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आप के शिशु का मानसिक विकास अधूरा तो नहीं

‘‘आप की बेटी पढ़ाई में बहुत कमजोर है. उसे क्लास में पढ़ाया याद नहीं रहता,’’ जब टीचर रीमा को उस की बेटी अनिका के बारे में यह बता रही थी, तब उसे टीचर की बातों पर यकीन नहीं हो रहा था.

3 साल की अनिका देखने में तंदुरुस्त थी और उस का कद भी उस की उम्र के हिसाब से सही थी, तो फिर उसे पढ़ने या याद करने में क्या दिक्कत हो सकती है? यही सोच रीमा परेशान हो रही थी.

रीमा ने घर आ कर अनिका के बरताव पर गौर किया, तो उसे समझ में आया कि अनिका एकाग्र हो कर न तो खेलती है और न ही पढ़ती है. उसे बहुत हैरानी हो रही थी कि क्यों कभी उस ने अनिका के इस पहलू पर ध्यान नहीं दिया. रीमा का पूरा ध्यान उस की कदकाठी और वजन पर रहता था. यह सिर्फ रीमा की ही कहानी नहीं है. रीमा जैसी न जाने कितनी मांएं हैं, जो सिर्फ बच्चे की शारीरिक सेहत पर ध्यान देती हैं, लेकिन यह कभी नहीं सोचतीं कि बच्चे का मानसिक विकास भी बहुत जरूरी है. विशेषज्ञों के अनुसार शिशु के शुरू के 1000 दिन उस के शारीरिक व मानसिक विकास के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण होते हैं. इसलिए शिशु के पोषक तत्त्वों से युक्त आहार यानी न्यूट्रिएंट डैंस फूड पर खास ध्यान देना चाहिए, लेकिन बहुत कम पेरैंट्स अपने शिशु के दिमाग या मानसिक विकास पर चर्चा करते हैं.

जरूरी है पोषक तत्त्व

दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के नियोनेटोलौजिस्ट डा. सतीश सलूजा कहते हैं, ‘‘भारत में बहुत कम अभिभावक बालरोग विशेषज्ञ से शिशु के मानसिक विकास से जुड़े आहार की बात करते हैं. अधिकतर अभिभावक सिर्फ शिशु के वजन, हाइट को ले कर फिक्रमंद हैं और इन्हीं से जुड़े आहार के बारे में पूछते हैं. अकसर यह भी देखा गया है कि लोग अपने परिवार के खानपान के हिसाब से ही शिशु का खाना निश्चित करते हैं. इस स्थिति में कई शिशु पोषक तत्त्वों जैसे आयरन, जिंक और कैल्सियम की कमी से बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं. इसलिए यह बहुत जरूरी है कि मातापिता बच्चे के मानसिक विकास से जुड़े पोषक तत्त्वों की जरूरतों के बारे में डाक्टर से परामर्श लें.’’

गौरतलब है कि भारतीय अभिभावक अपने शिशुओं के मैक्रोन्यूट्रिएंट्स यानी प्रोटीन, कार्ब्रोहाइड्रेट और फैट पर तो ध्यान देते हैं, जिस से उन का शारीरिक विकास तो नजर आता है, लेकिन माइक्रोन्यूट्रिएंट्स यानी जिंक, आयरन, कैल्सियम, विटामिन्स देने पर कम ध्यान देते हैं. इन की कमी से शिशु का मानसिक विकास प्रभावित होता है, जो शारीरिक विकास की तरह आंखों से तो दिखाई नहीं देता, लेकिन समय बढ़ने के साथ पता चलता है कि बच्चे का मानसिक विकास पूरी तरह से नहीं हुआ है. अगर समय रहते शिशु का मानसिक विकास नहीं हुआ तो इसे भविष्य में कवर करना नामुमकिन हो जाता है. भारत में 6 महीने से 23 महीने के बच्चों में सब से ज्यादा 49.5 फीसदी आयरन की कमी पाई गई है.

संपूर्ण विकास के लिए

गौरतलब है कि शुरुआती 6 महीने तक शिशु सिर्फ स्तनपान पर रहते हैं और 6 महीने का होने पर उन्हें स्तनपान के साथ ठोस आहार देना शुरू किया जाता है. लेकिन इस के साथ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि शिशु शुरू में आहार पचा नहीं पाते तो उन्हें आहार थोड़ा तरल कर के ही देना चाहिए. थोड़ा तरल आहार होने के साथ यह पोषक तत्त्वों से युक्त होना भी बहुत आवश्यक है.

शिशुओं का आहार बनाते समय कई बातों का ध्यान रखना चाहिए. सब से जरूरी है कि उन के आहार में पहले साल नमक न डालें, क्योंकि उन में नमक पचाने की क्षमता नहीं होती.

नमक के अलावा चीनी का प्रयोग करने से भी बचाना चाहिए. इस से शिशु के निकलने वाले दांतों को नुकसान पहुंच सकता है और भविष्य में मोटापे का भी खतरा रहता है. सिर्फ खट्टे फलों को मीठा करने के लिए थोड़ी चीनी का इस्तेमाल किया जा सकता है. उन्हें खाने में बिस्कुट और नमकीन देने की आदत न डालें.

प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और फैट जैसे पोषक तत्त्वों के साथ शिशु को आयरन, जिंक और कैल्सियम युक्त पोषक तत्त्वों से भरपूर आहार देना भी महत्त्वपूर्ण है ताकि उन का संपूर्ण विकास हो सके. उन के मानसिक विकास के लिए आयरन युक्त आहार देना जरूरी है, जिस में ब्रोकली, शकरकंदी, हरी पत्तेदार सब्जियां, टोफू, मटर, मछली इत्यादि शामिल हैं.

इम्युनिटी बढ़ाने के लिए

इसी तरह जिंक शिशुओं की इम्युनिटी में सहायक होता है. यह रैड मीट, दही, नट्स और साबूत अनाज में पाया जाता है. साबूत अनाज के भूसे में जिंक की मात्रा ज्यादा होती है, लेकिन जिंक की यह मात्रा पिसाई के दौरान लगभग खत्म हो जाती है.

घर पर बने आहार से आयरन, जिंक और कैल्सियम की कमी को पूरा करना काफी मुश्किल होता है, क्योंकि शिशु के पेट का आकार वयस्क के पेट से 5 गुना छोटा होता है. इसलिए शिशु बहुत ही सीमित आहार खा पाता है. इस स्थिति में शिशु के शरीर के पोषक तत्त्वों को पूरा करने के लिए फोर्टीफाइड आहार शामिल किया जा सकता है. इस में जिंक, आयरन और कैल्सियम जैसे माइक्रोन्यूट्रिएंट्स प्रचुर मात्रा में होते हैं, जो शिशु के मानसिक विकास और इम्युनिटी को बरकरार रखने में मदद करते हैं.

मां का दूध है सर्वोत्तम

घर के बने आहार के  साथ आयरन, जिंक और कैल्सियम से भरपूर फोर्टीफाइड आहार को शिशु की डाइट में सम्मिलित कर उसे शारीरिक व मानसिक रूप से सक्षम बनाना महत्त्वपूर्ण है. शिशु के शुरुआती 2 साल में खानपान का खास खयाल रखना जरूरी है, क्योंकि बिना पोषक तत्त्वों से उसे भविष्य में कई तरह के विकार हो सकते हैं.

ठोस आहार के साथ स्तनपान का भी ध्यान रखें. मां का दूध शिशु के पोषण के लिए बहुत फायदेमंद है. इसे बिलकुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. शिशु के खानेपीने के साथसाथ समय पर वैक्सीनेशन पर भी ध्यान दें. जब भी शिशु को टीका लगवाने जाएं, तो उस की ग्रोथ को जरूर चैक करें.

इस तरह की छोटीछोटी बातों का ध्यान रख कर शिशु की संपूर्ण मानसिक व शारीरिक देखभाल की जा सकती है.                   

महत्त्वपूर्ण तथ्य

– वैसे तो मां का दूध शिशु के लिए पूरा आहार होता है, लेकिन उस में आयरन और विटामिन सी जैसे मुख्य पोषक तत्त्व नहीं होते. अगर आप का शिशु 6 महीने से ज्यादा उम्र का हो गया है और उसे दूध के अलावा पोषक तत्त्वों से युक्त भोजन नहीं मिल रहा तो वह ऐनीमिया से ग्रस्त हो सकता है.

– अलगअलग अध्ययनों के अनुसार शिशु का दिमाग 2 साल की उम्र तक 80 फीसदी तक विकसित हो जाता है और अगर इस उम्र में शिशु में पोषक तत्त्वों की कमी रह जाए, तो उसे पूरा करना लगभग नामुमकिन हो जाता है.

महत्त्वपूर्ण बात

– शिशु को बैठा कर चम्मच से धीरेधीरे खिलाना चाहिए और बचे आहार को शिशु को दोबारा नहीं खिलाना चाहिए.

– पहली बार जब शिशु को आहार दें, तो थोड़ी मात्रा में ही दें ताकि वह आसानी से पचा सके और उसे आहार का स्वाद महसूस हो सके.

– माइक्रोन्यूट्रिएंट्स को पूरा करने के लिए पोषक तत्त्वों से युक्त फोर्टीफाइड आहार भी दिया जा सकता है.    

वक्त रसोई में घुस जाने का नहीं

5 राज्यों के चुनावी नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि अब देश में एक नई तरह की राजनीति चलेगी. अब तक सामाजिक, धार्मिक मुद्दे सरकारों की नजर से अलग रहते थे पर अब जो सरकार में हैं उन की आम लोगों के सामाजिक व्यवहार, रीतिरिवाजों, धार्मिक अनुष्ठानों और परिवार व संस्कृति पर गहरी सोच है और वे उसे शासन का एक हिस्सा मानते हैं. अब सरकार केवल कर एकत्र करने, कानून व्यवस्था बनाने और सड़कों व इन्फ्रास्ट्रक्चर की ही चिंता नहीं करेगी वरन कौन क्या खाता है, क्या पहनता है, कैसे रहता है, कैसे विवाह करता है, भी सब शासन के हिस्से बन जाएंगे.

महिलाओं को अब अपनी जीवनशैली में बदलाव नजर आ सकता है, जिस के पीछे सिर्फ शिक्षा या बाजार न होगा वरन सरकारी फैसले भी हो सकते हैं. इस बारे में सरकार की नीति क्या होगी यह स्पष्ट नहीं है पर वह परंपरावादी जरूर होगी. इसलिए इन परिणामों को सिर्फ कुछ लोगों की सोच का जिम्मा मान कर रसोई में घुस जाना ठीक न रहेगा. राजनीति जब घर में घुस जाए तो फर्क औरतों को ही पड़ता है. मुसलिम व ईसाई राजाओं ने भारत व यूरोप के देशों में सदियों औरतों पर कहर ढाया और उन्होंने जो आजादी पिछली 2 सदियों में पाई, वह केवल परिवार के पुरुषों से नहीं पाई, सरकारी फैसलों के विरुद्ध मोरचे खोल कर पाई.

देश की पिछली सरकारें आमतौर पर औरतों के अधिकारों के इक्कादुक्का कानून बना कर चुप बैठ जाती थीं. औरतों ने देश में अपने अधिकार मांगने या बढ़ाने के लिए कुछ ज्यादा नहीं किया. जो मिला वह तकनीक या आर्थिक जरूरत से मिला. फिर भी कांग्रेसी सरकारें भी लकीर की फकीर बनी रही थीं और नतीजा है कि छिटपुट हस्तियों के अलावा अधिकांश सत्ता पुरुषों के हाथ में ही रही. जिन देशों में औरतों के अधिकार कम हैं वहां न केवल उन पर अत्याचार ज्यादा होते हैं, वहां हिंसा और युद्ध भी ज्यादा होते हैं, क्योंकि औरतों की सुरक्षा को देश, वाद और धर्म के नाम पर कुरबान कर दिया जाता है. इराक, ईरान, लीबिया, इजिप्ट, सीरिया ही नहीं, अधिकांश कैथोलिक ईसाई शासकों के देशों में भी औरतों का हाल बुरा है.

भारत की नई राजनीति क्या पिटारे खोलती है इस का एहसास है पर यह औरतों पर निर्भर करता है कि वे अधिक अधिकार मांगें और जो मिले हैं उन्हें छद्म रूप से घटाने न दें. आर्थिक मोरचे पर जो हो सो हो पर घरेलू मोरचे पर कुछ अप्रिय न हो और बराबरी के हक मिलें, यह देखना अब औरतों को खुद करना होगा. अमेरिका में पिंक हैट क्रांति की शुरुआत इसीलिए हुई है कि वहां के नए राष्ट्रपति बेहद दंभी हैं और औरतों को खिलौना मानते हैं. उन्होंने अपने नए बजट में औरतों की परेशानियां बढ़ाने वाले बहुत से कदम भारी विरोध के बावजूद उठाए हैं. यह बीमारी दूसरे शासकों को न लगे इस के लिए प्रतिरोध औरतों को करना होगा, कोई और न करेगा. भारत की महिलाओं को पिछले 5-6 दशकों में जो मिला है उसे वे धर्म और संस्कृति के नाम पर कहीं खो न दें, उस के लिए उन्हें होशियार रहना होगा. पुरुष साथ देंगे, इस में संदेह ही है.

ऐप्स से करें पेरैंट्स की मदद

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले की रहने वाली पारुल नोएडा में रह कर एमबीए कर रही है. उस के पिता बस्ती जिले के एक सरकारी महकमे में मुलाजिम हैं. पारुल को जब भी पैसों की आवश्यकता पड़ती थी तो पारुल के पापा औफिस से छुट्टी ले कर बैंक की लंबी लाइनों में लग कर पैसे जमा करते थे, जिस के चलते उन्हें तमाम तरह की परेशानियों का सामना भी करना पड़ता था. 

इस बार पारुल जब घर आई तो उस ने अपने पापा से कहा कि वे अपने स्मार्टफोन में जिस बैंक का खाता है उस बैंक का ऐप डाउनलोड कर के इंस्टौल कर लें, जिस से उन्हें हर महीने पैसे भेजने के लिए बैंक जाने की जरूरत नहीं रहेगी.

ऐप से पैसे ट्रांसफर करना बहुत ही आसान है और इस से किसी भी बैंक खाते में पैसा ट्रांसफर करना जहां पूरी तरह से सुरक्षित होता है वहीं कुछ ही मिनट में दूसरे के खाते में पैसा वहां पहुंच जाता है.

पापा को पारुल की बात समझ आ गई और उन्होंने बैंक का ऐप डाउनलोड करने को कहा. पारुल ने कुछ ही मिनट में उन के बैंक का ऐप डाउनलेड कर इंस्टौल कर दिया और निर्धारित प्रक्रिया के तहत मोबाइल बैंकिंग का रजिस्ट्रेशन कर पूरी प्रक्रिया समझा दी. अब पापा जहां बैंक जाने से बच गए वहीं वे ऐप के सहारे अपने मोबाइल का बिल, बिजली बिल, डीटीएच रिचार्ज, जैसी सुविधाओं का लाभ भी ले पा रहे हैं.

मोबाइल क्रांति ने सूचना और संचार को न केवल सस्ता सरल व सुलभ बनाया है बल्कि समय की बचत का एक बड़ा माध्यम भी है. आज तमाम उपयोगों में लाए जाने वाले ऐप्स न केवल घर बैठे खरीदारी की सुविधा उपलब्ध कराते हैं बल्कि होटल बुकिंग, रेल टिकट बुकिंग, हवाई टिकट बुकिंग, कपड़ों की खरीदारी, घर या जरूरी वस्तुओं की खरीदारी, सहित तमाम सुविधाएं मुहैया करा रहे हैं. 

बृजेश एक गारमैंट्स की दुकान चलाते हैं एक दिन वे सुबह परेशान थे, क्योंकि उन की दुकान का टैलीफोन बिल जमा करने की आज आखिरी तारीख थी, लेकिन वे दुकान से निकल नहीं पा रहे थे. ऐसे में जब वे घर लौटे तो बेहद परेशान दिख रहे थे. ग्रैजुएशन की पढ़ाई कर रहे उन के बेटे ने उन के परेशान होने का कारण पूछा और जान कर बोला, ‘‘पिताजी, इस में घबराने की क्या बात है अपना फोन दीजिए. आप को हर माह लाइन में लग कर बिल जमा करने की मुसीबत से छुटकारा दिला देता हूं. बृजेश के बेटे ने झट पापा का मोबाइल ले कर उस में ऐप डाउनलोड कर दिया और फिर कुछ ही क्षण में टैलीफोन का बकाया बिल जमा भी कर दिया. बेटे द्वारा डाउनलोड किए गए ऐप के माध्यम से अब वे हर माह समय से टैलीफोन का बिल जमा कर देते हैं. 

जिम्मेदारी के बोझ तले दबे पेरैंट्स के लिए स्मार्टफोन ऐप बेहद कारगर साबित हो सकते हैं बस, आप रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़े ऐप्स डाउनलोड कर अपने मांबाप की मदद करें.

जरूरी ऐप्स जो पेरैंट्स के काम आएं

डिजिटल इंपावरमैंट फाउंडेशन नई दिल्ली में बतौर आईटी विशेषज्ञ कार्यरत आनंद कुमार का कहना है कि आप रोजमर्रा के काम आने वाले ऐप्स को अपने पेरैंट्स के फोन में डाउनलोड कर उन की जिम्मदारियों को हलका करने में मदद कर सकते हैं, उदाहरणतया ऐप्स आधारित टैक्सियों के ऐप अपने स्मार्टफोन में इंस्टौल कर आप टैक्सी को बुक कर सकते हैं. ये टैक्सियां वाजिब दाम की होती हैं. 

शौपिंग ऐप्स

आईटी विशेषज्ञ आनंद कुमार के अनुसार इन ऐप्स की मदद से आप पेरैंट्स के लिए घर बैठे जरूरत का सामान मंगा सकते हैं, जिस से बाजार जाने से छुटकारा मिल जाता है. फ्लिपकार्ड, अमेजान, ओएलऐक्स जैसी तमाम कंपनियां ऐप्स के सहारे हर जरूरत का सामान होम डिलीवरी के माध्यम से मुहैया करवा रही हैं.

पत्रपत्रिकाएं व समाचार आधारित ऐप्स

अगर आप के पेरैंट्स पत्रपत्रिकाएं पढ़ने के शौकीन हैं तो उन के लिए न्यूज ऐप्स बेहद कारगर साबित हो सकते हैं. इस के लिए न्यूज चैनल, अखबारों, पत्रपत्रिकाओं के ऐप्स लोड कर पेरैंट्स इन खबरों को पढ़ व देख सकते हैं.  

लोकेशन आधारित ऐप्स

कभीकभी पेरैंट्स को किसी लौंग टूर पर जाना पड़े तो उन्हें पता होना चाहिए कि कौन से रास्ते का इस्तेमाल किया जाए, इस के लिए आप उन के फोन में लोकेशन आधारित ऐप्स लोड करें इन में से कई ऐप्स जीपीएस सिस्टम से जुड़े होते हैं, जो चलने वाले स्थान से ले कर पहुंचने वाले स्थान की डिटेल डालने के बाद लोकेशन बताते रहते हैं व वाइस व मैप के माध्यम से भी जानकारी देते हैं.  

ऐंटरटेनमैंट व स्पोर्ट्स आधारित ऐप्स

अगर आप के पेरैंट्स क्लासिकल गाने देखने व सुनने के शौकीन हैं तो उन के लिए तमाम ऐप्स उपलब्ध हैं. इस के अलावा वीडियो, फिल्म, गाने या अन्य जरूरी डाक्यूमैंट्री देखने के लिए यू ट्यूब्स का ऐप चलाने में सब से आसान माना गया है. इस के अलावा एमएस प्लेयर, सावन, बिग फ्लिक्स इत्यादि भी मनोरंजन उपलब्ध कराने का काम करते हैं.

वहीं अगर पेरैंट्स खेल की दुनिया में ज्यादा रुचि रखते हैं तो इस के लिए द स्कोर्ट ऐप कारगर साबित होगा. इस ऐप के सहारे फुटबौल, बास्केटबौल या अन्य खेल प्रतियोगिताओं के लाइव स्कोर व समाचार की जानकारी ली जा सकती है. अगर वे क्रिकेट के शौकीन हैं तो क्रिकवज नाम का ऐप क्रिकेट से जुड़ी जानकारी देने में मददगार साबित हो सकता है.

चैट व वीडियो कौलिंग आधारित ऐप्स

अगर आप पेरैंट्स से दूर रह कर पढ़ाई या नौकरी कर रहे हैं तो अपने पेरैंट्स से जुड़ाव के लिए उन के चैट आधारित ऐप्स का सहारा ले सकते हैं. ये न केवल बातचीत को आसान बनाते हैं बल्कि आप के पेरैंट्स की गतिविधियों व लाइव वीडियो दिखाने में भी मददगार साबित होते हैं. लाइव चैटिंग के लिए कुछ प्रमुख ऐप्स में व्हाट्सऐप, लिंबज, वाइबर, लाइन, वी चैट गिने जाते हैं. इन ऐप्स के माध्यम से वीडियोचैटिंग के साथसाथ वीडियो कौलिंग की सुविधा भी निशुल्क मिलती है.

यात्रा टिकट के साथी ऐप्स

अगर आप के पेरैंट्स कहीं यात्रा का प्लान बना रहे हैं तो ये ऐप्स उन के लिए एक मार्गदर्शक का काम कर सकते हैं. यात्रा का प्रमुख साधन माना जाने वाला रेल ऐप डाउनलोड कर न केवल घर बैठे टिकट बुक किया जा सकता है बल्कि टे्रनों की स्थिति, गंतव्य इत्यादि की जानकारी भी ली जा सकती है. इस के अलावा हवाई यात्रा टिकट व अन्य तरह की सुविधाओं का लाभ भी लिया जा सकता है.

स्मार्टफोन में ऐसे करे इंस्टौल

आईटी विशेषज्ञ आनंद कुमार के अनुसार अपने या अपने पेरैंट्स के स्मार्टफोन में जरूरी ऐप्स डाउनलोड करने के लिए गूगल प्ले स्टोर का सहारा ले सकते हैं. यहां से आप की जरूरत के ज्यादातर ऐप्स फ्री में डाउनलोड किए जा सकते हैं. प्लेस्टोर में जा कर ऐप्स से जुड़े कुछ शब्द टाइप करने होते हैं इस के बाद जिस चीज की जरूरत है उन से जुडे़ तमाम ऐप्स की लिस्ट आ जाती है. इन में से आप अपनी जरूरत के ऐप पर उंगली रख कर डाउनलोडिंग औप्शन चुन सकते हैं. बस, देर किस बात की, आप भी अपने पेरैंट्स की जरूरत के ऐप्स डाउनलोड कर उन का सहयोग कर सकते हैं.                                    

फैल रहा है सैक्सी कहानियों का करंट

‘‘हैलो दोस्तो, मेरा नाम सोनिया है. मैं राजस्थान के जोधपुर में रहती हूं. मेरी उम्र 24 साल है. मैं बहुत सैक्सी हूं और हमबिस्तरी के लिए नएनए मर्दों की तलाश में रहती हूं, जिस से ज्यादा से ज्यादा मजा ले सकूं.  मेरे उभार बहुत मोटे हैं और…

‘‘आज मैं आप को अपनी पहली हमबिस्तरी की कहानी बताने जा रही हूं. मैं तब 16 साल की थी और बहुत चंचल थी. मेरी एक सहेली थी रितु. वह भी मेरी तरह हमबिस्तरी की शौकीन थी. ‘‘एक दिन उस का फोन आया कि वह घर में अकेली है, रात को उस का बौयफ्रैंड आएगा. अगर तू चाहे तो आ जा, बड़ा मजा आएगा. ‘‘मैं झट से तैयार हो गई और मम्मीपापा से पूछ कर रितु के घर जा पहुंची और बैडरूम में जा कर जो नजारा देखा, तो मदहोश हो उठी. ‘‘रितु बगैर कपड़ों के अपने बौयफ्रैंड की गोद में बैठी थी, जो उस का अंगअंग मसल रहा था और चूम भी रहा था. यह देख कर मुझ से रहा न गया और मैं भी कपडे़ उतार कर उन की ओर लपकी…

‘‘यह कहानी आप सुन रहे हैं ‘कामुकता डौट कौम’ पर…’’

कचरा सैक्सी कहानी

इस तरह की और इस से भी ज्यादा सैक्सी कहानियां इन दिनों यू ट्यूब और गूगल पर धड़ल्ले से सुनी जा रही हैं, जिन में आवाज किसी लड़की की होती है, जो बेहद बिंदास और खुलेपन से इन्हें इस तरह सुना रही होती है कि सुनने वाले के बदन में बिजली का करंट दौड़ जाता है, क्योंकि कहानी सुना रही लड़की इसे अपनी आपबीती बताती है और अंगों के नाम भी ठीक वैसे ही लेती है, जैसे गालियों में इस्तेमाल किए जाते हैं. वह लड़की हमबिस्तरी को इस तरह बयां करती है कि सुनने वाले को लगता है कि सबकुछ सच है और उस की आंखों के सामने ही हो रहा है. ‘कामुकता डौट कौम’, ‘बैड टाइम हौट स्टोरी’ और ‘अंतर्वासना डौट कौम’ जैसी दर्जनभर पौर्न साइटों ने अपना बाजार बढ़ाने के लिए ग्राहकों की कमजोर नब्ज पकड़ते हुए उन्हें कहानियों के जरीए एक नई दुनिया में सैर कराने का मानो बीड़ा सा उठा लिया है.

सैक्सी कहानियां सुनने वालों को यह अहसास कराया जाता है कि कहानी सुनाने वाली लड़की सच बोल रही है, इसलिए बीचबीच में तरहतरह की आवाजें भी भर दी जाती हैं. आहें और सिसकियां भरती लड़की कमरे का हुलिया बताती है और सोफे, परदे का रंग भी बताती है और कहानी के मुताबिक चिल्लाने का दिखावा भी करती है. एक कहानी की मीआद तकरीबन 12 मिनट की होती है, जिस के खत्म होतेहोते सुनने वाला उस में इस तरह डूब जाता है कि उसे अपनेआप का होश नहीं रहता. सुनने वालों को लत लगाने के लिए ये साइट वाले रोज एक नई कहानी देते हैं, जिन में लड़की का नाम और उम्र बदल जाते हैं, शहर भी बदल जाते हैं,  कभी वह खुद को निपट कुंआरी बताती है, तो कभी शादीशुदा. ऐसी कहानियों में कोशिश यह भी की जाती है कि वे आम लोगों के तजरबे से मेल खाती लगे, इसलिए नजदीकी रिश्तेदारों से सैक्स की कहानियां भी इफरात से सुनवाई जाती हैं.

जीजासाली, देवरभाभी, भाभी या बहनोई का भाई, भाई का दोस्त जैसे दूर के रिश्तेदार तो अहम हैं, पर नजदीकी रिश्तेदारों मसलन मांबेटे, बापबेटी, भाईबहन वगैरह से हमबिस्तरी की भी कहानियों का ढेर है. ऐसी सैक्सी कहानियों को चटकारे ले कर सुनाने वाली सोनिया, रितु या सपना को तो कोई शर्म नहीं आती, उलटे वे इन्हें इस तरह सुनाती हैं कि जिस से लगता है कि उन्हें कतई शर्म, डर या पछतावा नहीं होता, बल्कि उन का मकसद मजे लूटना भर होत है.

इन कहानियों में दौड़ती ट्रेन या कार में हमबिस्तरी होती है, तो रेगिस्तान और समुद्री किनारे की सैक्सी कहानियां भी सुनवाई जाती हैं. इन कचरा कहानियों की मांग तेजी से बढ़ रही है.

ब्लू फिल्मों से उचटा जी

अब ब्लू कहानियां आसानी से स्मार्टफोन पर मिल जाती हैं. भोपाल के एक इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ रहे 20 साला छात्र सुयश का कहना है कि वह पहले ब्लू फिल्में देखता था, लेकिन उन में एक ही तरह के सीन बारबार दोहराए जाते हैं, इसलिए उन में उसे मजा नहीं आता था. दूसरे, ब्लू फिल्में चूंकि स्क्रीन पर चलती हैं, इसलिए किसी के आ जाने पर पकड़े जाने का डर भी बना रहता था. अब इन कहानियों को वह हैडफोन के जरीए बगैर किसी डर या हिचक के सुनता है और घर वालों को लगता है कि वह गाने सुन रहा है.

सुयश बताता है कि एक दोस्त के बताने पर उस ने पहली बार जब कहानी सुनी थी, तब शरीर में बिजली सी दौड़ गई थी, क्योंकि किसी लड़की के मुंह से अंगों के खुले शब्द सुनने का उस का यह पहला तजरबा था और हमबिस्तरी का आंखोंदेखा हाल. जिस तरह वह सुना रही थी, उस का भी अलग ही लुत्फ था. जब कंप्यूटर, टैलीविजन और स्मार्टफोन चलन में नहीं थे, तब लोग मस्तरामछाप नीलीपीली किताबें इफरात से पढ़ते थे, पर उन में दिक्कत यह थी कि साइज में छोटी और घटिया क्वालिटी के पन्नों पर छपी इन किताबों को छिपा कर रखना पड़ता था. इन्हें पढ़ कर फेंक देना या जला देना मजबूरी हो जाती थी. आज से तकरीबन 25-30 साल पहले ये किताबें तकरीबन 30 रुपए में मिलती थीं, जो महंगी होती थीं, पर इन की मांग इतनी होती थी कि इन की कमी हमेशा बनी रहती थी.

इस तरह की किताबें अभी भी मिलती हैं, पर इन्हें पढ़ने वाले न के बराबर बचे हैं, क्योंकि इलैक्ट्रौनिक आइटमों ने ब्लू फिल्मों को देखना आसान बना दिया है. लोग अब इन से भी ऊबने लगे, तो नया फंडा सैक्सी कहानियों का आ गया है. कई कहानियों में साहित्यिक शब्दों का भी इस्तेमाल किया जाता है, जिन्हें सुन कर लगता है कि इन्हें लिखने वाला माहिर कहानीकार है.

क्यों सुन रहे हैं लोग

विदिशा से भोपाल आनेजाने वाले बृजेश, जो 50 साल के हो चले हैं और 3 बच्चों के पिता भी हैं, का कहना है कि उन्होंने अभी 2 साल पहले ही स्मार्टफोन खरीदा है और वे उस का इस्तेमाल करना सीख गए हैं. पहले विदिशा से भोपाल के एक घंटे के रास्ते में उन्हें काफी बोरियत होती थी. वे पहले सैक्सी मैगजीन पढ़ते थे, लेकिन ट्रेन में खुलेआम पढ़ने में दिक्कत होती थी, इसलिए ऊपर की बर्थ पर जा कर कोने में मुंह छिपा कर पढ़ते थे. बाद में स्मार्टफोन में ब्लू फिल्में देखना शुरू किया, तो भी दिक्कत पेश आई, इसलिए टायलेट में चले जाते थे, पर वहां भी चैन नहीं था. देर हो जाती थी, तो बाहर से ही मुसाफिर दरवाजा खड़खड़ाना शुरू कर देते थे कि जल्दी निकलो. इसी हड़बड़ाहट में एक बार फोन कमोड से पटरियों पर जा गिरा, तो 6 हजार रुपए का चूना लग गया. अब बृजेश सुकून से ये ब्लू कहानियां सुनते हुए वक्त काटते हैं. वे हैड फोन लगा कर यू ट्यूब चालू करते हैं और कहानी शुरू हो जाती है जो भोपाल जा कर ही खत्म होती है.

बकौल बृजेश, ‘‘यह एक अलग किस्म का तजरबा है, जिसे लफ्जों में बयां नहीं किया जा सकता. घर पर उन्होंने बीवी को भी ये कहानियां सुनवाने की कोशिश की, पर वे इन्हें सुन कर भड़क गईं.’’

हर्ज भी क्या है

क्या ब्लू कहानियां सुनना हर्ज की बात है या इन से कोई नुकसान है? इस सवाल का जवाब ढूंढ़ पाना उतना ही मुश्किल काम है, जितना नीलीपीली किताबों के दौर में उन के नुकसान ढूंढ़ना हुआ करता था. ब्लू फिल्में धड़ल्ले से हर कोई देखता है. आलम यह है कि कई राज्यों के मंत्रीअफसर तक स्मार्टफोन पर इन्हें देखते पकड़े गए हैं. जाहिर है, ऐसी कहानियों से लोग टाइमपास करते हैं, सैक्स की अपनी भूख शांत करते हैं और नई उम्र के लड़के इन्हीं के जरीए सैक्स की बातें और गुर सीखते हैं. इन्हें किसी भी दौर में रोका नहीं जा सका है, न ही रोक पाने के लिए कोई कानून सरकार लागू कर पा रही है. सुप्रीम कोर्ट तक इस मामले में अपनी बेबसी जाहिर कर चुका है.

क्या ऐसी कहानियां गुमराह करती हैं? इस पर बहस की तमाम गुंजाइशें मौजूद हैं, इसलिए सुनने वालों को यह बात समझ लेनी चाहिए कि इन कहानियों का हकीकत से कोई लेनादेना नहीं होता और न ही इन्हें सुन कर सभी औरतों की इमेज वैसी समझनी चाहिए, जैसी कि इन कहानियों में तफसील से बताई जाती है.

जरूरत से ज्यादा और लगातार ऐसी कहानियां सुनना जरूर नुकसानदेह है, इसलिए सैक्स की अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए ऐसी कहानियां पढ़नी चाहिए, जिन में सैक्स साफसुथरे ढंग से पेश किया जाता है और जिन में कोई सबक भी अच्छेबुरे का मिलता हो.

दरअसल, ये कहानियां जोश पैदा करती हैं, जो हर्ज की बात नहीं. भोपाल के सैक्स रोगों के माहिर एक बुजुर्ग डाक्टर का कहना है कि इन्हें सुन कर उन लोगों में भी जोश आता है, जो सैक्स में ढीलापन या कमजोरी महसूस करते हैं. इस की एक अहम वजह यह भी है कि कहानी लड़की सुनाती है, जिस के मुंह से प्राइवेट पार्ट्स के नाम और हमबिस्तरी का खुला ब्योरा सुनना नए दौर का एक अलग तजरबा है. इन कहानियों के डायलौग भी वैसे ही होते हैं, जैसे आमतौर पर हमबिस्तरी के वक्त की जाने वाली बातचीत होती है. पर सुनने वालों को इन का आदी नहीं होना चाहिए. साफ दिख रहा है कि भविष्य में इन कहानियों की मांग और बाजार जोर पकड़ेगा. मुमकिन है कि कहानी गढ़ने वाले कामयाबी मिलती देख कुछ नए प्रयोग इन में करें, जिस से सुनने वालों की दिलचस्पी इन में न केवल बनी रहे, बल्कि बढ़े भी.

शादी का झांसा दे कर बलात्कार

आमतौर पर देखा गया है कि युवतियां पहले तो किसी युवक की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाती हैं या उस की दोस्ती कबूल कर लेती हैं. बाद में उन का यह दोस्ताना रिश्ता शारीरिक संबंधों तक पहुंच जाता है. यह युवक भी जानता है और युवती भी कि उन की शादी हो नहीं सकती, इस के बावजूद दोनों संबंध बना कर सुख भोगते रहते हैं. सामान्यत: कोई युवक शादी का झांसा दे कर या बहलाफुसला कर युवती से शारीरिक संबंध नहीं बनाता, लेकिन वक्त आने पर युवतियां उस पर शादी का झांसा दे कर बलात्कार करने या यौन शोषण का आरोप लगा कर उसे जेल भिजवाने से भी नहीं हिचकतीं.

कुछ प्रकरणों में तो युवतियों का कहना होता है कि पिछले 5 साल से वह शादी का झांसा दे कर यौन शोषण कर रहा था. प्रश्न यह है कि यदि वह बलात्कार था, तो 5 साल तक वे चुप क्यों बैठी रहीं? क्यों न पहले दिन या पहली बार में एफआईआर दर्ज कराई गई? इन 5 साल में उन्होंने कई बार संबंध बनाए, तब तो उसे कोई आपत्ति नहीं हुई, तो फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि रजामंदी को बलात्कार का स्वरूप दे कर उसे फंसा दिया?

कुछ युवतियां पैसे वाले लड़कों से दोस्ती करती हैं या उन्हें अपने प्रेमजाल में फंसाती हैं. उन के साथ हमबिस्तर होती हैं और उन के पैसों पर ऐश करती हैं. जब सामने वाला हाथ खींच लेता है, तो वह उसे ब्लैकमेल करने लगती हैं कि या तो वह उस की आर्थिक जरूरतें पूरी करता रहे या फिर झूठे मुकदमे में फंसने के लिए तैयार रहे?

अब यदि युवक ब्लैकमेल से बचने के लिए उसे धनराशि देता है तो उस की कभी खत्म न होने वाली चाहत बढ़ती जाती है, जो आर्थिक दृष्टि से उसे खोखला कर देती है. ऐसे में जिस दिन वह पैसे देना बंद कर देता है, उस पर शादी करने का झांसा दे कर बलात्कार करने का आरोप मढ़ दिया जाता है.

शादी का झांसा या वादा कर यौन शोषण करने के आरोप प्राय: बेतुके, झूठे और बेबुनियाद होते हैं. युवक लाख सफाई दे, रजामंदी से संबंध बनाने की दुहाई दे, लेकिन उसे सुनता कौन है, नतीजतन, बेकुसूर युवक को सजा हो जाती है.

यदि यह मान भी लिया जाए कि कभी युवक ने शादी करने का वादा किया था और अब उस से मुकर रहा है, तो यह वादाखिलाफी तो हो सकती है, पर बलात्कार नहीं. क्या वादाखिलाफी और बलात्कार एक ही अपराध है? तो फिर उसे बलात्कार के जुर्म में क्यों सलाखों के पीछे डाला जाए?

बलात्कार वह होता है जब कोई बलपूर्वक या डराधमका कर किसी युवती के साथ शारीरिक संबंध बनाता है. मैडिकल जांच से पता चल सकता है कि वह बलात्कार था या आपसी सहमति का नतीजा, क्योंकि बलात्कार में छीनाझपटी, कपड़ों का फटना, प्रजनन अंग में जख्म होना आदि बातें उजागर होती हैं, लेकिन यदि दोनों की सहमति से संबंध बनते हैं तो इस तरह के कोई लक्षण नजर नहीं आते.

जो युवती युवक पर शादी का झांसा दे कर संबंध बनाने जैसे इलजाम लगाती है, कोई उस से पूछे कि वह झांसे में आई क्यों? वह नासमझ तो है नहीं? यदि नाबालिग है तो यह उम्र नहीं शारीरिक संबंध बनाने की, उस ने अपनी सहमति क्यों दी? यदि वह बालिग है तो अपना भलाबुरा खुद जानती है, इस के लिए वह तैयार क्यों हुई?

आजकल मौडर्न सोसायटी या बड़े शहरों में साथ पढ़ने वाले अथवा नौकरीपेशा युवकयुवतियों में ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में रहने का चलन बढ़ रहा है. अपने घरपरिवार से दूर युवकयुवती एक कमरे में, एक छत के नीचे बगैर शादी किए रहते हैं, ऐसे युवकयुवतियां शादी को एक बंधन मानते हैं और इस बंधन में बंधना नहीं चाहते, पर शादी के बाद मिलने वाला सुख भोगना चाहते हैं.

न तो उन्हें ‘लिव इन’ में रहने के लिए कोई विवश करता है और न ही शारीरिक संबंध बनाने के लिए. रही बात शादी का झांसा देने की, तो इस का प्रश्न ही पैदा नहीं होता, क्योंकि शादी नहीं करनी थी, तभी तो वे ‘लिव इन’ में साथ हैं. इसलिए 10 साल तक ‘लिव इन’ में रहने के बाद युवक पर यौन शोषण का आरोप लगाना सरासर नाइंसाफी है.

एक बात यह भी है कि ‘लिव इन’ में रहने वाली युवतियां हों या युवक मौजमस्ती के लिए वे गर्भनिरोधक गोलियों अथवा अन्य साधनों का इस्तेमाल करते हैं ताकि गर्भ न ठहरे. जरा गौर कीजिए, क्या आज तक किसी ने कंडोम का इस्तेमाल कर बलात्कार किया है? तो फिर यह बलात्कार या यौन शोषण कैसे हो सकता है?

कई बार मंगेतर प्रेमीप्रेमिका जब एकांत में होते हैं तो परिस्थितिवश उन के कदम बहक जाते हैं और वे शादी का इंतजार किए बगैर शारीरिक संबंध बना लेते हैं. ऐसे में युवती या उस के परिजन उस से शादी करना नहीं चाहते तो उलटे उस पर बलात्कार का आरोप लगा कर उस से मुक्ति पाने का प्रयास करते हैं.

यदि आप शादी से पूर्व शारीरिक संबंध बनाने को गलत मानती हैं तो संबंध न बनाएं. एक सीमा तक ही उसे शारीरिक स्पर्र्श करने दें. शारीरिक संबंधों को ‘शादी के बाद’ के लिए छोड़ सकती हैं.

कोई भी युवक, प्रेमी या मंगेतर तब तक संबंध नहीं बनाता, जब तक कि युवती राजीखुशी तैयार नहीं होती या अपनी मौन स्वीकृति’ नहीं दे देती. यदि युवक पहल करता है और वह उस का मजा लेते हुए उसे सब कुछ करने देती है, तो फिर यह बलात्कार कैसे हुआ?

इस तरह के बलात्कार या यौन शोषण के मुकदमे दर्ज कराने वाली युवतियां खुद भी जानती हैं कि वह बलात्कार नहीं था. कई प्रकरणों में तो युवती उसे बलात्कार सिद्ध करने में असफल रही या युवक ने यह सिद्ध कर दिया कि जो कुछ हुआ वह दोनों की सहमति से हुआ. ऐसे में न्यायालय युवती को बलात्कार का झूठा मुकदमा दर्ज करने पर फटकार लगाता है तथा युवक को बरी कर देता है.

राजस्थान के बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष मनन चतुर्वेदी का मानना है कि छोटी उम्र में अगर जानेअनजाने में भी सहमति से संबंध बनाएं जाएं, तो उसे दुष्कर्म नहीं मानना चाहिए.

इस के व्यावहारिक पहलू को समझने की जरूरत है. ऐसे मामलों में अकसर युवक के खिलाफ पोक्सो ऐक्ट के तहत मामला दर्ज हो जाता है और उसे जीवन भर परेशानी होती है.

राजस्थान के राजसमंद जिले में अपने दौरे में अधिकारियों के साथ बैठक में मनन चतुर्वेदी ने कहा कि आजकल जितने भी पोक्सो ऐक्ट में दुष्कर्म के प्रकरण दर्ज हो रहे हैं जिन में बालक को दोषी ठहराया जा रहा है, उन में परामर्श की जरूरत है ताकि गलती दोबारा न हो.

मनन चतुर्वेदी ने आगे कहा कि उन्होंने कई आदिवासी इलाकों का दौरा किया और मातापिता तथा किशोरगृहों में रह रहे बच्चों से बात की, तो सामने आया कि उन्हें यह पता ही नहीं है कि वे क्या गलती कर बैठे हैं. उन्होंने कहा कि वे पोक्सो ऐक्ट को गलत नहीं मानतीं, लेकिन यह ऐक्ट लगाने से पहले बच्चों को समझाने की जरूरत भी है.

बच्चे फिल्में देख कर या किसी परिस्थिति में संबंध बना लेते हैं, मगर इस में कहीं न कहीं एकदूसरे की रजामंदी जरूर है. इस के लिए न सिर्फ स्वयंसेवी संगठनों की जिम्मेदारी से परामर्श देते हुए लोगों को प्रेरित करना होगा बल्कि पुलिस व प्रशासन को भी ध्यान देना चाहिए. चतुर्वेदी के बयान पर राजस्थान महिला आयोग की अध्यक्ष सुमन शर्मा ने कहा कि देखना होगा कि चतुर्वेदी ने किस संदर्भ में यह बयान दिया है.                    

उजले लोगों का काला धंधा

“हैलो, कैन आई टौक टू रवनीत मैम?’’ मोबाइल फोन पर किसी पुरुष की रौबदार आवाज उभरी. ‘‘यस, आफकोर्स.’’ दूसरी ओर से किसी युवती ने खनकती आवाज में पूछा.

‘‘मैम, मैं जयपुर से आया हूं, मेरा नाम करण है… करण शर्मा…’’ उसी रौबदार आवाज में पुरुष ने कहा, ‘‘दरअसल, मैं जयपुर में एक मीडिया हाउस में काम करता हूं. मेरे दोस्त ने रवनीत मैम का नंबर दिया था, इसीलिए फोन किया है.’’

‘‘यस, आई एम रवनीत स्पीकिंग.’’ उसी खनकती आवाज में युवती ने कहा.

‘‘मैम, मैं आप के कोचिंग सैंटर में अपने बेटे का एडमिशन कराना चाहता हूं, इसलिए आप से मिलना चाहता हूं.’’ करण ने फोन करने का मकसद बताया.

‘‘यस, आप कोटा आएं तो सीधे कोचिंग सैंटर आ जाएं, मुलाकात हो जाएगी.’’ युवती ने कहा.

‘‘मैम, मैं आज जयपुर से इसी काम के लिए कोटा आया हूं, आप कहें तो मैं आ जाऊं?’’ करण ने गुजारिश करने वाले अंदाज में कहा.

‘‘ठीक है, अभी एक बजा है, आप ऐसा कीजिए, 2 बजे तक आ जाइए. इतनी देर में मैं लंच कर लेती हूं.’’ रवनीत ने कहा.

‘‘ओके मैम.’’ करण ने कहा.

यह 4 जनवरी, 2017 की बात है. रवनीत कोटा के एक नामी कोचिंग इंस्टीट्यूट में पब्लिक रिलेशन (पीआर) का काम करती थी. इस इंस्टीट्यूट में आईआईटी-जेईई आदि परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती थी.

इस कोचिंग इंस्टीट्यूट में काम करते उसे अभी कुछ ही महीने हुए थे, लेकिन अपनी खूबसूरती और अच्छी अंगरेजी में लच्छेदार बातें करने की वजह से वह इतने कम समय में ही कोचिंग संस्थान के कामकाज से अच्छी तरह वाकिफ ही नहीं हो गई थी, बल्कि पब्लिक रिलेशन की जिम्मेदारी संभालने की वजह से कोचिंग इंस्टीट्यूट में अपने बच्चों का एडमिशन दिलाने के लिए तमाम प्रभावशाली लोग उस की मदद ले रहे थे. क्योंकि कोचिंग इस्टीट्यूट की मोटी फीस में वह कुछ रियायत भी करवा देती थी.

करण जैसे मीडियापर्सन का फोन आना रवनीत के लिए रोजाना की तरह सामान्य बात थी. उस समय दोपहर का एक बज चुका था. उस के पेट में चूहे कूद रहे थे. वह घर से लंचबौक्स लाई थी.

लंचबौक्स खोल कर सुकून से लंच करने के साथ वह अपने मोबाइल फोन पर वाट्सएप पर आ रहे वीडियो, फोटो व मैसेज भी देख रही थी. इस बीच एकदो फोन आए तो रवनीत ने उन्हें इग्नोर क र दिया.

रवनीत लंच खत्म कर के बैठी ही थी कि उस के केबिन में एक हैंडसम आदमी दाखिल हुआ. उस के साथ एक युवती भी थी. अंदर आते ही उस आदमी ने कहा, ‘‘हैलो रवनीत मैम, माईसेल्फ करण.’’

‘‘ओ यस, करण फ्रौम जयपुर?’’ रवनीत ने सवाल किया. लेकिन जवाब मिलने से पहले ही बोली, ‘‘प्लीज सिट.’’

‘‘रवनीतजी, मैं आप के कोचिंग में अपने बेटे के एडमिशन के लिए आया हूं.’’ करण ने अपने आने का मकसद बताते हुए कहा, ‘‘वैसे मैं जयपुर के एक मीडिया हाउस में काम करता हूं. पीआर में आप जैसे स्मार्ट चेहरे कम ही होते हैं. आप का चेहरा देख कर मुझे याद आ रहा है कि मैं ने आप को जयपुर में कहीं देखा है.’’

करण की इस बात पर रवनीत एकदम से हड़बड़ा उठी. फिर खुद को संभाल कर बोली, ‘‘जयपुर में… हां, दरअसल मैं ने जयपुर में पढ़ाई की थी न. शायद तभी कभी देखा होगा.’’

रवनीत की हड़बड़ाहट देख कर करण समझ गया कि वह सही ठिकाने पर पहुंच गया है. जिस रवनीत की तलाश में वह 10 दिनों से भटक रहा था, वह यही रवनीत है. करण ने उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘मेरा नाम करण शर्मा नहीं, मैं एसओजी का पुलिस इंसपेक्टर हूं. मेरे साथ यह महिला भी पुलिस इंसपेक्टर हैं. रवनीत, अब तुम्हारा भांडा फूट चुका है. तुम ने बहुत लोगों को अपनी सुंदरता के जाल में फांसा और उन्हें ब्लैकमेल कर के उन से करोड़ों रुपए वसूले. हम तुम्हें गिरफ्तार करने आए हैं.’’

इसंपेक्टर की बात सुन कर रवनीत के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. वह चेहरा छिपा कर फूटफूट कर रोने लगी. थोड़ा रो लेने के बाद उस ने हिचकियां लेते हुए कहा, ‘‘सर, मैं ने अब वह सब छोड़ दिया है. उन बदमाशों ने मुझ से चीटिंग की थी. इसलिए मैं ने उन का साथ छोड़ दिया है. इन बातों को काफी समय हो गया है. अब मैं शांति की जिंदगी जी रही हूं. प्लीज, मुझे शांति से जीने दीजिए.’’

‘‘तुम्हें जो कुछ भी कहना है, पुलिस स्टेशन चल कर कहना.’’ कह कर दोनों पुलिस अधिकारी रवनीत को हिरासत में ले कर कोचिंग इस्टीट्यूट से बाहर ले आए और वहां खड़ी गाड़ी में बैठा कर अपनी टीम के साथ सीधे जयपुर के लिए चल पड़े.

कोटा से जयपुर तक के लंबे सफर में रवनीत गुमसुम बैठी रही. जयपुर पहुंचतेपहुंचते रात हो गई थी. इसलिए रवनीत से उस दिन पूछताछ नहीं की जा सकी. अगले दिन सुबह एसओजी के अधिकारियों ने रवनीत से पूछताछ शुरू की. अधिकारियों ने उस से कहा कि वह इस बात को ठीक से जान ले कि पुलिस को उस के पूरे गिरोह का पता चल चुका है. कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया जा चुका है. इसलिए वह खुद ही बता दे कि उस ने किनकिन लोगों को अपने हुस्न के जाल में फांस कर उन से कितनी रकम ऐंठी है? इस काम में उस के साथ कौनकौन लोग शामिल थे?

रवनीत की कहानी जानने से पहले आइए यह जान लेते हैं कि पुलिस को उस के बारे में कैसे पता चला?

12 मई, 2015 को जयपुर के विद्याधरनगर इलाके में सैंट्रल स्पाइन स्थित अलंकार प्लाजा के सामने दिनदहाड़े 34 साल के हिम्मत सिंह की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. हमलावर 2 थे और मोटरसाइकिल से आए थे. हिम्मत सिंह हरमाड़ा थाने का हिस्ट्रीशीटर था. वह प्रौपर्टी का कारोबार करता था और जयपुर के राजपुरा हरमाड़ा के लक्ष्मीनगर में परिवार के साथ रहता था. जबकि वह मूलरूप से सीकर के राजपुरा गांव का रहने वाला था. बैनाड़ रोड पर मां भगवती प्रौपर्टीज के नाम से उस ने अपना औफिस बना रखा था.

थाना पुलिस इस मामले में कुछ नहीं कर पाई तो इस मामले की जांच एसओजी को सौंप दी गई. हिम्मत सिंह की हत्या के आरोप में करीब डेढ़ साल बाद दिसंबर, 2016 के दूसरे सप्ताह में एसओजी ने 2 लोगों को गिरफ्तार किया. इन में एक जयपुर के तिलकनगर का रहने वाला आनंद शांडिल्य था और दूसरा उत्तर प्रदेश के बिजनौर का रहने वाला अनुराग चौधरी उर्फ रानू.

अनुराग चौधरी जयपुर के विद्युतनगर में रहता था. दोनों से पूछताछ में पता चला कि हिम्मत सिंह की हत्या राजस्थान के कुख्यात अपराधी आनंदपाल सिंह ने कराई थी. आनंदपाल अदालत से जेल जाते समय पुलिस पर गोलियां चला कर फरार हो गया था. वह अभी भी पुलिस गिरफ्त से बाहर है.

आनंद और अनुराग आनंदपाल के सहयोगी थे. हिम्मत सिंह की हत्या जयपुर में हरमाड़ा के पीछे माचड़ा में एक जमीन पर कब्जे को ले कर की गई थी. इस जमीन पर हिम्मत सिंह की नजर थी, जबकि आनंदपाल की नजर पहले से ही उस जमीन पर थी. आनंदपाल के इशारे पर ही उस के गिरोह के लोगों ने हिम्मत सिंह की गोली मार कर हत्या की थी.

पुलिस आनंद और अनुराग से आनंदपाल और उस के गिरोह के बारे में पूछताछ कर रही थी. इसी पूछताछ में पुलिस के सामने एक नया खुलासा हुआ. आनंद शांडिल्य ने पुलिस को बताया कि जयपुर में एक ऐसा भी गिरोह सक्रिय है, जो हाईप्रोफाइल लोगों के साथ ब्लैकमेलिंग करता है.

इस काले धंधे में सारे बड़े लोग शामिल हैं. बड़े लोगों से मतलब वे लोग हैं, जो समाज में प्रतिष्ठा की नजर से देखे जाते हैं. इस गिरोह में कुछ वकील, पुलिस वाले, प्रौपर्टी व्यवसाई और फरजी पत्रकार भी शामिल हैं.

यह गिरोह खूबसूरत लड़कियों की मदद से रईस लोगों को ब्लैकमेल करता है. इस गिरोह के लोग पहले तो रईस लोगों की पहचान करते हैं, उस के बाद उन्हें फंसाने के लिए उन की दोस्ती गिरोह की खूबसूरत लड़कियों से करा देते हैं. दोस्ती के लिए वे फार्महाउसों पर सेलिबे्रट पार्टियां आयोजित करते हैं. इन पार्टियों में पीनेपिलाने का दौर चलता है.

उसी बीच लड़कियां शिकार को अपने मोबाइल नंबर दे देती हैं और उन के नंबर ले लेती हैं. इस के बाद पहले बातचीत और उस के बाद मुलाकातों का दौर शुरू हो जाता है. कुछ ही मुलाकातों में लड़कियां अपने शिकार को अपनी सुंदरता के मोहपाश में इस कदर बांध लेती हैं कि वे उन के साथ हमबिस्तर होने के लिए बेचैन हो उठते हैं.

शिकार को तड़पा कर लड़कियां हमबिस्तर होने का प्रोग्राम बनाती हैं. इस के लिए वे कई बार जयपुर से बाहर भी चली जाती हैं. रईसों के साथ उन के हमबिस्तर होने के समय गिरोह के सदस्य लड़की की मदद से गुप्त कैमरे से वीडियो क्लिपिंग बना लेते हैं. अगर इस में वे सफल नहीं हो पाते तो लड़कियां हमबिस्तर होने के बाद अपने अंतर्वस्त्र सुरक्षित रख लेती हैं.

इस के बाद उस रईस को धमकाने का काम शुरू होता है. लड़की अपने रईस शिकार को पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने की धमकी देती है. ज्यादातर मामलों में लड़कियां पुलिस में शिकायत कर भी देती हैं. इस के बाद फरजी पत्रकार और वकील का काम शुरू होता है. वे उस रईस को बदनामी का डर दिखा कर समझौता कराने की बात करते हैं. जरूरत पड़ने पर बीच में पुलिस वाले भी आ जाते हैं.

रईस अपनी इज्जत बचाने के लिए उन से सौदा करता है. रईस की हैसियत देख कर 10-12 लाख रुपए से ले कर एक करोड़ रुपए तक मांगे जाते हैं. गिरोह के लोग शिकार पर दबाव बनाए रखते हैं. आखिर रईस को सौदा करना पड़ता है. उस से पैसे लाने का काम अलग लोग करते हैं.

आनंद शांडिल्य ने पुलिस को बताया था कि यह गिरोह जयपुर सहित राजस्थान के बड़े शहरों के नामचीन प्रौपर्टी व्यवसायियों, बिल्डरों, मोटा पैसा कमाने वाले डाक्टरों, ज्वैलर्स, होटल रिसौर्ट संचालक और ठेकेदार आदि को अपना शिकार बनाता. इस काले धंधे में एक एनआरआई युवती भी शामिल है.

गिरोह के लोग लड़की को प्लौट या फ्लैट खरीदने के बहाने प्रौपर्टी व्यवसाई अथवा बिल्डर के पास भेज कर उसे फांस लेते हैं. इसी तरह होटल रिसौर्ट संचालक के पास नौकरी के बहाने भेजा जाता है तो डाक्टर के पास इलाज के बहाने. सौदा होने के बाद युवती और उस के गिरोह के सदस्य स्टांप पर लिख कर देते हैं कि दुष्कर्म नहीं हुआ है.

इस के पहले जयपुर में कभी इस तरह का कोई बड़ा मामला सामने नहीं आया था. इसलिए एसओजी के लिए हकीकत जानना अत्यंत महत्त्वपूर्ण था. अधिकारियों ने आपस में सलाहमशविरा कर के एसओजी के आईजी एम.एन. दिनेश के निर्देशन में हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग करने वाले गिरोह की खोजबीन शुरू कर दी.

उसी बीच इस गिरोह से पीडि़त जयपुर के वैशालीनगर निवासी डा. सुनीत सोनी ने एसओजी में शिकायत कराई कि उन का वैशालीनगर में हेयर ट्रांसप्लांट का क्लीनिक है. कुछ महीने पहले एक लड़की हेयर ट्रांसप्लांट कराने के लिए उन की क्लीनिक में आई. तभी उन का उस लड़की से संपर्क हुआ. लड़की ने जल्दी ही उन्हें प्रेमजाल में फांस लिया. इस के बाद दोनों पुष्कर गए और वहां एक रिसौर्ट में रुके. 2 दिनों बाद 2 लड़के मीडियाकर्मी बन कर आए और लड़की से दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराने की धमकी दे कर उन से एक करोड़ रुपए मांगे.

डाक्टर ने रुपए देने से मना किया तो लड़की ने उन के खिलाफ पुष्कर में दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करा दिया. जांच के बाद पुलिस ने डा. सुनीत सोनी को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. डाक्टर करीब ढाई महीने तक जेल में रहे. इस बीच डाक्टर से गिरोह के वकील सहित अलगअलग लोगों ने संपर्क किया.

गिरोह के सदस्यों ने अदालत में लड़की के बयान बदलवाने के लिए डाक्टर से डेढ़ करोड़ रुपए की मांग की. आखिर सौदा एक करोड़ रुपए में तय हो गया. पैसे लेने के बाद गिरोह के लोगों ने लड़की के बयान बदलवा दिए. उस समय डा. सुनीत सोनी ने जयपुर के थाना वैशालीनगर में इस मामले की रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी. लेकिन उस समय थाना पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की थी.

डा. सुनीत सोनी की शिकायत पर जांच करते हुए एसओजी ने 24 दिसंबर, 2016 को इस हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग करने वाले गिरोह का खुलासा किया. एसओजी ने गिरोह के 2 लोगों को गिरफ्तार कर लिया था. गिरफ्तार किए गए लोगों से पूछताछ की गई तो गिरोह में शामिल लड़कियों के बारे में पता चल गया. इन्हीं लोगों से गिरोह की एनआरआई लड़की रवनीत कौर उर्फ रूबी के बारे में पता चला था. इस के अलावा एक लड़की कल्पना उत्तराखंड की थी.

इस के बाद एसओजी इस पूरे गिरोह को गिरफ्तार करने में जुट गई. धीरेधीरे लोग पकड़े भी जाने लगे. एसओजी उत्तराखंड के ऊधमसिंहनगर से कल्पना को गिरफ्तार कर के जयपुर ले आई. पूछताछ में कल्पना ने बताया कि गिरोह ने उस की मदद से कई लोगों को अपने जाल में फांस कर मोटी रकम ऐंठी थी.

कल्पना से पूछताछ के बाद राजस्थान सशस्त्र पुलिस बल (आरएसी) के कांस्टेबल हरिकिशन को गिरफ्तार किया गया. उस ने गिरोह के लिए उत्तराखंड से अन्य कई लड़कियों को बुलाया था. कल्पना को भी वही लाया था.

गिरोह ने कल्पना को इस काम के लिए जो रकम देने का वादा किया था, वह रकम उसे नहीं मिली थी. इस के बाद उस ने गिरोह के सदस्य एक वकील को दुष्कर्म का केस दर्ज कराने की धमकी दी थी. इस से घबराए वकील ने कल्पना से सन 2015 में आमेर के एक मंदिर में शादी कर ली थी. वकील से शादी के बाद भी गिरोह कल्पना से हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग की वारदातों का काम लेता रहा.

कल्पना की गिरफ्तारी के बाद एसओजी का दल एनआरआई लड़की रवनीत कौर की तलाश में जुट गया. लेकिन समस्या यह थी कि अब तक रवनीत का गिरोह से पैसों के लेनदेन को ले कर विवाद हो गया था, जिस से वह गिरोह  से अलग हो गई थी. एसओजी को कहीं से जानकारी मिली कि रवनीत कोटा में है. जांच अधिकारियों को उस के फेसबुक एकाउंट का भी पता चल गया था.

इस के बाद एसओजी ने रवनीत के मोबाइल नंबर हासिल कर लिए. उस का नंबर मिल गया तो एसओजी की टीम कोटा पहुंच गई और एक पुलिस इंसपेक्टर ने रवनीत को जयपुर के मीडियाकर्मी करण के नाम से फोन किया. इस के बाद उसे किस तरह पकड़ा गया, आप शुरू में पढ़ चुके हैं. रवनीत कौर उर्फ रूबी से पूछताछ में उस की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

27 साल की रवनीत कौर उर्फ रूबी हांगकांग में पैदा हुई थी. उस के पिता पंजाब के फरीदकोट के रहने वाले थे. वह कारोबार के सिलसिले में हांगकांग गए थे. वहां उन का कामधाम जम गया तो वहीं उन्होंने भारतीय मूल की महिला से शादी कर ली.

रवनीत सन 2008 में ओवरसीज कार्ड पर अपनी दादी के पास जालंधर रहने आई. जालंधर से वह सन 2012 में जयपुर आ गई और एक यूनिवर्सिटी से उस ने 3 साल के बीबीए कोर्स में एडमिशन ले लिया. उसी यूनिवर्सिटी में एमबीए कर रहे कोटा निवासी रोहित से उस की दोस्ती हो गई. रवनीत कौर को बीबीए की पढ़ाई रास नहीं आई तो उस ने 2 साल बाद पढ़ाई छोड़ दी.

इस बीच रवनीत बीचबीच में अपने मातापिता के पास हांगकांग भी जाती रही. सन 2013 के अंत में उस के मातापिता ने कनाडा के एक एनआरआई बिजनैसमैन से उस की शादी तय कर दी. रवनीत भी उस से शादी करने को तैयार थी. इस का कारण यह था कि उस समय तक रवनीत की कोटा के रहने वाले रोहित से केवल दोस्ती थी.

दोस्ती इतनी आगे नहीं बढ़ी थी कि वह उस से शादी के बारे में सोचती. उस ने मातापिता से कहा कि शादी में वह जयपुर का लहंगा पहनेगी और वहीं से शादी के अन्य कपड़े और ज्वैलरी ले कर आएगी.

मातापिता ने उसे जयपुर से लहंगा और अन्य सामान लाने के लिए 8 लाख रुपए दे दिए. जयपुर आ कर रवनीत के 8 लाख रुपए खर्च हो गए मातापिता से शादी के सामान के लिए लाए पैसे खर्च हो गए तो रवनीत परेशान हो उठी. इस बीच उस की शादी भी टूट गई तो वह जयपुर में ही नौकरी की तलाश करने लगी. तभी वह इस गिरोह के संपर्क में आई. यह सन 2014 की बात है. गिरोह के इशारे पर रवनीत ने 6-7 लोगों को अपनी सुंदरता के जाल में फांस कर करोड़ों की वसूली की. सब से पहले उस ने एक बिल्डर को अपने हुस्न का जलवा दिखा कर उस से एक गोल्फ क्लब में मीटिंग तय की.

फ्लैट का सौदा करने दोनों में ही दोस्ती हो गई तो जल्दी ही दोनों में अनैतिक संबंध भी बन गए. बिल्डर के खिलाफ वकील ने इस्तगासा पेश करने की धमकी दी तो मीडियाकर्मी ने खबर चलाने की धमकी दी. गिरोह के इशारे पर रवनीत ने उस से एक करोड़ रुपए मांगे.

अंत में उस से 35 लाख रुपए वसूले गए. इस के बाद रवनीत को मोहरा बना कर गिरोह ने एक बिल्डर से 50 लाख, एक एक्सपोर्टर से 23 लाख, एक डाक्टर से एक करोड़ 5 लाख, प्रौपर्टी व्यवसाई से 80 लाख और रिसौर्ट मालिक के बेटे से 45 लाख रुपए वसूले.

ब्लैकमेलिंग से मोटी रकम मिली तो रवनीत ने हांगकांग जा कर अपने मातापिता को उन से लिए 8 लाख रुपए लौटा दिए. उस ने अपने घर वालों को बताया कि वह जयपुर में नौकरी करती है. उस ने उन से कोटा के अपने प्रेमी के बारे में भी बता दिया था.

उसी बीच रवनीत कौर उर्फ रूबी का गिरोह के लोगों से पैसों के बंटवारे को ले कर विवाद हो गया. इस की वजह यह थी कि गिरोह के सदस्य शिकार से तो मोटी रकम ऐंठते थे, लेकिन रवनीत को काफी कम पैसे देते थे. इसी बात को ले कर दिसंबर, 2015 के आखिर में रवनीत ने गिरोह छोड़ दिया.

इस के बाद रवनीत ने सन 2016 के शुरू में कोटा निवासी अपने प्रेमी रोहित से शादी कर ली. शादी के बाद वह कोटा चली गई, जहां वह महावीरनगर तृतीय में ससुराल वालों के साथ रहने लगी. बाद में उस ने कोटा की एक कोचिंग इस्टीट्यूट में नौकरी कर ली. उस इंस्टीट्यूट को छोड़ कर उस ने दूसरे कोचिंग इंस्टीट्यूट में करीब 4 महीने ही नौकरी की थी कि एसओजी ने उसे गिरफ्तार कर लिया था. रवनीत की गिरफ्तारी तक उस की ससुराल वालों को उस के कारनामों का पता नहीं था.

एसओजी ने उसे अदालत में पेश कर सुबूत जुटाने के लिए रिमांड पर लिया. उस की हैंडराइटिंग और हस्ताक्षरों के नमूने लिए, ताकि उस का शिकार बने लोगों को लिखित में दिए गए स्टांप पेपरों की लिखावट से मिलान किया जा सके.

स्टांप पर रवनीत कौर अपने हाथों से लिख कर हस्ताक्षर करती थी. स्टांप पर लिखे समझौतों और हस्ताक्षरों की मिलान के लिए अदालत में रवनीत कौर से लिखवा कर हस्ताक्षर कराए गए. इस के बाद इन्हें जांच के लिए विधिविज्ञान प्रयोगशाला भेजा गया.

इस गिरोह की दूसरी हसीना रीना शुक्ला और उस के सहयोगियों ने एक चार्टर्ड एकाउंटैंट से 70 लाख रुपए ऐंठे थे. हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोह का खुलासा होने पर एसओजी में इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई है. इसी के बाद एसओजी ने रीना शुक्ला, शंभू सिंह और किशोरीलाल को गिरफ्तार किया था.

किशोरीलाल सीए का दोस्त था. शंभू सिंह जयपुर के मानसरोवर में प्रौपर्टी का कारोबार करता था, जबकि रीना शुक्ला गरीब बच्चों का एक एनजीओ चलाती थी. रीना ने एक मासिक अखबार का रजिस्ट्रेशन भी करा रखा था. आरोपियों ने इसी अखबार के प्रैस कार्ड भी बनवा रखे थे. इन लोगों से पूछताछ में पता चला कि शंभू सिंह के प्रौपर्टी के व्यवसाय को वही सीए संभालता था.

रीना सन 2008 से शंभू सिंह के संपर्क में थी. शंभू सिंह के मार्फत रीना की दोस्ती सीए से हुई. रीना की मौसी कोटा में रहती थी. उस के पड़ोस में अनीता रहती थी. रीना ने अनीता को नौकरी दिलाने के बहाने सन 2013 में जयपुर बुलाया और सीए के माध्यम से एक कंपनी में नौकरी दिलवा दी, साथ ही रहने के लिए जयपुर के प्रतापनगर में एक फ्लैट किराए पर दिलवा दिया.

नवंबर, 2013 में रीना के रिश्तेदार की शादी में शरीक होने के लिए शंभू सिंह और अनीता राजस्थान के प्रतापगढ़ शहर गए. वहीं पर सीए अनीता के बीच अनैतिक संबंध बन गए. इस के सबूत रीना और अनीता ने एकत्र कर लिए. उन्हीं सबूतों के आधार पर उन्होंने सीए को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया.

रीना ने सीए से अनीता को एक लाख रुपए दिलवा कर कोटा भेज दिया. इस के बाद भी रीना और शंभू सिंह ने सीए को ब्लैकमेल करना जारी रखा. उन्होंने 6 महीने में उस से 10 लाख रुपए वसूल लिए.

किशोरीलाल को पता था कि रीना और शंभू सिंह सीए को ब्लैकमेल कर रहे हैं. उसी बीच सीए ने मानसरोवर स्थित अपना एक प्लौट सवा करोड़ रुपए में बेचा. किशोरीलाल ने सीए के प्लौट बेचने की बात रीना और शंभू सिंह को बता दी. सीए के पास मोटी रकम देख कर शंभू सिंह और रीना को लालच आ गया. उन्होंने सीए को धमकी दी कि अनीता कोर्ट में दुष्कर्म का इस्तगासा दर्ज करवा रही है. अगर समझौता करना हो तो वह एक करोड़ रुपए मांग रही है. उस ने मीडिया में भी मामला उजागर करने की धमकी दी.

इन धमकियों से सीए परेशान हो गया. वह आत्महत्या करने की सोचने लगा. इस के बाद शंभू सिंह के साथ मिल कर किशोरीलाल ने 70 लाख रुपए में सौदा करवा दिया. सीए ने अपने दोस्त किशोरीलाल को यह मामला निपटाने के लिए 70 लाख रुपए दे दिए. किशोरीलाल शंभू सिंह और रीना के साथ अनीता को यह रकम देने कोटा गया.

वहां उस ने 20 लाख रुपए खुद रखे और 50 लाख रुपए शंभू सिंह और रीना को दे दिए. रीना और शंभू सिंह ने अनीता को होटल में बुला कर एक समझौता पत्र तैयार किया. इस के बाद रीना ने समझौता पत्र और रुपए के साथ अनीता की एक फोटो ले ली.

शंभू सिंह और रीना ने अनीता को बताया कि सीए ने कोटा में कोई प्रौपर्टी खरीदी है, ये रुपए उन्हीं के हैं. वे प्रौपर्टी खरीदने के लिए सीए के दोस्त के साथ कोटा आए हैं. अनीता को बातों में उलझा कर रीना और शंभू सिंह ने उसे मात्र 10 हजार रुपए दे कर घर भेज दिया, बाकी रुपए दोनों ने अपने पास रख ली और सीए को समझौता पत्र और फोटो दे कर बता दिया कि समझौता हो गया.

एसओजी ने रीना और शंभू सिंह से अनीता के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि अनीता की 6 महीने पहले कैंसर से मौत हो गई है. एसओजी अधिकारियों को आशंका है कि कहीं मामले का खुलासा होने के डर से अनीता की हत्या तो नहीं कर दी गई. इस बात की जांच शुरू हुई. इस जांच में शंभू सिंह के बैंक लौकर से 15 से ज्यादा सीडियां मिली हैं, जिन्हें पुलिस ने देखा तो उन में तमाम लोगों की आपत्तिजनक फिल्में थीं. इस से स्पष्ट हो गया कि इन लोगों ने अन्य लोगों से भी पैसे ऐंठे हैं.

जांच में रीना और शंभू सिंह के उस झूठ का परदाफाश हो गया कि अनीता मर चुकी है. एसओजी ने कोटा निवासी अनीता चौहान को गुजरात के अहमदाबाद शहर से जीवित बरामद कर लिया.

पूछताछ में अनीता ने बताया कि वह अपने पति के साथ पिछले 3-4 महीने से अहमदाबाद में रह रही थी. उसे शंभू सिंह और रीना शुक्ला द्वारा उस के नाम पर सीए से 70 लाख रुपए ऐंठने की जानकारी नहीं थी. पूछताछ के बाद पुलिस ने अनीता को छोड़ दिया था. वह इस मामले में गवाह बन गई है.

जयपुर में इस तरह की ब्लैकमेलिंग करने वाले नएनए गिरोह सामने आ रहे हैं. एक अन्य गिरोह में तो एक सरकारी वकील के साथ कई लड़कियां शामिल थीं. उन्होंने स्पा मसाज सैंटर के नाम पर रईसों से मोटी रकम ऐंठी. एसओजी ने इस गिरोह की 2 लड़कियों वंदना भट्ट और पूनम कंवर को 11 फरवरी को गिरफ्तार किया.

इन्होंने एक साल में 6 रईसों से 60 लाख रुपए वसूल करने की बात स्वीकार की है. ये लड़कियां रईसों को मसाज पार्लर में बुला कर फांसती थीं. अनैतिक संबंध बनने के बाद थाने में शिकायत दर्ज करा कर वकील और उस के साथी उस रईस को फोन कर धमकाते थे और समझौता कराने के नाम पर 10 से 15 लाख रुपए ऐंठ लेते थे.

सौदा होने के बाद ये लोग पीडि़त को स्टांप पर समझौता लिख कर देते थे. एसओजी की जांच में सामने आया है कि हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोह ने ढाई साल में करीब 45 लोेगों से 20 करोड़ रुपए वसूले हैं.

इन में गिरोह के सरगना एक वकील और कुख्यात अपराधी आनंदपाल के साथी आनंद शांडिल्य के हिस्से में 2-2 करोड़ रुपए आए हैं. रवनीत कौर के हिस्से में डेढ़ करोड़ रुपए आए थे. बाकी रकम अन्य सदस्यों में बांटी गई थी. गिरोह के सरगना वकील ने 8 वारदातों के बाद आनंद शांडिल्य को अलग कर दिया था. इस का कारण यह था कि आनंद शांडिल्य ब्लैकमेलिंग की राशि लाता था तो उस में से 15-20 लाख रुपए पहले  ही खुद रख लेता था. इस के बाद लाई गई रकम में भी हिस्सा लेता था. इस बात का पता गिरोह के दूसरे सदस्य वकील को चल गया था.

इस हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग गिरोह में 4 वकील, 2 फरजी पत्रकार एवं एनआरआई युवती सहित करीब 30 लोग शामिल थे. गिरोह के सरगना वकील को एसओजी ने 9 फरवरी को गोवा से गिरफ्तार किया था. वहां भी उस के साथ एक युवती थी. उस युवती के बारे में जांच की जा रही है.

एक वकील को जयपुर से एक दिन पहले ही एसओजी ने गिरफ्तार किया था. फरार आरोपियों की तलाश में एसओजी जुटी हुई है. जयपुर बार एसोसिएशन ने गिरोह में शामिल वकीलों की सदस्यता रद्द कर दी है. बार कौंसिल के चेयरमैन एम.एम. लोढा ने 12 फरवरी को कहा है कि दुष्कर्म के झूठे केस में फंसा कर रुपए ऐंठने वाले वकीलों की सदस्यता बार कौंसिल से भी समाप्त कर दी जाएगी.        ?

– कथा पुलिस सूत्रों व अन्य रिपोर्ट्स पर आधारित

नूरः नारी प्रधान फिल्म के नाम पर अति कमजोर कथानक

पाकिस्तानी लेखिका सबा सय्यद के उपन्यास ‘कराची आर यू किलिंग’ पर बनी फिल्म ‘नूर’ अति कमजोर कहानी वाली फिल्म है. मगर फिल्म देखकर एहसास होता है कि लेखक ने पत्रकार, न्यूजरूम, संपादक की बहुत गलत कल्पना की है. यह अति कमजोर कथानक पर बनी निराश करने वाली फिल्म है.

फिल्म ‘‘नूर’’ की कहानी मुंबई की 28 वर्षीय पत्रकार नूरा रॉय चौधरी (सोनाक्षी सिन्हा) की है, जिसे सभी नूर कह कर बुलाते हैं. उनकी मां बचपन में ही गुजर गयी थीं. वह अपने पिता (एम के रैना) के साथ रहती हैं. उनके पिता ने घर में एक बिल्ली पाल रखी है और वह अक्सर बिल्ली के साथ ही समय बिताते हैं. यह बात नूर को पसंद नहीं आती.

उधर नूर की जिंदगी में दो दोस्त जारा पटेल (शिवानी दांडेकर) और शाद सहगल (कानन गिल)हैं. शाद का लंदन में अपना रेस्टारेंट है, पर वह अक्सर मुंबई में ही बना रहता है. नूर का बॉस शेखर दास (मनीष चौधरी) अपनी पत्नी लवलीन के पिता के चैनल के लिए खबरें व वीडियो इंटरव्यू आदि इकट्ठा करके देते हैं. नूर हमेशा इंसानी जिंदगी की सच्चाई को उकेरने वाली कहानियों पर काम करना पसंद करती है. पर शेखर दास उसे बार बार फिल्म जगत में दौड़ाते हैं.

जब शेखर दास नूर को सनी लियोनी का इंटरव्यू करने के लिए भेजते हैं, तो उसे गुस्सा आता है. नूर हमेशा बहुत बड़ी पत्रकार बनकर सीएनएन के लिए काम करने व एक अच्छे प्रेमी व पति की चाहत को लेकर सोचती रहती है. इसी बीच एक दिन नूर की मुलाकात सीएनएन में कार्यरत पत्रकार और फोटोग्राफर अयान मुखर्जी (पूरब कोहली) से होती है. नूर, अयान के करीब होने के प्रयास में लग जाती है.

अचानक एक दिन नूर को अपने घर में काम करने वाली मालती से पता चलता है कि कपाड़िया ट्रस्ट के डॉक्टर दिलीप शिंदे ने मालती के भाई विलास को नौकरी देने का लालच देकर उसकी किडनी निकाल ली. नूर को लगता है कि वह इसे ब्रेकिंग न्यूज के तहत देकर रातों रात बहुत बड़ी पत्रकार बन जाएगी. और सीएनएन में उसकी नौकरी पक्की हो जाएगी. मालती के मना करने के बावजूद नूर उसकी सुरक्षा की जिमेदारी लेते हुए मालती और उसके भाई विलास के इंटरव्यू की वीडियो रिकॉर्डिंग करती है. इस वीडियो रिकॉर्डिंग को देखकर शेखर दास कहते हैं कि इसका प्रसारण करना है या नहीं, इसका निर्णय दो दिन बाद करेंगे. पर नूर को जल्दी है.

उसे लगता है कि शेखर दास जानबूझकर अपनी पत्नी लवलीन के इशारे पर उसकी प्रतिभा को दबाने का काम कर रहे हैं. वह गुस्से में अयान से मिलकर सारी बात बताती है. अयान उस पर प्यार लुटाता है. नूर,अयान के साथ उसके होटल के कमरे में पहुंचती है. जब सुबह होती है, तो होटल कमरे के बिस्तर पर अयान व नूर के हालात देखकर समझा जा सकता है कि रात में दोनों के बीच शारीरिक संबंध बन चुके हैं. दोनों पूरी रात जगे हैं. अयान उससे कहता है कि वह रात की खुमारी उतारे, तब तक वह बाहर किसी से मिलकर वापस आता है.

शाम को जब सीएनएन पर नूर की विलास तांबे वाली स्टोरी अयान के नाम से चलती है, तो जारा नूर को फोन करती है. सच जानकर नूर को एहसास होता है कि वह ठगी गयी. वह तुरंत शेखर दास के पास पहुंचती है. शेखर दास उससे कहते हैं कि ‘‘अयान मुखर्जी तो ठग है. पत्रकारिता में ऐसा कई बार होता है. नूर, तुम बुद्धिमान हो, तुम्हें खबर पकड़ना आता है. मगर हर खबर पर रिसर्च करना जरुरी होता है. जो कि तुमने इस खबर में नहीं किया. डॉ शिंदे बहुत बड़े इंसान हैं. एक पत्रकार के साथ उसकी अपनी जिम्मेदारी को भूल गयी. तुमने खुद को बड़ा बनाने के चक्कर में यह नहीं सोचा कि मालती व विलास का क्या होगा. किसी भी सच्चाई को यूं ही नहीं दिया जाता. खबर को चार दिन बाद लोग भूल जाएंगे…’’

नूर मालती के घर जाती है, तो पता चलता है कि उसके घर पर ताला है. बाद में पता चलता है कि मालती और उसके भाई विलास को अगवा कर लिया गया है. नूर के पिता को धमकियां मिलती है. अब नूर को गलती का एहसास होता है. वह शा के साथ लंदन चली जाती है. कुछ दिन बाद पता चलता है कि विलास मारा गया. डॉ. शिंदे बरी हो गए. फिर नूर वापस आती है. लवलीन, नूर से कहती है कि उसने उसके पति शेखर पर विश्वास नहीं किया तथा चोट पहुंचाई है. फिर नूर रिसर्च करके फेसबुक पर रिपोर्ट लिखती है. जिसमें किडनी चोरी के पूरे जाल का पर्दाभास करने के साथ ही मुंबई शहर की कमजोरियों व कमियों को गिनाती है. रातो रात वह स्टार बन जाती है. डां शिंदे के खिलाफ गवाही देने के लिए सैकड़ो लोग आ जाते हैं. डॉ शिंदे गिरफ्तार हो जाते हैं. शाद, नूर के सामने शादी का प्रस्ताव रखता है.

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी अति धीमी गति से आगे बढ़ना और कमजोर कथानक है. फिल्म पत्रकार की कहानी कहती है, मगर फिल्म में पत्रकार, उसकी जिंदगी और उसके आस पास का ताना बाना ठीक से नहीं उकेरा गया. क्या एक चैनल के दफ्तर में बॉस यानी कि संपादक के अलावा महज नूर ही काम करती है? फिल्म की पटकथा में कसावट की बहुत ज्यादा जरुरत है. फिल्म के कुछ संवाद काफी हार्ड हीटिंग हैं. पटकथा लेखक ने नूर को एक आपदा के रूप में ही चित्रित किया है. पूरी फिल्म अवास्तविक लगती है. लेखक ने ‘न्यूज रूम’, संपादक व पत्रकार की जो कल्पना की है, वह भी गलत तथा अवास्तविक है.

गीत संगीत ठीक ठाक है. लोकेशन बेहतर है. यह फिल्म अपनी लागत वसूल कर पाएगी, इसमे संशय है. जहां तक अभिनय का सवाल है, तो एक बार फिर सोनाक्षी सिन्हा ने निराश ही किया है. पत्रकार के किरदार में वह पूरी तरह से विफल हैं. पूरी फिल्म में वह पत्रकार कम जोकर ही ज्यादा नजर आयी. शायद उन्हें इस बात का एहसास हो रहा था, इसीलिए नूर खुद को कई बार जोकर ही कहती है. वैसे भी जो इंसान खुद को जोकर कहेगा या समझेगा, वह पत्रकार हो ही नहीं सकता. इसके अलावा कानन गिल, मनीष चौधरी, स्मिता तांबे, शिवानी दांडेकर ने काफी सधा हुआ अभिनय किया है.

एक घंटे 54 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘नूर’’ का निर्माण टीसीरीज और विक्रम मल्होत्रा  ने मिलकर किया है. फिल्म के निर्देशक सुनहिल सिप्पी, संगीतकार अमाल मलिक तथा कलाकार हैं- सोनाक्षी सिन्हा, शिवानी दांडेकर, कानन गिल, मनीष चौधरी, पूरब कोहली, स्मिता तांबे व अन्य.

कहीं आपको अपराधी ना बना दे इंटरनेट

इंटरनेट एक सागर की तरह है जिसमें असीमित जानकारियां हैं. आप जितना ज्‍यादा उसमें खोजेंगे आपको उतनी ही जानकारियां उसमें मिलेगी.

लेकिन कई बार इंटरनेट पर गैर-कानूनी जानकारियां या अन्‍य चीजें भी पड़ी हुई होती हैं जिससे देखना या चलाना कानूनी रूप से स्‍वीकृत नहीं है. आइए जानते हैं कि इंटरनेट पर क्‍या-क्‍या स्‍वीकृत नहीं है.

टोरेंटिंग कॉपीराइट कन्‍टेंट

टोरेंटिंग करना कानूनी रूप से अनिवार्य है लेकिन इसके कॉपीराइट डेटा को सेव करना या उसका इस्‍तेमाल करना कानूनी रूप से अवैध है.

ऑनलाइन कम्‍यूनिटी में ट्रॉलिंग

ट्रॉलिंग, कोई नई बात नहीं है. लेकिन अगर इससे कोई व्‍यक्ति शोषण का शिकार बनता है तो यह कानूनी रूप से अपराध की श्रेणी में आता है.

साइबरबुलिंग

इंटरनेट पर की जाने वाली बुलिंग को साइबरबुलिंग कहा जाता है जो कि अपराध की श्रेणी में आता है. इसे कई श्रेणियों में बांटा जाता है. बच्‍चों को लेकर की जाने वाली साइबरबुलिंग सबसे जघन्‍य अपराध माना जाता है और इसके लिए कड़ी का प्रावधान कानून के द्वारा बनाया गया है.

वीडियो कॉल रिकॉर्ड करना

अगर आप अपने सामने वाले व्‍यक्ति की बिना सहमति के उसके साथ की जाने वाली वीडियो चैट को रिकॉर्ड करते हैं तो वह एक अपराध माना जाएगा.

नकली पहचान बनाना

अगर आप इंटरनेट का इस्‍तेमाल नकली पहचान बनाकर करते हैं तो यह गलत होगा. इंटरनेट के इस्‍तेमाल के लिए अपनी सही पहचान बनाना अनिवार्य होता है.

लाल बत्ती उतरने से कम न होगा वीआईपी कल्चर

फौरीतौर पर देखें तो लगता है कि लालबत्ती उतर जाने से वीआईपी कल्चर खत्म हो जायेगा. थोड़ा गहराई में जाये तो दिखता है कि लालबत्ती वीआईपी कल्चर को हाशिये पर ले जाने की पहली सीढ़ी है. हवाई जहाज के सफर से लेकर ट्रेन के सफर तक इसकी छाया का प्रभाव दिखता है. बड़े अफसर और नेता ही नहीं सत्ता पक्ष के पार्टी कार्यकर्ता तक प्रभावी होते हैं. वह भी वीआईपी कल्चर का एक हिस्सा होते हैं. बुंदेलखंड में पार्टी को संबोधित करते खुद सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि ‘विकास कामों में हड़बड़ी होने से बीजेपी कार्यकर्ता कानून हाथ में न ले. वे गलत काम की शिकायत अपने जनप्रतिनिधि और पदाधिकारियों से करें. विपक्ष में थे तो धरना प्रदर्शन सब चलता था. अब धरना प्रदर्शन पार्टी कार्यकर्ताओं का काम नहीं है.’

असल में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बहुत ही सरल तरह से बात को समझाने का प्रयास किया है. बहुमत की सरकार बनने के बाद भाजपा के नेताओं से अधिक भाजपा के साथ शामिल किये गये नेता और कार्यकर्ता सत्ता की हनक दिखा कर ठेका, रिश्वत, जमीनों मकानों के कब्जे के लिये झगड़ों को सुलझाने की आड़ में अफसरों से साठगांठ करने लगे हैं. यह दुखद हालात बन रहे हैं. जिस तरह का आरोप समाजवादी पाटी के कार्यकर्ताओं पर लग रहा था अब भाजपा में शामिल हुये कार्यकर्ता करने लगे हैं. भाजपा विधायक महेन्द्र सिंह यादव का टोल कर्मचारियों से मारपीट करना छोटा उदाहरण भर है. सरकार बनने के बाद कुछ लोग सरकार की छवि को दागदार बना रहे हैं. असल में इस वीवीआईपी कल्चर पर रोक जरूरी है.

केन्द्र सरकार ने वीआईपी कल्चर को कम करने के लिये लाल बत्ती लगी गाडियों से लालबत्ती उतराने का काम किया है. केन्द्र सरकार ने अमल के लिये 1 मई का समय दिया था. उसके पहले ही तमाम लोगों ने अपनी गाड़ियों से लालबत्ती उतारने का काम शुरू किया. लाल बत्ती कल्चर तभी खत्म होगा जब सत्तापक्ष के नेता, उनके समर्थक और अवसरवादी नेता तो भाजपा में सरकार बनने के समय शामिल हुये वह सयंम के साथ काम करे. अस्पताल जैसी जगहों पर जहां लोग लाइन में लगे हो संयम से काम ले. सड़क पर अपने वाहन से चलते समय दूसरी गाड़ियों को ठीक से पास दे.

केवल कानून बना देने या लालबत्ती उतारने से यह काम नहीं होने वाला. इसके लिये व्यवहार में बदलाव लाना होगा. खासकर सत्ता पक्ष और उससे जुड़े लोग सहनशीलता का प्रदर्शन करे और न्याय का साथ दे. लालबत्ती और हूटर का विरोध नया नहीं है. समय समय पर कई बार इसको रोकने और कम करने के प्रयास हुये हैं. इस प्रयास का सार्थक प्रभाव तभी दिखेगा, जब सत्ता पक्ष के लोग संयम से रहेंगे और अपने बीच में छिपे ऐसे लोगों को पहचान कर बाहर करेंगे जो पार्टी में घुसपैठ कर पार्टी की छवि को प्रभावित कर रहे हैं.      

आईपीएल 10 : जब दो भागों में टूट गया बल्ला

फटाफट क्रिकेट यानी की टी20 मैच तो हमेशा ही रोमांच से भरपूर होता है. और जब बात आईपीएल की हो तो क्या कहना. यह कहना गलत नहीं होगा की क्रिकेट के सभी प्रारूपों में आईपीएल सबसे ज्यादा प्रभावशाली और रोमांचक है.

आईपीएल में छक्के-चौकों की बरसात तो आम है लेकिन कोई शॉट खेलते हुए किसी बल्लेबाज का बल्ला टूट जाना तो खास है. आप सोच रहे होंगे की किसी खिलाड़ी का बल्ला कैसे टूट सकता है. दरअसल यह घटना राइजिंग पुणे सुपरजाइंट और गुजरात लायंस के बीच खेले गए मैच की है. यह वाकया उस मैच का है जिस मैच से गुजरात लायंस ने आईपीएल 10 में जीत का शंखनाद किया.

राइजिंग पुणे सुपरजाइंट ने पहली बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवरों में 8 विकेट पर 171 का स्कोर बनाया था. इसी दौरान मैच के 19वें ओवर में बल्लेबाजी कर रहे बल्लेबाज मनोज तिवारी का बल्ला टूटकर दो भागों में बंट गया. ये देखकर मैदान मैं बैठे कई दर्शक हंसने लगे. ये सबकुछ कैसे हुआ आइए आपको बताते हैं.

ये बात आरपीएस की पारी के 19वें ओवर की है. गेंदबाजी कर रहे थे प्रवीण कुमार और बल्लेबाजी कर रहे थे मनोज तिवारी. प्रवीण ने यॉर्कर लेंथ की गेंद फेंकी, तिवारी ने गेंद को मिड विकेट क्षेत्र में मारने की कोशिश की, गेंद बल्ले के निचले हिस्से में लगी और उनका बल्ला हैंडल के थोड़ी नीचे से टूटकर दो भागों में बंट गया. वैसे मनोज ने टूटे हुए बल्ले की परवाह नहीं की और दौड़कर दो रन पूरे किए.

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