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अकेली महिला यात्रियों के लिए ऐप

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जिंदगी सिमट नहीं जाती चमड़ी के सिकुड़ने से

शनिवार का दिन था. रात के साढ़े 8 बजे थे. माला कर्मकार ‘सियालदहडायमंड हार्बर’ लोकल ट्रेन से दफ्तर से घर लौट रही थीं. उस समय लेडीज कंपार्टमैंट में कुछ गिनीचुनी औरतें ही थीं. एकाध स्टेशन के बाद उन में से 1-1 कर के और भी 4-5 औरतें उतर गईं. अब माला कर्मकार समेत 3 औरतें रह गईं.

कल्याणपुर स्टेशन से कुछ सवारियों को उतार कर जब ट्रेन चली, तो अचानक चलती हुई ट्रेन की खिड़की के सामने एक नकाबपोश आया और उस ने खिड़की पर बैठी माला कर्मकार पर एसिड फेंक दिया. यह वह घड़ी थी, जब माला की पूरी जिंदगी ही बदल गई.

दरअसल, एक जमीन को ले कर स्वरूप हलदार नामक एक बिल्डर के साथ माला कर्मकार के घर वालों का झगड़ा था. बिल्डर जमीन चाहता था और माला का परिवार जमीन बेचने को राजी नहीं था.

बिल्डर स्वरूप हलदार कई बार माला कर्मकार के परिवार वालों को नतीजा भुगतने की धमकी दे चुका था. आखिरकार उस ने माला पर एसिड फेंक कर अपनी धमकी को पूरा कर ही दिया. अब वह हवालात में है. उस की जमानत नहीं हो पा रही है.

एक और वाकिआ. मनीषा पैलान सुबहसवेरे जब नींद से जाग कर अपना चेहरा आईने में देखती हैं, तो एसिड से झुलसे चेहरे में गाल, आंखें, उस से नीचे गले और छाती की बीभत्सता से उन का पूरा बदन कांप जाता है.

एक मग एसिड ने मनीषा की दुनिया को पूरी तरह झुलसा कर रख दिया है. मनीषा पैलान का सपना था कि वे अच्छी तरह पढ़लिख कर सब्जी बेचने वाले अपने पिता मुन्नाफ पैलान का सहारा बनें. वे अपने छोटे भाईबहन की पढ़ाई का खर्च जुटाना चाहती थीं, ताकि परिवार सिर ऊंचा कर के जी सके, इसीलिए पढ़ाई के साथसाथ वे नर्सिंग ट्रेनिंग, कंप्यूटर कोर्स, ब्यूटीशियन कोर्स भी कर रही थीं.

रूढि़वादी मुसलिम परिवार में जनमी मनीषा पैलान कुछ भी कर के अपने पिता और परिवार की लड़खड़ाती जिंदगी को संभालने की कोशिश कर रही थीं.

साल 2015 में मनीषा पैलान ने अपने बचपन के प्यार सलीम हलदार से घर से भाग कर शादी कर ली. लेकिन कुछ समय बाद ही मनीषा के मन में अपने पैरों पर खड़ा हो कर पिता की मदद करने का सपना कुलबुलाने लगा.

मुसलिम परिवार में ऐसा सपना देखने की सख्त मनाही थी. जाहिर है, पतिपत्नी में अनबन होने लगी. मनीषा पैलान ने तलाक लेने का फैसला किया.

मनीषा के मुताबिक, सलीम भी तलाक के लिए तैयार था, लेकिन वह इसे मन से स्वीकार नहीं कर पाया.

17 नवंबर, 2015. सर्दी की एक शाम. मनीषा कंप्यूटर क्लास से घर लौट रही थीं. सलीम अपने कुछ दोस्तों के साथ अचानक सामने आया और एक मग एसिड फेंक कर फरार हो गया. मनीषा से अलग होने का गुस्सा उस ने एसिड हमला कर के निकाला था.

सलीम से अलग होने के बाद मनीषा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उन के लिए एक बहुत बड़ी लड़ाई इंतजार कर रही है. लगातार थाना, पुलिस और अदालत के चक्कर लगाने के साथसाथ अपनी लड़ाई लड़ने के लिए वे मन को तैयार करती चली गईं.

एसिड हमले की वारदात और पुलिस की कार्यवाही के बाद सलीम समेत दूसरे 5 आरोपी जमानत पर खुलेआम घूम रहे हैं, धमकियां दे रहे हैं और मामला उठा लेने के लिए लगातार दबाव बना रहे हैं.

आखिरकार मनीषा को अपना कसबा छोड़ कर कोलकाता आना पड़ा. यहां मनीषा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाईकोर्ट ने 17 जुलाई को राज्य सरकार को मनीषा को 3 लाख रुपए हर्जाने के तौर पर दिए जाने का आदेश दिया.

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में एसिड हमले के पीडि़तों को 3 लाख रुपए हर्जाना देने का कानून है. इस कानून के तहत हाईकोर्ट ने यह फैसला सुनाया. इतना ही नहीं, जमानत पर खुलेआम घूम रहे पांचों आरोपियों को भी हाईकोर्ट ने फिर से गिरफ्तारी के साथ जांच का भी आदेश दिया.

सलीम फरार है. बाकियों को पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है. जहां तक 3 लाख रुपए के हर्जाने का सवाल है, तो 21 साला मनीषा कहती हैं कि अगर काबिलीयत से उन्हें कोई नौकरी मिल गई, तो कुछ सालों में 3 लाख रुपए जमा कर लेना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है. सिर्फ चमड़ी ही तो जल कर सिकुड़ गई है. इस से जीने का रास्ता तो बंद नहीं हो जाता है न? नौकरी कर के अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए चिकनी चमड़ी होना एकलौती काबिलीयत नहीं हो सकती है.

इलाज के दौरान जब पूरे चेहरे पर पट्टियां बंधी थीं, तब अस्पताल के बिस्तर पर लेटी मनीषा ने खुद को दिलासा दी थी कि जिंदगी यहीं खत्म नहीं हो जाती. इस के आगे भी दुनिया है. पर उस के लिए खुद को ही तैयार करना होगा.

मनीषा बताती हैं कि लोकल ट्रेन में उन की आपबीती सुन कर एक मुसाफिर ने यहां तक पूछ लिया था कि सिर्फ एसिड ही फेंका था या रेप भी हुआ था? ऐसी दुनिया से रूबरू होने के बाद भी वे आत्मविश्वास से लबालब हैं. उन का मानना है कि उन का जला चेहरा समाज का आईना है.

मनीषा को जब अस्पताल से छुट्टी मिली, तब उन्हें पता चला कि हमलावर जमानत पर छूट कर महल्ले में लौट आए हैं और छाती फुला कर उन के घर के आसपास घूम रहे हैं.

उसी समय मनीषा ने ठान लिया था कि पूरी हिम्मत के साथ उन्हें समझा देना है कि तुम्हारा एसिड मेरा कुछ भी नहीं जला पाया है. मेरे सपने को, मेरी चाह को जला नहीं सका है.

यही वजह है कि आज भी मनीषा गानों पर थिरकती हैं. ब्यूटीशियन का कोर्स कर के वे महल्ले की औरतों को सजातीसंवारती हैं.

इसी तरह मैत्री भट्टाचार्य द्वारा नाजायज संबंध बनाने से इनकार करने की सजा एसिड हमले से दी गई.

पश्चिम बंगाल के वर्दमान जिले के रानाघाट स्टेशन पर एक जानपहचान के लड़के ने मैत्री के चेहरे को निशाना बना कर एसिड फेंका. इस हमले में मैत्री का चेहरा तो झुलसा ही, साथ ही एक आंख भी जाती रही. लेकिन उन का मनोबल आज भी नहीं टूटा है.

वे कोलकाता मैडिकल कालेज में अपना इलाज करा रही हैं. उन के कंधे और दाहिने हाथ की चमड़ी ही नहीं, मांसपेशियां तक गल गई थीं और वहां सैप्टिक हो गया था. फिर भी वे दम साध कर कुसूरवारों को सजा दिलाने और एसिड हमले की पीडि़तों के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ने का संकल्प ले रही थीं.

वे एसिड पीडि़तों को संदेश देना चाहती हैं कि जिंदगी सिमट नहीं जाती चमड़ी की सिकुड़न से.

मैत्री भट्टाचार्य कहती हैं कि बलात्कार के विरोध में लोग सड़कों पर उतरते हैं, लेकिन एसिड हमले का देश में सख्ती से कोई विरोध नहीं करता, इसीलिए वे इसे एक लंबी लड़ाई मानती हैं. इस लड़ाई में वे आम लोगों का साथ भी चाहती हैं.

आंकड़ों की जबानी

‘एसिड सर्वाइवल फाउंडेशन औफ इंडिया’ के आंकड़े कहते हैं कि एसिड हमले की वारदातें हमारे देश में बड़ी तेजी से बढ़ रही हैं. साल 2011 में एसिड हमले की जहां महज 106 वारदातें सामने आई थीं, वहीं साल 2015 में 802 वारदातें दर्ज हुई हैं.

जाहिर है, यह चिंता की बात है. वैसे, फरवरी, 2013 से पहले हुए एसिड हमले के आंकड़े पुख्ता आंकड़े नहीं माने जा सकते. वजह, तब तक हमारे देश में एसिड हमले जैसी वारदातों के लिए भारतीय आपराधिक कानून में अलग से कोई धारा नहीं थी.

फरवरी, 2013 को भारतीय दंड विधान में संशोधन किया गया. 326ए और 326बी को गैरजमानती धारा के तहत ऐसे अपराध को चिह्नित किया गया. अपराध साबित होने पर कम से कम 7 साल और ज्यादा से ज्यादा 10 साल की सजा का प्रावधान किया गया.

इस तरह देखा जाए, तो एसिड हमले के पुख्ता आंकड़े साल 2014 में ही उपलब्ध हो पाए. नई धारा के तहत पूरे देश में एसिड हमले के 225 मामले दर्ज हुए और साल 2015 में यह आंकड़ा बढ़ कर 249 तक पहुंच गया.

सरकार की अनदेखी

पश्चिम बंगाल की बात करें, तो पिछले कुछ सालों से राज्य में एसिड हमले की वारदातें लगातार बढ़ती जा रही हैं. साल 2013 से ले कर अब तक राज्य में ऐसी घटनाएं आएदिन हो रही हैं. उन्हें देख कर साफ लगता है कि एसिड मामलों में पुलिस प्रशासन और सरकार उदासीन है.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़े कहते हैं कि बीते 5 सालों में राज्य में 131 मामले दर्ज हुए, वहीं साल 2014 और साल 2015 में 41-41 मामले दर्ज हुए. पर किसी भी आरोपी को सजा नहीं हुई है.

‘एसिड सर्वाइवल फाउंडेशन औफ इंडिया’ के विक्रमजीत सेन का मानना है कि गैरजमानती धारा में आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद ही ये जमानत पर छूट जाते हैं. ऐसा इसलिए होता है कि पुलिस पुख्ता चार्जशीट तैयार नहीं करती है.

सलफ्यूरिक, नाइट्रिक और हाइड्रोक्लोरिक एसिड खरीदनेबेचने में कंट्रोल के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिन के तहत राज्य सरकार ने 31 मार्च, 2014 को एसिड बिक्री से संबंधित कुछ नियम बनाए थे. मसलन, दुकानदारों को एसिड खरीदारों का एक अलग रजिस्टर रखना होगा और उस रजिस्टर में खरीदार का पूरा नामपता दर्ज करना होगा.

साथ ही, यह भी कहा गया था कि ऐक्जिक्यूटिव मजिस्ट्रेट जितनी हैसियत वाला कोई अफसर, सबइंस्पैक्टर की हैसियत वाला पुलिस औचक दौरा कर के एसिड विक्रेताओं के रजिस्टर की जांच कर सकता है.

कानूनी पचड़े में पीड़ित

पश्चिम बंगाल सरकार के मौजूदा नियम के मुताबिक, एसिड पीड़ित को अधिकतम 2 लाख रुपए हर्जाने व बतौर माली मदद के रूप में दिए जाने का प्रावधान है. उधर साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश जारी कर के कहा था कि एसिड पीड़ित को 15 दिनों के भीतर राज्य सरकार 3 लाख रुपए दे.

पिछले साल जून में एसिड हमले की पीड़िता मनीषा पैलान ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाईकोर्ट ने सरकार को 3 लाख रुपए का हर्जाना देने का निर्देश दिया. लेकिन सरकार अभी तक मनीषा को रकम नहीं दे पाई है.

हालांकि इस बारे में गृह विभाग के एक अधिकारी के अनुसार, इस देरी की वजह कानूनी अड़चन है. दरअसल, वित्त विभाग की मंजूरी मिलने के बावजूद कानून विभाग से कानून में बदलाव की इजाजत अभी तक नहीं मिली है. इस के कारण मामला अधर में लटका हुआ है.

जाहिर है, राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार हर्जाना नहीं दे पा रही है. सुप्रीम कोर्ट का निर्देश मान कर 3 लाख रुपए का हर्जाना देने के लिए राज्य सरकार को वित्त विभाग की इजाजत चाहिए और वित्त विभाग इस रकम की मंजूरी दे चुका है. लेकिन कानून विभाग द्वारा पुराने कानून में संशोधन किए बिना राज्य सरकार पीड़िता को वह रकम नहीं दे सकती.

पश्चिम बंगाल में एपीडीआर जैसे मानवाधिकार संगठनों और स्वयंसेवी संगठनों के लगातार दबाव बनाने के बाद हुआ सिर्फ इतना है कि सरकारी अस्पतालों में पीड़िता के मुफ्त इलाज का निर्देश सरकार ने जारी कर के छुट्टी पा ली है.                             

एक मिसाल यह भी

एसिड हमला न केवल पीड़िता के चेहरेमोहरे को बिगाड़ देता है, बल्कि उस के पूरे वजूद को झकझोर कर रख देता है. लेकिन यह एक नाकाम कोशिश होती है. ‘नाकाम कोशिश’ इसलिए है, क्योंकि इस तरह का हमला पीड़ित को कमजोर नहीं बनाता, बल्कि सब से डट कर मुकाबला करने का माद्दा ही पैदा करता है.

आगरा के फतेहाबाद रोड पर गेटवे होटल के ठीक सामने शिरोज हैंगआउट इसी बात का सुबूत है. इस कैफेटेरिया को एसिड हमले की पीड़ित लड़कियां व औरतें चलाती हैं. एसिड ने भले ही इन के चेहरे को बिगाड़ दिया है, लेकिन इन के चेहरे पर हजारों वाट की मुसकराहट है.

एसिड अटैक सर्वाइवल को दोबारा बसाने का अपनी ही तरह का देश में यह पहला प्रोजैक्ट है, बल्कि यह कहा जाना चाहिए कि एसिड सर्वाइवल द्वारा चलाया जाने वाला यह देश का पहला कैफेटेरिया है. बिगड़े चेहरे, समाज की अनदेखी, आसपड़ोस के लोगों की हमदर्दी, हंसीमजाक, डर को अंगूठा दिखा कर ये लड़कियां शिरोज हैंगआउट चला रही हैं.

साल 2014 में अकेले उत्तर प्रदेश में एसिड हमले के 186 मामले पुलिस ने दर्ज किए थे. इस के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दिल्ली की एक स्वयंसेवी संस्था ‘छांव फाउंडेशन’ की मदद से इन लड़कियों के पुनर्वास की योजना बनाई.

मजेदार बात यह है कि इस कैफेटेरिया में चायकौफी और स्नैक्स के साथ कम्यूनिटी रेडियो सुनने का लुत्फ और लाइब्रेरी में बैठने की भी सहूलियत है. इस के अलावा समयसमय पर यहां आर्ट वर्कशौप और एग्जिबिशन भी कराई जाती हैं.

यह कैफेटेरिया आगरा में न केवल लोकल लोगों के बीच, बल्कि देशीविदेशी सैलानियों के बीच कम समय में ही मशहूर हो गया. इस की मशहूरी को देखते हुए लखनऊ में भी इस की एक शाखा खोल दी गई?है. जाहिर है, उत्तर प्रदेश की यह मिसाल उम्मीद जगाती है, पर इस में सरकार और समाज का साथ मिलना भी बेहद जरूरी है.    

कौन हैं बायोपिक फिल्म ‘कल्पना चावला’ के दावेदार..?

मुंबई पहुंचते ही बौलीवुड अदाकारा प्रियंका चोपड़ा ने इशारा कर दिया कि वे तीन बौलीवुड फिल्में अनुबंधित करने वाली हैं, जिनमें से एक बौलीवुड फिल्म अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला की बायोपिक फिल्म है, जिसका निर्देशन प्रिया मिश्रा करने वाली हैं. पर अब सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि कल्पना चावला की बायोपिक फिल्म कौन बना सकता है? क्योंकि एक वेबसाइट के अनुसार कल्पना चावला की बायोपिक फिल्म बनाने के अधिकार दो फिल्मकारों के पास है, जबकि सूत्रों के अनुसार इन दो के अलावा भी साल 2015 में ‘वायकाम 18’ भी इस पर फिल्म बनाने की बात कर चुका है.

एक तरफ प्रिया मिश्रा दावा कर रही हैं कि कल्पना चावला की बायोपिक फिल्म बनाने के अधिकार उनके पास हैं. प्रिया मिश्रा का दावा है कि वे 2010 से कल्पना चावला के पिता बी.एल. चावला के संपर्क में हैं और उनके पास पिछले सात वर्षों से इस फिल्म को बनाने के अधिकार हैं. प्रिया मिश्रा का दावा है कि वे पहली बार बी एल चावला से 2010 में करनाल, हरियाणा में मिली थीं, तब से वह कई बार मिल चुकी हैं. उनका दावा है कि वे कल्पना चावला की मां और बहनों से भी मिली हैं. प्रिया मिश्रा के अनुसार उन्होंने बी एल चावला से पहली मुलाकात में ही फिल्म बनाने के लिए अनुबंध पत्र पर हस्ताक्षर नहीं करवाए थे, बल्कि पहले उन्होंने उनसे रिश्ता जोड़ा और कई मुलाकातों के बाद अनुबंध पत्र पर हस्ताक्षर करवाए थे.

प्रिया मिश्रा दावा कर रही हैं कि वे पिछले माह भी बी एल चावला से दिल्ली में मिलीं थी. उन्हें बी एल चावला हर जानकारी देते रहते हैं, जैसे कि अभी पिछले सप्ताह वे ‘कल्पना चावला विश्वविद्यालय’ के उद्घाटन के सिलसिले में करनाल गए थे. प्रिया मिश्रा का दावा है कि वे स्वयं इस फिल्म की लेखक,निर्माता व निर्देशक हैं.

वहीं दूसरी तरफ ‘‘क्लाउड नाइन पिक्चर्स प्रा. लिमिटेड’’ की सीईओ मीनू अरोड़ा का दावा है कि कल्पना चावला की बायोपिक फिल्म बनाने का अधिकार उनकी कंपनी के पास है. मीनू अरोड़ा का दावा है कि उन्होंने अपनी भागीदार सविता हिरेमथ के साथ कल्पना चावला के पिता बी एल चावला से मुलाकात की थी और उनसे फिल्म बनाने के अधिकार हासिल कर, एक अग्रीमेंट साइन करवाया था.

ज्ञातब्य है कि सविता हिरेपथ कई साल पहले फिल्म ‘‘खोसला का घोसला’’ का निर्माण कर चुकी हैं. मीनू अरोड़ा व सविता हिरेमथ अपना पक्ष मजबूत करते हुए दावा करती हैं कि उन्होंने पेंग्विन से उनके द्वारा प्रकाशित अनिल पद्मानाभन की किताब ‘‘कल्पना चावला : लाइफ’’ पर फिल्म बनाने के अधिकार ले रखे हैं. उनकी फिल्म इस किताब पर आधारित होगी. इनका दावा है कि इन्हें कल्पना चावला के पिता बी एल चावला के अलावा परिवार के अन्य सदस्यों से भी कल्पना चावला से जुड़ी कई बातों की जानकारी मिली है, जिसके चलते इनकी फिल्म बहुत खास हो जाती है. मगर मीनू अरोड़ा या सविता हिरेमथ यह नहीं बता पा रही हैं कि उनकी फिल्म का निर्देशन कौन करेगा?

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अंततः कल्पना चावला की बायोपिक फिल्म का निर्माण कौन करता है? ‘‘वायकाम 18’’ स्टूडियो इन दोनो में से किसी के साथ जुड़ता है या नहीं…

लोगों का विश्वास ही मेरी ताकत है : दीपिका पांडे

झारखंड के गोड्डा जिले को भारत सरकार ने 2006 में भारत के 250 सब से पिछड़े जिलों में घोषित किया था. यहां विकास की रूपरेखा बना कर काम करना आसान नहीं है और वह भी एक महिला के लिए. मगर दीपिका पांडे पूरे हौसले के साथ यह काम कर रही हैं. सामान्य कदकाठी, मगर आत्मविश्वास से भरपूर दीपिका फिलहाल गोड्डा जिले में कांग्रेस की जिलाध्यक्ष हैं. इन के पति रत्नेश कुमार टाटा स्टील में हैं, जिन के साथ दीपिका ने इंटरकास्ट मैरिज की है. दीपिका की 2 बेटियां हैं. पेश हैं, उन से कुछ सवाल जवाब:

आप की स्ट्रैंथ क्या है?

मेरी लड़ाई में भीड़ नहीं होती, लोगों का विश्वास होता है और यही मेरी असली ताकत है.

मुख्य रूप से आप किस तरह के विकास कार्य कर रही हैं?

मैं संगठन के माध्यम से जनमुद्दों जैसे पानी, बिजली, सड़क जैसी बुनियादी जरूरतों पर काम कर रही हूं. इन के अलावा किसानों व युवाओं के सुरक्षित भविष्य को निश्चित करने वाली नीतियों को लागू कराने और उन से जुड़े आंदोलनों को मुकाम तक  पहुंचाने के प्रयास में भी लगी हूं. हाल ही में गोड्डा जिले के राजमहल प्रोजैक्ट, जो कोल माइनिंग से जुड़ा है, में हुए एक हादसे में 23 लोग मारे गए. उन के परिवारों को मुआवजा दिलाने के साथसाथ मैं ने घटना की जांच की मांग भी की. कोल माइनिंग क्षेत्र में करप्शन, सेफ्टी, आउटसोर्सिंग आदि मसलों को भी उठाया ताकि स्थानीय लोगों को न्याय मिल सके.

घरपरिवार के साथ कैसे मैनेज करती हैं?

मेरा मनोबल पति की अनकंडीशनल सपोर्ट और कम उम्र के बावजूद मेरी परिस्थितियों को समझने व स्वीकारने वाली मेरी बेटियों के सहयोग से अपना काम मैनेज करना मेरे लिए कभी मुश्किल नहीं रहा.

इस मुकाम तक पहुंचने में किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा?

यह ग्रामीण इलाका है. आमतौर पर लोग अपनी बात खुल कर नहीं रख पाते हैं. ऐसे में आप को उन्हें भरोसा दिलाना पड़ता है कि जब तक वे अपने लिए आवाज नहीं उठाएंगे, कोई उन के लिए नहीं लड़ सकता.

बुरे काम का बुरा नतीजा

आजकल पैसों के लिए बहुत से लोग हर बुरा काम करने को तैयार रहते हैं, क्योंकि उन्होंने पद और पैसे को ही अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया है. पैसों के लिए वे रिश्तों को भी तोड़ने में कोई गुरेज नहीं करते हैं. ऐसी ही एक दास्तान रिश्वत लेने के जुर्म में सजा भुगत चुके 60 साला सबइंस्पैक्टर की है. कभी मेहनतमजदूरी कर के, तो कभी भीख मांग कर वह अब अपनी जिंदगी गुजार रहा है.

उस आदमी ने बताया कि अपनी नौकरी में उस ने तमाम लोगों की नाक में दम कर दिया था. पैसे ऐंठने के लिए वह उन के रिकशों के पहियों की हवा निकाल देता था, तो कभी उन्हें ऐसा खराब कर देता था कि रिकशे वाले बुरी तरह रो पड़ते थे.

जिस रिकशे वाले की बेटी, बहन या बीवी खूबसूरत होती थी, उन के साथ वह उन के सामने ही बलात्कार करता था. उन की कई बहनों और बेटियों को तो अपने गुंडों से उठवा कर वह उन से देह धंधा करा कर खूब पैसे कमाता था.

एक बार वह रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया. जेल के बंदियों में कुछ ऐसे भी थे, जिन की बीवियों का उस ने बलात्कार किया था. वहां उन्होंने उस का जीना मुहाल कर दिया. जेल में वे उस से गटर की सफाई कराते थे और हर रोज अपने पैर दबवाते थे. वे बंदी उसे इतनी बुरी तरह से मारते थे कि कई बार उस के कपड़ों में ही पेशाब निकल जाता था.

जेल में बंद रहने पर उस के घर वालों ने भी उस की कोई सुध नहीं ली थी. एक साल बाद वह जमानत पर जेल से निकल कर अपने घर पहुंचा, तो पड़ोसियों से मालूम हुआ कि उस के बच्चे मकान को बेच कर कहीं बाहर चले गए हैं.

वह एक होटल में जूठे बरतन साफ करने के काम पर लग गया था. एक दिन एक अखबार में छपी खबर को पढ़ कर मालूम हुआ कि उस की लड़की जिस लड़के के साथ जेवर और पैसे ले कर भागी थी, उस ने उस की बेटी के साथ कुछ दिनों तक मौजमस्ती करने के बाद  हत्या कर दी थी.

उस का बेटा भी अपनी मां की हत्या कर के एक लड़की को ले कर घर से भाग गया था. कुछ दिनों बाद उस  लड़की के घर वालों ने उस के बेटे की भी हत्या कर दी थी.

ऐसा ही एक मामला 40 साला एक खूबसूरत औरत का है, जो ठेकेदार के यहां मजदूरी कर के अपनी जिंदगी बिता रही थी. 10 साल पहले वह लड़कियों के एक सीनियर सैकेंडरी स्कूल में सैकंड ग्रेड की टीचर थी.

स्कूल में पढ़ने वाली खूबसूरत लड़कियों को वह अपने घर पर ट्यूशन पढ़ने के लिए बुलाती थी और इम्तिहान में ज्यादा नंबर देने व शौपिंग कराने का लालच दे कर उन्हें अपने जानकार पैसे वालों के साथ अपने घर पर ही उन से देह धंधा करवा कर पैसे कमाती थी.

एक बार जब उस की इन करतूतों के बारे में उस के पड़ोसियों को मालूम हुआ, तो उन्होंने पुलिस को सूचना दे कर उसे गिरफ्तार करा दिया. इस मामले में जब उसे जेल की सजा हुई, तो उस की सरकारी नौकरी भी चली गई और दूसरे शहर में रह कर सरकारी नौकरी करने वाले उस के पति ने भी उस से अपना रिश्ता खत्म कर लिया. जेल की सजा खत्म होने पर वह मायके गई, तब उन्होंने भी उस से अपने रिश्ते खत्म कर लिए थे. तब से वह मजदूरी कर एक गुमनाम जिंदगी जी

रही है.धनदौलत के लालच में लोग ऐसे बुरे काम करते हैं, पर जब उन्हें उन के बुरे कामों की सजा मिलती है, तब वे पछतावे के आंसू बहाते हैं.           

यहां वही हिट है जो फिल्मी गाने गाता है : रीवा राठौड़

महज 21 वर्ष की उम्र में रीवा राठौड़ ने जो मुकाम हासिल किया उसे हासिल करने में लोगों की पूरी उम्र बीत जाती है. रीवा स्वयं अपने गाने लिखती हैं, स्वयं उन्हें संगीत से संवारती हैं और स्वयं गाती हैं. रीवा राठौड़ को संगीत विरासत में मिला है. उन के पिता मशहूर तबला वादक, संगीतकार व गायक तथा गत वर्ष अपने गजल अलबम ‘जिक्र तेरा’ के लिए ‘जीमा’ अवार्ड हासिल कर चुके रूप कुमार राठौड़ हैं, जबकि मां सोनाली राठौड़ शास्त्रीय गायिका हैं.

आप ने किस उम्र में संगीत सीखना शुरू किया था?

बचपन में संगीत में रुचि थी. जब मैं 6 साल की थी तब मेरे पिता ने पियानो ला कर दिया. मैं ने शांति शेंडल से पियानो बजाना सीखना शुरू किया. पियानो से शुरुआत करने की वजह से मुझे कौर्ड, हारमोनी, रिदम आदि की समझ आई. इस के बाद दक्षिण का संगीत शंकर महादेवन से सीखा. मैं तो आज भी कर्नाटक संगीत सीख रही हूं. उस के बाद मैं ने अपने पिता के मित्र व संगीतकार पं. राजन साजन से हिंदुस्तानी क्लासिकल संगीत सीखना शुरू किया. इस तरह मेरे संगीत में बनारस घराना भी जुड़ा. बनारस घराने के संगीत की मुझे अच्छी समझ हो गई है. मेरे मातापिता ने मुझे संगीत के क्षेत्र में हर तरह से परिपक्व करने के लिए हर संभव ट्रेनिंग दिलाई.

आप ने विविध प्रकार के संगीत की जो ट्रेनिंग ली है, उस से आप के अंदर क्या बदलाव आया?

आप मेरे गाने सुन कर दिग्भ्रमित होते रहेंगे. दक्षिण के गाने सुन कर आप को लगेगा कि मैं दक्षिण भारतीय हूं. अंगरेजी भाषा के गाने सुन कर आप को लगेगा कि मेरी परवरिश विदेश में हुई है. हिंदी गाने सुन कर लगेगा कि मैं वाराणसी में ज्यादा रही हूं. मैं पहली लड़की हूं जिस ने दक्षिण भारतीय ‘कचरी’ की है. मैं ने मुंबई के मैसूर ऐसोसिएशन हाल में 2 घंटे तक दक्षिण भारतीय गीत गाए हैं. जो 2 घंटे की बैठक होती है उसे कचरी कहते हैं. पर मैं बचपन से ही अंतर्राष्ट्रीय संगीत जगत में अपनी पहचान बनाना चाहती थी.

आप की शिक्षा अंगरेजी माध्यम से हुई है. इसी के चलते आप अंगरेजी भाषा में गाने लिखती हैं और इंटरनैशनल संगीत में नाम कमाना चाहती हैं?

मेरे सपने को आप इस तरह से न देखें. मैं तो बचपन से ही अंतर्राष्ट्रीय संगीत जगत में अपना नाम बनाना चाहती थी. मेरी शिक्षा अंगरेजी माध्यम से हुई है, मगर मैं पढ़ाई में बहुत कमजोर थी. मेरी रुचि हमेशा संगीत में रही है. हकीकत में मैं जिस तरह के गाने सुनना पसंद करती हूं, मैं जिस तरह के गाने संगीतबद्ध करती हूं, जिस तरह के गाने लिखती हूं, उस तरह के गाने अंतर्राष्ट्रीय संगीत बाजार के लिए ज्यादा उपयुक्त हैं. मुझे अंतर्राष्ट्रीय गायकों में शीन, नोरा, जोंस, यन्नी व ब्रिटनी को सुनना बहुत पसंद है. इन गायकों ने मुझे बचपन से बहुत प्रभावित किया है. इस वजह से भी इंटरनैशनल संगीत में मेरी ज्यादा रुचि है.

पर आप के पिता बता रहे थे कि आप किशोर कुमार की प्रशंसक रही हैं?

आप को जान कर आश्चर्य होगा, पर मेरी जिंदगी का सब से बड़ा सच यह है कि 18 वर्ष की उम्र तक मैं किशोर कुमार की बहुत बड़ी प्रशंसक रही हूं. मेरे पास उन के गाए कम से कम 5 हजार गाने हैं. किशोर कुमार के हजारों गाने मुझे याद हैं. मेरे कमरे में 18 वर्ष की उम्र तक सिर्फ किशोर कुमार के ही फोटो व पोस्टर लगे होते थे. जब मेरा 18वां जन्मदिन मनाया गया, तो मैं ने पूरे घर में गुब्बारे नहीं, बल्कि किशोर कुमार के बड़ेबड़े कटआउट लगाए थे.

जब में 7वीं कक्षा में थी, तो बीमारी की वजह से कुछ दिनों तक स्कूल नहीं जा पाई. जब स्वस्थ हुई, तो रविवार के दिन मैं ने अपनी दोस्त को फोन कर स्कूल में सोमवार को क्या होने वाला है, इस की जानकारी मांगी. उस ने बताया कि सोमवार को हिंदी की परीक्षा है. मैं ने उस से चैप्टर पूछ कर अपने पिता के साथ बैठ कर तैयारी कर ली. जब स्कूल गई तो 5 सवाल तो उन्हीं चैप्टर्स में से थे. मगर 10 सवाल दूसरे चैप्टरों से आए थे. जिन सवालों के जवाब मुझे नहीं आ रहे थे, उन की जगह मैं ने किशोर कुमार के गाने लिख दिए जैसे ‘पलपल दिल के पास’, ‘हम बेवफा क्यों हुए…’ आदि जितने गाने याद आए, सब लिख दिए. फिर घर आ कर मैं ने रोते हुए पिता को सब कुछ बता दिया. पिताजी ने टीचर को फोन कर के बात की. टीचर ने पापा से कहा कि उस ने गाने लिखने के बजाय मुझे सुना दिए होते, तो भी मैं उसे पास कर देती. मेरी स्कूल की टीचर व प्रिंसिपल ने मुझे बहुत सपोर्ट किया.

18 साल की उम्र के बाद ऐसा क्या हो गया कि  आप का किशोर कुमार से मोहभंग हो गया?

मैं ने पहले भी कहा कि बचपन से ही मुझे इंटरनैशनल संगीत में जाना था. विदेशों में फिल्म कलाकारों की बनिस्बत गायकों की अहमियत बहुत ज्यादा है. वहां एक गायक का एक गाना हिट होते ही उस की पूरी जिंदगी बन जाती है. उसे बारबार अपनेआप को साबित करने की जरूरत नहीं पड़ती. भारत में तो हर बार खुद को साबित करना पड़ता है. भारत में संघर्ष कभी खत्म नहीं होता.

ऐसा फर्क क्यों है?

इस की सब से बड़ी वजह यह है कि यहां सब कुछ बौलीवुड है. यहां का गायक बौलीवुड फिल्मों में गाने और इस बात पर ध्यान देता है कि उस की आवाज किस कलाकार पर फिट बैठेगी? यहां संगीत के क्षेत्र में बैंड कल्चर का अभाव है. यहां सिर्फ संगीत से जुड़ें और फिल्मों से न जुड़ें, ऐसा नहीं है. यहां जो लोग खुद गाना लिख कर उसे संगीतबद्ध कर अपनी ही आवाज में रिकौर्ड करते हैं, उन की हमारे देश में कद्र नहीं होती. यहां गायक की पहचान इस बात से होती है कि उस ने किस सफल फिल्म में गाना गाया या किस फिल्म का उस का गाना हिट हुआ, जबकि विदेशी फिल्मों में गाने नहीं होते हैं. वहां के संगीतकार या गायक स्वतंत्र रूप से गाना गाते हैं. वहां के गायक स्टार कलाकारों से काफी बड़े हैं. वहां संगीतकार व संगीत से जुड़ी हस्तियों का रुतबा अभिनेता के मुकाबले कई गुना बड़ा है. वहां के श्रोता म्यूजिकल कंसर्ट में बहुत ध्यान से संगीत को सुनते हैं. उन के लिए संगीत, संगीत की धुन, आवाज बहुत माने रखती है. जबकि हमारे यहां संगीत के शो में गायक गाता रहता है और उस के सामने पहली कतार में बैठा इनसान मोबाइल पर बातें करता रहता है. यह देख कर एक गायक को अंदर से बहुत अजीब सा लगता है. यहां संगीत को बौलीवुड से इतर कुछ समझा ही नहीं जाता.

अंतर्राष्ट्रीय संगीत जगत में पहला कदम कब रखा?

मुझे पहली बार 2011 में पुणे में अंतर्राष्ट्रीय गायक ब्रायन एडम के म्यूजिकल शो की शुरुआत करने का अवसर मिला था. इस शो में मैं ने अपना लिखा, अपने द्वारा संगीतबद्ध गीत गा कर श्रोताओं का दिल जीत लिया था. उस के बाद स्पैनिश फिल्म निर्देशक मारिया रिपोल की स्पैनिश व अंगरेजी भाषा की नवंबर 2014 में पूरे विश्व में प्रदर्शित फिल्म ‘ट्रेसेस औफ सैंडलवुड’ में संगीत देने के साथ ही ‘तनदाना’ नृत्यप्रधान गीत गाने का अवसर मिला. इस फिल्म में स्पैनिश कलाकार ऐना क्लोटेट के साथ भारतीय अभिनेत्री नंदिता दास ने अभिनय किया है. इस फिल्म का मेरा यह गाना काफी लोकप्रिय है. यह गाना इतना लोकप्रिय है कि वहां की छोटी लड़कियां नृत्य सीखने के लिए इसी गाने का उपयोग करती हैं. कई लड़कियों ने तो इस के वीडियो भी यूट्यूब पर डाले हैं. स्पैनिश फिल्म में गीत गाने व संगीत देने के बाद मेरा उत्साह बढ़ गया. मेरे दिमाग में यह बात घर कर गई कि अब मुझे अंतर्राष्ट्रीय संगीत जगत में कुछ कर गुजरने से कोई नहीं रोक सकता. फिर मैं ने विश्व प्रसिद्ध ‘बुद्धा बार लाउंज’ के लिए अलबम बनाया, जो दिसंबर माह से हर जगह बज रहा है.

पर बुद्धा लाउंज बार के लिए अलबम करने का मौका कैसे मिला?

मैं ने गणेश के एक संस्कृत के श्लोक को आधुनिक पश्चिमी संगीत के फ्यूजन के साथ नया रंग देते हुए अपनी ही आवाज में उस का एक वीडियो बना कर यूट्यूब पर डाल दिया, जिस की वजह से बुद्धा बार लाउंज के मालिकों से मेरा परिचय हुआ. उन के कहने पर मैं ने गणेश के श्लोकों पर ही ‘इन राउट गणेशा’ नामक अलबम तैयार कर के दिया. पिछले 20 वर्षों से यह बुद्धा बार लाउंज हर साल विश्व के सर्वश्रेष्ठ संगीत को चुन कर एक अलबम ले कर आता है. फिर यह अलबम का गाना बुद्धा बार लाउंज की हर चेन बार में बजता है. यह गाना गणपति के संस्कृत के श्लोक पर है, जिसे मैं ने थोड़ा मौडर्न टच दे कर गया है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह मेरी बहुत बड़ी उपलब्धि है. मैं पहली भारतीय संगीतकार हूं जिस के संगीतबद्ध व स्वरबद्ध गीत को बुद्धा बार लाउंज ने पिछले 20 वर्षों में पहली बार चुना.

अपनी बहुमुखी प्रतिभा पर रोशनी डालें?

मुझे घुड़सवारी का भी शुरू से शौक था. इसीलिए मैं ने 10 साल की उम्र में घुड़सवारी सीखना शुरू किया. मैं रोज सुबह अपने पिता के साथ मुंबई के रेसकोर्स पहुंच कर घुड़सवारी सीखती थी. मेरा अपना एक घोड़ा था. मैं बाद में राष्ट्रीय स्तर की घुड़सवार बनी. कई अवार्ड मिले. मुझे पेंटिंग का भी बहुत शौक है. मैं अकसर अपने पिता के साथ गुलजारजी के घर जाती थी. वे मुझे 5-6 सादे कागज दे दिया करते थे और फिर वे और मेरे पिता काम में मगन हो जाते थे. मैं उन के कमरे में टंगी तसवीरों को कागज पर उतारती थी. कई बार गुलजार साहब ने मेरे बनाए चित्रों पर सर्वश्रेष्ठ लिख कर औटोग्राफ दिए. यह सब मेरी शिक्षा का ही हिस्सा रहा है.

 

आप ने पेंटिंग करनी छोड़ दी?

 

नहीं. मैं आज भी कम से कम 4 पेंटिंग्स जरूर बनाती हूं. पर ज्यादातर वाइल्ड लाइफ पर ही बनाती हूं. घोड़े, हाथी, शेर आदि की पेंटिंग्स बहुत बनाई हैं.

 

आप ने लिखना कहां से सीखा?

 

जब मैं किसी बात को महसूस करती हूं तो उस पर सोचना शुरू करती हूं. फिर उसे शब्दों में बयां करती हूं. मैं ने सब से पहले ‘आशिया’ नामक गीत लिखा था. मैं ने जो गाने लिखे हैं, उन्हें स्टेज शो में सुनाती रहती हूं.

 

आप पर आप के मातापिता का किस तरह का प्रभाव है?

 

मेरे मातापिता ने बचपन से मेरी पूरी मदद की. हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया. उन्होंने मुझ से यह नहीं कहा कि इस तरह का संगीत मत सुनो. संगीत को ले कर मेरे नजरिए को मेरे मातापिता ने हमेशा सम्मान दिया.

 

आप के लिए प्यार क्या है?

 

प्यार किसी से भी हो सकता है. प्रकृति से हो सकता है, मातापिता से हो सकता है. जानवरों से हो सकता है. यह तो इनसानी भावना है.

 

किसी नए अलबम की तैयारी हो रही है?

 

जी, हां. मैं एक 8 गानों के अलबम पर काम कर रही हूं. इस अलबम के सभी गीत मैं ने लिखे हैं. इन्हें संगीतबद्ध भी मैं ने ही किया है. इन्हें मैं ने अपनी आवाज में रिकौर्ड किया है. यह ऐसा अलबम होगा, जिस पर लोग फिल्म बनाना चाहेंगे. इस के अलावा संगीतकार रंजीत बारौट के संग एक ‘इंडीपौप’ अलबम पर काम कर रही हूं.

 

अब तक आप के बौलीवुड फिल्मों में गाने आ जाने चाहिए थे?

 

मैं ने अपनेआप को रोक रखा था. मैं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी शुरुआत करना चाहती थी.

 

मैं भूत, भविष्य में विश्वास नहीं करती : दिशा परमार

छोटी सी उम्र में दिल्ली से मुंबई जैसे महानगर में कदम रखने वाली दिशा को बंधीबंधाई परिपाटी पर चलना पसंद नहीं. उन्हें बचपन से ही सजनेसंवरने का शौक था. इसीलिए उन्होंने ऐक्टिंग को अपना कैरियर बनाया. स्लिमट्रिम दिशा की सादगी उन के कपड़ों और मेकअप से साफ झलकती है. हैवी मेकअप से परहेज करने वाली दिल्ली की दिशा पर ऐक्टिंग का ऐसा जनून सवार हुआ कि 16 साल में ही पढ़ाई को अलविदा कह ऐक्टिंग से नाता जोड़ लिया. दिल्ली की गलियों में शौपिंग करने और दहीभल्ले खाने के मजे को दिशा मुंबई आने पर बहुत मिस करती हैं. शो ‘प्यार का दर्द है मीठामीठा, प्याराप्यारा’ से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली दिशा से उन के नए शो ‘कोई अपना सा’ के इवैंट पर मुलाकात के दौरान कुछ सवाल जवाब हुए:

कम उम्र में ऐक्टिंग की शुरुआत से बीच में पढ़ाई छोड़ने का कोई असर पड़ा?

मैं जब 12वीं कक्षा में थी तभी मुझे पहला शो मिल गया. तब मुझे पढ़ाई और ऐक्टिंग में से एक को चुनना पड़ा, क्योंकि दोनों एकसाथ नहीं हो सकते थे. लेकिन मैं मानती हूं कि ऐक्टिंग के लिए पढ़ाई जरूरी नहीं है. हमारी इंडस्ट्री में कई ऐसे सितारे हैं, जो कम पढ़ेलिखे होने के बावजूद आज बुलंदियों पर हैं. आमिर खान को ही देख लीजिए. वे 12वीं कक्षा पास हैं पर फिल्म इंडस्ट्री में टौप पर हैं. ऐक्टिंग पढ़ाने वाली चीज नहीं है और न ही इसे कोई सिखा सकता है. यह तो सैल्फ ग्रूमिंग से ही आती है.

तो जो एनएसडी और एफटीआईआई से आते हैं वे कौन होते हैं?

मैं आप की बात मानती हूं कि एनएसडी में अभिनय की बारीकियों को सिखाया जाता होगा, लेकिन आप ही बताएं कि कितने लोग हैं, जो एनएसडी और एफटीआईआई से निकल कर फिल्मों में हैं. इन की संख्या बहुत कम है. ज्यादातर को मौका नहीं मिलता. हालांकि मैं उन्हें अपने से बहुत अच्छा कलाकार मानती हूं. लेकिन उस कला का क्या फायदा जिसे दिखाने का मौका ही आप को न मिले.

थिएटर के मुकाबले टीवी में काम करना कितना आसान है?

मुझे थिएटर का ज्यादा ऐक्सपीरिएंस नहीं है, क्योंकि मैं ने बचपन में ही स्कूल थिएटर में भाग लिया था. मुझे नौनस्टौप बोलने से बड़ा डर लगता है. सैकड़ों की भीड़ में बिना कट के बोलना बहुत ही कठिन काम है. लेकिन टीवी में भी काम करना उतना आसान नहीं है. हफ्ते में रोज 12 से 14 घंटे बिना रुके शूटिंग करना कोई आसान काम नहीं. हम लोग एक दिन में 12 सीन तक शूट करते हैं, क्योंकि डेली सोप की शूटिंग रोज होती है. इस में तो हमें यह भी मालूम नहीं होता कि अगले दिन कहानी में क्या बदलाव आने वाला है. डेली सोप में किसी तरह की तैयारी करने का या रोल पर खास वर्क करने का समय नहीं मिलता है, क्योंकि शौट से 15 मिनट पहले ही स्क्रिप्ट हाथ में दी जाती है. तभी पता चल पाता है कि क्या करना है. लेकिन फिल्मों में ऐसी मारामारी नहीं है. वहां एक दिन में एक ही सीन शूट हो पाता है.

रिश्तों में कितना विश्वास रखती हैं?

हर शख्स का किसी न किसी से रिश्ता जरूर है. मैं व्यक्तिगत जीवन में रिश्तों को बहुत महत्त्व देती हूं. मैं आज भी अपना कोई भी काम मम्मीपापा से पूछे बिना नहीं करती. फिर हमारा शो भी रिश्तों के तानेबाने पर आधारित है, जिस में मेरा जाह्नवी का कैरेक्टर भी बहुत कुछ मेरी निजी जिंदगी के करीब है. मैं भी जाह्नवी की तरह भूत, भविष्य में विश्वास नहीं करती. बिंदास हूं, कमजोर नहीं और न ही जीवन की कठिनाइयों में आंसू बहाती हूं.

पंखुड़ी से जाह्नवी किस तरह अलग है?

दोनों में जमीनआसमान का अंतर है. ‘प्यार का दर्द है’ की पंखुड़ी तो बिलकुल ही बात नहीं करती थी. हमेशा गुमसुम सी खयालों में खोई रहती थी पर जाह्नवी ठीक इस के विपरीत है. वह कभी चुप नहीं बैठती. हमेशा फिल्मों का कोई न कोई डायलौग सुनाती रहती है. हां, जो दोनों में समानता है वह है फैमिली को प्यार करना. मैं निजी जिंदगी में पंखुड़ी के ज्यादा करीब हूं, क्योंकि मैं बहुत सीधीसादी सिंपल गर्ल हूं. मुझे ज्यादा शो औफ करना और बोलना पसंद नहीं है. शुरू में तो बहुत ही कम बात करती थी. अब जब सैट पर जाने लगी हूं, तो बोलने भी लगी हूं.

पहले शो के बाद 3 साल तक कहां गायब रहीं?

यह 3 साल का ब्रेक मैं ने कुछ प्लान करने के लिए ही लिया था पर वह प्लानिंग फेल हो गई, इसलिए वापस टीवी में आ गई. इस के पहले मेरे पास ‘गुलाम’ और ‘एक था राजा एक थी रानी’ के भी प्रस्ताव आए थे, लेकिन फाइनली मैं उन का हिस्सा न बन सकी. लेकिन मैं जैसी कहानी चाहती थी वैसी जब मुझे इस शो की लगी, तो मैं ने तुरंत हां कर दी.

आप अपने होने वाले जीवनसाथी में क्या देखेंगी?

अभी तो ऐसा कुछ नहीं सोचा है. हां, अगर कोई मिलता है तो मैं चाहूंगी कि वह तमीज वाला जरूर हो. वह सच्चा हो, दूसरों की इज्जत करने वाला हो, क्योंकि मुझे घर में बचपन से यही सिखाया गया है कि अगर इज्जत दोगे तो इज्जत मिलेगी और यही मैं अपने पार्टनर में चाहती हूं.

कोई फिल्म मिलती है तो किस तरह का रोल करने की तमन्ना है?

मैं फिल्म ‘दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे’ में सिमरन वाला रोल करना चाहती हूं. जब यह फिल्म आई थी तब मैं बहुत छोटी थी, लेकिन तब से ले कर अब तक मैं इसे कई बार देख चुकी हूं. काजोल और शाहरुख की मैं बहुत बड़ी फैन हूं.

खाली समय में क्या करती हैं?

मुझे शौपिंग करना बहुत पसंद है. जब भी मौका मिलता है, तो शौपिंग करने निकल जाती हूं. मैं फैशन ट्रैंड पर नजर रखती हूं और अपडेट रहती हूं. ट्रैंड में रहना ही मेरा स्टाइल मंत्र है. कुछ भी मैं नहीं पहन सकती. मैं ऐसे कपड़े पहनती हूं जिन में सहज महसूस कर सकूं. हैवी मेकअप मुझे बिलकुल पसंद नहीं है. अपना ज्यादा समय अपने साथी कलाकारों के साथ बिताती हूं, इसलिए कि वे सभी मेरे दोस्त हैं.      

पिछले जन्म और आज

हिंदू धर्म की जातिवादी सोच के पीछे पाप और पुण्य बहुत ज्यादा हावी हैं. हर रोज समझाया जाता है कि पिछले जन्म के कामों के हिसाब से आज का भाग्य लिख दिया जाता?है और सरकार व समाज को गलत ठहराने की कोशिश न करना. जब से राजाओं का राज गया और लोकतंत्र मजबूत हुआ, तब से धर्म की यह अफीम भरी चाशनी कि भाग्य और भगवान पर ही भरोसा करो, कम हो गया. लोगों को पता चलने लगा कि शासकों के फैसले ही उन के सुखों की चाबी है. अगर सरकार अच्छी है, तो जनता फलेगीफूलेगी और खराब, तो न कानून चलेगा, न सड़कें होंगी और न जनता को सुख मिलेगा.

भारतीय जनता पार्टी ने दशकों तक यह कह कर सत्ता में आना चाहा कि वह हिंदू धर्म की रक्षक है और हर हिंदू का फर्ज है कि धर्म को बचाने के लिए उसे वोट दे, पर धीरेधीरे अहसास हो गया कि जनता को लोकतंत्र में सरकार से कुछ और ज्यादा उम्मीदें हैं. इंदिरा गांधी 1971 में ‘गरीबी हटाओ’ के नारे पर जीती थीं. उस से पहले तो उन्हें अंगरेजों से छुटकारा दिलाने का इनाम नाम मिलता था. पश्चिम बंगाल और केरल में कम्यूनिस्ट गरीबों व मजदूरों के मसीहा बन कर राज कर सके. दूसरे राज्यों में पार्टियों ने सदियों से सताई, दबाई व कुचली जमातों के दर्द और बेबसी को भुनाया और जीत हासिल की. जब भाजपा को अहसास हो गया कि गरीब, लाचार की आवाज सुनना जरूरी है, तो उस ने विकास की बात करनी शुरू की और 2014 के लोकसभा व 2017 के विधानसभा चुनावों में वह बाजी मार ले गई.

हर युग में धर्म ने पैसा जमा भी किया है और खर्च भी किया है. जब तक कांग्रेस धन्ना सेठों को बहलाफुसला कर लाइसैंस कोटे दे कर या धमका कर पैसा वसूलती रही, वह जीतती रही. पर जब पार्टी कमजोर हो गई, तो पैसा कांगे्रसी नेता अपने घरों में भरने लगे, पार्टी को नहीं दे पाए और गरीबों की मसीहा होने की बात कहने तक को कांग्रेस के पास शायद पैसा नहीं बचा. दूसरी तरफ धर्म के नाम पर खूब पैसा जमा हुआ. बड़ी मेहनत से गांवगांव में मंदिर, आश्रम, मठ, मेले, मंत्र होने लगे, जिन में पैसा बना. आम आदमी को लगा कि इसी से उस का भाग्य बदलेगा. आखिर यही तो वह सदियों से सुनता आया है. उसे यह भी अहसास है कि दुनिया के ज्यादातर देशों में धर्म की दुकानदारी चमक रही है, क्योंकि वे पैसा जमा भी कर सकते हैं और प्रचार में खर्च भी कर सकते हैं.

अब मजबूत और कट्टर होती सरकार ने विकास को दूसरे दर्जे पर डाल दिया है. अब फिर भाग्य और भगवान की छाया दिखने लगी है. पूजापाठ, शुद्धीकरण, दंडवत प्रणाम, विधर्मी को कमजोर करना शुरू हो गया है. इस का नतीजा वही होगा, जो मुसलिम देशों में हो रहा है. जहां न लोकतंत्र है, न सरकार. अगर है तो बंदूक की नोक पर गुंडागर्दी. यही तो भाग्य है. अब भगवान ही भला करेगा

सुनो बेटा

‘‘मां, मुझे अपनी सहेली निशा के घर जाना है आज. उस ने क्लास में बहुत अच्छा नोट बनाया है. कल टैस्ट है. एक बार उस के घर जा कर पढ़ आती हूं. पास ही तो रहती है. स्कूटी से तुरंत जा कर आ जाऊंगी,’’ राशि ने अपनी मां सुधा से कहा.

‘‘यह कोई वक्त है लड़कियों का घर से बाहर निकलने का? देख रही हूं सुधा तूने इसे कुछ ज्यादा ही छूट दे रखी है. कुछ ऊंचनीच हो जाएगी, तो सिर धुनती रहना जीवन भर,’’ मां के कोई जवाब देने से पहले ही राशि की दादी बोल उठीं.

‘‘तुम्हें क्लास में ही उस से नोट ले लेना चाहिए था. आखिर रात होने का तुम ने इंतजार ही क्यों किया?’’ पापा ने घर में घुसते ही कहा.

‘‘बेटा, उस नोट को छोड़, खुद नोट बना ले. अब रात के 9 बजे तुम्हारा बाहर जाना उचित नहीं,’’ मां ने भी समझाया.

मन मसोस कर राशि अपने कमरे में जा कर पढ़ने बैठ गई.

करीब 1 घंटे के बाद राशि का भाई अपने कमरे से निकला और मां से बोला, ‘‘मां, शाम से बाहर नहीं निकला हूं, एक चक्कर लगा कर आता हूं,’’ और फिर बाइक ले बाहर चला गया. कहीं से कोई आवाज नहीं आई. किसी ने उस से कुछ नहीं पूछा या कहा.

दोहरी सोच

आम भारतीय घरों में कमोबेश यही स्थिति होती है. बेटी को तो हर समय आचारव्यवहार सिखाते रहेंगे. कभी दूसरे के घर जाने के नाम पर तो कभी जमाना बहुत खराब है के नाम पर. ऐसे न बोलो, ऐसे न चलो, ऐसे न करो आदि की लंबी सूची होती है बेटियों को सिखाने के लिए. कभी सीधेसीधे तो कभी घुमाफिरा कर बेटियों को बताया जाता है कि रास्ते में शोहदों को कैसे नजरअंदाज करना है. कोई फबती कसे तो कैसे चुपचाप कोई बखेड़ा खड़ा किए निकल लेना चाहिए. अगर कोई ऊंचनीच हो भी जाए तो गलतियां खोज कर लड़की को ही कुसूरवार ठहराया जाता है कि उस ने कपड़े ही ऐसे पहन रखे थे या रात के वक्त भला कहीं अच्छे घर की लड़कियां बाहर घूमती हैं? अखबार में छपी बलात्कार की खबरों को सुना कर उन्हें और भीरु बनाया जाता है. मगर बेटों के लिए यही सोच है कि अरे लड़का है इस के लिए क्या सोचना. कोई लड़की है क्या जो फिक्र की जाए कि कहां जा रही है? क्या कर रही है? दरअसल, परेशानी इसी सोच से है.

क्या ऐसा नहीं लगता कि परेशानी दरअसल लड़कों से ही है? क्या आप ने कभी सुना है कि कुछ लड़कियों ने मिल कर एक लड़के के साथ छेड़खानी की, बलात्कार किया या कुछ ऐसा ही और? नहीं न? सड़कों पर तेजी से दोपहिया वाहन चलाते हुए कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो दुर्घटनाग्रस्त या मरने वाले भी ज्यादातर लड़के ही होते हैं जबकि दोपहिया अब तो लड़कियां भी चलाती हैं.

बचपन से ही सिखाएं

लड़कियां शुरू से ही बहुत समझदार और संवेदनशील होती हैं. अब कुछ ज्ञान लड़कों को भी दिया जाना चाहिए. बेटों से बचपन से ही कहा जाता है, ‘अरे लड़की हो क्या जो रो रहे हो?’ ‘डरपोक, तुम लड़की हो क्या?’ ‘चूडि़यां पहन रखी हैं क्या?’ ‘अरे, तुम किचन में क्या कर रहे हो?’ वगैरहवगैरह. ऐसा बोल कर उन्हें शुरू से ही संवेदनहीन बना दिया जाता है.

बेटों को भी बचपन से ही सिखाना चाहिए कि लड़कियों की इज्जत करें. मां का यह कर्तव्य है कि अपने जिगर के टुकड़े को सिखाए कि राह चलती लड़कियों को घूरा न जाए. उन्हें कैसे इज्जत दी जाए.

दोष किस का

घर में बेटियों को नालायक लड़कों से बचने के गुण सिखाने के साथसाथ बेटों को लायक बनने के गुण भी बताए जाएं. बच्चे तो बच्चे होते हैं, कच्ची मिट्टी की तरह. जैसा चाहें हम उन्हें गढ़ सकते हैं, जैसा चाहें हम उन में सोच रोपित कर दें. फिर क्या लड़का और क्या लड़की.

आज जब हम किसी सड़क छाप मजनू या किसी बलात्कारी अथवा हिटलरशाही पति को देखते हैं, जो मनमानी करने को अपना हक समझता है, तो यह समझ लेना चाहिए कि दोष उस की परवरिश का भी है. सुधा ने तो बेटी को बाहर नहीं जाने दिया कि कुछ अनर्थ न हो जाए पर हो सकता है उस का भोला सा दिखने वाला लाल ही बाहर कोई अनर्थ कर आया हो.          

भगवा पर खफा अखिलेश यादव

वैसे तो किसी सरकार का कोई रंग नहीं होना चाहिये. लोकतंत्र में वोटबैंक की जरूरत ने सरकार को अलग अलग रंग में बांट दिया है. कहीं खादी है तो कही लाल, कहीं नीला है तो कहीं हरा, अब भगवा भी इसका हिस्सा बन गया है. ऐसे में उस रंग का कपड़ा पहनने वाले को उस पार्टी से जोड़ दिया जाता है. भगवा जैसे कपड़े पहनने वाले ने पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से उनके चाचा शिवपाल के बारे में सवाल पूछा तो अखिलेश यादव भड़क गये. चेहरा गुस्से से तनतना गया. सवाल से ज्यादा गुस्सा इस बात पर था कि सवाल भगवा जैसे कपड़े पहनने वाले ने पूछा. असल बात यह है कि अब कोई नेता यह नहीं चाहता कि उससे ऐसे सवाल हों, जो उसे असहज कर सकें. अखिलेश यह मानते हैं कि भगवा कपड़े पहन कर लोग उत्पात कर रहे हैं.

अखिलेश यादव अपने परिवार के झगड़े को शुरू से ही दूसरों द्वारा भड़काया मान रहे हैं. चुनाव में इस झगड़े से उनको काफी नुकसान हुआ. इस झगड़े के पीछे वह छिपे तौर पर भाजपा का हाथ मानते भी रहे हैं. यही वजह है कि अखिलेश हमेशा से ही भाजपा को चालाक लोगों की पार्टी कहते रहे हैं. भाजपा के सामने करारी हार के बाद उनका गुस्सा काबू से बाहर हो गया. मीडिया के बदले रुख का आकलन अखिलेश को हो गया है. ऐसे में वह अपने गुस्से को काबू में नहीं रख पाये. परिवार के झगड़े पर अखिलेश ने कहा कि किसी एक तय दिन उनसे सवाल कर लिये जायें और बारबार यह सवाल न हो.

अखिलेश प्रदेश में मुख्य विरोधी दल के नेता हैं. अभी मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटे हैं. उनके कामकाज को लेकर कई तरह की जांच और सवाल उठते रहेंगे, ऐसे में अखिलेश यादव सवालों से बच नहीं सकते. अखिलेश की परेशानी यह है कि उनके परिवार का झगड़ा अभी भी कायम है. दूसरा गुट बीचबीच में सवाल करता रहेगा ऐसे में उसके जवाब अखिलेश से पूछे जा सकते हैं. अखिलेश को ऐसे सवालों से बचने की जगह पर उसके जवाब देना चाहिये. यह सच है कि मीडिया खेमेबंदी का बड़ा हिस्सा बन चुकी है. ज्यादातर उसका फोकस सत्ता के समर्थन का होने लगा है.

कल तक यही मीडिया अखिलेश के हर काम में चमक देखती थी. आज योगी के हर काम में उसको चमत्कार नजर आ रहा है. कुर्सी पर बैठा नेता आलोचना सुनना पसंद नहीं करता, इसलिये मीडिया ने आलोचना की जगह पर गुणगान गाने शुरू कर दिये हैं. इसके लिये सत्ता में बैठे लोग ही सबसे अधिक जिम्मेदार हैं. समाज पर अपने काम से नहीं वोटबैंक के आधार पर बंट गया है. ऐसे में कोई भी विरोधी और समर्थक हो सकता है. नेता सवाल से अधिक यह देखता है कि उससे पूछने वाला कौन है? यह शुरुआत तो पहले से हो चुकी है, अब इसका अंत जल्द होगा दिखाई नहीं दे रहा है.  

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