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आ रहे हैं दुनिया के सबसे घटिया “बैंक चोर”

सबसे खतरनाक, कूल और स्मार्ट चोर के बाद असली चोर बैंक लूटने आ गया है. रितेश देशमुख अपने दो शागिर्दों के साथ 'बैंक चोर' बन कर आ गए हैं. बहुप्रतीक्षित फिल्म “बैंक चोर” का ट्रेलर रिलीज कर दिया गया है.

फिल्म की शुरुआत होती है फेमस धूम सीरीज के चोरों के साथ. इनके बाद रितेश देशमुख चंपक चंद्रगुप्त चिपलुंकर बनकर आए हैं एक बैंक लूटने. बैंक लूटने के लिए रितेश ने बाबा का भेस धारण किया है वहीं उनके साथी गुलाब और गेंदा ने हाथी और घोड़े का भेस बनाया है. ट्रेलर के हिसाब से ये दुनिया के सबसे घटिया चोर हैं और चोरी के लिए चुना दिन भी इनके लिए अनुकूल नहीं है.

फिल्म में विवेक ओबरॉय और रिया चक्रबर्ती भी हैं. विवेक फिल्म में सीबीआई ऑफिसर अमजद खान बने हैं जो हर हाल में इन चोरों को रोकना चाहते हैं. वहीं रिया फिल्म में क्राइम रिपोर्टर गायत्री गागुंली बनीं है. फिल्म में बाबा सहगल भी हैं जो एक बड़ा ही मजेदार डायलॉग बोलते दिख रहे हैं, 'लिप्स हैं तेरे लाल, काले हैं तेरे बाल, पहले आया अन्ना बाद में केजरीवाल.' फिल्म का ट्रेलर काफी मजेदार है. सभी अपने-अपने किरदार में अच्छे लग रहे हैं.

फिल्म का निर्देशन बंपी ने किया है. 'बैंक चोर' 16 जून को रिलीज होगी. फिल्म का निर्माण यशराज बैनर का यूथ प्रोडक्शन हाउस Y-Films कर रहा है. Y-Films ने इससे पहले 'मैन्स वर्ल्ड', 'बैंग बाजा बारात', और 'लेडिज रूम' जैसे कई हिट वेब सीरीज बनाई हैं.

इमरजेंसी फंड है एक अच्छा निवेश

मुसीबतें किसी को बताकर नहीं आती. इसके लिए जरूरी है कि आप पहले से तैयार रहें. भविष्य की जरूरतों के लिए बहुत सारे लोग एक बड़ी राशि इंश्योरेंस, यूलिप, फिक्स डिपॉजिट और म्यूचुअल फंड जैसे इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करते रहते हैं. लेकिन इन सब के बाद भी अक्सर आप कई बार ऐसी मुसीबत से निपटने में असमर्थ हो जाते हैं. पैसों की अचानक जरूरत के लिए हम अपनी एफडी और यूलिप का प्रीमैच्योर विड्रॉल कर लेते हैं, नतीजन पूरी रकम भी नहीं मिल पाती.

ऐसी गलतियां लोग इमर्जेंसी फंड न बनाकर करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक इमर्जेंसी फंड बनाना आपके लिए कितना मददगार होता है.

तुरंत जरूरतों के लिए इमर्जेंसी फंड बनाएं-

आजकल बढ़ती महंगाई के साथ हमारी अन्य जरूरतें भी उसी तेजी से बढ़ रही हैं. ऐसे में बीमारी, नौकरी छूटने या अन्य वजह से अचानक सामने आने वाले बड़े खर्चों से हमारा सारा बजट खराब हो जाता है. ऐसी ही समस्याओं से निपटने के लिए इमरजेंसी फंड बहुत जरूरी होता है. यह फंड ऐसी सेविंग होती है, जिसे अचानक आने वाली जरूरत के समय में आप खर्च कर सकते हैं. साथ ही आपको बता दें कि बैंक स्वैप एफडी की भी सुविधा उपलब्ध कराते हैं. इससे आप अपनी राशि पर फिक्स्ड डिपॉजिट जितना ही ब्याज पाते हैं और इसे आप कभी भी विड्रॉल कर सकते हैं.

कितना होना चाहिए इमर्जेंसी फंड-

विशेषज्ञ मानते हैं कि इमर्जेंसी फंड की राशि उतनी होनी चाहिए जो आपके 6 महीनों के खर्चों को पूरा कर सके. यदि आपके पास हैल्थ इंश्योरेंस पहले से है तो तीन से चार महीने का इमर्जेंसी फंड भी पर्याप्त है. इसके लिए हर महीने अपनी सेविंग का 10 फीसदी हिस्सा इमर्जेंसी फंड के लिए तैयार करें. एक तय सीमा से अधिक बचत होने पर अपनी शेष राशि को अन्य विकल्प में निवेश कर सकते हैं.

लिक्विड फंड में निवेश करें-

इमरजेंसी फंड के लिए बैंक बचत खाता और लिक्विड म्युचुअल फंड में भी निवेश किया जा सकता है. इन फंड्स में लॉक-इन पीरिएड नहीं होता और विड्रॉल में भी ज्यादा समय नहीं लगता. बचत खाते में इमर्जेंसी फंड के तौर पर जमा राशि किसी भी समय एटीएम की मदद से निकाल सकते हैं. इमर्जेंसी के लिए कोशिश करें कि बैंक एफडी या म्यूचुअल फंड में निवेश न करना पड़े. ऐसा इसलिए क्योंकि इनमें लॉकइन पीरिएड होता है, जिसके कारण प्रीमैच्योर फाइन भी भरना पड़ता है. वहीं दूसरी ओर म्युचुअल फंड या बीमा की रकम प्राप्त होने में चार दिन से लेकर कम से कम एक हफ्ते या 15 दिन का वक्त लगता है.

इमरजेंसी में क्रेडिट कार्ड का करें इस्तेमाल-

इमर्जेंसी के लिए आपका क्रेडिट कार्ड भी सहायक बन सकता है. क्रेडिट कार्ड के साथ 50 से 60 दिनों तक का क्रेडिट पीरिएड मिलता है. ऐसे में अस्पताल के खर्चों का भुगतान और दूसरे खर्चों के लिए क्रेडिट कार्ड से भुगतान कर सकते हैं. लेकिन आपको बता दें कि क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल विड्रॉल के लिए न करें. क्योंकि इससे ब्याज काफी बढ़ जाएगा.

हेल्थ इंश्योसरेंस है जरूरी-

बीमारी या दुर्घटना के दौरान इमर्जेंसी फंड की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है. ऐसे में किसी भी अनिश्चितता से सुरक्षा के लिए अपने और परिवार के लिए एक हेल्थि इंश्योरेंस पॉलिसी होना बहुत जरूरी है. हेल्थ पॉलिसी की मदद से अस्पताल और इलाज के खर्च से बच जाते हैं. कैशलैस प्लान की स्थिति में इलाज के दौरान कोई भी धन राशि देने की जरूरत नहीं होती. लेकिन यदि कैशलैस नहीं है तो कुछ समय के लिए पैसों की जरूरत अवश्य पड़ सकती है.

गोरखपुर मसले में घिरे मुख्यमंत्री योगी

समाजवादी पार्टी सरकार में महिला अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के अधिकारों की रक्षा करने का दावा करने वाली भाजपा अब अपनी सरकार में महिला अधिकारी चारू निगम के स्वभिमान की रक्षा को लेकर बैकफुट पर है. चारू निगम आईपीएस अधिकारी हैं. ट्रेनिंग के समय पर वह गोरखपुर जिले के गोरखनाथ सर्किल की पुलिस सर्किल आफिसर के रूप में काम कर रही हैं. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद गोरखपुर चर्चा मे है. योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से ही सांसद हैं. यहीं के गोरखनाथ मंदिर के महंत के रूप में रहते थे. गोरखनाथ मंदिर गोरखनाथ पुलिस सर्किल में ही आता है. योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से यहां पर बहुत ही भरोसेमंद और तेजतर्रार अफसरों की नियुक्ति की गई थी.

चारू निगम ट्रेनी आईपीएस अधिकारी हैं. शराब बंदी को लेकर धरना प्रदर्शन कर रही महिलाओं पर पुलिस के द्वारा लाठी चार्ज के मसले पर चारू निगम और गोरखपुर के विधायक डाक्टर राधा मोहन दास अग्रवाल के बीच नोकझोंक ने बड़ा रूप ले लिया है. महिला आईपीएस अधिकारी के अपमान को लेकर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आईपीएस एसोसिएशन ने अपना विरोध दर्ज कराया है. आईपीएस चारू निगम ने अपनी बात को खुलकर अपने फेसबुक पेज पर लिखा तो विधायक राधा मोहन अग्रवाल ने मीडिया से बात की और अपनी किसी भी तरह की गलती नहीं मानी.

राधा मोहन अग्रवाल-चारू निगम प्रकरण के 3 दिन बीत जाने के बाद भी न सरकार ने इस मसले पर अपना पक्ष रखा और ना ही भाजपा संगठन ने ही अपना पक्ष रखा है. सोशल मीडिया में चर्चा शुरू होने के बाद से यह मसला उलझता जा रहा है. इसे समाजवादी पार्टी के दुर्गा शक्ति नागपाल प्रकरण से जोड़ा जा रहा है. इससे भाजपा के सरकार और संगठन दोनों की छवि धूमिल हो रही है. उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद से अधिकारी और नेताओं के टकराव का यह पहला मुद्दा नहीं है. प्रदेश में कम समय में ही कई ऐसी घटनायें घट चुकी हैं जहां असफर और नेता आमनेसामने आ गये.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लगातार सीख के बाद भी भाजपा के नेता और कार्यकर्ता किसी भी तरह से अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे. विद्यार्थी परिषद जैसे भाजपा के संगठन स्कूलों में फीस मुद्दे को लेकर ऐसे व्यवहार कर रहे हैं जैसे वह सरकार का अंग हो. फर्जी मीट की दुकानों के संबंध में यह बात देखने में आई थी कि पुलिस से अधिक एक्शन में भगवा बिग्रेड थी. उस समय मसला हिन्दुत्व का था ऐसे में बात थम गई. अब भाजपा के नेताओं का कोई गलत सलूक कोई स्वीकार नहीं कर रहा. योगी सरकार की छवि कमजोर पड़ती जा रही है. हर घटना में त्वरित प्रतिक्रिया देने वाले भाजपा संगठन और सरकार की टीम के चुप रहने से विरोधियों को पौ बारह हो रही है. चारू निगम प्रकरण में सरकार फैसला लेने में जितना देर लगायेगी मसला उतना ही उलझता जायेगा.

योगी के शपथ ग्रहण में मुलायम ने मोदी के कान में कही थी ये बात

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके अखिलेश यादव को जिस तरह यूपी में हार मिली, वैसी हार की उम्मीद नहीं की जा रही थी. भाजपा उन पर यह आरोप लगाती रही कि अखिलेश यादव की सरकार में उत्तर प्रदेश में बहुत गुंडागर्दी हुई और उनकी सरकार में अपराधी बेखौफ घूमते रहे.

उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के बाद भाजपा ने कहा था कि, ‘अब उत्तर प्रदेश में गुंडागर्दी बरदाश्त नहीं की जाएगी, इसलिए अब अपराधी या तो उत्तर प्रदेश छोड़ दे या फिर अपराध छोड़े दे.’ लेकिन अब हम देख ही रहे हैं कि, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार आने के बाद गुंडागर्दी अपने चरम सीमा पर पहुंच चुकी है.

इसके अलावा हद तो यहां तक बढ़ चुकी है कि हिन्दू संगठन के गुंडे बेखौफ अल्पसंख्यकों और पुलिस वालों पर हमले कर रहे हैं. इन्हीं सब समस्याओं पर हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान अखिलेश यादव ने अपने चुटीले अंदाज में जनता को ऐसे-ऐसे जवाब दिए कि, उन्होंने सबका दिल जीत लिया.

इंटरव्यू में अखिलेश यादव से सवाल किया गया कि, ‘जब शपथ ग्रहण हो रहा था तब मोदी जी और मुलायम सिंह जी के बीच क्या बात हुई क्या आप बता सकते हैं? इसके जवाब में अखिलेश यादव ने बताया कि, अगर मैं बता दूंगा तो आप सच नहीं मानोगे. अखिलेश यादव ने बताया कि, नेता जी ने प्रधानमंत्री मोदी जी को कहा कि, प्रधानमंत्री जी बचके रहना ये मेरा बेटा है.’ अखिलेश यादव ने अपने चुटीले अंदाज में नोटबंदी पर भी हमला बोलते हुए कहा कि, ‘नोटबंदी से कौनसा लाभ हो गया हमें बता दो.’

इसके अलावा उत्तर प्रदेश में बढ़ रही हिन्दू युवा वाहिनी के लोगों की गुंडागर्दी को देखते हुए अखिलेश यादव ने इन लोगों को भी सबक सिखा दिया. अखिलेश यादव की ये बातें सुन रहे सामने बैठे पत्रकारों की भी बोलती बंद हो गई और वो भी अखिलेश के इस अंदाज को देखकर उनकी बातों पर मुस्कुराने लग गए. अखिलेश यादव अपने इसी मिजाज़ के कारण ही तो जाने जाते हैं और अपने इन जवाबों से अखिलेश यादव ने पत्रकारों को बोलने लायक भी नहीं छोड़ा.

क्या आप जानते हैं गूगल डॉक्स के इन शानदार फीचर्स को

हम में से बहुत लोग गूगल डॉक्स का इस्तेमाल करते होंगे, लेकिन कुछ ही लोग ऐसे होंगे जो इसके शानदार फीचर्स के बारे में जानते होंगे. गूगल डॉक्स में वॉयस टाइपिंग, क्लियर फॉरमेटिंग, कमेंट में किसी को टैग करने जैसे दमदार फीचर्स हैं जिनका इस्तेमाल करके आप अपने काम को आसान बना सकते हैं.

1. टाइपिंग की जगह बात करें

यदि आपको लगता है कि आप टाइपिंग करते-करते थक गए हैं तो आप बोलकर हिन्दी-अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में टाइपिंग कर सकते हैं. इसके लिए गूगल डॉक्स खोलें और डॉक्स के सबसे ऊपर दिख रहे बार में टूल्स पर क्लिक करें. वहां आपको वॉयस टाइपिंग का विकल्प मिल जाएगा. अब वॉयस टाइपिंग पर क्लिक करें, अपनी भाषा चुनें और बोलें. हालांकि यह टूल केवल गूगल क्रोम ब्राउजर में ही काम करेगा.

2. क्लियर फॉरमेंटिंग

कई बार हम किसी दूसरी साइट से कंटेंट कॉपी करते हैं और गूगल डॉक्स में पेस्ट करते हैं. ऐसे में उस वेबसाइट के फॉरमेटिंग में ही डॉक्स में भी कंटेंट पेस्ट होता है. ऐसे में आपको कंटेंट को एडिट करने में दिक्कत हो सकती है. तो पूरे कंटेंट को सेलेक्ट करके मीनू बार में फॉरमेट में जाकर क्लियर फॉरमेटिंग कर दें या फिर डॉक्स के टॉप पर राइट साइट में दिख रहे Tx पर क्लिक करें.

3. कमेंट में किसी को टैग करें

यदि आप किसी डॉक्स को एडिट कर रहे हैं और उसमें कोई गलती है  या फिर कोई सुझाव लेना चाहते हैं तो उस सेंटेंस को सेलेक्ट करके जिससे सुझाव लेना/दिखाना चाहते हैं उसे टैग कर सकते हैं. आप जिसे टैग करेंगे उसे एक ई-मेल जाएगा और आपने कमेंट में जो लिखा है वह भी दिखेगा.

4. मनचाहे आकार की फोटो

आप चाहें तो किसी भी डॉक्यूमेंट में मनचाहे आकार की फोटो टेक्स्ट के साथ लगा सकते हैं. इसके लिए डॉक्स के मीनू बार से Insert> Drowing>Shape में जाएं. सेप सेलेक्ट करने के बाद T (Text Box) पर क्लिक करें और जो टेक्स्ट चाहें फोटो में लिखें.

5. ऑफलाइन मोड

ऐसा जरूरी नहीं है कि गूगल डॉक्स में काम करने के लिए आपको ऑनलाइन ही होना पड़ेगा. आप ऑफलाइन भी गूगल डॉक्स में काम कर सकते हैं. गूगल ड्राइव की सेटिंग में जाकर आप ऑफलाइन मोड को ऑन कर सकते हैं. गूगल डॉक्स का सबसे बड़ा फायदा होता है कि आपको कंटेंट को बार-बार सेव करने की जरूरत नहीं है. डॉक्स में कंटेंट ऑटो सेव होता है.

अपने लिए एक अच्छा हेडफोन कैसे चुनते हैं आप?

हेडफोन का इस्तेमाल आमतौर पर म्यूजिक सुनने में होता है. आजकल इनका उपयोग धीरे धीरे विस्तृत होते जा रहा है. बाजार में अब बहुत से अलग अलग ब्रैंड्स के हेडफोन मिलने लगे हैं. ऐसे में परफेक्ट हेडफोन का चुनाव करना बहुत मुश्किल हो गया है. हम आपको बता रहे हैं कि कौन सा हेडफोन आप की जरूरत के हिसाब से सबसे बेस्ट होगा.

पहले जानते हैं कि आजकल बाजार में किस किस प्रकार के हेडफोन उपलब्ध हैं और वे सभी कैसे काम करते हैं.

इन ईयर हेडफोन : स्मार्टफोन के साथ ज्यादातर ऐसे हेडफोन आते हैं. ये कान के अंदर फिट बैठने वाले होते हैं. ये कई तरह के रिप्लेसमेंट टिप के साथ आते हैं. इनका इस्तेमाल सुविधानुसार किया जा सकता है. सिलिकन ईयर पीस कान के भीतर चिपक कर बाहरी आवाज आने नहीं देता. इसके साथ ही ये शानदार बेस क्वॉलिटी भी देते हैं. चूंकि ये आसपास के माहौल की आवाजों को कानों में पड़ने से रोकता है इसलिए आप ट्रैफिक का शोर और किसी की पुकार सुन नहीं पाएंगे.

ईयरबड : यह आपके कान के एकदम अंदर नहीं जाता बल्कि कानों में फिट बैठकर चिपका रहता है. कुछ कंपनियां अच्छी क्वॉलिटी के ईयरबड्स बनाती हैं लेकिन इसमें शानदार साउंड क्वॉलिटी देने वाले बहुत कम विकल्प हैं. इसकी वजह यह है कि ये आमतौर पर सस्ते फीचर फोन और एमपी3 प्लेयर्स के साथ आते हैं. ये बेसिक यूज के लिए काफी होते हैं, इसलिए इनसे शानदार बेस, ट्रेबल या हाई वॉल्यूम की उम्मीद करना बेमानी होगा. लेकिन लोग इनको प्रेफर करते हैं क्योंकि इनको कैरी करना बहुत आसान होता है.

ओवर दि ईयर : नाम से ही पता चलता है कि ये बड़े कुशन वाले एयरकैप होते हैं जो कान के ऊपर लगते हैं और उसको ढंक लेते हैं. ये महंगे होते हैं लेकिन बेस्ट साउंड क्वॉलिटी देते हैं. ये दो तरह के होते हैं – क्लोज्ड और ओपन बैक्ड. क्लोज्ड बैक्ड हेडफोन बाहरी आवाजों को खत्म कर देता है जबकि ओपन बैक्ड ऐसा नहीं करता. अगर आप घर के लिए हेडफोन चाहते हैं तो ओपन बैक्ड हेडफोन बेहतर ऑप्शन होगा. लेकिन चलते फिरते यूज करना है तो क्लोज्डबैक हेडफोन लेना चाहिए.

ऑन दि ईयर : ये कान को ओवर दि ईयर की तरह पूरी तरह से नहीं ढंकता. इनको लंबे समय तक पहने रहा जा सकता है लेकिन यह बाहरी आवाजों को ब्लॉक नहीं करते. इसका साउंड आउटपुट मिक्स्ड होता है यानी बेस डीप नहीं ऐवरेज होता है.

तो यहां जानिए बाजार में उपलब्ध हेडफोन्स में से आपकी जरुरत के हिसाब से कौन सा हेडफोन आपके लिए उचित रहेगा.

ओवर दि ईयर, शेनहेजर एचडी 201 : यह एंट्री लेवल का ओवर दि ईयर हेडफोन आपके कानों को पूरी तरह से ढक लेता है और बाहर के शोर को खत्म कर देता है. ब्लैक और सिल्वर फिनिश वाले इन हेडफोन में लगे कुशन घंटों तक कान के लिए बहुत आरामदेह होते हैं. कीमत के हिसाब से साउंड क्वॉलिटी जबरदस्त है. यह अच्छे-खासे बेस के लिए बैलेंस्ड साउंड आउटपुट देता है.

इन-ईयर हेडफोन, सिगनेट फ्यूजर या अटॉमिक : दोनों सिगनेट के इन-ईयर हेडफोन की नई रेंज में आए हैं. ये कई कलर्स में आते हैं. डीप बेस वाले ये इन ईयर हेडफोन नॉयज एकदम खत्म कर देते हैं. इससे म्यूजिक सुनना और मूवी देखना एकदम मजेदार हो जाता है. दोनों में वॉयस कॉल के लिए इन-लाइन माइक्रोफोन है.

क्लिप्श एस4

अगर आपको इन ईयर हेडफोन में बहुत ही आरामदेह और शानदार साउंड क्वॉलिटी चाहिए तो क्लिप्श एस4 खरीदा जा सकता है. इसमें अंडाकार ईयर टिप हैं जो घंटों लगे रहने पर कान को दर्द नहीं देता है. इसको लगाने के बाद तो बाहर की नॉयज एकदम नहीं आती है. इसमें ड्यूल मैग्नेट माइक्रोस्पीकर्स लगे हैं जिससे ये शानदार बेस आउटपुट देते हैं.

ब्यूटी ट्रीटमैंट : खूबसूरती बढ़ाती नई तकनीकें

आधुनिक भारत तनाव के उच्च स्तर, अनिद्रा, मोटापा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह जैसी समस्याओं से जूझ रहा है. काम करने के अव्यवस्थित तरीके, अस्वास्थ्यप्रद आहार लेना, शारीरिक व्यायाम न करना, खानेपीने की चीजों में मिलावट, प्रदूषण, डिजिटल तनाव आदि आज स्वास्थ्य पर भारी पड़ रहे हैं. स्वास्थ्य बिगड़ने का पहला संकेत मोटापा आज भारतीय पुरुषों और महिलाओं में महामारी की तरह फैल रहा है. समस्या वजन बढ़ने के साथ शुरू होती है और धीरेधीरे गंभीर जानलेवा रोगों जैसे हृदय रोग, कैंसर, कोरोनरी स्ट्रोक आदि का कारण बन जाती है.

हाल ही में ब्रिटिश मैडिकल जनरल द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार भारत में करीब 2 करोड़ महिलाएं मोटापे की शिकार हैं, वहीं मोटापे से पीडि़त पुरुषों की संख्या 1 करोड़ है.

आंकड़े चौंका देने वाले हैं और इन पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है. 40 एवं अधिक उम्र की महिलाओं की बात करें, तो उन के लिए वजन कम करना धीरेधीरे मुश्किल होता जाता है. ज्यादातर महिलाओं को लगता है कि उन्हें वजन कम करने के लिए बहुत कोशिश करनी पड़ेगी. जीवन की इस अवस्था के दौरान शरीर में चयापचयी बदलाव आने लगते हैं और पाचन प्रक्रिया में बदलाव के चलते शरीर के बीच के हिस्से, जांघों आदि में वसा जमने लगती है. हारमोनल बदलाव भी चयापचयी दर को प्रभावित करता है और वजन कम करना मुश्किल होता जाता है. उस पर अगर आप को कोई स्वास्थ्य संबंधी समस्या है, तो परेशानी और बढ़ जाती है.

मोटापे की समस्या का अब प्रभावी उपचार उपलब्ध है. वजन कम करने की कोशिशों में नाकाम होने के बाद अब ज्यादातर लोग वजन कम करने के सर्जिकल एवं नौनसर्जिकल उपायों की ओर रुख करने लगे हैं. बढ़ती जागरूकता, अत्याधुनिक उपचार एवं प्रभावी चिकित्सा पेशेवरों की उपलब्धता के चलते नौनइनवेसिव सर्जिकल प्रक्रियाएं अब लोकप्रिय हो रही हैं.

सौंदर्य चिकित्सा अब शहरी पुरुषों और महिलाओं के लिए नया मंत्र बन गई है, क्योंकि अच्छी दवाओं और डर्मेटोलौजिस्ट की मदद से वे अपनी इन समस्याओं का समाधान कर सकते हैं. यह प्रभावी, तीव्र और आरामदायक तरीका है. सुरक्षित नौनइनवेसिव विधियां कंटूरिंग, त्वचा के ढीलेपन और गुणवत्ता में सुधार, फाइन लाइंस को हटाने, जिद्दी वसा को निकालने में कारगर हो सकती हैं. अब तक हमारे पास ऐसे उपकरण थे, जो मरीज के सीधे संपर्क में होते थे, लेकिन आज हमारे पास ऐसी तकनीक है, जिस में मरीज एवं डिवाइस के बीच सीधा संपर्क नहीं होता. मरीज उपचार कराने के साथसाथ किताब पढ़ सकता है, टीवी देख सकता है, अपने दोस्तों के साथ चैट कर सकता है.

सौंदर्य चिकित्सा पिछले 2 सालों में बेहद लोकप्रिय हो गई है और नई तकनीकों ने डाक्टरों एवं मरीजों को कई विकल्प उपलब्ध कराए हैं. यह कौस्मैटिक सर्जरी से अलग है जैसाकि अकसर माना जाता है. कौस्मैटिक सर्जरी में शल्यक्रिया के द्वारा व्यक्ति के लुक में बदलाव लाया जाता है जबकि सौंदर्य चिकित्सा एक नौनइनवेसिव तरीका है.

राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बौडी कंटूरिंग एवं स्किन लैक्जिटी रिपेयर (त्वचा के ढीलेपन में सुधार) के कई समाधान उपलब्ध हैं जैसे क्रीयोलिपोलिसिस, लेजर लिपोलिसिस, अल्ट्रासाउंड एवं रेडियोफ्रीक्वैंसी आदि. रेडियोफ्रीक्वैंसी भारतीय बाजार में सब से पसंदीदा सौंदर्य उपकरण बन चुकी है. रेडियोफ्रीक्वैंसी पर आधारित तकनीकें जैसे बीटीएल वैंक्विश एमई या मोनोपोलर रेडियोफ्रीक्वैंसी तथा अल्ट्रासाउंड जैसे बीटीएल ऐक्जिलिस एलाइट वसा कम करने में नौनइनवेसिव तकनीकें कारगर साबित हुई हैं.

ये तकनीकें एक ही सत्र में सब से बड़े हिस्से का उपचार करती हैं. उपचार में बाहरी त्वचा या वसा की परत के नीचे मौजूद पेशियों को नुकसान पहुंचने की संभावना नहीं होती है. इस का कोई साइड इफैक्ट भी नहीं है और न ही ज्यादा समय की जरूरत है. आप लंच ब्रेक ले कर अधिकतम 1 घंटे के सत्र में यह उपचार करवा सकती हैं.

रेडियोफ्रीक्वैंसी उन के लिए अच्छा विकल्प है, जो सर्जरी नहीं करवाना चाहते. 40 से अधिक उम्र के पुरुषों और महिलाओं को इस तरह के उपचार की सलाह दी जाती है, क्योंकि यह ढीली त्वचा पर भी बहुत अच्छी तरह से काम करता है. नए कोलोजन के निर्माण को बढ़ाता है, शरीर को कंटूर करता है और बिना चीरा लगाए अतिरिक्त फैट निकाल देता है.               

– डा. अमित लूथरा, एलाइट टैक्नोलौजी विशेषज्ञ

 

नस्ली भेदभाव

भारत में विदेशियों का रहना मुश्किल होता जा रहा है. चाहे पश्चिमी देशों के गोरे हों या अफ्रीका के काले, हमारा रंग भेद इतना ज्यादा गहरा गया है कि किसी को नहीं बख्शा जा रहा. अकेली पर्यटन पर आई गोरी युवतियों को तो यहां गाइड, टैक्सी ड्राइवर, होटलों के कर्मचारी हरदम बिस्तर पर बिछने को तैयार मानते हैं और उन के नानुकर करने पर बलात्कार कर मार तक डालते हैं. कितनों का ही गैंगरेप किया जाता है.

अभी दिल्ली के निकट नोएडा में रह रहे कई सौ अफ्रीकी छात्रों के साथ बुरी तरह मारपीट की गई. आरोप वैसा ही था जैसा मुसलिम पर गौमांस रखने पर लगाया जाता है. कहा गया कि अफ्रीकियों ने एक स्थानीय युवक को नशे की आदत डाल दी और वह मर गया. इस पर सैकड़ों की भीड़ ने कालों पर हमले शुरू कर दिए. कभी मौल में तो कभी घरों के आसपास. एक युवती को टैक्सी में से घसीट कर बुरी तरह मारा. नोएडा तो छोडि़ए जो उत्तर प्रदेश में आता है, दिल्ली में भी अफ्रीकियों को रंग की वजह से छेड़ा जाता है. अफ्रीकी दब्बू नहीं होते और प्रतिकार करते हैं तो भीड़ जमा कर ली जाती है. कई बस्तियों में इस तरह के कांड हो चुके हैं. आम आदमी पार्टी के एक मंत्री की एक बार अच्छी मुठभेड़ हुई और उन्होंने सभी अफ्रीकियों को किसी न किसी तरह का अपराधी घोषित कर दिया.

यह रंग भेद हमारी जाति, वर्ण भेद की उपज है. जाति हमारी रगों में इस बुरी तरह भरी है कि हर दूसरा व्यक्ति हमें या तो मजाक का पात्र लगता है या दुश्मन. रंग के कारण हमारे यहां की सांवली युवतियां अपनी पूरी जिंदगी मरमर कर बिता देती हैं. काले युवकों का भी यही हाल होता है. अफ्रीकियों को तो नीचा इसीलिए समझा जाता है कि उन का रंग हमारे गांवों के दलित मजदूरों का सा होता है. दूसरी तरफ गोरे को हर कोई कच्चा चबा लेना चाहता है. गोरी युवतियों का चाहे देशी ही हों, घर से बाहर निकलना दूभर रहता है. उन की शादी तो आसानी से हो जाती है पर वे हर समय भयभीत रहती हैं कि कब, कौन आक्रमण कर दे.

हमारे समाज ने युवतियों और दूसरों को इज्जत से रखने का पाठ कभी नहीं पढ़ाया. हर कोई तानों व मजाक का निशाना रहता है. पहले मदरासी व बंगाली का मजाक उड़ता था. सरदारों पर बने चुटकुलों पर कोई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया. अपने से अलग तरह के लोगों को न मिलाने की वजह से ही हमारी कुंडली मिला कर विवाह करने की आदत है जिस से हमें विविधता का ज्ञान ही नहीं होता. हमें अपने से अलग लोगों से मिलजुल कर रहने की आदत ही नहीं पड़ती. ‘क्वीन’ फिल्म में नायिका को एक अफ्रीकी, एक गोरे और एक पूर्व एशियाई के साथ कुछ दिन मौज उड़ाते दिखाया गया था पर यह हमारे जीवन का हिस्सा नहीं है.

नोएडा और दिल्ली में जो हो रहा है उस से अफ्रीका में भारत की छवि बहुत खराब हुई है. अफ्रीका प्रगति की दौड़ में खासा तेज है और किसी रोज कुछ देश एशिया को मात देने लगें तो आश्चर्य नहीं है. अफ्रीका के कितने ही देशों की प्रति व्यक्ति आय भारतीय प्रति व्यक्ति आय से बेहतर है. उन से पंगा लेना हमें बहुत महंगा पड़ेगा.

धोखे में लिपटी मोहब्बत

9 जनवरी, 2017 को पश्चिम बंगाल के उत्तरी 24 परगना के रहने वाले 65 वर्षीय रामजी सिंह पटना के सचिवालय थाने पहुंचे तो उस समय इंसपेक्टर प्रकाश सिंह अपने कक्ष में बैठे कुछ जरूरी फाइलें निबटा रहे थे. रामजी सिंह उन के सामने खाली पड़ी कुरसी पर बैठ गए. इंसपेक्टर ने फाइलों को एक तरफ किया और रामजी सिंह से मुखातिब हुए.

रामजी सिंह ने उन्हें बताया कि उन का बेटा विनोद कुमार सिंह पटना के सचिवालय में लघु सिंचाई विभाग में नौकरी करता है. वह अंतरराष्ट्रीय तैराक भी रह चुका है. जन्म से उस के दोनों हाथ नहीं हैं. पिछले 2 दिनों से उस का कहीं पता नहीं चल रहा है और उस का मोबाइल भी बंद है.

रामजी सिंह की बात सुन कर इंसपेक्टर प्रकाश सिंह चौंके. हाई प्रोफाइल मामला था और सचिवालय से जुड़ा हुआ भी. उन्होंने सारा काम छोड़ कर रामजी की पूरी बात सुनी. रामजी ने उन्हें आगे बताया कि 2 दिन पहले 7 जनवरी, 2017 को दोपहर को बेटे से उन की बात हुई थी. उस ने कहा था कि वह कुछ जरूरी काम से भागलपुर जा रहा है. काम निपटा कर वह वापस पटना लौट जाएगा.

उस के बाद से उस का फोन बंद बता रहा है. वह 2 दिनों से लगातार उस के मोबाइल पर फोन कर रहे थे, लेकिन उस से न तो बात हो सकी और न ही उस का कुछ पता चल रहा है.

मामला गंभीर था, इसलिए बिना देर किए प्रकाश सिंह ने इस मामले की जानकारी एसएसपी मनु महाराज और आईजी नैयर हसनैन खान को दे दी. मामला सचिवालय से जुड़ा होने की वजह से अधिकारियों के भी हाथपांव फूल गए. वे किसी तरह का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने प्रकाश सिंह को उचित काररवाई करने के आदेश दिए.

त्वरित काररवाई करते हुए प्रकाश सिंह रामजी सिंह के साथ विनोद के कमरे पर पहुंचे. विनोद शास्त्रीनगर के राजवंशीनगर, रोड संख्या 6 के मकान नंबर 396/400 में अपने भांजे अंकित कुमार सिंह के साथ रहता था. प्रकाश सिंह ने सब से पहले अंकित से विनोद के बारे में पूछताछ की. लेकिन वह विनोद के बारे में कुछ खास नहीं बता सका तो उन्होंने कमरे में रखे विनोद के सामान की जांच की. तो उस में उन्हें विनोद की एक पुरानी डायरी मिली.

उस डायरी में भागलपुर के रहने वाले एक तैराक संजय कुमार का मोबाइल नंबर लिखा था. इस के अलावा वहां से ऐसी कोई चीज नहीं मिली, जिस से विनोद के बारे में कुछ पता चलता. प्रकाश सिंह ने यह बात एसएसपी मनु महाराज को बता दी. मनु महाराज ने उन्हें आदेश दिया कि एक पुलिस अफसर को भागलपुर भेज कर वहां से पता लगाने की कोशिश करें. इस पर उन्होंने रामजी सिंह के साथ एसआई अरविंद कुमार को भागलपुर भेज दिया.

10 जनवरी, 2017 को रामजी सिंह और एसआई अरविंद कुमार भागलपुर पहुंचे. संजय कुमार के मोबाइल पर संपर्क कर के वे उस के घर पहुंच गए. वह तिलकामांझी मोहल्ले में अपने निजी मकान में रहता था. उस से अरविंद कुमार ने विनोद के बारे में पूछताछ की तो उस ने जो जानकारी दी, उसे सुन कर दोनों हैरान रह गए.

संजय ने बताया कि 1 जनवरी, 2017 को विनोद रंजना नाम की एक लड़की से मिलने भागलपुर आया था. रंजना को ले कर उस की रंजना के बहनोई शंभू मंडल और उस के मौसेरे भाई बिट्टू से कहासुनी हुई थी. कहासुनी के बीच शंभू मंडल ने विनोद के गाल पर कई थप्पड़ मारे थे, साथ ही उस पर अपनी साली का मोबाइल चुराने का आरोप भी लगाया था. इस के बाद दोनों उसे ले कर तिलकामांझी थाने गए थे.

तिलकामांझी थाने के थानाप्रभारी विनोद को देख कर दंग रह गए थे, क्योंकि विनोद के दोनों हाथ नहीं थे. ऐसे में वह चोरी कैसे कर सकता था. थानाप्रभारी को शंभू और बिट्टू पर शक हुआ तो उन्होंने उन से पूछताछ की. उन्होंने कहा कि जिस के दोनों हाथ ही नहीं हैं, वह भला चोरी कैसे कर सकता है. यह कुछ और ही मामला लगता है.

उन्होंने शंभू से रंजना के बारे में पूछा तो उस ने कहा कि वह यहां नहीं है. हां, उस से बात करा सकता है. इस के बाद उस ने रंजना की थानाप्रभारी से बात कराई. रंजना ने उन्हें बताया कि विनोद ने उस का मोबाइल चुराया नहीं, बल्कि जबरन अपने पास रख लिया है, जिसे वह उसे लौटा नहीं रहा है.

थानाप्रभारी तिलकामांझी ने रंजना के मोबाइल के बारे में विनोद से पूछा तो उस ने कहा कि उस का मोबाइल उस के पास है. थानाप्रभारी ने विनोद से उस का मोबाइल लौटाने को कहा तो उस ने मोबाइल शंभू मंडल को लौटा दिया. शंभू मंडल और बिट्टू मोबाइल ले कर चले गए. थानाप्रभारी ने विनोद को समझाया कि वह अपने घर लौट जाए. ये अच्छे लोग नहीं हैं. उन दोनों के चले जाने के बाद थानाप्रभारी ने थाने के 2 सिपाहियों के साथ विनोद को स्टेशन पहुंचवा दिया. इस के आगे संजय कुछ नहीं बता सका.

संजय ने जो भी बताया था, उस की तसदीक करने के लिए एसआई अरविंद कुमार और रामजी सिंह तिलकामांझी थाने पहुंचे. वहां से पता चला कि संजय द्वारा दी गई जानकारी सही थी. सच्चाई जानने के बाद एसआई अरविंद कुमार ने रामजी सिंह से रंजना के बारे में पूछा.  वह केवल इतना ही बता सका कि रंजना राज्य स्तर की वौलीबाल खिलाड़ी थी. दोनों का एकदूसरे से परिचय खेल के माध्यम से ही हुआ था. 6 महीने पहले दोनों को पटना सचिवालय में एक साथ देखा गया था.

रामजी सिंह ने इस बारे में बेटे विनोद से पूछा था तो उस ने बताया था कि भागलपुर की रहने वाली वौलीबाल खिलाड़ी रंजना उस की दोस्त है. रामजी सिंह को इस से ज्यादा कुछ पता नहीं था. जो भी जानकारी मिली, उसी के आधार पर एसआई अरविंद कुमार को यह प्रेमप्रसंग का मामला लगा.

विनोद कुमार का मामला रहस्यमय ढंग से उलझ गया था. जब कोई सुराग हाथ नहीं लगा तो दोनों पटना लौट आए. 2 दिनों तक रामजी सिंह पटना में रह कर अपने स्तर से बेटे की तलाश करते रहे. उन्होंने दोस्तों, रिश्तेदारों और परिचितों के यहां पता लगाया, लेकिन विनोद का कहीं पता नहीं चला. जब कहीं से भी कोई जानकारी नहीं मिली तो उन्होंने 13 जनवरी को बेटे की गुमशुदगी थाना सचिवालय में दर्ज करा दी.

गुमशुदगी दर्ज होने के बाद पुलिस की काररवाई में तेजी आई. कई दिनों तक पुलिस विनोद की खोज करती रही. मुखबिर भी लगाए गए, फिर भी विनोद के बारे में कुछ पता नहीं चला. 21 जनवरी, 2017 को पुलिस ने अंतरराष्ट्रीय तैराक विनोद कुमार सिंह के अपहरण का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ भादंसं की धारा 363, 365 और 34 के तहत दर्ज कर लिया.

मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने विनोद की सुरागरसी में जमीनआसमान एक कर दिया. पूछताछ के लिए उस के कुछ दोस्तों को भी हिरासत में लिया गया, लेकिन इस से भी पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा. स्थानीय अखबारों ने दिव्यांग तैराक विनोद के अपहरण की खबरों को खूब सुर्खियों में उछाला, जिस से पुलिस की खूब छीछालेदर हो रही थी.

23 जनवरी, 2017 को भागलपुर के लोदीपुर थाने के थानाप्रभारी भारतभूषण ने सचिवालय थाने के थानाप्रभारी प्रकाश सिंह को फोन कर के बताया कि उन के थानाक्षेत्र में आने वाली कलवलिया नदी के किनारे झाड़ी में एक सड़ीगली लाश मिली है, जिस का हुलिया लापता विनोद कुमार सिंह से मिलता है.

सूचना मिलते ही रामजी सिंह, छोटे बेटे मनोज कुमार सिंह और एसआई अरविंद कुमार को साथ ले कर भागलपुर के थाना लोदीपुर पहुंचे. उन्होंने लाश देखी तो हतप्रभ रह गए. उस लाश का चेहरा बुरी तरह जला हुआ था. इस के बावजूद लाश देख कर रामजी सिंह ने उस की शिनाख्त अपने बेटे विनोद के रूप में कर दी.

विनोद की हत्या की सूचना मिलते ही उस के घर में कोहराम मच गया. उस की पत्नी वीणा और उस के दोनों बच्चों प्रियांशु और सोनाली का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था. 17 दिनों से रहस्य बनी अंतरराष्ट्रीय तैराक विनोद कुमार सिंह की गुमशुदगी की कहानी हत्या के रूप में सामने आई.

मृतक विनोद के पिता रामजी सिंह ने बेटे की हत्या का आरोप राज्यस्तर की महिला वौलीबाल खिलाड़ी रंजना कुमारी, उस की मां सबरी देवी, पिता राधाकृष्ण मंडल उर्फ वकील मंडल, रंजना के मौसेरे भाई बिट्टू और बहनोई शंभू मंडल पर लगाया.

उन के आरोपों के आधार पर पटना पुलिस ने थाना लोदीपुर के थानाप्रभारी भारतभूषण की मदद से उसी दिन कोहड़ा गांव से रंजना कुमारी, सबरी देवी, राधा मंडल उर्फ वकील और शंभू मंडल को गिरफ्तरार कर लिया. पांचवां आरोपी बिट्टू घर से फरार था.

गिरफ्तार चारों आरोपियों को पटना पुलिस सचिवालय थाने ले आई. थाने में सचिवालय रेंज के एएसपी अशोक कुमार चौधरी ने उन से अलगअलग पूछताछ की. चारों आरोपियों ने अंतरराष्ट्रीय तैराक विनोद कुमार सिंह की हत्या की बात स्वीकार कर ली.

पुलिस ने अगले दिन चारों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. विनोद कुमार सिंह की हत्या के पीछे प्यार, धोखा और ब्लैकमेलिंग की कहानी कुछ ऐसे सामने आई—

36 वर्षीय विनोद कुमार सिंह मूलरूप से बिहार के सीवान जिले के बड़ा सिकवा गांव का रहने वाला था. उस के पिता रामजी सिंह पश्चिम बंगाल के उत्तरी 24 परगना जिले में रहते थे. विनोद के बाबा ने यहीं रह कर नौकरी की थी. तभी उन्होंने वहां मकान बनवा लिया था. तब से उन का परिवार यहीं रह रहा था. विनोद के पिता रामजी सिंह ने यहीं रह कर शिक्षा विभाग में नौकरी की थी और यहीं से सेवानिवृत्त हुए थे.

रामजी सिंह के 4 बच्चों में 2 बेटियां और 2 बेटे थे. बेटियों से छोटे विनोद कुमार सिंह और मनोज कुमार थे. विनोद पैदाइशी दिव्यांग था. कंधे से नीचे उस के दोनों बाजू नहीं थे. धीरेधीरे विनोद बड़ा हुआ. दोनों बाजू न होने की वजह से विनोद कभी मायूस या दुखी नहीं हुआ, बल्कि उस ने अपनी इसी कमजोरी को ताकत बनाया.

पैरों को उस ने हाथ बनाया. उन्हीं पैरों के सहारे वह अपने सारे दैनिक कार्य करता था. वह पैर के सहारे अपनी कमीज के बटन बंद करने से ले कर पढ़नेलिखने, यहां तक कि चकले पर बेलन के सहारे गोल रोटियां बेलने, चावल पकाने, पैरों से चम्मच के सहारे खाना खाने और कंप्यूटर चलाने जैसे सारे काम कर लेता था. उसे सिर्फ पैंट के बटन बंद करने में दूसरे की मदद लेनी पड़ती थी.

विनोद ने उत्तरी 24 परगना जिले के नइहट्टी कालेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की और मगध विश्वविद्यालय गया से स्नातक. वह अपनी जिंदगी में कुछ बड़ा करना चाहता था. उस की मंजिल उसे तब मिली, जब उस ने कुछ लड़कों को पानी में तैराकी सीखते देखा.

इसी जिले के श्यामनगर में स्विमिंग क्लब था. यहां बच्चे तैराकी सीखने आते थे. विनोद भी अपने दोस्तों के साथ वहां आताजाता था. बच्चों को तैरता देख कर विनोद के मन में आया कि वह भी तैरना सीखेगा. वहां के कोच अशोक पाल थे. कोच से उस ने तैराकी सीखने की इच्छा जाहिर की. लेकिन उस के दोनों हाथ न देख कर कोच ने उसे तैराकी सिखाने से मना कर दिया.

कोच अशोक पाल की बातों का विनोद ने कतई बुरा नहीं माना, बल्कि उन की नकारात्मकता से उसे ऊर्जा मिली. विनोद ने उन से फिर आग्रह किया. कई दिनों की मिन्नतों के बाद कोच अशोक पाल उसे तैराकी सिखाने को तैयार हो गए. उन्होंने 4-5 लड़कों के साथ उसे पानी में उतार दिया. उन्होंने दूसरे लड़कों को हिदायत दी कि कोई भी उसे पकड़े न, देखें यह कैसे क्या करता है, बस इतना ध्यान रखना कि यह डूबने न पाए.

लड़कों ने वैसा ही किया. पहली बार पानी में उतरे विनोद ने दोनों पैरों के सहारे पानी में अद्भुत करतब दिखाए. विनोद के अदम्य साहस को देख कर सभी दंग रह गए. तैरने के लिए पहली बार पानी में उतरे विनोद ने कोच अशोक पाल का दिल जीत लिया. वह उसे तैराकी सिखाने को राजी हो गए. उन्होंने विनोद को तैराकी के गुर सिखाए.

धीरेधीरे वह इस कला में पारंगत हो गया. पहले जिला, फिर राज्य, फिर देश और विदेशों में जा कर उस ने अपने नाम का झंडा फहराया. उस ने 6 बार अंतरराष्ट्रीय तैराकी में मैडल और कई बार नेशनल तैराकी में मैडल जीते. बिहार सरकार ने सन 2012 में खेल कोटे से विनोद को पटना सचिवालय में लघु सिंचाई विभाग में नौकरी दे दी.

जिन दिनों तैराकी में विनोद कुमार के नाम का देशविदेश में डंका बज रहा था, उन्हीं दिनों उस की जिंदगी में वीणा कुमारी सिंह ने जीवनसंगिनी के रूप में कदम रखा. शादी के बाद विनोद 2 बच्चों बेटे प्रियांशु और बेटी सोनाली उर्फ गुनगुन का पिता बना. विनोद की जिंदगी खुशियों से भर गई. अब उसे किसी चीज की कमी नहीं थी.

बात सन 2013-14 की है. सामान्य कदकाठी और तीखे नैननक्श वाली गोरीचिट्टी, छरहरे बदन की रंजना पटना सचिवालय किसी काम से आतीजाती रहती थी. वह भी बिहार की राज्य स्तर की वौलीबाल खिलाड़ी थी. वह भी जीत के कई मैडल अपने नाम कर चुकी थी.

खेल के आधार पर उसे भी नौकरी मिलने वाली थी. उसी की औपचारिकता पूरी करने के लिए वह सचिवालय आयाजाया करती थी. सचिवालय में उन दिनों विनोद की नईनई नौकरी लगी थी. वहीं दोनों की पहली मुलाकात हुई. रंजना सुंदर भी थी और वाकपटु भी. विनोद पहली ही नजर में उसे दिल दे बैठा.

रंजना भागलपुर से एकदो दिनों के लिए पटना आती थी और अपना काम निपटा कर भागलपुर लौट जाती थी. रंजना जब भी सचिवालय आती, विनोद उस का खास खयाल रखता. वह सब से पहले उस का काम करा देता था. इसी बात से रंजना उस की मुरीद हो गई थी.

विनोद की आंखों में उस ने अपने लिए चाहत देख ली. उसे विनोद से मिलनाजुलना अच्छा लगने लगा. धीरेधीरे वह उस की ओर खिंची चली गई. विनोद भी रंजना के दिल में उतर गया था. दोनों के दिलों में मोहब्बत के शोले भड़कने लगे. जल्दी ही दोनों ने अपनी मोहब्बत का इजहार कर दिया.

शादीशुदा और 2 बच्चों का पिता होने की बात विनोद ने रंजना से छिपा ली थी. उस ने रंजना से खुद को कुंवारा बताया था. प्यार के सामने रंजना को विनोद की दिव्यांगता नजर नहीं आई. रंजना भागलपुर के लोदीपुर कोहड़ा गांव की रहने वाली थी. उस के पिता का नाम राधाकृष्ण मंडल उर्फ वकील था. वह स्वास्थ्य विभाग से सेवानिवृत्त हुए थे. रंजना उन की दूसरे नंबर की बेटी थी.

वह बड़ी हो कर कुछ ऐसा करना चाहती थी, जिस से नाम और शोहरत दोनों मिले. बचपन से ही उस का मन पढ़ाई के बजाए खेलकूद में लगता था. स्कूली पढ़ाई के दौरान वह स्कूल के किसी भी खेल में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी. इंटरमीडिएट के बाद उस ने वौलीबाल की ट्रेनिंग ली. उस के बाद उस ने खेल के मैदान में अपनी प्रतिभा का जादू दिखाया.

जिला स्तर से खेलती हुई रंजना ने राज्य में अपने नाम का परचम फहराया. उसे कई मैडल मिले. उस की खेल प्रतिभा की गूंज बिहार सरकार तक पहुंची तो सरकार ने उसे नौकरी देने का फैसला कर लिया. इसी सिलसिले में रंजना की सचिवालय में विनोद से मुलाकात हुई थी.

विनोद ने रंजना के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो वह इनकार नहीं कर सकी. दोनों ने चुपके से मंदिर में जा कर शादी कर ली. सात फेरों की उन की तसवीरें रंजना के मोबाइल में कैद थीं, लेकिन विनोद ने बड़ी चालाकी से उस का मोबाइल अपने कब्जे में ले लिया था, ताकि आगे चल कर वह इन तसवीरों को हथियार बना कर उसे अपनी बात मनवाने के लिए मजबूर न कर सके.

विनोद कुमार की देखरेख के लिए उस के साथ उस का भांजा अंकित कुमार सिंह रहता था. उसे भी इस शादी के बारे में पता नहीं चला था. विनोद ने यह बात अंकित से भी छिपा ली थी. इस की भनक उस ने न तो पत्नी वीणा को लगने दी थी और न ही पिता रामजी सिंह को. वीणा कभीकभार पटना आती थी और कुछ दिनों उस के साथ रह कर बंगाल लौट जाती थी.

शादी के बाद रंजना की नियुक्ति सीतामढ़ी के डीएवी इंटर कालेज में पीटी शिक्षक के रूप में हो गई थी. रंजना ने नौकरी जौइन की और सीतामढ़ी के डुमरा इलाके में किराए का एक कमरा ले कर अकेली रहने लगी. विनोद उस से मिलने सीतामढ़ी आताजाता रहता था. मजे की बात यह थी कि रंजना भी शादीशुदा थी, लेकिन उस ने भी अपनी शादीशुदा जिंदगी की बात सभी से छिपाए रखी थी. उस ने कभी अपनी मांग में सिंदूर नहीं भरा था. इसलिए लोग उसे कुंवारी ही समझते थे.

शादी के बाद रंजना विनोद को साथ ले कर कई बार अपने घर आई थी. विनोद का परिचय उस ने मांबाप से खिलाड़ी मित्र के रूप में कराया था. एकदो दिन घर रह कर वह विनोद के साथ लौट जाती थी. विनोद को जीवनसाथी चुन कर रंजना खुश थी. वह भी उसे खुश रखने के लिए पैसा पानी की तरह बहाता था.

जिस सच्चाई को विनोद छिपा रहा था, आखिरकार एक दिन उस की कलई रंजना के सामने खुल ही गई. विनोद की सच्चाई खुलते ही रंजना के ख्वाबों का महल रेत के महल के समान भरभरा कर ढह गया. विनोद इतना बड़ा धोखा देगा, उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. इस के बाद रंजना ने विनोद से दूरियां बना लीं.

अपनी गलतियों पर परदा डालने के लिए विनोद ने रंजना से संपर्क कर के उसे भरोसा दिलाने की काफी कोशिश की, लेकिन रंजना उस की चिकनीचुपड़ी बातों में नहीं आई. इतना ही नहीं, वह अपना मोबाइल उस से वापस लेने की जिद पर अड़ गई. मोबाइल में उस की जिंदगी का अहम राज छिपा था, जबकि विनोद उसे मोबाइल लौटाने से इनकार कर रहा था.

मोबाइल न मिलने से रंजना काफी परेशान थी. एक दिन रंजना अपनी बड़ी बहन विमला के यहां गई. वह काफी परेशान और उदास थी. उस की परेशानी और उदासी देख कर विमला से रहा नहीं गया. उस ने इस का कारण पूछा तो रंजना की आंखों से आंसू टपकने लगे और वह बहन के गले लिपट कर रोने लगी. विमला समझ नहीं पाई कि आखिर ऐसी क्या बात है.

आखिर रंजना ने सारी बातें बेझिझक बता दीं. रंजना की बात सुन कर विमला के पैरों तले से जमीन खिसक गई. रंजना ने जो गलती की थी, वह माफ करने लायक नहीं थी. बड़ी बहन ने उस के गाल पर 2 थप्पड़ रसीद कर दिए, साथ ही उसे काफी भलाबुरा भी कहा.

खैर, जो होना था हो चुका था. अब सवाल उस के निदान का था. शाम के वक्त काम से जब उस का पति शंभू मंडल घर लौट कर आया और साली रंजना को देखा तो उस की खुशी दोगुनी हो गई. रात का खाना सब ने एक साथ खाया. शंभू खाना खाने के बाद कमरे में सोने गया. उस के पीछे विमला भी आ गई. उस ने पति से रंजना की सारी बातें बता दीं. पत्नी की बात सुन कर शंभू का खून खौल उठा.

उस से रहा नहीं गया तो उस ने उसी समय ससुराल फोन कर के रंजना की करतूत अपनी सास सरबी देवी और ससुर राधाकृष्ण उर्फ वकील मंडल से बता दी. हकीकत जान कर मांबाप भी सिर पकड़ कर बैठ गए. वे यह सोच कर परेशान थे कि जब रंजना की सच्चाई बिरादरी वालों को पता चलेगी तो वे कौन सा मुंह दिखाएंगे. उन्होंने यह कह कर सब कुछ शंभू मंडल पर छोड़ दिया कि वह जो उचित समझे, करे.

सुबह हुई तो शंभू ने सब से पहले रंजना से बात की. बातचीत करने के बाद उस ने कुछ सोचा और रंजना से कहा कि उसे परेशान होने की जरूरत नहीं है. सब पहले की ही तरह ठीक हो जाएगा. वह अपनी नौकरी पर लौट जाए और मन लगा कर काम करे. जीजा की बातें रंजना को ठीक लगीं. उस ने वैसा ही किया.

रंजना सीतामढ़ी नौकरी पर लौट आई. इस बीच विनोद ने उस से फोन कर बात करने की कोशिश की, लेकिन रंजना ने उस से बात करने से साफ मना कर दिया. इस के बाद विनोद मोबाइल में सेव शादी की तसवीरें सार्वजनिक करने की धमकी दे कर उसे मानसिक रूप से प्रताडि़त करने लगा.

रंजना परेशान हो गई और घर वालों को सारी बातें बता दीं. बेटी की परेशानी देख कर सबरी देवी परेशान हो गई. उस ने दामाद शंभू से जल्द से जल्द कोई उचित कदम उठाने को कहा. इस बारे में शंभू मंडल ने रंजना के मौसेरे भाई बिट्टू, जो उसी के मोहल्ले में रहता था, से बात की. बिट्टू अपने इलाके का दबंग था.

बिट्टू और शंभू मंडल ने आपस में मिल कर रंजना की राह के कांटे को जड़ से उखाड़ने की योजना बना डाली. इस योजना में उन्होंने रंजना को भी शामिल किया. क्योंकि उस के बिना योजना को अंजाम नहीं दिया जा सकता था.

29 दिसंबर, 2016 को रंजना कालेज प्रशासन को धोखे में रख कर वहां से 2 दिनों की छुट्टी ले कर घर आई कि नया साल परिवार के साथ बिता कर लौट आएगी. घर आते समय उस ने किराए का कमरा खाली कर दिया था और सारा सामान ले कर भागलपुर चली आई थी.

30 दिसंबर को मां सबरी देवी और जीजा शंभू मंडल के कहने पर रंजना ने विनोद को नए साल को सेलिब्रेट करने के लिए भागलपुर बुलाया. रंजना के बुलाने पर विनोद 1 जनवरी, 2017 को भागलपुर आ गया.

अपने यहां आने की सूचना उस ने भागलपुर में रहने वाले अपने दोस्त संजय को दे दी थी. संजय विनोद के पास आ चुका था. विनोद को अपने साथ धोखे का अहसास तब हुआ, जब उस ने रंजना की जगह उस के बहनोई शंभू मंडल और बिट्टू को देखा.

शंभू मंडल और बिट्टू उसे रंजना के घर ले जाने के लिए अपने साथ ले कर निकले. लेकिन उसे वहां न ले जा कर तिलकामांझी थाने ले गए. संजय भी उन के साथ था. पहले से आगबबूला शंभू ने रास्ते में विनोद के गाल पर 4-5 थप्पड़ जड़ दिए थे. इस के बाद वह उसे थाने ले गया था.

थानाप्रभारी तिलकामांझी से उस ने मोबाइल चुराने की शिकायत की. विनोद के दोनों हाथ नहीं थे, उसे देख कर उन्होंने मामले को भांप लिया कि यह मामला चोरी का नहीं, बल्कि कुछ और है. जब थानाप्रभारी ने इस बाबत शंभू से पूछताछ की तो उस ने साली के मोबाइल चुराने की बात कही.

थानाप्रभारी के कहने पर उस ने अपनी साली रंजना की बात उन से करा दी. रंजना ने उन्हें बताया कि विनोद ने उस का मोबाइल चुराया नहीं है, बल्कि जबरन अपने पास रख लिया है और उसे लौटा नहीं रहा है. थानाप्रभारी ने विनोद से पूछा तो उस ने इस बात को सही बताया और रंजना का मोबाइल उसे लौटा दिया. मोबाइल ले कर दोनों थाने से चले गए और विनोद भी पटना लौट गया.

5 दिनों बाद 6 जनवरी, 2017 की शाम साढ़े 5 बजे के करीब शंभू मंडल ने विनोद को फोन किया. उस ने साली का जीवन बरबाद करने की बात कह कर उसे जान से मारने की धमकी दी.

विनोद शंभू मंडल की धमकी से डर गया. इस के ठीक आधे घंटे बाद शाम 6 बजे रामजी सिंह बेटे का हालचाल लेने के लिए फोन किया. ड्यूटी कर के औफिस से विनोद कमरे पर जा रहा था. पिता का फोन रिसीव कर के वह शंभू मंडल द्वारा जान से मारने की धमकी वाली बात बता कर रोने लगा.

वह काफी आतंकित लग रहा था. बेटे का रोना सुन कर उन्होंने उसे समझाया कि रोने के बजाए वह उसी समय उन के पास (बंगाल) आ जाए या फिर वही वहां आ जाएं. इस के बाद फोन कट गया. दरअसल विनोद ने रंजना से दूसरी शादी वाली बात घर वालों से छिपा ली थी. उस की इस नई कहानी से उस के घर वाले अनजान थे.

उस के एक घंटे बाद 7 बजे के करीब विनोद ने पिता को फोन कर के बताया कि वह भागलपुर रंजना की मां सबरी देवी से मिलने जा रहा है. उस के पास रंजना के मौसेरे भाई बिट्टू का फोन आया था. वह रंजना की मां से समझौता कराने की बात कह रहा था.

यह सुन कर रामजी सिंह का माथा ठनका. उन्होंने विनोद को वहां जाने से मना किया, लेकिन विनोद ने पिता की बात नहीं मानी और भागलपुर चला गया. वह औफिस से सीधे निकला था. फोन से ही उस ने अंकित को भागलपुर जाने की जानकारी दे दी थी. इसलिए उस के पास केवल बैग ही था. उस बैग में उस के सारे सर्टिफिकेट और टिफिन था.

7 जनवरी, 2017 की दोपहर 1 बजे भागलपुर पहुंच कर उस ने रामजी सिंह को फोन कर के अपने भागलपुर पहुंच जाने की सूचना दे दी. उस ने बिट्टू का वह नंबर भी उन्हें बता दिया था, जिस नंबर से उस ने उसे फोन किया था.

विनोद ने बिट्टू को फोन कर के बता दिया था कि वह भागलपुर पहुंचने वाला है. बिट्टू शंभू मंडल के साथ स्टेशन पहुंचा. दोनों ने उसे रिसीव किया. विनोद का बैग बिट्टू ने ले लिया था. तीनों एक ही मोटरसाइकिल पर बैठ कर रंजना के घर जाने के लिए निकले. लेकिन दोनों उसे वहां न ले जा कर सीधे कलवलिया नदी के किनारे ले गए. यह देख कर विनोद डर गया.

उस की समझ में आ गया कि उस के साथ धोखा हुआ है. उस ने भाग कर जान बचाने की कोशिश की, लेकिन उन के चंगुल से बच नहीं सका. शंभू और बिट्टू ने मिल कर उसे जमीन पर गिरा दिया. बिट्टू ने उस के दोनों पैर कस कर पकड़ लिए, जबकि मजबूत जिस्म वाला शंभू मंडल हाथों से विनोद के मुंह को तब तक दबाए रहा, जब तक उस का जिस्म ढीला नहीं पड़ गया.

अपनी संतुष्टि के लिए दोनों ने विनोद कुमार सिंह को हिलाडुला कर देखा. उस के जिस्म में कोई हरकत नहीं हुई. उस की लाश पहचानी न जा सके, इस के लिए शंभू मंडल ने साथ लाया तेजाब उस के चेहरे पर उड़ेल दिया और लाश को झाड़ी में फेंक दिया.

विनोद का सारा सामान उन्होंने नदी में डाल दिया और मोटरसाइकिल से अपने घर लौट गए. विनोद की हत्या की जानकारी उस ने सास सबरी देवी को दे दी थी. बेटी के रास्ते का कांटा साफ होने की खबर पा कर वह खुश थी. यह बात उस ने रंजना को नहीं बताई थी.

दूसरी ओर रामजी सिंह ने बेटे से बात करने के लिए शाम को जब उस के मोबाइल पर फोन किया तो उस के दोनों फोन बंद मिले. उन्होंने कई बार फोन किया, लेकिन हर बार उस का फोन बंद मिला तो वह घबरा गए.

2 दिनों बाद बेटे का पता लगाने वह पश्चिम बंगाल से पटना पहुंचे. उन्हें बेटे का कोई पता नहीं चला तो उन्होंने सचिवालय थाने में उस के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस हरकत में आई तो 17 दिनों से गायब विनोद की लाश भागलपुर में मिली.

नदी के किनारे झाड़ी के पास खेलते बच्चों की टोली ने सड़ीगली लाश देखी थी और शोर मचा दिया था. इस तरह मामला लोदीपुर थाने तक पहुंच गया.

23 जनवरी, 2017 को विनोद कुमार सिंह हत्याकांड के 4 आरोपी रंजना कुमारी, उस की मां सबरी देवी, पिता राधाकृष्ण उर्फ वकील और शंभू मंडल थाना लोदीपुर पुलिस की मदद से गिरफ्तार कर लिए गए. पांचवां आरोपी बिट्टू फरार था.

पूछताछ में शंभू मंडल ने पुलिस को बता दिया था कि विनोद का सारा सामान और मोबाइल उस ने नदी में फेंक दिया था. उस के बताए अनुसार पुलिस शंभू मंडल को भागलपुर ले गई, वहां विनोद के सामान की खोजबीन की, लेकिन उस का कोई सामान नदी से नहीं मिला.

पूछताछ के बाद चारों आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. चारों आरोपी जेल में बंद हैं. सचिवालय पुलिस ने बाद में इस मुकदमे को अपहरण की धाराओं से हत्या की धाराओं में बदल दिया था.   

– कथा मृतक के परिजनों और पुलिस सूत्रों पर आधारित

बड़ा बच्चा हो हैप्पी नैपी बेबी के आने पर

दूसरे बच्चे का आगमन जहां अपने साथ ढेरों खुशियां लाता है वहीं कुछ जिम्मेदारियां भी साथ लाता है. पहले बच्चे को इस बात के लिए तैयार करना पड़ता है कि घर में नन्हे मेहमान के आने से उस की जिंदगी में क्या बदलाव होगा. माना कि छोटे भाई या बहन के आने से पहला बच्चा खुद को अकेला नहीं महसूस करेगा, लेकिन उस के साथ ही उसे अपना प्यार भी बांटना पड़ेगा, अपना समय बांटना पड़ेगा, उसे ज्यादा अटैंशन मिलेगी. इन्हीं सब बातों के लिए पहले बच्चे को तैयार करना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी का काम होता है.

पेश हैं, कुछ अहम सुझाव जो आप को यह जिम्मेदारी बेहतर तरीके से निभाने में मददगार होंगे:

तैयारी की शुरुआत: कई बार छोटे बच्चे मानसिक रूप से इस बात के लिए तैयार नहीं होते कि अब तक पेरैंट्स का जो जरूरी अटैंशन उन्हें मिलता था उसे कोई और बांट ले. ऐसे में उसे इमोशनली डील करना पड़ता है, क्योंकि अगर उसे मानसिक रूप से तैयार नहीं किया गया तो उस के कोमल मन पर इस का गलत असर हो सकता है. उस का आना उसे अच्छा न लगे या हो सकता है स्थाई रूप से उस के मन में अपने पेरैंट्स और छोटे भाई या बहन के प्रति नाराजगी पनपने लगे. इसलिए जैसे ही आप को दूसरे बच्चे की आने की खुशखबरी मिले वैसे ही पहले बच्चे का रिश्ता उस से बनाने की शुरुआत कर दें ताकि उस के साथ उस का जुड़ाव हो, वह उस के आने से पहले उस से इमोशनली अटैच हो जाए और उस का स्वागत करे.

पहले बच्चे को दें ज्यादा अटैंशन: माना कि दूसरा यानी आने वाला बच्चा छोटा होगा और उसे ज्यादा देखभाल की जरूरत होगी, लेकिन दूसरे बच्चे के साथ पहले बच्चे की बौडिंग बने, इस के लिए पहले बच्चे को ज्यादा अटैंशन देनी होगी. एशियन इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंसेज, फरीदाबाद की गाइनोकोलौजिस्ट डा. पूजा कुशल के अनुसार, ‘‘भले ही पहले व दूसरे बच्चे के बीच आयु का अंतर अधिक नहीं होता, फिर भी पहला बच्चा समझदार होता है. वह सभी बातों को इमोशनली फील करता है, इसलिए वह दूसरे बच्चे को अपना प्रतिद्वंद्वी न समझे और उस के साथ जुड़ सके, इस के लिए पहले बच्चे को ज्यादा अटैंशन दें. वैसे भी डिलिवरी के बाद व प्रैगनैंसी के दौरान पहला बच्चा हर बात को बहुत ध्यान से औब्जर्र्व करता है, इसलिए उसे हर समय अपने साथ रखें और दूसरे बच्चे की बात करते समय उसे पूरा अटैंशन दें.

 ‘‘प्रैगनैंसी के दौरान जब दूसरे बच्चे के लिए शौपिंग करें तो पहले बच्चे से पूछें, उस की पसंद जानें और उस के अनुसार शौपिंग करें. इस से वह खुद को महत्त्वपूर्ण समझेगा ओर दूसरे बच्चे के प्रति उस के मन में ईर्ष्या का भाव नहीं पनपेगा, साथ ही आने वाले भाई या बहन के साथ जुड़ाव भी महसूस करेगा.’’

बच्चे के जन्म के बाद

– छोटे बच्चे का डायपर बदलते समय, उसे नहलाते समय बड़े बच्चे की मदद लें. इस से वह हमेशा आप के व छोटे बच्चे के साथ रहेगा और अकेला महसूस नहीं करेगा, साथ ही उस में जिम्मेदार बड़ा भाई या बहन की भावना भी विकसित होगी.

– आप चाहे कितनी ही व्यस्त क्यों न हों, बड़े बच्चे की ऐक्टिविटीज में पहले की तरह शामिल रहें.

– अगर मां छोटे बच्चे की देखभाल में व्यस्त है तो पिता बड़े बच्चे की जिम्मेदारी ले. उसे पूरा अटैंशन दे. उस के साथ खेले, उसे बाहर घुमाने ले जाए.

– छोटे बच्चे के आने के बाद बड़े बच्चे को उस से दूर न करें, बल्कि उसे अपने छोटे भाई या बहन को पास से देखने दें. अगर बड़ा बच्चा थोड़ा बड़ा है तो छोटे बच्चे को उस की गोद में दें. उस से कहें आप भी जब छोटे थे तो बिलकुल ऐसे ही थे. जब यह बड़ा हो जाएगा तो आप के साथ स्कूल जाएगा, आप के साथ खेलेगा. ऐसा करने से बड़े बच्चे के मन में अपने छोटे भाई या बहन के प्रति भावनात्मक रिश्ता पनपेगा.

– कई बार जब घर के पहले बच्चे को दूसरे बच्चे के आने की खबर दी जाती है तो उसे समझ नहीं आता कि छोटे भाई या बहन की जरूरत क्या है और साथ ही उसे यह भी लगता है कि अब तक जो पूरे घर का अकेला लाडला या लाडली थी, सभी अपना पूरा ध्यान उसी पर देते थे, लेकिन दूसरे के आने से उस का प्यार बंट जाएगा. वह ऐसा न सोचे या उस के मन में ऐसे भाव न आएं, इस के लिए जरूरी है कि उसे समझाया जाए कि छोटा भाई या बहन होना जरूरी होता है, वह घर में आप का दोस्त, आप का साथी बनेगा. आप के प्यार में कमी नहीं आएगी. आप उसे किताबों, वास्तविक उदाहरणों की सहायता से समझाएं कि देखो वे दोनों कैसे सभी काम एकसाथ करते हैं. आप का आने वाला छोटा भाई या बहन भी वैसा ही होगा और आप उस के साथ खूब मौजमस्ती करोगे. आप का अकेलापन दूर होगा.

इन तरीकों पर अमल करने से बड़े बच्चे के मन में आने वाले दूसरे बच्चे के प्रति प्रतिद्वंद्विता का भाव नहीं पनपेगा ओर वह उस का स्वागत तहेदिल से करेगा.           

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