ली. दोनों कोटा के नयापुरा में रहते हैं. अंजलि ने पिता को शादी की बधाई दी है.

माधुरी कोटा की ही रहने वाली हैं. उन की शादी दिल्ली के राजेश शर्मा से हुई थी. राजेश मिलिट्री की रोड कंस्ट्रक्शन विंग में थे. माधुरी के एकलौते बेटे भारत की भी सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी. बाद में वह दिल्ली से कोटा आ गईं और नयापुरा स्थित चंबल रेजीडेंसी में फ्लैट खरीद कर रहने लगीं.

पौलीटेक्निक से रिटायर्ड होलाराम हरियानी का कोटा में सिविल लाइन में मकान है. हरियानी और माधुरी कुछ महीने पहले जयपुर गोल्डन के निकट स्थित एक आश्रम में सत्संग के दौरान मिले थे. विचार मिले तो दोनों ने शादी का मन बना लिया.

होलाराम ने यह बात अपने बच्चों को बताई तो वे खुश हो कर बोले कि इस से बढि़या कुछ नहीं हो सकता. हालांकि इस शादी को ले कर होलाराम की सुंदर पिचाई से कोई बात नहीं हुई थी.

राहुल-अखिलेश की जोड़ी बदलाव की नई सियासत

उत्तर प्रदेश में नौजवान वोटर तेजी से बढ़ रहे हैं. जिन प्रदेशों में बदलाव की बयार बही, वहां नौजवानों का योगदान सब से ज्यादा रहा. दिल्ली से ले कर बिहार तक के विधानसभा चुनाव इस बात का उदाहरण रहे हैं. लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने भी इसी नौजवान तबके को अपनी ओर खींच कर बहुमत की सरकार बनाई थी. लेकिन पिछले ढाई साल की सरकार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नौजवानों को जोश में लाने वाला कोई फैसला नहीं लिया. नोटबंदीं के फैसले के बाद रोजगार की कमी और नौजवानों की नौकरियों पर आई मुसीबत ने नरेंद्र मोदी की चमक को फीका कर दिया है.

लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के वोटरों ने भाजपा को 73 सांसद दिए थे. इस हिसाब से तो विधानसभा की 3 सौ से ऊपर सीटें उस के खाते में जाती दिख रही थीं. उम्मीद थी कि भाजपा लखनऊ में फिर किसी मिश्र, शुक्ला को मुख्यमंत्री बना कर यादवों, मुसलिमों और दलितों को हाशिए पर खड़ा कर सकेगी और पाखंडों के प्रदेश में जहां गंगा के किनारे हर 4-5 मील पर धर्म की दुकानें हैं, एक बार फिर पौराणिक युग लौटेगा, जिस में ऋषिमुनि और सेवक ही होंगे. लेकिन आज उत्तर प्रदेश में भाजपा की नाव फंस चुकी है. हालत यह है कि भाजपा अब दलबदलू नेताओं से ले कर परिवारवाद के मुद्दे पर अपनी नीतियों से पीछे हट कर समझौते कर रही है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि ‘सांसद अपने परिवार के लोगों को विधानसभा का टिकट देने की सिफारिश नहीं करेंगे’. इस बात से लगा था कि भाजपा परिवारवाद के खिलाफ एक मुहिम चलाएगी. पर भाजपा ने जब टिकट बांटने शुरू किए, तो प्रधानमंत्री का यह बयान चुनावी जुमला साबित हुआ. भाजपा ने न केवल अपने दल के सांसदों के परिवार के लोगों को टिकट दिए, बल्कि दलबदल करने वाले नेताओं के परिवार वालों को भी टिकट दिए. पुश्तैनी राज करना या राजनीति करना हमारे ग्रंथों की देन है और उसे 21वीं सदी की तकनीक, मेहनत, बराबरी, संविधान की बातें खत्म कर दें, यह कैसे मंजूर है. यह बीमारी तो सभी दलों में है, फिर भाजपा क्यों उस से इनकार करे. इस के अलावा भारतीय जनता पार्टी में प्रदेश लैवल के नेताओं की अनदेखी कर जिस तरह से केवल राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की बात ही चल रही है, उस से भाजपा का कैडर बुरी तरह से नाराज हो गया है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उत्तर प्रदेश में ऊंची जाति की अहमियत को समझते हुए आरक्षण को ले कर अपनी सोच को सामने रख संदेश देने की कोशिश की है. बिहार के मुकाबले उत्तर प्रदेश में ऊंची जाति के वोट ज्यादा हैं. यहां इन के वोट चुनावी फैसला तय करते हैं. पर ऊंची जाति वालों का देश के विकास में क्या योगदान है? क्या वे खेती करते हैं? क्या वे कारखाने चलाते हैं? उत्तर प्रदेश में तो वे वैज्ञानिक भी नहीं हैं. उन्हें सिर्फ राज करना आता है.

उधर, दलितपिछड़ों की राजनीति करने वाली बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने ऊंची जाति के वोटों को सामने रख कर टिकटों का बंटवारा किया है. इन जातीय समीकरणों से अलग राहुल गांधी और अखिलेश यादव बदलाव की नई सियासत की ओर प्रदेश को ले जाने की बात कर रहे हैं. समाजवादी पार्टी के पास उत्तर प्रदेश में मजबूत संगठन है और कांग्रेस के पास नैशनल लैवल पर बेहतर नीति है. सपाकांग्रेस ने अपने बहुत सारे विरोधों को दरकिनार करते हुए इस विधानसभा चुनाव में जिस गठबंधन का फैसला किया है, उस का दूर तक असर जाएगा. सब से अच्छी बात यह है कि इन दोनों ही नेताओं की इमेज साफसुथरी और नौजवानों को पसंद आने वाली है.

सपाकांग्रेस के गठबंधन से लड़ाई त्रिकोणीय हो चुकी है. इन के एकसाथ आने से मुसलिम वोट बैंक का बिखराव रुक गया है, जिस का असर बहुजन समाज पार्टी पर पड़ने वाला है. बसपा ने यादव परिवार में बिखराव का फायदा उठाते हुए सब से ज्यादा मुसलिम उम्मीदवारों को टिकट देने का काम किया है. सपाकांग्रेस गठबंधन ने इस रणनीति को फेल कर दिया है. अब इस बात की उम्मीद जोर पकड़ने लगी है कि कहीं अंदर ही अंदर बसपा और भाजपा नई नीति बना लें, जिस से टिकटों का बंटवारा इस तरह के समीकरणों से किया जाए, ताकि सपाकांग्रेस गठबंधन की सीटें कम से कम निकल सकें.

राहुल अखिलेश हैं दोस्त  

उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होने के पहले साल 2000 में कन्नौज लोकसभा सीट से अखिलेश यादव संसद के सदस्य बने थे. यही वह दौर था, जब राहुल गांधी भी सांसद सदस्य बने थे.

साल 2004 में जब से कांग्रेस की अगुआई में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनी, तब से समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का दोस्ताना रिश्ता खट्टेमीठे अनुभवों के साथ चलता रहा.

भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस और सपा पर परिवारवाद के नाम पर हमला करती रहती थी. राहुल गांधी और अखिलेश यादव का मजाक बनाने में भाजपा ने पूरी मुहिम चला दी. राहुल गांधी को ‘पप्पू’ और अखिलेश यादव को ‘आधा मुख्यमंत्री’ साबित करने का प्रपंच शुरू किया गया.

 भाजपा को पता था कि अगर इन दोनों नेताओं को हाशिए पर धकेल दिया जाए, तो भाजपा के लिए चुनौती खत्म हो जाएगी. लोकसभा चुनाव की हार के बाद राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने मिल कर भाजपा का मुकाबला करने की कोशिश शुरू की. राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में अपनी सभाओं में अखिलेश यादव को ‘अच्छा लड़का’ कहा, तो अखिलेश यादव ने उन को ‘अच्छा दोस्त’ करार दिया. 

अखिलेश यादव ने भाजपा का नाम लिए बगैर उसे ‘चालू पार्टी’ कहना शुरू किया. राहुल गांधी ने भाजपा की सरकार को ‘सूटबूट की सरकार’ का नाम दिया. जनता को ये दोनों ही ताने पसंद आए.

भाजपा सरकार की नोटबंदी का असर उत्तर प्रदेश के गांवगांव में हुआ, क्योंकि वहां की लचर काम की आदत के चलते नए नोट देर से पहुंचे. वहां जम कर बेईमानी भी हुई.

मुसीबत में मिला सहारा

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार को कमजोर करने के बाद भाजपा ने समाजवादी पार्टी को निशाने पर लिया, जिस के चलते मुलायम परिवार में विवाद शुरू हो गया.

अखिलेश यादव के दोनों चाचा शिवपाल यादव और रामगोपाल यादव आपस में ही भाजपा से मिले होने का आरोप लगाने लगे. अखिलेश यादव की सब से बड़ी परेशानी पिता मुलायम सिंह यादव बन गए, जो पूरी तरह से बेटे के खिलाफ खड़े हो गए.

मुलायम परिवार के करीबी लोग बताते हैं कि मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव ने कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ की और राजनाथ सिंह के पैर छुए.

इस बात को भाजपा के प्रचारतंत्र ने कुछ इस तरह से इस्तेमाल किया, जैसे अपर्णा यादव भाजपा के करीब जा रही हैं. यह वही दौर था, जब मुलायम सिंह यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने घर शादी पर बुलाया था.

अफवाहों के जरीए यह बात फैलाई  गई कि भाजपा और सपा मिल गई हैं. मुलायम सिंह को इस में बलि का बकरा बनाया गया. अखिलेश खेमे को यह समझाया गया कि अमर सिंह के जरीए भाजपा ही सपा में परिवार के विवाद को हवा दे रही है.

भाजपा को उत्तर प्रदेश में सब से ज्यादा खतरा अखिलेश यादव से लग रहा था. उन की साफसुथरी इमेज भाजपा के लिए राह का रोड़ा बन रही थी. भाजपा इस कोशिश में थी कि मुसलिम वोट को सपा से अलग कर दिया जाए, तो वे मुकाबले से हट जाएंगे. ऐसे में भाजपा के लिए बसपा से मुकाबला करना और भी आसान होगा.

उधर, मुलायम सिंह पर दबाव था कि वे अखिलेश को मुख्यमंत्री की कुरसी से हटा कर खुद मुख्यमंत्री बन जाएं.

अखिलेश यादव के लिए यह सब से मुश्किल दौर था. एक तरफ पिता थे, तो दूसरी तरफ साजिशों से निबटने की चुनौती थी. अखिलेश यादव के लिए यह तय कर पाना मुश्किल था कि सलाह देने वालों में कौन सगा है और कौन पराया.

ऐसे में कांग्रेस का गांधी परिवार उन की मदद करने सामने आया. कांग्रेस खुल कर अखिलेश यादव के पक्ष में खड़ी हो गई. कांग्रेस ने इस बात के साफ संकेत दे दिए कि अगर मुलायम सिंह यादव अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री की कुरसी से हटाते हैं, तो कांग्रेस के विधायक अखिलेश यादव का साथ दे कर उन को सत्ता में बनाए रखेंगे.

कांग्रेस के इस तरह खुल कर सामने आने से मुलायम सिंह यादव को अपने कदम पीछे खींचने पड़े. इस मौके का फायदा उठा कर अखिलेश यादव ने पलटवार किया और पार्टी पर भी अपना कब्जा कर लिया.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मुलायम सिंह यादव को समझाने में अहम भूमिका निभाई. एक तरफ सोनिया गांधी ने उन्हें समझाने का काम किया, तो दूसरी ओर राहुल गांधी और प्रियंका ने अखिलेश यादव का हौसला बनाए रखा.

इस के बाद ही सपा और कांग्रेस ने यह तय किया कि अब उत्तर प्रदेश में सपाकांग्रेस गठजोड़ तैयार हो. इस को बिहार की तर्ज पर महागठबंधन बनाने की तैयारी थी.

बिहार के नेता लालू प्रसाद यादव भी इस के पक्ष में थे. मुलायम सिंह यादव से दोस्ती और रिश्तेदारी होने के बाद भी वे अखिलेश यादव के पक्ष में खड़े नजर आए. 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अड़ंगे के बाद जनता दल (यू) इस गठबंधन से बाहर हुआ. इसी तरह चौधरी अजित सिंह का राष्ट्रीय लोकदल भी गठजोड़ का हिस्सा नहीं बन सका.

आसान होगी आगे की राह

सपा और कांग्रेस के कई नेता इस पक्ष में थे कि यह गठजोड़ न बने. आखिर में अखिलेश यादव और सोनिया गांधी की बातचीत के बाद सपाकांग्रेस का गठजोड़ बन गया.

अखिलेश यादव पहले कांग्रेस को 80 से ज्यादा सीटें देने के लिए राजी नहीं थे, पर बाद में 105 सीटें देने को तैयार हो गए. कांग्रेस 105 और सपा 298 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. जीत के बाद दोनों ही दलों का एक घोषणापत्र तैयार होगा, जिस के आधार पर आगे की रणनीति तय होगी.

कांग्रेस और सपा दोनों का गठबंधन केवल उत्तर प्रदेश के चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोकसभा चुनाव और नैशनल लैवल पर भी असर डालेगा.

उत्तर प्रदेश में लंबे समय से कांग्रेस सत्ता से बाहर है. कांग्रेस को सपा से यादवमुसलिम वोट मिल सकेंगे, जिस से उस के विधायकों की तादाद पहले से ज्यादा बढ़ जाएगी. वह बिहार की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में सरकार में हिस्सेदारी करेगी. सरकार बनने पर नैशनल एजेंडा कांग्रेस का होगा और प्रदेश लैवल पर सपा का एजेंडा लागू होगा.

उत्तर प्रदेश में हिस्सेदारी का फायदा कांग्रेस को साल 2019 के लोकसभा चुनाव में मिलेगा. कांग्रेस को उत्तर प्रदेश की सत्ता में दिलचस्पी नहीं है और सपा केंद्र की सत्ता की दावेदार नहीं है. ऐसे में सपाकांग्रेस दोनों ही अपनेअपने हितों के हिसाब से काम करेंगी.

नए चेहरे की कमी

पिछड़े वर्ग के लोग जहां अखिलेश यादव में अपना प्रतिनिधि देख रहे हैं, वहीं अगड़ी और मुसलिम जातियां राहुल गांधी में असरदार नेता को देख रही हैं.  भाजपा की नीतियों से उसे साफ लग गया है कि वहां पर फैसले सामूहिक रूप से नहीं लिए जाते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तानाशाही सोच से सभी को खतरा महसूस होने लगा है. विरोधी दल ही नहीं, बल्कि भाजपा के अपने लोग भी इस बात से दुखी हैं कि भाजपा में कैडर के बजाय बाहरी नेताओं को टिकट दिया जा रहा है. भाजपा के पास प्रदेश लैवल पर कोई ऐसा नेता नहीं है, जिसे वह मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में सामने रख कर चुनाव लड़े.

बहुजन समाज पार्टी के पास मायावती का चेहरा जरूर है, पर उन्होंने कांशीराम और अंबेडकर का इस्तेमाल सिर्फ मूर्तियां बनाने में किया. उन की सोच और जातिवाद के खिलाफ लड़ाई को वे भूल गईं. उन के बयान टीवी पर आ जाते या अखबारों में छप जाते, पर गांवों में फैले अछूतदलितों की फिक्र उन्होंने अरसे से नहीं की. अखिलेश यादव के चेहरे के सामने मायावती को बढ़त हासिल नहीं हो पा रही है.

परिवार के विवाद के बाद अखिलेश यादव की लोकप्रियता में बढ़ोतरी हुई है, जिस से इस गठबंधन को वोट मिलने में आसानी होगी. प्रदेश के लोगों को राहुलअखिलेश की छवि में बेहतर नेता दिखते हैं. इस जोड़ी के मुकाबले भाजपा के पास अभी कोई नया चेहरा नहीं

है. दलबदलू नेताओं को टिकट दे कर भाजपा ने अपनी चमक को फीका किया है. यही वजह है कि कांग्रेस की रणनीति और सपा की संगठनात्मक मजबूती मिल कर सियासत की एक नई कहानी लिख सकती है.                       

अहमद पटेल और अभिषेक मिश्रा की जोड़ी

सपा और कांग्रेस के गठबंधन में पूरे चुनाव भर और चुनाव नतीजे आने के बाद कई तरह के उतारचढ़ाव आने वाले हैं. इन से लड़ने के लिए जिस राजनीतिक समझदारी और रणनीति की जरूरत है, उस में कांग्रेस की तरफ से अहमद पटेल और सपा की तरफ से अभिषेक मिश्रा की जोड़ी सब से असरदार है.

अहमद पटेल किसी नेता के विरोध को खत्म करने के लिए सोनिया गांधी को बीच में लाने का काम करते हैं, तो हर बात को समझ कर उसे अखिलेश यादव के सामने रखने की कला में अभिषेक मिश्रा सब से ज्यादा कुशल हैं. वे मुलायम सिंह यादव के भी करीब हैं, जिस से पितापुत्र के बीच बेहतर तालमेल बन सकता है. 

बहन और पत्नी की ताकत

अखिलेश यादव की दोस्ती जितनी राहुल गांधी के साथ है, उस से कहीं ज्यादा प्रियंका के साथ है. अखिलेश यादव की पत्नी और सांसद डिंपल यादव राहुल गांधी से ज्यादा उन की मां सोनिया गांधी के करीब हैं.

संसद में सदन के दौरान सोनिया और डिंपल आपस में बात करती दिखती रही हैं. राहुल गांधी की बहन प्रियंका भी डिंपल के साथ मधुर रिश्ते रखती हैं. आपसी बातचीत में दोनों ही बहुत सहज रही हैं.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में डिंपल यादव खामोशी से पति अखिलेश यादव के कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं, तो प्रियंका अपने भाई राहुल गांधी के साथ खड़ी नजर आती हैं. बहन और पत्नी का यह साथ राहुल और अखिलेश को सब से भरोसेमंद साथी देता है. ये दोनों ही सब से प्रमुख सलाहकार हैं.

सब से अच्छी बात यह है कि दोनों ही दलों का बड़े से बड़ा नेता प्रियंका और डिंपल की बात को काटने की हिम्मत नहीं रखता है. ऐसे में यह जोड़ी विधानसभा चुनाव में पीछे रह कर भी अहम भूमिका में है.

मुकाबले में भारी पड़ते अखिलेश और राहुल

उत्तर प्रदेश के चुनावी गठबंधन में 43 साल के अखिलेश यादव और 46 साल के राहुल गांधी उम्र के लिहाज से 66 साल के नरेंद्र मोदीऔर 52 साल के अमित शाह की जोड़ी पर भारी पड़ सकते हैं.

बसपा नेता मायावती अभी भी जातीय समीकरण से चुनाव जीतना चाहती हैं. यही वजह है कि उन को बारबार टिकट के दावेदार बदलने पड़ते हैं. वहीं तरक्की के नाम पर जनता ने लोकसभा चुनाव में भाजपा का साथ दिया, पर बाद में तरक्की की बात पीछे छूट गई. प्रदेश के चुनाव में भाजपा को अपनों से ज्यादा दूसरों पर यकीन करना पड़ रहा है.

राहुल गांधी और अखिलेश यादव दोनों ही एकजैसी सोच के सहारे मजबूत हो कर आगे बढ़ेंगे. चुनाव में सपा और कांग्रेस दोनों ही पुराने नेताओं के चेहरों को छोड़ आगे बढ़ी हैं. अखिलेश यादव स्मार्ट नेता के रूप में उभरे, वहीं राहुल गांधी अभी भी खुद को साबित करने में लगे हैं.

सपाकांग्रेस ने सब से कम दलबदलू नेताओं को टिकट दिए हैं. राहुलअखिलेश अकेले भले ही नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी से कमजोर दिखते हों, पर एकजुट हो कर दोनों प्रभावी हो जाते हैं. नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी उत्तर प्रदेश में बाहरी मानी जाती है, जबकि राहुलअखिलेश की राजनीति उत्तर प्रदेश में ही रही है.

नौजवानों का मिल रहा है जबरदस्त समर्थन

समाजवादी पार्टी की प्रवक्ता और बाल आयोग की अध्यक्ष जूही सिंह कहती हैं, ‘‘अखिलेश यादव ने अपने पूरे कार्यकाल में नौजवान तबका, औरतें और समाज के कमजोर तबके को ध्यान में रखते हुए काम किया है. अलगअलग तरह के तमाम चुनावी सर्वे हुए. इन में अखिलेश यादव को सब से आगे माना गया. मुख्यमंत्री के तौर पर हर किसी ने उन की भूमिका को सराहा है.

‘‘प्रदेश को जिस विकास की जरूरत है, उस के लिए नीतियां अखिलेश यादव के पास हैं. पूरी पार्टी उन के साथ मजबूती से खड़ी है.’’

जूही सिंह की गिनती अखिलेश यादव के करीबी नेताओं में होती है. वे सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के भी बेहद करीब हैं.

उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव शैलेंद्र किशोर पांडेय ‘मधुकर’ कहते हैं, ‘‘देश और प्रदेश में सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए कांग्रेस हर तरह के कदम उठाने के लिए हमेशा ही आगे रही है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जब उत्तर प्रदेश में ‘खाट सभा’ की और सोनिया गांधी की वाराणसी रैली हुई, उस समय प्रदेश के लोगों का रुझान कांग्रेस की ओर दिखने लगा था. प्रदेश में कांग्रेस सत्ता से बाहर है. ऐसे में उस के लिए अपने फैसले लागू करना मुश्किल हो गया था. अब सपा के साथ गठबंधन से नए समीकरण बने हैं, जिस का समर्थन पूरा प्रदेश कर रहा है. इस से प्रदेश के विकास को सही दिशा मिल सकेगी.

‘‘अभी तक प्रदेश में जाति और धर्म को ले कर राजनीति होती रही है, पर अब विकास की बात होगी, जिस से रोजगार के नए अवसर मिलेंगे.’’

आराधना मिश्रा ‘मोना’ कांग्रेस की विधायक हैं. उन्होंने राहुल गांधी और अखिलेश यादव दोनों के कामकाज को करीब से देखा है. वे कहती हैं, ‘‘समाज को जिस तरह की राह पर चलने की जरूरत है, दोनों नेताओं की साफ सोच उस ओर ले जाती है. आज की साफसुथरी राजनीति के वे अगुआ नेता हैं. अपनी बात कहते समय वे कभी विरोधी नेता पर ओछी टिप्पणी नहीं करते हैं. ऐसे में इस चुनाव में यह सब से बेहतरीन जोड़ी है.

‘‘दलों के बीच गठबंधन पहले भी हुए हैं. पहली बार बिना किसी पूर्वाग्रह के समझौता हुआ है. विरोधी दल इस तालमेल के बाद अपनी रणनीति बदलने में जुट गए हैं, जिस से साफ है कि इस गठबंधन की ताकत से वे डर रहे हैं.’’

लंबे समय से कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार योगेश श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘चुनावी तालमेल और दलबदल आज के दौर में कोई नई बात नहीं है. ऐसे नेता चुनाव में उतरने से पहले एक हो जाते हैं, जो कुछ दिन पहले से एकदूसरे को भलाबुरा कहते रहे. कांग्रेससपा पहले भी साथ आए हैं. पर इस बार हालात अलग हैं.

‘‘इस गठबंधन की अगुआई नई सोच के नौजवान नेता कर रहे हैं. लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने जो सपने दिखाए थे, वे पूरे नहीं हुए. इस से उपजी नाराजगी को अपने पक्ष में करने का यही सब से सही समय है. अगर सपाकांग्रेस उत्तर प्रदेश में भाजपा को घेरने में कामयाब हो गई, तो साल 2019 की आधी लड़ाई जीत लेंगी. भाजपा को इस बात का आभास है, इसलिए वह हर तरह के समझौते कर रही है.’’    

हसबैंड बनाम बौयफ्रैंड: भाग 1

जिस विलासिता और सुखसुविधाओं वाली जिंदगी के लिए मध्यम वर्गीय युवतियां मन्नतें मांगा करती हैं, वह संगीता कोहली को बैठेबिठाए मिल गई थी. एक ऐसी जिंदगी, जिस में पैसों की कोई कमी नहीं थी. धनियामिर्ची का हिसाबकिताब नहीं रखना था. महंगे कपड़े और खूब गहने थे. आलीशान मकान और बड़ीबड़ी गाडि़यां थीं. रोज शाम को शौपिंग हो सकती थी.

35 वर्षीया संगीता ने कभी सपने में भी यह सब नहीं सोचा था, जो अब उसे हासिल था. मांसल सौंदर्य की मालकिन संगीता मामूली खातेपीते परिवार की युवती थी. शादी से पहले वह जबलपुर के एक अस्पताल में रिसैप्शनिस्ट थी. सपने देखना गुनाह नहीं होता, इसलिए वह धनाढ्य ससुराल और रईस पति के ख्वाब देख लेने में कोई संकोच नहीं करती थी. एक दिन करिश्माई तरीके से उस की यह हसरत पूरी हो गई थी. उसे लगा कि कहने वाले गलत नहीं कहते कि जिंदगी में कभीकभी चमत्कार भी होते हैं. अब से कोई 13 साल पहले अस्पताल में एक खूबसूरत नौजवान मरीज इलाज के लिए आया था, ज स का नाम था रंजन ग्रोवर. वह 8 दिनों तक अस्पताल में भरती रहा. इस दौरान उस की तन की बीमारी तो ठीक हो गई, लेकिन मन का रोग प्यार लग गया.रंजन को संगीता से प्यार हो गया था. संगीता भी उसे चाहने लगी थी. पहले प्यार, उस के बाद इजहार हुआ तो शादी होने में देर नहीं लगी. रंजन ने संगीता को पाने के लिए किसी की भी परवाह नहीं की और इस बात को साबित कर दिखाया कि प्यार जातिपांत, ऊंचनीच कुछ नहीं देखता. संगीता के लिए रंजन का प्यार और शादी किसी सपने से कम नहीं थी.

कटनी के खानदानी कारोबारी करोड़पति रंजन ग्रोवर ने जब संगीता को जीवनसंगिनी के रूप में चुना तो उस की तो मानो जिंदगी ही बदल गई. उस का नाम भी बदल कर संगीता ग्रोवर हो गया. जबलपुर के प्रेमनगर के साधारण मकान में रहने वाली संगीता कटनी स्थित अपनी ससुराल के महल जैसे मकान में आई तो मैडम और मालकिन कहने वाले नौकरों की कतार लगी थी.

महाकौशल इलाके के तमाम पैसे वाले लोग इस शानदार शादी में शरीक हुए थे, जिन के लाए महंगे तोहफे देख कर ही संगीता की आंखें फटी की फटी रह गई थीं. जिस जिंदगी और दुनिया के बारे में उस ने फिल्मों और टीवी सीरियलों में देखा था, उस का हिस्सा बन कर वह अपनी किस्मत पर इतरा रही थी.

मध्यवर्गीय युवती खूबसूरत होने के साथसाथ महत्वाकांक्षी भी हो तो सोने पे सुहागा वाली कहावत को चरितार्थ करने वाली बात होती है. लेकिन कई बार यह बात नीम चढ़े करेले वाली भी साबित होती है. अभावों की जिंदगी से भाव की जिंदगी और दुनिया में आ कर उस से तालमेल बैठा पाना एकदम से आसान काम नहीं होता.

तमाम ऐशोआराम हों, लेकिन पति का प्यार और साथ धीरेधीरे छूटने लगे तो हालत पानी में रहने वाली प्यासी मछली की तरह हो जाती है. यही बीते 10 सालों से संगीता के साथ हो रहा था. जिस ने एकएक कर के 2 बेटों को जन्म दिया था, पर जाने कब और कैसे पति बेगाना होता गया, इस का उसे पता ही नहीं चला.

रंजन की रहनसहन की अपनी एक अलग स्टाइल थी. वह वर्जनाओं में जीने वाला युवक नहीं था. चूने की खदानों के लिए मशहूर महाकौशल इलाके के कटनी जिले के करोड़पति कारोबारियों की अपनी एक अलग दुनिया है, जिस में वे खुल कर जाम छलकाते हैं और देश की नीतियोंरीतियों पर बहस करते हैं.

वे अपने कारोबार की समीक्षा करते हैं और परेशान करने वाले अधिकारियों और नेताओं को सबक सिखाने के तौरतरीकों पर विचार करते हैं और फिर रात होतेहोते नशे में लड़खड़ाते लुढ़कने लगते हैं. पत्नी और नौकरों के सहारे वे कब घर पहुंच कर बिस्तर में घुस जाते हैं, इस का अहसास या अंदाजा उन्हें नहीं होता.

धनाढ्य वर्ग की जिंदगी के इस रंगीन पहलू का अपना एक अलग सच और वजह है, जो अलगअलग शहरों और इलाकों में अलगअलग तरीके से देखने में आता है. संगीता को शुरूशुरू में यह अच्छा लगा था, क्योंकि वह ऐसी ही किसी जिंदगी के ख्वाब देखती थी, जिस में सब कुछ हो.

सब कुछ हो, पर शर्त यह थी कि पति ऐसा न हो. संगीता ने कभी ऐसा नहीं सोचा था. मध्यमवर्गीय सपने और संस्कार ऐसी 2 समानांतर रेखाएं होती हैं, जो कभी कहीं जा कर नहीं मिलतीं. जिंदगी की यह ज्योमेट्री जब हकीकत में बदलने लगी तो संगीता घबरा उठी. दोनों बेटे अब बडे़ हो गए थे. लेकिन इतने बड़े भी नहीं कि बगैर मां के रह पाएं. रुद्राक्ष अभी 12 साल का था तो शिवांग 10 साल का.

बीते 3-4 सालों से संगीता को लग रहा था कि रंजन उस से दूर होने लगा है और पहले सा प्यार नहीं करता. अगर कारोबार के सिरदर्द इस की वजह होते तो पहले भी थे, पर तब तो रंजन बड़े रोमांटिक तरीके से पेश आता था. वजहें कुछ और थीं, जिस से संबंधों में पहले सी गर्माहट नहीं रह गई थी और दांपत्य दरकने लगा था.

अब संगीता को रहरह कर नौसिखिया आशिक रंजन याद आता था, जो अस्पताल में भरती रह कर उस की नजदीकियां पाने के मौके ढूंढा करता था. उसे इंप्रेस करने के लिए नएनए तरीके इस्तेमाल किया करता था. बड़ा और आलीशान मकान अब संगीता को सोने का पिंजरा लगने लगा था. अपने भीतर आते खालीपन से लड़ने में खुद को वह असमर्थ पा रही थी.

पति था, लेकिन कहने भर को था. भावनात्मक रूप से तो वह कब का उस से दूर हो चुका था. दिल में उमड़तीघुमड़ती बातें, जिन्हें भड़ास कहना बेहतर होगा को संगीता किसी के साथ शेयर करना चाहती थी, पर अब सुनने वाला कोई नहीं था. और जो सहेलियां थीं, उन में से अधिकांश इसी हालत का शिकार थीं और उन्होंने हालातों से समझौता कर लिया था.

संगीता को शक ही नहीं, बल्कि यकीन हो चला था कि रंजन भी दूसरे रईसजादों की तरह जिंदगी की राह भटक चुका है. शराब को एक बार सोसाइटी ड्रिंक मान भी लिया जाए, पर वह तो कालगर्ल्स के पास जाने लगा था. यह सोचते ही संगीता के तनबदन में आग लग जाती थी. शायद यह उस की खूबसूरती की अनदेखी और बेइज्जती थी कि पति इतनी सुंदर पत्नी के होते यहांवहां मुंह मारता फिरे.

संगीता को भरोसा ही नहीं होता था कि यह वही रंजन है, जो पहली बार प्रेग्नेंट होने की खबर सुन कर कैसे उछलने लगा था और अब 2 बच्चों के बाद एकदो नहीं, बल्कि 5 बार उस का अबौरशन करा चुका था. उस ने कई बार रंजन को समझाने की कोशिश की, पर एवज में हमेशा झिड़कियां और नसीहतें सुनने को मिलीं कि मुझे मत सिखाओ कि मुझे क्या करना है. ऐसे बेरुखे जवाब सुन कर संगीता का पारा और चढ़ जाता था.

संगीता की मजबूरी बड़े होते दोनों बेटे थे, इसलिए अकसर वह चुप रह जाया करती थी. हर रोज की कलह का बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा, यह भी वह खूब समझती थी, पर क्या करे, यह उस की समझ में नहीं आ रहा था. तय था, वह कमजोर पड़ने लगी थी. डगमगाते आत्मविश्वास को वह संभालने की जितनी कोशिश करती, उतनी ही अनुपात में बिखरती भी जाती थी. कल तक जो ऐश्वर्य, वैभव लुभाता था, वही अब उसे काटने लगा था.

पति की सभ्य आवारगी या अय्याशी से समझौता कर लेना संगीता को हार लग रहा था, इसलिए उस ने एक खतरनाक फैसला ले लिया कि क्यों न बच्चों सहित खुदकुशी कर ली जाए या फिर ऐसा कुछ किया जाए, जिस से रंजन को सबक मिले. इस खतरनाक सोच ने दांपत्य की कड़वाहट और बढ़ा दी.

कशमकश की घुटन से या कैद से छुटकारा पाने के लिए संगीता को बेहतर लगा कि कुछ किया जाए और कुछ ऐसे अंदाज में किया जाए कि पति का बदनुमा चेहरा बेनकाब हो जाए. उस की करतूतें दुनिया के सामने आ जाएं और उसे अपने किए की सजा भी मिले. बेटे भी आगे चल कर पिता की राह जाएंगे, यह सोच कर ही उस के अंदर बैठी मां कांप उठती थी. उच्च वर्ग के वैभव व विलासिता पर मध्यमवर्गीय संस्कार भारी पड़ने लगे.

उसी दौरान उस की मुलाकात सतीश कोटवानी से हुई. वह भी कटनी का ही रहने वाला खूबसूरत स्मार्ट युवक था, जिस से संगीता की पहचान फेसबुक के जरिए हुई थी. कब यह परिचय हायहैलो की औपचारिकताएं लांघ कर इतना गहरा गया कि एकदम अनौपचारिक और अंतरंग हो गया, इस का अहसास भी संगीता को अन्य नवयुवतियों की तरह नहीं हुआ.

बात केवल फेसबुक या मोबाइल फोन तक ही सीमित नहीं रही, वह सतीश से मिलने भी लगी थी और मिलने चोरीछिपे न जाना पड़े, इस के लिए उस ने उस के साथ एक जिम और फिर कोचिंग क्लास जौइन कर ली थी. अब कोई खास परदेदारी संगीता और सतीश के बीच नहीं रह गई थी.

प्यार में जहर का इंजेक्शन

26 वर्षीय रवि कुमार दिल्ली के सदर बाजार स्थित कोटक महिंद्रा बैंक में कैशियर थे. रोज की तरह 7 जनवरी, 2017 को ड्यूटी खत्म कर के वह घर जाने के लिए निकले. वह उत्तरी दिल्ली के शास्त्रीनगर में रहते थे. वह बैंक से निकले थे तो उन के साथ साथ काम करने वाले शतरुद्र भी थे. सदर दिल्ली का थोक बाजार है, जिस से वहां दिन भर भीड़ लगी रहती है. माल लाने और ले जाने वाले रिक्शों की वजह से सड़कों पर जाम सा लगा रहता है. इसी वजह से रवि कुमार शतरुद्र के साथ पैदल ही जा रहे थे.

दोनों बैंक से कुछ दूर स्थित वेस्ट एंड सिनेमा के नजदीक पहुंचे, तभी उन के बीच एक ठेले वाला आ गया, जिस से दोनों अलगअलग हो गए. उसी बीच रवि कुमार की गरदन में किसी ने सुई जैसी कोई चीज चुभो दी. गरदन में जिस जगह सुई सी चुभी थी, रवि कुमार का हाथ तुरंत उस जगह पर तो गया ही, उन्होंने पलट कर भी देखा. एक युवक उन्हें भागता दिखाई दिया तो उन्हें लगा कि उसी ने उन की गरदन में कुछ चुभाया है.

रवि कुमार ने गरदन से हाथ हटा कर देखा तो उस में खून लगा था. उन्होंने उस युवक की ओर इशारा कर के शोर मचाया कि ‘पकड़ो पकड़ो’ तो उन के साथी शतरुद्र उस युवक के पीछे भागे. सदर और खारी बावली बाजार में अकसर छिनैती की घटनाएं होती रहती हैं, इसलिए लोगों ने यही समझा कि युवक पैसे वगैरह छीन कर भागा है. कुछ अन्य लोग भी उसे पकड़ने के लिए उस के पीछे दौड़ पड़े.

बाराटूटी के पास भाग रहे उस युवक का पैर फिसल गया तो पीछे दौड़ रहे लोगों ने उसे पकड़ लिया और उस की पिटाई करने लगे. तभी किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर के उस के पकड़े जाने की सूचना दे दी. रवि अभी अपनी जगह पर ही खडे़ थे. उन का हाथ गरदन पर उसी जगह था, जहां कोई चीज चुभी थी. अब तक उन्हें चक्कर से आने लगे थे. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर गरदन पर क्या चीज चुभाई गई है. लेकिन यह साफ हो गया था कि उसी नुकीली चीज के चुभन से उन की तबीयत बिगड़ रही है. इस का मतलब वह कोई जहरीली चीज थी.

बाजार के तमाम लोग रवि को जानते थे. हमदर्दी में वे उन के पास आ कर खडे़ हो गए थे. उन्हीं लोगों में अजय साहू का बेटा इंद्रजीत भी था. अजय साहू सदर बाजार में ही कोटक महिंद्रा बैंक के पास गत्ते के डिब्बे बेचते हैं. इस में उन का बेटा इंद्रजीत हाथ बंटाता था. उस का कोटक महिंद्रा बैंक में एकाउंट था, जिस की वजह से कैशियर रवि कुमार से उस की दोस्ती थी.

रवि की बिगड़ती हालत देख कर लोग ऐंबुलैंस बुलाने की बात कर रहे थे. उस भीड़भाड़ वाली जगह में ऐंबुलैंस का जल्दी पहुंचना आसान नहीं था. इसलिए इंद्रजीत उन्हें मोटरसाइकिल से सेंट स्टीफंस अस्पताल ले गया. जांच के बाद डाक्टरों ने बताया कि जिस ने इन्हें जो भी चीज चुभोई है, उसी की वजह से इन की हालत बिगड़ रही है.

रवि की हालत देख कर साफ लग रहा था कि उन पर जहरीली दवा का असर हो रहा है. चूंकि यह पुलिस केस था, इसलिए डाक्टरों ने थाना सदर पुलिस को फोन द्वारा सूचना दे कर उन का इलाज शुरू कर दिया. शाम साढ़े 7 बजे के करीब पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना मिली थी कि सदर बाजार में बाराटूटी के पास कुछ लोगों ने एक चोर को पकड़ रखा है.

इस सूचना को थाना सदर के ड्यूटी अफसर ने एएसआई निक्काराम के नाम कर इस की जानकारी थानाप्रभारी रमेश दहिया को दे दी थी. इसी के कुछ देर बाद थाना सदर पुलिस को सेंट स्टीफंस अस्पताल से भी सूचना मिली कि कोटक महिंद्रा बैंक के कैशियर रवि कुमार को किसी ने जहरीला इंजेक्शन लगा दिया है, उन का इलाज वहां चल रहा है.

बाराटूटी थाने से लगभग 5-6 सौ मीटर ही दूर है, इसलिए एएसआई निक्काराम हैडकांस्टेबल विजय को ले कर तुरंत वहां पहुंच गए. कुछ लोग 24-25 साल के एक युवक को पकड़े थे. पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले कर पूछा तो उस ने अपना नाम डा. प्रेम सिंह बताया. थाने ला कर उस से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि वह चोर नहीं है.

‘‘तू चोर नहीं है तो लोगों ने तुझे क्यों पकड़ा?’’ थानाप्रभारी रमेश दहिया ने पूछा.

‘‘सर, मैं चोरी कर के नहीं, कोटक महिंद्रा बैंक के कैशियर रवि कुमार की गरदन पर जहर का इंजेक्शन लगा कर भाग रहा था, तभी लोगों ने मुझे पकड़ लिया था.’’ प्रेम सिंह ने कहा.

चाकू, गोली मार कर किसी की जान लेने की वारदातें तो अकसर होती रहती हैं, लेकिन राह चलते किसी को जहर का इंजेक्शन लगा कर जान लेने की कोशिश करने का यह अपनी तरह का अलग ही मामला था. इसलिए मामले की सूचना एसीपी आर.पी. गौतम और डीसीपी जतिन नरवाल को देने के बाद रमेश दहिया अतिरिक्त थानाप्रभारी इंसपेक्टर मनमोहन कुमार को साथ ले कर सेंट स्टीफंस अस्पताल पहुंच गए.

रवि कुमार के उपचार में जुटे डाक्टरों को रमेश दहिया ने बता दिया कि इन्हें जहर का इंजेक्शन लगाया गया है. डाक्टर चाहते थे कि यह पता लग जाता कि इंजेक्शन में कौन सा जहर इस्तेमाल किया गया था, जिस से उपचार में उन्हें आसानी हो जाती.

बहरहाल, डाक्टर रवि कुमार के शरीर में फैले जहर का असर कम करने की कोशिश कर रहे थे. अब तक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी आ गए थे. डीसीपी और एसीपी के सामने प्रेम सिंह से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि रवि कुमार को जो इंजेक्शन लगाया गया था, उस में कोबरा सांप के जहर के अलावा मिडाजोलम और फोर्टविन नाम के कैमिकल भी मिले थे.

पुलिस ने प्रेम कुमार के खिलाफ धारा 328 (जहर देने) का मामला दर्ज कर के जहर के बारे में मिली जानकारी रवि कुमार के इलाज में जुटे डाक्टरों को दे दी. चूंकि अब तक जहर पूरे शरीर में फैल चुका  था, इसलिए रवि कुमार की हालत चिंताजनक होती जा रही थी.

पूछताछ में पता चला कि प्रेम कुमार से यह वारदात रवि कुमार के साले बौबी ने कराई थी. रवि कुमार अपनी पत्नी सविता के साथ मारपीट कर के उसे परेशान करते थे. उन की इस हरकत से बौबी बहुत परेशान रहता था, इसीलिए उस ने अपने बहनोई की हत्या की जिम्मेदारी उसे सौंपी थी.

डीसीपी जतिन नरवाल उस समय थाने में ही मौजूद थे. बौबी की गिरफ्तारी के लिए उन्होंने एसीपी आर.पी. गौतम के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी रमेश दहिया, अतिरिक्त थानाप्रभारी मनमोहन कुमार, एसआई प्रकाश, आशीष, एएसआई निक्काराम, हैडकांस्टेबल विजय आदि को शामिल किया.

रवि कुमार का साला बौबी द्वारका की पालम कालोनी के राजनगर एक्सटेंशन पार्ट-2 में रहता था. पुलिस टीम उस के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. पुलिस उसे पकड़ कर थाने ले आई. बौबी से पूछताछ की गई तो उस ने कहा, ‘‘सर, मेरी बहन सविता तो अपनी ससुराल में खुश है. उस के पति रवि कुमार बेहद सज्जन व्यक्ति हैं, भला मैं उन के बारे में इस तरह क्यों सोचूंगा? यह जो हमला करने वाला आदमी है, इसे तो मैं जानता तक नहीं.’’

बौबी को जब पता चला कि उस के बहनोई अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं तो वह बेचैन हो उठा. उस ने फोन द्वारा यह जानकारी बहन सविता को दी. बौबी की बातों से पुलिस को लगा कि प्रेम सिंह उसे झूठा फंसाने की कोशिश कर रहा है तो पुलिस ने उसे घर जाने की इजाजत दे दी.

बौबी घर न जा कर सीधे सेंट स्टीफंस अस्पताल पहुंचा. लेकिन उस के अस्पताल पहुंचने से पहले ही रात करीब ढाई बजे उस के बहनोई रवि कुमार की मौत हो गई थी. रवि की मौत की खबर पा कर पुलिस भी अस्पताल पहुंच गई और शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

पुलिस ने मामले में हत्या की धारा जोड़ कर अगले दिन यानी 8 जनवरी, 2017 को प्रेम सिंह को तीस हजारी कोर्ट में ड्यूटी एमएम के समक्ष पेश कर सबूत जुटाने के लिए एक दिन के रिमांड पर ले लिया. चूंकि डा. प्रेम सिंह बौबी को इस मामले में झूठा फंसाना चाहता था, इस से पुलिस समझ गई कि यह आदमी बेहद शातिर है.

रिमांड अवधि के दौरान उस से की गई पूछताछ में उस ने जो सच्चाई बताई, उस के अनुसार, उस ने यह काम जिम ट्रेनर अनीश यादव के कहने पर किया था. अनीश ने इस के एवज में उसे डेढ़ लाख रुपए दिए थे.

‘‘यह अनीश यादव कौन है और वह कहां रहता है?’’ मनमोहन कुमार ने पूछा.

‘‘सर, अनीश रवि कुमार की पत्नी सविता का प्रेमी है और वह पालम कालोनी की राजनगर एक्सटेंशन पार्ट-2 में रहता है.’’ प्रेम सिंह ने बताया.

प्रेम सिंह को ले कर पुलिस टीम जिम ट्रेनर अनीश यादव के घर पहुंची तो वह भी घर पर ही मिल गया. उसे थाने ला कर पूछताछ की गई तो रवि कुमार को अनूठे तरीके से मारने की जो कहानी सामने आई, वह प्रेमप्रसंग की चाशनी में सराबोर थी—

सविता दक्षिणीपश्चिमी दिल्ली की पालम कालोनी के राजनगर एक्सटेंशन पार्ट-2 में रहने वाले सुरेशचंद की बेटी थी. सुरेशचंद उत्तर प्रदेश के जिला प्रतापगढ़ के रहने वाले थे. 15-20 साल पहले वह दिल्ली आ गए थे और औटो चलाने लगे थे. बेटी सविता के अलावा उन का एक ही बेटा था, जिस का नाम था बौबी.

छोटा परिवार था. औटो चलाने से जो कमाई होती थी, उस से परिवार का गुजरबसर बड़े आराम से हो जाता था. इसलिए उन्होंने अपने दोनों बच्चों को ठीक से पढ़ायालिखाया. पालम कालोनी में ही नवीन रहता था, जो कालेज में सविता के साथ पढ़ता था. साथ पढ़ने की वजह से दोनों में दोस्ती हो गई थी, जो बाद में प्यार में बदल गई.

राजनगर एक्सटेंशन पार्ट-2 में ही नवीन का दोस्त अनीश रहता था. पढ़ाई के साथसाथ उसे बौडी बनाने का शौक था. इस के लिए वह घंटों जिम में एक्सरसाइज करता था. नवीन ने उसे अपनी प्रेमिका सविता के बारे में सब कुछ बता दिया था. यही नहीं, उस ने सविता से उसे मिलवा भी दिया था. पहली मुलाकात में ही सविता अनीश यादव से प्रभावित हो उठी थी. किसी तरह सविता को अनीश का फोन नंबर मिल गया तो वह उस से फोन पर बातें करने लगी.

अनीश सविता के बात करने का आशय समझ गया. दरअसल सविता का झुकाव नवीन के बजाए अनीश की तरफ हो गया था. दोनों एकदूसरे को प्यार करने लगे थे. नवीन को जब इस बात का पता चला तो उसे दोस्त की बेवफाई का बड़ा दुख हुआ.

अनीश ने एक तरह से नवीन की पीठ में छुरा घोंपा था. इसलिए नवीन ने उस से हमेशा के लिए संबंध खत्म कर लिए. उधर अनीश और सविता एकदूसरे को जीजान से चाहने लगे थे. वे प्यार के उस मुकाम पर पहुंच गए थे, जहां से वापस आना आसान नहीं होता. उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया था. लेकिन वे शादी कोर्ट में करने के बजाए घर वालों की सहमति से सामाजिक रीतिरिवाज से करना चाहते थे.

दोनों ने ही यह बात अपनेअपने घर वालों को कही तो अनीश ने तो किसी तरह अपने घर वालों को राजी कर लिया, पर सविता के घर वाले राजी नहीं हुए. उस की मां तो राजी हो गई थी, पर पिता किसी भी तरह तैयार नहीं हुए. इस की वजह यह थी कि दोनों अलगअलग जाति के थे. सुरेश बेटी सविता की शादी अपनी ही जाति के लड़के से करना चाहते थे.

पिता का यह फरमान सविता को बहुत अखरा. सुरेशचंद्र कैंसर पीडि़त थे. डाक्टरों ने कह दिया था कि वह कुछ ही दिनों के मेहमान हैं. इसलिए सविता जिद कर के पिता के दिल को दुखाना नहीं चाहती थी. यह बात उस ने प्रेमी अनीश को बताई तो अरमानों पर पानी फिरने का उसे भी दुख हुआ. सविता ने घर वालों की मरजी के खिलाफ शादी करने से इनकार कर दिया.

सविता का मानना था कि उस के पिता ज्यादा दिनों के मेहमान तो हैं नहीं, इसलिए उन के गुजर जाने के बाद वह अनीश से शादी कर लेगी. लेकिन अनीश इंतजार करने को तैयार नहीं था. लिहाजा उस ने 29 फरवरी, 2016 को दिल्ली के संगम विहार की एक लड़की से शादी कर ली.

सविता को जब पता चला कि अनीश ने शादी कर ली है तो उसे बड़ा दुख हुआ. उस ने इस बात की शिकायत अनीश से की तो उस ने  कह दिया कि यह शादी घर वालों ने जबरदस्ती की है. इस पर सविता ने मन ही मन ठान लिया कि वह अनीश को किसी और लड़की का नहीं होने देगी.

सविता अनीश की बीवी से मिली और उसे अपने और अनीश के प्रेमसंबंधों के बारे में बता दिया. यही नहीं, उस ने अनीश के साथ के अपने कुछ फोटो भी उसे दिखा दिए. फोटो देख कर अनीश की पत्नी को बहुत गुस्सा आया. शाम को उस ने अनीश से पूछा तो उस ने झूठ बोल दिया.

चूंकि वह सविता के साथ उस के फोटो देख चुकी थी, इसलिए वह उस पर भड़क उठी. दोनों के बीच जम कर नोकझोंक हुई. इस का नतीजा यह निकला कि अनीश की नवविवाहिता उसे छोड़ कर मायके चली गई. वह आज तक लौट कर ससुराल नहीं आई है.

अनीश की पत्नी के चली जाने से सविता बहुत खुश हुई, क्योंकि उस के और अनीश के बीच जो दीवार खड़ी हो गई थी, वह गिर चुकी थी. लिहाजा दोनों के बीच फिर पहले की तरह संबंध हो गए. पर ये संबंध ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सके. सविता के पिता की हालत दिनबदिन बिगड़ती जा रही थी. उन की इच्छा थी कि अपने जीतेजी वह सविता के हाथ पीले कर दें.

किसी रिश्तेदार से उन्हें रवि कुमार के बारे में पता चला. रवि कुमार उत्तर प्रदेश के जिला मैनपुरी के कुआंगई गांव के रहने वाले प्रमोद कुमार का बेटा था. प्रमोद कुमार सेना से रिटायर होने के बाद कानपुर की किसी कंपनी में नौकरी कर रहे थे. रवि कुमार दिल्ली के सदर बाजार स्थित कोटक महिंद्रा बैंक में कैशियर था.

लड़की लड़का पसंद आने के बाद सुरेशचंद्र और प्रमोद कुमार ने बातचीत कर के 13 जुलाई, 2016 को सामाजिक रीतिरिवाज से उन की शादी कर दी. हालांकि सविता अनीश से ही शादी करना चाहती थी, लेकिन रिश्ता तय होने के बाद पिता की भावनाओं को ठेस पहुंचाना उस ने उचित नहीं समझा. शादी के बाद वह मैनपुरी स्थित अपनी ससुराल चली गई.

शादी के बाद सविता ने अनीश से संबंध खत्म कर लिए और पूरी तरह से ससुराल में रम गई. उस की शादी हो जाने से अनीश जल बिन मछली की तरह तड़पने लगा. सविता की वजह से ही उस की बसीबसाई गृहस्थी उजड़ी थी और अब वही उसे धोखा दे कर चली गई थी. इस का उसे बड़ा दुख हुआ.

अनीश ने सविता से बात की तो उस ने उसे अपनी मजबूरी बता दी. उस ने पति के बारे में सब कुछ बता कर वाट्सएप से उस का फोटो भी भेज दिया. जबकि वह उस की एक भी बात सुनने को तैयार नहीं था. उस ने सविता पर पति से तलाक लेने का दबाव बनाया, लेकिन वह तैयार नहीं हुई. कुल मिला कर किसी भी तरह से वह पति को छोड़ने को तैयार नहीं थी.

अनीश तो सविता के प्यार में जैसे पागल था. उस के बिना हर चीज उसे बेकार लगती थी. उस ने सदर बाजार जा कर एक बार रवि कुमार से मुलाकात भी की. उस ने उसे अपने और सविता के प्यार के बारे में बता भी दिया. इस पर रवि ने उस से कहा कि सविता शादी से पहले क्या करती थी, इस से उसे कोई मतलब नहीं है. वह उस के अतीत को नहीं जानना चाहता, अब वह उस की पत्नी है और अपनी जिम्मेदारियां ठीक से निभा रही है.

अनीश को रवि कुमार की बातों पर हैरानी हुई. वह सोचने लगा कि यह कैसा आदमी है, जो पत्नी की सच्चाई जान कर भी चुप है. बहरहाल निराश हो कर वह घर लौट आया. कहते हैं, जिम करने से ब्रेकअप का दर्द कम हो जाता है, पर अनीश तो खुद जिम टे्रनर था. इस के बावजूद वह सविता से बिछुड़ने की पीड़ा नहीं भुला पा रहा था. वह सविता को पाने के उपाय खोजने लगा.

ऐसे में ही उस के दिमाग में आइडिया आया कि अगर वह रवि की हत्या करा दे तो सविता उसे मिल सकती है. यही उसे उचित लगा. वह रवि को ठिकाने लगाने का ऐसा उपाय खोजने लगा, जिस से उस पर कोई आंच न आए. वह तरीका कौन सा हो सकता है, इस के लिए वह इंटरनेट पर सर्च करने लगा. उस ने तमाम तरीके देखे, पर हर तरीके में बाद में कातिल पकड़ा गया था.

वह ऐसे तरीके की तलाश में था, जिस में कातिल पकड़ा न गया हो. इंटरनेट पर महीनों की सर्च के बाद आखिर उसे वह तरीका मिल गया. लंदन और जर्मनी में 2 हत्याएं हुई थीं, जो पिन चुभो कर की गई थीं. पिन द्वारा जहर उन के शरीर में पहुंचाया गया था और वे मर गए थे. ठीक इसी तरह शीतयुद्ध के दौरान बुल्गारिया के रहने वाले बीबीसी के पत्रकार जर्जेई मर्कोव की हत्या की गई थी.

मर्कोव कम्युनिस्टों की निगाह में था. उन्होंने उसे मारने का फतवा भी जारी किया था. मर्कोव बस में जा रहा था, तभी एक हट्टेकट्टे आदमी ने एक छाता उस के ऊपर गिरा दिया था. इस के लिए उस आदमी ने मर्कोव से सौरी भी कहा था. मर्कोव ने भी सोचा कि छाता गलती से गिर गया होगा. लिहाजा उस ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया.

मर्कोव की जांघ में कुछ चुभा था, जहां उस ने हाथ से मसला भी था. 3 दिनों बाद उसे बहुत तेज बुखार आया और वह मर गया. यह बात सन 1978 की थी. जेम्स बौंड स्टाइल में उस छाते के पिन में रिसिन जहर लगाया गया था. रूस की खुफिया एजेंसी केजीबी ने इसे ईजाद किया था.

इस मामले में कोई पकड़ा नहीं जा सका था. इटली के जासूस पिकोडिली पर आरोप लगा था, पर कुछ साबित नहीं हो पाया था. मर्कोव खुद भी एक कैमिकल इंजीनियर था. अनीश को यह तरीका सब से अच्छा लगा.

इस के बाद वह ऐसे व्यक्ति को खोजने लगा, जो उस का यह काम कर सके. वह जहर कहां से लाए, यह भी उस के लिए समस्या थी. इस के लिए वह किसी डाक्टर की तलाश करने लगा, क्योंकि पढ़ाई के दौरान डाक्टरों को जहर के बारे में भी पढ़ाया जाता है. कोई डाक्टर उस का यह काम करने को तैयार हो जाएगा, इस बात का शंशय उस के मन में था. अनीश का एक दोस्त था डा. प्रेम सिंह. वह फिजियोथैरेपिस्ट था. प्रेम सिंह जालौन का रहने वाला था. करीब 4 साल पहले वह दिल्ली आया था. गाजियाबाद के एक इंस्टीट्यूट से फिजियोथैरेपिस्ट का कोर्स करने के बाद द्वारका के पालम विहार में उस ने अपना क्लीनिक खोला था, पर उस का काम ज्यादा अच्छा नहीं चल रहा था.

अनीश के घर के पास डा. प्रेम सिंह किसी के यहां फिजियोथैरेपी करने आता था. तभी उस की मुलाकात अनीश से हुई. अनीश भी जिम ट्रेनर था, इसलिए दोनों में दोस्ती हो गई. अपना काम कराने के लिए अनीश को प्रेम सिंह ही उचित लगा. एक दिन उस ने अपने प्रेम विरह की पीड़ा प्रेम सिंह से बता कर बीबीसी पत्रकार जर्जेई मर्कोव की तरह रवि कुमार की हत्या करने को कहा.

पढ़ाई और क्लीनिक खोलने के लिए प्रेम सिंह पर कुछ लोगों का कर्ज हो गया था. उसे पैसों की सख्त जरूरत थी. हत्या करने का जो प्लान अनीश ने उसे बताया था, उस में उस के फंसने की संभावना काफी कम थी. इसी बात को ध्यान में रख कर उस ने कहा कि इस काम को वह खुद तो नहीं करेगा, पर किसी से करवा जरूर देगा. आखिर 3 लाख रुपए में बात तय हो गई. अनीश ने डेढ़ लाख रुपए उसे एडवांस दे भी दिए.

पैसे लेने के बाद प्रेम सिंह सितंबर, 2016 में अपने गांव गया. उस के गांव के बाहर सपेरों के डेरे थे. उस ने एक सपेरे से कोबरा सांप का जहर मांगा तो उस ने उसे 7 सौ रुपए में एक, सवा एमएल जहर उसे एक सिरिंज में निकाल कर दे दिया. प्रेम सिंह जानता था कि कभीकभी सांप के जहर से भी इंसान बच जाता है.

इसलिए सांप के जहर में वह दूसरे जहर मिलाना चाहता था. उस में क्या मिलाया जाए, इस के लिए वह गूगल पर सर्च करने लगा. सर्च कर के उसे मिडाजोलम और फोर्टविन नाम की 2 दवाओं की जानकारी मिली. इन की अधिक मात्रा आदमी के लिए जानलेवा साबित होती है. इन में से फोर्टविन तो केमिस्ट के पास मिल जाती है, पर मिडाजोलम बडे़ अस्पतालों में ही मिलती है.

अनीश से पैसे ले कर प्रेम सिंह गांव में ही रुका था. जबकि अनीश फोन कर के काम जल्द करने को कह रहा था. वह कह रहा था कि अगर उस से काम नहीं हो रहा तो वह उस के पैसे लौटा दे. दबाव बढ़ने पर वह दिल्ली आ गया.

प्रेम सिंह का एक रिश्तेदार एम्स में भरती था. वह उसे देखने एम्स गया तो वहां टेबल पर उसे मिडाजोलम की शीशी दिखाई दी. 5 एमएल दवा का इंजेक्शन मरीज को लगा दिया गया था. उस में एक एमएल दवा बाकी थी. प्रेम सिंह ने उस शीशी को जेब में रख लिया. फोर्टविन उस ने एक केमिस्ट से खरीद ली. इस के बाद उस ने एक सिरिंज में कोबरा सांप का जहर, फोर्टविन और मिडाजोलम को मिला कर रख दिया.

इस के बाद वह अनीश के साथ रवि कुमार की रैकी करने लगा. 25 अक्तूबर, 2016 को दोनों ने उस का पीछा किया. उस दिन वह बिंदापुर में अपने चचिया ससुर से मिल कर लौट रहा था. जैसे ही वह औटो में बैठा, प्रेम सिंह ने इंजेक्शन लगाने के लिए सुई उस के हाथ में घुसेड़ी. सुई चुभते ही उस ने अपना हाथ घुमाया तो सुई हाथ से निकल गई. इस तरह वह उसे इंजेक्शन नहीं लगा सका.

रवि कुमार ने शोर मचाया तो प्रेम सिंह भीड़ का फायदा उठा कर जहर की सिरिंज ले कर भाग खड़ा हुआ. इस के बाद प्रेम सिंह चौकन्ना हो गया. लेकिन वह समझ नहीं पाया था कि उसे सुई लगाने वाला आखिर कौन था? उस की उस ने पुलिस में शिकायत भी नहीं की थी.

वारदात को कैसे अंजाम दिया जाए, इस बारे में प्रेम सिंह और अनीश की बात होती रहती थी. दोनों ने तय किया कि रवि कुमार ड्यूटी खत्म करने के बाद बाहर निकले तो उसे ऐसी जगह इंजेक्शन लगाया जाए कि वह जीवित न बचे. दोनों मौके की तलाश में लगे रहे. उन्हें लगा कि यह काम सदर बाजार में करना आसान रहेगा, क्योंकि वह भीड़भाड़ इलाका है.

वारदात को अंजाम देने के मकसद से 7 जनवरी, 2017 को अनीश और प्रेम सिंह द्वारका से मैट्रो पकड़ कर आर.के. आश्रम स्टेशन पर पहुंचे. वहां से ई-रिक्शा द्वारा वे सदर बाजार में बाराटूटी चौक पर पहुंचे. अनीश ने वहीं पर प्रेम सिंह को एक बोतल बीयर पिलाई. इस के बाद वे कोटक महिंद्रा बैंक की उस शाखा के नजदीक पहुंच गए, जहां रवि कुमार नौकरी करता था.

शाम सवा 7 बजे के करीब रवि कुमार अपने सहकर्मी शतरुद्र के साथ बैंक से निकला तो प्रेम सिंह उस के पीछे लग गया. जबकि अनीश वहीं खड़ा रहा. प्रेम सिंह को वेस्ट एंड सिनेमा के नजदीक जैसे ही मौका मिला, उस ने रवि की गरदन में फुरती से जहर का इंजेक्शन लगा दिया. इस बार उस ने इंजेक्शन का सारा जहर रवि के शरीर में पहुंचा दिया था.

इस के पहले अप्रैल, 2016 में चैन्नै में एक बिजनैसमैन पकड़ा गया था, जिस ने सन 2015 में इसी अंदाज में 3 लोगों को इंजेक्शन लगा कर मारा था. पहले उस ने इंजेक्शन कुत्तों पर ट्राई किए थे. इंजेक्शन को वह छाते में छिपा कर रखता था. छाते को वह जांघ में छुआ देता था. मरने वाले उन 3 लोगों में एक उस का साला भी था.

अनीश ने इंटरनेट पर महीनों तक सर्च करने के बाद रवि कुमार को मारने का जो उपाय खोजा, आखिर उस से उसे क्या हासिल हुआ? अपने किए अपराध में वह जेल तो पहुंच ही गया, साथ ही उस ने सविता की हंसतीखेलती गृहस्थी भी उजाड़ दी. प्रेम सिंह ने डाक्टर होने के बावजूद अपने पेशे को बदनाम कर के जो कृत्य किया, वह निंदनीय है. पैसे के लालच में वह अपना फर्ज भी भूल गया.

बहरहाल, थाना सदर बाजार पुलिस ने डा. प्रेम सिंह और जिम ट्रेनर अनीश यादव को गिरफ्तार कर के तीसहजारी न्यायालय में महानगर दंडाधिकारी सचिन सांगवान की कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. केस की तफ्तीश इंसपेक्टर मनमोहन कुमार कर रहे हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, सविता परिवर्तित नाम है.

ताकि ढलती उम्र में भी दिखें जवां जवां

अपनी उम्र से कम दिखना भला कौन नहीं चाहता. अगर बात महिलाओं की की जाए, तो वे अपनी बढ़ती उम्र को छिपाने के लिए कुछ भी ट्राई करने से पीछे नहीं हटतीं.

तभी तो कौस्मैटिक इंडस्ट्री ने भी बढ़ती उम्र पर लगाम लगाने वाले कई उत्पाद बाजार में उपलब्ध कराए हैं. ये उत्पाद चेहरे पर उभरती उम्र की रेखाओं को छिपाने में महिलाओं की बड़ी मदद करते हैं. मगर यह जरूरी है कि इन उत्पादों का उपयोग करने से पहले महिलाओं को इन के सही इस्तेमाल के बारे में पूरी जानकारी हो वरना इन का त्वचा पर विपरीत असर भी देखने को मिल सकता है.

कौस्मैटोलौजिस्ट, अवलीन खोखर कहती हैं, ‘‘कौस्मैटिक प्रोडक्ट्स खूबसूरती को बढ़ाने के लिए होते हैं. इन से चेहरे की कमियों को सुधारा जा सकता है, लेकिन यह जरूरी है कि उन कमियों के बारे में पता हो और उन्हें किस उत्पाद से ठीक करना है, यह भी जानकारी हो वरना उम्र कम लगने की जगह ज्यादा लगने लगती है.’’

त्वचा को करें मेकअप के लिए तैयार

अवलीन के अनुसार त्वचा पर कोई भी कौस्मैटिक उत्पाद लगाने से पहले उस का प्रकार जानना बहुत जरूरी है, क्योंकि त्वचा के अुनरूप मेकअप उत्पाद का चुनाव करने पर ही सही लुक मिलता है. बाजार में ड्राई, औयली और कौंबिनेशन स्किन के लिए अलगअलग कौस्मैटिक उत्पाद उपलब्ध हैं. सही चुनाव के साथ मेकअप के लिए त्वचा को तैयार करना भी जरूरी है. यदि त्वचा को साफ किए बगैर मेकअप किया जाए तो गंदगी स्किन पोर्स के अंदर ही रह जाती है और मेकअप की लेयर पोर्स को बंद कर देती है. इस से संक्रमण का डर रहता है. इसलिए मेकअप से पहले त्वचा की क्लीनिंग, टोनिंग और मौइश्चाराइजिंग जरूर करें. इस से मेकअप में स्मूदनैस आती है.

बचें कंसीलर के इस्तेमाल से

कंसीलर का इस्तेमाल काले धब्बों को छिपाने के लिए किया जाता है. इसे चेहरे के केवल उन हिस्सों पर लगाया जाता है जहां काले धब्बे होते हैं. मगर कुछ महिलाएं इसे पूरे चेहरे पर लगा लेती हैं. ऐसा करने से चेहरे की झाइयां उजागर होने लगती है. अवलीन कहती हैं कि कंसीलर थिक होता है और जरा सा लगाने पर ही असर दिखा देता है. ज्यादा लगाने पर यह चेहरे पर लकीरें बना देता है. कुछ महिलाएं काले घेरों को छिपाने के लिए भी कंसीलर का इस्तेमाल करती हैं, जोकि गलत है, आंखों के नीचे कंसीलर हमेशा इनर कौर्नर पर ही लगाना चाहिए. ज्यादा कंसीलर लगाने पर आंखें अलग से चमकती दिखाई देती हैं, जिस से पता लग जाता है कि आंखों पर कंसीलर लगाया गया है.

न लगाएं ज्यादा फाउंडेशन

सब से पहले फाउंडेशन का चुनाव अपनी स्किन टाइप के हिसाब से करें. मसलन, नौर्मल त्वचा वाली महिलाएं जहां मिनरल बेस्ड या फिर मौइश्चराइजर युक्त फाउंडेशन का इस्तेमाल कर सकती हैं, वहीं ड्राई त्वचा के लिए हाइड्रेटिंग फाउंडेशन उचित रहेगा. फाउंडेशन सेम स्किन कलर टोन का ही लें वरना स्किन ग्रे दिखने लगेगी. औयली त्वचा के लिए पाउडर डबल फाउंडेशन का इस्तेमाल करना चाहिए. यह त्वचा को मैटीफाई करता है.

फाउंडेशन के सही चुनाव के साथ ही इस का सही इस्तेमाल भी बहुत जरूरी है. अमूमन महिलाएं पूरे चेहरे पर फाउंडेशन की परत चढ़ा लेती हैं, जो गलत है. फाउंडेशन को चेहरे पर लगाने का सही तरीका है कि जरा सा फाउंडेशन उंगली में ले कर डैब करते हुए अच्छी तरह चेहरे पर लगाया जाए. यह उम्र के साथ त्वचा में हुए डिस्कलरेशन को दूर करता है.

कौंपैक्ट से दें फिनिशिंग

बहुत सी महिलाएं फाउंडेशन के बाद कौंपैक्ट पाउडर नहीं लगातीं. अवलीन इसे मेकअप ब्लंडर मानती हैं. वे कहती हैं कि कौंपैक्ट पाउडर मेकअप को फिनिशिंग देता है. हां, इस का भी अधिक इस्तेमाल नहीं करना चाहिए वरना चेहरे पर लकीरें उभर आती हैं.

इस का चुनाव भी सावधानी से करना चाहिए. सब से पहले तो स्किन कलर टोन के हिसाब से ही शेड चुनें. अपनी स्किन टाइप का भी ध्यान रखें. मसलन, औयली त्वचा के लिए औयल कंट्रोल मैट फिनिशिंग वाला कौंपैक्ट पाउडर तो ड्राई स्किन के लिए क्रीमी कौंपैक्ट लें. यह त्वचा को हैल्दी लुक देता है. सैंसिटिव स्किन के लिए इमोलिएंट औयल एवं वैक्स युक्त कौंपैक्ट सब से अच्छा विकल्प होता है.

आई मेकअप करें ध्यान से

यंग दिखने के लिए बहुत जरूरी है कि आई मेकअप अच्छी तरह किया गया हो. अधिकतर महिलाओं को भ्रम होता है कि आंखों पर डार्क मेकअप करने से जवां लुक आ जाता है मगर अवलीन इसे भ्रम करार देते हुए कहती हैं कि  ‘एशियन स्किन कलर टोन पर अर्थी कलर नैचुरल लगते हैं. खासतौर पर उम्र को कम दिखाने में कौपर, ब्राउन और रस्ट कलर सब से अधिक कारगर हैं. आईशेड्स में इन रंगों का ही इस्तेमाल करना चाहिए. इस बात का भी ध्यान रखें कि क्रीमी आईशेड्स न चुनें, क्योंकि ये आंखों की झुर्रियों को छिपाने में सफल नहीं होते. आईशेड्स के साथ ही आईलाइनर भी ब्राउन ही चुनें.’

आंखों का मेकअप काजल और मसकारे के बिना अधूरा है. काजल आंखों को हाईलाइट करता है. आजकल स्मजप्रूफ काजल फैशन में है इसलिए अपने लिए यही काजल चुनें. मसकारा चुनते वक्त भी थोड़ी सावधानी बरतें. बढ़ती उम्र के साथ आईलैशेज झड़ने लगती हैं. गलत मसकारे से डाउन फाल बढ़ सकता है, वहीं हाइडे्रटिंग मसकारे से आईलैशेज को मजबूती मिलती है. सही मसकारा चुनने और इस के सही इस्तेमाल से ही जवां लुक पाया जा सकता है. इसलिए मसकारे को हमेशा अपर और लोअर लैशेज पर लगाएं. इस से आंखों को बहुत अच्छा लुक मिलता है.

लिपस्टिक के ब्राइट शेड्स चुनें

वैज्ञानिक तौर पर डार्क शेड्स किसी भी सरफेस को छोटा दिखाते हैं. मगर बात जब होंठों की आती है तो इस का विपरीत प्रभाव देखने को मिलता है. डार्क शेड होंठों को बड़ा दिखाते हैं. अपनी उम्र से कम दिखना है तो न्यूड और ग्लौसी लिपस्टिक का चुनाव करें. साथ ही, यह भी ध्यान रखें कि लिपलाइनर लिपस्टिक के शेड से मैच करता हो और फटे होंठों पर लिपस्टिक न लगाएं. होंठ फटे हैं तो पहले पैट्रोलियम जैली लगा कर स्मूद कर लें.

इस तरह अगर मेकअप की बारीकियों की सही जानकारी हो तो ढलती उम्र में भी आप जवांजवां दिख सकती हैं.   

“प्रधानमंत्री ने गोद कानून का उड़ाया मजाक”

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयान यूपी ने हमें गोद ले लिया हैपर उत्तर प्रदेश राज्य बाल विकास अधिकार संरक्षण आयोग ने आपत्ति जताई है. बाल संरक्षण आयोग की सदस्य नाहिद लारी खान ने इस मसले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिख कर विरोध जताया है. नाहिद लारी खान ने इस पत्र की कॉपी केन्द्र में मुख्य चुनाव आयुक्त और प्रदेश के चुनाव आयुक्त को भेजी है.

लखनऊ में बाल संरक्षण आयोग की सदस्य नाहिद लारी खान कहती हैं कि देश में गोद लेने के संबंध में कानून बना है. इसके तहत अनाथ बच्चों को जरूरतमंद लोग गोद लेते हैं. प्रधानमंत्री एक संवैधानिक पद पर हैं. प्रधानमंत्री के बयान से ऐसे लोगों की ठेस पंहुची है.

नाहिद लारी खान कहती हैं, बाल संरक्षण आयोग का सदस्य होने के नाते हमने जानकारी मांगी है कि प्रधानमंत्री को अगर किसी ने गोद लिया है तो उससे जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत करें. अगर ऐसा नहीं है तो प्रधानमंत्री को अपने बयान के लिये माफी मांगनी चाहिये.

नाहिद लारी खान का बयान उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में नया मोड़ दे सकता है. नाहिद लारी खान ने कहा कि देश में बहुत सारे लोग संतानहीन हैं. बहुत सारे बच्चे अनाथ आश्रमों में हैं. प्रधानमंत्री ने अपने बयान से इन लोगों को आहत किया है.

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजपा की साख दांव पर लगी है. पार्टी के प्रचार प्रसार के लिये प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी से लेकर पूरी पार्टी प्रचार प्रसार में लगी है. इसको लेकर अलग अलग तरह के बयान दिये जा रहे हैं. राजधानी लखनऊ से लगे बाराबंकी जिले में चुनाव प्रचार करते प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, मैं उत्तर प्रदेश का गोद लिया बेटा हूं. यह गोद लिया बेटा मां-बाप को छोड़ेगा नहीं. जो खुद का बेटा नहीं कर पाया वह गोद लिया बेटा कर दिखायेगा.प्रधानमंत्री के बयान से साफ है कि उत्तर प्रदेश में जो भी नेता मुख्यमंत्री बनेगा वह नाम का होगा. असल राज नरेन्द्र मोदी ही करेंगे.

वैसे देखा जाय तो गोद लेने के बाद भी विकास योजनाओं का बुरा हाल है. लोकसभा चुनावों में जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सांसदों से कहा था कि वह सभी एक एक साल के लिये गांव को गोद ले कर उसका विकास करें.

शुरूआत में प्रधानमंत्री की यह योजना बहुत जोर शोर से चली पर बाद में इसका क्या हुआ? कुछ पता नहीं चल सका. पहले साल सांसदों ने अपने गोद लिये गांवों के नाम घोषित किये थे पर बाद में यह घोषणा बंद हो गई. गांव को सांसदों को गोद देने के बाद अब उत्तर प्रदेश की गोद में खुद जाने के बयान की आलोचना शुरू हो गई है. देखने वाली बात यह है कि चुनाव आयोग इसको किस तरह से लेता है.

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