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मां बनने के लिए पिता की जरूरत नहीं : निरुशा निखत

टीवी धारावाहिक ‘आम्रपाली’ से ड्रैस डिजाइनिंग का काम शुरू करने वाली कौस्ट्यूम डिजाइनर निरुशा निखत ने कई फिल्मों में भी ड्रैस डिजाइनिंग का काम किया है. वे अब तक करीब 40 टीवी धारावाहिकों और फिल्मों के लिए ड्रैस डिजाइन कर चुकी हैं. अपने 16 साल के कैरियर में निरुशा 54 अवार्ड जीत चुकी हैं. उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में निम्न मध्यवर्गीय मुसलिम परिवार में जन्मीं निरुशा ने इलाहाबाद से स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की.

यहां तक पहुंचना निरुशा के लिए आसान नहीं था. काफी संघर्ष के बाद उन्होंने अपनी मंजिल हासिल की. वे सिंगल मदर हैं. बिना शादी किए 1 बेटे की मां बनी हैं. मां बनने का फैसला लेना उन के लिए आसान नहीं था, फिर भी यह साहसी कदम अपने बल पर उठाया. वे अपनी लाइफ को अपने तरीके से जीना पसंद करती हैं. अपने बेटे मनाल और काम के बीच तालमेल बनाए रखती हैं. वे कैसे यहां तक पहुंचीं, आइए जानें उन्हीं से:

आप की नजर में सफलता क्या है?

संतुष्टि का दूसरा नाम सफलता है. अगर आप अपने काम से संतुष्ट नहीं, तो आप सफल नहीं हैं, क्योंकि संतोष से ही आप को मानसम्मान, धन यानी सबकुछ मिलता है.

यहां तक पहुंचने में पिता का कितना सहयोग रहा?

सब से अधिक मातापिता ने ही सहयोग दिया. उन्हीं के सहयोग से मैं इलाहाबाद से मुंबई आई थी. सिंगल मदर बनने का निर्णय भी मातापिता के सहयोग से ही ले सकी थी. मेरे पिता ए.आर. खान डाक्टर थे, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं. उन्होंने खुद बचपन में बहुत संघर्ष किया था. उन की कहानियों को मैं हमेशा सुनती रहती थी. मेरी मां भी अनाथ थीं और पढ़ीलिखी भी नहीं थीं. उन को सिर्फ उर्दू भाषा आती थी. पिता की कोशिश से उन्होंने 10वीं की परीक्षा शादी के बाद पास की थी. पिता मेरे लिए रियल लाइफ हीरो थे. उन से मैं बहुत प्रेरित थी.

जीवन में कितना संघर्ष रहा?

जब मैं मुंबई आई थी तो मेरी मां ने अपनी सोने की अंगूठी बेच कर मुझे पैसे दिए थे. मैं बचपन से क्रिएटिव थी. बचपन से पेंटिंग का शौक था. मां की साडि़यों को काट कर कुशन कवर बनाती थी. 3 साल तक काफी संघर्ष रहा, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है. जब जो काम मिला करती गई. मेरे लिए यह अच्छा रहा कि जिस दिन मुंबई आई उस के अगले दिन ही मुझे काम मिल गया. उस समय मैं केवल 21 वर्ष की थी. मैं ने अपने फोटो हर जगह भेजे थे. लेकिन पाया कि ऐक्टर बनने का सपना ठीक नहीं, क्योंकि उस समय चैनल कम थे. फिर अधिकतर लोग रात को चर्चा करने के लिए बुलाते थे, जो मुझे पसंद नहीं था. इस के बाद सैल्स गर्ल का काम किया. सैट पर कपड़े ले कर जाती थी. इस से लोगों से परिचय बढ़ा और मैं डिजाइनर बन गई.

पिता की किस बात को अपने जीवन में उतारती हैं?

उन में किसी भी स्थिति में आगे बढ़ते रहने की भावना थी, जिसे मैं ने अपने जीवन में उतारा है. उन्होंने हर कठिन स्थिति में कभी हार नहीं मानी. वे गांव से स्कूल 50 किलोमीटर की दूरी साइकिल से तय कर जाते थे. उन का उद्देश्य बहुत साफ था. मुसलिम परिवार में होते हुए भी उन की सोच बहुत अलग थी. उन्होंने हमें सीख दी कि हम सभी भाईबहनों को किसी भी तरह अपनी पढ़ाई पूरी करनी है.

आप ने सिंगल मदर बनने का इतना बड़ा फैसला कैसे लिया?

2005 में मैं मुंबई में लिव इन रिलेशनशिप में थी. जब शादी करना चाही तो पता चला कि वह शादीशुदा है. जब तक यह समझ पाती कि अब क्या करूं, तब तक मैं प्रैगनैंट हो चुकी थी. रिश्ता टूट गया. सब ने गर्भपात करवाने की सलाह दी, लेकिन मैं ने सोचा कि यह मेरे प्रेम संबंध का नतीजा है, इस में बच्चे का क्या कसूर है? अत: मैं ने फैसला लिया कि मैं इसे जन्म दूंगी. मेरे इस फैसले को मेरे परिवार वालों ने सहयोग दिया. गर्भावस्था के दौरान मैं पूरा समय अकेली थी. बच्चे की डिलिवरी के वक्त मैं ने खुद अपने फार्म पर हस्ताक्षर किए थे. पैसे की भी तंगी थी. लेकिन सब धीरेधीरे ठीक हो गया. अब मेरा बेटा 11 साल का है. इस दौरान मुझे कभी नहीं लगा कि मां बनने के लिए पिता की जरूरत होती है.

आने वाले दिल के दौरे का खतरा भांप लेगी ये तकनीक

तमिलनाडु के कक्षा दसवीं के एक छात्र ने एक ऐसी नई तकनीक विकसित की है, जो कि 'चुपके से आने वाले दिल के दौरे' के खतरे का पता लगा सकती है, यह अग्रिम और नवीनतम तकनीक है, जो कि ग्रामीण इलाकों में बहुत से जीवन बचा पाने में खासी मदद कर सकती है. दसवीं कक्षा में पढ़ रहे आकाश अपनी इस तकनीकी के दम पर ही राष्ट्रपति भवन के 'इनोवेशन स्कॉलर्स इन-रेजीडेंस प्रोग्राम' के तहत राष्ट्रपति के खास मेहमान के रूप में रह रहे हैं. इस कार्यक्रम के तहत नवोन्मेषकों, लेखकों और कलाकारों को एक सप्ताह से अधिक के लिए राष्ट्रपति भवन में रहने का मौका मिलता है.

अच्छी खासी सेहत वाले किसी परिचित का अचानक दिल के दौरे के कारण गुजर जाना वाकई एक बड़ा सदमा होता है, लेकिन अपने दादाजी के ही अचानक हुए निधन से आहत तमिलनाडु के आकाश ने एक ऐसी तकनीक बना डाली, जो लोगों पर मंडराने वाले हृदयाघात के खतरे की पहचान कर सकती है, जिसके आम तौर पर इसके कोई लक्षण दिखाई नहीं देते.

राष्ट्रपति भवन में रहते हुए इस 'नवाचार उत्सव' में आकाश कहते हैं कि ''आजकल ऐसे 'साइलेंट हार्ट-अटैक' काफी आम हो गये हैं. लोग दिखते तो इतने स्वस्थ हैं कि उनमें हृदयाघात से जुड़ा कोई लक्षण दिखता ही नहीं है. मेरे दादाजी एकदम स्वस्थ लगते थे लेकिन अचानक ही दिल के दौरे से उनका निधन हो गया. हमारे शरीर में एक एफएबीपी3 प्रोटीन जो कि सबसे छोटे प्रोटीनों में से एक है, पाया जा सकता है. यह रिणावेशित (निगेटिव चार्ज वाला) होता है, इसलिए धनावेश: पॉजिटिव चार्ज: की ओर तेजी से आकर्षित होता है और उसके इसी गुण का इस्तेमाल करते हुए मैंने यह तकनीक तैयार की है. ये मौन रहने वाला दिल का दौरा इन दिनों बेहद घातक और चिंताजनक होता जा रही है और इन जैसे मामलों में, लगभग सारे लक्षण स्पष्ट नहीं रहते. और लोग सामान्य तौर पर स्वस्थ दिखाई देते हैं, मेरे दादाजी भी स्वस्थ दिखते थे लेकिन एक दिन अचानक दिल का दौरा पड़ने के बाद वो गिर गए.” इस पूरी घटना ने मनोज को इस प्रोटोटाइप या टेक्नोलॉजी को विकसित करने के लिए प्रेरित किया और अब इस तकनीक को राष्ट्रपति भवन में भी प्रदर्शित किया गया है.

आकाश की यह तकनीक हमारे रक्त में एफएबीपी3 नामक प्रोटीन की मौजूदगी पर आधारित है, जिसकी मात्रा दिल तक रक्त और ऑक्सीजन की आपूर्ति के बाधित होने का संकेत देती है. इस तकनीक में रक्त में एफएबीपी3 की मात्रा का समय-समय पर विश्लेषण किया जाता है. इसकी खास बात यह है कि इसके लिए शरीर से रक्त निकालने की जरूरत नहीं पड़ती.

आकाश को उनकी तकनीकी की इस नवीनता के लिए इस अवसर पर सम्मानित भी किया जा रहा है. आकाश मनोज, जो कि एक कार्डियोलॉजिस्ट बनना चाहते हैं, इस तकनीक को ग्रामीण क्षेत्रों में भी उपलब्ध कराना चाहते हैं ताकि लोग अपने दिल के स्वास्थ्य का ट्रैक सही रख सकें और समय पर चिकित्सा सहायता प्राप्त कर सकें. इस तकनीक की मदद से ग्रामीण क्षेत्रों में "दिल के मामले में जोखिम उठा रहे लोग” भी अपने दिल की स्वास्थ्य जांच करा सकते हैं.

मैं एक युवक से प्यार करती हूं. हमारे बीच वह सब हो गया जो शादी के बाद होना चाहिए था. मैं क्या करूं.

सवाल

मैं पिछले एक साल से एक युवक से प्यार करती हूं. मैं उसे दिलोजान से चाहती हूं औैर उस की हर गलतसही बात मान लेती हूं, जिस कारण पिछले महीने हमारे बीच वह सब भी हो गया जो शादी के बाद होना चाहिए था. फिर उस ने मुझे यह भी कह दिया कि मैं तुम से प्यार नहीं करता पर मेरा दिल नहीं मानता, क्योंकि जब मैं उस से नहीं मिलती तो वह जबरदस्ती मुझ से मिलता है पर मिलने पर खफा रहता है. मैं क्या करूं?

जवाब

यकीनन आप में स्वाभिमान की कमी है अपना सर्वस्व लुटा कर भी आप ने अपने प्यार को नहीं समझा. अगर प्यार एकतरफा हो तो ऐसा होता है. साथ ही वह युवक आप को छोड़ना भी नहीं चाहता. इस से यही लगता है कि वह आप का इस्तेमाल कर रहा है आप की इमोशंस का फायदा उठा रहा है.

अपने में स्वाभिमान जगाइए. उस के प्यार को स्वार्थ समझिए. खुद को उस के सामने मत परोसिए. कुछ दिन दूरी बनाइए. अगर वाकई उसे आप से प्यार होगा तो दूरी सह न पाएगा और आप से मिलेगा वरना इस चैप्टर को क्लोज कर दीजिए, क्योंकि आखिर में नुकसान में आप ही रहेंगी, न प्रेम मिलेगा न प्रेमी, दिल टूटेगा सो अलग. अत: पहले ही संभल जाइए व अपना मन काम में लगाइए.

 

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अंपायर से नाराज हो टीम ने बीच में ही छोड़ा मैच

विजय हजारे ट्रॉफी में कर्नाटक के साथ मुकाबले के दौरान अंपायर के फैसले से गुस्सा होकर टीम इंडिया के स्टार बल्लेबाज और छत्तीसगढ़ के कप्तान मोहम्मद कैफ ने टीम के साथ मैदान छोड़ दिया.

टीम इंडिया के लिए लंबे समय तक खेले मोहम्मद कैफ फील्ड अंपायर वीरेंदर शर्मा और लेग अंपायर उमेश दुबे के थर्ड अंपायर के पास ना जाने के फैसले से इतना गुस्सा हुए कि वो मैच के बीच में ही टीम के साथ वापस ड्रेसिंग रूम में लौट गए.

जिसके बाद मैच रेफरी ने मोहम्मद कैफ और उनकी टीम को समझा कर वापस खेलने आने के लिए मनाया. हालांकि इसके बाद कैफ को वॉर्निंग दिए जाने के साथ उनकी मैच फीस काट ली गई.

ये पूरा मामला कर्नाटक की पारी के दौरान शुरू हुआ जब वो छत्तीसगढ़ से मिले 200 रनों के लक्ष्य का पीछा करने उतरे. 200 रनों के जवाब में कर्नाटक की पारी के तीसरे ओवर की दूसरी गेंद बल्लेबाज मयंक अग्रवाल के बल्ले का बाहरी किनारा लेते हुए विकेटकीपर के हाथों में चली गई.

जिसके बाद विकेटकीपर समेत गेंदबाज और पहले स्लिप पर खड़े कैफ ने भी अपील की जिसके बाद फील्ड अंपायर वीरेंदर शर्मा ने लेग अंपायर के साथ डिसक्शन किया लेकिन थर्ड अंपायर के पास नहीं गए और इससे ही गुस्सा होकर कैफ ने टीम के साथ मैदान छोड़ दिया. 

इस पूरे मामले के बाद जब मैच फिर शुरू हुआ तो मयंक अग्रवाल के 66 रनों की मदद से कर्नाटक ने आसानी से मैच जीत लिया. कर्नाटक की टीम पहले ही क्वार्टर-फाइनल में जगह पक्की कर चुके हैं.

क्या “कायझाला” दे पाएगा व्हाट्सऐप को टक्कर

माइक्रोसॉफ्ट ने व्हाट्सऐप को टक्कर देने के लिए मैसेजिंग ऐप कायझाला को लॉन्च किया है. माइक्रोसॉफ्ट द्वारा लांच किया गया यह एप व्हाट्सऐप, हाइक, फेसबुक मैसेंजर की तरह ही काम करेगा. वही माइक्रोसॉफ्ट अपने मैसेजिंग ऐप कायझाला से व्हाट्सऐप को पूरी तरह से टक्कर देने की कोशिश करेगा.

मइक्रोसॉफ्ट के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर ने बताया है कि यह ऐप "वास्तविक ऐप्लीकेशन" है, जो यूजर्स को पसन्द आएगा. कायझाला का इस्तेमाल चैट और अन्य कामों में किया जा सकता है.

दुनिया की सबसे बड़ी इंसटैंट मैसेजिंग ऐप व्हाट्सऐप लगातार अपने यूजर्स के लिए नए-नए फीचर लेकर आ रही है. जिसमे यूजर्स की सुविधा के अनुसार नए फीचर्स पेश किये जाते है. इंसटैंट मैसेजिंग एप्प व्हाट्सऐप का इस्तेमाल मेसेज करने के अलावा वॉइस कालिंग और विडियो कालिंग में भी किया जाता है. अब देखना है कि आने वाले समय में मैसेजिंग ऐप कायझाला, व्हाट्सऐप के लिए कितना प्रतिद्वंदी साबित होगा.

देखें बोल्ड होकर भी क्यों आउट नहीं हुए राहुल

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच जारी टेस्ट सीरीज का दूसरा मैच बंगलुरु में खेला जा रहा है. दूसरे टेस्ट के तीसरे दिन टीम इंडिया की बल्लेबाजी के दौरान कुछ ऐसा हुआ जिसे देख सब हैरान रह गए. लोकेश राहुल बल्लेबाजी करते हुए बोल्ड होकर भी नॉटआउट रहे. जिसके बाद दर्शकों के साथ खिलाड़ी भी हैरान दिखे.

दरअसल, भारतीय पारी के 22वें ओवर में जब नाथन लायन गेंदबाजी कर रहे थे, तब राहुल स्ट्राइक पर थे लेकिन लायन के बॉल डालते ही वो हट गए और बॉल सीधे विकेट पर जा लगी. जिससे राहुल बोल्ड हो गए. ये देखकर ऑस्ट्रेलियाई विकेटकीपर और खिलाड़ी खुशी से कूदे, लेकिन राहुल आउट नहीं हुए थे.

हुआ यूं कि राहुल बॉल डालने से पहले ही हट गए थे. यह देखकर ऑस्ट्रेलियाई कप्तान स्टीव स्मिथ भी हैरान थे.

खुद को डुबाने पर आमादा शाहिद कपूर

साल 2003 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘इश्क विश्क’’ से अपने अभिनय करियर की शुरूआत करने वाले अभिनेता शाहिद कपूर के अंदर अहम के साथ साथ आत्मप्रशंसा सुनने की आदत इस कदर समा चुकी है कि यदि किसी ने शाहिद कपूर को उनका आइना दिखा दिया, तो वे उस पर आग बबुला हो जाते हैं. पूरे 14 साल के अभिनय करियर में उनका करियर उंचाईयां छूने की बजाय बिगड़ता ही रहा है.‘‘उड़ता पंजाब’’ के बाद ‘‘रंगून’’ की असफलता ने उनके करियर में कील गाड़ दी है और इसके लिए पूरी तरह से शाहिद कपूर ही जिम्मेदार हैं. यह एक कड़वा सच है, इस सच को अपरोक्ष रूप से शाहिद कपूर भी स्वीकार कर चुके हैं.

वास्तव में फिल्म ‘‘इश्क विश्क’’ में ही बतौर कैमरामैन अमित रॉय ने अपना करियर शुरू किया था.बाद में अमित रॉय ने अमिताभ बच्चन सहित कई स्टार कलाकारों को लेकर 50 विज्ञापन फिल्में निर्देशित की. अमित रॉय ‘सरकार व ‘सरकार राज’ सहित 20 बड़े बजट की फिल्में के कैमरामैन रहे हैं. इन्ही अमित रॉय ने शाहिद कपूर के करियर पर चर्चा करते हुए कहा था कि ‘‘मैं शाहिद कपूर का आलोचक रहा हॅू. मुझे उनकी प्रतिभा का अहसास है. मैंने कई बार उनसे कहा कि वे गलत फिल्में कर रहे हैं. मैं उनकी कुछ फिल्मों से निजी स्तर पर नाराज भी था. हर बार मैने उन्हें चेताया. जब से उन्होंने विशाल भारद्वाज का साथ पकड़ा, तब से वे अच्छा काम कर रहा है मगर..’’

अमित रॉय की बातों में काफी सच्चाई है. साल 2003 में आई ‘इश्क विश्क’ से शाहिद कपूर का करियर शुरू हुआ था. पर उन्हे पहली सफलता इम्तियाज अली निर्देशित फिल्म ‘‘जब वी मेट’’ से मिली थी, जिसमें उनके साथ करीना कपूर थीं. लेकिन फिर ‘किस्मत कनेक्षन’, ‘दिल बोले हड़ियप्पा’, ‘चांस पे डांस’, ‘पाठशाला’,  ‘मिलेंगें मिलेंगे’, ‘मौसम’, ‘तेरी मेरी कहानी’, ‘फटा पोस्टर निकला हीरो’ सहित उनकी कई फिल्मों ने पानी तक नहीं मांगा. यहां तक कि आलिया भट्ट का करियर निरंतर सफलता की ओर अग्रसर रहा, पर शाहिद कपूर के साथ अलिया भट्ट ने ‘शानदार’ की और बाक्स ऑफिस पर ‘शानदार’ को मिली असफलता के चलते आलिया भट्ट के करियर पर भी असफलता का एक दाग तो लग ही गया.

जब हमने शाहिद कपूर के सामने उनके करियर को लेकर अमित रॉय की इस सोच को व्यक्त किया, तो शाहिद कपूर ने कहा- ‘वे सही कह रहे हैं, मगर मैं अपने अनुभवों से सीखकर नए निर्णय लेता हूं. आप यह न भूले कि मेरी रगों में अभिनय बहता है. मेरी मां नीलिमा अजीम और मेरे पिता पंकज कपूर महान अभिनेता हैं. वे एक उत्कृष्ट कलाकार हैं. मेरे पिता स्टार नही हैं, इसीलिए बॉलीवुड के लोग मेरे साथ गलत ढंग से पेश आते हैं, अन्यथा दर्शक मेरे अभिनय के दीवाने हैं. फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ में लोगो ने सबसे ज्यादा तारीफ मेरे अभिनय की ही की थी. ‘उड़ता पंजाब’ से मुझे स्टार का दर्जा मिला, पर मीडिया इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं.’

यानि कि कुल मिलाकर शाहिद कपूर हमेशा आत्मप्रशंसा में लीन रहते हैं. उन्हें अपनी बुराई सुनना पसंद नहीं है. बॉलीवुड की तो दशकों से रीति चली आ रही है कि हर इंसान को चने के झाड़ पर चढ़ाते रहो और शाहिद ने अपने इर्द-गिर्द अपने बिजनेस मैनेजर, अपनी पीआर टीम और दोस्तों के रूप में ऐसी फौज खड़ी कर रखी है, जो कि शाहिद की प्रशंसा करती रहती है. इस टीम ने भी शाहिद कपूर का दिमाग खराब करते हुए इनके करियर को नुकसान पहुंचाने का ही काम किया है. वैसे बॉलीवुड से जुड़े कुछ लोग मानते हैं कि इसमें शाहिद कपूर की पीआर टीम या बिजनेस मैनेजर का कोई दोष नहीं है.

फिल्म ‘रंगून’ के प्रदर्शन से पहले शाहिद कपूर ने अपनी पी आर टीम में भी बदलाव किया, मगर इसके बावजूद उनकी आदतें नहीं बदली. इतना ही नहीं ‘रंगून’ के प्रदर्शन से पहले वह शादीशुदा ही नहीं, बल्कि एक बेटी के पिता भी बन चुके थे और ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि उनकी पत्नी ने कुछ तो उन्हे अच्छी सीख दी ही होगी. इसके अलावा बेटी का पिता बनने के बाद उन्हें जिम्मेदारी का अहसास तो हुआ ही होगा, मगर उनके व्यवहार में तो कोई बदलाव नहीं नजर आ रहा था. वह पुराने ढर्रे पर ही लोगों को गीदड़ भपकियां दे रहे थे.

फिल्म ‘रंगून’ की असफलता का सबसे ज्यादा असर शाहिद कपूर के ही करियर पर पड़ा है. फिल्म के निर्माता निर्देशक विशाल भारद्वाज को फर्क नहीं पड़ता. उन्होंने तो फिल्म के स्टूडियो को बेचकर अपना फायदा कर लिया है. सैफ अली खान तो नवाब हैं, उनकी सेहत पर असर नहीं होता. कंगना रानौट की अभिनय प्रतिभा पर कोई शक सुबह नहीं करता. उन्होने तो पहले ही कह दिया था कि विशाल भारद्वाज ने उनके 40 मिनट के बेहतरीन दृष्यों पर कैंची चलाकर उन्हे नकसान पहुंचाया पर शाहिद कपूर के पास बचने का कोई रास्ता नहीं रहा. यूं भी उनमें अभिनय प्रतिभा की थोड़ी कमी है. फिल्म में उनका किरदार भी कोई खास प्रभावित नहीं करता. इसी के साथ शाहिद कपूर की बददिमागी उन्हें लगातार पीछे ढकेल रही है.

मजेदार बात यह है कि साल 2013 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘आर राजकुमार’’ के लिए शाहिद कपूर को सात करोड़ रूपए पारिश्रमिक राशि मिली थी. उसके बाद उनकी पारिश्रमिक राशि सीधे आधी मतलब कि चार कराडे़ रूपए हो गयी. 2013 से 2016 के बीच मंहगाई बढ़ गयी. हर इंसान की आमदनी बढ़ गयी, मगर शाहिद कपूर को फिल्म ‘‘रंगून’’ के लिए सात करोड़ रूपए नही मिल पाए. यहां तक कि सूत्र दावा कर रहे हैं कि संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ मे भी शाहिद कपूर की पारिश्रमिक राशि काफी कम है. सूत्रों की माने तो फिल्म ‘पद्मवती’ के लिए जितने पैसे शाहिद कपूर को मिल रहे हैं, उससे दोगुनी रकम रणवीर सिंह को मिल रही है.जबकि रणवीर सिंह तो शाहिद कपूर से बहुत बाद में आए हैं.

सूत्रों के अनुसार फिल्म ‘रंगून’ के प्रमोशन के दौरान शाहिद कपूर मीडिया से एक स्टार की तरह मिल रहे थे. उनकी पीआर टीम वीडियो व चैनल के पत्रकारों से उनके सवालों की जांच परख करने के बाद ही शाहिद से इंटरव्यू की इजाजत दे रही थी. इतना ही नहीं इंटरव्यू के दौरान शाहिद कपूर को यह गंवारा ना था कि कोई पत्रकार उनसे विवादास्पद सवाल करे. एक हिंदी अखबार के पत्रकार ने जब एक चुभता हुआ सवाल शाहिद कपूर से किया, तो शाहिद की पीआर टीम ने उसे टोकते हुए कहा कि आप इस तरह का सवाल नहीं पूछ सकते. इस पर शाहिद कपूर ने भी अपनी टीम का पक्ष लिया. ऐसे में उस पत्रकार ने कहा कि सिर्फ प्रशंसा वाली बातें नहीं छपती हैं. आप सवाल के जवाब में कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र हैं, शाहिद कपूर ने उस पत्रकार से रिकार्ड किए गए इंटरव्यू को डिलीट करने के लिए कहा. उस पत्रकार के पास शाहिद के साथ यह सारी बात रिकार्डेड हैं और तो और शाहिद ने कुछ पत्रकारों को ग्रुप में इंटरव्यू दिए थे. एक ग्रुप में 12 पत्रकार थे. इन पत्रकारो की माने तो शाहिद ने उन सभी से एक साथ अनमने भाव से सिर्फ 12 मिनट ही बात की थी.

‘‘रंगून’’ के बाक्स ऑफिस पर बुरी तरह से असफल होने के बाद अब शाहिद कपूर के करियर का सारा दारोमदार संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘‘पद्मावती’’ पर है. शाहिद कपूर ने इस फिल्म की शूटिंग के लिए दो सौ दिन दिए हैं. उनका दावा है कि वह ‘पद्मावती’ के लिए 25 दिन शूटिंग कर चुके हैं. जब तक वह ‘पद्मावती’ की शूटिंग पूरी नहीं कर लेते, तब तक वह किसी फिल्म की शूटिंग शुरू नहीं कर सकते. वैसे भी शाहिद कपूर को फिलहाल किसी फिल्म का आफर नहीं मिल रहा है. उन्होने अपने बददिमागी के ही चलते कई बेहतरीन फिल्में खो दी हैं.

उधर फिल्म ‘पद्मावती’ विवादों में फंसी है. राजपूत करणी सेना ने ऐसा अड़ंगा डाला है कि अब ‘पद्मावती’ की आगे शूटिंग कब शुरू होगी, यह बात दावे के साथ कोई नहीं बता सकता. यानि कि शाहिद कपूर का करियर भी अब दांव पर है. खुदा ना खास्ता, एक डेढ़ साल बाद ‘‘पद्मावती’’ प्रदर्शित भी हो गयी, तो भी उसका शाहिद के करियर पर क्या असर होगा, कहा नहीं जा सकता. इस बीच यदि शाहिद कपूर आत्मप्रशंसा में लीन रहे और अपने अभिनय को चमकाने का प्रयास नही किया, तो उन्हें लेने के देने भी पड़ सकते हैं. शाहिद कपूर को यह नही भूलना चाहिए कि उनके बाद आए अर्जुन कपूर, सिद्धार्थ मल्होत्रा, वरूण धवन जैसे युवा कलाकार उनसे काफी आगे निकल चुके हैं.

बदसूरत कहकर ताने मारते थे लोग और अब…

पुरुषों की तुलना में महिलाओं को अक्सर कमजोर माना जाता है. लोगों को यकीन होता है कि जो काम पुरुष कर सकते हैं, उसे महिलाएं नहीं कर सकती हैं. लेकिन बॉडी बिल्डर यास्मीन चौहान मनक ने लोगों की सोच को बदल कर रख दिया है. यास्मीन ने बताया कि स्कूलिंग के दौरान वह दूसरी लड़कियों की खूबसूरती देख उदास हो जाया करती थीं. तब उन्होंने खुद की बॉडी को शेप में लाने का फैसला किया. वह पिछले 20 सालों से जिम में इसके लिए पसीना बहा रही हैं. फिलहाल अपने पति के साथ गुड़गांव में रहने वाली यास्मीन बताती हैं कि मैं बचपन से काफी पतली थी. वजन बढ़ाने के लिए इलाज भी कराया, लेकिन कुछ फायदा नहीं हुआ. लोग मुझे बदसूरत कहते थे, लेकिन मुझे उनकी बातों का बुरा नहीं लगता, क्योंकि मैं भी खुद को बदसूरत ही मानती थी.

यास्मीन ने कहा मैं स्कूल से पासआउट होने के बाद कॉलेज पहुंची, तब मैंने जिम जाने का निर्णय लिया. उस वक्त मैं 17 साल की थी. हालांकि, तब लड़कियों के लिए जिम जाना काफी मुश्किल था, लेकिन मेरे फैमिली मेंबर्स ने सपोर्ट किया और मैं रोजाना जिम जाने लगी. इस दौरान कई लोग मुझे डिस्करेज भी करते थे, लेकिन मैंने कभी उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया. जिम जाने की वजह से न सिर्फ मेरा कॉन्फिडेंस लौटा, बल्कि मैं खूबसूरत और अट्रैक्टिव भी दिखने लगी.

खबरों के अनुसार मनक गुडग़ांव में अपना एक जिम चलाती हैं और अपने जिम में वो हर महीने करीब 300 लड़के-लड़कियों को ट्रेनिंग देती है.

नितिभा ने करवाया हॉट फोटोशूट, दिखा स्टनिंग अवतार

'बिग बॉस-10' कंटेस्टेंट नितिभा कॉल इन दिनों मॉडलिंग में हाथ आजमा रही हैं, ये बात तो सभी जानते हैं. कुछ दिनों पहले उन्होंने 'माइन एन योर्स वेडिंग शो' के साथ मॉडलिंग असाइनमेंट साइन कर शूट कराए पहले फोटोशूट फोटोज भी अपने इंस्टाग्राम पर शेयर की थीं. हाल ही में नितिभा ने एक और नया बोल्ड फोटोशूट कराया है जिसकी एक झलक उन्होंने सोशल मीडिया पर शेयर की हैं. नितिभा इस फोटो में ब्लैक ड्रैस में काफी बोल्ड लुक में नजर आ रही हैं.

गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले नितिभा ने पिंक फ्लोरल ड्रैस में बार्बी फोटोशूट कराया था. जिसमें वो बिल्कुल डॉल की तरह ब्यूटीफुल नजर आई थीं. नितिभा ने अपने पहले फोटोशूट की फोटोज इंस्टाग्राम पर शेयर की थीं. 

विद्युत जामवाल हुए चारों खाने चित

फिल्म ‘‘कमांडो’’ से एक्शन हीरो के रूप में उभरे विद्युत जामवाल ‘कमांडो’ की सिक्वल ‘‘कमांडो 2’’ के प्रमोशन के वक्त जिस तरह की बड़ी-बड़ी डींगें हांक रहे थे, उसी के चलते ‘कमांडो 2’ के बॉक्स ऑफिस  के व्यापार का आंकड़ा आते ही बंगले झांकने लगे हैं. अब वह मीडिया से मुंह चुराते फिर रहे हैं. अब तो बॉलीवुड के बिचैलिए विद्युत जामवाल के लिए एक पुरानी कहावत का जिक्र करते हुए कह रहे हैं-‘‘बड़े बड़ाई न करें, बड़े न बोलें बड़े बोल..’’

जी हॅा! ‘‘कमांडो 2’’ के प्रदर्शन से पहले विद्युत जामवाल की हालत ‘थोथा चना बाजे घना’ वाली ही थी. विद्युत जामवाल ने बड़े-बड़े दावे करते हुए कहा था कि पूरे विश्व में एक भी कलाकार या स्टंट मैन नहीं है, जो कि उनकी बराबरी कर सके या उनके जैसा एक्शन व स्टंट कर सके. विद्युत जामवाल इस कदर अहम में चूर थे कि उन्होंने निर्माता पर दबाव डालकर फिल्म ‘कमांडो 2’ को हिंदी के अलावा तमिल व तेलगू भाषा में भी डब करवा कर प्रदर्शित करवाया. इसके बावजूद यह फिल्म तीन दिन में 15 करोड़ 75 लाख ही कमा पायी. जबकि हॉलीवुड फिल्म ‘‘लोगन’’ ने सिर्फ भारत में ही तीन दिन के अंदर सत्रह करोड़ दस लाख रूपए कमा लिए. यहां गौर करने वाली बात यह है कि ‘‘कमांडो 2’’ 2200 स्क्रीन्स में तथा ‘‘लोगन’’ 1400 स्क्रीन्स में ही प्रदर्शित हुई है. यानी कि ‘कमांडो 2’’ के मुकाबले एक तिहाई से भी कम स्क्रीन्स में प्रदर्शित होने के बावजूद ‘‘लोगन’’ ने ज्यादा धन बटोरा है. अब इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दर्शक विद्युत जामवाल के एक्षन को कितना पसंद कर रहे हैं.

फिल्म ‘कमांडो’ और ‘कमांडो 2’ दोनों फिल्म देख चुके लोग दावे के साथ कह रहे हैं कि ‘कमाडो 2’ के मुकाबले ‘कमांडो’ बेहतरीन फिल्म थी. यानी कि विद्युत जामवाल ने पहली फिल्म में ज्यादा मेहनत की थी. दूसरी फिल्म में तो वह भी अहम व आत्मप्रशंसा में इस कदर डूबे रहे कि  फिल्म को डुबाने के साथ ही अपने करियर पर भी सवालिया निशान लगा बैठे. बॉलीवुड से जुड़े सूत्रों की माने तो इसका असर विद्युत की आने वाली फिल्मों पर भी पड़ेगा और यदि अब फिल्मकार उनसे दूर भागने लगें, तो आश्चर्य वाली कोई बात नहीं होगी.

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