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बच्चों के अनुसार अपना शैड्यूल बनाती हूं : रश्मि आनंद

10 सालों तक घरेलू हिंसा सहने के बाद बच्चों के सुखद भविष्य की खातिर रश्मि आनंद ने 35 साल की उम्र में अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू करने का फैसला किया. फिर 9 साल की बेटी व 5 साल के बेटे को ले कर उस घर से निकल गईं जिस में उन्हें निरंतर टौर्चर किया जाता था. रश्मि आज काउंसलर और लेखिका के रूप में स्थापित हैं. वोडाफोन फाउंडेशन की वूमन औफ प्योर वंडर बुक में भी इन का नाम शामिल किया गया है. वे घरेलू हिंसा से पीडि़त महिलाओं का दर्द बांटते हुए उन्हें सही राह दिखाने का काम करती हैं. रश्मि को कई अवार्ड्स मिल चुके हैं और तलाक के बाद वे कई किताबें भी लिख चुकी हैं.

तलाक के बाद दोबारा जिंदगी शुरू करने का अपना अनुभव बताएं?

जब मैं ने पति से अलग रहने का फैसला लिया था उस वक्त ऐसी कोई चुनौती नहीं होगी, जो मेरी जिंदगी में नहीं थी. मेरे पास पैसों की कमी थी. मैं जौब नहीं करती थी. पिता और भाई ने मुझ से मुंह मोड़ लिया था. बेटा खामोश रहता था. बेटी भी डिप्रैशन में रहती थी. ऐसे में मुझे हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा नजर आ रहा था.

उस नर्क से निकलने के बाद मैं ने तय किया कि मैं सिर्फ और सिर्फ  वर्तमान के बारे में सोचूंगी. मैं रात में लिखने का काम करती थी और दिन में बच्चे को इलाज के लिए ले जाती थी. क्राइम फौर वूमन सैल की सहायता से पति के खिलाफ केस दायर किया गया. दिल्ली पुलिस ने मेरी बहुत मदद की. मुझे 2002 में तलाक मिल गया और फिर बच्चों की कस्टडी भी मिली. पर एलुमनी नहीं मिली. किसी भी तरह की आर्थिक मदद नहीं थी. उस वक्त घरेलू हिंसा कानून भी नहीं था. ऐसे में अपनी व बच्चों की बेहतर जिंदगी के लिए मुझे खूब संघर्ष करना पड़ा.

आप की तनावपूर्ण वैवाहिक जिंदगी का जो बुरा असर बच्चों के मन पर पड़ा था, उसे दूर करने के लिए क्या किया?

मैं ने अपने बच्चों को हंसना सिखाया. हमारे (मैं और मेरे दोनों बच्चे) अंदर इतना भय था कि हमें हर चीज से डर लगने लगा था. हम ने इतनी ज्यादा शारीरिक, मानसिक प्रताड़ना सही थी कि उन परिस्थितियों में या तो मैं टूट कर बिखर जाती या फिर खुद को मजबूत बनाती. मैं ने मजबूत बनने का रास्ता चुना. सब से बड़ी शक्ति हंसने की होती है. इसलिए मैं ने वही अपने बच्चों को सिखाया. जिन चीजों से हमें डर लगता था, उन पर हम ने जोक्स बना लिए. टूटना मुझे गवारा नहीं था. मैं अपने बच्चों को हारते या बिखरते हुए नहीं देखना चाहती थी. उन की आंखों में भय और होंठों पर खामोशी देख कर मैं डर गई थी. इसलिए मैं ने यह रास्ता चुना और पति से अलग हो गई. नए घर में हम तीनों दोस्तों की तरह रहते. मैं ने उन पर कभी हुक्म नहीं चलाया. उन्हें हर तरह की छूट दी.

बच्चों को संभालते हुए लिखने का समय कैसे निकाल पाती हैं?

मुझे 2 मिनट का भी वक्त मिलता है, तो मैं लिखने बैठ जाती हूं. थकी होती हूं तो भी लिख कर ही मेरी थकान मिटती है. मेरे मन की शांति और खुशी का जरीया लेखन ही है.

एक काउंसलर के तौर पर आप मदर्स/पीडि़त महिलाओं को क्या सलाह देती हैं?

मैं महिलाओं को यही समझाती हूं कि प्रताड़ना सहते हुए ससुराल में ही रहना जरूरी नहीं. अकसर बच्चों के भविष्य की खातिर महिलाएं सब सहती रहती हैं. मगर सच यह है कि यदि बच्चों का वजूद बनाना है, तो ऐसे दमघोटू वातावरण से निकलना जरूरी है.

आप के पास काउंसलिंग के लिए जो महिलाएं आती हैं वे ज्यादातर किस बात को ले कर परेशान रहती हैं?

मैं ने क्राइम फौर वूमन सैल में 5 सालों तक काउंसलिंग की. फिर अपनी ट्रस्ट शुरू की. मेरे पास घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं ही आती हैं. मैं ने यही देखा है कि स्त्री गरीब हो या अमीर, शिक्षित हो या अशिक्षित, हर तरह की महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं.                  

बहुत जल्दी स्विच औफ और स्विच औन कर लेती हूं : पंकज भदौरिया

2010 में मास्टर शैफ सीजन 1 की विनर रहीं पंकज भदौरिया आज किसी परिचय की मुहताज नहीं हैं.  ‘शैफ पंकज का जायका,’ ‘किफायती किचन,’ ‘3 कोर्स विद पंकज,’ ‘रसोई से पंकज भदौरिया के साथ’ जैसे कई टीवी शोज ने उन्हें घरघर में पहचान दिलाई है. उन की 2 कुकबुक ‘बार्बी : आई एम शैफ’ और ‘चिकन फ्रौम माई किचन’ दुनिया भर में काफी मशहूर रही हैं. 2 बच्चों की मां पंकज स्कूल टीचर से कैसे बनीं मास्टर शैफ, किस तरह उन्होंने परिवार को संभालते हुए कैरियर में ऊंची उड़ान भरी, चलिए, जानते हैं:

कुकिंग में दिलचस्पी कब से हुई?

मेरे पेरैंट्स को कुकिंग का बहुत शौक था. वे बहुत अच्छे होम कुक थे. लोगों को पार्टी में बुलाना और उन्हें अपने हाथों से तरहतरह की रैसिपीज बना कर खिलाना उन्हें अच्छा लगता था. उस वक्त मुझे भी लगता था कि अच्छा खाना बनाने से न सिर्फ अच्छा खाना खाने को मिलता है, बल्कि कइयों की तारीफ भी मिलती है. इसलिए मेरी रुचि भी कुकिंग में बढ़ने लगी. मैं 11 साल की उम्र से खाना बनाने लगी. मुझे शुरुआत से कुकिंग में ऐक्सपैरिमैंट करने का बहुत शौक था. इंटरनैशनल फूड जैसे चाइनीज, इटैलियन, थाई बनाना मुझे ज्यादा अच्छा लगता था. शादी के बाद पति भी खाने के शौकीन निकले, इसलिए कुकिंग और ऐक्सपैरिमैंट का सिलसिला जारी रहा.

बहुत छोटी उम्र में पेरैंट्स को खो दिया. ऐसे में आप के लिए कैरियर की डगर कितनी मुश्किल रही?

जब मैं 13 साल की थी तब मेरे पिता की मौत हो गई. 21 साल की उम्र में मैं ने अपनी मां को भी खो दिया. मेरी मां अकसर कहती थीं कि शिक्षा एक ऐसा गहना है, जिसे आप से कोई नहीं छीन सकता, इसलिए हमेशा पढ़ाई जारी रखना. चूंकि मेरी मां कम पढ़ीलिखी थीं, इसलिए पिता की मौत के बाद उन्हें अच्छी जौब नहीं मिल पाई, इसलिए भी वे मुझे हमेशा पढ़ने को कहती थीं. मैं ने अंगरेजी में एमए किया और फिर स्कूल में पढ़ाने लगी. फिर शादी हो गई. ससुराल वालों के साथ पार्टी में आने वाले भी मेरे खाने की बहुत तारीफ करने लगे, जिस से मुझे महसूस होता था कि शायद मैं कुछ खास बनाती हूं. उसी दौरान मैं ने टीवी पर मास्टर शैफ का विज्ञापन देखा. मैं ने टीचिंग छोड़ कर इस में भाग लिया और जीतने के बाद अपने पैशन को प्रोफैशन बना लिया.

घर संभालते हुए कैरियर में आगे जाना मुमकिन हो पाया?

जब मैं घर में रहती हूं तब बस घर में रहती हूं और जब बाहर जाती हूं, तो पूरी तरह से बाहर रहती हूं. मैं बहुत जल्दी स्विच औफ और स्विच औन कर लेती हूं. घर में मैं होम मोड पर होती हूं, बिलकुल एक सामान्य घरेलू महिला की तरह. खुद खाना बनाती हूं, सफाई करती हूं आदि. खाने को ले कर अपने बच्चों की सारी फरमाइशों को भी पूरा करती हूं. मैं अपनी प्रोफैशनल लाइफ को घर के दरवाजे के बाहर छोड़ कर आती हूं और जब औफिस जाती हूं, तो घर को घर में छोड़ आती हूं.

अपने दोनों बच्चों के साथ कैसा रिश्ता है?

19 साल की बेटी और 15 साल का बेटा दोनों मेरे सब से अच्छे फ्रैंड हैं. मेरे पेरैंट्स ने भी मुझे ऐसे ही बड़ा किया है. मेरी मां और मेरे पिता दोनों ही मेरे अच्छे फ्रैंड रहे हैं. हम बच्चों को अच्छा इनसान बनाने में यकीन रखते हैं. हम उन्हें मैंटली और फिजिकली तौर पर फिट रखते हैं. हम चारों मिल कर एकसाथ खेलतेकूदते भी हैं. हर तरह की मूवी देखते हैं, हर मुद्दे पर बात करते हैं.

मां बनने के बाद कैरियर को छोड़ने वाली महिलाओं को क्या सलाह देंगी?

औरत की जिंदगी में ऐसा पड़ाव आता है, जब उसे कैरियर और बच्चे के बीच किसी एक का चुनाव करना पड़ता है. शुक्र है मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ, लेकिन जिन महिलाओं को बच्चों की परवरिश के लिए ऐसा फैसला लेना पड़ा है, मेरे अनुसार वे मिड ऐज में दोबारा काम शुरू कर सकती हैं किसी भी रूप में जैसे पार्टटाइम, वर्क फ्रौम होम आदि.                 

दलाली के कीचड़ में मनरेगा

बिहार में पटना जिले के नौबतपुर ब्लौक की जमलपुरा ग्राम पंचायत के जमलपुरा गांव में बिचौलियों की खुराफात की वजह से कई मकान आधीअधूरी हालत में हैं. उन की दीवारें तो पक्की बनाई गई हैं, लेकिन छत की जगह फूस डाल दिया गया है. इस इलाके के ‘विकास मित्र’ रामनाथ राम के मुताबिक, जमलपुरा टोले में तकरीबन 546 महादलित गरीबी की रेखा के नीचे अपनी जिंदगी बसर कर रहे हैं. उन की आमदनी के ज्यादा साधन नहीं हैं. पंचायत समिति के सदस्य अशोक कुमार का कहना है कि इस टोले के लोग गैरमजरूआ जमीन पर रहते हैं. इस का रकबा एक एकड़, 52 डिसमिल है. इस का प्लाट नंबर 527 और खाता नंबर

69 है. अभी तक वासगीत परचा जारी नहीं किया गया है, फिर भी इसी जमीन पर इंदिरा आवास योजना के मकान बनाए जा रहे हैं. इंदिरा आवास योजना के तहत 45 हजार रुपए मिलते हैं और उन में से 7 हजार रुपए डकार लिए जाते हैं. सरकार ने बढ़ती महंगाई को देखते हुए 5 साल पहले इंदिरा आवास योजना के तहत मकान बनाने वाली रकम तो बढ़ा दी थी, पर इस का फायदा गरीबों के बजाय दलाल उठा रहे हैं. बड़े पैमाने पर पनप चुके दलालों ने योजना की रकम बढ़ने के बाद अपने कमीशन की रकम भी बढ़ा दी है. नतीजतन, पैसा बढ़ने के बाद भी गरीबों और दलितों को कोई फायदा नहीं हो पा रहा है. इस की वजह से गरीबों को मकान बनवाने में तमाम परेशानियां उठानी पड़ रही हैं. सरकारी रकम में दलालों की बंदरबांट से बहुत से गरीबों के मकान और शौचालय आधेअधूरे रह गए हैं.

कच्चा काम कराने के एवज में 26 फीसदी और पक्का काम कराने पर 22 फीसदी कमीशन देना पड़ता है. मिट्टी संबंधी काम कच्चा काम होता है. इस में मनरेगा के कार्यक्रम परियोजना पदाधिकारी को 10 फीसदी, रोजगार सेवक को 5 फीसदी, इंजीनियर को 5 फीसदी, असिस्टैंट इंजीनियर को 2 फीसदी और कंप्यूटर औपरेटर को एक फीसदी चढ़ावा देना पड़ता है. पक्का काम कराने में सोलिंग कराने, पुलपुलिया बनाने पर परियोजना पदाधिकारी को 10 फीसदी, रोजगार सेवक को 5 फीसदी, इंजीनियर को 5 फीसदी, असिस्टैंट इंजीनियर को 2 फीसदी कमीशन मिल जाता है.

मनरेगा के कामों की जांच करने गई एनजीओ की टीम को मुखिया जम कर धमकाते भी हैं. बिहार के बांका जिले के चांदन ब्लौक की बड़फेरा तेतरिया ग्राम पंचायत के मुखिया ब्रह्मानंद दास उर्फ रामजी की मनमानी से मनरेगा का मकसद तारतार हो रहा है. यह मुखिया मनरेगा के तहत काम करवा कर मजदूरों को मजदूरी नहीं देता है. जब मजदूर हल्ला करते हैं, तो कुछ कपड़े और अनाज दे कर उन का मुंह बंद कर देता है. उस ने आज तक मजदूरों को काम के बदले मजदूरी नहीं दी है. बड़फेरा तेतरिया गांव की मजदूर बड़की मरांडी ने बताया कि उस के पास जौब कार्ड तो है, पर उस के हिसाब से काम नहीं मिलता है. मौखिक रूप से ही काम दिया जाता है. उस के जौब कार्ड का नंबर 333003 है.

बड़की मरांडी आगे बताती है कि 12 दिसंबर, 2010 से ले कर 25 दिसंबर, 2010 तक तिबतिमाली से ले कर अंतुआ काली मंदिर तक सड़क बनाने में मजदूरी का काम मिला था, पर आज तक मजदूरी नहीं मिली. वह और भी मजदूरों के नाम गिनाती है, जिन्हें मजदूरी नहीं दी गई. कई मजदूरों ने बताया कि उन्होंने कई दफा मुखिया से मजदूरी की मांग की, पर मुखिया पैसे की कमी का बहाना बना कर उन्हें चलता कर देता था.

मुखिया की सीनाजोरी का यह हाल है कि इस बारे में बात करने पर वह सरकार को ही कठघरे में खड़ा कर देता है. मनरेगा को ले कर ज्यादातर मुखिया की यही दलील होती है कि सरकार पैसा ही नहीं भेज रही है, तो ऐसे में मजदूरों को किस तरह से समय पर मजदूरी दी जा सकती है. गौरतलब है कि मनरेगा के तहत काम करने वाले मजदूर को एक दिन के काम के बदले में 140 रुपए मजदूरी मिलती है. इस हिसाब से 14 दिनों के काम के बदले एक मजदूर को 1960 रुपए मिलने चाहिए. लेकिन मुखिया ने मजदूरों को मजदूरी की रकम के बजाय घटिया सामान दे कर उन का मुंह बंद कर दिया, जो सरासर गलत है. सामाजिक कार्यकर्ता आलोक कुमार कहते हैं कि नकद पैसा मिलने से मजदूर अपनी जरूरत के हिसाब से उसे खर्च सकते हैं, पर मजदूरी के बदले घटिया सामान थमा कर मुखिया ने मजदूरों के साथसाथ मनरेगा के नियमों के साथ भी खिलवाड़ किया है. अगर मनरेगा के कामों की सही तरह से जांचपड़ताल की जाए, तो इस जैसे हजारों मुखिया और अफसरों की काली करतूतों का खुलासा हो सकता है.                   

आदमी बनाम आदमी

बचपन में मेरी दादी मुझे कहानियां सुनाया करती थीं. वे कहती थीं, ‘वक्त पड़ने पर अगर गधे को भी बाप कहना पड़े तो कोई बात नहीं.’

जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ, तो दादी की नसीहत मुझे बकवास लगने लगी. लेकिन बाद में जबजब सरकारी बाबुओं, पुलिस वालों, छुटभैए नेताओं से अपना काम निकलवाने के लिए मुझे उन्हें ‘बाप’ कहना पड़ा, तो दादी की नसीहतों का मतलब समझ आने लगा. दादी कहती थीं, ‘वफादारी कुत्ते से सीखो, चालाकी लोमड़ी से. याद करना तोते से, मेहनत करना चींटी से और लक्ष्य पर झपटना बाज से…’ यनी हर अच्छे काम के लिए दादी पशुपक्षियों की ही मिसाल दिया करती थीं. उन्होंने कभी आदमी की मिसाल नहीं दी. कभी यह नहीं कहा कि ईमानदारी खान साहब से सीखो, फर्ज की अहमियत तिवारीजी से, वक्त की पाबंदी वर्माजी से और सच बोलना यादवजी से.

दादी ने एक बार मुझे बताया था कि सभी प्राणियों में आदमी को सब से अच्छा कहा गया है. मैं ने जब उन से पूछा कि आदमी को किस ने और क्यों अच्छा कहा, तो वे इस बात का कोई जवाब नहीं दे सकीं. दादी द्वारा दी गई इस जानकारी के लिए उन का पशुपक्षियों की मिसाल देना मुझे खटकने लगा था. मैं चक्कर में पड़ गया कि अगर आदमी सब प्राणियों में बेहतर है, तो उसे नसीहत करने के लिए पशुपक्षियों की मिसाल क्यों दी जा रही है?

मासूम बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाना, दूसरों का माल हड़पना, दूसरों को नुकसान पहुंचाने की ताक में रहना, जो है, उस में संतोष करने के बजाय और ज्यादा की लालसा करना जैसे (अव) गुण पशुवर्ग की खूबी हो सकते हैं, तथाकथित सर्वश्रेष्ठ प्राणी के बिलकुल नहीं. लेकिन कानूनों और संविधानों के बावजूद हमारी पशुता बरकरार है. कुदरत ने इनसान यानी आदमी को एक बना कर भेजा है, लेकिन मामला अब सिर्फ आदमी का नहीं, आदमी बनाम आदमी का हो गया है. एक वह, जो गुंडों द्वारा बहन को तंग किए जाने की शिकायत करने थाने जाते हुए भी डरता है और एक वह, जो थाने आने वाले हर आदमी को मोटा बकरा समझता है.

एक वह, जिसे तपती धूप में चौराहे पर सिर्फ इसलिए खड़ा कर दिया गया है, क्योंकि चौक से मंत्री के काफिले को गुजरना है. और एक वह, जो इस रुतबे को हासिल करने के लिए एक वोट की खातिर कभी आप के दरवाजे पर भिखारी की तरह हाथ जोड़े खड़ा था. एक वह, जो लेदे कर धरती का भगवान बना बैठा है और एक वह, जो खाली जेब में एंडोस्कोपी, ईसीजी, यूरिन, ब्लड और स्टूल टैस्ट की रिपोर्ट धरे घर लौटते हुए इस उधेड़बुन में खोया रहता है कि साधारण बुखार की यह कौन सी पैथी है? 

कदम कदम पर गुनाह

3 नवंबर, 2016 की रात हरदोई के पुलिस अधीक्षक राजीव मेहरोत्रा सरकारी काम से लखनऊ के थाना हजरतगंज आए थे. वह अपनी सरकारी सूमो गाड़ी भीड़भाड़ वाले इलाके हजरतगंज में खड़ी कर के काम निपटाने चले गए. ड्राइवर महेश कुमार गाड़ी के पास था. महेश को चाय पीने की तलब लगी तो वह सूमो के चारों दरवाजे लौक कर के चाय पीने चला गया. थोड़ी देर बाद जब वह चाय पी कर वापस लौटा तो गाड़ी वहां नहीं थी. यह देख महेश के पैरों तले की जमीन खिसक गई और वह परेशान हो गया. उस ने इधरउधर देखा, लेकिन गाड़ी कहीं दिखाई नहीं दी. महेश समझ गया कि वाहन चोरों ने एसपी साहब की सरकारी गाड़ी पर हाथ साफ कर दिया है. उस ने तुरंत फोन कर के एसपी राजीव मेहरोत्रा को इस मामले की जानकारी दी. सूचना मिलते ही एसपी राजीव काम बीच में ही छोड़ कर वहां लौट आए. थोड़ी ही देर में एसपी साहब की गाड़ी गायब होने की खबर लखनऊ के पूरे पुलिस डिपार्टमेंट में फैल गई.

आननफानन में कोतवाली पुलिस घटनास्थल पर पहुंच गई. पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना जिले के सभी थानों को दे दी थी. फलस्वरूप पुलिस ने राजधानी से जुड़े सभी सीमाई इलाकों की नाकेबंदी कर के वाहनों की चैकिंग शुरू कर दी. लेकिन देर रात तक चली चैकिंग के बाद भी सूमो का कहीं पता नहीं चला. वाहन चोर संभवत: सूमो को पहले ही लखनऊ से बाहर ले गए थे. इस संबंध में कोतवाली थाने में अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

मुकदमा दर्ज होने के बाद इस मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई. घटना किसी मामूली व्यक्ति से जुड़ी हुई नहीं थी. बात एसपी साहब की गाड़ी की चोरी की थी. ऐसे में राजधानी पुलिस की नींद हराम हो जाना स्वाभाविक था. क्राइम ब्रांच ने अपने मुखबिरों को यह पता लगाने की जिम्मेदारी सौंप दी कि इस में किस गिरोह का हाथ हो सकता है.

करीब हफ्ते भर बाद मुखबिरों ने क्राइम ब्रांच को हैरत में डालने वाली सूचना दी. सूचना के अनुसार, वाहन चोरों ने एसपी राजीव की सूमो 50 हजार में नेपाल के रोतहट जिले के कबाड़ी सागर शाह के हाथों बेच दी थी.

यह खबर मिलते ही लखनऊ क्राइम ब्रांच की टीम सादे कपड़ों में नेपाल गई और वहां के जिला हेटौड़ा के डीआईजी पशुपति उपाध्याय से मिली. इस टीम ने उन्हें घटना की पूरी जानकारी दे कर उन से अपराधियों को गिरफ्तार करने के लिए मदद मांगी. डीआईजी पशुपति उपाध्याय ने इस टीम को रोतहट जिले के प्रभारी डीएसपी नवीन कृष्ण भंडारी जो एसपी का पद भी संभाल रहे थे, के पास भेज दिया. क्राइम ब्रांच की टीम नवीन कृष्ण भंडारी से मिली. नवीन कृष्ण भंडारी ने फौरी तौर पर एक पुलिस टीम गठित की और सागर शाह के वीरगंज स्थित कबाड़ के गोदाम पर छापेमारी की. सागर शाह चोरी के वाहन खरीदने और बेचने के लिए बदनाम था. यह बात नेपाल की पुलिस  भी जानती थी.

उस के गोदाम से पुलिस टीम को एसपी साहब की सूमो की चेसिस मिल गई. उस ने सूमो को कई हिस्सों में काट कर उस के पार्ट अलगअलग कर दिए थे, जिस से उसे आसानी से न पहचाना जा सके. नेपाल पुलिस ने सागर शाह को हिरासत में ले लिया. उस से कड़ाई से पूछताछ की गई तो उस ने सूमो खरीदने की बात कबूल कर ली. उस ने पुलिस को बताया कि वह सूमो उसे तस्कर और वाहन चोर गिरोह के सरगना शमीम अख्तर के साथी असगर उर्फ मोजाबिल अंसारी और अफगान अहमद ने 50 हजार रुपए में बेची थी. सागर शाह ने यह भी बताया कि शमीम अख्तर वीरगंज में छिपा है.

नेपाल पुलिस के हाथों बड़ा बटेर लग चुका था. सागर शाह की निशानदेही पर नेपाल पुलिस ने शमीम अख्तर के ठिकाने पर दबिश दी. वहां से शमीम अख्तर को गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने उस के पास से 2 पिस्टल, 23 जिंदा कारतूस, 200 ग्राम हेरोइन, 5 मोबाइल फोन, 18 सिम, फरजी प्रैस कार्ड और तमाम जाली आईडी बरामद कीं. बरामद सामानों को नेपाल पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. पुलिस शमीम अख्तर को गिरफ्तार कर के थाने ले आई. उस के खिलाफ थाना वीरगंज में मुकदमा दर्ज किया गया.

बिहार के मोतिहारी (पूर्वी चंपारण) के पुलिस अधीक्षक जितेंद्र राणा को जब शमीम अख्तर की गिरफ्तारी की सूचना मिलीतो वह बहुत खुश हुए. शमीम अख्तर बिहार के कई जिलों का वांछित अपराधी था. सीतामढ़ी के एक ही परिवार के 3 सदस्यों के अपहरण और उन की नृशंस हत्या, मृतकों की बेटी आशा सिंह को पहले बेटी बनाना, फिर बेटी से पत्नी और बाद में उसे जिस्मफरोशी के धंधे में उतार देने जैसे उस के कई कृत्य काफी चर्चित रहे थे.

उस ने आशा सिंह को पाकिस्तान में बेचने की योजना बना ली थी ताकि वह वहां से वापस ही न लौट सके. लेकिन वह अपने घृणित मंसूबों में कामयाब होता, उस से पहले ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया था. लेकिन वह पुलिस के चंगुल से फरार हो गया और नेपाल में जा कर छिप गया था. शमीम नेपाल में छिप कर रहते हुए वहीं से अपना आपराधिक धंधा चला रहा था.

बहरहाल, दोबारा गिरफ्तारी के बाद  शमीम अख्तर अभी नेपाल की जेल में बंद है. यहां की पुलिस उस के प्रत्यर्पण की कोशिश में जुटी है. शमीम अख्तर से लखनऊ एटीएस, एसटीएफ, लखनऊ की स्पैशल ब्रांच, पटना की स्पैशल ब्रांच, एटीएस, पटना की एसटीएफ के साथ मोतिहारी पुलिस के कई अधिकारियों ने नेपाल जा कर उस से विस्तृत पूछताछ की है.

पूछताछ में शमीम ने कबूल किया है कि उस के कहने पर उस के साथियों ने हरदोई के एसपी की सरकारी गाड़ी चुराई थी. लेकिन पकड़े जाने के डर से उस ने यह गाड़ी सागर शाह के हाथों 50 हजार रुपए में बेच दी थी.

करीब 40 वर्षीय शमीम अख्तर बिहार के मोतिहारी (पूर्वी चंपारण) जिले के थाना ढाका क्षेत्र के आजाद चौक इलाके के सिकंदरापुर टोला का रहने वाला था. उस के पिता नईमुद्दीन अख्तर किसान थे. नईमुद्दीन के आधा दरजन बच्चों में शमीम अख्तर सब से बड़ा था. शमीम शुरू से ही शातिरदिमाग था. जिस चीज पर उस का दिल आ जाता था, उसे पा कर ही दम लेता था. भले ही इस के लिए उसे किसी भी तरह के हथकंडे क्यों न अपनाने पड़ें. शमीम की हरकतों से उस के घर वाले काफी परेशान रहते थे. अपनी हरकतों के चलते ही शमीम इंटर से आगे पढ़ाई नहीं कर सका था.

नईमुद्दीन का परिवार बड़ा था. वह अपने परिवार का भरणपोषण किसानी से करते थे. उन के परिवार की माली हालत ठीक नहीं थी. जबकि शमीम गरीबी के आलम में जीना नहीं चाहता था. पढ़ाई बीच में छोड़ कर शमीम ने कबाड़ का धंधा शुरू कर दिया. उस ने जीजान से मेहनत की. फलस्वरूप उस का धंधा चल निकला. लेकिन उस ने अमीर बनने के जो ख्वाब देखे थे, वह कबाड़ की कमाई से पूरे नहीं हुए. आखिरकार उस ने अमीर बनने के लिए एक शौर्टकट रास्ता निकाल लिया. यह अलग बात है कि वह रास्ता जुर्म की अंधेरी सुरंग से हो कर जाता था.

बात सन 2001 की है. शमीम अख्तर ने अपने 2 साथियों राजमिया और चंदनदीप के साथ मिल कर अरेराज, जिला मोतिहारी के संजय का अपहरण कर लिया. इन लोगों ने संजय के घर वालों से फिरौती की बड़ी रकम वसूल की. पैसे मिलने के बाद शमीम ने संजय को छोड़ दिया. एक बार शमीम अख्तर ने अपराध की दुनिया में कदम रखा तो फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

इस के बाद शमीम ने इसी जिले से दूसरा अपहरण कर के सनसनी फैला दी. इस बार उस ने एक ज्वैलर का अपहरण किया था. फिरौती में उस ने ज्वैलर के परिवार वालों से करीब 50 लाख वसूले. जुर्म की दुनिया से काला पैसे आते ही शमीम अख्तर ने अपना एक बड़ा गिरोह बना लिया. अपने गिरोह में उस ने कम उम्र के नएनए चेहरों को शामिल किया ताकि पुलिस उस तक आसानी से न पहुंच सके.

2-2 अपहरण कर के शमीम ने पुलिस की नाक में दम कर दिया था. पुलिस भी चुप नहीं बैठी थी. आखिर उस ने शमीम को गिरफ्तार कर ही लिया. गिरफ्तारी के बाद उसे मोतिहारी जेल भेज दिया गया. बाद में पुलिस ने उसे सीतामढ़ी जेल में ट्रांसफर कर दिया. सीतामढ़ी जेल में रहने के दौरान शमीम की मुलाकात सीतामढ़ी के शातिर अपराधी दीपनारायण महतो से हुई.

दीपनारायण महतो की सीतामढ़ी में तूती बोलती थी. उस ने शमीम को अपराध के कई गुर सिखाए. शमीम जेल से ही अपना सिंडीकेट चला रहा था. उस के गुर्गों ने मोतिहारी टाउन, बैरगनिया, फेनहारा और मेहसी में ताबड़तोड़ लूट की कई घटनाओं को अंजाम दिया. पकडे़ जाने के बाद शमीम ने जेल में रह कर 8 साल गुजारे.

इस बीच शमीम अख्तर की पत्नी अपने बच्चों के साथ हमेशाहमेशा के लिए मायके चली गई. शमीम के जेल जाने से पहले की बात है. नईमुद्दीन बेटे की करतूतों से आजिज आ चुके थे. उन्होंने उस की शादी करवा कर उसे सुधारने की सोची, लेकिन नईमुद्दीन की यह कवायद काम नहीं आई. जब वह रोजरोज के पुलिस के झमेले से परेशान हो गए तो उन्होंने शमीम से नाता तोड़ लिया. इसी से दुखी हो कर उस की पत्नी हमेशा के लिए मायके चली गई थी. खैर, उन दिनों शमीम अख्तर के सितारे बुलंदियों पर थे.

सन 2008 में शमीम सीतामढ़ी की जिस जेल में बंद था, उसी में सीतामढ़ी जिले के थाना डुमरा का रहने वाला मूकबधिर संजीव कुमार सिंह भी बंद था. उसे पट्टीदारों से संपत्ति के बंटवारे के विवाद में जेल जाना पड़ा था. उस की पत्नी खुशबू सिंह पति से मिलने जेल आया करती थी.

खुशबू बला की खूबसूरत महिला थी. जेल में आतेजाते जब उस पर शमीम अख्तर की नजर पड़ी तो वह उस का दीवाना हो गया. शमीम और खुशबू के बीच परिचय हुआ तो उस ने खुशबू को विश्वास दिलाया कि जेल से बाहर निकलते ही वह उस के पति को जेल से छुड़वा देगा.

पता नहीं शमीम ने ऐसा कौन सा जादू कर दिया था कि खुशबू उस की अंधभक्त बन गई. उसे शमीम पर पूरा भरोसा हो गया कि वह उस की मदद जरूर करेगा. जेल से बाहर आने के बाद शमीम ने जोड़जुगत कर के खुशबू के पति संजीव को जेल से बाहर निकलवा दिया.

खुशबू शमीम के इस एहसान तले दब गई. वजह यह थी कि जब उस के अपनों ने उस का साथ छोड़ दिया था, तब एक अंजान शख्स उस का सहारा बना. धीरेधीरे शमीम और खुशबू सिंह एकदूसरे की ओर खिंचते चले गए. दोनों के बीच का यह आकर्षण प्रेम में बदल गया. यहां से शमीम अख्तर की जिंदगी में दूसरे अध्याय की एक अनोखी कड़ी जुड़ गई.

खुशबू सिंह की शादी सन 1990 में जिला सीतामढ़ी के डुमरा के संजीव कुमार सिंह से हुई थी. संजीव कुमार सिंह जन्म से मूकबधिर था. शादी के बाद उस के वहां एक बेटे का जन्म हुआ. मांबाप ने उस का नाम अमनदीप सिंह रखा. उस के 3 साल बाद खुशबू आशा सिंह की मां बनी. मूकबधिर संजीव बहुत खुद्दार और जिंदादिल इंसान था. अपने कर्म और मेहनत पर भरोसा करने वाली खुशबू उस का हौसला बढ़ाती रहती थी. संजीव को अपने भाइयों से कभी कोई मदद नहीं मिली थी. सच तो यह है कि वे एक तरह से उस से घृणा करते थे.

न जाने वह कौन सा मनहूस दिन था, जब संजीव कुमार सिंह के परिवार में बुरे वक्त ने कुंडली मार ली. उस का हंसताखेलता परिवार बिखर गया. सन 2008 में पट्टीदारों से विवाद के चलते संजीव सिंह परिवार को ले कर शहर में आ गए. लेकिन विवाद फिर भी नहीं थमा. इसी विवाद के चलते संजीव को जेल जाना पड़ा था.

बहरहाल, 3 जनवरी 2009 को खुशबू की जिंदगी में एक और तूफान आया. उस के 13 वर्षीय बेटे अमनदीप सिंह का किसी ने अपहरण कर लिया. अपहर्त्ताओं ने फिरौती में 20 लाख वसूले. इस के बावजूद अपहर्त्ताओं ने पैसे ले कर भी संजीव और खुशबू सिंह के साथ धोखा किया. उन्होंने अमनदीप को छोड़ने के बजाय उस की हत्या कर दी. अमनदीप की क्षतविक्षत लाश रेलवे लाइन पर मिली. अमनदीप का अपहरण शमीम ने अपने गुर्गों से करवाया था. उस ने यह काम इतने शातिर ढंग से किया था कि खुशबू को इस की भनक तक नहीं लगी.

खुशबू की जिंदगी ने जैसे दुखों से नाता जोड़ लिया था. वह अभी बेटे की मौत के सदमे से पूरी तरह उबर भी नहीं पाई थी कि दरवाजे पर एक और मुसीबत बांहें फैलाए आ खड़ी हुई.

दिसंबर, 2010 की बात है. संजीव किसी काम से घर से बाहर गया तो फिर लौट कर घर नहीं पहुंचा. बदमाशों ने संजीव सिंह को भी उस के बेटे की तरह अगवा कर लिया. अपहरण करने के 2 दिनों बाद यानी 1 जनवरी, 2011 को शिवहर-पूर्वी चंपारण जिले की सीमा ललुआ सरेह में उस की लाश पड़ी मिली. सदर अस्पताल में खुशबू ने लाश की शिनाख्त अपने पति संजीव के रूप में की. यह काम भी शमीम अख्तर ने ही किया था. संजीव उस की और खुशबू की राह में रोड़ा बन रहा था. संजीव की मौत के बाद शमीम का रास्ता साफ हो गया. अब उसे कोई नहीं रोक सकता था.

खुशबू का हंसताखेलता परिवार उजड़ गया था. उस के जीने का एकमात्र सहारा उस की 13 वर्षीय बेटी आशा सिंह ही बची थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. जीने के लिए अभी पूरी जिंदगी बाकी थी. संकट की इस घड़ी में शमीम अख्तर ने उस के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया. चूंकि दोनों एकदूसरे को अपना जीवनसाथी बनाना चाहते थे, इसलिए खुशबू सिंह इनकार नहीं कर पाई. इस तरह वह शमीम की शरीकेहयात बन गई. शमीम ने खुशबू की बेटी अंशुप्रिया को अपनी बेटी के रूप में अपना लिया.

खुशबू से निकाह करने के बाद शमीम अख्तर पत्नी और बेटी आशा को ले कर बंगाल चला गया. उस ने बंगाल के डागापार में जमीन खरीद कर मकान बनवाया और परिवार के साथ रहने लगा. बाद में उस ने पत्नी और बेटी का धर्म परिवर्तन करा दिया. इस के बाद खुशबू सिंह का नाम रुखसाना खातून और उस की बेटी का नाम नूर हो गया. उस के कुछ दिनों बाद पत्नी और बेटी को ले कर वह वहां से सिलीगुड़ी चला गया.

उस ने सिलीगुड़ी में एक और फ्लैट खरीदा. यह फ्लैट उस ने रुखसाना खातून की करोड़ों की संपत्ति में से कुछ हिस्से को बेच कर खरीदा था. दरअसल, अमनदीप और संजीव की मौत के बाद शमीम अख्तर की नजर खुशबू उर्फ रुखसाना की संपत्ति पर जम गई थी. उस ने धीरेधीरे पत्नी की संपत्ति का आधा हिस्सा अपने नाम करा लिया था. इस के बाद वह उस संपत्ति को बेचता रहा. शमीम के प्यार में अंधी खुशबू उर्फ रुखसाना ने उसे कभी रोकने की कोशिश नहीं की. नूर बच्ची थी, उस के विरोध करने का कोई मतलब नहीं था.

अचानक एक दिन खुशबू उर्फ रुखसाना रहस्यमय तरीके से गायब हो गई. शमीम ने उस की हत्या कर के लाश गायब कर दी. खुशबू की लाश आज तक बरामद नहीं हुई. शमीम ने आशा उर्फ नूर से झूठ बोला कि उस की मां धोखा दे कर एक आदमी के साथ भाग गई.

13 साल की मासूम आशा उर्फ नूर मां के गायब होने से काफी दुखी थी. मां की याद में रोरो कर उस का बुरा हाल था. अपना राज छिपाने के लिए शमीम नूर को ले कर सिलीगुड़ी से मोतिहारी सिकंदरापुर आ गया. उस ने नूर की देखभाल की जिम्मेदारी आयशा को सौंप दी. आयशा शमीम से मिल कर जिस्मफरोशी का धंधा करती थी. शमीम के काले धंधों में एक धंधा जिस्मफरोशी का भी था.

जिस्मफरोशी की दुकान चलाने वाली आयशा शमीम तक कैसे पहुंची, इस की भी एक रोमांचक कहानी है. आयशा शमीम अख्तर के चंगुल में धोखे से आ फंसी थी. दरअसल, दिल्ली एनसीआर की रहने वाली आयशा जौब के सिलसिले में सहारनपुर के दीपांशु से मिली थी. दीपांशु लड़कियों को जौब देने के लिए अखबारों में विज्ञापन छपवाता था. ऐसे विज्ञापन छपवा कर वह भोलीभाली लड़कियों को अपने जाल में फांसता था.

आयशा भी उस के इस धोखे का शिकार बन गई थी. दरअसल, दीपांशु सैक्स रैकेट का सरगना था. राह भटकी अथवा मजबूर लड़कियों को नौकरी दिलाने का झांसा दे कर वह उन्हें अपने यहां लाता था. उन्हें नौकरी तो नहीं मिलती थी, उन का दैहिक शोषण कर के वह उन्हें जिस्मफरोशी के धंधे में उतार देता था.

आयशा दीपांशु की चिकनीचुपड़ी बातों में फंस गई थी. पहले तो उस ने आयशा का खूब दैहिक शोषण किया, फिर उस की नग्न फिल्म तैयार की ताकि वह उस के चंगुल से आजाद न हो सके.

दीपांशु ने वीडियो फिल्म दिखा कर आयशा को इतना मजबूर किया कि वह उस की बात मानने को तैयार हो गई. उस ने आयशा को धमकी दी कि अगर कभी उस ने कुछ ऐसावैसा सोचा भी तो वह उस की ब्लू फिल्म की सीडी बना कर बाजार में उतार देगा. दीपांशु की धमकियों से डरी आयशा अपनी इज्जत बचाने के लिए वही करती रही, जैसा उस ने करने के लिए कहा.

दीपांशु और शमीम अख्तर एक ही नाव के सवार थे. शमीम अख्तर को एक नई लड़की की तलाश थी. उस ने दीपांशु से कह रखा था कि कोई अच्छी लड़की मिले तो उसे उस के यहां भेज दे. उस की मांग पर दीपांशु ने आयशा को मोतिहारी भेज दिया.

इंसान की खाल में छिपे शैतान शमीम अख्तर की भूखी नजरों से आयशा भी नहीं बची. उस ने आयशा को जिस्मफरोशी के धंधे में उतार दिया. आयशा एक पिंजरे से निकल कर दूसरे पिंजरे में कैद हो गई थी. थकहार कर वह शमीम की जिस्मफरोशी की दुकान चलाने लगी.

शमीम अख्तर ने नूर की निगरानी आयशा पर छोड़ दी थी. आयशा 24 घंटे उस पर कड़ी नजर रखती थी. ताकि वह वहां से भाग न सके. बेटी का दरजा देने वाले हैवान शमीम ने उस से जबरन निकाह कर लिया. बेबस और लाचार नूर कुछ नहीं कर पाई. आशा उर्फ नूर को उस ने अपने घर के नीचे बने तहखाने में कैद कर दिया था. उस की मासूमियत को उस ने पहले ही रौंद डाला था.

उस ने नूर को भी जिस्मफरोशी के बाजार में उतार दिया. जब नूर इस के लिए तैयार नहीं होती थी तो शमीम जबरन उस की बांह में नशीला इंजेक्शन लगा देता था. इंजेक्शन की वजह से बेहोशी के आलम में पहुंचते ही जिस्म के भूखे भेडि़ए उसे नोचना शुरू कर देते थे. आयशा गेट के बाहर खड़ी उस की पहरेदारी करती थी.

तहखाने में कैद नूर 3 साल तक सिसकती रही, लेकिन शमीम को उस पर दया नहीं आई. शमीम ने नारकीय जीवन जी रही नूर को उस की बची हुई संपत्ति हथियाने के लिए जिंदा रखा था. वह अभी बालिग नहीं हुई थी. जिस्मानी रिश्तों से नूर को गर्भ न ठहरे, इस के लिए वह हर 3 महीने में उस की कमर में इंजेक्शन लगवा देता था.

शमीम अख्तर ने नूर से निकाह करने के बाद पाकिस्तान के रहने वाले जैक लेबोरियन से 2 लाख में उस का सौदा कर दिया था. जैक लेबोरियन नूर पर लट्टू था और उस से निकाह करने के लिए पाकिस्तान से कपड़े भी खरीद कर लाया था. निकाह के बाद वह उसे पाकिस्तान ले जाना चाहता था. शमीम उस के साथ लंदन जाने की बात कह कर करीब डेढ़ महीने तक गायब रहा. नूर को धोखे में रखने के लिए शमीम ने उस से जैक लेबोरियन को लंदन का रहने वाला बताया था. लेकिन जब नूर ने कपड़े देखे तो उस का भांडा फूट गया. कपड़े पाकिस्तान से खरीदे गए थे.

शमीम अख्तर के पाप का घड़ा भर चुका था. बात 24 फरवरी, 2015 की है. मोतिहारी के ढाका थाने के इंसपेक्टर अशोक कुमार को मुखबिरों से सूचना मिली कि कबाड़ व्यवसाई शमीम अख्तर के घर ढाका लाइन में चोरी हुई कई गाडि़यां देखी गई हैं. इंसपेक्टर अशोक कुमार ने पुलिस टीम के साथ शमीम के सिकंदरापुर आवास पर दबिश दी. पुलिस ने उस के घर से चोरी की 6 गाडि़यां बरामद कीं.

पुलिस की दबिश की सूचना शमीम अख्तर को पहले ही मिल गई थी, इसलिए वह पुलिस के आने से पहले ही घर छोड़ कर फरार हो गया था. तलाशी लेते हुए पुलिस जब उस कमरे तक पहुंची, जहां कबाड़ रखा था तो वहां उसे बाहर की खिड़की से तहखाना दिखाई दिया. तहखाने से किसी के कराहने की मद्धिम सी आवाज आ रही थी. जब आवाज की दिशा की ओर कान लगा कर सुना गया और भीतर झांक कर देखा गया तो उन के होश उड़ गए. तहखाने में एक लड़की कैद थी.

पुलिस को मामला संदिग्ध लगा तो यह खबर अधिकारियों को दी गई. सूचना मिलते ही अधिकारी मौके पर पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने घर की तलाशी ली. तलाशी के दौरान वहां से आयशा को गिरफ्तार किया गया. आयशा की निशानदेही पर तहखाने में कैद आशा उर्फ नूर को मुक्त कराया गया. नूर ने जब पुलिस को आपबीती सुनाई तो पुलिस अधिकारियों के भी रोंगटे खड़े हो गए. मासूम नूर कई सालों से शमीम की यातनाओं को झेल रही थी.

छानबीन के दौरान तहखाने से पुलिस को कई तरह की नशीली गोलियों के रैपर, इंजेक्शन, नशीली दवाओं की शीशियां, कई कंपनियों के सिम और मोबाइल मिले. इन चीजों को पुलिस ने साक्ष्य के तौर पर अपने कब्जे में ले लिया. इस के बाद पुलिस ने आशा उर्फ नूर को अदालत में पेश किया. अदालत के सामने उस ने अपने नाना के घर जाने की इच्छा जाहिर की. नाना, नानी और मामा के अलावा उस का दुनिया में कोई और बचा भी नहीं था.

आशा उर्फ नूर के बयान पर ढाका थाने में भादंवि की धारा 313, 376ए, 376डी, 376 (2एन), 372, 373, 34 एवं 3, 4, 5, 6, 8 आईटीपी और पोक्सो एक्ट के तहत आरोपी शमीम अख्तर, अजगर खां, मोहम्मद रामजान और आयशा के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया. नूर की दुखभरी कहानी सुन कर शमीम अख्तर के प्रति लोगों का आक्रोश फूट पड़ा. उन लोगों ने शमीम अख्तर को गिरफ्तार करने के लिए सड़कों पर धरनेप्रदर्शन किए. आंदोलन कई दिनों तक चलता रहा. नागरिकों के भारी दबाव में पुलिस ने शमीम को गिरफ्तार करने के लिए उस के कई ठिकानों पर दबिश दी, लेकिन वह पुलिस के हाथ नहीं आया.

शमीम अख्तर बिहार छोड़ कर बंगाल भाग गया था. उस ने बंगाल और सिलीगुड़ी के मकान औनेपौने दामों में बेच दिए. ढाका आजाद चौक से सिमरन की बरामदगी के बाद फरार मुख्य आरोपी शमीम ने विभिन्न राज्यों में ठिकाना बनाने के बाद नेपाल के वीरगंज में पानी टंकी के पास नया ठिकाना बनाया था.

उस के बाद वह गाड़ी चोरी के रैकेट से जुड़ गया था. उस का अड्डा ढाका व बैरगनिया (सीतामढ़ी) से सटे गौर (नेपाल) में था. शातिर शमीम अख्तर चोरी की गाडि़यों के गौर पहुंचते ही नंबर प्लेट उतार कर नई नंबर प्लेट लगवा देता था, जिस के नाम से गाड़ी बेची जाती थी, उस के नाम वह फौरी तौर पर कागजात भी बनवा देता था. इस के साथ ही वह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ से भी जुड़ा था.

जांच में पुलिस को शमीम के नेपाल के त्रिभुवन एयरपोर्ट से पाकिस्तान जाने की वीडियो भी मिल गई है. शमीम नेपाल से कई बार पाकिस्तान जा चुका था. पुलिस को उस के पाक जाने के पुख्ता सबूत मिले हैं. शमीम आइएसआइ तक कैसे पहुंचा, इस की भी जांच की जा रही है. आइएसआइ से जुड़ कर उस ने नकली नोटों की खेप, मादक पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी तेज कर दी थी.

आशा उर्फ नूर शमीम अख्तर के लिए खतरा बन चुकी थी. अपने मां, बाप और भाई की हत्या की वही एकमात्र गवाह थी, जो उसे सजा दिला सकती थी. नेपाल में रह कर शमीम अख्तर उस की हत्या की योजना बना रहा था.

बात 3 अक्तूबर, 2016 की है. नूर अपने नाना के घर बाजपट्टी के बाबू नरहा और सीतामढ़ी की महिला चौकीदार इंदू देवी के साथ छत पर सोई थी. नूर को शमीम के चंगुल से मुक्त कराए जाने के बाद ढाका थाने ने उस की सुरक्षा में एक महिला और पुरुष सिपाही लगा दिए थे. रात 11 बजे के करीब नूर को घुटन महसूस हुई तो वह छटपटा कर उठ बैठी.

उस ने देखा कि कोई उस का गला दबा कर हत्या करने की कोशिश कर रहा था. वह उसे पहचान गई और चीखने लगी. उस की चीख सुन कर इंदू देवी उठ गईं. तब तक हमलावर छत से नीचे कूद कर फरार हो गया. नूर हमलावर को पहचान गई थी. वह उसी गांव का रहने वाला परमानंद कुमार था. नूर की चीख सुन कर नीचे से सिपाही अरविंद कुमार यादव भी ऊपर आ गया था. नूर ने हमलावर का नाम बताया. पुलिस ने उसी रात परमानंद कुमार को अवैध धारदार चाकू के साथ गिरफ्तार कर लिया और थाना बाजपट्टी ले आई.

थाने में पुलिस पूछताछ में आरोपी परमानंद कुमार ने पुलिस को बताया कि उसे शमीम अख्तर की ओर से नूर को जान से मारने के लिए पैसे मिले थे. ये पैसे उस के आदमियों ने दिए थे. बाजपट्टी थाने की पुलिस ने नूर की तहरीर पर भादंवि की धारा 452, 323, 376, 504, 506 और 34 के तहत परमानंद कुमार के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. बाद में उसे जेल भेज दिया गया. परमानंद की नाकामी से शमीम अख्तर बौखला कर रह गया था.

शमीम के ही इशारों पर बेतिया निवासी उस के आदमियों असगर उर्फ मोजाबिल अंसारी और अफगान अहमद ने हरदोई के एसपी राजीव मेहरोत्रा की सरकारी गाड़ी चुराई. इस वाहन की वजह से ही उस के गुनाहों का भंडाफोड़ हुआ और उसे जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा.

शमीम अख्तर अभी नेपाल की जेल में बंद है. भारत की पुलिस उस के प्रत्यर्पण के लिए कोशिश कर रही है. नेपाल की जेल में बंद शमीम अख्तर से लखनऊ एटीएस, एसटीएफ, लखनऊ स्पैशल ब्रांच, पटना स्पैशल ब्रांच, एटीएस, एटीएफ पटना की एसटीएफ के साथ मोतिहारी पुलिस के कई अधिकारियों ने पूछताछ की है.

लेकिन कानूनी दांवपेच के चलते शमीम को भारत नहीं लाया जा सका. उस के कई साथी गिरफ्तार किए जा चुके हैं और कई फरार चल रहे हैं. नूर के बयान पर ढाका थाने में शमीम के खिलाफ खुशबू सिंह, अमनदीप सिंह और संजीव सिंह की हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया था.

शमीम अख्तर ने जो गुनाह किए हैं, उस की फेहरिस्त काफी लंबी है. शायद कानून की किताबों की तमाम धाराएं उस के गुनाहों के सामने कम पड़ जाएं. मासूम नूर की तो दुनिया ही तबाह हो गई. उसे अपना कहने वाला कोई नहीं रहा.

उस के बचपन की हसरतों को शमीम ने छीन लिया था. उस के हिस्से में अंधेरों के सिवाय कुछ नहीं बचा. जैसे ही शमीम अख्तर के गिरफ्तार होने की सूचना 17 वर्षीय नूर को मिली, खुशी के मारे उस की आंखों से आंसू छलक पड़े. उस ने कानून से उस के लिए फांसी की सजा की गुहार की है.    

– कथा पुलिस सूत्रों, जनचर्चाओं और सोशल मीडिया पर आधारित. कथा में आशा उर्फ नूर नाम बदला हुआ है.

क्या आप भी शुरू कर रहे हैं अपनी कंपनी!

ज्‍यादातर लोगों कि इच्‍छा होती है कि उनका अपना कोई काम या कारोबार हो और वे खुद अपने बॉस हों. उनके पास ऐशोआराम की वे तमाम सुविधाएं उपलब्‍ध हों, जो देश एवं दुनिया के अमीर लोगों और कारोबारियों के पास होते हैं.

ऐसे में यदि आप भी अपनी कंपनी बनाकर खुद का कारोबार शुरू करना चाहते हैं. तो आइए हम बताते हैं कि कंपनी शुरू करने के लिए कौन-कौन सी औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती हैं. इसके साथ ही नई कंपनी रजिस्‍टर्ड कराने के लिए कितना शुल्‍क देना पड़ता है.

नई कंपनी के रजिस्‍ट्रेशन में लगते हैं 14-20 दिन

आमतौर पर किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के रजिस्‍ट्रेशन के लिए 14-20 दिन का समय लगता है, लेकिन रजिस्‍ट्रेशन में लगने वाला समय कस्‍टमर के द्वारा संबंधित डॉक्‍यूमेंट को जमा करने और सरकार के द्वारा इसको कितनी जल्‍दी स्‍वीकृति मिलती है, उस पर निर्भर करता है. इसलिए आपको अपनी कंपनी का नाम यूनिक रखना चाहिए और इससे संबंधित डॉक्‍यूमेंट को रजिस्‍ट्रेशन की प्रक्रिया शुरू होते ही जमा कराना चाहिए

कंपनी में अधिकतम 200 शेयर होल्‍डर्स

एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी खोलने के लिए कम से कम 2 लोगों की जरूरत होती है. प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में कम से कम दो डायरेक्‍टर और अधिक से अधिक 15 डायरेक्‍टर हो सकते हैं. इसमें कम से कम 2 शेयर होल्‍डर्स हो सकते हैं, जबकि आपको ज्‍यादा से ज्‍यादा 200 शेयर होल्‍डर्स रखने की इजाजत कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय (एमसीए) देता है.

कंपनी के डायरेक्‍टर बनने की योग्‍यता

आमतौर पर किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के डायरेक्‍टर बनने के लिए किसी व्‍यक्ति की आयु कम से कम 18 साल या इससे अधिक होनी चाहिए, जबकि योग्‍यता संबंधी कोई नियम तय नहीं है. इसलिए एक साधारण व्‍यक्ति भी किसी कंपनी का डायरेक्‍टर बन सकता है. इसके अलावा, डायरेक्‍टर बनने के लिए निवास स्‍थान और नागरिकता जैसी कोई बाध्‍यता भी नहीं है.

कंपनी शुरू करने के लिए कैपिटल

यदि आप प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की शुरुआत करने जा रहे हैं, तो कैपिटल मनी के रूप वह राशि कुछ भी हो सकती है. हालांकि कंपनी शुरू करने के लिए सरकार को फीस के तौर पर कम से कम 1 लाख रुपए शेयर के रूप में देना अनिवार्य है. ये पैसे ऑथराइज्‍ड कैपिटल फी के तौर पर कंपनी का रजिस्‍ट्रेशन कराने के दौरान देने होते हैं.

कंपनी खोलने के लिए ऑफिस जरूरी

भारत में कंपनी शुरू करने के लिए एक जगह की आवश्‍यकता होती है, जहां से कंपनी का संचालन होता है और उसी पते पर नई कंपनी रजिस्‍टर्ड भी होती है. यह जगह कमर्शियल, इंडस्ट्रियल और रेजिडेंशियल एरिया के अंदर भी हो सकती है.

रजिस्‍ट्रेशन के लिए अनिवार्य डाक्‍यूमेंट

कंपनी का रजिस्‍ट्रेशन कराते समय पहचान पत्र और पते के लिए प्रमाण पत्र प्रस्‍तावित सभी डारयेक्‍टर्स को देना होगा.

नई कंपनी के रजिस्‍ट्रेशन में भारतीय नागरिकों के लिए पैन कार्ड का होना भी जरूरी है. जिस पते पर कंपनी का रजिस्‍ट्रेशन कराया जाना है, उसका प्रमाण पत्र देना होगा.

कंपनी के रजिस्‍ट्रेशन के लिए मकान मालिक की ओर से जारी किया गया नो ऑब्‍जेक्‍शन सर्टिफिकेट भी देना अनिवार्य है. जिस व्‍यक्ति के नाम से रजिस्‍ट्रेशन कराया जाना है, उसका पहचान प्रमाण पत्र और पत्राचार प्रमाण पत्र भी देना जरूरी है.

जिस पते पर नई कंपनी का रजिस्‍ट्रेशन होना है, उस पते का भी प्रमाण पत्र पेश करना जरूरी है.

कंपनी की रजिस्‍ट्रेशन प्रक्रिया और फीस

कंपनी का रजिस्‍ट्रेशन कराने के लिए सबसे पहले आपको फॉर्म आईएनसी-29 भरकर जरूरी डॉक्‍यूमेंट के साथ रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के ऑफिस में जमा कराना होगा. यदि एमसीए द्वारा रजिट्रेशन के लिए प्रस्‍तावित कंपनी के नाम को स्‍वीकार कर लिया जाता है तो वह इनकॉरपोरेशन जारी करेगा. अगर वह नाम को स्‍वीकार नहीं करता है तो आपको नया नाम देना होगा.

अपने डब्बा फोन को बनाएं कार का म्यूजिक सिस्टम

क्या आप अपने पुराने स्मार्टफोन से बोर हो चुके हैं? क्या आप नया फोन खरीदने की सोच रहे हैं. अगर हां, तो पुराने फोन का क्या करेंगे. बेच देंगे या घर पर किसी को दे देंगे. लेकिन अगर फोन में कुछ दिक्कत हो तो ना तो आप उसे बेचेंगे ना ही आपके घर में कोई उसका इस्तेमाल करेगा. ऐसे में आप सोचेंगे कि आपका फोन बस एक डब्बा बन कर रह गया है.

लेकन ऐसा नहीं है. चलिए हम बताते हैं कि आपका ये डब्बा फोन बड़े ही काम की चीज है. जानें आप अपने पुराने फोन को कैसे रिसाइकल कर सकते हैं जिससे आप उसका बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं.

आप अपने पुराने स्मार्टफोन को अपने कार का मीडिया प्लेयर बना सकते हैं. कैसे तो चलिए आपको बता देते हैं.

– सबसे पहले अपने पुराने फोन की सिम निकालकर अपने नए फोन में लगा दें.

– फिर अपने पुराने फोन में ढेर सारे गानें डाउनलोड करें या फिर कॉपी करें.

– इसके बाद आप अपने पुराने स्मार्टफोन को कार के पावर पोर्ट से कनेक्ट करें.

– फिर ब्लूटूथ या 3.5 एमएम हैडफोन जैक के माध्यम से फोन को स्टीरियो से कनेक्ट करें.

तो लीजिए आपका पुराना स्मार्टफोन आपके कार का नया स्टीरियो बन चुका है. अब अगर आप अपने कार के पुराने सीडी प्लेयर को रिटायर करना चाहते हैं तो कर सकते हैं. अब इससे अच्छा इस्तेमाल एक पुराने फोन का और क्या होगा.

आप किस बात का इंतजार कर रहे हैं. आप भी अगर नया फोन लेने की सोच रहे हैं तो अपने पुराने फोन का इस्तेमाल एक क्रिएटिव ढंग से कीजिए.

आईपीएल 10 से जुड़े इन रोचक रिकॉर्ड्स के बारे में जानते हैं आप!

इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) का 10वां संस्करण खत्म हो गया. आईपीएल के सीजन 10 के खिताबी मुकाबले का फैसला बेशक गेंदबाजों के कारण मुंबई इंडियंस के हक में रहा लेकिन बीते 50 दिनों से क्रिकेट फैन्स का मनोरंजन कर रहे इस इलीट टी-20 आयोजन में कुल 10,662 रन सिर्फ चौकों और छक्कों से बने.

इस सीजन 18,775 रन बनें

इस साल कुल 60 मैच खेले गए. इस दौरान आठ टीमों ने कुल 18,775 रन बनाए, जिसमें से आधे से ज्यादा रन चौकों और छक्कों से निकले. हालांकि इस दौरान कुल 708 विकेट भी गिरे लेकिन पांच शतक और 95 अर्धशतक भी लगे.

पांच शानदार शतक

सबसे अधिक दो शतक किंग्स इलेवन पंजाब के सलामी बल्लेबाज हाशिम अमला ने लगाए जबकि दिल्ली के संजू सैमसन, पुणे के बेन स्टोक्स और सनराइजर्स हैदराबाद के कप्तान डेविड वॉर्नर ने एक-एक शतक लगाया.

ऑरेंज कैप के सरताज रहें वॉर्नर

डेविड वॉर्नर ने 126 रनों की पारी के साथ इस सीजन का सबसे बड़ा स्कोर बनाया. यही नहीं, वॉर्नर ने इस साल अधिक रन बनाए. वॉर्नर ने इस साल का ऑरेंज कैप जीता. वॉर्नर ने 14 मैचों में 58.27 की औसत से 641 रन बनाए, जिसमें एक शतक और चार अर्धशतक शामिल हैं. इस सीजन में उनका स्ट्राइक रेट 141.81 का रहा.

गंभीर दूसरे तो धवन तीसरे स्थान पर

कोलकाता नाइट राइर्ड्स टीम के कप्तान गौतम गंभीर सबसे अधिक रन बनाने वाले बल्लेबाजों की लिस्ट में दूसरे स्थान पर रहे. गंभीर ने 16 मैचों में 498 रन बनाए जबकि सनराइजर्स के ही शिखर धवन 479 रनों के साथ तीसरे स्थान पर रहे. वॉर्नर को ऑरेंज कैप मिलना तय था क्योंकि मुंबई इंडियंस और पुणे के बीच हुए फाइनल से पहले तक कोई भी खिलाड़ी इस रन स्कोर को छूता नहीं दिख रहा था. वॉर्नर ने एक पारी में 126 रन भी बनाए, जो इस सीजन का किसी भी बल्लेबाज का सर्वोच्च व्यक्तिगत योग रहा.

भुवनेश्वर ने दूसरी बार जीता पर्पल कैप

जहां तक सबसे ज्यादा विकेट की बात है तो हैदराबाद के ही भुवनेश्वर कुमार ने सबसे ज्यादा 26 विकेट लिए. पुणे के जयदेव उनादकट ने 24 विकेट लिए जबकि मुंबई के जसप्रीत बुमराह ने 20 विकेटों के साथ तीसरा स्थान हासिल किया.

इस मैच में लगे सबसे ज्यादा छक्के-चौके

किंग्स इलेवन पंजाब और मुंबई के बीच हुए 51वें मैच में कुल 62 चौके-छक्के लगे. इस मैच में 36 चौके और 26 छक्के लगाए गए.

कुछ रोचक रिकॉर्ड्स

एक मैच ऐसा रहा जो सुपर ओवर तक गया और एक मैच ऐसा भी रहा, जिसका फैसला आखिरी बॉल पर हुआ. इस सीजन में सबसे लम्बा छक्का 109 मीटर का रहा. पहले बल्लेबाजी करते हुए जीत का सबसे बड़ा अंतर 146 रनों का रहा. इसी तरह लक्ष्य का पीछा करते हुए बल्लेबाजी करने वाली टीम का जीत का सबसे बड़ा अंतर 10 विकेट का रहा.

एंड्रयू टाई की रिकॉर्ड गेंदबाजी

इस साल तीन हैट्रिक लगे और एंड्रयू टाई ने इस सीजन में पारी में सबसे अच्छी गेंदबाजी (17-5) का रिकॉर्ड बनाया. पुणे के हरफनमौला खिलाड़ी बेन स्टोक्स को मोस्ट वैल्यूबल खिलाड़ी का पुरस्कार मिला. इंग्लैंड के ऑलराउंडर स्टोक्स को पुणे ने नीलामी में 9.5 करोड़ देकर खरीदा था. स्टोक्स फाइनल में नहीं खेल सके. इसके बावजूद वह अपनी कीमत अदा करते हुए सबसे कीमती खिलाड़ी का पुरस्कार हासिल करने में सफल रहे.

दुनिया में हीरो बनें अफगानी राशिद

नीलामी में जब अफगानिस्तान के लेग स्पिनर राशिद के लिए जो कीमत अदा की गई थी उसे देखकर लगा था कि शायद हैदराबाद ने उन्हें ज्यादा कीमत दे दी. लेकिन राशिद ने अपने प्रदर्शन से साबित किया कि उन्हें जो चार करोड़ रुपये मिले उसके वह हकदार थें.

अपनी मिस्ट्री लेग स्पिन से उन्होंने पूरे संस्करण में बल्लेबाजों को खूब छकाया और रन भी बनाने नहीं दिए. टीम को जब जरूरत पड़ी राशिद ने विकेट भी निकाले. टीम को प्लेऑफ में पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई. इस संस्करण में उन्होंने 14 मैच खेले और 17 विकेट लेकर सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाजों की सूची में छठे स्थान पर रहे. उन्होंने 6.62 की औसत से 358 रन दिए. 

प्रो कबड्डी लीग 2017 : जानें किस खिलाड़ी के नाम रही नीलामी

प्रो कबड्डी लीग (पीकेएल) के आगामी पांचवें संस्करण के लिए हो रही खिलाड़ियों की नीलामी में नितिन तोमर सबसे महंगे खिलाड़ी बन कर उभरे हैं. उन्हें संस्करण की नई टीम यूपी ने 93 लाखों की भारी भरकम कीमत में खरीदा. नीलामी के शुरुआती दौर में मंजीत चिल्लर सबसे महंगे खिलाड़ी रहे थे. उन्हें जयपुर पिंक पैंथर्स ने 75.5 की कीमत में खरीदा, लेकिन नीलामी के आखिरी चरण में जब रेडरों की बोली लगनी शुरू हुई तो नितिन ने सभी रिकार्ड तोड़ डाले और मंजीत को पछाड़ कर सबसे मंहगे खिलाड़ी बने.

मंजीत को इसके बाद रोहित कुमार ने भी पछाड़ा. उन्हें बेंगलुरू बुल्स ने 83 लाख की कीमत में अपने साथ जोड़ा. के सेल्वामणि भी मंजीत को पछाड़ने के करीब पहुंच गए थे लेकिन जयपुर ने 73 लाख पर उनकी अंतिम बोली लगाई. पहले दौर में विदेशी खिलाड़ियों में सबसे महंगे बिकने वाले ईरान के अबोजार मोहाजेरमिघानी रहे. ईरान के इस डिफेंडर को सीजन-5 में नजर आने वाली नई टीम गुजरात द्वारा 50 लाख रुपये में खरीदा गया है.

इसके अलावा, ईरान के कबड्डी खिलाड़ी अबु फजल को दबंग दिल्ली ने 31.8 लाख रुपये में खरीद कर अपनी टीम में शामिल किया है. ईरान के ही फरहाज राहीमी को 29 लाख रुपये में तेलुगू टाइटंस ने खरीदा. थाईलैंड की कबड्डी टीम के कप्तान खोमसाम थोंगकम को हरियाणा स्टीलर्स ने 20.4 लाख रुपये खरीदा.

यू-मुंबा ने कोरिया के डोंगजु होंग को 20 लाख रुपये, ईरान के हादी ओश्तोरोक को 18.6 लाख रुपये और कोरिया के ही युंग जुओ को 8.10 लाख रुपये में खरीदकर टीम में शामिल किया है. पुनेरी पल्टन ने बांग्लादेश के जियाउर रहमान को 16.6 लाख रुपये और जापान के ताकामित्सु कोनो को आठ लाख रुपये में खरीदा है.

इसके अलावा, पटना पाइरेट्स ने ईरान के मोहम्मद मगसोदलोउ को आठ लाख रुपये में खरीदा, वहीं इस सीजन के लिए चार नई टीमों में शामिल उत्तर प्रदेश ने बांग्लादेश के सुलेमान कबीर को 12.6 लाख रुपये में खरीदा है.

सुरजीत बनें सबसे महंगे डिफेंडर

बंगाल वॉरियर्स ने सीजन-5 के लिए नीलामी में डिफेंडर सुरजीत सिंह को 73 लाख रुपये में खरीद लिया. पिछले साल कबड्डी विश्व कप जीतने वाली भारतीय टीम का हिस्सा रहे सुरजीत को अपनी टीम में शामिल कर बंगाल का लक्ष्य अपने डिफेंस को मजबूत करना होगा. सुरजीत कबड्डी लीग के इतिहास में सबसे महंगे बिकने वाले दूसरे खिलाड़ी हैं. सुरजीत से पहले ऑलराउंडर मंजीत चिल्लर को जयपुर पिंक पैंथर्स ने बड़ा दांव लगाते हुए 75.5 लाख रुपये में खरीदा.

कबड्डी लीग के पिछले चार सीजन में कुल 48 मैच खेल चुके पुनेरी पल्टन के डिफेंडर रहे रविंदर पहल को इस सीजन में बेंगलुरु बुल्स की टीम से खेलते देखा जाएगा. उन्हें बेंगलुरू ने 50 लाख रुपये में खरीद कर टीम में शामिल किया है.

इसके अलावा, कबड्डी लीग के तीन सीजन में यू-मुंबा और बंगाल वॉरियर्स के लिए खेल चुके डिफेंडर विशाल मणे को इस सीजन के लिए पटना पाइरेट्स ने 36.5 लाख रुपये में खरीदा है. पटना ने इसके अलावा अपने डिफेंस को और भी मजबूती देने के लिए सचिन शिंगड़े को 42.5 लाख रुपये में खरीदकर टीम में शामिल कर लिया है.

पिछले दो संस्करणों में पटना पाइरेट्स के कप्तान के रूप में नजर आए धर्मराज चेरालाथन को पुनेरी पल्टन ने 46 लाख रुपये में खरीदा. वह पिछले साल विश्व कप जीतने वाली भारतीय टीम के डिफेंडर और भारत की राष्ट्रीय कबड्डी टीम का प्रमुख हिस्सा रहे हैं.

इसके अलावा, बंगाल वॉरियर्स के डिफेंडर गिरीश मारुति एरनाक को पुनेरी पल्टन ने 33.50 लाख रुपये में खरीद कर टीम में जोड़ा है, वहीं डिफेंडर जोगिंदर सिंह नरवाल को यू-मुंबा ने 25 लाख रुपये में और दबंग दिल्ली ने डिफेंडर नीलेश शिंदे को 35.5 लाख रुपये में खरीदा है. जीवा कुमार को 52 लाख में टीम यूपी ने खरीदा.

जीवा सीजन-1 और चार में यु-मुम्बा के लिए खेले थे. उन्हें हासिल करने के लिए तमिलनाडु और जयपुर ने भी जोर लगाया था. मोहित चिल्लर को हरियाणा ने 46.5 लाख रुपये में खरीदा. मोहित की बोली 30 लाख से शुरू हुई थी. मोहित भी विश्व कप जीतने वाली टीम का हिस्सा रहे हैं. इससे पहले वह तेलुगू टाइटंस के लिए खेल चुके हैं. पिछली नीलामी की तुलना में मोहित को कम कीमत मिली.

सीजन एक और चार में जयपुर के लिए खेल चुके रोहित राणा को तेलुगू टाइटंस ने 27.5 लाख रुपये में खरीदा. सीजन चार में जयपुर के लिए खेलने वाले राइट कार्नर डिफेंडर अमित हुड्डा को तमिलनाडु ने 63 लाख रुपये में खरीदा. अमित डिफेंडरों में सबसे अधिक कीमत पाने वाले दूसरे खिलाड़ी रहे.

दक्षिण कोरिया के जान कुंग ली को बंगाल वॉरियर्स ने अपनी टीम में 80.3 लाख रुपये में रिटेन किया है. लेकिन मोहित चिल्लर अभी भी इस नीलामी में सबसे महंगे बिकने वाले खिलाड़ी बने हुए हैं. उन्हें जयपुर पिंक पैंथर्स ने 75.5 लाख रुपये में खरीदा है.

नितिन, रोहित के अलावा सोनू नरवाल भी छाए

रेडरों की सूची में सोनू नरवाल को हरियाणा ने 21 लाख रुपये में खरीदा. हरियाणा ने अंतिम समय में सोनू के लिए बोली लगाई.

सीजन-4 में जयपुर पिंक पैंथर्स के कप्तान रहे जसवीर सिंह को जयपुर ने ही 51 लाख रुपये में खरीदा. जयपुर ने अपने कप्तान को रीटेन नहीं किया. मनू गोयत को पटना पाइरेट्स ने 44.5 लाख रुपये में खरीदा.

इसी तरह बीते सीजन में दिल्ली टीम के कप्तान रहे काशीलिंग अडाके को 48 लाख रुपये में यू मुम्बा ने खरीदा. सुरेश हेगड़े को गुजरात ने 31.5 लाख रुपये में खरीदा. यह प्रो कबड्डी के अब तक के सभी चार सीजन में तेलुगू टाइटंस के लिए खेले थे.

नितिन मदाने को यू मुम्बा ने 28.5 लाख रुपये में खरीदा. सीजन चार में पटना को खिताब जीत दिलाने में अहम योगदान निभाने वाले राजेश मोंडाल को पुनेरी पल्टन ने 42 लाख रुपये में खरीदा. बीते सीजन में जयपुर के लिए खेलने वाले अजय कुमार इस सीजन में बेंगलुरू बुल्स के लिए खेलेंगे. अजय को बेंगलुरू ने 48.5 लाख रुपये में अपने साथ जोड़ा.

बीते सीजन में जयपुर के लिए खेल चुके केरल के अनुभवी खिलाड़ी शब्बीर बापू को यू मुम्बा ने 45 लाख में खरीदा. शब्बीर के रूप में मुम्बा ने तीसरा रेडर अपने साथ जोड़ा. इसी तरह हरियाणा ने सुरजीत सिंह को 42.5 लाख में अपने साथ जोड़ा.

सचिन करेंगे कबड्डी कबड्डी

फुटबाल और बैडमिंटन लीग में बतौर सह-मालिक प्रवेश कर चुके भारत के पूर्व दिग्गज क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर का कहना है कि वह तहेदिल से देश में कबड्डी को लोकप्रिय बनाना चाहते हैं और यही कारण है कि उन्होंने इस लीग के लिए चेन्नई फ्रेंचाइजी के साथ जुड़ने का फैसला किया है.

सचिन प्रो-कबड्डी लीग में शामिल चार नई टीमों में से एक चेन्नई फ्रेंचाइजी के सह-मालिक हैं. हैदराबाद के व्यवसायी नीमागड्डा प्रसाद इस फ्रेंचाइजी में उनके सहयोगी हैं. प्रसाद के पास व्यवसायिक और खेल के क्षेत्र में काफी अनुभव है और उनका कहना है कि जब प्रो-कबड्डी लीग में फ्रेंचाइजी टीमों की संख्या बढ़ाए जाने की पुष्टि हुई, तो सचिन ने खुद इसमें रुचि दिखाई.

हैदराबाद के पुलेला गोपीचंद बैडमिंटन अकादमी के निर्माण के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने वाले प्रसाद ने इंडियन सुपर लीग फ्रेंचाइजी केरला ब्लास्टर्स फुटबाल क्लब को भी मजबूती प्रदान करने में अहम योगदान दिया है.

प्रसाद ने प्रो-कबड्डी लीग सीजन-5 की नीलामी से पहले आयोजित संवाददाता सम्मेलन में कहा, “सचिन आज कई खेलों से जुड़े हुए हैं. क्रिकेट में मुंबई इंडियंस के साथ बतौर मेंटॉर जुड़ने के अलावा, वह केरला ब्लास्टर्स के सह-मालिक भी हैं. सचिन ने प्रो-कबड्डी लीग में चेन्नई फ्रेंचाइजी के साथ जु़ड़ते हुए कहा था कि वह हर खेल को बढ़ावा देने के लिए प्रयास करना चाहते हैं और कबड्डी तो जमीन से जुड़ा हुआ खेल है. इसके अलावा केरला ब्लास्टर्स के लिए क्लासरूट और युवा विकास कार्यक्रम के संचालन में उनकी अहम भूमिका रही है.”

सचिन बढाएंगे लोकप्रियता

सचिन के कबड्डी से जुड़ने के बारे में यू-मुंबा के कप्तान अनूप कुमार और तेलुगू टाइटंस द्वारा रीटेन किए गए खिलाड़ी राहुल चौधरी ने कहा कि सचिन जैसी शख्सियत के लीग से जुड़ने इसकी लोकप्रियता में और भी इजाफा होगा, क्योंकि जब कभी भी सचिन लीग के मैच के लिए स्टेडियम में पहुंचेंगे, तो उनको देखने वाले दर्शक भी बड़ी संख्या में स्टेडियम आएंगे. निश्चित तौर पर इससे कबड्डी की लोकप्रियता और बढ़ेगी.

देश में अच्छे हिंदी मीडियम स्कूलों की जरुरत : इरफान खान

बॉलीवुड और हॉलीवुड में नाम कमा चुके अभिनेता इरफान खान को आज भी लीक से हटकर फिल्में करने का शौक है. वे एक ऐसे कलाकार हैं, जो किसी भी किरदार में अभिनय से जान डाल देते हैं. यही वजह है कि उन्होंने टीवी से लेकर फिल्में, जहां भी काम किया सफल रहे. हालांकि उनका शुरुआती जीवन संघर्ष से भरा था, लेकिन उन्हें अपने पर विश्वास था कि वे एक दिन कामयाब होंगे. शांत और गंभीर चित्त के इरफान की जिंदगी में उनकी पत्नी सुतपा सिकदार का बहुत बड़ा हाथ है, जिन्होंने  हर समय हर काम में उनका साथ दिया है. इरफान का ‘हिंदी मीडियम’ फिल्म में काम करना भी उनके लिए चुनौती थी, क्योंकि इसमें दिखाए गए कुछ तथ्य उनके जीवन से काफी मेल खाते हैं. हिंदी भाषा और उससे जुड़े लोग आखिर अपने आप को कम क्यों समझते हैं? इस बारे में उन्होंने बातचीत की. पेश है अंश.

प्र. इस तरह के विषय पर काम कर सफल होने के बाद आप कितने खुश हैं? जबकि आज की पीढ़ी हिंदी में बातचीत करना और पढ़ना भूलती जा रही है?

ये एक ऐसा विषय है, जो सदियों से है और सदियों तक चलता रहेगा. मेरे हिसाब से अंग्रेजी आनी चाहिए, लेकिन अपनी राष्ट्र भाषा पर भी भरोसा होने की जरुरत है.

प्र. आप हिंदी भाषा के कितने करीब हैं?

बचपन से ही हिंदी के करीब रहा हूं. हालांकि पढ़ाई मैंने अंग्रेजी माध्यम से की है, लेकिन सोचता हिंदी में ही हूं. घर में माहौल हिंदी का ही था. हिंदी साहित्य मैंने पढ़ा है.

प्र. किस तरह के भेदभाव आप दैनिक जीवन में हिंदी को लेकर देखते हैं?

हमेशा ही देखता हूं कि हिंदी जानने वाले को कम और अंग्रेजी जानने वाले को बेहतर समझा जाता है. इसके अलावा अगर अंग्रेजी के किसी शब्द का उच्चारण हिंदी भाषी गलत करता है, तो अंग्रेजी के जानकार लोग उसे कौतूहल की दृष्टि से देखते हैं. दोहरी मानसिकता होती है. मैंने भी कई बार ऐसे हालात का सामना किया है. ये केवल हिंदी सिनेमा जगत में ही नहीं, हर जगह मौजूद है. यहां तो फिर भी हिंदी जानने वाले ही सारे कलाकार आज सुपर स्टार हैं. मेरे हिसाब से अंग्रेज देश छोड़कर चले गए हैं, पर अभी भी वे किसी न किसी रूप में राज कर रहे हैं. केवल भाषा ही नहीं, व्यवसाय से लेकर मीडिया, विकास के मोड्यूल, रहन-सहन आदि सब कुछ हम विदेश से ही लेते हैं.

प्र. आपके परिवार में हिंदी बोलचाल कितनी होती है, आपके बच्चे कितना हिंदी जानते हैं?

हिंदी हम पढ़ाते हैं और वैसा माहौल होता है. मैं हिंदी में बात भी करता हूं. हिंदी से वे अच्छी तरह परिचित हैं. ननिहाल जाते हैं तो बांग्ला भी बोल लेते हैं.

प्र. आपकी स्कूल लाइफ कैसी थी? कितना बदलाव अब आप अपने में महसूस करते हैं?

मेरी स्कूल लाइफ कैद खाने की तरह थी. सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक चलती थी. घर पर खेलना, कूदना तो रह जाता था. मैं सोचता था कि कब मेरा इस स्कूल से पीछा छूटे. छात्र के रूप में मैं बहुत ही बेकार था. क्लास में पीछे सोता रहता था. मेरे साथियों को पता भी नही था कि मैं उनकी कक्षा में हूं. कक्षा में क्या होता था, मुझे कुछ पता नहीं चलता था. अंत के कुछ दिनों में पढ़कर किसी तरह पास हो जाता था. मैं शरारती नहीं, शाय नेचर का था. मुझे उस समय अंकगणित बहुत पसंद था. मैं अभी भी बहुत बदला नहीं हूं. अंदर से शर्मीले स्वभाव का हूं.

प्र. आप अपनी जर्नी को कैसे देखते हैं? क्या अभी कोई मलाल रह गया है?

मुझे जो भी काम अभिनय के क्षेत्र में मिला, करता गया. शुरुआत में काफी संघर्ष था, लेकिन मुझे अभिनय करना था, इसलिए धैर्य नहीं छोड़ा. धीरे-धीरे जो चाहा मिलता गया और आज यहां तक पहुंच चुका हूं. एक कलाकार कितना भी काम कर ले, कभी भी अपने काम से संतुष्ट नहीं रहता ,उसे हमेशा कुछ न कुछ अलग करते रहने की इच्छा रहती है.

प्र. हिंदी को आगे बढ़ाने की दिशा में आप क्या संदेश देना चाहते हैं?

हिंदी मीडियम के अच्छे स्कूल और वहां पढ़ाने वाले अध्यापकों की वेतन अधिक होनी चाहिए, ताकि अच्छे अध्यापक वहां आयें और बच्चों को शिक्षित करें. माता-पिता को भी ये भरोसा दिलाना चाहिए कि हिंदी मीडियम से भी पढ़कर बच्चा कुछ बनकर ही निकलेगा.

प्र. आगे की फिल्में कौन सी हैं?

अभी एक हॉलीवुड फिल्म करने वाला हूं. इसके अलावा एक बांगला फिल्म ‘डूब’ में मैंने फिल्म निर्देशक की भूमिका निभाई है. रिलेशनशिप पर आधरित इस कहानी को करने में मैंने बांग्ला भाषा को अच्छी तरह सीखा है. आगे कई हिंदी फिल्में भी कर रहा हूं.

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