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अब खरीदें सस्ते और सुरक्षित घर

अगर आप घर खरीदना चाहते हैं तो अब बहुत सही मौका है. सरकार ने पिछले कुछ महीनों में बहुत से ऐसे ठोस कदम उठाए हैं, जिससे आपके लिए घर खरीदना आसान हो गया है. अब घर खरीदना न केवल सुरक्षित है, बल्कि सस्‍ता भी है. आप अगर इस समय घर खरीदने निकलते हैं तो आपको 3 से 4 लाख रुपए तक सस्‍ते घर मिल सकते हैं. इतना ही नहीं, अब बिल्‍डर आपको धोखा भी नहीं दे पाएंगे. बस आप घर खरीदते वक्‍त थोड़ी सी सावधानी बरतें और सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का फायदा उठाएं.

इस कानून ने आपके लिए घर खरीदना किया सुरक्षित

होम बायर्स सालों से बिल्‍डर्स की मनमानी से बहुत परेशान थे. बायर्स सरकारों से लगातार मांग कर रहे थे‍ कि उन्‍हें बिल्‍डर्स के चंगुल से बचाया जाए और उन्‍हें उनके घर दिलाए जाएं. वर्तमान सरकार ने उनकी मांग को मानते हुए कानून बना दिया है कि अगर होम बायर्स के साथ फ्रॉड करेंगे तो बिल्‍डर्स को 3 साल तक की जेल हो सकती है और उन्‍हें ब्‍याज के साथ-साथ जुर्माना भी देना पड़ेगा.

यह कानून 1 मई से लागू कर दिया है. इसका फायदा उन लोगों को भी मिलेगा, जो नया घर खरीदने की सोच रहे हैं. बस आपको करना यह है कि यह जांच करनी है कि आपके इलाके में रियल एस्‍टेट रेग्‍युलेटरी अथॉरिटी बन चुकी है या नहीं. यदि बन चुकी है तो आप जिस प्रोजेक्‍ट में घर लेना चाहते हैं, वे अथॉरिटी में रजिस्‍टर है या नहीं. जो प्रोजेक्‍ट रजिस्‍टर हो, उसमें ही घर खरीदें.

कैसे मिलेंगे सस्‍ते घर

सरकार ने कानून बनाने के साथ-साथ प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत लोगों को सस्‍ते घर देने के वादे पर काम करना शुरू कर दिया है. यदि आप प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर लेते हैं तो ये घर आपको 4 लाख रुपए तक सस्‍ते मिल सकते हैं, क्‍योंकि सरकार की ओर से होम लोन पर 3 से 6.5 फीसदी तक की सब्सिडी दी जा रही है.

इस योजना की खास बात यह है कि जैसे ही आप होम लोन के लिए अप्‍लाई करते हैं तो लोन पास होते ही आपके लोन अकाउंट में लगभग 2 लाख 30 हजार रुपए की सब्सिडी ट्रांसफर हो जाएगी और यह सब्सिडी प्रिंसिपल अमाउंट से कम होगी, जिसके चलते आपको होम लोन पर ब्‍याज सहित 4 लाख रुपए से अधिक का फायदा होगा. यानी कि आपके घर की कीमत 4 लाख रुपए तक सस्‍ती हो जाएगी.

कहां खरीद सकते हो सस्‍ते घर 

प्रधानमंत्री आवास योजना के अलावा “अफोर्डेबल हाउसिंग पॉलिसी” भी सरकार ने लॉन्‍च की है. इस स्‍कीम के तहत आप होम लोन पर सब्सिडी तो ले ही सकते हैं, लेकिन यदि आप दूसरा घर खरीद रहे हैं तो आप सब्सिडी के दायरे में नहीं आएंगे, बावजूद इसके आप अफोर्डेबल हाउसिंग पॉलिसी के तहत घर खरीद सकते हैं. इस पॉलिसी के तहत बिल्‍डर्स सरकार की निगरानी में घर बनाएंगे, जो न केवल सस्‍ते होंगे, बल्कि आपको तय समय पर मिलेंगे.

मतलब, आजकल की तरह आपको पेमेंट देने के बावजूद भी घर न मिलने की समस्‍या नहीं होगी.

काम नहीं आ रही योगी की सीख

योगी सरकार को उत्तर प्रदेश में 50 दिन पूरे हो चुके हैं. सरकार की समीक्षा के लिये यह कोई बड़ा वक्त नहीं होता. जिस तरह से मुख्यमंत्री योगी से लेकर बाकी नेता और मंत्री सीख देते नजर आ रहे थे उससे उम्मीद जग रही थी कि सरकार के इकबाल का असर जल्द दिखेगा. सरकार के 30 दिन पूरे होने पर एक प्रचार सा भी हुआ कि कामकाज कितना बदल गया है. अब करीब 50 दिन पूरा होने के बाद प्रदेश के हालात बदलते नहीं दिख रहे हैं. सबसे बड़ी परेशानी कानून व्यवस्था को लेकर खड़ी हो रही है. राजधानी लखनऊ में लूट और हत्या की घटनायें बढ़ गईं. गोमतीनगर और राजाजीपुरम जैसी घनी कालोनियों में लूट और सामूहिक हत्या की घटनाओं ने लोगों को डरा दिया है. गोमतीनगर में पूरे कारोबारी परिवार को बंधक बनाकर लूट हुई. राजाजीपुरम में रिटायर फौजी की 2 सगी बेटियों की हत्या हो गई.

इन घटनाओं के होने से जनता का गुस्सा पुलिस और सरकार पर फूटने लगा. सहारनपुर में हिंसा इतनी भड़क गई कि पुलिस और प्रशासन के अफसर तक पिट गये. अपराध एक बड़ा कारण था जिसके कारण लोग समाजवादी पार्टी से नाराज थे. भाजपा ने नारा दिया था कि ‘अब की बार गुंडा मुक्त सरकार’ चुनाव में यह नारा काम आ गया, पर चुनाव के बाद सरकार अपने वादे पर खरी उतरती नहीं दिख रही है. दंगों और अपराध के साथ सत्ता के मद में चूर कार्यकर्ताओं की दंबगई बढ़ती जा रही है. गोरखपुर के विधायक और पुलिस अफसर के बीच हुई घटना से पुलिस के लोगों का मनोबल टूटा है. इसका प्रभाव शासनतंत्र पर पड़ रहा है.

उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत से भाजपा की सरकार बनी है. विपक्ष पूरी तरह से हाशिये पर चला गया है. विपक्ष संगठनात्मक रूप से इतना कमजोर है कि वह पूरी तरह से एकजुट होकर भाजपा की नाकामियों उजागर नहीं कर पा रही है. बसपा नेता मायावती उत्तर प्रदेश के बजाय केन्द्र में हैं. समाजवादी पार्टी विपक्ष से लड़ने के बजाय आपस में लड़ रही है. कांग्रेस पूरी तरह से धराशायी है. विधानसभा चुनाव के बाद उसके नेता कम ही दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में योगी सरकार पूरी तरह से विपक्ष के दबाव से मुक्त है.

भाजपा ने वैसे तो प्रदेश को संभालने के लिये एक ही जगह पर 3 मुख्यमंत्री बनाये है. जिस तरह से राजधानी सहित बाकी जिलों का हाल बेहाल होता जा रहा है उससे साफ है कि यह 3 मुख्यमंत्री वाला प्रयोग काम नहीं आ रहा है. सरकारी नौकरों को समय का पाबंद बनाने के लिये योगी सरकार तमाम प्रयास कर चुकी है. यह सीख अगर काम आती तो अपराध और दंगे इस तरह से सिर नहीं उठाते. कानून व्यवस्था पहली ऐसी चीज है जिसका प्रभाव तुरंत दिखने लगता, अगर योगी सरकार इस पर काबू नहीं पा सकी तो उसकी छवि बिगड़ती ही जायेगी.     

एक दूसरे को गोली ना मार दें भारत-पाक खिलाड़ी

खेल में भारत पाक का नाम आते ही रोमांच का स्तर ही बढ जाता है. भारत-पाक के बीच मैच का नाम सुनते ही लोग उत्साहित हो जाते हैं. दोनों देशों के बीच मैच देखने के लिए लोग क्या कुछ नहीं करते. फिर चाहे वह क्रिकेट मैच हो, फुटबॉल या हॉकी का मैच.

इसके साथ ही यह खतरा लगा रहता है कि कहीं खेल और रोमांच झगड़े का रूप ना ले ले. इस बात का डर सिर्फ भारत पाकिस्तान को ही नहीं बाकी देशों को भी सताता है. और इसका अंदाजा जर्मनी में हुए समर ओलंपिक से लगाया जा सकता है.

दरअसल साल 1972 के जर्मनी में हुए म्यूनिख समर ओलंपिक को लोग 'ब्लैक सेप्टेम्बर' के आतंकी हमले के लिए ज्यादा याद करते हैं. आपको बता दें कि जब इजरायली टीम पर हमला हुआ तो उसी स्पोर्ट्स विलेज में भारत और पाकिस्तान की टीम भी मौजूद थीं.

जर्मन पुलिस को सुरक्षा के बाकी इंतजाम के साथ इस बात का भी ख्याल रखना पड़ रहा था कि कहीं भारत और पाकिस्तान के खिलाड़ी एक दूसरे को गोली न मार दें.

जानिए क्या था मामला

भारत और पाकिस्तान के बीच 1971 का युद्ध थमे कुछ ही महीने बीते थे और दोनों देशों के बीच काफी अशांति थी. पाकिस्तान अपनी हार से काफी आहत था और किसी भी तरह की बुरी घटना की आशंका लगातार बनी हुई थी.

इसके साथ ही भारत और पाकिस्तान दोनों ही ग्रुप्स में उनकी शूटिंग टीम मौजूद थीं. अब क्योंकि वो सभी शूटर्स थे तो अपने साथ अपनी बंदूकें और प्रैक्टिस के लिए अन्य बंदूकें भी लाए थे.

जर्मन सुरक्षा एजेंसियों को इस बात की खुफिया सूचना मिली थी कि दोनों ही टीमों में बतौर खिलाड़ी कुछ इंटेलीजेंस के लोग शामिल कर भेजे गए हैं. दोनों ही टीमों के पास बंदूकें थीं और कभी भी कुछ हो सकता है इसकी आशंका लगातार बनी हुई थी.

क्या बताते हैं शूटर परिमल चटर्जी

उस वक्त भारत की तरफ से शूटिंग टीम में शामिल खिलाड़ी परिमल बताते हैं कि माहौल में बहुत तनाव था जिसके चलते हमारे कमरों के बाहर हमेशा पुलिस के जवान तैनात रहते थे. पुलिस ने कभी कुछ कहा नहीं लेकिन वे रात भर भी कमरे के बाद पहरा देते थे.

शूटर्स अपनी बंदूकें अपने कमरे में रख सकते थे और उन्हें डर था कि कुछ ही दूर रुके पाकिस्तानी खिलाड़ियों के साथ हमारी कोई खटपट न हो जाए. हालांकि ऐसी कोई घटना नहीं हुई और ये ओलंपिक इजरायली खिलाड़ियों पर हुए आतंकी हमले के लिए जाना गया.

गिल्लियां गिरे बिना ही आउट हो गया बल्लेबाज

यूं तो क्रिकेट का खेल 16वीं शताब्दी से ही खेला जा रहा है, लेकिन 19वीं और 20वीं सदी में इस खेल को पूरे विश्व में पहचान मिली. यह सच ही कहा गया है कि क्रिकेट खेल है अनिश्चिताओं का, रोमांच का. इस खेल में कब किस टीम का, खिलाड़ी का पासा पलट जाए कुछ कहा नहीं जा सकता. कुछ ऐसा ही हुआ है ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेट ग्राउंड पर.

क्रिकेट के मैदान पर वैसे तो आपने कई हैरतअंगेज कारनामे देखे होंगे लेकिन ऑस्ट्रेलिया के एक क्रिकेट मैच के दौरान एक ऐसी घटना घटी जो शायद ही कभी क्रिकेट इतिहास में घटी हो. दरअसल ऑस्ट्रेलिया के मिड-इयर क्रिकेट एसोसिएशन के मैच के दौरान गेंदबाज ने एक बल्लेबाज को बोल्ड कर दिया लेकिन स्टंप के ऊपर लगी गिल्लियां (बेल्स) नीचे नहीं गिरी.

मूनी वेली और स्थ्रेटमोर हाइट्स के बीच मैच में जतिंदर सिंह को एक अलग तरीके से आउट दिया गया है. गेंदबाज ने उनको बोल्ड किया, लेकिन ऊपर रखी दोनों बेल्स नीचे नहीं गिरी, बीच का स्टंप पूरी तरह से उखड़कर दूर चला गया. अंपायर भी इस दृश्य को देख कर चौंक उठे और उलझ गए कि इस नतीजे को आउट दिया जाए या नॉट आउट.

क्यों नहीं उड़ी गिल्लियां

अंपायर ने काफी समय लिया और फिर सोच-विचार करने के बाद बल्लेबाज जतिंदर सिंह को आउट दे दिया. मुनी वेली के कप्तान माइकल ओज्बन ने कहा, ‘हमें नहीं पता था कि इस घटना का क्या नतीजा होता, लेकिन हमने थोड़ा सोच विचार कर के इसको आउट मान लिया. ये असंभव सा दृश्य था, जहां पर बेल्स 2 स्टंप्स पर ही रुकी रही और बीच का स्टंप उखड़ने के बाद बीच में खाली जगह दिखाई देने लगी. गेंद बीच के स्टंप पर लगने के बाद स्टंप उड़ा नहीं स्टंप वहीं गिर गया. जिसके कारण बेल्स बाकी बचे दोनों स्टंप पर ठहर गया.’

क्या है नियम

एमसीसी के क्रिकेट नियम 28 के अनुसार बेल्स का स्टंप्स पर से पूरी तरह गिरना आउट माना जाता है. अगर बेल्स हिलते हुए स्टंप्स पर ही ठहर जाती हैं, तो उसको आउट नहीं करार दिया जाता. लॉ के पहले भाग में लिखा गया है कि विकेट आउट जब माना जाता है, जब बेल्स अच्छे से स्टंप्स के ऊपर से गिर जाए या फिर स्टंप पूरा उखड़ जाए.

लेकिन इस घटना में बल्लेबाज का स्टंप गिर गया था और बेल्स ऊपर ही रह गई थी तो सभी इसी उलझन में अटक गए कि इस नतीजे को क्या घोषित किया जाए. इसीलिए बल्लेबाज मैदान पर ही खड़ा रहा. बाद में अंपायर ने उनको आउट करार दे दिया. बल्लेबाज की विकेट का टीम को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ, उनकी टीम ने आसानी के साथ मैच को 6 विकेट से जीत लिया.

आपके गैजेट्स के काम आएंगे ये टिप्स

आपके पास आपके गैजेट्स तो होंगे ही जो आपके साथ हमेशा रहते हैं और आप इनकी सुरक्षा के लिए कुछ प्रयास भी करते होंगे. क्या आप अपने गैजेट्स के लिए कुछ घरेलू उपाएं भी करते हैं जिनसे आपके गैजेट्स सुरक्षित रहते हैं. कुछ ऐसे ही घरेलू टिप्स जो आपके गैजेट्स की खास देखभाल करते हैं.

वाई-फाई स्ट्रॉन्ग सिग्नल

वाई-फाई से ज्यादा स्ट्रॉन्ग सिग्नल चाहिए तो यह तरीका अपना सकते हैं. वाई-फाई राउटर के पास सोडा कैन या ऐल्यूमीनियम फॉइल रख दीजिए. सिग्नल थोड़ा बेहतर हो जाएगा.

फोन और पानी

अगर आपका फोन पानी में गिर जाए तो चावल बहुत काम आ सकते हैं. बैटरी निकालकर फोन को कच्चे चावल में रखकर 24 से 48 घंटों तक छोड़ दीजिए.

डीएसएलआर

डीएसएलआर को ड्राई रखना है तो सिलिका जेल पैक काम आएंगे. सिलिका जेल पैक नमी को सोख लेते हैं.

पावर बैंक

पावर बैंक की इफिशंसी बढ़ानी है तो महीने में कम से कम एक बार इसे पूरी तरह से चार्ज करें और फिर डिस्चार्ज होने दें.

स्क्रीन

छोटे-मोटे स्क्रैच वगैरह की वजह से अगर स्क्रीन धुंधली दिख रही है तो कॉटन में थोड़ा सा टूथपेस्ट लेकर साफ करें. डिस्प्ले साफ और बेहतर नजर आएगा.

कीबोर्ड सफाई

लैपटॉप के कीबोर्ड को साफ करने के लिए स्टिकी नोट (पोस्ट-इट नोट) या कागज के छोटे टुकड़े को इस्तेमाल किया जा सकता है.

प्रिंटर

प्रिंटर का कार्टरिज अगर सूख गया है तो इसे हीट-प्रूफ प्लास्टिक बैग में लपेटकर कुछ देर के लिए गर्म पानी में डुबोएं.

लैपटॉप

लैपटॉप अगर गर्म होता है और आपके पास कूलिंग पैड नहीं है तो खाली एग ट्रे का इस्तेमाल किया जा सकता है. अंडों की खाली ट्रे पर रखकर जब आप लैपटॉप इस्तेमाल करेंगे तो उसे पर्याप्त हवा मिलती रहेगी.

अगर खो जाए आपका स्मार्टफोन तो घबराएं नहीं

आपको कैसा लगता है जब आपको मालूम चलता है कि आपका स्मार्टफोन चोरी हो गया है? आपके फोन के खो जाने के बाद आप सबसे पहले क्या करते हैं? ये बात तो सच है कि किसी का भी फोन जब खो जाता है तब आप बहुत उदास और निराश हो दजाते हैं और कई बार तो फोन चोरी होने पर कुछ लोग घबरा भी जाते हैं.

हम आपको बताना चाहते हैं कि अगर आपका स्मार्टफोन खो गया है या चोरी हो गया है तो निराश ना हों, क्योंकि आज हम आपको बताएंगे कि किस तरह से आप कुछ खास ट्रिक्स की मदद से, सिर्फ कुछ ही मिनटों में अपने फोन को फिर से वापस पा सकते हैं. ये बात शायद आप नहीं जानते होंगे कि गूगल ने एक ऐसा फीचर बनाया है, जिससे आप सिर्फ 1 मिनट में बेहद आसानी से अपना फोन ढूंढ सकते हैं.

आइये जानते हैं क्या है आपके खोये हुए फोन को ढूंढने का तरीका…

1. सबसे पहले गूगल का होम पेज खोलिए. यहां पर उस गूगल अकाउंट आईडी से साइन इन कीजिए, जो आपने अपने ऐंड्रॉयड स्मार्टफोन में रजिस्टर किया है.

2. इसके बाद गूगल होमपेज की सर्च बार पर टाइप करके सर्च कीजिए ‘Whare is my phone?’

जैसे ही आप इस लिंक पे क्लिक करेंगे, आपके सामने एक लिस्ट खुलेगी जहा आपके सारे मोबाइल सेट्स का नाम होगा जिसमे आपने इस ईद से लॉगिन किया हुआ होगा. अब इसमें से अपना मोबाइल सेट सेलेक्ट कर लीजिये. ऐसा करते ही आपके सामने एक मैप खुल जाएगा.

3. इस मैप में कुछ ही देर में आपको अपने फोन की लोकेशन दिख जाएगी. गूगल आपके स्मार्टफोन की लोकेशन ट्रेस करेगा और बताएगा कि आपका फोन कहां है.

अगर आप किसी जगह से होकर आए हों और शायद अपना फोन वहीं भूल आएं हो और आपको याद न आ रहा हो कि फोन वहां छूट गया या उसके अलावा कहीं और, ऐसे में यह फीचर बड़े काम का है. इसके जरिए आपको फोन की लोकेशन दिख जाएगी कि वो कहां पर है. इसलिए आप सही जगह पर उसे तलाश कर सकते हैं. जब आपको लोकेशन पता चल जाए, तब वहां जाकर अगला कदम उठाएं.

यहां हम आपको और बाकी विकल्पों के बारे में बता रहे हैं…

4. अगर आप फोन को घर पर ही कहीं रखकर भूल गए हैं ये शायद आपका फोन आसपास कहीं गिर गया है, तो आप इसे फुल वॉल्यूम पर रिंग करवा सकते हैं. अगर आपने फोन सायलेंट मोड पर भी रखा होगा, तब भी यह फीचर काम करेगा. बस याद रहे आपके फोन की बैटरी खत्म नहीं होनी चाहिए. यहां रिंग करने का ऑप्शन आपको मैप के नीचे दिखेगा.

5. अगर आप को लगता है की आपका फोन किन्हीं गलत हाथों में चला गया है तो आप के मदद से अपने फोन को पासवर्ड द्वारा लॉक कर सकते है.

6. अगर आप अपने मोबाइल के सारे डाटा तो डिलीट करना चाहते है तो इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. इसपे क्लिक करते ही, आपको आपके मोबाइल का सारा डेटा डिलीट हो जायेगा.

7. यहां एक बात का ध्यान रखें कि आपके फोन के खो जाने पर ये सारे ट्रिक्स तभी काम करेंगे, जब आपके मोबाइल फोन का डेटा ऑन होगा या आपका फोन इंटरनेट से कनेक्टेड होगा.

शुक्र है आधा सच तो बोले राजनाथ सिंह

मोदी मंत्रिमंडल के जो दो चार सदस्य तुक की बात बोल पाते हैं गृह मंत्री राजनाथ सिंह उनमे से एक हैं, जिन्हें कुछ बोलने के पहले मोदी की इजाजत या रजामंदी की जरूरत नहीं पड़ती. नक्सल प्रभावित दस राज्यों के मुख्यमंत्रियों की मीटिंग में राजनाथ सिंह की यह स्वीकारोक्ति कोई राजनैतिक मजबूरी नहीं थी कि नक्सली हिंसा का हल गोलियां नहीं हैं. यह जरूर उनकी सच से मुंह मोड़ने की कवायद थी कि वे बजाय कोई ठोस हल पेश करने के नक्सली समस्या से निबटने के अव्यवहारिक सुझाव देते रहे, मसलन सरकार के खुफिया तंत्र का कमजोर होना और नक्सलियों की फंडिंग के स्त्रोत रोकना वगैरह वगैरह.

किसी भी समस्या का हल असल में उसकी वजहों से होकर जाता है. राजनाथ सिंह या मौजूदा केंद्र सरकार पूर्ववर्ती सरकार की तर्ज पर जाने क्यों इन वजहों से कतरा रहे कि इस समस्या की जड़ या उत्पत्ति आदिवासियों का शोषण और उनके हक छीने जाना है. यह ठीक है की इन शोषकों की शक्ल सूरत बदल गई है, ठीक वैसे ही जैसे हिन्दी फिल्मों के खलनायक की बदल गई है. सरकार यह नहीं सोच रही कि भोला भाला आदिवासी बजाय उसके नक्सलियों पर क्यों भरोसा करता है और बस्तर में तैनात अर्धसैनिक बल उन पर वही कहर बरपाते हैं, जो कभी सामंत और जमींदार बरपाते थे, इस के लिए उदाहरणों की कमी नहीं है.

चार दिन पहले ही रायपुर जेल की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे को राज्य सरकार ने बर्खास्त किया है. वर्षा का गुनाह इतना भर था कि उसने आदिवासियों पर हो रहे सरकारी अत्याचारों का कच्चा चिट्ठा सोशल मीडिया पर खोलकर रख दिया था, जिसे सुन हर किसी के रोंगटे खड़े हो सकते हैं. बकौल वर्षा आदिवासी इलाकों में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था लागू की जा रही है, आदिवासियों से उनका जल, जंगल और जमीन का हक छीना जा रहा है. अपनी भड़ास मे सीधे सरकार पर आरोप वह नहीं लगाती जिसकी जरूरत भी नहीं. वह कहती हैं, सारे प्राकृतिक संसाधन उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए जंगल खाली करवाये जा रहे हैं. वर्षा कहती हैं कि खुद आदिवासी नक्सलवाद का अंत चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं तो इंसाफ के लिए आदिवासी कहां जाएं.

खुद वर्षा ने अपनी आंखों से देखा है कि बस्तर थाने में आदिवासी किशोरियों को पूरी तरह नग्न कर उनकी कलाइयों और स्तनों पर करंट लगाया गया, 14 से 16 साल की इन लड़कियों का इलाज खुद उसने करवाया था. वर्षा गलत इसलिए करार नहीं दी जा सकती कि अपनी बात में उसने सीबीआई रिपोर्ट और बिलासपुर हाईकोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया है.

यह सब और इससे भी ज्यादा वीभत्स नजारे किसी गृहमंत्री को नहीं दिखते, इसलिए वर्षा यह सच बयानी कर अपनी नौकरी जाने का अफसोस नहीं करती कि बस्तर में जो भी समाजसेवी या मानवाधिकारकर्ता आदिवासियों के हक में बोलता है उसे नक्सली कहते जेल में ठूंस दिया जाता है. ऐसे में राजनाथ सिंह सच ही कह रहे हैं कि गोलियां नक्सली हिंसा का हल नहीं, क्योकि अघोषित तौर पर अधिकांश आदिवासी सैनिक शासन के खिलाफ हैं और इन सभी कथित नक्सलियों पर गोलियों कारगर नहीं होंगी. फिर जो हल बचता है वह यह है कि सरकार बस्तर से पहले सेना हटाए, फिर आदिवासियों का भरोसा जीते, नहीं तो हर साल हिंसा में मारे जाने बाले औसतन एक हजार आदिवासियों के मौतों की जिम्मेदारी लेने की हिम्मत दिखाए. समस्या अब नक्सली कम बस्तर में तैनात अर्ध सैनिक बलों की तैनाती ज्यादा हो चली है. भ्रष्टाचार पर सवार शोषण बस्तर में भी आम है, जिसके शिकार वे गरीब नंगे भूखे आदिवासी ज्यादा होते हैं जिन्हें अपने संवैधानिक हक तक नहीं मालूम.

रही बात फंडिंग की तो राजनाथ सिंह को औरों से ज्यादा बेहतर मालूम होना चाहिए कि मेहनती आदिवासी ही नक्सलियों के बड़े फाइनेंसर हैं, जो सेना से अपनी हिफाजत की कीमत नक्सलियों को चुकाते हैं. बंदूक की नोक पर कौन बस्तर में लोकतन्त्र की हत्या कर रहा है इस पर माथापच्ची अब बेकार की बात है, कौन विकास का दुश्मन है यह कतई चर्चा  की बात नहीं, मुद्दे की बात वे वजहें हैं जिनके चलते नक्सली वजूद में आए और ये वजहें जब तक दूर नहीं होंगी तब तक बस्तर के जंगलों में उड़ता बारूद खत्म या बंद होने की उम्मीद किसी को नहीं करनी चाहिए. 

बी पौजिटिव एटिट्यूड बेहतर भविष्य के लिए जरूरी

फिल्म ‘नो एंट्री’ में अनिल कपूर का किरदार जब भी किसी मुश्किल हालात में फंसता था तो वह पैनिक होने के बजाय बी पौजिटिव कहता था. इस से उस के न सिर्फ बिगड़े काम बनते थे, बल्कि एक हास्य भी पैदा होता था. फिल्म में बी पौजिटिव के फलसफे को भले ही हंसीमजाक की चाश्नी में लपेट कर दिखाया गया हो लेकिन असल जिंदगी में अगर युवाओं को बेहतर भविष्य की कल्पना करनी है तो यही एटिट्यूड काम आता है. युवावस्था अकसर कई तरह के भ्रम पैदा करती है, जिस से भविष्य की राह मुश्किल लगने लगती है. ऐसे में किस तरह एक बेहतर भविष्य की बुलंद इमारत के लिए सफलता की नीव रखी जाए, आइए जानते हैं :

हमेशा सकारात्मक सोचें

कहते हैं, ‘जहां चाह वहां राह.’ जीवन में सफलता का पहला फौर्मूला यही है कि आप हमेशा आशावादी रहें, क्योंकि इस नजरिए से हर कठिन काम को पलभर में हल कर सफलता हासिल की जा सकती है. जीवन में आगे बढ़ने के लिए कौशल विकास के साथसाथ सकारात्मक सोच का होना भी जरूरी है. अकसर नकारात्मक रवैए के चलते आत्मविश्वास डगमगा जाता  है. जो व्यक्ति अपनी सोच व अपनी मानसिक दशा को हमेशा सकारात्मक रखता है उसे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता. जैसे ही हमारे मन में किसी प्रोजैक्ट या फ्यूचर प्लान के लिए नैगेटिव थौट्स आने लगते हैं तो हम अपने सफल भविष्य की मंजिल से उतनी ही दूर चले जाते हैं. जीवन में आगे बढ़ने के लिए कौशल विकास के साथसाथ सकारात्मक सोच का होना भी जरूरी है. आशावादी बनें, नकारात्मक विचार कभी मन में न लाएं. नकारात्मक विचारों से आत्मविश्वास कम होता है, अत: हमेशा आशावादी दृष्टिकोण ही अपनाएं. 

जोखिम उठाने का जज्बा

नो रिस्क नो गेन यानी बिना जोखिम के कुछ भी हासिल करना संभव नहीं होता. भविष्य उस का ही संवरता है जो लीक से हट कर कुछ नया और बड़ा अचीव करने के लिए जोखिम उठाता है. लकीर के फकीर बने रहने से बेहतर और सफल भविष्य की मंजिल तक नहीं पहुंचा जा सकता. युवा पीढ़ी क्रिएटिव को कानून के दायरे में रहते हुए जोखिम उठाने की क्षमताओं को विकसित करना होगा. एक छोटा सा जोखिम आप की सफलता में बड़ा बदलाव ला सकता है. जोखिम लेना हर किसी के बस की बात नहीं है. उस के लिए कौन्फिडैंस की जरूरत होती है. विश्वास में वह शक्ति है जिस से उजड़ी दुनिया में प्रकाश लाया जा सकता है.

अकसर जोखिम न लेने वाले यह तर्क देते हैं कि इस राह में फेल होने के अवसर बढ़ जाते हैं, लेकिन याद रखें असफलता का मतलब है कि सफलता का प्रयास पूरे मन से नहीं किया गया. असफलता किसी काम को दोबारा शुरू करने का एक मौका देती है कि उस काम को और अच्छे तरीके से किया जाए. जब आप यह निश्चय करते हैं कि चाहे कुछ भी हो, कितनी भी मेहनत करनी पड़े लेकिन मुझे अपना लक्ष्य हासिल करना है तो यह जोखिम आप के सुनहरे कल की तस्वीर प्रस्तुत करता है.

खुद करें अपना मूल्यांकन

सफलता का पहला नियम यही है कि जिस काम में मन न लगे वही पहले करना चाहिए. वैसे भी जिस विषय या क्षेत्र में आप को महारत हासिल हो उस में भविष्य बनाने से कामयाबी का प्रतिशत बढ़ जाता है. काम यदि आप की रुचि अनुसार होता है तो आप उस में अपना 100त्न देते हैं. बिना अपना मूल्यांकन किए कोई काम करना वैसा ही है जैसे बिना गहराई का अंदाजा लगाए नदी या तालाब में कूदना.इसलिए सब से पहले यह पता लगाएं कि आप को क्या करना अच्छा लगता है और उसी काम को करें. अपनी शक्ति या सामर्थ्य का हमें पता होना चाहिए. हमेशा लक्ष्य ऐसा चुनें, जो अपनी शक्तिसामर्थ्य में हो. कभी भी ऐसा लक्ष्य चुनने की गलती न क रें, जो स्वयं की सामर्थ्य से बाहर हो. उदाहरण के लिए किसी की रुचि विज्ञान या तकनीक में है तो उसे कला सब्जैक्ट लेने से बचना चाहिए. अगर जबरदस्ती कोई और राह चुनेंगे तो असफलता ही हाथ लगेगी.

नया विचार नई क्रांति

आने वाले कल की बेहतरी के लिए आज की युवापीढ़ी अपने भविष्य के लिए क्या विचार या सोच रखती है, इस बिंदु पर सफलता और असफलता टिकी होती है. नए विचार व नई योजनाएं अपनाने में घबराएं नहीं. नए विचार नई क्रांति को जन्म देते हैं. नए विचार व नई योजनाएं सफलता की धुरी होते हैं. आजकल की प्रतिस्पर्धा और भागदौड़ भरी जिंदगी में पुराने विचारों की कोई पूछ नहीं है. नई पीढ़ी अपने नए विचारों से दुनिया भर में अपनी सफलता का परचम लहरा रही है. फेसबुक संस्थापक मार्क जुकरबर्ग हों या कोई अन्य  सफलतम युवा उ-मी, सब ने नए आइडिया के दम पर दुनिया को अपनी योग्यता का लोहा मनवाया है.

युवाओं को चाहिए कि वे हमेशा अच्छा सोचें. ज्यादातर अपनी मंजिल या लक्ष्य इतना कम सैट करते हैं कि बाद में पिछड़ जाते हैं, जबकि कुछ लोग बहुत बड़ा लक्ष्य  और बेहतर भविष्य पाते हैं. वह समय बीत गया जब युवा किसी भी दफ्तर में क्लर्क की नौकरी कर के खुश हो जाते थे. अब वे अपना भविष्य बेहतर बनाने के लिए खुद अपने आइडिया के दम पर अपनी कंपनी के मालिक बनते हैं और सफलता की राह में बहुत जल्द बड़ा नाम बन जाते हैं.

असफलता, गलतियां और संकल्प

जीवन में संकल्प हमें सफल बनाता है. हमारे कैरियर, स्कूल या दोस्ती में कई मनमुटाव या छोटीमोटी लड़ाइयां चलती रहती हैं, लेकिन हम उन्हें किस तरह से सुलझा कर अपनी सफलता के असली संकल्प को पूरा करते हैं, यही एक भावना सफल भविष्य की इमारत बुलंद करती है, यही हमारी सफलता को भी सुनिश्चित करती है. असफलता से घबराने के बजाय अपने लक्ष्य तक पहुंचने का संकल्प जरूरी है. सफलता हमारा परिचय दुनिया से करवाती है और असफलता हमें दुनिया का परिचय करवाती है. सफलता की राह पर अग्रसर होते हुए कुछ निराशात्मक बातें हमारे सामने आती हैं, यदि हम उन बातों पर ध्यान न दे कर सिर्फ अपने लक्ष्य के बारे में सोचते हैं तो हमें सफलता जरूर मिलती है.

गलती करना बुरी बात नहीं है, लेकिन उन से कुछ सबक न सीखना और बारबार उन्हें दोहराना जरूर सफलता की राह में रोड़े पैदा करता है.  आप गलतियों से तभी सीख सकते हैं जब अपनी उन गलतियों को स्वीकार करते हैं और उन पर मनन करते हैं.सदैव कड़ी मेहनत करें. ईमानदारी, सकारात्मक ऊर्जा से असफलता का डट कर मुकाबला करें. सिर्फ और सिर्फ सफल और सुनहरा भविष्य आप का इंतजार करता नजर आएगा.                             

किसिंग सीन देने में बुराई नहीं : पिया बाजपेयी

बचपन से अभिनय का शौक रखने वाली अभिनेत्री पिया बाजपेयी ने तमिल, तेलुगू और मलयालम फिल्मों से अपने कैरियर की शुरुआत की. उन का जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा में हुआ, लेकिन कैरियर की शुरुआत दिल्ली में हुई. बचपन से ही पिया अत्यंत चंचल स्वभाव की थीं. शुरूशुरू में उन के मातापिता नहीं चाहते थे कि वे फिल्मों में काम करें, पर उन के आत्मविश्वास को देख कर उन्होंने हां कही. आज उन के परिवार वाले उस की इस कामयाबी से खुश हैं. पिया की फिल्म ‘मिर्जा जूलिएट’ में उन की भूमिका उन के स्वभाव से काफी मिलतीजुलती है. उन से मिल कर बात करना रोचक था. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के मुख्य अंश :

फिल्म ‘मिर्जा जूलिएट’ के लिए हां करने की वजह क्या थी?

मुझे इस फिल्म की भूमिका बहुत अच्छी लगी. अधिकतर ऐसा होता है कि नरेशन कुछ होता है और ऐक्ंिटग के बाद कुछ और हो जाता है, लेकिन इस में मैं ने जो सुना वही दिखाया जाएगा, ये अच्छी बात है.

इस फिल्म में आप की भूमिका क्या है. वह आप से कितना मेल खाती है?

मैं ने इस में एक छोटे शहर की दबंग लड़की की भूमिका निभाई है. जो मुझ से काफी मेल खाती है. मैं रियल में भी एक छोटे शहर इटावा से हूं, मुझे याद है कि बचपन में मैं टौमबौय जैसी थी. कोई लड़का अगर मुझे कुछ कह देता था, तो उसे पकड़ कर खूब मारती थी. मेरे पिताजी ने कहा था कि अगर लड़ाई हो तो मार के आना, खुद पिटाई खा कर नहीं.

पिताजी ने मुझे बेटे की तरह पाला है. मेरी बातचीत और चलनेफिरने का ढंग सब लड़कों की तरह था. मैं ने बाइक और जीप चलाई है. त्योहारों में मेरे लिए हमेशा पैंटशर्ट ही आते थे.

फिल्मों में आने के बाद मैं ने लड़कियों वाली ड्रैस पहननी शुरू की. इसलिए जब मुझे इस तरह की ही भूमिका का औफर मिला तो मैं ने तुरंत हां कर दी.

फिल्म में छोटे शहर के लोग जब बड़े शहरों में जाते हैं तो अपनेआप को वहां के माहौल में फिट बैठाने के लिए क्याक्या करते हैं, जिसे देख कर दूसरों को लगता है कि यह चालाक लड़की है, लेकिन ऐसा होता नहीं है, अपनेआप को स्मार्ट दिखाने के लिए वे ऐसा करती हैं.

इस फिल्म में भी मेरी भूमिका वैसी ही लड़की की है. इस की शूटिंग बनारस और धर्मशाला में हुई है.

क्या फिल्मों में आना इत्तफाक था?

मेरे जीवन में कुछ भी इत्तफाक नहीं था. मैं जब 7वीं कक्षा में थी, मुझे डांस का बहुत शौक था, पड़ोस में गाना बजता था और मैं डांस करना शुरू कर देती थी. इतना ही नहीं स्कूल, कालेज सभी जगह डांस कार्यक्रम में भाग लेती थी. मेरी इस रुचि को देख कर पापा ने एक दिन कहा था कि 12वीं पूरी होने के बाद वे मुझे ऐक्ंिटग व डांसिंग का कोर्स करवा देंगे, लेकिन जब मैं 12वीं में आई तो उन्होंने साफ मना कर दिया, लेकिन चिनगारी तो उन्होंने लगा ही दी थी.

मुझे लगा कि इटावा से निकल कर ही मेरी लाइफ बन सकती है, क्योंकि यह एक छोटा शहर है, यहां लाइफ नहीं बन सकती. वहां से निकल कर मैं दिल्ली आई. कंप्यूटर कोर्स किया, रिसैप्शनिस्ट की जौब की, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाई और इस तरह मैं धीरेधीरे मुंबई में सैट हो गई.

मुंबई में कितना संघर्ष किया?

मुंबई में मैं ने पहले डबिंग आर्टिस्ट के रूप में काम किया, क्योंकि मेरी हिंदी अच्छी है. इस के बाद प्रिंट ऐड में काम शुरू कर दिया, जिस से मुझे कमर्शियल ऐड मिलने लगे. ऐसा करतेकरते मुझे हिंदी फिल्म ‘खोसला का घोंसला’ की रीमेक तमिल फिल्म में काम करने का मौका मिला. मेरी वह फिल्म हिट हो गई, फिर फिल्मों का सिलसिला शुरू हो गया.

करीब 12-13 दक्षिण भारतीय फिल्में करने के बाद मुझ में हिंदी फिल्म करने की इच्छा पैदा हुई, क्योंकि मैं जितनी फिल्में कर रही थी, भाषा समझ में न आने की वजह से मेरे मातापिता उस में भाग नहीं ले पा रहे थे. मुझे सब आधाअधूरा लग रहा था.

मैं ने एक साल का ब्रेक लिया और मुंबई रुकी. उसी दौरान मुझे हिंदी फिल्म ‘लाल रंग’ मिली. उस के तुरंत बाद ‘मिर्जा जूलिएट’ मिल गई.

साउथ की और यहां की फिल्मों में क्या अंतर है?

सिर्फ भाषा का अंतर है. वहां भी लोग अच्छी और खराब फिल्में बनाते हैं.

आप के काम में परिवार ने किस तरह का सहयोग दिया?

परिवार वालों ने पहले कभी मुझे सहयोग नहीं दिया, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि मैं हीरोइन बनूं. उन्हें लग रहा था कि मैं एक सीधीसादी और छोटे शहर की लड़की हूं. लोग यहां मुझे बेवकूफ बना देंगे. समय बरबाद हो जाएगा, लाइफ सैटल नहीं हो पाएगी आदि चिंता उन्हें सता रही थी.

मेरे परिवार में सभी बहुत पढ़ेलिखे हैं ऐसे में ऐसी सोच वाजिब थी. फिर मुंबई की कहानियां उन्होंने अखबारों में काफी पढ़ी थीं. उन्होंने मेरा साथ देने से साफ मना कर दिया था, पर मुझे विश्वास था कि मैं सफल हो जाऊंगी, अत: मैं दिल्ली गई. आज उन्हें मुझ पर गर्व है, वे मेरी उपलब्धि से खुश हैं.

किसी नए शहर में अकेले रहना कितना मुश्किल था?

अगर आप अपनी जिम्मेदारी खुद लेते हैं, तो जंगल में भी रह सकते हैं. आप कहीं भी रहें हमेशा सतर्क रहना चाहिए. मुझे दिल्ली या मुंबई कहीं भी रहने में कोई समस्या नहीं आई.

फिल्मों में अंतरंग दृश्य करने में कितनी सहज रहती हैं?

मुझे अभी तक कोई भी इंटीमेट सीन करने में मुश्किल नहीं आई. फिल्म ‘लाल रंग’ में भी कुछ किसिंग सीन थे, इस में भी हैं. दक्षिण की किसी भी फिल्म में मेरा कोई भी किसिंग सीन नहीं था, लेकिन मैं कैमरे पर अधिक फोकस्ड रहती हूं. अगर फिल्म की डिमांड है, तो उसे करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं.

मेरे लिए निर्देशक, कोऐक्टर खास माने रखते हैं, इस के अलावा मैं जो भी दृश्य करूं, वह ओरिजनल लगे, इस बात पर अधिक ध्यान देती हूं.

फिल्मों की पाबंदी के बारे में क्या सोचती हैं?

फिल्मों का सर्टिफिकेशन जरूरी है, फिल्म को देख कर उस के हिसाब से उसे सर्टिफाई कर देना चाहिए, न कि उस पर पाबंदी लगाई जाए. इस के बाद दर्शक हैं, जो फिल्म के  भविष्य को तय करते हैं. वैसे तो लोग यूट्यूब पर हर तरह की फिल्में देख लेते हैं. मेरे हिसाब से फिल्म जैसे बनी है, उस के हिसाब से सर्टिफिकेट दें. किसी की पसंद या नापसंद को आप डिक्टेट नहीं कर सकते.

समय मिले तो क्या करना पसंद करती हैं?

मैं बहुत बड़ी फिटनैस फ्रीक हूं. समय मिलने पर जिम जाती हूं जिस में मैं मार्शल आर्ट की एक कठिन विधा परकौर करती हूं. खानेपीने पर ध्यान देती हूं, किताबें पढ़ती हूं, फिल्में देखती हूं. मेरे फ्रैंड्स नहीं हैं. फिल्म की यूनिट के लोग ही मेरे फ्रैंड्स हैं. मुझे खाना बनाने का शौक है. सबकुछ बना लेती हूं. नौनवैज नहीं बनाती, क्योंकि मैं खाती नहीं हूं. मैं ने खाना बनाना घर से बाहर निकल कर ही सीखा है. मैं चाय अच्छी बनाती हूं.

आप को कभी ‘कास्टिंग काउच’ का सामना करना पड़ा?

किसी भी क्षेत्र में चाहे वह हिंदी सिनेमा जगत हो या कोई कौरपोरेट वर्ल्ड हर जगह महिलाओं को किसी न किसी रूप में प्रताडि़त होना पड़ता है. इस के लिए वे खुद जिम्मेदार होती हैं.

जिस के पास पावर है वह उस का प्रयोग किसी न किसी रूप में करता है, लेकिन आप अगर खुद उन्हें बता देते हैं कि आप को अपनेआप पर भरोसा नहीं, आप एक रात में ऐक्ट्रैस बनना चाहती हैं, कुछ भी करने के लिए तैयार हैं, तो आप का यूज कौन नहीं करेगा? इस तरह की घटनाओं में दोनों का योगदान होता है. एक अकेला व्यक्ति कुछ भी नहीं कर सकता.

कोई ड्रीम प्रोजैक्ट है?

मैं हमेशा एक अच्छी फिल्म करना चाहती हूं. अभी मैं अपनेआप को प्रूव कर रही हूं.

कुछ और दूसरी रीजनल फिल्में करने का शौक है?

मैं कोई भी अच्छी फिल्म, किसी भी भाषा में हो, करना पसंद करूंगी.

रिलेशनशिप पर आप की सोच क्या है? क्या आप को कभी किसी से प्यार हुआ?

रिलेशनशिप जल्दी टूटती है क्योंकि वह बनती भी जल्दी है. आजकल बनावटी चीजें बहुत हो रही हैं. ऐसे में मैं अपने काम पर अधिक ध्यान देती हूं. मेरा काम ही मेरा प्यार है.

कितनी फैशनेबल हैं?

मैं फैशनेबल बिलकुल नही हूं, जो मिले उसी को पहन लेती हूं.

तनाव होने पर क्या करती हैं?

तनाव होने पर दौड़ने चली जाती हूं.

शौपिंग मेनिया है?

मुझे जो पसंद आए उसे अवश्य खरीद लेती हूं, नहीं तो रात में उस के सपने आते हैं. वे कपड़े, जूते कुछ भी हो सकते हैं.

आप अपना आदर्श किसे मानती हैं?

मैं अपनी मां कांति बाजपेयी को अपना आदर्श मानती हूं.

यूथ जो इस क्षेत्र में आना चाहे उन्हें क्या मैसेज देना चाहेंगी?

यूथ के लिए मेरा मैसेज यही है कि आप जो भी सपने देखें, उन्हें ईमानदारी से फौलो करने की हिम्मत रखें. सभी स्टार बनने के लिए मुंबई आते हैं, पर वे सही ढंग से मेहनत नहीं करते और जब फेल हो जाते हैं, तो रोते हैं और सब को दोषी ठहराते हैं. मेरे हिसाब से सपने जितने अधिक बड़े होते हैं, मेहनत उतनी ही अधिक होती है. उस के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए.          

संरक्षणवाद की आंधी

अमेरिका में डौनल्ड ट्रंप की सरकार को कुछ मोरचों पर शिकस्त मिल रही है पर फिर भी वे अपने चुनावी नारों को थोपने में लगे हैं. आईटी प्रोफैशनल्स को एच-1बी वीजा अब कठिनाई से मिलेगा और अमेरिकी कंपनियों में अमेरिकियों को ही नौकरियों पर रखना होगा. यह सोचना कि अमेरिकी कंपनियां पहले पैसा बचाने के लिए भारत जैसे देशों से आईटी प्रोफैशनल्स को बुलाती थीं, गलत होगा. असल में अमेरिका में पढ़ाई महंगी है और एकदो दशकों से वहां के युवा मौजमस्ती में ज्यादा लगे हैं, काम के प्रति गंभीर होने के बजाय. इधर भारत में ऊंची जातियों के पढ़ेलिखे लोगों के बच्चे और मेहनत कर के अपना स्तर सुधारने में लगे हैं. भारत में नौकरी के अवसर कम मिलने के कारण उन्होंने अमेरिका में नौकरियां ढूंढ़ी और अपनी मेहनत से अपना रंग जमा लिया.

इन कंपनियों के आम गोरे मालिक या मैनेजर भारतीयों को आदर से देखते हों ऐसा नहीं है. जैसा व्यवहार वे अपने देश के काले या दक्षिण अमेरिका से आए मिश्रित लैटिनों से करते रहे हैं, उस से थोड़ा सा अच्छा है. अंगरेजी के ज्ञान के कारण उन की दोस्ती अच्छी चलती है और इसीलिए कंपनियां उन्हें एशिया के दूसरे क्षेत्रों से ज्यादा पसंद करती हैं. पर अमेरिकियों के मन में भारतीयों के बारे में भी वैसा ही भेदभाव व गुस्सा है जैसा दूसरे बाहरियों के साथ. यह ट्रंप की जीत ने साबित कर दिया है. वैसे ऊंची जातियों के अमेरिकी नागरिकता प्राप्त मूल भारतीयों में से ज्यादातर ने कट्टर रिपब्लिकन पार्टी का समर्थन किया था पर उन्हें अब असल रंग समझ आ रहे हैं.

अमेरिका जा कर अपना भविष्य बनाने का सपना हर भारतीय युवा का होता है और मातापिता लाखों इस पर खर्च करते हैं. असल में इंजीनियरिंग व मैडिकल प्रवेश परीक्षाओं में जो मारामारी है वह इसी अमेरिकी नौकरी की वजह से है और यही नहीं मिली तो समझो कि पूरा भविष्य चौपट हो गया. अब यह सपना टूट रहा है. न अमेरिका में नौकरियां मिलेंगी, न अमेरिकी कंपनियां भारतीय कंपनियों को काम के ठेके दे पाएंगी. एक तरह से दोनों को टाइट बकसों में रहना पड़ेगा. वैश्वीकरण के सपनों में अब क्रैक पड़ रहे हैं. ऊपर से भारत में अफ्रीकियों के साथ जो व्यवहार हो रहा है उस से अफ्रीका में मिलने वाली मोटे वेतन वाली नौकरियों पर आंच आने लगी है. सिंगापुर भी कुछ बंधन लगाने लगा है.

अगर ऐसे में देश में ही नौकरियों के अवसर न मिले तो बच्चों की पढ़ाई पर किया खर्च बेकार हो जाएगा और अच्छे मेधावी छात्रों को छोटी नौकरियों से संतोष करना होगा. भारत अमेरिका तो क्या न चीन बन पाएगा और यहां तक कि शायद वियतनाम जैसे देश से भी पिछड़ न जाए.

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