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Hindi Story : गुजर जाते हैं जो मुकाम

Hindi Story : यह 50 बरस की उम्र भी बड़ी अजीब होती है, न तो व्यक्ति ठीक से जवान रह पाता है और न बूढ़ों में ही गिनती होती है.

आज रजनीश ने अपना 50वां जन्मदिन का केक काटा है. केक शुगरफ्री था क्योंकि रजनीश को डायबिटीज है. केक को खाने वाला वह और उस का इकलौता दोस्त डाक्टर नवीन ही तो हैं, इसलिए उस ने केक को शुगरफ्री बनवाया.

पिछले 10 वर्षों से अकेला है रजनीश, फिर भी वह अपना जन्मदिन सैलिब्रेट करना नही भूलता.

रजनीश केक काट कर उस का एक टुकड़ा खाने के बाद बाकी का केक फ्रिज में रख कर नीचे उतर आया. आगे के मोड़ से मुड़ कर वह पार्क में आ गया और पार्क के अंदर उगाई हुई घास में टहलने लगा. उस की नज़र वहां घूम रहे युवाओं व बच्चों पर पड़ी. वे सभी लोग अपनी गरदन झुकाए अपने मोबाइलों में व्यस्त थे.

‘हुंह, सब लोग कहते हैं कि मोबाइल ने हम से बहुतकुछ छीन लिया है पर फिर भी सब लोग मोबाइल में ही मस्त और व्यस्त हैं,’ उस की बुदबुदाहट में क्रोध और हताशा का मिश्रण था.

लागभग रोज़ ही रजनीश इस पार्क में आता है, कुछ और लोग भी आते हैं और पार्क में आने वाले लोगों में बिना एकदूसरे से बोले ही एक आपसी जानपहचान भी पनप जाती है. यदि उन लोगों में से कोई कुछ दिन न दिखाई दे तो मन खुद ही उस व्यक्ति को याद कर उठता है. रजनीश को भी 70 साल की उन अम्मा की याद आई जो अपनी 20 साल की पोती के साथ पार्क में आ कर बैंच पर बैठती हैं. और उन के बैठते ही उन की पोती उन्हें अपने साथ लाया हुआ एक रेडियो दे देती जिसे वे अपने कान से सटा लेती हैं. फिर धीरेधीरे उन की आंखों में कोई नई रोशनी सी जाग जाती है जो उन के गालों से होते हुए उन के होंठों पर मुसकराहट बन कर थिरक जाती है. और फिर, जैसे उन्हें दीनदुनिया से कोई मतलब नहीं रह जाता. शायद वे कोई फिल्मी गीत या गीतों वाला कोई प्रोग्राम सुन रही होंगी. पर अब रेडियो पर भला कितने ऐसे प्रोग्राम आते होंगे जो लोगों का तनाव दूर कर दें और उन्हें मुसकराने पर विवश कर दें.

इस बात का तो रजनीश को भी नहीं पता, भले ही रजनीश और रेडियो का पुराना नाता है. यह नाता तब शुरू हुआ था जब अपनी बीए की पढ़ाई खत्म करने के बाद उस ने अपना वौयस टैस्ट लखनऊ के आकाशवाणी केंद्र में दिया था और उस की गहराई ली हुई आवाज़ और उस के भारीपन व साफ उच्चारण के कारण उसे उदघोषक की नौकरी मिल गई थी.

हालांकि अभी उसे स्थाई तौर पर नियुक्तिपत्र नहीं मिला था, एक तरह से उस की नौकरी संविदा पर ही थी लेकिन सैलरी ठीकठाक थी. और फिर, समाज में तो आकाशवाणी में जौब करने वाले व्यक्ति को बड़ी अच्छी दृष्टि से देखा जाता है, इसलिए रजनीश संतुष्ट था.

रजनीश ने अपनी आवाज़, अद्भुत प्रतिभा और कल्पनाशीलता भरे प्रोग्राम्स के जरिए जल्दी ही लोकप्रियता हासिल कर ली. यह उस की कल्पनाशीलता ही थी कि रजनीश ने अपने श्रोताओं के लिए ‘मुझ से बातें करोगे’ नामक एक ऐसा प्रोग्राम लौंच किया जिस में रेडियो सुनने वाले लोग आकाशवाणी के बताए गए फोन नंबर पर डायरैक्ट फोन कर के रेडियो उदघोषक यानी रजनीश से बातें शेयर कर सकते थे.

इस दौरान रजनीश और श्रोताओं के बीच बहुत सी चुटकीली बातें होती, तो कहीं कुछ लोग अपनी व्यक्तिगत समस्याएं भी वताते और ये सब औन एयर चल रहा होता. स्पष्ट है कि इस प्रोग्राम में रजनीश को अपनी वाकपटुता द्वारा कार्यक्रम के संचालन में रुचि बनाए रखना होता था. रजनीश बहुत ही सुंदरता के साथ अपनी आवाज़ का जादू जगाता और लोगों के साथ बहुत आत्मीयता से जुड़ता, साथ ही, श्रोताओं की पसंद के गीतों को भी बजाया जाता. आकाशवाणी की कम होती लोकप्रियता एक बार फिर से बढ़ने लगी थी और लोग अपनी कार व दुकानों पर रेडियो सुनने लगे थे. उन सब का पसंदीदा उदघोषक था रजनीश.

‘मुझ से बातें करोगे’ नामक प्रोग्राम में मानसी नाम की एक लड़की का फोन कई बार आता और वह रजनीश से बड़े ही खुलेपन व खुलेमन से बात करती थी. उस का बिंदास होना मानसी को और लड़कियों से अलग बनाता था तभी तो रजनीश भी उस की हेलो सुन कर ही बिंदास मानसी को पहचान जाता और बिंदास होना शायद उस की चरित्रगत विशेषता थी. तभी तो औन एयर उस ने रजनीश से कहा था कि उस की आवाज़ से मानसी को प्यार हो गया है और वह ऐसी ही मखमली आवाज़ वाले व्यक्ति से शादी करना चाहेगी.

उस दिन तो गज़ब ही हो गया जब कार्यक्रम खत्म होने के बाद मानसी रजनीश से मिलने के लिए आकाशवाणी भवन के बाहर पहुंच गई थी. रजनीश को बातोंबातों में हजरतगंज चल कर कौफी पीने के लिए मना भी लिया. मानसी की हाज़िरजवाबी व बातबात पर उन्मुक्त हो कर हंसना रजनीश को भी अच्छा लगा.

बातें बढ़ीं तो मुलाकातों के दौर भी बढ़ गए. कौफी से बात शुरू हुई थी तो अब इन का संबंध टौकीज में जा कर एकदूसरे का हाथ थाम कर रोमांटिक मूवी देखने तक पहुंच गया था. हालांकि रजनीश को अपने व्यस्त शिड्यूल से घूमनेफिरने का समय निकाल पाना बहुत मुश्किल होता था पर मानसी के प्यार में इतनी गर्मजोशी  थी कि उसे ये सब करना पड़ता था.

प्रेमभरे दिन तेज़ी से बीतते हैं और दिन बीतने के साथ वह दिन भी आ गया जब मानसी ने खुद ही रजनीश के सामने उन दोनों की शादी का प्रस्ताव रख दिया. ‘प्यारव्यार तो ठीक है पर शादी करना ज़रा पेचीदा मामला है और फिर तुम मेरे परिवार के बारे में जानती ही क्या हो?’ रजनीश का लहज़ा थोड़ा तल्ख हो चला था

पर उस के इस सवाल के जवाब में जो मानसी ने कहा उसे सुन कर रजनीश की सारी कठोरता जाती रही. ‘सबकुछ जानती हूं तुम्हारे बारे में, यही न कि तुम एक सामान्य परिवार से हो और तुम पर विधवा मां और 2 कुआंरी बहनों की ज़िम्मेदारी है.’ मानसी की आवाज़ में प्यारभरी बेचैनी साफ झलक रही थी.

रजनीश ने अपने निम्नमध्यवर्गीय होने से ले कर अपनी हर ज़िम्मेदारी के बारे में मानसी को बता दिया था पर मानसी का रजनीश के लिए प्रेम किसी उफनते सागर की लहरों की तरह उमड़ रहा था.

मानसी ने रजनीश की मां और उस की बहनों से मुलाकात की और अपने व रजनीश के प्रेम के बारे में उन्हें सबकुछ बता दिया. रजनीश के घरवालों को मानसी का यह खुला और जल्दबाज़ीभरा व्यवहार थोड़ा अजीब तो लगा पर इस में भी एक अपनापन झलक रहा था. मानसी का रजनीश के घरवालों के साथ भी अच्छा संबंध बन गया था.

‘शादी तो करनी ही है, अच्छा होगा कि तू उस लड़की से शादी कर जो तुझ से प्रेम करती है.’ हालांकि अभी रजनीश को शादी करने की जल्दी नहीं थी फिर भी मानसी की तरफ से लगतर मनुहार किए जाने के कारण मां ने भी हरी झंडी दे दी थी और रजनीश व मानसी शादी के बंधन में बंध गए थे.

एक साल तक तो मानसी ने किसी कुशल बहू की तरह सब का ध्यान रखा और शादी का दूसरा साल लगतेलगते वह एक बेटी की मां बन गई. घर में खुशियों का माहौल था. कुछ महीनों बाद मानसी की रेलवे परीक्षा का परिणाम आया और उस की भरती रेलवे सीतापुर में क्लर्क के पद पर हो गई.

मानसी अपनी नौकरी को लेकर बहुत उत्साहित थी. रजनीश ने सीतापुर जा कर उस की जौइनिंग से ले कर उस के रहने का प्रबंध करवा दिया और छोटी बच्ची का ध्यान रखने के लिए अपनी छोटी बहन को उस के साथ भेज दिया.

हर सप्ताहांत में रजनीश मानसी के पास डेढ़ सौ किलोमीटर का सफर तय कर के आता और मानसी के साथ समय बिताता. लेकिन उस का जीवन जैसे 2 जगह बंट गया था. इसलिए मानसी ने अपना ट्रांसफर लखनऊ कराने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया. इतनी जल्दी ट्रांसफर होना कठिन था पर इस काम में मानसी की सहायता उस के एक सीनियर अधिकारी तेज़ वर्मा ने की जो मानसी से उम्र में तीनचार साल बड़े थे.

मानसी बच्ची को ले कर वापस लखनऊ शिफ्ट तो हो गई पर पिछले कुछ दिनों से मानसी से मिलने पर रजनीश को वह मानसी नहीं मिलती, उस के स्वभाव में परिवर्तन आ गया था जो चिड़चिड़ेपन और पारिवारिक मनमुटाव के रूप में बाहर आ रहा था. रजनीश ने कारण जानना चाहा तो मानसी ने सच बता दिया कि सीतापुर में पोस्टिंग के दौरान मानसी और तेज़ वर्मा के बीच प्रेम पनप गया है और उसे लगता है कि तेज़ वर्मा रजनीश से अच्छा जीवनसाथी साबित होगा.

 

रजनीश अवाक था. उसे अपने सुने पर भरोसा नहीं हो रहा था. कोई लड़की ऐसा कैसे कर सकती है और क्या उस का पति कोई ‘चौइस’ है जिसे वह बदलना चाह रही है. पर, मानसी ऐसी ही थी. उस का प्यार एक बुलबुले की तरह था जिसे उठने की जितनी जल्दी होती है तो फूट जाने का उतालवनापन भी उतना ही रहता है.

 

कैसे कोई शादीशुदा और छोटे बच्चे वाली औरत ऐसा कर सकती है और फिर रजनीश तो निम्नमध्यवर्गीय परिवार से था, उस के परिवारों में तो शादी को सात जन्मों का बंधन माना जाता है और तलाक को एक बदनुमा दाग. दिमाग नहीं चल रहा था रजनीश का, इसलिए उस ने अपने इकलौते दोस्त डाक्टर नवीन को सारी बातें बताईं व इस मसले पर उस की राय मांगी.

डाक्टर नवीन ने उसे मानसी को तलाक दे देने की बात कही, ‘इतना ही कम है क्या कि मानसी ने तुम्हें सब सच बता दिया. अगर वह चाहती तो बड़े आराम से दो नावों पर पैर रख सकती थी.’

नवीन द्वारा मानसी को क्लीन चिट दिया जाना रजनीश को अखर रहा था. बहस और तर्क का समय नहीं था और वैसे भी मानसी द्वारा अपने प्रेम को स्वीकार कर लेने के बाद तो रजनीश के पास उसे तलाक देने के अलावा कोई चारा ही नहीं था. दोनों ने आपसी सहमति से कोर्ट में जा कर तलाक ले लिया पर आश्चर्यजनक रूप से बेटी को मानसी ने अपने पास रखा, लेकिन उस के जीवनयापन के लिए रजनीश से पैसे लेने के लिए अतिरिक्त दबाव नहीं बनाया.

मानसी के जाने के बाद रजनीश मानो सदमे में चला गया था. मानसी ने खुद ही उस से शादी की पहल की थी और परिवार को भी आगे बढाया. फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि उस का मन किसी परपुरुष के साथ लग गया और वह अपने पति को तलाक तक देने को राजी हो गई. अपनेआप से बहुत सवाल करने के बाद इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल सका रजनीश को.

रजनीश की मनोव्यथा इतनी बढ़ गई थी कि वह दोबारा आकाशवाणी के माइक पर बोल नहीं सका और उदघोषक का कार्य छोड़ कर औफिस की क्रिएटिव टीम का हिस्सा बन कर काम करने लगा. साथियों ने उसे इस सदमे की हालत से निकालने का बहुत प्रयास किया पर वे सफल नहीं हुए और फिर रजनीश का मन आकाशवाणी में लग भी तो नहीं रहा था. सो, रजनीश ने वहां से त्यागपत्र दे दिया.

 

दुखदर्द और समस्याओं के आने से अपनी जिम्मेदारियों से तो मुंह नहीं मोड़ा जा सकता. रजनीश ने अपनी दोनों बहनों की शादी कर दी और अपनी विधवा मां का उन के जीवित रहने तक बराबर ध्यान रखा. शायद रजनीश दोबारा शादी करने की मां की ज़िद मान लेता तो मां और जी जाती पर रजनीश एक बार धोखा खाने के बाद दोबारा धोखा नहीं खाना चाहता था.

पिछले 20 सालों में लखनऊ में काफीकुछ बदल गया था. इन वर्षों में मानसी कहां गई थी और किस हाल में रही, उस की बेटी कैसी है और क्या उसे अपने पापा की याद नहीं आती है? ये सब जानने की कोशिश तक नहीं की थी रजनीश ने और खुद को भी इतना मजबूत रखा था कि उसे भी अपनी बेटी की याद न आए.

 

आज पार्क में उस अम्मा को निहार रहा था, तभी रजनीश ने मोबाइल पर एक अनजाना नंबर देख कर अनमने मन से फोन उठाया. “हां जी, कहिए.” पर रजनीश को उत्तर नहीं मिला. उस ने फिर हेलो किया पर उत्तर नदारद था. फोन करने वाला जी भर कर रजनीश की आवाज़ सुन लेना चाहता था. उकता कर रजनीश ने फोन काट दिया.

पर फोन फौरन फिर बज उठा और जब रजनीश ने हेलो किया तब उधर से एक महिला का स्वर था. चूंकि 20 साल में चेहरा बदलने के साथसाथ आवाज़ भी बदल जाती है, इसलिए महिला ने खुद अपना नाम बता दिया.

“देखो रजनीश, प्लीज़ फोन मत काटना. मैं बोल रही हूं तुम्हारी मानसी.”

रजनीश मौन था, उसे क्या बोलना है, यह समझ भी नहीं आ रहा था उसे. मानसी उसे फोन कर रही है पर उस ने तो सालों पहले ही अपना रास्ता अलग कर लिया था और फिर, अब क्यों?

 

“दरअसल मैं तुम से मिलना चाहती हूं, बस. इस के अलावा कुछ नहीं चाहिए मुझे और मैं जानती हूं कि तुम मुझ से बहुत नफरत करते होगे पर एक बार मिल लो,” मानसी के स्वर में याचना का भाव लग रहा था और उस की आवाज़ में बहुत थकावट सी भी लग रही थी.

रजनीश बारबार फोन को काट देना चाहता था. वह मानसी पर चिल्लाना भी चाहता था पर ये सब कर न सका और कुछ न बोल सका. ‘पर इतने सालों बाद, अब, मिलनेमिलाने में क्या सार है?’ रजनीश बुदबुदाया.

लेकिन मानसी 20 साल पहले की तरह ही उतावली लग रही थी.

आखिरकार, रजनीश ने बेमन से मिलने के लिए हां कर ही  दिया.

दोनों ने परिवर्तन चौक के पास शहादत अली के मकबरे पर मिलना तय किया. रिश्ता खत्म हुए 20 साल हो गए थे, इसलिए उन लोगों को  मकबरे की शांति ज्यादा सुहा रही थी.

रजनीश जब पहुंचा तब मानसी वहां पहले से ही थी. दोनों की नजरें टकराईं तो रजनीश के मन में एक विषाद सा पैदा हो गया, उस ने देखा कि मानसी की सुंदर और छरहरी काया अब थोड़ी सी स्थूलकाय हो चली थी और बाल कनपटी के पास से सफेद होने लगे थे व चेहरे में कसावट की जगह थोड़ा ढीलापन आने लगा था. मानसी ने भी रजनीश के चेहरे पर ढीलापन देखा था.

रजनीश ने मानसी के चेहरे से नज़रें हटा लीं और उस के बोलने का इंतज़ार करने लगा. कुछ मिनटों तक खामोशी ही छाई रही थी.

“तुम ने तो कभी मेरा हाल जानने की कोशिश ही नहीं की,” मानसी की हलक से बड़ी मुश्किल से शब्द निकल रहे थे.

“तुम ने कोई संबंध ही कहां रखा था,” रूखे स्वर में रजनीश ने कहा.

टूटे हुए रिश्ते आज आमनेसामने थे और दोनों के बीच एक खाई सी थी जो अब भर नहीं सकती थी. मानसी ने हिम्मत कर के बोलना शुरू किया और रजनीश को बताया कि तेज़ वर्मा के साथ शादी कर लेने का उस का निर्णय किस तरह से गलत निकला था.

तेज़ वर्मा की फितरत ही औरतों को धोखा देने वाली थी. उस का अफेयर किसी फैशन मौडल से हुआ तो उस ने मानसी को छोड दिया. तब मानसी को एहसास हुआ कि अपने साथी द्वारा छोड़ा जाना कितनी पीड़ा पहुंचाता है. उस के बाद मानसी ने अपनी बेटी की परवरिश अकेले ही की. भले ही उस के पास सरकारी नौकरी थी पर फिर भी वह अपनी बेटी को पिता का प्यार, अनुशासन नहीं दे पाई थी.

नतीजा यह निकला कि वह मात्र 20 साल की गलत संगत में पड़ गई है और नशे का शिकार हो गई है. तरात वह घर नहीं आती, न तो उसे पढ़ाईलिखाई की चिंता है और न ही कैरियर बनाने का शौक.

मानसी अपनी कहानी आगे भी सुनाना चाहती थी पर रजनीश ने खीझते हुए उसे रोक दिया, “मुझ से चाहती क्या हो? और फिर, आज यह कहानी सुनाने का क्या फायदा, तुम पहले भी तो आ सकती थीं मेरे पास?”

“बस, हिम्मत नहीं कर पाई और किस मुंह से आती. पर अब लगता है कि मैं ने तुम्हारे साथ गलत किया. बस, एक बार माफ कर दो मुझे. और कुछ नहीं चाहिए तुम से,” मानसी गिड़गिड़ा रही थी.

मानसी के चरित्र में उतावलापन था. बहुत जल्दी ही अपने सारे निर्णयों को वह सही मान कर आगे बढ़ जाती थी. जिस तरह से उस ने रजनीश से शादी करने में ज़िद दिखाई उसी तरह की ज़िद तेज़ वर्मा के साथ घर बसाने में की और क्या पता आज भी वह किसी जल्दबाज़ी में ये सब बात कर रही हो.

रजनीश कुछ बोल नहीं पा रहा था. फिर भी उस ने इतना कहा, “माफ करने के लिए मेरे तुम्हारे बीच में कोई रिश्ता तो होना चाहिए. तुम ने वही नहीं रखा, तो अब क्या ज़रूरत है इस सब नाटक की. तुम ने मुझे जो दंश दिया उस के कारण पूरी स्त्री जाति से मेरा भरोसा उठ गया है. इस का परिणाम यह रहा कि मैं ने आज तक दोबारा शादी नहीं की.”

माफी और पश्चात्ताप की सारी बातों को पूरी तरह खत्म कर दिया था रजनीश ने. मानसी अकेली मकबरे के लौन में खड़ी थी. उस के आंसू भी उस की आंखों का साथ छोड़ रहे थे.

बात को तीनचार दिन बीत गए. दरवाज़े पर दस्तक हुई तो रजनीश ने दरवाज़ा खोला, देखा, सामने डाक्टर नवीन खड़ा था. दोनों बैठने के बजाय सीधा किचन में गए जहां नवीन चाय बनाने लगा. हमेशा नवीन ही चाय बनाता था क्योंकि रजनीश को अच्छी चाय बनानी नहीं आती थी.

“माफ क्यों नहीं कर देते मानसी को,” नवीन अचानक से बोल उठा था.

नवीन के मुंह से आज इतने सालों बाद मानसी का नाम सुन कर रजनीश हैरान था. उस ने सवालिया नज़रों से नवीन को देखा. आंखों के सवालों को समझ कर नवीन ने सोफे पर बैठे हुए, चाय की चुस्की के साथ उत्तर देना शुरू कर दिया

“इतना ही कम है क्या कि 20 साल बाद ही सही पर उसे अपने अपराध का बोध हुआ और वह तुम से माफी मांग रही है. अगर न भी मांगे तो क्या?” एक लंबी सांस छोड़ी थी नवीन ने और आगे कहना शुरू किया.

उस ने बताया कि पिछले दिनों मानसी नवीन के अस्पताल में ही अपनी बेटी दिया को ले कर आई थी. दिया ने एक नशीली दवा का ओवरडोज़ ले लिया था. दिया को ठीक करने में डाक्टर नवीन ने पूरी जान लगा दी थी क्योंकि मानसी और नवीन एकदूसरे को पहचान गए थे. दिया की तबीयत ठीक हुई तो मानसी ने नवीन को अपने बीते सालों के बारे में बताया कि उसे कैसे अपने किए पर पछतावा है और नवीन से ही मानसी ने रजनीश का नंबर लिया था.

“पर इतने दिनों बाद भला मेरी ज़रूरत क्यों?” रजनीश का धैर्य जवाब दे चुका था.

“तुम्हारी ज़रूरत उसे अपने लिए नहीं बल्कि अपनी बेटी के लिए है क्योंकि मानसी को लास्ट स्टेज का कैंसर है और वह अधिक दिन जीवित नहीं रहेगी. इसलिए मरने से पहले वह अपनी बेटी को तुम्हारे सेफ हाथों में सौंप जाना चाहती है.” एक ही सांस में सब कह गया था डाक्टर नवीन.

सन्न रह गया था रजनीश. भले ही मानसी से उस का कोई रिश्ता नहीं रह गया था पर उस की बेटी में तो रजनीश का ही खून था. इतने वर्षों अलग रहने के बाद ममता दब सी गई थी जो अब जागती सी मालूम हुई पर मानसी के बारे में सुन कर रजनीश को ज़रूर दुख हुआ. लेकिन यह मानसी ही तो थी जिस के कारण उस का जीवन, उस का कैरियर सब बरबाद हुआ. इसलिए फिर भी नवीन को वह कोई उत्तर न दे सका.

आज इन सब बातों को 15 दिन बीत चुके हैं. रजनीश शाम को पार्क में पहुंचा और अपनी पसंदीदा बैंच पर बैठ गया. सामने अम्मा वाली बैंच आज खाली थी, सिर्फ उन की पोती ही अकेले बैठी थी और उस के पास वही रेडियो रखा था. उस की बेटी दिया इतनी बड़ी ही होगी, रजनीश उस लड़की के पास पहुंचा.

“आज आप की दादी नहीं आईं?” रजनीश ने सवाल किया, तो वह लड़की फफक कर रो पड़ी और रोतेरोते उस ने बताया कि दादी को कैंसर था, उन की मृत्यु हो गई है.

“कैंसर…” रजनीश के होंठ हिल रहे थे. उस ने सुना कि रेडियो पर धीमी आवाज़ में एक गीत बज रहा था जिस के बोल थे-

‘जिंदगी के सफर में गुज़र जाते हैं जो मुकाम, वो फिर नहीं आते…’

रजनीश वहां खड़ा न रह सका. वह नवीन के फ्लैट की तरफ बढ़ चला और कांपते हाथों से उस ने मानसी का नंबर डायल कर दिया था.

 

Dr. Manmohan Singh : ‘द एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्‍टर’ पर अनुपम खेर vs हंसल मेहता

Dr. Manmohan Singh  के निधन के बाद उनपर बनी फिल्म ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ को ले कर इस के क्रिएटिव डायरेक्टर द्वारा फिल्म की आलोचना करने पर फिल्म अभिनेता अनुपम खेर के बीच बहस छिड़ गई.

संजय बारू की किताब पर सवाल

कहते हैं सच्चाई आखिरकार सामने आ ही जाती है, पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ पर आधारित अनुपम खेर अभिनीत फिल्म इन दिनों चर्चा में आ गई है.और परत दर परत सच्चाई सामने आ रही है कि दरअसल ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ फिल्म डा. मनमोहन सिंह की छवि को आघात पहुंचाने के लिए बनाया गया था. दरअसल, किसी भी घटनाक्रम, स्थितियों को देखने का तरीका सकारात्मक या नकारात्मक हो सकता है.
जहां तक बात संजय बारू की किताब का सवाल है वह पहले से ही नकारात्मक भाव लिए हुए थी और एक प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार होने के कारण उन्हें इसलिए हाथोंहाथ लिया गया और कहा जाता है उन्होंने व्यवसायिक लाभ उठाया.

डा. मनमोहन सिंह और जीडीपी

डा. मनमोहन सिंह एक ऐसे प्रधानमंत्री थे जिन्होंने सिर्फ अपने काम पर ध्यान दिया था और दुनिया भर के बड़े लोगों ने उन के अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री रहते उन के योगदान होने का लोहा माना और सब से बड़ी बात उन के समय काल 10 वर्ष में जो भारत की जीडीपी ऊंचाई हासिल कर रही थी, उस के बारे में कहा जाता है,भूतो न भविष्यति. इस से स्पष्ट हो जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह का कद कितना बड़ा था, काम देश को कितना आगे ले जाने वाला था. शायद यही कारण है कि नरेंद्र मोदी की सरकार लाख कोशिश करने के बाद भी उन की लोकप्रियता के तूफान को रोक नहीं पाई है और मीडिया व जनमानस में डाक्टर मनमोहन सिंह को उन के योगदान को याद किया जा रहा है.

आइए अब आप को बताते हैं- ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ किस तरह अब सच्चाई की धरातल पर तारतार हो कर के देशदुनिया के सामने आ गई है. इस फिल्म के क्रिएटिव डायरेक्टर हैं हंसल मेहता. जिन्होंने वरिष्ठ पत्रकार वीर संघवी की एक पोस्ट पर सहमति जता कर बता दिया की सच्चाई यह है. इस पर डाक्टर मनमोहन सिंह का किरदार निभाने वाले अनुपम खेर उखड़ गए, बोले- ‘डबल स्टैंडर्ड, आप क्रिएटिव डायरेक्टर थे, फीस भी ली होगी.’
पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के निधन के बाद फिल्म इंडस्ट्री के दो कलाकारों के बीच उन पर बनी फिल्म पर बहस छिड़ गई जिस में दोनों की अपनीअपनी भूमिका थी. दरअसल, एक जर्नलिस्ट ने मनमोहन सिंह पर बनी फिल्म ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ की आलोचना की, जिस में अनुपम खेर ने उन की भूमिका निभाई थी.

 हंसल मेहता का ‘+100’ वाला मामला

इस आलोचना पर फिल्म के क्रिएटिव डायरेक्टर रहे हंसल मेहता ने सहमति जता दी, जिस पर अनुपम खेर भड़क गए. लेखक और जर्नलिस्ट वीर सांघवी ने एक सोशल मीडिया पोस्ट शेयर कर आरोप लगाए कि फिल्म द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर ने मनमोहन सिंह की छवि बिगाड़ी थी. उन की पोस्ट के जवाब में फिल्म के क्रिएटिव डायरेक्टर हंसल मेहता ने ‘+100’ लिखा और दबे शब्दों में सहमति जता दी.
इधर, अपनी ही फिल्म की आलोचना करने वाले हंसल मेहता का बयान आते ही फिल्म में लीड रोल निभाने वाले अनुपम खेर भड़क गए. उन्होंने जवाब में लिखा, इस थ्रेड में पाखंडी वीर सांघवी नहीं है. उन्हें किसी फिल्म को पसंद न करने की आजादी है. लेकिन हंसल मेहता ‘द एक्सीडेंट प्राइम मिनिस्टर’ के क्रिएटिव डायरेक्टर हैं. जो इंग्लैंड में फिल्म की पूरी शूटिंग के दौरान मौजूद थे. अपना क्रिएटिव इनपुट दे रहे हैं और इस के लिए फीस भी ली होगी.
आगे अनुपम खेर ने लिखा, उन के लिए वीर सांघवी की टिप्पणी पर 100% कहना बहुत ही गड़बड़ और डबल स्टैंडर्ड से भरा है.

ऐसा नहीं है कि मैं सांघवी से सहमत हूं लेकिन हम सभी बुरा या उदासीन काम करने में सक्षम हैं हमें इसे अपनाना चाहिए. ऐसा नहीं है कि हंसल मेहता कुछ खास वर्ग के लोगों से कुछ पैसा कमाने की कोशिश कर रहे हैं. अरे हंसल, बड़े हो जाओ. मेरे पास अभी भी शूटिंग के हमारे सभी वीडियो और तस्वीरें हैं. इसी के साथ अनुपम खेर ने हंसल मेहता का 2019 में किया गया ट्वीट भी शेयर किया है, जिस में उन्होंने ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर फिल्म’ और उन के एक्टर्स की तारीफ की थी.

मनमोहन सिंह को मौनी बाबा कहने वाले भौंचक्‍क

विवाद बढ़ने के बाद हंसल मेहता ने भी पलटवार किया. उन्होंने पोस्ट कर लिखा-“मिस्टर खेर, जाहिर है मैं अपनी गलतियों का मालिक हूं. मैं स्वीकार कर सकता हूं कि मुझ से गलती हुई. क्या मैं नहीं कर सकता सर? मैं ने अपना काम उतना प्रोफेशनली किया, जितनी मुझे अनुमति थी. क्या आप इस से इनकार कर सकते हैं? लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि मुझे फिल्म का बचाव करते रहना होगा. पैसे कमाने और पाखंड की बात पर मैं आदरपूर्वक यही कहूंगा कि आप लोगों को वैसे ही देखते हैं, जैसा खुद को.”
कुल मिला कर के पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के जीवन के एक पक्ष को जिसे संजय बारू ने मीडिया सलाहकार के रूप में देखा और लिखा, वह एक पक्ष हो सकता है जबकि होना यह चाहिए कि डाक्टर मनमोहन सिंह का संपूर्ण आकलन करते हुए यह फिल्म नहीं बन पाई और इसीलिए दर्शकों ने भी इसे नकार दिया था.

मनमोहन सिंह को अक्सर मौनी बाबा या गूंगा कह कर चिढ़ाते रहने वाले भी उस वक्त भौंचक्क रह गए जब आमलोगों ने अपनी डीपी और स्टेट्स पर उन की तस्वीर लगाई. ये वे लोग थे जिन्हें आमतौर पर राजनीति से कोई खास सरोकार नहीं होता लेकिन उन्होंने अपनी भावनाएं सोशल मीडिया पर उतने ही शिष्ट तरीके से प्रदर्शित कीं जितने शिष्ट खुद मनमोहन सिंह थे. उन्होंने कभी लोकप्रियता बटोरने सस्ते तो दूर महंगे हथकंडे भी नही अपनाए.
शांत, सौम्य और गहरी नजर रखने वाले मनमोहन सिंह ऐसा नहीं है कि 2014 के बाद या उस से पहले भाजपा की नफरत फैलाऊ राजनीति पर खामोश रहे हों. उन्हें देश की चिंता थी, लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान मई के आखिरी सप्ताह में उन्होंने पंजाब के मतदाताओं के नाम जारी एक पत्र में लिखा था, मोदी ने नफरत फैलाने वाले भाषणों का सब से क्रूर रूप अपनाया है जो पूरी तरह से विभाजनकारी है अतीत में किसी भी पीएम ने समाज के किसी खास वर्ग को या विपक्ष को निशाना बनाने के लिए इस तरह के घृणित असंसदीय शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया है.

भाजपा का कौपीराइट

इस के पहले एक पब्लिक मीटिंग में भी मोदी पर हमलावर होते उन्होंने कहा था मैं ने कभी भी अपने जीवन में एक समुदाय को दूसरे से अलग नहीं किया यह पूरी तरह से भाजपा का कौपीराइट है. मनमोहन सिंह ने भाजपा सरकार की आर्थिक नीतियों को भी कटघरे में खड़ा करते कहा था भाजपा सरकार के कार्यकाल में औसत जीडीपी वृद्धि दर गिर कर 6 फीसदी से नीचे आ गई है जबकि कांग्रेस यूपीए के कार्यकाल के दौरान यह 8 फीसदी के लगभग थी अभूतपूर्व बेरोजगारी और बेलगाम मुद्रास्फीति ने असमानता को बहुत बढ़ा दिया है जो अब 100 साल के उच्चतम स्तर पर है. केंद्र सरकार की अग्निपथ योजना को भी उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा करार दिया था.

जाहिर ये विचार सिर्फ चुनावी राजनीति का हिस्सा नहीं थे बल्कि उन में एक आर्थिक दर्शन भी था जिसे कम लोग ही समझ पाए और जिन्होंने समझा वे वो लोग थे जो बंद कमरों में बहस या चर्चा कर देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी हुई मान लेते हैं. मनमोहन सिंह के निधन के बाद एक अदृश्य बैचेनी आमलोगों में देखी गई उस के माने यही हैं कि लोग मौजूदा प्रधानमंत्री की 10 – 12 फीसदी लोगों को खुश करने बनी धार्मिक नीतियों को अब और ढोने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं लेकिन अब कर कुछ नही पा रहे हैं ऐसे मनमोहन सिंह के निधन के बाद लोगों ने उन्हें शिद्दत से याद किया जबकि उन के कोई सीधे राजनैतिक सरोकार उन से नहीं थे. उन के पास अर्जित लोकप्रियता थी जिस का खौफ उन के अंतिम संस्कार के समय में भी जानबूझ कर खड़े किए गए विवादों की शक्ल में भी देखने में आया था.

Constitution : संविधान के 75 वर्ष – हाकिम के हाथ बांधने के

Constitution : भारत का संविधान 75 वर्षों से लोकतंत्र की नींव और स्वतंत्रता का सब से बड़ा रक्षक रहा है. यह मात्र एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि देश के हर नागरिक के अधिकारों, सम्मान और समानता का प्रतीक है. लेकिन संविधान पर बहस अकसर राजनीति और आरोपप्रत्यारोप के धुंधले परदों में गुम हो जाती है. संसद में हुई ताजा चर्चा भी इस से अलग नहीं थी. सवाल यह है कि क्या यह दस्तावेज अब भी आम लोगों के आत्मविश्वास का आधार बना हुआ है?

शीतकालीन सत्र में दिसंबर के तीसरे सप्ताह संसद में संविधान पर हुई बहस को दोटूक कहा जाए तो लगभग निरर्थक और बेमानी इन मानो में थी कि सत्ता और विपक्ष दोनों अपनीअपनी पार्टियों का एजेंडा आलापते नजर आए. दोनों ने ही अधिकतर वक्त व्यक्तिगत और दलगत आरोपप्रत्यारोपों में जानबू झ कर जाया किया ताकि मुद्दे की बातें न करनी पड़ें. संविधान कैसे आम लोगों के आत्मविश्वास और स्वाभिमान की सब से बड़ी वजह है, इस पर बोलने से सभी वक्ता कतराते नजर आए. कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी ने लोकसभा में बहस की शुरुआत जोरदार ढंग से की लेकिन बाद में वे भी सरकार को घेरने से चूक गए.

जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो शुरू से ही लड़खड़ाते नजर आए. लगा ऐसा मानो कि वे अभी भी लोकसभा चुनाव प्रचार कर रहे हों कि देश नेहरू और उन के परिवार के कारण पिछड़ा है. अब न तो यह राहुल गांधी ने पूछा या बताया और न ही किसी दूसरे कांग्रेसी ने कि अगर हम और हमारे पूर्वज नेहरू ने संविधान न बनाया होता और लागू भी न किया होता तो देश आज किन हाथों में होता और कहां खड़ा होता और खड़ा हो भी पाता या नहीं. इस से भी ज्यादा अहम बात यह कि आधुनिक भारत की नींव रखने वाले नेहरू का आभार भाजपा दलगत राजनीति से परे हो कर क्यों नहीं मान पाती.

राहुल गांधी ने बहस को मनुस्मृति बनाम संविधान पर लाते भाजपा को घेरने में आंशिक तौर पर जरूर सफलता हासिल कर ली थी. उन्होंने महाभारत के प्रचलित प्रसंग गुरु द्रोणाचार्य द्वारा आदिवासी एकलव्य के अंगूठा काटे जाने को उठा कर भाजपा और हिंदूवादी संगठनों की दुखती और कमजोर नब्ज पर हाथ रखा. लेकिन तुरंत ही भाजपाइयों ने भी एकजुट हो कर आदतन हल्ला मचाते नेहरू और उन के परिवार को संविधान के दुरुपयोग की बाबत घेरा तो बहस पटरी से उतरती नजर आई.

पहले दिन जो दिलचस्पी आम लोगों की इस बहस में पैदा हुई थी वह दूसरे दिन ही फुस्स हो कर रह गई. दरअसल, लोग संविधान पर जिस स्तर की बहस की उम्मीद कर रहे थे उस में शामिल होना तो यह चाहिए था कि संविधान किसी को भी, यहां तक कि सरकार को भी, निरंकुश होने की छूट या इजाजत नहीं देता बल्कि उसे बाध्य करता है कि वह लोगों के अधिकारों की रक्षा करे. इस का हरेक अनुच्छेद सरकार के हाथ बांधते और मुश्कें कसता हुआ है जबकि आम धारणा यह है कि संविधान सरकार को कुछ भी करने की छूट देता है.

मनुवाद बनाम संविधान

इस के बाद भी इस बहस से जो तुक की बातें निचोड़ के तौर पर सामने आईं उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, मसलन यह कि इस में कोई शक नहीं कि हिंदूवादी संगठन ऐसा संविधान नहीं चाहते थे जैसा कि यह है और इस का दोषी वे जवाहरलाल नेहरू को ठहराते हैं जिन्होंने, दरअसल, संविधान बनाया था. लेकिन इस का पूरा श्रेय उन्होंने डाक्टर भीमराव अंबेडकर के खाते में जाने दिया.

मुमकिन है नेहरू राजनीतिक वजहों के चलते हिंदूवादियों से सीधे न उल झना चाह रहे हों, दूसरे, मनुस्मृति आधारित देश की परिकल्पना को वे संविधान के जरिए ध्वस्त करने की अपनी मंशा पूरी कर चुके थे. बाद में हिंदू कोड बिल ने रहीसही कसर पूरी कर दी थी.

अंबेडकर घोषिततौर पर मनुवाद के घोर विरोधी थे लेकिन चूंकि दलित थे इसलिए 50 के दशक की तरह अब भाजपा और हिंदूवादी संगठनों की हिम्मत उन्हें कोसने की नहीं पड़ती क्योंकि दलित समुदाय समाज और राजनीति में अहम होते और ताकत बनते जाने के अलावा जागरूक होता जा रहा है.

2014 और 2019 के आम चुनाव में दलित वोटों के दम पर ही भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई थी. लेकिन 2024 के चुनाव में दलितों ने उसे अंगूठा दिखा दिया था, नतीजतन उसे बैसाखियों का सहारा ले कर सरकार बनानी पड़ी.

इस चुनाव में इकलौता मुद्दा संविधान ही था जिस के बारे में कांग्रेस लोगों को यह बताने में कामयाब रही थी कि अगर तीसरी बार मोदी सरकार सत्ता में आई तो अपने मंदिर मोह के चलते वह या तो संविधान को खत्म ही कर देगी या फिर इतना बेदम कर देगी कि दलितों, आदिवासियों, मुसलमानों और औरतों को पहले की तरह ऊंची जाति वालों की गुलामी ढोने को मजबूर होना पड़ेगा. यह बात असर कर गई जिस से 400 पार का ख्वाब देख रही भाजपा महज 240 सीटों पर सिमट कर रह गई.

लोग नरेंद्र मोदी के 2 मई को दिए एक पब्लिक मीटिंग में उस भाषण से भी डर गए थे जिस में उन्होंने संविधान की तुलना धर्मग्रंथों से कर दी थी.

संविधान की 75वीं वर्षगांठ पर संसद में हुई संविधान पर बहस के मद्देनजर सोचना स्वाभाविक है कि अगर संविधान पूरी तरह अंबेडकर की परिकल्पना था तो भाजपाई और हिंदूवादी संगठन बजाय उन्हें दोष देने के नेहरू को ही क्यों संविधान की बाबत कोसते रहते हैं और उलटे हैरतअंगेज तरीके से भीमराव अंबेडकर का पूजापाठ वे हिंदू देवीदेवताओं की तरह क्यों करने लगे हैं. जाहिर है, नेहरू और उन के वंशजों को कोसना आसान काम है बनिस्बत अंबेडकर को कोस कर दलितों से सीधा पंगा लेने के, जो खुद को सामूहिक गर्व से अंबेडकर की संतान कहते हैं.

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने यह गलत नहीं कहा कि आरएसएस ने जम कर संविधान का विरोध किया था क्योंकि यह मनुस्मृति पर आधारित नहीं था.

संविधान जब बना उस वक्त इन लोगों ने संविधान जलाया, रामलीला मैदान में नेहरू, बाबासाहेब और महात्मा गांधी  के पुतले जलाए. खड़गे ने आरएसएस मुखपत्र ‘और्गेनाइजर’ की तत्कालीन संपादकीय का हवाला देते कहा कि इन्होंने न तो संविधान को स्वीकार किया और न ही तिरंगे  झंडे को माना.

कोर्ट के आदेश पर इन्हें 26 जनवरी 2002 को मजबूरी में संघ मुख्यालय पर तिरंगा फहराना पड़ा. बाबासाहेब यानी भीमराव अंबेडकर को इन लोगों ने भगवा  झंडा दिखाया था. खड़गे यहीं नहीं रुके, उन्होंने सरकार को यह कहते भी घेरा कि उस ने 11 साल संविधान को मजबूत करने का क्या काम किया, वह बताए.

जिस तरह संसद में संविधान पर हुई बहस बेमानी और निष्कर्षहीन है उसी तरह इस बहस में किस ने क्या कहा, यह भी बेमानी ही होगा क्योंकि संविधान वह किताब है जो आम लोगों को उन के अधिकारों के प्रति न केवल आश्वस्त करती है बल्कि उन्हें स्वाभिमान से जीने की गारंटी भी देती है.

यह धर्मग्रंथों की तरह लोगों को पापपुण्य, स्वर्गनरक और अगले जन्म की योनि का डर नहीं दिखाती. जाहिर है संविधान वेद, पुराणों, स्मृतियों, उपनिषदों, संहिताओं, रामायणों और श्रीमद् भगवदगीता जैसे धर्मग्रंथों से कहीं ज्यादा प्रभावी और उपयोगी है.

भाजपा और कांग्रेस दोनों ही इस की रक्षा और सम्मान करने की कसमें सड़क से ले कर संसद तक में खाने लगे हैं तो इस से संविधान की अहमियत ही उजागर होती है. लेकिन संसद में हुई बहस जो सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंची उस से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि कट्टर हिंदूवादियों और जातिगत श्रेष्ठता से ग्रस्त सवर्णों के मन में संविधान को ले कर एक कसक और टीस तो है कि यह ऐसा क्यों है जैसा कि है, यह वैसा क्यों नहीं है जैसा कि विनायक सावरकर हेडगेवार, गोलवलकर और करपात्री महाराज जैसे उन के अगुआ कट्टर हिंदूवादी नेता चाहते थे. इसलिए अधिकतर सवर्ण इस मसले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शान में कसीदे नहीं गढ़ पाए. वजह यह स्पष्ट हो जाना है कि अब इस संविधान को वे भी खत्म नहीं कर सकते. और तो और, मनमाफिक और मनमरजी के संशोधन भी वे नहीं कर सकते.

मिला वोटिंग का हक

संविधान के लागू होते वक्त इस पर हायहाय करते कट्टरवादियों के मुकाबले खासतौर से दलित आदिवासी, मुसलमान और औरतें रोमांचित और खुश थे क्योंकि उन्हें वोट देने का हक पहली बार मिला था, जिस के इस्तेमाल से वे अपनी पसंद की सरकार चुन सकते थे.

यह अधिकार उन के लिए अकल्पनीय था क्योंकि तत्कालीन समाज में उन की हैसियत गुलामों और मवेशियों सरीखी सी ही थी. इस से छुटकारा चूंकि कांग्रेस, नेहरू और अंबेडकर का बनाया संविधान दिला रहा था इसलिए लंबे वक्त तक वे कांग्रेस को ही चुनते हुए उस के प्रति आभार व्यक्त करते रहे और शायद आगे भी करते रहते यदि इंदिरा गांधी ने संविधान का मनमाना इस्तेमाल करते 1975 में इमरजैंसी न थोपी होती.

आम लोग संविधान से मिले अपने मौलिक अधिकारों के प्रति कितने संजीदा और सजग थे (और अभी भी हैं), इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि संविधान में किया गया 42वां संशोधन उन्हें रास नहीं आया था जोकि आपातकाल लागू करने के लिए किया गया था.

आज की तरह लोग तब भी धर्मस्थलों से ज्यादा कानून और अदालतों पर आंख बंद कर भरोसा करते थे जिसे इंदिरा गांधी ने तोड़ा तो 1977 के आम चुनाव में वोटरों ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने में देर नहीं की थी. अपनी आजादी और दूसरे मौलिक अधिकारों की हिफाजत लोगों ने की तो उसी वोट की ताकत से की जो कांग्रेस ने ही उन्हें संविधान के जरिए दी थी.

यूनिवर्सल सफ्रिज का अधिकार

नागरिक शास्त्र में मामूली दिलचस्पी रखने वाला व्यक्ति भी बेहतर जानता है कि जिस देश में जितने ज्यादा लोगों को मतदान का अधिकार मिला होता है वह देश उतना ही जनतांत्रिक होता है.

इस लिहाज से भारत सब से बड़ा जनतांत्रिक है क्योंकि दुनिया में सब से ज्यादा वोटर यहीं हैं. संविधान का अनुच्छेद 326 एक सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को निर्वाचित सरकार के सभी स्तरों के चुनावों के आधार के रूप में पारिभाषित करता है. इस यूनिवर्सल सफ्रिज या  सर्वजनित मताधिकार का सीधा सा मतलब यह होता है कि सभी वे नागरिक जो 18 साल या उस से ज्यादा की उम्र के हैं उन की जाति, लिंग, शिक्षा, रंग, धर्म, प्रजाति और आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद उन्हें वोट देने की आजादी है.

इस आजादी ने लोगों को तमाम तरह के जातिगत व धार्मिक मतभेद भुलाते एक लाइन में लगने को मजबूर कर दिया. यह वंचित और शोषित कहे जाने वाले वर्ग की पहली जीत या उपलब्धि थी जिस ने उन्हें अपने वजूद का एहसास कराया वरना तो ज्यादा नहीं, 40 के दशक में हालात यही थे कि दलित का सामने पड़ जाना भी ऊंची जाति वालों को पाप कुंड में ढकेलने वाला माना जाता था. दलितों को सार्वजनिक स्थलों पर जाने की कहींकहीं अघोषित और ज्यादातर जगहों पर घोषिततौर पर मनाही थी. वे कुओं और नदी के घाटों से पानी भी नहीं भर सकते थे. उन के कुएं अलग होते थे, नदियों पर घाट अलग होते थे, उन की बस्तियां अलग होती थीं, महल्ले अलग होते थे. और तो और, उन के श्मशान घाट तक अलग होते थे.

अस्पृश्यता बना अपराध

आज के डिजिटल दौर में भी यह रोग आंशिक रूप से ही सही, कायम है. लेकिन अब कोई भी खुलेआम छुआछूत नहीं फैला सकता क्योंकि ऐसा करना कानूनन दंडनीय अपराध है. सड़क से ले कर संसद तक में भाजपा और उस के पूर्वज दलों हिंदू महासभा, रामराज्य परिषद और जनसंघ सहित आरएसएस को मनुवादी करार देना कांग्रेस के लिए जितना आसान काम है उस से कहीं ज्यादा दुष्कर उन्हें आम आदमी को यह बताना है कि कैसे यह मनुवादी व्यवस्था उन के पूर्वजों ने कानून बनाने के बाद संविधान में वोट देने का हक दे कर दरकाई जिस ने लोगों में आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और स्वाभिमान का जज्बा पैदा किया.

संविधान का अनुच्छेद 17 दोटूक कहता है कि अस्पृश्यता का अंत किया जाता है और उस का किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध किया जाता है. ‘अस्पृश्यता’ से उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करना अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा.

इस कानून के लागू होने के बाद यह जिम्मेदारी सरकार के कंधों पर आ गई कि वह छुआछूत फैलाने वालों को सजा दिलवाए. यह और बात है कि ऐसा पूरी तरह संभव हो नहीं पाया क्योंकि दबंग सवर्ण अपना धार्मिक और जातिगत पूर्वाग्रह नहीं छोड़ पा रहे.

इस में उन्हें हेठी लगती है लेकिन कानून के आगे उन की एक नहीं चलती जबकि इस से पहले वे जब चाहे, जैसे चाहे, जहां चाहे शूद्रों को लतियाते रहते थे, लेकिन मतदान के सर्वजनित अधिकार ने उन्हें दलितों के बराबर खड़े रहने को मजबूर कर दिया क्योंकि यह मंदिरों के दर्शन वाली लाइन नहीं थी और न है, जिस पर दलितों के लिए नो एंट्री की सनातनी तख्ती सदियों से लटकी है.

संविधान पर हुई बहस में लोकसभा और राज्यसभा दोनों में एक बात जो प्रमुखता से नहीं कही गई वह थी वोट का अधिकार. जहां जनता के पास, भारतीय जनता के पास पैदा होने, खानेपीने, उपजाने, खर्च करने, काम करने, पीटने, पिटने, शादी करने, संपत्ति जमा करने, बच्चों को बांटने, दूसरों के लूटने, मारने, मरने के अवसर प्राकृतिक मिले थे, हक नहीं. वोट कर के अपने हाकिम को चुनने का अवसर नहीं ‘हक’ पहली बार इस संविधान ने दिया था.

1946 में जो अस्थाई सरकार बनी थी वह अंगरेजों के अधीन देश में (रियासतों में नहीं) चुनावों से चुन कर आए लोगों से बनी थी पर इस चुनाव में वोट देने का हक मुश्किल से 13 प्रतिशत लोगों को था. 1950 में लागू हुए विभाजित भारत के हर नागरिक, जो 25 साल से ज्यादा की उम्र का था, को यह हक मिला था.

यह हक बहुत बड़ा था क्योंकि कानूनी तौर पर यह ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों को तो था ही, यह अछूतों को भी मिला था जो 1952 के हुए चुनावों में वोट देने के हकदार बने थे. संविधान के इस हक की महिमा यह है कि आज ऊंची जातियों के लोगों को न केवल शूद्रों को ऊंची जातियों में शामिल करना पड़ रहा है, उन्हें औरतों और अछूतों को पुचकारने के लिए उन के घरों में जाना पड़ रहा है, उन को ‘मुफ्त’ खाना (यह टैक्स के पैसे का है, अडानीअंबानी के चंदे का नहीं) देना पड़ रहा है और अब औरतों, जिन में दलित यानी अछूत औरतें शामिल हैं, को नकद पैसा उन के खाते में डालना पड़ रहा है.

वोटिंग राइट से मिला समानता का हक

जो भी सुधार सरकारों ने पिछले 75 सालों में किए थे उन के पीछे इस वोट के अधिकार का डर था. किसानों का वोट लेने के लिए हिंदू जमींदारी समाप्त की गई, औरतों को हक देने के लिए पुरुषों से बहुविवाह का हक 1955 में छीन लिया गया, पंडों को धता बताते हुए बिना पंडितों के विवाह का प्रावधान स्पैशल मैरिज एक्ट में किया गया. स्कूल खोले गए. अस्पताल खुले. सड़कें बननी शुरू हुईं, अकाल से निबटने के लिए राशन व्यवस्था शुरू हुई जिस में हरेक को बराबर अन्न मिला. एक जना, एक वोट का अधिकार न मिलता तो यह संभव नहीं था.

हर व्यक्ति को वोट का हक स्वंतत्रता संग्राम की मांगों का बड़ा हिस्सा कभी नहीं था. महात्मा गांधी और सरदार वल्लभभाईर् पटेल इस पर चुप ही रहे थे. व्हाट्सऐप के आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस टूल से इस सवाल पर पूछो तो साफ कहता है कि उन के स्पष्ट विचार कहीं इस बारे में कहीं नहीं हैं. सरदार पटेल की बड़ी मूर्ति इस बात की निशानी है कि इस को बनवाने वालों की यूनिवर्सल एडल्ट फ्रैंचाइज पर कोई दिलचस्पी नहीं है. मोतीलाल नेहरू और भीमराव अंबेडकर ने बहुत पहले से इस की मांग करनी शुरू कर दी थी जब स्वतंत्र भारत की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.

‘वन नेशन वन इलैक्शन’ का असली अर्थ संविधान के मौलिक से भी ज्यादा मौलिक अधिकार वोट के अधिकार का ‘वन नेशन का इलैक्शन’ में बदलना है. नरेंद्र मोदी जो अकेले अपने बलबूते 2014 के चुनाव जीतते रहे हैं, बारबार के चुनावों से थक गए हैं. वे इस बो झ को समाप्त करना चाहते हैं.

2004 में सुप्रीम कोर्ट के जज जी एस सिंघवी ने कहा था कि डैमोक्रेसी संविधान के मूलभूत ढांचे का अभिन्न अंग है और समयसमय पर चुनाव होना जरूरी है ताकि लोग उन्हीं लोगों को फिर से चुनें या हराएं या नयों को चुनें. चुनाव फ्री होने चाहिए. चुनावों में किसी तरह का मैनीपुलेशन न हो, चुनावों में खड़े उम्मीदवारों के एजेंट कुछ गलत तरीके से इस्तेमाल न करें.

यही शब्द 1975 में एच आर खन्ना ने इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण के मुकदमे मेंआपातकाल के दौरान दिए गए एक निर्णय में कहे थे.

विंस्टन चर्चिल, जो इंगलैंड के युद्ध के समय प्रधानमंत्री और इंगलैंड में लोकतंत्र के पक्ष में थे पर कालोनियों को आजादी नहीं देना चाहते थे, ने कहा था, ‘‘लोकतंत्र को दिए गए सभी धन्यवादों के मूल में वह छोटा (अनजाना सा) आदमी है जो एक छोटे से बूथ में, एक छोटी सी पैंसिल के साथ, एक कागज पर क्रौस बनाता चलता है. कोई भी बयान, कोई भी भारीभरकम बहस, इस छोटे से काम से ज्यादा महत्त्व नहीं रखती.’’

चुनावों का अधिकार इस संविधान का सब से बड़ा अधिकार है. शूद्रों, जिन्हें आज पिछड़ा कहा जा रहा है, सवर्णों की औरतों, दलितों को इस संविधान ने जो सब से बड़ा कामयाब हथियार व हक दिया है, वह वोट देने का हक है. उसे छीनने के हर प्रयास पर जनता को खड़ा होना होगा क्योंकि इस में कोई भी दरार सरकारी तांडव के जहरीले समुद्र के पानी से लोकतंत्र के खुशनुमा बाग को नष्ट कर देगी और कांटेदार पेड़ों की छांव में जनता को रहने को मजबूर कर देगी.

सरकार हुई बाध्य

बात अकेले इस तरह के मूल अधिकारों (समानता का अधिकार अनुच्छेद 14 से 18, स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 19 से 22, शोषण के विरुद्ध अधिकार अनुच्छेद 23 व 24, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 25 से 28, सांस्कृतिक व शैक्षिक अधिकार अनुच्छेद 29 व 30 और अनुच्छेद 32 में वर्णित संवैधानिक उपचारों का अधिकार) की नहीं है जिन्हें 75 साल बाद अधिकतर लोग जाननेसम झने लगे हैं बल्कि इस से भी आगे बहुतकुछ है जो सरकार को बाध्य करता है कि वह मौलिक अधिकारों के साथसाथ नागरिकों के दीगर हितों की हिफाजत करे, मसलन –

अनुच्छेद 20 ( 1 ) : कोई व्यक्ति किसी भी अपराध के लिए तब तक सिद्ध दोषी नहीं ठहराया जाएगा जब तक कि उस ने ऐसा कोई कार्य करने के समय, जो अपराध के रूप में आरोपित है, किसी प्रवृत्त विधि का अतिक्रमण नहीं किया है या उस से अधिक शास्ति का भागी नहीं होगा जो उस अपराध के किए जाने के समय प्रवृत्त विधि के अधीन अधिरोपित की जा सकती थी.

संविधान की यह भाषा बेहद क्लिष्ट है जिस से आम लोग इसे पढ़ने और सम झने में हिचकते हैं, इसलिए बहस तो इस के सरलीकरण पर भी होनी जरूरी है. अस्तु उक्त अनुच्छेद का अभिप्राय यह है कि किसी भी व्यक्ति को ऐसे कार्य के लिए सजा नहीं दी जा सकती जो उस समय अपराध नहीं था.

अनुच्छेद 301 : व्यापार, वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता – इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए भारत के राज्य क्षेत्र में सर्वत्र व्यापार, वाणिज्य और समागम अबाध होगा.

जाहिर है, यह अनुच्छेद यह सुनिश्चित करता है कि पूरे देश में व्यापार, वाणिज्य और संभोग आजादी से किए जा सकते हैं. यदि तमिलनाडु का कोई व्यक्ति दिल्ली जा कर व्यापार करना चाहता है तो उसे रोकने का हक किसी को नहीं है. इसी तरह दिल्ली का कोई व्यापारी चेन्नई जा कर व्यापारव्यवसाय करना चाहे तो उसे भी रोका नहीं जा सकता. न ही राज्य सरकार ऐसा कोई कानून बना सकती है और न ही स्थानीय निकाय और न ही पुलिस रोक सकती है. इस अनुच्छेद में

2 वयस्कों को देश के किसी भी हिस्से में जा कर संभोग तक करने की स्वतंत्रता दी गई है यानी भोपाल का कोई कपल मुंबई जा कर सैक्स करे तो वह अपराध नहीं होगा जैसे कि भोपाल में भी नहीं था.

सैक्शन 39 ए – राज्य के नीतिनिर्देशक तत्त्व के तहत – राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधिक तंत्र इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो और वह विशिष्टतया यह सुनिश्चित करने के लिए कि आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए, उपयुक्त विधान या स्कीम द्वारा किसी अन्य रीति से निशुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करेगा.

गरीबों और कमजोर लोगों के लिए मुफ्त न्याय की धारणा बिलाशक सराहनीय है लेकिन इस की चर्चा किसी संसद या विधानसभा में नहीं होती और इस पर विपक्ष भी सरकार को नहीं घेरता तो यह उस की असफलता और उदासीनता ही कही जाएगी.

एनसीआरबी के आंकड़े आएदिन यह हकीकत उजागर करते रहते हैं कि लाखों बेगुनाह (2021 में इन की तादाद 4,27,165 थी) जेलों में सिर्फ इसलिए सड़ रहे हैं क्योंकि उन के पास जमानत या मुकदमा लड़ने के पैसे नहीं हैं.

आंकड़ों के मुताबिक भारतीय जेलों में 77 फीसदी कैदी विचाराधीन कैदी हैं. ये ऐसे आरोपी हैं जिन्हें किसी अदालत द्वारा दोषी करार नहीं दिया गया है. फिर ये लंबे समय तक जेलों में क्यों ठूंस कर रखे जाते हैं, इस पर हरकोई खामोश रहता है.

अनुच्छेद 300 क –  किसी व्यक्ति को उस की संपत्ति से विधि के प्राधिकार से ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं.

यह एक दिलचस्प अनुच्छेद है जो पहले मौलिक अधिकारों में शामिल था. 1978 के संशोधन के तहत इसे संवैधानिक अधिकारों में शामिल कर दिया गया था. यह एक समाजवादी किस्म की ही सोच है कि सरकार किसी व्यक्ति को राजशाही की तरह उस की निजी संपत्ति से उचित प्रक्रिया अपनाए या जबरिया बिना किसी कानूनी प्रावधान के छीन नहीं सकती. यानी, सरकार के हाथ यहां भी बंधे हुए हैं. यह सोचना बेमानी है कि सरकार जब चाहे, जैसे चाहे किसी भी नागरिक की जमीनजायदाद राजा, महाराजा, नवाबों की तरह छीन सकती है.

कहां मात खा रहा विपक्ष

दर्जनों प्रावधान संविधान में हैं जो सरकार के हाथ बांधते हैं. संसद में हुई बहस में इन का कहीं जिक्र न होना विपक्ष के भी लापरवाह होने का सुबूत है. देश का यह वह दौर है जिस में मंदिरों का जनून सिर चढ़ कर बोल रहा है. धार्मिक बैर और उन्माद किसी सुबूत का मुहताज नहीं. इस संवेदनशील मुद्दे पर विपक्ष का आक्रामक होना अपनी जगह ठीक है लेकिन धर्म से इतर भी संविधान में काफीकुछ है जिसे आम लोगों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी समूचे विपक्ष और उस में भी खासतौर से कांग्रेस को उठानी चाहिए तभी वह अपने पूर्वजों के बनाए संविधान की सार्थकता साबित कर पाएगी.

लेकिन इस के लिए वह क्या करे, इस का जवाब या उपाय बेहद सरल है कि जिस तरह भाजपा ने गलीमहल्लों तक के मंदिरों और मड़ीयाओं (बहुत छोटे मंदिर) को अपने प्रचार का जरिया बना रखा है उसी तर्ज पर वह महल्ला वार्ड और गांव स्तर पर संविधान जागरूकता केंद्र खोल कर संविधान के बारे में सत्यनारायण की कथाओं की तर्ज पर बताए कि इस में क्याक्या लिखा गया है और उस में से क्याक्या सरकार नहीं कर रही है.  विपक्षी दल अपने वकीलों के माध्यम से संवैधानिक अधिकार आम आदमी को दिला सकते हैं.

संवैधानिक अधिकार हर वह अधिकार है जो संविधान के अंतर्गत बने कानून और प्रशासन व्यवस्था के अनुसार प्रशासन की जिम्मेदारी है. इस में थाने की धौंस, न्याय में देरी, अस्पताल में इलाज, गरीब बच्चों की पढ़ाई, लड़कियों को सुरक्षा, टैक्स इंस्पैक्टरों की मनमानी, कच्ची सड़कें सब शामिल हैं.

हर मामले को आवेदन दे कर अदालत, नगर परिषद, विधानसभा, लोकसभा, प्रशासनिक अधिकारी को खटखटाया जा सकता है. यह बहुत महंगा काम भी नहीं है जिस में एक संविधान जागरूकता केंद्र पर 3-4 हजार रुपए महीने से ज्यादा खर्च नहीं आना चाहिए. लेकिन उस से फायदा लाखोंकरोड़ों को होगा, नहीं तो संसद की बहसों का अंजाम क्या होता है, यह भी हरकोई जानता है कि वे चंद दिनों बाद ही भुला दी जाती हैं जिस से आम वोटर उन से कनैक्ट होने के पहले ही डिस्कनैक्ट हो जाता है.

संविधान ने 75 साल में जो रोशनी दी है उसे घरघर, गलीगली पहुंचाने के लिए बिजली के खंभों की तरह संविधान जागरूकता केंद्र तो विपक्ष को खोलने ही पड़ेंगे और यह अब रोशनी की तरह देश की जरूरत भी हो चली है.

संविधान घरघर, गलीगली पहुंचे, यह जरूरी है. संविधान अमीरों की बपौती नहीं है, यह सब से निचले, दबे, कुचले निवासी का कवच है जिसे सरकार भेद नहीं सकती. इसे पहनाया जाए, यह राजनीति का फर्ज है, सिर्फ लोकसभा व राज्यसभा में बहस से काम नहीं चलेगा.

Manipur : हम एक हैं, हम अलग हैं

Manipur :  ‘हम एक हैं’ सा नारा लगाना एक बात है पर लोगों को समझना दूसरी. जब एक होने की बात किसी दूसरे के संदर्भों में कही जा रही हो, तो वह कोरा छलावा होती है. मणिपुर इस का बड़ा जलता हुआ उदाहरण है वरना हम और वो का जहर तो पिछले सालों में हमारी नसनस में फैलाया जा चुका है.

मणिपुर पिछले कई दशकों से सुलग रहा था पर पिछले 3-4 सालों के दौरान यह जलने लगा है. कहीं कोई आसार फिलहाल नहीं दिख रहे हैं ‘हम’ होने के. पहाडि़यों में रहने वाले कुकी व जो कबीलों के लोग अपने राज्य को मैतेई लोगों के हवाले करने को तैयार नहीं जो बाहर से आ कर मैदानी घाटियों में बसे हैं.

सरकार को मैतेई पसंद हैं क्योंकि वे उस के धर्म के हैं. कबीलों वाले के अपने अलग धर्म हैं और कुछ ईसाई हैं. वे पंडों को दानदक्षिणा नहीं दे रहे. यहां सवाल यह नहीं कि कौन गलत है, कौन सही है. सवाल यह है कि देश की सरकार आखिर क्यों नहीं इस छोटे से राज्य के छोटे से मुद्दे को सुलटा पा रही और क्यों यह सालदरसाल खराब हो रहा है.

सरकार मणिपुर के नागरिकों को कुचलने के लिए फोर्स पर फोर्स भेज रही है मानो यह रूसयूक्रेन युद्ध हो या इजरायलफिलिस्तीनी खूंखारी लड़ाई. एक जामाने में शांत मणिपुरी अपने विशेष नृत्य के लिए जाना जाता था. इसे भारत के पूरब का स्विट्जरलैंड भी कहा जाता था जो आज देश का सब से ज्यादा जल रहा इलाका है.

पिछले दशकों में ‘हम अलग हैं’ का जो नारा लगा और जिस के रथ पर चढ़ कर भाजपा को केंद्र की सत्ता मिली है, मंदिर मिले हैं, टैक्स के पैसे से हवाई जहाज मिले हैं, उसे वह आसानी से कैसे छोड़ दे. कुकी और जो कबीलों की हैसियत ही क्या है, जब मौजूदा सरकार द्वारा बड़ीबड़ी पार्टियों को धराशायी कर दिया गया हो. लेकिन यह लड़ाई बहुत महंगी पड़ रही है, हालांकि इस का अंदाजा उस रामनामी टैंट के लगे होने की वजह से नहीं दिख रहा जो अपनेआप में बेहद पतला है. इस के पीछे बेरोजगारी, महंगाई, अमीरीगरीबी का बढ़ता भेद है.

उपराष्ट्रपति Jagdeep Dhankhar के प्रति अविश्वास

Jagdeep Dhankhar : राज्यसभा अध्यक्ष व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के विरुद्ध संसद में पहली बार अविश्वास प्रस्ताव का लाना चाहे कोई अंतिम लक्ष्य पूरा न कर पाए, मगर इस ने अध्यक्ष की सरकार की चाटुकारिता करने की पोल अवश्य खोली. पूजापाठी और वर्णव्यवस्था की हिमायती वर्तमान सरकार को अंधसमर्थन देने में संसद के कुछ सदस्य खूब बढ़चढ़ कर बोल रहे हैं, यहां तक कि कुछ को तो अपने संवैधानिक पद की गरिमा का भी खयाल नहीं रहता. ऐसा लगता है कि देश में लोकतंत्र नहीं, पौराणिक तंत्र चल रहा है जिस में राजा ऋषिमुनि के आने पर अपने स्थान से उठ कर उन की आवभगत में लग जाता था.

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ पर आरोप यही है कि वे राज्यसभा के अध्यक्ष होने के नाते राज्यसभा में सरकार का बचाव हर संभव तरीके से करते हैं. यही नहीं, राज्यसभा से बाहर उन्हें जहां मौका मिलता है वे कट्टरवादी सोच के प्रमुख वक्ता बन जाते हैं. उन के प्रशंसात्मक बयानों को एकत्र किया जाए तो अखंड सप्ताह चलने वाले माता के 2 जागरणों जैसा बन जाएगा जिस में बारबार जयजयकारा लगाया जाता है.

पूर्व कांग्रेसी जगदीप धनखड़ आज उपराष्ट्रपति के संवैधानिक पद पर बैठे हैं और उन्हें पद व संविधान की मर्यादा की रक्षा करनी चाहिए पर जिस तरह का व्यवहार वे हर सैशन में करते रहे हैं, उस से विपक्षी दलों का एक न एक दिन उखड़ना स्वाभाविक ही था. यह पक्का था कि अगर इस पर बहस होती तो प्रस्ताव भारी मतों से गिर जाता क्योंकि भारतीय जनता पार्टी और किसी बात में माहिर हो या न, लोगों को मनाने, बहलाने और फुसलाने के साथसाथ डरानेधमकाने के सभी पौराणिक ढंग अच्छी तरह से जानती है.

भागवत महापुराण में सगर चरित्र वर्णन करते हुए शुकदेव कहते हैं कि चक्रवर्ती सम्राट सगर ने और्व ऋषि के कहने पर अश्वमेध यज्ञ किया तो उस का छोड़ा गया घोड़ा जब कहीं नहीं मिला तो सगर के पुत्रों ने सारी पृथ्वी खोद डाली और कपिल मुनि के पास वह मिला. कपिल मुनि का तिरस्कार होने पर उन के शिष्य सगर राजकुमारों को जैसे जला बैठे थे, आज कितने ही संवैधानिक पद पर बैठे लोग उस समय के उसी तरह से विपक्षियों को जलाने के लिए तैयार बैठे हैं.

सगर के एक भतीजे ने कपिल मुनि के पास जा कर कहा, ‘‘भगवन, आप अजन्मे ब्रह्माजी से परे हैं, आप एक रस हैं, ज्ञानधन हैं, आप सनातन आत्मा हैं. ज्ञान का उपदेश देने के लिए आप ने यह शरीर धारण कर रखा है. यह संसार आप की माया की करामात है.’’

आज जब जज, विचारक, टीवी एंकर, पत्रकार, लेखक इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करने लगते हैं तो साफ हो जाता है कि उन की पढ़ाई चाहे देशविदेश के बड़े विश्वविद्यालयों में हुई हो लेकिन  वे असल में पौराणिक सोच के गुलाम हैं. उन के खिलाफ आवाज उठाना लोकतंत्र के लिए जरूरी है.

 

 

 

Sambhal : तोड़ो, खोदो और खोदो

Sambhal :  संभल के मामले में भी मसजिद के नीचे मंदिर होने का दावा ठोक कर जो भी हिंदू कट्टरवादी कर रहे हैं, वह उन का धंधा है. दरअसल, जब तक किसी को यह कह कर बहकाया नहीं जाएगा कि सामने वाला तुम्हारा पैसा, जीवन, औरत लेने वाला है या उस के पुरखों ने तुम्हारे पुरखों से लिया था, लोग हथियार उठाने को तैयार नहीं होंगे. हथियार उठाने वाले हाथ पहले अपनी कमाई को उकसाने वाले को देते रहे हैं क्योंकि तभी वे अपना धंधा चला पाते हैं.

2,000 साल से ईसाई यरूशलम में क्राइस्ट की मौत के लिए यहूदियों को दोष देते रहे हैं. हिटलर ने उन्हीं को ढाल बना कर एक हारे हुए देश को फिर से न केवल नए जोश से भर दिया था, कुछ ही महीनों में उस ने, 1940-41 में, पूरे यूरोप पर कब्जा भी कर लिया था. उस का बहाना यहूदियों को सजा देना था.

आज हर मसजिद के नीचे अगर मंदिर दिखाया जा रहा है तो इसलिए कि हिंदू धर्म का धंधा, जो तेजी से फलफूल रहा है, बेहद प्रतियोगी हो गया है. लाखों युवा पैसा बनाने के लिए इस में टूट पड़े हैं. जब बाजार में एकजैसा माल बेचने वाले बहुत होने लगते हैं तो अलगअलग लेबल, अलगअलग दावे, अलगअलग तौरतरीके, झूठ, फरेब आदि गढ़े जाते हैं.

डोनाल्ड ट्रंप इमीग्रेंट्स को ले कर जीत गया क्योंकि अमेरिकी जनता को चर्च ने बहका दिया कि डैमोक्रेटिक पार्टी न केवल इमीग्रेंट्स को पाल रही है, वह धर्म का राज भी खत्म करने पर तुली है. सो, कल को सत्ता लैटिनों या मुसलिमों के हाथ में जा सकती है. चर्चों के धंधों को चलाने के लिए पादरियों ने जम कर ट्रंप के गुणगान किए और उस महान अमेरिका को वापस लाने का वादा किया जिस में श्वेत अलग रहते थे और अश्वेत, कालेपीले, ब्राउन अलग.

संभल जैसे मामले निकलते रहेंगे क्योंकि 2002 में रंजन गोगाई जैसे मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ यह माना कि बाबरी मसजिद गिराना गैरकानूनी था पर दूसरी ओर जमीन हिंदू पक्ष को दे दी बिना यह पहचान किए कि कौन सा पक्ष 500 साल पुरानी जगह पर दावा करने का हकदार है.

अगर सुप्रीम कोर्ट ने जरा भी यह मान लिया है कि अयोध्या में बाबरी मसजिद को रामजन्म भूमि की जगह बनाया गया है तो फिर सारा अयोध्या, जो इस रामजन्म भूमि के चारों ओर बसा हुआ है, असल में पौराणिक राजमहल, दरबार, दरबारियों के घरों, सेना की छावनियों, अयोध्या के निवासियों के घरों व उस समय के दूसरे तमाम मंदिरों के ऊपर बसा हुआ होगा.

नैतिकता तो कहती है कि चारों ओर के बने हुए मकानों को भी तोड़ा जाए और पूरा राजमहल बनाया जाए, दशरथजी के महल के साथ भरत, दुर्योधन, लक्ष्मण के महलों को ढूंढ़ा जाए, हनुमान जहां रहते थे उस जगह का पता किया जाए, गुरु वशिष्ठ जहां रहते थे वह ढूंढ़ा जाए, जिस जगह राम ने राजगद्दी पर बैठने के बाद यम देवता से बातचीत की, वह कक्ष ढूंढ़ा जाए. दुर्वासा मुनि का जहां लक्ष्मण से विवाद हुआ वह ढूंढ़ा जाए.

आज वहां हिंदुओं के मकान बने हैं या मुसलिमों के, यह भुला कर सारा क्षेत्र खोदा जाए चाहे 10 फुट खोदना हो या 100 फुट. यह काम पुराने इतिहास को जीवित करने के लिए जरूरी है.

जब मोहन जोदड़ो, लोथल, धौलावीरा, नालंदा, पटना के कुम्हरार में सैकड़ों साल पहले बने महलों, मकानों के अवशेष आज मिलते हैं तो पूरे अयोध्या को खोद कर पुण्यनगरी को पुनर्जीवित क्यों न किया जाए? इजिप्ट में 3,000 से ले कर 5,000 साल पुराने भव्य शहर मिल रहे हैं. खुदाई करने की जब अयोध्या में शुरुआत हो चुकी है तो फिर उसे पूरा क्यों न किया जाए, पूरी अयोध्या क्यों न खोदी जाए?

Broadcasting Bill और सोशल मीडिया पर कंट्रोल

Broadcasting Bill :  सोशल मीडिया पर मिसइन्फौर्मेशन और डिसइन्फौर्मेशन को कंट्रोल करने के बहाने दुनिया के कई देश सोशल मीडिया के बहाने ट्रेडिशनल मीडिया पर चैकिंग स्टाफ बैठाने की स्कीमें बना रहे हैं. लोगों को गुमराह न किया जाए, कह कर वे चाहते हैं कि सरकार, नेताओं, प्रैसिडैंटों, प्राइममिनिस्टरों, गवर्नरों, मेयरों, पुलिस अफसरों की पोल सोशल मीडिया या ट्रेडिशनल मीडिया पर न आए ताकि वे गुनाहगार, जो अपने पौवर का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं, मौज से जी सकें.

आस्ट्रेलिया में सितंबर में इसी तरह के लाए गए एक बिल को कानून बनने से पहले ही वापस लेने का फैसला किया गया है. भारत में Broadcasting Bill और सोशल मीडिया पर कंट्रोल जून 2024 के चुनावों के बाद वापस ले लिया गया था पर शायद अब हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा की जीत के बाद फिर लाया जाएगा.

सोशल मीडिया बेहद गैरजिम्मेदार है, इस में शक नहीं है. इस पर लोग हर तरह की गंद डाल सकते हैं, जो कुछ सौ से ले कर लाखों लोगों तक पहुंच सकती है. जिन लोगों को धर्म के तथाकथित चमत्कारों की झूठी कहानियों की आदत पड़ी है वे आमतौर पर इस तरह की अफवाहों/खबरों को मोबाइलों पर ठाठ से पढ़ते हैं और फिर उन्हें दैविक, गोस्पल वर्ड्स मान कर सच मान लेते हैं.

इन पर कंट्रोल करना चाहिए पर सरकार अगर कंट्रोल करेगी तो पक्का है कि उस का इंट्रस्ट अपने बारे में डिसइन्फौर्मेशन ज्यादा परोसना होगा. भारत में देख लें, जितने सरकारी विज्ञापन छपते है उन में आधे तो नकली खबरों से भरे होते हैं.

सोशल मीडिया पर कंट्रेाल करने की मंशा है तो एक ही तरीका है. इसे महंगा किया जाए. अब यह काम कौन करेगा, यह नहीं कहा जा सकता. जिम्मेदार एडवर्टाइजरों का काम है कि वे मुफ्त में मीडिया कंज्यूम करने वालों के यहां एडवर्टाइज न करें तो मिसइन्फौर्मेशन पर कंट्रोल होगा.
सोशल मीडिया यूजर्स अपने छोटेछोटे एसोसिएशन बना सकते हैं और ये चाहे सैकड़ों की तादाद में बनें. हर एसोसिएशन यदि सोशल मीडिया कंटैंट का रिव्यू करेगा तो इस पर कंट्रोल होगा.

सब से बड़ी बात यह है कि सोशल मीडिया यूज करने वाले समझें कि कोई भी कोई रील मुफ्त में बना कर नहीं डालेगा. सिर्फ फौलो, लाइक और सब्सक्राइब करने से रील बनाने वाले का पेट नहीं भरता. हर सोशल मीडिया उस रील को देखे जिस की कुछ कीमत हो. सही व अच्छी जानकारी तो पे (भुगतान) करने के बाद मिलेगी यानी पे फौर गुड इन्फो. आजकल तो एक घूंट पानी भी मुफ्त में नहीं मिलता, वैसे, एंटरटेनमैंट मुफ्त में मिल सकता है.

 

Religion : धर्म की गुलाम सरकार

Religion : चादर का फटना शुरू होने के बाद नजर आने लगा है. न केवल भारत की विदेश नीति की पोल फटी चादर के छेदों से दिखने लगी है, कश्मीर, लद्दाख, बेरोजगारी, प्रदूषण, दिल्ली जैसे शांत शहर में रंगदारों की खुली गोलीबाजी, नई सड़कों के गड्ढे, ड्रग्स, डंकी व्यापार आदि सब भी दिखने लगे हैं.

पिछले 40 सालों से धर्म का जो खुमार चढ़ा था और जिस की वजह से राम मंदिर बन गया लेकिन बाकी समाज तारतार हो गया है, ऐसा साफ दिखने लगा है. धर्म की नाव पर चढ़ कर जो सरकार दिल्ली में बनी थी उसे झंडों की और प्रतीकों की इतनी फिक्र थी कि उस ने नाव की मरम्मत करने की ही नहीं सोची और उस नाव से नदी के तटबंध तोड़ डाले, किनारों को उजाड़ दिया, पानी को गंदा कर डाला.

धर्म कभी भी कहीं भी निर्माण का काम नहीं करता, जरूरी निर्माण का पैसा और श्रम धर्म के नाम पर लगवाता है. गांव और शहर सड़ने लगते हैं, धर्म की दुकान के बुर्ज ऊंचे होने लगते हैं, चमकने लगते हैं. सड़े शहरों में समाज तारतार होने लगता है.

कश्मीर अब धीरेधीरे फिर आतंकवाद की ओर बढ़ रहा है. पंजाब के खालिस्तानी पंजाब में ही नहीं, दुनियाभर में फैले हुए हैं और जम कर सक्रिय हो रहे हैं और भारत सरकार वहां उन का मुंह बंद करा रही है लेकिन समस्याको सुलझा नहीं पा रही. बेरोजगारी के कारण मुट्ठीभर सरकारी नौकरियों को पाने के लिए जाति, धर्म, उपजाति के झगड़े अभी चाहे कागजों पर ही दिख रहे हों, कब वे सड़कों पर उतर आएंगे, कहा नहीं जा सकता.

सरकार ने टैक्नोलौजी को जम कर पूरे समाज पर बुरी तरह थोपा और चाहे सरकारी दफ्तरों की लाइनों से बचा लिया पर टैक्नोलौजी फ्रौडों की एक नई विधा को जन्म दे दिया. अब हर किसी के फोन पर किसी अनजाने की कौल आ जाती है कि आप का फोन बंद होने वाला है या आप के नाम आए पार्सल में ड्रग्स हैं या आप के बैंक में ह्यूमन ट्रैफिकिंग का पैसा है और लोग लाखों खो रहे हैं पर सरकार बेबस है. उसे तो बुलडोजर चलाना आता है, हिंदूमुसलमान करना आता है, मंदिर के नाम पर उकसाना आता है. शासन करना उसे नहीं आता.

नए कानूनों से, कानूनों को नए नाम देने से, नई कानूनी संस्थाएं बनाने से देश सुधरता नहीं है. आज प्रशासन चलाना आसान नहीं है. अब कानून व्यवस्था बनाए रखने में एकदो नहीं, हर पल सैकड़ों फैसले लेने होते हैं. अगर फैसले लेने वालों के मन में एक ही बात भरी हो कि धर्म का झंडा ऊंचा रहे, धर्म की चादर बिछी रहे तो झंडे के और चादर के नीचे उगी झाडि़यों में सैकड़ों कीड़े, बिच्छू जन्म ले लेंगे ही जो कब किसे काटेंगे, पता नहीं.

देश की जनता का काम कैसे सुखद हो, इस के लिए नक्शे भविष्य देख कर बनाने होते हैं, गुजरी सदियों के इतिहास को खंगालने से नहीं मिलते.

सरकार के मन में यही भरा है कि अगर पौराणिक काल में ऋषियोंमुनियों की सेवा करने से जनता प्रसन्न हो जाती है, सुख आ जाता है तो वह न आज का काम ढंग से कर पाएगी न आने वाले कल की तैयारी कर सकेगी. पौराणिक युग में भी हर समय सत्ता के लिए छीनाझपटी ही होती रही, यह नहीं भूलना चाहिए. हस्तिनापुर और अयोध्या में शांति नहीं थी, लंका में भी नहीं, यह नहीं भूलना चाहिए.

 

 

 

Russia-Ukraine : वैश्विक नासमझी

Russia-Ukraine :   रूस और यूक्रेन के बीच हो रहे युद्ध व इजरायल की हमास व हिजबुल्ला से जारी झड़पें शासकों को यह जताने के लिए काफी होनी चाहिए कि आज के युग में जमीन पर कब्जा कर लेने या लोगों को मार डालने से कोई बड़ी जीत हासिल नहीं होती. हालांकि, पिछले 2 विश्वयुद्धों, कोरियाई युद्ध, वियतनाम-अमेरिका लड़ाई, अफगानिस्तान पर रूस व अमेरिकी फौजें यह सबक सीख चुकी हैं कि आज के युग में किसी की जमीन पर कब्जा करना बेकार की कवायद है और अपना  झंडा दूसरे की जमीन पर फहराने से किसी को कोई लाभ नहीं होता. हां, शासकों को अपनी सेना का इस्तेमाल करने की लगी रहती है.

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अब यूक्रेन के जंजाल में फंस गए हैं और उन के युवा फ्रंट पर जाने से मना करने लगे हैं. पुतिन को अब बाहर से मजदूरी पर सैनिक बुलाने पड़ रहे हैं. न जाने कितने भारतीय नौकरी के ?ांसे में रूस ले जाए गए हैं जो फ्रंट के नजदीक सेना की मदद कर रहे हैं और देशों के मजदूरों को भी सैनिक वरदी पहना कर युद्ध में  झोंका जा रहा है.

नई खेप 10 हजार उत्तरी कोरियाई सैनिकों की यूक्रेन फ्रंट पर पहुंची है पर रूसी सैनिक इन लोगों को सहजता से साथी समझने से इनकार कर रहे हैं. वे कोरियाई सैनिकों को मरने के लिए आगे कर देंगे पर वे भूल रहे हैं कि किम जोंग उन की सेना को मरने के लिए पहले से ही तैयार कर रखा गया है. ताजा खबरों के हिसाब से उत्तरी कोरिया 1 लाख तक सैनिक भेज सकती है.

उत्तरी कोरियाई सैनिक टैंकों, बंदूकों, खंदकों में लड़ने के आदी होंगे, इस में शक है लेकिन वे मरने को तैयार होंगे क्योंकि वे जानते हैं कि वापस कोरिया में लौट कर जिंदा रहना तो संभव ही नहीं है. लौटने पर किम जोंग उन के सैनिक उन सब को मार डालने में दो मिनट भी हिचकेंगे नहीं. किम डाइनैस्टी ने 1945 के बाद ऐसा माहौल उत्तरी कोरिया में बना डाला है कि वहां अब जिंदगी सरकार की कृपा पर है और कोई भी, किम जोंग उन की प्रेयसी तक, सुरक्षित नहीं है.

उत्तरी कोरिया लाखों सैनिक झांक सकता है पर पुतिन को उस की भारी कीमत चुकानी होगी. एक बार उत्तरी कोरियाई सैनिकों के हाथों में रूसी हथियार आए नहीं कि वे रूस पर पलटवार भी कर सकते हैं. जापान ने कभी छोटा होते हुए भी रूस, कोरिया और चीन पर अकेले कब्जा कर लिया था.

लेकिन इन कब्जों से क्या मिला? एटम बमों को झेलना. आज जापान के लोग ज्यादा सुखी हैं. आज दक्षिण कोरिया के लोग सुखी हैं. आज हिटलर के बिना वाली जरमनी के लोग सुखी हैं. दूसरे देशों पर कब्जा करने की इच्छा न रखने वाले स्वीडन, नौर्वे, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड ज्यादा सुखी हैं.

भारत में भी सुख कहां है? हम दूसरे धर्मों और नीची जातियों पर कब्जा करना चाहते हैं, उन की जमीनजायदाद छीन कर उन्हें गुलाम सा बनाए रखने के लिए प्रपंच रचते रहते हैं जो युद्ध से थोड़ा ही कम है, लेकिन हलकी जीत के बाद भी सुख कहां है?

देश के गरीब और अमीर मस्त हैं पर सभी भागने की फिराक में हैं. वे दूसरे देशों में दूसरे दर्जे के नागरिक बनना ज्यादा पसंद करेंगे बजाय अपने देश में स्वतंत्र नागरिक रहने के. हम न पुतिन से कुछ सीख रहे हैं, न हमास, हिजबुल्ला व इजरायल से और न ही अफगानिस्तान के दलदल से.

लेकिन गलती सिर्फ नरेंद्र मोदी की कहां है जब शी जिनपिंग, जो बाइडेन, व्लादिमीर पुतिन, बेंजामिन नेतन्याहू, खामेनाई, डोनाल्ड ट्रंप, तालिबानी कुछ नहीं समझा रहे हैं. वे सोचते हैं कि सुख बंदूक की नली से निकलता है. जबकि, सुख तो मेहनत में है, उत्पादन में है, निर्माण में है. गर्व कुछ बना कर करने में है, कुछ तोड़ने में नहीं.

 

Israel : हिटलर मरा है, सोच नहीं

Israel : इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने गाजा पट्टी के हमास और लेबनान के हिजबुल्ला और न जाने किनकिन के रेडियो वेव्स से चलने वाले टैलिकौम वायरलैस इंस्ट्रूमैंट्स में बैटरी के साथ बारूद डाल दिया है. यह पता करने में उस के विरोधियों को ही नहीं, दोस्तों को भी सिर के बाल नोचने होंगे. हैंडहेल्ड इन इंस्ट्रूमैंट्स को इजराइल मनमाने ढंग से औपरेट कर सकता था, यह तकनीक उस के पास थी. उस की इस तकनीक ने दुनिया के सभी जासूसों, नेताओं, सेनाओं और कंप्यूटर बनाने वालों को पसीने ला दिए हैं.

यह कमाल सिर्फ हैकिंग का नहीं था. बनते समय या लातेलेजाते समय इन इंस्ट्रूमैंट्स को खोलना और उन में ऐसा एक्सप्लोसिव डालना जो दूर से कभी भी चलाया जा सकता है, यह दर्शाता है कि किसी के हाथ में भी कोई मोबाइल, किसी की मेज पर कोई कंप्यूटर, किसी कंपनी में बड़ा कंप्यूटर, डाटा सैंटर, बिजलीघर, परमाणु संयत्र, सैटेलाइटें, कैमरे कुछ भी सुरक्षित नहीं हैं.

इजराइल ने पहले पेगासस सौफ्टवेयर भी बनाया था जिसे आसानी से किसी के मोबाइल में डाला जा सकता है और जो मोबाइल के मालिक की हर बात, हर फोटो, हर मैसेज रिकौर्ड कर सकता है. भारत सरकार ने यह सौफ्टवेयर खरीदा है और आज भी कितने मोबाइलों पर चलाया जा रहा है, पता नहीं.

टैक्नोलौजी इस तरह से हर जने की जिंदगी में घुस जाएगी, इस का अंदाजा कहानियां लिखने वाले वर्षों से कर रहे हैं और 1948 में लिखी जौर्ज औरवेल की किताब ‘1984’ में इस का एक अंदाजा पेश किया गया था. तब यह केवल साइंस फिक्शन लगता था, असलियत नहीं. लेकिन अब 2024 में इजराइल ने तकनीक से ही सैकड़ों को घायल कर डाला.

मतलब साफ है कि आज एप्पल, सैमसंग, वनप्लस, जियो, एयरटेल, रिलायंस, टाटा स्काई के पास आप के कितने रहस्य कहांकहां दबे हैं, आप को नहीं मालूम. आम आदमी बेचारा है, बिना ताकत वाला है, इसलिए उस का नुकसान नहीं हो सकता पर कितने नेता आज ब्लैकमेल हो रहे होंगे क्योंकि ये कंपनियां सरकार को कितना ब्लैकमेल करने लायक सामग्री दे रही हैं, क्या मालूम?

दूसरी पार्टियों के नेताओं के हृदय परिवर्तन क्यों हो रहे हैं कि वे भारतीय जनता पार्टी की शरण में अचानक चले जाते हैं, यह अब अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है.

आज की टैक्नोलौजी ने अगर जिंदगी आसान की है तो यह भी मान लीजिए कि इस ने सबकुछ थोड़े से लोगों को बांध कर रखने में भी सहायता की है.

जैसे हमारे पौराणिक ग्रंथों में अपनी जाति की औरतों तक को हथियार उठाने की इजाजत नहीं थी कि कहीं वे भी टैक्नोलौजी का ज्ञान हासिल न कर लें, वैसे ही आज की टैक्नोलौजी एक उच्च वर्ग पैदा कर रही है जो ताकतवर लोगों को भी पंगु बना रही है. विज्ञान की पहुंच आप के जिगर तक ही नहीं है, आप के दिमाग, हाथपैर तक में भी है. सो, होशियार रहिए कौन जाने इस विज्ञान की नब्ज असल में किस के पास है.

यह नब्ज अच्छे शासक के पास भी हो सकती है जो भला करना चाहता है और किसी कट्टर के पास भी जो आप को गुलाम बना कर मौज करना चाहता है.

हिटलर मरा है, उस की सोच नहीं.

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