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आईपीएल 10 में होगी इस दिग्गज की वापसी!

आईपीएल का हर सीजन कुछ ना कुछ नया ले कर आता है. आईपीएल के 10वें सीजन में भी कुछ ऐसा ही होने वाला है. इस साल आईपीएल में एक दिग्गज की वापसी होने वाली है.

भारत के जाने माने कॉमेंटेटर हर्षा भोगले एक बार फिर से कमेंट्री में वापसी कर सकते हैं. हर्षा भोगले इंडियन प्रीमियर लीग के दसवें सीजन में कमेंट्री करते हुए दिखाई दे सकते हैं. सूत्रों के मुताबिक हर्षा की वापसी तो हो रही है लेकिन वह मैदान पर नहीं दिखेंगे. आईपीएल के दौरान वह एक्सपर्ट्स के तौर पर स्टूडियो में मौजूद रहेंगे.

एक साल पहले बीसीसीआई ने हर्षा को कमेंट्री टीम से हटा दिया गया था. वह भारत के अंतरराष्ट्रीय मैचों में कमेंट्री करते हुए नहीं दिख रहे थे. हर्षा को 2016 आईपीएल से पहले ही हटा दिया गया था. अब बीसीसीआई में हुए बदलाव को उनकी वापसी की वजह बताया जा रहा है.

दरअसल, हर्षा को भारतीय कप्तान विराट कोहली और मुरली विजय की शिकायतों के कारण कमेंट्री टीम से हटाया गया था. 2014 में ऑस्ट्रेलियाई दौरे पर शतक जड़ने के बाद विजय से अटपटे सवाल पूछे जाने पर विजय ने बीसीसीआई से हर्षा की शिकायत की थी, वहीं 2014 टी-20 विश्वकप के दौरान विराट कोहली की बल्लेबाजी पर सवाल उठाने पर भी कोहली हर्षा से नाराज हुए थे.

मैं मुंहासों की वजह से बहुत परेशान हूं. मुझे इन से छुटकारा पाने का कोई घरेलू उपाय बताएं.

सवाल

मैं 17 वर्षीय छात्रा हूं. मैं अपने चेहरे पर हो रहे मुंहासों की वजह से बहुत परेशान हूं. मुझे इन से छुटकारा पाने का कोई घरेलू उपाय बताएं?

जवाब

आप अपनी डाइट से चीनी, कार्बोहाइड्रेट युक्त भोज्यपदार्र्थ व औयली फूड कम कर दें. इस के अलावा नीम व तुलसी के पत्तों को पानी में उबाल कर के ठंडा होने पर अपने चेहरे को उस से धोएं. नीम व तुलसी के पत्ते चेहरे के लिए ऐंटीसैप्टिक का काम करेंगे. ये मुंहासों को होने से रोकेंगे. इस के अतिरिक्त आप चेहरा धोने के लिए औयल फ्री फेसवाश का प्रयोग करें. साथ ही चेहरे पर मुलतानी मिट्टी का फेसपैक भी लगाएं. ये सभी उपाय मुंहासों को कम करेंगे.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

मेरे नाखून बढ़ते नहीं हैं और बढ़ भी जाते हैं, तो खुरदरे हो कर जल्दी टूट जाते हैं. कोई उपाय बताएं.

सवाल

मैं 20 वर्षीय युवती हूं. मेरी समस्या यह है कि मेरे नाखून बढ़ते नहीं हैं और अगर काफी देखभाल के बाद थोड़ेबहुत बढ़ भी जाते हैं, तो खुरदरे हो कर जल्दी टूट जाते हैं. कृपया मुझे नाखूनों को लंबा व मजबूत करने का कोई उपाय बताएं?

जवाब

खानपान में कैल्सियम की कमी की वजह से नाखूनों के न बढ़ने की समस्या होती है. उन्हें लंबा और मजबूत बनाने के लिए माइल्ड शैंपू के घोल में नीबू कर रस मिलाएं और अपने हाथों को उस में 5-10 मिनट डुबोए रखें. इस के बाद हाथों को साफ पानी से धो कर कोल्ड क्रीम या मौइश्चराइजिंग क्रीम लगाएं. ऐसा हफ्ते में 2 बार करें. साथ ही डाइट में दूध, दूध से बने पदार्थ व ड्राईफ्रूट्स शामिल करें. यकीनन आप के नाखूनों की लंबाई भी बढ़ेगी और वे मजबूत भी होंगे.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

कोहली जैसा बनना चाहता है यह पाक क्रिकेटर

किसी जमाने में दुनिया भर के युवा क्रिकेटरों में सचिन तेंदुलकर जैसा बनने की लालसा होती थी, लेकिन अब विराट कोहली पहली पसंद बन गए हैं. न केवल भारत बल्कि विदेशों में भी युवा क्रिकेटर विराट कोहली जैसा बनना चाहते हैं. इसी कड़ी में नया नाम जुड़ा है पाकिस्तान के उदीयमान बल्लेबाज बाबर आजम का. यह युवा क्रिकेटर विराट कोहली की तरह क्रिकेट में सफल होना चाहते हैं.

पाकिस्तान के उदीयमान बल्लेबाज बाबर आजम और विराट कोहली में कोई समानता नहीं है लेकिन वह भारतीय कप्तान जैसे ही सफल बनना चाहते हैं. वेस्टइंडीज के खिलाफ सीमित ओवरों की श्रृंखला के लिए अभ्यास शिविर के लिए चुने गए आजम ने कहा कि उनका सपना कोहली जैसी सफलता हासिल करना है.

आजम ने कहा कि “मैं उनकी तरह नहीं खेलता, हमारी शैली भिन्न है. लेकिन विराट कोहली जो अपनी टीम के लिए करते हैं मैं उसी तरह का सफल खिलाड़ी बनना चाहता हूं. उन्होंने कहा कि मैं अपनी टीम के प्रदर्शन में योगदान देना चाहता हूं, मैं टीम की जरूरत के लिए रन बनाना चाहता हूं. मुझे अभी लंबा रास्ता तय करना है लेकिन मैं जानता हूं कि मेरी दिशा क्या है.”

गौरतलब है कि बाबर आजम पिछले कुछ समय से पाकिस्तान के लिए वनडे क्रिकेट में लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं. बाबर ने अभी तक कुल 23 वनडे मैच खेले हैं, जिनमें उन्होंने 53 की औसत से कुल 1168 रन बनाये हैं. बाबर अभी तक कुल 4 वनडे शतक जड़ चुके हैं.

अपनी ही फिल्मों पर निर्माताओं की मर्जी नहीं

आजकल सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन यानि कि सेंसर बोर्ड का नाम विवादों में कुछ ज्यादा ही रहता है. फिल्म निर्माता अक्सर अपनी फिल्मों के सर्टिफिकेशन को लेकर सीबीएफसी के चीफ ‘पहलाज निहलानी’ से भिड़े हुए ही नजर आते हैं.

क्या आप ये बात जानते हैं कि अभी तक सेंसर बोर्ड के दफ्तर में सारा काम कागजी होता आया है और अब इन तमाम चिंताओं के बीच अच्छी खबर है कि सीबीएफसी ऑफिस अब डिजिटल होने जा रहा है. इसका फायदा फिल्म निर्माताओं को ये होगा कि फिल्मों को रिलीज करने के लिए उनकी भागदौड़ कम हो जाएगी. अच्छी खबर के साथ एक बुरी खबर ये भी है कि फिल्म निर्माताओं को अब अपनी फिल्मों को रिलीज करने की तारीख के लिए अब सेंसर बोर्ड का मुंह ताकना पड़ेगा.

खबरों के मुताबिक अगले आने वाले दो हफ्ते में सारी ऑनलाइन प्रक्रिया शुरू हो जाएगी. इस बात पर निहलानी कहते हैं कि ऑनलाइन सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया शुरू करने के लिए उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी है और इसका सबसे बड़ा फायदा होगा कि निर्माताओं को अब सीबीएफसी के दफ्तर में अपनी फिल्म की डीवीडी जमा नहीं करवानी होगी. सारी प्रक्रियाएं ऑनलाइन ही हो जाएंगी. यह ऑनलाइन प्रक्रिया हिंदी फिल्मों के साथ अन्य सभी क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों पर भी लागू होगी.

यहां हम आपको बताना चाहते हैं कि ऑनलाइन हुई इस प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि अब फिल्म निर्माता, उनकी फिल्म का सेंसर सर्टिफिकेट जारी होने से पहले रिलीज होने की तारीख का एलान नहीं कर सकते.

आजकल फिल्ममेकर्स फिल्मों की शूटिंग शुरू होने से पहले ही इसकी रिलीज डेट एनाउंस कर देते हैं. अब ऐसे में फिल्में इस फैसले से कितना प्रभावित होंगी, ये बात विचारणीय है. हालांकि सीबीएफसी प्रमुख ने कहा कि निर्माता फिल्म बनने के शुरुआती दौर में अपनी फिल्म रिलीज करने की तारीख चुनने के लिए आजाद होंगे और वे इसका एलान भी कर सकते हैं, लेकिन फिल्म की शूटिंग खत्म होने के बाद और रिलीज की तारीख नजदीक आते ही वे सेंसर सर्टिफिकेट हासिल किए बिना विज्ञापनों में किसी तारीख का उल्लेख नहीं कर सकते हैं. 

अब जाहिर तौर पर ये नियम फिल्म वालों को नागवार तो होगा ही. पर अब तो इस बारे में पहलाज निहलानी भी कुछ नहीं कर सकते. अब आप ही सोचिए जब तक कि फिल्मों के निर्माता को सेंसर सर्टिफिकेट नहीं मिल जाएगा, वो रिलीज डेट कैसे निश्चित कर सकेंगे और अगर वे सेंसर सर्टिफिकेट के बिना ही फिल्म की तारीख जनता को बता रहे हैं तो इसका मतलब वे लोंगो को बेवकूफ बना रहे हैं. 

इसके अलावा अब सीबीएफसी के दफ्तर में निर्माताओं को लाइन लगाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी. यहां सारा कागजी काम, कम हो जाएगा और अब यहां ‘पहले आओ पहले पाओ’ की नीति का सख्ती से पालन किया जाएगा.

ईपीएफओ की सभी सेवाओं के लिए औनलाइन सेवा

सरकार की योजना जल्द ही कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईपीएफओ के सभी लेनदेन औनलाइन करने की है. यह कार्य इसी साल मई अथवा जून के बाद शुरू किया जा सकता है. इस का मकसद ईपीएफओ के दावों का निबटान औनलाइन करना है. ताकि संगठन के अंशधारकों को अपने जीवनभर की कमाई से बचाए गए पैसे की निकासी के लिए जटिल प्रक्रियाओं को सरल बनाया जा सके.

अब तक यह बात महज एक सपने सी लगती थी लेकिन जिस स्तर पर इस व्यवस्था को लागू करने की योजना चल रही है उसे देखते हुए साफ है कि यह देश के करोड़ों अंशधारकों के लिए जल्द ही हकीकत बन जाएगी. इस क्रम में आधार नंबर अहम भूमिका निभा रहा है और सभी अंशधारकों को आधार से जोड़ने के लिए ईपीएफओ ने विशेष अभियान शुरू किया है. आधार नंबर से खातों को जोड़ने की अवधि पहली फरवरी तय की गई थी, लेकिन अब इसे एक माह बढ़ा कर 31 मार्च कर दिया गया है. इस का मतलब चालू वित्त वर्ष में सभी खाताधारकों को ईपीएफओ से जोड़ने का कार्य पूरा कर लिया जाएगा.

ईपीएफओ का कहना है कि उस के पास सभी तरह के लगभग एक करोड़ दावे आते हैं और यह काम बहुत कठिन होता था. दावों को निबटाने का काम लंबा समय लेता था लेकिन पूरी व्यवस्था के औनलाइन होने के बाद अब दावों का निबटान घंटों में पूरा किया जा सकेगा.

ईपीएफओ पायलट परियोजना के तहत अब तक 50 कार्यालयों के सर्वरों को इस योजना से जोड़ा जा चुका है और वहां बड़े स्तर पर दावों के निबटान की प्रक्रिया को अंतिमरूप दिए जाने का कार्य चल रहा है. इस साल मई तक सभी क्षेत्रीय कार्यालयों को केंद्रीय कार्यालय से जोड़ दिया जाएगा.

सरकार की यह सचमुच महत्त्वाकांक्षी योजना है और यदि यह योजना पूरी तरह से लागू हो जाती है तो डिजिटल इंडिया के सफर का यह महत्त्वपूर्ण पड़ाव होगा. हर कर्मचारी बिना परेशानी के इस से जुड़े, इस के लिए इस में समयसमय पर सुधार लाने की आवश्यकता होगी और इस के व्यावहारिक स्तर पर काम करने की जरूरत इस तरह से है कि सामान्य कर्मचारी की समस्या का आसानी से समाधान हो. उसे वैबसाइट पर काम करते हुए इस तरह के दिशानिर्देश मिलें कि प्रक्रिया पूरी होने तक उसे अगला कदम क्या उठाना है. मतलब यह कि यूजर्स को किसी से कुछ पूछने की जरूरत न पड़े. उम्मीद की जानी चाहिए कि कर्मचारी को उस के मोबाइल या लैपटौप के जरिए यह सुविधा आसानी से मिल जाएगी.

केसरबाटी मेवों का स्वाद चीनी का अंदाज

आजकल मिठाई बनाने और उसे पेश करने का अंदाज अलग होने लगा?है. यही वजह है कि मिठाई की दुकानों के मालिक और मिठाई बनाने के कारीगर कुछ न कुछ नया करने की कोशिश में रहते?हैं. इस तरह के?ज्यादातर प्रयोग खोए और मेवों के साथ किए जाते?हैं. खोया जब मेवों के साथ मिल जात?है, तो उस से तैयार मिठाई की लाइफ और कीमत दोनों बढ़ जाती?हैं. ग्राहक भी नए तरीके से तैयार की गई मिठाई को खूब पसंद करते हैं. ऐसी ही एक मिठाई केसरबाटी है. मेवों, खोए और चीनी से तैयार होने वाली यह मिठाई अपने नाम से ही कुछ अलग लगती है.

लखनऊ की छप्पन भोग मिठाई के मालिक विनोद गुप्ता कहते?हैं, ‘बाटी और चोखा उत्तर प्रदेश और बिहार का बहुत मशहूर पकवान है. उसी में से बाटी के आकार को ले कर हम ने केसरबाटी तैयार की?है, जो आकार में बाटी की तरह दिखती?है. इस के अंदर मेवे भरे होते?हैं. बाटी को सेहत के लिए कारगर बनाने के लिए केसर का इस्तेमाल करते?हैं. चीनी के छोटेछोटे दाने ले कर उन को केसर के रंग में रंग देते?हैं. तैयार बाटी के ऊपर रंगे चीनी के दानों को चिपका दिया जाता?है, जिस से बाटी देखने में पूरी तरह से केसरिया नजर आने लगती है. इस के जरीए हम ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की बाटी को अलग स्वाद में पेश करने की बेहद कामयाब कोशिश की है.’

केसरबाटी का स्वाद ले चुकी उमा आदिल कहती?हैं, ‘केसरबाटी में केसर की भीनीभीनी खुशबू के साथसाथ खोए और मेवों का स्वाद मिलता?है. सब से अच्छे बाटी के ऊपर लगे चीनी के दाने लगते?हैं. वे इस मिठाई को पूरी तरह से अलग कर देते?हैं. उसे खा कर लगता है जैसे हम मेवों से भरपूर कोई बहुत उम्दा मिठाई खा रहे?हों. सब से अच्छी बात यह है कि यह दूसरी मिठाइयों के मुकाबले काफी किफायती?है. मेवे मिले होने के कारण इसे खोऐ की दूसरी मिठाइयों के मुकाबले ज्यादा दिनों तक रख सकते हैं.’

कैसे बनती है केसरबाटी

केसरबाटी को बनाने के लिए सब से पहले कलाकंद बरफी बना लेते हैं. इस के बाद छोटे दाने की सफेद रंग वाली साफ चीनी लेते हैं. चीनी को केसर के रंग में रंग देते हैं. केसर के रंग के लिए केसर का ही इस्तेमाल करें. केसरिया खाने वाले रंग का इस्तेमाल न करें. अब कलाकंद बरफी को बाटी का आकार देते हुए छोटेछोटे गोलगोल आकार में बना लेते?हैं. कुछ बारीक कटे मेवे अंदर रख कर बाटी को बंद कर देते?हैं. ऊपर से चीनी के केसरिया दाने चिपका देते?हैं. हाथ से दबा कर बाटी के?ऊपर गड्ढा सा बना देते?हैं. गड्ढे में पिस्ते और बादाम के टुकड़े काट कर रख देते हैं.

विनोद गुप्ता कहते?हैं, ‘आजकल लोगों को उन मिठाइयों का स्वाद ज्यादा पसंद आ रहा?है, जो कम मीठी होती?हैं. केसरबाटी में चीनी का इस्तेमाल बेहद कम किया जाता है. मेवों के मिलने से चीनी की मिठास कम हो जाती?है. अपने नाम और आकार के अलावा केसरबाटी देखने में बहुत अच्छी लगती?है, इसीलिए इस को लोग खूब पसंद कर रहे?हैं.

इस की कीमत करीब 500 रुपए प्रति किलोग्राम है. अपने खास नाम की वजह से यह लोगों को आसानी से याद रहती है.’

उपज की बरबादी आखिर इस का हल क्या है

इसी 31 जनवरी को झारखंड में रांची के पास बुंडु इलाके के परेशान किसानों ने कई?ट्रक टमाटर सड़कों पर फेंक दिए. मंडी में उपज की वाजिब कीमत न मिलने से खफा किसानों ने पहली बार ऐसा नहीं किया था. 1 रुपए प्रति किलोग्राम से भी कम कीमत मिलने पर बीती 7 दिसंबर 2016 को भी किसानों ने अपने?टमाटर सड़कों पर फेंक कर हाइवे जाम कर दिया था. झारखंड के चतरा व बुंडु आदि कई जिलों में इस बार टमाटरों की बहुत छीछालेदर हुई. मुनाफा तो दूर, किसानों की लागत भी नहीं निकली. नतीजतन कर्जदार किसान खुद सड़कों पर आ गए. आजादी के बाद बीते 69 सालों में बहुत से किसान इसीलिए खुदकुशी करने पर मजबूर हुए, लेकिन ऐसा इंतजाम न हो सका, जिस से किसानों को अपनी उपज फेंकने की नौबत न आती. इस से पहले कम कीमत मिलने से नाराज किसानों ने नासिक में अपनी प्याज सड़कों पर फेंक दी थी.

बेशक बदइंतजामी है. कोई सुनने वाला नहीं है, जिस से किसान गुहार कर सकें. ऐसे में किसानों को खुद पर यकीन करना होगा. बेशक कमी सरकार की है, लेकिन जानकारी की कमी किसानों में भी है. मसलन, टमाटर फेंकने की जगह यदि किसान उन की सौस, कैचप, पेस्ट, पल्प, जूस या सूप का पाउडर आदि बना या बनवा कर बेचते तो ज्यादा कीमत मिलती. टमाटर से सौस बनाने की मशीन 35000 रुपए में मैं रिशिंग इंडस्ट्रीज, झोताला, कोलकाता. मोबाइल 08071683325 से मिलती है. अब साबुत टमाटर डब्बाबंद व धूप में सुखा कर भी प्रोसेस किए जाते?हैं. टमाटरों के बीजों का तेल निकाला जाता है.

सीजन में फलसब्जियों को सुखाना नया नहीं?है. चटनी, अचार, मुरब्बे, बडि़यां व पापड़ वगैरह बनाने का हुनर पुराना?है. इसे पहले से ही घरों में औरतें करती रही हैं. पहले नमक, चीनी, धूप व सिरके वगैरह से फलसब्जी को महफूज किया करते थे. अब सोडियम बैंजोइड जैसे कैमिकल प्रिजर्वेटिव के तौर पर डब्बाबंदी करने में काम आते हैं. पहले ये सब घरेलू इस्तेमाल के लिए करते?थे, अब व्यावसायिक तौर पर ऐसा बड़े पैमाने पर होने लगा है.

टूटते सपने

ज्यादातर किसान कर्ज ले कर महंगी खाद, बीज व सिंचाई के खर्च पूरे करते हैं. रातदिन पसीना बहाते हैं. उस के बाद अपनी उपज को मंडी तक ले जाते हैं. वहां पहुंच कर बेचने की नौबत आती है. उस वक्त मिली रकम ऊंट के मुंह में जीरा साबित होती है. उस से यदि ढुलाई का खर्च भी पूरा न निकले तो किसानों को गुस्सा आना जायज है. ऐसे में दुखी किसान मजबूरन अपना आपा खो बैठते हैं. वे खुद पर काबू नहीं रख पाते. उन्हें कुछ नहीं सूझता.

केंद्र सरकार के खेती मंत्रालय में फसल अनुसंधान की एक अलग इकाई सीफेट के नाम से काम करती?है. उस की ताजा रिपोर्ट के आंकड़े चौकाने वाले?हैं. रिपोर्ट के मुताबिक देश में 32 लाख?टन टमाटर व प्याज खेतों से बाजार तक पहुंचने से पहले ही बरबाद हो गए. इतना ही नहीं भारत में हर साल 92000 करोड़ रुपए कीमत की 67 लाख टन खाद्य सामग्री खराब हो जाती है. यह रकम ब्रिटेन के कुल उत्पादन से ज्यादा है.

ज्यादातर किसानों को यह शिकायत रहती है कि मंडी में उन्हें उपज की वाजिब कीमत नहीं मिलती. दूसरी ओर आढ़तिए व बिचौलिए किसानों के दम पर मलाई खाते हुए मालामाल रहते?हैं. यह मसला किसानों से जुड़ा व बेहद अहम है, लिहाजा इस का कारगर हल जल्द निकाला जाना बेहद जरूरी है.

मंदी की वजह

किसानों को लूटखसोट व मंदी की मार से बचाने के लिए देश में अब मंडी समितियां हैं. मंडी सुधार और मंडी विकास की स्कीमें चल रही?हैं. लेकिन कोई खास फर्क नहीं पड़ा है. ज्यादातर किसान आज भी आढ़तियों व दलालों के चंगुल में फंसे रहते?हैं. मंडी की ज्यादातर समितियों पर दबंगों व नेताओं का कब्जा है. लिहाजा छोटे किसान आज भी बदहाली के शिकार हैं. उन्हें उन की उपज की वाजिब कीमत नहीं मिलती.

ज्यादातर किसान छोटे, कम जोत वाले, कम पढे़ व गरीब हैं. उन्हें तकनीकी जानकारी नहीं होती. वे अपनी कूवत और बाजार के रुख के हिसाब से बोआई से पहले अंदाजा नहीं लगाते. वे मांग व पूर्ति के नियम से?भी अनजान होते?हैं. सिर्फ दूसरों की देखादेखी करते?हैं, लिहाजा मंडियों में एक ही चीज के अंबार लग जाते?हैं.

अब किसानों को सूझबूझ से काम लेना होगा. बेहतर है कि अपने कुल रकबे में एक ही फसल बोने की जगह उस के हिस्से करें. उन में ज्यादा मुनाफा देने वाली कई फसलें बोएं, लेकिन ज्यादातर किसान बीते सीजन की कीमतों को देख कर एक ही फसल बो देते?हैं और उसी से मोटी कमाई की उम्मीद करते?हैं. ऐसे में वे धोखा खाते?हैं और फायदे की जगह भारी नुकसान उठाते हैं.

हल मौजूद?हैं

फसल की बोआई से बिक्री तक तौरतरीकों में सुधार व बदलाव की जरूरत है. सरकार के भरोसे रहने से कुछ होने वाला नहीं है. किसानों को अपने मसले खुद सुलझाने होंगे.

यह सीखना जरूरी है कि किस तरह से उपज की कीमत में बढ़ोतरी हो सकती है. उस के लिए कौन से तरीके अपनाए जाएं. दरअसल, अब जमाना फसल बोने व काट कर बेचने तक का नहीं रह गया?है. अब उद्योगधंधों की दुनिया में कदम रखना जरूरी है.

ज्यादातर किसानों को फसल पकते ही उसे बेच कर पैसा हासिल करने की जल्दी रहती है, ताकि वे अपनी जरूरतें पूरी कर सकें और तमाम कर्ज अदा कर सकें. ऐसे में मंडी में एक साथ बहुत ज्यादा माल आ जाता है, नतीजतन दाम नीचे गिरने लगते?हैं.

किसानों को चाहिए कि वे सारी उपज कच्चे माल के रूप में मंडी ले जा कर न बेचें, बल्कि खुद प्रोसेसिंग करें. इस प्रकार मंडी में?ज्यादा माल न आने से कीमतों में गिरावट नहीं आएगी. साथ ही किसान तकनीक सीख कर अपनी उपज को टिकाऊ बनाने की यूनिट गांव में ही लगा सकते?हैं. वे उपज की डब्बाबंदी कर के खानेपीने की बहुत सी चीजें बना सकते हैं. इस प्रकार वे अपनी उपज को लंबे अरसे तक महफूज रख सकते हैं.

आज खेती के साथ कुछ नया सहायक कामधंधा करने की जरूरत?है. डब्बाबंदी का काम सीखने के लिए किसान अपने नजदीक के बागबानी, फल व खाद्य संरक्षण महकमे, एग्रीकल्चर यूनीवर्सिटी या कृषि विज्ञान केंद्र से जानकारी ले सकते?हैं.

किसान फूड प्रोसेसिंग की काफी लंबे अरसे से चल रही किसी नामीगिरामी यूनिट में काम कर के तजरबा हासिल कर सकते?हैं. इस के अलावा वे केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान, सीएफटीआरआई मैसूर व प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान, लुधियाना, पंजाब से?भी जानकारी हासिल कर सकते हैं.

पूंजी

किसान लघु कृषक व्यापार संगठन, सफाक, नई दिल्ली राज्य सरकार के ग्रामोद्योग महकमे, सहकारी बैंक, केंद्र सरकार के खाद्य प्रसंस्करण महकमे व खादी आयोग से तकनीकी सलाह व रियायती दरों पर कर्ज वगैरह की सहूलियतें ले सकते हैं.

खेत से खाने तक का दायरा बहुत बड़ा है. आजकल नईनई चीजें बन कर बिक रही हैं. फिर भी गेहूं से आटा, मैदा, सूजी, दलिया, चावल से बाल आहार, आटा, मुरमुरे, चने से दाल, बेसन, भुने चने, सरसों से तेल, फलसब्जियों से अचार, मुरब्बे, चटनी, जैम, जूस, जैली, दालों से बड़ी, पापड़ आदि तैयार करने की इकाइयां गांवों में ही लगाई जा सकती हैं. इस से रोजगार और आमदनी दोनों बढ़ेंगे.

मशीनें

उपज को बरबाद होने से बचाने व उस की भरपूर कीमत पाने के लिए उस की प्रोसेसिंग करना लाजिम?है. आलू के चिप्स बनाना और फलों के जूस व सब्जियों की डब्बाबंदी करना फायदेमंद है. इस में तकनीक, ट्रेनिंग, मशीनों व औजारों वगैरह की जरूरत पड़ती है. भारत में अब हर तरह की छोटीबड़ी मशीनें बनती व मिलती हैं. फलसब्जियों की प्रोसेसिंग करने की मशीनों के लिए किसान इस पते पर संपर्क कर सकते?हैं:

मैं. पैकेजिंग सल्यूशंस
राजेंद्र नगर, सेक्टर 3
साहिबाबाद, उत्तर प्रदेश.
मोबाइल नंबर: 08071681600.

क्यों कर रहे हैं किसान आत्महत्याएं

अकसर कुदरत के कहर से फसलें तबाह होती रहती?हैं, ऐसे में तमाम किसान नुकसान का सदमा झेल नहीं पाते और आत्महत्या ही उन्हें एकलौता रास्ता नजर आता है. इसी तरह कर्ज का बोझ भी किसानों को खुदकुशी करने पर मजबूर कर देता है. आखिर यह सिलसिला कब थमेगा? तमाम किसानों द्वारा आत्महत्याएं किए जाने के समाचार अखबारों और टीवी वगैरह की सुर्खियां भले ही बन रहे?हों, लेकिन इन मरते किसानों को बचाने की ठोस कोशिशें कहीं दिखाई नहीं दे रहीं. आखिर क्यों कर रहे हैं देश के किसान खुदकुशी?

किसानों की बेबसी और आत्महत्या के किस्से रोंगटे खड़े कर देने वाले?हैं. एक 40 साला किसान ने कर्ज से परेशान हो कर अपने खेत के पास ही फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. उस पर डेढ़ लाख रुपए का कर्ज था और उस की फसल बरबाद हो गई थी. एक अन्य 40 साला किसान ने आंगन में लगे लगे नीम के पेड़ पर फंदा लटका कर आत्महत्या कर ली. उस किसान ने खेती के लिए ट्रैक्टर फाइनेंस कराया था, लेकिन किश्त नहीं जमा करने पर कंपनी के अधिकारी उसे परेशान करते थे.

एक 48 साला किसान ने फसल खराब होने और उस के बाद भैंसें चोरी हो जाने के सदमे से परेशान हो कर फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. सोयाबीन की फसल खराब होने और कर्ज का बोझ बढ़ जाने से परेशान 38 साला किसान ने जहर खा कर अपनी जान दे दी. ये तो एक ही दिन के अखबार में छपी खबरों की झलकियां हैं. शायद  ही कोई ऐसा दिन जाता होगा, जब किसानों की आत्महत्याओं के समाचार प्रकाशित न होते हों. इस के अलावा तमाम ऐसे मामले भी होते हैं, जो न तो अखबारों की सुर्खियां बन पाते?हैं और न ही रेडियो या टेलीविजन तक पहुंच पाते हैं. हाल ही में जारी नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट से किसानों की आत्महत्याओं के बारे में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. आंकड़ों के मुताबिक साल 2015 में 80 फीसदी किसानों ने बैंकों और पंजीकृत माइक्रो फाइनेंस संस्थाओं से कर्ज लेने और फिर दिवालिए होने के कारण आत्महत्याएं कीं. साल 2015 में 3000 से?ज्यादा किसानों ने कर्ज लेने के बाद यह कदम उठाया था. एनसीआरबी ने पहली बार किसानों की आत्महत्याओं को कर्ज लेने और दीवलिया होने के आधार पर वर्गीकृत किया है. बैंकों और साहूकारों दोनों से कर्ज लेने के कारण 10 फीसदी किसानों ने आत्महत्याएं की थीं. साल 2014 से 2015 के बीच किसानों की आत्महत्याओं में 41.7 फीसदी का इजाफा हुआ. साल 2015 में कुल 8007 किसानों ने आत्महत्याएं की थीं, जबकि साल 2014 में 5650 किसानों ने ऐसा कदम उठाया था.

रिपोर्ट के मुताबिक कर्ज के बोझ की वजह से सब से ज्यादा आत्महत्याओं के मामले (1293) महाराष्ट्र में आए, जबकि कर्नाटक 946 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर रहा. वहीं तेलंगाना राज्य 632 मामलों के साथ तीसरे स्थान पर रहा. खेती की वजह से होने वाली आत्महत्याओं के मामले में भी महाराष्ट्र (769) पहले स्थान पर रहा, जबकि तेलंगाना (363) दूसरे, आंध्र प्रदेश (153) तीसरे और कर्नाटक (113) चौथे स्थान पर रहा. साल 2015 में पारिवारिक समस्याएं (933) और बीमारियां (842) भी आत्महत्याओं की खास वजहें थीं. साल 2014 की तुलना में कर्ज की वजह से आत्महत्याओं में साल 2015 में 3 गुने (3097) का इजाफा हुआ. खेती की वजहों से आत्महत्या करने के मामलों में 61 फीसदी का इजाफा हुआ.

राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि महाराष्ट्र में सब से ज्यादा 3030, तेलंगाना में 1358, कर्नाटक में 1197, छत्तीसगढ़ में 854 और मध्य प्रदेश में 516 किसानों ने आत्महत्याएं कीं. कर्नाटक में किसानों की आत्महत्याओं में 1 साल के भीतर तकरीबन 3 गुने का इजाफा हुआ. एनसीआरबी ने जो आंकड़े जारी किए हैं, वे किसानों और उन के परिवारों से जुड़ी बेहद दुखद तसवीर को बयां कर रहे हैं. कहां तो सरकार ने दावा किया था कि 5 सालों में किसानों की आय को 2 गुना किया जाएगा, लेकिन हालात इस के उलट हैं. एक तरफ तो किसान कुदरत की मार और साहूकारों के कुचक्र में पिस रहे?हैं, तो दूसरी ओर सरकार भी उन की मदद से हाथ खींच रही?है.

मध्य प्रदेश में भी खुदकुशी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, वहां साल 2015 में रोजाना औसतन 4 किसानों ने जान दी. साल 2016 में रोजाना जान देने वालों की तादाद बढ़ कर 6 हो गई थी. योजना आयोग के पूर्व सदस्य अभिजीत सेन का कहना?है कि ज्यादातर किसान साहूकारों से ही कर्ज लेते हैं, क्योंकि वे बैंकों व माइक्रो फाइनेंस इंस्टीट्यूशंस के मुकाबले लचीले होते हैं. भारतीय किसानों के बारे मे एक कहावत सदियों से कहीसुनी जाती है कि ‘भारतीय किसान कर्ज में पैदा होता है, कर्ज में पलता है और कर्जदार रहते हुए मर जाता है’ यानी पैदा होने से ले कर मरने तक कर्ज उस का पीछा नहीं छोड़ता. जब कर्ज का बोझ इतना बढ़ जाए कि उसे चुका पाना मुमकिन न हो तो मजबूर हो कर किसान आत्महत्या कर लेते हैं. कोई किसान आत्महत्या क्यों करता है? इस के पीछे कई वजहें हो सकती हैं. सब से बड़ी वजह गरीबी और कर्ज है. भारतीय किसानों के पास गरीब होने की वजह से खेती की मशीनें नहीं होती हैं. ऐसे में हलबैल से खेती करना उस की मजबूरी है. ऐसी हालत में किसान मशीनें या तो किराए पर लाता है या फिर कर्ज ले कर खरीदता है. अगर किसान कर्ज ले कर मशीनें खरीदता है, तो उसे उस का भारीभरकम ब्याज चुकाना मुश्किल हो जाता है.

हालांकि देश में बैंकिंग सुविधाएं बढ़ी हैं, तो भी एक आम किसान बैंकों की बजाय साहूकार से ही रकम उधार लेता है. जब ब्याज चुकाना ही कठिन हो तो मूलधन चुकाना भी मुश्किल हो जाता है. ऐसे में किसान खुदकुशी कर लेते हैं. किसान खाद, बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक दवाओं वगैरह के लिए कर्ज लेते हैं. लेकिन जब कुदरती आपदा की वजह से उन की फसल चौपट हो जाती है, तो उन की आशाओं पर पानी फिर जाता है और वे मजबूर हो कर खुद को मिटा डालते हैं.

सूखा, बाढ़, पाला फसलों के रोग, कीड़ों, आगजनी व जानवरों वगैरह की वजह से किसानों को अकसर लाभ की बजाय हानि उठानी पड़ती है. ऐसे में वे अपने परिवार का पेट कैसे पालें? घबरा कर वे न केवल अपनी जान ही देते?हैं, बल्कि अपने पूरे परिवार को मौत की नींद सुला देते हैं. भारतीय किसानों में ज्यादातर कम पढ़ेलिखे हैं. वे तमाम सामाजिक रीतिरिवाजों, रूढि़यों और कुप्रथाओं से जकड़े रहते हैं. इन सब में वे फुजूलखर्ची करते हैं. आज भी वे कर्ज ले कर मृत्युभोज का आयोजन बड़े पैमाने पर करते हैं, मगर वह कर्ज अकसर चुका नहीं पाते और फिर हार कर खुदकुशी कर लेते हैं. छोटे किसान पशुओं पर निर्भर रहते हैं. आजकल पशु काफी महंगे हो गए हैं. ऐसे में यदि असमय अचानक पशुओं की मौत हो जाए, तो उन का मामला गड़बड़ा जाता है. वे पशुओं के लिए लिया गया कर्ज चुका नहीं पाते और अकसर हार कर खुदकुशी कर लेते हैं.

ग्रामीण इलाकों में किसानों के बीच जमीन संबंधी मामलों को ले कर काफी मुकदमेबाजी होती है, जिस में उन का काफी पैसा खर्च होता है. ऐसे में यदि वे मुकदमा हार जाते?हैं, तो आत्महत्या के सिवा उन्हें कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझता. कहने को तो भारत एक कृषि प्रधान देश है और देश के किसान सभी का पेट भरने के लिए अन्न उपजाते?हैं. लेकिन यह भी एक हकीकत है कि ज्यादातर किसान या तो खेतीहर मजदूर हैं या उन के पास इतनी कम जमीन है कि खेती उन के लिए घाटे का सौदा बन कर रह गई?है. ऐसे में दूसरों के लिए अन्न उपजाने वाले ये गरीब किसान अकसर घबरा कर खुदकुशी कर लेते हैं. किसानों को राहत पहुंचाने के लिए केंद्र और राज्य दोनों एकदूसरे पर जिम्मेदारी डालते हैं, लेकिन यह जिम्मेदारी दोनों की?है, क्योंकि किसान देश का है किसी राज्य विशेष का नहीं. उस का दुखदर्द हर स्तर पर जाननासमझना होगा और उस का हल भी करना होगा. जब केंद्र और राज्य में अलगअलग दलों की सरकारें होती हैं, तो वे किसानों की आत्महत्याओं और मदद को ले कर राजनैतिक रोटियां सेकने लग जाती?हैं. ऐसे में किसानों के हाथ कुछ भी नहीं लगता.

किसानों द्वारा आत्महत्या करने के मामले दिनोंदिन बढ़ते जा रहे हैं, जिन्हें राजनैतिक रंग दे कर इलजाम लगाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा.

ऐसे में अहम सवाल उठता है कि आखिर देश के किसान आत्महत्या पर क्यों उतारू हो रहे हैं? उन के दर्द और परेशानियों को आजादी के 7 दशकों बाद तक दूर नहीं कर पाना हमारी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियों पर सवालिया निशान लगाता है. वैसे आजादी के बाद देशभर में बैंकों व सहकारी संस्थाओं का जाल बिछाया गया है, फिर भी किसानों की साहूकारों पर निर्भरता कम नहीं हुई है. साहूकार किसानों का शोषण करते हैं और उन्हें कभी कर्ज मुक्त नहीं होने देते. ऐसे में उन कर्जदार किसानों की मौत के बाद कर्ज की भरपाई उन के घर वालों से कराई जाती है. किसान के बेवक्त मरने का साहूकार की सेहत पर जरा सा भी असर नहीं पड़ता है.

भारतीय कृषि मानसून का जुआ है यानी उस पर निर्भर है. कई बार मानसून की गड़बड़ी से किसानों की फसलें पूरी तरह से बरबाद हो जाती हैं. ऐसे बदहाली के आलम में उन्हें कर्ज चुकाने के लिए मजबूर किया जाए तो वे कहां से चुकाएंगे? ऐसे में उन्हें सरकारी मदद की उम्मीद रहती है. अगर समय पर मदद नहीं मिलती, तो अकसर तमाम किसान घबरा कर खुदकुशी कर लेते हैं. कृषि प्रधान देश का एक किसान अगर आत्महत्या करता है, तो इस से ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती?है? हमारे लिए हर किसान बेशकीमती है और उस की जान हर कीमत पर बचानी चाहिए.

बरबादी टमाटरों की

यह झारखंड सरकार के निकम्मेपन का ही नतीजा है कि किसान भारी मात्रा में उपजे टमाटरों को खरीदार न मिलने के कारण नजदीकी टाटा रांची राजमार्ग एनएच 33 पर फेंकने को मजबूर हो गए. बताया जाता है कि बाहर के व्यापारियों को 50 पैसे प्रति किलोग्राम के हिसाब से देने के बावजूद उन्होंने टमाटरों की खरीदारी में जरा भी रुचि नहीं दिखाई.

वैसे सर्दी का मौसम टमाटर उत्पादन के लिए सब से अच्छा होता है. इस समय टमाटर सहित तमाम सब्जीभाजियों की बंपर खेती होती है. खेती करने वाले किसान दूसरी सब्जियों के मुकाबले टमाटर की खेती करने में ज्यादा रुचि दिखाते?हैं, क्योंकि टमाटर की खेती में ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं होती. टमाटर एक ऐसी सब्जी है, जो खाने के स्वाद को बढ़ाती है. इस में विटामिन भी भरपूर होता?है. किसी भी सब्जी में टमाटर डाल कर खाना भारत का रिवाज?है. सलाद के रूप में इस का काफी ज्यादा इस्तेमाल होता है. इस के बगैर सब्जी बेमजा हो जाती है. यही कारण है कि इस की मांग हर घर में हमेशा बनी रहती है.

टमाटर की खेती के लिए नमी की बहुत जरूरत होती?है, इसीलिए इस की खेती के लिए जाड़े का मौसम सब से सही होता?है. बेमौसम में जब टमाटर की उपज नहीं होती, तब इस की मांग काफी बढ़ जाती है. ऐसी हालत में इस के दाम उछल कर 70-80 रुपए प्रति किलोग्राम तक हो जाते हैं. वैसे सामान्य दिनों में इस की कीमत 20 से 25 रुपए प्रति किलोग्राम तक हो जाती है.

ज्यादा मांग को देखते हुए तकरीबन सभी किसान अपने खेतों में टमाटर जरूर लगाते?हैं. इस की खेती काफी आसान है. बस एक बार पौधा रोप कर 2 से 3 बार पानी देने की जरूरत होती?है. इस की देखभाल करने की भी ज्यादा जरूरत नहीं होती. टमाटर का पौधा करीब 3 से 4 फुट ऊंचा होता?है. जब उस में टमाटर लगने लगते?हैं, तो भारी होने की वजह से वह झुक जाता?है. ऐसे में उसे बांस की छड़ी से बांध कर खड़ा रखा जाता है. पूरे मौसम में 1 पौधे से 50 से 70 टमाटर तोड़े जाते हैं.

झारखंड के किसान खेती लायक जमीन होते हुए भी गरीबी और बदहाली की जिंदगी जीते?हैं. वे सभी प्रकार की खेती नहीं कर पाते हैं, क्योंकि उन्हें सरकार से कोई सुविधा प्राप्त नहीं हैं. उन्हें सरकार की तरफ से यह जानकारी नहीं दी जाती है कि कौन सी सब्जी लगाने से ज्यादा फायदा होगा. वे ज्यादातर धान की खेती करते?हैं और सिंचाई के लिए बरसात के पानी पर निर्भर रहते?हैं.

पिछले कुछ सालों से झारखंड ग्लोबल वार्मिंग के कारण सूखे का सामना कर रहा है. वहां औसत बारिश होती है, जो खेती के लिए पर्याप्त नहीं होती. एक साल अच्छी बारिश होती है, तो दूसरे साल राज्य में सूखा पड़ जाता है. राज्य सरकार द्वारा बनाई गई नहर सिंचाई योजना का हाल भी खस्ता है. वहां गरमी के मौसम में पानी के लिए हाहाकार मच जाता है. आम लोगों को जब पीने के लिए पूरा पानी नहीं मिल पाता है, तो फिर खेती के लिए कहां से मिलेगा. नदियों पर बैराज बनाए गए हैं, जोकि अधूरे ही?हैं. आम किसानों को उन से कोई फायदा नहीं?है. खेती में सिंचाई के लिए वहां के किसान खुद अपने भरोसे रहते?हैं. वे नदी, तालाब या नाले के पानी को डीजल की मोटर से खींच कर अपने खेतों तक पहुंचाते?हैं. ऐसे में उन्हें खेती करना महंगा पड़ जाता है.

मायूस किसान बताते?हैं कि टमाटर की खेती वे इसलिए भी करते?हैं, क्योंकि इस में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है और न ही खास लागत लगती है. पैदावार भी अच्छी हो जाती?है, इसीलिए वे जाड़े के मौसम में टमाटर की खेती करते?हैं. मगर बुरी हालत तब हो जाती?है, जब किसान टमाटर बेचने के लिए कसबे के बाजार में लाते?हैं और खरीदार नहीं मिल पाते. बाहर के व्यापारी कसबे के बाजार में नहीं आते. वे राष्ट्रीय राजमार्ग पर ही माल मंगवाते?हैं, ताकि उन्हें ले जाने में आसानी हो.

व्यापारियों से सौदा तय हो जाने पर टमाटरों को डब्बों में भर कर गाड़ी में लदवाने तक का खर्च किसानों को झेलना पड़ता है. इस के बाद भी किसी वजह से जब माल नहीं बिकता तो उसे वापस ढो कर ले जाने में किसान सक्षम नहीं होते और माल जहां का तहां छोड़ कर भारी मन से वापस गांव लौट जाते?हैं.

किसानों ने बताया कि इस साल ज्यादा टमाटर होने की वजह से इस का बाजार मूल्य 50 पैसे प्रति किलोग्राम हो गया था, फिर भी खरीदार नहीं मिल रहे थे. ऐसे में हार कर वे?टमाटरों को सड़कों पर फेंकने पर मजबूर हुए.

किसानों ने बताया कि वे काफी अरसे से कोल्ड स्टोरेज की मांग कर रहे हैं, लेकिन अभी तक इस पर कोई काम नहीं हुआ, जबकि झारखंड के 2016 के बजट में यहां के किसानों की कच्ची उपज को रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज प्रस्तावित है. लेकिन अभी तक इस पर काम भी शुरू नहीं हुआ. नतीजतन हर साल उन्हें हजारों रुपए का नुकसान होता है.

किसानों ने बताया कि सरकारी सहायता के बिना कोल्ड स्टोरेज बनाना मुमकिन नहीं है, क्योंकि वहां के ज्यादातर किसान गरीब हैं. सब्जीभाजी बेच कर जो पैसा आता है, वह फिर से सब्जीभाजी रोपने के लिए कम पड़ जाता है. खेती को उपजाऊ बनाए रखने के लिए खाद की जरूरत होती है, पर खाद बहुत महंगी हो गई है. नए तरह के कृषि यंत्र उन की पहुंच से बाहर हैं, लिहाजा वे पारंपरिक तरीके से ही खेती करने को मजबूर?हैं. किसानों का कहना?है कि अगर झारखंड सरकार उन की ओर ध्यान दे, तो वे सब्जी उगा कर भरपूर पैसे कमा सकते?हैं. तब रोजगार के लिए उन्हें दूसरे शहरों की ओर नहीं जाना पड़ेगा.

बहुत ज्यादा मात्रा में उगी सब्जीभाजियों को बरबाद होने से बचाने और उन की ताजगी को बरकरार रखने के लिए पिछले साल झारखंड सरकार ने किसानों से फूड प्रोसेसिंग का काम शुरू करने के लिए कहा था, मगर बाद में इस बारे में सरकार का कोई सहयोग नहीं मिला नतीजतन समस्या जस की तस बनी हुई?है और किसान जरूरत से?ज्यादा उपजी सब्जीभाजियों को फेंकने पर मजबूर हैं.       ठ्ठ

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