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मोदी की उपलब्धियों पर भारी जसोदाबेन का धैर्य

जितना जटिल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वभाव है उतनी ही सरल उनकी पत्नी जसोदाबेन हैं. एकदम परंपरावादी समझौतावादी और सहज महिला जो बिना किसी लागलपेट के अपनी बात कहती हैं. उनके पास हर एक मुद्दे पर एक स्पष्ट निष्कर्ष है जिससे असहमत होने जिस अध्ययन और ज्ञान या तर्कों की जरूरत होनी चाहिए वे आमतौर पर उनसे मिलने वालों के पास नहीं होते. लोग एक जिज्ञासा लिए उनसे मिलते हैं और एक आस्था लेकर उनसे विदा होते हैं. चेहरे से भले ही सहज हों पर जसोदाबेन ढृढ व्यक्तित्व वाली महिला हैं जिनके सामने आप यह पूछना निरर्थक महसूसने लगते हैं कि मोदी जी ने आपको क्यों छोड़ा था और अब आप उनसे अपने अधिकार क्यों नहीं मांगती, हालांकि बहुत पहले वे स्पष्ट कर चुकी हैं कि वे बुलाएंगे तो मैं पीएम हाउस रहने चली जाऊंगी पर वे यह कभी नहीं कहतीं कि मैं अपने मन से बिना बुलाये भी जा सकती हूं.

जाहिर है जसोदाबेन का स्वाभिमान उनके पति के निर्णय अहंकार या जिद जो भी कह लें पर भारी पड़ता है. जसोदाबेन पिछले सात दिन मध्यप्रदेश के मालवा और निमाड अंचलों के दौरों पर रहीं और हर जगह उन्होंने नरेंद्र मोदी की उपलब्धियों को सराहा कि उनके नेतृत्व में देश आगे बढ़ रहा है, दुनिया भर में भारत का मान बढ़ने का श्रेय भी वे पति को देती हैं. बहुत ही सहज ढंग से अपना पतिव्रत जसोदाबेन यह कहते भी व्यक्त करती हैं कि मोदी जी की  स्वीकार्यता बढ़ रही है.

उज्जैन से लेकर नीमच और मंदसौर तक की उनकी यात्रा हालांकि आकस्मिक थी पर बेवजह नहीं थी. जसोदाबेन बेटी बचाने और पढ़ाने की बात जगह जगह रख रही हैं. उनकी बातों से कोई भेदभाव या पूर्वाग्रह भी नहीं झलकता. जसोदाबेन इन्दिरा गांधी और मायावती की भी तारीफ करती हैं कि उन्होंने महिलाओं के विकास के लिए अच्छे काम किए. महिलाओं की दुर्दशा का एक बड़ा जिम्मेदार वे कुरीतियों को मानती हैं और महिलाओं से घर से बाहर निकलने की अपील भी करती हैं कि बाहर आकर देखो वक्त बदल चुका है और देश तुम्हारा इंतजार कर रहा है.

ऐसे भी लोगों की कमी नहीं जो जसोदाबेन के मुंह से पति के बारे में ऐसा कुछ सुनने की खवाहिश लिए आते हैं जिसकी सनसनी मचाई जा सके, पर ये लोग निराश ही लौटते हैं. वजह वे बेहद संभल कर बोलती हैं और उस जमाने की स्त्री उनमें मौजूद है जो सिर्फ यह कहती है कि मेरा पति मेरा देवता है. नरेंद्र मोदी ने अपना एक मकसद तय किया और उसे हासिल करने के लिए खुद को उसमें झोंक भी दिया. आज वे शीर्ष पर हैं, तो बिलाशक खुद की वजह से हैं, लेकिन उन्हे जसोदाबेन का शुक्रगुजार भी होना चाहिए कि वे कभी उनकी राह का रोड़ा नहीं बनी उल्टे अहिल्या जैसी श्रापित ज़िंदगी जीते उनकी कामयाबी की दुआ मांगती रहीं.

पति द्वारा त्यागे जाने पर उन्होंने कभी इसे अपने प्रति ज्यादती या बुरा बर्ताव नहीं कहा और पढ़ लिख कर स्कूल टीचर बनकर ज़िंदगी गुजारने का रास्ता चुना और आज भी नरेंद्र मोदी से कोई अपेक्षा नहीं रखतीं, तो एक सेल्यूट की हकदार तो वे हैं. उनसे मिलकर जाने वाले जरूर यह चर्चा करने से खुद को रोक नहीं पाते कि कितना अच्छा हो अगर मोदी जी उन्हें ससम्मान पीएम हाउस कभी ले जाएं तो उनका मान और बढ़ जाएगा. 

अब आपकी फोटो हमेशा रहेंगी सुरक्षित

क्या आपको भी कहीं घूमने जाते वक्त कैमरे के बिना अपना सफर अधूरा सा लगता है? हालांकि आज के समय में तो कैमरे की जगह स्‍मार्टफोन ने ले ली है, लेकिन फिर भी लोग अपने सफर की यादों को ताजा रखने के लिए हाई क्वालिटी कैमरे भी उपयोग करते हैं.

ये बात तो आप जानते ही हैं कि इन सभी कैमरों में आपकी तस्वीरों और वीडियो को सुरक्षित करने के लिए मैमोरी कार्ड या फिर माइक्रोएसडी कार्ड लगाने होते हैं, जिनमें कि आसानी से आपकी फोटो और वीडियो सेव हो जाते हैं.

कहीं भी घूमने जाने वक्त या यात्रा के दौरान, हम कई बार हम कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिनकी भरपाई करना थोड़ा मुश्‍किल हो जाता है. अगर आप 10 दिन के लिए कहीं बाहर घूमने जाते हैं, जहां घूमते हुए आप ढेरों फोटो आपने पास सेव कर लेते हैं, लेकिन घर आने के बाद अचानक आपसे, अगर आपकी वही सारी फोटो गलती से डिलीट हो जाएं तो ऐसे में फिर आप क्‍या करेंगे.

तो आज हम आपको कुछ ऐसे तरीक बताने जा रहे हैं, जो ट्रैवल या यात्रा करते समय आपके काफी काम आएंगी और आपकी फोटो हमेशा आपके पास सुरक्षित रहेंगी.

1. हमेशा ध्यान रखें कि आप फोटोज को सीधे मेमोरी कार्ड से न डिलीट करें. यदि आपको कुछ फोटोज डिलीट करनी हैं तो उन्हें कैमरे से हटाएं. ऐसा इसलिए कि ऐसा करने से आपके कैमरे के मेमोरी कार्ड में सेव हुई कॉपी फाइल्स सेफ ही रहेंगी, और आप उन तस्वीरों को ले पाएंगे.

2. ये बात हमेशा ध्यान रखें कि यात्रा के दौरान एक एक्स्ट्रा मेमोरी कार्ड हमेशा लेकर चलें. क्या पता कब आपको इसकी जरुरत पड़ जाए. आपका मेमोरी कार्ड कभी भी खराब हो सकता है, या फुल हो सकता है, इसलिए बेहतर यही होगा कि आपके पास एक अतिरिक्त मेमोरी कार्ड हो.

3. मेमोरी कार्ड को हमेशा उसके केस या कवर के साथ ही लेकर चलें, ऐसा करने से इससे मेमोरी कार्ड भी सुरक्षित रहता है.

4. आपके द्वारा ली गई फोटोज का हमेशा बैकअप बनाकर चलें. यदि कभी आप अपना कोई फोटो गलती से डिलीट भी कर दें तो इससे आपको पछताना नहीं पड़ेगा और बैकअप से आफ इस वापस पा लेंगे.

5. यदि फोटोज का बैकअप रखना आपके लिए मुश्किल होता हो तो आप उन्हें अपने पास क्लाउड स्टोरेज सिस्टम में भी सेव रख सकते हैं.

6. यदि किसी करणवश आपका तस्वीरों से भरा मेमोरी कार्ड करप्ट हो जाए तो आपके पास अपनी सारी चीजों को वापस पाने के लिए डेटा रिकवरी प्रोग्राम का भी एक विकल्प है. इसके जरिए आप अपने आसानी से अपने फोटोज वापस पा सकते हैं.

प्राण जाएं पर कीमत न जाए

 नई तकनीकों पर आधारित नई दवाओं और नए उपचारों से लाखों जानें तो बचाई जा रही हैं पर उन के बढ़ते दाम की चिंता की बात भी उठ रही है. सरकार ने डाक्टरों और अस्पतालों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है कि वे ओवर चार्ज न करें पर यह एक ऐसी समस्या है जिस का हल आसान नहीं है

नई दवाओं, नए उपचारों और जांच की नई मशीनों की कीमत वाकई बहुत ज्यादा है, क्योंकि इन को खोजने में बहुत समय, पैसा और शक्ति लगती है. कंपनियां वर्षों तक पहले जानवरों पर और फिर आदमियों पर इन का ट्रायल करती हैं. इस दौरान वैज्ञानिक वेतन व सुविधाएं तो पाते ही हैं, बहुत बार बीच में ही दवा या मशीन का विकास छोड़ना पड़ता है, जिस से लगाया गया पैसा बेकार जाता है. इस की कीमत असल में मरीज से ही वसूल की जा सकती है, क्योंकि दवा, उपचार या नई बनने वाली मशीन का लाभ तो मरीजों को ही मिलता है.

दुनिया भर के अस्पतालों का खर्चा भी बढ़ गया है. उन के भवन 5 सितारा होटलों की तरह होने लगे हैं ताकि एक तरफ इन्फैक्शन कम हो तो दूसरी ओर मरीजों और उन के रिश्तेदारों को यह न लगे कि वे किसी जेल में आ गए हैं, जहां से रास्ता केवल मृत्यु की ओर जाता है. अस्पतालों को चलाने के लिए हर जने का प्रशिक्षित होना जरूरी है और यह काम महंगा और धैर्य वाला होता है. दर्द से कराहते मरीजों को रोजरोज देखना और उन्हें मौत के मुंह से निकाल कर लाना आसान नहीं होता. डाक्टरों और सपोर्ट स्टाफ का मानसिक संतुलन भी बना रहे यह खर्चीला काम है.

भारत सरकार ने नैशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथौरिटी गठित की है, जो अस्पतालों के खर्चों पर नजर रखने के लिए बनाई गई है पर इस तरह की अंकुश रखने वाली एजेंसियां अस्पतालों का खर्च बढ़ाती हैं. उन्हें लगाई गई पूंजी पर तो लाभ कमाना ही है खर्च भी पूरे करने हैं. एजेंसियां यदि सख्त हुईं तो अस्पताल वे इलाज देंगे ही नहीं जो महंगे हैं पर जिन से जान बच सकती है. मरीजों की जेब तो बचेगी पर जान चली जाएगी.

इस का उपाय यह है कि सरकार जनता से जमा किए टैक्स से चिकित्सा मुफ्त उपलब्ध कराए पर यह फार्मूला दुनिया भर में असफल हुआ है. चूंकि इस में मरीज पैसा नहीं देता, इसलिए सरकारी अस्पताल या सरकार से पैसा पाने वाले निजी क्षेत्र के अस्पताल व डाक्टर लापरवाह हो जाते हैं. मरीज भी बेमतलब का इलाज कराने चले आते हैं.

आदमी की जान बहुत कीमती है पर इसे बचाने की कीमत भी बहुत है. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा सरकार ने इस की भरपाई करने की कोशिश की थी पर अब नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उसे खत्म कर रहे हैं. दुनिया भर के कई देशों में हैल्थ सेवाएं जो सरकारी थीं, धीरेधीरे गैरसरकारी बनाई जा रही हैं, जिस से मरीजों को इलाज कराना महंगा पड़ रहा है. पर इस का उपाय क्या है?

चिकित्सा का खर्च किसी को तो वहन करना ही होगा. मरीज करे तो अच्छा है. रैग्युलेटरी अथौरिटी हो पर रैग्युलेशन के नाम पर शोध का गला न घोट दिया जाए.

अब छूना है आसमान

‘ना’और ‘हां’ ये दोनों ऐसे शब्द हैं, जिन के प्रयोगमात्र से बिना किसी स्पष्टीकरण के मन की भावना को व्यक्त किया जा सकता है. लेकिन हमारे समाज ने भाषा को भी अपने सांचे में ढाल लिया है जैसे स्त्री की ना को हां ही माना जाता है. कहा जाता है कि लज्जावश स्त्री अपनी हां को हां नहीं कह पाती, इसलिए ना कहती है. दरअसल, उस ना का अर्थ हां ही है और जब स्त्री किसी बात का समर्थन कर हां कहती है, तो उसे अनेक उपनामों जैसे घमंडी, मौडर्न, बेहया आदि कहा जाता है. पर पुरुष की हां या ना को ले कर ऐसी कोई कहावत नहीं है. मतलब समाज में भाषा भी पितृसत्तात्मक संपत्ति है.

हिंदी सिनेमा कभी इस बात से अछूता नहीं रहा. सिनेमा, सीरियल, समाचार, विज्ञापन आदि हर जगह स्त्री आज या तो चमत्कारिक उत्तेजना को प्रस्तुत करती नजर आ रही है या फिर लाचारी. लेकिन जीवन न तो चमत्कार से चलता है और न ही लाचारी से. मध्यमार्ग को ले कर चलने वाली स्त्रियों का जीवन असल में स्त्री विमर्श की भारीभरकम परिभाषाओं के नीचे दब गया है.

स्त्री विमर्श के अंतर्गत कहा जाता है, ‘‘पूरा आसमान स्त्री का है. उसे सब अधिकार मिलने चाहिए. सैक्स से ले कर छोटे कपड़े पहनने तक का अधिकार.’’

कब्जा नहीं अधिकार

मगर पूरा आसमान कभी किसी का नहीं हो सकता. आसमान में उड़ने वाले परिंदों को भी जमीन पर उतरना ही पड़ता है. फिर स्त्री हो या पुरुष कैसे पूरे आसमान पर कब्जा कर सकते हैं? लेकिन यहां बात कब्जे की नहीं, बल्कि अधिकार की है. कम से कम आसमान में उड़ने की आजादी तो होनी ही चाहिए स्त्रियों को.

आज शहरी जिंदगी में स्त्रीपुरुष का चुनाव, उन का मतभेद, टूटते परिवार, स्थायित्व की कमी जैसी अनगिनत समस्याएं हैं. अगर गांवों की बात करें, तो आज भी लड़कियां वहां मौडर्न होने की कोशिश ही कर रही हैं. पर अपने पुराने आवरण को अभी भी उतार फेंकने में नाकामयाब हैं. साथ ही वे आज तक यह नहीं समझ पाईं कि आधुनिक बनने के लिए उन्हें कितना आगे बढ़ना है और घरगृहस्थी चलाने के लिए कितना पीछे हटना है, क्योंकि इस तरह का कोई व्यावहारिक ज्ञान तो उन्हें कहीं भी नहीं मिलता. मां अपने हाथों से बेटी को खूंटे से बंधी गाय बनाती है. यदि पुरुष रो दे, तो वह हंसी का पात्र है और यदि स्त्री की आंखों से आंसू नहीं निकले तो वह स्त्री कहलाने योग्य नहीं रहती. वह बेहया है.

यह ऐसा समाज है जहां स्त्री के कौमार्य परीक्षण का दायित्व सफेद चादर को मिलता है और पहली रात बिल्ली मार लेने वाली कहावत को पढ़ेलिखे लोग भी समर्थन प्रदान करते हैं. ऐसे समाज में बलात्कार, मादा भू्रणहत्या, दहेज उत्पीड़न, तेजाबी हमला जैसे घटिया कांड नहीं होंगे तो क्या होगा?

महज चोचलेबाजी

कैसे, कब, कहां, कितना हंसना, रोना, गाना है इत्यादि सब मातापिता अपनी बेटियों को सिखाते हैं, लेकिन यही बातें हम बेटों को सिखाना भूल जाते हैं. जब कभी घर में मेहमानों का आगमन होता है, तो लड़की से कहा जाएगा पानी लाने को, बेटे से नहीं. क्यों? अति सभ्य, सुशिक्षित पुरुषों को आज भी इस बात का ज्ञान

है ही नहीं कि बंदर की तरह खुजलाने और मनुष्य की तरह खुजलाने के बीच का अंतर क्या है? पत्नी, बेटी, मां, घर का कोई भी सदस्य पानीखाना कुछ भी दे तो उन्हें धन्यवाद कहना, उन के प्रति हमारे प्रेम सम्मान आदि को दर्शाता है. लेकिन नहीं ये सब तो हमारी मानसिकता के अनुसार चोचलेबाजी है.

दूसरी ओर सिनेमा जगत हो या विज्ञापन यहां औरत को एक उत्पादकता के रूप में ही पेश किया जाता है, जहां वह सिर्फ बाजार के एक प्रोमोटर के रूप में मौडल बन कर रह गई है.

स्त्री अपने व्यक्तित्व को जीती है

बाजार स्त्रियों को फिल्मों के माध्यम से आजादी तो दे रहा है, परंतु वह सिर्फ देह के प्रति लाज का भाव दूर करने तक सीमित है. दरअसल, सिनेमा का संसार भी पुरुष वर्चस्व वाला संसार है. यह वर्चस्व उन के संख्या बल के कारण नहीं, बल्कि सिनेमा के संसार में जारी मूल व्यवस्था के कारण है. अगर हम शुरू से देखें तो अब तक के नारी जीवन के सफर की कहानी साफ आईने सी दिखती है. हिंदी फिल्मों में भी प्रारंभ से अब तक नारी के कई चित्र उभर कर आते हैं, जिन में कहीं मां, बहन, पत्नी, कार्यकर्ता आदि के रूप में दिखती है, तो कहीं सशक्त लड़ती हुई दिखाई पड़ती है. कहीं वह आसमान छू लेना चाहती है. यही नहीं, कहींकहीं तो वह अबला भी प्रतीत होती है.

जब सिनेमा शुरू ही हुआ था तब भारतीय समाज में व्याप्त नारी जीवन की परेशानियों को ले कर कई फिल्में बनाई गईं, जिन में ‘दुनिया न माने’ (1937), ‘अछूत कन्या’ (1936), ‘आदमी’ (1939), ‘देवदास’ (1935) आदि कुछ फिल्में हैं. इस तरह की फिल्मों में नारी जीवन से संबंधित जिन समस्याओं को उजागर किया गया उन में ‘बाल विवाह’, ‘अनमेल विवाह’, ‘अशिक्षा’, ‘परदा प्रथा’ आदि थीं.

50 और 60 के दशक में विमल, गुरुदत्त और राजकपूर जैसे फिल्मकारों ने नारी के कई रूप जैसे पत्नी, मां, प्रेमिका का सही चित्र प्रस्तुत किया, जिस ने यह साबित किया कि किस तरह स्त्री अपने व्यक्तित्व को जीती है.

70 से 90 के दशक में स्त्री पक्ष को ले कर गजब का बदलाव आया. इन दशकों में बहुत सी फिल्में आईं जैसे ‘अनुभव’, ‘गृहक्लेश’, ‘श्रीमानश्रीमति’ आदि. इन फिल्मों में नारी के नौकरी करने, उस के विदेशी संस्कृति को अपनाने आदि रवैए को भी दिखाया गया.

नई परिभाषा

वहीं केतन मेहता की ‘मिर्च मसाला’ फिल्म में नारी उभर कर समाज की नारियों में जागृति लाने का काम करती है. इस ने समाज में पल रही नारीवादी विचारधारा को भी तोड़ा कि  नारी सिर्फ घर की चारदीवारी में रह कर घर का कामकाज और बच्चों को पालने के लिए होती है.

1993 में जब ‘दामिनी’ फिल्म आई तब उस में नारी एक सशक्त चरित्र के रूप में उभर कर आई, जो अपने पति से अलग रह कर भी समाज में हो रहे अत्याचार के विरुद्ध खड़ी होती है, बेबाक हो कर हाथ में कुदाल ले कर गुंडों का सामना करती है. वहीं ‘सलाम नमस्ते’ फिल्म में लिव इन रिलेशनशिप के मुद्दे को उठाया गया, जिस में स्त्री पुरुष की ही भांति स्वतंत्रता चाहती है. वह प्रेम सूत्र में बंधना तो चाहती है, परंतु स्वतंत्र रूप में.

उस के बाद 21वें दशक में कई ऐसी फिल्में आईं जैसे ‘नो वन किल्ड जैसिका’, ‘बैंड बाजा बरात’, ‘अनजानाअनजानी’, ‘पा’, ‘पीकू’ आदि ने नारी के नए चरित्रों को नया आयाम और नई परिभाषा दी.

विचारधारा में बदलाव

 ‘पिंक’ फिल्म की नायिकाएं चमत्कारिक स्त्रियां नहीं दिखतीं, तो लाचार भी नहीं पर उन्हें अपने स्त्रीत्व पर गर्व है. इस फिल्म ने एक अहम मुद्दा यह भी उठाया कि स्त्री के चरित्र को नापने का पैमाना वस्त्र या पुरुषों से मिलाना नहीं होना चाहिए. कहीं न कहीं समाज में स्त्रियों के चरित्रों, उन की वेदनाओं, भावों का दोहन आज भी हो रहा है.

भारत में आज भी 50% औरतें गांव के परिवेश की हैं, जहां सुविधाओं की कमी है और इस के लिए हमारा घरपरिवार, समाज, मीडिया आदि ही जिम्मेदार हैं. वैसे तो समाज में कई तरह के परिवर्तन समयसमय पर आए, जिन्होंने सामाजिक धरातल पर लड़कियों और औरतों संबंधी विचारधारा को बदला.

पहले अपने जीवन में जहां स्त्री सिर्फ घर तक सीमित थी, अब वह बाहर निकल कर मीडिया, प्रबंधन, चिकित्सा, खेलकूद, राजनीति, कानून, मार्केटिंग, बैंकिंग, सिनेमा आदि हर क्षेत्र में अपने पांव फैला चुकी है. यही नहीं उस ने नए विचारों का आदानप्रदान भी किया.

बढ़ता दायरा

अब लड़कियां एवं औरतें विभिन्न क्षेत्रों में पदार्पण करने लगी हैं. शादी या पारिवारिक मामलों में उन की राय बदलने लगी है. अब वे अपना कैरियर अपनी इच्छानुसार बनाना चाहती हैं. अपने डिसीजन खुद लेना चाहती हैं. वे

पुरुषों की भांति अपनी पहचान बनाना चाहती हैं. अब वे अपना जीवन खुल कर जीती हैं, बिना इस बात की परवाह किए कि लोग क्या कहेंगे. उन की सीमाएं सिमटी नहीं हैं, बल्कि विस्तृत हो गई हैं, इसलिए औरतों को बुनियादी सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकारों पर हिस्सेदारी मिलनी ही चाहिए.

वैसे तो आज भी स्त्री समाज के लिए भोग्या ही है, सब को याद भी रखना है कानून सजा दे सकता है लेकिन कानून किसी भी जुर्म को खत्म नहीं कर सकता. हमारी मानसिकता और घरपरिवार से शुरू होने वाले प्रयास ही समाज को बदल सकते हैं, बदलते कानूनों को सार्थक बना सकते हैं.

सपने पूरे हो सकते हैं

 

‘‘यह सही है कि आज की महिलाएं पुरुषों के कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं और सफल हैं. मगर पुरुष मानसिकता अब भी उन्हें अपने पीछे ही देखना चाहती है. हर स्त्री के सपने पूरे हो सकते हैं, बशर्ते वह समाज में व्याप्त रुढिवादी परंपराओं से बाहर निकले. महिलाओं को अंधविश्वास से भी बाहर निकल कर वैज्ञानिक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए.’’

– मनी बंसल, जिला उपाध्यक्ष, भाजपा महिला मोरचा, उत्तर पूर्व दिल्ली

 

बराबरी का दर्जा मिले

‘‘सामाजिक उत्थान में महिलाओं का बराबरी का योगदान है, मगर पुरुष वर्ग इस बात को स्वीकार नहीं करता. आज भी महिलाओं को पुरुषों की तरह बराबरी के अवसर नहीं मिल पाते. जो महिलाएं आज किसी मुकाम तक पहुंच चुकी हैं, उन्हें भी अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ता है. इस में कोई दोराय नहीं कि महिलाएं पुरुषों को हर क्षेत्र में कड़ी टक्कर दे रही हैं, पर यहां बात महिलाओं को पुरुषों से आगे बढ़ाने की नहीं, बल्कि बराबरी का दर्जा देने की है.’’

– स्वाति बेडकर, सोशल ऐंटरप्रेन्योर, साइंस ऐक्टिविस्ट

 

जब दोस्त दोस्त न रहा

उड़ीसा के रहने वाले 25 साल के कुमार मांझी की अपने से 10 साल बड़े सीतापुर निवासी पूरन से गहरी दोस्ती थी. दोनों साथ मिल कर कोई छोटामोटा काम करते और जो कमाते, उसी से गुजरबसर करते थे. इन के परिवार भी थे, लेकिन दोनों ही घर वालों के साथ नहीं रहते थे. ये दिन भर में जो कमाते थे, शाम को सीतापुर रोड पर कूड़ाखाना के पास स्थित देशी शराब के ठेके पर जा कर शराब में उड़ा देते थे.

मांझी और पूरन की दोस्ती इतनी गहरी थी कि दोनों को ही एकदूसरे के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता था. यहां तक कि उन्हें परिवार की भी कमी नहीं खलती थी. दोनों की उम्र में 10 साल का अंतर था, लेकिन वे लगते हमउम्र थे. इन की गहरी दोस्ती होने की वजह यह थी कि दोनों ही आपस में एक जैसा व्यवहार करते थे. दोनों की पसंद भी एक जैसी थी.

कई बार मांझी और पूरन के अन्य साथी इन के साथ रहना चाहते या बात करना चाहते तो दोनों ही उन से कन्नी काट लेते थे. दोनों ही पक्के शराबी थे. बिना शराब के वे एक भी दिन नहीं रह सकते थे. लेकिन शराब पीने के बाद अकसर दोनों में लड़ाई हो जाती थी. कई बार मारपीट भी हो जाती थी, इस के बावजूद दोनों देर तक एकदूसरे से अलग नहीं रह पाते थे.

रात में लड़ाई होती थी तो सवेरा होतेहोते सब ठीक हो जाता था. यह देख कर उन के अन्य दोस्त कहते भी थे कि मांझी और पूरन कब लड़ते हैं, पता ही नहीं चलता, सवेरे दोनों का चायनाश्ता एक साथ होता है. इस के बाद वे साथसाथ ही काम पर जाते थे.

पूरन और कुमार मांझी ने उस रात भी जम कर शराब पी थी. इस के बाद दोनों में लड़ाई शुरू हो गई. बात बढ़ी तो पूरन ने कहा, ‘‘मांझी, तू कभी पैसे खर्च नहीं करता. हमेशा मेरे पैसे ही खर्च कराता है.’’

‘‘हमारे बीच पैसा आ गया, इस का मतलब हमारी दोस्ती खतम.’’ मांझी ने कहा.

‘‘भई, दोस्ती रहे या खतम हो जाए, हम इस बारे में कुछ नहीं जानते. हम तो यह जानते हैं कि पैसे का सही से हिसाब होना चाहिए. पिछली बार के 100 रुपए अभी तक तुम ने नहीं दिए हैं.’’ पूरन ने कहा.

‘‘लेकिन मैं ने तो कई बार पैसे खर्च किए हैं, उन का क्या होगा?’’ मांझी ने कहा.

इस के बाद उन के बीच बात बढ़ गई. दोनों ही नशे में थे. ऐसे में आगापीछा सोचे बगैर आपस में हाथापाई करने लगे. मारपीट में उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि वे क्या कर रहे हैं. मांझी ज्यादा नशे में था, इसलिए पूरन ने उसे पीट दिया. मारपीट कर के पूरन बैठ गया. नशे की वजह से उसे झपकी आ गई.

नशा कम होने पर मांझी थोड़ा होश में आया तो उसे याद आया कि पूरन ने उसे मारा था. उसे गुस्सा आ गया और ईंट उठा कर उस ने पूरन के सिर पर दे मारी. तब उसे इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि इस से पूरन मर भी सकता है.

रात में दोनों रघुवर पैलेस के पास खाली प्लौट में बैठे थे. सवेरे 4 बजे कुमार मांझी इंजीनियरिंग कालेज चौराहे पर स्थित अनिल की दुकान पर पहुंचा. दोनों अकसर यहीं चायनाश्ता करते थे. कुमार के कपड़ों में खून लगा देख कर अनिल ने पूछा, ‘‘तेरे कपड़ों में खून कहां से लगा, पूरन कहां गया?’’

मांझी ने कहा, ‘‘कल रात पूरन से सौ रुपए को ले कर लड़ाई हो गई थी. वह मुझे बेईमान कह रहा था. जब मैं ने उसे सच बताया तो वह झगड़ा करने लगा. झगड़ा ज्यादा बढ़ा तो मैं ने ईंट से मार कर उस की हत्या कर दी. लेकिन अनिल भाई, अब मुझे अपनी गलती का अहसास हो रहा है. उस की मौत का मुझे पछतावा हो रहा है.’’

उस से कुछ कहने के बजाय अनिल ने उसे दुकान पर बैठा दिया और पुलिस को सूचना देने के लिए फोन करने लगा. लेकिन दूसरी ओर से फोन उठा ही नहीं. करीब 7 बजे अनिल ने रघुवर पैलेस के मैनेजर वीरेंद्र को घटना की सूचना दी तो वीरेंद्र ने जानकीपुरम थाने में तैनात सबइंसपेक्टर को फोन कर के इस बात की जानकारी दे दी.

इस के बाद 9 बजे पुलिस मौके पर पहुंची और लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस में पुलिस को कुछ समय लग गया. तब तक कुमार मांझी को पूरी तरह होश आ गया था. होश में आने के बाद उसे पता चला कि मामला पुलिस तक पहुंच गया है तो पुलिस की मार की डर से वह कांपने लगा.

दोस्त की हत्या के साथसाथ पुलिस की मार का डर उसे सताने लगा. वहां मौजूद लोगों ने जब उसे बताया कि हत्या के बाद फांसी हो सकती है तो वह काफी डर गया. हत्या के आरोप में मिलने वाली सजा के डर से वह जंगल की ओर भागा.

अनिल ने मांझी को भागते देखा तो उसे पकड़ने के लिए शोर मचाने लगा. आसपास के लोगों ने उस का पीछा किया. लेकिन तब तक वह गुडंबा के जंगल में घुस गया, जहां एक पेड़ के पीछे छिप गया. पुलिस अन्य लोगों को साथ मिल कर मांझी की तलाश करती रही. करीब आधे घंटे की मशक्कत के बाद मांझी को पकड़ लिया गया और थाने लाया गया.

थाना जानकीपुरम के थानाप्रभारी इंसपेक्टर सतीश सिन्हा ने बताया कि अपने दोस्त की हत्या के आरोप में पकड़े गए कुमार मांझी ने स्वीकार कर लिया है कि सौ रुपए के विवाद में उस ने दोस्त की हत्या को अंजाम दिया था.

शुक्रवार की रात कुमार मांझी से मृतक पूरन ने सौ रुपए उधार मांगे थे. पैसे न होने पर कुमार ने देने से मना कर दिया, जिसे ले कर दोनों के बीच कहासुनी हो गई. बात हाथापाई तक पहुंच गई. मारपीट के दौरान कुमार ने ईंट से पूरन के सिर पर कई वार कर दिए, जिस से उस की मौके पर ही मौत हो गई.

मांझी और पूरन की दोस्ती पर शराब का नशा भारी पड़ा. अगर दोनों शराब न पीते होते तो सौ रुपए जैसी मामूली रकम के लिए मांझी अपने सच्चे दोस्त की हत्या कतई नहीं कर सकता था. पूछताछ के बाद पुलिस ने कुमार मांझी को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. 

– कथा पुलिस और पब्लिक से मिली जानकारी के आधार पर

मां बेटी का खूनी खेल

8 नवंबर, 2016 को किसी ने राजस्थान के बाड़मेर जिले के थाना पचपदरा पुलिस को फोन कर के सूचना दी कि मंडापुरा साजियाली फांटा के पास सड़क किनारे झाडि़यों में एक लाश पड़ी है. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी जयकिशन सोनी पुलिस टीम के साथ सूचना में बताई गई जगह पर पहुंच गए.

वहां बबूल की झाडि़यों में 25-26 साल के एक युवक की लाश पड़ी थी. उस के गले में रस्सी का फंदा लगा था. इस से यही लग रहा था कि उस की हत्या रस्सी से गला घोंट कर की गई थी. लाश के पास किसी आदमी के पैरों के निशान के साथ मोटरसाइकिल के टायरों के भी निशान थे.

पुलिस ने वहां पर मौजूद लोगों से लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की, पर मृतक को कोई भी पहचान नहीं सका. थानाप्रभारी ने अज्ञात युवक की लाश मिलने की सूचना बाड़मेर के एसपी डा. गगनदीप सिंगला और बालोतरा के एडिशनल एसपी कैलाशदान रतनू को भी दे दी थी.

कुछ ही देर में एसपी और एडिशनल एसपी भी मौके पर पहुंच गए. लाश का निरीक्षण कर उन्होंने भी वहां मौजूद लोगों से बात की. इस के बाद दोनों पुलिस अधिकारी थानाप्रभारी जयकिशन सोनी को जरूरी दिशानिर्देश दे कर चले गए. अधिकारियों के जाने के बाद थानाप्रभारी ने लाश का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए बालोतरा के सरकारी अस्पताल भिजवा दिया.

लाश की शिनाख्त जरूरी थी, इसलिए पुलिस अधिकारियों ने सलाहमशविरा कर के लाश के फोटो वाट्सएप ग्रुप में शेयर कर लोगों से शिनाख्त की अपील की. पुलिस की यह तरकीब काम कर गई और किसी ने उस की शिनाख्त कर दी. उस का नाम गोमाराम था और वह थाना धोरीमन्ना के गांव कोठाला के रहने वाले गुमानाराम का बेटा था.

जयकिशन सोनी ने गुमानाराम को बुलवाया तो उन्होंने बालोतरा अस्पताल जा कर लाश देखी और उस की शिनाख्त अपने बेटे गोमाराम के रूप में कर दी. शिनाख्त हो गई तो पोस्टमार्टम के बाद लाश घर वालों को सौंप दी गई. घर वालों ने पुलिस को बताया कि गोमाराम की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. इस से मामला और पेचीदा हो गया. पुलिस ने हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर केस की जांच शुरू कर दी.

एसपी डा. गगनदीप सिंगला ने इस केस को सुलझाने के लिए 2 पुलिस टीमें बनाई. पहली टीम में थाना नागाणा के थानाप्रभारी देवीचंद ढाका, एसपी (स्पेशल टीम) कार्यालय से भूपेंद्र सिंह तथा ओमप्रकाश और दूसरी टीम में कल्याणपुर के थानाप्रभारी चंद्र सिंह व उन के थाने के तेजतर्रार सिपाहियों को शामिल किया.

दोनों टीमों का निर्देशन एडिशनल एसपी कैलाशदान रतनू कर रहे थे. पुलिस ने मृतक के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि बाटाड़ू गांव का एक लड़का मृतक के साथ आताजाता रहता था. 2 महीने पहले वह गांव लुखू स्थित मृतक की ससुराल भी गया था.

उस युवक की पहचान गंगाराम निवासी दुर्गाणियों का तला, थाना लुंदाड़ा गिड़ा, के रूप में हुई. पुलिस ने 13 नवंबर, 2016 को उसे जोधपुर से धर दबोचा. थाने ला कर उस से पूछताछ की गई तो सारा सच सामने आ गया.

उस ने बताया कि गोमाराम की हत्या में उस की पत्नी वीरो और सास जीतो भी शामिल थीं. पुलिस ने 14 नवंबर की सुबह उन दोनों को भी गिरफ्तार कर लिया. तीनों से पूछताछ के बाद गोमाराम की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

राजस्थान का बाड़मेर जिला जाट बाहुल्य है. यहां के लोगों का मुख्य पेशा खेतीकिसानी है. पहले राजस्थान में बालविवाह का प्रचलन था. दादादादी अथवा नानानानी की मौत होने पर मौसर (मृत्युभोज) की कड़ाही पर नन्हें बच्चों का बालविवाह करने की परंपरा थी.

अक्षय तृतीया को भी हजारों की संख्या में बालविवाह किए जाते थे. इसी जिले के गांव कोठाला के रहने वाले गोमाराम का भी 15-16 साल पहले लुखू गांव के श्रवणराम चौधरी की बेटी के साथ बालविवाह हुआ था. उस समय वीरो की उम्र 4 साल थी, जबकि गोमाराम 10 साल का था.

घर वालों ने गुड्डेगुडि़यों के खेल की तरह छोटी सी उम्र में इन दोनों की शादी कर दी थी. इस से पहले गोमाराम की शादी अपनी ही बिरादरी की एक लड़की के साथ हो गई थी, पर गौना होने से पहले ही उस की बीवी टांके में डूब कर मर गई थी. राजस्थान में अंडरग्राउंड बने पानी के टैंक को टांका कहते हैं.

वक्त के साथ गोमाराम और वीरो जवान हो गए. दोनों ने घर वालों से सुन रखा था कि उन की बचपन में ही शादी हो चुकी है. गोमाराम ने स्कूली पढ़ाई के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी, जबकि वीरो जब 10वीं कक्षा में पढ़ रही थी, तभी उस का गौना गोमाराम से कर दिया गया था.

वीरो ने अपने वैवाहिक जीवन को ले कर कई रंगीन ख्वाब देखे थे, मगर गौने के बाद जब गोमराम से उस का सामना हुआ तो उस के ख्वाब टूट गए. किसी सुंदरस्वस्थ युवक के बजाय उस का पति दुबलापतला और शराबी था. चूंकि उस के साथ उस की शादी हो चुकी थी, इसलिए निभाना उस की मजबूरी थी.

गोमाराम हर समय शराब के नशे में डूबा रहता था. पत्नी से जैसे उसे कोई लगाव ही नहीं था. वह तो केवल शराब को अपनी जरूरत समझता था. नईनवेली दुलहन का दुखसुख पूछना तो दूर, वह उस से रात में भी बात नहीं करता था. शराब पी कर वह बिस्तर पर एक तरफ लुढ़क जाता था.

गौने के कुछ दिनों बाद ससुराल से वीरो जब मायके आई तो उस ने अपना दुखड़ा अपनी मां जीयो से कह सुनाया. उस ने साफसाफ कहा कि ऐसे शराबी के साथ वह जिंदगी कैसे गुजारेगी. बेटी की व्यथा सुन कर जीयो को भी महसूस हुआ कि बचपन में गोमाराम के साथ बेटी की शादी कर के उस ने बड़ी गलती की थी.

मां ने उसे दिलासा दी कि वक्त के साथ सबकुछ ठीक हो जाएगा. गौने के बाद वीरो स्कूल की गर्मियों की छुट्टियों में ससुराल गई. मगर पति की शराब की आदत में कोई सुधार नहीं आया. गौने के डेढ़ साल तक वह ससुराल में रही. उस ने अपने प्यार से पति का दिल जीतना चाहा, पर पति पर इस का कोई फर्क नहीं पड़ा.

वीरो ने मायके आ कर मां को सारी बातें बताईं तो बेटी का दुख देख कर जीयो को बड़ा झटका लगा. गोमाराम जोधपुर शहर की एक फैक्ट्री में नौकरी करता था. उस के साथ गंगाराम और उस का भाई चूनाराम भी काम करते थे. तीनों आपस में अच्छे दोस्त थे.

गोमाराम अपनी ज्यादातर कमाई शराब पर उड़ा देता था. वहीं गंगाराम और चूनाराम शराब को हाथ तक नहीं लगाते थे. वे अपनी तनख्वाह बचा कर रखते थे.  गोमाराम की बीवी वीरो पिछले 6 महीने से मायके में थी. गोमाराम कभीकभी उस से फोन पर बातें कर लेता था. वह उस से आने को कहती तो वह पैसे न होने का बहना कर देता. उस के पास पैसे होते भी कहां से, क्योंकि वह सारे पैसे शराब में उड़ा देता था.

एक बार पैसे न होने पर गोमाराम ने अपना मोबाइल चूनाराम को बेच दिया. चूनाराम ने वह मोबाइल अपने भाई गंगाराम को दे दिया. वीरो को यह बात पता नहीं थी, इसलिए जब उस ने पति को फोन किया तो फोन गंगाराम ने रिसीव किया. वीरो ने पूछा, ‘‘कैसे हो?’’

‘‘मैं तो ठीक हूं. तुम कैसी हो?’’ गंगा ने पूछा.

उस की आवाज सुन कर वीरो चौंकी, क्योंकि एक तो वह आवाज उस के पति की नहीं थी, दूसरे पति ने कभी उस से इतनी तमीज से बात नहीं की थी. उस ने कहा, ‘‘यह नंबर तो गोमाराम का है, आप कौन बोल रहे हैं?’’

‘‘मैं गोमाराम का दोस्त गंगाराम बोल रह हूं. उन का फोन मैं ने ले लिया है. आप इसी नंबर पर फोन करना, मैं गोमा से बात करा दूंगा.’’

‘‘बात क्या करनी है, उन्हें तो शराब पीने से ही फुरसत नहीं है. उन के लिए कोई मरे या जिए, उन्हें किसी से कोई मतलब नहीं है.’’ वीरो ने लंबी सांस ले कर कहा. 

‘‘आप सही कह रही हैं, उसे सचमुच किसी की परवाह नहीं है. आप को मायके गए कितने दिन हो गए, मिलने तक नहीं जाता. पता नहीं कैसा आदमी है. दिनरात शराब में मस्त रहता है.’’

‘‘बिलकुल सही कह रहे हैं आप.’’ वीरों ने लंबी सांस ले कर कहा.

इस बातचीत से गंगाराम समझ गया कि वीरो अपने पति से खुश नहीं है. इसलिए जब भी वीरो उस से बात करती, वह उस से बड़ी तहजीब से बातें करता.

गंगाराम की यही आदत वीरो को भा गई. वह अकसर उस से मोबाइल पर बातें करने लगी. उसे गंगारम ने बताया कि उस का बचपन में बालविवाह हुआ था. वीरो जब भी गंगाराम से बातें करती, उसे अपनेपन का अहसास होता.

थोड़े दिनों तक फोन पर होने वाली बातों से दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित हो गए. वीरों ने अपनी मां जीयो को भी गंगाराम के बारे में बता दिया. जीयो ने भी गंगाराम से बात की. उसे भी गंगाराम का व्यवहार सही लगा. इस के बाद जीयो ने गंगाराम से कहा कि गोमाराम के साथ उस की बेटी खुश नहीं है. अगर वीरो का उस से तलाक हो जाए तो नाताप्रथा के तहत वह बेटी का ब्याह उस के साथ कर देगी.

इस बात से गंगाराम का दिल बागबाग हो उठा. वीरो ने भी गंगाराम से कहा कि वह गोमाराम का दोस्त है, उसे तलाक के लिए मनाए. एक दिन गोमा जब शराब के नशे में धुत था तो गंगाराम ने उस से कहा, ‘‘तुम वीरो का जीवन क्यों बरबाद कर रहे हो. उसे तलाक दे दो.’’

‘‘तलाक… मैं उसे इस जनम में तो तलाक नहीं दूंगा. वह अपने आप को बहुत सुंदर और होशियार समझती है. मुझे शराबी, निकम्मा और न जाने क्याक्या कहती है. इसलिए जीते जी मैं उसे तलाक नहीं दे सकता. वह शादीशुदा हो कर भी विधवा की तरह जीती रहे. बस मैं यही चाहता हूं?’’ गोमाराम ने कहा.

गंगाराम ने यह बात जब वीरो को बताई तो उस ने अपनी मां से बात की. इस के बाद उन्होंने गंगाराम को अपने गांव लुखू बुलाया. यह 2 महीने पहले की बात है. गंगाराम अपनी प्रेमिका वीरो से मिलने लुखू पहुंच गया. वहां पर गंगाराम और वीरो ने एकदूसरे को देखा.

दोनों ने एकदूसरे को पसंद कर लिया. बस फिर क्या था, मांबेटी ने गंगाराम से कहा कि वह गोमाराम से वीरो का तलाक करवा दे. अगर वह तलाक के लिए राजी न हो तो उसे रास्ते से हटा दे. गंगाराम को भी उन की बात पसंद आ गई.

गंगाराम गोमाराम को रास्ते से हटाने का मौका तलाशने लगा. वीरो और उस की मां की गंगाराम से अकसर मोबाइल पर बातें होती रहती थीं. दोनों उसे उकसाती रहती थीं कि जल्द से जल्द गोमाराम का पत्ता साफ करे. गंगाराम भी इसी धुन में था, मगर मौका नहीं मिल रहा था.

गोमाराम ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की बीवी और सास उस की हत्या का तानाबाना बुन रही हैं. वह तो अपनी मस्ती में मस्त था. आखिर 7 नवंबर, 2016 को गंगाराम को उस समय मौका मिल गया, जब दिन में ही गोमाराम उसे शराब के नशे में धुत मिल गया. इस मौके को भला वह हाथ से क्यों जाने देता.

उस ने रात होने का इंतजार किया. रात करीब 8 बजे गंगाराम ने अपनी मोटरसाइकिल पर गोमाराम को बिठाया और गांव चलने को कहा. गोमाराम उस मना नहीं कर सका. बालोतरा रोड पर मोटरसाइकिल पहुंची तो रास्ते में भांडू गांव के ठेके से गंगाराम ने शराब की बोतल खरीद कर गोमाराम को दी. एक जगह बैठ कर वह उसे पी गया. इस के बाद दोनों ने कल्याणपुर के एक ढाबे पर खाना खाया.

गंगाराम को लग रहा था कि गोमाराम अभी भी होश में है. उस ने पचपदरा में जोधपुर रोड पर उसे फिर शराब पिलाई. इस से उसे गहरा नशा हो गया. मोटरसाइकिल के पीछे बैठ कर वह लहराने लगा. गंगाराम इसी मौके की ताक में था. वह गोमा को मोटरसाइकिल से उतार कर बबूल की झाडि़यों के बीच ले गया और वहीं उस का गला दबा कर मार डाला. लाश को वहीं पड़ी छोड़ कर वह मोटरसाइकिल से जोधपुर चला गया.

गंगाराम ने गोमाराम की हत्या करने की बात वीरो तथा जीयो को बता दी थी. वीरो खुश थी कि अब गंगाराम से वह नाता के तहत ब्याह कर लेगी. गंगाराम भी यही सोच रहा था. मगर पुलिस ने उन के मंसूबों पर पानी फेरते हुए 5 दिनों में इस हत्याकांड का खुलासा कर दिया.

 पूछताछ के बाद पुलिस ने 16 नवंबर, 2016 को तीनों को पचपदरा की कोर्ट में पेश किया, जहां से वीरो और जीयो को केंद्रीय कारागार जोधपुर और गंगाराम को बालोतरा जेल भेज दिया गया. क्योंकि बालोतरा जेल में महिलाओं को रखने की जगह नहीं है. इस मामले में भी वही हुआ, जो ऐसे मामलों में होता है. थानाप्रभारी जयकिशन सोनी इस मामले की जांच कर रहे हैं.       

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बेमेल प्यार

तबरेज इलाहाबाद के विवेकानंद मार्ग पर चमेलीबाई धर्मशाला के पास स्थित प्रभात सिंह की मशीनरी पार्ट्स की दुकान पर नौकरी करता था. वह रोजाना सुबह 10 बजे के करीब दुकान पर पहुंचता तो कुछ देर बाद प्रभात भी वहां पहुंच जाता था. इस के बाद ही तबरेज दुकान खोल कर उस की साफसफाई करता था. 30 नवंबर, 2016 को भी जब तबरेज निर्धारित समय पर दुकान पर पहुंचा तो दुकान का शटर खुला मिला. यह देखते ही उस के मुंह से निकला, ‘‘लगता है भैया आज सुबहसुबह ही दुकान आ गए हैं.’’

लेकिन जब दुकान के भीतर गया तो वहां प्रभात नहीं दिखा. वह मन में बुदबुदाने लगा, ‘‘ऐसे दुकान खोल कर कहां चले गए भला?’’

दुकान के अंदर आड़ातिरछा रखा सामान निकाल कर उस ने दुकान के बाहर लगा दिया. फिर दुकान की साफसफाई कर के वह दुकान में बैठ कर प्रभात के लौटने का इंतजार करने लगा. आधे घंटे से ज्यादा बीत गया पर प्रभात नहीं लौटा तो तबरेज पास की दुकान पर चाय पीने चला गया. प्रभात का जिनजिन दुकानों पर उठनाबैठना था, तबरेज वहां भी गया पर उसे उस का मालिक दिखाई नहीं दिया तो बुदबुदाते हुए वह वापस दुकान पर आ कर बैठ गया.

उसी समय चित्रा दौड़ती हुई बदहवास सी दुकान पर आई. जिस मकान में प्रभात की दुकान थी, चित्रा उसी मकान मालिक सत्येंद्र सिंह की बेटी थी. उस के साथ उस का चचेरा भाई गोलू भी था. वह बोली, ‘‘त…तब… तबरेज…’’

‘‘हां बताओ, तुम इतनी घबराई हुई क्यों हो?’’

‘‘बात ही कुछ ऐसी है. आओ मेरे साथ, खुद ही चल कर देख लो.’’

किसी अनहोनी की आशंका के साथ तबरेज चित्रा और गोलू के पीछेपीछे उस के घर पहुंच गया. घर दुकान के एकदम पीछे ही था. जैसे ही वह कमरे में पहुंचा तो उस का मालिक प्रभात फांसी के फंदे पर झूला हुआ दिखा. यह देख कर उस की चीख निकल गई, ‘‘यह कैसे हो गया?’’

तभी चित्रा बोली, ‘‘पता नहीं, इन्होंने आत्महत्या क्यों कर ली? इन के हाथ में सुसाइड नोट भी है. तबरेज तुम इन के घर वालों को फोन कर के जानकारी दे दो.’’

तबरेज ने तुरंत अपने मोबाइल से प्रभात के पिता वीरेंद्र प्रताप सिंह को फोन कर के उस की आत्महत्या की जानकारी दे दी. प्रभात का घर वहां से कुछ ही दूरी पर था इसलिए थोड़ी ही देर में वीरेंद्र प्रताप सिंह अपने घर वालों और पड़ोसियों के साथ वहां पहुंच गए. अब तक वहां काफी भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी.

उस समय भी प्रभात रसोईघर के बगल वाले कमरे में फांसी पर लटका पड़ा था. खबर मिलने पर अनेक व्यापारी भी वहां पहुंच गए. घर के जवान आदमी की मौत पर घर वाले बिलखबिलख कर रो रहे थे. किसी ने सूचना थाना कोतवाली पुलिस को भी दे दी.

चूंकि घटनास्थल से थाना कोतवाली महज आधा एक किलोमीटर की दूरी पर है, इसलिए 10 मिनट में ही एसपी (सिटी) विपिन कुमार टांडा व कोतवाली प्रभारी अनुपम शर्मा मय फोर्स घटनास्थल पर पहुंच गए.

अब तक सत्येंद्र सिंह के मकान के बाहर भारी संख्या में भीड़ मौजूद हो चुकी थी, जिस के कारण रोड पर जाम लग गया था. पुलिस ने फांसी पर लटके प्रभात सिंह को नीचे उतारा. उस की मौत हो चुकी थी. शव की बारीकी से जांच की तो पहली ही नजर में मामला संदिग्ध नजर आया. प्रभात के सिर व शरीर पर चोटों के निशान थे.

यह देख प्रभात के घर वाले और अन्य व्यापारी हंगामा करने लगे. उन का आरोप था कि प्रभात की हत्या करने के बाद उसे फांसी पर लटकाया गया है, जिस से मामला आत्महत्या का लगे. मृतक के हाथ में 2 पेज का एक सुसाइड नोट भी था.

उस सुसाइड नोट में एक लड़की से प्रेम संबंध और उस की बेवफाई का जिक्र था. प्रभात और उस की तथाकथित प्रेमिका का कितना पुराना रिश्ता था, इस बात का उल्लेख उस नोट में किया गया था. सुसाइड नोट में कितनी सच्चाई है, यह बात जांच के बाद ही पता चलती.

मृतक के परिजनों ने सीधे तौर पर दुकान मालिक सत्येंद्र सिंह की बेटी चित्रा सिंह पर आरोप लगाया कि उस ने ही अपने सहयोगियों के साथ मिल कर प्रभात की हत्या की है. फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए.

प्रभात की लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने के बाद उस के भाई प्रदीप की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर लिया. पोस्टमार्टम के बाद शाम को जब पुलिस को रिपोर्ट मिली तो उस में भी बताया गया कि प्रभात के सिर पर लोहे की रौड जैसी किसी चीज से वार किया गया था, जिस से उस की मौत हुई थी.

मकान मालिक सत्येंद्र सिंह घटना से एकदो दिन पहले अपनी पत्नी राशि के साथ प्रतापगढ़ चले गए थे. वहां उन के किसी रिश्तेदार की मौत हो गई थी. घर पर उन की बेटी चित्रा और उस का चचेरा भाई कौशिक उर्फ गोलू मौजूद था.

एसपी (सिटी) विपिन कुमार टांडा के समक्ष चित्रा सिंह से पूछताछ की गई तो उस ने खुद को निर्दोष बताते हुए कहा, ‘‘सर, प्रभात सिंह का उस के प्रति एकतरफा प्यार था. वह मुझ से उम्र में भी दोगुना बड़ा था. भला मैं उस से कैसे प्रेम कर सकती हूं. मेरा उस की हत्या या आत्महत्या से कोई वास्ता नहीं है.’’

‘‘जिस वक्त प्रभात तुम्हारे कमरे में घुस कर फांसी पर लटका, उस वक्त तुम कहां थी?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘सर, मैं रोज सुबह नहाने के बाद पूजा करती हूं. बुधवार को भी रोजाना की तरह नहाने के बाद मैं पूजा करने चली गई थी. पूजा के बाद मैं ने बालकनी से नीचे की ओर देखा तो नीचे प्रभात की कार दिखी. मैं यह सोचते हुए सीढि़यों से नीचे उतरी कि प्रभात आज दुकान पर इतनी जल्दी कैसे आ गए. तभी देखा कि वह हमारी रसोई के बगल वाले कमरे में लटका हुआ था. मैं समझ नहीं पाई कि यह काम करने के लिए उस ने मेरा घर ही क्यों चुना?’’ वह बोली.

घर में फर्श पर जो खून का धब्बा मिला था, उस के बारे में पुलिस ने उस से पूछा तो उस ने उसे चुकंदर का रस बताया.

पुलिस को लग रहा था कि यह झूठ बोल रही है इसलिए उस से और उस के चचेरे भाई गोलू से सख्ती से पूछताछ की तो दोनों ने ही अपना जुर्म कबूल कर लिया. उन्होंने कहा कि प्रभात की हत्या करने का उन का कोई इरादा नहीं था. पर हालात ऐसे बन गए जिस से उस का कत्ल हो गया.

प्रभात सिंह इलाहाबाद शहर के कीडगंज थाना क्षेत्र के कृष्णानगर निवासी वीरेंद्र प्रताप सिंह का बेटा था. कारोबारी वीरेंद्र प्रताप सिंह के 4 बेटे और एक बेटी थी. उन की पत्नी कनकलता का देहांत हो चुका था. मांगलिक होने की वजह से प्रभात की शादी नहीं हुई थी.

वीरेंद्र प्रताप सिंह के एक दोस्त थे सत्येंद्र सिंह, जो प्रतापगढ़ में एक सरकारी मुलाजिम थे. कोतवाली थानाक्षेत्र के विवेकानंद मार्ग पर रहते थे. वीरेंद्र प्रताप ने सन 2003 में उन की एक दुकान किराए पर ली थी, जहां उस ने बंधु ट्रेडर्स के नाम से मशीनरी पार्ट्स बेचने का काम शुरू कर दिया. उस दुकान को प्रभात संभालता था.

दोस्ती के नाते सत्येंद्र उन से दुकान का किराया तक नहीं लेते थे. प्रभात का सत्येंद्र सिंह के घर में खूब आनाजाना था. दुकान के पीछे ही सत्येंद्र सिंह का आवास था. उन की एक बेटी चित्रा थी, घर में आनेजाने के कारण उन दोनों के बीच प्रेमसंबंध स्थापित हो गए. उस समय प्रभात की उम्र 36 साल और चित्रा की 16 साल थी.

कुछ दिनों बाद ही उन के संबंधों की खबर उन के घर वालों को भी हो गई. घर वालों ने उन्हें लाख समझानेबुझाने की कोशिश की लेकिन इस का उन पर कोई असर नहीं हुआ. बल्कि उन का प्यार परवान चढ़ने लगा. दोनों की उम्र में काफी अंतर था. लेकिन प्यार का भूत जिन के सिर पर सवार होता है, उन के बीच उम्र आड़े नहीं आती.

धीरेधीरे समय आगे बढ़ने लगा. चित्रा जहां जवान थी तो दूसरी ओर प्रभात की उम्र ढलान की ओर बढ़ रही थी. शायद यही कारण था कि उस पर जान छिड़कने वाला प्रभात अब उसे नीरस नजर आने लगा था. वह उस से इतना प्यार करता था कि वह उसे कालेज तक छोड़ने और लेने जाने लगा था.

लेकिन चित्रा प्रभात से दूरी बनाने लगी थी और अपनी उम्र के लड़कों से मोबाइल पर घंटों बतियाती थी. प्रभात जब भी उसे फोन करता तो वह उस का फोन रिसीव नहीं करती. बारबार फोन करने के बाद वह उस का फोन उठाती तो बेमन से बात करती.

प्रभात समझ नहीं पा रहा था कि पिछले 10 सालों से प्यार करने वाली चित्रा के अंदर यह बदलाव कैसे आ गया. प्रभात के मना करने के बावजूद भी वह वाट्सऐप और फेसबुक पर पता नहीं किसकिस से चैटिंग करती रहती थी. किसी भी तरह वह प्रभात से अपना पीछा छुड़ाना चाहती थी, लेकिन प्रभात उसे किसी भी हाल में छोड़ने या भुलाने को तैयार नहीं था.

29 नवंबर, 2016 की रात को प्रभात ने चित्रा से बात करने के लिए कई बार उस का नंबर मिलाया. पहले तो उस का मोबाइल व्यस्त आ रहा था पर बाद में वह स्विच्ड औफ हो गया. प्रभात ने सुबह उठ कर फिर से उस का मोबाइल नंबर डायल किया. घंटी बजने के बावजूद चित्रा ने फोन नहीं उठाया.

गुस्से में वह सुबह 8 बजे ही अपने घर से निकल गया और दुकान खोलने के बाद सीधे चित्रा के कमरे में पहुंचा. वहां चित्रा बिलकुल अकेली थी. मोबाइल रिसीव न करने की बात को ले कर वह उस से झगड़ने लगा. उन का शोर सुन कर चित्रा का चचेरा भाई कौशिक उर्फ गोलू उठ गया.

उस ने देखा कि गुस्से से लालपीला प्रभात चित्रा के साथ मारपीट कर रहा है तो उस ने बीचबचाव करने की कोशिश की. उस समय प्रभात चित्रा का गला दबाए हुए था. गोलू ने बताया कि उस ने चित्रा दीदी को बचाने की कोशिश की. तब प्रभात उस से उलझ गया और हाथापाई करने लगा.

उसी दौरान गोलू की नजर दीवार से सटा कर रखे सरिए पर गई. किसी तरह उस ने प्रभात के चंगुल से खुद को छुड़ाया तो प्रभात चित्रा से भिड़ गया. तभी गोलू ने सरिया उठा कर पीछे से प्रभात के सिर पर दे मारा. एकदो वार और करने पर प्रभात नीचे गिर गया और मर गया.

इस के बाद दोनों ने एक रस्सी गले में बांध कर उसे कुंडे से लटका दिया ताकि मामला आत्महत्या का लगे. जहांजहां उस का खून गिरा था, उसे साफ कर के चुकंदर का जूस डाल दिया. फिर दोनों रोने का नाटक करने लगे. चित्रा को जब पता चला कि दुकान पर नौकर तबरेज आ चुका है तो वह घबराई हुई उस के पास गई और उसे कमरे में ला कर बताया कि प्रभात ने आत्महत्या कर ली है.

इधर मृतक के छोटे भाई सुधीर सिंह ने बताया कि प्रभात ने चित्रा के नाम लाखों रुपए की प्रौपर्टी और जायदाद कर दी थी. प्रभात उस से प्रौपर्टी वापस न मांग ले, इसलिए उस ने अन्य लोगों के साथ मिल कर उस की हत्या कर दी. उधर चित्रा का कहना है कि वह प्रभात से प्यार नहीं करती थी. प्रभात एकतरफा उसे चाहता था.

पुलिस ने चित्रा और उस के चचेरे भाई गोलू को भादंवि की धारा 302, 201 के तहत गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अभी यह पता नहीं लग सका है कि मृतक के हाथ में जो सुसाइड नोट मिला, वह किस ने लिखा था. फोरैंसिक जांच के बाद ही यह स्थिति साफ हो सकेगी. केस की विवेचना कोतवाली प्रभारी अनुपम शर्मा कर रहे हैं.

अप्रैल महीने के दौरान किए जाने वाले खेती के जरूरी काम

आमतौर पर अप्रैल का महीना हंसीमजाक के अंदाज में एकदूसरे को अप्रैलफूल यानी मूर्ख बनाने के लिए जाना जाता है. 1 अप्रैल का लोग काफी पहले से इंतजार करते?हैं ताकि अपने चहेतों को मधुर तरीके से उल्लू बना सकें. तमाम किसान भी इस मौके को हाथ से नहीं जाने देते और अपने साथी किसानों व रिश्तेदारों को मूर्ख बनाने के हथकंडे खुल कर आजमाते हैं. जागरूक किसान इस मामले में भी कमाल करते रहते हैं. मेरे एक परिचित किसान ने जामुन की बेल लगाने का नाटक कर के कई लोगों को खुलेआम बेवकूफ बना दिया था.

बहरहाल, हंसीमजाक से हट कर अप्रैल महीने के दौरान खेती के मोरचे पर भी भरपूर काम किए जाते हैं. इस महीने रबी मौसम की तमाम फसलों की कटाई का सिलसिला शुरू हो जाता है. इस दौरान जायद मौसम की फसलें खेतों में हिलोरे लेती नजर आती हैं. आइए डालें एक तीखी नजर अप्रैल महीने के खेती से जुड़े खास कामों पर:

* रोटी यानी गेहूं की फसल अप्रैल तक पक कर तैयार रहती?है, लिहाजा इस महीने का खास काम गेहूं की फसल की कटाई करने का होता?है.

* गेहूं काटने के बाद उसे अच्छी तरह सुखा कर उस की गहाई करें. अगर उस के भंडारण का इरादा है, तो उस के लिए भंडारण के नए व उन्नत तरीकों को आजमाएं.

* चना पुराने जमाने से गेहूं का खास जोड़ीदार रहा है. पहले तमाम लोग बराबर मात्रा में गेहूंचना मिला कर ही आटा पिसवाते थे, जिसे मिस्सा आटा कहते?हैं. अप्रैल तक चने की भी फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है, लिहाजा इस की कटाई का काम भी फौरन निबटा लेना चाहिए.

* चने की देरी से बोई जाने वाली फसल अप्रैल तक कटाई लायक नहीं होती. इस की कटाई की नौबत बाद में आती?है.

* देरी से बोई गई चने की फसल पर अगर फलीछेदक कीट का हमला नजर आए तो वैज्ञानिकों से पूछ कर मुनासिब दवाएं इस्तेमाल करें. इस के लिए जैविक तरीके आजमाना बेहतर रहेगा.

* आमतौर पर अप्रैल में बारिश का कोई आसार नहीं रहता और खेत सूखने लगते?हैं. ऐसी हालत में गन्ने की फसल में जरूरत के हिसाब से सिंचाई करें. वैसे कभीकभी अप्रैल में भी तगड़ी बारिश होती है, तब उसी हिसाब से सिंचाई करनी चाहिए.

* गन्ने के खेत में निराईगुड़ाई करें और किसी तरह के खरपतवार न पनपने दें. बेहतर होगा कि निराईगुड़ाई से पहले खेत में गोबर की अच्छी तरह सड़ी हुई खाद, कंपोस्ट खाद या केंचुआ खाद डालें. इस के बाद निराईगुड़ाई करने से खादें खेत की मिट्टी में अच्छी तरह मिल जाएंगी. इस के खेत की मिट्टी की पानी जज्ब करने की करने की कूवत में भी इजाफा होगा और यकीनन बेहतर गन्ने पैदा होंगे.

* सूरजमुखी के खेत का मुआयना करें. उन में अप्रैल तक फूल आने लगते?हैं. ऐसे में खेत की निराईगुड़ाई करना जरूरी होता?है. खेत की नमी का जायजा भी लें. नमी में कमी होने पर सिंचाई करें. जरूरी लगे तो वैज्ञानिकों से पूछ कर खेत में यूरिया खाद का छिड़काव करें.

* बैसाखी मौसम की मूंग बोने का भी यह सही वक्त होता?है. अगर मूंग बोने का इरादा हो तो 15 अप्रैल तक इस की बोआई का काम निबटा लें.

* जो मूंग मार्च महीने में बोई गई थी, उस के खेत की जांच भी करें. अमूमन अप्रैल में इसे सिंचाई की जरूरत होती है. अगर खेत सूखे नजर आएं बगैर चूके उन की सिंचाई करें.

* इनसानों की तरह गायभैंसों वगैरह को भी सारे साल खाने यानी चारे की दरकार रहती है. पशुओं के चारे के लिहाज से अप्रैल में मक्का, लोबिया व बाजरे की बोआई करें, ताकि मईजून में चारे की दिक्कत न रहे.

* फरवरी में चारे के लिए जो फसलें बोई थीं, उन में नाइट्रोजन की खुराक देने के लिए यूरिया खाद डालें और खेत में बराबर नमी कायम रखें.

* इस बीच फूलगोभी की बीज वाली फसल आमतौर पर कटाई लायक हो जाती है, लिहाजा उस की कटाई का काम निबटा लें. कटाई के बाद फसल को सुखा कर बीज निकाल लें. बीजों को सही तरीके से पैक कर के उन का भंडारण करें.

* तुरई की नर्सरी अप्रैल के पहले हफ्ते के दौरान जरूर डालें, ताकि समय पर पौध तैयार हो सकें. फरवरीमार्च महीनों के दौरान डाली गई नर्सरी के पौधों की रोपाई कर दें. रोपाई 100×50 सेंटीमीटर की दूरी पर करें. रोपाई करने के बाद सिंचाई जरूर करें.

* अरबी की खेती का इरादा हो तो अप्रैल में ही इस की अगेती किस्मों की बोआई का काम निबटा लें.

* जनवरीफरवरी के दौरान नर्सरी में तैयार किए गए करेले व लौकी के पौधों की रोपाई करें. करेले की रोपाई 150×60 सेंटीमीटर की दूरी पर करें, जबकि लौकी की रोपाई 2×1 मीटर की दूरी पर करें.

* मार्च में रोपी गई बैगन की फसल में निराईगुड़ाई करें व जरूरत के हिसाब से सिंचाई भी करें. नाइट्रोजन के लिहाज से खेत में यूरिया खाद डालें व बराबर नमी बरकरार रखें.

* अप्रैल में लहसुन की फसल की खुदाई निबटा लें. खोदने के बाद फसल को 3 दिनों तक खेत में रहने दें. इस के बाद फसल को छाया में ठीक से सुखा कर लहसुन का भंडारण करें.

* अप्रैल तक मूली व गाजर की बीज वाली फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है. उस की कटाई कर के फसल को ढंग से सुखाने के बाद बीज निकालें. बीजों को ठीक से सुखा कर पैक करें और फिर उन का सही तरीके से भंडारण करें.

* अदरक की बोआई का काम भी अप्रैल में निबटाएं. बोआई के लिए करीब 20 ग्राम वाले कंदों का इस्तेमाल करें. इस की बोआई 30-40 सेंटीमीटर की दूरी पर मेंड़ें बना कर करें. कंदों के बीच 20 सेंटीमीटर का फासला रखें.

* यदि शिमला मिर्च की फसल लगाई हो, तो उस की निराईगुड़ाई करें व जरूरत के हिसाब से सिंचाई भी करें. यूरिया खाद भी डालें ताकि नाइट्रोजन की कमी न रहे और फल अच्छे किस्म के आएं.

* आम का रसीला मौसम आने वाला है, लिहाजा आम के बागों की सिंचाई करें ताकि नमी कम न होने पाए. पेड़ों पर कीटों या बीमारियों के लक्षण नजर आएं, तो कृषि वैज्ञानिक से राय ले कर सही दवा का इस्तेमाल जरूर करें.

* ठंड से पिछले दिनों परेशान रहे अपने पशुओं का पशुचिकित्सक से मुआयना कराएं. कोई दिक्कत हो तो इलाज कराने या टीके लगवाने में लापरवाही न करें.

* पशुओं को जरूरी कीड़ों की दवाएं खिलाने का पूरा खयाल रखें. अगर गाय या भैंस गरमी में आ जाए, तो उसे अस्पताल ले जा कर या डाक्टर बुला कर गाभिन कराने में कतई देरी न करें.

मिनी गुलाबजामुन स्वाद का नया अंदाज

रसीला गुलाबजामुन देश की सब से मशहूर मिठाई है. गुलाबजामुन बनाने वाले इसे ले कर नएनए प्रयोग करने लगे हैं. सब से ज्यादा प्रयोग इस के आकार को ले कर होने लगे हैं. पहले गुलाबजामुन नीबू के आकार बनता था. अब इस के आकार को छोटा कर दिया गया है. इसे मिनी गुलाबजामुन के नाम से जाना जाता है. छप्पन भोग मिठाई शाप के मालिक रवींद्र गुप्ता कहते हैं, ‘आज के समय में लोग मिठाई को भरपेट नहीं खाते. वे स्वाद लेने के लिए मिठाई खाते हैं. ऐसे में मिनी गुलाबजामुन भी चलन में आ गया.’

गुलाबजामुन का नाम गुलाब और जामुन से मिल कर बना है. यह अपनी तरह की अलग मिठाई है, जिस का नाम फल और फूल पर रखा गया है. गुलाबजामुन की चाशनी को बनाने के लिए गुलाबजल को खुशबू के लिए डाला जाता है और जामुन के गोल आकार और रंग के कारण इसे गुलाबजामुन कहा जाता है. गुलाबजामुन मुगल काल की मिठाई है. गुलाबजामुन भारत और दूसरे मुसलिम देशों की खास मिठाई है. अब दुनिया में जहांजहां भारतीय रहते हैं, वहांवहां मिठाई  की दुकानों में गुलाबजामुन मिलता है.

चाशनी में डूबा गुलाबजामुन गरमगरम खाने में ही मजा देता है. कोई दावत गुलाबजामुन के बिना अधूरी मानी जाती है. अगर आप गरम और ठंडा स्वाद एकसाथ लेना चाहते हैं, तो गुलाबजामुन और वनीला आइसक्रीम को मिला कर खाया जा सकता है. एक बार इस अंदाज में गुलाबजामुन का स्वाद लेंगे, तो किसी और मिठाई का स्वाद याद ही नहीं रहेगा.

गुलाबजामुन और कालाजाम में अंतर

मिठाई की दुकानों पर गुलाबजामुन से मिलतीजुलती एक और मिठाई दिख जाती है, जिसे कालाजाम कहा जाता है. आमतौर पर लोग कालाजाम और गुलाबजामुन को एक ही मिठाई समझ बैठते हैं, मगर इन में फर्क होता है. गुलाबजामुन चाशनी में डूबा होता है, जबकि कालाजाम सूखा होता है. गुलाबजामुन गरम खाया जाता है और कालाजाम सामान्य तापमान में रख कर खाया जाता है. गुलाबजामुन खोए से तैयार होता है और इस के अंदर कुछ भरा नहीं जाता, जबकि कालाजाम में अंदर मेवाइलायची जैसी दूसरी चीजें डाली जाती हैं. गुलाबजामुन को चांदी के वर्क से सजाया नहीं जाता है, जबकि कालाजाम को चांदी के वर्क और केसर पाउडर से सजाया जाता है. कालाजाम गोल आकार का ही बनता है, जबकि गुलाबजामुन गोल और लंबे दोनों आकारों में बनते हैं. इन के स्वाद में भी अंतर होता है. गुलाबजामुन पंजाबी मिठाई होती है, जबकि कालाजाम बंगाली मिठाई होती है.

कैसे बनता है गुलाबजामुन

गुलाबजामुन बनाने के लिए खोया, मैदा, बेकिंग पाउडर और इलायची पाउडर का इस्तेमाल किया जाता है. सब से पहले खोए को कद्दूकस कर लें. फिर उस में मैदा, बेंकिग पाउडर और इलायची पाउडर मिला लें. इस में थोड़ा दूध डालते हुए आटे की तरह गूंध लें. जब यह खूब चिकना जाए तो मनचाहे गोल या लंबे आकार में गुलाबजामुन तैयार कर लें. ध्यान रखें कि ये फटे नहीं.  फटने से इन में दरारें पड़ जाती हैं. तैयार कच्चे गुलाबजामुन को कपड़े से ढक  कर रख दें. इस के बाद कढ़ाई में जरू रत के अनुसार तेल डाल कर इन्हें तल लें. जब ये ब्राउन कलर के हो जाएं,  तो इन को बाहर निकाल लें और किचन पेपर पर रखें.

इस के बाद चीनी और पानी बराबर मात्रा में ले कर चाशनी बनाएं. इसे धीमी आंच पर गरम करें. जब चाशनी तैयार हो जाए, तो तले गुलाबजामुन उस में डाल दें. चाशनी में कुटी इलायची, गुलाबजल और केसर डाल दें. जब गुलाबजामुनों के अंदर तक रस घुल जाए, तो उन को निकाल कर गरमगरम खाएं. चाशनी में भीगे होने के कारण इन को गरम करना आसान होता है.

दुनिया भर में छाए भारतीय मूल के ये कलाकार

बॉलीवुड की अदाकाराओं प्रियंका चोपड़ा और दीपिका पादुकोण के हॉलीवुड में पसंदीदा होने से पहले, ऐसे कई भारतीय मूल के अभिनेता और अभिनेत्री हैं, जिन्होंने अमेरिकी टीवी शो और फिल्म उद्योग में अपने लिए एक स्थान बनाया है. इन कलाकारों ने टेलीविजन शो से लेकर फिल्मों तक कई बड़ी भूमिकाएं निभाई हैं, और विश्व स्तर पर इन सितारों ने मान्यता प्राप्त की हैं.

अभिनेत्री मिंडी कलिंग से अभिनेता देव पटेल तक, ये हैं भारतीय मूल के वे छ: सितारे जिन्होंने हॉलीवुड में अपने हुनर से सबको दीवाना बना दिया है..

कुनाल नय्यर

लंदन में एक पंजाबी परिवार में जन्मे कुणाल का जीवन और शिक्षा-दीक्षी सब भारत (नई दिल्ली) में ही हुई. बाद में वे वित्त और व्यवसाय का अध्ययन करने के लिए अमेरिका चले गए और इसी दौरान उन्होंने वहां अभिनय कक्षाएं लेना शुरू किया और सहीं से उन्हें इस अभिनय कला के लिए अपने प्यार और समर्पण का एहसास हुआ.

वर्तमान में उन्हें ‘बिग बैंग थ्योरी’ (रोजमर्रा की जिंदगी में पैदा होने वाली परिस्थितियों के आधार पर बनाया गया एक हास्यप्रद टेलीविजन कार्यक्रम) में ‘राज कोथरापापली’ की भूमिका निभाने के लिए बहुत अधिक तारीफे मिल रही हैं. उन्होंने कई फिल्मों में अभिनय करने के साथ-साथ, कई अलग-अलग फिल्मों की डबिंग में अपनी आवाज भी दी है.

मिंडी कलिंग

वीरा मिंडी चोकलिंगम, जिन्हें हम मिंडी कलिंग नाम से ही जानते हैं, का जन्म अमेरिका में एक हिंदू परिवार में हुआ था. इनके माता-पिता अवू और स्वाती, नाइजीरिया में काम करते हुए आपस में मिले थे.

मिंडी को अमेरिकन टेलीविजन सीरीज ‘द ऑफिस’ से एक बड़ा ब्रेक एक लेखक के रूप में मिला, जिसमें उन्होंने केली कपूर की भूमिका भी निभाई थी. तब से वे रुकी नहीं और उन्होंने अभी तक, दो संस्मरण और लिखे.

अब उन्होंने अपना खुद का शो, ‘द मिंडी प्रोजेक्ट’ भी तैयार किया है. वे साल 2018 में रिलीज होने वाली फिल्म ‘ओशियन8’ में भी नजर आने वाली हैं.

फ्रीडा पिन्टो

फ्रीडा, मुंबई में एक कैथोलिक परिवार में पैदा हुई, उनकी पहली फिल्म, स्लमडॉग मिलियनेयर की सफलता के बाद वे संयुक्त राज्य अमेरिका चली गई. इसके बाद से वे ल 'ओरियल पेरिस के लिए एक चेहरा बन गईं. लैंगिक समानता और लड़कियों की शिक्षा के लिए चलाए जाने वाले वैश्विक अभियान का वे एक सक्रिय अंग हैं.

इंदिरा वर्मा

भारतीय मूल और स्विस वंश की इंदिरा को वर्तमान में प्रमुख रुप से ‘द गेम ऑफ थ्रोन्स’ में उनकी भूमिका इल्लारिया के लिए याद किया जाता है. उनकी कला के क्षेत्र में पृष्ठभूमि संगीत, थिएटर्स और नाट्यक्रमों में भी है. पहले उन्होंने बोन्स, लूथर जैसे कार्यक्रमों के अलावा कई फिल्मों में भी अभिनय किया है.

अजीज अंसारी

दक्षिण केरोलिना में पैदा हुए अजीज, एक तमिल-मुस्लिम परिवार से आते हैं और ये ‘एक शानदार कॉमेडियन’ हैं. एक विपणन अर्थात मारकेटिंग में स्नातक करने वाले अजीज अक्सर कॉमेडी शोज में नजर आते हैं. 'पार्कस एण्ड रिक्रिएशन' जो कि एक अमेरिकी राजनीतिक कॉमेडी शो है उसमें उन्होंने टॉम हावरफोर्ड के रूप में शानदार प्रदर्शन किया. इसके बाद से उन्हें एक विशाल प्रशंसक समूह मिला. अजीज एक बेहद मजाकिया और आपको चंद पलो में प्रफुल्लित कर देने वाले व्यक्ति हैं.

देव पटेल

अभिनेता देव पटेल को तो शायद किसी परिचय की जरूरत नहीं है और वर्तमान में तो उनसे काफी लोग प्रभावित हैं. वे लंदन में एक गुजराती परिवार में जन्में और उनके माता-पिता, राज और अनीता है. स्लमडॉग मिलियनेयर में जमाल की भूमिका निभाने से पहले उन्होंने ब्रिटिश टीवी शो, स्किन्स में अभिनय किया और इस फिल्म के बाद उनका जीवन बदल गया.

ऑस्कर मनोनीत फिल्म ‘लॉयन’ में सरु के किरदार के बाद उन्होंने दुनिया भर के प्रशंसकों के दिलों में एक बढ़िया स्थान बना लिया है.

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