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चापलूसी के देवता

कहते हैं आजादी के समय देश में 33 करोड़ देवीदेवता थे और लगभग इतनी ही देश की जनसंख्या थी. आजादी के बाद जनगणना तो हुई मगर देवगणना रुक गई. देवगणना इसलिए रुक गई क्योंकि सभी देवीदेवतागण बिना सिरपैर के थे और मात्र पंडेपुजारियों द्वारा धर्मभीरू जनता को लूटने के लिए बताएसमझाए गए थे.

मगर, इस धर्मभीरू देश में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं द्वारा धड़ल्ले से अपने नेताओं को देवता, देवी और दूसरे दल के नेताओं को दानव करार दिया गया. ज्योंज्यों चुनावी खुमार बढ़ता गया त्योंत्यों देवी, देवता और दैत्य बढ़ते गए. देश का सब से बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश इस मसले में सब से आगे निकला. सीधी बात है कि पहले अभिनेता अपने ग्लैमर के बूते आसानी से नेता बन जाया करते थे, वहीं अब नेता अपने चापलूस कार्यकर्ताओं के जरिए आसानी से देवी व देवता बन जाते हैं.

राजनीति में हर समय साम, दाम, दंड और भेद से लदे ये नेता अपने को देवता करार दिए जाने वाले छुटभैया नेताओं पर कोई रोकटोक नहीं लगाते हैं और खुद को देवता समझ शान से रहते हैं.

मामला यहीं खत्म नहीं होता है, बल्कि इन नए देवताओं के नाम पर मंदिर बन चुके हैं, चालीसा होती है, आरती होती है, भजन गाए जाते हैं. हालांकि देश का यह रिवाज बहुत ही पुराना है मगर 2014 के संसदीय चुनावों के समय से इस में गति आ चुकी है. इस भेड़चाल में जो कसर रह गई थी, वह मैसेज को इधर से उधर करने वाले व्हाट्सऐप, फेसबुक जैसे सोशल नैटवर्किंग के मैसेंजर्स ने पूरी कर दी है.

चरम पर चापलूसी : भारतीय जनमानस में खुशामद करने के लिए हददरजे की चापलूसी और बिना सिरपैर का पुराणवाद किस तरह से फलफूल रहा है, इस का अंदाजा आप कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश में छिड़े हाईस्पीड पोस्टर वार से लगा सकते हैं. छुटभैया नेताओं के ऐसा करने पर पार्टियां उन पर कोई कार्यवाही नहीं करती हैं, इसलिए उम्मीद रखिए कि नेता से देवता और डाकू से देवता बना देने की यह गंदी बात भविष्य में भी कायम रहेगी.

कहानी कृष्ण अवतार की : राज्य में भाजपा नेतृत्व ने कुछ महीनों पहले नए प्रदेश अध्यक्ष के रूप में केशव प्रसाद मौर्य की ताजपोशी की. प्रदेश अध्यक्ष के रूप में ताजपोशी होते ही केशव को वाराणसी जाना हुआ, वहां भाजपा के एक कार्यकर्ता द्वारा बड़ा पोस्टर लगाया गया जिस में केशव को सुदर्शनधारी कृष्ण के रूप में दिखाया गया था, उत्तर प्रदेश को द्रौपदी (पौराणिक महाभारत की पात्र) और सभी विपक्षी दलों के नेताओं को द्रौपदी का चीरहरण करते हुए कौरव या दुशासन के तौर पर दिखाया गया था. पोस्टर में सपा सरकार के मंत्री आजम खान, बसपा प्रमुख मायावती, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, औल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी उत्तर प्रदेशरूपी द्रौपदी का चीरहरण कर रहे हैं और वह ‘रक्षमाम केशव:’ का जाप कर रही है.

इस संबंध में पोस्टर लगवाने वाले वाराणसी के स्थानीय भाजपा नेता रूपेश पांडेय ने कुछ इस तरह सफाई दी थी, ‘‘मेरा मानना है कि आज उत्तर प्रदेश का चीरहरण हो रहा है. कांग्रेस की सरकार के दौरान गरीबी, बेरोजगारी बढ़ी. अखिलेश यादव की सरकार के दौरान गुंडाराज बढ़ा और मायावती के राज में भ्रष्टाचार बढ़ा. आजम खान सांप्रदायिकता फैला रहे हैं और ओवैसी राष्ट्रद्रोही बयान देते हैं. ऐसे में भाजपा नेतृत्व ने केशव प्रसाद मौर्य को युद्घभूमि में भेजा है.’’

दूसरा नजारा वाराणसी शहर में ही जेडीयू के राज्यस्तरीय सम्मेलन में देखा गया जिस में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को महाभारत के केंद्रीय पात्र अर्जुन के रूप में और शरद यादव को कृष्ण के रूप में दिखाया गया.

इतना सब होने के बाद भला कांग्रेस पार्टी क्यों पीछे रहती. इलाहाबाद में कांग्रेस पार्टी के स्थानीय नेताओं हसीब अहमद, श्रीशचंद्र दुबे और कादिर भाई द्वारा राहुल गांधी के रोड शो ‘किसान यात्रा’ के स्वागत के लिए एक पोस्टर शहर के बीच लगा दिया गया. पोस्टर में राहुल गांधी को युगपुरुष व महाभारत के प्रमुख पात्र अर्जुन के रूप में दिखाया गया.

इसी तरह हाल ही में प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ‘डायल 100’ सेवा शुरू करने के लिए बरेली पहुंचे. राज्य की सरकार के कारागार मंत्री बलवंत सिंह रामूवालिया ने अखिलेश की कुछ इस तरह तारीफ की, ‘‘जिस तरह द्रौपदी ने चीरहरण के समय ‘कृष्ण भइया बचाओ, कृष्ण भइया बचाओ’ की आवाज दी और कृष्ण उन को बचाने दौड़ पड़े, उसी तरह जनता अपनी परेशानी में मन से ‘अखिलेश भइया बचाओ, अखिलेश भइया बचाओ’ की आवाज देगी तो वे वहीं खड़े मिलेंगे.’’

काली और दुर्गा का दंभ : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत के आरक्षण संबंधी बयान के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में बहुजन समाज पार्टी के कार्यकर्ताओं ने एक झांकी निकाली जिस में बसपा प्रमुख मायावती को काली के रूप में प्रदर्शित किया गया था. उस झांकी में संघ प्रमुख मोहन भागवत मायावती के पैरों पर लेटे हुए थे. साथ ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मायावती के सामने हाथजोड़े खड़े थे. पोस्टर में लिखा गया था, ‘बहिनजी, हमें माफ करो, हम आरक्षण बंद नहीं करेंगे. यही नहीं, इस पोस्टर में मायावती को तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी का कटा हुआ सिर थामे दिखाया गया.

इलाहाबाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र नेता अनुराग शुक्ला द्वारा लगवाया गया पोस्टर दुर्गा का दंभ भरता नजर आया. पोस्टर में बसपा प्रमुख मायावती के खिलाफ विवादित बयान दे कर चर्चा में आए उत्तर प्रदेश के पूर्व भाजपा उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह को दुर्गा जबकि मायावती को शूर्पणखा के रूप में दिखाया गया. इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य को भगवान राम और दयाशंकर सिंह को लक्ष्मण के रूप में दिखाया गया. पोस्टर में पूर्व बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य को विभीषण, बसपा नेताओं सतीश चंद्र मिश्र और नसीमुद्दीन सिद्दीकी को क्रमश: मारीच व रावण के तौर पर दिखाया गया.

रामायण राग : दंगाभड़काऊ भाषण के आरोपों से घिरे गोरखपुर से भारतीय जनता पार्टी के सांसद महंत योगी आदित्यनाथ के 44वें जन्मदिन पर वहां की भाजपा अल्पसंख्यक मोरचा इकाई द्वारा लगवाया गया पोस्टर भी चापलूसी की चरमसीमा को पार करते दिखा. पोस्टर में योगी को रामरूपी अवतार में पेश किया गया. सपा, बसपा, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी व ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम समेत बाकी सभी पार्टियों को रावण के रूप में दिखाया गया. पोस्टर में लिखा गया कि उत्तर प्रदेश के राम 2017 में रावण को पराजित करेंगे. दरअसल, यह योगी समर्थकों की उन को मुख्यमंत्री पद के लिए प्रोजैक्ट करने की चापलूसी थी.

डाकू देवता : उत्तर प्रदेश में नेतागण अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए डाकुओं को भी देवता करार दे कर पूजा करवा सकते हैं. इस का ताजा उदाहरण पिछले दिनों देखने को तब मिला जब सपा विधायक द्वारा मरहूम डकैत ददुआ की पत्नी सहित मूर्ति लगवाई गई.

बता दें कि शिवकुमार पटेल उर्फ ददुआ वही डाकू था जिस के नाम पर कभी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ तीनों राज्यों के लोग थरथर कांपते थे. 2007 में राज्य की स्पैशल टास्क फोर्स द्वारा मार गिराए गए दुर्दांत ददुआ के सिर पर 7 लाख रुपए का इनाम सरकार ने घोषित कर रखा था. उस के खिलाफ अकेले उत्तर प्रदेश में विभिन्न मामलों के 241 मुकदमे दर्ज थे.

ददुआ की मूर्ति फतेहपुर जिले के धाता तहसील के अंतर्गत नरसिंहपुर कबरहा

गांव में लगाई गई. राजनीतिक संरक्षण के फलस्वरूप उस के जीजा, भाई और बेटा विधायक से ले कर सांसद तक बन चुके हैं. वर्तमान में उस का लड़का वीर सिंह पटेल सपा से विधायक हैं.

संभवतया समाजवादी पार्टी से खुला संरक्षण मिलने के कारण ही मूर्ति अनावरण के समय प्रदेश के तत्कालीन लोक निर्माण मंत्री शिवपाल सिंह यादव के भी आने की चर्चा गरम थी. कहते हैं कि मूर्ति अनावरण के इस कार्यक्रम में दलीय भिन्नता भुला कर कई कद्दावर सांसद व विधायक शरीक हुए. दावा था कि 251 क्विंटल अन्न का भंडार किया गया था, जिस में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के करीब 1 लाख लोगों ने ददुआ देवता के पूजन का प्रसाद भी चखा. इस से पहले दस्यु सरगना मोहर सिंह की मूर्ति आगरा में स्थापित की जा चुकी है.

इसी क्रम में फतेहपुर जिले के जहानाबाद विधानसभा क्षेत्र से बसपा के पूर्व विधायक आदित्य पांडेय, 90 के दशक में पूर्वांचल और बिहार में आतंक के पर्याय रहे सुपारीकिलर श्रीप्रकाश शुक्ला की मूर्ति फतेहपुर की बिंदकी तहसील के अंतर्गत कौंह गांव में स्थित परशुराम मंदिर में लगवाए जाने की घोषणा कर सुर्खियों में है.

श्रीप्रकाश शुक्ला ने वर्ष 1998 में पटना स्थित इंदिरा गांधी अस्पताल के बाहर बिहार सरकार के तत्कालीन मंत्री बृज बिहारी प्रसाद को गोलियों से छलनी कर मौत के घाट उतार दिया था. बाद में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को मारने की सुपारी लेने की सुरागकशी पर सूबे के एसटीएफ द्वारा उसे मार गिराया गया था.

इसी तरह कभी 90 के दशक में उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश में चंबल के बीहड़ों में आतंक का पर्याय रहे दस्यु सरगना निर्भय गुज्जर की मूर्ति लगवाने की घोषणा गुज्जर के चचेरे भाई सरन सिंह गुज्जर ने कर दी है. मूर्ति स्थापित करने की यह योजना इटावा जनपद के बिठौली इलाके में जाहरपुर गांव के काली मंदिर में की गई है. हालांकि 6-7 वर्ष पहले ही निर्भय गुज्जर की मूर्ति लगवाने की योजना बनाई गई थी मगर तत्कालीन शासन, प्रशासन की मंजूरी न मिल पाने के कारण यह काम लटक गया था. बता दें कि निर्भय गुज्जर के खिलाफ 250 से अधिक संगीन मामलों में अनेक मुकदमें दर्ज थे. साल 2008 में पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत से पहले उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश पुलिस द्वारा निर्भय गुज्जर के सिर पर 2.5 लाख रुपए का इनाम घोषित था.

चापलूसी की चालीसा : इस से पहले देश, विदेश में लालू चालीसा खूब सुर्खियां बटोर चुका है. मगर अब प्रधानमंत्री के चालपूस टाइप के भक्त उन के नाम पर मोदी चालीसा धड़ल्ले से लिखने और पढ़ने लगे हैं. यही नहीं, चालीसा और आरती को पढ़ने के माकूल ठिकाने के लिए मंदिर भी बना डाले गए हैं.

देश के अलगअलग हिस्सों में मंदिर बनाए जाने की खबरें आ चुकी हैं. गुजरात के राजकोट, उत्तर प्रदेश के भगवानपुर (कौशाम्बी) और इलाहाबाद के जलालपुर गांव में मोदी के नाम पर बनाए गए मंदिर पर खुद प्रधानमंत्री कड़ा एतराज जता चुके हैं. मंदिर बनाए जाने के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ इस तरह ट्वीट कर चुके हैं- ‘‘किसी इंसान का मंदिर बनाना हमारी सभ्यता नहीं है. मंदिर बनाने से मुझे दुख हुआ है. मैं लोगों से ऐसा नहीं करने की अपील करता हूं.’’ फिर भी भक्त हैं कि मानने को तैयार नहीं. वे तो, बस, देवता बनाने पर तुले हैं.

दागदार हैं देवता : जिन छुटभैया नेताओं ने अपने आकाओं को देवता या देवी करार दिया है, वे दागदार भी हैं. केशव प्रसाद मौर्य के लोकसभा चुनाव के समय चुनाव आयोग को दिए हलफनामे के अनुसार, उन पर धारा 302, धारा 153, धारा 420 समेत 10 विभिन्न गंभीर आरोप दर्ज हैं. इसी तरह बसपा मुखिया मायावती भी ताज हैरिटेज कौरिडोर समेत अन्य कई मामलों में दागी हैं. जबकि दुर्गा करार दिए जाने वाली स्वाती सिंह के पति दयाशंकर सिंह मायावती के खिलाफ विवादित बयान दे कर फंस चुके हैं.

पल्ला झाड़ती पार्टियां : जिन पार्टी के नेताओं को देवी या देवता करार दिया गया है उन में से सभी पार्टियों ने अपने को किनारे करते हुए मामले से पल्ला झाड़ लिया है. भाजपा के कार्यकर्ताओं द्वारा इस तरह के सब से ज्यादा पोस्टर लगवाए जाने पर प्रदेश भाजपा नेता दिनेश शर्मा ने कहा कि लगवाए जाने वाले पोस्टरों से पार्टी का कोई नाता नहीं है, अति उत्साहित कार्यकर्ता ऐसा कर बैठते हैं. जबकि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि कृष्ण संबंधी पोस्टर से मेरा कोई लेनादेना नहीं है. कांग्रेसी कार्यकर्ताओं द्वारा राहुल गांधी को कृष्ण का अवतार बताने वाले मसले पर प्रदेश कांग्रेस महासचिव मुकुंद तिवारी ने कहा कि ऐसे पोस्टर लगाने वाले पार्टी के जिम्मेदार नेता नहीं हैं.  

कैसे लगेगी रोक?

डा. इंदु प्रकाश सिंह, सहायक प्रोफैसर, दर्शनशास्त्र व संबंद्घ अधिकारी, उच्च शिक्षा निदेशालय, उत्तर प्रदेश के नजरिए से सब से अहम बात ईश्वर का कोई रूप नहीं है. दूसरी बात, ईश्वर किसी भी राग, द्वेष, ईर्ष्या समेत अनेक मानवसुलभ दुर्गुणों से रहित माना गया है. आज के मानव का तो ऐसा बिलकुल नहीं है. ऐसे में भला कौन सा नेता देवतातुल्य हो सकता है. पौराणिक ग्रंथों के हवाले से भी कंस, रावण में जब मानवसुलभ दुर्गुण बढ़ गए तो वे राक्षस माने गए. डाकुओं और नेताओं को देवता करार दिए जाने का प्रकरण हिंदुओं की आस्था पर गहरी चोट जैसा है. इस प्रकार के पोस्टर और मंदिरों से बचने के लिए हिंदू समाज के बुद्घिजीवी वर्ग को उच्च न्यायालय जनहित याचिका जरूर दायर करनी चाहिए.’’

मुकुंद तिवारी, महासचिव, उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी, कहते हैं, ‘‘धर्म को कभी भी राजनीति से नहीं जोड़ना चाहिए. यह बिलकुल गलत और आस्था के साथ खुला खिलवाड़ है. इस मसले पर जनता को माफ नहीं करना चाहिए. बीजेपी तो हमेशा धार्मिक उन्माद भड़काने व धर्म के सहारे सत्ता में बरकरार रहना चाहती है.’’

पल्लवी सिंह चंदेल, सामाजिक कार्यकर्ता कहती हैं, ‘‘किसी भी पार्टी के कार्यकर्ताओं को अपने नेताओं को खुश करने के बजाय शहर या कसबे के विकास के एजेंडे को पोस्टर में दिखा कर नेताओं उसे पूरा करवाने की पुरजोर कोशिश करनी चाहिए. आजकल के नेताओं में नैतिक मूल्य जैसी बुनियादी बातें दूर हो चुकी हैं, इसलिए किसी भी नेता की तुलना किसी देवीदेवता से करना अनुचित होगा. इसी तरह व्यंग्यात्मक टिप्पणी के लिए धार्मिक पात्रों का सहारा लेना समाज के लिए शर्मनाक है.’’

जीवन की मुसकान

मैं ताम्बरम एयरफोर्स बेस स्टेशन पर विशेष प्रशिक्षण कोर्स में था. उस दिन सैनिक अस्पताल, चेन्नई में मेरे बेटे का जन्म हुआ था. सोचा, अस्पताल का एक चक्कर लगा आते हैं. पास के ही एक कमरे में कुछ लड़कियां थीं. मैं कमरे में चला गया और बोला, ‘‘हैलो गर्ल्स, आई एम फ्लाइट लैफ्टिनैंट अमित श्रीवास्तव, और आप लोग?’’

वे बोलीं, ‘‘सर, हम लोग सीडीएस के जरिए आ कर आर्मी आफिसर्स ट्रेनिंग सैंटर पर ट्रेनिंग के दौरान फिजिकल ट्रेनिंग में घायल हो कर यहां आए हैं.’’ वहीं अलग बैड पर उदास बैठी  लड़की के पास जा कर मैं ने पूछा, ‘‘यह गुडि़या, यहां अकेले उदास सी क्यों है?’’ वह लड़की मानो रोते हुए धीरे से बोली, ‘‘सर, मैं गरिमा हूं. मेरे पांवों में तेज मोच आ गई है. आज मेरा बर्थडे है. घर का कोई सदस्य पास नहीं.’’ मैं ने कहा, ‘‘उदास नहीं होते, तुम्हारी सहेलियां हैं न.’’ और मैं वहां से चला गया.

बाजार से बर्थडे का सारा सामान ले कर अस्पताल के उस कमरे में एक घंटे बाद घुसा, ‘‘कम औन, गर्ल्स, लेट अस सैलिब्रेट गरिमाज बर्थडे’’ और मैं ने मेज पर बर्थडे केक, मोमबत्तियां, कुछ रसगुल्ले सजा दिए, और गुब्बारे लड़कियों को लगाने के लिए दे दिए. मोमबत्ती जला कर गरिमा को साथ ले कर आया. गरिमा की आंखों में कृतज्ञता और खुशी के आंसू थे. मोमबत्ती बुझा कर, उस से केक कटवाया और ‘हैप्पी बर्थडे, हैप्पी बर्थडे टू गरिमा’ की आवाज से कमरा गूंज उठा.     

अमित श्रीवास्तव

*

मैं सुबह जब जागी तो पूरे महल्ले में कुहराम मचा हुआ था. कारण था कि मोदी सरकार ने अकस्मात 1,000 रुपए का नोट व 500 रुपए का नोट निष्क्रिय कर दिए थे. इसी दिन महल्ले के एक व्यक्ति की मृत्यु भी हो गई और घर में अर्थी उठाने के लिए भी पर्याप्त पैसे न थे. परेशानी इसलिए अधिक थी क्योंकि महल्ले में नियम निर्धारित है कि जब कोई मरेगा तो उस की अर्थी कच्चे बांस से, डोम के हाथों बनवाई जाएगी, फिर उस के पार्थिव शरीर को श्मसान घाट ले जाया जाएगा. डोम बांस की अर्थी बनाने के लिए 12 सौ रुपए मांगने लगे. महल्ले के लोगों ने आपस में विचारविमर्श किया, फिर निश्चय हुआ कि जिस खटिए पर बौडी रखी गई है, उसी पर श्मसान घाट तक ले जाया जाए. अंत्येष्टि के लिए रुपए एकत्रित कर लिए. इस तरह रुढि़वादी परंपरा भी टूट गई.     

प्रेमशीला गुप्ता

छत्तीसगढ़ का मनमोहक वन्यजीवन

बढ़ते शहरीकरण और सिमटती जीवनशैली का एक चिंतनीय प्रभाव पुरानी तो पुरानी, नई पीढ़ी पर भी यह पड़ रहा है कि बच्चे एकाध एकड़ के खेत को ही जंगल और खरगोश व कुत्ते जैसे जानवरों को ही वन्यजीव समझने लगे हैं. निसंदेह यह स्थिति उन्हें न केवल प्रकृति से दूर कर रही है बल्कि उन्हें वन्यजीवन के लुत्फ व रोमांच से भी वंचित कर रही है. पर, अच्छी और सुकून देने वाली बात यह है कि लोगों का रुझान अब तेजी से पर्यटन में बढ़ रहा है और इस में भी उन की प्राथमिकता वाइल्डलाइफ है. वन्यजीवन को नजदीक से देखने, महसूस करने और समझने के लिए छत्तीसगढ़ बेहतर राज्य है जहां कुदरत ने जंगल इफरात से संजोए हैं और तरहतरह के दुर्लभ पशुपक्षी भी अपना आशियाना यहां बनाए हुए हैं. इसीलिए सैरसपाटे के शौकीन सैलानी अब बड़ी तादाद में छत्तीसगढ़ का रुख करने लगे हैं. वे यहां के वन्यजीवन को नजदीक से देख शहरी आपाधापी को भूलते, कुदरत के बख्शे नजारों को देख सुधबुध खो बैठते हैं.

3-3 राष्ट्रीय उद्यान — कांगेर घाटी, इंद्रावती और गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान इस राज्य की ही नहीं, बल्कि देश की भी शान हैं. 11 अभयारण्यों में कई दुर्लभ वनस्पतियां और ऐसेऐसे पशुपक्षी मौजूद हैं जो पर्यटकों को ऐसे सम्मोहन में बांध लेते हैं कि उन का मन बारबार यहां आने को करता है.

कुदरती खूबसूरती और जैव विविधता के लिए मशहूर कांगेर नैशनल पार्क में घूमती हजारों तरह की रंगबिरंगी तितलियां देखना अपनेआप में एक अलग एहसास है. जगदलपुर से महज 25 किलोमीटर दूर इस पार्क की और भी कई खूबियां हैं जिन में से एक है छत्तीसगढ़ का राजकीय पक्षी पहाड़ी मैना जो इंसानी आवाज की हूबहू ऐसी नकल करती है कि पर्यटक अचंभित रह जाते हैं.

कांगेर नैशनल पार्क में चीता, बाघ, जंगली बिल्ली, लंगूर, जंगली भेडि़या, चीतल, अजगर, कोबरा जैसे दर्जनों पशुओं को नजदीक से देखने का रोमांच ही अलग है. पर एक बड़ा आकर्षण वहां उड़ने वाली गिलहरी भी है.

जगदलपुर से नीचे उतरने पर पड़ता है इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान जो बस्तर संभाग के बीजापुर जिले से ले कर भोपालपट्टनम तक 800 किलोमीटर में फैला हुआ है. इंद्रावती नदी इस नैशनल पार्क में जगहजगह दिखती है. अधिकतर पर्यटक, शोधार्थी और वन्यजीवन में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के यहां आने की एक बड़ी वजह जंगली भैंसों का सहजता से दिखना भी है. सागौन, शीशम, साजा, सलाई, बीजा और सार के अलावा जामुन व तेंदू के पेड़ इंद्रावती नैशनल पार्क की शान में चारचांद लगाते हैं. यहां आप 102 तरह के वृक्ष, 46 तरह की झाडि़यां और 28 तरह की लताएं देख कर हैरान रह जाएंगे.

बैकुंठपुर जिला कोरिया का गुरु घासीदास नैशनल पार्क भी कम अद्भुत नहीं जो साल 2001 में बना था. घने जंगलों और पशुपक्षियों के अलावा इस नैशनल पार्क से 3 नदियां हो कर बहती हैं. यहां आ कर लगता है मानो किसी स्वप्नलोक में खड़े हैं. छत्तीसगढ़ के वन्यजीवन को शब्दों में बांध पाना बेहद मुश्किल और चुनौतीभरा काम है.

राजधानी रायपुर से 100 किलोमीटर दूर स्थित बारनवापारा अभयारण्य देखते ही यह बात स्पष्ट भी हो जाती है कि अगर वाकई वाइल्डलाइफ को समझना, देखना और उस का लुत्फ उठाना है, एक दफा यहां आना जरूरी है. यहां सबकुछ है. छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड यहां वे सभी सहूलियतें मुहैया करा रहा है जिन की जरूरत आम व खास दोनों तरह के पर्यटकों को पड़ती है.      

जॉली एलएलबी-2 के वो सीन जिन्हें फिल्म से हटा दिया गया

आप सभी जानते हैं कि हाल ही में आई फिल्म जॉली एलएलबी-2 इस साल की पहली ब्लॉकबस्टर फिल्म है, लोगों ने इस फिल्‍म को काफी हद तक पसंद भी किया है, लेकिन क्‍या आपको पता है कि इस फिल्म से कुछ सीन हटाए गए हैं. नहीं न शायद ये मानना आपके लिए थोड़ा मुश्किल है लेकिन ये सच है.

दरअसल ये फिल्म अदालतों पर एक व्यंग्य है और साथ ही आपको बता दें की इस फिल्‍म में एक सीन ऐसा भी है जिसे हॉल में से हटा दिया गया है. इस फिल्म से हमें ये भी समझ आता है की कैसे कानून की तलवार दिखा कर के वकील हमे लूटते हैं और हमें धोखा देते रहते हैं.

अब आप यही सोच रहे होंगे कि ऐसा क्‍या है इस फिल्‍म में जो डिलीट करना पड़ा तो ये आप खुद देख लीजिए.

गम

मेरा दामन अश्कों से जब भी नम होता है

गम देने वाला अपना ही हरदम होता है

रिश्वतखोर नहीं कोई यों ही बन जाता है

पीछे कुछ लोगों का दमखम होता है

जो मौकापरस्त होते हैं, कुरसी पर जो हो

उन के हाथों में ऐसों का परचम होता है

किसे फुरसत है शामिल हो गैरों के गम में

आदमी का खुद का गम क्या कम होता है

‘अंजुम’ जो भी मिला गमगीन नजर आय

छूता हूं जो भी दामन वो ही नम होता है.

– अखिलेश ‘अंजुम’

विजुअल इफेक्ट्स के लिए ‘द जंगल बुक’ को मिला ऑस्कर

किमिओ याबुकी लिखित कहानी 'द जंगल बुक' की एनिमेटेड सीरीज ने साल 1989 से घरों में रौनक कर दी थी. और साल 2016 में जॉन फेवरोऊ की फिल्म 'द जंगल बुक' जिसने बच्चों से लेकर बूढ़ों सभी को सिनेमा घरों में जाने पर मजबूर कर दिया था. फिल्म ऑस्कर अवॉर्ड्स 2017 में भी अपने खूब रंग जमाए है. जॉन फेवरोऊ की फिल्म 'द जंगल बुक' को फिल्म के विजुअल इफेक्ट्स के लिए ऑस्कर दिया गया है.

फिल्म 'द जंगल बुक' को ऑस्कर अवॉर्ड मिलने की चर्चा काफी वक्त से चल रही थी और फिल्म की रिलीज के बाद ही लोगों का बोलना था कि यह फिल्म इस बार ऑस्कर की हकदार है.

'द जंगल बुक' की पूरी शूटिंग कैलिफोर्निया के स्टूडियो में हुई और इस फिल्म के सभी किरदारों को ग्राफिक्स के जरिए बनाया गया. यह फिल्म एक इंसान के बच्चे की कहानी बताती है जिसे जानवर मिलकर जंगल में पालते हैं.

एक लड़का मुझे बहुत प्यार करता है और कहता है कि वह मुझ से शादी करना चाहता है. मैं क्या करूं.

सवाल

मैं 16 वर्षीय 12वीं कक्षा की छात्रा हूं. एक लड़का मुझे बहुत प्यार करता है और कहता है कि वह मुझ से शादी करना चाहता है. इसे एकतरफा प्यार ही कह सकते हैं. मैं उसे साफसाफ नहीं कह सकती हूं कि मैं उसे प्यार नहीं करती, क्योंकि इस से उसे दुख होगा. मगर मैं उसे किसी मुगालते में भी नहीं रखना चाहती. बताएं मैं क्या करूं?

जवाब

अभी आप बहुत छोटी हैं. आप को अपना पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई और कैरियर पर लगाना चाहिए. जहां तक आप के उक्त दोस्त की बात है उसे आप को शालीन और स्पष्ट शब्दों में समझा देना चाहिए कि आप उसे सिर्फ दोस्त मानती हैं. प्यार या शादी के बारे में सोचने की न तो अभी आप की उम्र है और न ही दिलचस्पी. इसलिए वह आप से ऐसी कोई उम्मीद न रखे.

 

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क्या है भविष्य निधि ?

सर्विस सेक्टर के तबके के बहुत से लोगों के लिए सेवानिवृत्ति या रिटायरमेंट के बाद सिर्फ भविष्य निधि या प्रॉविडेंट फंड ही सहारा रह जाता है. इसका मूल कारण है पेंशन जो कि सिर्फ कुछ लोगों को ही मिलती है. ऐसी असमानता के बाद भविष्य निधि या पीएफ का महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है. पीएफ ऐसे लोगों के भी काम आता है  जो किसी बिजनेस से जुड़े हैं या जिनके पास स्वरोजगार के साधन हैं. सरकार ने ऐसे नियम बनाए हैं जिसके बदौलत कोई भी व्यक्ति अपने भविष्य के लिए बचत कर सकता है.

समस्या है जानकारी के अभाव की. कई नौकरीपेशा लोगों को पता ही नहीं होता की पीएफ क्या है या इसके क्या फायदे हैं. आज हम आपको पीएफ के बारे में कुछ जानकारी देंगे, जिससे आपको इसके बारे में थोड़ी सी जानकारी मिले.

प्रॉविडेंट फंड या भविष्य निधि तीन तरह के होते हैं: ईपीएफ यानी इंप्लॉई प्रॉविडेंट फंड, पीपीएफ यानी पब्लिक प्रॉविडेंट फंड और जीपीएफ यानी जनरल प्रॉविडेंट फंड.

ईपीएफ (इंप्लॉई प्रोविडेंट फंड)

कर्मचारियों के हितों की सुरक्षा और उनके भविष्य की सुरक्षा के लिए भारतीय संसद ने 1952 में कर्मचारी भविष्य निधि ऐक्ट को पारित किया था. जम्मू कश्मीर के अलावा पूरे देश में यह ऐक्ट लागू कर दिया गया था. 20 या इससे अधिक कार्यरत कर्मचारियों वाले सभी संगठनों को भविष्य निधि खाता रखना जरूरी है.

कब नहीं खुलता ईपीएफ खाता ?

इन दो कारणों से नहीं कटता आपका पीएफ

– अगर आपकी कंपनी में 20 से कम कर्मचारी है तो पीएफ कटना जरूरी नहीं है.

– अगर किसी कंपनी में 20 से ज्यादा कर्मचारी हैं और सभी कर्मचारियों की बेसिक सैलरी और डायरेक्ट अलाउंस 15 हजार रुपये से अधिक है और इन सबने फार्म 11 भरकर ईपीएफ से बाहर रहने का फैसला किया है तो ऐसे में पीएफ की कटौती नहीं होगी. 

आपकी सैलरी से कितनी होगी कटौती

पीएफ अकाउंट में आपकी सैलरी का भी कुछ हिस्सा भी डाला जाता है. आपकी सैलरी का कम से कम 12 प्रतिशत हिस्सा आपके पीएफ अकाउंट में डाला जाता है. जितना हिस्सा आपकी सैलरी से कटता है उतना ही हिस्सा आपकी कंपनी भी आपके अकाउंट में डालती है. अगर नियोक्ता अपना हिस्सा जमा करने में देर करता है तो उसे कर्मचारी भविष्य निधि संगठन को 17 से 37 प्रतिशत सालाना ब्याज चुकाना पड़ता है.

पीपीएफ (पब्लिक प्रॉविडेंट फंड)

1968 में केन्द्र ने पीपीएफ की शुरुआत की थी. अगर कोई भी व्यक्ति इसमें निवेश करता है तो उसे आयकर कानून के तहत पीपीएफ में निवेश करने से आयकर छूट भी मिलती है. पीपीएफ में निवेश करने के लिए आपके पास नौकरी होना जरूरी है. अगर आप कंसल्टेंट, दुकानदार, फ्रीलांसर आदि हैं तो भी आप पीपीएफ अकाउंट खुला सकते हैं. नाबालिग भी पीपीएफ अकाउंट खुलवा सकते हैं. पीपीएफ अकाउंट किसी भी बैंक या पोस्ट ऑफिस में खुलावाया जा सकता है. पर सभी बैंक ब्रांच में पीपीएफ की सुविधा नहीं होती है. इसके अलावा, चुनिंदा पोस्ट ऑफिस ही पीपीएफ खाता खुलवाते हैं. एसबीआई और सहयोगी बैंकों के अलावा ज्यादातर राष्ट्रीयकृत बैंकों की वेबसाइट में फार्म डाउनलोड कर खाता खुलवाया जा सकता है.

जीपीएफ (जनरल प्रॉविडेंट फंड)

यह सुविधा केन्द्रीय कर्मचारियों के लिए है. कोई भी अस्थायी केन्द्रीय सरकारी कर्मचारी जिसने लगातार 1 साल की सेवा पूरी कर ली है और स्थायी सरकारी कर्मचारी जीपीएफ में पैसा जमा करवा सकते हैं. 

पहले ही मैच में रिटायर हो गए थे द्रविड़

अपने दौर में भारतीय क्रिकेट के सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज रहे राहुल द्रविड़ को उनके शानदार डिफेंस के लिए ‘द वॉल’ के नाम से जाना जाता है. द्रविड़ ने क्रिकेट के उन जेंटलमैन में रहे जिनका विवादों से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं रहा है. 5 साल पहले क्रिकेट को अलविदा कहने वाले द्रविड़ को उनके खेल के दिनों में क्रिकेट का सबसे क्लासी बल्लेबाज माना जाता था.

यह कहना गलत नहीं होगा कि द्रविड़, सचिन तेंदुलकर के बाद भारत के सबसे महान बल्लेबाज हैं. इस बात का सबूत द्रविड़ का अंतराष्ट्रीय करियर है. 20 जून 1996 को लॉड्स के मैदान पर अपने टेस्ट करियर की शुरूआत करने वाले राहुल द्रविड़ ने अपने अंतराष्ट्रीय क्रिकेट करियर में द्रविड़ ने 24 हजार से ज्यादा रन बनाए.

एक बल्लेबाज के अलावा द्रविड़ एक शानदार स्लिप फील्डर भी थे. द्रविड़ के नाम टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज्यादा कैच पकड़ने का रिकॉर्ड है.

अंतराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह चुके द्रविड़ क्रिकेट कोच के रूप में दूसरी पारी की शुरूआत कर चुके हैं. मौजूदा समय में वो भारतीय अंडर-19 टीम के कोच के रूप में कार्यरत हैं. आज जानिए उनसे जुड़ी कुछ रोचक बातें.

एक ही मैच में डेब्यू और रिटायरमेंट

राहुल द्रविड़ क्रिकेट इतिहास के पहले बल्लेबाज हैं जिन्होंने एक ही मैच में डेब्यू और रिटायरमेंट किया. द्रविड़ ने अपना पहला और अंतिम टी20 मैच इंग्लैंड के खिलाफ 31 अगस्त 2011 को खेला. ये उनका अंतिम टी20 मैच भी था. इस मैच में द्रविड़ ने 21 गेंदों पर 31 रनों की पारी खेली थी.

मैन ऑफ द मैच’ की जगह ‘जैमी ऑफ द मैच’ का खिताब

राहुल द्रविड़ के पिता एक जैम बनाने वाली कंपनी में काम करते थे इस वजह से राहुल द्रविड़ का निक नेम ‘जैमी’ पड़ा. बहुत कम लोग ही जानते हैं कि राहुल द्रविड़ के इस निकनेम पर बंगलुरु में एक लोकल टूर्नामेंट का आयोजन किया जाता है. जैमी कप के नाम के इस टूर्नामेंट में ‘मैन ऑफ द मैच’ की जगह ‘जैमी ऑफ द मैच’ का खिताब दिया जाता है.

होम ग्राउंड पर कभी शतक नहीं बना पाए

पूरे विश्व में जाकर भारत के लिए रन बनाने वाले द्रविड़ अपने होम ग्राउंड पर कभी शतक नहीं बना पाए. चिन्नास्वामी स्टेडियम में खेले 8 टेस्ट मैचों में उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर 60 रन रहा.

पिच पर ही रोमे लगे थे द्रविड़

राहुल द्रविड़ अपने विकेट को कितना अहम मानते थे ये किसी से छुपा नहीं है. लेकिन एक बार 13 साल के द्रविड़ अपना विकेट गंवाने के बाद विकेट पर ही रोने लगे थे और रोते हुए ही वो पवेलियन लौटे थे. अंतराष्ट्रीय क्रिकेट करियर शुरू करने के बाद द्रविड़ ने उस पल को बहुत ही शर्मिंदगी वाला पल बताया था.

1999 में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज

राहुल द्रविड़ विश्व कप 1999 में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज थे. द्रविड़ ने 1999 विश्व कप में द्रविड़ ने 8 मैचों में 2 शतक और 3 अर्धशतक की मदद से 461 रन बनाए थे.

सेक्सी स्पोर्ट्सपर्सन

राहुल द्रविड़ को एक ऑनलाइन सर्वे ने 2004-05 में भारत का सबसे ‘सेक्सी स्पोर्ट्सपर्सन’ का खिताब दिया था. इस खिताब के लिए द्रविड़ ने युवराज सिंह और सानिया मिर्जा जैसे सितारों को पीछे छोड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया था.

हॉकी खेलते थे द्रविड़

बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि द्रविड़ ने क्रिकेट करियर शुरू करने से पहले हॉकी खेलते थे. भारतीय क्रिकेट के वॉल अपने स्कूल के दिनों में जूनियर हॉकी स्टेट टीम में खेलते थे.

सबसे ज्यादा गेंद खेलने का रिकॉर्ड

भारतीय ‘द वाल’ राहुल द्रविड़ के नाम टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज्यादा गेंद खेलने का रिकॉर्ड दर्ज है. द्रविड़ ने टेस्ट क्रिकेट में कुल 31258 गेंदों का सामना किया. द्रविड़ ने अपने 164 टेस्ट मैचों में 163 टेस्ट मैच भारत के लिए खेले हैं, एक टेस्ट मैच उन्होंने आईसीसी विश्व इलेवन के लिए खेला था जिसमें द्रविड़ ने 0 और 23 का स्कोर बनाया था.

सबसे ज्यादा बार शेन वार्न ने किया आउट

राहुल द्रविड़ को टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज्यादा बार शेन वार्न ने आउट किया. वार्न ने 8 मौकों पर अपनी टीम को द्रविड़ का महत्वपूर्ण विकेट दिलाया. इसके अलावा ब्रेट ली ने द्रविड़ को 7 बार आउट किया.

फिल्म ‘‘हिचकी’’ से रानी मुखर्जी की वापसी

आदित्य चोपड़ा के संग शादी करने के बाद रानी मुखर्जी ने आदित्य चोपड़ा निर्मित फिल्म ‘‘मर्दानी’’ में अभिनय किया था, जो कि सितंबर 2014 में प्रदर्शित हुई थी. उसके बाद से वह अभिनय से दूरी बनाए हुए थीं. इस बीच दिसंबर 2015 में वह एक बेटी आदिरा की मां भी बनी. और फिर वह अपनी बेटी की परवरिश में व्यस्त हो गयीं.

लेकिन अब एक बार फिर रानी मुखर्जी अभिनय में वापसी करने जा रही हैं. वह फिल्म निर्देशक सिद्धार्थ मल्होत्रा की फिल्म ‘‘हिचकी’’ में एक दिव्यांग का किरदार निभाने वाली  हैं. ज्ञातब्य है कि फिल्म ‘हिचकी’ पहले पुरूष प्रधान फिल्म थी, जिसमें अभिनय करने के लिए सिद्धार्थ मल्होत्रा ने अभिषेक बच्चन और इमरान हाशमी से संपर्क किया था, पर इन दोनों ने इस फिल्म में दिव्ंयाग का किरदार निभाने से मना कर दिया.

सूत्रों का दावा है कि जब आदित्य चोपड़ा को पता चला कि सिद्धार्थ मल्होत्रा एक अपाहिज इंसान की कहानी पर फिल्म बनाना चाहते हैं, तो आदित्य चोपड़ा ने सिद्धार्थ मल्होत्रा की इस फिल्म का निर्माण इस शर्त पर करने को तैयार हुए कि फिल्म के मुख्य प्रोटोगॉनिस्ट को पुरूष  की बजाय नारी बना कर फिल्म में रानी मुखर्जी को मुख्य प्रोटोगॉनिस्ट के किरदार में ले. सिद्धार्थ मल्होत्रा को भला क्यों आपत्ति होने लगी? वह तुरंत तैयार हो गए. अब आदित्य चोपड़ा निर्मित और सिद्धार्थ मल्होत्रा निर्देशित फिल्म ‘‘हिचकी’’ से रानी मुखर्जी की अभिनय में वापसी होगी. इस फिल्म की शूटिंग बहुत जल्द शुरू होने वाली है.

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