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अब लैपटॉप से भी ले सकते हैं स्क्रीनशॉट

आपके लैपटॉप पर स्क्रीनशॉट लेना बेहद आसान काम है. अगर आप अपने विंडोज पर स्क्रीनशॉट लेना चाहते हैं तो कीबोर्ड पर Prt Sc का बटन टैप करने से स्क्रीनशॉट लिया जा सकता है.

हम आपको बता दें कि आपके विंडोज डिवाइस पर स्क्रीनशॉट लेने के कई बेहतर तरीके हैं. आज हम आपको उन्हीं में से चार तरीके बताने जा रहे हैं. यहां बस आपको ये ध्यान रखना होगा कि ये तरीके केवल विंडोज एक्सपी या ओएस के नए वर्जन के साथ ही काम करेंगे.

1. पूरे स्क्रीन के स्क्रीनशॉट को करें सेव

सबसे पहले विंडोज बटन के बाद प्रिंट स्क्रीन को दबाएं. ऐसे करने के बाद स्क्रीनशॉट आपके कंप्यूटर के पिक्चर्स लाइब्रेरी में सुरक्षित हो जाएगा. अब आपके सिस्टम के एक्सप्लोरर को लॉन्च कर, साइड में दिए गए पिक्चर्स पर क्लिक करें. इसके बाद स्क्रीनशॉट फोल्डर को ओपन करते ही आपको स्क्रीनशॉट मिल जाएगा.

2. स्क्रीनशॉट को क्लिपबोर्ड पर सेव करें

जिसका आपको स्क्रीनशॉट लेना है, उसके साथ प्रिंटस्क्रीन को दबाएं. ऐसा करने से वो प्रिंटस्क्रीन क्लिपबोर्ड पर कॉपी हो जाती है, अब आपको ऐसे सॉफ्टवेयर्स ओपन करने होंगे, जो आपकी इस इमेज को हैंडल कर सकते हैं जैसे एमस पेंट, वर्ड आदि.

अब यहां Ctrl + v दबाएं. ऐसा करने से यहां स्क्रीनशॉट पेस्ट हो जाएगा और आप Ctrl + s दबा कर, इस स्क्रीनशॉट को सेव कर सकते हैं.

3. किसी सॉफ्टवेयर या विंडो का स्क्रीनशॉट

आप जिसका स्क्रीनशॉट लेना चाहते हैं, वो ऐप फोरग्राउंड में होनी चाहिए यानी उस ऐप का पेज दिखाई देना चाहिए. अब इसके बाद alt + Print Screen दबाएं. अब एमएस पेंट ओपन करें और ctrl + v को दबाएं. ऐसा करने के बाद ओपन विंडो का स्क्रीनशॉट पेंट में स्टोर हो जाएगा. इसके बाद आप स्क्रीनशॉट को अपनी पसंद के किसी भी जगह पर स्टोर कर सकेंगे.

4. स्क्रीन के एक हिस्से का स्क्रीनशॉट कैसे लें

इसके लिए आपको आपके सिस्टम पर मौजूद स्निपिंग टूल का इस्तेमाल करना होगा. स्निपिंग टूल को ओपन कर, menu > All programs > Accessories में जाकर, यहां स्निपिंग टूल के new के साइड में बने डाउन arrow को क्लिक करके, रेकटैंगुलर स्निप या फ्री-फॉर्म स्निप को चुनना होगा. रेकटैंगुलर स्निप से आप आयताकार स्क्रीनशॉट ले सकेंगे.

वहीं, फ्री-फॉर्म स्निप की मदद आप अपनी स्क्रीन पर कोई भी आकार बना सकते हैं. ऐसे करने के बाद आप स्निपिंग टूल की मदद से आप स्क्रीनशॉट को, अपने पर्सनल कंप्यूटर के किसी भी हिस्से में सेव कर सकते हैं.

अलग अलग राह पर सपा के महारथी

समाजवादी पार्टी 3 हिस्सों में बंट चुकी है. हर हिस्सा अलग अलग राह पर चलने की योजना में है. पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव पूरी तरह से बेबस हो चुके हैं. ऐसे में पूरी समाजवादी विचारधारा खत्म होने के कगार पर पहुंच चुकी है. कुर्सी से उतरने के बाद अखिलेश यादव पार्टी के सर्वमान्य नेता नहीं रहे हैं. ऐसे में सपा के लिये अपने वजूद को बचाये रखना बड़ी चुनौती है. सामान्य तौर पर देखें तो समाजवादी पार्टी पर अखिलेश यादव का कब्जा है. अब उनको घर से खुलकर चुनौती मिलने लगी है. मुलायम की दूसरी बहू अपर्णा यादव और पु़त्र प्रतीक यादव अब भाजपा के करीब जा रहे हैं. अपर्णा यादव ने अपनी हार के लिये पार्टी में हुये भीतरघात को जिम्मेदार माना है.

सपा के दो बड़े नेता पार्टी प्रमुख मुलायम सिह यादव और शिवपाल यादव ने अखिलेश यादव पर खुलकर बोलना शुरू कर दिया है. शिवपाल यादव ने कहा कि कुछ माह में मेरा और नेता जी का जितना अपमान हुआ उतना कभी नहीं हुआ होगा. खुद मुलायम ने इस बात को स्वीकार करते कहा कि जो बेटा बाप की बात नहीं सुनता वो किसी और की क्या सुनेगा. ऐसे में यह साफ हो गया है कि शिवपाल यादव अब सपा से हट कर नई पार्टी बनायेंगे. सपा प्रमुख शिवपाल के साथ होंगे. शिवपाल यादव और अखिलेश यादव के बीच चला संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर आ चुका है. अब तक अखिलेश से सामने झुक चुके शिवपाल यादव झुकने को तैयार नहीं है.

अखिलेश यादव अब अपने लोगों के साथ सपा को मजबूत कर आगे बढ़ने को तैयार हैं. वह किसी तरह के दबाव में खुद को नहीं रखना चाहते. चाचा शिवपाल, पिता मुलायम और परिवार के दूसरे सदस्यों के बीच तालमेल करने के लिये समझौते करने वाले अखिलेश अब खुद को दबाव से मुक्त रखना चाहते हैं. वह खुद से पार्टी का विस्तार करना चाहते हैं. अखिलेश के पास पार्टी को बनाने के लिये पूरा समय है. तकनीकि रूप में सपा पूरी अखिलेश के साथ है. अब उसे एकजुट रखना अखिलेश की जिम्मेदारी है.

सपा में बड़ा बदलाव आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा. बिखर कर सपा अपने वजूद को बचाने का प्रयास करेगी. प्रदेश की राजनीति में मुख्य भूमिका निभा रहे मुलायम सिंह यादव के लिये अब पुरानी जगह हासिल करना संभव नहीं है. बिखरने के बाद सपा भी अपने को बचा नहीं पायेगी. 1990 के दशक में जो उदय सपा का हुआ था अब वह अपने वजूद की तलाश में है. देखने वाली बात यह होगी कि परिवारवाद की पार्टी परिवारवाद का शिकार होकर डूब रही है. जो परिवार कभी सपा की ताकत होता था वही अब उसके डूबने की वजह बन गया है.          

आतंकियों के जाल में फंसते बेरोजगार

20 नवंबर, 2016 को कानपुर के पास पुखरावां में ‘पटनाइंदौर ऐक्सप्रैस’ ट्रेन को बम से उड़ाने की साजिश के मास्टरमांइड शमसुल हुदा की गिरफ्तारी के बाद पता चला कि उस के तार नेपाल और आईएसआई से जुड़े हुए थे. इस हादसे से एक बार फिर यह साबित हो गया है कि आईएसआई नेपाल के रास्ते भारत में आतंकी वारदातों को फैलाने की मुहिम में लगा हुआ है. शमसुल हुदा पिछले कई सालों से भारतनेपाल के सरहदी इलाकों में अपना नैटवर्क फैलाने में लगा हुआ था. आईएसआई के इशारे पर वह कई दिनों से ड्रग्स, हथियार और नकली नोटों को भारत भेजने का काम कर रहा था. नेपाल के बारा जिले के मोनाजिर अंसारी, आशीष सिंह, उमेश कुर्मी और शंभू के साथ मिल कर शमसुल हुदा अपनी मजबूत पकड़ बना चुका था. उस के बाद ही आईएसआई ने उसे पालनापोसना शुरू किया. ‘पटनाइंदौर ऐक्सप्रैस’ ट्रेन को दुघर्टनाग्रस्त करने के बाद वह दुबई भाग गया था.

पुलिस की जांच में खुलासा हुआ है कि शमसुल हुदा का साथी मुजाहिर अंसारी दाऊद इब्राहिम का गुरगा है. कानपुर रेल हादसे में मुजाहिर अंसारी भी शामिल था. कानपुर ट्रेन हादसे के बाद भी तकरीबन एक दर्जन रेल हादसे करने की साजिश रची जा चुकी थी. बिहार और उत्तर प्रदेश में ही ज्यादातर रेल हादसे करने की प्लानिंग थी. दाऊद इब्राहिम की डी कंपनी ने भारत में दहशत फैलाने के लिए सीरियल बम ब्लास्ट करने की अपनी पुरानी आदत में बदलाव कर रेलगाडि़यों को उड़ाने की योजना को अंजाम देना शुरू कर दिया. शमसुल हुदा मूल रूप से नेपाल का रहने वाला है और आईएसआई एजेंट है. नेपाल में उस का एक रेडियो स्टेशन भी है. वह नेपाल के राष्ट्रीय मधेशी समाजवादी पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ चुका है.

चुनाव लड़ने के दौरान शमसुल हुदा के सिर पर ढाई करोड़ रुपए का कर्ज हो गया. उस के बाद उस ने पैसा कमाने और कर्ज चुकाने के लिए कई काम किए, पर नाकाम रहा. बाद में वह पैसा कमाने के लालच में आतंकी संगठन से जुड़ गया.

3 साल पहले शमसुल हुदा सैलानी वीजा पर पहली बार दुबई गया था. दुबई में उस की मुलाकात पाकिस्तानी नागरिक मोहम्मद सफी से हुई. मोहम्मद सफी ने ही उसे भारत में बम धमाका करने की जिम्मेदारी सौंपी थी. शमसुल हुदा के खिलाफ नेपाल के बारा इलाके में पहले से ही कई आपराधिक मामले दर्ज हैं. शमसुल हुदा दुबई के रास्ते 2 बार पाकिस्तान जा चुका है. वह आईएसआई एजेंट मोहम्मद सफी के साथ पाकिस्तान गया था और सफी ने ही उस की आतंकी संगठन जमात ए उद दावा के मुखिया हाफिज सईद से मुलाकात कराई थी. कानपुर में रेल हादसे को अंजाम देने के बाद भी वह पाकिस्तान गया था और उसे आईएसआई के हार्डकोर सदस्य का दर्जा दिया गया था. उस के कुछ दिनों बाद ही बिहार के मोतीहारी जिले के घोड़ासहन रेल हादसे को अंजाम देने में नाकाम रहने पर आईएसआई ने उसे जम कर लताड़ लगाई थी.

लंबे समय तक पुलिस को छकाने में कामयाब रहने वाला शमसुल हुदा 7 फरवरी, 2017 को काठमांडू में नेपाल पुलिस के चंगुल में फंस गया था. नेपाल पुलिस ने उस का पासपोर्ट और सैलानी वीजा जब्त कर लिया, जिस की बदौलत वह दुबई पहुंच कर आतंकी हरकतों में शामिल हुआ था. पासपोर्ट में दर्ज आंकड़ों के मुताबिक, उस ने पाकिस्तान समेत दुबई और मलयेशिया में लगातार सफर किया था. नेपाल और भारत की पुलिस मिल कर मामले की जांच में जुटी हुई हैं. शमसुल हुदा के इंटरनैशनल आतंकी कनैक्शन को खंगालने के लिए इंटरपोल की मदद ली जा रही है. शमसुल हुदा ने नेपाल पुलिस को बताया कि रेल हादसे को अंजाम देने के लिए उसे एक करोड़ रुपए दिए गए थे. उस में से 63 लाख रुपए जाली थे. यह रकम हवाला के जरीए दुबई से नेपाल में ब्रजकिशोर गिरि तक पहुंचाई गई थी.

ब्रजकिशोर गिरि नेपाल में आईएसआई एजेंट मोहम्मद सफी के संपर्क में था. मोहम्मद सफी जाली नोटों का बहुत बड़ा नैटवर्क चलाता है. उस का नैटवर्क दुबई, पाकिस्तान, बंगलादेश और नेपाल तक फैला हुआ है. नेपाल के रास्ते भारत में नकली नोट खपाने का वह बड़ा खिलाड़ी है. भारत में नोटबंदी के बाद उस का नैटवर्क बुरी तरह से तबाह हो गया. कानपुर में रेल पटरी को बम से उड़ाने के लिए मोती के साथ शमसुल हुदा का भतीजा जियाउल भी गया था. इस के अलावा बृजकिशोर गिरि, राकेश यादव और गजेंद्र यादव भी पुखरावां पहुंचे थे. मोती, मुकेश और उमाशंकर को घोड़ासहन इलाके से, बृजकिशोर गिरि, मुजाहिर अंसारी और शंभू गिरि उर्फ लड्डू को नेपाल से व जियाउल और जुबैर को दिल्ली से पकड़ा था.

पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, आईएसआई और डी कंपनी ने शमसुल हुदा को भारत में रेल पटरियों पर ब्लास्ट कर के रेल हादसा कराने की जिम्मेदारी सौंप रखी थी. बहरहाल, कानपुर रेल ब्लास्ट में पकड़े गए अपराधियों के खुलासे के बाद यह साफ हो गया है कि बिहार और नेपाल के सैकड़ों बेरोजगार नौजवानों को रुपयों का लालच दे कर दहशत फैलाने के काम में लगा दिया गया है.      

कस्टम और एसएसबी में तकरार

भारत और नेपाल के सरहदी इलाकों में तस्करों को रोकने के बजाय कस्टम और एसएसबी यानी सशस्त्र सीमा बल आपसी तनातनी में उलझी रहती हैं. दोनों महकमों का आरोप है कि वे एकदूसरे के काम में टांग अड़ाते हैं, जिस से तस्करों पर अंकुश लगाने में अकसर काफी मुश्किलें आती हैं. सरहदी इलाकों में नकली नोट, नशीली चीजें, मानव तस्करी वगैरह का धंधा काफी पहले से फलताफूलता रहा है. पिछले कुछ सालों से आतंकी वारदातों में खासा इजाफा हो चुका है.

बिहार के तकरीबन 750 किलोमीटर तक की भारतनेपाल सरहद पर कस्टम और एसएसबी के अलगअलग काम हैं. दोनों की जवाबदेही अलगअलग है. इस के बाद भी दोनों महकमों के अफसरों और मुलाजिमों के बीच तकरार बनी रहती है. कस्टम अफसरों का आरोप होता है कि एसएसबी के लोग हमेशा उन के कामों में बेवजह दखल देते रहते हैं, जिस से काम करने में खासी दिक्कत आती रहती है. एसएसबी को न तो तस्करी का सामान जब्त करने और न ही गिरफ्तार करने का अधिकार है. अगर एसएसबी के जवान किसी तस्कर को सामान के साथ पकड़ते हैं, तो उन्हें कस्टम के हवाले कर मामले से अलग हो जाना चाहिए, लेकिन वे इस काम में पूरी तरह से भिड़ जाते हैं.  इस खटास को दूर करने के लिए दोनों महकमों के अफसरों की कई बैठकें हो चुकी हैं, पर कोई नतीजा नहीं निकल सका है.

10 नायाब कैरियर

इंजीनियरिंग, मैडिकल और सिविल सर्विसेज में कैरियर ट्रैडिशनल कैरियर के रूप में शुमार होता है, लेकिन सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के साथ अब इन परंपरागत कैरियर्स की चमक फीकी पड़ने लगी है. ऐसे में रोजगार की प्रकृति में भी काफी बड़े परिवर्तन हो रहे हैं. आने वाले दशकों में सूचना प्रौद्योगिकी में अभूतपूर्व प्रगति और तकनीक के निरंतर बदलते स्वरूप के मद्देनजर कैरियर और रोजगार के विकल्पों की प्रकृति में भी परिवर्तन की संभावनाएं हैं. प्रस्तुत हैं, इसी क्षेत्र में 10 नायाब कैरियर औप्शंस का ब्योरा :

1. ऐप डैवलपर एवं प्रोग्रामर

आज ऐंड्रौयड फोन की लौंचिंग ने मोबाइल तथा नैटवर्किंग की दुनिया में क्रांति ला दी है. इस के परिणामस्वरूप हजारों ऐप्स आ रहे हैं. लेटैस्ट ऐप्स की तकनीक ने इस क्षेत्र के ऐक्सपर्ट्स के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार के नए अवसरों का सृजन किया है. एक रिसर्च के अनुसार आज 16 हजार से अधिक मोबाइल ऐप्स इस्तेमाल में हैं. अत: आने वाले वर्षों में ऐप प्रोग्रामर और डैवलपर के रूप में नए रोजगार के कई विकल्प खुलेंगे.

2. सोशल मीडिया मैनेजर

सोशल मीडिया कम्युनिकेशन तथा बिजनैस का एक महत्त्वपूर्ण प्लेटफौर्म है. सोशल मीडिया के रूप में फेसबुक से ले कर ब्लौगिंग, ट्विटर और व्हाट्सऐप सोशल और फेमिलियल कनैक्शन के एक महत्त्वपूर्ण माध्यम के अतिरिक्त बिजनैस, गुड्स और सर्विसेज की पब्लिसिटी का भी बड़ा माध्यम साबित हो रहा है. वर्तमान में हर छोटीबड़ी कंपनी अपने प्रोडक्ट्स के बेहतर प्रैजेंटेशन के लिए सोशल मीडिया मैनेजर का यूज कर रही है. इस दिशा में कंप्यूटर साइंस में प्रोफैशनल क्वालिफिकेशंस और ऐक्सपीरियंस वाले ऐक्सपर्ट्स के लिए रोजगार के बेहतर विकल्प खुल रहे हैं.

3. मिलेनियम जनरेशन ऐक्सपर्ट

मिलेनियम जनरेशन का सामान्य अर्थ जनसंख्या के उस हिस्से से है, जो 1980 के दशक के बाद डिजिटल टैक्नोलौजी और मास मीडिया के मध्य पलीबढ़ी पीढ़ी है. यह पीढ़ी जनरेशन वाई के नाम से जानी जाती है. लेकिन मिलेनियम जनरेशन ऐक्सपर्ट से आशय उन ऐक्सपर्ट्स और प्रोफैशनल्स से है जो कंपनी के लाभ में वृद्धि और परफौर्मैंस में बेहतरी के लिए एक कंसल्टैंट और गाइड का काम करते हैं. इन ऐक्सपर्ट्स का मुख्य कार्य कंपनी के मैनेजिंग बोर्ड को वर्कर्स के काम करने के ढंग, व्यवहार और इमोशनल लैवल के बारे में गाइड करना होता है ताकि श्रमिकों के साथ उन की समझदारी के लैवल पर ही व्यवहार किया जा सके और कंपनी के प्रोडक्शन और प्रौफिट में निरंतर वृद्धि हो.

4. क्लाउड कंप्यूटिंग सर्विस प्रोवाइडर

क्लाउड कंप्यूटिंग बिजनैस के क्षेत्र में बड़ीबड़ी कौर्पोरेट कंपनियों के लिए एक महत्त्वपूर्ण डाटा रिसोर्स प्रोवाइडर के रूप में काम कर रहा है. यह एक ऐसी नैटवर्किंग सेवा है जिस से सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित क्षमताएं सेवा के रूप में उपलब्ध कराई जाती हैं. आईबीएम ने भारत में क्लाउड कंप्यूटिंग सर्विस के विकास में 100 करोड़ डौलर का निवेश कर 200 रिसर्चरस की सेवा ली है. वर्तमान में आईबीएम के छोटेबड़े लगभग 1 हजार से अधिक कमर्शियल क्लाइंट्स हैं जिन्हें वे उत्पाद और सेवा उपलब्ध की जा रही हैं जिन की वे मांग करते है. इसे इनफौर्मेशन टैक्नोलौजी का आउटसोर्सिंग भी कहते हैं.

अब अधिकांश कंपनियां अपनी सेल तथा टर्नओवर बढ़ाने के लिए डाटा बेस मैनेजर, इंजीनियर और स्ट्रैटेजिस्ट की अधिक संख्या में मांग करने लगे हैं, जिस के फलस्वरूप इस क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर उपलब्ध हो रहे हैं.

5. मार्केट रिसर्च डाटा माइनर

व्यापार में रिसर्च और डाटा विश्लेषण के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता, खासकर आज जबकि पूरी दुनिया एक ग्लोबल विलेज के रूप में तबदील हो चुकी है और हम ने अपनी अर्थव्यवस्था को विश्व के देशों के लिए खोल दिया है. जब हम रिटेल तथा थोक मार्केटिंग के डाटा और उपभोक्ताओं के व्यवहार से संबंधित फैर्क्ट्स और फिगर्स का विश्लेषण करते हैं तो हमें इस से कईर् लाभ प्राप्त होते हैं. पहले तो हमें अपनी प्रोडक्शन कौस्ट को कम करने तथा अपने प्रौफिट को अधिकतम करने में मदद मिलती है. आने वाले वर्षों में डाटा में इच्छुक उम्मीदवारों के लिए इस क्षेत्र में रोजगार के कई औप्शंस उपलब्ध हैं.

6. यूजर ऐक्सपीरियंस डिजाइनर

किसी वैबसाइट, वैब ऐप्लिकेशन या फिर डैस्कटौप सौफ्टवेयर की सफलता यूजर्स के फीडबैक मसलन, क्या वह विशेष वैबसाइट उस यूजर की आवश्यकता को पूरा कर पाती है, क्या वह वैबसाइट यूज करने में आसान है, क्या उस वैबसाइट से कस्टमर्स को क्वालिटी इनफौर्मेशन मिल पाती है, इत्यादि पर निर्भर करता है और इसी के आधार पर यह भी निर्भर करता है कि कोईर् व्यक्ति उस वैबसाइट का रैगुलर यूजर बना रहेगा कि नहीं. एक यूजर ऐक्सपीरियंस डिजाइन प्रोफैशनल हमेशा इस बात की कोशिश करता है कि एक यूजर किसी विशेष वैबसाइट का रैगुलर यूजर बना रहे और उसे गुणवत्तापूर्ण सेवा प्राप्त होती रहे. जो प्रोफैशनल इस प्रकार के यूजर ऐक्सपीरियंस डिजाइन (यूऐक्स) पर काम करते हैं वे यूजर की फीलिंग्स का अवलोकन कर उन का मूल्यांकन करते हैं. इस प्रकार वैबसाइट, ऐप्लिकेशन या सौफ्टवेयर को यूजर के यूटैलिटी लैवल को संतुष्ट करने के लायक बनाया जाता है. इस क्षेत्र में जौब औप्शंस बड़ी संख्या में उपलब्ध हैं. इस क्षेत्र के उम्मीदवार में प्रोग्रामिंग लैंग्वेज के साथसाथ फोटोशौप पर भी काम करने की योग्यता होनी चाहिए.

7. सस्टेनेबिलिटी प्रोफैशनल

विश्व के देशों के तेजी से बढ़ते ग्रोथ रेट के कारण दुनिया में पर्यावरण संतुलन हमारे लिए चिंता का विषय बन चुका है. वायुमंडल में कार्बन एमिशन की अत्यधिक मात्रा के कारण ग्लोबल वार्मिंग और अनियमित जलवायु परिस्थिति की समस्याएं हमारे लिए ज्वलंत प्रश्न हैं और इन पर नियंत्रण के लिए आने वाले निकट वर्षों में पर्यावरण वैज्ञानिकों की बड़े पैमाने पर नियुक्ति की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. पर्यावरण संकट विश्व संकट है और इस के फलस्वरूप व्यावसायिक कंपनियां पर्यावरण विशेषज्ञ और वैज्ञानिकों की नियुक्ति कर रही हैं. इस क्षेत्र में एनवायरनमैंट साइंटिस्ट और बिजनैस मैनेजर के लिए जौब प्रौस्पैक्टस की संख्या में बड़ी तेजी से वृद्धि होने की अपार संभावनाएं हैं.

8. नैनोटैक्नोलौजिस्ट

क्या आप ने कभी महसूस किया है कि आज से एक दशक के पूर्व टैलीविजन का आकार कितना बड़ा होता था? डैस्कटौप, घड़ी, कैमरा और अन्य विभिन्न इलैक्ट्रौनिक उपकरण भी बड़े आकार के होते थे. किंतु सूचना प्रौद्योगिकी के वर्तमान सोफिस्टिकेटिड युग में वैज्ञानिक इनोवेशन के कारण इन उपकरणों और अन्य गैजेट्स के साइज में आश्चर्यजनक रूप से परिवर्तन हुआ है. ये सभी उपकरण समय के साथ साइज में छोटे होते जा रहे हैं. यह सभी इनोवेशन नैनोटैक्नोलौजी कहलाते हैं. तकनीकी परिवर्तन की इस परिस्थिति में इस प्रकार के इलैक्ट्रौनिक उपकरणों की रिपेयरिंग के लिए वैसे तकनीकी ऐक्सपर्ट्स की जरूरत होगी जिन्हें नैनो तकनीशियन कहते हैं. इस जौब के लिए कैंडिडेट्स को और्गैनिक कैमिस्ट्री के साथ मौलिक्यूलर बायोलौजी और माइक्रोफैब्रिकेशन में डिग्री की आवश्यकता होती है और आने वाले वर्षों में इस में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं.

9. वेस्ट मैनेजमैंट कंसल्टैंट

फास्ट वैज्ञानिक ऐडवांसमैंट तथा तकनीकी इनोवेशंस के साइड इफैक्ट्स के रूप में इलैक्ट्रौनिक गार्बेज, जिसे ‘ईवेस्ट’ भी कहते हैं, एक गंभीर समस्या का रूप लेता जा रहा है. इस ईकचरे को यदि उचित ढंग से नष्ट न किया जाए तो इन में मौजूद खतरनाक रसायन स्वास्थ्य के लिए काफी घातक साबित हो सकते हैं. इस के उचित और फास्ट डिस्पोजल के लिए बायोलौजी और कैमिस्ट्री ग्रुप के सब्जैक्ट्स वाले हाई क्वालिफाइड युवाओं की आवश्यकता होती है. गार्बेज डिस्पोजल मैनेजमैंट में डिग्री होल्डर्स के लिए यह क्षेत्र अच्छे जौब का गोल्डन पासपोर्ट माना जाता है.

10. चीफ लिसनिंग औफिसर

कहते हैं कि लिसनिंग इज लर्निंग अर्थात सुनना सीखना है, लेकिन जब आप किसी कंपनी के चीफ लिसनिंग औफिसर होते हैं और आप उस कंपनी के उपभोक्ताओं की प्रतिक्रियाओं को सावधानीपूर्वक सुनते हैं तो आप न केवल उस कंपनी को लाभ कमाने के योग्य बनाते हैं बल्कि आप भी प्रशंसा और पुरस्कार के भागी बनते हैं. चीफ लिसनिंग औफिसर की जिम्मेदारी सोशल मीडिया मैनेजर जैसी ही होती है. यद्यपि चीफ लिसनिंग औफिसर का जौब बिलकुल नया है, लेकिन इन की जिम्मेदारी की संवेदनशीलता और अहमियत को नजर में रखते हुए यह उम्मीद करना अप्रासंगिक नहीं है कि आने वाले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में जौब की संभावनाएं बड़ी तेजी से बढ़ने वाली हैं.

लुटेरा बनाती शाहखर्ची

29 दिसंबर, 2016 की रात उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के थाना निगोहां के गांव मदाखेड़ा के देशी शराब के ठेके पर कुछ लोग बैठे शराब पी रहे थे. रात गहराई तो शराब पीने वाले वे लोग ठेके से थोड़ी दूरी पर जा कर खड़े हो गए. इस की वजह यह थी कि वे शराब के ठेके के पास चलने वाली कैंटीन में चोरी करना चाहते थे. वे अकसर यहां शराब पीने आते थे. इस से उन्हें पता था कि कैंटीन में पैसा रखा रहता है. दरअसल, नया साल आने वाला था, इसलिए उन लोगों को मौजमस्ती और शाहखर्ची के लिए पैसों की जरूरत थी. इस के लिए उन्हें कैंटीन में चोरी करने से बेहतर कोई दूसरा उपाय नजर नहीं आ रहा था. शराब का यह ठेका सिसेंडी निवासी राजेश कुमार जायसवाल की पत्नी सरिता जायसवाल के नाम था.

28 साल का मनीष कुमार अपने परिवार के गुजरबसर के लिए ठेके के पास कैंटीन चलाता था. उस की कैंटीन में शराब के साथ पीने के लिए पानी, कोल्डड्रिंक और नमकीन बिस्कुट वगैरह मिलता था. दिन भर जो बिक्री होती थी, वह मनीष के पास कैंटीन में ही रखी रहती थी. रायबरेली जिले के रहने वाले राजनारायण, कल्लू, चुन्नीलाल और चंदन अकसर यहां आ कर शराब पीते थे. पैसों के लिए ये इलाके में चोरी और लूटपाट करते थे. इन सभी को शान से रहने की आदत थी. इन्हें महंगी गाडि़यों में घूमने और ब्रांडेड कपड़े पहनने का शौक था.

रायबरेली जिले के थाना बछरावां के रहने वाले राजनारायण और चंदन बापबेटे थे. बेरोजगारी और महंगे शौक ने दोनों को एक साथ अपराध करने के लिए विवश कर दिया था. गिरोह बना कर ये इलाके में पत्तल और दोने बेचते थे.

इस के जरिए ये पता कर लेते थे कि किस घर या दुकान में रकम मिल सकती है. ये सभी ज्यादातर बड़ी दुकानों, शोरूम और दूसरी जगहों को ही निशाना बनाते थे. गांव और आसपास की बाजारों में अभी भी लोग बैंकों में पैसा रखने के बजाए घर पर ही रखते हैं. दिसंबर महीने में नोटबंदी के चलते बैंकों में पैसा जमा कराना मुश्किल हो गया था, इसलिए कैंटीन चलाने वाले मनीष ने भी बिक्री के पैसों को कैंटीन में ही रखा हुआ था.

यह बात लुटेरे गिरोह को पता चल गई थी, इसलिए 29 दिसंबर को शराब पीने के बाद इन लोगों ने वहां चोरी की योजना बना डाली थी. रात में मनीष सो गया तो ये सभी चोरी करने के लिए कैंटीन में घुसे. चोरी करते समय बदमाशों ने इस बात का पूरा खयाल रखा कि किसी तरह का कोई शोरशराबा न हो.

इस के बावजूद कैंटीन में रखा एक बरतन गिर गया, जिस की आवाज सुन कर मनीष जाग गया. उस के जागने से चोरी करने वाले परेशान हो उठे. उन्हें पकड़े जाने का भय सताने लगा. बचने के लिए उन्होंने मनीष के सिर पर लोहे का सरिया मार दिया, जिस से वह बेहोश हो कर गिर गया.

उस के सिर से खून बहने लगा. इस के बाद लुटेरे नकदी और सामान लूट कर भाग गए. सुबह शराब के ठेके का सेल्समैन पहुंचा तो उस ने मनीष को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया. मनीष के शरीर से खून ज्यादा बह चुका था, इसलिए उसे बचाया नहीं जा सका.

उस की मौत की सूचना थाना निगोहां पुलिस को दी गई तो पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ चोरी और हत्या का मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी. इंसपेक्टर ओमवीर सिंह ने मामले की जानकारी लखनऊ की एसएसपी मंजिल सैनी को दी तो उन्होंने इस मामले की जांच में क्राइम ब्रांच को भी लगा दिया.

एसपी क्राइम डा. सुजय कुमार की अगुवाई में गठित टीम में से सर्विलांस सेल के प्रभारी अक्षय कुमार और इंसपेक्टर क्राइम उदय प्रताप सिंह ने मामले की छानबीन शुरू कर दी. पुलिस के लिए सब से मुश्किल काम यह था कि घटना का कोई चश्मदीद नहीं था. यह पूरी तरह से ब्लाइंड मर्डर था. ऐसे में पूरा दारोमदार सर्विलांस टीम पर था.

निगोहां पुलिस और क्राइम ब्रांच ने कुछ संदिग्ध लोगों को निशाने पर लिया. उन की जानकारी सर्विलांस टीम को दी. इस तरह कड़ी से कड़ी जुड़ने लगी. आखिर में पुलिस के हत्थे रायबरेली जिले का यह लुटेरा गिरोह लग गया. अब जरूरत थी घटना के बारे में उन से कबूल करवाना.

दरअसल, लुटेरे आपस में फोन पर बातें कर रहे थे, उसी से पुलिस को उन के द्वारा की गई वारदात का पता तो चल ही गया था, यह भी पता चल गया था कि वे निगोहां के टिकरा गांव के पास बने सामुदायिक मिलन केंद्र पर एकत्र होंगे.

यह जानकारी मिलते ही पुलिस टीम ने घेराबंदी कर के 6 जनवरी को इस गिरोह को पकड़ लिया था. पुलिस को इस गिरोह के पास से 35 हजार रुपए नकद और 10 मोबाइल फोन मिले थे. पुलिस ने गिरोह के सदस्यों से वह सरिया भी बरामद कर लिया था, जिस से मनीष की हत्या की गई थी.

पूछताछ में इस गिरोह ने बताया था कि निगोहां के ही बाबूखेड़ा गांव में रामू के घर 15 अक्तूबर को हुई चोरी भी इन्हीं लोगों ने की थी. दरअसल 29 दिसंबर की रात इस गिरोह ने सब से पहले पत्तेखेड़ा और मदाखेड़ा गांव में चोरी का प्रयास किया था, पर सफल नहीं हो सके थे.

ऐसे में ये शराब के ठेके पर पहुंचे, जहां कैंटीन में इन लोगों ने पैसा देखा तो लूट की योजना बना डाली. लूट के दौरान आवाज होने से ये लोग बचने के लिए मनीष को मारने पर मजबूर हो गए. पुलिस की इस सफलता के लिए एसएसपी मंजिल सैनी और एसपी क्राइम डा. संजय कुमार ने पुलिस टीम को बधाई दी है.

एसआई अक्षय कुमार ने बताया कि यह गिरोह पहले अपने टारगेट को चुनता था, उस के बाद चोरी करता था. उस दिन 2 जगहों पर असफल होने के बाद ये कैंटीन में चोरी करने को मजबूर हो गए. इन्हें किसी भी तरह से पैसा हासिल करना था, इसलिए ये समझ नहीं पाए कि कैंटीन में कोई सोया हुआ है. इन्हें लगता था कि कैंटीन में कोई होगा नहीं. इंसपेक्टर ओमवीर सिंह का कहना था कि इस गिरोह के पकड़े जाने के बाद इलाके में होने वाली चोरियां रोकी जा सकेंगी?

तोहफा अप्रैल फूल का

अप्रैल की पहली तारीख थी. चंदू सुबह से ही सब से मूर्ख बननेबनाने की बातें कर रहा था. इसी कशमकश में वह स्कूल पहुंचा, लेकिन स्मार्टफोन पर बिजी हो गया. हमेशा गैजेट्स की वर्चुअल दुनिया में खोया रहने वाला चंदू स्मार्टफोन से व्हाट्सऐप पर गुडमौर्निंग के मैसेजेस कौपीपेस्ट कर रहा था कि अचानक व्हाट्सऐप पर एक मैसेज आया. इस मैसेज को पढ़ने और इंप्लीमैंट करने के बाद जो नतीजा उस के सामने आया उस से वह ठगा सा रह गया. दरअसल, किसी ने उसे अप्रैल फूल बनाया था. वह खुद पर खिन्न था लेकिन तभी उसे खुराफात सूझी. अत: उस ने भी अपने सभी दोस्तों को अप्रैल फूल बनाने की सोची और अपने सभी कौंटैक्ट्स पर उस मैसेज को कौपी कर दिया.

उस के कौंटैक्ट्स में उस की क्लास टीचर अंजू मैडम का नंबर भी था, सो मैसेज उन के नंबर पर भी फौरवर्ड हो गया. मैसेज में लिखा था, ‘क्या आप किसी अमित कुमार को जानते हैं? वह कह रहा है कि वह आप को जानता है. उसे आप का फोन नंबर दूं या आप को उस का फोटो सैंड करूं. मेरे पास उस का फोटो है. आप बोलें तो दूं नहीं तो नहीं.’

संयोग से मैडम के वुडबी का नाम भी अमित था, सो उन्हें बड़ी हैरानी हुई. उन्होंने आननफानन में रिप्लाई किया कि फोटो भेज दो और उन्हें मेरा नंबर भी दे दो, लेकिन जवाब में चंदू ने उन्हें फोटो भेजा तो वे ठगी रह गईं. फिर नीचे लिखे मैसेज को पढ़ कर हैरान हुईं. लिखा था ‘अप्रैल फूल बनाया.’ उस फोटो में अंगरेजी फिल्म ‘द मम्मी’ के प्रेतात्मा वाले करैक्टर का भद्दा चित्र था. मैम को चंदू पर बहुत गुस्सा आया. सो उन्होंने उसे सबक सिखाने की सोची. ‘अपने से बड़ों से मजाक करता है. इसे सबक सिखाना ही होगा.’ लेकिन साथ ही वे संदेश भी देना चाहती थीं कि मजाक हमउम्र से ही करे.

चंदू, जिस का पूरा नाम चंद्रप्रकाश था, 11वीं कक्षा का छात्र था. पढ़ाई में निखद लेकिन बात बनाने में आगे. तिस पर उसे छोटेबड़े का भी लिहाज न था. हमेशा गैजेट्स की वर्चुअल दुनिया में ही खोया रहने वाला चंदू स्मार्टफोन मिलने के बाद तो और खो गया था. हर समय, चैटिंग, व्हाट्सऐप, यूट्यूब में लगा रहता. प्रार्थना के बाद जब सब क्लासरूम में आए तो क्लास टीचर अंजू क्लास में आते ही बोलीं, ‘‘आज सुबह से ही तुम सब एकदूसरे को अप्रैल फूल बना रहे हो. चलो, मैं भी तुम्हें खेलखेल में फन के रूप में पढ़ाती हूं. मैं इतिहास विषय से कुछ प्रश्न पूछूंगी, जो सब से ज्यादा सही उत्तर देगा उसे इनाम दिया जाएगा. शर्त यह है कि वह किसी तरह मुझे अप्रैल फूल भी बनाए.’’

मैम ने पहला प्रश्न पूछा, ‘‘बाबर का जन्म कब हुआ था?’’ सभी छात्र शून्य में देखने लगे लेकिन पीछे बैठा चंदू झट से बोला, ‘‘14 फरवरी, 1483.’’

 ‘‘सही जवाब,’’ मैम ने कहा और अगला प्रश्न दागा, ‘‘क्रीमिया का युद्ध कब से कब तक चला?’’

इतिहास की तिथियां किसे याद रहती हैं. अत: सभी चुप थे. तभी चंदू फिर बोला, ‘‘जुलाई 1853 से सितंबर 1855 तक.’’

‘‘बिलकुल सही,’’ एक बार फिर तालियां बजीं. तभी प्रीति बोल पड़ी, ‘‘मैम आप के बालों पर चौक लगा है.’’

‘‘हां, मुझे पता है,’’ कह कर वे चुप हो गईं. दरअसल, प्रीति ने मैम को अप्रैल फूल बनाना चाहा था. फिर मैम ने अगला प्रश्न पूछा, ‘‘कुतुबमीनार किस ने बनवाई थी?’’ इस बार कईर् छात्रों के हाथ खड़े थे, लेकिन अंजू मैडम ने जानबूझ कर चंदू से ही पूछा तो उस ने भी सटीक उत्तर बता दिया, ‘‘गुलाम वंश के संस्थापक कुतबुद्दीन ऐबक ने.’’

‘‘सही उत्तर,’’ कह कर मैम ब्लैक बोर्ड की ओर मुड़ीं तो राहुल बोल पड़ा, ‘‘मैम, आप की साड़ी के पल्लू पर छिपकली है.’’

अंजू मैम जानती थीं कि अप्रैल फूल बनाया जा रहा है, सो बोलीं, ‘‘तुम हटा दो.’’ अब मैम जो भी प्रश्न पूछतीं पीछे डैस्क पर बैठा चंदू उस का सही जवाब बताता. 10 में से केवल एक सवाल का उत्तर अन्य छात्र ने दिया. बाकियों ने सिर्फ अप्रैल फूल बनाने की नाकाम कोशिश की. सभी छात्र इस बात से भी हैरान थे कि फिसड्डी चंदू आज इतनी आसानी से बिलकुल सटीक उत्तर कैसे दे रहा है? अंत में नतीजा सुनाती अंजू मैम बोलीं, ‘‘आज के इस चैलेंज में ज्यादा से ज्यादा सवालों के सही जवाब चंदू ने दिए और अप्रैल फूल भी उसी ने बनाया,’’ कहती हुई मैम चंदू की सीट पर गईं और उस के हाथ से मोबाइल छीनती हुई बोलीं, ‘‘देखो, यह सभी प्रश्नों के उत्तर नैट से गूगल सर्च कर के दे रहा था.’’

फिर वे चंदू की ओर मुखातिब होती हुई बोलीं, ‘‘चंदू, आखिरी पीरियड में आ कर मुझ से अपना मोबाइल और अप्रैल फूल का तोहफा ले जाना.’’ सभी बच्चे हैरान थे कि चंदू ने बैठेबैठे खेलखेल में इनाम जीत लिया. सभी को इस बात से चंदू से ईर्ष्या थी, लेकिन चंदू बहुत खुश था. आखिरी पीरियड में चंदू अंजू मैम के पास गया तो उन्होंने उसे एक बड़ा सा डब्बा थमा दिया, जिसे बहुत ही सुंदर पैकिंग से पैक किया हुआ था. ऊपर चिट लगी थी, ‘‘चंदू को अप्रैल फूल का तोहफा मुबारक.’’ चंदू ने खुशीखुशी तोहफा लिया और क्लासरूम में आ कर बड़े उत्साह से खोलने लगा. तोहफे का डब्बा खोलते समय वह फूला नहीं समा रहा था. चंदू ने पैकिंग पेपर हटाया औैर डब्बा खोला. वह तोहफा देखने को खासा उत्सुक था. उस के आसपास अन्य छात्र भी इकट्ठे हो तोहफा देखने को उत्सुक दिखे. डब्बे को खोलने पर उसे अंदर एक और छोटा डब्बा मिला. चंदू हैरान था. अब इस डब्बे को खोला तो अंदर एक और डब्बा था. चंदू नरवस हो गया. डब्बे में डब्बा खोलते उस के पसीने छूट गए. वह सोचने लगा, ‘मैम ने अच्छा तोहफा दिया है कि खोलते रहो.’

एक छात्र बोला, ‘‘लगता है चंदू को मैम ने अप्रैल फूल बनाया है, डब्बे में डब्बा ही खुलता जा रहा है.’’ ‘हां, शायद अप्रैल फूल के तोहफे में अप्रैल फूल ही बनाया है मैम ने,’ सोचता हुआ चंदू डब्बे खोलता गया लेकिन अंत में जो डब्बा मिला उसे पा कर वह फूला न समाया. यह अत्यंत महंगे मोबाइल फोन का डब्बा था.  चंदू खुश हो गया. उसे लगा मैम ने इतना महंगा फोन गिफ्ट किया है, लेकिन ज्यों ही उस ने मोबाइल फोन का डब्बा खोला, उस में मोबाइल के बजाय एक पत्र पा कर हैरान हुआ. फिर पत्र निकाल कर पढ़ने लगा. लिखा था,‘चंदू तुम्हें अप्रैल फूल का तोहफा मुबारक हो. तुम ने सुबह मुझे मैसेज कर अप्रैल फूल बनाया, मुझे बहुत पिंच हुआ. संयोग से मेरे वुडबी का नाम भी अमित है सो मैसेज का संबंध उन से जुड़ा, लेकिन बाद में तुम्हारे द्वारा भेजा ‘ममी’ का फोटो देख दिल धक्क रह गया. तुम्हें मजाक करते समय यह भी खयाल नहीं रहा कि तुम मजाक किस से कर रहे हो. उस की उम्र क्या है. तुम से संबंध क्या है. तुम्हें इस तरह की हरकतें अपने हमउम्र के साथ ही करनी चाहिए, बड़ों के  साथ नहीं. ‘दूसरे, तुम ने स्कूल में मोबाइल लाने की गलती की, क्योंकि स्कूल में मोबाइल अलाउड नहीं होता. तुम जानते ही हो. तिस पर तुम ने गूगल सर्च कर कर के प्रश्नों के उत्तर दिए और मुझे फूल बनाया. इस तरह तुम सटीक उत्तर दे पाए परंतु क्या खुद को परख पाए? परीक्षा खुद को परखने का पैमाना है. स्कूल परीक्षा में मोबाइल भी नहीं होगा, तब क्या करोगे? ‘समय से चेत जाओ और गैजेट्स की वर्चुअल दुनिया से बाहर आ कर ऐक्चुअल में विचरण करो. गैजेट्स का सही इस्तेमाल सीखो. नैट से नकल के बजाय हैल्प लो और अपने नोट्स बनाओ. परीक्षा की तैयारी करो. मैं ने पहले भी जब क्लास टैस्ट लिए हैं तुम्हें मोबाइल सर्च करते पाया है, पर तुम्हारी बेइज्जती न हो इसलिए चुप थी. आज का नाटक भी तुम्हारे कारण किया. तभी मैं तुम से ही सब प्रश्न पूछ रही थी और तुम उत्साह में नैट से देख कर उत्तर देते रहे. मेरा फर्ज था समय रहते तुम्हें चेताऊं. आगे से मजाक हमउम्र लोगों से करना साथ ही पढ़ाई के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल करो इस से गैजेट्स का सही इस्तेमाल भी होगा और तुम्हारा भला भी. हैप्पी अप्रैल फूल.

‘तुम्हारी क्लास टीचर

‘अंजू.’

चंदू ने पत्र फोल्ड कर के जेब में रख लिया लेकिन उस में लिखी बातों ने उस के हृदय को झकझोर कर रख दिया. सभी साथी भी उसे हमदर्दी की नजरों से देख रहे थे. उसे सबक मिल गया था. ‘वाकई अगर वह डिजिटल दुनिया से निकल कर ऐक्चुअल तैयारी करे तो परीक्षा में अच्छे अंक ही नहीं लाएगा बल्कि टौप भी करेगा. अगली परीक्षा में वह इन बातों पर जरूर अमल करेगा और अप्रैल फूल के इस तोहफे को जीवन का टर्निंग पौइंट मान कर संभाल कर रखेगा.’ यह संकल्प लेते हुए चंदू ने पत्र जेब में डाला और नैट पर परीक्षा सामग्री सर्च कर डायरी में नोट्स बनाने बैठ गया.

अवसर न खोएं

जीवन उतना सरल नहीं है जितना आज के किशोरों को लगता है. एक समय था जब किशोरों को अपने घरों में ही भाईबहनों व रिश्तेदारों के साथ प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता था. हां, उन दिनों घर आज की तरह सूने नहीं होते थे. फिर भी सत्य यह है कि किशोर आज ज्यादा पा रहे हैं और यह हमेशा मिलता रहेगा, सुरक्षा रहेगी, सोचना गलत है.

बड़े पेड़ के वे दिन सब से खतरनाक होते हैं जब उस का तना एक लाठी या डंडे के लायक हो जाए. तभी उस को उखाड़े जाने के अवसर ज्यादा होते हैं. इसी तरह गरमियों में भी उगते सूरज की रोशनी भाती है पर वह ज्यादा देर तक लुभावनी नहीं रहती. किशोरावस्था में वह मजबूती नहीं होती जो परिपक्वता आने पर मिलती है.

इसलिए जीवन की कठिनाइयों को झेलने की ट्रेनिंग लेना हर समय जरूरी है. किशोरों का तो यही काम होना चाहिए कि वे किसी भी अवसर को न खोएं. घर के छोटेबड़े कामों के साथ चैलेंजिंग, रोमांचक, अनूठे कामों को भी इस दौर में करें. इतना पढ़ें कि हर लाइब्रेरी छोटी पड़ जाए. इतना नाचें कि हर स्टेज छोटा पड़ जाए. इतना चढ़ें कि पहाड़ बौना दिखे. इतना तैरें कि हर स्विमिंग पूल गुसलखाने का टब लगे. इतना लिखें कि कागज की कमी पड़ जाए. माना कि आज सरकार को किशोरों की चिंता नहीं है. किशोरों को तो सरकार की तरफ से छोटे बच्चों को मिलने वाली सुविधाएं भी नहीं मिलतीं. वे अधर में रहते हैं. मातापिता समझते हैं पर जानते नहीं कि इन सुनहरे वर्षों का इस्तेमाल कैसे हो जबकि समाज को और सरकार को अपने भ्रष्टाचार से ही फुरसत नहीं होती.

सरकार को तो सड़कें बनवाने या कूड़ा उठवाने से ही समय नहीं मिलता कि वह किशोरों के लिए कुछ सोच सके, मातापिता इन नौनिहालों को ले कर चिंतित रहते हैं कि कल इन का क्या होगा. नतीजा यह है कि इन सुनहरे सालों के बाद आने वाली गरमी में सारे सपने सूखे पत्तों की तरह झड़ जाते हैं. इसलिए जरूरी है कि किशोर खुद को पहचानें और स्वयं अपना लक्ष्य तैयार करें. खुद अपने समय का सदुपयोग करें.

इस समय छुट्टियों की तैयारी करें. देशविदेश जाएं. पीठ पर बैकपैक ले कर गांवगांव घूमें. लोगों से मिलें. लोगों के लिए काम करें. उन से कुछ सीखें. कुछ बनाने की कोशिश करें. चाहे चित्रकारी हो या कारपेंटरी, यह समय हर चीज पर हाथ आजमाने का है और अगर स्कूल से छुट्टी मिली है तो उसे सोने में सुहागा समझें. गरमी, बरसात की चिंता किए बिना अपने नए लक्ष्य बनाएं और उन्हें पूरा करने में लग जाएं. आज तकनीक ने किशोरों को बहुत कुछ हाथ में दे दिया है. इस का भरपूर लाभ उठाएं. चूकें नहीं. समय जाया न करें, बल्कि समय का सदुपयोग कर अपनी राह प्रशस्त करें.

विधानसभा चुनाव 2017 : जीत के पार चुनौतियां हजार

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी और पंजाब में कांग्रेस को जनता ने बहुमत से सरकार बनाने का मौका दे कर चुनौती दी है कि अब वे इन प्रदेशों को विकास की राह पर आगे ले जाएं. इन दलों ने चुनाव में जनता से जो वादे किए थे, उन को पूरा करें.

उत्तर प्रदेश में अब तक भारतीय जनता पार्टी को इस बात का मलाल था कि इस राज्य में उस की सरकार नहीं है. ऐसे में वह प्रदेश का सही विकास नहीं कर पा रही है. उत्तर प्रदेश ने पहले 73 सांसदों और अब 325 विधायकों का साथ दे कर भाजपा के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा कर दिया है. कानून व्यवस्था बनाए रखने, भ्रष्टाचार खत्म करने और विकास को गति देने के लिए भाजपा के सामने अब बच कर निकलने का कोई रास्ता जनता ने नहीं छोड़ा है. उत्तर प्रदेश की जनता ने यह भी दिखा दिया है कि बहुमत हासिल करने वाली पार्टी को वह अर्श से फर्श पर भी उतार सकती है. साल 2007 में जीती बहुजन समाज पार्टी और साल 2012 में जीती समाजवादी पार्टी इस की मिसाल हैं. दलित और पिछड़े समाज के चिंतक मानते हैं कि मुलायम सिंह यादव और कांशीराम की ही तरह मायावती और अखिलेश यादव को भी मिल कर ‘नव हिंदुत्व’ का मुकाबला करना होगा.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने अगड़ों, पिछड़ों और दलितों का नया समीकरण बना कर सब से बड़ी जीत हासिल की है. 1991 की राम लहर में भी भाजपा को इतनी सीटें नहीं मिली थीं. अब वह अगड़ापिछड़ा और दलित गठजोड़ को कैसे एकजुट रख पाएगी, यह बड़ी चुनौती होगी. भाजपा के लिए चिंता करने वाली यह बात भी है कि लोकसभा चुनाव के मुकाबले विधानसभा चुनाव में उस का वोट फीसदी कम हुआ है. लोकसभा चुनाव में भाजपा को 42.63 फीसदी वोट मिले थे, जबकि विधानसभा चुनाव में यह फीसदी 39.70 पर आ गया है.

भाजपा के साथसाथ सपा और बसपा के लिए भी यह चुनौतियों भरा समय है. मायावती के काम करने के तरीके का जादू टूट रहा है, तो सपा के मंडल की राजनीति पर खतरा उमड़ रहा है. जिस तरह का बहुमत भाजपा को मिला है, कांग्रेस को भी किसी दौर में ऐसा बहुमत मिल चुका है. ऐसे प्रचंड बहुमत के बाद चुनौतियों की कला से निबटना सब से बड़ी कामयाबी मानी जाती है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के कुछ समय पहले की बात है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह लखनऊ की मोहनलालगंज संसदीय सीट से सांसद कौशल किशोर के घर गए थे. कौशल किशोर दलित बिरादरी के नेता हैं. वे भाजपा के विरोधी भी रहे हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में वे भाजपा में शामिल हुए और सांसद बने थे.

अमित शाह ने कौशल किशोर के घर जा कर यह संदेश दिया कि भाजपा अब दलित जातियों के साथ सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना चाहती है. कौशल किशोर के घर गए अमित शाह ने वहां पर भोजन किया था. आमतौर पर कोई बड़ा नेता जब ऐसे किसी कार्यकर्ता के घर जाता है, तो बाहरी लोग खाना बनाने का काम करते हैं, पर अमित शाह ने घर के बने भोजन को खाने की बात कही थी. कौशल किशोर के परिवार के लोगों और उन की पत्नी ने जो भी अपनी रसोई में बनाया था, उसे बड़ी तारीफ के साथ अमित शाह ने खाया था. वहां मौजूद सभी को सुखद आश्चर्य हुआ था कि इतनी बड़ी पार्टी का नेता कितने सहज भाव से एक दलित के घर खाना खाने गया था.

2014 के लोकसभा चुनाव तक भाजपा को अगड़ी जातियों खासकर बनियों की पार्टी माना जाता था.  मोदीशाह की जोड़ी ने इस सोच को बदलने की शुरुआत की. लोकसभा चुनाव में जीत के बाद मोदीशाह की जोड़ी को एक बल मिला. भाजपा में अगड़ी जतियों का दबदबा कमजोर हुआ. लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दूसरी पार्टियों से दलित नेताओं को शामिल किया. इन में छोटेबड़े तमाम तरह के नेता शामिल हुए. ‘अपना दल’ की अनुप्रिया पटेल, बिहार से रामविलास पासवान, महाराष्ट्र से रामदास अठावले, उदित राज, कौशल किशोर ऐसे बहुत सारे नाम इस लिस्ट में शामिल हैं. भाजपा में दलित और पिछड़े नेता पहले भी रहे हैं. ये नेता हाशिए पर होते थे. अगड़ी जातियों के नेता उन को अपने दबाव में रखते थे. मोदीशाह की जोड़ी ने इन नेताओं को आगे बढ़ाने का काम शुरू किया. उत्तर प्रदेश में अनुप्रिया पटेल और कौशल किशोर जैसे नेताओं को नई पहचान दी.

सपा बसपा से नाराजगी

पहली बार अमित शाह ने पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ बना कर पाल और गड़रिया समुदाय के नेता एसपीएस बघेल को उस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद पर अगड़ी जातियों के दावे को दरकिनार करते हुए केशव प्रसाद मौर्य को कुरसी दी. उत्तर प्रदेश में दलित जातियों में जाटव बिरादरी के बाद पासी सब से बड़ी तादाद में हैं. बसपा पासी और जाटव बिरादरी के सहारे ही आगे बढ़ी थी. पासी धीरेधीरे अपनी अनदेखी से नाराज हो कर बसपा से टूट गए. भाजपा ने पासी बिरादरी को अपने से जोड़ने के सिलसिले में पासी बिरादरी में असर रखने वाले नेताओं को आगे बढ़ाया. पूर्वांचल में राजभर समुदाय बड़ी तादाद में है, जो बसपा और सपा दोनों की अनदेखी का शिकार था. भाजपा ने राजभर समुदाय के ओमप्रकाश राजभर को अपने साथ लिया. केंद्रीय मंत्रिमंडल से ले कर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के गठबंधन तक में भाजपा ने अपने छोटेछोटे सहयोगियों को पूरा हक दिया.

लोकसभा चुनावों में मिली जीत के बाद ही मोदीशाह का ‘मिशन उत्तर प्रदेश’ शुरू हो चुका था. अपने अगड़े वोट बैंक की नाराजगी के जोखिम कोे दरकिनार करते हुए इस मोदीशाह जोड़ी ने गैरजाटव दलितों और गैरयादव पिछड़ों को भरपूर अहमियत दी. चुनावी टिकट देने के समय भाजपा ने 70 टिकटें गैरजाटव दलितों और 112 टिकटें पिछड़ों को दीं. चुनाव के पहले भाजपा ने 2 सौ से ज्यादा पिछड़ा वर्ग सम्मेलन और दलित सम्मेलन कराए. भाजपा ने 90 हजार कार्यकर्ताओं की पैदल सेना तैयार की थी, जिस में सब से ज्यादा दलितपिछड़े तबके के लोग थे. अगड़ी जातियों की नाराजगी को कम करने के लिए भाजपा ने राजनाथ सिंह और कलराज मिश्र को चुनाव प्रचार में आगे रखा.

गैरजाटव जातियां इस वजह से परेशान थीं कि उन को बसपा में हक नहीं मिल रहे थे. गैरयादव पिछड़े सपा में यादव बिरादरी के बढ़ते दबदबे से नाराज थे. भाजपा ने इसी वोट बैंक में सेंधमारी की. इन जातियों में जातीयता की बात को दबा कर धर्म, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाया. भाजपा ने मुसलिम बिरादरी को एक भी टिकट न दे कर परोक्ष रूप से धार्मिक तुष्टीकरण को नई परिभाषा दी. सपा और बसपा जैसे दल इस चाल को समझ नहीं पाए. वे मुसलिम तुष्टीकरण की राह पर आगे चल पड़े. उत्तर प्रदेश विधानसभा के शुरुआती दौर में भाजपा ने इस बात को हवा देने में परहेज किया. इस के बाद जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुसलिम बहुल इलाकों का चुनाव खत्म हो गया, तो भाजपा ने हिंदुत्व के प्रतीक चिह्नों को उठा कर हिंदुत्व का ऐसा धुव्रीकरण किया, जो अंडर करंट के रूप में था. भाजपा को जितनी उम्मीद थी, उस से ज्यादा समर्थन उसे हासिल हुआ.

मुश्किल दौर में बसपा

बहुजन समाज पार्टी केवल एक दल नहीं है, यह एक विचारधारा थी, जिस के सहारे समाज का सब से कमजोर तबका अपने को सहज पाता था. बसपा उस के हकों को ले कर सजग थी. कांशीराम ने भाजपा के राम मंदिर कार्ड को जवाब देते हुए दलितपिछड़ा गठजोड़ बनाया था, जिस के तहत ‘मिले मुलायमकांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ जैसे नारे लगे थे. पर समय के साथसाथ बसपा अपनी नीतियों पर नहीं चल पाई. कांशीराम के बाद सत्ता मायावती के हाथ में आई, तो बसपा के जनाधार में गिरावट शुरू हो गई. दलित जातियों में राजनीतिक चेतना के आने से गैरजाटव जातियां अपने को बसपा में अनदेखा महसूस करने लगीं. यही वजह थी कि बसपा धीरेधीरे अपने बेस वोट को खोने लगी. पार्टी पर अपना दबदबा मजबूत रखने की कोशिश में मायावती दूसरे नेताओं को पार्टी के साथ नहीं जोड़ पाईं, जिस के चलते कांशीराम के समय के बसपा नेता पार्टी से दूर होते गए.

सत्ता के जरीए सामाजिक ताकत हासिल करने के सिद्धांत पर अमल करते हुए बसपा ने भाजपा से 3 बार समर्थन ले कर सरकार बनाई थी. तब मायावती मुख्यमंत्री बनी थीं. दलितों को तब बसपा में केवल जाटव जातियों का असर नजर आने लगा था  गैरजाटव जातियां और उन के नेता अनदेखी का शिकार हो कर बसपा से टूटने लगे. गैरजाटव जातियों के टूटने से पार्टी को मजबूत बनाने की कोशिश में मायावती ने दलितब्राह्मण गठजोड़ की सोशल इंजीनियरिंग को तैयार किया. 2007 में बसपा बहुमत से सरकार बनाने में कामयाब रही. बसपा की इस सरकार के समय ही दलितों को अपनी अनदेखी खुल कर नजर आने लगी. बहुमत की सरकार में मायावती अपनी छाप छोड़ने में नाकाम रहीं. यहीं से बसपा के जनाधार का टूटना शुरू हो गया था. 2009 के लोकसभा चुनाव में मायावती ने प्रधानमंत्री बनने का सपना देखा था, पर उस चुनाव में बसपा को मनचाही कामयाबी नहीं मिली. 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा सत्ता से बाहर हुई, तो बसपा की धुर विरोधी सपा सरकार में आ गई.

2014 के लोकसभा चुनावों में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली. 2017 के विधानसभा चुनावों में बसपा सत्ता की सब से प्रमुख दावेदार थी. इस के बाद भी उस को महज 19 सीटें ही मिल पाईं. यह मायावती के काम करने के तरीके पर सब से बड़ा सवाल है. बसपा का कोर वोटर टूट रहा है. मायावती का जादू ढलान पर है. बसपा को 1991 में विधानसभा में 12 सीटें मिली थीं. 2017 में वह वापस 19 सीटों पर सिमट गई है. इस बात का अहसास मायावती को था. इस की कमी को पूरा करने के लिए ही मायावती ने दलितमुसलिम गठजोड़ की खिचड़ी पकाने की तैयारी की थी, पर इस का स्वाद पूरी तरह से बेस्वाद नजर आया.

बसपा के पास अब उत्तर प्रदेश में इतने विधायक भी नहीं बचे हैं, जिन के सहारे पार्टी प्रमुख मायावती 2018 में राज्यसभा में अपनी सदस्यता को बचाए रख पाएं. पार्टी में इतने विधायक भी नहीं हैं कि वे उत्तर प्रदेश की विधानसभा में सदस्य विधानपरिषद बनी रह सकें. ऐसे में राष्ट्रीय पार्टी का तमगा भी बचा रहना मुश्किल है. मायावती लोकसभा और विधानसभा का चुनाव कम ही लड़ती हैं. ऐसे में वे राज्यसभा को अपने लिए बेहतर जरीया समझती हैं. मायावती की राज्यसभा सदस्यता 2 अप्रैल, 2018 को खत्म हो रही है. ऐसे में दोबारा वे राज्यसभा कैसे पहुंचेगी, यह मुश्किल सवाल है. दरअसल, बसपा ने चुनाव में जीत को हासिल करने के लिए ऐसे करोड़पति नेताओं को टिकट देना शुरू किया, जिन को दलित समाज से कोई लेनादेना नहीं होता था. ऐसे लोग बसपा से टिकट और दलितों से वोट पा कर चुनाव जीत जाते थे. समाज के लिए कुछ न करने से लोग ऐसे नेताओं से नाराज होने लगे. ऐसे लोगों में से ज्यादातर ठेकेदार, प्रौपर्टी डीलर जैसे लोग होते थे. इन लोगों को टिकट देने के लिए जमीनी नेताओं की अनदेखी की जाती थी. 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने सब से ज्यादा करोड़पति नेताओं को टिकट दिए.

अब दलित समाज भी जागरूक हो गया है. उसे अपनी अनदेखी का अहसास होने लगा है. वह धीरेधीरे अपने हकों को लेने और समझने लग गया है. भाजपा ने ऐसे दलित और पिछड़े तबके के दर्द को समझते हुए उन को ‘नव हिंदुत्व’ का पाठ पढ़ाया और धर्म के नाम पर भाजपा के पक्ष में खड़ा कर लिया.  भाजपा ने ‘नव हिंदुत्व’ के नाम पर दलितों को अपने साथ तो जोड़ लिया है, पर जमीन पर दलितों को इज्जत दिलाना मुश्किल काम है. आज भी समाज में छुआछूत और गैरबराबरी का भाव फैला हुआ है. मायावती अपनी इस हार को भले ही ईवीएम मशीनों की गड़बड़ी से जोड़ कर देख रही हैं, पर असल बात यह है कि उन के काम करने के तरीके का जादू खत्म हो गया है. बसपा के आंदोलन को बचाने के लिए मायावती को अपने अहम को खत्म करते हुए नए प्रयोग करने होंगे, नहीं तो बसपा के साथ दलितों की आवाज के गुम हो जाने का खतरा मंडरा रहा है.

हाशिए पर मंडल राजनीति

अयोध्या के राम मंदिर आंदोलन के पहले मंडल आयोग ने जिस तरह से हिंदी बोलने वाले प्रदेशों की राजनीति को प्रभावित किया था, अब वह दौर खात्मे की ओर है. बसपा में जिस तरह से मायावती का राज चला, उसी तरह से सपा में मुलायम सिंह यादव और उन के परिवार का कब्जा हो गया. गैरजाटव की तरह गैरयादव जातियां सपा से टूटने लगीं. 2012 में बसपा को हराने के लिए सपा के साथ पिछड़ी और अगड़ी जातियां बड़ी तादाद में एकजुट हो गईं और सपा की सरकार बहुमत से बनी. सरकार बनने के बाद गैरयादव जातियां हाशिए पर सिमटने लगीं. बड़ी तादाद में दूसरे यादवों के साथसाथ मुलायम परिवार सत्ता में शामिल हो गया. 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा के जो 5 लोग चुनाव जीते, वे सभी मुलायम परिवार के थे. अखिलेश सरकार के आखिरी साल में पार्टी परिवार के विवाद में फंस गई. पारिवारिक कलह के चलते पार्टी में टूटफूट हो गई. मुलायम सिंह यादव हाशिए पर चले गए और अखिलेश यादव पार्टी के नए अगुआ बन गए. मुलायम सिंह यादव की राजनीति का जन्म समाजवाद और मंडल की राजनीति से हुआ था. वे सपा में सब को साथ ले कर चलते थे. यह समीकरण बाद में टूट गया.

अखिलेश यादव ने अपनी टीम में परिवार के नौजवानों पर भरोेसा किया. पार्टी में गैरयादव जातियों को पूरा हक नहीं मिल सका. अखिलेश सरकार पर खुल कर आरोप लगे कि सरकारी नौकरियों में पक्षपात किया गया. अखिलेश यादवों के साथ अपने विकास के मौडल पर चल रहे थे. वे गैरयादव जातियों की नाराजगी को समझ नहीं पाए और कांग्रेस से गठजोड़ करने के बाद भी बुरी तरह से चुनाव हार गए. भाजपा ने मंडल के दौर की राजनीति को खत्म करने की कोशिश की है. इस से सपा को सब से ज्यादा झटका लगा है.  अखिलेश यादव को लगता है कि उत्तर प्रदेश में समझाने से नहीं बहकाने से वोट मिलता है. इस बात के पक्ष में उन के अपने तर्क हो सकते हैं. सरकार बनाने के लिए सत्ता में रहने वाले दल अपने घमंड को अगर छोड़ कर काम करें, तो शायद जनता तक पहुंच पाना आसान हो जाए. समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल यादव ने कहा कि विधानसभा में समाजवाद की नहीं, घमंड की हार हुई है. चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के लिए समय माकूल नहीं है. बसपा के सामने जहां अपनी पार्टी को फिर से खड़ा करने की चुनौती है, वहीं सपा के लिए घरेलू झगड़ों से पार पाना होगा.

प्यार और शादी के बाद भी अकेले हैं ये निर्माता

आपने बॉलीवुड अभिनेताओं के अफेयर्स के किससे, उनके ब्रेकअप की बातें तो खूब सुनी होंगी. लेकिन आपने बॉलीवुड के फिल्‍ममेकर्स के प्‍यार की दास्‍तान, अभी तक नहीं सुनी होगी. बॉलीवुड की ऐसी हस्‍तियां जिन्‍होंने प्‍यार भी किया और शादी भी. इनमे से कुछ के बच्‍चे भी हैं. इसके बाद कामयाबी के शिखर पर बैठे ये वास्‍तव में डैशिंग लुक वाले र्निमाता, र्निदेशक अपनी असल जिंदगी में सफल नहीं हैं.

प्रभु देवा

बॉलीवुड और साउथ दोनों जगह एक्‍टर डायरेक्‍टर और सुपर कोरियोग्राफर प्रभु देवा के नाम का डंका बजता है. सलमान खान के डूबते करियर को वांटेड जैसी हिट फिल्म देकर प्रभु ने ही बचाया था. शाहिद कपूर का सहारा भी प्रभु देवा ही बने. हर जगह सक्‍सेज ही प्रभु देवा की पहचान बनी इसके बावजूद उनकी निजी जिंदगी तन्‍हाई की शिकार है. प्रभु ने पहले रामलता से शादी की उनके चार बच्‍चे भी हैं, पर उनकी जिंदगी में नयनतारा आ गयी. दोनों ने शादी भी की पर कभी इस बात को सार्वजनिक रूप से दोनों ने ही स्‍वीकार नहीं किया. लता से तलाक हो गया और नयनतारा भी उनकी जिंदगी से चली गयीं. आज प्रभु सिंगल हैं.

फरहान अख्‍तर

एक्‍टर, डायरेक्‍टर, फिल्‍ममेकर और सिंगर मल्‍टी टैलेंटेड फरहान अख्‍तर के पास सब कुछ है. कामयाबी और उनका चोली दामन का साथ है. बस नहीं है तो किसी पार्टनर का साथ नहीं है. दो-दो शादियां और दोनों नाकामयाब. फरहान की पहली शादी रिया जैन से हुई बाद में उन्‍होंने तलाक ले कर हेयर स्‍टाइलिस्‍ट अधुना भबानी से शादी की पर अब करीब 16 साल के साथ के बाद ये दोनों भी अलग हो चुके हैं. दोनों के दो बच्‍चे भी हैं. फिलहाल फरहान का नाम श्रद्धा कपूर के साथ जोड़ा जा रहा है पर दोनों ही उसे अफवाह बता रहे हैं और अभी फरहान भी सिंगल हैं.

अनुराग कश्‍यप

ऐसा ही एक नाम फिल्‍म र्निमाता, निर्देशक अनुराग कश्‍यप का भी है. अनुराग ने भी दो शादियां कीं उनकी पहली पत्‍नी थीं आरती बजाज और दूसरी शादी उन्‍होंने अभिनेत्री कल्‍की कोचलिन से की. दोनों ही उनकी जिंदगी से जा चुकी हैं. हालांकि इन दिनों उनका नाम उनसे 21 साल छोटी शुभ्रा शेट्टी से जोड़ा जा रहा है लेकिन अनुराग खुद को सिंगल ही बता रहे हैं.

सुधीर मिश्रा

फिल्‍म मेकर सुधीर मिश्रा की कहानी भी ऐसी है दो-दो शादियां और फिर भी अकेले. सुधीर की पहली शादी सुष्‍मिता मुखर्जी से हुई थी, बाद में दोनों का तलाक हो गया. इसके बाद उनकी जिंदगी में रेनु सलूजा आयीं हालांकि उनसे शादी को कभी सुधीर ने कंफर्म नहीं किया, साल 2000 में दोनों अलग हो गए और तब से सुधीर सिंगल हैं.

राम गोपाल वर्मा

बॉलीवुड में प्रोड्यूसर, डायरेक्‍टर राम गोपाल वर्मा की कंपनी को लोग फैक्‍ट्री कहते हैं जहां एक साथ कई फिल्‍मों का र्निमाण होता रहता है. हिंदी के अलावा वर्मा साउथ और दूसरे राज्‍यों की भाषाओं के लिए भी फिल्‍म बनाते हैं. अपने विवादास्‍पद बयानों के लिए चर्चा में रहने वाले रामू का रिलेशनशिप को लेकर कभी कोई खास विवाद सामने नहीं आया. रामू अपनी पत्नी रत्ना वर्मा से तलाक ले चुके हैं. इनके अफेयर्स के बारे में आज तक कोई बात सामने नहीं आई है, और वे अकेले जिंदगी बिता रहे हैं.

प्रकाश झा

राजनीति, दामुल, आरक्षण और अपहरण जैसी शानदार और कामयाब फिल्‍में बना चुके प्रकाश झा असल जिंदगी में भी राजनीति से जुड़े हुए हैं. प्रकाश झा ने अभिनेत्री दीप्‍ति नवल से शादी की पर बाद में दोनों अलग हो गए. फिल्‍हाल प्रकाश भी सिंगल हैं.

जब इस भोजपुरी गाने पर जमकर नाचे रितिक रोशन

सोशल मीडिया पर बॉलीवुड के सुपरस्टार रितिक रोशन का इन दिनों एक वीडियो काफी वायरल हो रहा है. जिसमें वह एक मशहूर भोजपुरी गाने पर थिरकते नजर आ रहे हैं. डेली सोशल नाम के फेसबुक पेज द्वारा पोस्ट किए गए इस वीडियो को पिछले 3 दिन में 22 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं.

आपको रितिक रोशन की पहली फिल्म तो याद ही होगी. जी हां, हम ‘कहो ना..प्यार है’ की ही बात कर रहें है. इस फिल्म में रितिक रोशन ने अपने डांस से लाखों युवा दर्शकों को कायल कर अपना प्रशंसक बनने को मजबूर कर दिया था. भले ही इस फिल्म को 17 साल हो चुके हैं लेकिन आज भी रितिक को इसी फिल्म के गानों के लिए बार बार याद किया जाता है.

डेली सोशल द्वारा पोस्ट किए गए इस वीडियो में रितिक का डांस तो कहो ना प्यार है वाला है लेकिन बैकग्राउंड में जो गाना बज रहा है वो भोजपुरी गायक पवन सिंह का गाया हुआ ‘लॉलीपॉप लागेलु है. इस भोजपुरी गाने का पहले मैशअप तैयार कर इस वीडियो को बहुत ही बेहतरीन तरीके से बनाया गया है.

आप भी देखिए ये जबरदस्त वीडियो…

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