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शराबबंदी : दिखने लगा असर धीरे धीरे

शराबबंदी का असर

बिहार के सिवान के महादेव सहायक थाना क्षेत्र के बंगाली पकड़ी इलाके की रहने वाली लाडो देवी ने अपने शराबी पति को जेल भिजवा दिया. दरअसल, लाडो देवी का पति विकास राजभर रोज शराब पी कर उस के साथ मारपीट करता था. लाडो देवी उसे रोज समझाती कि शराब पीना छोड़ दे, पर विकास कुछ सुनने को तैयार नहीं था. लाडो ने उसे शराबबंदी कानून का डर भी दिखाया, पर विकास उस की बातों की खिल्ली उड़ाता रहता था. तंग आ कर लाडो देवी ने थाने में अपने पति के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी. उस के बाद थाना इंचार्ज शंभूनाथ सिन्हा दलबल के साथ विकास के घर पहुंचे और उसे नशे की हालत में गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे पहुंचा दिया.

इस के पहले सिवान के ही मटुक छपरा गांव की पूनम ने अपने पियक्कड़ पति को शराब पीते रंगे हाथ गिरफ्तार करा दिया था.

शराबबंदी का असर

राज्य में शराबबंदी के बाद 16 साल से अलगअलग रह रहे मियांबीवी एक बार फिर शादी के बंधन में बंध गए और उन्होंने अपनी जिंदगी को नए सिरे से शुरू करने की कसमें खाईं. दोनों को मिलाने में उन की बेटी ने खास रोल अदा किया.

मामला सासाराम के मेहंदीगंज थाना इलाके का है. 16 साल पहले अपने पति जय गोविंद सिंह की दारूबाजी से तंग आ कर उस की बीवी विजयंती देवी ने उसे छोड़ दिया था. उस समय विजयंती देवी अपनी एक साल की बेटी को ले कर घर से निकल गई थी और मायके में रहने लगी थी. उस के बाद जय गोविंद ने उसे कई बार मनाने और घर वापस लौटने की गुजारिश की, लेकिन विजयंती देवी इस बात पर अड़ी रही कि जब तक वह शराब नहीं छोड़ेगा, तब तक वापस नहीं लौटेगी.

साल दर साल गुजरते गए. उन की बेटी गुड्डी ने अपने मांबाप को दोबारा मिलाने की कोशिश शुरू की और उन दोनों ने एक बार फिर से एकदूसरे के गले में वरमाला डाल कर शादी रचा ली. हार में शराबबंदी का अब सुकून भरा असर दिखने लगा है. औरतें इस को ले कर काफी सचेत हो गई हैं. बिहार महिला आयोग के शिकायत रजिस्टर को देखने के बाद आसानी से पता चल जाता है कि इस से महिलाओं को क्या और कितना फायदा हुआ है. आयोग की अध्यक्ष अंजुम आरा बताती हैं कि शराबी पति द्वारा की गई पिटाई और झगड़े से तंग औरतों की रोजाना 3-4 शिकायतें आयोग को मिलती थीं, पर शराबबंदी के 8 महीने गुजरने के बाद ऐसा एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ है. इस से साफ हो जाता है कि शराब पर बैन लगने से सब से ज्यादा फायदा औरतों को मिला है.

राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, औरतों पर होने वाली तकरीबन 80 फीसदी हिंसक वारदातें नशे की हालत में ही होती हैं. साल 2015 में बिहार विधानसभा का पिछला चुनाव जीतने के बाद 20 नवंबर, 2015 को नीतीश कुमार ने ऐलान किया था कि 1 अप्रैल, 2016 से बिहार में शराब पर पूरी तरह से रोक लगा दी जाएगी. बिहार में औरतें काफी दिनों से शराब पर रोक लगाने की मांग करती रही थीं. 1 अप्रैल, 2016 से राज्य में पूरी तरह से शराब बनाने, बेचने, खरीदने और पीने पर रोक लगी हुई है, जिस के बेहतर नतीजे अब सामने आने लगे हैं. शराब पीना कितना खतरनाक और जानलेवा है, इस के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों पर गौर किया जा सकता है. संगठन के आंकड़े बताते हैं कि देश की कुल आबादी के 30 फीसदी लोग शराब पीते हैं, जिन में से 13 फीसदी लोग रोज शराब पीने के आदी हैं. हर साल ही शराब पीने वालों का आंकड़ा 8 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रहा है. गांवों के 45 फीसदी लोग शराब पीने के आदी हैं और सड़क हादसों में होने वाली कुल मौतों में 20 फीसदी मौतें शराब पीने से होती हैं. शराबबंदी के पीछे गांव की औरतों का दुखड़ा है, जिसे उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सुनाया था और शराब पर रोक लगाने की गुहार लगाई थी. 9 जुलाई, 2015 को मद्य निषेध दिवस के मौके पर पटना के श्रीकृष्ण मैमोरियल हाल में स्वयंसहायता समूह की औरतों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपने कड़वे अनुभव सुनाए थे.

खगडि़या के चौथम गांव की आशा देवी, गया के खिजसराय गांव की रेखा देवी और मुजफ्फरपुर की गीता ने मुख्यमंत्री को बताया था कि किस तरह से उन्होंने गांव की औरतों के साथ मिल कर अपने इलाके में शराब पर रोक लगा दी है.

समारोह में पहुंची हजारों औरतों ने एक सुर में कहा था, ‘मुख्यमंत्रीजी, शराब को बंद कराइए. इस से हजारों घर बरबाद हो रहे हैं.’ उन्हीं औरतों के किस्सों को सुन कर नीतीश कुमार ने उसी समय ऐलान कर दिया था कि अगर वह दोबारा सत्ता में आएंगे, तो शराब पर पूरी तरह से पाबंदी लगा देंगे. तमाम विरोधों के बाद भी उन्होंने ऐसा कर दिखाया. पहले तो नीतीश कुमार ने 1 अप्रैल, 2016 को देशी दारू पर रोक लगाने का ऐलान किया था, पर बाद में 5 अप्रैल, 2016 से बिहार में हर तरह की शराब पर पाबंदी लगा दी. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मानते हैं कि 2015 के विधानसभा चुनाव के पहले उन्होंने शराब पर रोक लगाने का वादा किया था और राज्य की औरतों ने उन के वादों पर यकीन कर उन्हें रिकौर्ड वोट दिए थे.

गौरतलब है कि औरतों के वोट फीसदी 54.85 के मुकाबले मर्दों का वोट फीसदी 50.70 रहा था. साल 2000 के विधानसभा चुनाव में मर्दों के मुकाबले 20 फीसदी औरतों ने वोट की ताकत का इस्तेमाल किया था. शराबबंदी के ऐलान के साथ पंचायत चुनाव में औरतों को 50 फीसदी रिजर्वेशन दे कर नीतीश कुमार ने औरतों को गोलबंद कर लिया था. इस वजह से नीतीश कुमार के लिए शराब पर पाबंदी लगाना जरूरी हो गया था. पटना के मलाही पकड़ी गांव की  42 साला फुल कुमारी देवी कहती हैं कि जब से सरकार ने शराब बंद की है, तब से वे बहुत खुश हैं. उन का शौहर अब रात को दारू पी कर घर नहीं आता है और न ही बवाल मचाता है. अब रोज वह अपने पति और बच्चों के साथ रात को खाना खाती हैं, टैलीविजन देखती हैं और उस के बाद चैन से सोती हैं. शेखपुरा जिले के बरबीघा ब्लौक के रमजानपुर गांव की औरतों ने शराब के विरोध में अपना अलग ही नियमकानून बना लिया है और उसे कड़ाई से लागू भी कर रही हैं. उन के गांव में दारू बेचने और पीने पर पूरी तरह से रोक है. औरतें जत्था बना कर पूरे गांव में घूमती रहती हैं और खुद ही इस बात की निगरानी करती हैं कि कहीं कोई चोरीछिपे दारू तो नहीं पी रहा है.

रमजानपुर की पंचायत सदस्य शलभ देवी बताती हैं कि गांव की औरतों ने मिल कर दारू के खिलाफ अपना नियम बनाया है. शराब पीते पकड़े जाने वाले से ढाई हजार रुपए जुर्माने के तौर पर वसूले जाएंगे. दारू बेचते हुए पकड़े जाने वालों से 10 हजार रुपए वसूले जाएंगे. दारू बेचने और पीने वालों को इतना जुर्माना भरने के बाद भी नहीं छोड़ा जाएगा. इतना ही नहीं, दारूबाज को औरतों से बतौर सजा 10 झाड़ू भी खाने पड़ेंगे. दारूबाजों को जुर्माना भरने के साथ सरेआम अपनी इज्जत भी गंवानी पड़ेगी.             

बाज नहीं आ रहे कुछ लोग

पिछले साल अगस्त महीने में गोपालगंज में जहरीली शराब पीने से 17 लोगों की मौतें हो गई थीं. दारू पी कर कुछ देर के लिए मजा मारने की लत ने पीने वालों को तो मौत की नींद सुला दिया, लेकिन उन के घर वालों को रोनेतड़पने के लिए छोड़ दिया. मीरगंज थाने की कंचन बताती हैं कि 16 अगस्त को उन का पति शशिकांत किसी काम से गोपालगंज गया था. रास्ते में ही हरखुआ ढाले के पास उन्होंने दोस्तों के साथ दारू पी. शाम को घर लौटते ही उन्होंने पेट में दर्द की शिकायत की. जब तक वे कुछ समझ पातीं, तब तक शशिकांत ने उलटी करना शुरू कर दिया. आननफानन उन्हें अस्पताल में भरती कराया गया, पर रात 8 बजे उन की मौत हो गई.

नगर थाने के इंस्पैक्टर बीपी आलोक समेत 25 पुलिस वालों को भी सस्पैंड कर दिया गया. गोपालगंज के कलक्टर राहुल कुमार ने माना कि जिले के खजूरबन्नी इलाके में शराब या जहरीला पेय पीने से 17 लोगों की मौतें हुई हैं. गोपालगंज के खजूरबन्नी गांव में देशी शराब धड़ल्ले से बिक रही थी. 17 मौतों के बाद गांव के लोगों की भी नींद खुली है और अब वे देशी दारू बनाने और बेचने वालों के खिलाफ खड़े हो गए हैं. गांव का रघुराम बताता है कि 20 रुपए में आधा गिलास और 40 रुपए में एक गिलास देशी दारू बिक रही थी. वहीं अंगरेजी शराब की बोतल एक हजार रुपए में मिलती है. खजूरबन्नी इलाका देशी दारू का एकलौता अड्डा है. बिहार में शराबबंदी का फैसला तो लागू कर दिया गया, पर देशी शराब बनाने और बेचने का गैरकानूनी काम कई इलाकों में चल रहा है और इस में लोकल पुलिस वालों की मिलीभगत से इनकार नहीं किया जा सकता है. शराब पर बैन के बाद भी कोई तगड़ा नैटवर्क है, जो यह जहर बांट रहा है और कानून की धज्जियां उड़ा रहा है.

कहां ले जाएगी मुफ्तखोरी

दिल्ली में हर घर को हर महीने 20 हजार लिटर पानी मुफ्त मिलता है. ‘महल्ला क्लिनिकों’ में दवाएं मुफ्त मिलती हैं. कुछ जगहों पर वाईफाई मुफ्त है. दिल्ली के सभी 262 रैनबसेरों में रात गुजारने वालों को चाय और रस्क मुफ्त बांटे जाते हैं. अब आम आदमी पार्टी की सरकार इस से भी एक कदम और आगे निकल गई है. पिछले दिनों ऐलान किया गया कि दिल्ली के 10 रैनबसेरों में अब 2 वक्त के बजाय 3 वक्त का खाना भी मुफ्त दिया जाएगा.

अगर सरकार लोगों को रहने को ठिकाना, ऊपर से चायनाश्ता व तीन वक्त का खाना भी मुफ्त में मुहैया करा रही है, तो सोचने की बात है कि भला कोई काम करने की जहमत क्यों उठाएगा? रैनबसेरों के आसपास नजर डालें, तो जहांतहां गंदगी पसरी दिखाई देगी. उन में रह कर मुफ्त खाने व रात बिताने वाले कामचोर कभी खुद हाथ तक नहीं हिलाते. जहां रहते हैं, वहां पर अकेले या मिल कर कभी सफाई तक नहीं करते. दरअसल, वोट बैंक बढ़ाने के लिए नेता करदाताओं का पैसा पानी की तरह बहाने व सरकारी खजाने को लुटाने में भी कोई गुरेज नहीं करते. मुफ्त में खानेपीने की चीजें बांट कर वे सिर्फ अपना मकसद पूरा करने में लगे रहते हैं.

दिल्ली में ही नहीं, देश के कई दूसरे राज्यों में भी इसी तरह मुफ्त का सामान बांटा जाता रहा है. उत्तर प्रदेश में साइकिलें व लैपटौप की रेवडि़यां बांटी गई थीं. पंजाब में किसानों को मुफ्त बिजलीपानी मुहैया कराने के लिए बीते 7 सालों में 32 हजार करोड़ रुपए का भुगतान सरकार कर चुकी है. तमिलनाडु, कर्नाटक वगैरह कई दूसरे राज्यों में भी किसानों को बिजली मुफ्त दी जा रही है. चुनाव के वक्त वोटरों को लुभाने के लिए शराब, कबाब व नकदी बांटने की होड़ मच जाती है. उत्तर प्रदेश व पंजाब में मुफ्त स्मार्टफोन देने वादे किए गए, तमिलनाडु में मुफ्त चावल, मिक्सी व टैलीविजन बांटे गए. आखिरकार गरीबों के सामने यह चारा किसलिए डाला जाता है? निजी कंपनियां अपना माल बेचने के लिए अकसर मुफ्त की स्कीमें चलाती हैं, लेकिन सरकारें ऐसा करें, तो बात गले से नीचे नहीं उतरती. किसी के खुदकुशी करने पर भी उस के परिवार को एक करोड़ रुपए दे दिए जाते हैं. कई नेता ऐसे हैं, जो अपने विवेकाधीन कोष से चुपचाप अपनों को लाखोंकरोड़ों रुपए बांटते रहते हैं और आम जनता को उन की दरियादिली की कानोंकान खबर तक नहीं होती.

मुफ्तखोरी में नुकसान

हमारे देश में मुफ्तखोरी की आदत बहुत गहराई तक घर कर गई है. कहीं भी कुछ जरा सा मुफ्त मिलने की खबर मिलते ही लोग पागलों की तरह बेकाबू हो जाते हैं. उसे लूटने के लिए लोग अंधाधुंध टूट पड़ते हैं.

लखनऊ में गरीब औरतों को साडि़यां बांटने के दौरान मची भगदड़ में कई औरतों की जानें चली गई थीं. इस के अलावा देश के कई दूसरे इलाकों में भी मुफ्त का सामान बांटने के दौरान जानलेवा हादसे हो चुके हैं, लेकिन लालची लोगों की आंखें नहीं खुलतीं. यह सच है कि मुफ्त में मिली चीज की कभी भी कद्र नहीं होती. उस का अंधाधुंध व बेजा इस्तेमाल होता है. साथ ही, जब सरकारें मुफ्त में सामान बांटती हैं, तो उस का हिसाबकिताब भी सही नहीं होता. सूखा, बाढ़ व आपदा राहत में खानेपीने के सामान व सरकारी कंबल बंटते वक्त छीनाझपटी, सेंधमारी व अपने घर भरने का खूब खेल होता है. भ्रष्टाचार में गले तक डूबे सरकारी मुलाजिम, अफसर, छुटभैए नेता व ठेकेदार सब मिल कर बहती गंगा में हाथ धोते हैं.

हमारे समाज में अनगिनत दाढ़ीचोटी वाले पाखंडी धर्म के नाम पर बिना करे खीरपूरी खाते हैं. निकम्मे रोज सुबह से शाम तक पान व चाय की दुकानों पर बेवजह बैठे रहते हैं. करोड़ों भिखारी भीख मांग कर अपना पेट भरते हैं. गरीब दिखने के लिए खुद गंदे रहते हैं और अपने आसपास भी जहांतहां गंदगी फैलाते रहते हैं. नशा करने में वे जम कर पैसा खर्च करते हैं. जो मेहनत व रोजगार का कुछ काम नहीं करता, वह कर्ज लेता है. अदा न कर के, बल्कि उसे मार लेता है और फिर जब देने की बारी आती है, तो अपराध करने लगता है.

क्या है उपाय

खैरात बांट कर लोगों को आलसी व लालची बनाना, बैसाखियों पर चलाना, कामचोरी सिखाना बिलकुल गलत है. मुफ्तखोरी वह बुराई है, जो गरीबों को हमेशा गरीब बनाए रखेगी. उन्हें ऊपर नहीं उठने देगी. उन के यकीन व जमीर को मार कर उन की तरक्की के रास्ते में गड्ढे खोदेगी. मुफ्त का सामान बांटने व खाना खिलाने वगैरह में जनता का पैसा फुजूल में जाया किया जाता है. इस से अच्छा है कि उसे बचा कर कम पढ़ने वाले को तालीम देने व उन को हुनरमंद बनाने पर खर्च किया जाए, ताकि सब लोग खुद कमानेखाने लायक हो जाएं और देश की समस्या न बढ़ाएं. साथ ही, लोगों में मेहनत से काम करने की आदत, साफसुथरा रहने व पैसे वाला बनने की चाहत हो, ताकि गंदगी व गरीबी दूर हो सके.

जापान जैसे देश इस बात के सुबूत हैं कि वही लोग आगे बढ़ते हैं, जो मेहनत व सूझबूझ से काम करते हैं. अपना दिमाग लगाते हैं. हमारे देश में तो लंगरों व भंडारों में जीम कर पेट भरने वाले निकम्मों की फौज भरी पड़ी है. ऊपर से कई नेता भी मुफ्तखोरी सिखा कर लोगों को काहिल बना रहे हैं.

नसीहत रखिए आप

गौरतलब है कि अपनी जेब से खर्च कर के कहीं कोई नेता जरा सी भी रहमदिली नहीं दिखाता. दरियादिली हमेशा जनता के पैसों से ही दिखाई जाती है, इसलिए इस पर पाबंदी लगना जरूरी है. वैसे भी बूढ़े, बीमार, लाचार व अपाहिजों के अलावा कौन ऐसा है, जो अपने लिए कुछ खर्च न कर सके, अपना तनबदन न ढक सके या पेट भी अच्छी तरह से न भर सके? आगे बढ़ने के लिए लोगों को अपने पैरों पर खड़ा होने देना बहुत जरूरी है. ऐसे लोग कम ही हैं, जो मुफ्त की चीजों के पीछे नहीं भागते. उन के अंदर अपना जमीर जिंदा है. वे खुद कमा कर खाने में यकीन रखते हैं. उन की गिनती बढ़ना जरूरी है, क्योंकि एक इनसान और जानवर में यही फर्क होता है. अगर रहनुमा ही भटके हुए हों, तो जनता को जागना होगा. खुद ही इस सचाई को समझने की पहल करनी होगी. मुफ्त में दी जाने वाली चीजें धीमा जहर हैं. इन से बचना होगा.

लड़कियों से जबरदस्ती, शर्मसार बार बार

24 दिसंबर, 2016 की रात. राजस्थान के चूरू जिले के एक गांव में एक नाबालिग लड़की को अगवा कर गैंगरेप किया गया. इतने पर भी जी नहीं भरा, तो उस पर मोटरसाइकिल चढ़ा दी गई. इस से उस की रीढ़ की हड्डी टूट गई. उस लड़की की एक आंख फोड़ दी गई.  बेंगलुरु, कनार्टक के एमजी रोड पर नए साल की पूर्व संध्या के मौके पर कुछ मर्दों ने लड़कियों के साथ हाथापाई की, जबकि वहां पुलिस मौजूद थी.

जयपुर में वहशीपन

राजस्थान की राजधानी जयपुर में भी वहशीपन की सारी हदें पार कर देने वाले 2 ऐसे मामले सामने आए, जो शर्मसार कर देने वाले हैं. पहले मामले में अलवर से जयपुर आई एक लड़की से 3 लड़कों के साथसाथ एक आटोरिकशा ड्राइवर ने रेप किया और उस के बाद बिना कपड़ों के उसे एमएनआईटी के बाहर फेंक कर फरार हो गए. लड़की ने खुद ही कंट्रोल रूम में फोन पर पुलिस को बताया.डीसीपी ईस्ट कुंवर राष्ट्रदीप ने बताया कि उत्तर प्रदेश की रहने वाली पीडि़त लड़की जगतपुरा में अपने भाई के साथ रह कर सरकारी नौकरी के इम्तिहान की तैयारी कर रही थी. सुबह वह रेलवे स्टेशन पर उतरी और जगतपुरा में अपने भाई के कमरे तक जाने के लिए आटोरिकशे में बैठ गई. इस दौरान आटोरिकशे में 3 और लड़के भी थे.

लड़की को अकेला पा कर आरोपी लड़कों ने आटोरिकशा को सुनसान जगह पर रुकवाया और लड़की के मुंह पर कपड़ा बांध कर उस के साथ बारीबारी से रेप किया. रेप के बाद तीनों लड़के वहां से फरार हो गए, उस के बाद आटोरिकशा ड्राइवर ने भी उस के साथ रेप किया.

इस वारदात के बाद पुलिस ने शहरभर में नाकाबंदी कराई और लड़की को ले कर सिंधी कैंप बसस्टैंड और रेलवे स्टेशन पहुंची, जहां पीडि़ता से संदिग्ध आटोरिकशा ड्राइवर की शिनाख्त कराई गई. पीडि़ता ने पुलिस को बताया कि वे तीनों लड़के हिंदी में बातें कर रहे थे और उस से पूछा कि कहां की रहने वाली हो और यहां क्या करती हो? उस पीडि़ता ने बताया वे तीनों आटोरिकशे में पहले से ही बैठे हुए थे. उन्हें कहां जाना था, इस बारे में वह नहीं जानती.

दूसरा मामला जयपुर के ही सांगानेर थाना इलाके का है. यहां 57 साल के एक टीचर ने अपनी ट्यूशन छात्रा, जिस की उम्र 16 साल बताई जा रही है, के साथ रेप कर दिया. पुलिस ने इस मामले में आरोपी टीचर को गिरफ्तार किया है. सांगानेर थाना पुलिस ने बताया कि नागरिक नगर, सांगानेर की पीडि़त लड़की के परिवार वालों ने मामला दर्ज कराया कि विरेंद्र सारस्वत नाम के टीचर ने यह करतूत की थी.

दरिंदगी की हदें पार

राजस्थान के चूरू जिले में भी दरिंदगी का एक मामला सामने आया. 2 लड़कों ने एक लड़की का रेप कर उस की रीढ़ की हड्डी व पसलियां तोड़ दीं. उन दरिंदों ने पीडि़ता की एक आंख भी फोड़ दी. इस के बाद वह लड़की जयपुर के एसएमएस अस्पताल में कई दिनों तक जिंदगी और मौत से जूझती रही.यह वारदात बीदासर थाना इलाके के गांव सांरगसर की है. बीदासर थानाधिकारी प्रहलाद राय के मुताबिक, पीडि़ता के पिता ने रिपोर्ट दी है कि 24 दिसंबर, 2016 को 15 साला पीडि़ता अपने घर पर पढ़ाई कर रही थी. रात 11 बजे गांव भोमपुरा का एक बाशिंदा राकेश भार्गव अपने रिश्तेदार के एक लड़के के साथ मोटरसाइकिल पर आया और वे दोनों पीडि़ता को जबरदस्ती मोटरसाइकिल पर बिठा कर ले गए. आरोपियों ने गांव से एक किलोमीटर दूर चरला रोड पर ले जा कर उस के साथ ज्यादती की.

उस के बाद आरोपियों ने उसे किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी दी और मोटरसाइकिल चढ़ा कर उस की रीढ़ की हड्डी व पसलियां तोड़ दीं. उस की एक आंख भी फोड़ दी. शरीर के कई हिस्सों पर गहरे घाव कर के उसे लहूलुहान हालत में मौके पर छोड़ कर भाग गए.

25 दिसंबर, 2016 की दोपहर 3 बजे पीडि़ता की मां के पास राकेश के मातापिता आए और उन्होंने लड़की के घायल होने की जानकारी दी. तब घर वालों को पता चला.

परिवार वालों ने पीडि़ता को सुजानगढ़ के अस्पताल में भरती कराया, जहां से उसे गंभीर हालत में पहले बीकानेर और फिर जयपुर भेज दिया गया. पीडि़ता का पिता गुजरात में मजदूरी करता है. घटना का पता चलने पर वह वहां आया और मामला दर्ज कराया.

राजस्थान पुलिस के मुताबिक, साल 2008 में रेप के 568 मामले दर्ज हुए थे. पिछले साल 2016 में यह तादाद बढ़ कर 3,769 हो गई. ये आंकड़े भयावह इसलिए भी हैं, क्योंकि 75 फीसदी आरोपी सुबूतों की कमी में बाइज्जत बरी हो जाते हैं. वैसे, साल 2015 में देशभर में दुष्कर्म के कुल 37,413 मामले हुए. इन में सब से ऊपर मध्य प्रदेश (5,076), राजस्थान (3769), उत्तर प्रदेश (3,467), महाराष्ट्र (3,438) जैसे राज्य ही थे. महानगरों की बात हो, तो दिल्ली (1,813), मुंबई (607), चेन्नई (65), बेंगलुरु (104) और कोलकाता (36) सब से आगे थे.

जयपुर की एक लीगल फर्म के मुताबिक, लापरवाही से की गई जांच, एफआईआर में देरी, आरोपियों के वकील का पीडि़ता के प्रति आक्रामक रुख और अदालतों में संवेदनशीलता की कमी इस की अहम वजह रही हैं. सजा की दर भी इसलिए कम है, क्योंकि ज्यादातर पीडि़ता चुपचाप ज्यादती सह जाती हैं. अगर पीडि़ता समाज के तानों की परवाह न करे, तो उसे पुलिस और कानून से इंसाफ मिलने की उम्मीद कम रहती है. साल 2015 में हुई एक स्टडी के मुताबिक, भारत में पति द्वारा जबरन सैक्स के सिर्फ 0.6 फीसदी यानी 167 में से महज एक केस ही दर्ज होता है.

दिखाया जज्बा

बेंगलुरु में 2 शोहदे एक लड़की से बेशर्मी के साथ छेड़छाड़ करते रहे और आसपास के लोग तमाशबीन और चुप ही रहे, लेकिन राजस्थान के चूरू जिले के राजगढ़ कसबे में जो घटा, वह सजगता की एक मिसाल बन गया है. यह किस्सा महशूर ओलिंपियन एथलीट कृष्णा पूनिया की बहादुरी की भी एक नजीर है. कृष्णा पूनिया ने बताया कि रविवार की दोपहर दिन के डेढ़ बजे जब वे  सादुलपुर कसबे की कृष्णा बहल रोड से गुजर रही थीं, तो पिलानी रेलवे फाटक बंद था. वहां 3 बदमाश 2 किशोरियों पर फब्तियां कस रहे थे और छेड़खानी कर रहे थे.

छेड़छाड़ करते हुए उन बदमाशों ने लड़कियों को जमीन पर गिरा दिया और मोटरसाइकिल से भागने लगे. इस घटना को बहुत से लोग देख रहे थे, लेकिन कोई भी अपनी जगह से नहीं हिला. सभी तमाशबीन खडे़ थे. लड़कियां छेड़छाड़ से परेशान थीं और रो रही थीं. कृष्णा पूनिया अचानक कार से उतरीं और उन तीनों बदमाश लड़कों के पीछे दौड़ पड़ीं. उन्होंने       50 मीटर दौड़ने के बाद एक लड़के को धर दबोचा और पुलिस को फोन किया. लड़कियां कह रही थीं कि अगर उन के घर वालों को इस घटना का पता लगा, तो वे आइंदा उन्हें घर से बाहर नहीं निकलने देंगे. लेकिन कृष्णा पूनिया ने किशोरियों को हौसला दिया और उन्हें उन के घर पर छोड़ कर आईं.

वे पुलिस स्टेशन भी गईं और पुलिस अफसरों को नसीहत दी कि आखिर थाने के ठीक पास ही बदमाश इस तरह लड़कियों से कैसे छेड़छाड़ कर रहे हैं. बीजिंग और लंदन ओलिंपिक में भारत की नुमाइंदगी कर चुकी कृष्णा पूनिया हरियाणा से हैं और चूरू जिले में उन की ससुराल है. इन दिनों वे राजनीति में हैं, लेकिन उन में एक बहादुर खिलाड़ी का जज्बा आज भी बरकरार है.बेंगलुरु और राजगढ़ की ये दोनों घटनाएं एक ही समय में घटित हुई हैं, लेकिन एक में भीड़ के बीच खड़ी एक हिम्मती खिलाड़ी कृष्णा पूनिया ने पूरे हालात को ही बदल दिया और दूसरी में एक आधुनिक कसबे की जनता का वह तबका शर्मसार है,  जो घटना के समय चुप्पी साधे रहा.

हद तो यह है कि बेंगलुरु की इस घटना के बाद कर्नाटक के गृह मंत्री डाक्टर जी. परमेश्वरा ने यह तक कह दिया कि नए साल और दूसरे ऐसे मौकों पर ऐसी घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहा है कि राजस्थान का भी एक पक्ष है, जहां गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया ने अभी तक कृष्णा पूनिया की तारीफ नहीं की है, क्योंकि वे कांग्रेस से जुड़ी हैं.सवाल यह उठता है कि क्या यह देश औरतों व लड़कियों के लिए महफूज नहीं है? क्या वे हमेशा यह डर साथ ले कर घर से बाहर निकलें कि कोई न कोई उन के साथ कुछ बुरा सोच कर तैयार बैठा है और वे हमेशा डरती रहें?  आखिर हमारी सरकार, पुलिस और समाज का पूरा तबका अपनी सोच कब बदलेगा? ऐसे में यही बेहतर है कि हर लड़की कृष्णा पूनिया की तरह बन जाए और छेड़छाड़ करने वालों को गरदन से दबोच कर पुलिस के हवाले कर दे.

महिलाओं में दिल की बीमारी

दिल की बीमारी का जोखिम महिलाओंपुरुषों में बराबर ही रहता है. हालांकि पुरुषों और महिलाओं में कार्डियोलौजी अलगअलग तरह से काम करता है. पुरुषों और महिलाओं में कार्डियोवैस्क्युलर बीमारियों के साझे जोखिम कारकों (डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, खून में कोलैस्ट्रोल का बढ़ा स्तर और धूम्रपान) के अलावा और भी ऐसे कारक हैं, जो महिलाओं में कार्डियोवैस्क्युलर बीमारी का जोखिम बढ़ा देते हैं.

रजोनिवृत्ति और ऐस्ट्रोजन की हानि

महिलाओं के शरीर में बनने वाला हारमोन ऐस्ट्रोजन हृदय की बीमारियों से प्राकृतिक सुरक्षा मुहैया कराता है. उम्र बढ़ने के साथसाथ प्राकृतिक ऐस्ट्रोजन की कमी से उन में रजोनिवृत्ति के बाद दिल की बीमारी का जोखिम बढ़ सकता है. अगर रजोनिवृत्ति का कारण गर्भाशय या अंडाशय निकालने की सर्जरी की गई हो तो जोखिम और भी बढ़ जाता है.

गर्भनिरोधक गोलियां

खाने वाली कुछ गोलियां दिल की बीमारी का जोखिम पैदा कर सकती हैं खासकर उन महिलाओं में जो धूम्रपान भी करती हैं या जिन्हें उच्च रक्तचाप रहता है.

तनाव, मोटापा और अवसाद अच्छेखासे जोखिम कारणों में हैं, जो तुलनात्मक रूप से महिलाओं को ज्यादा प्रभावित करते हैं.

डायबिटीज की शिकार महिलाओं की कार्डियोवैस्क्युलर बीमारी से मौत का जोखिम डायबिटीज वाले पुरुषों की तुलना में ज्यादा होता है. गर्भावस्था के दौरान अस्थायी डायबिटीज भी महिलाओं में जोखिम बढ़ा देती है.

दिल की कई तरह की बीमारियां महिलाओं में पुरुषों की तुलना में ज्यादा आम हैं. जैसे स्ट्रोक, हाइपरटैंशन, ऐंडोथेलियल डिसफंक्शन और कंजैस्टिव हार्ट फेल्यर.

आज हैल्थकेयर समाज में सब से चर्चित विषय है. अत: महिलाओं को इस बात के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए कि वे अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दें और समय पर रोगनिदान हेतु उपचार का चुनाव करें.                  

 – डा. नीति चड्ढा, मैट्रो हौस्पिटल, फरीदाबाद

बिहार : लुटेरे चुग गए अरबों के चावल

बिहार में हो रही चावल मिलों की धांधली पर रोक लगाने में सरकार बिलकुल नाकाम रही है. पिछले 5 सालों से चावल मिल मालिकों के पास बिहार खाद्य निगम के 12 सौ करोड़ रुपए बकाया हैं और निगम उसे वसूलने के लिए कछुआ चाल ही चलता रहा है. जब भी बकाया रकम की वसूली के लिए मुहिम शुरू की जाती है, वह कभी भी अपने अंजाम तक नहीं पहुंच पाती है. राज्य में 13 सौ चावल मिलें ऐसी हैं, जिन्होंने धान ले कर सरकार को चावल नहीं लौटाया है, इस के बावजूद धान कुटाई के लिए इन मिलों को दोबारा से धान दे दिया गया.

पटना की 64 चावल मिलों पर 55.61, भोजपुर की 90 मिलों  पर 72.05, बक्सर की 152 मिलों पर 101, कैमूर की 357 मिलों पर 220, रोहतास की 191 मिलों पर 111, नालंदा की 84 मिलों पर 55.34, गया की 49 मिलों पर 40 और औरंगाबाद की 207 मिलों पर 62.15 करोड़ रुपए बकाया हैं. वैशाली की 25 मिलों पर 23.66, मुजफ्फरपुर की 33 मिलों पर 66.51, पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण की 153 मिलों पर 63, सीतामढ़ी की 52 मिलों पर 55.83, दरभंगा की 34 मिलों पर 39.83, शिवहर की 8 मिलों पर 17.78 करोड़ रुपए की वसूली बाकी है. नवादा की 23 मिलों पर 20.48 करोड़ रुपए की रकम बकाया है. इस के अलावा अरवल, शेखपुरा, लखीसराय, मधुबनी, समस्तीपुर, सिवान, सारण, गोपालगंज वगैरह जिलों की सैकड़ों छोटीमोटी चावल मिलों पर तकरीबन 90 करोड़ रुपए बकाया हैं.

साल 2011-12 में राज्य खाद्य निगम ने 4 लाख, 55 हजार टन और पैक्स यानी प्राथमिक कृषि साख समितियों ने 17 लाख, 6 हजार टन किसानों से धान  खरीदा था. सारा धान चावल मिलों को दे दिया गया. चावल मिलों से सरकार को 14 लाख, 47 हजार टन चावल मिलना था, पर चावल मिलों ने केवल 8 लाख, 56 हजार टन चावल ही लौटाया. बाकी चावल इन मिलों ने नहीं लौटाया. उस चावल की कीमत 12 सौ करोड़ रुपए है.

बिहार महालेखाकार ने पिछले साल की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि धान को ले कर चावल मिलों ने सरकार को 434 करोड़ रुपए का चूना लगाया है. इस के पहले 2011-12 में भी चावल मिलों ने 434 करोड़ रुपए का धान दबा लिया था. उस के बाद के साल में 929 करोड़ रुपए के धान की हेराफेरी कर सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया. इस के बाद भी सरकार ने मिल मालिकों के खिलाफ कार्यवाही करने में कोई दिलचस्पी नहीं ली.बिहार राज्य खाद्य निगम के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, साल 2011-12 में जिन चावल मिलों पर धांधली का आरोप लगा था, उन्हीं मिलों को साल 2012-13 में भी करोड़ों रुपए का धान दे दिया गया. केवल 50 हजार रुपए की गारंटी रक म पर ही 3 करोड़ से 6 करोड़ रुपए का धान चावल मिलों को सौंप दिया गया.

मिलों को धान देने के बारे में नियम यह है कि भारतीय खाद्य निगम इन चावल मिलों से एग्रीमैंट करता है, जिस के तहत चावल मिलें पहले निगम को 67 फीसदी चावल देती हैं, जिस के बदले में उन्हें रसीद मिलती है. उस रसीद को दिखाने के बाद ही चावल मिलों को सौ फीसदी धान दिया जाता है.  राज्य के मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह ने खाद्य निगम को फटकार लगाई थी और चावल मिलों से बकाया रकम वसूलने की मुहिम तेज करने का फरमान जारी किया था. उस के बाद बिहार में किसानों और सरकार से धान ले कर चावल नहीं लौटाने वाले मिल मालिकों को जेल भेजने की कवायद कई बार शुरू की गई, पर उस की रफ्तार काफी धीमी रही है.

सरकार ने ऐसे चावल मिल मालिकों को गिरफ्तार करने और उन की कुर्कीजब्ती का आदेश जारी कर दिया है. इस सिलसिले में 13 सौ बड़े बकायादार मिल मालिकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है. गौरतलब है कि पिछले 5 सालों से चावल मिलों के मालिक बकाया 1342 करोड़ रुपए देने में टालमटोल करते रहे हैं. चावल मिल मालिकों पर साल 2013-14 के 150 करोड़, साल 2012-13 के 732 करोड़ और साल 2011-12 के 427 करोड़ रुपए बकाया हैं. धान ले कर चावल वापस नहीं करने के मामले में खाद्य निगम समेत कई महकमों के अफसरों और मुलाजिमों पर भी कानूनी कार्यवाही की जा रही है. कुल 394 अफसरों और मुलाजिमों की जांच की जा रही है और 184 लोगों पर मुकदमा दर्ज किया गया है.

साल 2011-12, 2012-13 और 2013-14 में 2024 चावल मिल मालिकों पर राज्य खाद्य निगम से धान लेने के बाद उस का चावल तैयार कर के नहीं लौटाने का आरोप है. चावल की बकाया रकम का भी भुगतान नहीं किया गया है. चावल मिल मालिकों के पास निगम के 1341 करोड़, 75 लाख रुपए बकाया हैं. काफी जद्दोजेहद के बाद निगम केवल 240 करोड़, 62 लाख रुपए ही वसूल सका है. निगम द्वारा बारबार कहे जाने के बाद भी 332 चावल मिलों ने पैसे जमा नहीं किए हैं. इस मामले में अब तक 1193 चावल मिल मालिकों पर 992 एफआईआर दर्ज की गई हैं. 1630 सर्टिफिकेट केस किए गए हैं और 722 चावल मिल मालिकों के खिलाफ वारंट जारी किया गया है, जिन में से 319 वारंटों की तामील हो चुक है. इन में से 199 मिल मालिकों की गिरफ्तारी हुई है और 836 ने सरैंडर किया है. 255 मिल मालिकों के खिलाफ आरोपपत्र दायर किए जा चुके हैं.   

अब ‘पैक्स’ लगाएगी चावल मिलें

प्राइवेट चावल मिलों की बढ़ती धांधली के बाद अब राज्य सरकार प्राथमिक कृषि साख समितियों को चावल मिल लगाने के लिए 25 लाख रुपए तक का अनुदान देगी. राज्य में 8463 पैक्स हैं और वे चावल मिल लगाने की योजना का फायदा उठा सकती हैं. व्यापार मंडल को भी इस योजना का फायदा मिल सकता है. चावल मिल लगाने के लिए पैक्स के अध्यक्ष को जिला सहकारिता कार्यालय में आवेदन देना होगा. सहकारिता विभाग ने बिजली से चलने वाली मिलों को लगाने के लिए प्रस्ताव तैयार कर लिया है. इस के तहत प्रति घंटा 20 क्विंटल धान की कुटाई क्षमता वाली चावल मिल लगाई जानी हैं. एक मिल के लगाने पर 50 लाख रुपए का खर्च आएगा. इस में से 50 लाख रुपए अनुदान के तौर पर मिलेंगे. कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद इस योजना को जमीन पर उतारा जाएगा. इस से पैक्स को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान की खरीद में काफी सुविधा हो जाएगी और किसानों से ज्यादा से ज्यादा धान की खरीद हो सकेगी. किसानों को इस से काफी फायदा मिल सकेगा. गौरतलब है कि इस साल सरकार ने धान की खरीद का कोई टारगेट तय नही किया है. सरकार का दावा है कि  किसान जितना भी धान बेचेंगे, उतने की खरीद की जाएगी.

योग के नाम पर भोग

गोवा में पढ़ी लिखी, समझदार 2 विदेशी औरतों के साथ एक गैरब्राह्मण योग गुरु का बलात्कार करना कोई नई बात नहीं. तांत्रिक अनुष्ठानों के बहाने सदियों से धर्म के नाम पर औरतों को बहकाया जाता रहा है कि उन का शरीर तो क्षणभंगुर है. काया के ऊपर पहुंचने और चरम आनंद को प्राप्त करने के लिए तांत्रिक प्रक्रियाएं ईश्वर प्रदत्त हैं और जिस गुरु के पास यह ज्ञान है उसे पूजो, पैसा दो भले ही वह शरीर से खिलवाड़ करे. अब इस प्रकार स्वयंभू गुरु औनलाइन अवतरित होने लगे हैं और एक अमेरिकन व एक कैनेडियन औरत ऐसे ही एक गुरु 38 वर्षीय प्रतीक कुमार अग्रवाल के झांसे में आ गईं और 7 दिन के ट्रेनिंग कोर्स के लिए आ पहुंचीं.

योग का प्रचार इस तरह हो रहा है कि देशविदेश में इसे हर रोग के इलाज के लिए बता दिया जाता है और भेड़चाल में हजारों लोग योग गुरुओं के चरणों में बिछे चले जाते हैं. इन औरतों को भी किसी तरह की मानसिक परेशानियां रही होंगी और फिर से वे भी योग के नाम पर आकर्षित हो धूर्त के हाथों में पड़ गई होंगी. इन्होंने बलात्कार का आरोप तो लगाया ही है इन का पैसा भी गया होगा, यह भी पक्की बात है. पुलिस ऐसे मामलों में ज्यादा कुछ नहीं कर सकती, क्योंकि प्रमुखतया शिकार स्वयं शिकारी के फंदे में पड़े थे. उन के साथ जोरजबरदस्ती की गई थी, यह साबित करना कठिन होगा. बलात्कार में शारीरिक भय दिखाया गया था, यह औरतों के लिए साबित करना मुश्किल होगा. सफाई में इस तरह के संबंध से इनकार करा जाए या उसे सहमति से बने संबंध कहा जाए तो गलत ठहराना काफी कठिन होगा.

योग क्रियाओं के नाम पर हमारे देश में ही नहीं दुनिया भर में न जाने क्याक्या किया जा रहा है. इसे रोगों के उपचार का पक्का तरीका साबित करा जा चुका है और हाल यह है कि अच्छेभले अस्पताल भी योग का लेबल चिपका कर मनचाहा पैसा पाने लगे हैं. इस शातिर ने जो किया वह तो मामूली सा लगता है. जो तेज होते हैं वे तो योग के नाम पर मजे में भोग करते हैं.

नन बनी सोफिया का सबसे हॉट फोटोशूट देखा आपने

नन बन चुकीं सोफिया हयात ने फाइनली अपने मंगेतर की आइडेंटिटी रिवील कर दी है. एक लीडिंग वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में उन्होंने अपने मंगेतर, शादी प्लान और अन्य मुद्दों पर खुलकर बात की. सोफिया ने बताया कि उनके मंगेतर कोई सेलेब्रिटी नहीं हैं. इसलिए वे उन्हें प्रोटेक्ट करना चाहती हैं. उनका नाम Vlad Stanescu है और वे रोमानिया बेस्ड इंटीरियर डिजाइनर हैं. Vlad ने सउदी अरबिया के किंग फाहद, स्वीडन की रानी स्लिविया और कैंब्रिज के प्रिंस विलियम ड्यूक सहित कई नामी लोगों के लिए काम किया है."

सोफिया ने इंटरव्यू में बताया कि Vlad उनका पूरा ख्याल रखते हैं. वे डिनर के समय उनकी चेयर खिसकाते है, कार का डोर खोलते हैं. उनकी ख़ुशी से जुड़ी हर छोटी-छोटी बात का ध्यान रखते हैं. सोफिया के मुताबिक, एक डिनर के दौरान Vlad ने उन्हें 'I Love You' कहा और शादी के लिए प्रपोज कर दिया. उन्होंने हां कर दी और दो दिन बाद दोनों की सगाई हो गई.

सोफिया ने इस इंटरव्यू में यह खुलासा भी किया कि वे इसी साल 24 अप्रैल को शादी कर लेंगी. उनके मुताबिक, उनकी वेडिंग सेरेमनी में हिंदू, मुस्लिम, क्रिश्चियन और तिब्बतन सहित सभी धर्मों के रिवाज देखने को मिलेंगे. इतना ही नहीं, सोफिया की मानें तो वे और Vlad पहले ही मुस्लिम धर्म के अनुसार शादी कर चुके हैं.

जब सोफिया से यह सवाल किया गया कि पिछले साल वे कहती थीं कि कभी शादी नहीं करेंगी, सेक्स से दूर रहेंगी और बच्चे भी पैदा नहीं करेंगी. फिर इस साल उनका दिल कैसे बदल गया. उन्होंने जवाब दिया, "मेरा दिल नहीं बदला है. उस वक्त वह मेरी सच्चाई थी और आज यह मेरी सच्चाई है. दूसरे शब्दों में कुछ लोग तब शादी करते हैं, जब उन्हें कोई अच्छा लगने लगता है और कुछ लोग इसलिए तलाक लेते हैं कि उनका रिश्ता चल नहीं रहा होता है. इसका मतलब यह तो नहीं कि जब वे पहले प्यार में पड़े तो झूठ बोल रहे थे.”

ब्वॉयफ्रेंड ने ऐक्ट्रेस का इंटीमेट वीडियो बना पॉर्न साइट को बेचा

हॉलीवुड ऐक्ट्रेस मीशा बार्टन इन दिनों अपनी जिदंगी के सबसे बुरे दौर से गुजर रही हैं. मीशा ने हाल ही में अपने एक्स ब्वॉयफ्रेंड के बारे में चौंकाने वाला खुलासा किया है. उनके मुताबिक, एक्स ब्वॉयफ्रेंड ने उनके साथ बिताए निजी पलों का वीडियो बनाकर पॉर्न साइट्स को बेचने की कोशिश की. चर्चा तो ये भी है कि ऑनलाइन पॉर्न कंपनियों ने इसके लिए बोली लगाना भी शुरू कर दी है. हालांकि मीशा अब उसके खिलाफ लीगल एक्शन लेने जा रही हैं.

हॉलीवुड के वीडियो ब्रोकर केविन ब्लैट के मुताबिक, 'मेरे पास एक शख्स इस वीडियो को लेकर आया था. फिलहाल यह वीडियो तेजी से सर्कुलेट किया जा रहा है.' बता दें कि कुछ दिन पहले खबरें आई थीं कि मीशा बार्टन का सेक्स टेप पॉर्नोग्राफिक साइट्स पर मौजूद है. इसके बाद मीशा ने अपनी अटॉर्नी लीजा ब्लूम के साथ इस बारे में मीडिया से चर्चा की.

एक न्यूज एजेंसी के मुताबिक़, मीशा ने बताया- ''ये मेरे लिए काफी मुश्किल और बुरा दौर है. जब मुझे पता चला कि जिसे मैंने प्यार किया और उस पर भरोसा किया उसी ने मेरे साथ गुजारे निजी पलों को हिडन कैमरे से शूट किया. सबसे ज्यादा दुख वाली बात तो ये है कि उसने इन वीडियो को बेचने और उन्हें पब्लिकली करने की कोशिश कर रहा है.

24 जनवरी, 1986 को हैमरस्मिथ, लंदन में जन्मीं मीशा ब्रिटिश अमेरिकन फिल्म और टीवी ऐक्ट्रेस हैं. मीशा मॉडलिंग भी करती हैं. 31 साल की मीशा ने टीवी पर अमेरिकन सोप ओपेरा 'ऑल माय चिल्ड्रन' से 1996 में डेब्यू किया. मीशा ने भोपाल गैस ट्रेजडी पर बनी फिल्म 'भोपाल- ए प्रेयर फॉर रेन' में मीशा ने ईवा गैसकॉन नाम की जर्नालिस्ट का रोल निभाया है.

मीशा की रोमांटिक कॉमेडी 'नॉटिंग हिल' और मनोज नाइट श्यामलन की साइकोलॉजिकल थ्रिलर 'द सिक्स्थ सेंस' शामिल है. मीशा ने 1997 में फिल्म लॉन डॉग्स में लीड रोल किया है. इसके बाद उन्होंने पप्स, स्किप्ड पार्ट्स, ऑक्टेन और वर्जिन टेरिटरी जैसी फिल्मों में भी काम किया है.

अक्षय फिल्म ‘मोगुल’ में बनेंगे गुलशन कुमार

साल 2017 को शुरू हुए अभी कुछ महीने ही हुए हैं और अक्षय कुमार ने आने वाले साल 2018 के लिए फिल्मों की तैयारी शुरू भी कर दी है. बॉलीवुड अभिनेता और सुपर-स्टार अक्षय कुमार एक के बाद एक सफल फिल्म देते जा रहे हैं और दूसरी फिल्में साइन करते जा रहे हैं.

साल 2017 के शुरूआत में अक्षय की फिल्म ‘जॉली एलएलबी 2’ रिलीज हुई. फिल्म ने हाल ही में बॉक्स ऑफिस पर कई सारे रिकॉर्ड्स भी तोड़े हैं. इस समय तो अक्षय कुमार अपनी फिल्में ‘टॉयलेट एक प्रेम कथा’, ‘रोबोट 2’, ‘पैड मैन’, और ‘गोल्ड’ के काम में व्यस्त चल रहे हैं.

खबरों की मानें तो उन्होंने सलमान खान और करण जौहर की फिल्म भी साइन की हुई है. इन सबके अलावा अब खिलाड़ी कुमार अपने प्रशंसकों के लिए एक नयी फिल्म की खबर ले कर आए हैं. इस फिल्म का नाम होगा ‘मोगुल’, जो कि गुलशन कुमार की जिन्दगी पर आधारित है. इसका मतलब है कि अब अक्षय जल्द ही ‘मोगुल : द गुलशन कुमार स्टोरी’ नामक गुलशन कुमार की बायोपिक में नजर आएंगे.

इस फिल्म के बारे में अक्षय का मानना है कि “मैं खुशकिस्मत हूं और पर्दे पर गुलशन जी की भूमिका निभाने के लिए काफी उत्साहित हूं. मेरी और गुलशन जी की बॉन्डिंग, मेरी पहली फिल्म 'सौगंध' से शुरू हुई थी”.

अक्षय कुमार की फिल्म ‘मोगुल’ को सुभाष कपुर निर्देशित करेंगे और यह फिल्म साल 2018 में रिलीज की जाएगी. इससे पहले अक्षय कुमार और सुभाष कपूर ने ‘जॉली एलएलबी 2’ में एक साथ काम किया है. टी सीरीज म्यूजिक के फाउंडर स्वर्गीय गुलशन कुमार के साथ उनका एसोसिएशन पहले से ही है. अक्षय ने इस फिल्म को लेकर ट्वीट किया कि "मेरा और उनका साथ मेरी पहली फिल्म से ही है. वह म्यूजिक के राजा थे. अब उनकी कहानी जानिए, ‘मोगुल : द गुलशन कुमार स्टोरी’".

80 और 90 के दशक में संगीत और म्यूजिक इंडस्ट्री को एक नए मुकाम तक पहुंचाने वाले गुलशन कुमार की साल 1997 में हत्या कर दी गई थी. टी-सीरीज के नाम से उनका बॉलीवुड और संगीत के क्षेत्र में एक जाना माना नाम बन गया. इस बायोपिक की घोषणा इसी हफ्ते गुलशन कुमार की बेटी के जन्मदिन के मौके पर की गई. उनकी पत्नी सुदेश कुमारी उनके जीवन पर आधारित इस फिल्म को प्रोड्यूस करने वाली हैं.

टी सीरीज के मालिक और गुलशन जी के बेटे भूषण कुमार के अनुसार 'मोगुल', उनके लिए केवल एक फिल्म नहीं है बल्कि ये उनका सपना है जो पूरा होने वाला है और अक्षय से बेहतर उनके पिता का किरदार कोई नहीं निभा पाएगा.

आपको बता दें कि गुलशन जी, अपनी बेटी तुलसी कुमार से काफी नजदीक थे और इसी वजह से तुलसी के जन्मदिन पर मुगल के फर्स्ट लुक को भी रिवील कर, फिल्म की घोषणा की गई. फिल्म 'मोगुल' की शूटिंग इस साल के अंत तक शुरू की जाएगी. अगले ही साल साल रीमा कागती की फिल्म 'गोल्ड' और आर बाल्की निर्देशित 'पैडमैन' फिल्म भी रिलीज होगी.

फिल्म ‘गुलाब जामुन’ में होगा पूरा बच्चन परिवार

बच्चन परिवार के वॉलीवुड फैंस के लिए खुशखबरी है. बहुत जल्द पूरा बच्चन परिवार अनुराग कश्यप की फिल्म 'गुलाब जामुन' में जमा होने वाला है. फिल्म में अनुराग कश्यप पैसा लगाएंगे और उनके सहायक इस फिल्म को निर्देशित करने वाले हैं. खबर है कि कुछ दिनों पहले बच्चन परिवार को स्क्रिप्ट सुनाई गई. यह अभिषेक, ऐश्वर्या और अमिताभ को ध्यान में रखकर लिखी गई थी. लेकिन बाद में फिल्म से जया को भी जोड़ने का फैसला किया गया.

वैसे भी इस समय अभिषेक बच्चन स्टुडियो की बजाय स्टेडियम में ज्यादा नजर आते हैं. उनका करियर खत्म होने की कगार पर है. अभिषेक ने तय कर लिया है कि ऐरी-गैरी फिल्म नहीं करेंगे, लेकिन समस्या यह है किजानदार रोल उन्हें कोई ऑफर ही नहीं करता. बजाय घटिया फिल्म करने के अभिषेक ने घर बैठना उचित समझा. फिल्म “गुलाब जामुन” की स्क्रिप्ट जब आई तो इसमें अमिताभ और अभिषेक काम करने के लिए शायद इसलिए भी राजी हो गए ताकि अभिषेक का करियर फिर संवर जाए. वे अमिताभ बच्चन चाहते हैं कि अभिषेक को कोशिश जारी रखना चाहिए.

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