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खेल को धंधा बनाते कारोबारी

इन दिनों इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल सीजन 10 की खुमारी क्रिकेट प्रशंसकों में छाई हुई है. कई लोग देररात तक जाग कर तालियां पीटते हैं तो कई मायूस हो कर सो जाते हैं. क्रिकेट प्रतियोगिताओं की हालत अब धार्मिक आयोजनों सरीखी हो गई है जिन में लोग दूसरों के इशारों और मरजी से अपना वक्त व पैसा बरबाद करते हैं. आईपीएल इस का जीताजागता उदाहरण है. हालांकि पहले के मुकाबले आईपीएल का बुखार दर्शकों में उतरा है पर कारोबारियों को तो खासा मुनाफा दे ही रहा है.

इस आयोजन की तुलना आएदिन होने वाले यज्ञहवनों और भगवद्कथा से की जा सकती है जिस में बिना शामिल हुए भी कब और कैसे लोगों की जेब ढीली हो जाती है, इस का उन्हें पता ही नहीं चलता. देररात जो लोग आईपीएल देख रहे होते हैं उन की हालत सचमुच में भक्तों जैसी होती है जिन के बारे में यह व्यंग्य किया जाता है कि रामायण खत्म होने के बाद वे पूछते हैं कि सीता कौन थी. अधिकतर दर्शकों को नहीं मालूम रहता कि किस टीम में कौन खिलाड़ी है, फिर भी देखते हैं, तो साफ समझ आता है कि उन्हें एक और लत लग गई है. आईपीएल का सट्टा लगे या मैच फिक्स हो, इस से दर्शकों को कोई फर्क नहीं पड़ता है. वर्ष 2013 के सैशन में हुई स्पौट फिक्ंिसग ने जो धब्बा आईपीएल पर लगाया था उस का अब कहीं अतापता नहीं है. क्रिकेट में पारदर्शिता लाने के लिए लोढा समिति का गठन हुआ पर सुधार के नाम पर क्या हुआ, यह बहुतों को  मालूम नहीं. पर हां, बीसीसीआई पर सुप्रीम कोर्ट जरूर सख्त है, यह अच्छी बात है. लेकिन क्रिकेट के कारोबारी चांदी काट रहे हैं और खिलाडि़यों को उम्मीद के मुताबिक नीलामी राशि मिल रही है. तो इस में बड़ा योगदान प्रायोजकों और दर्शकों का है जो इस यज्ञ में आहुति जरूर डालते हैं.

खिलाड़ी तो रामलीला के पात्रों की तरह हैं जिन्हें अभिनय के एवज में दक्षिणा या फीस, जो भी कह लें, दी जाती है पर राशि का बड़ा हिस्सा आयोजकों की जेबों में जाता है. फिर यही आयोजक खेल संघों पर अपनी मजबूत पकड़ बना कर मनमरजी के फैसले लेते हैं. अपनी पसंद के खिलाडि़यों का चयन करते हैं जो उन के हिसाब से नहीं चलता उसे बाहर का रास्ता भी दिखा देते हैं. खेल को धंधा बनाते इन कारोबारी लोगों के चलते यह विशुद्ध कमाने का जरिया बन गया है. इसलिए दर्शकों को भी चाहिए इस खेल को बहुत गंभीरता से न लें और अपना धन व समय किसी अच्छे काम में लगाएं.

शारीरिक शोषण के मामले

फिल्म ‘क्वीन’ से अपने निर्देशन का लोहा मनवा चुके निर्देशक विकास बहल पर एक महिला ने सैक्सुअल हैरेसमैंट का आरोप लगाया है. यह महिला विकास की प्रोडक्शन कंपनी फैंटम फिल्म्स की महिला कर्मचारी है. हालांकि इस आरोप को विकास सिरे से खारिज करते हैं और उस महिला को अपनी कंपनी का कर्मचारी भी नहीं मानते. फिल्म जगत से इस तरह की खबरें गाहेबगाहे आती रहती हैं जहां ज्यादातर मामला या तो किसी ऐक्ट्रैस या मौडल को काम दिलाने के नाम पर शारीरिक शोषण का होता है या फिर कई बार व्यक्तिगत खुन्नस निकलने के लिए नामी आदमी को आसान टारगेट बना दिया जाता है. बहरहाल, विकास के मामले की सचाई जल्द ही सामने आ जाएगी. 

महिलाओं की ट्रंप से टक्कर

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति का पद संभालते ही अमेरिका गुस्से से उबलने लगा. एक ऐसा व्यक्ति जो औरतों के प्रति नितांत बाजारू व घृणित सोच रखता हो, राजनीति के दांवपेंचों के सहारे राष्ट्रपति बन गया तो अमेरिका समेत दुनिया के 70 देशों में सैकड़ों मार्च निकाले गए. तकरीबन साढ़े 5 लाख महिलाओं ने अपनी सुरक्षा, गरिमा, अधिकार और मानसम्मान की खातिर जबरदस्त विरोधप्रदर्शन कर जता दिया कि उन्हें किसी भी रूप में कमजोर न समझा जाए. ‘सिस्टर्स मार्च’ के जरिए उन्होंने अपनी एकजुटता और मजबूती का जबरदस्त प्रदर्शन किया.

इस मार्च के पीछे 60 वर्षीया ग्रैंडमदर टेरेसा शुक की भूमिका काबिलेतारीफ है. बड़ी संख्या में लोगों को बुलाने के लिए उन्होंने सोशल मीडिया फेसबुक के जरिए ट्रंप की नापसंद नीतियों के खिलाफ आमजन का आह्वान किया था. एक नजर डालते हैं उन के प्रयास और उस रणनीति पर जिस ने दुनियाभर की महिलाओं को आवाज बुलंद करने की जबरदस्त हिम्मत दी.

एक अकेली दादी मां टेरेसा शुक, जिस ने दुनियाभर की महिलाओं को अपनी आवाज बुलंद करने की जोरदार हिम्मत दिखाई और अंजाम की परवा किए बगैर अमेरिका के सब से ताकतवर व्यक्ति से टकरा गई.

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप 8 नवंबर, 2016 को बेहद खुश थे. उन्होंने तमाम विरोधी लहरों और विवादों के बावजूद हिलेरी क्लिंटन को हरा कर राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत लिया था. उन के समर्थक जश्न मना रहे थे, जबकि करोड़ों लोगों को उन की जीत लोकतंत्र की जीत नहीं लग रही थी. विभिन्न देशों से आए मुसलिम समुदाय के अप्रवासियों में काफी बेचैनी थी, जो लंबे समय से अमेरिका में रह रहे थे.

उन्हीं में अमेरिकी शहर हवाई की रहने वाली एक सामान्य घरेलू महिला 60 वर्षीया ग्रैंडमदर टेरेसा शुक को ट्रंप की जीत ने अंदर से झकझोर कर रख दिया था. वह काफी विचलित हो गई थी. उस की आंखों की नींद गायब थी. निराशा से भरी हुई वह यह सोचसोच कर कुपित हो रही थी कि ट्रंप का अमेरिकी राष्ट्रपति बनना महिलाओं के लिए किस हद तक हानिकारक साबित होगा.

यह चिंता उस के मन को कचोट रही थी कि क्या ट्रंप के कुछ फैसलों से महिलाओं की समानता और अधिकारों पर अंकुश लग सकता है? इन सब से महिलाओं को बचाने के लिए वह अकेली करे भी तो क्या करे? कैसे विरोध करे? इसी ऊहापोह के बीच उस के दिमाग में महिलाओं को एकजुट करने का विचार कौंध गया.

महिलाओं, अल्पसंख्यकों और प्रवासियों को ले कर ट्रंप द्वारा दिए गए अभद्र और बेतुकी बयानों से जनमानस को आगाह करने के लिए उन्होंने दृढ़ता से एक संकल्प लिया.

मार्च की तैयारी

रात के 12 बजे उन्होंने फेसबुक पर एक इवैंट पेज बनाया, जिस में डोनाल्ड ट्रंप की हेट पौलिटिक्स के खिलाफ मार्च निकालने की बात पोस्ट कर दी. पोस्ट में उन्होंने ट्रंप की नीतियों को ले कर कई आशंकाएं जताईं. ट्रंप को अमेरिकी मूल्यों के बारे में संदेश देने के लिए एक प्रदर्शन के आयोजन की विचारधारा दी. कोई निश्चित मांग किए बगैर प्रदर्शन का मुख्य आधार सम्मान और अधिकार को बनाया.

उन्होंने लिखा, ‘‘मुझे लगता है कि हमें ट्रंप के विरुद्घ रैली निकालनी चाहिए.’’ यह सब सोच कर वह सोने चली गई, लेकिन नींद नहीं आ रही थी. आधे घंटे बाद उस की नींद अचानक खुल गई. उस ने अपने इवैंटपेज पर देखा, विभिन्न पेशे से जुड़े 40 लोग उस की बातों से सहमत थे. सुबह 5 बजे जागने पर पाया कि 10,000 लोग उस के द्वारा आह्वान किए गए मार्च में शामिल होने की अपनी सहमति जता चुके हैं.

शुक के मार्च निकालने के प्रस्ताव और विचार को स्वीकारने वालों में हर वर्ग की कई देशों की महिलाएं थीं. उन में अगर हौलीवुड की कई सैलिब्रिटी थीं, तो कुछ सामान्य घरेलू, शिक्षिकाएं, चिकित्सा एवं उद्योग जगत से जुड़ी कारोबारी और दूसरे सामाजिक कार्यकर्ताएं भी थीं. कुछ महिलाएं ऐसी भी थीं जिन की इच्छा और सोच भी शुक से मेल खाती थी.

फिर क्या था सोशल साइट्स पर इस मार्च का प्रस्ताव वायरल होने के 2 दिनों  के बाद ही न्यूयौर्क के मैनहटन के एक रेस्तरां में वीमेंस मार्च की तैयारी शुरू हो गई. उसे ‘सिस्टर्स मार्च’ का नाम दिया गया. यह तय हुआ कि ट्रंप के शपथ लेने के ठीक अगले रोज ही इस मार्च को एकसाथ यह जताने के लिए निकाला जाएगा कि ‘आप हमें जितना गिराएंगे, हम उतनी ही बार ऊपर उठेंगे.’ उस के बाद 21 जनवरी को दुनिया के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब किसी सब से ताकतवर गद्दी पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ आवाज बुलंद की गई हो.

पूरे अमेरिका में विरोध का कुहराम तो ट्रंप के शपथग्रहण के समय से ही मचा हुआ था, लेकिन लाखों महिलाओं के प्रदर्शन ने पूरी दुनिया को बता दिया कि उन्होंने ट्रंप से टक्कर ले ली है. विशाल जनसमूह की भीड़ उन के शपथग्रहण समारोह से कहीं ज्यादा मार्च में आंदोलनकारी के रूप में जुटी थी. प्रदर्शनकारी महिलाओं के अलगअलग बने संगठनों ने 7 महाद्वीपों के शहरों में जबरदस्त प्रदर्शन किया. केवल अमेरिका में ही जगहजगह 150 से अधिक मार्च निकाले गए, जबकि इस के 408 मार्च की योजना थी. इस के अलावा ब्रिटेन, कनाडा, मैक्सिको, भारत, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, स्पेन, नार्वे, फिलीपींस समेत कई देशों में भी प्रदर्शन किए गए.

मौलिक अधिकारों की सुरक्षा

लंदन में अगर एक लाख से अधिक महिलाओं ने ट्रंप के खिलाफ मोरचा खोला तो उत्तरी धु्रव के अंटार्कटिका में गिनेचुने लोग और वैज्ञानिकों ने भी हाथ में तख्ती ले कर विरोध जताया. यह  पूरी तरह से गैरराजनीतिक हो कर अपने मौलिक अधिकार की सुरक्षा के लिए निकाला गया मार्च था.

विरोध करने वालों में अगर काले, गोरे और मुसलिम समाज की महिलाएं थीं, तो एलजीबीटी (लेस्बियन, गे, बाइसैक्सुअल और ट्रांसजैंडर) की भी जमातें शामिल थीं. प्रदर्शन काफी शांतिपूर्ण हुआ और इस दौरान न किसी तरह का हंगामा हुआ और न ही किसी की गिरफ्तारी हुई. यह 1960-70 के दशक में वियतनाम युद्घ विरोधी प्रदर्शन के बाद यह सब से बड़ा प्रदर्शन था.

इस वीमेंस मार्च के समर्थन में लंदन की महिलाओं द्वारा ट्रैफल्गा स्क्वायर से अमेरिकी दूतावास तक निकाले गए मार्च में लंदन के मेयर सादिक खान भी शामिल हुए. टीवी प्रैंजेंटर सैडी टौक्सविग और लेबर सांसद वाय कूपर ने ट्रंप के खिलाफ व अपने अधिकारों की तख्ती लिए लोगों को संबोधित किया. आयोजकों ने कड़े लहजे में विरोध करते हुए आम नागरिकों को यह संदेश दिया कि इस से महिलाओं के अधिकारों को रेखांकित किया गया है, जो डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद खतरे में पड़ गए हैं. प्रदर्शनकारियों ने मैक्सिको सीमा पर प्रस्तावित दीवार बनाने की बात पर नारे लगाए, ‘पुल बनाओ दीवार नहीं,’ ‘हम एक रहेंगे, नहीं बंटेंगे.’

मार्च में शामिल होने वाली, अमेरिका में लंबे समय से रह रही, फौजिया काजी को भी राष्ट्रपति के तौर ट्रंप कुबूल नहीं हैं. वह 9 साल पहले बंगलादेश से अकेली अमेरिका आई थी और वहां कपड़े की दुकान में काम करती है. उस का कहना है कि ट्रंप के प्रशासन से सब से अधिक डर अप्रवासियों, मुसलमानों, औरतों और शरणार्थियों को है. कारण, उन्होंने अपने चुनावप्रचार के दौरान उन के खिलाफ नागवार गुजरने वाले बयान दिए हैं. ट्रंप मुसलमानों और महिलाओं के खिलाफ भद्दी बातें करते रहे हैं.

इस संबंध में फौजिया कहती है, ‘‘ट्रंप के पास किसी तरह की ठोस नीति नहीं है, जिस से कोई उम्मीद की जा सके. उन की मानसिकता और उन के मूल्य भी हम से मेल नहीं खाते हैं. अब जबकि ट्रंप 4 सालों तक अमेरिका में राज करेंगे, तो हम जैसे लोग उन का हर कदम पर विरोध करेंगे और डट कर विरोध करते रहेंगे. और तो और, अमेरिका में रह कर ही विरोध करेंगे.’’

ट्रंप के खिलाफ इतनी बड़ी संख्या में लोगों में विशेष कर महिलाओं के तन कर खडे़ होने की मूल वजह यही है कि उन का नजरिया महिलाओं के प्रति अच्छा नहीं माना जाता रहा है. उन के द्वारा महिलाओं के संदर्भ में दिए गए कई बयानों में बहुतकुछ अटपटी बातें सामने आ चुकी हैं. जैसे, उन्होंने चुनावप्रचार के दौरान कहा था, ‘जो महिला उन्हें पसंद नहीं है वह भद्दी, मोटी या काली होगी.’ उन्होंने यह भी कहा था, ‘महिलाओं के साथ कुछ भी किया जा सकता है.’ उन का मानना है कि ट्रंप की चुनाव में जीत का कारण गरीब कामगारों का समर्थन रहा है. उन्होंने ट्रंप को वोट इसलिए दिया क्योंकि उन की आर्थिक दशा सुधारने के वादे किए गए हैं.

हवाई की शुक द्वारा किए गए विरोध के आह्वान ने हजारों महिलाओं को भीतर से झिंझोड़ डाला था. वह भले ही राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व के लिए पर्याप्त नहीं रहा हो लेकिन समर्थन में आए आमलोगों ने इस की जरूरत को गंभीरता से लिया. उन की जैसी फेसबुक पेज बनाने वाली एव्वी हरमौन, न्यूयौर्क की बहुचर्चित फैशन डिजाइनर बौब ब्लांड, ब्रून्नी बटलर की अपील से मार्च के मैसेज और अधिकार संबंधी मांगों को फेसबुक, यूट्यूब और ट्विटर के जरिए तेजी से फैला दिया गया.

शुक ने अपने इस अभियान और ट्रंप के खिलाफ बनी बेचैनी के बारे में एक टीवी शो में कहा था, ‘मैं चुनाव नतीजे के बाद काफी हतोत्साहित हो गई थी. मैं बहुत ही बुरा महसूस कर रही थी. उस रात नींद नहीं आ रही थी. बारबार सोच में थी, यह कैसे हो सकता है?’

बहरहाल, महिलाओं की वैबसाइट के अनुसार, मार्च को बड़े पैमाने पर सफल बनाने के लिए 700 सिस्टर मार्च के आह्वान किए गए थे, जिस में अमेरिका और दूसरे देशों में 20 लाख लोगों को शामिल करने का लक्ष्य रखा गया था. आइए एक नजर उन महिलाओं पर भी डालते हैं जिन्होंने आंदोलन को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई.

बौब ब्लांड : शुक ने विरोध की जो अलख जगाई उस में दूसरी महिलाओं का भरपूर साथ मिला. उन्हीं में एक हैं बौब ब्लांड. वे न्यूयौर्क में एक फैशन डिजाइनर हैं. उन्होंने विरोध प्रदर्शन के लिए युवाओं को आकर्षित करने वाले नैस्टी वीमैन (बुरी औरत) और बैड हौम्ब्रे (बुरा आदमी) जैसे शब्द छपे टीशर्ट डिजाइन किए और उसे बेच कर 3 दिनों के भीतर ही आंदोलन के लि 20 हजार डौलर की रकम भी जुटा ली.

उन्होंने अभियान संबंधी बातें न्यूयौर्क में कई दूसरे सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच तेजी से फैलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. इस का असर यह हुआ कि उन के साथ मार्च में शामिल होने के लिए उन्हें बंदूक इस्तेमाल और नियंत्रण की वकील तमिका मैलोरी, एक आपराधिक न्याय सुधार समूह की प्रमुख कार्मेन पेरेज और मुसलिम समुदाय के लिए छुट्टियों की मांग को ले कर न्यूयौर्क में सफल अभियान का नेतृत्व करने वाली लिंडा सारसौर का भी समर्थन मिल गया.

कुछ दिनों में ही मार्च की तैयारी पूरी हो गई. उन्होंने अपनेअपने तरीके से विरोध के लिए मार्च का नामकरण किया. उन्हीं में मिलियन पुस्सी मार्च ट्रंप द्वारा की गई निंदा के खिलाफ था. मिलियन वीमन मार्च भी कुछ इसी तरह का था.

लिंडा सरसौर : अमेरिकी मुसलिम समाज की लिंडा सरसौर न्यूयौर्क में अरब अमेरिकन एसोसिएशन की कार्यकारी निदेशक हैं. बु्रकलिन की मूल निवासी 3 बच्चों की मां लिंडा वाशिंगटन में महिलाओं की इस मार्च की सहअध्यक्ष थीं. वे नागरिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और 15 सालों से नस्लीय न्याय की मांगों को ले कर सक्रिय हैं. वैसे मूलतया वे अंगरेजी शिक्षिका हैं और अरब अमेरिकन एसोसिएशन के साथ तब जुड़ गई थीं जब इस के संस्थापक बास्मेह अथवेह की 2005 में आकस्मिक मृत्यु हो गई थी.

लिंडा सरसौर के अनुसार, उन्होंने अमेरिका में 9/11 की काली छाया को काफी शिद्दत के साथ महसूस किया था. वे कहती हैं, ‘‘बुरे वक्त के बाद अच्छा समय हमेशा आता है. खास कर वैसे समुदाय के लिए जो रंगभेद के शिकार हैं.’’

शिशि रोज : नस्लीय, लिंग और आर्थिक असमानता के बारे में बोलने और हाशिए पर आए लोगों के उत्थान के लिए संघर्ष करने वाली 27 वर्षीया सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका शिशि रोज 2014 से सक्रिय हैं. इंस्टाग्राम पर उन के 35 हजार से अधिक अनुयायी हैं. यही उन के लिए सफल कार्य करने का औजार है. इस की बदौलत ही उन्होंने राष्ट्रीय महिला मार्च के लिए आह्वान किया. उन्होंने अलगथलग पड़ी गौरवर्णी महिलाओं को मार्च में शामिल होने के लिए तैयार किया.

कार्मेन पेरेज : अपने जीवन को पूरी तरह से एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर समर्पित कर चुकी कार्मेन पेरेज 17 वर्ष की उम्र से ही सक्रिय हैं. उन की बहन की 19 वर्ष की आयु में ही मृत्यु हो गई थी. उस के बाद से ही अपनी आतंरिक ऊर्जा को समेटते हुए वे सामाजिक कार्यों में जुट गईं. यूएस सांताक्रुज से वर्ष 2001 में मनोविज्ञान की डिगरी हासिल करने के बाद उन्होंने युवाओं और महिलाओं के हितों के लिए कार्य करने का मन बना लिया था. वे उन्हें आपराधिक न्याय प्रणाली संबंधी व्यापक मार्गदर्शन देती हैं, उन का नेतृत्व करती हैं और समुचित सुविधाएं उपलब्ध करवाती हैं.

कार्मेन की पूरे सांताकु्रज और खास समुदाय में खासी पहचान है. वे युवाओं के एक समूह रीफौर्म, एजुकेशन एडवोकेटिंग फौर यूथ (शिक्षा में सुधार के लिए वकालत) की संस्थापक और लड़कियों की बेहतरी के लिए बनी संस्था टास्क फोर्स की सहसंस्थापक हैं.

तमिका डी मल्लोरी : वीमन मार्च की सहअध्यक्ष तमिका की पहचान सामाजिक न्याय की मुखर वक्ता के रूप में है. मुद्दे चाहे नागरिक अधिकारों के हों, महिलाओं के हित की बात हो, स्वास्थ्य की देखभाल का मसला हो, बंदूकी हिंसा या पुलिस और कदाचार की बातें आदि हों. वाशिंगटन में वे एक राष्ट्रीय मार्च की 50वीं वर्षगांठ के मौके पर 3 लाख लोगों का नेतृत्व कर चुकी हैं.

वैनेसा व्रुबले : सामाजिक तौर पर मीडिया की प्रासंगिकता, राजनीतिक आयोजनों और आधुनिक अफ्रीकी संस्कृति को वैश्विक स्तर पर पुनर्परिभाषित करने को ले कर कार्य करने वाली वैनेसा व्रुबले अपने जीवन को समर्पित कर चुकी है. वे वीमन मार्च

में भी भागीदारी निभा चुकी हैं. ओकायाफ्रिका उन की अपनी एक बड़ी मीडिया कंपनी है, जिस का पूरा फोकस अफ्रीकी महाद्वीप की समस्याओं को ले कर रहता है.

कैस्सडे फेंडली : सामाजिक न्याय के लिए मीडिया में मुद्दे उठाने वाली कैस्सडे फेंडली स्वतंत्र संचार की रणनीतिकार की तरह कार्य करती हैं. उन्होंने गैरलाभकारी संगठनों और सरकारी तथ्यों के जरिए कई प्रगतिशील कदम उठाए हैं तथा सामाजिक न्याय के लिए दूसरे आंदोलनकारियों को समर्थन दिया है.

मृणालिनी चक्रवर्ती : भारतीय मूल की अमेरिकी युवती मृणालिनी चक्रवर्ती शिकागो के इलिनोइस विश्वविद्यालय में मानव विज्ञान की एक डौक्टरेट छात्रा हैं. उन्हें 8 साल पहले अमेरिका में एक कालेज द्वारा छात्रवृत्ति मिली और फिर वे वहां जा बसीं. वहां रहते हुए वे अप्रवासियों और महिला व पुरुष के साथ रंगभेद, एलजीबीटी समुदाय की समस्याओं को ले कर लड़ाई लड़ती रही हैं. उन्होंने खुद को राजनीतिक रूप से सक्रिय बना लिया है. वे मार्च में हिस्सा ले कर, लोगों को जागृत कर उन्हें मुखर आवाज देने की कोशिश करती हैं, जो आंदोलन में भाग लेने से झिझकते हैं. वाशिंगटन में महिला मार्च में हिस्सा ले कर वे अप्रवासी महिला शक्ति को बखूबी दर्शा चुकी हैं.

 

औरतों को सिर्फ सैक्स टौय समझते हैं ट्रंप?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ दुनियाभर की महिलाओं ने यों ही नहीं मोरचा खोल रखा है. दरअसल, ट्रंप अलगअलग मौकों पर महिलाओं को ले कर अपनी घटिया मानसिकता का सुबूत कुछ इस तरह देते रहे हैं कि कोई भी उन से नफरत करने लगेगा. आइए नजर डालते हैं डोनाल्ड ट्रंप के महिलाओं को ले कर कुछ विवादित व शर्मनाम बयानों पर —

–       सितंबर 2015 में तत्कालीन प्रतिद्वंद्वी कार्ली फियोरेना के बारे में डोनाल्ड ने बड़े भद्दे तरीके से बोला था कि, ‘‘जरा इन का चेहरा देखिए. क्यों इस के लिए कोई वोट करेगा. क्या आप सोच भी सकते हैं कि ऐसे चेहरे वाली हमारी अगली राष्ट्रपति होगी?’’

–       सितंबर में ही पूर्व मिस यूनीवर्स और ऐक्ट्रैस मेलिसिया माचादो को डोनाल्ड ट्रंप ने मिस पिग्गी कहा था और बाद में उन के मोटापे को ले कर भी भद्दी टिप्पणी की थी.

–       अप्रैल 2015 में एक ट्वीट किया था, जिस में कहा था कि हिलेरी क्लिंटन अपने पति को संतुष्ट नहीं कर पाती हैं, ऐसे में वे अमेरिकी राष्ट्रपति बन कर देश को कैसे संतुष्ट करेंगी.

–       7 अगस्त, 2015 को डोनाल्ड ट्रंप ने एक इंटरव्यू में एंकर मेगिन कैली के बारे में कहा कि, ‘उस की आंखों से खून आ रहा था. दरअसल, उस से हर जगह से खून बाहर आ रहा था.’

–       एक वीडियो में ट्रंप रेडियो एवं टीवी प्रस्तोता बिली बुश के साथ बातचीत के दौरान महिलाओं के बारे में, बिना सहमति के महिलाओं को छूने व उन के साथ यौन संबंध बनाने के बारे में बेहद अश्लील टिप्पणियां करते दिखाई दिए थे.

–       मार्च 2013 में ट्रंप ने कौमेडियन रोजी ओ डोनेल को ले कर अनापशनाप बोला और फिर बजाय अपनी गलती मानने के उन्होंने कहा था, ‘‘मुझे ऐसा लगता है कि वह इसी लायक है. मुझे इस बात के लिए बिलकुल भी खेद नहीं है.’’

–       डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी बेटी इवांका के बारे में कहा था कि इवांका पहले से ज्यादा कामुक लग रही है. यदि मेरी खुद की बेटी नहीं होती तो मेरा उस से जरूर अफेयर होता.

–       1991 में डोनाल्ड ट्रंप ने महिलाओं के बारे में कहा था कि अगर उन के पास खूबसूरत ‘एस’ हैं, तो अमेरिकी मीडिया उन के बारे में क्या लिखता है, उस से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है.

–       इन आरोपों के अलावा ट्रंप का एक और टेप सामने आया था जिस में वे 10 साल की बच्ची पर अभद्र टिप्पणी करते दिखे.

–       पीपल मैगजीन की पत्रकार ने भी ट्रंप पर जबरदस्ती किस करने का आरोप लगाया था. मैनहटन की जेसिका लीड्स के साथ डोनाल्ड ट्रंप ने 30 साल पहले एक फ्लाइट में अश्लील हरकत की थी.

–       जेसिका लीड्स अकेली नहीं हैं, पीपल मैगजीन की रिपोर्टर नताशा ने भी डोनाल्ड ट्रंप पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था.     

– राजेश कुमार

मिशेल ओबामा भी हैं ट्रंप से खफा

अमेरिका की पूर्व प्रथम महिला मिशेल ओबामा भी डोनाल्ड ट्रंप की शर्मनाक बयानबाजी के खिलाफ अपनी आवाज उठाती रही हैं. जब डोनाल्ड बिली बुश के साथ बातचीत में महिलाओं को ले कर अश्लील टिप्पणियां करते दिखे तो उन्होंने इसे ट्रंप का महिलाओं के प्रति क्रूर और भयावह रवैया करार दिया. उन्होंने ट्रंप को लताड़ लगाते हुए कहा कि यह शर्मनाक और असहनीय है. मर्यादित व्यक्ति ऐसा व्यवहार नहीं करते.

चीन में मांग बढ़ने से भारत में घट रही सौर ऊर्जा की दर

सरकार सौर ऊर्जा पर विशेष ध्यान दे रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मानते हैं कि भविष्य की ऊर्जा यही है. कारण, यह सस्ती है, आसानी से उपलब्ध है और सब से बड़ी बात यह है कि इस से पर्यावरण को नुकसान नहीं हो रहा है. ओजोन परत को इस से कोई खतरा नहीं है. मोदी सरकार ने इस दिशा में ठोस विचारविमर्श के बाद नीति तैयार की. वर्ष 2022 तक 100 गीगावाट सौर ऊर्जा का लक्ष्य हासिल किया गया. इसी तरह पवन ऊर्जा का लक्ष्य भी 60 गीगावाट तय किया गया है.

सौर ऊर्जा का यह लक्ष्य नए माहौल में आसान नजर आ रहा है. इस की वजह, इस के  दाम में आ रही बड़ी गिरावट है. इस साल के अंत तक सौर ऊर्जा की दर 20 फीसदी तक सस्ती हो सकती है. वजह यह है कि इस के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले महत्त्वपूर्ण पुर्जा मौड्यूल्स की कीमत में 20 से 25 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है.

गिरावट का कारण चीन में सौर ऊर्जा के निर्धारित लक्ष्य को हासिल करने के लिए मौड्यूल्स की भारी मांग है. मौड्यूल्स बनाने का काम करने वाली कंपनियों में इस वजह से जबरदस्त प्रतिस्पर्धा है जिस के कारण सौर ऊर्जा के मौड्यूल में भारी गिरावट आ रही है.

सौर ऊर्जा की दर में पहली बार गिरावट नहीं हो रही है बल्कि 2010 से लगातार इस में यह रुख बना हुआ है. पिछले 7 वर्षों में सौर ऊर्जा की दरें 73 फीसदी तक कम हो चुकी हैं. भारत में भी लगातार सौर ऊर्जा के इस महत्त्वपूर्ण उपकरण की दर घट रही है जिस के कारण गत फरवरी में सौर ऊर्जा की दर रिकौर्ड 3.30 यूनिट तक पहुंची है. इस महत्त्वपूर्ण उपकरण की दर घटाने से सौर ऊर्जा की दर में भारी गिरावट आ रही है.

 

शेयर बाजार ने किया नए वित्तवर्ष का जोरदार स्वागत

शेयर बाजार नए वित्तवर्ष की शुरुआत में उड़ान पर है. चालू वित्तवर्ष के पहले सप्ताह बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई का सूचकांक रिकौर्ड ऊंचाई पर पहुंचा और 30,000 अंक के मनोवैज्ञानिक स्तर के  करीब पहुंच गया. नए वित्तवर्ष के पहले सप्ताह में बाजार को जो पंख लगे उसे सीरिया में हुए जैविक हमले के कारण अमेरिकी कार्यवाही से अमेरिका और रूस के बीच बने तनाव के माहौल से झटका लगा. रूस ने सीरिया के हमले का समर्थन किया है जबकि अमेरिका ने इस हमले को मानवता के खिलाफ बता कर सीरिया पर मिसाइलों से हमला किया. इस तनाव का बाजार पर असर जरूर देखने को मिला लेकिन विनिर्माण क्षेत्र से लगातार मिल रहे सकारात्मक संकेतों तथा रुपए के 20 माह के शीर्ष पर पहुंचने के कारण निवेशकों में उत्साह का माहौल है. इस उत्साह की बुनियाद में वस्तु एवं सेवाकर यानी जीएसटी विधेयक का संसद में पारित होना भी है.

देश में कर सुधारों के लिए लाया गया यह एकीकृत विधेयक संसद में पारित होने के बाद राष्ट्रपति के पास जाएगा और उन की मुहर लगने के बाद देश में कर में सुधारों की प्रक्रिया शुरू की जाएगी. इस के अलावा बीते वित्त की चौथी तिमाही के परिणाम भी अच्छे रहने की उम्मीद है. बाजार का रुख क्या रहेगा, यह चौथी तिमाही के परिणामों पर भी काफी निर्भर करेगा. इस दौरान नैशनल स्टौक एक्सचेंज में भी तेजी रही है.

अपने तरीके से जीने दें बेटे की पत्नी को

विक्रांत सिंह चंदेल ने रूस की ओल्गा एफिमेनाकोवा से शादी की. शादी के बाद वे गोवा में रहने लगे. कारोबार में नुकसान होने के बाद ओल्गा पति के साथ उस के घर आगरा रहने आ गई. लेकिन विक्रांत की मां ने ओल्गा को घर में आने देने से साफ मना कर दिया. कारण एक तो यह शादी उस की मरजी के खिलाफ हुई थी, दूसरा सास को विदेशी बहू का रहनसहन पसंद नहीं था.

सुलह का कोई रास्ता न निकलता देख ओल्गा को अपने पति के साथ घर के बाहर भूख हड़ताल पर बैठना पड़ा. ओल्गा का कहना था कि उस की सास दहेज न लाने और उस के विदेशी होने के कारण उसे सदा ताने देती रही है.

जब मामला तूल पकड़ने लगा तो विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को हस्तक्षेप करते हुए राज्य के मुख्यमंत्री से विदेशी बहू की मदद करने के लिए कहना पड़ा. उस के बाद सास और ननद के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए गए. तब जा कर सास ने बहू को घर में रहने की इजाजत दी और कहा कि अब वह उसे कभी तंग नहीं करेगी.

नहीं देती प्राइवेसी

सासबहू के रिश्ते को ले कर न जाने कितने ही किस्से हमें देखने और सुनने को मिलते हैं. सास को बहू एक खतरे या प्रतिद्वंद्वी के रूप में ही ज्यादा देखती है. इस की सब से बड़ी वजह है सास का अपने बेटे को ले कर पजैसिव होना और बहू को अपनी मनमरजी से जीने न देना. सास का हस्तक्षेप ऐसा मुद्दा है जिस का सामना बेटाबहू दोनों ही नहीं कर पाते हैं. वे नहीं समझ पाते कि पजैसिव मां को अपनी प्राइवेसी में दखल देने से कैसे रोकें कि संबंधों में कटुता किसी ओर से भी न आए.

अधिकांश बहुओं की यही शिकायत होती है कि सास प्राइवेसी और बहू को आजादी देने की बात को समझती ही नहीं हैं. उन्हें अगर इस बात को समझाना चाहो तो वे फौरन कह देती हैं कि तुम जबान चला रही हो या हमारी सास ने भी हमारे साथ ऐसा ही व्यवहार किया था, पर हम ने उन्हें कभी पलट कर जवाब नहीं दिया.

आन्या की जब शादी हुई तो उसे इस बात की खुशी थी कि उस के पति की नौकरी दूसरे शहर में है और इसलिए उसे अपनी सास के साथ नहीं रहना पड़ेगा. वह नहीं चाहती थी कि नईनई शादी में किसी तरह का व्यवधान पड़े. वह बहुत सारे ऐसे किस्से सुन चुकी थी और देख भी चुकी थी जहां सास की वजह से बेटेबहू के रिश्तों में दरार आ गई थी.

शुरुआती दिनों में पतिपत्नी को एकदूसरे को समझने के लिए वक्त चाहिए होता है और उस समय अगर सास की दखलंदाजी बनी रहे तो मतभेदों का सिलसिला न सिर्फ नवयुगल के बीच शुरू हो जाता है बल्कि सासबहू में भी तनातनी होने लगती है.

आन्या अपने तरीके से रोहन के साथ गृहस्थी बसाना, उसे सजानासंवारना चाहती थी. उस की सास बेशक दूसरे शहर में रहती थी पर वह हर 2 महीने बाद एक महीने के लिए उन के पास रहने चली आती थी क्योंकि उसे हमेशा यह डर लगा रहता था कि उस की नौकरीपेशा बहू उस के बेटे का खयाल रख भी पा रही होगी या नहीं.

आन्या व्यंग्य कसते हुए कहती है कि आखिर अपने नाजों से पाले बेटे की चिंता मां न करे तो कौन करेगा. लेकिन समस्या तो यह है मेरी सास को हददरजे तक हस्तक्षेप करने की आदत है, वे सुबह जल्दी जाग जातीं और किचन में घुसी रहतीं. कभी कोई काम तो कभी कोई काम करती ही रहतीं.

मुझे अपने और रोहन के लिए नाश्ता व लंच पैक करना होता था पर मैं कर ही नहीं पाती थी क्योंकि पूरे किचन में वे एक तरह से अपना नियंत्रण  रखती थीं. यही नहीं, वे लगातार मुझे निर्देश देती रहतीं कि मुझे क्या बनाना चाहिए, कैसे बनाना चाहिए और उन के बेटे को क्या पसंद है व क्या नापसंद है.

सुबहसुबह उन का लगातार टोकना मुझे इतना परेशान कर देता कि मेरा सारा दिन बरबाद हो जाता. यहां तक कि गुस्से में मैं रोहन से भी नाराज हो जाती और बात करना बंद कर देती. मुझे लगता कि रोहन अपनी मां को ऐसा करने से रोकते क्यों नहीं हैं?

सब से ज्यादा उलझन मुझे इस बात से होती थी कि जब भी मौका मिलता वे यह सवाल करने लगतीं कि हम उन्हें उन के पोते का मुंह कब दिखाएंगे? हमें जल्दी ही अपना परिवार शुरू कर लेना चाहिए. जो भी उन से मिलता, यही कहतीं, ‘मेरी बहू को समझाओ कि मुझे जल्दी से पोते का मुंह दिखा दे.’ रोहन को भी वे अकसर सलाह देती रहतीं. प्राइवेसी नाम की कोई चीज ही नहीं बची थी.

रोहन का कहना था कि  हर रोज आन्या को मेरी मां से कोई न कोई शिकायत रहती थी. तब मुझे लगता कि मां हमारे पास न आएं तो ज्यादा बेहतर होगा. मैं उस की परेशानी समझ रहा था पर मां को क्या कहता. वे तो तूफान ही खड़ा कर देतीं कि बेटा, शादी के बाद बदल गया और अब बहू की ही बात सुनता है.

मैं खुद उन दोनों के बीच पिस रहा था और हार कर मैं ने अपना ट्रांसफर बहुत

दूर नए शहर में करा लिया ताकि मां जल्दीजल्दी न आ सकें. मुझे बुरा लगा था अपनी सोच पर, पर आन्या के साथ वक्त गुजारने और उसे एक आरामदायक जिंदगी देने के लिए ऐसा करना आवश्यक था.

परिपक्व हैं आज की बहुएं

मनोवैज्ञानिक विजयालक्ष्मी राय मानती हैं कि ज्यादातर विवाह इसलिए बिखर जाते हैं क्योंकि पति अपनी मां को समझा नहीं पाता कि उस की बहू को नए घर में ऐडजस्ट होने के लिए समय चाहिए और वह उन के अनुसार नहीं बल्कि अपने तरीके से जीना चाहती है ताकि उसे लगे कि वह भी खुल कर नए परिवेश में सांस ले रही है, उस के निर्णय भी मान्य हैं तभी तो उस की बात को सुना व सराहा जाता है.

बहू के आते ही अगर सास उस पर अपने विचार थोपने लगे या रोकटोक करने लगे तो कभी भी वह अपनेपन की महक से सराबोर नहीं हो सकती.

बेटेबहू की जिंदगी की डोर अगर सास के हाथ में रहती है तो वे कभी भी खुश नहीं रह पाते हैं. सास को समझना चाहिए कि बहू एक परिपक्व इंसान है, शिक्षित है, नौकरी भी करती है और वह जानती है कि अपनी गृहस्थी कैसे संभालनी है. वह अगर उसे गाइड करे तो अलग बात है पर यह उम्मीद रखे कि बहू उस के हिसाब से जागेसोए या खाना बनाए या फिर हर उस नियम का पालन करे जो उस ने तय कर रखे हैं तो तकरार स्वाभाविक ही है.

आज की बहू कोई 14 साल की बच्ची नहीं होती, वह हर तरह से परिपक्व और बड़ी उम्र की होती है. कैरियर को ले कर सजग आज की लड़की जानती है कि उसे शादी के बाद अपने जीवन को कैसे चलाना है.

फैमिली ब्रेकर बहू

आर्थिक तौर पर संपन्न होने और अपने लक्ष्यों को पाने के लिए एक टारगेट सैट करने वाली बहू पर अगर सास हावी होना चाहेगी तो या तो उन के बीच दरार आ जाएगी या फिर पतिपत्नी के बीच भी स्वस्थ वैवाहिक संबंध नहीं बन पाएंगे.

एक टीवी धारावाहिक में यही दिखाया जा रहा है कि मां अपने बेटे को ले कर इतनी पजैसिव है कि वह उसे उस की पत्नी के साथ बांटना ही नहीं चाहती थी. बेटे का खयाल वह आज तक रखती आई है और बहू के आने के बाद भी रखना चाहती है, जिस की वजह से पतिपत्नी के बीच अकसर गलतफहमी पैदा हो जाती है.

फिर ऐसी स्थिति में जब बहू परिवार से अलग होने का फैसला लेती है तो उसे फैमिली यानी घर तोड़ने वाली ब्रेकर कहा जाता है. सास अकसर यह भूल जाती है कि बहू को भी खुश रहने का अधिकार है.

विडंबना तो यह है कि बेटा इन दोनों के बीच पिसता है. वह जिस का भी पक्ष लेता है, दोषी ही पाया जाता है. मां की न सुने तो वह कहती है कि जिस बेटे को इतने अरमानों से पाला, वह आज की नई लड़की की वजह से बदल गया है और पत्नी कहती है कि जब मुझ से शादी की है तो मुझे भी अधिकार मिलने चाहिए. मेरा भी तो तुम पर हक है. बेटे और पति पर हक की इस लड़ाई में बेटा ही परेशान रहता है और वह अपने मातापिता से अलग ही अपनी दुनिया बसा लेता है.

शादी किसी लड़की के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण व नया अध्याय होता है. पति के साथ वह आसानी से सामंजस्य स्थापित कर लेती है, पर सास को बहू में पहले ही दिन से कमियां नजर आने लगती हैं. उसे लगता है कि बेटे को किसी तरह की दिक्कत न हो, इस के लिए बहू को सुघड़ बनाना जरूरी है. और वह इस काम में लग जाती है बिना इस बात को समझे कि वह बेटे की गृहस्थी और उस की खुशियों में ही सेंध लगा रही हैं.

इस का एक और पहलू यह है कि बेटे के मन में मां इतना जहर भर देती है कि  उसे यकीन हो जाता है कि उस की पत्नी ही सारी परेशानियों की वजह है और वह नहीं चाहती कि वह अपने परिवार वालों का खयाल रखे या उन के साथ रहे.

जरूरी है कि सास बेटे की पत्नी को खुल कर जीने का मौका दें और उसे खुद ही निर्णय लेने दें कि वह कैसे अपनी जिंदगी संवारना व अपने पति के साथ जीना चाहती है. सास अगर हिदायतें व रोकटोक करने के बजाय बहू का मार्गदर्शन करती है तो यह रिश्ता तो मधुर होगा ही साथ ही, पतिपत्नी के संबंधों में भी मधुरता बनी रहेगी.

चाइल्डफ्रैंडली होम

6 साल का सुजोय जब बाथरूम में नहाने गया, तो बड़ों के जैसे उस ने बाथरूम को अंदर से बंद कर लिया. गलती से उस ने अंदर से दरवाजे को लौक भी कर दिया. जब निकलने के लिए उस ने बाथरूम को खोलना चाहा, तो असमर्थ रहा. अंदर से चिल्लाने पर उस की मां आई. घबराहट में उन्हें चाबी नहीं मिली. ताला तोड़ने वाले को बुला कर उसे बाथरूम से निकाला गया. इस दौरान सुजौय इतना घबरा गया था कि ठंड में भी उस के पसीने छूटने लगे थे. ऐसा सिर्फ सुजोय के साथ ही नहीं, अमूमन हर घर में किसी न किसी बच्चे के साथ ऐसा होता रहता है जहां बच्चा बाथरूम या बैडरूम में अपनेआप को बंद कर लेता है.

यह सही है कि बच्चों में बड़ों की नकल करने के साथ जिज्ञासाएं भी बहुत अधिक होती हैं. उन्हें कुछ न कुछ करते रहने की आदत होती है. वे अनजाने में ही कई बार बड़ी समस्या खड़ी कर देते हैं. ऐसे में मातापिता को हमेशा ध्यान देने की आवश्यकता होती है कि उन का घर ‘चाइल्डफ्रैंडली’ हो. इस बारे में गोदरेज लौकिंग सिस्टम के एक्सपर्ट श्याम मोटवानी कहते हैं कि ताले का प्रयोग अलगअलग जगह के हिसाब से करना चाहिए. इस बात की जानकारी बहुत कम लोगों को होती है कि कौन सा ताला कहां लगाया जाए. लोग अधिकतर ताला उठाते हैं और अपने हिसाब से दरवाजा लौक कर के निकल जाते हैं.

आजकल के बच्चे बहुत होशियार होते हैं. वे मातापिता की हर गतिविधि पर नजर रखते हैं. अगर उन से छिपा कर वे कुछ लौक कर के रखते हैं, तो उन की उत्सुकता और अधिक बढ़ जाती है और खाली घर पा कर वे उसे खोल लेते हैं. इस से कई बार जरूरी कागजात बच्चों के हाथ आ जाते हैं. इतना ही नहीं, कई

बार मातापिता चाबी घर पर भूल गए हों और उन का बच्चा अंदर है तो फिर क्या कहने. ऐसे में घर को ‘चाइल्डफ्रैंडली’ बनाने की सही जानकारी मातापिता को होनी आवश्यक है.

ध्यान देने योग्य बातें

– मुख्यद्वार को अधिक महत्त्व देना चाहिए. ताला लगाने की जगह नीचे से एक मीटर की ऊंचाई पर होनी चाहिए, जिस से बच्चे का हाथ वहां तक आसानी से न पहुंच पाए. सिंगल बोल्ट नाइट लैच कभी न लगाएं, गलती से दरवाजा बंद होने पर लौक अपनेआप अंदर से लग जाता है.

–       जिन के बच्चे छोटे हैं वे मुख्यद्वार पर वर्टीबोल्ट, ट्विनबोल्ट या ट्राईबोल्ट का लौक लगवाएं, वर्टीबोल्ट लौक में लैचबोल्ट नहीं होने से दरवाजा अंदर से लौक नहीं होता. उस में एक नौब होती है जिसे घुमा कर दरवाजे को बंद या खोला जाता है जिसे बच्चे आसानी से प्रयोग नहीं कर सकते. ट्राईबोल्ट में भी लैच है लेकिन आधुनिक लौक होने की वजह से लैच को जरूरत के अनुसार इनऐक्टिव किया जा सकता है. इस से भी लौक होने का डर नहीं रहता. इस के अलावा अगर बच्चा छोटा है तो दरवाजे में डोरस्टौपर अवश्य लगाएं.

–       सैफ्टीडोर का लगवाना भी जरूरी है लेकिन इस के किनारे नुकीले न हों, इस का अवश्य ध्यान रखें. इस के अलावा कोईर् भी नया लौक लगाने से पहले उस की तकनीक को अच्छी तरह जान लें.

–       चाइल्डफ्रैंडली होम के लिए बाथरूम के लौक सिस्टम का सही होना बहुत जरूरी है, क्योंकि बच्चे अकसर बाथरूम में फंस जाया करते हैं. बेबी लैच और मोरटाइज थंब लौक या पुश बटन वाला लौक लगाना काफी अच्छा होता है, जो जरूरत पड़ने पर एक रुपए के सिक्के की सहायता से बाहर से खोला जा सकता है. चाबियां हमेशा बाहर और एक निश्चित जगह पर रखी जानी चाहिए.

– मैगनेटिक डोरकैच या डोरस्टौपर अवश्य लगवाएं ताकि हवा से दरवाजा अचानक बंद न हो जाए, डोरस्टौपर हर दरवाजे में हमेशा लगाना जरूरी है, इस से छोटे बच्चे द्वारा किसी भी तरह की लौक होने की घटना से बचा जा सकता है. कई बार चुंबक वाले डोरकैच का चुंबक खराब हो सकता है, ऐसे में डोरस्टौपर दरवाजे को बंद होने से रोक सकता है.

–       ट्रैडिशनल रबर के डोरस्टौपर की जगह आजकल स्प्रिंग डोरस्टौपर ने ले ली है. रबर के डोरस्टौपर को बच्चा आसानी से ऊपर उठा कर दरवाजा बंद कर सकता है जबकि स्प्रिंगस्टौपर बच्चों के लिए मुश्किल होता है क्योंकि इस की तकनीक थोड़ी जटिल होती है.

–       इस के बाद रसोईघर की सुरक्षा सब से बड़ी होती है. चाकू, छुरी से ले कर कटलरी के सामान बच्चों को हानि पहुंचा सकते हैं. इस के लिए ड्राअर और रसोईघर की कोई भी इंटीरियर अच्छी क्वालिटी के मैटेरियल से करनी चाहिए. इस के अलावा आजकल रसोईघर में सौफ्टपुश हार्डवेयर का प्रयोग किया जाता है

जो बच्चों के लिए सुरक्षित होता है, जिस से ड्राअर बंद करते समय या खोलते समय बच्चे की उंगलियों में चोट नहीं लगती.

–       अगर घर में बालकनी हो तो उस की ऊंचाई एक मीटर से अधिक होनी चाहिए. इस में शीशे की रेलिंग काफी अच्छी होती है. आजकल ग्लास भी अच्छी क्वालिटी के प्रयोग किए जाते हैं, जो ‘अनब्रेकेबल’ होते हैं. ये छोटे बच्चे के लिए सुरक्षित होते हैं. किसी भी कैमिकल कोटेड हार्डवेयर का प्रयोग इंटीरियर में कभी न करें.         

हर निसंतान जोड़े को आईवीएफ की जरूरत नहीं

आजकल लोगों के काम करने के अनियमित घंटे, निष्क्रिय जीवनशैली, तनावपूर्ण जीवन, अपर्याप्त खानपान, अधिक उम्र में विवाह, तंबाकू एवं शराब का सेवन, शारीरिक परिश्रम में कमी होने आदि के कारण वे निसंतानता के शिकार हो रहे हैं. ऐसे में आईवीएफ एवं आईयूआई जैसी प्रक्रियाएं ऐसे लोगों के लिए काफी लाभप्रद साबित हो रही हैं. हालांकि निसंतान जोड़ों के लिए केवल आईवीएफ ही एकमात्र विकल्प नहीं, सही और सटीक इलाज से प्राकृतिक रूप से भी संतानसुख प्राप्त हो सकता है. लोगों की यह धारणा होती है कि आईवीएफ द्वारा जन्मा बच्चा अनुवांशिक तौर से जोड़े का नहीं होता, जो गलत है क्योंकि महिलाएं अपने ही अंडे और पुरुष अपने ही शुक्राणु से मातापिता बन सकते हैं. साथ ही, आईवीएफ दर्दरहित प्रक्रिया होती है. इस दौरान रोज के काम भी आसानी से किए जा सकते हैं और इस में अस्पताल में भरती रहने की जरूरत भी नहीं होती है.

निसंतान जोड़ों को बिना देरी के निसंतानता विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श लेना चाहिए. आईवीएफ, आईयूआई, लैप्रोस्कोपी प्रक्रियाओं आदि के बारे में जानना चाहिए. इस के अलावा आईवीएफ कराने से पहले सभी प्रकार की जांचों को करा लेना चाहिए जिस में सब से ज्यादा महत्त्वपूर्ण पुरुष के शुक्राणुओं की संख्या और आकार एवं स्त्रियों के अंडे की संख्या व गर्भाशय का आकार होता है.

जिन महिलाओं की फैलोपियन ट्यूब खराब या बंद हो जाती है, वे मां बनने में अक्षम हो जाती हैं. पर यदि लैप्रोस्कोपी से बंद ट्यूब को खोल दिया जाए तो सामान्यतौर पर, आईयूआई या आईवीएफ से मां बनना संभव है. शून्य शुक्राणु वाले पुरुष भी अपने ही शुक्राणुओं से पिता बन सकते हैं. कम शुक्राणु वाले पुरुष बिना आईवीएफ के सफलता प्राप्त कर सकते हैं. जिन महिलाओं में अंडा बनने की क्षमता कम है, वे भी अपने अंडे से गर्भवती हो सकती हैं, आवश्यकता है केवल सटीक जांच एवं सही उपचार की.

निसंतानता के कारण

आईवीएफ पद्धति से इलाज करवाने वाली महिलाओं में पहले 38 से 45 वर्ष आयुवर्ग की महिलाएं अधिक होती थीं लेकिन बीते कुछ सालों में इस इलाज के लिए आने वाली महिलाओं के आयु समूह में बदलाव आया है. अब कम आयुवर्ग की महिलाएं भी आईवीएफ के लिए आती हैं. आज के समय में ये तकनीक बांझपन को दूर कर निसंतान दंपतियों के लिए आशा की एक नई किरण है.

किस चिकित्सक से परामर्श लें?

–       निसंतानता विशेषज्ञ से परामर्श लें.

–       आईवीएफ व उस से जुड़ी बातों के बारे में जानें.

–       स्त्रीरोग विशेषज्ञ का परामर्श ही काफी नहीं.

–       उम्र के साथ शुक्राणु कम होने पर विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें.   

(लेखिका उदयपुर में गीतांजलि फर्टिलिटी सैंटर में आईवीएफ की विशेषज्ञ हैं.)

ज्योतिषियों की फीस डाक्टरों से ज्यादा

मनुष्य एक जिज्ञासु प्राणी है. वह तमाम चीजों के साथसाथ अपना भविष्य भी जानना चाहता है. शायद अपनी इसी मनोवृत्ति की तृप्ति के लिए ही उस ने ज्योतिषशास्त्र की खोज की होगी. लेकिन, बाजार में ज्योतिष के नाम पर मनगढ़ंत किताबों के साथ ढोंगीपाखंडी बाबाओं की भरमार हो गई है. उन का मकसद लोगों की मजबूरियों का लाभ उठाना और पैसा बनाना है. मामूली पत्थर को भी ये लोग महंगे नगीने के नाम पर बेच कर लोगों को आसानी से ठग लेते हैं. यही कारण है कि हर गली, महल्ला, गांव, शहर, नगर, महानगर में ज्योतिषीय उपाय से समस्या समाधान करने का साइनबोर्ड टंगा हुआ है. मजबूर और बीमार आदमी उन के जाल में आसानी से फंस जाता है.

चाहे उत्तर भारत हो या दक्षिण भारत, चाहे पूर्व भारत हो या पश्चिम भारत, ज्योतिषियों की दुकान हर जगह खुली हुई हैं. आजकल तो टीवी चैनलों और अखबारों में ज्योतिषियों की बाढ़ सी आ गई है. सुबह से कार्यक्रम शुरू होते हैं तो मध्यरात्रि तक चलते रहते हैं. टीवी पर चलने वाले कार्यक्रमों के कंटैंट और प्रेजैंटेशन डर और भय पैदा करने वाले होते हैं.

शुभअशुभ का भ्रमजाल

जन्मकुंडली में 9 ग्रह बताए जाते हैं. ये ग्रह हैं सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु एवं केतु. इस में पृथ्वी का कोई स्थान नहीं है. जबकि वैज्ञानिक तथ्य यह है कि मनुष्य के जीवन पर सब से ज्यादा प्रभाव पृथ्वी का ही पड़ता है. जब मौसम और जलवायु में बदलाव होता है, तब मनुष्य की जैविक क्रियाओंप्रतिक्रियाओं में परिवर्तन होने लगता है. इन का प्रभाव इतना होता है कि मनुष्य को मौसम के अनुसार कपड़े पहनने पड़ते हैं. लेकिन ज्योतिषशास्त्र में मौसम और जलवायु का मनुष्य पर क्या प्रभाव पड़ता है, इस की कहीं कोई चर्चा नहीं है.

वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है

कि सूर्य तारा है, ग्रह नहीं. लेकिन ज्योतिषशास्त्र में अब भी सूर्य को ग्रह ही माना जाता है. इस का मुख्य कारण यह है कि ज्योतिषशास्त्र में सैकड़ों सालों से नई खोज हुई ही नहीं है. नई खोज होगी कैसे? आज ऐसे हजारों ज्योतिषी हैं जिन को केवल संस्कृत भाषा का ही ज्ञान है.

शिकार और शिकारी

ज्योतिषियों के शिकार केवल अनपढ़गंवार या सामान्य लोग ही नहीं हैं, बल्कि पढे़लिखे, बुद्धिजीवी, बड़ेबड़े धन्नासेठ, वैज्ञानिक, इंजीनियर, डाक्टर, आईएएस अफसर, आईपीएस अफसर, वकील, नेता, अभिनेताअभिनेत्री भी इन ज्योतिषियों की सेवा लेते हैं. फिल्मी दुनिया में तो जितना अंधविश्वास है उतना तो अनपढ़गंवार लोग भी नहीं मानते हैं. निर्देशक राकेश रोशन अपनी फिल्मों के नाम क अक्षर से रखते हैं, जैसे ‘करण अर्जुन’, ‘कहो ना प्यार है’, ‘कारोबार’, ‘कामचोर’, ‘कृष’, ‘कोयला’ इत्यादि. ‘कभी सास भी बहू थी’ टीवी धारावाहिक की निर्मात्री और अभिनेता जितेंद्र की बेटी एकता कपूर भी अपने धारावाहिकों और फिल्मों का नाम क अक्षर से ही रखती हैं, जैसे ‘कभी मैं झूठ नहीं बोलता’, ‘कृष्णा कौटेज’, ‘कसौटी जिंदगी की’, ‘कहीं किसी रोज’ इत्यादि. जबकि एकता कपूर की क अक्षर से टाइटल वाली सभी फिल्में फ्लौप हो गईं. जबकि उन की द अक्षर की टाइटल वाली फिल्म ‘द डर्टी पिक्चर’ सफल हो गई. फिर भी उन का अंधविश्वास ज्यों का त्यों है.

ऋतु चौधरी जब फिल्मों में अभिनेत्री बनने आईं और निर्देशक सुभाष घई से मिलीं तो सुभाष घई ने ऋतु चौधरी को सलाह दी कि उन के लिए म अक्षर लक्की है. उन की सभी फिल्मों की अभिनेत्रियों के नाम म अक्षर से हैं. इसलिए तुम अपना नाम म से रख लो. तो ऋतु चौधरी महिमा चौधरी बन गईं. और फिल्म बनी ‘परदेस.’ इतना कर्मकांड करने के बाद भी न फिल्म परदेस चली और न ही अभिनेत्री महिमा चौधरी का कैरियर आगे बढ़ सका.

सीमा से परे अंधविश्वास

यह अंधविश्वास केवल हिंदू धर्म में नहीं है. इसलाम धर्म को मानने वाले भी अंधविश्वासी होते हैं. जब यूसुफ खान फिल्म में अभिनेता बनने आए तो उन्होंने प्रसिद्ध ज्योतिषी पंडित नरेंद्र शर्मा से अपना नामकरण संस्कार दिलीप कुमार के रूप में कराया. शाहरुख खान पन्ना पहनते हैं, तो सलमान खान फिरोजा ब्रेसलेट. केवल फिल्मी हस्तियां ही नहीं, बल्कि कई प्रधानमंत्रियों को अपने तांत्रिक मित्रों के कारण काफी प्रसिद्धिअप्रसिद्धि भी मिली. इंदिरा गांधी एकमुखी रुद्राक्ष की माला पहनती थीं और कई बाबाओं के यहां आतीजाती रहती थीं. इस के बावजूद उन का जीवन काफी संघर्षपूर्ण रहा. प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा के बारे में भी ऐसा ही कहा जाता है. प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहा राव तांत्रिक चंद्रास्वामी से संबंध होने के बावजूद हवाला घोटाला में फंसे और उन की काफी फजीहत हुई.

इसरो हमारे देश की सब से बड़ी विज्ञान की प्रयोगशाला है. लेकिन इस के कई अध्यक्ष भी ऐसेऐसे वैज्ञानिक हुए हैं जो कर्मकांड और अंधविश्वास को मानते रहे हैं. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान परिषद यानी इसरो के वैज्ञानिक रौकेट लौंच करने से पहले वेंकेटेश्वर स्वामी के तिरुपति बालाजी मंदिर में पूजाअर्चना करते हैं. इस पूजा में इसरो के अध्यक्ष स्वयं उपस्थित रहते हैं. 2014 की आईएएस टौपर इरा सिंघल ने एक साक्षात्कार में कहा कि वे ज्योतिष से जान गई थीं कि इस बार उन का चयन आईएएस में हो जाएगा. बच्चन परिवार हो या अंबानी परिवार, राजनेता हो या नौकरशाह इन बड़े लोगों ने भी जानेअनजाने में अंधविश्वास का प्रचारप्रसार किया. अपनी सुरक्षा को ले कर एक सवाल के जवाब में अपने को सब से ईमानदार नेता के रूप में पेश करने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि मेरी हथेली में जीवनरेखा लंबी है. मुझे कोई नहीं मार सकता. वहीं केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी जब अपना भविष्य जानने के लिए राजस्थान के भीलवाड़ा के कारोई कसबे में पंडित नाथूलाल व्यास के पास गईं तो मीडिया और सोशल मीडिया में उन की काफी आलोचना हुई थी.

ऐश्वर्या राय की शादी के समय अमिताभ बच्चन ने ग्रहनक्षत्रों को खुश करने के लिए मंदिरों का खूब दौरा किया था. वहीं, अंबानी बंधुओं में दरार पाटने के लिए मोरारी बापू से सलाह ली गई थी. फिर भी दोनों अंबानी भाई अलग हुए. कोई टोटका दोनों को एकसाथ न रख सका.

मोटी फीस वसूली

सामान्यतया ये ज्योतिषी एक डाक्टर से ज्यादा फीस लेते हैं. यंत्रमंत्रतंत्र और कर्मकांड करनेकराने के नाम पर तो मोटी रकम वसूली जाती है, वहीं रुद्राक्ष, लौकेट, अंगूठी, रत्न, माला, शंख की कीमत सैकड़े से शुरू हो कर लाखों में चली जाती है. बेजान दारूवाला एक प्रसिद्ध ज्योतिषी हैं. 5 साल तक आप का कैरियर कैसा रहेगा, यह बताने के लिए वे करीब 5,275 रुपए लेते हैं. प्रसिद्ध ऐस्ट्रोलौजर के एन राव के शिष्य एस गणेश की फीस 6,000 रुपए है. 3 साल तक आप का कैरियर कैसा रहेगा, यह बताने के लिए कंप्यूटर ऐस्ट्रोलौजी के जनक अजय भाम्बी 4,500 रुपए लेते हैं. प्रेमपाल शर्मा प्रति प्रश्न 2,100 रुपए लेते हैं. सुरेश श्रीमाली टैलीफोन पर सलाह देने के लिए एक व्यक्ति से 11,000 रुपए झटक लेते हैं.

जादवपुर यूनिवर्सिटी में विजिटिंग फैकल्टी डा. सुरेंद्र कपूर वीडियो कौंफ्रैंसिंग के जरिए सलाह देने के लिए 15 मिनट का 2,100 रुपए लेते हैं. ऋतु शुक्ला आप का जीवन 2 साल तक कैसा रहेगा, यह बताने के लिए 11,000 रुपए लेती हैं. दूरसंचार कंपनी एयरसेल अपनी ज्योतिषसेवा से प्रतिमाह 2 करोड़ रुपए का कारोबार करती है. एयरसेल की ज्योतिषसेवा के करीब 20 लाख ग्राहक हैं. हालांकि सब की फीस क्लाइंट की स्थिति के हिसाब से घटतीबढ़ती रहती है. भारत का संविधान तंत्रमंत्रयंत्र, जादूटोना, शकुनअपशकुन, शुभअशुभ, मुहूर्त, गंडातावीज, और भभूत आदि को प्रतिबंधित करता है. भारतीय संविधान के 10 मूल कर्तव्यों में एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना भी है. लेकिन यहां अंधविश्वास को ही आगे बढ़ाने वालों की भीड़ ज्यादा है.

अंधविश्वास को बढ़ावा देती हस्तियां

–       तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव को वास्तुशास्त्र में इतना विश्वास है कि वे अपना आधिकारिक कार्यालय वास्तुशास्त्र के अनुसार 2 बार बदलवा चुके हैं.

–       धार्मिक पाखंड पर बनी बहुचर्चित फिल्म ‘पीके’ के अभिनेता आमिर खान अपनी हर फिल्म दिसंबर में रिलीज करने को शुभ मानते हैं.

–       कैटरीना कैफ अपनी हर फिल्म की रिलीज से पहले अजमेर शरीफ दरगाह जा कर दुआ मांगती हैं.

–       अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी अपनी आईपीएल टीम राजस्थान रौयल्स की सफलता के लिए मैच के दौरान 2 घडि़यां पहनती हैं.

–       परेश रावल अपनी किसी भी फिल्म की शूटिंग के पहले दिन लोकेशन पर नहीं जाते हैं.

–       बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मोती पहनते हैं.

–       शिवसेना नेता और 5 बार के सांसद मोहन रावले अपने चुनाव अभियान के दौरान सिर्फ पीली शर्ट ही पहनते हैं.

–       महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने अपना नाम बदल कर अशोक राव चव्हाण कर लिया.

–       वकील व पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने नौर्थ ब्लौक में अपने कार्यालय के बाहर गणेश की बड़ी मूर्ति लगवा ली थी.

–       धर्मनिरपेक्ष देश की राजधानी दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का घर गणेश की मूर्तियों से भरा हुआ था. फिर भी वे चुनाव हार गईं.

–       अभिनेता सुनील शेट्टी अंक ज्योतिष के अनुसार अपने नाम की स्पैलिंग स्ह्वठ्ठद्ग- स्द्धद्गह्लह्ल4 लिखते हैं.

–       ज्योतिष और अंकशास्त्र में 13 को अशुभ माना जाता है. इसरो ने रौकेट पीएसएलवी 12 के बाद 13 नहीं बनाया, पीएसएलवी-14 बनाया है.

–       राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव पन्ना पहनते हैं

मर्म

हर नजर

तुम रहे

सादगी भी रही

तुम को देखा था कभी

कनखियों से बारबार

जब हर नजर में

तुम ही नहीं थे

असंख्य स्वप्न साथ लिए

हृदय आल्हादित

हुआ करता था

क्या हो तुम

कैसे कहूं

असहज कर्म से

रचित काव्य में छिपे

मर्म से हो तुम.

 

– मनोज शर्मा

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