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शादीशुदा औरत ने किया लड़के का रेप, वीडियो हुआ वायरल

अक्सर लोगो के मन में यही रहता है कि शारीरिक शोषण का शिकार सिर्फ महिलाएं ही होती हैं अगर आप यह सोचते हैं तो आप गलत हैं. कुछ ऐसी घटनाए भी सामने आई है जहा पर मर्दों को भी कुछ महिलायें अपनी इच्छाओं का शिकार बना लिया हैं.

अगर भारतीय कानून पर नजर डाले तो कानून यही कहता है कि महिला हो या पुरुष अगर उसके साथ जबरदस्ती की गयी है तो वो बलात्कार माना जाता है. इसी पर आधारित एक वीडियो सोशल मीडिया में बड़ी तेजी से वायरल हो रहा है.

जिसमे यह दिखाया गया है की एक महिला एक युवक के साथ जबरदस्ती करती है और उसके बाद पीड़ित युवक जब अपनी शिकायत लेकर थाने जाता है तो उसके साथ क्या होता है.

 

लालू ढूंढ रहे हैं सूटेबल बहू

राजद सुप्रीमो लालू यादव और उनकी बीबी राबड़ी देवी को ‘सूटेबल बहू’ की तलाश है. उन्हें ऐसी बहू चाहिए, जो उनका और उनके घर का ख्याल रखे. नौकरी करने वाली या राजनीति करने वाली बहू उन्हें कतई नहीं चाहिए. उन्हें सीधी-सादी और घरेलू लड़की ही चाहिए. लालू कहते हैं कि लड़की के लिए कोई खास क्राइटेरिया नहीं है. वह राबड़ी देवी जैसी सोच-विचार वाली सीधी-सादी लड़की खोज रहे हैं, जो हर हाल में साथ निभाए और परिवार का ख्याल रखे.

लालू-राबड़ी के बेटे तेजप्रताप यादव और तेजस्वी यादव बिहार के मोस्ट एलिजिबल बैचलर हैं. उनका बड़ा बेटा तेजप्रताप बिहार का स्वास्थ्य मंत्री है और छोटे बेटे तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री हैं. दोनों के लिए जोर-शोर से लड़की देखने और चुनने की कवायद शुरू कर दी गई है. लालू के दोनों बेटे 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव में पहली बार जीत हासिल कर विधान सभा पहुंचे थे और उसके बाद नीतीश सरकार में मंत्री बनाए गए थे. तेजप्रताप ने महुआ विधान सभा सीट से चुनाव जीता था और तेजस्वी यादव ने राघोपुर सीट से चुनाव जीता था.

लालू और राबड़ी दावा करते हैं कि वह अपने दोनों बेटों की शादी में दहेज नहीं लेंगे. राबड़ी इसमें एक बात जोड़ती हैं कि दहेज तो नहीं लेंगे, लेकिन कोई गाय देना चाहेगा तो जरूर ले लेगें. राबड़ी यह भी कहती हैं कि उन्हें गुणवान और सुंदर बहू चाहिए. तेजप्रताप भी विवाह को लेकर पूछे गए सवालों के जबाब में कहते हैं कि वह अपने माता-पिता की पसंद की लड़की से ही विवाह करेंगे.

लालू और राबड़ी के 2 बेटे और 7 बेटियां हैं. सातों बेटियों का विवाह हो चुका है. मीसा भारती, रागिनी, लक्ष्मी, हेमा, रोहिणी, चंदा और धुर लालू की बेटियां हैं. सभी अपनी परिवारिक जिम्मेवारियां संभाल रही हैं. बड़ी बेटी मीसा भारती को पिछले साल राज्य सभा का सदस्य बनाया गया था. उनके पति        शैलेश कुमार इंजीनियर हैं और उनके 2 बच्चे हैं.

पिछले साल यह हवा जोरों से चली थी कि योग गुरू बाबा रामदेव के किसी रिश्तेदार की बेटी से तेजप्रताप का विवाह तय हो चुका है और उसके बदले बिहार के हाजीपुर में रामदेव को डेयरी फार्म खोलने के लिए जमीन मुहैया की जाएगी. यह बात बाद में अफवाह साबित हो कर रह गई.

पिछले दिनों भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने चुटकी लेते हुए कहा था कि लालू यादव ने अपने बेटों को राजनीति में सेटल कर दिया है और अब उनकी शादी कर देनी चाहिए. मोदी के इस मजाक पर तेजप्रताप तैश में आ गए और कह डाला कि मोदी अपने बेटे का विवाह क्यों नहीं करते हैं? क्या वह नपुंसक है? उनकी इस बात पर बिहार की सियासत गरमा गई तो लालू और नीतीश को उस पर पानी डालने के लिए आगे आना पड़ा. तब मामला ठंडा पड़ा था और मोदी चुप हो गए थे.

बिहार के सियासी हलकों और राजद के अंदरखाने में यह चरचा गरम रहती है कि अकसर अपने ललाट पर चंदन-टीका लगा कर घूमने वाले 28 साल के तेज प्रताप अपने छोटे भाई तेजस्वी को उप मुख्यमंत्री बनाए जाने से खासे नाराज रहते हैं. इस बात को लेकर वह अपने पिता लालू यादव से भी नाराज रहते हैं. अकसर वह मंदिरों के चक्कर लगाते रहते हैं. कई बार देर रात को उठ कर भी किसी मंदिर की ओर निकल पड़ते हैं. कभी तेजप्रताप कभी कृ़ष्ण का रूप धर कर बांसुरी बजाने लगते हैं तो कभी हलवाई की दुकान में जलेबी छानने लगते हैं. कभी कुम्हार की चाक पर हाथ साफ कर मिट्टी के बर्तन बनाने लगते हैं.

सुकमा में नक्सलियों ने ऐसे मारा हमारे जवानों को, सामने आया VIDEO

हमारा देश अपनी सीमाओं पर देश के दुश्मन आतंकवादियों से जूझ रहा है, तो देश के अन्दर नक्सलियों से. या यूं कहें कि देश के लिए सिर्फ आतंकवाद ही नहीं नक्सलवाद भी एक बड़ी समस्या है. जिससे हमारे देश के जवानों की जाने जाती रहती हैं. देश के अन्दर इन नक्सलियों से सीआरपीएफ के जाबांज दो-दो हाथ करते हैं. आज भी भारतीय जवानों के दर्द को लेकर कोई चिंतित नजर नहीं आ रहा है.

हमारा देश तेजी से बढ़ रहा है लेकिन देश की इस समस्या का स्थाई समाधान नहीं निकल रहा है. इसका कारण तमाम मानवीय दृष्टिकोण भी हैं. लेकिन जिस तरह से हमारे जवान शहीद हो रहें हैं, ये एक चिंता का विषय है और हम सभी को इस मुद्दे पर गंभीर हो जाना चाहिए. हालांकि सरकार इस समस्या पर गंभीरता दिखाते हुए योजना बना रही है.

अभी बीते दिन सुकमा में हुए नक्सली हमले में 25 से ज्यादा जवान शहीद हो गए और बहुत से जवान गंभीर रूप से जख्मी हैं. आज हम आपको वीडियो के माध्यम से सैनिकों का दर्द दिखाने जा रहें हैं. इसमें जवानों ने बताया है कि किस तरह से लोग नक्सलियों का समर्थन करते हैं और सैनिको से नफरत करते हैं. जब आप इस वीडियो मे जवान की दर्द भरी दास्तान सुनेंगे तो भी आप भी भावुक  जायेंगे.

क्या आपने बनाया अपना बजट?

"बूँद बूँद से सागर बनता है" ये बात तो आपने सुनी ही होगी, जिसका अर्थ होता है कि यदि आप थोड़ी राशि से भी प्रारंभ करते हैं तो समय के साथ ये बड़ी हो जाती है. स्मार्ट लोग वे होते हैं जो अपनी आय और खर्च में संतुलन रखते हैं और उसमें से बचत भी करते हैं. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितना कमाते हैं. फर्क इस बात से पड़ता है कि आप बिना किसी तकलीफ के कितनी बचत कर पाते हैं और कितनी आसानी से अपनी जरुरतें पूरी करते हैं.

किसी भी चीज के पहले अपना बजट बनायें, अपने खर्चों की योजना बनायें, एक डायरी बनायें या यदि आप टेक्नोलॉजी को पसंद करते हैं तो ऐसे ऐप्स डाउनलोड करें जो आपके खर्चों पर नजर रखने में सहायक हों. आम तौर पर हम छोटी राशि पर ध्यान नहीं देते जो समय के साथ बड़ी राशि में बदल जाती है.

यहां हम आपको पैसों की बचत के कुछ ऐसे तरीके बताने जा रहे हैं, जिन्हें आपको अनदेखा नहीं करना चाहिए-

किराने के सामान का बजट

अपना बजट प्लान करें और किराना सामान की सूची बनायें अन्यथा आप व्यर्थ चीज़ें खरीद लेंगे. लिस्ट बनाने से सहायता मिलती है और आप व्यर्थ का सामान नहीं खरीदते. लिस्ट बनाते समय आओ त्योहारों का और आने वाले मेहमानों का ध्यान रखें.

ऑनलाइन और ऑफलाइन कीमतों की तुलना

ऑनलाइन और ऑफलाइन कीमतों में फर्क होता है. जो चीज़ों आप खरीदना चाहते हैं उनकी तुलना करें और किस पर अधिक छूट मिल रही है. कीमत के अलावा ऑनलाइन रिव्यूज़ भी देखें, उदाहरण के लिए जैसे जब आप मोबाईल खरीदते हैं तो पहले ऑनलाइन रिव्यूज देखें.

दवाओं पर बचत

मेड प्लस या अपोलो फॉर्मेसी से दवाएं खरीदें क्योंकि वे आपको बिल पर कुछ डिस्काउंट (छूट) देते हैं. इन फॉर्मेसी से दवाएं खरीदने का एक अन्य लाभ यह है कि आप दवाईयों का पता लगा सकते हैं और यदि आपको कोई लॉग-इन आईडी दिया गया है तो आप दवाईयों की लिस्ट डाउनलोड भी कर सकते हैं. इसे आप टैक्स भरते समय जमा भी कर सकते हैं.

लग्जरीज पर खर्च को करें सीमित

यदि आप वास्तव में एक ब्रेक चाहते हैं, डिनर या मूवी पर जाना चाहते हैं तो पहले प्लानिंग कर लें अति उत्साह के चक्कर में आपके ज्यादा पैसे खर्च हो सकते हैं. विभिन्न वेबसाइट चेक करें जिनमें रेस्टॉरेंट पर मिलने वाली छूट के बारे में जानकारी होती है. मूवी बुक करने पहले ऑपरेटर के ऑफर या अन्य किसी कार्ड के बारे में जानकारी प्राप्त करें क्योंकि इन ऑपरेटर के कुछ बैंकों के साथ टाईअप होते हैं.

ऑफर्स की जांच

यदि आप कुछ बड़ा खरीदने की योजना बना रहे हैं तो त्योहारों के मौसम का इंतज़ार करें क्योंकि इस समय बहुत डिस्काउंट मिलते हैं. कई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बनाने वाली कंपनियां त्योहारों के दौरान बड़े ऑफर देती हैं और कुछ कंपनियों में एक्सेंज ऑफर भी होता है.

अनावश्यक चीजों को बेचना

यह पैसा कमाने का आसान तरीका है. आप अनावश्यक चीज़ों को बेचकर पैसा कम सकते हैं. हालाँकि आपको चीजें बेचने की इच्छा बनानी होगी.

क्रेडिट कार्ड का उपयोग न करें

यह एक आम सी सलाह है जो हर कोई देता है. यदि आपको ऐसा करना कठिन लग रहा है तो कम लिमिट वाला क्रेडिट कार्ड का उपयोग करें. क्रेडिट कार्ड का उपयोग टालने का मुख्य उद्देश्य अनावश्यक चीजों को खरीदने से बचना है. क्रेडिट कार्ड से बचत करने के लिए क्रेडिट कार्ड के पॉइंट्स पर नज़र रखें और जब भी आवश्यक हो, इसका उपयोग करें. कार्ड का उपयोग उन स्थानों पर करें जहाँ सरचार्ज न लगता हो, जैसे फ्यूल स्टेशन.

कार और अन्य लक्ज़री वस्तुओं का उपयोग टालें

जब भी संभव हो कार की जगह बाइक का उपयोग करें. इन छोटे छोटे तरीकों से आपका ईंधन पर होने वाला खर्च कम होगा और आपका स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा.

पैसे को व्यर्थ न पड़ा रहने दें

अपने पैसे को काम में लगायें, अपनी बचत को निवेश में डालें. कई बैंक ऑटो स्वीप की सुविधा प्रदान करते हैं. इसका अर्थ यह है कि यदि आपके खाते की राशि एक निश्चित सीमा से ऊपर जाती है तो यह अपने आप ही फिक्स्ड डिपॉजिट में परिवर्तित हो जाता है. आपको एफडी (फिक्स्ड डिपॉजिट) पर मिलने वाले ब्याज का लाभ मिलता है.

अपना वित्तीय ज्ञान बढ़ाएं

वित्तीय समाचारों के बारे में अपडेट रहने से आपको कई तरीकों से लाभ हो सकता है जैसे बैंक के जमा खाते में वृद्धि या कमी या डेबिट और क्रेडिट कार्ड पर मिलने वाले ऑफर आदि. किसी भी वित्तीय दस्तावेज को खरीदने से पहले उसे ध्यान से पढ़ लें और सोच समझकर निवेश करें.

अभिनेता विनोद खन्ना का निधन

पिछले कुछ समय से मुंबई के अस्‍पताल में भर्ती दिग्‍गज एक्‍टर विनोद खन्‍ना का निधन हो गया है. वह पिछले कुछ समय से कैंसर से जूझ रहे थे. विनोद खन्‍ना का 70 साल की उम्र में निधन हुआ है. फिल्‍मों से लेकर राजनीति तक में विनोद खन्‍ना काफी सक्रिय रहे थे. विनोद खन्ना का मुंबई के एचएन रिलायंस अस्पताल में इलाज चल रहा था. हाल ही में उनकी एक फोटो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी, जिसके बाद उनके बेटे ने कहा था कि उनक तबियत अभी ठीक है. विनोद खन्‍ना भारतीय फिल्‍मों के दिग्‍गज अभिनेता रहे हैं.

विनोद खन्ना के अस्‍पताल में भर्ती होने के बाद से ही उनके स्वास्थ्य के लिए पूरा हिंदी सिनेमा जगत दुआएं कर रहा था. सलमान खान आधी रात को विनोद खन्ना से मिलने सर एचएन रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल पहुंचे थे. सलमान खान पहले भी विनोद खन्ना के साथ कई फिल्में कर चुके हैं और उन्हें अपना लकी मैस्कट और मेंटर मानते रहे हैं. सलमान के अलावा महाराष्‍ट्र के सीएम देवेंद्र फड़णवीस भी उन्हें मिलने पहुंचे थे. वहीं, अभिनेता इरफान खान ने भी विनोद खन्ना के स्वास्थ्य की कामना करते हुए उनके लिए अंगदान की भी पेशकश की थी. 

भारत ही नहीं दूसरे देश के लिए भी खेलते हैं ये खिलाड़ी

यूं तो क्रिकेट का खेल 16वीं शताब्दी से ही खेला जा रहा है, लेकिन 19वीं और 20वीं सदी में इस खेल को पूरे विश्व में पहचान मिली. यह सच ही कहा गया है कि क्रिकेट खेल है अनिश्चिताओं का, रोमांच का. इस खेल में कब किस टीम का, खिलाड़ी का पासा पलट जाए कुछ कहा नहीं जा सकता.

1844 से ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेला जा रहा है लेकिन 1877 में इसे विश्व स्तर पर पहचान मिली. 19वीं सदी से ही खेल लोकप्रिय हो गया था बावजूद इसके भारतीय टीम ने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच साल 1932 में खेला था.

भारत में तो क्रिकेट का पदार्पण 20वीं सदी में हुआ लेकिन आज यह खेल भारत में धर्म माना जाता है. भारत ने ही दुनिया को क्रिकेट का भगवान दिया. क्रिकेट इतिहास में कई ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने दो देशों की तरफ से क्रिकेट खेला. तो ऐसे में भारतीय खिलाड़ी कैसे पीछे रह सकते थें.

आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत में ऐसे कई खिलाड़ी हुए हैं जिन्होंने क्रिकेट में अपना पदार्पण तो भारतीय टीम की ओर से किया लेकिन बाद में वे दूसरी टीमों की ओर से भी खेलते नजर आए. कुछ ऐसे क्रिकेटर भी हुए जिन्होंने भारत की सरजमीं पर अपने क्रिकेट करियर की शुरुआत की, लेकिन बाद में उन्होंने दूसरी टीमों की ओर से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलना शुरू किया. आइए आज हम आपको बताते हैं इन क्रिकेटरों के बारे में.

गुल मोहम्मद

गुल मोहम्मद ने साल 1946 में भारतीय टीम की ओर से टेस्ट मैचों में अपना डेब्यू किया था. गुल ने भारत के लिए कुल 8 टेस्ट मैच खेले. साल 1947 में भारत-पाक बंटवारे के 8 सालों बाद वर्ष 1955 में गुल को पाकिस्तान की नागरिकता मिल गई और वह पाकिस्तान की ओर से टेस्ट मैच खेलने लगें. साल 1921 में जन्में गुल ने साल 1938 रणजी ट्रॉफी में उत्तर भारत की ओर से डेब्यू किया था.

आमिर एलाही

आमिर एलाही उन 20 क्रिकेटरों में से एक हैं जिन्होंने सबसे ज्यादा उम्र में क्रिकेट खेला. एलाही ने भारतीय टीम के लिए एकमात्र टेस्ट मैच साल 1947 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सिडनी में खेला था. इसके बाद एलाही ने साल 1952-53 में पाकिस्तान के लिए 5 टेस्ट मैच खेले. संयोगवश ये सभी टेस्ट मैच उन्होंने भारत के खिलाफ खेले.

अब्दुल हफीज करदार

आजादी के बाद भारत और पाकिस्तान दो मुल्कों में बंट गए और इस तरह पाकिस्तान की क्रिकेट टीम भी अलग टीम बनी. इस नई पाकिस्तान टीम के कप्तान अब्दुल हफीज करदार बनें जो पहले भारतीय क्रिकेट टीम की ओर से टेस्ट मैच खेल चुके थे.

कृष्णा चंद्रन

कृष्णा चंद्रन ने अपना लिस्ट ए डेब्यू केरल की ओर से किया था. बाद में उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात की ओर से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया.

स्वप्निल पाटिल

स्वप्निल पाटिल मुंबई के रहने वाले हैं. उन्होंने मुंबई की ओर से अंडर-19 और अंडर-22 में क्रिकेट खेला और उसके बाद वह काम की तलाश में यूएई चले गए. इसी दौरान उन्हें क्रिकेट खेलने का मौका मिला, पाटिल ने यूएई की टीम की ओर से डेब्यू करने का मौका मिला.

शक्ति गौचन

शक्ति मुंबई के रहने वाले हैं. उन्होंने मुंबई की ओर से अंडर 15 और अंडर 17 में क्रिकेट खेला और उसके बाद वह नेपाल की टीम में शामिल हो गए. शक्ति नेपाल के अंतरराष्ट्रीय शतक बनाने वाले दूसरे क्रिकेटर बन गए. 2005 में आईसीसी विश्व कप क्वालिफाइंग सीरीज दौरान इटली के खिलाफ उन्होंने 103 गेंदों पर नाबाद 106 रन बनाए.

ऑफिस में बोर हो रही थी लड़की, तो बाथरूम जाकर कर डाला ये काम

इंसान अकेला पड़ने पर बोर होने लगता है. वह कई तरह की बातें सोचने लगता है. उसका दिमाग कहीं और ही भटकने लगता है. इसी बोरियत से बचने के लिए वह न जाने क्या-क्या काम करने लगता है. लेकिन हम यहां पर आज आपसे पार्न स्टार के बारे में बात कर रहे हैं जिसने बोर होने पर कुछ ऐसा किया जो कोई भी इस बारे में नहीं सोच सकता.

पार्न स्टार पेज जेनिंग्स मात्र 23 साल की थी और वाल स्ट्रीट में नौकरी करती थी. कुछ समय आफिस जाने के बाद पेज जेनिंग्स को आफिस में बोर लगने लगा और उसे आफिस का काम में भी बोरियत आने लगी. और फिर इन्होने बाथरूम में अपनी न्यूड सेल्फी ली और इतना ही नहीं इस न्यूड सेल्फी को एक पोर्न रियेलिटी शो सेक्स फैक्ट्र को भेज दी.

कुछ लोगों ने ट्विटर पर उसकी तारीफें की हैं. पेज का पोर्न इंडस्ट्री में नाम वेरोनिका वेन है.

इसलिए खत्म नहीं होती नक्सली हिंसा

अब कहां पहले सी सामाजिक असमानता और जमींदारी रही, अब तो आदिवासी मुख्यधारा से जुड़ कर सुविधाजनक जिंदगी जी रहे हैं, उनके बच्चे पढ़ने स्कूल जाने लगे हैं, आदिवासियों के हाथ में अब तीर कमान नहीं बल्कि सेलफोन हैं और तो और अब उनका पहले जैसा शोषण भी नहीं होता, जैसी बातें करने वाले लोग कभी बस्तर गए हों ऐसा लगता नहीं, इसलिए उन्हें अपनी यह गलतफहमी दूर करने एक दफा बस्तर जरूर जाना चाहिए, वहां के जंगलों में बसे इन आदिवासियों की जिंदगी को नजदीक से देखना चाहिए तब शायद उन्हें समझ आए कि सब कुछ ज्यों का त्यों है और जो बदलाव आए बताए जाते हैं उनकी छोटी सी झलक धमतरी नाम के कस्बे तक ही ढूंढने पर ही दिखती है.

बीती 24 अप्रेल को सुकमा के नक्सली हमले में फिर एक बार सीपीआरएफ के 25 जवान मारे गए तो एक बात और प्रमुखता से कही गई कि अब तो नक्सली वसूली करने लगे हैं और नक्सलवाद कोई मुहिम नहीं, बल्कि एक धंधा बन चुका है, इसलिए सरकार को देर न करते हुये तुरंत वैसी सर्जिकल स्ट्राइक करनी चाहिए जैसी 18 सितंबर 2016 को जम्मू कश्मीर के उरी में सैनिक कैंप पर हुये आतंकी हमले में 20 सैनिकों के शहीद होने के बाद की थी. इस मुहिम में आतंकी ठिकानों पर सैन्य हमला करके उन्हें धव्स्त कर दिया गया था.

यह सुझाव या आइडिया नहीं बल्कि माओवादियों के खिलाफ एक स्वभाविक आक्रोश भर है जिसे पेश करने वाले लोग न तो नक्सली इतिहास से वाकिफ लगते हैं और जैसा कि ऊपर बताया गया कि न ही आदिवासियों की शाश्वत बदहाली से परिचित हैं. इसमे उनकी कोई खास गलती भी नहीं क्योंकि यही लोग महसूसते भी हैं कि अगर माओवादियों को खत्म करना अगर इतना आसान काम होता तो वह  कभी का हो चुका होता. तो फिर दिक्कत क्या है और क्यों सरकार और उसका भीमकाय दिखने वाला तंत्र नक्सलियों के सामने कमजोर पड़ जाता है.

इस सवाल का जबाब बेहद साफ है कि नक्सली आंदोलन सिर्फ इसलिए वजूद में है कि उसकी जरूरत अभी खत्म नहीं हुई है. यहां मकसद नक्सली हिंसा का समर्थन करना नहीं, बल्कि बहुत साफ तौर पर यह बताना और जताना है कि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों खासतौर से बस्तर में आदिवासी अब भी शोषण का शिकार हैं और सरकार या सेना पर कतई भरोसा नहीं करते, जो हर कभी उन्हें नक्सलियों के मुखबिर होने के इल्जाम में या फिर किसी भी आदिवासी को नक्सली करार देकर ऐसी यातना देती है कि उन्हें इस कहर से बचने नक्सलियों की शरण लेने में ही भलाई लगती है.

भोपाल और रायपुर के कुछ आदिवासी युवाओं से बात करने पर पता चलता है कि अब स्थानीय पुलिस वालों की भूमिका मूक दर्शक की सी रह गई है, जो नक्सलियों के बारे में काफी कुछ जानते हैं और मुमकिन है उनकी मदद भी करते हों, क्योंकि माओवादी उन्हें नहीं मारते, उनके निशाने पर सीपीआरएफ जैसी केंद्रीय एजेंसियां ही रहती हैं, जिन्हे हर आदिवासी नक्सली नजर आता है और वे हर कभी हर कहीं जमीदारों जैसा जुल्म उन पर करते हैं और आदिवासी औरतों को बेइज्जत करने से भी नहीं चूकते, उलट इसके अपनी रेड कारीडोर में समांतर सरकार चला रहे माओवादी घूसखोर मुलाजिमों से आदिवासियों को बचाते हैं, इसलिए वे आदिवासियों को ज्यादा विश्वसनीय लगते हैं, अगर न लगते होते तो उन्हे खत्म करने के लिए सरकार को न तो जगह जगह मिलिट्री केंप लगाना पड़ते और न ही खरबों रुपये नक्सली उन्मूलन अभियान पर फूंकना पड़ते, जिसका कोई सार्थक परिणाम आज तक नहीं निकला है.

बस्तर के गीदम कस्बे के  एक युवा की  माने तो यह भी सच है कि कई आदिवासी नक्सलियों की आर्थिक सहायता करते हैं, पर उसकी वजह डर नहीं बल्कि मिलिट्री सूदखोर बनियों  और घूसखोर सरकारी मुलाजिमों के कहर से बचाने का मेहनताना या नजराना जो भी समझ लें है. कई दफा ऐसा लगता भी है कि मेहनती और भोला भाला आदिवासी इन दो पाटों के बीच पिसता अपने आदिवासी होने की सजा भुगत रहा है, यह युवक मानता है कि कई बार नक्सली भी पुलिस का मुखबिर होने के शक में आदिवासियों पर कहर ढाते हैं, लेकिन  ऐसा अक्सर वे यकीन हो जाने के बाद करते हैं, इसलिए निर्दोष आदिवासी उनसे कोई डर या खतरा नहीं महसूसते यानि सीधी और स्पष्ट लड़ाई सरकारी एजेंसियों और माओवादियों के बीच है जिसमे घोषित तौर पर माओवादी आदिवासियों के हमदर्द हैं जबकि सीपीआरएफ जैसी एजेंसियों को आदिवासियों के भले बुरे से कोई सरोकार नहीं सिवाय इसके कि वे अपनी वे जरूरतें उनसे पूरी करें जिनका इंतजाम सरकार नहीं कर पाती.

साफ दिख रहा है यह लड़ाई अंतहीन है और सरकार अभी तक न तो कभी जीत पाई है न ही जीत पाएगी, इसकी वजह और भी साफ है कि वह आदिवासियों की समस्याएं हल नहीं कर पा रही और न ही उन्हे शोषण से मुक्ति दिला पा रही.

दोगली सियासत

कोसने वाले बेवजह सरकार की कमजोर इच्छाशक्ति और नक्सली समस्या पर उसके दोहरेपन को नहीं कोसते, इसे समझने छत्तीसगढ़ के सी एम रमन सिंह का यह ताजा बयान, जो सुकमा हमले के ठीक पहले उन्होंने दिया था, पर्याप्त है कि अगर विधायक और निगमों के अध्यक्ष एक साल के लिए भी कमीशन खाना बंद कर दें तो राज्य तीस साल आगे का विकास कर जाएगा यानि विकास न होना एक तरह से आदिवासियों का शोषण ही है. कमीशनखोरी की यह बात सरकारी तंत्र में छोटे स्तर तक पसरे भ्रष्टाचार पर भी लागू होती है.

उधर केंद्र सरकार का ढुलमुल और टरकाऊ रवैया भी नक्सली समस्या का कम जिम्मेदार नहीं जो हर बड़े हमले के बाद शहीद हुये जवानों को कुछ लाख रुपये की इमदाद देता है, सख्ती का दम भरता है और फिर बात आई गई हो जाती है. सुकमा हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जवानों की शहादत बेकार न जाने देने की बात कर उन पर गर्व किया, तो गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे चुनौती के रूप में स्वीकारा, जबकि मोदी सरकार के कार्यकाल में माओवादियों द्वारा किया गया यह तीसरा बड़ा हमला है. जाने क्यों सरकार अपनी ये कमजोरियां मानने और दूर करने को तैयार नहीं कि उसका खुफिया तंत्र लापरवाह, भष्ट और अव्वल दर्जे का निकम्मा है.

सीपीआरएफ जैसी एजेंसियां चयनित स्थानों पर डेरा डाले वक्त गुजारती रहती हैं उन्हें नक्सली गतिविधियों के बारे में कोई जानकारी नहीं रहती ऐसे में क्या खाकर इस चुनौती से निबटा जाएगा यह राम जाने. सुकमा हमले के बारे में जवान कह रहे हैं कि कोई 300 माओवादियों ने आदिवासियों को आगे रखा, जिससे वे मुंह तोड़ जबाब नहीं दे पाये, इसके बाद भी कई नक्सलियों को उन्होंने मार गिराया. हास्यास्पद बात यह है कि छत्तीसगढ़ या बस्तर में कोई भी आदिवासियों और नक्सलियों में फर्क नहीं कर सकता, फिर कैसे यह मान लिया जाये कि आदिवासियों को ही ढाल बनाया गया था, मुमकिन है अपने अभियान के प्रति जी जान से जुटे और प्रतिबद्ध नक्सलियों ने अपने ही साथियों को आगे रखा हो.

सुकमा के बारे में हर कोई जानता है कि वहां नक्सली बेखौफ घूमते हैं, उन्हें किसी का डर नहीं पर अब सरकार क्या करेगी जो अभी भी बस्तर की दुरूह भौगोलिक स्थिति को ढाल बनाकर बात घुमा फिरा रही है. क्या वह बस्तर के जंगल उजडवा देगी या फिर हवाई हमला करेगी जबकि उसे माओवादियों के एक भी ठिकाने की जानकारी नहीं है. जाहिर है वह ऐसा कुछ नहीं करेगी और न ही अपने फैसलों से चौंका देने वाले नरेंद्र मोदी कोई करिश्मा दिखा पाएंगे और दिखाया भी तो वह सर्जिकल स्ट्राइक जैसा अस्थाई होगा. जरूरत आदिवासियों को उनके अधिकार देने की है शिक्षा और स्वास्थ सहूलियतें मुहैया कराने की  है पर हो उल्टा रहा है, वहां की भाजपा सरकार 20 हजार स्कूल बंद करने का एलान कर चुकी है, इससे लाखों आदिवासी बच्चे तालीम से महरूम हो जाएंगे.

बस्तर के दूरदराज के इलाकों में डाक्टर नहीं हैं,  बिजली नहीं है, शौचालय नहीं हैं, पीने का साफ पानी नहीं है, सड़कें नहीं हैं.  आदिवासियों को इन मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखना शोषण और षड्यंत्र नहीं तो क्या है, इस पर भी तुर्रा यह कि अगर डाक्टर विनायक सेन जैसा कोई ईमानदार समाजसेवी आदिवासियों की सेवा करता है, तो सरकार उसे नक्सली करार देते जेल में ठूंसकर इतना प्रताड़ित कर मुकदमों से लाद देती है कि फिर कोई ऐसी जुर्रत नहीं करता जिससे आदिवासियों में जागरूकता और स्वाभिमान आए. नक्सली जो कर रहे हैं अगर वह हिंसा है तो उसके बंद या खत्म होने की उम्मीद एक तरह की नादानी ही है.

8 मई को राजनाथ सिंह नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की मीटिंग में नया कुछ कर या कह पाएंगे ऐसा लग नहीं रहा मुमकिन है. ममता बनर्जी या नीतीश कुमार सरकार को ही कटघरे में खड़ा करते यह पूछ डालें कि नोटबंदी का असर नक्सलवादियों पर क्यों नहीं पड़ा जैसा कि इस फैसले के वक्त कहा गया था कि इससे आतंकवादियों के भी होसले पस्त पड़ेंगे.

नक्सलवाद की जड़ें आदिवासियों का उस पर भरोसा है, उन्हें अपना हिमायती समझना है जो एक हद तक सच भी है. अपने एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि नक्सलवाद से इत्तफाक रखना गुनाह के श्रेणी में नहीं आता, तो ऐसे में बेहतर होगा कि सरकार माओवादियों की मांगों पर गंभीरता पूर्वक विचार करे या फिर वैचारिक स्तर पर उन्हें आदिवासियों के सामने गलत ठहराए. 

25 साल की उम्र में ही इस खिलाड़ी ने क्रिकेट से लिया संन्यास

इंग्लैंड क्रिकेट टीम के हरफनमौला खिलाड़ी जफर अंसारी ने वकालत में करियर बनाने के लिए 25 साल की उम्र में ही क्रिकेट के सभी फॉर्मेट से संन्यास की घोषणा कर दी है. अंसारी के इंग्लिश काउंटी क्लब सर्रे ने इसकी घोषणा की.

अंसारी ने पिछले साल अक्टूबर में बांग्लादेश के खिलाफ टेस्ट डेब्यू किया था. बाएं हाथ के स्पिनर जफर पिछले साल पांच टेस्ट मैचों के लिए भारत आने वाली इंग्लैंड टीम का हिस्सा थे. उन्होंने भारत के खिलाफ दो टेस्ट मैच भी खेले. प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उन्होंने कुल 71 मैच खेले हैं जिनमें उन्होंने 128 विकेट लिए. अपने करियर में उन्होंने इंग्लैंड के लिए तीन टेस्ट और एक वनडे खेला.

जफर अंसारी ने कहा, ‘सात साल तक प्रोफेशनल क्रिकेटर के तौर पर खेलने और कुल मिलाकर करीब दो दशक तक क्रिकेट खेलने के बाद मैंने अपने क्रिकेट करियर को खत्म करने का फैसला किया है. यह एक बहुत मुश्किल फैसला है और मैंने इसे काफी सोच समझकर लिया है.’

अंसारी ने 2015 में आयरलैंड के खिलाफ इंग्लैड की वनडे टीम में डेब्यू किया था. वो आठ साल की उम्र से ही सर्रे काउंटी क्लब के लिए खेल रहे हैं.

जफर अंसारी ने कहा, मैंने सर्रे के लिए 8 साल की उम्र से खेलना शुरू किया और क्लब तब से मेरे जीवन का अहम हिस्सा है. सर्रे ने हमेशा मुझे पूरी तरह सपॉर्ट किया है. इतने सालों तक मेरा समर्थन करने के लिए मैं हमेशा क्लब का आभारी रहूंगा. मैं बड़े दुख के साथ अलविदा कह रहा हूं.'

आगे उन्होंने कहा, “इस समय संन्यास की घोषणा करना हैरानी की बात है. मैंने हमेशा से क्रिकेट को अपने जीवन का एक हिस्सा बनाए रखा है, लेकिन मुझे अपनी कुछ और महत्वकांक्षाओं को भी पूरा करना है. मैं अपने दूसरे करियर को आगे बढ़ाना चाहता हूं, शायद वकालत में. इसके लिए अभी से शुरुआत करनी होगी.”

अंसारी ने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र, दर्शनशास्त्र और समाजशास्त्र में ऑनर्स के साथ स्नातक डिग्रियां ली हैं और रॉयल होलोवे कॉलेज से इतिहास में मास्टर की पढ़ाई कर रखी है.

सर्रे काउंटी टीम के निदेशक एलेक स्टुअर्ट ने कहा, “अंसारी एक अच्छे खिलाड़ी हैं और उनके इस फैसले की हम सबको इज्जत करनी चाहिए.” जफर के संन्यास के बाद केविन पीटरसन ने ट्वीट करके उन्हें उनके भविष्य के लिए शुभकामनाएं दी है.

देखें वीडियो, ये बाबा किस तरह औरतों को अपनी हवस के जाल में फंसाते हैं

आजकल के बाबाओं का कभी भरोसा नहीं करना चाहिए, वो लड़कियों का इलाज करने के बहाने उनकी इज्जत से खिलवाड़ करते हैं. वो खासकर औरतों को ही अपना शिकार बनाते हैं, क्योंकि वो उनके साथ शारीरिक संबध बनाकर अपनी इच्छा को पूरी करते हैं. इन घटनाओं को देखकर लोगों को अपनी सोच बदल लेनी चाहिए, ऐसे बाबाओं के ऊपर कभी विशवास नहीं करना चाहिए.

एक ऐसी ही कहानी लखनऊ से सामने आई है, जहां एक संस्था ने इस बाबा की वीडियो बना ली है. जिसके बाद इस बाबा की पुलिस में रिर्पोट करवा दी है मगर बाबा के गिरफ्तार होने की कोई खबर सामने नहीं आई है.

इस वीडियो में दिखाया गया है कि बाबा किस तरह लड़की से कहता है कि वो उसके साथ संबंध बनाएंगी तो उस पर कृपा बरसने लगेगी. उसकी सारी समस्या उसके गुप्तांग में है जो उसके साथ 1 महीने तक संबध बनाने से दूर हो जाएंगी.

आप भी देखिए ये वीडियो..    

 

 

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