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आईपीएल 10 : संदीप के आगे गेल, कोहली, डिविलियर्स सब फेल

आईपीएल 10 में रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर और किंग्स इलेवन पंजाब के बीच खेले गए मुकाबले में एक बार फिर बैंगलोर की टीम पूरी तरह फ्लॉप साबित हुई. कुल 139 के लक्ष्य का पीछा करने उतरी बैंगलोर की टीम 19 ओवर में 119 रन पर ही ढेर हो गई. इस जीत के साथ हीकिंग्स इलेवन पंजाब ने 10 मैचों में पांचवीं जीत के साथ तालिका में पांचवें स्थान पर अपनी स्थिति मजबूत की है.

इस दौरान पंजाब की जीत में संदीप शर्मा ने अहम भूमिका निभाई. इस गेंदबाज ने एक ऐसी सफलता हासिल की जो आज तक कोई गेंदबाज नहीं कर सका. स्टार बल्लेबाजों से सजी रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के लिए किंग्स इलेवन पंजाब के गेंदबाज संदीप शर्मा किसी बुरे सपने से कम साबित नहीं हुए.

क्रिस गेल, विराट कोहली और एबी डिविलियर्स ऐसे बल्लेबाज हैं, जिनके सामने दुनिया का हर गेंदबाज छोटा नजर आता है. कैसी भी गेंद हो, कोई भी गेंदबाज हो, अगर सामने ये बल्लेबाज हैं तो बल्ले से सिर्फ शॉट ही निकलेंगें, लेकिन आईपीएल के 43वें मैच में एक गेंदबाज के सामने इन तीनों बल्लेबाजों ने आसानी से घुटने टेक दिए.

संदीप के आगे तीन धुरंधर हुए फेल

बैंगलोर की टीम की सबसे बड़ी ताकत उनके शीर्ष के तीन बल्लेबाज विराट कोहली, एबी डिविलियर्स और क्रिस गेल माने जाते हैं. ये तीनों ही आईपीएल के इस सीजन में कुछ खास नहीं कर पाए. जबकि इससे पहले आईपीएल में कभी न कभी इनमें से एक का बल्ला गरजता ही था. इससे भी खास बात तो ये है कि आईपीएल के 10वें सीजन से पहले कभी कोई एक गेंदबाज एक ही पारी में इन तीनों को आउट करने में सफल नहीं रहा था. लेकिन आईपीएल के 43वें मैच में यह कड़ी टूट गई. संदीप शर्मा पहले ऐसे गेंदबाज बन गए जिसने एक ही पारी में इन तीनों को पवेलियन का रास्ता दिखाया.

संदीप शर्मा ने सबसे पहले पारी के पहले ही ओवर में क्रिस गेल को बिना खाता खोले पवेलियन लौटने पर मजबूर कर दिया. गेल का कैच गप्टिल ने लपका.

इसके बाद पारी के तीसरे ओवर में संदीप ने कप्तान विराट कोहली (6) को बोल्ड कर दिया. जबकि पारी के पांचवें ओवर में उन्होंने धुरंधर दक्षिण अफ्रीकी बल्लेबाज एबी डिविलियर्स (10) को विकेटकीपर साहा के हाथों कैच आउट करा दिया.

मैन ऑफ द मैच संदीप शर्मा

संदीप शर्मा आईपीएल में किंग्स इलेवन पंजाब की सबसे मजबूत कड़ी हैं ये उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया. संदीप ने मैच में अपने चार ओवरों में 22 रन लुटाते हुए तीन विकेट झटके और 'मैन ऑफ द मैच' का पुरस्कार भी जीता. ये टूर्नामेंट में उनका दूसरा मैन ऑफ द मैच का पुरस्कार था. उनके आंकड़े साबित करते हैं कि वो इस आईपीएल में कैसे पंजाब की टीम को सहारा दे रहे हैं.

पिछले सीजन के 14 मैचों में 15 विकेट लेने वाले संदीप ने मौजूदा सीजन में अब तक 9 मैचों में 20.28 की औसत और 8,35 की इकॉनमी रेट से 14 विकेट हासिल कर लिए हैं. इस सीजन में विकेट लेने के मामले में वो अब चौथे पायदान पर पहुंच गए हैं.

आपको बता दें कि इस लिस्ट में उनसे ऊपर मौजूद चारों गेंदबाजों ने संदीप से ज्यादा मैच खेले हैं. ये हैं टॉप-5.

1. भुवनेश्वर कुमार (हैदराबाद) – 10 मैचों में 21 विकेट

2. इमरान ताहिर (पुणे) – 11 मैचों में 17 विकेट

3. मिचेल मैक्लेंघन (मुंबई) – 10 मैचों में 15 विकेट

4. संदीप शर्मा (पंजाब) – 9 मैचों में 14 विकेट

5. क्रिस वोक्स (कोलकाता) – 11 मैचों में 14 विकेट

‘पाठ पढ़ाने’ में व्यस्त योगी सरकार

स्कूल टीचर, डॉक्टर, बिल्डरों, कारोबारी, विधायक कार्यकर्ता और सरकारी नौकरों और भी बहुत सारे लोगों को उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पाठ पढ़ाने में व्यस्त हैं. सरकार चलाने का यही रोडमैप अब तक दिखाई दे रहा है. इससे सरकार रोज ब्रेकिंग न्यूज और खबरों में तो बनी रह सकती है पर इसका असल में कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला. अगर कोई यह कहे की वह 18 से 20 घंटे काम करता है तो यह ब्रेकिंग न्यूज हो सकती है. साल के 365 दिन और 24 घंटे इस तरह काम करने की बातें बेमानी है. जरूरत इस बात की है कि सरकार का काम असल में प्रभाव डालता कैसे दिखे?

सरकार जब तक कुर्सी पर रहती है हर कोई यही कहता है कि वह सरकार बहुत अचछा काम कर रही है. कुर्सी से हटते ही वही लोग पुरानी सरकार को दोष देने लगते हैं. सरकार को भी वाह वाही सुनने की आदत लग जाती है. वह ऐसी बातें ही सुनना पसंद करती है कि जिसमें उसकी तारीफ हो रही हो. अगर सब कुछ अच्छा होता तो पिछली सरकारें इतनी बुरी तरह से चुनाव क्यों हारती?

सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की यूनिफॉर्म का रंग बदल गया. महापुरूषों की जंयती पर छुट्टियां रद्द हो गई. धार्मिक त्योहारों की भी छुट्टियां रद्द होती जाती तो और बेहतर होता. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने कामकाज से यह दिखाने की कोशिश में हैं कि प्रदेश में आमूलचूल बदलाव हो रहा है. यह सही है कि बदलाव का असर जल्दी नहीं दिखेगा. सरकार ऑफिसों में समय पर बैठने के बाद भी जनता के कामकाज नहीं हो रहे हैं. तहसील दिवस और थाना दिवस में यह साफ दिख रहा है. सरकार ने तहसील और थाना दिवस का नाम बदल कर पूर्ण समाधन दिवस कर दिया है.

सरकारी स्कूलों में यूनिफॉर्म बदलने से बच्चों की पढ़ाई पर क्या असर पड़ता है यह समझने के लिये पहले के फैसलों को देखना होगा. इसके पहले की दोनो सरकारों- समाजवादी और बसपा के समय में भी स्कूल ड्रेस को बदला गया था. यूनिफॉर्म के बदलने से बच्चों की पढ़ाई पर बहुत असर नहीं पड़ा. अब एक बार फिर सरकार ने स्कूल ड्रेस बदल दी है. अब सरकार ने कहा कि इस तरह से स्कूलों के हालात बदल जायेंगे. असल में सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के अलावा बाकी सब चीजों का ध्यान दिया जा रहा है. जब तक सरकारी नौकरों और नेताओं के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे सरकारी स्कूल ऐसे ही बदहाल रहेंगे.

योगी सरकार को अब यह भी दिख रहा है कि लाल गमछा की आड़ मे कुछ लोग अराजक काम कर रहे हैं. मुख्यमंत्री योगी ने इसके लिये लोगों को सावधान रहने के लिये कहा है. असल में सरकार इस तरह की बातें करती तो हैं पर इनके दुरूपयोग को रोक नहीं पाती. सपा के कार्यकाल में उस समय के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बार बार कार्यकर्ताओं से झंडा और बैनर के दुरूपयोग को रोकने की बात करते रहे पर कार्यकर्ता नहीं मानें. योगी को यह देखना होगा कि उनकी बात कितना अमल में आ रही है. पाठ पढ़ाना अच्छी बात है पर पाठ पढ़ाने का असर क्या होगा यह देखने वाली बात होगी?

हदें नहीं होतीं अंधविश्वासों की

13 साल के लगभग का वक्त गुजरने के बाद अब इस राज से पर्दा उठ रहा है कि आखिरकार क्यों 21 अगस्त 2004 को साध्वी, भागवद विशेषज्ञ और राम भक्त उमा भारती को मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा देकर हटना पड़ा था. कहने को तो हुआ इतना भर था कि उमा ने कर्नाटक के एक शहर हुबली के ईदगाह मैदान में साल 1994 में राष्ट्रीय झण्डा फहराया था, यह ईदगाह मैदान देश के उन लाखों विवादित स्थलों जैसा है जिस पर हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्मों के लोग अपना हक जताते हैं. चूंकि धार्मिक हक जताने के लिए हिंसा एक अनिवार्य तत्व है इसलिए हुबली में भी इतनी हिंसा हुई थी कि प्रशासन को वहां कर्फ्यू लगाना पड़ा था और उमा पर भड़काऊ भाषण देने और धार्मिक उन्माद फैलाने के अलावा तिरंगे के अपमान सहित 13 आपराधिक मामले दर्ज हुये थे जिनमें से एक हत्या की कोशिश का भी था.

अदालत ने उमा भारती को दोषी करार देते हुये उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया था जिससे उनके पास इस्तीफा देने के सिवाय कोई रास्ता बचा भी नहीं था. उमा विदा हुईं तो उनके बाद बाबूलाल गौर और फिर उनके बाद शिवराज सिंह को सूबे की कमान सौंप दी गई. अब चर्चा यह है कि उमा के जाने की वजह हुबली वारंट तो मां नर्मदा का प्रकोप था क्योंकि उन्होंने नर्मदा को हवाई यात्रा के जरिये पार कर लिया था.

दरअसल में नर्मदा नदी के उदभव अमरकंटक में एक नया हेलीपैड बन रहा है क्योंकि चर्चित और पूरी तरह धार्मिक हो चुकी नमामि देवी नर्मदे सेवा यात्रा का समापन करने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आने राजी हो गए हैं. अभी तक जो भी राजनैतिक हस्तियां अमर कंटक आई हैं उनका उड़न खटोला यहां के लालपुर हेलीपेड पर लैंड करता था पर मोदी के आने की खबर के साथ ही यह चर्चा भी हुई कि अभी तक जिन नेताओं ने हवाई यात्रा के जरिये नर्मदा को लांधा है उन्हें उमा की तरह कुर्सी छोडना पड़ी है इनमें प्रमुख नाम इन्दिरा गांधी, मोरारजी देसाई, वी सी शुक्ला, अर्जुन सिंह, भैरों सिंह शेखावत और मोतीलाल वोरा के हैं.

इन्हें नहीं मालूम था कि अपने ऊपर से हवाई यात्रा करने से नर्मदा कुर्सी छीनने की हद तक कुपित हो जाती है पर यह बात शिवराज सिंह को मालूम थी इसलिए अपने मुख्य मंत्रित्व काल मे उन्होंने कभी नर्मदा नदी हवाई यात्रा के जरिये पार नहीं कि इसीलिए उनकी कुर्सी सलामत है.  इसमें उनकी संगठन और सत्ता में पकड़ का कोई योगदान नहीं. शिवराज सिंह नहीं चाहते कि मोदी को भी कुर्सी छोड़ने का यह श्राप लगे इसलिए वे अलग हेलीपैड बनवा रहे हैं.

यह एक अंधविश्वास की हद है जो पंडावाद को बढ़ावा दे रही है. कहीं नहीं लिखा कि नर्मदा नदी इतनी क्रूर और पूर्वाग्रही है जिसका कहर अपने ऊपर से जाने वाले नेताओं के उड़न खटोलों पर ही टूटता है नियमित उड़ानों को वह जाने क्यों वख्श देती है जिनमें नेता भी सवार रहते हैं.  हकीकत तो यह है कि नर्मदा यात्रा की लंबी और महंगी नौटंकी से आम लोग नाराज हो चले हैं जिसमें दर्जनो हस्तियों को बुलाया गया. इस नाराजी को दूर करने शिवराज सिंह अंधविश्वास का सहारा ले रहे हैं जो भारतीयों की सनातनी कमजोरी है इससे लोग मुद्दे की बात भूलते चमत्कारों और अंधविश्वासों के रहस्य रोमांच में डूब जाते हैं और धर्म प्रचार भी हो जाता है.

शिवराज सिंह विकट के अंधविश्वासी हैं इसलिए वे अशोक नगर जाने से भी कतराते हैं जिसके बारे में यह अफवाह फैली हुई है कि यहां जो भी सी एम जाता है उसे कुर्सी गंवानी पड़ती है  यानि कुर्सी पर काबिज रहने काम धाम और काबिलियत की नहीं बल्कि किवदंतियों को ढोने की जरूरत होती है. पिछले एक साल से असुरक्षा की गिरफ्त में आ गए शिवराज सिंह धरम करम में ही डूबे हैं. कुम्भ मेले के बाद से वे प्रशासनिक काम काज कर नहीं रहे बल्कि ढो रहे हैं यह लापरवाही जरूर उन्हें डुबो सकती है क्योंकि जनता सब देखती है और बहुत बारीकी से देख कर ही वोट करती है.

कोई देवी देवता नदी पहाड़ उन्हें क्या किसी भी नेता को वोटर के गुस्से से नहीं बचा सकता उत्तराखंड के पूर्व मुख्य मंत्री हरीश रावत इसकी ताजी मिसाल हैं जिनका पूजा पाठ तंत्र मंत्र सब धरा रह गया. रही बात नर्मदा यात्रा की तो मीडिया उससे जुड़ी इस तरह की मूर्खताओं को नजरंदाज करने व्यावसायिक तौर पर विवश है क्योंकि इस ढकोसले की महिमा गाने करोड़ों के विज्ञापन जारी किए जा रहे हैं जो जनता के पैसे का दुरुपयोग ही है.

औनलाइन सिस्टम की खोट

अब का जमाना ई पेमैंट का है. अब बहुतेरे लोग घर बैठेबैठे अपने सारे जरूरी पेमैंट करते रहते हैं, ट्रेन, हवाईजहाज के टिकट बुक कर लेते हैं. चाहे बिजली का बिल हो या टैलीफोन का हो, बीमा की किस्त हो, सब का पेमैंट औनलाइन हो रहा है. आदमी घर में कैद रह गया है. बहुत सी निजी कंपनियों के कार्यालय घर आधारित होते जा रहे हैं.

यह सिस्टम हम आम हिंदुस्तानियों की फितरत के हिसाब से बिलकुल भी ठीक नहीं है. लोग कई कदम आगे बढ़ते चले जा रहे हैं बिना पीछे की सोचे हुए.

अब खाने का और्डर भी औनलाइन हो रहा है, दैनिक जरूरतों व विलासिता की चीजें भी औनलाइन और्डर पर कूरियर से घर पहुंच रही हैं. अब कोई ऐसी चीज नहीं है जो आप को औनलाइन न मिल सकती हो. प्यार तो बहुत पहले से चैटिंग मैसेजिंग द्वारा औनलाइन हो चुका है? औनलाइन फुटबौल व बैटिंग मतलब क्रिकेट का गेम भी खेला जा रहा है.

इस नए सिस्टम से पुराने सिस्टम का बड़ा नुकसान हो रहा है. पहले एक आदमी अपना काम करने जाता था तो चार लोगों से बतिया लेता था. जैसे, रेलवे की आरक्षण खिड़की, कितना जीवंत माहौल रहता था थोड़ीथोड़ी देर में लाइन में शांति भंग होती रहती थी.

2 आदमियों में पहले कौन आया, इस पर विवाद हो  जाता था या कोईर् नया आदमी लाइन में न लग कर सीधे खिड़की में तांकझांक करने की कोशिश करता तो लाइन में एकदम से एकतारूपी करंट का संचार उसी तरह हो जाता जैसे कि हीटर का बटन औन करने पर हो जाता है. कई लोग एकसाथ उस पर सुंदरसुंदर शब्दों के प्रहार कर बैठते कि हम क्या यहां घास चरने आए हैं? हमारा समय क्या धूल है? एक तुम्हीं फूल हो यहां, बाकी सब मिट्टी? पूरी की पूरी लाइन गुस्से में लाल हो जाती थी. कितना उच्च ऊर्जा स्तर रहता था. ऊर्जावान समाज है हमारा. लेकिन औनलाइन सिस्टम इसे लील जाएगा.

सोचें उस दृश्य को जो भूतकाल की बात हो जाएगी, जब लोग आरक्षण खिड़की में बाकायदा खाना व बिस्तरा, किताब, रेडियो साथ ले कर रात 12 बजे ही आ कर जम जाते थे कि सुबह 8 बजे सब से पहला तत्काल का टिकट उन्हीं को मिलेगा.

देश की समस्याओं पर कितनी सार्थक चर्चा लाइन में लगेलगे हो जाती थी. लड़भिड़ कर लोग फिर दादा, भैया भी करने लगते थे. पतिपत्नियों को इस से कुछ सीखना चाहिए जो कि जराजरा सी बात पर मुंह फुला कर कई दिनों तक आपस में बात नहीं करते हैं. नेताओं को सामूहिक रूप से कोसने का यह सब से अच्छा स्थल होता था.

एक दिन ऐसा आएगा इस औनलाइन सिस्टम के कारण कि यह सब लुप्तप्राय हो जाएगा. अगर हम जल्दी नहीं चेते तो अपनी पुरातन संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण अवयव हमेशा के लिए खो चुके होंगे?

पहले बच्चे पासपड़ोस में दिन के

4 बजते ही खेलने चले जाते थे. अब घर बैठे औनलाइन गेम खेल रहे हैं. वे पिज्जा, बर्गर की डिलीवरी देने से ले कर इस के घर पहुंचने तक हर स्टैप की मौनीटरिंग अपने कमरे में बैठेबैठे ही कर रहे हैं.

ई पेमैंट में वह मजा ही नहीं आता है जो नकदनारायण से आता है. जब जेब से खरेखरे नोट निकाल कर किसी दुकानदार को पेमैंट करते हैं तो मोलभाव का आनंद ही कुछ और होता है और बड़े से बड़ा आदमी यदि 10-12 रुपए भी कम करवा ले तो असीमानंद महसूस करता है. इस सब का क्या होगा?

हां, एक नई बात और भी हो रही है कि आदमी औनलाइन अच्छे से होने के लिए भी घर से बाहर निकल कर लाइन पर लगने के लिए तैयार है, वह भी रातभर के लिए और इस में पढ़ेलिखे ज्यादा हैं. ऐप्पल के आईफोन 6 लौंच के समय तो यही हुआ था. लोगों में जनून सवार हो गया था, यहां जैंडर इक्वैलिटी भी देखने को मिली, लड़केलड़कियां बराबरी से रातभर स्टोर खुलने के लिए डटे रहे. यह सोचते हुए कि एक बार लाइन में लग लो, सौदा घाटे का नहीं है, पूरी जिंदगी लाइन में लगने से मुक्ति मिल जाएगी. अब तो सिनेमा के टिकट भी औनलाइन बुक हो रहे हैं. अरे कम से कम सिनेमा को तो छोड़ कर रखना था. सुरक्षा बलों में भरती हुए नए रंगरूटों को अपने जौहर दिखाने का मौका कैसे मिलेगा जो रविवार के दिन 2 घंटे पहले से टिकट खिड़की पर आ कर बलात कब्जा कर लेते थे और किसी ने उफ की तो उस की हुई तबीयत से धुलाई.

कालाबाजारी से टिकट बेचने वालों का तो ध्यान रखना था और पत्नी का वह कुप्पा सा फूला मुंह कहां देखने को मिलेगा, यह इतिहास की बात हो जाएगी. जब पतिपत्नी व 2 बच्चे सिनेमा के टिकट खिड़की पर 2 घंटे पहले से आ कर लगते थे और पता चलता था कि सारे टिकट उन की बारी आने पर खत्म और बिना सौरी बोले ही पीछे बैठा खलनायक लगता आदमी सटाक से टिकट खिड़की का कपाट बंद कर देता था.

अब तो 15 दिन पहले से ही प्लानिंग हो जाती है और सिनेप्लैक्स में कहां बैठना है, यह भी तय हो जाता है. तो यह सिस्टम तो गंगू की नजर में बहुत बुरा है, समाज को जीने के समृद्ध अंदाज का तानाबाना लीलता जा रहा है. हम हिंदुस्तानी ऐसे नहीं रह पाएंगे? ये तकनीक ईजाद करने वाले यह समझने की कोशिश क्यों नहीं करते?

यह क्या बात हुई कि  दुकान गए ही नहीं, कपड़े के 10 थान या 20 साडि़यां या सलवारकुरते या पैंटशर्ट निकलवा कर नहीं देखे वह भी 2-3 दुकानों में कम से कम घूम कर, और यहां औनलाइन कैटलौग देख कर और्डर कर दिया? ऐसा तो कपड़ा पहनने में ही मजा न आए. मजा तो तब आता था जब कपड़ा मोलभाव कर के, 4 दुकानें घूम कर लाएं फिर अपने पसंदीदा टेलर के यहां नाप दिया. उस ने उसे सिला और यहां हम अपना गिलाशिकवा ले कर पहुंच गए कि कमर की जगह कमरा समझ के सिल दिया है या फुलशर्ट की बांहें इतनी छोटी बनी हैं कि अब हाफशर्ट ही बना दो.

औनलाइन पतलून और्डर करो तो इतने छोटे से पैक में हलका सा कपड़ा आता है कि लगता है कि कहीं रूमाल तो नहीं भेज दिया है. फिर भी लोग खुश हैं और औनलाइन कारोबार करने वाली कंपनियां भी, क्योंकि उन का टर्नओवर अंकगणितीय अनुपात में बढ़ता जा रहा है.

लाइन में लगना, मोलभाव करना हमारी सांस्कृतिक धरोहर है, कृपया इसे लुप्त होने से बचाने में आप अपना योगदान दें.   

धर्म की निरंकुश दुकानें

केंद्र सरकार हज जाने वालों को दी जाने वाली सब्सिडी को कतरने वाली है. यह कदम अच्छा है क्योंकि किसी भी सरकार को किसी भी धर्म को कोई आर्थिक सहायता नहीं देनी चाहिए. पर कठिनाई यह है कि अगर कांग्रेस सरकार मुसलमानों को हज सब्सिडी देती थी तो अब हिंदू मंदिरों, मठों, तीर्थों, तीर्थयात्रियों को कहीं सीधी, तो कहीं सुविधाओं के नाम पर छिपी सब्सिडी दी जा रही है. हर धर्म अपने भक्त को कट्टर और निरंकुश बनाने की कोशिश करता है और साथ ही, उसे फुसला कर उस की जेब ढीली करवाता है. दुनियाभर के विशाल चर्च, मसजिदें, मंदिर, बौद्ध मोनस्ट्रियां गवाह हैं कि वहां सैकड़ों लोग बिना काम किए सुरक्षित जिंदगी जीते हैं क्योंकि धर्म के नाम पर बने मूर्ख लोग अपनी जेब कटाने वहां खुद आते हैं. उस पर सरकारी सहायता भी मिलने लगे, तो कौन धर्मों की पोल खोलेगा और कौन धंधे की आग को धीमा करेगा.

आधुनिक सोच, विज्ञान, तकनीक, नई खोजों, नए आविष्कारों से पिछले 300 वर्षों से मानव बेहतर तरीके से रहना सीख रहा है और यह किसी धर्म की देन नहीं है. यह व्यक्तियों की अपनी मेहनत, सूझबूझ, लगन और नया सोचने से हुआ. सरकारों को उसे प्रोत्साहन देना चाहिए, न कि हज सहायता या मानसरोवर सहायता दे कर उन्हें 1,000-2,000 साल पीछे ले जाना चाहिए. मानव ने प्रकृति से लड़ना सीखा पर धर्म चतुराई से प्रकृति और मानव के बीच का दलाल बन बैठा. प्रकृति क्या है, इस की जानकारी धर्म ने काल्पनिक किस्सेकहानियों से मानव मस्तिष्क में भर दी. धर्म को लगातार लाभ हुआ क्योंकि धर्म अघोषित टैक्स लगा सका और आमतौर पर राजा भी इस साजिश में हिस्सेदार रहा क्योंकि धर्म की कर्मठ, उत्साही, अनुशासित और सवाल न पूछने वाली फौज हमेशा राजा की फौज से ज्यादा उपयोगी रही है.

भारत में धर्म की दुकानें कभी मद्धम नहीं पड़ी थीं और भाजपा की जीत से अब और चमकेंगी. मोदी की जीत का अर्थ यह न समझें कि दूसरे धर्म वाले भयातीत हो कर दुबक जाएंगे, हर धर्म के भक्त अंधे होते हैं और धर्म के नाम पर वे हर तरह की कुरबानी दे सकते हैं. कालाधन जो सरकार को टैक्स न दे कर बचाया जाता है, धर्म के नाम पर चेहरे पर बिना शिकन लाए चढ़ावे में दे दिया जाता है. धर्म के लिए तो लोग मरने को भी तैयार हैं. 21वीं सदी की तकनीक का लाभ उठा कर गरीबी, बीमारी, भेदभाव, ऊंचनीच, प्रकृति प्रकोप से बचाने का प्रयास न कर, धर्म आधारित सरकारों का उदय होना मानव इतिहास के काले अध्याय की शुरुआत है और ऐसा दुनियाभर में हो रहा है. अरब देश जलने लगे हैं और अमेरिका इस के कगार पर है. यूरोप में भी ऐसा कुछ हो रहा है. अफसोस यह है कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग भी पाखंडों का मुरीद है और धर्र्मकर्म को ही उन्नति का मुख्य मार्ग मानता है.

यह भी खूब रही

मैं एक विद्यालय में पढ़ाती हूं. मेरी एक सहकर्मी की डींगे मारने की आदत है. उन की बातों का विषय अकसर ही उन की बेटी और उस की उपलब्धियां हुआ करता था. अकसर ही वे कहतीं, ‘‘मेरी बेटी तो कल्पना चावला की बहुत बड़ी फैन है. वह भी कल्पना चावला की तरह बहुत बड़ी साइंटिस्ट बनना चाहती है.’’ एक दिन उन की बेटी हमारे स्कूल आई. बातोंबातों में हमारी लाइब्रेरियन मैम ने उस से बड़े प्यार से पूछा, ‘‘बेटा, आप बड़े हो कर कल्पना चावला की तरह बनना चाहते हो?’ तो वह बोली, ‘‘कौन कल्पना चावला? मैं तो किसी कल्पना चावला को नहीं जानती.’’ उस की बात सुन कर हम सभी भौचक्के रह गए और उन सहकर्मी पर घड़ों पानी पड़ गया. 

ऋतु गुप्ता

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आधी रात को पति उठ कर बैठ गए. बिस्तर पर चिंताग्रस्त पति को देख कर पत्नी बोली, ‘‘क्या हो गया, चिंता किस बात की?’’ पति बोले, ‘‘साहूकार से 50 हजार रुपए उधार लिया था, उचित समय में न दे सका. उस ने मुझे धमकी दी है, नींद उड़ गई है. चैन से सो नहीं सकता.’’ पत्नी लंबी सांस ले कर बोली, ‘‘बस, यही अड़चन है न, चिंता न करें?’’ उस ने फोन से साहूकार को डांट लगाई, ‘‘मैं उस आदमी की पत्नी बोली रही हूं, जिस की आप ने नींद हराम की है. जाओ, हम आप के पैसे नहीं दे सकते. चाहे जो करो, हां, पंगा मुझ से है.’’ अब उस साहूकार की नींद हराम हो गई थी, बेचारा.       

लक्ष्मण कुन्हेकर

इन्हें भी आजमाइए

– घूमने के स्थान के चयन में यह जरूर देखें कि जहां आप जा रहे हैं वह जगह वैसी तो नहीं है कि जिस माहौल में आप रोजाना जी रहे हैं. अगर आप शोरशराबे वाली जगह में रहते हैं तो आप को किसी शांत जगह का चुनाव करना चाहिए, इस से आप को बहुत सुकून मिलेगा. आप पर्यटन से तरोताजा हो कर लौटेंगे.

– फेशियल औयल की 4 बूंदें लें और ड्राई आईलाइनर में डाल दें. अच्छी तरह मिलाएं. इस से लाइनर स्मूथ हो जाएगा और आप उसे लंबे समय तक इस्तेमाल कर पाएंगी.

– सफर के दौरान अपने साथ अच्छा इयरफोन रखें ताकि आप अपना मनपसंद संगीत सुन सकें और दूसरी चिल्लपों से बचे रहें.

– आप को फर्नीचर के डिजाइन का चुनाव करते समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए. याद रखें, फर्नीचर बारबार नहीं बदला जाता. तो ऐसे डिजाइन का चुनाव करें जो पूरी तरह आधुनिक हो तथा भविष्य में पुराना न दिखाई दे. इस के अलावा आप कुछ पारंपरिक प्रकार के फर्नीचर का चुनाव भी कर सकते हैं.

– होटल आदि में रुकने के दौरान रात का खाना देर से न खाएं और खाने के बाद कुछ देर टहलें जरूर. इस से आप सुस्ती महसूस नहीं करेंगे और शरीर में स्फूर्ति बनी रहेगी.

निर्भया केस : आप देखिए 16 दिसंबर की उस रात के सच का पहला VIDEO

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को निर्भया मामले के चार दोषियों को मिली मौत की सजा बरकरार रखी है. निचली अदालत ने मुकेश, पवन, विनय शर्मा और अक्षय कुमार सिंह को मौत की सज़ा सुनाई थी जिसे दिल्ली हाई कोर्ट ने बरकरार रखा था. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के बाद 27 मार्च को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चारों दोषियों को रियायत नहीं दी जा सकती. जस्टिस भानुमति की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा, "इस बर्बरता के लिए माफी नहीं दी जा सकती, अगर किसी एक मामले में मौत की सजा हो सकती है तो वो यही है. निर्भया कांड सदमे की सुनामी था."

वहीं निर्भया की मां आशा देवी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि मैं सारे समाज का धन्यवाद करती हूं. उम्मीद करती हूं कि हम आगे और भी बच्चियों के लिए ऐसी लड़ाई लड़ेंगे. कहीं न कहीं लचर व्यवस्था तो है, लेकिन आज कोर्ट में साबित हो गया कि न्याय में देर है, अंधेर नहीं.."

निर्भया मामले में कब-कब क्या हुआ?

16 दिसंबर, 2012 : दिल्ली के मुनिरका में छह लोगों ने एक बस में पैरामेडिक छात्रा से सामूहिक बलात्कार किया. घटना के बाद युवती और उसके दोस्त को चलती बस से बाहर फेंक दिया गया.

18 दिसंबर, 2012 : राम सिंह, मुकेश, विनय शर्मा और पवन गुप्ता को इस मामले में गिरफ़्तार किया गया. 21 दिसंबर को मामले में एक नाबालिग को दिल्ली से और छठे अभियुक्त अक्षय ठाकुर को बिहार से गिरफ़्तार किया गया.

29 दिसंबर, 2012 : पीड़िता ने सिंगापुर के एक अस्पताल में दम तोड़ा.

3 जनवरी, 2013: पुलिस ने पांच बालिग अभियुक्तों के ख़िलाफ़ हत्या, गैंगरेप, हत्या की कोशिश, अपहरण, डकैती आदि आरोपों के तहत चार्जशीट दाख़िल की.

17 जनवरी, 2013: फ़ास्ट ट्रैक अदालत ने पांचों अभियुक्तों पर आरोप तय किए.

11 मार्च 2013: राम सिंह ने तिहाड़ जेल में आत्महत्या की.

31 अक्टूबर, 2013: जुवेनाइल बोर्ड ने नाबालिग को गैंगरेप और हत्या का दोषी माना और उसे प्रोबेशन होम में तीन साल गुज़ारने का फ़ैसला सुनाया.

10 सितंबर, 2013: फ़ास्ट ट्रैक अदालत ने चार अन्यों को 13 अपराधों के लिए दोषी ठहराया और 13 सितंबर को मुकेश, विनय, पवन और अक्षय को सज़ा-ए-मौत सुनाई गई.

13 मार्च, 2014: दिल्ली हाई कोर्ट ने चारों दोषियों की मौत की सज़ा को बरक़रार रखा.

2014-2016: दोषियों ने फांसी की सज़ा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है और शीर्ष अदालत फिलहाल इस पर सुनवाई कर रही है.

अब आप देखिए ये वीडियो जिसमें निर्भया के दोस्त ने पहली बार टीवी के सामने आकर उस रात का सच बताया था… 

(वीडियो साभार : जी न्यूज़)

बच्चों के मुख से

मैं एक स्कूल में अध्यापिका हूं. एक दिन मैं कक्षा 3 के छात्रों को उन के यूनिट टैस्ट के अंक बता रही थी. एक छात्र से मैं ने कहा कि आकाश, तुम्हारे सब विषयों में तो अच्छे अंक आए हैं, परंतु नैतिक विज्ञान (मौरल साइंस) में बहुत कम अंक आए हैं. लगता है तुम ने यह विषय पढ़ा नहीं था. यह सुन कर पहले तो वह चुप रहा, फिर धीरे से बोला कि मौरल साइंस का जमाना गया. उस की यह बात सुन कर सब बच्चे खिलखिला कर हंस पड़े और मैं सोचने लगी कि इस बच्चे ने कितने भोलेपन से इतनी गूढ़ बात कह दी.

तृप्त कौर भाटिया

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मेरा बेटा विशाल जब 5 वर्ष का था तो एक बार उस ने कहा, ‘‘पापा, आप मुझे यदि एक साइकिल दिलवा दें, तो मैं आप को रोज शाम को औफिस से लेने आऊंगा.’’ खैर, हम ने उस को छोटी साइकिल दिलवा दी और बात आईगई हो गई.

एक दिन औफिस बंद होने पर जब मैं घर लौट रहा था, तो मैं ने सड़क पर साइकिल चलाते हुए विशाल को अपनी ओर आते देखा. मैं ने मुसकराते हुए उस से पूछा, ‘‘साहब बहादुर, यहां कैसे?’’ वह बोला, ‘‘आप को लेने आया हूं. चलो, मेरी साइकिल पर.’’ अब आप ही सोचिए कि मैं उस साइकिल पर कैसे बैठता? आज वह युवा हो गया है, मुझे अकसर कार में बिठा कर लौंगड्राइव पर ले जाता है. तब, मुझे बालक विशाल के वे शब्द याद आते हैं, ‘‘पापा, आप मुझे यदि साइकिल दिलवा दें, तो मैं आप को रोज शाम को औफिस से लेने आऊंगा.’’      

नरेंद्र वार्ष्णेय

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मेरी 2 बेटियां हैं. बड़ी बेटी अक्षिता 9 साल की है जबकि छोटी जीशू 4 साल की है. दोनों आपस में बहुत प्यार करती हैं तो झगड़ती भी हैं. छोटी बेटी बड़ी पर हावी हो जाती है. एक दिन मैं ने छोटी को समझाया कि तुम दीदी से इतना झगड़ती क्यों हो? वह ससुराल चली जाएगी तो क्या होगा? दीदी की बहुत याद आएगी तो तुम क्या करोगी? जीशू ने बहुत ही मस्ती से कहा कि दीदी की शादी हो जाएगी तो मैं उस की सारी चीजें आराम से छेड़ूगी. उस के खिलौने, पैंसिल, कलर्स, गुडि़या सब मेरी हो जाएंगी.

उस की बात सुन कर मेरी आंखों में आंसू के साथ होंठों पर हंसी भी आ गई.

दिव्या केडि़या

टोयोटा ने लॉन्च की इनोवा क्रिस्टा टूरिंग स्पोर्ट

टोयोटा ने इनोवा क्रिस्टा टूरिंग स्पोर्ट भारत में लॉन्च कर दी है. इसे इनोवा क्रिस्टा की पहली एनिवर्सिरी पर लॉन्च किया गया है. पेट्रोल वेरिएंट की शुरुआती कीमत 17.79 लाख और डीजल की 18.91 लाख रुपये (एक्स-शोरूम, दिल्ली) है.

टोयोटा इनोवा क्रिस्टा टूरिंग स्पोर्ट में खासतौर पर कॉस्मेटिक बदलाव किए गए हैं. फ्रंट ग्रिल और रियर टेल गेट को ग्रॉस ब्लैक में पेंट किया गया है. बॉडीकिट और व्हील्स को क्रॉसरोवर स्टाइल दिया गया है. प्रीमियम लुक देने के लिए इसमें क्रोम फिनिशिंग भी की गई है. फ्रंट बंपर पर भी क्रोम फिनिशिंग और टेल गेट के स्पॉयलर का डिजाइन थोड़ा बदला गया है.

टोयोटा ने इनोवा के व्हील साइज को 17 इंच से घटाकर 16 इंच कर दिया है. टोयोटा को इस बारे में कई शिकायतें मिली थीं कि 17 इंच के व्हील भारतीय सड़कों के लिए ठीक नहीं हैं.

टोयोटा क्रिस्टा टूरिंग स्पोर्ट मैनुअल और ऑटोमेटिक गियरबॉक्स ऑप्शन के साथ पेट्रोल और डीजल इंजन में अवेलेबल है. पेट्रोल इंजन 2.7 लीटर का है, जो 164 bhp और 245 Nm टॉर्क जनरेट करता है. यह 5-स्पीड मैनुअल और 6-स्पीड ऑटोमेटिक में अवेलेबल है.

डीजल इंजन दो इंजन वेरिएंट में आ रहा है. मैनुअल डीजल 2.4 लीटर का है, जो 148 bhp और 343 Nm टॉर्क जनरेट करता है. इसमें 5-स्पीड मैनुअल गियरबॉक्स है. ऑटोमेटिक टूरिंग स्पोर्ट में 2.8 लीटर इंजन है, जो 172 bhp और 360 Nm टॉर्क जनरेट करता है. इसमें 6-स्पीड ऑटोमेटिक गियरबॉक्स है.

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