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सचिन करते थे इस बल्लेबाज का बैटिंग स्टाइल कॉपी

क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर को कौन नहीं जानता. आज क्रिकेट की दुनिया में बैंटिंग में शायद ही कोई ऐसा रिकॉर्ड होगा जिसे सचिन ने नहीं बनाया होगा. आज भी कई युवा क्रिकेटर सचिन की तरह बल्लेबाजी करने की कोशिश करते हैं. उनके हर शॉट की तकनीक को कॉपी करने की कोशिश करते हैं.

लेकिन जरा सोचिए कि क्या सचिन भी कभी किसी खिलाड़ी के शॉट की कॉपी किया करते थे? शायद आप सोच रहे होंगे कि नहीं, ऐसा कोई खिलाड़ी ही नहीं है जिसे सचिन जैसा महान क्रिकेटर कॉपी करें.

लेकिन हम आपको बता दें कि एक ऐसा खिलाड़ी भी था जो इंटरनैशनल मैच तो नहीं खेल सका लेकिन सचिन भी उनकी बैंटिंग स्टाइल को कॉपी किया करते थे. इस खिलाड़ी को मुंबई का विव रिचर्ड्सन भी कहा जाता था.

सचिन तेंदुलकर के कोच रमाकांत आचरेकर सचिन को इस खिलाड़ी की बल्लेबाजी देखने कहते थें और सिखने भी. सचिन तेंदुलकर इस खिलाड़ी को सर कहते थें. जी हां ऐसे ही कुछ अनोखी प्रतिभा के मालिक थे अनिल गुरव. लेकिन इत्तेफाक देखिए वह कभी भारत के लिए क्रिकेट नहीं खेल सके.

सचिन तेंदुलकर को जब सर आचरेकर क्रिकेट खेलना सिखा रहे थे तब एक लड़का सचिन से भी अच्छा क्रिकेट खेलता था, जिसे रमाकांत आचरेकर सचिन से बेहतर खिलाड़ी मानते थे और उन्हें विव रिचर्ड्स कहकर बुलाते थे.

लैपटॉप और डेस्कटॉप के शानदार म्यूजिक प्लेयर

अलग-अलग वर्जन के साथ आने वाले डिफॉल्ट प्लेयर्स म्यूजिक के बारे में आपकी सभी जरूरतों को पूरा नहीं कर पाते हैं. लेकिन कुछ ऐसे ऐप भी उपलब्ध हैं, जो पीसी पर म्यूजिक सुनने का मजा बढ़ा देते हैं.

फॉबर2000 (foobar2000)

एक पावरफुल फ्री म्यूजिक ऐप है, जो आपकी पसंद के मुताबिक सिंपल या अडवांस्ड हो सकता है, और इसका श्रेय इसके मॉड्यूलर डिजाइन को जाता है. इस फ्री म्यूजिक ऐप को सिंपल और मेमरी के लिहाज से एफिशंट बनाया गया है. आप इसे जैसा चाहें वैसा कर सकते हैं और अपने मन मुताबिक फीचर्स जोड़ सकते हैं. इसमें सीडी बर्निंग, प्ले स्टेशन साउंड फाइल्स की डीकोडिंग, विजुअलाइजेशंस, प्लेलिस्ट ऑर्गनाइजर्स और दूसरी तरह की उपयोगी चीजें हैं.

स्पॉटीफाय (Spotify)

स्पॉटीफाय का डेस्कटॉप ऐप सभी सर्विसेज के बेस्ट फीचर्स तक आपकी पहुंच आसान कराता है, जिसमें कम्युनिटी ऑप्शंस भी मौजूद होता है.

म्यूजिकबी (MusicBee)

विंडोज के लिए यह एक शानदार फ्री म्यूजिक ऐप है. म्यूजिकबी एक नया म्यूजिक मैनेजर और प्लेयर है. इसमें डिजिटल प्रोसेसिंग इफेक्ट के साथ एक मल्टी ब्रैंड इक्वलाइजर है, जो कि हाई इंड ऑडियो कॉर्ड्स को सपोर्ट करता है.

डोपामिन (Dopamine)

डोपामिन का इस्तेमाल करना बेहद आसान है. इसमें एक सिंपल विजर्ड है, जो कि आपको अपने गाने इंपोर्ट करने और उन्हें चलाने की सहूलियत देता है. इस फ्री म्यूजिक ऐप को संगीत सुनने को जहां तक संभव हो आसान बनाने के लिए डिजाइन किया गया है. यह WAV, MP3, Ogg, Vorbis, FLAC, WMA और M4AAAC को सपोर्ट करता है.

मीडियामोनकी (MediaMonkey)

अगर आपकी मीडिया लाइब्रेरी थोड़ी अव्यवस्थित है तो मीडियामोनकी इसे एक क्रम में लाने में आपकी काफी मदद करेगा. यह फ्री म्यूजिक ऐप ऑटोमैटिक तरीके से आपके म्यूजिक को टैग कर सकता है. इसके अलावा, यह एंड्रॉयड और आईपॉड्स समेत डिवाइसेज को सपोर्ट करने, DLNA स्ट्रीमिंग, डीजे मोड में चलाने में सक्षम है. यह ऑटोमैटिक तरीके से वॉल्यूम्स को सेट करता है, जिससे ट्रैक अलग न हो. इसमें आप इंटरनेट से सीडी रिकॉर्ड और इसे डाउनलोड कर सकते हैं.

वी एल सी मीडिया प्लेयर (VLC Media player)

यह एक बेहतरीन फ्री म्यूजिक ऐप है. VLC मीडिया प्लेयर केवल एक फाइल या म्यूजिक स्ट्रीम को प्ले कर सकता है. VLC बहुत सारे फाइल फॉरमैट्स को सपोर्ट करता है.

इन 6 खिलाड़ियों ने फेंके सबसे ज्यादा मेडन ओवर

एक समय था जब क्रिकेट मैच में सबकी निगाखें बल्लेबाज पर होती थी. लेकिन आज समय बदल रहा है. क्रिकेट के इस दौर में बल्लेबाज और गेंदबाज दोनों की अपनी अपनी महत्ता है.

क्रिकेट में एक गेंदबाज की क्या अहमियत होती है ये तो सभी जानते हैं. और जब बात टी 20 मैच की हो फिर तो गेंदबाजों पर सबकी नजर होती है. टी 20 मैच में अगर कोई गेंदबाज मेडन ओवर फेंकता है तो उसे एक बड़ी उपलब्धि समझा जाता है. आज हम आपको कुछ ऐसे ही गेंदबाजों के बारे में बता रहे हैं जिन्होंने टी 20 क्रिकेट में सबसे ज्यादा मेडन ओवर फेंके हैं.

प्रवीन कुमार

भारतीय टीम बेहतरीन स्पिनर प्रवीन कुमार ने साल 2007 से अब तक कुल 166 टी 20 मैच खेले हैं. भारतीय टीम में अब तक टी20 में सबसे ज्यादा 19 मेडन ओवर प्रवीन कुमार के द्वारा ही फेंके गए हैं. प्रवीण कुमार ने अब तक कुल टी 20 मैच में 584.3 ओवर फेके हैं.

इरफान पठान

भारतीय टीम के मशहूर गेंदबाज इरफान पठान 2005 से टी20 क्रिकेट खेल रहे हैं. इरफान पठान ने कुल 170 मैचों में 575.1 ओवर की गेंदबाजी की है, जिसमें उन्होंने 13 ओवर मेडन फेंके हैं. इरफान का बेस्ट बॉलिंग स्कोर 5 रन पर 13 विकेट का है.

सैमुअल बद्री

वेस्टइंडीज के बेहतरीन गेंदबाजों की सूची में सैमुअल बद्री का नाम भी शामिल है. वो एक बेहतरीन गेंदबाज हैं. सैमुअल ने अब तक कुल 153 टी 20 मैच खेले हैं और अपने टी 20 करियर में उन्होंने कुल 542.3 ओवर फेंके हैं जिनमें से 19 ओवर मेडन फेंके हैं. टी 20 करियर में वो अब तक 151 विकेट ले चुके हैं और इनका बेस्ट बॉलिंग स्कोर 5 रन पर 22 विकेट का है.

सुनील नारायन

वेस्टइंडीज के दूसरे बेहतरीन स्पिनर्स सुनील नारायन ने साल 2011 से लेकर अब तक कुल टी 20 में 208 मैच खेले हैं. इस दौरान उन्होंने 794.2 ओवर फेंके हैं. जिसमें उन्होंने 17 ओवर मेडन फेंके और 261 विकेट लिए हैं. नारायन का बेस्ट गेंदबाजी स्कोर 5 रन पर 19 विकेट का है.

लसिथ मलिंगा

श्रीलंका के मशहूर दांये हांथ के गेंदबाज लसिथ मलिंगा ने साल 2004 से टी20 क्रिकेट में कदम रखा. मलिंगा ने कुल 222 टी20 मैच खेले हैं जिनमें उन्होंने 809.5 ओवर की गेंदबाजी की है. मलिंगा ने कुल 13 ओवर मेडन फेंके हैं. मलिंगा का बेस्ट गेंदबाजी स्कोर 6 रन पर 7 विकेट का है.

अल्फांसो थॉमस

दक्षिण अफ्रीका की क्रिकेट टीम के स्पिनर अल्फांसो थॉमस ने साल 2004 से 2015 के बीच कुल 225 टी20 मैच खेले. इस दौरान उन्होंने 759.4 ओवर फेंके. थॉमस ने अपने करियर में कुल 15 बार मेडन ओवर फेंके , और साथ ही टी 20 मैचों में 263 विकेट भी लिए हैं.

आखिर किस तरह की अकादमी खोलना चाहते हैं सूरज शर्मा

समय बड़ा बलवान होता है. समय और नियति इंसान को कहां से कहां ले जाए, कोई नहीं जानता. सॉफ्टवेअर इंजीनियर पिता व अर्थशास्त्री मां के बेटे सूरज शर्मा तो कालेज में प्रोफेसर बनने का सपना देख रहे थे, मगर जब वे साल 2012 में 18 साल की उम्र में दिल्ली के सेट स्टीफन कॉलेज से दर्शन शास्त्र की पढ़ाई कर रहे थे, तभी उन्हे ऑस्कर विजेता हौलीवुड फिल्मकार एंगली के निर्देशन में फिल्म ‘‘लाइफ आफ पई’’ में पाई का किरदार निभाने का अवसर मिल गया. पहले सूरज शर्मा ने इस फिल्म में अनमने मन से काम करना स्वीकार किया था, पर बाद में सेट पर हर किसी को 15 से 18 घण्टे मेहनत करता देख वे भी मेहनत से काम करने लग गए. फिल्म ‘‘लाइफ आफ पाई’’ की शूटिंग खत्म होने के बाद भी सूरज का इरादा फिल्मों से जुड़ने का नहीं था. लेकिन ‘‘लाइफ आफ पाई’’ ने इतनी सफलता बटोरी कि उसके बाद सूरज शर्मा के सामने इतनी फिल्मों के ऑफर आ गए कि वे अभिनय से ही जुड़ गए और साथ ही उन्होने न्यूयार्क स्कूल से फिल्म मेंकिंग की पढ़ाई भी शुरू कर दी.

फिल्म ‘लाइफ आफ पाई’ के बाद सूरज शर्मा ने ‘मिलियन डॉलर आर्म’ व ‘उमरिका’ जैसी फिल्मों के अलावा अमरीकन टीवी सीरीज ‘‘होमलैंड’’ भी किया. अब उन्होने पहली बौलीवुड फिल्म ‘‘फिलौरी’’ की है, जिसकी निर्माता अनुष्का शर्मा हैं. फिल्म ‘‘फिलौरी’’ में सूरज शर्मा के अलावा मेहरीन परजादा, अनुष्का शर्मा व दिलीजीत दोषांज की अहम भूमिकाएं हैं.

सूरज शर्मा भले ही धीरे धीरे फिल्मों का हिस्सा बनते जा रहे हैं, मगर उनकी मंशा कुछ और ही है. हाल ही में जब हमारी उनसे बात हुई, तो सूरज शर्मा ने ‘‘सरिता’’ पत्रिका से एक्सलूसिब बात करते हुए कहा कि ‘‘सच यही है कि मैने अभिनेता बनने के बारे में कभी सोचा नहीं था. मुझे तो फिल्में देखने का भी कभी शौक नहीं रहा. मेरी रूचि फुटबाल खेलने में थी. फुटबाल भी मैंने दसवी व ग्यारहवीं तक खेला. हम फुटबाल में सभी को हरा देते थे. मेरी भविण्य को लेकर योजना कॉलेज में प्रोफेसर बनने की थी. मैंने फिलॉसफी भी पढ़ी है, पर प्रोफेसर बन नहीं पाया. पर मेरी जिंदगी में सब कुछ ठीक ठाक हुआ, तो दिल्ली में मेरी इरादा फुटबाल अकादमी खोलने का है. यह मेरा सपना है.’’

दलित और मुसलिमों को रिझाते चुनाव

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में दलितों और मुसलिमों के वोट पाने के लिए जम कर भागदौड़ हुई. जो लोग सदियों से इन दोनों जमातों को अछूत, पराया, गरीब, बेसहारा, बेचारा और ध्यान न देने लायक मानते रहे हैं, इन के वोट पाने के लिए दड़बेनुमा, बदबूदार महल्लों में भी गए और गंदी तिरपाल की या फूस की झुग्गी बस्तियों में भी.

लेकिन इन नेताओं को दलितों और मुसलिमों के सिर्फ वोट चाहिए थे, उन के भले से इन का कोई मतलब नहीं. इन लोगों की अपनी सी पार्टियां बहुजन समाज पार्टी या आल इंडिया मुसलिम लीग भी अपने माने जाने वाले वोटरों का कल सुधारने की कोई बात नहीं करती दिखीं. हर बार ‘हम तुम्हारे साथ हैं’ जैसे बेमतलबी नारे लगा कर वोट ले लिए जाते हैं और अगले चुनावों तक दलितों को भुला दिया जाता है.

उत्तर प्रदेश के दलित और मुसलिम एक ही सी जातियों से आते हैं. इन्हें सवर्ण हिंदू समाज ने शास्त्रों के कहे के हिसाब से सैकड़ों सालों से नीचा समझा है. जब भी विदेशी लोगों ने राज किया, इन पर अत्याचार कम हुए, पर जहां अपने लोगों का राज हुआ, इन्हें जोरजबरदस्ती का सामना करना पड़ा.

सदियों की गुलामी का हाल यह है कि आज उत्तर प्रदेश ही नहीं, दूसरी जगह का भी दलित या मुसलिम सिर उठा कर चलने में घबराता है. जिन्हें आरक्षण के कारण कुछ नौकरियां मिल गईं, वे भी अपनी जमातों के लिए लंबाचौड़ा जागरण नहीं कर पा रहे. जो आगे निकल गया, उसे हर समय डर लगा रहता है कि ऊंची जमातें उसे फिर जंजीरें न पहना दें. आम दलित को तो लगता है कि उस के गले में आज भी तख्ती लटकी है कि वह पाप योनि का है. चुनाव हों या न हों, उस के दिनों पर कुछ असर नहीं पड़ रहा है.

हां, पिछले दशकों में जो थोड़ाबहुत विकास हुआ है, उस की वजह से लाखों ऐसी नौकरियां निकली हैं, जिन में इन दलितों और मुसलिमों को रोटी कमाने के मौके मिले हैं. इन का पेट भरने लगा है, पर चुनावों से कोई हक मिल रहा हो, ऐसा नहीं दिखता. इन चुनावों में भी मायावती को अपने हीरों और पर्स की वजह से मजाकों का निशाना बनना पड़ा और मुसलिमों को भारत से अलग हुए पाकिस्तानबंगलादेश के लिए जिम्मेदार होने का अपराधी माना गया.

मोदी, अखिलेश, राहुल, मायावती, ओवैसी किसी ने भी इन बड़ी जमातों को काम देने की बात नहीं की, क्योंकि इन दोनों जमातों की जबान नहीं है. इन के अखबार नहीं हैं. इन के टीवी चैनल नहीं हैं. इंटरनैट ये देख नहीं सकते. कालेजों में इन के बच्चों की जगह नहीं है.

दलितों, पिछड़ों, मुसलिम गरीबों ने गालियों की भाषा, नशे, समय की बरबादी, फालतू के झगड़ों को अपनी जिंदगी बना लिया है. वे काम करते हैं तो मन मार कर. हां, ऊंची जातियों ने साजिश कर जो छोटे देवीदेवताओं के मंदिर इन्हें पकड़ाए हैं, उन में खूब जोशखरोश दिखाते हैं. इन मंदिरों को चलाने वाली असल में वही पुरानी पुजारी जमात है, जो इन्हें समाज का कोढ़ मानती रही है. इन के नेता भी इन मंदिरों में सिर नवा आते हैं, क्योंकि इन्हें लगता है कि इन के अच्छे दिन उसी अंधविश्वासी गली से आएंगे, जिस पर ऊंची जातियों के लोग चलते हैं.

भारत के लोकतंत्र में वोट देने का हक है और सोच व बोलने की आजादी भी है. ये दोनों जमातें इन दोनों हकों को सही तरह इस्तेमाल करना नहीं जानतीं. ये जमातें इन की बात करने वाले अखबारों या चैनलों से जुड़ी नहीं हैं. ये अपने दड़बे में घुस कर कोशिश करती हैं कि जुल्मों से बच जाएंगी. इन का हाल उस लड़की की तरह है, जो झाड़ी के पीछे छिप कर चुप रहती है कि शायद बलात्कारियों की नजर उस पर न पड़े. होता कुछ और है. इन्हें ढूंढ़ लिया जाता है और चुनावों से 1-2 माह पहले के अलावा जबरन इन का बलात्कार करा जाता है.

चूंकि इन की जबान नहीं, इन की बात कहने वाले को ये खुद भी जानते नहीं, इन की वकालत करने वाले भी आमतौर पर थक जाते हैं और जहां सुनहरी चमक दिखती है, वहां जमा हो जाते हैं. तभी दलितों के नेता भाजपा और कांग्रेस में शामिल हो जाते हैं, क्योंकि वहां दलित नेता को तो नकली आदर मिलता है, चाहे उस की जमात को मिले या नहीं.

दलित और मुसलिम मिल कर देश के खेतों, व्यापारों और कारखानों की रीढ़ की हड्डी हैं, पर इन्हें उन मूक जानवरों का सा समझा जाता है, जिन्हें घर में घुसने नहीं दिया जाता, जब चाहे चाबुक मार दिया जाता है. इन की दशा तो उन गायों से भी बदतर है, जिन के लिए कुछ मरनेमारने को तैयार हो जाते हैं.

दलितों और मुसलिमों में बहुत से पढ़ने लगे हैं, समझदार हो गए हैं, पर उन के पैरों में अभी भी पुरानी जाति की बिवाइयां हैं, जो उन्हें दूसरों की तरह भागने से रोकती हैं. उन के दिमागों पर आज भी अपने को हीन होने के अहसास का काला साया छाया हुआ है. इन के नेता इन्हें दलदल से निकाल नहीं रहे, बल्कि इन की छातियों पर पैर रख कर अपना जीवन सुधार रहे हैं.

आज कितने अखबार, कितने चैनल, कितने धारावाहिक, कितने उपन्यास हैं, जो इन जमातों की बात सोचते हैं. चुनाव से 10 दिन पहले पुचकारने से सदियों की मिट्टी धुलेगी नहीं. यह काम इन जमातों को खुद करना होगा. दलितों, मुसलिमों और पिछड़ों को चुनावों के हक का इस्तेमाल सोचने और बोलने के हक को पाने में करना होगा. इन को शास्त्रों और शरीअतों के बंधनों से आजादी चाहिए, जो न वोटिंग मशीन में है, न टीवीमोबाइल में. यह मन में तैयार करनी होगी. हर तरह के मौके के बारे में जानना होगा और फिर बराबरी का हक पाने के लिए मुंह खोलना होगा, पढ़ना होगा. सही वोट देना होगा. अपनों से आजादी भी उतनी ही मुश्किल से मिलती है, जितनी दूसरों से आजादी मिलती है.

इन जमातों को अपने पर हो रहे अनाचार व अत्याचार की वजह खोजनी होगी. सिर्फ अछूत या दलित या मुसलिम मां के पेट से पैदा होने की वजह से ये नीचे नहीं हो गए हैं, गरीबी में जीने को मजबूर नहीं हैं. इन्हें अपनी जिंदगी सुधारनी होगी, पर खुद. नेताओं के भरोसे कुछ न होगा. यह न भूलें कि नमूने के तौर पर बनियों के नेता न के बराबर हैं, पर हर बनिया पैदा होते ही समझदार हो जाता है, क्योंकि वह जानकारी से घिरा रहता है, अपने मतलब की जानकारी से.                                        

सोशल मीडिया में वायरल हुई सनी लियोनी की ये तस्वीरें

हाल ही में सनी लियोनी एक इवेंट में पहुंची थीं जहां उन्होंने रेड बुल पी ली. जिसके बाद सनी ने पति डेनियल वेबर को जमकर तंग किया है. ड्रिंक (रेड बुल) करने के बाद सनी इतनी एनजेटिक हो गईं कि उन्हें संभालना थोड़ा मुश्किल हो गया. यही कारण रहा कि इवेंट के दौरान पति डेनियल को सनी की हरकतों के चलते खूब परेशान होना पड़ा.

सनी ने इन इवेंट की मस्ती भरी फोटोज सोशल मीडिया पर पोस्ट की हैं. जिसमें कभी वो डेनियल से चिपकती दिख रही हैं तो कभी उछल कूद करती नजर आ रही हैं. सनी ने इन्हीं फोटोज को शेयर करते हुए कैप्शन में बताया कि ये सारी फोटोज ड्रिंक करने के बाद की हैं. जिसके बाद उन्होंने नशे में इतनी मस्ती की.

पहली बार हुआ ब्रैस्ट कैंसर ऐप का लौंच

मुंबई में पिछले दिनों पहली बार ‘उषालक्ष्मी ब्रैस्ट कैंसर फाउंडेशन’ के ब्रेस्ट कैंसर विशेषज्ञ डॉ.पी रघुराम ने ब्रेस्ट कैंसर पर एक ऐप ‘ए बी सी ऑफ ब्रैस्ट हेल्थ’ का लौंच अभिनेता अमिताभ बच्चन के साथ मिलकर किया. इस ऐप को कोई भी महिला ‘फ्री’ में डाउनलोड कर अपने ब्रेस्ट कैंसर से जुड़े तथ्यों की पूरी जानकारी पा सकती है. महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में किया जाने वाला ये एक प्रयास है, जहां महिलाओं को अपने स्वास्थ्य के बारें में जानकारी आसानी से मिल सके. ये ऐप 12 भाषाओं अंग्रेजी, हिंदी, मराठी, गुजराती, पंजाबी, बंगाली, तेलगू, तमिल, कन्नड़ा, मलयालम, ओरिया और आसामिज में उपलब्ध है.

इस अवसर पर डॉ. रघुराम का कहना है कि महिलाओं को अभी तक ब्रैस्ट कैंसर के बारें में पूरी जानकारी नहीं है. जिससे इस बीमारी में लगातार वृद्धि हो रही है. केवल ब्रैस्ट पर गांठ या दर्द से कैंसर नहीं होता. ऐसे में ये ऐप उन्हें इस बारें में पूरी जानकारी देगा. जिससे समय रहते इस बीमारी का इलाज संभव हो सकेगा.

अमिताभ बच्चन कहते हैं कि मैं इस ऐप को लौंच कर गौरवान्वित हूं, क्योंकि इस ऐप के द्वारा समय से पहले कैंसर का पता चलने पर उसका इलाज हो पाएगा. अधिकतर महिलाओं को ब्रैस्ट कैंसर का पता बाद में चलता है, क्योंकि वे अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरुक नहीं होती. जिससे उनका इलाज नहीं हो पाता. ‘हेल्थ केयर’ के क्षेत्र में ये एक अच्छा प्रयास है.

दलाई लामा का मनोविज्ञान

धर्म की दुकानदारी अंधभक्तों की भीड़ को सुख के सपने दिखाने पर टिकी है और बौद्ध धर्म इस बीमारी का अपवाद नहीं है. बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा भोपाल में नया कुछ नहीं बोले,  धर्म गुरुओं के पास नया कुछ बोलने को है भी नहीं. तमाम धर्म गुरु अपने बासे सिद्धांतों को नए शब्द देकर परोसते रहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे होटल ढाबे वाले रात की बासी दाल सब्जी को दोबारा फ्राय कर पैसा बनाते हैं. ग्राहक भी गरम और चटपटा खाकर जीभ के स्तर पर संतुष्ट हो लेता है, दिक्कत तब खड़ी होती है जब कभी ज्यादा बासी खाना पेट में जाकर बीमार कर देता है.

दलाई लामा भी इस मानसिक अपच का शाब्दिक इलाज करते हुये कुछ चलताऊ बातें कर चलते बने. उन्होंने वही बोला जो स्वेट मार्टेन से लेकर शिव खेड़ा तक बोलते रहे हैं, मसलन मन में सुख है तो गरीब भी खुश है और मन में सुख नहीं तो अमीर भी प्रसन्न नहीं. भारतीय मनोवैज्ञानिक पद्धतियां सबसे उत्तम हैं. यानि हर हाल में खुश रहो और भजन करते रहो. पंडो धर्म गुरुओं को धर्म कर देते रहो तो दुख की अनुभूति नहीं होगी.

मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान के धार्मिक अनुष्ठान नर्मदा सेवा यात्रा में रामदेव बाबा और श्री श्री रविशंकर के बाद दलाई लामा एक अलग फ्लेवर थे, जो पूरी तरह आरएसएस की भाषा बोलते रहे कि गांवों का विकास होना चाहिए. सार ये कि बढ़ता शहरीकरण धर्म का दुश्मन है, क्योंकि शहर जाकर गांव वाले एक नए माहौल में ढल जाते हैं, जिसमे भूख प्रधान होती है. धर्म तो इन  पलायनवादियों के लिए एच्छिक भी नहीं रह जाता. चीन की किरकिरी बने दलाई लामा जाने क्यों बौद्ध धर्म के बुनियादी उसूलों से कन्नी काटते दिखे कि नदी पहाड़ पेड़ वगैरह पूजने की नहीं उपभोग की चीजें हैं और इनको पुजवाकर भी पैसा बनाने वाले लुटेरे नहीं तो और क्या हैं.

जल संरक्षण विज्ञान का विषय है. सेवा यात्रा के जरिये व्यापक पैमाने पर उसका ढिंढोरा पीट रही मध्य प्रदेश सरकार करोड़ों रुपये महज नदियों के धार्मिक महत्व के प्रचार के लिए फूंक रही है. इसीलिए नर्मदा सेवा यात्रा में जल वैज्ञानिकों के बजाय इन धर्म गुरुओं से ब्रांडिंग कराई जा रही है. दलाई लामा ने जो भोपाल में कहा वह उन्हे तरस का ही पात्र बनाता है. यह या तो उन्हे मालूम नहीं या जान बूझ कर वे इस तथ्य को पचा गए कि बौद्ध साहित्य में जल अनुग्रह संबन्धित उल्लेख हैं और जल संकट और उससे निबटने उपाय भी बताए गए हैं.

बौद्ध काल में पड़े या हुये जल अकालों और विवादों ने बुद्ध को आहत किया था. रोहिणी नदी के जल बंटबारे को लेकर शाक्य वंश और कालियवंश के बीच हुई हिंसा एक सबक है कि पानी को लेकर विवाद बहुत आम थे जिनसे दुखी होकर बुद्ध बहुजन हिताय – बहुजन सुखाय की खोज के लिए निकल पड़े थे.  दलाई लामा इन विवादों का उल्लेख कर पानी की महत्ता बताते तो ज्यादा प्रभावी साबित होते पर वे  मन के सुख दुख की व्याख्या कर चलते बने तो मकसद साफ था कि करते रहो पूजा पाठ यज्ञ हवन यही शाश्वत सत्य है. 

फिर गुदगुदाने आ रहा है ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’

टेलीविजन पर दर्शकों को लंबे समय तक गुदगुदाने वाला मशहूर कॉमेडी शो 'साराभाई वर्सेस साराभाई' फिर से लौट रहा है. लेकिन इस बार इसका अंदाज बिल्कुल अलग होगा. इस बार 'साराभाई वर्सेस साराभाई' एक वेब सीरीज के रूप में लोगों का मनोरंजन करेगा.

इस शो के निर्देशक देवेन भोजानी हैं. शो के प्रड्यूसर जमनादास मजेथिया के अनुसार इस महीने के अंत में इसकी शूटिंग शुरु हो जाएगी और उम्मीद है कि अप्रैल के आखिर तक या मई के पहले सप्ताह तक खत्म भी हो जाएगी. 'साराभाई वर्सेस साराभाई' सीजन2 को स्क्रीन राइटर आतीश कपाड़िया ने लिखा है.

हम आपको बता दें कि 2004 से 2006 के बीच 'साराभाई वर्सेस साराभाई' टेलीविजन पर काफी लोकप्रिय शो रहा था और इसने दर्शकों से खूब सराहनाएं भी बटोरी थी. इस शो में रत्ना पाठक शाह, सतीश शाह, रूपाली गांगुली और सुमीत राघवन जैसे कलाकारों ने अभिनय किया था. इस शो में यह दिखाया गया था कि कैसे एक अपर क्लास की फैमिली अपनी मिडिल क्लास बहू से तालमेल बैठाती है.

शो के सारे किरदार शो में वापसी तो करेंगे ही साथ ही कुछ नये लोग भी आपको देखने को मिल सकते हैं. शो के सभी कलाकार आपको पहले से ज्यादा हंसाने की कोशिश में लगे हुए हैं. इस शो में केवल एक बड़ा बदलाव यही है कि अब आप इस शो को टीवी के बजाय हॉट-स्टार पर एक वेब श्रृंखला के रूप में देख सकेंगे, इसे मई के महीने से इंटरनेट पर देखा जा सकेगा. हालांकि मई में इसे प्रदर्शित करने की तारीख अब तक तय नहीं की गई है.

'साराभाई वर्सेस साराभाई' सात साल के बाद वापस शुरु होने जा रहा है, जिसमें कि उम्मीद यही लगाई जा रही है कि ये नयी वेब सीरीज बिल्कुल नई कहानी और कॉमेडी के तड़के के साथ दर्शकों के बीच होगी.

“फुकरे” के सीक्‍वल का फर्स्‍ट लुक रिलीज

मृगदीप सिंह लांबा ने निर्देशित फिल्म और साल 2013 की स्‍लीपर हिट फिल्‍म “फुकरे” के सीक्‍वल का फर्स्‍ट लुक रिलीज डेट के साथ रिलीज हो चुका है. हालांकि, इस पोस्‍टर में जुगाड़ू लड़कों की सूरतें नहीं हैं.

एक्‍सेल एंटरटेनमेंट ने ट्वीट किया है कि, ‘जुगाड़ू लड़के आपकी जिंदगियों में फुकरापंती लाने के लिए 8 दिसंबर 2017 को फिर से आ रहे हैं.’

रितेश सिद्धवानी और फरहान अख्‍तर के बैनर की ओर से जारी किए गए फुकरे रिटर्न्‍स के पोस्‍टर पर आठ अंकनुमा सांप बना हुआ है और साथ में दिसंबर लिखा हुआ है.

फिल्‍म फुकरे रिटर्न्‍स की शूटिंग हाल ही में खत्म हुई है. अभिनेता के के मेनन के अनुसार फिल्‍म फुकरे रिटर्न्‍स अपने सीक्‍वल से बेहतर होगी और यकीनन दर्शकों को खूब मजा आएगा.

फिल्‍म में ऋचा चढ्डा, जो इस फिल्‍म के कारण भोली पंजाबन के रूप में प्रख्‍यात हो चुकी हैं, पुलकित सम्राट, अली फैजल, वरुण शर्मा, मनजोत सिंह, विशाखा सिंह और प्रिया आनंद फिल्म में मुख्य भूमिका में नजर आएंगे.

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