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ऐसा रिकॉर्ड जिसे कोई टीम नहीं चाहती करना अपने नाम

आईपीएल के अबतक 9 सफल संस्करण हो चुके हैं. इस लीग का दसवां संस्करण भी शुरू हो चुका है. सीजन के पहले ही मैच में सनराइजर्स हैदराबाद के युवराज सिंह ने सबसे तेज फिफ्टी का रिकॉर्ड अपने नाम किया.

आईपीएल के बीते 9 सीजन में कई नये चेहरे शामिल हुए और कई पुराने चेहरे बाहर भी हुए हैं. इसके अलावा कई टीमें नई आयीं तो कुछ टीमों की इस लीग से छुट्टी भी हुई.

क्रिकेट के छोटे प्रारूप में बल्लेबाजों का बोलबाला रहा है. लेकिन गेंदबाजों की भूमिका को कोई नकार नहीं सकता है. अगर स्कोर 200 से ज्यादा का बना है, तो कई बार टीमें 100 रन के अंदर भी आउट हुईं हैं.

तो आइए जानते हैं आईपीएल इतिहास के ऐसे ही रिकॉर्ड के बारे में जिसे कोई टीम अपने नाम नहीं करना चाहती है. मसलन इन टीमों के नाम है आईपीएल का सबसे छोटे स्कोर का रिकॉर्ड.

राजस्थान रॉयल्स बनाम रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर

साल 2009 आम चुनावों की वजह आईपीएल दक्षिण अफ्रीका में खेला गया था. जहां न्यूलैंड्स में लीग के दूसरे ग्रुप मैच में आरसीबी का मुकाबला आरआर से हुआ था.

पीटरसन आरसीबी के कप्तान थे, टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी चुनी थी. लेकिन आरआर के गेंदबाज दिमित्री मैस्करेनहास ने आरसीबी को शुरूआती झटके देकर असहज कर दिया.

इस मैच में कोई बड़ी साझेदारी नहीं हुई, जिसके चलते आरसीबी की पूरी टीम 133 रन बनाकर ऑलआउट हो गयी. हालांकि जवाब में आरसीबी के दिग्गज स्पिन गेंदबाज अनिल कुंबले और तेज गेंदबाज प्रवीन कुमार ने शानदार गेंदबाजी की और आरआर को 58 पर रोक दिया.

कोलकाता नाईट राइडर बनाम मुंबई इंडियंस

आईपीएल में केकेआर दो बार की चैंपियन रह चुकी है. पहले तीन साल ये टीम बुरी तरह से असफल रही थी. जहां पहले सीजन के ग्रुप मैच में मुंबई के खिलाफ केकेआर 67 रन पर ऑलआउट हो गयी थी. ये मैच वानखेड़े स्टेडियम में हुआ था.

मुंबई के कप्तान सचिन थे और केकेआर के कप्तान सौरव गांगुली थे. तेंदुलकर ने टॉस जीतकर पहले फील्डिंग चुनी थी.

रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर बनाम राजस्थान रॉयल्स

साल 2014 में आरसीबी और आरआर के बीच मुकाबला हुआ था. जिसमें आरसीबी 100 रन के अंदर ही ऑलआउट हो गयी थी. अबुधाबी के शेख जायद स्टेडियम में हुए इस मुकाबले में राजस्थान के गेंदबाजों ने कमाल की गेंदबाजी की थी.

विराट कोहली की आरसीबी 15 ओवर में 70 रन बनाकर ऑलआउट हो गयी थी. जवाब में मिचेल स्टार्क के शुरुआती झटकों से उबरते हुए राजस्थान ने मुकाबला सातवें ओवर में जीत लिया था.

कोच्ची टस्कर्स बनाम डेक्कन चाजर्स

आईपीएल के चौथे संस्करण के 32वें ग्रुप मैच में कोच्ची का मुकाबला डेक्कन चाजर्स से हुआ था. जिसमें संगकारा की 65 और कैमरून वाइट की 31 रन की पारियों के दम पर डेक्कन चाजर्स ने 20 ओवर में 129 रन बनाये थे.

जवाब में कोच्ची टस्कर्स की शुरुआत बेहद खराब रही. उनकी पूरी टीम 74 रनों पर सिमट गई थी. उनके 6 में से 5 बल्लेबाज़ जीरो पर आउट हो गये थे. जयवर्धने, जडेजा, परेरा और विनय कुमार ने क्रमश: 4, 23, 22 और 18 रन बनाये थे. डेल स्टेन और इशांत शर्मा ने मिलकर कोच्ची के 8 बल्लेबाजों को पवेलियन का रास्ता दिखाया था.

चेन्नई सुपर किंग्स बनाम मुंबई इंडियंस

साल 2013 में चेन्नई सुपर किंग्स और मुंबई इंडियंस के बीच मुकाबला था. रोहित शर्मा ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी का निर्णय किया. इस मैच में कुल मिलाकर मुंबई ने चेन्नई के सामने जीत के लिए 20 ओवर में 140 रन का लक्ष्य रखा था.

जवाब में चेन्नई के बल्लेबाजों को मिचेल जॉनसन और प्रज्ञान ओझा ने ताश के पत्तों की तरह बिखेर दिया. रैना, विजय, धोनी, हसी और ब्रावो बेहद सस्ते में आउट हो गये और चेन्नई की पूरी टीम 79 रन बनाकर ऑलआउट हो गयी.

आईपीएल का हर सीजन कुछ ना कुछ नया ले कर आता है. वैसे तो कोई टीम इस लिस्ट में शामिल होना नहीं ही चाहेगी लेकिन फिर भी देखते हैं किस टीम की किस्मत उसे कहां ले कर जाती है.

बनना था डाक्टर, बन गई ऐक्ट्रैस

मध्य प्रदेश के छोटे से कसबे की इस लड़की को बचपन से ही फैशन से बहुत लगाव था. डाक्टर पापा चाहते थे कि लाडली भी डाक्टर बन कर उन का हौस्पिटल संभाले पर कृतिका का मन तो कहीं और रमा था. डाक्टरी की पढ़ाई पढ़ने के लिए कोटा भेजा गया, लेकिन पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर फैशन डिजाइनर बनने दिल्ली आ गईं.

निफ्ट में पढ़ाई के दौरान ही मौडलिंग का जो शौक लगा वह मुंबई आ कर फिल्म इंडस्ट्री में पूरा हुआ. पढ़ाई के दौरान ही पहला शो ‘यहां के हम सिकंदर’ में काम कर चुकीं कृतिका ने ‘कितनी मुहब्बत है’ और ‘कुछ तो लोग कहेंगे’ जैसे धारावाहिकों से दर्शकों के बीच काफी लोकप्रियता हासिल की है. टीवी शोज के साथ ही उन्होंने कई शौर्ट फिल्में भी की हैं, लेकिन छोटे परदे से वे अपना मोह नहीं तोड़ पाईं.

28 साल की कृतिका हमेशा अपनी ड्रैसिंग सैंस को ले कर जानी जाती हैं. इन दिनों वे निर्देशक निखिल सिन्हा के शो ‘चंद्रकांता’ में राजकुमारी चंद्रकांता का रोल कर रही हैं.

पेश हैं शो के प्रमोशन के मौके पर उन से हुई दिलचस्प बातचीत के कुछ अंश:

कभी सोचा नहीं था यहां तक पहुंच पाऊंगी

कृतिका बताती हैं, ‘‘मैं मध्य प्रदेश के एक छोटे से कसबे से हूं. मैं ने सोचा भी नहीं था कि मैं कभी ऐक्ट्रैस बनूंगी. मेरे पापा डाक्टर थे. मैं जब पढ़ाई के लिए दिल्ली आई तब मुझे सिर्फ यह पता था कि या तो मुझे डाक्टर बनना है या फिर फैशन डिजाइनर. ऐक्ट्रैस बनने की सोची ही नहीं थी. लेकिन जब एनएसडी और कमानी में थिएटर देखती तब दिल में कहीं ऐक्टिंग करने की हूक उठती. जब निफ्ट में मैं फैशन डिजाइनर का कोर्स कर रही थी तब शौकिया मौडलिंग भी करने लगी थी. तभी किसी ने कहा था कि तुम्हें एक बार मुंबई जरूर जाना चाहिए. कालेज की छुट्टियों के दौरान वहां गई. ‘यहां के हम सिकंदर’ शो के लिए औडिशन दिया और चुनाव हो गया. जैसे ही पापा को मालूम हुआ तो उन्हें झटका लगा. मैं उन्हें पहले भी झटका दे चुकी थी, क्योंकि उन्होंने मुझे डाक्टर की पढ़ाई के लिए कोटा भेजा था, पर मैं बीच में ही पढ़ाई छोड़ कर फैशन डिजाइनर बनने दिल्ली आ गई थी.’’

कैमरे के सामने ही ऐक्टिंग सीखी

‘‘मैं ने कोई ऐक्टिंग का कोर्स नहीं किया है. मैं फैशन डिजाइनर के तौर पर अपना कैरियर बनाना चाहती थी. अगर पहले मालूम होता तो जरूर ऐक्टिंग का कोर्स करती. मैं यह तो नहीं कह सकती कि मेरा कभी मन ही नहीं हुआ कि नाटकों में अभिनय करूं लेकिन कभी मौका भी नहीं मिला. काफी कम उम्र में ही मेरा चयन ‘यहां के हम सिकंदर’ शो के लिए हो गया, तो एनएसडी में अभिनय सीखने के बारे में सोच ही नहीं पाई. एनएसडी में पोस्ट ग्रैजुएशन कोर्स था. जब तक सोचती तब तक ऐक्ट्रैस बन गई थी.’’

कुछ अलग हट कर करना पसंद है

‘‘चंद्रकांता के लिए कई लोगों ने औडिशन दिया. जब मुझे इस किरदार का प्रस्ताव मिला तो मैं सब से पहले यही सोच रही थी कि मुझे क्यों चंद्रकांता के लिए चुना गया. मैं ने अपने अब तक के कैरियर में इस तरह का किरदार कभी नहीं निभाया है. लेकिन देवकीनंदन खत्री के उपन्यास के बारे में सुना बहुत था कि इस में एक राजकुमारी की कहानी है और राजकुमारी बनना मेरा बचपन का सपना था. जब यह शो दूरदर्शन पर आता था तब मैं बहुत छोटी थी. मुझे सही से याद भी नहीं है कि क्या कहानी थी पर शिखा स्वरूप और इरफान खान द्वारा निभाए गए पात्र अभी भी याद हैं. जब मैं ने सीरियल साइन किया तब थोड़ी सी कन्फ्यूज थी कि पता नहीं लोगों को मेरा यह बदला लुक पसंद आएगा भी या नहीं. लेकिन अब महसूस होता है कि मैं ने सही फैसला लिया है. यह शो टीवी के सभी टिपिकल पैटर्न को ब्रेक कर रहा है. फिर चाहे वह भाषा हो अथवा ऐक्ट्रैस के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला ऐक्स्ट्रा मेकअप.’’

सभी तरह के रोल पसंद हैं

कृतिका वैब सीरीज भी कर चुकी हैं. लेकिन उन का कहना है, ‘‘वैब सीरीज और टीवी दोनों अलगअलग मीडियम हैं. मैं किसी में मस्तमौला लड़की बनी हूं तो किसी में सीधीसादी मुझे दोनों माध्यमों में मौका मिला. मैं ने 3 शौर्ट फिल्में भी की हैं. हर माध्यम में काम करना चैलेंजिंग होता है. लेकिन मुझे ऐसे काम करना पसंद है. अगर बौलीवुड में कभी चांस मिलता है, तो मैं वहां भी पूरी शिद्दत के साथ काम करूंगी. लेकिन कोई अच्छा औफर आता है तब. हां, अगर रिऐलिटी शो के नाम पर बिग बौस से औफर आया, तो कभी नहीं करूंगी, क्योंकि वहां जो होता है वह मैं नहीं कर सकती.’’

दिल्ली अब भी दिल में है

कृतिका कहती हैं, ‘‘आज भी जब दिल्ली आती हूं, तो कनाट प्लेस और मंडी हाउस जाना नहीं भूलती. इन जगहों से मेरी कई यादें जुड़ी हैं. मंडी हाउस में प्ले देखने जाती थी, कत्थक वर्कशौप करती थी. वहां की आर्ट गैलरी में भी जाना मुझे बहुत पसंद था. अगर आप दिल्ली में रह चुकी हैं, तो कहीं भी जा कर सर्वाइव कर सकती हैं. दिल्ली एक ऐसी जगह है, जो आप को एक लड़की के तौर पर स्ट्रौंग और स्मार्ट बना देती है. फिर आप दुनिया में कहीं भी रह सकती हैं. इसीलिए जब मैं मुंबई गई, तो कोई मुश्किल नहीं हुई.

फिट रहने का राज

लंबी शूटिंग के चलते मैं हमेशा यह ध्यान रखती हूं कि शरीर की ऐनर्जी कम न हो पाए, इसलिए थोड़ीथोड़ी देर में कुछ खाते रहती हूं. मैं इस समय व्हीट और डेरी प्रोडक्ट्स बिलकुल नहीं ले रही हूं. टीवी इंडस्ट्री में लगातार काम करने के लिए खुद की फिटनैस का ध्यान रखना हमारे लिए बहुत जरूरी है. मैं ज्यादा कुछ नहीं केवल अपनी नानीदादी के जमाने का हैल्दी खाना मतलब मोटे अनाज वाला खाना खाती हूं. खूब पानी पीती हूं. घर का बना खाना इस समय मेरी डाइट का हिस्सा है.

शादी अभी नहीं, इसीलिए बौयफ्रैंड छोड़ा

 

कृतिका ने अपने बौयफ्रैंड सिद्धार्थ बिजपुरिया से ब्रेकअप कर लिया है. खबर है कि शादी को ले कर कुछ आपसी विवाद के कारण यह ब्रेकअप हुआ है. सिद्धार्थ इस रिश्ते को खत्म नहीं करना चाहते और वे कृतिका से पैचअप करने की कोशिश भी कर रहे हैं, लेकिन कृतिका अब इस रिलेशन को आगे नहीं चलाना चाहतीं, क्योंकि वे अभी शादी के लिए तैयार नहीं हैं, जबकि सिद्धार्थ उन्हें शादी करने के लिए फोर्स कर रहे थे.

फर्जीवाड़ा डौट कौम

हम भारतीय हर माने में देश को अमेरिका बनाना चाहते हैं, पर यह नहीं देखते कि अमेरिका ने किस तरह अपनी एक टौप की ऐनर्जी कंपनी ‘एनरौन’ के खातों में घपला पाए जाने पर न सिर्फ कंपनी के मालिक को पकड़ कर जेल में डाल दिया, बल्कि इस की नीलामी से मिले पैसे धोखाधड़ी के शिकार निवेशकों में बांट दिए. अमेरिका ही नहीं, इंडस्ट्री के बल पर चल रहे दक्षिण कोरिया में दुनिया की 35वीं अर्थव्यवस्था के बराबर ताकत रखने वाली इलैक्ट्रौनिक्स कंपनी सैमसंग के मालिक ली जी योंग के साथ इस साल की शुरुआत में ऐसी रगड़ाई की खबरें आई थीं कि उन के बारे में हमारे देश में कल्पना तक नहीं की सकती.

यहां के उद्योपतियों के साथ वैसा बरताव होने पर कई राजनीतिक दल ही उन का पक्ष ले कर हंगामा करने सड़कों पर उतर आए. यहां तो हाल यह है कि विजय माल्या जैसा फ्रौड व्यक्ति बैंक अधिकारियों के साथ सांठगांठ कर करोड़ों रुपए ले कर विदेश भाग गया और उस से हुए नुकसान की भरपाई के लिए देश पर नोटबंदी थोप दी गई. इसी तरह वोडाफोन ने भारत में 12 अरब डौलर लगा कर हचिंसन को खरीद लिया, लेकिन टैक्स के रूप में एक पैसा तक सरकारी खजाने में जमा नहीं किया. ताजा उदाहरण साल की शुरुआत में पकड़ में आए साइबर ठगी मामले में महज 3 लोगों ने मिल कर नोएडा में चिटफंड कंपनी के रूप में 37 अरब का औनलाइन फर्जीवाड़ा कर डाला और सरकार को इस फर्जीवाड़े की खबर तक न हुई. यदि धोखाधड़ी के शिकार कुछ लोगों ने शिकायतें दर्ज न कराई होतीं, तो शायद यह घोटाला खरबों की रकम डकारने के बाद भी न रुकता. ध्यान रहे कि शारदा घोटाले में 17.4 लाख लोगों से 20 हजार करोड़ रुपए, रोज वैली में 60 हजार करोड़ और सहारा मामले में 36 हजार करोड़ रुपए की धोखाधड़ी की गई थी, कोई शक नहीं कि सोशल ट्रेड के नाम पर ठगी का यह सिलसिला 3,700 करोड़ रुपए के पार जा कर कहीं थमता, अगर कुछ लोगों ने इस की शिकायत न की होती.

वैसे तो इंटरनैट के प्रचारप्रसार का दौर शुरू होने के बाद लगातार यह कहा जाता रहा है कि भविष्य की सब से बड़ी चुनौती आपराधिक साइबर गतिविधियां ही होंगी, जिन से इंटरनैट के माध्यम से संचालित होने वाली इन आपराधिक और आतंकी गतिविधियों को कोई व्यक्ति या संगठन देशदुनिया और समाज को नुकसान पहुंचाने की चेष्टा करे. अभी तक देश में इस तरीके से कई गैरकानूनी काम हुए हैं, जैसे औनलाइन ठगी, बैंकिंग नैटवर्क में सेंध, लोगों खासकर महिलाओं को उन के गलत प्रोफाइल बना कर परेशान करना.

सोशल नैटवर्किंग के जरिए एक किस्म की पोंजी स्कीम (चिटफंड कंपनी जैसी योजना) चलाने का यह पहला बड़ा मामला है जो नोएडा में पकड़ में आया. नोएडा लाइक स्कैम नामक इस साइबर घोटाले का खुलासा यूपी एसटीएफ ने फरवरी के आरंभ में यह कहते हुए किया कि देशभर के करीब साढ़े 6 लाख लोगों से सोशल ट्रेड के नाम पर एक कंपनी ने 3,700 करोड़ रुपए ठग लिए हैं.

इस फर्जीवाड़े में 3 लोगों को गिरफ्तार करते हुए एसटीएफ ने दावा किया था कि एब्लेज इंफो सौल्यूशंस नाम की कंपनी नोएडा से अपना औफिस संचालित कर रही थी. यह कंपनी सोशल ट्रेड डौट बिज के नाम पर निवेशकों से मल्टी लैवल मार्केटिंग के जरिए डिजिटल मार्केटिंग के लिए पैसा ले रही थी, जिस में कंपनी के केनरा बैंक खाते में जमा 524 करोड़ रुपए सीज किए गए. कंपनी पर पड़े छापे में एसटीएफ को साढ़े 6 लाख लोगों के फोन नंबर डाटाबेस में मिले, जबकि 9 लाख लोगों के पहचानपत्र बरामद किए गए.

एसटीएफ ने कंपनी पर छापा मार कर कंपनी के निदेशक अनुभव मित्तल, सीईओ श्रीधर प्रसाद और तकनीकी प्रमुख महेश को गिरफ्तार किया. अनुभव मित्तल पुत्र सुनील मित्तल हापुड़ जनपद के पिलखुवा का रहने वाला है, जबकि कंपनी का सीईओ श्रीधर पुत्र पीएस रमया मूलरूप से विशाखापट्टनम निवासी है और फिलहाल नोएडा के 53बी, सैक्टर-53 में रह रहा था. एसटीएफ द्वारा गिरफ्तार तीसरा अभियुक्त कंपनी का टैक्निकल हैड महेश दयाल पुत्र गोपाल मथुरा जनपद के थाना बरसाना क्षेत्र स्थित कमई गांव का रहने वाला है. इस मामले में केनरा बैंक के एक मैनेजर की गिरफ्तारी हुई.

फर्जीवाड़े को कैसे दिया अंजाम

यों तो कंपनी ने दावा किया कि उस ने अपने निवेशकों से मिले अधिकतर पैसे निवेशकों को लौटा दिए थे पर जिस तरह से कंपनी के खातों में सैकड़ों करोड़ रुपए मिले, उस से साफ है कि कंपनी कुछ और रकम जमा होने के बाद यहां से रफूचक्कर हो जाती और इस में फंसे लाखों लोग हाथ मलते हुए रह जाते.

हालांकि निवेशकों से पैसा लेने की इस कंपनी की स्कीम शारदा, सहारा और रोज वैली जैसी पोंजी स्कीमों से काफी अलग थी. कंपनी की स्कीम लेने वालों को तयशुदा रकम देने पर एक विशेष आईडी के जरिए सोशल ट्रेड डौट बिज पोर्टल से जोड़ा जाता था और उन्हें अपनी आईडी पर दिखने वाले विज्ञापनों को फेसबुक और ट्विटर की तरह रोजाना ‘लाइक’ यानी क्लिक करना पड़ता था, जिस के बदले प्रति लाइक रकम देने का वादा था. ‘घर बैठे कुछ वैबसाइट लिंक्स पर क्लिक करें और बदले में अच्छे पैसे कमाएं’, इस स्लोगन के साथ कंपनी ने कुछ ही समय में लाखों लोगों को अपने साथ जोड़ लिया था. आईडी यानी सदस्यता हासिल करने के लिए कंपनी सोशल ट्रेड डौट बिज पोर्टल से जोड़ने के नाम पर 5,750 रुपए, 11,500 रुपए, 28,750 रुपए तथा 57,500 रुपए सदस्यता के तौर पर लेती थी. आईडी मिलने पर जब सदस्य पोर्टल पर मिलने वाले लिंक को लाइक करता था, तो उसे एक लाइक पर कंपनी सदस्य के खाते में 5 रुपए के हिसाब से पेमैंट करती थी. यही नहीं, अन्य पोंजी स्कीमों की तरह इस योजना में भी हर सदस्य को 21 दिन में अपने साथ 2 और लोगों को जोड़ना होता था, जिस के बाद सदस्य को पोर्टल पर रोजाना मिलने वाले लिंक दोगुने हो जाते थे.

सदस्यों को शुरुआत में रोजाना पेमैंट दी जाती थी, लेकिन बाद में उसे साप्ताहिक कर दिया जाता था. इस के अलावा सदस्यों को प्रमोशनल इनकम के रूप में भी कुछ रकम देने का झांसा दिया जाता था.

हालांकि कंपनी दावा करती थी कि वह विभिन्न कंपनियों के विज्ञापनों को लाइक कराने के बदले ज्यादा रकम पाती थी, जिस में से अपना हिस्सा काट कर वह बाकी सदस्यों में बांट देती थी, पर सचाई यह है कि यह कंपनी खुद ही इस तरह के फर्जी विज्ञापन डिजाइन कर के पोर्टल पर डालती थी और नए सदस्यों से हासिल रकम का कुछ हिस्सा पुराने सदस्यों को वापस करती थी.

कंपनी की मनशा फर्जीवाड़े की ही थी, इस का खुलासा इस बात से होता है कि सरकारी जांच एजेंसियों की पकड़ से बचने के लिए यह कंपनी कुछ समय से लगातार नाम बदल रही थी. कंपनी में लोगों का भरोसा तेजी से बढ़ने के पीछे की वजह यह थी कि असल में मामूली रकम लगाने के बाद इस में कोई विशेष दिमागी काम तो करना ही नहीं था. बस, घर बैठे मोबाइल या कंप्यूटर पर दिखने वाले लिंक्स पर क्लिक करने के मोह ने दिल्लीएनसीआर से ले कर विदेशों में बैठे लोगों को भी आकर्षित किया.

यही नहीं, जब नवंबर, 2016 में कंपनी के एक समारोह में बौलीवुड अभिनेत्री सन्नी लियोनी और अमीषा पटेल जैसी अभिनेत्रियां शामिल हुईं तो लोगों का भरोसा और पुख्ता हो गया. यही वजह है कि इस के झांसे में आए लोगों ने एक नही कई अकाउंट खोल रखे थे और कुछ ने तो क्लिक की मेहनत करवाने के लिए भी 300-400 रुपए रोजाना दे कर लड़के तक रख लिए थे. सब से आश्चर्यजनक बात तो यह है कि इस कंपनी का फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद भी लोग इस के समर्थन में मुहिम चलाते रहे.

आंखों में धूल झोंकने की नीयत

यह कंपनी कैसे लोगों की आंखों में धूल झोंक रही थी, इस का खुलासा इस बात से हुआ कि पोर्टल पर विज्ञापनों के जिन लिंक्स के खुलने का दावा किया जाता था, खुद क्रिएट करती थी, जबकि कंपनी का दावा था कि लिंक उसे विज्ञापनदाता कंपनियां भेजती हैं.

शुरुआती जांच में ही नोएडा पुलिस ने साफ कर दिया कि इस में विज्ञापनदाता कोई थर्ड पार्टी नहीं थी. कंपनी के पोर्टल पर दिखने वाले सभी लिंक फर्जी होते थे जो लाइक के बाद कंपनी के सर्वर में डंप कर दिए जाते थे. कंपनी सिर्फ पैसा बनाने के लिए मल्टी लैवल मार्केटिंग के जरिए अपनी जेब भर रही थी.

खास बात यह है कि देश में इस तरह की मल्टी लैवल मार्केटिंग पर मनी सर्कुलेशन ऐक्ट, 1978 के तहत प्रतिबंध लगा है, लेकिन बावजूद इस के न तो ऐसी फ्रौड कंपनियों पर कोई प्रतिबंध है और न ही उन से धोखा खाने वालों का सिलसिला रुक रहा है. सोशल ट्रेड बिज से पहले स्पीक एशिया और क्यू नैट जैसी कंपनियां इसी तरह मल्टी लैवल मार्केटिंग के नाम पर लोगों को चूना लगा चुकी हैं.

व्यक्तिगत लालच एक वजह

इंटरनैट और सोशल मीडिया पर ठगी के दर्जनों तरीके हैं जिन के जरिए लोगों को फंसाया जाता है और उन से रकम ऐंठी जाती है. लौटरी का झांसा देना, किसी दूसरे मुल्क में वसीयत में छोड़ी गई संपत्ति आप के नाम ट्रांसफर करने के बदले फीस मांगना, विदेश से आए तोहफे की ड्यूटी चुका उसे आप तक पहुंचाना, क्रैडिट व एटीएम कार्ड की हैंकिंग जैसी अनगिनत वारदातें तकरीबन रोज होती हैं और एक किस्सा बंद होते ही साइबर ठगी का कोई दूसरा नया उदाहरण हमारे सामने उपस्थित हो जाता है.

ऐसे हादसे साबित करते हैं कि इंटरनैट और सोशल मीडिया के इस्तेमाल के बारे में सजगता का सारा मामला एकतरफा है. लोग इंटरनैट का इस्तेमाल करना तो सीख गए हैं, पर उस के विभिन्न मंचों पर क्याक्या सावधानियां बरतें, इस का उन्हें कोई आइडिया ही नहीं है. सरकार भी कानून पर कानून तो बनाती है, पर उस के पहरुओं की नींद तब टूटती है. जब अरबों का घोटाला हो चुका होता है और लाखों लोग अपनी पूंजी गंवा चुके होते हैं. 

वैसे साइबर ठगी की इस बड़ी घटना की 2 अहम वजह हैं. एक तो यह कि सूचना प्रौद्योगिकी के मामले में भारत खुद को अगुआ मानता रहा है, उस के आईटी ऐक्सपर्ट दुनियाभर में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं और अमेरिका के कैलिफोर्निया में स्थापित सिलीकौन वैली की स्थापना तक में भारतीय आईटी विशेषज्ञों की भूमिका मानी जाती है.

साइबर खतरों को भांपते हुए सरकार 2013 में राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति जारी कर चुकी है, जिस में देश के साइबर सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर की रक्षा के लिए प्रमुख रणनीतियों को अपनाने की बात कही गई थी. इन नीतियों के तहत देश में चौबीसों घंटे काम करने वाले एक नैशनल क्रिटिकल इन्फौर्मेशन प्रोटैक्शन सैंटर (एनसीईआईपीसी) की स्थापना शामिल है, जो देश में महत्त्वपूर्ण इन्फौर्मेशन इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा के लिए एक नोडल एजेंसी के रूप में काम कर सके.

सवाल है कि क्या इन उपायों को अमल में लाने में कोई देरी या चूक हुई है अथवा यह हमारे सूचना प्रौद्योगिकी तंत्र की कमजोर कडि़यों का नतीजा है कि एक ओर हैकर जब चाहे सरकारी प्रतिष्ठानों की वैबसाइट्स ठप कर रहे हैं और दूसरी ओर साइबर आतंकी भी अपनी गतिविधियां चलाने में सफल हो रहे हैं?

जो सरकार और पुलिस ठगी की बड़ी घटना के बाद संदिग्ध लोगों की धरपकड़ से ले कर उन के नैटवर्क का पता लगाने में मुस्तैद नजर आती है, वह किसी कंपनी के कामकाज शुरू करने से पहले यह पड़ताल क्यों नहीं करती कि आखिर वह किस तरह का काम कर रही है? क्या कंपनी ऐक्ट उसे ऐसी जानकारियां लेने से रोकता है या फिर सरकार का काम सिर्फ कागजी खानापूर्ति मात्र है?

सवाल कमाई के ऐसे आसान तरीके खोजने और उस में अपनी पूंजी फंस कर सिर पीटने वाली युवापीढ़ी से भी है, जो वैसे तो बेरोजगारी का रोना रोती है, लेकिन आसान काम के बदले बड़ी रकम के लालच में फंस जाती है. युवा यह क्यों नहीं सोचते कि किसी जरिए से उस के पास थोड़ेबहुत पैसे आते हैं, तो वह उन का इस्तेमाल ऐसे गैरकानूनी कामों में करती है जो आगे चल कर मुसीबत करते हैं. ऐसे लोगों के दिमाग में यह बात क्यों नहीं आती कि मात्र एक क्लिक के बदले कोई भी कंपनी 5-7 रुपए क्यों दे रही है, जबकि उस से किसी किस्म की आर्थिक सेवा का सर्जन नहीं हो रहा है?      

निवेश से पहले की सावधानियां

यदि आम लोग किसी भी वित्तीय योजना अथवा निवेश कराने वाली कंपनी में पैसा लगाने से पहले कुछ सावधानियां बरतें, तो ठगे जाने से बच सकते हैं :

–       कंपनी के कामकाज पर नजर डालें कि क्या वे जमा कराई गई रकम या ली गई फीस के बदले कोई विश्वसनीय सेवा कर रही हैं या कोई व्यवसाय कर रही हैं.

–       कंपनी के उच्चाधिकारियों के बारे में पूरी तरह से जांचपड़ताल करें. यह देखें कि उन का प्रोफैशनल अनुभव क्या है? क्या पहले उन्होंने इस तरह की कंपनियों या चिटफंड कंपनियों का संचालन किया है?

–       कंपनियों के उच्चाधिकारियों की राजनीतिक नहीं, वित्तीय पोजिशन देखी जाए. यह पता करने की कोशिश हो कि कंपनी की कुल परिसंपत्तियां क्या हैं. यदि कंपनी के उच्चाधिकारी किसी प्रकार की धोखाधड़ी कर के भागते हैं तो क्या उन की परिसंपत्ति बेच कर निवेशकों का पैसा लौटाया जा सकता है?

–       निवेश पर रिटर्न की दर की तुलना मार्केट रेट से की जानी चाहिए. यह जरूर देखा जाए कि अन्य वित्तीय कंपनियां क्या रिटर्न दे रही हैं.

–       बाजार विशेषज्ञों की राय अवश्य ली जानी चाहिए और शुरुआत में छोटी रकम का ही निवेश करना चाहिए.

यूं करें आसानी से बचत

सेविंग या बचत करने में आप जितना आलस दिखाते हैं, पैसे बचाना इतना मुश्किल भी नहीं है. महीने की पहली तारीख की सैलेरी को महीने के आखिर तक चलाना नामुमकिन लगता है, खासकर बैचलर्स को. पर कुछ तरीकों से आप आसानी से बचत कर सकते हैं.

अपने पैसों का बेहतर इस्तेमाल करने के लिए ये हैं 5 बेस्ट तरीके. इन तरीकों का इस्तेमाल करके आप अपने और अपने परिवार के भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं.

एफडी की जगह करें डेट म्युचुअल फंड में इन्वेस्टमेंट

अगर आप एफडी में इन्वेस्ट करने के लिए सोच रहे हैं तो इसकी जगह डेट म्युचुअल फंड में इन्वेस्ट करना अच्छा रहेगा, अगर आप लांग टर्म इन्वेस्टमेंट की प्लानिंग कर रहे हैं. एफडी में जहां साल इंटरेस्ट पर टैक्स लगता है वहीं एमएफ फंड में टैक्स तभी लगता है जब आप इसे बेचते हैं.

सॉवरेन गोल्ड बांड

सरकार ने सॉवरेन गोल्ड बांड स्कीम लॉन्च की थी जिस पर फिलहाल 2.75 फीसदी इंटरेस्ट रेट मिल रहा है. इस स्कीम में गोल्ड का प्राइस मार्केट से लिंक है. अगर मानकर के चलें कि गोल्ड का प्राइस में साल भर में 6 फीसदी तक बढ़ता है तो आप साल के अंत में 8.75 फीसदी तक का रिटर्न पा सकेंगे. गोल्ड बांड में आप 8 साल तक के लिए इन्वेस्ट कर सकते हैं.

बेटी के लिए खोलें सुकन्या समृद्धि अकाउंट

2016 में सुकन्या समृद्धि योजना में निवेश करने से आपको अच्छा टैक्स बेनेफिट मिलेगा. इस योजना में आप अपने 10 वर्ष तक की बेटी के नाम से यह खाता खोल सकते हैं. इस खाते में जमा रकम मौजूदा समय में 9.2 फीसदी की दर से ब्याज मिल रहा है. ब्याज की दर एफडी या फिक्सड डिपॉजिट से अधिक है जिसके चलते आपको अच्छा टैक्स बेनेफिट मिल सकता है. सुकन्या समृद्धि अकाउंट आप बैंक या पोस्‍ट ऑफिस में 1000 रुपए जमा करके खोल सकते हैं.

एनपीएस में इन्वेस्ट करने से मिलेगा अतिरिक्त फायदा

एनपीएस में इन्‍वेस्‍ट करने से न सिर्फ आपका फ्यूचर सिक्‍योर होगा, बल्कि इससे आपको टैक्‍स में 50 हजार रुपए का एक्‍सट्रा फायदा होगा. यह बेनिफिट 80 C के तहत मिलने वाली 1.5 लाख रुपए की छूट के बाद होगा. मतलब इसमें इन्‍वेस्‍ट करने से आपको 2 लाख रुपए का टैक्‍स बेनिफिट मिल सकता है.

ई-वालेट का करें इस्तेमाल

ई-वॉलेट का इस साल आप ज्यादा से ज्यादा पेमेंट करने के लिए यूज करें. ऐसा इसलिए क्योंकि इनके जरिए पेमेंट करने पर आपको काफी अच्छे ऑफर और कैशबैक डिस्काउंट मिलता है. कई ई-वॉलेट कंपनियां जैसे कि पेटीएम, पे यू और मोबीक्विक बढ़िया कैशबैक देती हैं, जिसके चलते आप काफी सेविंग कर सकते हैं. इन कंपनियों का सिक्योरिटी लेवल वैसा ही है जैसा कि बैंकों का होता है.

एहसासों पर कब्जा करते रोबोट

रोबोट अब हमारे लिए नई चीज नहीं हैं. दुनिया के कई मुल्कों में वे तरहतरह के काम निबटा रहे हैं. हमारे देश की कई फैक्ट्रियों में भी रोबोभुजाएं एक ही तरह से किए जाने वाले कई कार्य कुशलता से संपन्न कर रही हैं. हाल में, मुंबई में एक निजी बैंक की शाखा में ‘इरा’ नामक रोबोट को ग्राहकों के स्वागत और उन्हें कई जानकारियां देने के लिए तैनात किया गया है जो एक यांत्रिक महिला कर्मचारी की तरह दिखता है. ‘इरा’ का मतलब है इंटैलीजैंट रोबोटिक असिस्टैंट और इसे भारत में ही विकसित किया गया है. एक समझदार महिला कर्मचारी की तरह ग्राहकों की समस्याएं हल करने के अलावा बैंक कर्मचारियों की मदद करने का जिम्मा भी इरा को दिया गया है.

हमारे देश में इस तरह के संवेदनशील रोबोट बनाने की यह एक शुरुआत है और ऐसी ही एक शुरुआत जापान और यूरोपीय संघ ने संयुक्त रूप से 20 लाख पाउंड के खर्च से ऐसा रोबोट बनाने की दिशा में की है, जो सांस्कृतिक और संवेदनशील हों और बुजुर्गों की देखभाल कर सकें. अगले 3 साल में बनाए जाने वाले ये पेपर रोबोट इंसानों की तरह ही दिखेंगे और उन्हें बुजुर्गों की देखभाल जैसे समय पर दवापानी देने और उन के रोजमर्रा के कई काम संपन्न करने में लगाया जाएगा. सब से उल्लेखनीय बात है रोबोट को आम इंसानों की तरह बुद्धिमान व संवेदनशील बनाया जाना. पेपर रोबोट बनाने वाली कंपनी ‘सौफ्टबैक रोबोटिक्स’ का कहना है कि वह ऐसी दुनिया बनाना चाहती है, जहां इंसान और रोबोट साथसाथ रह सकें और साथ रहते हुए सुरक्षित, सेहतमंद व खुशहाल जीवन बिताएं. हालांकि अभी भी जापान में सैकड़ों घरों में इसी तरह के पेपर रोबोट आजमाए जा रहे हैं, पर इस परियोजना के तहत बेहद समझदार और संवेदनशील रोबोट सब से पहले ब्रिटेन के एडवीनिया हैल्थ केयर के केयर होम्स में जांचापरखा जाएगा.

समझदार रोबोट बनाने की दिशा में एक प्रयोग फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने भी किया है. उन्होंने अपने घर पर आर्टिफिशियल इंटैलीजैंसी यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से हौलीवुड की फिल्म ‘आयरनमैन’ में देखने वाले रोबोट जारविस की तरह का एक रोबोटिक सिस्टम तैनात किया है जो घर और औफिस के कामों में उन की मदद करता है.

जारविस सिस्टम उन की आवाज के  इशारे पर काम करता है और उस में लगी एआई तकनीक संगीत, लाइट से ले कर घर का तापमान तक नियंत्रित करती है. यही नहीं, जारविस उन के घर आने वाले दोस्तों की पहचान करता है, घंटी बजने पर उन के लिए घर का दरवाजा खोलता है और जुकरबर्ग की गैरमौजूदगी में उन की बेटी मैक्स की देखभाल भी करता है. घर पर मौजूद नहीं रहने पर औफिस में काम करते वक्त जुकरबर्ग को अपने कंप्यूटर जारविस की मदद से घर के भीतर की सारी जानकारी मिलती रहती है.

कौमनसैंस वाले रोबोट

ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो यह साबित करते हैं कि धीरेधीरे रोबोट हम इंसानों  के आदेशों के अलावा हमारी भावनाओं को समझते हुए कार्य करना सीख रहे हैं. असल में, अभी तक यही माना जाता रहा है कि जब बात सामान्य बुद्धि यानी कौमनसैंस की आती है, तो रोबोट इस मामले में इंसानों से पिछड़ जाते हैं, जबकि इंसान बहुत सारे काम कौमनसैंस (व्यावहारिक बुद्धि) के सहारे करते हैं. ऐसे में यह जरूरी है कि अगर रोबोट को इंसानों के बराबर ला खड़ा  करना है, तो उन में कौमनसैंस विकसित की जाए, लेकिन रोबोट या कहें कि मशीनों में ऐसी क्षमता विकसित करना काफी कठिन काम माना जाता रहा है.

जापान और यूरोपीय संघ मिल कर पेपर रोबोट के संबंध में जो कर रहे हैं और जिस तरह  का एक काम अमेरिका की कोर्नेल यूनिवर्सिटी में हो रहा है, उस से लगता है कि जल्दी ही यह तसवीर बदल जाएगी. असल में, कोर्नेल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता रोबोट में ऐसी क्षमता विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि किसी धारदार चीज को हाथ में लेते समय उन में इस से पैदा होने वाले खतरे का एहसास हो सके. रोबोट यह जान सकने योग्य बनाए जा रहे हैं कि कांच जैसी आसानी से टूटने वाली चीजों को किस तरह संभालना है.

हालात के मुताबिक खुद सोच सकने वाले ऐसे रोबोट को ‘बैक्सटर’ नाम दिया गया है. ‘बैक्सटर’ अगर किसी मामले में कोई गलती करता है, तो उस के साथ मौजूद रहने वाला ह्यूमन हैंडलर उस केहाथ की दिशा ठीक कर देता है. यह काम तब तक दोहराया जाता है, जब तक कि रोबोट में कुछ खास किस्म के काम कर सकने की समझ विकसित नहीं हो जाती. लेकिन रोबोट में चीजों में अंतर करने की समझ विकसित करना आसान नहीं है. यों रोबोट्स को इंसान जैसा बनाने की जो कोशिशें चल रही हैं, उन्हें देखते हुए लगता है कि जल्द ही कोई ऐसा रोबोट सामने आएगा जिस से यह फर्क करना मुश्किल हो जाएगा कि वह मशीन है या जीवित प्राणी. पर क्या इस का पता किया जा सकेगा कि कोईर् रोबोट इंसान जैसा हो गया है क्योंकि अभी हम यह मानने को तैयार नहीं कि हमारे हावभाव की नकल करने वाली मशीन इंसान जैसी आखिर कैसे हो सकती है. एक ऐसी मशीन, जो हमारी तरह सोचसमझ नहीं सकती, हमारी जैसी चेतना नहीं रखती, जो इमोशंस की सिर्फ नकल कर रही होगी, यह असली नहीं हो सकती. वह तो रोबोट ही रहेगी, पर वैज्ञानिक दावा कर रहे हैं कि असली और नकली का यह अंतर जल्दी ही मिटने वाला है. ऐसा दावा करने वाले वैज्ञानिक एक अनुमान लगाने को कहते हैं. वे कहते हैं कि यदि रोबोट को ऐसा बना दिया जाए कि वह हाड़मांस का लगे, तो हम उसे तब तक इंसान ही समझेंगे, जब तक कि वह खुद हमें न बताए कि  वह तो रोबोट है.

जिंदा हो रही मशीन

कोई चीज जड़ या चेतन या फिर कोई मशीन है या इंसान जैसा जीव इस का फर्क तो हम सामने से देख कर आसानी से कर लेते हैं, पर यदि आप के सामने एक परदा हो और उस पार कोई अजनबी, जिसे आप देख नहीं सकते, तो उसे पहचानना मुश्किल होगा. खासतौर से तब जब दूसरी तरफ से आप को सही जवाब मिल रहे हों.

कहा जा रहा है कि जिस दिन इंसानों की तरह बात और व्यवहार करने वाले रोबोट बना लिए जाएंगे, तब मशीनों को जिंदा ही मान लिया जाएगा. तब रोबोट एक ऐसी मशीन के  रूप में हमारे सामने होगा जो हम से बातचीत कर रहा होगा, हमारी भावनाओं को समझ रहा होगा और हमारे आदेशनिर्देश समझ कर कोई सही फैसला कर रहा होगा. हजारों तरह के कीड़े और जीव प्रजातियां तो हम से बात भी नहीं करतीं, पर हम उन्हें जिंदा मानते हैं. फिर यदि रोबोट सोचनेमहसूस करने की जरा भी योग्यता दर्शाने लगें, तो उन्हें जीवित मान लेने में क्या हर्ज है?

असल में चेतन और जड़ (लाइफ और नौनलाइफ) के बीच जो दूरी या परदा था, अब वह खत्म होता लग रहा है, क्योंकि मशीनें हमारे जीवन में काफी भीतर तक घुसपैठ कर चुकी हैं. कह सकते हैं कि मशीनें जिंदा होने जा रही हैं जिन से सारे समीकरण बदल सकते हैं. वैसे इस बदलाव के काफी संकेत तो अत्यधिक स्मार्ट हो चुके मोबाइल फोन, कंप्यूटर और इशारे से चलने और बंद होने वाली हमारे रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाली मशीनें दे ही रही हैं, पर बड़ी तबदीली शायद रोबोट्स की वजह से आने वाली है.

यह तबदीली कैसी होगी, इस का संकेत यूरोप में चलाए जा रहे फेलिक्स ग्रोविंग प्रोजैक्ट से मिलता है. फेलिक्स का मतलब है फीलिंग (एहसास), इंटरैक्ट (क्रियाप्रतिक्रिया) और ऐक्सप्रैस (अभिव्यक्ति). इस के तहत रोबोटिक्स, साइकोलौजी और न्यूरो साइंस के कई विशेषज्ञों की साझा मेहनत से तैयार होने जा रहे रोबोट में पहली बार भावनाएं पैदा की जाएंगी. ऐसे रोबोट अपनी मशीनी आंखों, कानों और सैंसर्स से आसपास के माहौल को पहचानेंगे, अपने मालिक के इशारों, संकेतों और भावों को समझेंगे और जवाब में वैसी ही प्रतिक्रिया देंगे, जैसी जीवित प्राणी देते हैं.

रोबोट को लोग अपने नौकर या पालतू जानवर की तरह इस्तेमाल कर सकेंगे. वह सोनी के मशीनी कुत्ते ऐबो और होंडा के रोबोट आसिमो से कईर् पीढ़ी आगे का होगा. ऐबो चेहरे पहचानता है और अपने मालिक की कमांड सीखता है. आसिमो इस से थोड़ा आगे है. वह नाच भी सकता है. फुटबौल खेल सकता है पर ये दोनों हैं तो रोबोट ही.

खत्म हो रहा है फासला

अभी भले ही लोग यह फर्क कर पाएं कि इंसान जैसे दिखने के बावजूद कोई मशीन असल में रोबोट है और इंसान उन से अलग है, पर एक मशहूर वैज्ञानिक रे कुर्जवेल जल्दी ही इस अंतर के  खत्म होने की उम्मीद कर रहे हैं. कुर्जवेल का दावा है कि आने वाले कुछ ही वर्षों में रोबोट भी प्रयोगशाला रूपी कक्षाओं में नई चीजें सीखते और इस बारे में जानकारी को एकदूसरे से साझा करते दिखाई दे रहे होंगे कि वे हर मामले में इंसानों को कैसे पीछे छोड़ सकते हैं.

असल में इस उद्देश्य से रोबोट्स के लिए खासतौर से ऐसा वर्ल्ड वाइड वैब तैयार किया जा रहा है जहां वे इंसानी खूबियों को सीखेंगे. इस वर्ल्ड वाइड वैब का नाम है, ‘रोबोअर्थ’ और ‘रोबो ब्रेन’. रोबोअर्थ की जानकारियों का स्रोत प्रोग्रामिंग है, जबकि रोबो ब्रेन इंटरनैट से मिली सूचनाओं के प्रति खुद अपनी समझ बनाता है. रोबो बे्रन केवल वस्तुओं को पहचानता ही नहीं है बल्कि उस में मनुष्यों की भाषा और व्यवहार जैसी जटिल चीजों  को समझने की भी क्षमता है. यदि कोई रोबोट ऐसी स्थिति में फंसता है, जिस से उस का पहले कभी सामना नहीं हुआ था, तो वह रोबो ब्रेन से सलाहमशविरा कर सकता है.

असल में रोबो ब्रेन को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि वह सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सूचना स्रोतों से कई प्रकार के हुनर और ज्ञान को हासिल कर ले. इस ब्रेन से संपर्क रखने वाले दुनिया के किसी भी हिस्से में मौजूद अन्य रोबोट अपने रोजमर्रा के कार्यों के लिए रोबो ब्रेन में जमा सूचनाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं. रोबोअर्थ नामक वैब का विकास करने वाले वैज्ञानिक इंडोवेन यूनिवर्सिटी में बनाए गए एक प्रायोगिक अस्पताल में ऐसी प्रणाली बना रहे हैं, जिस का मकसद रोबोटों को इस लायक बनाना है ताकि वे अपनी जानकारियों को डाटाबेस में डाल सकें. डाटाबेस में पहुंचाई गई ये सूचनाएं सभी मशीनों के साथ एक खास कृत्रिम मस्तिष्क के जरिए दूसरे रोबोटों से साझा की जाएंगीं.

रोबोअर्थ परियोजना के मुखिया रेने वान दे मोलेनग्राफ्ट के मुताबिक, रोबोअर्थ असल में रोबोटों के लिए तैयार किया गया एक ऐसा वर्ल्ड वाइड वैब है, जिस का विशाल नैटवर्क है. लंबेचौड़े आंकड़ों का गोदाम इस की खासीयत है. इस वैब पर रोबोट अपनी जानकारियां एकदूसरे से बांटेंगे और एकदूसरे से सीखेंगे भी. इस प्रणाली को जांचने के लिए 4 ऐसे रोबोट चुने गए हैं, जो अस्पताल में आने वाले मरीजों की मदद के लिए मिलजुल कर काम करेंगे. ये रोबोट काम कैसे करेंगे, इस का भी एक खाका तैयार है. जैसे इन में से एक रोबोट अस्पताल में भरती मरीज के बैड या कमरे का नक्शा वैबसाइट पर अपलोड करेगा, ताकि मरीज से मिलने वालों को यहां पहुंचने में कोई परेशानी न हो. इसी तरह दूसरा रोबोट ऐसे संदेश प्रसारित करेगा, जिस से मरीजों को पेय पदार्थ जल्दी और आसानी से मिल जाएं. इस तरह लग रहा है कि जल्दी ही कई तरह के सार्वजनिक कार्यों में रोबोट की मदद ली जाने लगेगी.

अभी जो सब से बड़ी समस्या है, वह यह है कि हम इंसान जिन कामों को आसानी से करते हैं, रोबोट के लिए वे सभी काम मुश्किल होते हैं, जबकि जो काम इंसानों के लिए कठिन माने जाते हैं, उन्हें रोबोट आसानी से कर लेते हैं. जैसे, लावा उगलते ज्वालामुखी में उतरना या समुद्र की गहराइयों में किसी चीज को खोज निकालना ऐसे सक्षम रोबोट अब अस्तित्व में हैं पर चाय का गरम प्याला उलटने से हाथ जल सकता है, यह समझ रोबोट में प्राय: नहीं होती.

खतरा क्या है

सवाल यह है कि जब रोबोट इंसानों जैसी समझ आदि से जुड़ी बहुत सारी बातें सीख रहे हैं, तो उन से खतरा क्या है? उन्हें तो यही सिखाया जा रहा है कि कैसे किसी आदेश का पालन किया जाए या कैसे किसी परिस्थिति का सामना किया जाए? यह तो हम इंसानों के लिए अच्छी बात है कि हमारे काम में मददगार रोबोट हमारे आसपास होंगे पर असल में खतरा यही है. वैज्ञानिकों के मुताबिक एक जिंदा और बुद्धि से लैस रोबोट अगर हमारी सारी भावनाओं को समझने लगेंगे, तो उसी वक्त हमइंसानों की हस्ती खतरे में पड़ जाएगी. यह मामला मशीनों के जिंदा हो जाने का है.

एक खतरा तो यह हो सकता है कि हमारी किसी बात पर रोबोट रूठ जाए, तुनक जाए या क्रोधित हो जाए. ऐसी स्थिति में वह हमारे लिए समस्या पैदा कर सकता है. क्या पता हमला ही कर बैठे. यही नहीं, वह या तो आदेश का पालन करने से इनकार कर दे. संभव है कि वह अपने लिए आदरणीय संबोधन का इंतजार करे और कहे कि मिस्टर, जरा तमीज से पेश आइए. आखिर जब रोबोट जैसी मशीनें हमारी भावनाओं को समझने लगेंगी, तो वे अपने सम्मान की फिक्र भी तो करने लगेंगी. यह भी सकता है कि भविष्य की मशीनें हम से भी ज्यादा समझदार हों. वे चुपचाप विकसित होती रहें और हमें इस की भनक न लगने दें यानी तब सब से बड़ा खतरा हम इंसानों के लिए होगा. शायद यही वजह है कि दुनिया में कुछ लोग अभी से रोबोटों को मानवाधिकार देने की बात करने लगे हैं. ब्रिटिश सरकार के एक अध्ययन के अनुसार अगले 20 से 50 वर्ष में रोबोट्स को उन के हक देने होंगे. यही नहीं, दक्षिण कोरिया में कुछ वैज्ञानिक तो रोबोटों के लिए नैतिक नियम तय कर रहे हैं, ताकि वे इंसानों को नुकसान न पहुंचाना सीख लें. पर क्या एक दिन रोबोट इंसानों पर हमला कर देंगे? यह आशंका भी अकसर जताई जाती है, क्योंकि जिस तरह से उन्हें बुद्धिमान बनाने के प्रयास हो रहे हैं, मुमकिन है कि एक दिन वे इंसानों से हर मामले में आगे निकलना चाहें और दुनिया पर कब्जा करना चाहें.

‘बैक्सटर’ जैसे रोबोट को ले कर अभी से सी बातें की जा रही हैं, पर वैज्ञानिक कहते हैं कि अगले 500 साल में तो ऐसा नहीं होगा. अगर किसी रोबोे के हाथों कोई खून होगा तो वह गलत कमांड या रोबोट से भूलवश ही होगा. ऐसे कुछ हादसे विदेश में और भारत में गुड़गांव तक में हो चुके हैं, पर अंतत: वे हमारी बनाई मशीनें हैं जिन्हें हमारे ही निर्देशों की जरूरत है. बिना मानवीय दखल के रोबोट विद्रोह तो हरगिज नहीं कर सकेंगे.

ये ब्यूटी गैजेट्स अपनाएं, पार्लर का पैसा बचाएं

स्किन केयर से ले कर अपने लुक को परफैक्ट रखने के लिए अगर आप भी अकसर महंगे पार्लर या स्पा जाती हैं और महीना दर महीना हजारों खर्च करती हैं, तो अब से पार्लर या स्पा जाना कम कर दीजिए, क्योंकि खास आप के लिए हम ने जुटाएं हैं कुछ ऐसे ब्यूटी गैजेट्स, जिन के इस्तेमाल से आप घर बैठे पा सकती हैं पार्लर सा निखार और वह भी आसानी से. अच्छी त्वचा के साथसाथ सौंदर्य बढ़ाने के लिए अपने पास कौनकौन से ब्यूटी गैजेट्स रखें, यह जाना हम ने डर्मैटोलौजिस्ट डा. गीताजंलि शेट्टी से:

क्लींजिंग ब्रश

अच्छी त्वचा के  लिए रोजाना क्लींजिंग, टोनिंग और मौश्चराइजिंग करना जरूरी है. इस में भी सब से बड़ी भूमिका होती है क्लींजिंग की, जिस से त्वचा की गंदगी दूर होती है, त्वचा अंदर से स्वस्थ रहती है और कीलमुंहासों की संभावना भी आधी रह जाती है. इसलिए अपने वैनिटी बौक्स में क्लींजिंग ब्रश ब्यूटी गैजेट जरूर रखें. यह त्वचा को बाहर से साफ रखता है और अंदर से स्वस्थ बनाता है. इस के इस्तेमाल से त्वचा की मसाज होती है और वह नर्ममुलायम बनी रहती है.

कैसे करें इस्तेमाल

क्लींजिंग ब्रश के किट के साथ ब्रश के साथसाथ क्लींजिंग क्रीम भी मिलती है. पहले पूरे चहेरे पर अच्छी तरह क्लींजिंग क्रीम लगाएं, उस के बाद हैंडी क्लींजिंग ब्रश को हलके से पूरे चेहरे पर 5 मिनट तक घुमाएं. बाद में कुनकुने पानी से चेहरा धो लें.

स्मार्ट टिप्स

ओले प्रो. ऐक्स माइक्रोडर्माब्रेशन ऐडवांस क्लींजिंग ब्रश, प्रोऐक्टिव स्किन क्लींजिंग ब्रश व स्पा सोनिक केयर सिस्टम आदि में से कोईर् एक क्लींजिंग ब्रश खरीद सकती हैं. इस की कीमत  1 से 6 हजार तक हो सकती है.

रिंकल इरेजर

चेहरे पर उभर आई रिंकल्स को हटाने के लिए पार्लर जा कर हजारों खर्च करने से बचना चाहती हैं तो अपने पास रिंकल इरेजर गैजेट या रिंकल इरेजर पैन जरूर रखें. इस से आप घर बैठे फाइन लाइंस के साथसाथ आंखों के नीचे, होंठों के पास और गालों की छाई झुर्रियों को भी कम कर सकती हैं. सप्ताह में 2 बार इस का इस्तेमाल किया जा सकता है. इस से रिंकल्स तो कम होती ही हैं, साथ ही स्किन फ्रैश और यंग भी नजर आती है.

कैसे करें इस्तेमाल

रिंकल इरेजन पैन यूज करने से पहले आंखों के नीचे अंडर आई क्रीम लगाएं. उस के बाद रिंकल इरेजर पैन को झुर्रियों पर रख कर हलके से दबाएं. फिर उठा लें. यह क्रिया 2-3 मिनट दोहराएं. इसी तरह होंठों के आसपास और जौ लाइन की रिंकल्स को भी हटाया जा सकता है.

स्मार्ट टिप्स

रिंकल इरेजर पैन की कीमत की शुरुआत  2 हजार से होती है और रिंकल इरेजर गैजेट किट  4 हजार से. केयर जौय, इरेजर पैन, एचईजीएफ रिंकल इरेजर पैन, डर्मासीन इंस्टैंट रिंकल इरेजर आदि में से किसी एक का चुनाव कर सकती हैं.

स्किन स्मूदर

चेहरे की त्वचा बहुत कोमल होती है. धूप, धूलमिट्टी और प्रदूषण के साथ ही मौसम का मिजाज भी सब से पहले चेहरे की त्वचा को ही प्रभावित करता है, जिस से त्वचा रूखी हो जाती है और उस का रंग फीका नजर आता है. ऐसे में स्किन स्मूदर गैजेट आप के बेहद काम आ सकता है. सप्ताह में 2 बार त्वचा पर स्किन स्मूदर का इस्तेमाल करने से रूखी त्वचा की परत हट जाती है और नईर् त्वचा मुलायम महसूस होती है. स्किन स्मूदर डार्क स्पौट्स को भी कम करता है.

कैसे करें इस्तेमाल

पूरे चेहरे पर अच्छी तरह मौइश्चराइजर लगा कर स्किन स्मूदर से चेहरे की मसाज करें. इस से रूखी त्वचा की परत हट जाएगी. आखिर में कुनकुने पानी से चेहरे को धो लें.

स्मार्ट टिप्स

फिलिप्स स्किन स्मूदर, पीएमडी पर्सनल माइक्रोडर्म, अल्ट्रासोनिक स्किन स्मूदर मशीन आदि ट्राई कर सकती हैं. इस की कीमत 1 हजार से शुरू होती है. औनलाइन मंगवाने से छूट भी मिल सकती है.

टैंपरेरी स्किन टाइटनर

बढ़ती उम्र की वजह से तो कई बार चेहरे पर जरूरत से ज्यादा कैमिकलयुक्त प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करने से त्वचा में ढीलापन आ जाता है या फिर त्वचा लटक जाती है, जिसे आप पार्लर या स्पा जा कर तरहतरह के ब्यूटी ट्रीटमैंट ले कर कम कर सकती हैं, लेकिन आप के पास अगर पार्लर या स्पा जाने का वक्त नहीं है तो आप टैंपरेरी स्किन टाइटनर गैजेट भी यूज कर सकती हैं. इस के इस्तेमाल से स्थाई तो नहीं, लेकिन कुछ समय के लिए स्किन टाइट जरूर महसूस होगी.

कैसे करें इस्तेमाल

स्किन टाइटनिंग मशीन को प्रभावित जगह पर रख कर हलके से दबाएं, फिर उठा लें. कुछ मिनट यह क्रिया दोहराने से त्वचा में हलका सा कसाव महसूस होगा.

स्मार्ट टिप्स

कई रिंकल इरेजर गैजेट्स स्किन को भी टाइट करते हैं, लेकिन आप सिर्फ स्किन टाइटनिंग खरीदना चाहती हैं तो वीनस विवा स्किन टाइटनिंग, ट्रिआ स्किन टाइटनिंग, मिशा स्किन टाइटनिंग मशीन में से कोई एक चुन सकती हैं. इस की कीमत  1,500 से शुरू होती है.

ट्वीजर

अगर आप भी आईब्रोज की शेप बिगाड़ने वाले ऐक्स्ट्रा बालों को नहीं देखना चाहतीं और तुरंत अगले दिन उन्हें निकालने के लिए पार्लर पहुंच जाती हैं, तो इस के बजाय ट्वीजर को अपना साथी बना लें. इस की मदद से आप जब चाहें तब और जहां चाहें वहां आईब्रोज के ऐक्स्ट्रा और अनचाहे बालों को उखाड़ सकती हैं. इस से आईब्रोज भी हमेशा शेप में रहेंगी और आप को पार्लर जाने की भी जरूरत नहीं होगी.

कैसे करें इस्तेमाल

ट्वीजर को इस्तेमाल करना बहुत ही आसान है. यह चिमटे की तरह होता है. आप जिस तरह चिमटे से बरतन उठाती हैं, उसी तरह ट्वीजर के बीच ऐक्स्ट्रा बाल को पकड़ कर खींच लिया जाता है.

स्मार्ट टिप्स

ट्वीजर 100 से ले कर 600 तक में भी मिलता है. ब्लू स्लैंट ट्वीजर, ट्वीजर गुरु, हारपरटोन प्लककिट आदि खरीद सकती हैं.

फैशियल हेयर रिमूव

चेहरे पर आने वाले अनचाहे बालों से छुटकारा पाने के लिए महीने में 2 बार पार्लर या स्पा के चक्कर लगाने के बजाय मार्केट जाएं और अपने लिए फैशियल हेरर रिमूवर खरीद लाएं. आप घर बैठे इस के इस्तेमाल से चेहरे के अनचाहे बालों को आसानी से हटा सकती हैं. इस के लिए आप को वैक्स से बाल हटाने या ब्लीच के जरीए उन्हें छिपाने की जरूरत नहीं होगी. इस के इस्तेमाल से मिनटों में ही बाल छूमंतर हो जाएंगे.

कैसे करे इस्तेमाल

फैशियल हेयर रिमूवर के दोनों छोरों को 1-1 हाथ से पकड़ें और फिर उन्हें ऊपर से नीचे की तरफ घुमाते हुए फैशियल हेयर को रिमूव करें.

स्मार्ट टिप्स

ट्वीजर की तरह फैशियर हेयर रिमूवर भी काफी सस्ता मिलता है. इस की कीमत 150 से शुरू होती है. ट्वीजरमैन स्मूद फिनिश फैशियल हेयर रिमूवल, यूनिक हेयर रिमूवल, डीआईवाई क्विक स्मूद हेयर रिमूवल आदि में से किसी एक का चुनाव किया जा सकता है.

हेयर रिमूवल लेजर

हाथपैरों के साथसाथ बिकिनी लाइन या फिर पूरे शरीर के अनचाहे बालों से छुटकारा पाना चाहती हैं तो अपने पास हेयर रिमूवल लेजर ब्यूटी गैजेट रखना न भूलें. यह बालों को त्वचा से हटाने के साथ ही त्वचा को कोमल भी बनाता है. सब से अच्छी बात यह है कि इस के इस्तेमाल से दर्द भी नहीं होता है. हर महीने के बजाय इस का इस्तेमाल डेढ़ से 2 महीनों के अंतराल पर करें.

कैसे करें इस्तेमाल

हेयर रिमूवल लेजर को अनचाहे बालों वाली जगह पर हलके से घुमाएं. इस से बाल साफ होते जाएंगे.

स्मार्ट टिप्स

वीट हेयर रिमूवल डिवाइस, वर्सो ईपेन परमानैंट हेयर रिमूवल, ट्रिआ हेयर रिमूवल लेजर आदि में से कोई भी हेयर रिमूवल लेजर खरीद सकती हैं. इस की कीमत  5 हजार से शुरू होती है.

सेफ्टी रूल्स

डा. गीताजंलि शेट्टी के अुनसार, घर पर भी ब्यूटी गैजेट्स यूज करने से पहले निम्न बातों को ध्यान में रखें:

– ब्यूटी गैजेट के पैकेट पर उसे इस्तेमाल करने का लिखा तरीका ध्यान से पढ़ लें.

– अगर आप को स्किन ऐलर्जी है तो कोई भी  ब्यूटी गैजेट इस्तेमाल करने से पहले डर्मेटोलौजिस्ट की सलाह अवश्य लें.

– त्वचा संबंधी किसी प्रौब्लम के चलते अगर आप किसी डर्मेटोलौजिस्ट की निगरानी में उस का इलाज करवा रही हैं, तो कोई भी ब्यूटी गैजेट्स यूज करने से बचें.

– अगर आप प्रैगनैंट या बच्चे को स्तनपान करा रही हैं तो ब्यूटी गैजेट यूज करने से पहले डर्मेटोलौजिस्ट से जरूर पूछें.

लालू यादव : मिट्टी ने की मिट्टी पलीद

लालू प्रसाद के परिवार पर 90 लाख रूपए की मिट्टी गैरकानूनी तरीके से पटना के संजय गांधी जैविक उद्यान को बेचने के आरोप से बिहार की राजनीति गरमा गई है. लालू इस मसले पर सफाई-दर-सफाई दे रहे हैं और नीतीश कुमार चुप्पी साधे हुए हैं. पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने लालू के बेटे और वन एवं पर्यावरण मंत्री तेजप्रताप यादव को बर्खास्त करने की मांग कर डाली है. गौरतलब है कि पटना और दानापुर के बीच सगुना मोड़ के पास बिहार का सबसे बड़ा मौल बनाया जा रहा है. बताया जा रहा है कि वह मौल लालू और उनके परिवार का है. राजद के सुस्संड के विधायक अबू दौजाना की कंपनी मौल बना रही है. उसी मौल से निकली मिट्टी को बगैर टेंडर निकाले जैविक उद्यान को बेच दिया गया है.

मोदी ने आरोप लगाते हुए कहा है कि अपने परिवार को मिट्टी घोटाले में फंसते देख कर लालू यादव आधी रात को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलने उनके घर पहुंच गए. 4 अप्रैल को अपने जनता दरबार के बाद मोदी ने बताया कि डिलाइट मार्केटिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी में तेजप्रताप यादव, तेजस्वी यादव और चंदा यादव साल 2014 से ही डायरेक्टर हैं. उसी कंपनी की जमीन पर बिहार का सबसे बड़ा मौल बनाने का दावा किया जाता रहा है. मौल को बनाने के लिए काट कर निकाली गई मिट्टी को जैविक उद्यान को बेच दिया गया है. मौल के 2 अंडर ग्राउंड फ्लोर के लिए काटी गई मिट्टी गैरकानूनी तरीके से जैविक उद्यान को बेची गई है. इस मामले की अगर ईमानदारी से जांच कराने से दूध का दूध और पानी का पानी हो सकता है.

गौरतलब है कि साल 2008 में जल संसाधन मंत्री ललन सिंह ने लालू यादव पर आरोप लगाया था कि रेलवे के 2 होटल हर्ष कोचर को देने के एवज में कोचर ने पटना के सगुना मोड़ के पास 2 एकड़ जमीन लालू को दी थी. उसी जमीन पर मौल बनाया जा रहा है. मौल को बनाने का काम मेरीडियन कंस्ट्रक्शन इंडिया लिमिटेड कर रही है. यह कंपनी राजद विधयक सैयद अबु दौजाना की है.

मोदी का दावा है कि बगैर कोई टेंडर निकाले मिट्टी उठाने और गिराने का काम रूपसपुर के बीरेंद्र यादव के एमएस इंटरप्राइजेज को दिया गया. पिछले 2 महीने से रात 10 बजे से लेकर सुबह 5 बजे के बीच 5 लाख घन फुट मिट्टी ढुलाई का काम चल रहा था. जबकि रात के समय में वन्य प्राणियों के उद्यान में निर्माण कार्य या किसी भी तरह की गतिविधियों पर रोक है. मोदी बताते हैं कि बिहार वन्य प्राणी संरक्षण कोष से मिट्टी की कीमत चुकाई गई है, जबकि 334 करोड़ 41 लाख रूपए से बनाए गए कोष के ब्याज की राशि केवल वन्य प्राणियों के संरक्षण पर ही खर्च की जा सकती है.

अपने ऊपर लगे आरोपों से तिलमिलाए लालू मोदी को झूठा बताते हुए कहते हैं कि मोदी का आरोप पूरी तरह से गलत है और वह किसी भी तरह की जांच के लिए तैयार हैं. लालू कहते है कि वह पिछले कई सालों से चिड़ियाखाना को मुफ्त में गोबर देते रहे हैं. आखिर मिट्टी बेचने और खरीदने का कोई रिकार्ड तो होगा, वह मोदी क्यों नहीं सामने लाते हैं? मोदी केवल झूठ का व्यपार करते हैं.

इस मसले पर जब संजय गांधी जैविक उद्यान के निदेशक नंदकिशोर से बात की गई तो उन्होंने कहा कि उद्यान के सौंदर्यीकरण के लिए 44 लाख रूपए की मिट्टी की खरीद की गई है, जिसकी कीमत 27 लाख है. मिट्टी की खरीद में सभी नियमों का पालन किया गया है. एसएस इंटरप्राइजेज से मिट्टी की खरीद हुई हैं और इस खरीद योजना को 7 महीने पहले ही मंजूरी मिली थी. उन्होंने यह भी दावा किया किया है कि किसी राजनेता के यहां से मिट्टी नहीं खरीदी गई है.

राजद विधयक सैयद अबु दौजाना कहते हैं कि मौल से निकाली गई मिट्टी को संजय गांधी जैविक उद्यान नहीं बल्कि उनके दूसरे प्लौटों पर भेजा गया है. उनकी कपंनी कन्वर्जन पर जमीन लेकर मौल बना रही है. सुशील मोदी अपने गलत आरोप के लिए माफी मांगे, नहीं तो उन पर मानहानि का मुकदमा किया जाएगा.

जैविक उद्यान में मिट्टी भराई के मामले को लेकर हल्ला मचने के बाद राज्य के मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह को जांच का जिम्मा सौंपा गया है. जांच की रिपोर्ट आने के बाद ही सच्चाई का पता चल सकेगा, लेकिन फिलहाल तो मिट्टी ने लालू यादब और महागठबंधन सरकार की मिट्टी पलीद कर ही दी है.

जीएसटी : कुछ बातें जानना है जरूरी

जीएसटी यानि कि वस्तु एवं सेवा कर. पिछले कुछ सालों से जीएसटी को लेकर काफी शोर-शराबा हो रहा है. पिछले कई सालों से केन्द्रीय सरकार इसे लागू करना चाह रही है, पर विपक्ष की पार्टी के विरोध के कारण यह लागू नहीं हो पा रहा है. संविधान का 122वां संशोधन यानि की जीएसटी को सन् 2014 में राज्यसभा में पारित कर दिया गया था. 6 मई 2015 को जीएसटी बिल लोकसभा में भी सर्वसम्मति पारित हो गया था.

क्या है जीएसटी?

गुड्स ऐंड सर्विसेस टैक्स या वस्तु एवं सेवा कर एक प्रकार का अप्रत्यक्ष कर या इन्डायरेक्ट टैक्स है. जीएसटी के तहत वस्तुओं और सेवाओं पर अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही टैक्स लगाया जाता है. जहां-जहां ये कानून लागू नहीं किया गया है वहां हर वस्तु या सेवा मे अलग-अलग टैक्स लगाया जाता है. अगर जीएसटी लागू हो जाता है तो हमें किसी भी वस्तु या सेवा के लिए अलग-अलग नहीं बल्कि एक ही टैक्स देना पड़ेगा. किसी भी प्रकार का अतिरिक्त टैक्स नहीं देना पड़ेगा. जीएसटी को आजादी(1947) के बाद अप्रत्यक्ष कर या इन्डायरेक्ट टैक्स का सबसे बड़ा रिफॉर्म या सुधार बताया जा रहा है.

जीएसटी से जुड़ी जरूरी बातें-

1. डबल जीएसटी

जीएसटी लागू होने पर राज्य सरकारें और केन्द्रीय सरकार अपने हिसाब से वस्तुओं और सेवाओं पर टैक्स लगा सकती है. केन्द्रीय सरकार सीजीएसटी(सेन्ट्रल जीएसटी) और राज्य सरकार एसजीएसटी(स्टेट जीएसटी) कर लगाएगी वहीं दो राज्यों के बीच आईजीएसटी(इंटीग्रेटेड जीएसटी) कर लगाया जाएगा. केन्द्रीय और इंटीग्रेटेड जीएसटी केन्द्र सरकार द्वारा ही लागू किया जाएगा.

2. कोई अतिरिक्त टैक्स नहीं

किसी भी वस्तु या सेवा का लाभ उठाने के लिए वर्तमान समय में एक्साइज ड्यूटी(उत्पाद शुल्क), सीवीजी, एसएडी, सीएसटी जैसे कई टैक्स देने पड़ते हैं. इसके अलावा कई तरह के राज्य स्तरीय कर जैसे वैट, प्रवेश कर(ऐंट्री टैक्स), लक्जरी टैक्स आदि का कई तरह के कर चुकाने पड़ते हैं. जीएसटी लागू होने पर इन में से किसी भी तरह का कर नहीं चुकाना पड़ेगा.

3. काले धन पर विराम

सरकार काले धन से निपटने के लिए बहुत से कड़े कदम उठा रही है. कई बार तो इस चक्कर में जनता का दीवालिया निकल जाता है, पर सरकार नहीं पसीजती. विशेषज्ञों का मानना है कि काले धन की रोकथाम में जीएसटी बहुत कारगर साबित होगा.

4. पूरी दुनिया में है जीएसटी

विश्व के लगभग 160 देशों में जीएसटी कर व्यवस्था लागू है. भारत में जीएसटी लागू करने की बात सबसे पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी.

5. जीएसटी के फायदे

– केन्द्र और राज्य सरकारें अपने हिसाब से वस्तुओं और सेवाओं पर कर लगाएगी. सबसे ज्यादा फायदा कंपनी और कारखानों के मालिकों को होगा. अगर कोई कंपनी या कारखाना एक राज्य में अपने उत्पाद बनाकर दूसरे राज्य में बेचती है तो वर्तमान समय में उन्हें दोनों राज्यों के टैक्स भरने पड़ते हैं. ऐसे में उत्पाद की कीमत बढ़ जाती है. जीएसटी लागू होने पर उत्पादों की कीमत कम हो जाएगी. इसका फायदा कंपनी और उपभोक्ता दोनों को होगा. उपभोक्ता को एक समान के लिए पूरे देश में एक ही दाम देना होगा.

– जीएसटी लागू होने से कई तरह के टैक्स देने से छुटकारा मिल जाएगा. लोग टैक्स चोरी नहीं कर पाएंगे. इसके अलावा अधिकारी भी कोई फेर-बदल नहीं कर पाएंगे.

– सबसे ज्यादा फायदा राज्यों को होगा क्योंकि जीएसटी लागू होने से राज्यों का राजस्व भी बढ़ेगा.

– टैक्स सिस्टम में पारदर्शीता आएगा.

जीएसटी के नुकसान

राज्यों को जीएसटी को लेकर कई तरह की आशंकाएं भी हैं. जीएसटी लागू होने पर वो कई तरह के टैक्स नहीं वसूल पाएंगे. पर केन्द्र सरकार ने राज्यों को 5 साल तक राज्यों के नुकसान की भरपाई करने का आश्वासन भी दिया है

वित्त मंत्री ने अपने बजट के भाषण में 1 अप्रैल से जीएसटी लागू करने की बात की थी. गौरतलब है की जीएसटी कानून अभी तक देश भर में लागू नहीं किया जा सका है.

 

मिर्जा ज्यूलिएट : लेखक और निर्देशक ने चौपट की पूरी फिल्म

मिर्जा साहिबां की क्लासिक प्रेम कहानी को तमाम फिल्मकार अपने अपने अंदाज में पेश करते रहे हैं. लगभग 6 माह पहले मशहूर फिल्मकार राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने अपनी फिल्म ‘‘मिर्जिया’’ में एक साथ दो कहानियों यानी कि मिर्जा साहिबां की क्लासिक प्रेम कहानी व आधुनिक युग के मिर्जा साहिबां की प्रेम कहानी को समानांतर पेश करते हुए साहिबां तीर क्यों तोड़े का जवाब तलाशने का प्रयास किया था. अब उसी क्लासिक प्रेम कहानी को निर्देशक राजेश रामसिंह उत्तरप्रदेश के मिर्जापुर की पृष्ठभूमि में बाहुबलियों व हिंदू मुस्लिम परिवारों की पृष्ठभूमि में इस तरह लेकर आए हैं कि कहानी का पूरा मर्म धराशाही हो गया. फिल्म ‘‘मिर्जा जूलिएट’’ प्यार व रोमांस की बजाए एक्शन, राजनैतिक महत्वाकांक्षा के चलते अपने भाई की हत्या करा देने से लेकर आनर किलिंग तक के सारे मुद्दों से ओतप्रोत एक बोझिल फिल्म बनकर रह गयी है.

फिल्म ‘‘मिर्जा जूलिएट’’ की कहानी उत्तर भारत के मिर्जापुर शहर की है, जहां हिंदू और मुसलमान दोनों धर्म के लोग रहते हैं. यहां बाहुबली धर्मराज शुक्ला (प्रियांशु चटर्जी) अपने दो भाईयों नकुल व सहदेव व बहन जूली के साथ रहते हैं. जूली मस्त व बिंदास है. वह निडरता के साथ हर किसी से पंगे लेती रहती है. उसे अपने प्रति अपने भाईयों के प्रेम का अहसास है. जूली की शादी इलाहाबाद के दबंग नेता पांडे परिवार में तय की गयी है. जूली के होने वाले पति राजन पांडे (चंदन राय सान्याल) कामुक किस्म के इंसान है. राजन, जूली को जुलिएट पुकारते हैं और फोन पर किस व सेक्स की बात करते हैं. पर जूली उनकी बातों पर ध्यान नहीं देती. निजी जीवन में जूली बिंदास है, मगर प्यार, रोमांस व सेक्स से अपरिचित सी है.

इधर रामनवमी के दिन  इलहाबाद में हिंदू और मुसलमानों के जुलूस निकल रहे होते हैं, दोनों में से कोई रास्ता बदलना नहीं चाहते. उस क्षेत्र का पुलिस अधिकारी मुस्लिम नेता सलाउद्दीन और हिंदू नेता यानी कि राजन पांडे चाचा देवी पांडे को राह बदलने के लिए समझाने का असफल प्रयास करते हैं. तभी वहां पुलिस की वर्दी में एक शख्स आता है और देवी पांडे पर गोली चलाकर चला जाता है. आरोप सलाउद्दीन पर लगता है. उधर पता चलता है कि पुलिस वर्दी वाला शख्स जेल का कैदी मिर्जा (दर्शन कुमार) है, जिसने वहां के पुलिस अफसर पाठक के इशारे पर इस हत्या को अंजाम दिया है.

वास्तव में बचपन में अबोध मिर्जा से गुनाह हुआ था, जिसके चलते वह बाल सुधार गृह पहुंचा था. अब मिर्जा जेल से निकलकर शराफत की नई जिंदगी शुरू करने के लिए मिर्जापुर अपने मामा मामी के यहां जाता है. 15 साल बाद मिर्जा को देखकर उसके मामा मामी बहुत खुश होते हैं. मिर्जा के मामा और जूली शुक्ला का मकान मिला जुला है, दोनों बचपन में दोस्त रहे हैं. राजन पांडे की हरकतों की वजह से परेशान जूली को मिर्जा के संग सकून मिलता है और दोनों के बीच प्यार हो जाता है. पर इस प्यार की रूकावट जूली के तीनों दबंग भाईयों के अलावा राजन पांडे का पूरा परिवार है.

राजन पांडे को विधायक का चुनाव लड़ने का टिकट मिल जाता है. इसी खुशी में एक जश्न का आयोजन होता है. वहां पर जूली भी अपने भाइयों के साथ आई है. मिर्जा उसके पीछे यहां आकर पांडे परिवार में नौकरी पा गया है. क्योंकि मिर्जा ने राजन पांडे के पिता को बता दिया है कि उन्होंने अपने बेटे राजन पांडे के विधायक बनने का रास्ता आसान करने के लिए खुद मिर्जा के ही हाथ से अपने छोटे भाई की हत्या करवायी है. इस समारोह के दौरान राजन, जूली को अपना कमरा दिखाने मकान के अंदर ले जाता है और कमरे से रोते हुए निकलकर जूली पूरे गांव वालों के सामने राजन पर बलात्कार का आरोप लगाती है. वह पुलिस में शिकायत दर्ज कराना चाहती है. पर जूली के भाई धर्मराज, नकुल व सहदेव उसे जबरन घर ले जाते हैं. इधर गुस्से में मिर्जा, राजन पांडे की पिटाई करता है. पांडे के लोग मिर्जा पर हावी होते हैं, तो किसी तरह मिर्जा वहां से भागने में सफल हो जाता है. पर पांडे की शिकायत पर पुलिस मिर्जा के पीछे पड़ जाती है.

कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. राजन पांडे व जूली अपनी कार से मिर्जा को नेपाल सीमा तक छोड़ने जाते हैं. अब तक जूली को अहसास हो चुका है कि उसका असली प्यार मिर्जा है. वह भी मिर्जा के साथ नेपाल चली जाती है. इस बात की खबर जब पांडे व धर्मराज को मिलती है, तो वह इन दोनों की हत्या के लिए निकल पड़ते हैं. मिर्जा कहता है कि जूली के भाईयों को वह गोली मार देगा. जूली छिपकर मिर्जा की बंदूक से गोली खाली कर देती है. अंत में जूली के भाईयों के हाथ मिर्जा और जूली दोनों मारे जाते हैं.

फिल्म की शुरुआत बहुत घटिया है. इंटरवल से पहले लगता है कि फिल्मकार के पास कहानी नहीं है और वह दुविधा में है कि इस फिल्म को किस दिशा में ले जाए. इंटरवल से पहले लगता है कि वह एक सेक्सी फिल्म बना रहे हैं. फिल्म की गति बहुत धीमी है. इंटरवल के बाद फिल्म की कहानी के पात्र मिर्जा साहिबान के आधुनिक रूप में में आ जाते हैं. पूरी फिल्म देखते समय लगता है कि लेखक और निर्देशक दोनों ही भटके हुए हैं. कभी रोमांस, कभी हिंसा तो कभी राजनीति के चक्कर में घूमते रहते हैं. फिल्म की कथा कथन शैली नीरस व अति धीमी है. पटकथा व निर्देशन की गड़बड़ी के चलते पूरी फिल्म बोर करने के अलावा कुछ नहीं है. फिल्म में पटकथा लेखक शांतिभूषण और निर्देशक राजेश रामसिंह ने जिस तरह से बाहुबलियों व दबंग किरदारों व रिश्तों को जिस तरह से पेश किया है, उससे कोई रिलेट नहीं कर सकता. शायद इन्हे भाई बहन के रिश्तों की अहमियत ही पता नहीं है.

जहां तब अभिनय का सवाल है, तो मिर्जा के किरदार में दर्शन कुमार और जूली शुक्ला के किरदार में पिया बाजपेयी ने बेहतरीन अभिनय किया है. पिया बाजपेयी के अभिनय में ताजगी है. मगर जूली शुक्ला के किरदार में लेखक की अपनी कमियों के चलते कई विरोधाभास है. जबकि दर्शन कुमार के गठन में कमजोरी के चलते कई जगह उनका अभिनय प्रभाव नहीं डाल पाता है. प्रियांशु चटर्जी विलेन के किरदार में अपनी छाप छोड़ने में असफल रहते हैं. राजन पांडे के किरदार के साथ चंदन सान्याल न्याय नही कर पाए. फिल्म का गीत संगीत भी प्रभावित नहीं करता. पूरी फिल्म में लेखक व निर्देशक ने महज क्षेत्रीय परिवेश को उभारने पर ही ज्यादा ध्यान दिया, मगर कहानी व फिल्म का बंटाधार कर डाला. दर्शक महज दर्शन कुमार के कारण ही फिल्म को देख सकते हैं.

125 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘मिर्जा जूलिएट’’ का निर्माण नीरज कुमार बर्मन, केतन मारू व अमित सिंह, निर्देशक राजेश राम सिंह, संगीतकार कृष्णा सोलो, गीतकार संदीप नाथ तथा कलाकार हैं – दर्शन कुमार, पिया बाजपेयी, प्रियांशु चटर्जी, स्वानंद किरकिर, चंदन राय सान्याल व अन्य.

चिनगारी फोगट बहनें

हरियाणा की कुश्ती पदक विजेता गीता फोगट, जिस पर आमिर खान की फिल्म ‘दंगल’ बनी थी, को 2010 के कौमनवैल्थ खेलों में स्वर्ण पदक जीतने पर वह वाहवाही नहीं मिली थी, जो फिल्म ने दिलाई है. अब गीता और बबीता फोगट घरघर का नाम बन गई हैं और लड़कियों की नई आशा बन गई हैं. हिंदी फिल्में इस प्रकार का सामाजिक बदलाव कम करा पाती हैं, पर इस बार ऐसा हो गया है. हरियाणा में एक पिता ने अपनी 2 बेटियों को कुश्ती में महारत दिलाने का संकल्प लिया था, यही अपनेआप में बड़ी बात है. इस देश में जहां औरतों को सदियों से बोझ समझा जाता रहा है, वहां एक पिता का बेटियों को कुश्ती में अपनी मरजी से डालना आश्चर्य ही है.

अब फिल्म ‘दंगल’ के बाद इन लड़कियों को नई पहचान मिलने लगी है और वे रोल मौडल बन रही हैं. महिला कुश्ती में वैसे तो लड़कियां ही होंगी, पर हरियाणा के पिछड़े गांवों में से इस तरह लड़कियों का बाहर निकलना एक सामाजिक बदलाव की निशानी है. यह बदलाव असल में बहुत गहरे जाना जरूरी है. औरतों और लड़कियों को सामाजिक व धार्मिक रीतिरिवाजों से इस तरह बांध दिया जाता है कि वे खूंटे से बंधी गाय की तरह हो जाती हैं, जिन का काम केवल दूध देना भर रह जाता है. लड़कियों का व्यक्तित्व तो खो ही जाता है, देश को उत्पादन की एक भरपूर सक्षम इकाई से भी हाथ खो देना पड़ता है.

यह नहीं भूलना चाहिए कि कमजोर इनसान चाहे मर्द हो या औरत, पूरे समाज पर बोझ होता है. किसी समाज की अमीरी उस की उत्पादकता पर निर्भर होती है और यदि लड़कियों को घर में बंद कर के पूजापाठ, सिर्फ चूल्हेचौके और बच्चे पैदा करने पर लगा दिया जाए, तो परिवार ही नहीं पूरा देश पीछे रह जाता है. धर्म ने साजिश कर के सदियों से औरतों को कमजोर रखा, ताकि वे मर्दों की सेवा करते रहें और कोई मांग न करें. ऐसा समाज गुलामी को तख्त पर बैठा देता है और उसे अपनी खुद की गुलामी का एहसास भी नहीं रहता.

फोगट बहनें महिला कुश्ती में नाम कमा कर एक दकियानूसी समाज में चिनगारी का काम कर रही हैं. अगर वे दूसरे पाखंडों का भी इसी तरह विरोध करें, तो ही उन का काम सफल होगा. फिल्म ‘दंगल’ में उन का ट्रेनिंग के दौरान लड़कों को भी पछाड़ना असल चैलेंज है और यह हर स्तर पर होना जरूरी है.

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