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ट्रैंड में हैं डार्क लिप्स

ड्रैसिंग टेबल पर रखी मम्मी की गहरे लाल रंग की लिपस्टिक नेहा को हमेशा से आकर्षित करती थी. मगर दोस्त आंटी कह कर चिढ़ाएंगे, यह सोच कर नेहा कभी उसे हाथ नहीं लगाती थी. मगर वक्त के साथ फैशन के पैमाने बदल चुके हैं. आज स्ट्रौंग डार्क लिपस्टिक शेड्स युवा लड़कियों में हौट ट्रैंड बन चुके हैं.

कौस्मैटोलौजिस्ट, अवलीन खोकर कहती हैं, ‘‘डार्क लिपस्टिक ट्रैंडी लुक देती है और सब से खास बात यह है कि डार्क लिप्स लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं. इसलिए डार्क लिपस्टिक का इस्तेमाल सावधानी के साथ किया जाना चाहिए.’’

वैसे तो मेकअप के कोई ठोस नियमकायदे नहीं होते, मगर बात जब डार्क लिपस्टिक की आती है, तो कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी हो जाता है.

कैसा है स्किन कौंप्लैक्शन

ध्यान देने वाली बातों में सब से जरूरी है स्किन टोन कलर. भारत में अधिकतर महिलाओं की त्वचा का रंग गेहुआं होता है. इस रंग को वार्म स्किन टोन कहा जाता है. ऐसी स्किन टोन पर प्लम और ब्राउन कलर फैमिली के शेड्स बहुत जंचते हैं. वहीं अगर कूल स्किन टोन है तो रैड कलर के विभिन्न डार्क शेड्स चुने जा सकते हैं.

कौन से शेड्स हैं ट्रैंड में

इस बार डार्क लिपस्टिक के ट्रैंड में नए रंगों की भरमार है. अवलीन कुछ खास रंगों के बारे में बताती हैं, ‘‘ब्लैक करंट, बरगंडी, ब्लड रैड, रस्क, मैरून रैड, ब्लैक चेरी, क्रिमसन और पिंक कटिंग एज कुछ ऐसे शेड्स हैं, जो युवतियों को यूथफुल लुक के साथ ट्रैंडी और ग्लैमरस लुक भी देते हैं.’’

लगाने का सही तरीका

डार्क शेड्स लिपस्टिक यदि सही तकनीक से लगाई जाए तो हर उम्र की महिला पर जंचती है. अवलीन कुछ ऐसी ही तकनीकों के बारे में बताती हैं:

– डार्क लिपस्टिक फेशियल फीचर्स को उभारती है. मगर होंठ अधिक चौड़े या पतले हैं तो यह लुक को बिगाड़ भी सकती है. इसलिए अधिक चौड़े होंठों पर डार्क लिपस्टिक लगाने से पहले ब्लैक लिप लाइनर से लिप कंटूरिंग करें और फिर लिपस्टिक लगा कर अच्छी तरह से ब्लैंडिंग करें. इसी तरह होंठ पतले हैं तो लाइनर से लिपलाइन के ऊपर लाइन ड्रा करें और ब्रश से डार्क शेड्स होंठों पर लगाएं.

– मार्केट में मैट और ग्लौसी दोनों तरह की लिपस्टिक में डार्क शेड्स आते हैं. वैसे तो यह लिपस्टिक किसप्रूफ और ट्रांसफर फ्री होती है, मगर मैट लिपस्टिक का इस्तेमाल कर रही हैं तो पहले अपने होंठों की कंडीशनिंग कर लें.

– फटे होंठों पर कभी डार्क लिपस्टिक न लगाएं वरना पपड़ी हटने के साथ लिपस्टिक भी हट जाएगी और भद्दा सा पैच नजर आने लगेगा.

– फटे होंठों पर टूथब्रश में पैट्रोलियम जैली

लगा कर मसाज करें और उस के बाद लिपस्टिक लगाएं.

– यदि रोज देशी घी और शक्कर से होंठों की मसाज की जाए तो होंठों का कालापन तो दूर होता ही है, साथ ही ब्लड सर्कुलेशन भी सही हो जाता है.

कौन सा रंग कब लगाएं

स्किन टोन के हिसाब से डार्क शेड चुनने के साथ ही इस बात का भी खयाल रखना जरूरी होता है कि कौन सा शेड कब लगाया जाए. इस संबंध में अवलीन कहती हैं, ‘‘डार्क लिपस्टिक में भी न्यूड और पेस्टल शेड्स को शामिल किया गया है. इसलिए रैड और ब्राउन शेड्स जहां शाम की कंसीलिंग लाइट्स में अच्छे लगते हैं, वहीं पिंक और बरगंडी कलर दोपहर के समय सौफ्ट लुक देते हैं.’’

नियोन कलर्स भी आजकल ट्रैंड में हैं. वैसे तो ये सौफ्ट कलर्स होते हैं, मगर इन का रिफ्लैक्शन हमेशा डार्क होता है. लिपस्टिक के इन शेड्स को दोपहर के समय इस्तेमाल किया जा सकता है.

मेकअप को कैसे करें बैलेंस

डार्क लिपस्टिक के साथ मेकअप हमेशा बैलेंस होना चाहिए. जाहिर है, जब होंठ डार्क होंगे तो फेशियल मेकअप सौफ्ट होना चाहिए. खासतौर पर आंखों का मेकअप हैवी नहीं होना चाहिए. मगर डार्क शेड्स फेशियल फीचर्स उभारते हैं, इसलिए कंटूरिंग अच्छी तरह होनी चाहिए. होंठों पर डार्क शेड्स और आंखों पर हैवी मेकअप गौडी लुक देता है, साथ ही आंखों और होंठों के अलावा दूसरे फीचर्स भी दब जाते हैं. इसलिए जब भी डार्क लिपस्टिक लगानी हो तो आंखों का मेकअप हलका रखें, साथ ही चेहरे की कंटूरिंग सही तरह से करें. इस से डार्क लिप्स और भी अट्रैक्टिव लगेंगे. 

ट्राई करें ये ऐक्सपैरिमैंट

 

– डार्क लिपस्टिक को होंठों के आउटर पार्ट्स पर फिल करें और पाउट एरिया पर उसी कलर का हलका शेड लगाएं और अच्छी तरह ब्लैंड करें.

 

– डार्क मैट शेड से होंठों को फिल करें और उसी कलर के ग्लिटर को पाउट एरिया पर लगाएं.

 

– अपर लिप में डार्क शेड और लोअर लिप में लाइट शेड भी इन ट्रैंड हैं.

 

– डार्क लिपस्टिक के साथ आई मेकअप को सैटल करने के लिए लिपस्टिक के शेड का ग्लिटर आईलाइनर लगा लें. इसे ब्लैक आईलाइनर के साथ ग्लिटर आउटलाइन की तरह भी लगाया जा सकता है.

 

स्मौग न चुरा ले चेहरे की कांति

स्मौग शहरों में तेजी से बढ़ती एक ऐसी समस्या है, जो हमारे स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाल रही है. इस से हमारा स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है. थोड़ी सी भी लापरवाही से उस का हमारी त्वचा पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है. क्या है वह प्रभाव और कैसे बचें उस से आइए जानें:

क्या होता है प्रभाव

स्मौग कार्बन मोनोऔक्साइड, सल्फर डाईऔक्साइड, नाइट्रोजन डाईऔक्साइड जैसी हानिकारक गैसों के अलावा धूल व धुएं का मिश्रण भी होता है, जिस की वजह से त्वचा में रूखापन, खुजली, मुंहासे, रैशेज जैसी समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं, जो हमारी त्वचा के लिए बहुत हानिकारक हैं.

स्मौग हमारी त्वचा से औक्सीजन को चुरा लेता है, जिस से त्वचा अपना ग्लो खो देती है. इस के अलावा त्वचा पर झुर्रियां भी जल्दी पड़ती हैं. खूबसूरती के लिए त्वचा का स्वस्थ होना पहली शर्त होती है. लेकिन स्मौग त्वचा को बहुत बुरी तरह प्रभावित करता है, जिस से उस की सुंदरता कहीं खो सी जाती है.

कैसे पाएं छुटकारा

पुलत्स्या कैडल स्किन केयर सैंटर के डर्मेटोलौजिस्ट डा. विवेक मेहता ने इस से बचने के लिए ये तरीके बताए:

– जब आप बाहर से आएं तो इस बात का ध्यान रखें कि  किसी अच्छे फेसवाश से चेहरा जरूर धोएं, जो आप के चेहरे पर चिपकी धूल को तो साफ करे ही, साथ ही त्वचा को भी बहुत रूखा न बनाए, क्योंकि जाड़े में वैसे भी त्वचा को अतिरिक्त नमी की जरूरत होती है.

– एक अच्छे क्लींजर से भी अपनी त्वचा की सफाई करें, क्योंकि यह त्वचा की गहराई तक सफाई करता है और प्रदूषण के हानिकारक प्रभाव से उसे मुक्त करता है.

– चेहरे को धोने के बाद उस पर विटामिन ई युक्त मौइश्चराइजर लगाना न भूलें.

– अपनी डाइट में कुछ ऐसे खा-पदार्थों को शािमल करें जिन में प्रचुर मात्रा में ऐंटीऔक्सीडैंट मौजूद हों जैसे बेसिल, जिंजर,  डार्क चौकलेट, गाजर, टमाटर, बींस आदि. इन से त्वचा को अंदर से पोषण मिलता है, जिस से उस पर प्रदूषण व स्मौग का नकारात्मक प्रभाव कम पड़ता है.

– पूरे दिन में कम से कम 10 से 12 गिलास पानी जरूर पीएं. इस से फायदा यह होगा कि त्वचा के लिए हानिकारक टौक्ंिसस धूल कणों को शरीर से बाहर निकाल देता है जो त्वचा की सेहत के लिए बहुत अच्छा है.

– जब भी धूप में जाएं तो 30 एसपीएफ का सनस्क्रीन लगाना न भूलें. यह त्वचा को धूप के प्रभाव से बचाता है.

– विटामिन ई और सी त्वचा के लिए ऐंटीपौल्यूशन इनग्रीडिएंट की तरह काम करते हैं. ऐसे में इस के अलावा यह त्वचा में नई कोेशिकाओं के निर्माण में भी सहायक है. ऐसे में जब भी मेकअप या स्किन केयर का कोई प्रोडक्ट खरीदें तो उस में यह देख लें कि ये दोनों विटामिन जरूर मौजूद हों.

– त्वचा पर ऐलोवेरा जैल का प्रयोग भी उसे स्मौग के हानिकारक प्रभावों से बचाता है.

– समयसमय पर अपने स्किनटाइप के अनुसार फेशियल भी कराती रहें. इस से न सिर्फ त्वचा पर जमा गंदगी साफ होती है, बल्कि प्रदूषण और स्मौग की वजह से त्वचा पर आए ब्लैकहैड्स से भी मुक्ति मिलती है व त्वचा का ग्लो बढ़ता है.

ट्रीटमैंट्स

– माइक्रोडर्माब्रेशन ट्रीटमैंट आजकल काफी प्रचलित है. यह त्वचा की ऊपरी परत जो प्रदूषण और स्मौग की वजह से प्रभावित होती है उसे पौलिश करने का काम करता है.

– कैमिकल पील्स भी एक ऐसी तकनीक है, जो त्वचा को स्मौग के प्रभाव से मुक्त करती है और उसे कोमल तो बनाती ही है, साथ ही झांइयों को भी दूर करती है. यह बेहद किफायती और असरदार ट्रीटमैंट है. लेकिन किसी भी ट्रीटमैंट को कराने के लिए हमेशा किसी अच्छे डर्मेटोलौजिस्ट से ही संपर्क करें.

– डा. विवेक मेहता, पुलत्स्या कैडल स्किन केयर सैंटर

गणेश की शातिर सोच

उत्तर प्रदेश के जिला वाराणसी के थाना भेलूपुर में प्रमोद कुमार पत्नी और 3 बच्चों के साथ हंसीखुशी से रहता था. शुभम उस का सब से छोटा बेटा था, जो सभी का लाडला था. गुरुवार 27 अक्तूबर, 2016 को अचानक वह गायब हो गया तो पूरा परिवार परेशान हो उठा.

13 महीने का शुभम जब कहीं दिखाई नहीं दिया तो उस की तलाश शुरू हुई. उस के बारे में आसपास के घरों में पूछा गया तो जल्दी ही उस के गायब होने की खबर पूरे मोहल्ले में फैल गई. इस के बाद मोहल्ले के भी कुछ लोग मदद के लिए आ गए. जब शुभम का कहीं कुछ पता नहीं चला तो बिना देर किए सलाह कर के सब उस के गुम होने की सूचना थाना भेलूपुर पुलिस को देने पहुंच गए.

थानाप्रभारी इंसपेक्टर राजीव कुमार सिंह को जब 13 महीने के शुभम के गायब होने की तहरीर दी गई तो उन्होंने गुमशुदगी दर्ज करा कर शुभम की फोटो ले कर प्रमोद कुमार तथा उन के साथ आए लोगों को धैर्य बंधाते हुए कहा, ‘‘आप लोग बिलकुल मत घबराइए, शुभम को कुछ नहीं होगा. हम उसे जल्द ही ढूंढ निकालेंगे.’’

इस के बाद राजीव कुमार सिंह ने आवश्यक जानकारी ले कर सभी को घर भेज दिया. एक मासूम की गुमशुदगी की बात थी, इसलिए उन्होंने इस की जानकारी अधिकारियों को दे कर थाने में मौजूद सिपाहियों को बच्चे की तलाश में लगा दिया. इस के अलावा इलाके के सभी मुखबिरों को भी सतर्क कर दिया.

प्रमोद की किसी से न कोई अदावत थी और न किसी से कोई विवाद था. ऐसे में यही लगता था कि बच्चे का फिरौती के लिए अपहरण किया गया होगा. लेकिन प्रमोद कुमार की इतनी हैसियत भी नहीं थी कि वह फिरौती के रूप में मोटी रकम दे सकता. फिर भी पुलिस फिरौती के लिए किए गए अपहरण को ही ध्यान में रख कर चल रही थी.

और हुआ भी वही. प्रमोद द्वारा थाने में तहरीर दे कर लौटने के थोड़ी देर बाद ही उसे एक पत्र मिला, जिस में शुभम के अपहरण की बात लिख कर उस की सकुशल वापसी के लिए 5 लाख रुपए की फिरौती मांगी गई थी.

अपहर्त्ता ने पत्र में लिखा था, ‘तुम्हारे जीजा ने मुझे बहुत परेशान किया है. अब तुम्हें अपना बेटा चाहिए तो 5 लाख रुपए दो, वरना बाद में चिडि़या खेत चुग जाएगी.’

ताज्जुब की बात यह थी कि पत्र भेजने वाला कोई और नहीं, प्रमोद कुमार के पड़ोस में ही रहने वाला गणेश राजभर था, जो औटो चलाता था. प्रमोद कुमार ने तुरंत इस बात की जानकारी थाना भेलूपुर पुलिस को तो दी ही, खुद भी गणेश की तलाश में लग गया. गणेश के घर में कोई नहीं था. पुलिस भी सूचना मिलते ही गणेश की तलाश में तेजी से जुट गई थी.

एसपी (सिटी) राजेश यादव ने सीओ राजेश श्रीवास्तव को निर्देश दिया कि किसी भी तरह गणेश को गिरफ्तार कर के शुभम को सकुशल बरामद किया जाए. इस के बाद थाना भेलूपुर पुलिस के अलावा क्राइम ब्रांच को भी गणेश की तलाश में लगा दिया गया.

आखिर पुलिस की मेहनत रंग लाई और अपहरण के 2 दिनों बाद यानी 29 अक्तूबर, 2016 को मुखबिर की सूचना पर गणेश को बच्चे के साथ मंडुआडीह रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तार करने के साथ ही उस के कब्जे से मासूम शुभम को सकुशल बरामद कर लिया गया. वह काफी डरासहमा हुआ था.

गणेश की गिरफ्तारी और मासूम शुभम की सकुशल बरामदगी के बाद एसपी (सिटी) राजेश यादव ने अपने औफिस में प्रैसवार्ता बुला कर अभियुक्त गणेश को पत्रकारों के सामने किया तो उस ने मासूम शुभम के अपहरण की जो कहानी सुनाई, वह प्रतिशोध की भावना से भरी हुई इस प्रकार थी—

वाराणसी के थाना सारनाथ के सोना तालाब का रहने वाला गणेश राजभर घर वालों से न पटने की वजह से परिवार के साथ थाना भेलूपुर के कमच्छा सट्टी स्थित अपनी ससुराल में किराए का मकान ले कर रहता था. गुजरबसर के लिए वह औटो चलाता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे थे. किराए पर रहने की वजह से उसे आर्थिक रूप से तो परेशानी होती ही थी, साथ ही बारबार कमरा बदलने से भी उसे दिक्क्त होती थी.

यही सोच कर उस ने कुछ पैसा इकट्ठा किया और जमीन लेने की योजना बनाई, जिस से वह अपना मकान बना कर उस में आराम से रह सके. इस से उस के किराए के पैसे तो बचते ही, बारबार कमरा बदलने की जहमत से भी छुटकारा मिल जाता. इस के अलावा उस में वह थोड़ीबहुत सागसब्जी की खेती भी कर लेगा, जिस से चार पैसे भी बचते.

पैसे इकट्ठा हो गए तो गणेश जमीन की तलाश में लग गया. किसी के माध्यम से उस ने प्रकाश मास्टर से साढ़े 3 लाख रुपए में एक जमीन खरीदी. लेकिन जमीन खरीदने के बाद उसे पता चला कि वह जमीन बंजर है. यह जान कर वह परेशान हो उठा. क्योंकि वहां कुछ भी नहीं हो सकता था. प्रकाश से उस ने अपने रुपए वापस मांगे तो उस ने पैसे देने से मना कर दिया. इस के बाद दोनों में अकसर तकरार होने लगी.

गणेश को जब पता चला कि प्रकाश मास्टर उस के पड़ोस में रहने वाले प्रमोद कुमार का बहनोई है तो उस के मन में शातिर और घृणित सोच ने जन्म लेना शुरू कर दिया. वह थी प्रमोद कुमार के मासूम बेटे शुभम के अपहरण की. उसे लगता था कि साले के बेटे की चाहत में प्रकाश उस के रुपए तो लौटा ही देगा, फिरौती के रूप में भी कुछ रुपए देगा.

बस फिर क्या था, अपनी इसी सोच को अंजाम देने के लिए वह मौके की तलाश में रहने लगा. आखिर 27 अक्तूबर, 2016 को उसे मौका मिल ही गया. उस समय शुभम  घर के बाहर खेल रहा था. गणेश ने अपने 14 साल के बेटे सूरज को भेज कर औटो में घुमाने के बहाने शुभम को मंगा लिया और उसे ले कर चला गया. बाद में उस ने अपने बेटे सूरज के हाथों फिरौती के लिए प्रमोद के पास चिट्ठी भिजवा दी थी.

फिरौती की चिट्ठी मिलते ही प्रमोद के घर में कोहराम मच गया था, जबकि गणेश फिरौती के 5 लाख पाने के सपने देखने लगा था. उस के ये सपने पूरे होते, उस के पहले ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया.

दरअसल, गणेश को इस बात की जरा भी उम्मीद नहीं थी कि लोग इतनी जल्दी पुलिस को शुभम के अपहरण की सूचना दे देंगे. गणेश द्वारा शुभम के अपहरण का अपराध स्वीकार करने के बाद थाना भेलूपुर पुलिस ने उस के खिलाफ अपहरण का मुकदमा दर्ज किया और उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

मेकअप से बढ़ता है आत्मविश्वास

कामकाजी महिलाएं दफ्तरों में लिपीपुती हों या सुबह मुंह धोया, बाल बनाए और पुरुषों की तरह दफ्तरों में जा पहुंचीं, सवाल काफी दिनों से चर्चा में है. कुछ का कहना है कि महिलाओं को दफ्तरों, कारखानों, व्यवसायों में पुरुषों की तरह सधे कपड़ों में पर बिना मेकअप के आना चाहिए, तो कुछ का कहना है कि उन्हें भरसक आकर्षक बन कर रहना चाहिए. असल में यह विवाद वृद्ध होती कामकाजी महिलाओं और युवा महिलाओं के बीच है. पुरुषों को इस से क्या फर्क पड़ता है कि कामकाजी महिला कैसी दिख रही है. 2 नजर उठा कर देख लेने के बाद यह बेमानी हो जाता है और आदमी को काम से मतलब रह जाता है.

दूसरी साथी औरतें जरूर जलभुन जाती हैं. अनुभवी, होशियार पर शरीर पर कम ध्यान देने वाली औरतों को तब बुरा लगता है जब उन्हें लगे कि उन की प्रतियोगिता केवल काम में ही नहीं दिखने में भी है, वे इस बात पर सख्त एतराज करती हैं कि कामकाजी औरतें मेकअप कर के आएं. बड़ी उम्र के पुरुष बौसों को रिझाने में अकसर मेकअप की हुई औरतें सफल हो जाती हैं और अपनी व्यावसायिक योग्यता में कमी को छिपा जाती हैं. इस का बहुतों को मलाल रहता है.

जिन क्षेत्रों में पर्सनैलिटी की खास जरूरत न हो वहां तो मेकअप विवाद का मामला बन जाता है. दरअसल, मेकअप करना हर औरत का प्राकृतिक अधिकार होना चाहिए. यह उस के व्यक्तित्व का हिस्सा है. जैसे बढ़ी हुई दाढ़ी, बिखरे बाल, फटी कमीज वाले पुरुष किसी भी क्षेत्र में स्वीकार्य नहीं हैं, वैसे ही बिना स्मार्ट बने औरतें किसी भी क्षेत्र में स्वीकार्य नहीं रहतीं. मेकअप आत्मविश्वास देता है, बल देता है, प्राकृतिक गुणों को उभारता है और उन्हें कैश करने का हक हर सुंदर स्त्री को है. जैसे कुछ बुद्धि का इस्तेमाल करती हैं, वैसे ही कुछ जन्म से मिले सौंदर्य का इस्तेमाल कर सकती हैं.

शिक्षा, खेलकूद, अभिनय, विवाह, मित्रता आदि में व्यक्तित्व का असर होता है और स्मार्ट स्त्रीपुरुष दोनों ही कुछ ज्यादा सफलता पाते हैं. इस पर एतराज नहीं होना चाहिए. इसे नकारना तो गलत ही होगा. मेकअप करना चाहे घर में हो, राजनीति में हो या फिर दफ्तरोंकारखानों में, गलत नहीं है पर अति हर चीज की बुरी होती है.

कंगना-करण विवाद को सोनम ने बताया ग्रेट बाथरूम रीडिंग मसाला

बॉलीवुड एक्ट्रेस सोनम कपूर ने कंगना रनौत और करण जौहर विवाद पर तंज कसा है. सोनम ने अपने हालिया एक इंटरव्यू में कंगना-करण विवाद को बाथरूम रीडिंग मसाला कहा है. कंगना ने करण के शो 'कॉफी विद करण' में कई मुद्दों पर अपनी राय बेबाकी से व्यक्त करते हुए कहा था कि करण बॉलीवुड में नेपोटिज़्म (भाई-भतीजावाद) को बढा़वा देते हैं और वो मूवी माफिया हैं. बाद में करण ने कहा था कि कंगना 'विक्टिम कार्ड' खेल रही हैं और उन्हें बॉलीवुड इंडस्ट्री इतनी बुरी लगती है तो उन्हें इसे छोड़ देना चाहिए. कंगना ने अब इसपर पलटवार किया है. कंगना ने एक इंटरव्यू में कहा, 'बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री एक छोटा सा स्टूडियो नहीं है जो करण को 20 साल की उम्र में उनके पिता ने दिया था, वो सिर्फ इसका एक छोटा सा हिस्सा हैं.

हाल ही में हुए इंटरव्यू में सोनम ने कंगना-करण विवाद पर कहा, 'मुझे यह बहुत मनोरंजक लगा. यह सबसे बुरी तरह के कीचड़ उछालने जैसा है. मुझे कंगना बहुत मनोरंजक लगी और वो हैं भी. मैं इस पर कुछ ऐसी टिप्पणी नहीं करना चाहती जो अवसरवादी लगे. मेरा मानना ​​है कि आप महिलावादी हैं खासकर तक जब आप दूसरी महिलाओं को खास बनाते हैं. मैं अब तक उसके करियर और उनकी च्वॉइस का सम्मान करती हूं.'

इससे पहले कंगना ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए इंटरव्यू के दौरान कहा था, करण भाई-भतीजेवाद का क्या मतलब समझते हैं, वो मुझे नहीं पता. अगर उन्हें लगता है कि ये सिर्फ भतीजे, बेटियों और भाई-बहन तक सीमित है तो मुझे इस बारे में कुछ नहीं कहना.

कंगना ने आगे कहा, करण मुझे शो में बुलाने का मौका दे रहे थे, तो मैं बता दूं कि मैं उनके शो से पहले कई बड़े लोगों को अपना इंटरव्यू दिया है. बता दूं कि करण की टीम, मेरी डेट्स के लिए मेरी टीम के पीछे कई महीनों से पड़ी थी. मुझे वहां इन्वाइट किया गया था क्योंकि चैनल को टीआरपी चाहिए होती है और करण तो बस एक पेड होस्ट हैं. मैंने कोई 'विक्टिम कार्ड' या 'वुमेन' कार्ड नहीं खेला.

करण हाल ही में दो बच्चों के पिता बने हैं, जिनमें से एक बेटी भी हैं, तो कंगना ने कहा कि करण अब एक बेटी के पिता हैं तो ऐसे में उन्‍हें अपनी बेटी को 'वुमेन कार्ड', 'विक्टिम कार्ड' और 'सेल्‍फ-मेड-इंडिपेंडेंट वुमेन कार्ड' जैसे कार्ड्स देने चाहिए. रही बात इंडस्ट्री छोड़ने की तो मैंने अपनी मेहनत से इस इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाई है, तो करण आप मुझे यहां से निकलने के लिए नहीं कह सकते.

होली पर रंग लगाने के बहाने इस हीरोईन को यहां यहां छुआ गया

होली पर अभिनेत्री शहनाज ट्रेजरीवाला खुद को कभी सुरक्षित महसूस नहीं करती हैं. शहनाज ट्रेजरीवाला ने इस बात का खुलासा अपने फैन्स के साथ किया है. शहनाज का कहना है कि मैं होली के त्यौहार पर खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करती. इस मौके पर मुझे कई बार गलत ढंग से छूआ गया है. शहनाज ने ट्विटर पर लिखा, 'मुझे 'होली है' के नाम पर गलत ढंग से छूआ गया, कारण दिया गया 'होली है'. ऐसे में मैं 'होली' को लेकर उत्साहित नहीं हूं, मुझे माफ कीजिएगा. 'देल्ही बेल्ही' एक्ट्रेस ने कहा कि यह सब कुछ मानसिक आघात जैसा है. हालांकि इस बात के लिए मैं शर्मिंदा नहीं हूं.यह तो उनके लिए शर्मनाक है जो यह करते हैं.

साल 2014 में आखिरी बार शहनाज फिल्म मैं और मिस्टर राइट में नजर आई थीं. फिल्म कहानी थी एक ऐसी लड़की की जो खुद के लिए एक बेहतर इंसान की तलाश में निकली हैं. इस फिल्म से टीवी एक्टर बरुन सोबती ने फिल्मी पदार्पण किया था.

साल 2014 में अभिनेत्री शहनाज़ ने नरेंद्र मोदी, अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, सलमान खान, आमिर खान और अनिल अंबानी को खुला पात्र लिखा था जिन्होंने उन्होंने देश में बलात्कार के खिलाफ अपील की थी.

ट्रैप्ड : रोमांच, दर्द व दुख से परे

इंसानी फितरत है कि उसे दूसरों का दुख, दूसरों का दर्द, दूसरों के संघर्ष को देखने में आनंद मिलता है. इसी इंसानी फितरत को ध्यान में रखकर विक्रमादित्य मोटवाणे रोमांचक फिल्म ‘‘ट्रैप्ड’’ लेकर आए हैं. मगर फिल्म देखकर कहीं भी फ्लैट के अंदर कैद इंसान का दर्द या दुख उभरकर नहीं आता है, बल्कि फिल्म का नायक शौर्य जिस तरह के कदम उठाता है, उसे देखकर लगता है कि वह सिरे दर्जे का बेवकूफ या विवेक शून्य इंसान है.

‘‘उड़ान’’ से निर्देशक विक्रमादित्य मोटावणे ने जो उम्मीद बंधाई थी, उसे उन्होंने अपनी दूसरी फिल्म ‘‘लुटेरा’’ में तोड़ा था और अब अपनी तीसरी फिल्म ‘‘ट्रैप्ड’’ से तो उन्होंने साबित कर दिखाया कि बतौर निर्माता व निर्देशक वह अच्छी फिल्म बना ही नहीं सकते.

फिल्म ‘‘ट्रैप्ड’’ की कहानी के केंद्र में शाकाहारी युवक शौर्य (राज कुमार राव) हैं. जो कि एक कंपनी में नौकरी कर रहे हैं तथा मुंबई में चार दोस्तों के साथ एक मकान में रहते हैं. उन्हें नूरी (गीतांजली थापा) से प्यार है. शौर्य व नूरी के बीच जिस्मानी रिश्ते भी हैं.

एक दिन नूरी कह देती है कि यदि शौर्य ने अपना फ्लैट लेकर दो दिन के अंदर उससे शादी नहीं की, तो उसकी शादी किसी अन्य पुरूष से हो जाएगी. इसके बाद शौर्य किसी तरह पंद्रह हजार माह के किराए पर एक नई बहुमंजली इमारत में फ्लैट का जुगाड़ कर लेते हैं.

पता चलता है कि कुछ कानूनी पचड़ों की वजह से इस इमारत में कोई रहने नहीं आया. वह रात में ही उस फ्लैट में रहने आ जाता है. दूसरे दिन सुबह वह नूरी से मिलने जाने लगता है. घर से बाहर निकलने के बाद याद आता है कि मोबाइल अंदर रह गया. वह दरवाजे के ताले में चाभी लगी छोड़कर अंदर मोबाइल लेने जाता है. और दरवाजा बंद हो जाता है.

अब शौर्य दरवाजे का ताला खोलने के सारे उपाय करते हैं. दीवार पर लगा टीवी, पंखा सब कुछ उखाड़कर दरवाजे पर पटकते हैं. पर सफलता नहीं मिलती है. पता चलता है कि उस फ्लैट में पानी या खाने पीने का कोई सामान नही है. मोबाइल की बैटरी चार्ज नहीं है. वह मोबाइल की बैटरी को चार्ज करना चाहते हैं,पर बिजली जा चुकी है.

अब शौर्य के समाने समस्या है कि वह फ्लैट से बाहर कैसे निकले. यहीं से शौर्य की उस फ्लैट से बाहर निकलने की जद्दो जेहाद शुरू होती है. और जब कुछ दिनों बाद किसी तरह उस फ्लैट से निकल कर शौर्य अस्पताल पहुंचते हैं, तो नूरी मिलने आती है और पता चलता है कि नूरी की शादी हो चुकी है.

वास्तव में फिल्म ‘‘ट्रैप्ड’’ का कथानक पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा की फिल्मों ‘‘कास्ट अवे’’ और ‘‘127 आवर्स’’ की नकल है. मगर खुद पर नकल का आरोप न लगे, इस कारण विक्रमादित्य मोटावणे और उनकी लेखकीय टीम ने शौर्य के किरदार व वह जो कुछ करता है, उसे इस तरह से बुना कि लोग फिल्म देखते समय यह कहने लगते हैं कि यह क्या पागलपन है. दर्शकों को शौर्य की तकलीफ के प्रति न सहानुभूति होती है और न ही दर्शक के मन में शौर्य के प्रति किसी अन्य तरह की संवेदना ही उपजती है. दर्शक सोचता है कि वह कहां फंस गया. पटकथा लेखक व निर्देशक की सोच पर तरस आता है कि जब एजेंट शौर्य को बताता है कि यह इमारत दो साल से कानूनी पचड़ो में है और यहां कोई रहता नहीं है, फिर भी शौर्य उस इमारत के 25 वें महले पर किराए के मकान में रहने जाता है. फिल्म में कमियां ही कमियां हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेत्री गीतांजली थापा के हिस्से करने को कुछ था ही नहीं. उन्हें इस फिल्म में देखकर सवाल उठता है कि उन्होंने क्या सोचकर इस फिल्म में अभिनय किया. इस तरह तो वह अपने करियर पर अपने ही हाथों कुल्हाड़ी चला रही हैं.

जहां तक राज कुमार राव का सवाल है, तो लगता है कि उन्होंने ‘फैंटम फिल्मस’ से जुड़े लोगों के साथ महज दोस्ती निभायी है. अन्यथा राष्ट्रीय पुरस्कार पाने व ‘क्वीन’, ‘शाहिद’, ‘अलीगढ’ जैसी फिल्में कर चुके राज कुमार राव का इस फिल्म से जुड़ना सही नहीं माना जा सकता. मगर उनका दावा है कि उन्होंने कुछ अलग करने के लिए ही यह फिल्म की. कुछ दिन पहले हमसे बात करते हुए राज कुमार राव ने अपने इस किरदार को लेकर जितने बड़े दावे किए थे, वह तो ‘थोथा चना बाजे घना’ ही चरितार्थ करता है. क्या राष्ट्रीय पुरस्कार पाने के बाद अब राज कुमार राव के लिए चेहरे पर दाढ़ी लेना, फ्लैट के अंदर की चीजों का तोड़फोड़ करना, गद्दे आदि को जलाना ही अभिनय कहलाने लगा है.

फिल्म की लंबाई काफी ज्यादा है. पटकथा में कसाव नहीं है. फिल्म देखते समय कहीं भी रोमांच पैदा नहीं होता. एक घंटे 42 मिनट की अवधि वाली फिल्म का निर्माण ‘फैंटम फिल्मस’ ने किया है. फिल्म के निर्देशक विक्रमादित्य मोटावणे, लेखक अमित जोशी व हार्दिक मेहता, संगीतकार आलोकानंद दास गुप्ता तथा कलाकार हैं राज कुमार राव, गीतांजली थापा.

वोटिंग मशीन नहीं दलितों की चिंता करें ‘बहन जी’

बसपा प्रमुख मायावती के पास अब इतने विधायक भी नहीं बचे हैं जो 2018 में उनकी राज्यसभा से सदस्यता खत्म होने के बाद दोबारा राज्यसभा या विधानपरिषद का सदस्य बना सकें. मायावती को अब चुनाव लड़ कर ही लोकसभा या विधानसभा का सदस्य बनना होगा. 25 साल में पार्टी वापस वहीं पहुंच गई जहां से वह चली थी. ऐसे में मायावती को वोटिंग मशीन की नहीं अपने दलित वर्ग बैंक की चिंता करने की जरूरत है. पार्टी को अपने दलित हित के स्टैंड पर वापस लौटना होगा नहीं तो हिन्दुत्व का शिकार हो रहे दलित पूरी तरह से बसपा से दूर हो जायेंगे.

दलित अब वोटबैंक बनने को तैयार नहीं हैं. उसे केवल पार्टी के नाम से जोड़ा नहीं जा सकता. 2007 में बसपा को बहुमत से सरकार बनाने का अवसर पाकर भी मायावती सरकार ने दलितों की तरक्की के लिये ठोस काम नहीं किये. उसके बाद से ही बसपा का जनाधार टूटने लगा था. मायावती इस सच को आज भी स्वीकार नहीं कर पा रही. 2009 के लोकसभा, 2012 के 2014 के लोकसभा और अब 2017 के विधानसभा चुनावों में लगातार बसपा को गिरावट का सामना करना पड़ा है. इसका कारण यह है कि बसपा से लगातार गैर जाटव जातियों का मोहभंग हो रहा है. इस कमी को पूरा करने के लिये बसपा से भदलित-मुसलिम्य समीकरण बनाने का जो प्रयास किया वह उल्टा पड गया.

दलितों में पूजा-पाठ करने वाले लोगों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है. यह लोग वोट के धार्मिक ध्रुवीकरण के समय बसपा के पक्ष में नहीं खड़े होते. 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने बसपा की इस कमजोर नस को भांप कर काम करना शुरू किया. भाजपा ने गैर जाटव जातियों को अपने से जोड़ा और बसपा को कमजोर करने में सफलता हासिल की थी. असल में 2007 में पहली बार बसपा की बहुमत से सरकार बनी थी. उसके पहले 3 बार मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनी थी. एक बार भी उनको पूरे समय काम करने का मौका नहीं मिला. ऐसे में वह अपने लोगों को यह समझाने में सफल हो जाती थीं कि उनको काम करने का मौका नहीं मिला.

बहुमत की सरकार से बसपा के लोगों को बहुत अपेक्षायें थी. इसके बाद भी मायावती ने दलितो के मुद्दों पर काम नहीं किया. दलित-ब्राहमण समीकरण को साधने के चक्कर में दलितों के कोर मुद्दों से वह भटक गईं. समाज में दलितों को सम्मान मिले ऐसी कोई योजना नहीं बनाई. दलितों को रोजगार मिले इसके लिये प्रयास नहीं किया. प्रदेश में रोजगार के साधन पैदा हो इस पर भी कोई पहल नहीं हुई. जो दलित संगठन दलित मुद्दों पर काम कर रहे थे उनको हतोत्सहित किया गया. ऐसे में दलितों में बहुत ही निराशाजनक माहौल बनने लगा.

इन बातों को उस समय भी उठाया गया. पर मायावती ने इनको सोचने समझने में वक्त नहीं लगाया. आलोचना करने वालों को विरोधी समझा और अपने मन से काम करना जारी रखा. नतीजा उस सरकार की इमेज भ्रष्टाचार और घोटालों की बन गई. मायावती के साथ रहने वालों ने उस सरकार में कमाई की और उनकी इमेज को भी नुकसान पहुंचाया. केवल बसपा का जनाधार ही नहीं टूटा, बल्कि पार्टी में मायावती के भरोसेमंद लोगों में भी कमी आने लगी. जिससे पार्टी में अनुशासनहीनता का बोलबाला शुरू हो गया.

अब तक चुनाव लड़ने वाले सभी दलों को यह लग रहा था कि बसपा से टिकट लेकर उसके वोट को अपने साथ जोड़ा जा सकता है. 3 लगातार चुनावों में यह भ्रम टूटने लगा है. ऐसे में आने वाले दिनों में बसपा के लिये संकट का दौर है. अब बाहरी नेताओं के बसपा से चुनाव लड़ना कम हो जायेगा. बसपा प्रमुख मायावती अभी राज्यसभा की सदस्य हैं. 2018 में उनकी राज्यसभा सदस्यता खत्म हो रही है. इसके बाद पार्टी के पास इतने विधायक भी नहीं हैं जो उनको राज्यसभा या विधानपरिषद तक पहुंचा सकें. इसके बाद मायावती को चुनाव लड़कर ही लोकसभा या विधानसभा में जाने का मौका मिलेगा.

ये हैं आपकी कार के लिए बेहतरीन ऐप्स

यह बात तो आप जानते ही हैं कि गाड़ी चलाते समय फोन पर बात करना कानूनन जुर्म है. क्योंकि इससे बड़ा हादसा होने का खतरा होता है और आपकी जान भी जा सकती है.

आज हम आपको बताएंगे कुछ ऐसे ऐप्स के बारे में जिनकी मदद से आपको गाड़ी चलाते समय फोन इस्तेमाल करने के लिए फोन को छूने की जरूरत नहीं पड़ेगी. मजे की बात तो ये है कि इनकी मदद से साथ-साथ में आप अपनी गाड़ी के बारे में भी काफी कुछ जान पाएंगे.

टॉर्क : यह ऐप है टॉर्क, जिसकी बात हम सबसे पहले कर रहे हैं. यह ऐप आपको आपकी गाड़ी के बारे में काफी जानकारी देता है. पर इससे संबंधित एक अहम बात है जो आपको ध्यान में रखना चाहिए. अगर आप अपनी गाड़ी की इंजीनियरिंग को समझने में बहुत अच्छे हैं तो इस ऐप एडॉप्टर को आप खुद से अपनी गाड़ी में लगाने की कोशिश न करें.

'रीड इट टू मी' ऐप : यह ऐप, एक बहुत ही शानदार ऐप है. यह गाड़ी चलाते वक्त आपके फोन पर आने वाले सभी संदेशों को आपको पढ़ कर सुना सकता है. फोन पर बस नहीं, यह 'रीड इट टू मी' ऐप सोशल मीडिया पर आने वाले सारे नोटिफिकेशन को भी आपको पढ़कर सुना सकता है.

इस ऐप का कमांड आपके पास ही रहता है, जिससे आप यह चुनकर यह तय कर सकें कि कौन से नोटिफिकेशन ये आपको पढ़ कर सुनाए. अगर कुछ लोगों के मैसेज आप नहीं सुनना चाहते हैं, तो उसके लिए भी इसमें सेटिंग संभव है.

इस ऐप की सबसे खास बात यह है कि इसके जरिए आप अपनी आवाज को शब्दों में तब्दील करके मैसेज का जवाब भी दे सकते हैं.

'कैम ऑन रोड' ऐप : इस ऐप को रजिस्टर करने पर. ऐप कंपनी आपको करीब तीन घंटे तक की रिकॉर्डिंग की सुविधा मुफ्त देती है जिससे कि आप कार में घूमने जाते वक्त करीब 2 गीगाबाइट तक का वीडियो रिकॉर्ड कर सकते हैं.

ओबीडी टू एडॉप्टर : आजकल आने वाली गाड़ियों के बारे में आधी सी जानकारी गाड़ी के इंजन से ही हो जाती है. अपनी गाड़ी के लिए ऑन बोर्ड डायग्नोस्टिक्स यानि ओबीडी टू एडाप्टर खरीदकर आप अपनी गाड़ी के बारे में काफी कुछ जान सकते हैं. आजकल की सभी गाड़ियों के इंजन में एक ओबीडी पोर्ट होता है. बस इसे अपने स्मार्टफोन से कनेक्ट कर दीजिए उसके बाद गाड़ी की रफ़्तार, माइलेज और डैशबोर्ड के सभी अलर्ट्स आपके स्मार्टफोन की स्क्रीन पर आ जाएंगे और आपको सारी जानकारी मिलती रहेगी.

इस ऐप को आपके रूट के बारे में भी जानकारी होती है तो यो आपको पेट्रोल बचाने के लिए अच्छे रूट्स का सुझाव भी देता रहता है.

भाजपा की जीत, मुस्कुराते नीतीश

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में भाजपा की जीत और सरकार बनने से भाजपाई खेमे में खुशी की लहर तो है ही, पर भाजपा से इतर भी एक नेता के मन में लड्डू फूट रहे हैं. वह नेता मंद-मंद मुस्कुरा रहा है. भाजपा की जीत पर वह फिलहाल कुछ बोलने से तो परहेज कर रहा है, लेकिन उसे पता है कि उसके साथी नेताओं और दलों को औकात बताने का समय आ गया है. जी हां! बात नीतीश कुमार की ही हो रही है. भाजपा की जीत पर उनकी मुस्कान कई इंच बढ़ चुकी है.

पिछले कुछ समय से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और महागठबंधन में उनके साथी और ‘बड़े भाई’ लालू यादव के बीच सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है. जदयू के कई नेता दबी जुबान में कहते रहे हैं कि लालू के बढ़ते सियासी दबाब और उलजलूल डिमांड से नीतीश खासे परेशान हैं. भाजपा से दुबारा हाथ मिलाने का धौंस दिखा कर नीतीश अपने सियासी साथी लालू यादव को काबू में रखने का दांव चल सकते हैं.

पिछले दिनों राबड़ी देवी ने अपने बेटे तेजस्वी यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर महागठबंधन के अंदर भी खलबली मचा रखी है. राजद का खेमा पिछले कुछ महीने से उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने की हवा बनाने में लगा हुआ है. राबड़ी देवी ने अपनी बात को बल देने के लिए कह डाला कि राज्य की जनता तेजस्वी को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है. लालू यादव अब तक इस मसले पर चुप्पी साधे हुए हैं. उन्होंने राबड़ी के बयान पर सफाई देने की जरूरत नहीं समझी.

जदयू के सूत्र बताते हैं कि लालू यादव को महागठबंधन धर्म का पालन करना चाहिए और अपने नेताओं को फालतू की बयानबाजी से रोकना चाहिए. बिहार की जनता ने महाठबंधन को वोट दिया है और वह नीतीश को ही मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है. ऐसे में महागठबंधन के किसी दूसरे नेता को मुख्यमंत्री बनाने की हवा बनाना बेमानी है और इससे महागठबंधन के अंदर खटास पैदा हो रही है.

भाजपा और सुशील मोदी कई बार यह कह चुके हैं कि नीतीश कुमार पलटी मारने में माहिर हैं. जब भाजपा से 17 साल पुराना रिश्ता वह एक झटके में तोड़ सकते हैं तो लालू से उनकी सियासी दोस्ती लंबी नहीं चलने वाली है. नेशनल पार्टी होने के बाद भी भाजपा ने बिहार में नीतीश को बड़े भाई की भूमिका सौंप रखी थी, उसके बाद भी नीतीश ने उस रिश्ते की लाज नहीं रखी थी. अब लालू के साथ मिलने से नीतीश छोटे भाई की भूमिका में आ गए हैं और लालू के बढ़ते सियासी दबाब को को वह ज्यादा समय तक नहीं झेल पाएंगे.

पिछले कुछ समय से मौके-बेमौके नीतीश कुमार प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी के सुर में सुर मिलते रहे हैं. प्रकाश पर्व के मौके पर पटना पहुंचे प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शराबबंदी की जमकर तारीफ की. वहीं नीतीश ने भी मोदी के सुर में सुर मिलाया. नीतीश ने कहा कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान मोदी ने वहां शराबबंदी कराई थी, जिससे बाद ही गुजरात ने तरक्की की रफ्तार पकड़ी. गौरतलब है कि जब नोटबंदी के बाद सभी विपक्षी दलों ने मोदी की आलोचना की थी तो नीतीश ने उस मसले पर मोदी का साथ दिया था और नोटबंदी को जरूरी बताया था.

पिछले साल 12 मार्च को पटना हाई कोर्ट के शताब्दी समारोह में शिरकत करने नरेंद्र मोदी बिहार पहुंचे थे. उसमें मोदी और नीतीश कुमार साथ-साथ मौजूद थे. मोदी ने नीतीश की जमकर तारीफ की. मोदी ने खुल कर कहा कि गांवों में बिजली पहुंचाने की योजना को तेज रफ्तार देने के लिए नीतीश ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. एक हजार दिनों में 18 हजार गांवों में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया था और 6 हजार गांवों मे बिजली पहुंचाई जा चुकी है.

नीतीश महागठबंधन की लाइन से अलग जाकर कई मौकों पर केंद्र सरकार और प्रधनमंत्री की तारीफ में कसीदे पढ़ चुके हैं. 3 तलाक के मसले पर ही नीतीश ने मोदी को कठघरे में खड़ा किया था, लेकिन जीएसटी, सर्जिकज स्ट्राइक, नोटबंदी और बेनामी संपति के मामले में नीतीश ने खुल कर मोदी के सुर में सुर मिलाया. इन मामलों में नीतीश बिना-लाग लपेट के मोदी का साथ दे चुके हैं.

अगर दोनों दलों के सीटों और वोट प्रतिशत पर गौर करें तो राजग को पिछले विधानसभा चुनाव में कुल 33 फीसदी वोट मिले थे, जिसमें से भाजपा को 24.4 फीसदी मिला था. जदयू को 16.8 फीसदी वोट मिला था. राजग की झोली में 58 और जदयू के खाते में 71 सीट गई थी. दोनों की सीटों को जोड़ने से 129 सीट हो जाती हैं और विधानसभा मे बहुमत पाने के लिए 122 सीट की दरकार होती है. जदयू के भी कई नेता मानते हैं कि लालू की महत्वाकाक्षांओं और परिवारवाद का बोझ नीतीश ज्यादा समय तक नहीं ढो सकते हैं. 

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