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गर्लफ्रैंड खुश हो जाएगी

पढ़ाई लिखाई और ऐग्जाम्स के बाद अगर किशोरों की सब से बड़ी कोई परेशानी है तो वह है गर्लफ्रैंड को खुश रखना. बेचारे अपनी तरफ से खूब कोशिश करते हैं कि गर्लफ्रैंड खुश रहे, लेकिन फिर भी जरा सी चूक होते ही गर्लफ्रैंड मुंह फुला लेती है. अगर आप भी इस समस्या से परेशान हैं तो जरा गौर फरमाएं इन अचूक नुसखों पर जो आप की गर्लफ्रैंड का दिल जीतने में मददगार साबित होंगे.

–  अपनी गर्लफ्रैंड की पसंदीदा चीजों व चाहतों की एक लिस्ट बनाएं. व्यवहार विशेषज्ञों का मानना है कि लड़कियों को ऐसी चीजें बहुत याद रहती हैं लेकिन लड़के भूल जाते हैं. इसलिए आप हाथोंहाथ नोट कर लेंगे तो खास मौकों पर उसे गिफ्ट देने में आसानी रहेगी और वह अपनी मनपसंद चीज पा कर बेहद खुश हो जाएगी.

–  गर्लफ्रैंड की कोई फ्रैंड साथ हो या उस से मिलने आई हो तो उस से बस, हायहैलो ही करें. ज्यादा हाहा, हीही करने की जरूरत नहीं. फ्लर्ट करने की तो भूल कर भी कोशिश न करें. उस के जाने के बाद अपनी गर्लफ्रैंड से कहें, क्या पकाऊ है यार. यकीन मानिए आप की गर्लफ्रैंड फूली नहीं समाएगी.

–  गर्लफ्रैंड से कभी हलकीफुलकी बहस हो जाए, तो अगले दिन उसे सौरी कहें और पूछें, ‘तुम कल बुरा तो नहीं मान गई? क्या बताऊं, कल मेरा मूड ठीक नहीं था.’ 

यकीन मानिए उस का दिल पिघल जाएगा, यह सोच कर कि आप वाकई उस की परवा करते हैं. कई बार गर्लफ्रैंड किसी छोटीमोटी बात को भूल जाती है या इग्नोर कर देती है और आप उस के लिए भी सौरी कहते हैं, तब तो वह आप से और भी ज्यादा इंप्रैस हो जाती है.

–  जब कभी वह अपनी किसी समस्या या किसी के साथ हुए विवाद की चर्चा आप के साथ करे, तो धैर्यपूर्वक, पूरी सहानुभूति से उस की बात सुनें. अगर आप को कहीं उस की गलती लगे, तो भी उस वक्त ऐसा न कहें उसे अपनी बात शेयर करने और उसे सुना कर मन हलका करने वाला चाहिए होता है न कि उस की कमी ढूंढ़ने वाला. उसे कहें, ‘मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं. जब भी मेरी जरूरत हो, याद करना तुम आधी रात को कौल करोगी तो भी मैं हाजिर हो जाऊंगा.’ समस्या का हल करने में पूरी शिद्दत से उस की मदद करें. ऐसे समय में वह आप को ‘कौल मी’ का मैसेज दे तो तुरंत कौल बैक करें.

–  अगर कभी आप का गर्लफ्रैंड से झगड़ा हो जाए, वह रूठी हो और आप का फोन रिसीव न कर रही हो या फिर मैसेज का जवाब न दे रही हो, तो सोशल मीडिया पर उस की तारीफ करते हुए कोई रोमांटिक पोस्ट भेज दें. अगर आप चाहते हैं कि इसे सब न देखें, तो प्राइवेसी सैटिंग पर लगा दें. यकीन मानिए, वह आप से भले बातचीत न कर रही हो लेकिन सोशल मीडिया पर आप की गतिविधियों पर पूरी नजर रखती है. अपनी तारीफ सुनते ही उस का गुस्सा काफूर हो जाएगा.

–  जैसे कि युवक किसी सुंदर युवती को देख कर घूरने लगते हैं ऐसा आप के साथ हो और आप की गर्फ्रैंड आप को रंगेहाथों पकड़ ले, तो फुरती से काम लीजिए और कहिए शायद स्कूल में मेरे साथ पढ़ती थी. कितनी मोटी और मैच्योर हो गई है या फिर ‘यह ड्रैस अगर तुम ने पहनी होती तो कितनी अच्छी लगती.’

जब भी गर्लफ्रैंड कोई नई ड्रैस ट्राई करे तो तारीफ करते हुए कहें, ‘क्या बात है यार, आजकल डाइटिंग पर हो क्या? बड़ी स्लिमट्रिम लग रही हो.’ गर्लफ्रैंड ऊपर से भले ही कुछ न कहे, लेकिन मन ही मन खुश हो जाएगी.

–  गर्लफ्रैंड ने कोई नया कोर्स शुरू किया है या जौब में कोई प्रोजैक्ट हाथ में लिया है तो उस में दिलचस्पी दिखाएं. उस की मदद करने की कोशिश करें या उस प्रौपर व्यक्ति के बारे में उसे बताएं जो उस के लिए मददगार साबित हो सकता है. आप को मदद की इतनी कोशिश करते देख उसे यकीनन बहुत अच्छा लगेगा और वह आप के इस अपनेपन की मुरीद हो जाएगी.

–  गर्लफ्रैंड का मूड उखड़ा हुआ या उसे उदास देखें, तो उस की हर बात में हां कह दें. उस स्थिति में उस से उलझना ठीक नहीं बल्कि उस से उदासी या नाराजगी का कारण पूछते हुए कहें कि तुम तो कभी ऐसे उदास रहती ही नहीं, किसी ने तुम्हें परेशान किया है क्या?

–  गर्लफ्रैंड की आलोचना करने से बचें. अगर आप को उस की कोई कमी बतानी भी है, तो भी उस की तारीफ करते हुए कहें, ‘तुम वाकई आज के हिसाब से बहुत इनोसैंट हो, लेकिन लोग तुम्हें ठीक से समझते नहीं.’

–  गर्लफ्रैंड डै्रस खरीदते समय जब आप की चौइस पूछे तो कभी भी ऐसा न कहें, ‘देख लो, तुम को जो पसंद हो. दोनों ही ठीक हैं.’ ऐसे जवाब से वह झुंझला जाएगी. बेहिचक दोनों में से किसी एक ड्रैस को छांट कर अलग करें और कहें, ‘वैसे तो दोनों ड्रैस अच्छी हैं, लेकिन यह तुम पर सौ फीसदी सूट कर रही है.’

–  अगर आप उस का बर्थडे भूल गए हैं और अचानक दोपहर या शाम को याद आता है, तो कौल भूल से भी न करें. वह भड़क जाएगी कि तुम्हें शाम को मेरा बर्थ डे याद आया क्या? बल्कि संभव हो तो उस के लिए एक सरप्राइज पार्टी और्गेनाइज करें. उस की फ्रैंड्स और म्यूचुअल फ्रैंड्स को खबर दें या फिर उस के गिफ्ट और खानेपीने का सामान ले कर दलबल सहित उस के घर पहुंच जाएं या उसे किसी रेस्तरां में इनवाइट करें. वह खुश हो जाएगी कि आप उस की इतनी परवा करते हैं. इस से आप के रिश्ते में और मिठास आ जाएगी.

जातियों का रोग, उलटबांसियों में फंसे लोग

‘मनुस्मृति’ के मुताबिक, समाज में वर्ण व्यवस्था जन्म के हिसाब से तय की जाती थी. ब्राह्मण को मुख, क्षत्रिय को हाथ, वैश्य को जांघ व शूद्र को पैर माना गया. पढ़ेलिखे व कामचोर पैसे वालों ने इस में चालाकी दिखाई. उन्होंने अपनी सहूलियत के काम छांट कर खुद कब्जा लिया. पैसे, ताकत व हक पर काबिज हो कर खुद ही अगड़े बन गए और कमरतोड़ मेहनत, खेतीबारी, मजदूरी, सेवा, साफसफाई व जानवरों की खाल उतारने जैसे काम गरीब, जाहिल, अनपढ़ व कमजोरों के जिम्मे तय कर दिए.

इस से समाज का कमजोर तबका पीछे व नीचे हो गया. अगड़े फायदे में रहे. ताकतवर की हैवानियत व मतलबपरस्ती के चलते समाज में कमजोरों पर हमेशा जुल्म होते रहे हैं.

कामचोरी को तरजीह

आमतौर पर कहा जाता है कि अगर पेट भरना है, तो काम करो. मेहनत कर के खाओ, लेकिन अफसोस की बात है कि मेहनत कर के खाने की बात अगड़े व असरदार लोग सिर्फ दूसरों के लिए करते हैं. मेहनत के सभी काम खासकर नीची जातियों के कंधों पर हैं. सारी नसीहतें कमजोरों पर ही लागू होती हैं. अगड़े और दाढ़ीचोटी वाले बिना करेधरे ही खीरपूरी खाते रहे हैं. अब भी वे अपनी खिदमत पिछड़ों, दलितों व कमजोरों से ही कराते हैं.

दिमागी फुतूर व झूठी शान दिखाने के लिए कम से कम काम करने वालों को समाज में बड़ा व ऊंचा और काम करने वालों को छोटा व नीचा समझा जाता है, इसलिए निकम्मों की फौज बरकरार है. हमारे समाज का ढांचा सदियों से ऐसा ही बेढब रहा है कि जो लोग कुछ नहीं करते, उन्हें ब्राह्मण बता कर सिरमाथे पर बिठाया गया. सब से ऊंचा दर्जा दिया गया. पंडेपुजारी जीने से मरने तक के कर्मकांड कराने में भोले भक्तों से दानदक्षिणा और चढ़ावा लेते रहे हैं, इसलिए उन के मेहनत करने का तो सवाल ही नहीं उठता.

यह कैसी चाल

मांग कर खाने वाले ऊंचे व अगड़े कैसे हो सकते हैं? लेकिन जातियों का जंजाल बनाने वालों ने उन्हें ज्ञानी व पूज्य बता कर जबरदस्ती समाज में ऊपर बिठाया. यह उलटबांसी है कि जो समाज में भीख मांग कर खाए, दूसरों को बेवकूफ बनाए, वह सब से ऊंचा यानी ब्राह्मण कहलाए. जो राज करे, दूसरों को हुक्म दे, गरीबों से टैक्स वसूल कर मौज मारे, उन्हें क्षत्रिय कह कर समाज में दूसरे नंबर पर रखा गया. खुद काम करना उन की शान के भी खिलाफ था, इसलिए वे भी दासदासियों के सहारे ही रहे.

समाज में तीसरे नंबर पर तिजारत करने वाले सेठसाहूकारों को वैश्य बता कर रखा गया. कुछ को छोड़ कर लेनदेन, कर्ज, सूद व खरीदफरोख्त की आड़ में जमाखोरी, मुनाफाखोरी, कालाबाजारी, मिलावट, चालाकी व घटतोली की खरपतवारें भी खूब उगीं व फलींफूलीं, लेकिन इन सब के बावजूद हमारे समाज में केवल ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को समाज में पैसा, रुतबा, शोहरत व इज्जत मिली.

कई बार तोड़ा गया

शूद्रों को ऊलजलूल बातें बता कर भरमाया गया कि पिछले जन्मों में तुम्हारे कर्म खराब रहे हैं. तुम ने बहुत से पाप किए हैं. इसलिए तुम तो सिर्फ  अगड़ों की सेवा करने के लिए ही पैदा हुए हो. पापों से छुटकारा पाने के लिए खूब जी लगा कर बेगारी करो. तुम्हारा यही फर्ज है. तुम मैला उठाओ. सफाई करो. खेत जोतो. फसल काटो. रोड़ेपत्थर ढोओ. इतना ही नहीं, अगड़ों ने शूद्रों को हमेशा बरगलाए रखा. उन्हें गलत समझाया व गलतियां करने के लिए उकसाया. उन्हें भरोसा दिया गया कि जीनेखाने के लिए जब भी जरूरत हो, तो हम से कर्ज ले लो, उसी में जीना सीखो. उसी में मरो, ताकि कम से कम अगले जन्म में तो तुम्हें पिछले पापों से छुटकारा मिल सके.

नीची जातियों पर दबंगों ने तरहतरह की पाबंदियां लगाईं. उन्हें अपवित्र बता कर एक ओर छुआछूत माना, वहीं दूसरी ओर उन की बहूबेटियों की इज्जत लूटी. विरोध करने पर उन्हें मारापीटा गया, बेइज्जत किया गया. धर्म के ठेकेदारों ने भी उन्हें उलटा पाठ पढ़ा कर बहलायाफुसलाया. उन्हें तरहतरह के अंधवश्विसों में फंसाया. भूतप्रेत, भाग्य और भगवान के भरोसे रहना सिखाया. दानपुण्य, तीर्थ, तेरहवीं, मुंडन वगैरह करने में लगाया. गंडेतावीज की आड़ में उन्हें जम कर लूटा. ग्रहों के नाम पर उन्हें इतना डरा दिया गया कि वे बहस करने के लायक ही नहीं रहे और चढ़ावा चढ़ाते रहे.

कड़वी सचाई

यह बात भी जगजाहिर है कि हमेशा दिल लगा कर काम करने व मेहनत करने की सीख दी जाती है, लेकिन मेहनत के काम में पूरा भेदभाव हुआ. उस में भी बंटवारा किया गया. यह कहां की तुक है कि पिछड़े व दलित अपनी कूवत से भी ज्यादा काम करें, ऊपर से अगड़ों के जुल्म सहें? जब तक कामचोरों की फौज है या फिर जब तक साफसफाई करना सिर्फ सफाई मुलाजिमों की ही जिम्मेदारी है, तब तक लाख सफाई अभियान चलाओ, कुछ बदलने वाला नहीं है.

अमीरों के शहरी इलाके भले ही चमक जाएं, लेकिन गांवकसबों में बसे असल हिंदुस्तान में लगे कूड़े के ढेर बढ़ते रहेंगे, बजबजाती नालियां उफनती रहेंगी, बीमारियां भी पनपती रहेंगी, इसलिए जरूरत है गांवदेहात के लोगों में जागरूकता लाने, तालीम व हुनर को बढ़ाने व सोच को सुधार कर बदलने की. हम सब लोगों का नया नजरिया ही इस में बदलाव ला सकता है और देश खुशहाल हो सकता है.

ऐसे भी होता है प्यार

जिंदगी में प्यार के फूल खिले हों और रिश्तों में मिठास तथा विश्वास हो तो हर पल खुदबखुद खूबसूरत हो जाता है. वे लोग खुशनसीब होते हैं, जिन्हें सच्चा प्यार मिलता है. सच्चा प्यार मिलने से ही कैनेडी मैरी का भी हर पल अब खुशियों भरा था. मैरी की गुलाबी आंखों, गुलाब की पंखुडि़यों की मानिंद नाजुक होंठों और आकर्षक गुलाबी चेहरे पर गजब की चमक थी. क्योंकि उसे सारे जहां की खुशियां जो मिल गई थीं.

कमरे में बैठी मैरी कल्पनाओं के जरिए खुशियों के महल सजा रही थी. गबरू जवान पृथ्वी उस की जिंदगी की जरूरत बन गया था. पृथ्वी उस के वजूद का वह हिस्सा था, जिसे अब वह कभी खोना नहीं चाहती थी. पृथ्वी कमरे में दाखिल हुआ तो धड़कते दिल से उस के हर कदम की आहट मैरी महसूस कर रही थी. उस के सामने बैठ कर वह कुछ पलों के लिए उसे बेयकीन निगाहों से देखता रहा तो मैरी के होंठों पर थिरकन हुई, ‘‘इस तरह क्या देख रहे हैं?’’

‘‘सोच रहा हूं कि किस्मत किसी पर इतना मेहरबान कैसे हो सकती है कि तुम जैसी खूबसूरत लड़की मुझे मिल गई.’’ पृथ्वी की इन बातों पर मुसकराते हुए मैरी ने कहा, ‘‘यह तो मैं भी नहीं जानती, लेकिन जिस तरह जिंदा रहने के लिए सांसें जरूरी हैं, अब उसी तरह तुम मेरे लिए हो गए हो. मैं ने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरा हमसफर इतनी दूर आ कर मिलेगा. एक बात और…’’

‘‘क्या?’’ पृथ्वी ने पूछा.

‘‘मैं ने सिर्फ तुम्हारे लिए अपना सब कुछ छोड़ा है. यहां तुम्हारे सिवा मेरा कोई नहीं है. उम्मीद करती हूं, तुम न कभी मेरा विश्वास तोड़ोगे और न साथ छोड़ोगे.’’ मैरी ने पृथ्वी की आंखों में आंखें डाल कर कहा तो उस ने उस के हाथ को अपने हाथ में ले कर विश्वास दिलाने वाले अंदाज में कहा, ‘‘मैरी, तुम भी मेरी सांसों की जरूरत बन चुकी हो, इसलिए इस तरह की बात सोचना भी मत.’’

इस के बाद पृथ्वी और मैरी खुशियों के सफर पर निकल पड़े. मैरी और पृथ्वी कभी इस तरह एक हो जाएंगे, ऐसा किसी ने नहीं सोचा था. उन का धर्म, जाति, भाषा और देश सब कुछ अलग था. मैरी सात समंदर पार से पृथ्वी का प्यार पाने के लिए चली आई थी और उसे अपना जीवनसाथी चुन लिया था. उन का जादुई अंदाज में हुआ प्यार एक ऐसी मिसाल बन गया था, जिस की हर तरफ चर्चा थी.

पृथ्वी सिंह हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के सलूणी उपमंडल के गांव तिवारी का रहने वाला था. पृथ्वी की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी. वह एक होटल में काम करने के साथ स्कूली बच्चों को जूडोकराटे सिखाता था. इस के अलावा अतिरिक्त कमाई के लिए वह गाइड का भी काम कर लिया करता था.

करीब एक साल पहले की बात है, जब पृथ्वी टूरिस्ट की तलाश में डलहौजी गया था. डलहौजी मनमोहक वादियों और पर्वत शृंखलाओं से घिरा प्रमुख पर्यटकस्थल है. इसे अंगरेजों ने बसाया था. अंगरेज यहां गरमियों की छुट्टियां बिताने आते थे. खूबसूरत डलहौजी में देशविदेश से पर्यटक घूमने आते हैं.

एक दिन पर्यटकों की तलाश में भटक रहे पृथ्वी सिंह की नजर एक पार्क के किनारे बैठी विदेशी युवती पर पड़ी तो वह चौंका, क्योंकि उस के चेहरे पर जमाने भर की उदासी सिमटी हुई थी. इतना ही नहीं, उस के पास ढेर सारा सामान भी था. उसे देख कर पृथ्वी को थोड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि इतना सामान ले कर कोई पार्क में टहलने नहीं आता. अधिक से अधिक टूरिस्ट अपने पास पर्स या पीठ बैग ही रखते हैं.

पृथ्वी को लगा कि शायद युवती कुछ परेशान है, इसलिए उस के नजदीक जा कर उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हैलो, आई एम गाइड, एनी प्रौब्लम?’’

लड़की ने पलट कर उस की ओर देखा और बड़ी ही उदासी से मरी सी आवाज में बोली, ‘‘यस.’’

‘‘कैन आई हेल्प यू?’’

इस के बाद युवती ने बताया कि वह इसलिए परेशान है, क्योंकि पर्यटकों की भीड़ की वजह से उसे किसी होटल में रहने के लिए कमरा नहीं मिल सका है. काफी प्रयास के बाद भी जब वह कामयाब नहीं हुई तो अपना सामान ले कर पार्क में आ गई. उस की बातें सुन कर पृथ्वी ने हंसते हुए कहा, ‘‘ओके नो प्रौब्लम.’’

उस के इस अंदाज पर युवती की निगाहें उस पर टिक गईं. वह उस के चेहरे को देखती रही. पृथ्वी ने उस से वादा ही नहीं किया कि वह उस की हरसंभव मदद करेगा, बल्कि उसे अपने साथ ले जा कर एक होटल में उस के रहने का इंतजाम भी करवा दिया.

कमरा पा कर मैरी बहुत खुश हुई. उस ने पृथ्वी को पैसे देने चाहे, लेकिन उस ने मना कर दिया. उस के मददगार और हंसमुख स्वभाव ने मैरी पर गहरी छाप छोड़ी.

दोनों के बीच बातचीत हुई तो पता चला कि मैरी अमेरिका के वाशिंगटन की रहने वाली थी. उस ने सुन रखा था कि भारत विभिन्नताओं से परिपूर्ण आकर्षक पर्यटकस्थलों वाला देश है, इसीलिए वह भारत घूमने चली आई थी.

अगले दिन पृथ्वी ने मैरी को कई जगहों पर ले जा कर घुमाया. अपने घर से कोसों दूर मैरी को पृथ्वी में अपनापन लगा. उस ने उस के दिलोदिमाग पर अपनी छाप कुछ इस तरह छोड़ दी, जैसे किसी चित्रकार ने कोरे पेपर पर किसी तसवीर को बनाने के लिए महज एक लकीर खींची हो.

उस दिन चंद पलों के लिए मैरी ने पृथ्वी की निगाहों से निगाहें क्या मिलाईं, उस की आंखों में अपने लिए कुछ अलग सी हसरत महसूस की. कुछ ही दिनों में दोनों के बीच दोस्ती काफी गहरी हो गई. मैरी हसीन ख्वाबों की दुनिया में जीने लगी. उसी बीच मैरी समझ गई कि खुद उस के दिल की तरह पृथ्वी के दिल में भी कुछ हो रहा है. यह अलग बात थी कि पृथ्वी ने उस पर कुछ जाहिर नहीं किया था. दोनों सिर्फ एकदूसरे की धड़कनें महसूस कर रहे थे.

दोनों का साथ घूमना और खूब बातें करना रोज की बात थी. अब वे आंखों को करार देने का बहाना तलाशने लगे. उन की दोस्ती कब प्यार में बदल गई, इस का पता न मैरी को चला और न ही पृथ्वी को. दोनों के ही दिलों में प्यार के फूल खिल रहे थे, लेकिन अपनी भावनाओं को वे कैद किए रहे. आखिर एक दिन मैरी ने ही प्यार के सफर पर कदम आगे बढ़ाया, ‘‘पृथ्वी, तुम ने कभी किसी से प्यार किया है?’’

मैरी की बात पर पृथ्वी कुछ देर के लिए खामोश रह गया. मैरी उसे देखती रही. उस ने अपना सवाल फिर दोहराया तो पृथ्वी बोला, ‘‘किया है.’’

‘‘कौन है वह खुशनसीब?’’

‘‘सौरी, अभी नहीं बता सकता. मुझे अभी उस के इजहार का इंतजार है. क्या तुम ने किसी से प्यार किया है?’’

‘‘पहले तो नहीं किया, लेकिन अब करती हूं.’’

‘‘किस से, कहां रहता है वह?’’

‘‘वह तुम हो पृथ्वी. मैं तुम्हें बहुत चाहती हूं.’’

पृथ्वी मुसकरा दिया. प्यार पर स्वीकृति की मुहर लगते ही दोनों की झोली में जैसे सारे जहां की खुशियां आ सिमटीं. अब तक पृथ्वी को इस बात का अहसास हो गया था कि मैरी को भारत से काफी लगाव हो गया है.

बातों और मुलाकातों का सिलसिला बढ़ता गया तो उन के प्यार का पौधा भी बढ़ा. दोनों ने साथसाथ जीनेमरने की कसमें भी खाईं. दोनों ही एकदूसरे को टूट कर चाहते थे. प्यार में कसमेवादे आम बात हैं. उन के वादे कैसे पूरे होंगे, दोनों ही नहीं जानते थे. भाषा, देश, जाति और धर्म किसी भी मामले में उन के बीच समानता नहीं थी.

मैरी को वापस अपने देश जाना था, लेकिन मन ही मन उस ने पृथ्वी को जीवनसाथी बनाने का फैसला कर लिया था, इसलिए शादी के मसले पर वह खुल कर बात कर लेना चाहती थी. उस ने पूछा, ‘‘पृथ्वी, शादी के बारे में तुम्हारा क्या इरादा है?’’

‘‘मैरी, तुम ऐसे पूछ रही हो, जैसे अभी मिनटों में शादी की रस्मों को पूरा कर दोगी.’’

‘‘रस्में तो अपने घर वालों से बातें कर के ही निभाऊंगी. मैं चाहती हूं कि तुम भी एक बार अपने घर वालों से बात कर लो.’’

‘‘यू आर सीरियस…क्या तुम सच कह रही हो?’’

‘‘तुम भी तो यही चाहते हो न. मैं तुम से सच्चा प्यार करती हूं.’’

मैरी अपने घर वालों से बातें करती ही रहती थी. उस ने उन से पृथ्वी से दोस्ती और प्यार के बारे में बता भी दिया था. इस बीच वह पृथ्वी के घर जा कर उस के घर वालों से मिल चुकी थी. उस की वीजा अवधि समाप्त हो रही थी. उस का वापस जाने का वक्त आया तो पृथ्वी का दिल बैठने लगा. उस की परेशानी मैरी जानती थी. वह खुद भी वापस नहीं जाना चाहती थी. लेकिन उस की मजबूरी थी.

उस ने वादा किया, ‘‘मैं तुम से दूर नहीं जा रही पृथ्वी. महसूस कर के देखना, मुझे हरदम अपने साथ खड़ा पाओगे. सच्चा प्यार इंसान जिंदगी में सिर्फ एक बार ही करता है और वह मैं ने तुम से किया है. मैं यहां सिर्फ घूमने आई थी. यहां तुम्हारा प्यार मिल गया, यह मेरे लिए खुशी की बात है. मैं अपने मातापिता को मनाऊंगी, तभी हमारी शादी होगी.’’

‘‘अगर वे तैयार न हुए तो..?’’ पृथ्वी ने आशंका प्रकट की.

‘‘तुम्हारी आशंका जायज है डियर, लेकिन हमारे प्यार की डोर इतनी कमजोर भी नहीं है. वे मेरी खुशी के लिए तैयार हो जाएंगे. हमारा धर्म, संस्कार और देश भले ही अलग है, लेकिन मेरे दिल ने सिर्फ तुम्हारी धड़कन को महसूस किया है. मैं ने आत्मा से तुम्हें प्यार किया है. जब से तुम मेरी जिंदगी में आए हो, मैं ने अपनी हर खुशी को तुम से जोड़ कर देखा है. अब तुम्हारे सिवा किसी और के साथ अपनी दुनिया बसाने के बारे में मैं सोच भी नहीं सकती.’’

मैरी की बातों में दृढ़ता थी. उस का हर एक शब्द इस बात का सबूत था कि वह जो कह रही है, उसे सच कर दिखाएगी. उस ने आगे कहा, ‘‘मैं अब जब भी वापस आऊंगी, हमेशा के लिए तुम्हारी हो जाऊंगी पृथ्वी. तुम मेरा इंतजार करना.’’

इस के बाद दोबारा आने का वादा कर के मैरी अपने देश चली गई. दोनों के बीच फोन पर बातों का सिलसिला चलता रहा. पृथ्वी को मैरी पर विश्वास तो था, लेकिन वह अपना वादा निभा पाएगी, इस की उम्मीद थोड़ा कम थी. क्योंकि अपने लोगों और देश को छोड़ना कोई आसान नहीं होता.

मैरी का मन बदल भी सकता था. पृथ्वी के दिन कशमकश में बीत रहे थे. एक दिन वह ऐसे ही विचारों में खोया था कि मैरी का फोन आया, ‘‘पृथ्वी, मैं जल्द ही इंडिया आने वाली हूं.’’

 ‘क्या?’’ पृथ्वी ने हैरानी से पूछा.

‘‘क्यों, इस में हैरान होने की क्या बात है. आप के लिए एक खुशखबरी भी है.’’ मैरी ने चहकते हुए कहा, ‘‘मौम डैड मेरी शादी के लिए तैयार हो गए हैं.’’

इस के बाद मैरी ने उस की बात अपने मातापिता से भी कराई. वे बेटी की खुशी में खुश थे. कई महीने बीत गए. मैरी अपने प्यार को निभाने का पुरजोर वादा करती रही. वह पृथ्वी को जीवनसाथी बनाने का सपना दिल में संजो कर दिसंबर, 2016 के आखिरी सप्ताह में इंडिया आ गई.

मैरी डलहौली पहुंची तो पृथ्वी बहुत खुश हुआ. इस बीच उन के प्यार का रंग और भी गहरा हो चुका था. मैरी ने अपना प्यार दर्शाने के लिए अपनी गरदन के नीचे पृथ्वी के नाम का टैटू भी बनवा लिया था. पृथ्वी के घर वाले भी इस शादी के लिए तैयार थे. अपने बीच की दूरियां दोनों को अब दुश्मन लगने लगी थीं.

 2 जनवरी, 2017 को आखिर दोनों ने सलूणी के मजिस्ट्रैट अजय पाराशर के यहां विवाह अधिनियम के तहत कोर्टमैरिज कर ली.

अमेरिका की भौतिकवादी जिंदगी से दूर गांव में जीवन बिता रही मैरी का कहना है कि इंडिया बहुत प्यारा देश है. उस ने सोचसमझ कर ही पृथ्वी से शादी का फैसला लिया है.

वहीं पृथ्वी मैरी को पा कर बहुत खुश है. उस ने सोचा भी नहीं था कि कोई विदेशी लड़की उसे स्वीकार करेगी और अपना देश छोड़ कर उस के पास रहने आ जाएगी. दोनों प्रेमियों की शादी चर्चा का विषय बनी हुई है. वे खुशी से जीवन बिता रहे हैं.

प्रतिभाशाली अभिनेत्री सुगंधा मिश्रा

विरासत में मिली शास्त्रीय गायकी छोड़ कर छोटे परदे का रुख करने वाली सुगंधा मिश्रा की पहचान एक कौमेडियन की ही है. जालंधर, पंजाब के एक मध्यवर्गीय परिवार की सुगंधा की इच्छा गायिका बनने की थी, लेकिन जब उसे लाफ्टर चैलेंज शो में मौका मिला तो हंसाना न केवल उन की पहचान बल्कि पेशा बन कर रह गया.

28 वर्षीय सुगंधा बेहद खूबसूरत और स्टाइलिश हैं और छोटे परदे की कौमेडियन टीम का अहम हिस्सा भी. एक टीवी शो ‘द वाइस औफ इंडिया’ के प्रमोशन के लिए वे भोपाल आईं तो लंबी बातचीत में उन्होंने स्वीकारा कि कौमेडी, गायकी के मुकाबले ज्यादा कठिन काम है. इस में चुनौतियां बहुत हैं खासतौर से युवतियों के लिए जिन्हें अपना हर ऐक्ट संभल कर करना होता है.

आज के मशहूर कौमेडियन कपिल शर्मा, सुदेश लहरी और भारती सिंह के साथ एक ही यूनिवर्सिटी में पढ़ीं सुगंधा होनहार और प्रतिभाशाली भी हैं. वे बताती हैं, ‘‘मैं कोई 10 से 5 बजे की नौकरी नहीं करना चाहती थी. मेरे परिवार में सभी शिक्षक हैं, घर वालों को मुझ से भी यही अपेक्षा थी कि मैं स्नातकोत्तर करने के बाद किसी कालेज में नौकरी कर लूं पर मैं काफी कुछ हासिल करना चाहती थी, इसलिए हर क्षेत्र में काम करती हूं. मैं पीएचडी भी कर रही हूं लेकिन अब इंडस्ट्री कभी नहीं छोडूंगी.’’

गायकी और कौमेडी की तुलना करते हुए वे कहती हैं कि वे एक प्रशिक्षित गायिका हैं. इस के लिए दादाजी रोज रिहर्सल कराते थे. एक गाना तो रोज गाया जा सकता है लेकिन कौमेडी में रोज कुछ नया लाना होता है.

बिग एफएम रेडियो पर बतौर आरजे अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को आकार देने वाली सुगंधा के लिए सबकुछ उम्मीद के मुताबिक नहीं था, न ही बैठेबैठाए मिल गया, जो भी है उसे हासिल करने हेतु उन्होंने काफी मेहनत की है.

स्कूल टाइम से ही मिमिक्री करने वाली सुगंधा कहती हैं कि युवक किसी भी तरह की कौमेडी कर लें, चलता है पर युवतियों को साफसुथरी कौमेडी करते हुए ही दर्शकों के दिल में अपनी जगह बनानी पड़ती है, जो बेहद मुश्किल काम है. ऐसा कई बार उन के साथ भी हुआ कि कमैंट्स आए और सीटियां भी बजीं लेकिन वे मानती हैं कि इन चीजों को नजरअंदाज कर अपने काम पर ध्यान देने के बाद ही आगे बढ़ा जा सकता है.

छोटे परदे के अनुभव कैसे रहे? इस सवाल के जवाब में सुगंधा बताती हैं, ‘‘कमोबेश ठीक ही रहे. कुछ समय पहले शाहरुख खान ने कौमेडी शो में मेरा ही मजाक बनाया तो मैं स्टेज पर ही रोने लगी.’’

दूसरा अनुभव तो वे उत्साहपूर्वक बताती हैं कि जब उन्होंने एक शो में लता मंगेशकर की आवाज की नकल उतारी तो कई नामी कलाकारों ने उन की आलोचना की पर जब खुद लताजी ने तारीफ की तो जान में जान आई. सुगंधा का इरादा उन्हें अपमानित करने का नहीं था.

कपिल शर्मा को सुगंधा भाई मानती हैं. बीते दिनों एक शो के दौरान उन की टीम के साथ विदेश जाना हुआ तो उन्होंने उन्हें खूब खरीदारी कराई. सुगंधा बताती हैं, ‘‘मैं अपने काम को खूब ऐंजौय करती हूं.’’

भविष्य के लिए क्या योजना है, पूछने पर वे बताती हैं, ‘‘मैं ऐक्टिंग तो कर ही रही हूं पर गाते भी रहना चाहती हूं और एक संगीत स्कूल खोलना चाहती हूं, कभी अपने दादा से छिप कर रेडियो पर शो देने जाती थी और अब मेरा इरादा उभरती प्रतिभाओं को मंच और मौका देने का है.’’       

‘बेगम जान’ के बाद मेरी पारिवारिक जिंदगी सही हो गई : चंकी पांडे

बॉलीवुड में कलाकार की किस्मत हर शुक्रवार को बदलती है. इसे चंकी पांडे के कैरियर पर निगाह दौड़ाकर समझा जा सकता है. कभी बॉलीवुड में उनकी गिनती सर्वाधिक सफल हीरो के रूप में होती थी. लेकिन 1993 में प्रदर्शित पहलाज निहलानी की सफलतम फिल्म ‘‘आंखे’’ ने उनकी किस्मत बदल दी. ‘‘आंखे’’ में चंकी पांडे व गोविंदा दोनों थे. इस फिल्म के बाद गोविंदा को 20 फिल्में मिल गयी, मगर चंकी पांडे को बॉलीवुड में काम नहीं मिला. तो उन्होंने बांगला देश की राह पकड़ ली और वहां वह सुपर स्टार बन गए. 1994 से 1999 तक वह बांगला देश में ही रहते हुए वहां के सिनेमा में व्यस्त रहे. फिर पत्नी के कहने पर वापस भारत आ गए. भारत आने पर उन्होंने चरित्र अभिनेता के रूप में काम करना शुरू किया. चरित्र अभिनेता के रूप में उन्होने हास्य भूमिकाएं ही ज्यादा निभायीं.

चंकी पांडे एक बेहतरीन अभिनेता हैं, इसमें कोई दो राय नहीं. तभी तो लोग असफल फिल्म के किरदार आखिरी पास्ता, जिसे चंकी पांडे ने निभाया था, नहीं भूले हैं. और अब असफल फिल्म ‘‘बेगम जान’’ में पहली बार कबीर का नगेटिब किरदार निभाकर उन्होंने लोगों को अपने अभिनय का मुरीद बना लिया है. लोगों की जुबान पर कबीर का नाम छाया हुआ है. फिल्म ‘‘बेगम जान’’ के प्रदर्शन के बाद चंकी पांडे से मुलाकात हुई. उस वक्त उनसे हुई बातचीत इस प्रकार रही.

‘बेगम जान’ असफल?

यह बहुत डिस्टर्बिंग फिल्म है. इसलिए नहीं चली. मैं खुद बेगम जान जैसी फिल्म की बजाय ‘आंखे’ या ‘हाउसफुल’ जैसी फिल्में देखता हूं. हर फिल्म की सफलता हम पर निर्भर नहीं करती. ‘बेगम जान’ को बॉक्स ऑफिस पर सफलता नही मिली, मगर लोगों को मेरा किरदार कबीर पसंद आया.

फिल्म ‘‘बेगम जान’’ में आपके किरदार कबीर को बहुत पसंद किया गया. आप क्या कहेंगे?

अब तो मुझे अपने आप से डर लगने लगा है. मैं लंबे समय से हास्य किरदार निभाता आया हूं. जबकि मेरी पत्नी मुझसे कहा करती थी कि मेरे अंदर एक बहुत बड़ा विलेन/खलनायक छिपा हुआ है. मैं इसे मजाक समझता था. मेरी शादी को 19 साल हो गए हैं. मैं उससे बहुत डरता आया हूं. लेकिन फिल्म ‘‘बेगम जान’’ के बाद वह मुझसे डरने लगी हैं. अब मेरी पारिवारिक जिंदगी सही हो गयी है. कबीर के किरदार को लेकर मुझे बहुत गालियां पड़ी. मैं अपने एक दोस्त के घर गया हुआ था, तो उसकी दादी ने कहा कि, ‘मैं तुझे चप्पल लेकर मारूंगी.’ मैं बहुत मुश्किल से उन्हें समझा पाया कि वह मैंने सिर्फ फिल्म में किया है. मेरी दोस्त की पत्नी का ब्यूटी पार्लर है. उसने फोन पर बताया कि उसके यहां जो महिलाएं आती हैं, वह सब कबीर को गालियां देती है.

कबीर का जो लुक है, वह आपके दिमाग की उपज है या निर्देशक के दिमाग की उपज है?

देखिए, जब मेरे पास श्रीजित मुखर्जी इस किरदार का ऑफर लेकर आए, तो मैंने उनसे पूछा कि क्या आप वास्तव में चाहते हैं कि मैं इस खतरनाक किरदार को निभाउं. इस पर उन्होंने कहा- ‘‘मैं तुझे पिछले 25 साल से अभिनय करते हुए देखता आ रहा हूं. तू कॉमेडी करता है, तब भी तेरे अंदर एक शैतानी नजर आती है.” मैंने भी उससे कहा कि माना मेरे अंदर एक विलेन है, पर उसे बाहर कैसे निकाला जाए? तो श्रीजित मुखर्जी ने कहा कि मुझे अपने चंकी पांडे को भूलना होगा? तो मुझे अपनी पहचान को खत्म करने. फिर श्रीजित मुखर्जी के इशारे पर मैंने सबसे पहले अपने बाल मुंडवाए. मेरी खूबसूरत हंसी को बिगाड़ने के लिए दांत बड़े किए गए. चुलबुली आंखों को हटाने के लिए काजल लगाया. मेरी दाढ़ी तो वैसे भी सफेद है, तो 6 दिन के बाद सफेद दाढ़ी आ गयी थी. फिर बनियान पहन ली और लूंगी पहन लिया. इस लुक में जब मैं पहली बार सेट पर गया, तो विद्या बालन ने भी मुझे नहीं पहचाना.

लोग मुझे देखकर डर गए. लोग मेरे नजदीक नहीं आते थे. सभी को मेरे किरदार से एक खास तरह की घिन्न आती थी. तो मेरी समझ में आ गया कि मैं इस मकसद में कामयाब हो गया हूं कि लोगों के दिलों में खौफ पैदा करना है. जब मैं कलकत्ता एअरपोर्ट पर अपना बोर्डिग कार्ड लेने गया, तो वह मुझे मेरा बोर्डिग कार्ड देने तैयार नहीं था. तो मेरी समझ में आ गया कि लोग मुझे पहचान नही पाएंगे. वैसे श्रीजित मुखर्जी चाहते थे कि मैं अपनी भौंहें सफाचट कर दूं, पर मैंने उनकी यह बात नही मानी. सिर्फ भौहों पर कलर किया था. मैं तो बचपन से वैसे भी बडे़-बडे़ विलेन मसलन अजीत, प्रेम चौपड़ा व अमजद खान का फैन रहा हूं.

तो जब मुझे मौका मिला, मैंने सोचा कि अब मैं लोगों कि बैंड बजाउंगा. मैं कई तरह के मैनेरिजम अपनाना चाहता था, पर निर्देशक ने कहा कि कोई मैनेरिजम अपनाने की जरूरत नही है. केवल संवाद अदायगी समाचार पढ़ने की तरह की जाए. मैंने वही किया. कहीं कोई इमोशन नहीं, कुछ नहीं.

किरदार के नाम को लेकर भी कई तरह के सवाल उठे. क्योंकि कबीर तो बहुत बड़े समाज सुधारक संत कबीर के नाम के साथ मेल खाता है?

हमारे दिमाग में भी यह बात आयी थी. पर हमें ऐसा नाम चाहिए था, जो हिंदू या मुस्लिम दोनों हो सकता हो. इसलिए फिर हमने इसी नाम को रखा. फिल्म में संत कबीर का कोई रिफरेंस नही है. हमें कोई दूसरा नाम नहीं मिल रहा था, जो हिंदू भी लगे और मुस्लिम भी. आपने फिल्म में देखा होगा कि फिल्म के अंत में सब लोग मर जाते हैं. पर कबीर नहीं मरता. निर्देशक कहना चाहता है कि इस संसार में अच्छाई होगी, मगर बुराई कभी खत्म नहीं होगी. बुरे इंसान हमेशा रहेंगे. हम सभी के अंदर एक बुरा इंसान है. जिसे हमें दबा कर रखना चाहिए.  

कुछ देर पहले आपने कहा कि कबीर का आपकी निजी जिंदगी पर असर रहा. वह असर क्या रहा?

सबसे बड़ा असर यह रहा कि अब मेरी पारिवारिक जिंदगी खुशहाल हो गयी है. पत्नी डरने लगी है. अब मैं कहता हूं कि चाय चाहिए, तो चाय बनाकर ले आती हैं. पहले मुझे उसके लिए काफी बनानी पड़ती थी. अब लोगों को यह पता चल गया कि चंकी पांडे सिर्फ कॉमेडी नहीं करता, बल्कि अच्छा कलाकार है. ‘‘बेगम जान’’ के बाद जिस तरह की मुझे पहचान मिली है, उससे मैं बहुत खुश हूं.

क्या अब आपको लगता है कि आपने पिछले 10-12 साल में जो कॉमेडी की है, वह नहीं करना चाहिए थी?

ऐसा नही है. कॉमेडी तो मेरी रूह में है. मैंने जो भी किरदार किए हैं, लोगों को पसंद आए हैं. मैंने एक फिल्म में नेपाली का किरदार निभाया था. मैं शुक्रगुजार हूं कि साजिद खान ने मुझे यह किरदार निभाने का मौका दिया था. पहले इस किरदार को साजिद खान निभाने वाले थे. जब मैं इस किरदार को निभाने पहुंचा, तो अक्षय कुमार ने साजिद से कहा कि तू खुद क्यों यह किरदार नहीं निभा रहा है. तो उसने कहा कि मैं अभिनय नहीं, सिर्फ निर्देशन करूंगा. अब जब दर्शकों ने मुझे कबीर के किरदार में पसंद किया, तो उन्होंने मेरे करियर की दूसरी पारी अलग अंदाज में शुरू करने की प्रेरणा दे दी. मैं हमेशा कहता हूं कि कोई भी कलाकार अपनी फिल्मों या अपने अभिनय के बल पर पहचाना जाता है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कलाकार अपनी निजी जिंदगी में क्या है.

1993 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘आंखे’’ में आपके साथ गोविंदा की जोड़ी थी. पर इस फिल्म ने आप दोनों के करियर बदल दिए?

आपने एकदम सही कहा. इस फिल्म के बॉक्स ऑफिस पर सफल होने के बावजूद मुझे कामनहीं मिला और गोविंदा को 20-25 फिल्में मिल गयी थीं. वह स्टार बन गए थे. घर पर मैं खाली बैठा हुआ था. मेरे अंदर काम करने की इच्छा मुझे परेशान कर रही थी. तभी मुझे बांगला देश की फिल्म में अभिनय करने का अवसर मिला, मैंने किया और फिर कुछ समय के लिए वहीं का होकर रह गया.

मैंने बांगलादेशी फिल्मों में 1994 से 1999 तक ही काम किया था. उसके बाद पत्नी के कहने पर भारत वापस आ गया था. लोग कहते हैं कि पानी हमेशा अपनी राह ढूंढ़ लेता है. उसी तरह से बांगला देशी फिल्मों में मैं जो काम कर रहा था, उसे लोग पसंद कर रहे थे. अनिल कपूर हॉलीवुड चले गए, तो मैं बांगलादेश. इससे कोई फर्क पड़ता है, तो दूसरे देश में लोगों को अपने अभिनय का कायल कर देना भी उपलब्धि है. मेरे अभिनय वाली बांगलादेशी फिल्मों ने जो कमायी की है, वह बहुत ज्यादा है. जितने भी समय मैंने काम किया, लोग मेरी फिल्मों की वजह से परेशान थे. मेरे पास अभी भी बांगलादेशी फिल्मों के ऑफर आते हैं. पर मैं मना कर देता हूं. एक वक्त वह था, जब मैं बतौर हीरो काम कर रहा था. उस वक्त मैं बहुत इंज्वॉय कर रहा था. पर मुझे पता है कि हमेशा हीरो के रूप में काम नहीं कर सकता हूं. तो समय के साथ बदलाव आना चाहिए, तभी आप सफल हो सकते हैं. यदि मैं आज से दस साल पहले ‘‘बेगम जान’’ के कबीर को निभाया होता, तो शायद लोग पसंद न करते.

क्या अब आप कुछ और करने की सोच रहे हैं?

मैं खुद कंफ्यूज हूं कि मुझे क्या करना चाहिए. मैंने खुद फिल्म ‘‘हनुमान दा दमदार’’ में एक किरदार को अपनी आवाज दी है. लेकिन शूटिंग होने के बाद मैंने उस किरदार के लिए डबिंग नहीं की है. बल्कि पहले मैंने किरदार को माइक के सामने निभाया यानीकि संवाद अदायगी की, उसके बाद उस आवाज से निकले चारित्रिक विशेषता के साथ मेरे किरदार को गढ़ा गया. यह कार्टून फिल्म है. मेरा किरदार विरोधा भासी है. यह फिल्म डबिंग थिएटर में बनी है. पहले हमने आवाज दी, फिर शूटिंग हुई. मेरे किरदार का नाम है राजू गाइड. यह बहुत नाजुक है. डबिंग स्टूडियो में पहुंचकर मैं अपने बचपन के किस्से सुना रहा था कि अस्पताल में जिस दिन मैं पैदा हुआ, उस दिन मेरे अलावा सभी लड़कियां पैदा हुई थी. मेरी मां भी लड़की चाहतीं थीं. पर मैं पैदा हो गया था. मेरी मम्मी बचपन में लड़की वाली पोशाक ही पहनाती थी. काजल लगाती थी. कान में बोल पहनाती थी. तो मैने राजू गाइड को महिला जैसी आवाज दी है.

कुछ नया कर रहे हैं?

दो-तीन नए व अच्छे ऑफर हैं. एक तेलगू फिल्म का ऑफर है. एक हॉलीवुड फिल्म का ऑफर है. एक टीवी शो का भी ऑफर है. देखते हैं कि क्या होगा. मैंने तो दो साल पहले यह नही सोचा थी कि मुझे ‘बेगम जान’ में नेगेटिव किरदार निभाने का अवसर मिलेगा, जो लोगों को काफी पसंद आएगा. मैं तो हर तरह के किरदार निभाना चाहता हूं.

फिल्मों में आ रहे बदलाव को किस तरह से देखते हैं?

दर्शक बदलते रहते हैं. दर्शक समाज व देश के हालात के अनुसार बदलते हैं.

एसबीआई में है आपका खाता तो जरूर जान ले ये बातें

अब ग्राहकों को एसबीआई कार्ड के जरिए मकान का किराया ऑनलाइन भुगतान करने की सुविधा दी जाएगी. इसके लिए कंपनी ने लंदन की वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनी रेडजिराफ के साथ साझेदारी की है. आपको बता दें कि रेडजिराफडॉटकॉम ने एक प्लेटफॉर्म रेंटपे शुरू किया है. इसकी मदद से क्रेडिट कार्ड से किराये आदि का भुगतान किया जा सकेगा.

रेडजिराफ के फाउंडर और सीईओ का कहना है कि एसबीआई कार्डधारक अब अपने रेंट की अदायगी क्रेडिट कार्ड के जरिए कर सकेंगे और साथ ही अपने सिबिल स्कोर को भी मजबूत बना सकेंगे. मानना है कि मार्च 2018 तक एसबीआई कार्ड के एक लाख ग्राहक रेंटपे का इस्तेमाल करेंगे.

अगर आपका बैंक खाता स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) में है तो आपको ये तीन बातें जरूर पता होनी चाहिए.

SBI ने घटाईं एफडी की ब्याज दरें

एसबीआई ने विभिन्न मैच्योरिटी वाले टर्म डिपॉजिट की जमा दरों में आधी फीसदी (50 bps) तक की कटौती की है. ये दरें 1 करोड़ रुपए से कम के मध्यम और दीर्घकालिक जमाओं के लिए संशोधित की गई हैं.

बैंक ने बताया कि अब नई संरचना के मुताबिक दो से कम तीन वर्षों के जमा के लिए, एसबीआई 6.25 फीसद दर की पेशकश करेगा, जबकि इससे पहले यह दर 6.75 फीसद रही थी. इसी तरह की परिपक्वता के लिए, वरिष्ठ नागरिकों की जमा दरों को 7.75 फीसद से घटाकर 7.25 फीसद कर दिया गया है. वहीं, 3 साल से 10 साल के टर्म डिपॉजिट के ब्याज में एसबीआई ने चौथाई फीसदी (25 बेसिस प्वाइंट) की कटौती कर इसे 6.50 फीसदी कर दिया है.

किन बैंक खातों के लिए मिनिमम बैलेंस नहीं है जरूरी

सार्वजनिक क्षेत्र के दिग्गज बैंक भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने अपने ग्राहकों को स्पष्ट किया है कि छोटे बचत खाते, बेसिक सेविंग्स बैंक अकाउंट्स, जन धन अकाउंट और कॉर्पोरेट सैलरी अकाउंट धारकों को न्यूनतम बैलेंस मेंटेन करने की जरुरत नहीं है. बैंक ने यह जानकारी ट्वीट के माध्यम से दी है. बैंक ने एक अप्रैल से सेविंग अकाउंट में मिनिमम बैलेंस सीमा को बढ़ा दिया था.

जानिए किन खातों के लिए मिनिमम बैलेंस है जरूरी

एसबीआई ने मेट्रो शहरों के लिए मिनिमम बैलेंस 5,000 रुपये, शहरी इलाकों के लिए 3,000 रुपये, अर्द्ध-शहरी (सेमी अर्बन) इलाकों के लिए 2,000 रुपये और ग्रामीण इलाकों के लिए 1,000 रुपये तय की है. एक अप्रैल से यह नियम प्रभावी हो चुका है. आपको बता दें कि यह जुर्माना जरूरी मिनिमम बैलेंस और उसमें कमी के बीच के अंतर पर आधारित होगा.

बैंक की वेबसाइट के मुताबिक एसबीआई के बचत खाताधारकों को मासिक आधार पर न्यूनतम राशि को अपने खाते में रखना होगा. ऐसा न करने पर ग्राहकों को 20 रुपये (ग्रामीण शाखा) से 100 रुपये (महानगर) देने पड़ सकते हैं. बैंक में 31 मार्च तक बिना चेक बुक वाले बचत खाते में 500 रुपये और चेक बुक की सुविधा के साथ 1,000 रुपये रखने की आवश्यकता थी.

3 ओवर में ही इस खिलाड़ी ने जड़ दिया शतक

क्रिकेट रोमांच के साथ साथ आंकड़ों का भी खेल है. क्रिकेट मैदान पर आए दिन नए नए आंकड़े देखने को मिलता है. फिर चाहे वह किसी टीम का सबसे कम स्कोर पर आउट होना हो या किसी टीम का सबसे ज्यादा अंतर से जीत दर्ज करना. मसलन यहां आंकड़ों से ही आंकड़ों को मात दे दी जाती है.

ऐसे में जानने लायक एक दिलचस्प आंकड़ा ये भी है कि क्रिकेट इतिहास में सबसे तेज शतक किसके नाम है. ऐसे में आपके दिमाग में कई नाम आएंगे सचिन, सहवाग, धोनी, गेल, एबी डिविलियर्स आदि. लेकिन हम आपको बता दें कि यह रिकॉर्ड क्रिकेट के महानतम खिलाड़ी सर डॉन ब्रैडमैन के नाम है. उन्होंने महज 22 गेंदों में ही अपना शतक पूरा किया था.

ब्रैडमैन का रिकॉर्ड उनकी महानता को दर्शाता है. ब्रैडमैन ने अपने 52 टेस्ट मैचों के करियर में 99.94 की औसत से 7 हजार रन और 29 शतक जड़े हैं.

ब्रैडमैन ने एक बार एक लोकल मैच में सिर्फ 3 ओवरों में ही सिर्फ 18 मिनट क्रीज पर रहते हुए शतक ठोंक दिया था. तो आइए जानते हैं इस मैच के बारे में जब क्रिकेट के डॉन ने अपने आक्रामक खेल का प्रदर्शन किया था.

जी हां, यह कारनामा 2 नवंबर 1931 में देखने को मिला था. यह मैच ब्लैकहीथ और लिटगो के बीच कंक्रीट के विकेट पर खेला गया था, जिसमें उछाल भी बहुत था. दिलचस्प बात ये है कि उस वक्त एक ओवर में 8 गेंदें फेंकी जाती थी. इसी के चलेत मैच में डॉन ब्रैडमैन ने 3 ओवर में ही अपना शतक पूरा कर लिया. ब्रैडमैन ने पहले ओवर में 3 छक्के, 3 चौके, एक डबल और एक सिंगल लिया. इस ओवर में उन्होंने 33 रन बना लिए. अगले ओवर में उन्होंने 4 चौके और इतने ही छक्के लगाकर 40 रन और अपने खाते में जोड़ लिए.

ब्रैडमैन को शतक पूरा करने के लिए अब 27 रन की जरूरत थी. तीसरे ओवर में उन्होंने तीन छक्के दो चौके और एक सिंगल लेकर अपना शतक पूरा किया. ये क्रिकेट इतिहास की महानतम पारियों में से एक है. हालांकि ये बात बहुत ही कम लोग जानते हैं. बता दें कि इस मैच में ब्रैडमैन ने 14 छक्के और 29 चौकों की मदद से 256 रन बनाए थे.

3 ओवर का स्कोर

पहला ओवर – 6 6 4 2 4 4 6 1

दूसरा ओवर – 6 4 4 6 6 4 6 4

तीसरा ओवर – 1 6 6 1 1 4 4 6

नयी नयी नौकरी है तो जरूर करें ये पांच काम

अपने कामकाजी सालों में उतर रहे अधिकतर युवा इस बात से अनभिज्ञ हैं कि वित्तीय नियोजनों की शुरुआत कब से की जाना चाहिए. इनमें से कुछ तो आर्थिक नियोजन के बारे में काफी देर तक सोचते भी नहीं हैं, जबकि कुछ इसे बेहद कठिन काम मान कर इससे बचते हैं.

निजी वित्त प्रबंधन में किसी का वास्तव में गणित में अच्छा होना जरूरी नहीं है. आर्थिक नियोजन की सही राह पर चलने के लिए आपको थोड़े से अध्ययन और इस दिशा में काम करने के लिए तैयार होने की ही जरूरत है.

कुछ मूलभूत बातों का पालन कर इस काम को आसानी से किया जा सकता है.

खर्च पर नियंत्रण रखना है जरूरी

अच्छे वित्तीय प्रबंधन के लिए आप को अपनी जरूरतों और इच्छाओं में अंतर समझना आवश्यक है. कोई भी सामान खरीदने से पहले अपनी वित्तीय स्थिति पर उसके परिणामों का आकलन करें और इस पर भी गौर करें कि आपको उसकी कितनी जरूरत है.

यदि उस सामान को खरीदने की अत्यंत आवश्यकता है और आपके वित्त पर ज्यादा दबाव नहीं पड़ेगा तभी अपने फैसले पर आगे बढ़ें. इसका ये मतलब कतई नहीं कि आप जिंदगी का आनंद उठाना छोड़ दें.

दोस्तों के साथ घूमना-फिरना और मनोरंजन किसी भी युवा के लिए प्रमुख जरूरत है, क्योंकि उन्होंने कई सालों तक पढ़ाई में कड़ी मेहनत करने के बाद नौकरी करना आरंभ किया है. लेकिन जिन चीजों की आपको जरूरत नहीं है, उन्हें खरीदने पर लगाम लगाना बहुत जरूरी है और इसके लिए आप में आत्म-नियंत्रण की भावना मजबूत होनी चाहिए.

अपने लक्ष्यों पर टिके रहें

नौकरी की शुरुआत करने से पूर्व जरूरी है कि आप अपने लक्ष्यों को निर्धारित करने की दिशा में काम करें. लक्ष्यों की समय सीमा अलग-अलग होती है.

कुछ लक्ष्य छोटी अवधि के होते हैं, तो कुछ मध्य अवधि के. वहीं कुछ लक्ष्य दीर्घकालिक होते हैं, लेकिन हमेशा अपने लक्ष्यों की दिशा में ही काम करें. लक्ष्य तय करना और उसी दिशा में आगे बढ़ने से आप अपनी पूंजी और समय का सही चीजों में निवेश करने में सक्षम होंगे.

बजट बनाकर तय करें दायरा

एक बार वित्तीय लक्ष्य तय करने के बाद, बजट बनाएं और प्रयत्न पूर्वक उसका ज्यादा से ज्यादा पालन करें. एक महीने बाद, आपको अहसास होगा कि बजट बनाना और खर्चों पर नजर रखना कितना मददगार होता है.

इससे आपको पता चलता है कि आपको कितना पैसा खर्च करना चाहिए और कितनी बचत करने की आवश्यकता है. इससे आपके वित्तीय मसलों के बारे में भी स्पष्ट जानकारी मिलती है और आप अनावश्यक खर्चों अथवा उधारी से बचकर अपने पास उपलब्ध साधनों में जीवन-यापन कर सकते हैं.

सुनियोजित बजट द्वारा चिंता के मामलों पर जोर दिया जाता है और यह व्यर्थ खर्चों से दूर रहने में मदद करता है. आपको यह समझना जरूरी है कि समझदारी से किया गया खर्च एक प्रकार की बचत है.

इमरजेंसी के लिए भी बचत करें

हर दिन एक जैसा नहीं होता. जरूरी नहीं कि आज आपकी नौकरी सुरक्षित है, तो कल भी ऐसा ही हो. आज के परिदृश्य में व्यक्ति को कभी भी मंदी की मार झेलनी पड़ सकती है और कारोबारी रणनीति में बदलाव होने अथवा उच्च शिक्षा का फैसला करने के कारण नौकरी से भी अलग होना पड़ सकता है.

परेशानी के वक्त के लिए थोड़ा पैसा बचाना समझदारी भरा कदम होता है. नियमित मासिक राशि में से थोड़ा सा हिस्सा अलग निकालें, जिसे मासिक खर्च से अलग रखना चाहिए. स्वस्थ इमरजेंसी फंड आपको बेहद जरूरी आराम एवं सहजता प्रदान करता है.

बुरी स्थितियों के लिए भी रहें तैयार

जीवन में अपने आप को बुरे वक्त के लिए तैयार रखना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि यह किसी पर भी आ सकता है. स्वास्थ्य और जीवन बीमा कवर लेना बुरे वक्त में काफी मददगार साबित होता है.

अप्रत्याशित स्थितियों में आपको वित्तीय स्थिरता उपलब्ध कराकर आपकी एवं परिवार की मदद करता है. यह अप्रत्याशित स्थिति अस्पताल में भर्ती होना, चोट लगना अथवा मौत होना हो सकती है, जो आपकी जिंदगी को पूरी तरह से बदल सकती है.

जीवन बीमा इन अप्रत्याशित घटनाओं के प्रति सुरक्षा प्रदान करता है. जीवन बीमा लेने से पहले खुद का पर्याप्त बीमा कराने पर अवश्य ध्यान दें, ताकि भविष्य में आप पर निर्भर लोगों को सहयोग मिल सके.

आतंक के निशाने पर कौन

इसलामी आतंकवादियों से प्रभावित एक और अकेले आतंकवादी ने लंदन में पार्लियामैंट बिल्डिंग के सामने महज 82 सैकंड में लंदन को ही नहीं, सभी सभ्य देशों को एक बार फिर दहला दिया. हालांकि इस हमले में मरे कम जबकि हर रोज दुर्घटनाओं में मरने वाले कहीं ज्यादा होते हैं लेकिन इंगलैंड में ही जन्मे खालिद मसूद के लंदन अटैक ने सैकड़ों सवाल छोड़ दिए.

चाहे मरने वाले 3 ही हों पर नीयत का फर्क है और कोई भी समाज इस तरह के आक्रमण पर गुस्सा तो होगा ही. आज कठिनाई यह है कि मुसलिम आतंकवादियों की एक बड़ी फौज पैदा हो गई है जो कब, कहां आक्रमण कर दे पता नहीं चलता. इन आतंकियों के आक्रमण का निशाना सरकारें या सेनाएं नहीं होती हैं, ये आम आदमियों को निशाना बनाते हैं.

धर्म के नाम पर इतने ज्यादा लोगों के दिमाग की सफाई की जा चुकी है कि वे कहीं भी, कभी भी आक्रामक हो सकते हैं और वे खुद मरने से डरते नहीं हैं. लंदन पर हमला करने वाला खालिद मसूद इसलामिक स्टेट से सीधे जुड़ा था या नहीं, यह साफ नहीं है. मूलतया 52 वर्षीय मसूद की पैदाइश ब्रिटेन की ही है और इसे बाहरी आतंकवादी नहीं कहा जा सकता. ब्रिटेन में पैदा हुआ, पढ़ा और काम किया, फिर भी धर्म की घुट्टी का असर यह है कि उस ने निर्दोषों, निहत्थों को बेबात में कुचल दिया.

जो कहते हैं कि धर्म कोई खराब काम नहीं सिखाता, असल में धर्म के प्रचार के कारण वे इतने ज्यादा दिमागी पंगु हो जाते हैं कि उन्हें वही दिखता है जो दिखाया जाता है. धर्म के दुकानदार का कहा सत्य अकेला सत्य ही बन जाता है. धर्म के नाम पर वे भरपूर पैसा तो देते ही हैं, अपनी आजादी देने से भी कतराते नहीं हैं और दूसरे की छीन लेना चाहते हैं. धर्म कोई सही पाठ पढ़ाता हो, इस का सुबूत धार्मिक ग्रंथों में कम मिलेगा. हां, धर्म के दुकानदार झूठ बोलने में इतने माहिर होते हैं कि वे दोषोंभरे अपने ग्रंथों को महान साबित कर सकते हैं और गलती पर अतार्किक उत्तर दे भी सकते हैं.

खालिद मसूद जैसों की दुनिया में कमी नहीं है. हमारे देश के टैलीविजन आजकल हिंदू कट्टरों से भरे हैं जो खुल्लमखुल्ला मारपीट की धमकी दे रहे हैं. सब से बड़ी विडंबना यह है कि धर्म की सब से बड़ी शिकार औरतें हैं और वे ही धर्म को सब से ज्यादा मानती हैं. वे सोचती हैं कि अपने मालिक की जीहुजूरी कर के वे उस के अत्याचारों व अनाचारों से कुछ बच जाएंगी. यही औरतें धर्म के लिए चुंबक का काम करती हैं.

इसलामिक स्टेट, अलकायदा, बोकोहराम औरतों को अगवा कर उन्हें अपने समर्थकों को परोस रहा है. खालिद मसूद किस तरह का है, यह भी पता चल जाएगा पर अपने आसाराम बापू और ईसाई चर्चों में बच्चों के साथ पादरियों के समलैंगिक संबंध धर्म की पोलपट्टी खोलने के लिए काफी हैं.

कठिनाईर् यह है कि अब वैसी आंखें ही नहीं रह गईं जिन से सहीगलत को परखा जा सके. दुनियाभर के धर्म एक बार फिर अपने मनचाहों के जरिए सत्ता में आ रहे हैं और सत्ता व धर्म के बीच खड़ी दीवार भरभरा रही है. इसलामी आतंक यह काम बंदूक के जरिए कर रहा है, कई देशों में यह काम बैलेटबौक्सों से हो रहा है.       

 

कुमार विश्वास : अपरिपक्व कवि, अधूरा नेता

फिल्म इंडस्ट्री में जो हैसियत जानी लीवर की है वही हैसियत कविता और साहित्य में कुमार विश्वास की है. बिलाशक काका हाथरसी और सुरेन्द्र शर्मा के बाद उन्होंने मंचीय कविता को जिंदा रखा है पर इसका मतलब यह नहीं कि कुमार विश्वास कोई नई बात कहते हैं या श्रीलाल शुक्ल सरीखा करारा और तीखा व्यंग व्यवस्था पर कर पाते हैं. दरअसल में वे भी तुकबंदी के विशेषज्ञ हैं और चलताऊ और हंसोड़ बातें कर मंच लूट ले जाते हैं जो आज की मांग भी है, इस नाते वे निसंदेह एक कामयाब कवि हैं जो श्रोताओं की नब्ज पकड़कर बात कहता है.

कुमार विश्वास को सुनकर कहा जा सकता है कि लोकप्रिय होने के लिए प्रतिभाशाली होना जरूरी नहीं है, जरूरी यह है कि आप फूहड़ और भोंडेपन को अभिजात्य तरीके से पेश करने की कला जानते हों, इससे आप को आलोचक और समीक्षक सहित श्रोता भी बुद्धिजीवी होने का तमगा पहना देते हैं. कुमार विश्वास पूरे आत्मविश्वास के साथ भोपाल में थे, उन्हें सुनने ठीक ठाक तादाद में लोग रवींद्र भवन के मुक्ताकाश मंच पर आंख और कान लगाए मौजूद थे. आयोजन भी सामयिक और जज्बाती किस्म का था जिसका नाम था, एक शाम शहीदों के नाम.

चुनावी सभाओं में हेमा मालिनी शोले फिल्म का बसंती की इज्जत और धन्नो वाला डायलोग जब तक नहीं बोल देतीं तब तक भीड़ उन्हें हेमा मालिनी नहीं मानती, यही हाल विश्वास का है कि, कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है… वाली अपनी चर्चित कविता सुनने के बाद ही तालियां बजीं और भीड़ चैतन्य हुई. इसके बाद , बीबी हो जिसकी बी ए वो काम क्या करेगी , वो तो  लक्स से नहाकर खुशबू में तर रहेगी जैसी तर्ज पर उन्होने कई शिष्ट और आक्रामक कवितायें सुनाईं जिनमें इश्क के आंसू भी थे और नायिका की झील सी आंखें भी थीं. चूंकि आए लोगों का मन बहलाने राजनीति पर लीक से हटकर भी कुछ कहना जरूरी था, इसलिए राहुल गांधी के बारे में उन्होंने कहा, इस अधूरी जवानी का क्या फायदा…इसी तुक को आगे बढ़ाते अरविंद केजरीवाल पर उन्होंने तंज़ कसा कि बिना कथानक कहानी का क्या फायदा और नरेंद्र मोदी को निशाने पर लेते कहा, जिसमें घुलकर नजर भी न पावन बनें, आंख में ऐसे पानी का क्या फायदा.

फायदे नुकसान के इस काव्यात्मक पहाड़े पर स्वभाविक रूप से तालियां बजीं, तो आयोजक एक नामी कोचिंग इंस्टीट्यूट के पैसे वसूल हो गए और लगे हाथ कुछ शहीदों के परिजनों को भी 11-11 हजार रुपये देकर आयोजन के नाम की सार्थकता सिद्ध कर दी गई. अपनी आम आदमी पार्टी की हालिया उठापटक और उसमें अपनी खुद की भूमिका पर विश्वास खामोश रहे तो सहज लगा कि वे अपनी साहित्यिक और व्यावसायिक निष्ठा प्रदर्शित करते खुद को विशिष्ट बताने जताने की कोशिश कर रहे हैं.

धंधे के लिहाज से बात ठीक भी थी क्योंकि एक मंचीय कवि की जान मिलने वाले परिश्रमिक के लिफाफे में अटकी रहती है, जिसके बाबत वह कोई जोखिम नहीं उठाता वैसे भी कपिल मिश्रा के आरोपों और दिल्ली की उठापटक पर मंच से कुछ बोलना बेमानी होता, लेकिन भोपाल में मीडिया से वे कतराते नजर आए तो जरूर बात हैरानी की थी क्योंकि मीडिया से उनके अनौपचारिक और अंतरंग संबंधों के अलावा अरविंद केजरीवाल की मित्रता और दया दृष्टि  ही उन्हे इस मुकाम पर ला पाये हैं कि बीते दो तीन सालों से फीस उन्हें एडवांस में मिल जाती है जो उनकी आमदनी का बड़ा जरिया है.

रही बात कविता की तो इन दिनों वह कैसी है यह उन्होंने बता दिया कि कविता अब भाव की नहीं बल्कि दाम की विधा हो चली है और इसके वे तकनीकी तौर पर जानकार हैं और हालफिलहाल आप की राजनीति में दो नंबर की हैसियत कुमार विश्वास रखते हैं जो कुछ न बोलकर भी अपनी अहमियत जताना जानता है.          

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