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बच्चों के मुख से

गरमी की छुट्टियों में मैं अपने पीहर जबलपुर गई हुई थी. वहां मेरी 5 वर्षीया भतीजी देशना अपनी हाजिरजवाबी से सब का मन बहलाए रखती. एक दिन नाश्ते में हम सब चायनीज स्प्रिंग रोल खा रहे थे. मेरे भाई ने देशना को बुलाते हुए कहा कि आ कर स्प्रिंग रोल खा लो. वह ठुमकती हुई आई और ध्यान से देखती हुई बोली, ‘‘क्या इन में स्ंिप्रग लगी हुई है? ये मेरे पेट में उछलेंगे, इसलिए मैं नहीं खाती.’’

उस की भोली बातें सुन कर हम सब ठहाका लगा कर हंस पड़े.

वंदना कासलीवाल

*

मेरी परिचिता का 7 वर्षीय पुत्र मेहुल बहुत चंचल व शरारती है, लेकिन पढ़ने में तेज भी है. इस वर्ष वह परीक्षा में हमेशा की तरह प्रथम नहीं आया तो मुझे आश्चर्य हुआ. मुलाकात होने पर मैं ने उस से प्यार से कहा, ‘‘मेहुल, तुम स्कूल के सामने रहते हो, इसलिए तुम्हारा रिजल्ट अच्छा आना चाहिए.’’ तब उस ने बड़े भोलेपन से कहा, ‘‘हां, लेकिन मेरे घर के सामने मेरा नहीं, लड़कियों का स्कूल है.’’ यह सुन कर मैं हंस पड़ी. 

गीता गुप्त

*

मैं अपनी 7 वर्षीया पुत्री अनुष्का को पढ़ा रहा था. वह सभी सवालों के सटीक जवाब दे रही थी. उस के कोर्स का कोई ऐसा प्रश्न नहीं था जो उसे न आता हो. मैं ने पास बैठी अपनी पत्नी से कहा, ‘‘क्या पढ़ाएं इसे? इसे तो सब आता है.’’

पत्नी ने कहा, ‘‘इस को कुछ ऐक्स्ट्रा पढ़ाओ.’’

इतने में बेटी ने तुरंत कहा, ‘‘मम्मी, मुझे तो ऐक्स्ट्रा भी आता है. बोलूं- ई एक्स टी आर ए.’’

हम सभी उस की मासूमियत पर हंस पड़े.     

सतीश व्यास

*

हमारे पड़ोसी परिवार की 4 वर्षीया बेटी सोनम बहुत नटखट है. एक दिन उस की मम्मी ने अपने लंबे बाल कटवा कर काफी छोटे करवा लिए. मैं ने सोनम से पूछा, ‘‘बेटा, तुम्हें कटे बालों वाली अपनी मम्मी कैसी लगती हैं?’’

सोनम तपाक से बोली, ‘‘आंटी, मम्मी मौम बन गईं.’’ उस की हाजिरजवाबी से हम सब हंसे बिना नहीं रह सके. 

निर्मल कांता गुप्ता

नए राजनीतिक दौर की शुरुआत

1947 के बाद 2017 देश में राजनीति की नई करवट ले रहा है. जैसे 1947 में गोरे शासकों को हटा कर पूरे भारत पर कांग्रेस सरकार ने कब्जा जमा लिया था वैसे ही 2017 में भारतीय जनता पार्टी देश की सत्ता पर कब्जा करने के साथ कई राज्यों की सत्ता पर भी काबिज हो गई है. नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने 3-4 साल की छोटी सी अवधि में जो राजनीतिक सफलता पाई है उस के पीछे इन दोनों की कठिन मेहनत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 50 साल की चेष्टा रही है.

कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अब फिर से खड़ी हो पाएंगी, इस में संदेह है. इन पार्टियों से निकले एकमत वाले अगर भारतीय जनता पार्टी के धार्मिक, सामाजिक व आर्थिक हथियारों की तोड़ निकाल पाएं, तभी यह संभव है. पुराने लेबल अब उसी तरह इतिहास के कूड़ेदान में पहुंच गए हैं जैसे भाजपा के पुराने नेता केवल दिखावटी चेहरे बने हुए हैं.

भाजपा की अपनी खास नीति है और कोई कारण नहीं कि वह उसे देश में लागू क्यों न करें. वह बहुत सी बातें खुल्लमखुल्ला कहती रही है और अब तो उसे पर्याप्त जनसमर्थन भी प्राप्त है. धार्मिक हों या आर्थिक मुद्दे, वह हर तरह के प्रयोग करने में स्वतंत्र है और प्रयोग करेगी, इस में संदेह नहीं. आम जनता चाहे सोच कर या किसी भावना में बह कर उसे समर्थन दिया है तो देश को स्वीकार करना ही होगा.

मेरे साथ चल मेरे साथिया

न उदास हो, न हो तू खफा

मेरे साथ चल, मेरे साथिया

तू है चांदनी मेरे बाम की

तू इबादतों का सिला मेरी

थे खिलाफ अपनेपराए सब

बड़ी मुश्किलों से है तू मिली

तू न होना मुझ से कभी जुदा

मेरे साथ चल, मेरे साथिया

यों न देख, मुझ से हटा नजर

कभी मेरे दिल की भी ले खबर

मेरे जिस्म में, मेरी जान में

तेरे ख्वाब चुभते हैं टूट कर

यों खामोश रह के न दे सजा

मेरे साथ चल, मेरे साथ

– आलोक यादव

पूर्णा : प्रेरणादायक व देखने लायक फिल्म

25 मई 2014 को 13 वर्षीय लड़की पूर्णा मालावात ने एवरेस्ट की उंची चोटी पर पहुंचकर एवरेस्ट पर चढ़ने वाली सबसे कम उम्र की लड़की बन गयी थी. उसी लड़की की कहानी को सिनेमा के परदे पर राहुल बोस लेकर आए हैं. कम बजट में बनी यह फिल्म कुछ कमियों के बावजूद देखने लायक व प्रेरणा दायक फिल्म है. पहाड़ों की चढ़ाई में रूचि न रखने वाले भले ही इसका ज्यादा आनंद न ले सकें, मगर एक 13 वर्षीय लड़की की कहानी उन्हे अंत तक बांधकर रखती है.

फिल्म ‘पूर्णा’ की कहानी आंध्र प्रदेश के एक गांव की लड़की पूर्णा मालावत(अदिति इनामदार)की कहानी है. घर के आर्थिक हालात बहुत खराब हैं. वह सरकारी स्कूल की फीस भी नहीं दे सकती. पूर्णा के साथ उसकी चचेरी बहन प्रिया(एस मारिया) भी पढ़ती है. एक दिन प्रिया को पता चलता है कि एक स्कूल ऐसा भी है, जहां रहकर पढ़ाई करनी होती है और वहां पर फीस नहीं लगती. इसके अलावा वहां पर भरपेट व अच्छा भोजन भी मिलता है. प्रिया व पूर्णा योजना बनाकर घर से भागने की तैयारी करती हैं. मगर प्रिया का खड़ूस पिता उन्हे पकड़ लेता है.प्रि या की कम उम्र में ही शादी हो जाती है.

इधर पूर्णा के पिता अपने भाई के मुकाबले कम कठोर हैं. उनके पास पूर्णा की शादी के लिए उस वक्त पैसे नहीं थे, इसलिए वह दो तीन साल तक पढ़ने के लिए पूर्णा को सरकारी बोर्डिंग स्कूल में भेज देते हैं. बोर्डिंग स्कूल का घटिया खाना देखकर पूर्णा गुस्साती है और बोर्डिंग स्कूल छोड़कर भागती है. उधर अमरीका से पढ़ाई करके डॉ. आर.एस. प्रवीण कुमार(राहुल बोस)लौटे हैं, जो कि मुख्यमंत्री(हर्षवर्धन) व अन्य अफसरों के साथ बैठकर बातें कर रहे हैं. मुख्यमंत्री प्रवीण को पुलिस विभाग में भेजना चाहते हैं, पर वे स्कूल के निरीक्षण अधिकारी बनना चाहता है.

खैर, मुख्यमंत्री उन्हें स्कूल का निरीक्षण अधिकारी बना देते हैं. पद संभालते ही प्रवीण कुमार को पूर्णा के भागने की खबर मिलती है. मजबूरन अपनी सहायक के साथ वह संबंधित स्कूल की तरफ रवाना होते हैं. रास्ते में एक जगह रोती हुई पूर्णा पर नजर पड़ती है. प्रवीण कुमार उससे बात कर उसे समझाकर वापस बोर्डिंग स्कूल लेकर आते हैं. वहां के प्राचार्य व अन्य शिक्षक बड़ी बड़ी बातें हांकते हैं.

प्रवीण बोर्डिंग में बच्चों को परोसे जाने वाले खाने का निरक्षण करने के लिए है, वहां खाने पहुंच जाते हैं और पहला कौर मुंह में लेते ही हैरान रह जाते हैं. फिर वह कैंटीन के ठेकेदार व कुछ शिक्षकों को निकाल देते हैं. आंदोलन होता है. एक शिक्षक मुख्यमंत्री से शिकायत की बात करता है, प्रवीण कुमार स्वयं मुख्यमंत्री को फोन लगाकर उसके हाथ में फोन पकड़ा देते हैं.

उसके बाद धीरे धीरे चीजें सुधरने लगती हैं. इधर एक माह की स्कूल में छुट्टी होने पर कुछ बच्चे पर्वतारोहण के प्रशिक्षण के लिए जा रहे होते हैं, तो पूर्णा अपनी बहन प्रिया से बात करने के बाद उन्हीं बच्चों के साथ चली जाती है. साथ में उसका दोस्त आनंद (मनोज कुमार)भी है. उसकी मेहनत देखकर वहां के अफसर खुश हो जाते हैं.

चार बच्चों के साथ पूर्णा को प्रशिक्षण के लिए देहरादून भेजा जाता है. अंत में आर्मी के लोग उसे व आनंद को एवरेस्ट पर चढ़ने का प्रशिक्षण देते हैं. अब जब एवरेस्ट पर चढ़ने का अवसर आता है, तो एक महिला अफसर मीना गुप्ता(हीबा शाह) विरोध कर देती है. तब फिर प्रवीण कुमार मुख्यमंत्री की मदद लेते हैं. अंततः आनंद व पूर्णा को पर्वतारोही के रूप में एवरेस्ट पर चढ़ने का अवसर मिल जाता है. कई कठिनाईयों के बावजूद वह दोनों सफलता पाते हैं.

बायोपिक फिल्म ‘पूर्णा’ देखते समय एक भावुक व प्रेरक कहानी का आनंद मिलता है. लेखक प्रशांत पांडे व श्रेया देव वर्मा तथा निर्देशक राहुल बोस ने एक छोटी लड़की के जिंदगी में आगे बढ़ने या उम्मीदों के टूटने पर नम होती आंखों के साथ जो मानवीय भावनाएं होती हैं, उन्हे बहुत बेहतरीन तरीके से परदे पर उकेरा है. एक बेहतरीन व सटीक पटकथा, बेहतरीन निर्देशन, कैमरामैन सुभ्रांशु की बेहतरीन फोटोग्राफी, 13 वर्षीय लड़की अदिति इनामदार की बेहतरीन पर्फमेंस के चलते फिल्म बेहतर बन गयी है.

फिल्म का गीत संगीत भी फिल्म को उत्कृष्ट बनाने में मदद करता है. फिल्म में बाल विवाह, सरकारी तंत्र के काम करने के तरीके, सिस्टम की कमियों के साथ ही इस बात को भी उजागर किया गया है कि जब सिस्टम ठीक से काम करता है तो कई प्रतिभाओं को विकसित होने का मौका मिलता है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो फिल्म देखते समय इस बात का एहसास ही नहीं होता कि अदिति इनामदार की यह पहली फिल्म है. उन्होंने जबरदस्त प्रतिभा का परिचय दिया है और अपने किरदार पूर्णा को सार्थक किया है. इसके अलावा राहुल बोस सहित सभी कलाकारों ने अच्छा काम किया है. फिल्म में कुछ कमियां हैं, इसके बावजूद यह फिल्म हर इंसान को न सिर्फ देखना चाहिए, बल्कि अपने बच्चों को भी दिखाना चाहिए.

एक घंटा 45 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘पूर्णा’ का निर्माण अमित पटनी और राहुल बोस ने किया है .लेखक प्रशांत पांडे व श्रेया देव वर्मा, संगीतकार सलीम सुलेमान, कैमरामैन सुभ्राशु, निर्देशक राहुल बोस तथा कलाकार हैं- अदिति इनामदार, राहुल बोस, हीबा शाह व अन्य.

घर भी बेचें और टैक्स भी बचाएं

अगर आप भी घर बेचने की सोच रहे हैं तो कुछ बातों का खास ख्याल रखना जरूरी है. घर बेचते वक्त पैसों के साथ साथ कैलेंडर पर भी नजर रखना जरूरी है. अगर आप प्रॉपर्टी खरीदने के 3 साल के अंदर घर बेचते हैं, तो इससे होने वाली प्रॉफिट को शॉर्ट टर्म कैपिटल गैन माना जाएगा.

इस प्रॉफिट की रकम को आपके कुल इनकम में जोड़ा जाएगा और उसके बाद आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से इस पर कर वसूला जाएगा. इसका मतलब यह है कि जो लोग साल में 10 लाख रुपये से अधिक कमाते हैं, उन्हें ऐसे ट्रांजैक्शन पर मुनाफे का 30 पर्सेंट टैक्स चुकाना पड़ेगा.

वहीं, अगर घर पांच फाइनेंशियल ईयर के अंदर बेचा जाता है तो इस पर आपको टैक्स बेनेफिट से हाथ धोना पड़ सकता है. आपने प्रिंसिपल री-पेमेंट, स्टैंप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन पर सेक्शन 80 सी के तहत जो टैक्स छूट क्लेम की होगी, वह रिवर्स हो सकती है और घर बेचने वाले साल में रकम टैक्सेबल हो सकती है. इसमें सिर्फ सेक्शन 24बी के तहत इंटरेस्ट पेमेंट पर मिली छूट वापस नहीं ली जाएगी. इसलिए प्रॉपर्टी को कम से कम तीन साल के लिए होल्ड करना जरूरी है.

अगर आप प्रॉपर्टी को तीन साल के बाद बेचते हैं तो प्रॉफिट को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन माना जाएगा और इंडेक्सेशन के बाद इस पर 20 पर्सेंट के हिसाब से टैक्स लगेगा. इंडेक्सेशन में होल्डिंग पीरियड के दौरान महंगाई दर के असर को शामिल किया जाता है और उस हिसाब से घर खरीदने की कीमत में एडजस्टमेंट होता है. इससे घर बेचने वाले के टैक्स के बोझ में काफी कमी आती है. इसके दूसरे फायदे भी हैं.

लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन के मामले में ओनर कई एग्जेम्पशंस क्लेम कर सकता है, जो शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन में नहीं मिलता. इस बारे में एचएंडआर ब्लॉक इंडिया के वैभव सांकला ने बताया, 'घर को रिपेयर करने और उसके रेनोवेशन पर आपने जो पैसा खर्च किया है, उसे प्रॉपर्टी खरीदने की कीमत में जोड़कर आप लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस टैक्स कैलकुलेट कर सकते हैं. वहीं, प्री-कंस्ट्रक्शन पीरियड में आपने जो ब्याज चुकाया है, उसे भी कॉस्ट में जोड़ा जा सकता है बशर्ते उस पर पहले छूट हासिल ना की गई हो.’

घर बेचने से हुए प्रॉफिट से अगर दो साल के अंदर आप दूसरी प्रॉपर्टी खरीदते हैं या तीन साल के अंदर कोई घर बनाते हैं तो कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा. दो और तीन साल की यह रियायत तब भी लागू होती है, जब आपने पहला घर बेचने से पहले ही दूसरा घर खरीद लिया हो. हालांकि, इसके लिए प्रॉपर्टी का सेलर के नाम पर खरीदा जाना जरूरी है. इस तरह के मामलों में अगर पूरे कैपिटल गेन का इनवेस्टमेंट नहीं होता है तो बची हुई रकम पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगेगा.

नाम शबाना : घटिया पटकथा, दमदार अभिनय

2015 की सफल फिल्म ‘‘बेबी’’ की प्रिक्वअल फिल्म “नाम शबाना’’ देखकर अहसास हुआ कि बेहतरीन कलाकारों और बेहतरीन परफार्मेंस के बावजूद कमजोर पटकथा व निर्देशक की अपनी कमजोरियों के चलते किस तरह फिल्म स्तरहीन हो जाती है. फिल्म ‘‘बेबी’’ की सफलता को भुनाने के लिए लेखक व निर्माता नीरज पांडे ने फिल्म ‘‘बेबी’’ के एक पात्र शबाना की पिछली जिंदगी को पेश करने के लिए प्रिक्वअल फिल्म ‘‘नाम शबाना’’ में जो कहानी गढ़ी है, वह अविश्वसनीय ही नहीं बल्कि तर्क हीन लगती है. फिल्म में नारी उत्थान की बात करने और नारी को पुरुषों के मुकाबले श्रेष्ठ साबित करने के लिए देश की सुरक्षा के लिए मर मिटने वाले जासूसों को जिस तरह से दिखाया गया है, उससे लेखक का दिमागी दिवालियापन ही सामने आता है.

फिल्म की कहानी मुंबई के डोंगरी इलाके की मुस्लिम लड़की शबाना खान (तापसी पन्नू) की है. उसने बचपन से देखा है कि किस तरह उसके पिता उसकी मां की पिटाई करते थे. एक दिन जब उसके पिता उसकी मां की पिटाई कर रहे होते हैं, तभी शबाना गुस्से में पिता के सिर पर वार करती है और पिता की मौत हो जाती है. जिसकी वजह से उसे दो साल के लिए बाल सुधार गृह भेज दिया जाता है. उसके बाद वह कालेज में जूडो की प्रतियोगिता में हिस्सा लेने लगती  है. पता चलता है कि उसकी सारी हकरतों पर देश की जासूसी संस्था से लोगों को जोड़ने के लिए कार्यरत अफसर रणवीर (मनोज बाजपेयी) के इशारे पर उस पर कुछ लोग नजर रख रहे हैं. शबाना, जय नामक लड़के से प्यार करती है. एक रात उसके सामने चार लड़कों में से एक करण, जय की हत्या कर देता है. अब शबाना, जय की मौत का बदला लेना चाहती है. रणवीर, शबाना की इस शर्त पर मदद करता है कि वह देश की सुरक्षा के लिए कार्यरत इस संस्था से जुडे़.

रणबीर की सूचना पर शबाना, गोवा जाकर होटल के कमरे में जय के हत्यारे व विधायक के बेटे करण की हत्या कर देती है. फिर उसे खास प्रशिक्षण दिया जाता है. मुंबई में जिस खूंखार अपराधी टोनी उर्फ मिखाइल (पृथ्वीराज सुकुमारन) को देश की जासूसी संस्था के चार पुरुष जासूस कब्जे में नहीं कर पाते हैं और मारे जाते हैं. उसी टोनी को एक दिन मलेशिया में जाकर शबाना ही अपनी गोलियों का शिकार बनाती है, पीछे से शुक्ला (अनुपम खेर), अजय सिंह राजपूत (अक्षय कुमार) भी मदद करते हैं.

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी इसकी कहानी व पटकथा है. कहानी काफी बेतरतीब तरीके से कही गई है. पटकथा लेखक ने शबाना व जय की प्रेम कहानी को बेवजह खींचा है. जिसके चलते इंटरवल से पहले फिल्म बहुत लंबी लगती है, इसे आधे से ज्यादा कम किया जा सकता था. पटकथा व कहानी के स्तर पर इतनी कमियां हैं कि क्या कहा जाए. जासूसी संस्था के रणवीर अपने कुछ सदस्यों की मदद से शबाना पर नजर रख रहे हैं. जब करण, जय को मारता है, तब भी रणवीर के लोग वहां पर मौजूद थे, पर उस वक्त जय को बचाने के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया. बल्कि जय को मार खाते व मरते हुए देखते रहे. क्या देश की सुरक्षा से जुड़ी संस्था के सदस्य उस वक्त अपनी आंख पर पट्टी बांध लेंगे जब किसी इंसान की हत्या हो रही हो. इस तहर की पटकथा की गलतियों के चलते फिल्म पूरी तरह से कूड़ा बनकर रह जाती है. फिल्म का संगीत प्रभावित नहीं करता. फिल्म के गीत फिल्म की गति को नुकसान पहुंचाते हैं. फिल्म का क्लायमेक्स स्तरहीन व बेवजह खींचा हुआ लगता है. फिल्म के चंद दृश्यों को नजरंदाज कर दें, तो फिल्म में कुछ भी रोचक नही है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो तापसी पन्नू ने सहज और बेहतरीन अभिनय किया है. यदि पटकथा बेहतर होती, तो शायद तापसी की अभिनय क्षमता और अधिक बेहतर निखरकर आती. तापसी पन्नू ने साबित कर दिखाया कि वह अकेले अपने कंधों पर फिल्म को आगे ले जा सकती हैं, बशर्ते कहानी, कहानी का प्लाट और पटकथा बेहतरीन हो. मनोज बाजपेयी के अभिनय पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. एक बार फिर उन्होंने खुद को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता साबित कर दिखाया है. इस फिल्म में अक्षय कुमार ने अपने आपको दोहराने के अलावा कुछ नहीं किया है. कमजोर पटकथा व कहानी के चलते पृथ्वीराज सुकुमार का किरदार उभर नहीं पाता, जो कि मुख्य खलनायक है. लेखक व निर्देशक ने पृथ्वीराज सुकुमारन की प्रतिभा को जाया किया है. अनुपम खेर के लिए करने को कुछ था ही नहीं.

निर्देशक के तौर पर शिवम नायर एक बार फिर मार खा गए. अतीत में वह ‘भाग जानी’ व ‘महारथी’ जैसी कई असफल फिल्में दे चुके हैं. दो घंटे अड़तालिस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘नाम शबाना’’ का निर्माण नीरज पांडे व शीतल भाटिया ने किया है. फिल्म के लेखक नीरज पांडे, संगीतकार रोचक कोहली व मीत ब्रदर्स, कैमरामैन सुधीर पलसाने और कलाकार हैं-तापसी पन्नू, अक्षय कुमार, मनोज बाजपेयी, पृथ्वीराज सुकुमारन, अनुपम खेर, मुरली शर्मा, डैनी, एली अवराम व ताहेर शब्बीर मिठाई वाला.

‘स्पाइडर मैन होमकमिंग’ का ऑफिशियल ट्रेलर रिलीज

टॉम हॉलैंड की मुख्य भूमिका वाली हॉलीवुड की आगामी सुपरहीरो फिल्म  ‘स्पाइडर मैन होमकमिंग’ का ट्रेलर रिलीज हो गया है. ये फिल्म 10 भाषाओं में रिलीज की जाएगी.

इस ट्रेलर में आयरन मैन यंग स्पाइडर मैन की मदद करता है और उसे गाइड करने के लिए आता है और उसे सुपरहीरो बनने की ट्रेनिंग देता है. ट्रेलर से पता चल रहा है कि फिल्म में जबर्दस्त एडवेंचर होगा. “कैप्टन अमेरिका सिविल वॉर” के बाद अब “स्पाइडर मैन होमकमिंग” धमाल मचाने आ रही है. फिल्म “स्पाइडर मैन होमकमिंग” में 15 साल का पीटर पार्कर अपनी दोहरी जिंदगी का बैलेंस बनाने में लगा है. क्योंकि एक तरफ उसकी स्पाइडर मैन वाली ड्यूटी हैं तो दूसरी तरफ क्वीन्स न्यूयॉर्क में उसका स्कूल. वह आयरन मैन की मदद लेता है जो उसे बचाने आता रहता है. लेकिन अब इस हीरो को खुद मजबूत होने की जरूरत है. कुछ इस प्रकार फिल्म की कहानी है.

इस फिल्म को जॉन वॉट ने डायरैक्ट और कोलम्बिया पिक्चर्स ने इसे प्रोड्यूस किया है. इससे पहले 24 मार्च को इसका नया पोस्टर जारी किया गया था. इस पोस्टर को देखकर ही पता लगता है कि स्पाइडर मैन ज्यादा कुछ खास तो नहीं बदला है लेकिन वह मॉर्डन जरूर हो गया है. ये फिल्म 7 जुलाई को रिलीज होगी.

क्रिकेट की दुनिया के सर्वश्रेष्ठ अंपायर

किसी भी खेल में अंपायरिग करना आसान नहीं है. एक सही निर्णय और एक गलत निर्णय मैच के रुख मोड़ देता है, इसके साथ ही अंपायर की जिन्दगी भी. अंपायर से यह उम्मीद की जाती है कि वे हर हाल में सही निर्णय लेंगे. इतने प्रेशर को झेलने के बाद भी कुछ अंपायर्स ने अपना काम बहुत ही सहज ढंग से किया है. कुछ अंपायर्स ने अपना नाम क्रिकेट इतिहास में अमर कर दिया है. इन अंपायर्स की खूबियों के कारण इन्हें खिलाड़ियों से लेकर आयोजकों द्वारा भी खूब वाहवाही मिली.

ये हैं क्रिकेट के कुछ बेहतरीन अंपायर

1. टोनी हिल

ऐंथनी लॉयड हिल उर्फ टोनी हिल न्यूजीलैंड के अंपायर हैं. 1998 से उन्होंने अपने अन्तर्राष्ट्रीय करियर की शुरुआत की. आईसीसी ने इन्हें न्युट्रल अंपायर के तौर पर कई अन्तर्राष्ट्रीय मैंचों की अंपायरिंग के लिए भेजा था. 2009 में इन्हें आईसीसी एलीट अंपायर्स पैनल में शामिल किया गया.

2. स्टीव बकनर

स्टीफन ऐंथनी बकनर या स्टीव बकनर क्रिकेट में सबसे अनुभवी अंपायर्स में से एक हैं. क्रिकेट अंपयारिंग से पहले वे फुटबॉल मैचों में बतौर रेफ्री काम करते थे. 2007 में खेले गए ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच के टेस्ट मैच में अपने गलत निर्णयों के कारण कुछ समय के लिए उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया. कुछ महीनों बाद उन्होंने वापसी की, पर साल 2009 में अपने रिटायरमेंट की घोषणा कर दी.

3. बिली बोडेन

ब्रेंट फ्रेजर बोडेन न्यूजीलैंड के अंपायर हैं. 1995 में उन्होंने अंपायरिंग शुरु की. 2003 में उन्हें आईसीसी एलिट अंपायर्स पैनल का हिस्सा बनाया गया. बिली को अपने नाटकीय रूप से दिए गए निर्णयों के कारण जाना जाता है. छक्के लगने पर उनका नृत्य जैसा संकेत लोगों को खूब पसंद है. आर्थराइटिस ने बिली को एक लोकप्रिय अंपायर बना दिया.

4. साइमन टॉफेल

साइमन जेम्स आर्थर टॉफेल ने ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट अंपायर के तौर पर खूब शौहरत कमाई. 1999 में उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट में अंपायरिंग शुरु की. ऑस्ट्रेलियाई अंपायर होने के कारण उन्हें क्रिकेट वर्ल्ड कप में ऑन फिल्ड अंपायर के तौर पर काम करने का मौका बहुत देर से मिला. 2011 के वर्ल्ड कप में उन्होंने अंपायरिंग की थी. उन्हें 5 बार लगातार आईसीसी अंपायर ऑफ द ईयर का खिताब मिला. 2012 में उन्होंने अंपायरिंग को अल्विदा कह दिया. अभी वे आईसीसी में अंपायर पर्फोरमेंस और ट्रेनिंग मैनेजर के रूप में काम कर रहे हैं.

5. डिकी बर्ड

हैरल्ड डेनिस बर्ड आज के समय के बेहतरीन अंपायर में से एक हैं. अंपायरिंग करने से पहले डिकी क्रिकेट खेलते भी थे. आक्रामक से आक्रामक क्रिकेटर भी उनका सम्मान करते हैं. 1973 में उन्होंने अंपायरिंग की शुरुआत की. रिटायरमेंट के बाद उन्होंने अपनी बायोग्राफी लिखी.

6. डेविड शेफर्ड

डेविड शेफर्ड भी अंपायरिंग से पहले बल्लेबाज के तौर पर क्रिकेट खेलते थे. 1981 में डेविड ने अंपायरिंग की पारी की शुरुआत की. 1983 वर्ल्ड कप में भी उन्होंने अंपायरिंग की थी. 2008 में उन्होंने रिटायरमेंट ले ली.

ये है बॉलीवुड का कोरियन कनेक्शन!

आपको बीते साल यानि कि साल 2016 में आई फिल्म ‘तीन’ तो याद ही होगी, जिस फिल्म के जरिए सुपर स्टार अमिताभ बच्चन ने प्रशंसकों को खासा प्रभावित किया था. उन्होंने अपने लंबे और शानदार अभिनय करियर में इस फिल्म में सबसे असाधारण और जटिल भूमिका अदा की है.

हम आपको बता देना चाहते हैं कि इस फिल्म ने साल 2013 की 'मॉन्टेज' नामक एक कोरियाई फिल्म से बहुत प्रेरणा ली है. इस फिल्म 'मॉन्टेज' में एक अनसुलझे अपहरण के मामले के पंद्रह वर्ष बाद, एक और अन्य अपहरण के मामले को दिखाया गया है, जिसमें एक ही तरीके का उपयोग और एक तरह के ही लक्ष्य का होना दिखाया गया है. इस मामले को सुलझाने के लिए तीन लोगों ने टीम बनाई, जिसमें कि दादा, एक मां जो पंद्रह साल से अपनी बेटी के अपहरणकर्ता को खोज रही है और एक अपराध बोध से भरा हुआ पुलिस वाला शामिल होते हैं.

अगर आपने फिल्म 'तीन' देखी है या नहीं भी देखी है तो हम आपको बता देना चाहते हैं कि ये दोनों ही फिल्में लगभग एक समान हैं. इन दोनों फिल्मों में तीन लोग शामिल होते हैं, जो अपहरण की घटना को हल करने की कोशिश करते हैं. दोनों फिल्मों में एक समान ढंग से ही अपहरण करने और उसे वापस दोहराये जाने की घटना दिखाई गई है और सबसे खास बात दोनों फिल्मों में एक जुनूनी दादा, जिसने अपनी पोती को अपने सामने ही खो दिया था और एक दोषी पुलिस वाला है.

तो जरा अब इस बात पर ध्यान दें कि यह पहली बार नहीं था जब बॉलीवुड कोरियाई सिनेमा से प्रेरित होकर भारतीय दर्शकों के लिए फिल्में लेकर आया हो. साल 2011 में आई फिल्म 'मर्डर 2' भी एक कोरियाई फिल्म 'द चेजर' (The Chaser) की एक जबरदस्त नकल है, जो कि साल 2008 में दक्षिण कोरिया में रिलीज की गई थी.

इसके अलावा साल 2007 में हिन्दी सिनेमाघरों में आई फिल्म 'अवारापन' एक और कोरियन फिल्म ‘बिटरस्वीट लाइफ’ (‘A Bittersweet Life’) से ली गई है. जीवन से भारी आकर्षित' हालांकि, इन सभी नकल की गई फिल्मों में से सबसे प्रसिद्ध, 2006 में आई थ्रिलर और ड्रामे से भरी फिल्म 'जिंदा' जो कि 'कोरियाई कल्ट क्लासिक' फिल्म ‘ओल्डबॉय' (Oldboy) से प्रेरित है. फिल्म 'जिंदा' का लगभग हर द्रश्य हुबहु इस रहस्यों और थ्रिलर से भरी कोरियन फिल्म ‘ओल्डबॉय' से नकल किया हुआ है. यह दक्षिण कोरियाई फिल्म साल 2003 में रिलीज की गई थी, वहीं भारतीय फिल्म 'जिंदा' साल 2006 में सिनेमाघरों में आई थी.

आप सभी को साल 2014 में रिलीज हुई श्रृद्धा कपूर अभिनीत फिल्म 'एक विलेन' तो याद ही होगी. इस फिल्म के दृश्य की प्रतिलिपि के रूप का नमूना आपको साल 2010 की फिल्म ‘आई सॉ द डेविल' (I Saw The Devil) के लगभग दृश्य में मिल जाएगा.

जबकि इस श्रृंखला में आगे निर्देशक दीपक टिजोरी की फिल्म ‘दो लाफ्जो की कहानी’ भी कोरियन फिल्म ‘ऑलवेज’ (Always), जो कि साल 2011 में रिलीज हुई थी, पर आधारित है. हम आपको बता दें कि इससे पहले साल 2015 में यही फिल्म ‘बॉक्सर’ नाम से भारत में ही कन्नड़ भाषा में बनाई जा चुकी थी.

इन फिल्मों के अलावा भी कई और ऐसे नाम अभी इस सूची में शुमार हैं जो पूरी तरह से दक्षिण कोरियान फिल्मों से प्रभावित हैं. बाकी नामों में से हैं साल 2012 में आई बर्फी, जिसे 2002 में कोरिया में बनी फिल्म ‘ओएसिस’ (Oasis) से लिया गया है.

अभिनेत्री ऐश्वर्या राय की बड़े पर्दे पर वापसी करने वाली फिल्म जज्बा जो कि साल 2015 में आई थी, यह भी दक्षिण कोरिया की फिल्म ‘सेवन डेज’ (Seven Days) का एक आधिकारिक रीमेक है, जो साल 2007 में रिलीज की गई थी.

भिन्न-भिन्न रिपोर्टों की माने तो ऋतिक रोशन अभिनीत फिल्म ‘काबिल’ जो हाल ही में रिलीज हुई थी, यह फिल्म भी साल 2014 में आई फिल्म ‘ब्रोकेन’ (Broken) से हुबहु मेल खाती है. दोनों ही फिल्मों में विलक्षण समानताएं हैं.

इसके अलावा भी बॉलीवुड में कई तमिल और तैलुगु फिल्में जैसे यामिरुक्का बेयामे (Yaamirukka Bayamey), जिगरथांडा (Jigarthanda) आदि कोरियन सिनेमा पर आधारित हैं.

अपने आईफोन को कितना जानते हैं आप

तकनीकी और गैजेट्स दोनों की बात जब भी की जाती है, तब दुनिया की सबसे शक्तिशाली कंपनियों में से एक ‘ऐप्पल’ का नाम जरूर लिया जाता है. केवल भारत में ही नहीं दुनिया भर में ‘ऐप्पल’ एक जानी मानी कंपनी है. शुरुआती दौर में थोड़ी परेशानी झलने के बाद कंपनी ने जो लोकप्रियता हासिल की उसे तो दुनिया देख रही है.

आज हम यहां कुछ ऐसे तथ्य पढ़ेगे जिनके बारे में आपको अभी तक नहीं पता होगा…

1. क्या आपको पता है कि ‘ऐप्पल’ की स्थापना ‘मूर्ख दिवस’ (अप्रैल फूल) यानि कि 1 अप्रैल साल 1976 में हुई थी.

2. ऐप्पल कंपनी प्रारंभ होने के सबसे पहले लोगो में न्यूटन की तस्वीर लगाई गई थी. इतना ही नहीं कंपनी के एक प्रोडक्ट का नाम भी न्यूटन था. आईफोन के आने से पहले कंपनी इसी प्रोडक्ट के गुण भी गाया करती थी. अफसोस की बात ये है कि जैसे ही आईफोन आया, ऐप्पल और न्यूटन का रिश्ता ही खत्म कर दिया गया.

3. ये बात जानकर आपको बहुत हैरानी होगी कि ‘ऐप्पल’ में नौकरी करने वाला हर तीसरा आदमी ‘भारतीय’ है.

4. आज की तारीख में इतनी सफलता पा चुकी कंपनी ‘ऐप्पल’ ने अपने शुरुआती दौर में बहुत मंदी का सामना किया था. साल 1976 में APPLE-I कम्प्यूटर के कुछ ऑर्डर कंपनी को मिले थे, इन ऑर्डर्स को पूरा करने के लिए कंपनी के मालिक जॉब्स और वॉजनिएक, जो कि कंपनी के पार्टनर थे; के पास पैसे नहीं थे. आपको जानकर धक्का लग सकता है कि इस मंदी से निपटने के लिए जॉब्स और वॉजनिएक ने अपना खुद का सामान बेचना शुरू कर दिया था.

5. साल 1985 में स्टीव जॉब्स (Steve jobs) को कंपनी से इस्तीफा देना पड़ा था और इसके 11 वर्षों बाद साल 1996 में उन्होंने फिर से कंपनी में वापसी की थी.

6. पूरी दुनिया में  ‘ऐप्पल’ के लगभग 83,000 कर्मचारी कार्यरत है. इस कंपनी के हेडक्वार्टर के कर्मचारी हर साल लगभग 81,20,625 कमाते हैं. आंकड़ों की माने तो कंपनी ‘ऐप्पल’ हर 1 मिनट में 300,000$ यानि कि 1,94,85,750 रुपये कमाती है.

7. साल 1991 यानि कि आज से 26 साल पहले की बात करें तो, अगर आप iPhone को Part by Part खरीदना चाहते तो इसके लिए आपको लगभग 3,560,000$ मतलब 23,12,30,900 जैसी भारी-भरकम और असंभव सी रकम चुकानी होती.

8. ‘ऐप्पल’ के ऐप्स को दुनिया में सबसे ज्यादा डाउनलोड किया जाता है.

9. साल 2011 में ‘ऐप्पल’ के CEO बने टिम कुक के बारे में एक बात बहुत प्रसिद्ध है. वो ये कि अगर आप ऐप्पल के एक कर्मचारी हैं तो कुक की तरफ से सुबह 4.30 बजे आने वाले ई-मेल के लिए तैयार रहें. कुक अपने हर कर्मचारी को सुबह 4.30 बजे ही ई-मेल कर देते हैं. अब ये तो उनके काम करने का अनोखा तरीका ही हो सकता है.

10. मात्र ‘ऐप्पल’ कंपनी के दम पर स्टीव जॉब्स 25 साल की उम्र में ही करोड़पति बन गये थे.

11. हम आपको बता देना चाहतो हैं कि आपको कभी भी ऐप्पल कम्प्यूटर्स के नजदीक धूम्रपान नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से की कम्प्यूटर की गारंटी खत्म हो जाती है.

12. क्या आप जानते हैं कि ऐप्पल आईफोन के हर विज्ञापन में 9:41 का ही समय दिखाया जाता है.

13. ऐप्पल के IPAD’S की रेटिना डिस्पले वास्तव में कंपनी सेमसंग (Samsung) द्वारा बनाई जाती है.

14. दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी कंपनी ‘ऐप्पल’ के बारे में एक बात है जो शायद आपको नहीं पता होगी, कि ‘ऐप्पल’ का 60 से 65 प्रतिशत व्यापार अमेरिका के बाहर से होता है. यानि की लाभ का एक तिहाई हिस्सा ऐप्पल का अमेरिका से नहीं बल्कि बाकी अन्य देशों से आता है.

15. इस कंपनी की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जापान में एक आदमी iPhone 6 के लिए 7 महीने तक लाइन में लगा था.

16. स्टीव जॉब्स को जब ऐप्पल iPod का पहला नमूना दिखाया गया था, तो उन्होंने इसे एक्वेरियम (Aquarium) में डालकर बुलबुले (Air Bubbles) का इस्तेमाल कर ये सिद्ध करने की कोशिश की कि इसमें अभी भी खाली जगह बाकी है और इसे अभी ओर छोटा बनाया जा सकता है.

17. ऐप्पल के ऐप स्टोर में 60% से अधिक एप्स ऐसे है जो आज तक कभी डाउनलोड नही किए गए हैं.

18. ऐप्पल में अपने आखिरी 15 साल तक स्टाव जॉब्स ने काम करने के सिर्फ 1 डॉलर बतौर सैलरी ली. इसके बावजूद जॉब्स की कुल पूंजी 7 बिलियन डॉलर से ज्यादा थी. स्टीव इस कंपनी के सबसे बड़े शेयर होल्डर थे।

19. क्या आप जानतो हैं कि ऐप्पल की मैकबुक (Macbook) की बैटरी आपको बंदूक की गोली से भी बचा सकती है, क्योंकि ये बुलेटप्रूफ (BulletProof) होती है.

20. इसे किसी रिकॉर्ड की तरह देखा जा सकता है कि साल 2012 में ऐप्पल ने 40 मिलियन आईफोन बेचे थे. इसका मतलब था औसत करीब 110000 आईफोन प्रति दिन बेचे गए थे, यानि कि औसत 4,583 आईफोन प्रति घंटे, 76 आईफोन प्रति मिनट और 1.26 आईफोन प्रति सेकंड. ये बात आपको जाननी चाहिए कि ऐप्पल के आईफोन दुनिया भर के करीब 90 देशों में बेचे जाते हैं.

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