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मोदी के हाथ होगा मुख्यमंत्री का रिमोट

चुनाव परिणाम के एक सप्ताह बाद तक भाजपा उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के नाम का खुलासा नहीं कर पाई है. 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को सबसे बड़ी जीत दिलाने वाले उत्तर प्रदेश का नम्बर सबसे बाद में रखा गया. जिन राज्यों में भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला वहां मुख्यमंत्री का नाम तय करके सबसे पहले सरकार बना दी गई. विरोधी दल इसे उत्तर प्रदेश की उपेक्षा के रूप में देख रहे हैं. भाजपा के मुख्यमंत्री पद को लेकर बने उहापोह के बीच जो नाम सबसे अधिक चर्चा में है वह सभी केन्द्रीय मंत्री ‘मनोज सिन्हा’ का है. इसके बाद कई और नाम भी सामने आ रहे हैं जो लोकसभा के सदस्य हैं. उत्तर प्रदेश में भाजपा के 325 विधायक चुनाव जीत कर आये हैं.

अगर भाजपा इनमें से मुख्यमंत्री का चुनाव नहीं करती और लोकसभा के सदस्यों में से किसी को मुख्यमंत्री बनाती है तो दो बातें साफ है कि भाजपा को विधायकों की क्षमता पर भरोसा नहीं है. इसलिये उनमें से कोई मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया. दूसरी बात लोकसभा सदस्य को मुख्यमंत्री बनाये जाने का जो कारण दिखाई दे रहा है वह यह कि वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली को समझता है. प्रधानमंत्री जैसा कहेंगे वैसा वह करेगा. जिस तरह से उत्तर प्रदेश के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दखल विधायकों के नाम चुनने से लेकर चुनाव प्रचार करने में रहा है उससे साफ है कि जो भी मुख्यमंत्री होगा वह प्रधानमंत्री के प्रतिनिधि के रूप में ही काम करेगा.

भाजपा में अब तक जो भी मुख्यमंत्री रहे हैं वह किसी नेता के प्रतिनिधि के रूप में काम नहीं करते हैं. उनका अपना वजूद रहा है. ऐसे मुख्यमंत्रियों में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का नाम प्रमुख है. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद युवाओं को प्रदेश की कमान देने के नाम पर ऐसे लोगों को मुख्यमंत्री बनाने का सिलसिला शुरू हुआ जो केन्द्र सरकार के रिमोट की तरह काम कर सकें. गुजरात में पहले आनंदी बेन पटेल को मुख्यमंत्री बनाया गया जब वह सफल नहीं हुई तो विजय रूपानी को मुख्यमंत्री बनाना गया. हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर भी नये नाम की तरह सामने आये और मुख्यमंत्री बने.

गोवा में भाजपा को पूरा बहुमत नहीं मिला तो वहां रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर को भेजा गया क्योंकि वह पहले मुख्यमंत्री रह चुके हैं. उत्तराखंड में भाजपा को कोई खतरा नहीं था तो पहले के तमाम मुख्यमंत्रियों को दरकिनार कर त्रिवेन्द्र सिंह रावत को कुर्सी सौंपी गई. जो भाजपा में उत्तराखंड के लिये नया नाम था. जानकार मानते है कि जहां भाजपा को बहुमत हासिल हुआ है वहां वह रिमोट कंट्रोल मुख्यमंत्री पसंद करती है. भाजपा केन्द्र से कई अफसरों को भी उत्तर प्रदेश भेजने जा रही है, जो प्रधानमंत्री की योजनाओं को अमल में लायेंगे.

कमजोर मुख्यमंत्री बनाने का काम कांग्रेस भी करती रही है. जब कांग्रेस की कमान इंदिरा गांधी ने संभाली तब वह पार्टी की सबसे मजबूत मेंमबर थी. इंदिरा गांधी अपने पंसद का मुख्यमंत्री ही चुनती थी. उसी नाम पर विधायक और पर्यवेक्षक मुहर लगाते थे. पर भविष्य के लिहाज से यह नीति पार्टी के लिये सही नहीं साबित हुई. आज कांग्रेस को कई प्रदेशों में जनाधार वाले नेता नहीं मिल रहे. अगर पार्टियां ऐसे ही अपनी पसंद के नेता का नाम चुनती रही तो प्रदेश स्तर के जमीनी नेताओं का विकास रूक जायेगा. कांग्रेस ने भी भाजपा की तरह ही कई बार विशाल बहुमत हासिल किया था. कांग्रेस के हश्र को देख समझ कर भाजपा को उस तरह के फैसलों से दूर रहना चाहिये जिसके चलते कांग्रेस का यह हश्र हुआ है.

क्या है युवी के 6 बॉल पर 6 छक्कों का राज

2007 में भारत-इंग्लैंड के बीच खेले जा रहे टी20 मैच में युवराज सिंह ने स्टुअर्ट ब्रॉड के ओवर में छह छक्के लगाए थे. आज भी लोग उस पुराने मैच को देख कर रोमांचित हो जाते हैं. इन लगातार छह छक्कों के बदौलत ही युवराज ने 12 गेंद पर अपने 50 रन भी पुरे कर लिए थे.

स्टुअर्ट ब्रॉड के लिए वो दिन किसी मनहूस दिन से कम नहीं था और ना चाह कर भी उन्हें ये रिकॉर्ड मिल गया. किसी भी बॉलर के लिए ये रिकॉर्ड किसी काले दिन के तरह ही है जो वो कभी अपने नाम नहीं करना चाहेगा.

लेकिन आपको ये नही मालूम होगा कि ये छह छक्के युवराज ने खुन्नस में मारे थे. भारत की ओर से गेंदबाजी करते हुए युवराज सिंग के गेंद पर इंग्लैंड के खिलाड़ी एड्रियन दिमित्री मैस्करेनहास ने एक ओवर में 5 छक्के मारे थे जिससे युवराज बौखला गए थें. यह उनके लिए काफी बुरा था. इसका बदला लेने के लिए युवराज ने अपना निशाना इंग्लैंड के स्टुअर्ट ब्रॉड को बनाया और ब्रॉड के एक ही ओवर में छह छक्के मारकर विश्व कीर्तिमान बना डाला.

इन तरीकों से मिलेगा अनचाहे फोन कॉल्स से छुटकारा

क्या आप भी अपने फोन पर आने वाले अनजाने कॉल्स या स्पैम कॉल्स से परेशान हैं? क्या वक्त-बेवक्त आपको ये कॉल्स परेशान करते हैं?  क्या आप भी जरूरी काम करते समय इन कॉल्स से परेशान हो जाते हैं? अगर वाकई ऐसा है तो अब आपको चिंता करने की जरुरत नहीं है, क्योंकि हम आपको इस परेशानी से निजात दिला सकते हैं. आज हम आपको ऐसे ही कुछ तरीके बताने जा रहे हैं, जिससे आपको स्पैम कॉल्स से छुटकारा मिल जाएगा.

1. ब्लैकलिस्ट में डाल दें नंबर

कई स्मार्टफोन्स और फीचर फोन में ब्लैकलिस्ट की सुविधा दी गई होती है. जो भी नंबर आप ब्लॉक करना चाहते हैं, उन्हें आप ब्लैकलिस्ट में डाल सकते हैं. इस फीचर में कॉल्स के साथ-साथ मैसेज ब्लॉक का भी ऑप्शन होता है. ये सबसे आसान उपाय होता है फालतू के कॉल्स से छुटकारा पाने के लिए.

2. सर्विस प्रोवाइडर से कराएं ब्लॉक

कस्टमर सर्विस के जरिए अनचाहे कॉल्स को ब्लॉक किया जा सकता है. इसके लिए आप जिस भी कंपनी का नंबर इस्तेमाल कर रहे हैं, उसके टेलिकॉम ऑपरेटर को कॉल करके, आपको उन नंबरों की लिस्ट उन्हें देनी होती है, जिन्हें आप ब्लॉक कराना चाहते हैं और आपको काम ऐसे आसान हो जाएगा.

3. खुद को कर लें रजिस्टर

इंटरनेट से भी आप अपने नंबर पर ‘स्पैम कॉल ब्लॉकर’ लगा सकते हैं. इसके लिए आपको वेबसाइट www.donotcall.gov पर जाकर, ब्लॉक करने वाले नंबर की जानकारी देनी होगी. इससे आपको सभी अनचाहे कॉल्स से छुटकारा मिल सकता है.

4. फोन में करें सेटिंग

आप अपने एंड्रॉयड या आईफोन की कॉन्टैक्ट लिस्ट से कॉलर चुन सकते हैं. यहां आपको ऑप्शन दिए जाएंगे. आप किस का कॉल रिसीव करना चाहते हैं और किसका नहीं, ये आप खुद ही तय कर सकते हैं.

5. ये ऐप भी है कारगर

स्पैम या अनचाहे कॉल्स से छुटकारा पाने के लिए इन दिनों प्ले-स्टोर पर बहुत से ऐप मौजूद हैं. इनमें से सही और उचित ऐप्स के जरिए आप आसानी से इन कॉल्स को ब्लॉक कर सकते है. इसके अलावा उस कॉल को एक स्पैम टैग भी दे सकते हैं, जिससे कि भविष्य में ये कॉल्स आपको कभी परेशान न कर सकें.

बनें आत्मनिर्भर हैल्थ इंश्योरैंस से

सुनील अपने घर का एकमात्र कमाने वाला सदस्य है. एक दिन अचानक बाइक चलाते समय वह दुर्घटना का शिकार हो गया. उस इतनी गंभीर चोटें आईं कि तुरंत सर्जरी करानी पड़ी. उस के परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता यदि उस ने सही समय पर स्वास्थ्य बीमा नहीं करवाया होता. उस के औपरेशन व अस्पताल के बाकी सारे खर्च का भुगतान बीमा कंपनी ने ही किया. स्वास्थ्य बीमा, जीवन में आने वाले जोखिम को कम करता है. यह सिर्फ आकस्मिक दुर्घटनाओं  में ही नहीं, बहुत सी बीमारियों के इलाज हेतु भी सुविधाएं प्रदान करता है. किसीकिसी बीमारी पर होने वाला खर्च तो लोगों की जमा पूंजी उड़ा ले जाता है, लेकिन स्वास्थ्य बीमा की सुविधा से उन के घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ने से बच जाती है.

आसान इलाज : स्वास्थ्य बीमा कंपनियों का बहुत से अस्पतालों के साथ टाईअप होता है. इस से बीमाधारक को अच्छे अस्पताल की जानकारी न होने पर भी मुश्किल नहीं होती और अस्पताल की सुविधाओं के लिए भटकना नहीं पड़ता. आमतौर पर इंश्योरैंस कंपनी के पैनल में शामिल अस्पतालों से ही बीमाधारक का इलाज संभव हो जाता है.

टैक्स छूट : स्वास्थ्य बीमा कराने पर प्रीमियम व टैक्सबल इनकम के अनुसार अधिकतम 15 हजार तक की इनकम टैक्स की वार्षिक छूट प्राप्त है.

पौलिसी लेने से पहले

पौलिसी लेने से पहले अच्छी तरह उस की शर्तें जान लें ताकि आप को पौलिसी लेने के पश्चात किसी तरह की परेशानी न हो. जैसे यह जान लें कि जो भी पौलिसी आप ले रहे हैं, उस में कौनकौन सी बीमारियों के इलाज हेतु सुविधाएं दी जाएंगी और किनकिन बीमारियों को उस में शामिल नहीं किया गया. जैसे, आमतौर पर डैंटल और मैटरनिटी खर्चों का भुगतान बीमा कंपनी द्वारा नहीं किया जाता है. लगभग सभी बीमा कंपनियों से हैल्थ इंश्योरैंस क्लेम की सुविधा प्राप्त करने हेतु न्यूनतम 24 घंटों के  लिए अस्पताल में भरती होना आवश्यक होता है.

इस के अलावा कुछ कंपनियां अस्पताल में भरती होने से 2 सप्ताह पहले व बाद के इलाज के खर्चों का भुगतान भी करती हैं, वहीं कुछ ऐसा नहीं करतीं. यह सब कुछ बीमा कंपनी की अपनी शर्तों पर निर्भर करता है, इसलिए सभी बातों को सुनिश्चित कर लें.

पौलिसी लेने से पहले देख लें कि बीमा कंपनी के पैनल में शामिल अस्पतालों का स्तर कैसा है, उन में कितनी सुविधाएं उपलब्ध हैं. किसी विश्वसनीय बीमा कंपनी से ही पौलिसी लें इस के लिए इंश्योरैंस ऐडवाइजर की सलाह ले सकते हैं. जांच लें कि पौलिसी एजेंट द्वारा बताई गई सभी शर्तें व सुविधाएं पौलिसी के कागजों में लिखित रूप में पेश की गई हैं या नहीं.

पौलिसी कैसी कैसी

आजकल बहुत सी सरकारी व निजी कंपनियों ने हैल्थ इंश्योरैंस प्लान बाजार में उतारे हैं, जैसे एलआईसी, आईसीआईसीआई, मैक्स, ओरिएंटल वगैरह ले. स्वास्थ्य बीमा के मुख्य रूप से 3 ही प्रकार देखने को मिलते हैं, जिन में किसी को भी अपनी आवश्यकता के अनुसार ही कराना चाहिए.

वैयक्तिक पौलिसी : जैसा कि नाम से ही जाहिर है ,यह पौलिसी एक व्यक्ति के लिए होती है . जिस के नाम से भी पौलिसी कराई गई होगी क्लेम पाने का अधिकारी केवल वही होता है. यह अविवाहित लोगों के लिए उपयुक्त रहती है.

फैमिली फ्लोटर : फैमिली फ्लोटर बीमा के अंतर्गत सिर्फ एक बीमा धारक की पौलिसी के नाम पर पूरा परिवार सुविधा प्राप्त करने का अधिकारी होता है. जैसे, घर के मुखिया के नाम पर यदि 4 लाख का फैमिली फ्लोटर बीमा कराया गया है, तो उस के परिवार में कोई भी इस पौलिसी की सेवाओं का लाभ प्राप्त कर सकता है व यदि 2 लोगों को एक ही समय पर जरूरत पड़ती है, तो यह राशि उन्हें जरूरत के अनुसार विभाजित हो कर मिल जाएगी. इस से एक ही पौलिसी से 2 लोगों को फायदा होगा.

ग्रुप इंश्योरैंस : ग्रुप इंश्योरैंस वह इंश्योरैंस होता है, जो कार्यालय द्वारा सभी कर्मचारियों का करवाया जाता है. ग्रुप इंश्योरैंस से प्रत्येक कर्मचारी को इस का लाभ व्यक्तिगत आवश्यकता के अनुसार मिलता है. इस इंश्योरैंस में भी कुछ शर्तें शामिल होती हैं जिन की जानकारी जरूरी है. परंतु इस का लाभ किसी को भी केवल तभी तक प्राप्त होगा, जब तक कि वह उस कार्यालय का कर्मचारी रहेगा .

क्लेम का भुगतान

स्वास्थ्य संबंधी इलाज व दवाओं के खर्च का भुगतान बीमा कंपनी से क्लेम प्राप्त कर के किया जाता है, जिस के 2 तरीके होते हैं:

कैशलेस : कैशलेस की सुविधा द्वारा क्लेम प्राप्त करना सब से सुविधाजनक होता है.  जिस के अंतर्गत बीमा कंपनी अस्पताल को स्वयं पूरे बिल का भुगतान करती है. आमतौर पर कैशलेस द्वारा भुगतान तभी किया जाता है, जब बीमा कंपनी के नैटवर्क के अस्पतालों से इलाज करवाया जाता है.

रीऐंबर्सटमैंट : यदि कंपनी के नैटवर्क अस्पतालों से इलाज नहीं करवाया जाता है तो कंपनी रीऐंबर्सटमैंट की प्रक्रिया से धारक को भुगतान करती है. रीऐंबर्सटमैंट से क्लेम की प्राप्ति के लिए बीमाधारक को इलाज में हुए खर्च का पूरा बिल व ब्योरा बीमा कंपनी को जमा करवाना पड़ता है और फिर बीमा कंपनी उस का भुगतान बीमाधारक को कर देती है. कभी कभी रीऐंबर्सटमैंट द्वारा तब भी क्लेम का भुगतान होता है जब बीमा कंपनी इलाज की सुविधाओं से जुड़े संशय दूर कर लेती है.

संशयों का समाधान

दिल्ली के सफदरजंग एनक्लेव स्थित ऐजी इंश्योरैंस कंपनी के इंश्योरैंस ऐडवाइजर ए. के. गोयल ने स्वास्थ्य बीमा से जुड़े मुख्य संशयों और उन के समाधान को बताया:

मैडिकल जांच : स्वास्थ्य बीमा पौलिसी लेते समय आमतौर पर 45 वर्ष से कम आयुवर्ग के लोगों का मैडिकल चेकअप नहीं किया जाता. बीमा कंपनी यह मान कर चलती है कि धारक जो भी सूचना अपने बारे में दे रहा है वह सही है इसीलिए धारक को अपनी ओर से ईमानदारी बनाए रखनी चाहिए व सही जानकारी देनी चाहिए ताकि पौलिसी का बिना किसी विवाद में उलझे लाभ उठाया जा सके.

पूर्ववर्ती बीमारियों क इलाज : बीमा पौलिसी में पूर्ववर्ती बीमारियों के इलाज हेतु सुविधाएं भी सम्मिलित होती हैं परंतु इस का लाभ पौलिसी लेने के  कुछ वर्षों के पश्चात ही उठाया जा सकता है आमतौर पर पौलिसी लेने के 5वें वर्ष से इस के इलाज का लाभ प्रारंभ हो जाता है. वहीं कुछ बीमारियों के इलाज की सुविधा पौलिसी लेने के 11 महीने, 2 वर्ष पश्चात भी मिलनी शुरू हो सकती है. जैसे आमतौर पर हर्निया की सर्जरी पौलिसी लेने के 1 वर्ष पश्चात कारवाई की जा सकती है वहीं मोतियाबिंद की 2 वर्ष के पश्चात परंतु गंभीर बीमारियों की इलाज की सुविधा ज्यादातर पौलिसी में 5वें वर्ष से मिलनी शुरू होती है.

पौलिसी ब्रेक : बीमा को सुचारु रूप से चलाने का एक नियम होता है मासिक प्रीमियम. जिसे समय पर देना आवश्यक होता है ताकि आप की पौलिसी लैप्स न हो. पौलिसी प्रीमियम भरने के लिए एक निश्चित तारीख तय की जाती है. इस दिन तक प्रीमियम का भुगतान न करने पर कु छ कंपनियां ग्रेस पीरियड के तौर पर 1 सप्ताह का समय देती है परंतु प्रीमियम देरी से देने में पौलिसी को सुचारु तरीके से चलाने में अवरोध उत्पन्न हो सकता है. बेहतर है प्रीमियम समय पर दें.

नवीनीकरण : आमतौर पर बीमा पौलिसी की समयावधि 1 वर्ष की होती है और इस का भावी लाभ उठाने के लिए इस का नवीनीकरण करना आवश्यक होता है. जिसे समय पर करा लेना चाहिए. नवीनीकरण करवाने के लिए निश्चित तारीख व कभीकभी समय भी तय होता है जैसे पिछली पौलिसी 2 बजे तक करवाई थी तो उस का नवीनीकरण इस समय से पूर्व हो जाना चाहिए. जोखिम से बचने के लिए बेहतर होता है कि नवीनीकरण की तिथि से 1 माह पहले ही इस का नवीनीकरण करवा लिया जाए व ध्यान रहे कि पहली पौलिसी के समय पर दी गई किसी भी सूचना में बदलाव आया है तो उसे भी कंपनी को सूचित अवश्य करें.

महंगी न पड़ जाए सेकेंड हैंड कार

हम भारतीय जरूरत या शौकीया तौर पर कार नहीं रखते, पर दूसरों की आंखों को लुभाने या सच कहें तो जलाने के लिए गाड़ियां रखते हैं. भारत में जितनी तेजी से नित नए कारों के मॉडल लॉन्च हो रहे हैं उतनी ही तेजी से सेकेंड हैंड कारों का बाजार भी बढ़ रहा है. कारों के शौक के कारण आजकल लोग 1-2 साल में ही नई कार बेच देते हैं. यही कारण है कि सेकेंड हैंड कारों का बाजार पहले के मुकाबले बहुत ज्यादा बढ़ा है और लोग भी सेकेंड हैंड कारें खरीद रहे हैं. पर सेकेंड हैंड कार लेने से पहले सावधानी बहुत जरूरी है. कार के बारे में अच्छे से जांच-पड़ताल कर लेना बहुत जरूरी है.

बाहरी खूबसरती पर ही फिदा हो जाते हैं, चाहे वो इंसान की हो या कार की. पर ऐसा करनी बेवकूफी है. क्योंकि जो दिखता है, वो होता नहीं. लुक के अलावा भी कुछ बातें हैं जो सेकेंड हैंड कार खरीदते वक्त जहन में होनी चाहिए.

कार की इंश्योरेंस हिस्ट्री के बारे में जानकारी जुटाएं

आपने जो सेकेंड हैंड कार पसंद की है उसका इंश्योरेंस आपको बहुत सारी जानकारियां दे सकता है. सबसे पहले ये पता करें कि जो कार आप खरीदने जा रहे हैं उसका इंश्योरेंस है या नहीं. अगर है तो क्या नियमित रूप से उसका प्रीमियम भरा गया है या नहीं. इंश्योरेंस क्लेम की हिस्ट्री से आप ये पता कर सकते हैं कि कभी कार दुर्घटनाग्रस्त हुई है या नहीं. इश्योरेंस के कागजों को अपने नाम पर ट्रांसफर करवा लें.

रजिस्ट्रेशन के पेपर्स की जांच भी है जरूरी

कार खरीदने से पहले हर कागज की अच्छे से जांच करवा लें. आप इसके लिए आरटीओ ऑफिस की मदद ले सकते हैं. यह सुनिश्चित कर लें की कार के मालिक ने हर तरह के टैक्स भरे हैं. अगर कार लोन लेकर खरीदी गई है तो मालिक से एनओसी लेना न भूलें.

यूं पता करें कार की हालत 

गाड़ी के लुक पर फिदा होकर गाड़ी के टायर के बारे में भूल मत जाना भविष्य में आपकी परेशानीयां बढ़ा सकती हैं. गाड़ी के टायर से आप बहुत कुछ पता कर सकते हैं. टायर के साइज, रिम के अलाइनमेंट के बारे में अच्छे से जांच करें. इससे कार की हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है. अगर टायर ज्यादा घिसे हैं तो कार न खरीदें.

कार एक्सीडेंटल न हो

कार के लक्जरी लुक से ज्यादा जरूरी है ये पता करना कि कहीं कार एक्सीडेंटल तो नहीं है. लेकिन सबसे पहले हमें ये जांच लेना चाहिए कि कहीं ये कार एक्‍सीडेंटल तो नहीं है. कार के पेंट से आप यह पता कर सकते हैं. कार के बोनट, डोर और डिक्‍की को अच्छे से जांच करें. बोनेट, डोर सबको खोल कर चेक करें.

इंजन क्वालिटी चैक करवाएं

सेकेंड हैंड कार बेचने वाले कार को चमका देते हैं. पर इंजन की क्वालिटी तो आपको ही चैक करनी पड़गी. आप अनुभवी मैकेनिक की मदद से इंजन को चैक करा सकते हैं. बेहतर होगा कि आप अपने कार का चेक अप एक अनुभवी मैकेनिक से कराएं.

उमेश यादव ने तोड़ दिया मैक्सवेल का बल्ला!

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच चार टेस्ट मैचों की बॉर्डर-गावस्कर सीरीज का तीसरा मुकाबला खेला जा रहा है. दो साल से ज्यादा समय के बाद टेस्ट में वापसी करते ऑस्ट्रेलिया के मैक्सवेल ने रांची टेस्ट के दूसरे दिन अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ 104 रन की पारी खेली.

तीसरे टेस्ट के दूसरे दिन की शुरुआत उमेश यादव ने जोरदार अंदाज में की, उन्होंने दिन की पहली ही गेंद पर ग्लेन मैक्सवेल का बल्ला आधा तोड़ डाला. यादव की गेंदबाजी में इतनी ताकत देखने के बाद मैक्सवेल भी काफी हैरान रह गए थें.

ऑस्ट्रेलिया की पारी के 91वें ओवर में पहली ही गेंद पर उमेश यादव ने ग्लेन मैक्सवेल का बैट तोड़ दिया. मैक्सवेल के हाथ में केवल बैट का हैंडल रह गया और वह हंसने लगे.

उस समय वह 82 रन पर खेल रहे थे. यादव की 137 किमी की रफ्तार वाली यह गेंद अंदर की ओर आई और मैक्सवेल के बैट के ऊपरी हिस्से पर लगी.

मैक्सवेल छोटे फॉरमेट में अपनी काबिलियत साबित कर चुके हैं, उन्हें टेस्ट में तीन मौके मिले, लेकिन वह इन सभी में विफल रहे. चोटिल मिशेल मार्श की वजह से उन्हें यह मौका मिला. उन्होंने कहा, मैं जानता हूं कि यह कितना बुरा लगता है जब आपने अंतिम मैच इतने समय पहले खेला हो. मैं इस मौके का पूरा फायदा उठाना चाहता था. ऑस्ट्रेलियाई टेस्ट टीम के साथ मैदान पर उतरना बहुत अच्छा लगा.

अब जीमेल एंड्रॉयड ऐप से भी भेज पाएंगे पैसे

एक नए अपडेट के तहत, गूगल ने जीमेल के जरिए पैसे मंगाने और भेजने का नया फीचर यूजर्स के लिए उपलब्ध कराया गया है. यह फीचर सबसे पहले वेब पर उपलब्ध कराया गया था, और अब इसे एंड्रॉयड ऐप पर भी शुरू कर दिया गया है. यूजर जीमेल एंड्रॉयड ऐप में अटैचमेंट बटन पर टैप करने के बाद, सेंड मनी विकल्प पर क्लिक कर गूगल वॉलेट के जरिए आसानी से पैसे ट्रांसफर कर सकते हैं.

वेब पर, कंपोज बटन के पास एक छोटा डॉलर ($) का आइकन बना है जिससे पैसे ट्रांसफर किया जाता है. एंड्रॉयड ऐप पर, यह उस अटैचमेंट बटन में छिपा हुआ है जिससे पहले फाइल, फोटो और वीडियो अटैच कर सकते हैं. इससे अब गूगल वॉलेट सभी एंड्रॉयड स्मार्टफोन पर उपलब्ध है और अब इससे पैसे भेजना भी आसान हो गया है.

पैसे भेजने का तरीका बेहद आसान है. आपको सिर्फ अटैचमेंट आइकन पर टैप करना है और 'सेंड मनी' विकल्प पर क्लिक कर सकते हैं. 'सेंड मनी' विकल्प से कैश के लिए रिक्वेस्ट भी भेजी जा सकती है और बिना किसी अतिरिक्त ऐप को इंस्टॉल किए उस यूजर को पैसे मिल जाएंगे जिसे भेजे गए हैं. आप अपने डेबिट/क्रेडिट कार्ड के जरिए गूगल वॉलेट को रीचार्ज कर सकते हैं और फिर दुनियाभर में किसी भी जीमेल एंड्रॉयड और वेब यूजर को अटैचमेंट के रूप में पैसे भेज सकते हैं.

यह फीचर अभी आईओएस यूजर के लिए उपलब्ध नहीं है. लेकिन जीमेल के जरिए पैसे भेजने वाले इस फीचर को जल्द ही आईओएस यूजर तक पहुंचने की उम्मीद है.

मुद्दों से भटके चुनाव, धर्म जाति और जुमलों के वार

उत्तर प्रदेश के इन विधानसभा चुनावों में अखिलेश राहुल और मोदी शाह की जोड़ी थी, तो मायावती अकेले ही चुनाव मैदान में थीं. तीनों एकदूसरे के खिलाफ लट्ठमार होली सी खेलते नजर आए. किसी ने जनता को यह भरोसा नहीं दिलाया कि जीत के बाद वह क्या करेगा? केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं, बल्कि बाकी राज्यों के चुनावों में भी मुद्दों की जगह जुमले उछालते रहे. यह केवल अपने देश की ही बात नहीं है, दुनिया के दूसरे देशों में होने वाले चुनावों में भी नेता जनता को ऐसे ही लुभाते नजर आते हैं. अब चुनाव लड़ना एक प्रबंधन कला है, जिस में बड़ीबड़ी कंपनियां शामिल होने लगी हैं. गरीब से गरीब प्रदेश के नेता अब हैलीकौप्टर सेचलते हैं. विकास के मुद्दे हवा में हो गए हैं. यही वजह है कि चुनाव के बाद जीतहार का देश के विकास पर कोई खास असर नहीं पड़ता है.

चुनाव दर चुनाव यही कहानी अब जोर पकड़ती जा रही है. नेताओं के घोषणापत्र देख कर लगता है कि वे कितने अमीर हैं. राजनीतिक दलों का कोई भी उम्मीदवार करोड़पति से कम नहीं होता है. पर जनता वहीं की वहीं रहती है. यही वजह है कि देश का सब से बड़ा प्रदेश होने के बाद भी उत्तर प्रदेश के लोग रोजगार के लिए दूसरे प्रदेशों में जाने को मजबूर हैं.       उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा के विधानसभा चुनावों से पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चुनावों में वोट मांगने के लिए जाति और धर्म का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. अदालत की इस सोच से यह उम्मीद जगी थी कि ये चुनाव जातिधर्म के असर से दूर होंगे. पर ऐसा दिखा नहीं. राजनीतिक दलों की सब से बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश थी, जहां पर जाति और धर्म का इस्तेमाल सब से ज्यादा होता है.

ऊपरी तौर पर हर दल ने जाति और धर्म से खुद को पूरी तरह से दूर बताया, पर जैसेजैसे चुनाव आगे बढ़ा, तो राजनीतिक दलों की पोल खुलने लगी. सभी दलों ने जाति और धर्म के समीकरणों और आंकड़ों को देख कर अपनेअपने उम्मीदवारों को टिकट बांटे. दरअसल, राजनीतिक दलों को यह पता है कि जनता विकास के मुद्दों की बात चाहे जितनी करे, पर वोट देते समय वह जातिधर्म के समीकरण से ऊपर नहीं उठ पाती है. चुनाव के समय हर दल ने अपने उम्मीदवार की लिस्ट जारी की, तो उस का जाति और धर्म के आधार पर विश्लेषण भी किया गया. इस से साफ जाहिर होता है कि चुनाव में जातिधर्म पूरी तरह से हावी रहे.

सभी दलों ने अपने प्रचारतंत्र के बहाने इस बात का खूब प्रचार किया कि उस पार्टी ने किस जाति और धर्म के लोगों को सब से ज्यादा टिकट दिए.उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने किसी भी मुसलिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया. ऊपरी तौर पर भाजपा ने इस बात का प्रचार नहीं किया. इस मुद्दे पर बहुत ज्यादा बात भी नहीं की. भाजपा चाहती तो इस मुद्दे को उछाल  कर बड़ा भी कर सकती थी. अदालत के आदेश की मंशा को ध्यान में रखते हुए शायद उस ने यह कदम नहीं उठाया. 

वोटरों को बताया गया कि जहां एक तरफ बाकी सभी दल मुसलिम वोटरों का साथ पाने के लिए उन के लोगों को टिकट दे रहे हैं, वहीं भाजपा ने एक भी मुसलिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया. यह बात बहुत हद तक लोगों पर असर डालने में कामयाब रही. इस की वजह से केवल अगड़ी जाति के वोटर ही नहीं, बल्कि दलित और पिछड़ी जाति के वोटर भी बिदकने लगे. भाजपा के साथसाथ सपाकांग्रेस गठबंधन और बसपा ने मुसलिम वोटरों को ध्यान में रख कर ही पाटी के टिकट बांटे थे. बसपा को यह उम्मीद थी कि सपा की घरेलू लड़ाई के बाद मुसलिम वोट सपा से दूर हो कर बसपा को जाएंगे, क्योंकि परिवार केविवाद में फंसी सपा चुनावी लड़ाई में भाजपा से पिछड़ जाएगी. मुसलिम वोटर हमेशा भाजपा के खिलाफ वोट करेंगे. ऐसे में बसपा ने सब से ज्यादा मुसलिम उम्मीदवारों को टिकट दे दिए.

 

लेकिन जब कांग्रेससपा का गठबंधन हो गया, तो बसपा का यह गेम पलट गया. अब मुसलिम वोट एकमुश्त बसपा को जाने के बजाय बिखर गए. बसपा के लिए मुसीबत यह हो गई कि दलित वोट हिंदुत्व के झांसे में आने लगे. इस बात का अहसास होते ही बसपा प्रमुख मायावती ने आरक्षण के दांव का इस्तेमाल किया.

 

दलित जातियां अब केवल आरक्षण के मुद्दे पर भी अगड़ी जातियों के विरोध में जा सकती हैं. बसपा प्रमुख ने भाजपा और संघ को आरक्षण विरोधी बताना शुरू किया. मायावती ने कहा कि भाजपा संघ के दबाव में है. ऐसे में वह धीरेधीरे आरक्षण को खत्म करने की योजना बना रही है.

 

भाजपा ने बड़ी होशियारी से आरक्षण के किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया. वह आरक्षण जैसे मुद्दों का जवाब देने की जगह जुमलेबाजी पर उतर आई. सपाकांग्रेस गठबंधन ने भी इस जुमलेबाजी में हिस्सा लिया. ऐसे में पूरा चुनाव ही मुद्दों से भटक गया.

 

पूरे चुनाव में उत्तर प्रदेश की विकास योजनाओं का कहीं जिक्र नहीं हुआ. राजनीति के अपराधीकरण, राजनीति में पैसों के चलन पर कोई बात नहीं हुई.

 

सीधेतौर पर जाति और धर्म की चर्चा से खुद को दूर रखते हुए अप्रत्यक्ष रूप से उन बातों का जिक्र किया गया, जो जाति और धर्म को बढ़ावा देती थीं. इस में ‘गधों’, ‘कसाबआतंकी’, ‘ईददीवाली’, ‘कब्रिस्तानश्मशान’ जैसे जुमले खूब उछाले गए. बड़ेबड़े नेताओं के चुनावी भाषण पूरी तरह से जुमलेबाजी से भरे नजर आए.

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में सपा, कांग्रेस और बसपा को ‘स्कैम’ बताया. अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी की बात का जवाब देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री केवल मन की बात करते हैं, काम की बात नहीं करते हैं. चुनावों की शुरुआत में विकास और काम के मुद्दों पर भाषण हुए, पर बाद में ये सब दरकिनार हो गए और बेकार की बातें उछलने लगीं.

 

इस चुनाव में विरोधी दलों का नामकरण भी अलगअलग तरह से करने का काम हुआ. भाजपा ने सपाकांग्रेस गठबंधन को ‘स्कैम’ करार देते हुए अखिलेशराहुल पर कटाक्ष कर के कहा कि एक से उस के पिता दुखी हैं, तो दूसरे से उस की माता दुखी हैं.

 

बसपा को नया नाम देते हुए भाजपा के नेताओं ने उसे ‘बहिनजी संपत्ति पार्टी’ कहा, तो बसपा ने नरेंद्र मोदी को ‘एंटी दलितमैन’ और भाजपा को ‘भारतीय जुमला पार्टी’ कहा.

 

अखिलेश यादव ने भाजपा को ‘चालू पार्टी’ का नाम दिया और बसपा को ‘पत्थरों वाली सरकार’ का नाम दिया. मायावती ने अखिलेश यादव को ‘बबुआ’ कहा.

 

भाजपा ने अखिलेश और मुलायम के पितापुत्र विवाद को खूब उछालने का काम किया. सपा को ‘कुनबा पार्टी’ करार दिया.

 

सब से खास बात तो यह रही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद को उत्तर प्रदेश का गोद लिया बेटा करार दिया. इस पर उत्तर प्रदेश बाल संरक्षण आयोग की सदस्य नाहिद लारी खान ने एतराज जताते हुए इसे गोद लेने संबंधी कानून का मजाक  बताया. 

 

भारी पड़ी भाजपा

 

चुनाव में जीत के लिए प्रबंधन और बोलने की कला का सब से अहम रोल हो गया है. अब यह सब करना पार्टी संगठन और कार्यकर्ताओं के बस की बात नहीं रह गई है. इस के लिए प्रोफैशनल टीमें बेहतर काम करती हैं. ये टीमें पूरी तरह से अपने काम पर फोकस करती हैं, जिस से पार्टी हर जगह सब से आगे दिखती है.

 

प्रोफैशनल टीमों के चुनाव प्रबंधन और नेताओं के बोलने की चतुराई के मामले में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भाजपा अपने विरोधी बसपा और सपाकांग्रेस गठबंधन पर हावी रही. साथ ही, भाजपा मीडिया के साथ बेहतर तालमेल करती दिखी.

 

बसपा में सारा तालमेल पार्टी प्रमुख मायावती के आसपास ही घूमता रहा. कांग्रेस में काफी अच्छी तरह से तालमेल रखा जाता है, पर उस की परेशानी यह रही कि हाईकमान के आदेश नीचे के कार्यकर्ताओं को सीधे नहीं मिले, जिस से ग्राउंड पर काम करने वाले को ऊपरी नीतियों का पता ही नहीं चल पाया.

 

उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार होने के चलते समाजवादी पार्टी से यह उम्मीद थी कि वहां पर चुनाव प्रबंधन बेहतर होगा, खासकर मीडिया को हर जानकारी समय पर मिलेगी.

 

समाजवादी पार्टी में मीडिया की भीड़ तो बड़े स्तर पर दिखी, पर बिना किसी भेदभाव के सटीक जानकारी नहीं मिली. पार्टी प्रवक्ताओं का फोकस केवल अखिलेश यादव पर रहा, जिस की वजह से भाजपा के हमलों का सही जवाब वहां तैयार नहीं मिला.

 

आज के दौर में मीडिया का मतलब केवल अखबार या टैलीविजन चैनल नहीं रह गए हैं. वैब मीडिया सब से बड़े हथियार के रूप में काम कर रहा है. वैब मीडिया को ले कर सपा और बसपा में कोई नीति नहीं दिखी, जबकि भाजपा में इसे बड़ी प्रमुखता के साथ देखा गया.

 

यह सच है कि जमीनी जनाधार और वोट बैंक के लैवल पर बात करें, तो उत्तर प्रदेश में जो असर मायावती का है या अखिलेश यादव का है, वह भाजपा और कांग्रेस दोनोंका नहीं है. दोनों ही दलों में प्रदेश लैवल पर एक भी ऐसा नेता नहीं है, जो मायावती और अखिलेश यादव की लोकप्रियता का मुकाबला कर सके. सब से बड़ा वोट बैंक भी इन दोनों दलों के पास ही है. इस के बाद भी ये लड़ाई में पीछे दिखे.

 

यही वजह है कि चुनाव प्रबंधन में अखिलेश यादव और मायावती दोनों ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से बहुत पीछे हैं. अखिलेश और मायावती दोनों ही के पास बोल पाने की वह कला नहीं है, जो नरेंद्र मोदी के पास है.

 

अखिलेश यादव और मायावती कोई अकुशल नेता नहीं हैं. दोनों की ही जमीनी पकड़ है. चुनाव में पैसा भी दोनों दल खर्च रहे हैं. फर्क केवल यह है कि भाजपा से चुनाव प्रबंधन के मामलें में दोनों ही दल पिछड़ रहे हैं. जिस ढंग से भाजपा अपनी बात को रख रही है, चुटीले संवादों से सुनने वालों को प्रभावित कर रही है, उस तरह से मायावती और अखिलेश नहीं कर पा रहे हैं. इंटरनैट से ले कर प्रचार के सभी साधनों में सब से आगे भाजपा है.

 

प्रधानमंत्री रह चुके डाक्टर मनमोहन सिंह के रेनकोट में नहाने से ले कर कांग्रेस नेताओं की जन्मपत्री याद दिलाने को ले कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नए तेवर में नजर आए.

 

लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 100 दिन के अंदर भ्रष्टाचारी और अपराधी जेल में होंगे. कांग्रेस के ‘दामादजी’ पर तो बाकायदा किताब तक जारी हो गई थी.

 

यह बात और है कि मई, 2017 में लोकसभा चुनाव का तीसरा साल पूरा होने वाला है, कांग्रेस के नेता तो क्या कोई कार्यकर्ता तक भ्रष्टाचार के आरोप में जेल नहीं गया है.

 

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जब राहुलअखिलेश की जोड़ी ने मोदी राज पर हमला शुरू किया, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पुराने तेवर में आने को मजबूर हो गए. वे यह भूल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के विरोध से वोट नहीं मिलने वाले. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में केंद्र सरकार का कामकाज भी मुद्दा है.

 

कांग्रेस का विरोध प्रधानमंत्री के लिए लोकसभा में संजीवनी साबित हो चुका है. उत्तर प्रदेश में हालात बदले हुए हैं. कांग्रेस, सपा और बसपा का विरोध करने वाली भाजपा ने सभी दलों के नेताओं को गले लगा लिया है.

 

भाजपा में शामिल हो कर ये नेता गंगा नहा कर पवित्र हो चुके हैं. दलबदल करने वाले नेताओं और उन के परिवार के लोगों को टिकट दे कर भाजपा ने अपनी पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं को खून के आंसू रोने पर मजबूर कर दिया है. जिलोंजिलों में भाजपा के लोग पार्टी नेताओं पर टिकट बेचने का आरोप लगा रहे हैं.

 

भाजपा ने कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर के जिस तरह से अपनी पार्टी के परिवारवादी नेताओं के लोगों को टिकट दिए हैं, उस से साफ  जाहिर है कि परिवार के हमाम में भाजपा भी कांग्रेस की तरह कार्बन कौपी बनने को तैयार है.

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सपा को परिवार का कुनबा बताया. वे यह भूल गए कि भाजपा भी कुनबा बनती जा रही है. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की तीसरी पीढ़ी चुनाव मैदान में है. बाकी नेताओं के बेटेबेटी भी टिकट पा कर चुनाव लड़ रहे हैं.

 

उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा के कार्यकर्ता जनता के सवालों के जवाब देने में नाकाम दिख रहे हैं. ऐसे लोगों में चेतना जगाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिर से कांग्रेस खासकर गांधी परिवार पर हमले को मुद्दा बनाने की कोशिश की है.

 

यह बात और है कि ‘कांग्रेस बुरी और कांग्रेसी अच्छे’ इस सवाल का भाजपा के पास कोई जवाब नहीं है. उत्तर प्रदेश से ले कर उत्तराखंड तक में भाजपा ने बड़ी संख्या में कांग्रेसी नेताओं का भगवाकरण कर दिया है. ऐसे कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के नीचे भगवा कार्यकर्ता कैसे काम करें, यह पार्टी समझ नहीं पा रही है.

 

अपने कार्यकर्ताओं को समझाने के लिए केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही कांग्रेस पर हमला नहीं बोला, बल्कि संघ और उस से जुड़े दूसरे संगठन भी उन में कांग्रेस विरोध के बहाने ऊर्जा भरने में लगे रहे. ये लोग अपने कार्यकर्ताओं को समझा रहे हैं कि लोहे को काटने के लिए लोहा जरूरी होता है. कांग्रेस को काटने के लिए कांग्रेसी जरूरी हैं.

 

कांग्रेस विरोध के नाम पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संगठन के दूसरे लोग अपने कार्यकर्ताओं को जगाने और पार्टी के लिए चुनाव में काम करने के लिए तैयार कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा का यह कांग्रेस विरोध खत्म हो जाएगा.

 

दरअसल, पूरा चुनाव अब प्रबंधन कला का मोहताज हो गया है. इन चुनावों में जनता अब भी वोट देते समय जाति और धर्म के दबाव में रहती है. इस कमजोरी का फायदा उठा कर राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र में बहुत सी बातें करते हैं, पर प्रचार के समय अपने घोषणापत्र की बातें कम से कम कर के चुनावी जुमलेबाजी और दूसरे नेताओं के भाषणों का जवाब देते हैं. ‘गुजरात के गधे’ उत्तर प्रदेश में चुनावी चर्चा बन जाते हैं. मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री का पद संभाल रहे नेताओं से इस तरह के शब्दों की उम्मीद कम की जाती है.         

जन्म जन्म का साथ

भारतीय हिंदू समाज में वैवाहिक संबंधों को जन्मजन्मांतर का संबंध माना जाता है. लेकिन परिवार न्यायालयों में बढ़ते तलाक के मामले बताते हैं कि वर्तमान समय में न तो प्रेम विवाह सफल हैं और न ही परंपरागत विवाह. अब सवाल यह उठता है कि बिना पछतावे के किसी के साथ आजीवन रहने के लिए क्या किया जाए? प्रस्तुत हैं, इस संबंध में कुछ युगलों और विशेषज्ञों की सलाह:

2015 में किए गए एक सर्वे में पाया गया कि प्रति हजार दंपतियों में से 13 दंपती आपसी तालमेल के कठिन दौर से गुजर रहे हैं, लेकिन आश्चर्य कि उन में से ज्यादातर आज भी साथ जीवन गुजार रहे हैं.

एक जानेमाने मनोवैज्ञानिक व विवाह सलाहकार का कहना है कि पुरानी विचारधारा के अनुसार विवाह जीवनभर का साथ होता था. लेकिन आजकल के युगल साथ रहने की कोई ठोस योग्यता नहीं रखते. वे युगल जो कई दशकों से बिना किसी मनमुटाव के साथ रह रहे हैं, उन के जीवन में भी शादी से बढ़ कर कई अन्य मामले हैं.

समझदारी जरूरी है

सरोद वादक अमजद अली खान और उन की पत्नी सुब्बालक्ष्मी खान सितंबर, 2016 में अपनी शादी के 40 साल पूरे कर चुके हैं. जब उन से यह पूछा गया कि शादी को स्थाई बनाने के लिए कौनकौन से कदम उठाए जाएं? तो सुब्बालक्ष्मी का कहना था कि विवाह को सफल बनाना व्यक्ति के अपने हाथ में है. इस हेतु धैर्य, सहनशक्ति और समझदारी की आवश्यकता होती है. विवाह कोई क्षणिक आनंद नहीं, जिसे भोगा और भुला दिया जाए. नई पीढ़ी एकदूसरे को छोड़ने में बहुत जल्दबाजी करती है, जबकि विवाह के अपने उतारचढ़ाव होते हैं. उन का सामना करना चाहिए.

त्याग की भावना

जानीमानी रोमांस लेखिका, प्रीति शिनौय का कहना है कि विवाह को स्थाई बनाने के लिए सर्वप्रथम हमें अपने अंदर त्याग की भावना पैदा करनी चाहिए तथा सब से पहले हमें अपने क्रोध पर नियंत्रण करना चाहिए. क्रोध में बोले गए शब्द हमारे मानस पटल पर स्थाई प्रभाव छोड़ते हैं. यदि आप आवेश में तनावग्रस्त हैं तो मुंह पर टेप लगा कर कम से कम 5 किलोमीटर की दौड़ लगाएं. तर्कवितर्क का स्वागत करें लेकिन वह विषय से संबंधित हो. कभी व्यक्तिगत दोषारोपण न करें और न ही एकदूसरे के  मातापिता पर दोषारोपण करें.

जब भी आप विवाह बंधन में बंधने का मन बनाएं तो स्वयं को भविष्य में आने वाली समस्याओं से दोचार होने के लिए तैयार रखें.

लेखक रविंदर सिंह का कहना है कि आप की किसी भी विषय में समान रूचि माने नहीं रखती, बल्कि यह बात महत्त्वपूर्ण होती है कि आप एकदूसरे की भिन्नता और समानता की परवाह किए बिना एकदूसरे में रूचि लें. ऐसे लोगों की भी लंबी सूची है, जो कई दशकों से सफलतापूर्वक साथ हैं. ‘जनरल औफ सौशल साइकोलौजी ऐंड पर्सनैलिटी साइंस’ के अनुसार जीवनसाथी के बारे में सकारात्मक सोच रखना सफल शादी का मूलमंत्र है.

सहानुभूति

एकदूसरे के प्रति सहानुभूति रखना प्रेम की उम्र बढ़ाता है. टीवी कलाकार रोहित राय जोकि अपनी पत्नी मानसी के साथ  17 सालों से हैं, का कहना है कि एकदूसरे के प्रति सहानुभूति रखना प्रेम को बढ़ाता है.

मनोवैज्ञानिक, गीतांजलि शर्मा का कहना है कि यदि आप अपने विवाह को दीर्घकालिक व सफल बनाना चाहते हैं तो बिना किसी आवेश और आलोचना के एकदूसरे को सहयोग करना तथा एकदूसरे की कमियों को स्वीकारना होगा.

अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी का कहना है, ‘‘हमारे अभिभावकों का सफल वैवाहिक जीवन था, क्योंकि उन की मानसिक धारणा भिन्न थी. आज समझौता शब्द ने संबंधों का मजाक बना दिया है, किंतु मेरे लिए समझौते का मतलब आपसी समझदारी है.’’

प्रतिबद्धता के नियम

वे युगल जो अपने विवादों को समझदारी के साथ सुलझाते हैं, उन का दांपत्य लंबे समय तक चलता है. हो सकता है कि इन्हें झुंझलाहट होती हो, पर इन का विवाह क्रोध की भेंट नहीं चढ़ता. युगलों को एकदूसरे की असमानताओं को स्वीकारना चाहिए और समझना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति संपूर्ण नहीं होता.

मार्च से दिसंबर ब्यूटी कैलेंडर

प्रत्येक माह, मौसम में थोड़ाबहुत बदलाव जरूर आता है. ऐसे में लुक को परफैक्ट बनाए रखना भी एक चुनौती है. पेश है, महीनेवार ब्यूटी कैलेंडर, जो आप के रूप को पूरा साल खूबसूरत बनाए रखेगा

मार्च : रंगों वाले त्योहार का मजा अपनी त्वचा को भी देने के लिए नैचुरल कलर्स का इस्तेमाल करें. इस के अलावा स्किन को औयल व मेकअप के कोट से प्रोटैक्ट करें. इस से त्वचा पर रंगों की पकड़ हलकी रहेगी और नहाते समय रंग बड़ी आसानी से साफ हो जाएंगे.

अप्रैल : स्लीवलैस आउटफिट के साथ खुद को कंफर्टेबल फील करवाने के लिए आप पल्सड लाइट ट्रीटमैंट करवा सकती हैं. यह शरीर के अनचाहे बालों को हमेशा के लिए दूर करने की आसान व कारगर तकनीक है. इस से आप को बारबार वैक्स करवाने के झंझट से छुटकारा मिल जाएगा. अप्रैल तेज धूप वाला महीना है. अत: खुद को सुरक्षा की छतरी यानी सनस्क्रीन लोशन के कोट से कवर करें.

मई : चिपचिप गरमी के इस मौसम में अपने चेहरे की खूबसूरती बढ़ाने के लिए पेस्टल कलर्स का इस्तेमाल करें. यदि लंबे अरसे से शौर्ट हेयर्स की तमन्ना दिल में छिपी है, तो इस महीने अपनी इस आरजू को पूरा कर सकती हैं.

जून : वैकेशन के टाइम में सारा समय मेकअप में न निकालें. इस के लिए परमानैंट मेकअप की तकनीक को अपनाएं. आंखों को खूबसूरत बनाने के लिए परमानैंट आईब्रोज, परमानैंट आईलाइनर और परमानैंट काजल है, तो होंठों को सैक्सी लुक देने के लिए लिपलाइनर व लिपस्टिक. ल्यूकोडर्मा के पैचेज को छिपाने के लिए परमानैंट कलरिंग के औप्शन भी मौजूद हैं. इस के अलावा नेल्स के लिए भी सेमीपरमानैंट सल्यूशन जैसे नेल ऐक्सटैंशन और नेल आर्ट जैसी तकनीक मौजूद है. इस मेकअप को अपनाकर आप ट्रिप पर अपना कीमती समय बचा सकती हैं.

जुलाई : यह टाइम कालेज का होता है, जब स्कूल के पासआउट स्टूडैंट्स कालेज की हवा को महसूस करना शुरू करते हैं. इस फेज में स्टाइलिश नजर आने के लिए स्ट्रीक्स कलर करवा सकती हैं या फिर परमानैंट स्टाइलिंग जैसे स्ट्रेटनिंग या कर्लिंग करवा सकती हैं. गर्लिश लुक के लिए कलरफुल लाइनर का इस्तेमाल कर सकती हैं.

अगस्त : भीगेभीगे मौसम में हरदम फ्रैश महसूस करने के लिए सुबह और शाम ऐरोमैटिक स्नान कर सकती हैं. बारिश में भीगने के बाद बालों को ऐसे ही न छोड़ें, बल्कि उन्हें किसी अच्छे शैंपू से वाश करें ताकि वे चिपके नहीं और डैंड्रफ का भी डर न रहे. दिन में कम से कम 2-3 बार फेस को स्किन टोनर की मदद से साफ करें, जिस से औयल कम होगा व ताजगी चेहरे पर बनी रहेगी.

सितंबर : जल्द ही दुलहन बनने वाली लड़कियां इस माह तक किसी भी अच्छे ब्यूटी क्लीनिक से प्रीब्राइडल ट्रीटमैंट शुरू कर

सकती हैं.

अक्तूबर : दीपों से सजे त्योहार में अट्रैक्टिव दिखने के लिए ट्रैडिशनल लुक को अपना सकती हैं. इस के अलावा कार्ड पार्टी में सैंटर औफ अट्रैक्शन बनने के लिए आंखों पर स्मोकी मेकअप और नेल्स पर 3डी नेल आर्ट जरूर करवाएं.

नवंबर : शादी की यादों को खूबसूरत बनाए रखने के लिए एअरब्रश मेकअप चुनें. यह बेहद हलका और स्मूद होता है, इस से स्किन बिलकुल बेदाग दिखती है. इस तकनीक में एअरगन के जरीए मेकअप किया जाता है. इस के औटोमैटिकली ब्लैंड हो जाने से चेहरे पर किसी तरह के निशान नहीं रहते.

दिसंबर : क्रिसमस के सैलिबे्रशन में शामिल होने के लिए कुछ कलरफुल अपनाएं. इस के साथ ही दमकती त्वचा के साथ नए साल का स्वागत करने के लिए बौडी पौलिशिंग को अपनाएं.                 

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