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कैमरा लेंस के स्क्रैच और धूल को ऐसे करें साफ

स्मार्टफोन का कैमरा कितना भी दमदार क्यों न हो, एक समय के बाद उसके लेंस पर डस्ट दिखने लगती है. इतना ही नहीं, कैमरे पर स्क्रैच भी नजर आने लगते हैं. स्क्रैच और डस्ट के चलते फोटो की क्वालिटी भी खराब हो जाती है. फोटोज अच्छे नहीं आते हैं. इसी परेशानी को दूर करने के लिए कुछ आसान तरीके आपके सामने पेश है, जिससे फोन के कैमरे से स्क्रैच और डस्ट हटा सकते हैं.

हम आपको कुछ ऐसे टिप्स बताएंगे, जिनकी मदद से कैमरे के लेंस को साफ किया जा सकता है.

टूथपेस्ट और कॉटन बड्स

टूथपेस्ट को कैमरा लेंस पर लगाएं और कॉटन बड्स से क्लॉकवाइस 3 से 4 मिनट तक साफ करें. फिर पानी की बूंद डालकर उसे कॉटन से साफ कर दें. ध्यान रहे कि टूथपेस्ट बहुत ही थोड़ा लेना है.

इरेजर

किसी सॉफ्ट, क्लीन और बिना यूज की गए इरेजर से भी लेंस को साफ किया जा सकता है. इसके लिए इरेजर को लेंस पर किसी एक डायरेक्शन में घुमाकर साफ करना होगा.

एल्कोहल

पानी की 20 बूंद में रबिंग एल्कोहल की एक बूंद को मिलाएं. अब माइक्रोफाइबर क्लॉथ में इसे लगाकर कैमरे के लेंस को साफ करें. ऐसा कम से कम 5 बार करें.

वेसलीन का इस्तेमाल

इसके लिए आप वेसलीन का इस्तेमाल भी कर सकते हैं. उंगली में वैसलीन लेकर लेंस के चारों तरफ लगा दें. इसके बाद माइक्रोफाइबर क्लॉथ से उसे साफ कर दें.

स्क्रीन पॉलिश और स्क्रैच रिमूवर

मार्किट में स्क्रीन पॉलिश और स्क्रैच रिमूवर मौजूद है. इनमें से किसी से भी आप लेंस साफ कर सकते हैं. रीमूवर को लेंस पर लगाकर किसी सॉफ्ट कॉटन के कपड़े से साफ कर लेना चाहिए.

इस आदमी ने खोली नरेंद्र मोदी की पोल, देखिए वीडियो

सोशल मीडिया में इन दिनों एक वीडियो वायरल हो रहा है. इस वीडियो में एक शख्स प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा चलाई जा रही योजनाओं की पोल खोल रहा है. खास बात यह है कि इस कार्यक्रम में मौजूद सभी लोग इस व्यक्ति की बातों का समर्थन भी कर रहे हैं.

जैसे प्रधानमंत्री ने एक अभियान शुरू किया है. स्वच्छ भारत अभियान भारत सरकार द्वारा आरम्भ किया गया राष्ट्रीय स्तर का अभियान है जिसका उद्देश्य गलियों, सड़कों तथा अधोसंरचना को साफ-सुथरा करना है. यह अभियान महात्मा गाँधी के जन्मदिवस पर आरम्भ किया गया. महात्मा गांधी ने अपने आसपास के लोगों को स्वच्छता बनाए रखने संबंधी शिक्षा प्रदान कर राष्ट्र को एक उत्कृष्ट संदेश दिया था.

अब इस योजना की और इसी तरह की अन्य योजनाओं की पोल कैसे खोली जा रही है, इसके लिए आपको ये वीडियो देखना होगा…

उपचुनाव नतीजे

10 विधानसभा सीटों के उपचुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने 5 सीटें जीत कर एक बार फिर साबित कर दिया कि मेहनत तो राजनीति में भी करनी होती है चाहे आप के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसा संगठन क्यों न हो जो लगातार काम कर रहा है वरना जीत संभव नहीं है. कांग्रेस ने बुरा प्रदर्शन नहीं किया पर आम आदमी पार्टी ने तो दिल्ली में अपने ढोल की पोल खोल दी. जहां अमित शाह और नरेंद्र मोदी रातदिन मतदाताओं को लुभाने के लिए दौड़भाग करते रहे, वहीं अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की बागडोर मनीष सिसोदिया पर छोड़ कर एक तरह से राजनीतिक मौजमस्ती का रास्ता अपना लिया.

राजनीति में रातदिन मेहनत करना जरूरी है. पर कुछ को लगता है कि यह तो मुफ्त की रोटी दिलाने वाला धंधा है. सत्ता पाना एक टेढ़ा और मेहनती काम है जिस में जूते घिसने भी पड़ते हैं, खाने भी पड़ते हैं. जहां भाजपा 2014 में दिल्ली विधानसभा चुनावों में 70 में से केवल 3 सीटें पा कर भी सक्रिय बनी रही, वहीं आम आदमी पार्टी 67 सीटें पा कर भी निष्क्रिय हो कर बैठेबिठाए पंजाब व गोवा में पके फल टपकने का इंतजार करने लगी.

राजनीति में सही बात कहने से ज्यादा सफलता का राज हरदम कुछ करते रहना दिखना है. 2004 से पहले 5 साल सोनिया गांधी ने देशभर में तूफानी दौरे किए थे. वे पार्टी में सक्रिय थीं, लोकसभा में सक्रिय थीं, जमीन पर सक्रिय थीं. 2010-11 से, बीमारी के बाद, उन की गति धीमी हो गई और राहुल गांधी राजनीति को पिकनिक समझ कर कभी आते, कभी सो जाते.

इन उपचुनावों में यह भी दिख रहा है कि यदि नेता काम करें तो नीतियां गलत हों या सही, फल निकलता ही है. कर्नाटक के सिद्धारमैया ने दोनों सीटे जीत लीं क्योंकि वे लगातार अखबारों में छाए रहे और सही छवि के कारण विवादों में नहीं आए. इधर, अरविंद केजरीवाल सिर्फ उपराज्यपाल से झगड़ने के मौके ढूंढ़ते रहे.

देश में अब भाजपा के नेताओं के अलावा बाकी सब ने, ममता बनर्जी अपवाद हैं, एक तरह से अपनी जैसी भी हालत है, का मजा लेना शुरू कर दिया है और उन्हें दरबारियों, चाटुकारों, हुक्मबरदारों के बीच घिरा रहना ही पसंद आ रहा है.

जब लड़ाई के मैदान में एक राजा औरतों का नाच देख रहा हो तो दूसरा जीतेगा ही, चाहे उस के पास फौज कम ही हो. यहां तो भाजपा की फौज अब कहीं अधिक पावरफुल, रिसोर्सफुल और एनर्जीफुल है. उस की जीत पर क्या आश्चर्य.

नस्लभेद का नासूर

विश्वभर में हिंसा का रंग और सुर्ख हो रहा है. अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस से ले कर भारत तक कुदरती इंसानी रंगों की आपसी नफरत और गहरी होती जा रही है. ग्रेटर नोएडा में नाइजीरियाई छात्रों के साथ हुई हिंसा से भारत की वर्ण, रंगभेदी सोच उजागर हुई है.

मामले की गूंज सोशल मीडिया से ले कर भारतीय संसद और अफ्रीकी देशों तक पहुंच गई. अफ्रीकी देशों ने नाइजीरियाई छात्रों पर हुए हमले को नस्लभेदी हमला करार दिया है. अफ्रीकी राजदूतों के समूह की बैठक में हमले को विदेशियों से घृणा और नस्लवादी सोच से युक्त बताया गया. हालांकि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने जांच के आदेश दे दिए पर सरकार इसे नस्लीय हमला मानने को तैयार नहीं है.

क्या है मामला

24 मार्च को ग्रेटर नोएडा की एनसीजी रैजिडेंसी सोसायटी में रहने वाला 19 वर्षीय मनीष खारी गायब हो गया तो उस के परिवार ने कासना पुलिस स्टेशन में कुछ नाइजीरियाई युवकों के खिलाफ अपहरण व हमले की रिपोर्ट दर्ज कराई.

अगले दिन मनीष अपने घर के पास बेहोशी की हालत में मिला. उसे अस्पताल ले जाया गया. वहां उसे ओवरडोज ड्रग सेवन के संदेह में मृत घोषित कर दिया गया. पुलिस ने मामले में 5 नाइजीरियाइयों को पकड़ा. अगले दिन नाइजीरियाइयों के समूह ने कासना पुलिस स्टेशन के बाहर पकड़े गए युवकों को छोड़ने के लिए विरोध प्रदर्शन किया. पुलिस को इन के खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला.

नाइजीरियाइयों को छोड़ने के बाद 27 मार्च को एसएसपी कार्यालय के बाहर स्थानीय लोग जमा हुए और उन की गिरफ्तारी के लिए परी चौक को ब्लौक कर दिया गया. कैंडल लाइट प्रदर्शन किया गया और इसी दौरान कई नाइजीरियाई छात्रों की पिटाई कर दी गई.

घटना के बाद क्षेत्र में तनाव फैल गया. ग्रेटर नोएडा की रिहायशी कालोनियों में रहने वाले अफ्रीकी छात्रों को घर खाली कर चले जाने को कहा गया. प्रशासन द्वारा तनाव के हालात को देख कर 28 मार्च को परी चौक और आसपास के इलाकों में अतिरिक्त रैपिड ऐक्शन फोर्स तैनात कर दी गई. नौलेज पार्क, कासना, सूरजपुर, एच्छर, ओमीक्रोन सैक्टर, ओमेगा, पी4  रिहायशी सोसायटियों में रहने वाले अफ्रीकी छात्रों की सुरक्षा के लिए सुरक्षाकर्मी तैनात करने पड़े.

प्रशासन ने स्थानीय रैजिडैंट वैलफेयर एसोसिएशन और अफ्रीकी छात्रों के प्रतिनिधियों के साथ शांति बनाए रखने के लिए बैठक कर दोनों ओर के लोगों को समझाने का प्रयास किया.

रंगभेद की मार

अफ्रीकी छात्र यहां के कालेज और विश्वविद्यालयों में बड़ी तादाद में पढ़ रहे हैं. 2007-08 के बाद से इन छात्रों की तादाद बढ़ रही है. भारत में कुछ विदेशी छात्रों में से अफ्रीकी 19 प्रतिशत बताए जाते हैं. ये छात्र नियमित तौर पर आएदिन रंगभेद के शिकार हो रहे हैं. रंगों को ले कर इन पर फब्तियां कसी जाती हैं. उन्हें ब्लैक मंकी, कालू आदि कहा जाता है.

इन पर आरोप लगते हैं कि ये नशे का कारोबार करते हैं. यह भी आरोप लगाया जाता है कि भारतीय युवकयुवतियां भी नशे की वजह से इन के साथ रहते हैं. सवाल उठता है कि भारतीय युवा ड्रग लेते ही क्यों हैं? कहा जाता है कि मृतक मनीष खारी भी अपने पड़ोस में रहने वाले इन नाइजीरियाई छात्रों के साथ नशा करता था.

यह पहली घटना नहीं है. पिछले साल दिल्ली में ही एक कांगो छात्र की पिटाई से मौत हो गई थी. इस से पहले एक तंजानियाई युवक को बेंगलुरु में भीड़ ने मार डाला था. मई 2016 में करीब 12 अफ्रीकी युवक और युवतियों के साथ, उन की फ्री लाइफस्टाइल पर विरोध जताते हुए दिल्ली में मारपीट की गई. 2014 में दिल्ली के ही राजीव चौक मैट्रो स्टेशन पर अफ्रीकी छात्र को भीड़ द्वारा पीटा गया.

जनवरी 2014 में आम आदमी पार्टी के नेता सोमनाथ भारती के समर्थकों द्वारा दक्षिण दिल्ली के खिड़की ऐक्सटैंशन इलाके में ड्रग और सैक्स रैकेट चलाने के संदेह में इन लोगों के साथ हिंसा की गई. इस घटना में 2 नाइजीरियाई और 2 युगांडा की महिलाएं घायल हो गई थीं, जिन्हें एम्स में भरती कराया गया था.

भारतीय बड़ी संख्या में विदेशों में रहते हैं. हजारों लोग नौकरियां कर रहे हैं तो हजारों पढ़ाई कर रहे हैं. अमेरिका, आस्टे्रलिया, कनाडा, फ्रांस जैसे देशों में भारतीयों के साथ धार्मिक भेदभाव और हिंसा की घटनाएं आएदिन सुर्खियों में रहती हैं. कई बार इन्हें देश छोड़ कर चले जाने को कहा जाता है.

ग्रेटर नोएडा में बड़ी तादाद में अफ्रीकी युवक पढ़ाई के सिलसिले में रह रहे हैं. हिंसा के बाद स्थानीय लोगों में इन के खिलाफ गुस्सा है. इन लोगों ने नाइजीरियाई युवकों से कहा कि वे यहां न रहें. हमले का आरोप लगाने वाली केन्याई युवती मारिया बुरेंडी ने तो भारत छोड़ने का फैसला कर लिया.

एस्टोनिया सोसायटी में रहने वाले अब्दुल ने कहा कि घटना के बाद हम भयभीत हैं. जब से मैं यहां आया हूं, हमारे साथ अनैतिक व्यवहार किया जाता है. लोग उंगलियों से हमारी ओर इशारा करते हैं. हम पर हंसते हैं जैसे हम कोई इंसान नहीं हैं. हमारे साथ भेदभाव बरता जाता है. यह भारतीयों द्वारा हमारे साथ नस्लभेद व्यवहार है.

बीएससी छात्र वाशिम के अनुसार, ‘‘मैं घर के अंदर बंद हूं और भयभीत हूं. मैं यहां पिछले साल सितंबर में आया था. मैं सोच रहा हूं वापस देश लौट जाऊं. मैं टिकट बनवाने की प्लानिंग कर रहा हूं.

मैं अब यहां किसी भी तरह नहीं रुक सकता. अफ्रीकियों में कुछ लोग ड्रग्स के मामलों में लिप्त हो सकते हैं पर आप सभी को कैसे शामिल कर सकते हैं.

भेदभाव हमारी संस्कृति है

असल में रंगभेद वर्णव्यवस्था का रूप है, भारत में जाति और वर्ण का बोलबाला रहा है, इसलिए यहां हमेशा गोरे और कालों का झगड़ा रहा है. सदियों से यहां शूद्र, दलितों के साथ गुलामों जैसा व्यवहार किया गया. आमतौर पर शूद्र और दलित काले तथा सवर्ण गोरे होते माने गए. इसलिए शूद्रों व दलितों के साथ छुआछूत, भेदभाव, हिंसा होती रही है. विश्वभर में अपने से काली चमड़ी का मजाक उड़ाया जाता है.

भेदभाव हमारी सदियों पुरानी संस्कृति है. यहां वर्ण और जातियां सदैव भेदभाव से त्रस्त रही हैं. खुद को ऊंचा समझने वालों ने अपने से निचले को हीन समझा और उस के साथ भेदभाव बरता. यहां सवर्ण पिछड़ों और पिछड़े दलितों के साथ गैर बराबरी का व्यवहार करते आए हैं. ग्रेटर नोएडा के जिस पिछड़े गुर्जर समुदाय ने नाइजीरियाइयों को मारापीटा, वे खुद सवर्णों से उपेक्षित रहे.

अब वे खुद कभी दलितों के साथ वही व्यवहार कर के सुर्खियों में आते हैं तो कभी मुसलमानों के खिलाफ. उन्होंने खुद को दलितों से और अब दक्षिण अफ्रीकियों से ऊंचा समझ लिया. यह ऊंचनीच की सोच हमारे खून में रचीबसी हुई है. उत्तर प्रदेश के इस क्षेत्र में इस तरह की घटनाएं आम हैं. इस बार दलितों, मुसलमानों की जगह नाइजीरियाई काले भेदभाव की चपेट में आ बैठे.

भारत में दलित और अफ्रीका के अश्वेत तो जन्मजात गैरबराबरी के शिकार रहे हैं. दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद कानून 1948 में बना था पर वहां की गोरी सरकारें कालों के खिलाफ भेदभावपूर्ण रवैया अपनाना जारी रखे हुई थीं. वहां की कुल आबादी के तीनचौथाई अश्वेत थे और अर्थव्यवस्था उन्हीं के श्रम पर आधारित थी पर सारी सुविधाएं मुट्ठीभर गोरे लोगों को मिलती थीं. 70 प्रतिशत जमीन गोरों के कब्जे में थी. रंगभेद के खिलाफ नेल्सन मंडेला को लंबा संघर्ष करना पड़ा.

भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख सिद्धांत रंगनीति का विरोध रहा है. स्वतंत्रता से पहले भारत ने दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति का विरोध किया था. रंगभेद समर्थक दक्षिण अफ्रीकी सरकार के विरुद्घ 1954 में संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से प्रतिबंध लगाने में भारत सक्रिय रहा. इसी नीति के कारण भारत ने 1954 में दक्षिण अफ्रीका से अपने कूटनीतिक संबंध तोड़ लिए थे. भारत तथा अन्य देशों के दबाव के कारण दक्षिण अफ्रीका को राष्ट्रमंडल से बाहर होना पड़ा था. महात्मा गांधी ने रंगभेद नीति का विरोध किया

और अफ्रीका जा कर वहां के लोगों को इस समस्या से मुक्ति दिलाने के लिए जनआंदोलन शुरू किया.

दक्षिण अफ्रीका में एक दौर था जब नस्लीय भेदभाव चरम पर था. सुविधाएं रंग के आधार पर बंटी हुई थीं. बसस्टैंड फौर ओनली व्हाइट, समुद्र बीच केवल व्हाइट रेस गु्रप के लिए, भूमिगत मार्ग से प्रवेश केवल गोरों के लिए, बसों, टे्रनों में अलग सीटें, अलग टौयलेट, अलग पार्क, अलग पब्लिक टैलीफोन बाकायदा इस तरह की सुविधाएं कानून बना कर दी गई थीं.

घृणा का डंक

नस्लभेद के चलते दुनिया को बड़ा नुकसान झेलना पड़ा है. पिछली सदी के 2 महायुद्धों में 65 लाख से ज्यादा लोगों की हत्याओं के पीछे भयंकर नस्लभेद कानून और इस के अगुआ यूरोपीय देशों के गोरे शासक थे. यूरोप की सभ्यता जब दुनिया के चारों कोनों में पांव पसार रही थी तब गुलाम देशों के लोगों पर, बंदूक के बल पर, बर्बर रंगभेद कानून थोपे गए.

मानवता के खिलाफ घृणा का डंक खुद भारत ने बहुत झेला है. सामूहिक तौर पर होने वाली हिंसा से बहुत भारी नुकसान होता है लेकिन क्या हमें अमेरिकी समाज में छिपी गैरबराबरी पर उंगली उठाने का हक है? असमानता के मामले में हमारा अतीत अमेरिका से कहीं अधिक बुरा है. हमारे संविधान ने जो बराबरी दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों को दी है क्या वह हम वास्तविक तौर पर दे रहे हैं. क्या हमारी आर्थिक गैरबराबरी में हमारे सामाजिक अन्याय की हकीकत भी शामिल नहीं है?

किसी भी देश की तरक्की में धार्मिक, नस्लीय भेदभाव व हिंसा प्रमुख बाधाएं हैं. ऐसे में भारत फिलिस्तीन, इसराईल, वियतनाम की ओर ही जा रहा है. भारत तरक्की में चीन, अमेरिका या जापान की बराबरी नहीं कर पाएगा. ये देश धर्म के अवलंबन के बगैर आगे बढे़ हैं.

ग्रेटर नोएडा में अफ्रीकियों के साथ किए गए दुर्व्यवहार से देश की छवि को गहरा नुकसान हुआ है. ऐसी घटनाओं से भारतीयों की नस्लभेदी सोच उजागर होती है. नस्लीय भेदभाव से अंतर्राष्ट्रीय संबंध भी प्रभावित होते हैं.

हम अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कनाडा की निंदा करते हैं क्योंकि वहां भारतीयों पर नस्ल, रंगभेद के नाम पर हमले होते हैं. वहां अश्वेतों के साथ हिंसा बढ़ रही है. हम यह तो चाहते हैं कि विदेशों में रह रहे भारतीय सुरक्षित रहें, उन के साथ धार्मिक भेदभाव न हो पर इस के उलट, भारत में हम यदि विदेशियों के साथ वही व्यवहार करें तो दुनियाभर में भारतीयों पर हो रहे हमलों को हम गलत ठहराने का नैतिक व राजनयिक हक खो रहे हैं.

अमेरिका जैसा पुराना लोकतांत्रिक, प्रगतिशील देश रंगभेद को खत्म करने में असफल साबित होता दिख रहा है. वहां शासकीय स्तर पर धार्मिक, नस्लीय विचार ज्यादा दृढ़ता से मजबूत होते जा रहे हैं. अश्वेतों, दूसरे धर्मों के प्रति हिंसा बढ़ रही है. अश्वेतों द्वारा शुरू किया गया ब्लैक लाइव्ज मैटर जैसा आंदोलन अब खामोश दिख रहा है.

विश्वभर में फैल रही धार्मिक, नस्लीय सोच केवल पीडि़त अल्पसंख्यकों, अश्वेतों या स्त्रियों के लिए खतरा नहीं है, वह समस्त समाज के लिए खतरा है. वह स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व के संवैधानिक मूल्यों और समाज के दबेकुचले वर्गों की बेहतरी के लिए उठाए गए कदमों के लिए भी खतरा है.

धार्मिक, जातीय, नस्लीय भेदभाव का सवाल पूरी दुनिया के सामने है. विश्व के 2 बड़े लोकतंत्रों भारत और अमेरिका के भीतर ही नहीं, सारी दुनिया में बराबरी के लिए वास्तविक क्रांति बाकी है. जो पिट रहे हैं वे कहीं अश्वेत हैं, कहीं दलित हैं, कहीं आदिवासी हैं और हर जगह स्त्रियां हैं. इन तमाम लोगों को समाज से बाहर रख कर न देश स्वस्थ, सुखी रह सकता है, न समाज और न व्यक्ति.

दुनिया में समानता खुशहाली, तरक्की की पहली शर्त है. गैर बराबरी में तो बरबादी ही बरबादी है. यकीन न हो तो जोहान्सबर्ग, वर्जीनिया से ले कर गोहाना, मिर्चपुर की जली हुई बस्तियां देखी जा सकती हैं.            

दिवालिया हो गई किम?

फिल्म ‘मोहब्बतें’ से अभिनेत्री किम शर्मा ने फिल्म जगत में डैब्यू किया था. यशराज बैनर्स से मिले इस मौके को वह अपने कैरियर में बहुत ज्यादा भुना तो नहीं पाई लेकिन क्रिकेटर युवराज सिंह के साथ चले प्रेमप्रसंग ने जरूर उसे चर्चा में रखा. इस से पहले युवराज उस से शादी करते, किम ने केन्या बेस्ड बिजनैसमैन अली पुंजानी से शादी कर डाली.

बहरहाल, यहां तक तो सब ठीक था. अपना बोरियाबिस्तर समेट कर वह विदेश भी चली गई. लेकिन अब खबर है कि उस के पति ने उसे ‘दिवालिया’ कर दिया है. हालांकि किम इस बात का खंडन कर रही है और इसे पतिपत्नी और वो वाला मामला मान कर चल रही है. दरअसल, किम के पति ने दूसरी महिला के चलते उस से रिश्ता तोड़ लिया है. और फिर इसी बात से यह बात निकली कि पति से अलग होने के बाद किम मुंबई लौट आई और बीते कुछ महीनों से वह आर्थिक समस्याओं का सामना कर रही है. सीधी जबान में कहें तो न उस के पास अभी कोई फिल्म है और न ही बिजनैस. इसलिए बात यहां तक कही जा रही है कि वह दिवालिया हो गई है.

एक्टिंग में उलझना नहीं चाहती : रश्मि सचदेवा

मिसेज यूनिवर्स रश्मि सचदेवा को देख कर कोई नहीं कह सकता कि उन की 21 साल की बेटी भी है. शादी के बाद फैशन की दुनिया में रश्मि ने वह सबकुछ हासिल किया जो किसी प्रोफैशनल मौडल का सपना होता है.

दिल्ली एनसीआर से शुरू हुआ उन का सफर मिसेज यूनिवर्स तक पहुंचा. आज वे बड़ी मौडल की तरह सैलिब्रिटी हैं. लखनऊ में मिसेज यूपी के जजमैंट पैनल में शामिल होने आईं रश्मि ने कहा, ‘‘फोटो खिंचवाने का शौक शुरू से था. पहली बार मुझे ‘सरिता’ पत्रिका में यह मौका मिला. उस समय सरिता में अंदर छपने वाली शायरी के साथ मेरी फोटो छपी थी. मैं ग्रेजुएशन के पहले साल में थी, तब शादी हुई. शादी के बाद बेटी हुई. मैं ने अपनी पढ़ाई जारी रखी.

‘‘मिसेज दिल्ली एनसीआर प्रतिभागिता में मेरी एक दोस्त हिस्सा ले रही थी. मेरी बेटी ने देखा तो वह बोली कि मैं भी इस में हिस्सा लूं. बेटी की बात का समर्थन पति ने भी किया. वहां से दोबारा मैं ने फैशन की दुनिया में कदम रखा. यह सफर मिसेज इंडिया और मिसेज यूनिवर्स तक पहुंच गया.’’

रश्मि के पति चार्टर्ड अकाउंटैंट हैं. बेटी अंगरेजी औनर्स की पढ़ाई कर रही है. रश्मि ऐक्ंिटग में जाना नहीं चाहतीं. वे कहती हैं, ‘‘मेरे लिए परिवार को समय देना सब से जरूरी है. उस के साथ जो मैं कर सकती हूं वही करना चाहती हूं. ऐक्ंिटग में समय बहुत लगता है. मौडलिंग और फैशन शो बहुत समय नहीं लेते. घरपरिवार के साथ इन को मैनेज किया जा सकता है.’’

रश्मि आज भी किसी मौडल की तरह स्लिम दिखती हैं. अपनी फिटनैस के बारे में वे कहती हैं, ‘‘मैं जिम के बजाय मौर्निंग वाक पर ज्यादा फोकस करती हूं. रोज कम से कम 40 मिनट की वाक करती हूं. क्रैश डाइट पर यकीन नहीं करती. हैल्दी और क्वालिटी फूड लेती हूं. 40 वर्ष के बाद महिलाओं में तमाम तरह की हैल्थ प्रौब्लम होती हैं. इन में थायराइड और विटामिंस की कमी सब से ज्यादा होती हैं. ऐसे में जिम करने से बौडी को नुकसान हो सकता है. ऐसे में वाकिंग सब से बेहतर लगती है. जब प्रैग्नैंसी होती है तो प्रैग्नैंसी के बाद बढ़े हुए वजन को कम करना सब से जरूरी होता है. एक बार वह कम हो जाए तो फिटनैस को हासिल करना

सरल हो जाता है. मैं ने प्रैग्नैंसी के समय अपना 12 किलो वजन कम किया था.’’

रश्मि थैलीसिमिया फांउडेशन के साथ जुड़ कर काम कर रही हैं. उन्होंने कई पंजाबी म्यूजिक एलबमों में भी काम किया है. रश्मि कहती हैं, ‘‘फैशन की फील्ड को ले कर खुलेपन और शोषण की जो बातें होती हैं वे उतनी सही नहीं हैं. अगर कोई बिना किसी तरह के समझौते के काम करना चाहता है तो वह भी काम कर सकता है. –

अब मैं सोच कर काम करता हूं : गोविंदा

अभिनेता गोविंदा अपने कैरियर की ढलान पर हैं. सालों से कोई सफल फिल्म देने में असफल रहे गोविंदा ने अपने होम प्रोडक्शन में ‘आ गया हीरो’ फिल्म से बतौर सोलो हीरो वापसी की तो यह फिल्म भी बुरी तरह से पिट गई. अब उन्हें अपने कैरियर को ले कर नई रणनीति बनाने की जरूरत है. एक समय में वे भले ही स्टार थे, उन की तूती बोलती थी, पर अब समय पूरी तरह से बदल चुका है. अब उन का कड़ा मुकाबला ऊर्जावान कलाकारों से है. ऐसे में गोविंदा अपनी पुरानी अदाओं व घिसेपिटे फार्मूलों पर आधारित फिल्मों की बदौलत दोबारा स्टारडम हासिल कर पाएंगे, बहुत मुश्किल लगता है.

फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश पाना उन के लिए मुश्किल भले ही था, पर अपनी जिंदादिली और हंसमुख स्वभाव की वजह से वे बहुत कम समय में दर्शकों के चहेते बन गए थे. उन के जैसी कौमेडी करने वाला अभिनेता आज भी नहीं है. यही वजह थी कि उन्होंने एक समय में 3 हफ्तों में 49 फिल्में साइन की थीं. यह अलग बात है कि आज उन के पास एक भी ढंग की फिल्म नहीं है.

गोविंदा का असली नाम गोविंद अरुण कुमार आहूजा है. अपने 6 भाईबहनों में सब से छोटे होने की वजह से उन्हें चीची बुलाया जाता है, जिस का पंजाबी में शाब्दिक अर्थ छोटी उंगली होता है. गोविंदा को फिल्मों में आने की प्रेरणा फिल्म ‘डिस्को डांसर’ से मिली, जिस में मिथुन चक्रवर्ती के डांस से वे काफी प्रभावित हुए. अपने डांस की वीडियो कैसेट्स बना कर वे फिल्म निर्माताओं को भेजते रहते थे.

गोविंदा को फिल्मों में लीड रोल उन के मामा आनंद सिंह ने फिल्म ‘तनबदन’ में दिया, जो ऋषिकेश मुखर्जी के सहायक निर्देशक थे. उन की पहली फिल्म ‘लव 86’ थी. ‘स्ट्रीट डांसर’ फिल्म में उन का अभिनय उन के कैरियर का टर्निंगपौइंट था. इस के बाद उन्हें पीछे मुड़ कर देखना नहीं पड़ा. अपनी इस सफलता का श्रेय वे अपनी मां को देते हैं जिन्होंने हर समय उन्हें आगे बढ़ने का साहस दिया. आज गोविंदा वैसे ही चुस्तदुरुस्त दिखते हैं. अपने फिल्मी सफर की शुरुआत व संघर्ष को ले कर वे कहते हैं, ‘‘पहले फिल्मों में आना आसान नहीं था. किसी भी प्रोडक्शन हाउस के बाहर घंटों बैठे इंतजार करते रहना पड़ता था. जब प्रोड्यूसर आता था तो मैं सर, सर करता हुआ आगे बढ़ता, लेकिन तब तक वे आगे निकल जाते. इस तरह इंतजार चलता रहता था. इस सिस्टम से बाहर आने के लिए मैं वहां की यूनिट के लोगों को वीडियो कैसेट्स बना कर उन के हाथ में दे दिया करता था और निर्मातानिर्देशक के फ्री होने पर उन्हें देने को कहता था. यह आसान तरीका था. उन्हें इस काम के लिए कभीकभी खाना खिला दिया करता था. इस तरह सही मैसेज मुझे उन लोगों से मिलता था.

वे आगे कहते हैं, ‘‘मुझे बाहर से अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ा था. कई बार निर्देशक मुझे बुला कर बातचीत कर लेते थे. मेरे काम की तारीफें भी करते थे और चांस देने की बात भी करते थे. इस तरह कोई मुझे अंदर आने से रोकता नहीं था.

वे आगे कहते हैं, ‘‘फिर एक समय  ऐसा भी आया जब मैं ने 3 हफ्तों में 49 फिल्में साइन की थीं. मुझे लगा कि यह थोड़ा अधिक हो रहा है, कैसे और कब करूंगा, समझ नहीं पा रहा था. मेरी सैक्रेटरी कीर्ति मुझे इतना काम करने से मना करती थी ताकिमैं बीमार न हो जाऊं. बीमारी की वजह से कई बार अस्पताल में भी रहा. उस समय लोग ऐसे ही काम करते थे. अब फिल्मलाइन अलग हो चुकी है, यह सही भी है, मैं उसे मिस नहीं करता.’’ अपनी कमजोरी और स्ट्रौंग पौइंट्स की उन्हें कब समझ आई, इस सवाल पर गोविंदा बताते हैं, ‘‘अभिनय के क्षेत्र में मुझे समझा दिया गया था कि जो लोग फिल्म देखने आ रहे है उन्हें आप की मेहनत के बारे में कुछ पता नहीं है. अगर फिल्म अच्छी नहीं बनी तो वे उसे नकार देंगे, इस का मुझे भय था. इसलिए ईमानदारी अधिक हुई और मेहनत दोगुनी हो गई. समय कम था, अधिक फिल्में साइन कर ली थीं. भाषा का ज्ञान अधिक नहीं था. सबकुछ सुधारने में बहुत मेहनत करनी पड़ी.

‘‘मैं जब कामयाबी के शिखर पर था तो मेरी मां बीमार पड़ गईं. मेरे पास उन से मिलने का समय नहीं था. उन्होंने कहा कि मेरा अंतिम समय आ गया है और उन्होंने 49 वर्ष की उम्र तक काम करने का आशीर्वाद दिया. मैं हंसने लगा और कहा कि आप के बिना जिंदगी नहीं. लेकिन वे अब नहीं रहीं. मैं ने कामयाबी पाई, दुनिया देखी और यहां तक पहुंचा हूं. पहले मैं काम कर के सोचता था, अब सोच कर काम करता हूं.’’

हिंदी सिनेमा इंडस्ट्री में आए बदलाव को ले कर गोविंदा का मानना है, ‘‘उस समय लोगों को अपने काम से बहुत लगाव था. सब लोग सच्चे दिल से काम करते थे. सही हो या गलत, लोग सामने कहने से घबराते नहीं थे. इस से काम में भी फर्क आता था. आज के कलाकारों में वह व्याकुलता दिखाई नहीं देती. सभी ने गैजेट्स के जरिए दुनिया को देख लिया है. वे काम से पहले उस की तकनीक को समझ लेते हैं. इसलिए इन के द्वारा किए गए काम से दर्शक भी कनैक्ट नहीं होते और एक फिल्म को एक बार देखने के बाद दोबारा देखना नहीं चाहते.

‘‘मुझे याद आता है जब मेरी मां बहुत बीमार थीं और उन का अंतिम समय आ चुका था तो मैं हर दिन उन से क्या पूछना है, उस की लिस्ट बनाता था. उन से मिल कर रोता था और सैट पर आ कर कौमेडी सींस करता था, डरता था कि कब वे मुझे छोड़ कर दुनिया से चली जाएं और मैं यहां काम ही करता रहूं.’’

गोविंदा ने ज्यादातर सकारात्मक भूमिकाएं निभाई हैं. ऐसे में कुछ फिल्मों में नकारात्मक भूमिका निभाने की वजह क्या रही, इस सवाल का जवाब वे यों देते हैं, ‘‘उस समय सही औफर नहीं मिल रहे थे. फिल्म ‘देवदास’ में मुझे चुन्नीलाल की भूमिका औफर की गई थी. मैं ने निर्देशक से कहा कि आप मुझ में चुन्नीलाल कहां से देखते हैं. मैं ने मना कर दिया था. फिर नकारात्मक भूमिकाएं मिलने लगी. फिर जो काम मिला, मैं ने उसी को करना बेहतर समझा. इस के अलावा कलाकार का संघर्ष हमेशा चलता रहता है.’’ अभिभावक के तौर पर गोविंदा किस तरह के हैं, इस पर वे बताते हैं, ‘‘मैं बचपन से ही अधिक कठोर स्वभाव का नहीं हूं, क्योंकि मैं ने बहुत कठिन समय देखा है. चाहता हूं कि बच्चे अपनी इस उम्र को एंजौय करें. राजनीति में आने के गलत निर्णय ने बच्चों की सहजता को खराब कर दिया था.

‘‘बुजुर्गों ने मुझे राजनीति में जाने की सलाह दी थी. मेरे पिता ने कहा था कि जिन की वजह से तुम यहां तक पहुंचे हो, उन की बात को कभी मत टालना. मुझे राजनीति की कोई जानकारी नहीं थी. मेरे राजनीति में आने की कोई वजह नहीं थी. मैं ने कोई गलत काम भी तो नहीं किया था, फिर क्यों आया? मैं अपनेआप से पूछता हूं. इस से मेरा पूरा परिवार डिस्टर्ब हो गया था.’’और आखिर में कौमेडी फिल्मों को ले कर वे कहते हैं, ‘‘मेरी फिल्में कौमेडी नहीं होती थीं. फिल्मों में कौमेडी का पुट होता था. जो सब को पसंद आ गया और यह दौर 15 साल तक चला. आजकल तो कौमेडी लिखी जाती है. लोगों की व्याकुलता बढ़ गई  है.’

भारत के लिए चुनौती रेशम मार्ग पर चलती रेल

चीन से ब्रिटेन की दूरी हजारों किलोमीटर है. अकसर ऐसी दूरियां विमान या फिर पानी के जहाज से तय की जाती हैं, ट्रेन से नहीं. पर वर्ष 2017 में इस मिथक को तोड़ने की एक शुरुआत चीन से की गई. यहां साल के आरंभ में चीन के झेजियांग प्रांत के छोटे से पूर्वी शहर यीवू से एक मालगाड़ी लंदन के लिए रवाना की गई. चीन के मशहूर थोक बाजार यीवू से चलाई गई मालगाड़ी इतिहास बनाने के रास्ते पर है. पहली जनवरी को चली यह ट्रेन 18 दिनों में 12 हजार किलोमीटर की दूरी तय कर के लंदन पहुंची. रास्ते में वह कई देशों — कजाकिस्तान, रूस, बेलारूस, पोलैंड, बेल्जियम और फ्रांस से हो कर गुजरी.

चीन जिस तरह से ट्रेनों की गति और रेलमार्ग के विस्तार की योजनाओं पर आक्रामक रूप से काम कर रहा है, यह ट्रेन उसी का एक उदाहरण है और भारत के लिए चुनौती भी. क्योंकि हम न सिर्फ पहाड़ी व दुर्गम जगहों पर ट्रेन पहुंचाने में काफी पिछड़े हुए हैं, बल्कि रेलों की गति के मामले में भी चीन के पासंग भी नहीं ठहर पा रहे हैं.

चीन के यीवू से नया सिलसिला : चीन के यीवू शहर को घरेलू इस्तेमाल की चीजों के उत्पादन के लिए जाना जाता है. यहीं से चलाई गई नई मालगाड़ी में घरेलू इस्तेमाल की चीजें जैसे कपड़े, थैले, सूटकेस लादे गए. रेल के जरिए दुनिया के एक छोर से दूसरे छोर तक सामान भेजने में भले ही 18 दिनों का समय लग रहा है, पर इस माध्यम से हवाई सेवाओं के मुकाबले समान ढुलाई में होने वाला खर्च 50 फीसदी कम होगा. यही नहीं, अगर यह सामान समुद्री रास्ते यानी पानी के जहाजों से भेजा जाता तो उस में एक महीने से ज्यादा का वक्त लगता. वैसे तो चीन से पहले ही यूरोप के कई देशों के बीच ट्रेन सुविधा उपलब्ध है लेकिन लंदन तक चली यह पहली रेल है. असल में लंदन को चीन से हाल में ही रेल नैटवर्क से जोड़ा गया है और इस रास्ते पर ट्रेन चलाने की जिम्मेदारी ईवू टाइमैक्स इंडस्ट्रियल इवैंस्टमैंट नामक कंपनी को दी गई है. यही कंपनी इस से पहले से स्पेन की राजधानी मैड्रिड और चीन के बीच ट्रेन संचालन कर चुकी है.

वन बैल्ट, वन रूट का कमाल : ऊपर से देखने पर लगता है कि चीन से लंदन तक का कोई नया, एकदम सीधा रेलमार्ग बनाया गया होगा, पर ऐसा नहीं है. असल में इस यात्रा में कई रेल नैटवर्कों को आपस में जोड़ा गया है. ऐसे में कोई एक ट्रेन 12 हजार किलोमीटर की पूरी दूरी तय नहीं करती है, बल्कि उस में लदे कंटेनरों को कई बार अलगअलग ट्रेनों से जोड़ कर आगे के लिए रवाना किया जाता है.

वन बैल्ट वन रोड : ओबीओआर चीन असल में अपनी ‘वन बैल्ट, वन रोड’ योजना के तहत पूरे एशिया में सड़कें, रेलवे, बंदरगाह और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर बना कर अपनी अर्थव्यवस्था को दूसरे देशों के साथ मजबूती से बांधना चाहता है. चीन ने यह योजना अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों को दुनियाभर में आगे बढ़ाने के उद्देश्य से तैयार की है.

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2013 में वन बैल्ट, वन रोड की शुरुआत करते हुए कहा था कि इस के तहत एशिया, अफ्रीका और यूरोप के देशों को सड़क व रेलमार्ग से जोड़ा जाएगा. चाइनीज नेतृत्व इसे शांति और समृद्धि की ओर बढ़ाई गई अंतर्राष्ट्रीय पहल का भी नाम दे रहा है. खुद राष्ट्रपति शी जिनपिंग कह चुके हैं कि यह क्षेत्रीय और वैश्विक सहयोग की समय की मांग के मुताबिक है.

ब्रिटेन में चीन के राजदूत ने वर्ष 2014 में कहा था कि चीन की वन बैल्ट वन रोड योजना में दुनिया के 60 देश शामिल होंगे यानी धरती की दोतिहाई आबादी. पर चीन के एक सरकारी दस्तावेज के मुताबिक, इस में वे देश शामिल होंगे जो चीन के कुल विदेश व्यापार में 26 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखते हैं.

यह सही है कि इस वृहद योजना के लिए चीनी सरकार के बैंक और उस की कई कंपनियां पानी की तरह पैसा बहा रही हैं. इस योजना के लिए वर्ष 2014 में 40 अरब डौलर का सिल्क रोड फंड शुरू किया गया था जो वन बैल्ट, वन रोड योजना को पैसा दे रहा है. चीन के सरकारी बैंक इस प्रोजैक्ट में शामिल होने वाले देशों को भी खुल कर कर्ज दे रहे हैं.

मकसद घाटा दूर करना : चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भले ही इस योजना को वैश्विक बंधुत्व के खाके में पेश कर रहे हों, पर सचाई यह है कि इस के जरिए चीन अपने वित्तीय घाटे को पूरा करते हुए अपनी विकास दर बढ़ाना चाहता है. पिछले 25 वर्षों में ऐसा पहली बार हुआ है जब चीन की विकास दर 7 फीसदी से नीचे (6.9 फीसदी पर) चली गई है. 2015 में उस का निर्यात 2014 के 2.34 लाख करोड़ डौलर के मुकाबले घट कर 2.27 लाख करोड़ डौलर हो गया. चीनी कंपनियां घरेलू स्तर पर स्लोडाउन का सामना कर रही हैं. ऐसे में जाहिर है चीन में विदेशों से व्यापार बढ़ाने के नए रास्ते खोजने को ले कर बेकरारी है. पर सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि क्या इस नए रेलमार्ग की वजह से यीवू में उत्पादन बढ़ेगा?

जीवित होगा सिल्क रूट : सिल्क रूट यानी रेशम मार्ग एक प्राचीन व्यापारिक रास्ता था जिस से चीन के सिल्क का व्यापार भूमध्यसागर से एशिया तक होता था. आज के वन बैल्ट, वन रोड प्लान का एक हिस्सा असलियत में प्राचीन रेशम मार्ग का नया रूप है जो वाणिज्यिक बैल्ट के रूप में विकसित किया जा रहा है.

यह सिल्क रोड चीन से शुरू हो कर सैंट्रल एशिया से होते हुए यूरोप तक जाएगी. इसी के दूसरे हिस्से में 21वीं सदी की मैरीटाइम सिल्क रोड बनाई जा रही है जो चीन को अहम समुद्री रास्तों से जोड़ने के अलावा साउथ ईस्ट एशिया, मिडल ईस्ट और अफ्रीका से जोड़ेगी. यह रास्ता पश्चिम पैसिफिक महासागर और हिंद महासागर से हो कर गुजरेगा. कुल मिला कर वन बेल्ट, वन रोड योजना के पीछे उद्देश्य यह है कि तकनीक का इस्तेमाल कर के बीचबीच में क्षेत्रीय उत्पादन केंद्र बनाए जाएं. जिन के जरिए चीन समुद्र, रेल और सड़क से पश्चिम देशों पर अपना प्रभाव कायम करे.

नई सिल्क रोड परियोजना के तहत चीन मध्यपूर्व और अफ्रीका तक अपनी पहुंच बनाना चाहता है, इसलिए वह इस पर रेललाइन, बंदरगाह और राजमार्गों का निर्माण कर रहा है. मध्य एशिया, पूर्वी यूरोप और पश्चिमी यूरोप को एशिया की मुख्य जमीन (मेन लैंड) से जोड़ने वाला यह वही रास्ता है जिस से हो कर 800 साल पहले आक्रमणकारी चंगेज खान ने दुनिया के कई इलाके अपने कब्जे में लिए थे. इसी के साथ चीन की योजना समुद्रीमार्ग से चीन सागर, हिंद महासागर, हौर्न औफ अफ्रीका और लालसागर होते हुए भूमध्य सागर तक पहुंचने की है. आज भले ही इस रेलमार्ग पर सिर्फ मालगाड़ी चलाई जा रही हो, लेकिन उम्मीद है कि आने वाले वक्त में इस पर पैसेंजर ट्रेनें भी चलेंगी. इस का फायदा सिर्फ चीन को नहीं, बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को हो सकता है.

यह विडंबना ही है कि पूरे यूरेशिया महाद्वीप को लंबे समय तक आपस में जोड़े रखने वाला रेशम मार्ग पिछले एक हजार वर्षों में गुम सा हो कर रह गया था और पड़ोसियों से दूर हो कर हम यूरोपअमेरिका से जुड़ते चले गए. पर अब उम्मीद है कि इस नए व्यापारमार्ग से न सिर्फ व्यापार बढ़ेगा बल्कि पड़ोसियों के बीच मेलजोल भी कायम होगा, बशर्ते चीन भारत को अपना स्वाभाविक पड़ोसी और मित्र माने.

चीन–ईरान रेलमार्ग

लंदन तक मालगाड़ी चलाने से पहले पिछले ही साल चीन ने तुर्कमेनिस्तान होते हुए ईरान तक एक ट्रेन (मालगाड़ी) भी चलाई थी. यह ट्रेन चीन के झेनझियांग से चल कर कजाकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान होते हुए 9,500 किलोमीटर का सफर तय कर के ईरान की राजधानी तेहरान पहुंची थी. तेहरान तक जो ट्रेन चलाई गई वह अपना सफर 14 दिनों में तय करती है. यह मालगाड़ी चीनी सामानों से भरे 32 कंटेनर ले कर तेहरान पहुंची. खास बात यह थी कि चीनी बंदरगाह से ईरानी बंदरगाह तक पहुंचने का जो पुराना रूट था उस के मुकाबले इस रूट ने 30 दिन कम लिए. तब से यह ट्रेन हर महीने चल रही है. ईरान का एकतिहाई से ज्यादा विदेश व्यापार चीन से होता है. वहीं, चीन ईरान का सब से बड़ा तेल आयातक है.

भारत के लिए खतरा

वैसे तो आबादी के मामले में, विकास के मामले में और अंतरिक्ष व रक्षा तैयारियों के मामले में दुनिया भी भारत व चीन के बीच तुलना करती रहती है लेकिन इधर कुछ वर्षों से चीन ने एक मामले में भारत के मुकाबले काफी आगे बढ़ कर कुछ ऐसा किया है कि जिस से हमारे देश की सुरक्षा को ले कर भी चुनौती पैदा हो गई है. असल में यह सारा मामला चीनी रेल के विकास से जुड़ा है. 2 साल पहले (अप्रैल 2015) में खबर आई थी कि चीन मशहूर पर्वत शिखर माउंट एवरेस्ट के नीचे सुरंग बना कर तिब्बत और नेपाल को आपस में जोड़ने की योजना बना रहा है. इस के लिए तिब्बत व नेपाल के बीच 540 किलोमीटर लंबा हाईस्पीड रेलनैटवर्क बिछाया जाएगा. यह असल में मौजूदा 1,956 किलोमीटर लंबे क्ंिवगहाइ-तिब्बत रेलनैटवर्क को और आगे बढ़ाने की योजना का हिस्सा है जिस में नेपाल को तिब्बत से जोड़ने का प्रस्ताव किया गया है.

चीन ने इस के लिए द्विपक्षीय व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा देने की बात का हवाला दिया था पर हिमालय में चीनी रेलनैटवर्क की मौजूदगी का भारत के लिए क्या अर्थ है, यह किसी से छिपा नहीं है. चीन अभी तक विकास के ऐसे काम अपनी ही सीमा के भीतर रह कर कर रहा था, लेकिन अब भारतीय सीमाओं तक रेल पहुंचाने की उस की योजनाओं से साफ है कि उस ने भारत की  घेरेबंदी की पुख्ता तैयारी कर ली है. वैसे तो एवरेस्ट के नीचे से नेपाल को चीन से जोड़ने वाले रेलनैटवर्क को बनाने का अनुरोध नेपाल सरकार ने ही उस से किया था पर भारत के लिए यह खतरे की बात इसलिए है क्योंकि इस चुनौती से निबटने को हमारा देश तैयार नहीं है.

चीन इस नैटवर्क के लिए तिब्बत में कोमोलांग्मा पर्वत के नीचे खुदाई कर के लंबीलंबी सुरंगें तैयार करेगा. कोमोलांग्मा असल में माउंट एवरेस्ट का ही चीनी नाम है यानी चीन में एवरेस्ट को इस नाम से पुकारा जाता है. नेपाल की भारत के मुकाबले चीन को प्राथमिकता नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री राम बरन यादव ने मार्च 2015 में स्वायत्त तिब्बती इलाके का दौरा किया था, उसी के बाद रेलनैटवर्क बनाने की बात उठी थी. चीन का कहना है कि वह 2020 तक रेलनैटवर्क को तैयार कर लेगा. इस के लिए तिब्बत के रेलवेस्टेशन केरमग तक मौजूद रेललाइन को बढ़ाते हुए एवरेस्ट के भीतर सुरंगों से गुजार कर नेपाल सीमा तक लाया जाएगा.

कहा जा रहा है कि नेपाल में एवरेस्ट के नीचे से लाई जाने वाली रेलवेलाइन पर ट्रेनें 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ेंगी. यह रेलनैटवर्क भारत के लिए खतरा कैसे है, यह एक उदारहण से स्पष्ट होता है. असल में, भारतीय सीमाओं में दर्जनों बार घुसपैठ क चुकी चीनी सेना ने इधर एक नया मोरचा खोला है. पिछले वर्ष (22 जुलाई, 2016) चीनी सेना के कुछ जवान उत्तराखंड के बाड़ाहोती इलाके में भारतीय सीमा के भीतर घुस आए थे. चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का एक हैलीकौप्टर भी उस इलाके में उड़ते हुए देखा गया. सवाल यह है कि आखिर बेहद दुर्गम और दूरदराज के सीमाई इलाकों में चीनी सैनिक इतनी आसानी से कैसे पहुंच जाते हैं, जबकि भारत सरकार को इस घुसपैठ का पता चलने में ही हफ्तों लग जाते हैं. इस का एक जवाब है रेलनैटवर्क की मौजूदगी.

तिब्बत में रेलों का जाल

अगस्त 2013 में ही चीन ने नेपाल सीमा के नजदीक तिब्बत के सब से बड़े शहर शिगाजे को तिब्बत की राजधानी ल्हासा से जोड़ने वाली 253 किलोमीटर लंबी रेललाइन बना कर तैयार कर ली थी. अक्तूबर 2014 में शुरू हुए इस रेल ट्रैक का महत्त्व चीन के मुताबिक यह है कि शिगाजे में चीन समर्थित 11वें पंचेन लामा ग्वैनसैन नोरबू का मुख्यालय है. चीनियों के लिए पंचेन लामा का पद दलाई लामा के बाद दूसरा सब से महत्त्व का माना जाता रहा है. चीन की नजर में यह धार्मिक व राजनीतिक महत्त्व का रेलनैटवर्क है, पर भारत के नजरिए से देखें तो इस का सैन्य और रणनीतिक महत्त्व भी समझ में आ जाता है. यह बेशक चीन व नेपाल का आंतरिक मामला है लेकिन इस से भारत का चिंतित होना स्वाभाविक है.

चीन ने तिब्बत में सब से ऊंचे और दुर्गम इलाकों तक रेललाइनें बिछा कर अपनी इंजीनियरिंग की क्षमता का परिचय तो दिया ही है, साथ में भारत के नजदीकी सीमावर्ती इलाकों में रेलें पहुंचा कर अपनी सेनाओं की मूवमैंट को भी आसान कर दिया है. अभी इन ज्यादातर इलाकों में आम जनता के अलावा सेना की पहुंच भी महज सड़कों के जरिए थी, बारिश और बर्फबारी के दिनों में वहां आवागमन थम जाता था. यही नहीं, सड़क यातायात की धीमी रफ्तार कई अहम मौकों पर सेनाओं की पहुंच में विलंब का कारण बनती है, जिस से कोई बाजी भी हाथ से निकल सकती है. शिगाजे का उदाहरण इस मामले में अहम है. सड़कमार्ग से ल्हासा से यहां पहुंचने में 5 घंटे का वक्त लगा करता था, जबकि ट्रेन यही दूरी अधिकतम 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तय करने में सिर्फ 2 घंटे का समय लगाती है.

अब चीनी सैनिकों को 1962 की तरह भारतीय सीमाओं तक पहुंचने के लिए हफ्तों दुर्गम पहाड़ी इलाकों में पैदल चल कर नहीं आना पड़ता है. इस के लिए वे शिनहाइ यानी तिब्बत रेलवे का इस्तेमाल करते हैं.

पाकिस्तान–चीन रेलमार्ग

सिर्फ नेपाल ही नहीं, चीन की रेल के पाकिस्तान से भी हो कर गुजारने की योजना है. कुछ समय पहले खबर आई थी कि चीन अपने सीमावर्ती प्रांत शिनजियांग से पाक अधिकृत कश्मीर के रास्ते पाकिस्तान तक एक अंतर्राष्ट्रीय रेल लिंक बनाने की योजना पर काम करने की तैयारी में है.यह प्रस्तावित रेल लिंक 1,800 किलोमीटर लंबा होगा और इसलामाबाद व कराची से गुजरते हुए पाकिस्तान के  ग्वादर बंदरगाह को चीन के शिनजियांग प्रांत के काशगर शहर को आपस में जोड़ेगा. इस का सब से चिंताजनक पहलू पाक अधिकृत  कश्मीर से हो कर गुजरना है.

भारत की तैयारियां

भारत की तैयारियां चीन के मुकाबले नाकाफी हैं. अब इस मोरचे पर लंदन तक की मालगाड़ी की चुनौती भी चीन पेश कर चुका है. देखना होगा कि हमारा देश इन चुनौतियों से कब और कैसे मुकाबला कर पाता है. इन चुनौतियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि हिमालय में ट्रेन पहुंचाने के काम में विलंब होना भारत को रणनीतिक रूप से भारी पड़ सकता है. पाकिस्तान, पीओके (पाक अधिकृत कश्मीर) और तिब्बत में चीनी रेल का जवाब हमारी सरकार कोसोचना ही पड़ेगा और इस बारे में कश्मीर के बाहर भी जोरदार पहल करनी होगी. पर्वतीय इलाकों में पर्यटन और व्यावसायिक गतिविधियों में तेजी लाने के लिए हमारी सरकार को ठीक वैसा ही नजरिया अपनाना होगा, जैसा अंगरेज शासकों ने अपनाया था.

अपने शासनकाल में अंगरेजों ने सैरसपाटे और व्यावसायिक-रणनीतिक उद्देश्यों के साथ कालका-शिमला, सिलीगुड़ी–दार्जिलिंग, माथेरान और कांगड़ा घाटी में रेललाइनें बिछाई थीं. सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग को जोड़नेवाली दार्जिलिंग हिमालयन रेललाइन वर्ष 1879 से 1881 के बीच बनी थी. करीब 86 किलोमीटर लंबी इस रेललाइन ने दूसरे विश्व युद्ध में उस समय महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी, जब इस का उपयोग अंगरेजों ने कलकत्ता से पूर्वाेत्तर के युद्ध क्षेत्र तक  सेना व सैनिक साजोसमान पहुंचाने में किया. अगर हम समय रहते रेलमार्गों से खुद को सक्षम नहीं बना पाए तो सीमाओं पर हमारी मौजूदगी बहुत असरदार नहीं रह पाएगी और व्यापारिक मोरचे पर भी हम पीछे रह जाएंगे.

लघु फिल्मों के बड़े सरोकार

शौर्ट फिल्म्स यानी लघु फिल्में सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दे उठा रही हैं. राहुल तिवारी की शौर्ट फिल्म ‘कुबूल’ इसी परंपरा की एक मजबूत कड़ी है. एबीसी प्रोडक्शन में बनी ‘कुबूल’ कहानी है सरफराज और नूर की. सरफराज की बहन है नूर जो उस के चाचा की लड़की है. दोनों में भाईबहन सरीखा प्यार है लेकिन जब दोनों का निकाह तय किया जाता है तो उन ?दोनों को अपने भाईबहन के रिश्ते के ऊपर मियांबीवी का रिश्ता कुबूल नहीं है. इलाहाबाद में शूट हुई इस फिल्म में जफर संजीरी, राहुल तिवारी, इकबाल तौकीर, रोहिणी जाधव, रश्मि शुक्ल, सरोजनी तिवारी आदि प्रमुख भूमिकाओं में हैं. समाज के रूढि़वादी तौरतरीकों, रीतिरिवाजों और जबरन थोपे जा रहे फैसलों पर सवाल खड़े करती ऐसी लघु फिल्मों को प्रोत्साहन मिलना ही चाहिए.

विवादों के साए में नैशनल अवार्ड

64वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा होने के चंद घंटों के अंदर ही पुरस्कार विजेताओं के नाम को ले कर कई निर्मातानिर्देशकों ने आपत्ति दर्ज करनी शुरू कर दी. फिल्म ‘अलीगढ़’ के निर्देशक हंसल मेहता हों या मनोज बाजपेयी, सब इन पुरस्कारों को बायस बता रहे हैं. बहरहाल, इस साल अक्षय कुमार को फिल्म ‘रुस्तम’ के लिए ‘सर्वश्रेष्ठ अभिनेता’ का नैशनल अवार्ड दिया गया है. चूंकि आमिर खान भी इसी श्रेणी में फिल्म ‘दंगल’ के लिए रेस में थे. लिहाजा, अक्षय के नाम पर कइयों ने आपत्ति दर्ज की. कुछ ने इस अवार्ड को उन की बीजेपी से नजदीकी का इनाम बताया. फिल्म पुरस्कारों को ले कर ऐसे विवाद हर साल होते हैं, फिर चाहे नैशनल अवार्ड हों या फिर निजी अवार्ड.

फिल्म ‘नीरजा’ को बैस्ट हिंदी फिल्म, जायरा वसीम को ‘दंगल’ के लिए बैस्ट  सपोर्टिंग एक्ट्रैस और  फिल्म ‘पिंक’ को सामाजिक विषयों पर सर्वेश्रेष्ठ फिल्म की श्रेणी में चुना गया है. हर बार की तरह इस बार भी कई रीजनल फिल्मों ने अपनी उम्दा गुणवत्ता वाली फिल्मों से सब का ध्यान खींचा और अवार्ड जीते.

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