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कैसे बचें लिपस्टिक ब्लंडर से

होंठों की सुंदरता बढ़ाने में लिपस्टिक का खास महत्त्व होता है. मगर कई महिलाएं लिपस्टिक का सही चुनाव नहीं कर पातीं, जिस का प्रभाव उन के लुक्स पर भी पड़ता है. खासतौर पर गर्मी के मौसम में लिपस्टिक के चुनाव में अधिक सावधानी बरतने की जरूरत है, नहीं तो पूरा लुक बिगड़ सकता है. ब्यूटीशियन मीनू अरोड़ा कहती हैं, ‘‘गर्मी के मौसम में महिलाएं कपड़ों में कूलिंग इफैक्ट देने वाले रंग ढूंढ़ती हैं. ठीक उसी तरह लिपस्टिक के शेड्स और फिनिश भी मौसम के अनुकूल होनी चाहिए. महिलाओं को अपनी स्किन टोन का भी ध्यान रखना जरूरी है क्योंकि लिपस्टिक का शेड स्किन टोन को उभारता है. इस मौसम में ग्लौसी की जगह मैट फिनिश वाली लिपस्टिक का ही इस्तेमाल करना चाहिए क्योंकि यह लाइट और सोबर लुक देती है.’’

किस स्किन टोन पर कौन सा रंग

स्किन टोन पहचानने का सब से अच्छा तरीका होता है कि कलाई पर उभरी हुई नसों का रंग देख लिया जाए. यदि नसों का रंग नीला है तो यह कूल स्किन टोन का प्रतीक है और यदि नसों का रंग हरा है स्किन टोन वार्म होती है. मीनू बताती हैं, कूल स्किन टोन वाली महिलाओं का रंग पेल व्हाइट और व्हाइट होता है जबकि वार्म स्किन टोन वाली महिलाएं व्हीटिश, डस्की और डीप डार्क होती हैं. हर रंग की त्वचा पर अलग रंग की लिपस्टिक अच्छी लगती है. जैसे:

– गोरी या बहुत गोरी त्वचा (व्हाइट और पेल व्हाइट) पर पिंक, कोरल, न्यूड और बेज रंग इस मौसम में बहुत अच्छे लगते हैं.

– व्हीटिश यानी गेंहुए रंग वाली महिलाओं पर रोज रैड, मोव और बेरी शेड्स की लिपस्टिक बहुत अच्छी लगती है. इस रंग की महिलाओं पर कौपर और ब्रौंज कलर की लिपस्टिक भी बहुत जंचती है.

– यदि त्वचा का रंग सांवला है तो कभी भी ब्राउन और पर्पल फैमिली के लिप शेड्स का इस्तेमाल न करें. इस रंग पर औरेंज फैमिली के शेड्स काफी अच्छे लगते हैं.

– गहरे सांवले रंग की महिलाएं ब्राउन, प्लम और वाइन कलर की लिपस्टिक में खूब जंचती हैं. 

लिपस्टिक खरीदते वक्त ध्यान रखें

त्वचा के रंग के आधार पर लिपस्टिक खरीदते वक्त कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. मीनू कहती हैं, ‘‘कई महिलाएं चार्ट या ऊपर से लिपस्टिक का रंग देख कर लिपस्टिक खरीद लेती हैं, मगर यह सही तरीका नहीं है. हर ब्रांड में एक ही लिपस्टिक के 2-3 कलर टोन आते हैं और यह होंठों के रंग पर निर्भर करता है की कौन सा कलर टोन अच्छा लगेगा. इसलिए हमेशा लिपस्टिक ट्राए कर के ही लें.’’

निम्नलिखित बातों का भी ध्यान रखें:

– निचले होंठ के रंग से 2 शेड गहरी लिपस्टिक ही खरीदें. रंग जांचने के लिए लिपस्टिक को निचले होंठ पर लगाएं और ऊपर वाले होंठ के रंग की गहराई से परखें. रंग की गहराई समान होने पर ही लिपस्टिक खरीदें.

– लिपस्टिक का सही कलर इफैक्ट देखने के लिए बिना मेकअप ओरिजनल स्किन टोन पर लिपस्टिक लगा कर देखें.

– यदि एक साथ कई लिपस्टिक शेड खरीद रही हैं, तो पहले शेड को होंठों से साफ करने के बाद ही दूसरा ट्राए करें.   

मैटी फिनिश के लिए होठों को करें तैयार

गर्मी के मौसम में मैट फिनिश वाली लिपस्टिक सब से अच्छा विकल्प है क्योंकि यह लिपस्टिक गर्मी में पिघल कर फैलती नहीं है. मीनू कहती हैं, ‘‘मैट फिनिश की लिपस्टिक बेहद शालीन लुक देती है मगर इसे लगाने के कुछ नियम होते हैं, जिन के अनुसार इस का इस्तेमाल न किया जाए तो लुक बिगड़ भी सकता है.’’

यह नियम निम्नलिखित हैं:

– फटे हुए होंठों पर कभी भी मैट फिनिश वाली लिपस्टिक नहीं लगानी चाहिए. यदि होंठ फटे हैं, तो पहले उन्हें स्क्रब कर के ऐक्सफोलिएट कर लें.

– मैट फिनिश वाली लिपस्टिक होंठों को रूखा कर देती है इसलिए लगाने से पहले होंठों पर बेबी औयल से मसाज कर लेनी चाहिए ताकि होंठों में नमी बनी रहे और होंठों पर दरारें न दिखें.

– मैट लिपस्टिक का अच्छा इफैक्ट देखने के लिए होंठों पर पहले कंसीलर लगाएं. इस से लिपस्टिक का रंग उभर कर आता है.

– मैट लिपस्टिक के हमेशा 2 कोट होंठों पर लगाएं और कभी भी होंठों को रब न करें.

– मैट लिपस्टिक लगाने से पहले होंठों को लिप लाइनर से शेप जरूर दें. दरअसल ग्लौसी लिपस्टिक की तरह मैट लिपस्टिक अपने आप होंठों पर नहीं फैलती इसलिए लिप लाइनर की आउटलाइन के सहारे पूरे होंठों पर लिपस्टिक लगानी चाहिए.            

न करें यह गलतियां

– ड्रैस के कलर को कॉम्प्लिमैंट करने वाला लिप शेड लगाएं न की ड्रैस के रंग से मैच करता हुआ. यह ड्रैस और मेकअप दोनों का ही लुक बिगाड़ देता है.

– पतले होंठों पर कभी भी गहरे रंग की लिपस्टिक न लगाएं, होंठ और भी पतले लगेंगे.

– यदि आंखों पर हैवी मेकअप है तो होंठों को ड्रामैटिक लुक देने से बचें. 

माता पिता के सपनों को पूरा करती बेटियां

कुछ अरसा पहले रिलीज हुई बौलीवुड की सब से ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म ‘दंगल’ महिला पहलवानों गीता फोगट और बबीता फोगट की वास्तविक जिंदगी पर आधारित थी. इस में बड़ी खूबसूरती से चित्रण किया गया कि कैसे बहुत ही कम उम्र में उन के पिता महावीर फोगट ने कुश्ती में गोल्ड मैडल लाने के अपने अधूरे सपने को पूरा करने की जिम्मेदारी का बोझ नन्ही गीता और बबीता के कंधों पर डाल दिया, क्योंकि उन का कोई बेटा नहीं था.

ऐसे में बहुत ही कम उम्र में नाजुक सी गीता और बबीता पिता की मेहनत से इतनी मजबूत बन गईं कि अपने से बड़ी उम्र के बलिष्ठ पहलवान लड़कों को भी चारों खाने चित्त करने लगीं. 2010 व 2014 के कौमनवैल्थ गेम्स में गोल्ड मैडल जीत कर पिता के साथसाथ पूरे देश का भी नाम रोशन कर दिया. ऐसा नहीं है कि लड़कियां किसी भी नजरिए से लड़कों से कम होती हैं या फिर जिंदगी में लड़कों की तरह किसी भी तरह की जिम्मेदारी उठाने में सक्षम नहीं होतीं. जरूरत पड़े तो वे कुछ भी कर सकती हैं.

आजकल ज्यादातर घरों में संतान के नाम पर 1 या 2 बेटियां ही होती हैं. ऐसे में न चाहते हुए भी उन के नाजुक कंधों पर ही बुजुर्ग मांबाप की देखभाल, उन के सपने पूरे करने या परिवार से जुड़ी दूसरी जिम्मेदारियां आ जाती हैं, जिन्हें वे बखूबी निभाती भी हैं. कितनी ही बेटियां हैं, जिन्होंने एक मुकाम हासिल कर घर वालों को सम्मानित किया है.

उदाहरण के लिए इंदिरा गांधी को ही ले लीजिए. वे एक बेटी ही तो थीं, मगर देश की पहली और अब तक की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री बन कर परिवार की प्रतिष्ठा को नए आयाम तक पहुंचाया.

बेटियां होती हैं बेटों से अधिक जिम्मेदार

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में कहा था कि 1 बेटी 5 बेटों से बेहतर होती है. वैज्ञानिक रूप से भी यह प्रमाणित हो चुका है कि बेटियां अपने मांबाप से भावनात्मक रूप से अधिक जुड़ी रहती हैं और उन की देखभाल करने में बेटों से अधिक रुचि लेती हैं.

बेटियां बड़ी हो कर मांबाप की अच्छी दोस्त बन जाती हैं. वे भी अपने दिल की बात बेटियों से ही अधिक शेयर करते हैं. बेटा तभी तक बेटा होता है जब तक उस की शादी नहीं होती. बेटियां हमेशा बेटियां ही रहती हैं. वे मांबाप को भावनात्मक सहारा देती हैं, उन्हें खुश रखती हैं. शादी से पहले तो वे अपने मांबाप की देखभाल करती ही हैं, शादी के बाद भी दोनों परिवारों की देखभाल करती हैं. वे अपने फर्ज से कभी मुंह नहीं मोड़तीं.

क्षेत्र कोई भी हो लड़कियों ने मौका मिलने पर न सिर्फ दायित्व निभाया वरन समाज में अपना अलग मुकाम भी बनाया है.

ट्रैवल एजेंट उज्ज्वला पादुकोण शादी के बाद एक बेटे को जन्म देना चाहती थीं, क्योंकि उन का कोई भाई नहीं था. वे अपने मन में पैदा इस रिक्तता को बेटे के जरीए भरना चाहती थीं. मगर 1986 में उन के घर बिटिया ने जन्म लिया. उन के पति अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त बैडमिंटन खिलाड़ी प्रकाश पादुकोण व उज्ज्वला पादुकोण ने बड़े प्यार से बच्ची का नाम दीपिका रखा. वही दीपिका आज घरघर में पहचानी जाती हैं. उज्ज्वला स्वीकारती हैं कि उन्हें दुनिया की सब से अच्छी 2 बेटियां मिली हैं. दीपिका की छोटी बहन अनीषा गोल्फ प्लेयर हैं.

दीपिका का फोकस भी शुरू से ही बैडमिंटन में रहा, क्योंकि कहीं न कहीं अपने पापा के सपनों को पूरा करने के लिए वे प्रयासरत थीं. उन्होंने कम उम्र से ही बैडमिंटन खेलना शुरू कर दिया था. जब वे स्कूल में थीं, तो सुबह जल्दी उठ जाती थीं. फिर फिजिकल ट्रेनिंग पूरी कर स्कूल जातीं. लौट कर बैडमिंटन खेलतीं और फिर होमवर्क खत्म कर के ही सोती थीं. वे नैशनल लैवल चैंपियनशिप प्रतियोगिता में भी खेली हैं. कुछ स्टेट लैवल टूरनामैंट्स में बेसबौल भी खेला है. पढ़ाई और खेल में ध्यान देने के साथसाथ वे चाइल्ड मौडल के रूप में भी काम करती रहीं.

10वीं क्लास में दीपिका के मन में फैशन मौडल बनने की चाहत पैदा हुई. इस बाबत उन्होंने अपने पिता से पूछा कि क्या वह बैडमिंटन खेलना छोड़ सकती है? पिता की स्वीकृति के बाद 2014 में उन्होंने फुलटाइम कैरियर के रूप में मौडलिंग को अपना लिया. फिर लगातार सफलता के मुकाम छूती रहीं. इसी दौरान उन्हें फिल्मों के औफर भी मिलने लगे. 2007 में उन की झोली में फिल्म ‘ओम शांति ओम’ आई, जिस के बाद सफलता और दीपिका एकदूसरे के पर्याय बन गए.

म्यूजिकल लीजैंड व सितारवादक रविशंकर को म्यूजिक वर्ल्ड का गौडफादर कहा जाता है. इंडियन क्लासिकल म्यूजिक को दुनिया भर में लोकप्रिय बनाने का श्रेय उन्हीं को जाता है. बेटा न होने की वजह से उन्होंने अपना म्यूजिकल टेलैंट अपनी बेटी अनुष्का शंकर को सौंपा. पिता से ही अनुष्का ने सितार वादन सिखा. आज पितापुत्री की यह जोड़ी पूरी दुनिया में अपनी जुगलबंदी के लिए जानी जाती है.

20 साल की उम्र में अनुष्का को पहली दफा ग्रैमी अवार्ड के लिए नौमिनेट किया गया था. आज तक वे 6 दफा इस के लिए नौमिनेट की जा चुकी हैं. वे देश की पहली कलाकार हैं, जिन्होंने ग्रैमी अवार्ड प्रोग्राम में परफौर्म किया है.

मूल रूप से मणिपुर की रहने वाली अंतराश पिछले कई वर्षों से अपने घर की एकमात्र कमाऊ सदस्या हैं. वे कहती हैं कि उन के पिता बेरोजगार थे. भाई के पास भी नौकरी नहीं थी. ऐसी स्थिति में परिवार की देखभाल और मांबाप के सपने पूरे करने का जिम्मा उन्हीं पर था.

अंतराश के सामने कई चुनौतियां थीं पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. 2014 में प्रतिनिधि के रूप में अंतराश ने एवौन कंपनी जौइन की और अब वहां सेल्स लीडर एसईएल के पद पर हैं. आज वे इतनी सक्षम हैं कि परिवार की आर्थिक जरूरतें पूरी करने के साथसाथ अपने सपनों को भी साकार कर रही हैं.

आर्थिक स्वंतत्रता ने दिए नए आयाम

सरोज सुपर स्पैश्यलिटी अस्पताल, नई दिल्ली के मनोचिकित्सक डा. संदीप गोविल बताते हैं, ‘‘पहले महिलाएं पुरुषों की परछाईं होती थीं. पर आज उन का स्वतंत्र वजूद है. समाज में उन की हैसियत बढ़ी है. आज वे ऊंची शिक्षा प्राप्त कर अच्छी नौकरियां करने लगी हैं. आज बहुत सी महिलाएं अपने परिवार का आर्थिक आधार हैं. वे न सिर्फ नौकरी कर रही हैं वरन बड़ेबड़े बिजनैस भी चला रही हैं.’’

एक महिला के लिए घर की चारदीवारी से निकल कर काम करना और समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाना आसान नहीं है. लेकिन जीवन की हर चुनौती का डट कर सामना करना उन्हें मानसिक रूप से मजबूत और दृढ़निश्चयी बना देता है. आर्थिक आत्मनिर्भरता उन के जीवन को एक नई दिशा देती है.

बढ़ता आत्मविश्वास

जो महिलाएं अपने परिवार के लिए रोटी कमाने वाली (ब्रैड अर्नर) होती हैं, वे उन महिलाओं की तुलना में अधिक आत्मविश्वासी होती हैं, जो अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए पिता, पति या बेटे पर निर्भर रहती हैं. जब अपनी कमाई से वे अपनी ही नहीं, परिवार की भी जरूरतें पूरी करती हैं, तो उन में अपनी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने का साहस उत्पन्न होता है. वे अपनी जिंदगी में उन समझौतों को नकार देती हैं, जो दूसरी महिलाओं को पुरुषों पर आर्थिक निर्भरता के कारण करने पड़े थे. आर्थिक स्वतंत्रता से मिला आत्मविश्वास उन्हें अपने जीवन को उस दिशा में  आगे बढ़ाने में सहायता करता है, जिस दिशा में वे बढ़ना चाहती हैं.

आत्मनिर्भर महिलाओं को अपने भविष्य की चिंता नहीं रहती कि कल को अगर मातापिता नहीं रहे, उन की शादी नहीं हुई, तलाक हो गया या पति की मृत्यु हो गई तो वे क्या करेंगी? अगर उन के अपने बच्चे हैं, तो उन के भविष्य का क्या होगा? उन के जीवन में कोई दुर्घटना घटती है, तो भी वे आर्थिक दृष्टि से इतनी सक्षम होती हैं कि अपने जीवन को पटरी पर ला सकती हैं. भविष्य को ले कर सुरक्षा का भाव उन के व्यक्तित्व को मजबूत बनाता है.             

चुनौतियों का सामना करने के टिप्स

डा. संदीप गोविल बताते हैं कि किसी महिला के लिए घर से बाहर निकल कर कमाना आज भी किसी चुनौती से कम नहीं है. उसे समाज व कार्यस्थल पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और जब महिला सिंगल हो तब तो ये चुनौतियां और बढ़ जाती हैं.

– अपने दृष्टिकोण को सकारात्मक और आशावादी रखें.

– मानसिक शांति के लिए ध्यान करें.

– अपनी भावनाओं को नियंत्रित रखना सीखें.

– रोज कम से कम 30 मिनट ऐक्सरसाइज करें. इस से न सिर्फ शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने में सहायता मिलती है, बल्कि मानसिक शांति भी प्राप्त होती है.

– मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए शरीर को आराम देना भी बहुत जरूरी है. अपने शरीर की आवश्यकता के अनुसार 7-8 घंटे की नींद जरूर लें.

– सामाजिक रूप से सक्रिय रहें.

रोजगार में संभावनाएं बढ़ाने की जरूरत

एसोचैम व थौट आर्बिट्रेज की साझा रिसर्च में यह बात सामने आई है कि पिछले 10 सालों में भारत में फीमेल लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट में 10% की गिरावट आई है. 2000 से 2005 के बीच जहां यह दर 34-37% थी. वहीं 2016 में घट कर 27% के आसपास रह गई है. इस के पीछे जो मुख्य वजहें सामने आईं, वे निम्न प्रकार हैं:

– रोजगार के कम अवसर.

– महिलाओं के लिए प्रतिकूल कार्यशैली.so

– महिलाओं के प्रति परिवारों व समाज में रूढि़वादी सोच.

पिछले 10 सालों में भारत के पड़ोसी देश चीन में यह दर 64% तक पहुंच गई है, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि यदि हमें अपनी जीडीपी दर बढ़ानी है, तो महिलाओं के लिए भी पुरुषों के समान रोजगार की नई संभावनाएं तलाशनी होंगी. भारत की बेटियों के सपने पूरे होंगे तभी तो देश तरक्की करेगा.

रोशनी की नई नजीर

लेदर की ब्लैक जैकेट, हाई हील बूट, जींस और सिर पर हिजाब पहन कर जब वह 250 सीसी वाली 2 लाख रुपए की होंडा सीबीआर स्पोर्ट्स बाइक ले कर सड़क पर निकलती है तो शायद ही कोई ऐसा हो जो उस की तरफ मुड़ कर न देखे. जी हां, यह है रोशनी मिसबाह. जामिया मिलिया इसलामिया यूनिवर्सिटी की एमए की छात्रा, गाजियाबाद की रहने वाली.

यह पढ़ कर आप एक बार जरूर सोचेंगे कि जिस इसलाम में महिलाओं पर तमाम तरह की पाबंदियां हैं, क्या उस इसलाम में ऐसा संभव है? लेकिन आप यह भूल रहे हैं कि खुली सोच वाला, पढ़ालिखा इसलामिक तबका बहुत तेजी से बदल रहा है. अपने बच्चों के भविष्य और कैरियर को ले कर उन्हें चिंता भी होने लगी है और उन्हें कुछ बनाने की दिल में चाह भी है.

इस तरह की सोच देश के लिए भी अच्छी है और इस्लाम के लिए भी. क्योंकि आगे बढ़ने वाले ही देश के लिए कुछ कर पाते हैं. लेकिन इस का मतलब यह कतई नहीं है कि इस विचार धारा के लोग अपने धर्म को भूलने या नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. रोशनी मिसबाह को ही ले लीजिए. वह बिना हिजाब पहने घर से नहीं निकलती, जिसे इसलाम में महिलाओं के जरूरी माना गया है. न ही वह दूसरी लड़कियों की तरह मौडर्न है.

अरेबिक एंड कल्चरल स्टडीज में एमए कर रही रोशनी मिसबाह अपने बाइकिंग शौक और अपनी रिलीजियस वैल्यू के चलते सोशल मीडिया पर तो चर्चित है ही, युवा लड़कियों के लिए भी प्रेरणा है. उसे हिजाबी बाइकर के नाम से जाना जाता है. वह बाइक राइडर्स ग्रुप जैसे विंड चेजर्स और दिल्ली रौयल एनफील्ड राइडर्स की मेंबर है. रोशनी मिसबाह का यह शौक एक तरह से बचपन में ही शुरू हो गया था.

दरअसल, उस के पिता को भी बाइक का शौक था. जब मिसबाह 9वीं क्लास में थी तो उस के पिता उसे अपनी बुलेट मोटरसाइकिल पर पीछे बैठा कर स्कूल छोड़ने जाया करते थे. तब रोशनी सोचा करती थी कि जिस बाइक पर पीछे बैठने में इतना मजा आता है, उसे चलाने में कितना आनंद आता होगा.

एक दिन उस के पिता उसे अपने दोस्त की पल्सर बाइक पर बैठा कर कहीं ले जा रहे थे तो रोशनी ने थोड़े संकोच से कहा, ‘मैं चलाऊं पापा.’ इस पर उस के पिता ने बिना किसी संकोच या डर के बेटी के हाथ में मोटरसाइकिल का स्टीयरिंग थमा दिया और खुद पीछे बैठ गए. बस, इस के बाद रोशनी बाइक चलाने लगी.

बहरहाल, 22 वर्षीय रोशनी दिल्ली के बाइकरनी ग्रुप की सब से कम उम्र की सदस्या है. यह ग्रुप महिला मोटरसाइकिलस्टों के जरिए लिंग समानता लाने का संदेश देने का प्रयास करता है.

रोशनी गाजियाबाद के बिजनैसमैन की बेटी है. उस का परिवार धार्मिक रूप से रुढि़वादी परिवार है. रोशनी बाइक जरूर चलाती है, लेकिन अपनी धार्मिक मान्यताओं को न केवल पूरी तरह मानती है, बल्कि निर्वाह भी करती है. बाइक की वजह से वह भले ही जींस, जैकेट पहने, हाई हील के लौंग बूट पहने, लेकिन उस के चेहरे के अलावा उस के शरीर का कोई भी अंग बेपरदा नहीं होता. यहां तक कि वह हेलमेट भी हिजाब के ऊपर पहनती है.

रोशनी का मानना है कि अगर आप की सोच आधुनिक नहीं है तो पहनावे से कुछ नहीं होता. आधुनिकता सोच में होनी चाहिए, कपड़ों में नहीं. कुछ लोगों ने हिजाब के ऊपर हेलमेट लगाने को ले कर रोशनी का मजाक उड़ाया तो उस ने कहा कि बाइकिंग उस का जुनून है और हिजाब उस की आस्था और दोनों को ही कोई चैलेंज नहीं कर सकता.

कुछ लोगों ने रोशनी के पिता से बेटी के बाइक चलाने पर विरोध जताते हुए कहा कि रोशनी के लिए यह ठीक नहीं है, उस से कौन शादी करेगा. इस पर उस के पिता ने जवाब दिया कि जब तक वह कोई गलत काम नहीं करती, तब तक वे उसे उस का शौक पूरा करने से नहीं रोकेंगे.

रोशनी की एक खास बात यह भी है कि वह ट्रैफिक का कोई रूल नहीं तोड़ती, बल्कि दूसरों को भी ऐसा करने से रोकती हैं. उन का कहना है कि अगर आप के पास स्पोर्ट्स बाइक है तो यह जरूरी नहीं है कि उसे अनियंत्रित तरीके से ही चलाया जाए. रफ्तार हमेशा नियंत्रण में होनी चाहिए और ट्रैफिक रूल्स को फालो करना चाहिए.

रोशनी मिसबाह ने जब जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया था तभी आनेजाने के लिए पिता से कह कर बजाज एवेंजर 220 खरीदवा ली थी. लेकिन 5 महीने बाद ही उस ने अपनी वह बाइक बेच कर रौयल एनफील्ड खरीद ली, क्योंकि उसे इस की आवाज इंप्रेस करती थी. इस के लिए उस ने अपने फैमिली बिजनैस में भी सहयोग किया और कुछ पार्टटाइम जौब भी किए ताकि सारा बोझ परिवार पर न पड़े.

कुछ महीने रौयल एनफील्ड चलाने से भी जब रोशनी का मन भर गया तो उस ने अपनी इस बाइक को बेच कर होंडा सीबीआर 250 रिप्सोल स्पोर्ट्स बाइक खरीद ली. जामिया मिलिया में लड़कियों सहित अन्य स्टूडेंट भी रोशनी को अपने आदर्श के रूप में देखते हैं.

इतना ही नहीं बल्कि यूनिवर्सिटी के प्रोफैसरों की ओर से रोशनी को पार्किंग में खास स्लौट मुहैया कराया गया है, जो इंडो अरेबिक सेंटर के पास कैंपस में ही है. रोशनी मिसबाह के प्रोफेसर और सेंटर फोर वेस्ट एशियन स्टडीज के डायरेक्टर जावेद खान के अनुसार रोशनी मिसबाह एक गंभीर स्टूडेंट है और उस का पूरा फोकस अपनी पढ़ाई पर रहता है. वह अपने बाइक प्रेम के चलते भी अपनी जड़ों से जुड़ी है.    

बेलगाम ख्वाहिश का अंजाम

हमसफर मनपसंद हो तो गृहस्थी में खुशियों का दायरा बढ़ जाता है. जमाने की नजरों में दीपिका और राजेश भी खुशमिजाज दंपति थे. करीब 8 साल पहले  कालेज के दिनों में दोनों की मुलाकात हुई थी. पहले उन के बीच दोस्ती हुई फिर कब वे एकदूसरे के करीब आ गए, इस का उन्हें पता ही नहीं चला. वे सचमुच खुशनसीब होते हैं जिन्हें प्यार की मंजिल मिल जाती है. प्यार हुआ तो खूबसूरत दीपिका ने राजेश के साथ उम्र भर साथ निभाने की कसमें खाईं. दोनों के लिए जुदाई बरदाश्त से बाहर हुई तो परिवार की रजामंदी से दोनों वैवाहिक बंधन में बंध गए. एक साल बाद दीपिका एक बेटे की मां भी बन गई.

राजेश का परिवार उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के रायपुर थानाक्षेत्र स्थित तपोवन एनक्लेव कालोनी में रहता था. दरअसल राजेश के पिता प्रेम सिंह राणा मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर के गांव सबदलपुर के रहने वाले थे, लेकिन बरसों पहले वह उत्तराखंड आ कर बस गए थे. दरअसल वह देहरादून की आर्डिनेंस फैक्ट्री में नौकरी करते थे. उन के परिवार में पत्नी और राजेश के अलावा 5 बेटियां थीं, जिन में से 2 का विवाह वह कर चुके थे.

सन 2000 में पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने किसी तरह खुद को संभाला और 3 बेटियों के हाथ पीले किए. राजेश और दीपिका एकदूसरे को चाहते थे इसलिए प्रेम सिंह ने सन 2007 में उन के प्यार को रिश्ते में बदल दिया. आजीविका चलाने के लिए राजेश ने घर के बाहर ही किराने की दुकान कर ली थी. दीपिका का मायका भी देहरादून में ही था. प्रेम सिंह व्यवहारिक व्यक्ति थे. इस तरह बेटाबहू के साथ वह खुश थे.

4 मार्च की दोपहर के समय दीपिका काफी परेशान थी. शाम होतेहोते उस की परेशानी और भी बढ़ गई. जब कोई रास्ता नजर नहीं आया तो वह थाना रायपुर पहुंची. उस ने थानाप्रभारी प्रदीप राणा से मुलाकात कर के बताया कि सुबह से उस के पति और ससुर लापता हैं.’’

थानाप्रभारी के पूछने पर दीपिका ने बताया कि आज सुबह वे दोनों अपनी सैंट्रो कार नंबर यूए07एल 6891 से बुलंदशहर जाने की बात कह कर घर से गए थे, लेकिन न तो अभी तक वापस आए और न ही उन का मोबाइल लग रहा है. दीपिका के अनुसार, 65 वर्षीय प्रेम सिंह शहर में रह जरूर रहे थे लेकिन कभीकभी वह बुलंदशहर स्थित गांव जाते रहते थे.

दीपिका से औपचारिक पूछताछ के बाद थानाप्रभारी ने उस के पति और ससुर की गुमशुदगी दर्ज कर ली. थानाप्रभारी ने भी राजेश और उस के पिता के फोन नंबरों पर बात करने की कोशिश की पर दोनों के फोन स्विच्ड औफ ही आ रहे थे.

उसी रात करीब 2 बजे जब देहरादून के दूसरे थाने डोईवाला की पुलिस इलाके में गश्त पर थी तभी पुलिस को देहरादून-हरिद्वार हाईवे पर कुआंवाला के पास सड़क किनारे एक कार खड़ी दिखी. पुलिस वाले कार के नजदीक पहुंचे तो पता चला कि कार के दरवाजे अनलौक्ड थे.

कार की पिछली सीट पर नजर दौड़ाई तो उस में 2 लोगों की लाशें पड़ी थीं जो कंबल और चादर में लिपटी हुई थीं. कंबल और चादर पर खून लगा हुआ था. गश्ती दल ने फोन द्वारा यह सूचना थानाप्रभारी राजेश शाह को दे दी. 2 लाशों के मिलने की खबर सुन कर थानाप्रभारी उसी समय वहां आ गए.

पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू की. दोनों की हत्या बेहद नृशंस तरीके से की गई थी. उन के शवों पर चाकुओं के दरजनों निशान थे. दोनों की गरदन और शरीर के अन्य हिस्सों पर अनेक वार किए गए थे. दोनों के गले में रस्सी कसी हुई थी.

थानाप्रभारी ने दोहरे हत्याकांड की सूचना आला अधिकारियों को दी तो एसएसपी स्वीटी अग्रवाल, एसपी (सिटी) अजय सिंह व एसपी (देहात) श्वेता चौबे मौके पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने जब कार का निरीक्षण किया तो कार पर आग से जले के भी निशान मिले. इस से पता चला कि शवों को कार समेत जलाने की कोशिश की गई थी.

निरीक्षण से यह बात भी साफ हो गई थी कि दोनों की हत्या कार में नहीं की गई थी. हत्या किसी अन्य स्थान पर कर के शव वहां लाए गए थे. सुबह होने पर आसपास के लोगों को कार में लाशें मिलने की जानकारी मिली तो तमाम लोग वहां जमा हो गए. पर कोई भी लाशों की शिनाख्त नहीं कर सका. आखिर पुलिस ने शवों का पंचनामा भर कर उन्हें पोस्टमार्टम हेतु भेज दिया. पुलिस ने कार के बारे में जानकारी की तो वह दीपिका राणा के नाम पर पंजीकृत निकली जो तपोवन कालोनी में रहती थी.

तपोवन कालोनी शहर के ही रायपुर थाने के अंतर्गत आती थी. इसलिए थानाप्रभारी राजेश शाह ने रायपुर थाने से संपर्क किया. वहां से पता चला कि दीपिका ने अपने पति और ससुर के लापता होने की गुमशुदगी दर्ज कराई थी. यह भी बताया था कि वे दोनों कार से ही बुलंदशहर के लिए निकले थे.

कार में 2 लाशें मिलने की सूचना पर थानाप्रभारी प्रदीप राणा को शक हो गया कि कहीं वे लाशें उन्हीं बापबेटों की तो नहीं हैं. उन्होंने खबर भेज कर दीपिका को थाने बुला लिया. थानाप्रभारी प्रदीप राणा दीपिका को पोस्टमार्टम हाउस पर ले गए, जहां लाशें पोस्टमार्टम के लिए भेजी थीं. दीपिका लाशें देखते ही दहाड़ें मार कर रोने लगी. कुछ देर बाद दीपिका के नातेरिश्तेदार भी एकत्र हो गए.

दोनों शवों की शिनाख्त हो गई. दीपिका इस स्थिति में नहीं थी कि उस से उस समय पूछताछ की जाती, लेकिन हलकी पूछताछ में उस ने किसी से भी अपने परिवार की रंजिश होने से इनकार कर दिया. बड़ा सवाल यह था कि जब उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी तो उन की हत्या क्यों और किस ने कर दी.

एसएसपी स्वीटी अग्रवाल ने इस मामले की जांच में एसपी (क्राइम) तृप्ति भट्ट व एसओजी प्रभारी अशोक राठौड़ को भी लगा दिया. पुलिस की संयुक्त टीम हत्याकांड की वजह तलाशने में जुट गई. जहां कार मिली, वहां आसपास के लोगों से पूछताछ करने पर पता चला कि कार वहां पूरे दिन खड़ी रही थी लेकिन किसी ने उस तरफ ध्यान नहीं दिया था. इस से साफ था कि हत्याएं पहले ही की गई थीं और कार सुबह किसी समय वहां छोड़ दी गई थी.

दोहरे हत्याकांड से पूरे शहर में सनसनी फैल चुकी थी. राजेश की बहन गीता की तहरीर के आधार पर पुलिस ने भादंवि की धारा 302, 201, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

पुलिस ने मृतक राजेश व उस की पत्नी दीपिका के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स का अध्ययन किया तो राजेश के मोबाइल की आखिरी लोकेशन 4 मार्च, 2017 की तड़के लाडपुर क्षेत्र में मिली जोकि कुंआवाला के नजदीक था. इस से पुलिस चौंकी, क्योंकि दीपिका ने उन के जाने का समय सुबह करीब 9 बजे बताया था.

काल डिटेल्स से यह स्पष्ट हो गया कि दीपिका ने पुलिस से झूठ बोला था. इस से वह शक के दायरे में आ गई. पुलिस ने दीपिका से पूछताछ की तो वह अपने बयान पर अडिग रही. इतना ही नहीं, उस ने अपने 8 साल के बेटे नोनू को भी आगे कर दिया. उस ने भी पुलिस को बताया कि पापा को जाते समय उस ने बाय किया था.

पुलिस ने नोनू से अकेले में घुमाफिरा कर चौकलेट का लालच दे कर पूछताछ की तब भी वह अपनी बात दोहराता रहा. ऐसा लगता था कि जैसे उसे बयान रटाया गया हो. शक की बिनाह पर पुलिस ने दीपिका के घर की गहराई से जांचपड़ताल की लेकिन वहां भी कोई ऐसा सबूत या असामान्य बात नहीं मिली जिस से यह पता चलता कि हत्याएं वहां की गई हों. लेकिन पुलिस इतना समझ गई थी कि दीपिका शातिर अंदाज वाली महिला थी.

पुलिस ने दीपिका के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स की फिर से जांच की तो उस में एक नंबर ऐसा मिला जिस पर उस की अकसर बातें होती थीं. 3 मार्च की रात व 4 को तड़के साढ़े 5 बजे भी उस ने इसी नंबर पर बात की थी. पुलिस ने उस फोन नंबर की जांच की तो वह योगेश का निकला. योगेश शहर के ही गांधी रोड पर एक रेस्टोरेंट चलाता था.

योगेश के फोन की काल डिटेल्स जांची तो उस की लोकेशन भी उसी स्थान पर पाई गई, जहां शव बरामद हुए थे. माथापच्ची के बाद पुलिस ने कडि़यों को जोड़ लिया. इस बीच पुलिस को यह भी पता चला कि दीपिका और योगेश के बीच प्रेमिल रिश्ते थे जिस को ले कर घर में अकसर झगड़ा होता था.

इतने सबूत मिलने के बाद पुलिस अधिकारियों ने एक बार फिर से पूछताछ की तो वह सवालों के आगे ज्यादा नहीं टिक सकी. वह वारदात की ऐसी षडयंत्रकारी निकली, जिस की किसी को उम्मीद नहीं थी. अपने अवैध प्यार को परवान चढ़ाने और प्रेमी के साथ दुनिया बसाने की ख्वाहिश में उस ने पूरा जाल बुना था. इस के बाद पुलिस ने उस के प्रेमी योगेश को भी गिरफ्तार कर लिया. दोनों से पूछताछ की गई तो चौंकाने वाली कहानी निकल कर सामने आई.

दरअसल, राजेश से शादी के बाद दीपिका की जिंदगी आराम से बीत रही थी. दोनों के बीच प्यार भरे विश्वास का मजबूत रिश्ता था. राजेश सीधासादा युवक था जबकि दीपिका ठीक इस के उलट तेजतर्रार व फैशनपरस्त युवती थी. 2 साल पहले योगेश ने रायपुर स्थित स्पोर्ट्स स्टेडियम में ठेके पर कुछ काम किया था. इस दौरान वह एक गेस्टहाउस में रहा. वह गेस्टहाउस राजेश के घर के ठीक पीछे था.

योगेश मूलरूप से हरियाणा के करनाल शहर का रहने वाला था और देहरादून में छोटेमोटे ठेकेदारी के काम करता था. वह राजेश की दुकान पर भी आता था. इस नाते दोनों के बीच जानपहचान हो गई थी. दीपिका जब भी छत पर कपड़े सुखाने जाती तो योगेश उसे अपलक निहारा करता था. पहली ही नजर में उस ने दीपिका को हासिल करने की ठान ली थी. दीपिका को पाने की चाहत में योगेश ने धीरेधीरे राजेश से दोस्ती गांठ ली. दोस्ती मजबूत होने पर वह उस के घर भी जाने लगा.

इस दौरान उस की मुलाकात दीपिका से भी हुई. कुछ दिनों में ही दीपिका ने योगेश की आंखों में अपने लिए चाहत देख ली. दोनों के बीच दोस्ती हो गई और वे मोबाइल पर बातें करने लगे. राजेश को पता नहीं था कि जिस दोस्त पर वह आंख मूंद कर विश्वास करता है, वह आस्तीन का सांप बन कर उस के घर की इज्जत तारतार करने की शुरुआत कर रहा है.

जब दीपिका योगेश के आकर्षण में बंध गई तो दोनों ने अपने रिश्ते को प्यार का नाम दे दिया. अब दीपिका बहाने से घर से बाहर जाती और योगेश के साथ घूमती. इस बीच योगेश ने तहसील चौक के पास अपना रेस्टोरेंट खोल लिया और खुद गोविंदगढ़ में रहने लगा.

दीपिका पति को धोखा दे कर योगेश के सपने देखने लगी. एक वक्त ऐसा भी आया जब उन के बीच मर्यादा की दीवार गिर गई. इस के बाद तो जब कभी राजेश व प्रेम सिंह बाहर होते तो वह योगेश के साथ अपना समय बिताती. राजेश को पता ही नहीं था कि उस की पत्नी उस से बेवफाई कर के क्या गुल खिला रही है.

अपने नाजायज रिश्ते को प्यार का नाम दे कर योगेश व दीपिका साथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे. दोनों के रिश्ते भला कब तक छिपते. आखिर एक दिन राजेश के सामने यह राज उजागर हो ही गया. उस ने अपने ही घर में दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया.

पत्नी की बेवफाई पर राजेश को गुस्सा आ गया. उस ने दीपिका की पिटाई कर दी और योगेश को भी खरीखोटी सुना कर अपनी पत्नी से दूर रहने की हिदायत दी.

कुछ दिन तो सब ठीक रहा लेकिन बाद में दोनों ने फिर से गुपचुप ढंग से मिलना शुरू कर दिया. पर राजेश से कोई बात छिपी नहीं रही. नतीजतन इन बातों को ले कर घर में आए दिन झगड़ा होने लगा.

दीपिका चाहती थी कि उस पर किसी तरह की बंदिश न हो और वह प्रेमी के साथ खुल कर जिंदगी जिए. वह ढीठ हो चुकी थी. अपनी गलती मानने के बजाए वह पति से बहस करती. राजेश अपना घर बरबाद होते नहीं देखना चाहता था. लिहाजा वह समयसमय पर परिवार और बच्चे का वास्ता दे कर दीपिका को समझाने की कोशिश करता. पर उस के दिमाग में पति की बात नहीं धंसती बल्कि एक दिन तो बेशरमी दिखाते हुए उस ने पति से कह दिया, ‘‘मेरे पास एक रास्ता है कि तुम मुझे तलाक दे कर आजाद कर दो. फिर तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होगी.’’

राजेश को पत्नी से ऐसी उम्मीद नहीं थी. वह सारी हदों को लांघ गई थी. उस की बात सुन कर उसे गुस्सा आ गया तो उस ने दीपिका की पिटाई कर दी. दीपिका राह से इतना भटक चुकी थी कि वह राजेश को भूल कर योगेश से जुनून की हद तक प्यार करती थी. कई दौर ऐसे आए जब उस ने योगेश को नकद रुपए भी दिए. यह रकम ढाई लाख तक पहुंच चुकी थी.

राजेश मानसिक तनाव से गुजर रहा था. वह इस कदर परेशान हो गया कि उस ने तलाक की बात मान लेने में ही भलाई समझी. दोनों तैयार हुए, लेकिन बेटे को ले कर बात अटक गई. राजेश बेटे को अपने साथ रखना चाहता था जबकि दीपिका उसे देने को भी तैयार नहीं थी. कभीकभी राजेश गुस्से में उस की पिटाई भी कर देता था.

अपनी पिटाई की बात दीपिका जब योगेश को बताती तो योगेश गुस्से में तिलमिला कर रह जाता था. उसे यह कतई पसंद नहीं था कि राजेश उस की प्रेमिका पर हाथ उठाए. रिश्तों की कड़वाहट इस हद तक बढ़ गई कि दीपिका अपने बेटे के साथ बैडरूम में सोती थी, जबकि राजेश ड्राइंगरूम में सोता था.

दीपिका अपना आचरण बदलने को तैयार नहीं थी और राजेश उस की शर्तों पर तलाक नहीं देना चहता था. रिश्तों में नफरत भर चुकी थी. दीपिका तो विवेकहीन हो चुकी थी. वह अब हर सूरत में हमेशा के लिए योगेश की होना चाहती थी. योगेश भी इन बातों से परेशान हो गया था.

राजेश के रहते यह संभव नहीं था इसलिए दोनों ने राजेश को रास्ते से हटाने का खतरनाक फैसला कर लिया. यह काम राजेश के अकेले के वश का नहीं था. उस के रेस्टोरेंट पर पप्पू व डब्बू नामक 2 युवक अकसर आते रहते थे. वे दोनों दबंग प्रवृत्ति के थे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे. उन के बारे में वह ज्यादा नहीं जानता था. उसे वे काम के मोहरे नजर आए. योजना के अनुसार योगेश ने बहुत जल्द उन से दोस्ताना रिश्ते बना लिए. एक दिन बातोंबातों में योगेश ने कहा, ‘‘तुम दोनों को लखपति बनाने का एक प्लान है मेरे पास.’’

‘‘क्या?’’ पप्पू ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘मेरे लिए तुम्हें एक काम करना होगा जिस के बदले में तुम्हें 5 लाख रुपए मिलेंगे.’’ कहने के साथ ही योगेश ने उन्हें अपने मन की बात बता दी.

पैसों के लालच में दोनों हत्या में उस का साथ देने को तैयार हो गए. अगले दिन उस ने दीपिका से बात की और उस से 50 हजार रुपए ले कर बतौर पेशगी दोनों को दे दिए. इस के बाद दीपिका व योगेश उचित मौके की तलाश में रहने लगे.

उन्होंने 3 मार्च, 2017 की रात हत्या करना तय कर लिया. उस रात प्रेम सिंह अपने कमरे में और राजेश ड्राइंगरूम में नींद के आगोश में थे. लेकिन दीपिका की आंखों से नींद कोसों दूर थी. योगेश ने दीपिका को फोन किया तो उस ने अपने घर का पिछला दरवाजा खोल दिया. फिर रात तकरीबन 12 बजे के बाद घर के पिछले दरवाजे से पप्पू व डब्बू के साथ योगेश घर में दाखिल हुआ. दीपिका तीनों को ड्राइंगरूम तक ले गई. वे अपने साथ गला दबाने के लिए रस्सी भी लाए थे. राजेश उस वक्त गहरी नींद में था.

पप्पू व डब्बू राजेश के गले में रस्सी डाल रहे थे कि उस की आंख खुल गई. मौत का अहसास होते ही वह बचाव के लिए उन से उलझ गया. लेकिन उन सभी ने उसे दबोच लिया. इस बीच दीपिका ने रसोई में से 2 चाकू ला कर उन्हें दे दिए. उन्होंने पहले रस्सी से उस का गला दबाया इस के बाद चाकुओं से ताबड़तोड़ वार किए. दीपिका ने उस के पैर पकड़ लिए थे. योगेश के मन में राजेश के प्रति इसलिए नफरत थी क्योंकि वह दीपिका को पीटता था इसलिए उस ने उस के शरीर पर सब से ज्यादा वार किए.

इस बीच आवाज सुन कर दूसरे कमरे में सो रहे राजेश के पिता प्रेम सिंह वहां आ गए. अपनी आंखों से मौत का नजारा देख कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. प्रेम सिंह को देख कर सभी के चेहरों पर हवाइयां उड़ गईं. उन का इरादा प्रेम सिंह की हत्या का नहीं था. चूंकि उन्होंने राजेश की हत्या करते देख लिया था, इसलिए उन की भी हत्या का फैसला कर लिया.

उन्होंने मिल कर प्रेम सिंह को दबोच लिया और चाकुओं से ताबड़तोड़ प्रहार कर के उन की भी हत्या कर दी. पति व ससुर की सांसों की डोर टूटने से दीपिका खुश हुई. इस के बाद पप्पू व डब्बू वहां से चले गए. फिर दीपिका व योगेश ने मिल कर खून साफ किया और दोनों लाशों को चादर व कंबल में बांध कर कार में रख दिया. योगेश ने चाकू और राजेश का मोबाइल भी रख लिया.

तड़के वह कार ले कर वहां से चला गया. रास्ते में लाडपुर के जंगल में उस ने सारा सामान फेंक दिया. इस से पहले उस ने मोबाइल स्विच्ड औफ कर दिया था. कार उस ने कुंआवाला में सड़क किनारे छोड़ दी. उस ने कपड़े से कार में आग लगाने की कोशिश भी की थी. लेकिन कामयाब नहीं हो सका और इस प्रयास में वह खुद भी जल गया था. इस के बाद उस ने फोन कर के दीपिका को लाशों को ठिकाने लगाने की जानकारी दे दी और अपने घर चला गया.

योजना के अनुसार दीपिका ने अपने मासूम बेटे को अच्छे से रटवा दिया था कि कोई भी पूछे तो बताना है कि उस ने पापा को जाते हुए बाय किया था. शाम ढले दीपिका ने पति व ससुर के बुलंदशहर जाने की झूठी कहानी गढ़ कर उन की गुमशुदगी दर्ज करा दी. अपने घर को भी उस ने पूरी तरह दुरुस्त कर दिया था. यह काम इतनी सफाई से किया था कि घर की तलाशी लेने पर पुलिस भी वहां से कोई सबूत नहीं जुटा पाई.

योगेश की निशानदेही पर पुलिस ने खून से सने चाकू और सोफा के कवर बरामद कर लिए. विस्तृत पूछताछ के बाद अगले दिन यानी 6 मार्च, 2017 को पुलिस ने दोनों आरोपियों को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रैट (द्वितीय) विनोद कुमार की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानत नहीं हो सकी थी.

दीपिका ने बेलगाम ख्वाहिश के चलते प्रेमी के साथ अलग दुनिया बसाने का ख्वाब पूरा करने के लिए जो रास्ता चुना, वह सरासर गलत था. उस ने अपनी ख्वाहिशों को काबू रखा होता और विवेक से काम लिया होता तो एक हंसताखेलता परिवार बरबादी के कगार पर कभी नहीं पहुंचता.       

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

दिन दहाड़े

मैं और मेरे पति अपने बच्चों के साथ इंदौर से अकलेश्वर ट्रेन द्वारा आ रहे थे. बीच में एक स्टेशन पर एक 50 वर्षीय बुजुर्ग, पायजामाकुरता पहने हुए और पेट पर 6 इंच चौड़ा कपड़ा बंधे हुए, अपनी पत्नीबच्चे के साथ डब्बे में आए. उन की पत्नी ने कहा, ‘‘औपरेशन करवाना है, सहायता कीजिए.’’

मेरे पति ने 100 रुपए दिए. सभी यात्री सहायता राशि दे रहे थे. वे आगे दूसरे कोच में चले गए.

सीट के सामने एक बुजुर्ग दंपती बैठे सब देख रहे थे. तभी उन्होंने कहा, ‘‘भाईसाहब, मैं 2 साल से इसी हालत में इन को देख रहा हूं सहायता मांगते हुए. पता नहीं इन का औपरेशन कब होगा. ये दिनदहाड़े आप जैसों को ठगते रहते हैं.’’       

कमला चौहान

*

मेरे पिताजी दिल्ली में डीटीसी बस में दिलशाद गार्डन से लापजत नगर जा रहे थे. वे सब से आगे ड्राइवर के ठीक पीछे वाली सीट पर बैठे हुए थे. चूंकि डीटीसी बसों में कंडक्टर सब से पीछे रहता है, सो उन्होंने एक लड़के को 100 रुपए का नोट दे कर कहा, ‘‘बेटा, एक 15 रुपए का टिकट मेरे लिए ले आना.’’

वह लड़का 100 रुपए का नोट ले कर पीछे कंडक्टर के पास गया और जैसे ही बस की रफ्तार कम हुई, बड़े आराम से नीचे उतर गया.

पिताजी के साथसाथ सभी यात्री इस दिनदहाड़े लूट की हरकत देख आश्चर्यचकित रह गए.  

राकेश घनशाला

*

मैं अपने पति के साथ ट्रेन में सफर कर रही थी. डब्बे में भीड़ थी. दिन का समय होने के कारण एकएक बर्थ पर सामर्थ्य से अधिक लोग बैठे थे. कुछ लोग खड़े थे और कुछ आजा भी रहे थे.

मैं साइड की बर्थ पर बैठी थी. तभी एक नौजवान मेरे सामने आ कर खड़ा हो गया. उस के रंगढंग से मुझे यह आभास हुआ कि वह यात्री नहीं है और न ही कुछ बेच रहा है.

मैं ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा तो मेरी निगाह उस के पैरों पर पड़ी वह नंगेपांव था और उस की निगाह मेरे पति की चप्पलों पर थी जो उस के पैरों के पास ही पड़ी थीं. मैं सतर्क हो गई. उस ने मेरी सतर्कता भांप ली, इसलिए चुपचाप आगे बढ़ गया.

थोड़ी देर बाद ही आगे से आवाज आई, ‘‘पकड़ोपकड़ो. देखो, वह मेरी चप्पल पहन कर भाग रहा है.’’ जब तक लोग कुछ समझते तब तक वह ट्रेन से कूद गया और तभी ट्रेन भी प्लेटफौर्म से सरकने लगी. 

रेणुका श्रीवास्तव

वक्त फिसलता रहा

खिरमने बाजार में भी

तेरी आहटों का धोखा रहा

कुछ इस अदा से

दाएंबाएं गुजर गए.

तमन्ना थी ख्वाबतराशी की

पर नूर ताबीर पर पड़ गए

ताबीर थी ख्वाबों की

गुलों को गुलनार कर गए.

इस कदर शीराजा हर्फ

बिखरबिखर से गए

मानो साल गुजरे नहीं

फिसलफिसल से गए.

– पम्मी सिंह

इस की टोपी उस के सिर

अपनी सासूजी और पत्नीजी के साथ सुबह का नाश्ता कर रहे थे. सासूजी अर्थशास्त्री चाणक्य की चर्चा कर रही थीं कि हमारे एक मित्र मनोजजी मुंह लटकाए आते दिखलाई दिए. सासूजी ने उस का पिचका, उतरा चेहरा देखा तो आश्चर्य हुआ क्योंकि हमेशा हंसनेबोलने वाला मनोज का चेहरा ऐसा कैसे हो रहा था.

पत्नीजी ने उस से नाश्ता करने को कहा तो उस ने थोड़ी नानुकुर करने के बाद सपाटे से फकाफक खाना शुरू कर दिया. लगा, मानो महीनेभर से वह भूखा हो. खा लेने के बाद उस के चेहरे पर थोड़ी राहत दिखाई दी. उस ने मुंह पोंछते हुए कहा, ‘‘इन दिनों बहुत मंदी का दौर चल रहा है.’’

‘‘किस का?’’ पत्नीजी ने प्रश्न किया.

‘‘देश का भी और मेरा भी,’’ उस ने कहा.

सासूजी ने एक कटीली, जहरीली मुसकान बिखेरते हुए कहा, ‘‘जब तक मूर्ख जिंदा है, बुद्धिमान भूखे नहीं मर सकते.’’

‘‘क्या मतलब मम्मीजी?’’ मनोज ने आश्चर्य से प्रश्न किया.

‘‘मैं कह रही थी अगर आप के पास बुद्धि है तो केवल आप ही क्या, आप का पूरा परिवार भी भूखा नहीं मर सकता है,’’ सासूजी ने रहस्यमय ढंग से अपनी बात कही.

‘‘वह कैसे मम्मीजी?’’

‘‘अरे बेटा, इस देश में आप फटे कपड़े पहने हो और तिलक लगा लो तो भूखे नहीं मर सकते. यहां पत्थर को एक रुपए का सिंदूर पोत कर भगवान बनाया जा सकता है. ऐसे में दक्षिणा से पूरा परिवार बिना काम के पेट भर सकता है और तुम कह रहे हो कि मंदी का दौर चल रहा है?’’

‘‘आप ने कहा तो बिलकुल सच है लेकिन मैं इस मंदी से कैसे उबरूं?’’ मनोज का दीनहीन स्वर गूंजा.

पत्नीजी ने भी मोरचा संभाला, कहा, ‘‘देवरजी, मम्मी सच कह रही हैं. आप फुटपाथ पर तोता ले कर या हाथ से लिखा साइनबोर्ड लगा कर हस्तरेखा देखने का काम करने लगो तो मूर्खों की भीड़ लग जाएगी, क्योंकि सब से अधिक समाज में गरीब लोग ही मूर्ख बनते हैं.’’

‘‘तो क्या हाथ देखने लग जाऊं?’’

‘‘देवरजी, मैं बिलकुल नहीं कह रही हूं कि आप यह करें, लेकिन मंदी से उबरने का एक उपाय यह भी है. 10 बातें बताएंगे तो 3 तो सच निकलेंगी ही. यह जनता, जो सच निकला उस की अफवाह अधिक फैलाती है. और बस, आप फेमस हो जाएंगे,’’ पत्नीजी ने अपने ज्ञान का बखान किया तो मनोज बहुत खुश हो गया. हम ने रायता फैलाते हुए कहा, ‘‘दोस्त मनोज, कभी एक भी बात सच नहीं निकली तो बहुत जूते पड़ेंगे.’’ मनोज ने सुना, तो घबरा गया. पत्नीजी कहां हार मानने वाली थीं, उन्होंने तर्क दिया, ‘‘क्या आप जानते हैं कि हम एक रात में 3 से 5 हजार सपने देखते हैं, यानी एक माह में 9 लाख सपने. लेकिन कोई एक गलती से सच हो जाता है तो हम उसे ही आधार बना कर कहते हैं कि सपने सच होते हैं जबकि प्रतिशत निकाला जाए तो वह .0001 प्रतिशत सच भी नहीं होता और हम इस कम प्रतिशत का ही बखान करते रहते हैं. ठीक उसी तरह हम लोग, जो एक भविष्यवाणी सच होगी, उस का गुणगान करते रहेंगे.’’

‘‘अरे, हमें तो यह सपनों वाली बात मालूम ही नहीं थी. यदि ऐसा है तो हस्तरेखा देख कर भविष्य बताने वाली बात उत्तम और उचित है,’’ हम ने भी उस का पक्ष लिया.

सासूजी ने कहा, ‘‘मनोज पढ़ालिखा है, वह यदि फुटपाथ पर बैठ कर भविष्यवाणी करेगा तो यह क्या अच्छा लगेगा? हमें कुछ और उपाय सोचना चाहिए. यह कह कर सासूजी चिंतन की मुद्रा में आ गईं. पूरे कमरे में अजीब सी गंभीरता छा गई. थोड़ी देर बाद सासूजी ने कहा, ‘‘मनोज, तुम्हारे पास कितने रुपए हैं व्यापार करने को?’’

‘‘मम्मीजी, नाश्ते को मैं मुहताज हूं, रुपए कहां से लाऊंगा?’’

‘‘ठीक है, हम तुम्हें 1 हजार रुपए व्यापार के लिए कर्ज में देंगे,’’ सासूजी ने कहा तो मैं जोरों से हंस दिया. मैं ने कहा, ‘‘हजार रुपए में जहर नहीं आता, व्यापार कहां से शुरू होगा?’’

‘‘दामादजी, यह सब दिमाग का खेल है.’’

‘‘कैसे?’’ हम ने प्रश्न किया.

‘देखो मनोज, कुछ पैंफ्लेट छपवाने होंगे, एक बोर्ड लगाना होगा और एक कंपनी का नाम खोजना होगा.’’

‘‘जी,’’ मनोज ने आज्ञाकारी बच्चे की तरह हुंकार भरी.

 ‘‘तुम 1 रुपए के 10 रुपए एक महीने में दोगे, इस का विज्ञापन करना होगा,’’ सासूजी ने बताया.

‘‘मतलब, मम्मीजी?’’

‘‘तुम 4-5 युवा लड़कों को काम पर रख लो और रसीदें छपवा लो. एक कंपनी का बोर्ड अपने किराए के मकान पर लगा दो और एक टेबल व कुरसी लगा कर कार्यालय खोल लो- मनोज ऐंड कंपनी.’’

‘‘लेकिन किस की कंपनी?’’

‘‘यदि आप 1 रुपए एक माह के लिए देंगे तो हम अगले माह 10 रुपए देंगे और 10 रुपए जमा करेंगे तो 100 रुपए देंगे,’’ सासूजी ने बोलना जारी रखा हुआ था लेकिन मनोज ने बात काट कर कहा, ‘‘और 1 हजार रुपए जमा किया तो पूरे 10 हजार रुपए देंगे.’’

‘‘शटअप, मरना है क्या?’’ नाराजगी से सासूजी ने कहा.

‘‘क्या मतलब, मम्मीजी?’’

‘‘अरे पगले, जो भी हजार रुपए ले कर आए उसे समझाओ कि आप अभी इतना रुपया इन्वैस्ट मत करो, क्योंकि कंपनी नई है, कहीं भाग गई तो? आप 1 रुपया, 10 रुपया ही लगाओ. सामने वाला व्यक्ति आप की ऐसी ईमानदारी की बातें सुन कर खुश हो जाएगा. वह कम ही लगाएगा. बस, हो गया काम.’’ सासूजी ने ताली बजा कर कहा.

‘‘क्या मतलब?’’ हम तीनों की एक जैसी आवाज बाहर निकली.

‘‘अरे बेटी, सिंपल, 1 रुपए और 10 रुपए वाले को 1 महीने बाद जो हम 1 हजार रुपए दे रहे हैं उस में से पेमैंट कर देना. बस, विश्वास जम जाएगा, जो अभी हमारी बिटिया ने कहा कि नौ लाख सपनों में से एक सच होने पर लोग उस का ही विज्ञापन करते हैं, बस, यह 10-20 जमाकर्ता दूरदूर आप का प्रचार करेंगे और अगले माह हजारों ग्राहक आ जाएंगे.’’

‘‘फिर?’’

‘‘अपनी साख 3-4 माह में जमा लो और इस की टोपी, उस के सिर पर रखो और सब का भुगतान करते रहना.’’

‘‘लेकिन अंत में क्या होगा?’’

‘‘अंत में क्या होगा,’’ कुछ देर ठहर कर सासूजी ने कहा, ‘‘3 माह बाद तुम्हारे पास मूर्ख लोग 1 लाख से ले कर 10 लाख रुपए ले कर आएंगे. और 1 करोड़ रुपए होने पर तुम…’’ सासूजी ने बात अधूरी छोड़ दी.

‘‘वाह मम्मीजी, यह आइडिया तो बहुत ही बढि़या है,’’ मनोज ने खुश हो कर कहा.

कमरे में अजीब सी खुशी व्याप्त हो गई थी. परिणामस्वरूप मनोज पूरी तैयारी कर चुका था कंपनी खोलने की. सासूजी उठीं, एक हजार रुपए उसे दिए और गंभीर स्वर में कहा, ‘‘बेटा मनोज, इस तरह का लालच गरीबों को दिया जाता है. और वे बेचारे फंस जाते हैं. इस तरह का लालच मंदी के दौर में तुम जैसे ऐसे विज्ञापन देख कर पत्नी के गहने बेच कर रुपया लगा देते हैं और वह कंपनी भाग जाती है  बेटा, तुम ऐसे पचड़े में मत पड़ना. मैं ने तो तुम्हें साजिश से अवगत कराया है. ये हजार रुपए मैं ने तुम्हें नौकरी खोजने के लिए दिए हैं. दामाद ही मेरा बेटा नहीं है, बल्कि तुम भी मेरे बेटे जैसे हो. कभी भी गलत रास्ते पर मत जाना.’’ यह कह कर सासूजी ने स्नेह से मनोज के सिर पर हाथ फेरा. सासूजी का चेहरा अचानक सास की जगह ममतामयी मां जैसा हो गया था.

फोन पर अनचाहे ऐड से हैं परेशान तो..

आप अपने स्मार्टफोन पर न्यूज पढ़ने किसी न्यूज वेबसाइट पर जाएं या फेसबुक, ट्विटर और लिंक्डइन जैसी किसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर या फिर गेम्स डाउनलोड करने की सुविधा देने वाली मोबाइल वेबसाइट्स पर, आप हर जगह खुद को विज्ञापनों से घिरा पाएंगे. अगर आप एंड्रॉएड स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं, तो आपको हैरानी होगी कि आपकी ऑनलाइन सर्च करने की आदतों के हिसाब से ही गूगल आपको मोबाइल पर विज्ञापन दिखाता है.

कुकीज की वजह से दिखते हैं अनचाहे विज्ञापन

दरअसल होता यह है कि अगर आप एक एड पर क्लिक कर दें, तो आप उस एड के वेबपेज पर पहुंच जाते हैं और आपके डिवाइस के ब्राउजर पर एड देने वाली कंपनी के कुकीज आ जाते हैं. इसके बाद आप गूगल पर सर्च करके जो भी मोबाइल साइट्स खोलते हैं, वहां आपको पहले खोला गया विज्ञापन नजर आ जाता है.

अनचाहे विज्ञापनों से बचना है संभव?

ऐसे विज्ञापन जहां आपको आपकी जरूरत के प्रॉडक्ट्स और सर्विसेजज के बारे में बताते हैं, वहीं हर क्लिक पर एक नया एड आ जाने से आपकी सर्चिंग में बाधा भी पैदा करते हैं. लेकिन क्या स्मार्टफोन में मोबाइल साइट्स पर आने वाले विज्ञापनों से बचना संभव है? जी हां, यह संभव है. हम आपको बताते हैं कि ऐसा आप कैसे कर सकते हैं.

तीन स्टेप्स में बचें अनचाहे विज्ञापनों से

अपने एंड्राइड स्मार्टफोन में गूगल सेटिंग्स पर जाएं और एड्स पर क्लिक कर दें. अब ‘ऑप्ट आउट ऑफ इंटरेस्ट बेस्ड एड्स’  की सेटिंग्स बदल दें. इसके बाद आपको अपने एंड्रॉइड स्मार्टफोन पर विज्ञापन नहीं दिखाई देंगे.

गूगल साइट्स में साइन्ड-इन होने पर इंटरेस्ट पर आधारित विज्ञापनों को कैसे बंद करें.

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गूगल के अलावा अन्य वेबसाइट्स पर सर्च के दौरान आने वाले विज्ञापनों को कैसे करें बंद.

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आईपीएल 10 फिक्सिंग : पिच पर तेजाब डलवाना चाहता था सट्टा किंग

इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के 10वें सीजन में फिक्सिंग के आरोप में गिरफ्तार किए गए महाराष्ट्र के अंडर-19 खिलाड़ी नयन शाह से पूछताछ के दौरान कई अहम खुलासे हुए हैं. इस मामले में सट्टा किंग बंटी खंडेलवाल का नाम प्रमुखता से सामने आया है, जो इसका मास्टर माइंड बताया जा रहा है.

ग्रीन पार्क स्टेडियम में होने वाले मैच के दौरान बंटी पीच पर तेजाब डलवाना चाहता था. यह बात एक ऑडियो क्लिप में सामने आई है. कानपुर पुलिस के पास मौजूद इस ऑडियो में बंटी आईपीएल खिलाड़ी नयन से फोन पर कहता है, 'तू चाहे पिच में तेजाब जलवा, तुम्हारी वजह से बहुत लॉस हुआ है.'

बंटी खंडेलवाल नयन शाह का हैंडलर था. उसने इसे स्वीकार किया है कि मैच फिक्सिंग के लिए आईपीएल के दो खिलाड़ी तैयार हो गए थे. यूपी एटीएस इस मामले में तेजी से जांच कर रही है. इसके तहत यूपी, दिल्ली, राजस्थान, महाराष्ट्र सहित कई जगहों पर छापेमारी की गई है.

पिच से करवाता था छेड़छाड़

यूपी पुलिस ने इस मामले की जांच के लिए आठ टीम बनाई हैं, जो गुजरात के सूरत और महाराष्ट्र के मुंबई शहर में छापेमारी कर रही हैं. आने वाले दिनों में दो अन्य खिलाड़ियों से भी पूछताछ की जा सकती है. नयन शाह ने कबूल किया है कि उसके सट्टेबाजों से रिश्ते रहे हैं. वह मैच के नतीजों को प्रभावित करने के लिए पिच से छेड़छाड़ करवाता था. उसने पुलिस को बताया कि सभी मैचों के लिए उसने बड़े सट्टेबाजों से कॉन्ट्रैक्ट लिया था.

इस जीत ने सबको चौंकाया

आपको बता दें कि 10 मई को कानपुर के ग्रीन पार्क मैदान पर गुजरात और दिल्ली के बीच मैच हुआ. हाई स्कोरिंग मैच में गुजरात ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 195 रन बनाए थे लेकिन दिल्ली ने 20वें ओवर में ये लक्ष्य हासिल कर सबको चौंका दिया था.

दो और आरोपी गिरफ्तार

इसी मैच में फिक्सिंग के आरोप में पुलिस ने अंडर 19 टीम का हिस्सा रह चुके नयन शाह के साथ दो और सटोरियों को गिरफ्तार किया है. इस पूरे मामले में अब तक किसी खिलाड़ी के खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं, लेकिन कानपुर से जिन तीन आरोपियों को पकड़ा गया. उनसे जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो किसी हाई प्रोफाइल रैकेट की ओर संकेत करती हैं.

एक आरोपी नयन शाह अंडर 19 टीम का खिलाड़ी रह चुका है. दूसरा आरोपी रमेश ग्रीन पार्क स्टेडियम में होर्डिंग लगाने का काम करता था और पिच की रिपोर्ट देता था. तीसरा आरोपी विकास चौहान एक लोकल सट्टेबाज है.

तीनों ही आरोपी को कानपुर से उस लैंडमार्क होटल से पकड़ा गया जहां आईपीएल टीम के खिलाड़ी ठहरे थे. आरोपी नयन शाह की मोबाइल क्लिंपिंग मिली जिसमें वो गुजरात टीम के दो खिलाड़ियों संपर्क में होने का जिक्र कर रहा है.

एच1बी वीजा : जी का जंजाल

अमेरिका फर्स्ट की आड़ में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शासकीय आदेश से एच 1 बी वीजा पर दूसरे देशों से आए आईटी पेशेवरों की नींद उड़ी हुई है. फिलहाल कोई स्वदेश लौटने को तैयार नहीं है. भारत में आईटी पेशेवरों को बतौर वेतन उतने पैसे भले ही मिल जाएं, पर जो तकनीकी और कामकाज के अवसर अमेरिका में हैं, वे भारत में उपलब्ध नहीं हैं. ट्रंप के सत्तानशीं होने के बाद अमेरिका में स्किल्ड पेशेवरों की मांग और आपूर्ति को ले कर अमेरिकी मीडिया में एच 1 बी पर खासी बहस हो रही है.

अब जबकि ट्रंप ने फैडरल एजेंसीज को जारी आदेश में अस्थायी वीजा के रूप में एच 1 बी क्रियाप्रणाली को और कड़ा बनाए जाने को कहा है, तो इस की गाज एच 1 बी वीजा पर आने वाले भारतीयों पर भी पड़ेगी, जिन की संख्या अन्य देशों की तुलना में करीब आधे से अधिक होती है. चुनावी वादे को पूरा करने के लिए प्रतिबद्घ ट्रंप ने ‘बाई अमेरिकन, हायर अमेरिकन’ नाम से आदेश में कहा है कि अस्थायी वीजा प्रणाली को इस तरह संशोधित किया जाए कि उस से अमेरिकी प्रोडक्ट की बिक्री बढ़ने में मदद मिले.

भारतीयों को तरजीह

यह एक कड़वा सत्य है कि अमेरिका में एक भारतीय दो अमेरिकियों के बराबर काम करता है. अमेरिकी कौर्पोरेट और मिडकैप स्टार्टअप्स कंपनियां भी अपेक्षाकृत सस्ते श्रम के लिए भारतीयों को तरजीह देती हैं. इस से एच 1 बी पेशेवरों की मांग बढ़ रही है. व्हाइट हाउस के इस आदेश के बावजूद कौर्पोरेट के वाल स्ट्रीट लौबिस्ट एच 1 बी की पैरवी में लगे हैं. फिलहाल असमंजस की स्थिति है. इस मसले पर 2 भारतीय आईटी पेशेवरों से दोटूक सवालजवाब हुए. एक दशक पहले, एच 1 बी वीजा पर अमेरिका आए हरिओम कहते हैं, ‘‘आईआईटी दिल्ली से कंप्यूटर साइंस में एमटैक किया था. माइक्रोसौफ्ट कंपनी में काम मिल गया. आज फ्रेमौंट, सिलिकौन वैली में 2 बैडरूम, लिविंग रूम, 2 बाथरूम और गैराज तथा एक छोटा सा लौन है. यहां मेरा अपना परिवार है, बच्चे हैं. फ्रेमौंट उपनगर एक मिनी इंडिया की तरह है. ग्रोसरी के लिए एकदो नहीं, बल्कि कई इंडियन स्टोर आसपास ही हैं. इस उपनगर में 10-12 मील दूरी पर एक अन्य उपनगर मिल्पीटिस में भारतीय सामुदायिक और कल्चरल केंद्र में किसी न किसी हिंदू फैस्टिवल पर महिलाएं और पुरुष परंपरागत परिधान में देखने को, बतियाने को मिल जाते हैं.

‘‘घर के पास एक बड़ा सा सैंट्रल पार्क और अच्छाखासा पब्लिक प्राइमरी हाई स्कूल भी है, जहां निशुल्क शिक्षा का सरकारी बंदोबस्त है. ये सरकारी स्कूल भारत के किसी भी बड़े पब्लिक स्कूल से कम नहीं हैं. इन में ऐडमिशन औनलाइन मिलता है. बस, स्कूल मेल पर घर का पता लिखें और ऐडमिशन पक्का.

‘‘पहले तो मेरे मातापिता हर साल गरमी में बी 2 वीजा पर 6 महीनों के लिए आते थे. अब दिल्ली में अपना मकान बेच कर यहां घर खरीदा है. सिर पर बैंक का ऋण भी है. मेरे मातापिता भी ग्रीनकार्ड के साथ यहां सपरिवार रहने लगे हैं. बच्चों को दादादादी का साथ मिल गया है, तो हम दोनों पतिपत्नी मिलजुल कर नौकरी करने लगे हैं.

‘‘आज सैन फ्रैंसिस्को जैसे महानगर में घरखर्च और बचत एक के रोजगार से मुमकिन नहीं है. पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पिछले साल स्पाउस के लिए एच 4 वीजा पर नौकरी करने की इजाजत दी थी. मेरे लिए यह स्वर्णिम अवसर था. एच 1 बी की अवधि पूरी होने के बाद मुझे अमेरिकी नागरिकता और मेरी पत्नी को ग्रीनकार्ड के साथ सोशल सिक्योरिटी नंबर मिल गया. इस से वह भी नौकरी के लिए योग्य हो गई. अब हम घर में, 1 नहीं, 2 कमाने वाले लोग हैं. खुश हैं और बचत भी हो रही है.’’ साल 2016 में एच 4 वीजा के लिए 1 लाख 31 हजार 51 आवेदन स्वीकार किए गए थे, जबकि साल 2012 में 80 हजार 15 स्पाउस को एच 4 वीजा दिए गए. ऐसे 5 लाख 91 हजार 398 भारतीय आईटी पेशेवर हैं. इन में से एच 4 में कितनों को वर्कपरमिट जारी हुए, कहना मुश्किल है.

डिपार्टमैंट औफ जस्टिस (डीओएस) के अनुसार, एच 4 वीजाधारक वर्कपरमिट के लिए आवेदन तो कर सकते हैं लेकिन नियमों में बदलाव होता है तो सभी आवेदकों को वर्कपरमिट और नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है. अभी डीएचए ने फरवरी में एच 4 वीजाधारकों पर 60 दिनों के लिए वर्कपरमिट पर रोक लगाई थी जिसे अब डीओजे ने 120 दिनों के लिए और बढ़ा दिया है. इस पर एडवोकेसी गु्रप इमीग्रेशन ने एच 4 के लिए बीचबचाव की कोशिश तो की पर कोई टिप्पणी नहीं की. इस बीच, सेव जौब्स यूएसओ ने कहा कि संभव है कि आदेश की कार्यवाही आगे भी बढ़े.

यह निसंदेह उन लोगों के लिए खतरे की घंटी है जो एच 1 बी और एच 1 वीजा पर निर्धारित 3-3 साल की अवधि पूरी करने के बावजूद वर्कपरमिट पर हैं और विवाहित हैं. ट्रंप ने एच 1 बी पर आने वाले नए आईटी पेशेवरों के लिए अड़चन पैदा कर दी है. अब कोई अमेरिकी कंपनी कंप्यूटर की सामान्य व्यावहारिक जानकारी रखने वाले को रोजगार नहीं दे सकेगी. इस के लिए कंप्यूटर प्रोग्रामर को एच 1 बी रोजगार नहीं मिल सकेगा. 36 वर्षीय हरिओम कहते हैं कि उन की तरह ऐसे कितने ही भारतीय और अन्य देशों से आए युवकयुवतियां हैं, जो वैधानिक तौरतरीकों से बेहतर भविष्य के लिए अमेरिका आए हैं. साल 2007 तक एच 1 बी वीजा के लिए मारामारी नहीं थी. एच 1 बी वीजा के लिए निर्धारित 65 हजार का कोटा पूरा ही नहीं होता था. माइक्रोसौफ्ट, गूगल, याहू, डिजनी वर्ल्ड तथा वैरीजान आदि टैक कंपनियों में सहज नौकरी मिल जाती थी. इसलिए आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, चेन्नई, महाराष्ट्र, दिल्ली, पंजाब और हरियाणा आदि से आईटी और आईबीएम स्नातक पेशेवर अमेरिका आते रहे.

बदलते आयाम

अब पिछले कुछ सालों से सोशल मीडिया का प्रचलन बढ़ा है, फेसबुक ने आयाम बदल दिए हैं. नएनए स्टार्टअप्स सामने आने लगे हैं, वैंचर कैपिटलिस्टों ने इन स्टार्टअप्स में निवेश कर जोखिम उठाना शुरू किया है. अमेरिका में स्किल्ड पेशेवरों की मांग और आपूर्ति भी कई गुणा बढ़ी है. एच 1 बी और एच 1 वीजा की शुरुआत 1990 से अमेरिकी इमीग्रेशन ऐक्ट के तहत हुई थी. तब अमेरिकी कंपनियों को देश के आर्थिक विकास के लिए कंप्यूटर साइंस और अकाउंट्स में ही नहीं, शिक्षा और विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में स्किल्ड पेशेवरों की भारी जरूरत थी.

जरूरत के मद्देनजर विदेशों से ग्रेजुएट स्तर पर एच 1 बी वीजा और पोस्टग्रेजुएट स्तर पर एच 1 श्रेणी में स्किल्ड पेशेवरों को 60 हजार डौलर प्रतिवर्ष पर 3-3 साल और कुल 6 साल के लिए अनुबंधित किया जाता था. इस के लिए अमेरिकी कंपनियों को 1 अक्तूबर से नए रोजगार की पारी की शुरुआत करने वालों के लिए एक अप्रैल से आवेदन स्वीकार किए जाने लगे.

आज एच 1 बी और एच 1 वीजा के लिए 85 हजार रोजगार तय हैं, जबकि एल 1 वीजा में कोई कोटा तय नहीं है. अब मांग 3 गुना हो गई है. इस बार अप्रैल के पहले सप्ताह में पिछले साल की तुलना में कम यानी 1 लाख 99 हजार आवेदन आए हैं. इन आवेदनों में चयन के लिए आधार मैरिट न हो कर लौटरी होगा. यह सही है कि भारत की टीसीएस, इन्फोसिस, विप्रो, एचसीएल सहित चीन और अन्यान्य देशों की आईटी कंपनियों ने इस इमीग्रेशन ऐक्ट की खामियों का लाभ उठा कर एच 1 बी वीजा प्रणाली को हाइजैक कर लिया था, अब यह संभव नहीं है. देखना यह है कि नए आदेश से क्या अमेरिका में स्किल्ड पेशेवरों की कमी पूरी हो सकेगी? सच यह है कि मांग की तुलना में अमेरिकी स्किल्ड युवाओं की भारी कमी है.

अब जब से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनावी वादे पूरे करने के उद्देश्य से एच 1 बी और एच 1 तथा एच 4 वीजा पर लगाम कसनी शुरू की है, भारतीय आईटी पेशेवरों में ही नहीं, दिल्ली में मोदी सरकार और देश के विभिन्न हिस्सों में रह रहे भारतीय परिवारों की भी नींद उड़ गई है. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को संसद में एच 1 बी पर अमेरिका में रह रहे आईटी पेशेवरों के कामकाज व उन की जानमाल की सुरक्षा को ले कर बारबार सफाई देनी पड़ रही है. हरिओम कहते हैं कि वे राजनीतिक बहस में पड़ना नहीं चाहते. बहस कांग्रेस में होती रहती है. इस देश में राष्ट्रपति नहीं, कांग्रेस और उन के प्रतिनिधि, वाल स्ट्रीट में बैठे बड़ेबड़े लौबिस्ट हैं, जो अमेरिकी कौर्पोरेट हाउस के लिए काम करते हैं. हरिओम की तरह ऐसे कितने ही भारतीय आईटी पेशेवर हैं जिन के मन में ढेरों सवाल हैं. कहते हैं, कनाडा और जरमनी विकल्प जरूर हैं, पर अभी वह वक्त नहीं आया है. कुछ इलाके हैं जहां सावधानी जरूरी है, पर खतरा नहीं है.          

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