Download App

निशाने पर अरुंधति राय

लोग बाबू राव स्टाइल का मसखरा ही न समझते रहें इसके लिए अभिनेता और सांसद परेश रावल को जरूरी लगने था कि वे भी ऐसी कोई बात कहें जो बुद्धिजीवियों जैसी लगती हो. इससे भी आसान रास्ता उन्हें यह लगा कि बेहतर और शॉर्ट कट तो यह है कि किसी बुद्धिजीवी की आलोचना कर दी जाये. इससे मीडिया इस बात का प्रचार प्रसार कर देगा कि परेश रावल भी मुख्य धारा से जुड़े हुये हैं.

बिना किसी शोध या खोजबीन के उन्हें बुकर पुरुस्कार विजेता लेखिका अरुंधति राय की याद हो आईं जिन्होंने कश्मीर में पत्थरबाजों को जीप के आगे बांधकर भ्रमण कराने पर एतराज दर्ज कराया था. बस इस पर परेश रावल ने ट्वीट कर दिया कि अब आर्मी जीप में अरुंधति रॉय को बांधना चाहिए. इस ट्वीट को उम्मीद से भी ज्यादा रेस्पोंस मिला, तो वे धन्य हो उठे, इतनी प्रतिक्रिया तो बाबू राव और डाक्टर घुंघरू वाले किरदार निभाने पर तो दूर कभी मिस इंडिया रहीं अभिनेत्री स्वरूप सम्पत से शादी करने पर भी नहीं मिली थी. ट्वीट पर जो प्रतिक्रियाएँ मिलीं वे जाहिर है कथित गंवार, देहातियों की नहीं, बल्कि उस बुद्धिजीवी वर्ग की ही थीं जिसके बीच पहचान और पैठ बनाने परेश रावल बेताब थे.

पर असल मुद्दा या मन की बात कुछ और है कि अरुंधति की विचारधारा कुछ कुछ माओवादियों से मिलती जुलती है, एक हद तक वे सशत्र हिंसा की सशर्त हिमायती हैं और भगवावाद की विरोधी भी हैं इसलिए पौराणिकवादियों की आंख की किरकिरी भी बनी रहती हैं. अरुंधति राय का स्पष्ट मानना है कि कितने भी सैनिक तैनात कर दो, उससे कश्मीर समस्या हल नहीं होने वाली, उलट इसके भक्तों की मांग और मंशा यह है कि एक बार सेना को आतंकियों के सफाये का हुक्म सरकार दे दे, तो घाटी आतंक मुक्त हो जाएगी.

अरुंधति के बहाने परेश रावल भक्त मण्डल का प्रतिनिधित्व करते समूचे हिंसा विरोधियों पर निशाना साधने की कोशिश में गच्चा खा गए हैं, क्योंकि जो वह कह गए वह कानून के साथ साथ उस नैतिकता के भी खिलाफ है जिसका राग आए दिन धर्म के ठेकेदार अलापते रहते हैं, जबकि रामायण सहित तमाम धर्मग्रंथ हिंसा खून खराबे और छल कपट से भरे पड़े हैं. हिन्दू स्वभावतः हिंसक नहीं हैं, यह गीत गाने वालों को एक दफा परेश रावल की मंशा समझने की कोशिश करनी चाहिए, जिन्होंने सिर्फ प्रचार के लिए अरुंधति राय के नाम का सहारा लिया, नहीं तो उनके ट्वीट्स पर कोई नजर भी नहीं डालता.  

अब हार्दिक पटेल ने कराया मुंडन

गायक सोनू निगम द्वारा अजान की आवाज से दुखी होकर कराये गए मुंडन का बवाल अभी थमा ही था कि गुजरात में पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने भी मुंडन करा डाला. हार्दिक के मुंडन की वजह प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का दो दिवसीय गुजरात दौरे का विरोध है. सोनू निगम के मुंडन के मुकाबले हार्दिक के मुंडन को ज्यादा तवज्जो नहीं मिली, क्योंकि यह किसी धर्म या उसके पाखंड से ताल्लुक रखता हुआ नहीं था, इसके बाद भी उनकी धमक बरकरार है.

हार्दिक को समझ आ रहा है कि अगर पटेल–पाटीदार समुदाय को आरक्षण दिलाना है तो उन्हें सक्रिय राजनीति में पांव रखना ही पड़ेगा और इस बाबत वे साफ कह भी चुके हैं कि अगर गुजरात में भाजपा को हराने कांग्रेस में जाना पड़ा तो जाऊंगा. हार्दिक पटेल की जमीनी पकड़ और लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे उन्हें गुजरात का मुख्य मंत्री पेश करने की पेशकश कर चुके हैं, यानि मोदी विरोधी हर दल और व्यक्ति या नेता हार्दिक में संभावनाएं देख रहा है तो कुछ तो बात इस युवा पटेल नेता में है.

पाटीदार अनामत आंदोलन के बैनर तले हार्दिक ने बोटाद में उसी जगह मुंडन कराया जहां मोदी पिछली दफा आए थे. हार्दिक अब सियासी ड्रामेबाजी के साथ साथ परिपक्व भी हो रहे हैं, इसलिए अपने अर्ध घुंघराले केश समारोह पूर्वक मुड़वाने के बाद उन्होंने मोदी को दूसरों की तरह सीधे फेंकू न कहते यह कहा कि प्रधान मंत्री सिर्फ बड़ी बड़ी बातें करते हैं, जबकि सच्चाई कुछ और होती है. इस का उदाहरण भी हार्दिक ने दिया कि जिस सोनी योजना की शुरुआत पीएम ने एक महीना पहले की थी, उसी योजना में आज पानी नहीं है.

साफ दिख रहा है कि हार्दिक पटेल नाम की चुनौती से निबटना भाजपा और मोदी दोनों के लिए आसान नहीं होगा, लेकिन मोदी के पास इसका भी मंत्र है जिसे वे गुजरात विधानसभा चुनाव के पहले पढ़ भी सकते हैं. यह मंत्र है हार्दिक पटेल और उनके आंदोलन की बातें, मांगें और शर्तें मान लेना इससे हार्दिक के पास फिर कहने या करने कुछ नहीं रह जाएगा और सारी क्रेडिट नरेंद्र मोदी बटोर ले जाएंगे.

यह आइडिया त्रेता युग का है कि जीतना है तो ताकतवर को गले लगा लो या दुश्मन के दुश्मन से हाथ मिला लो जैसा कि राम ने सुग्रीव और विभीषण के मामले में किया था. तब तक हार्दिक पटेल मुंडन कराएं या दूसरे किसी तरीके से अपने समुदाय के हित की बात कहें, मोदी की सेहत पर कोई असर पड़ेगा ऐसा लग नहीं रहा. 

ऐसे दिखें औफिस में स्मार्ट

औफिस में प्रेजैंटेबल और प्रोफैशनल नजर आना चाहती हैं, तो अपनी ड्रैस और मेकअप को दें स्मार्ट कौरपोरेट लुक और फिर देखिए कैसे आप लोगों पर अपना सकारात्मक प्रभाव छोड़ने में सफल होती हैं.

टीबीसी बाय नेचर की एमडी, मोनिका सूद बता रही हैं औफिस मेकअप से जुड़े कुछ

खास टिप्स:

आंखें

– आंखों के मेकअप की शुरुआत अच्छा बेस और आई प्राइमर लगाने से करें. आई मेकअप करते समय कभी आईब्रोज को अनदेखा न करें. समय न होने पर आईब्रोज के लिए क्लियर ब्राउन जैल का प्रयोग करना पर्याप्त रहता है.

– मसकारे का प्रयोग करते समय ध्यान दें कि वह लौंगलास्टिंग हो यानी 7-8 घंटों तक टिका रहे.

होंठ

– रोज वाले यानी आम लुक के लिए न्यूड पैंसिल या ग्लौस का इस्तेमाल करना बेहतर रहता है, क्योंकि इसे दिन में कभी भी आसानी से रीअप्लाई किया जा सकता है.

– आम दिन के लिए न्यूट्रल पिंक और सौफ्ट सेबल कोरल शेड का इस्तेमाल तो खास दिन के लिए बोल्डर शेड का प्रयोग करें.

– आंखों पर गहरे रंगों का इस्तेमाल करने के बजाय कुछ कलर ऐड करें. लिप मेकअप के लिए डार्क शेड्स का प्रयोग करें.

– रैट्रो वर्किंग लेडी लुक पाने के लिए स्किनटोन से मैच करता बेरी या ब्राउन रैड शेड का प्रयोग करें.

गाल

– चेहरे पर निखार लाने के लिए गालों पर हलका ब्लश होना जरूरी है.

– वर्कप्लेस पर बहुत ज्यादा शिमरी मेकअप प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल से बचें.

– चीकबोंस पर हलका सा शिमर बहुत अच्छा लगता है.

इन बातों का भी रखें खयाल

– लंबे समय तक टिकने वाले और लो मैंटेनैंस  प्रोडक्ट्स का प्रयोग करें.

– मेकअप से अपने चेहरे के स्पैशल फीचर्स पर उभार लाने का प्रयास करें.

– मेकअप से दूसरों का ध्यान खींचना तो ठीक

है पर याद रहे कि वह ऐसा न हो कि वे आप की जरूरी बातें सुनने के बजाय आप को घूरने लगें.

कैसा हो औफिस में हेयरस्टाइल

– मीडियम लंबे बाल हमेशा ट्रैंड में रहे हैं. इन्हें स्ट्रेट रख सकती हैं या फिर हलके भूरे या फिर दूसरे डार्क शेड्स में कलर करवा सकती हैं. अलगअलग तरह के हेयरस्टाइल बना सकती हैं अथवा स्टाइलिश लुक दे कर खुला भी छोड़ सकती हैं.

– ब्रेड का ट्रैंड नया नहीं है, पर इस में तरहतरह से बदलाव ला कर स्टाइल बदल सकती हैं. ब्रेड क्राउन और ब्रेड पिगटेल्स भी ट्रैंड में हैं.

– वौल्यूम से भरपूर बाल हमेशा लड़कियों की चाहत रही है. छोटे या लंबे हर तरह के बालों में यह जंचता है. छोटे बालों में कलर व हेयरड्रायर की मदद से उन्हें कर्ली या सीधा कर के भी वौल्यूम से भरपूर बना सकती हैं.

एल्प्स ब्यूटीपार्लर की फाउंडर डाइरैक्टर भारती तनेजा से जानते हैं औफिस के लिए कुछ खास परफैक्ट हेयरस्टाइल:

कौरपोरेट बन

सब से पहले बालों को कौंब से सुलझा कर उन में जैल लगा कर सैट कर लें ताकि वे आसानी से चिपक जाएं. इस के बाद साइड पार्टीशन कर के फ्रंट से फिंगर कौंब करें और सारे बालों को पीछे ले जा कर बन बनाएं और उसे बौब पिन से फिक्स कर दें. इस बन को हलका सा फैशनेबल टच देने के लिए स्टाइलिश ऐक्सैसरीज से सजा लें या फिर कलरफुल पिन से सैट कर दें.

स्लीक्ड बैक पोनी

बालों को प्रैसिंग मशीन के जरीए स्ट्रेट लुक दें और उस के बाद उन में हलका सा जैल लगा लें. ऐसा करने से लुक स्लीक नजर आएगा और स्टाइल भी देर तक टिका रहेगा. इस के बाद क्राउन एरिया से कौंब करते हुए बालों को उठा कर पीछे की तरफ कानों के लैवल पर टाइट पोनीटेल बना लें. पोनीटेल बनाने का यह लेटैस्ट पैटर्न सिर्फ फौरमल आउटफिट पर ही नहीं वरन कैजुअल पर भी खूब जंचेगा.

वैट वेवी हेयर

फ्रंट के बालों में जैल लगा कर उन्हें सैट कर लें ताकि आगे से बाल बिलकुल चिपके नजर न आएं. इस के बाद लैंथ के सभी बालों पर जैल व पानी लगाएं और उन में कैप रोलर लगा कर बालों को कुछ देर के लिए यों ही छोड़ दें. करीब 1-2 घंटों के बाद इन रोलर्स को खोल दें. बाल वेवी व कर्ली नजर आएंगे. साथ ही वैट लुक देने के कारण इन में चमक रहेगी व कर्ल्स भी देर तक टिके रहेंगे.

ड्रैसिंग सैंस

रोपोसो की फैशन हैड सिद्धिका गुप्ता से जानते हैं 2017 के वर्कवेयर ट्रैंड:

– पैंट के साथ डिकंस्ट्रक्टेड ड्रैस पहनें. यह डिस्ट्रक्चर्ड होती है और फैले हुए रफल्स व असमान हेमलाइन के साथ ढीली होती है. मात्रा व अनुपात में बड़े रफल्स के साथ नारीत्व का स्पर्श जोडि़ए. लेकिन बहुत ज्यादा न हो जाए, इस के लिए दिलचस्प वेस्टलाइन व हेमलाइन से कर्व्स कट कर दें.

– 2017 के फैशन में स्ट्राइप्स का बोलबाला है. आप चाहें तो विभिन्न आकार की स्ट्राइप्स को एकसाथ मिला सकती हैं. खड़ी स्ट्राइप्स का इस्तेमाल कर अपने कद में कुछ ऊंचाई का आभास दे सकती हैं.

स्टेटमैंट स्लीव्स

अपने वार्डरोब को स्लीव स्लिट, वन शोल्डर्स व पफ शोल्डर्स से भरें. इस स्टाइल का नया अपडेट है ओवरसाइज्ड सिल्हूट और लंबी स्लीव, जहां हैम्स लगभग घुटनों से रगड़ खाते दिखें.

खाकी

शर्ट ड्रैस से ले कर बैल्टेड स्कर्ट तक, रनवे से ले कर वर्क प्लेस तक खाकी का खूब इस्तेमाल हो रहा है.                    

ऐसे बढ़ाएं कौस्मैटिक्स की उम्र

माना कि हर मेकअप प्रोडक्ट की अपनी उम्र होती है जैसे मसकारे की 3 महीने, आईलाइनर की 6 महीने, तो फाउंडेशन की साल भर. लेकिन कई बार महंगे से महंगा कौस्मैटिक प्रोडक्ट भी डेट ऐक्सपायर होने से पहले खराब हो जाता है. इस का सब से बड़ा कारण है कौस्मैटिक्स के रखरखाव और देखभाल की कमी. आप अपने मेकअप प्रोडक्ट्स की उम्र उन की ऐक्सपायर्ड डेट से भी आगे बढ़ा सकती हैं. कैसे, बता रहे हैं मेकअप आर्टिस्ट अजय बिष्ट:

यों बचाएं खराब होने से

कौस्मैटिक्स को खराब होने से बचाने के लिए इन बातों का ध्यान रखें:

उंगलियों के इस्तेमाल से बचें: किसी भी कौस्मैटिक का इस्तेमाल करने के लिए उंगलियों का प्रयोग न करें. उंगलियों में एक तरह का औयल होता है, जिस के संपर्क में आने से प्रोडक्ट्स में बैक्टीरिया पनपने लगते हैं, जिस से प्रोडक्ट्स जल्दी खराब हो जाते हैं.

मेकअप प्रोडक्ट्स शेयर न करें: अपने मेकअप प्रोडक्ट्स किसी के साथ शेयर न करें खासकर ऐसे प्रोडक्ट्स जिन का इस्तेमाल बिना किसी ब्रश, स्पंज के सीधे त्वचा पर किया जाता है.

मेकअप ब्रश को हमेशा क्लीन रखें: मेकअप करने के लिए न सिर्फ क्लीन ब्रश का इस्तेमाल करें, बल्कि ब्रश को हमेशा क्लीन भी रखें. इस के लिए गरम पानी में कुछ देर ब्रश को भिगो कर रखें, और माइल्ड शैंपू से धोएं. फिर कौटन के कपड़े से पोंछ कर इस्तेमाल करें. सप्ताह में 2 बार ब्रश की सफाई जरूरी है.

बारबार डिप करने से बचें: किसी भी लिक्विड मेकअप प्रोडक्ट को जैसे आईलाइनर, आईशैडो, लिपग्लौस, मसकारा, नेलपौलिश को यूज करते वक्त बारबार ऐप्लिकेटर को बोतल में डिप न करें. ऐसा करने से बाहर की हवा बोतल के अंदर जाती है और बोतल बंद करने पर उसी में रह जाती है, जिस से प्रोडक्ट्स खराब हो जाते हैं. इन बातों के अलावा यह भी ध्यान रखें कि आप के कौस्मैटिक प्रोडक्ट्स के ढक्कन अच्छी तरह बंद हैं या नहीं. अगर वे खुले हैं, तो हवा अंदर जा सकती है और प्रोडक्ट्स के खराब होने के चांसेज बढ़ जाते हैं.            

लिपस्टिक

अगर आप चाहती हैं कि आप की लिपस्टिक और लिपस्टिक का शेड दोनों ही हमेशा फ्रैश रहें, तो उसे ड्रैसिंगटेबल की दराज में रखने के बजाय फ्रिज में रखें. गरम जगह या धूप के संपर्क में रखने से लिपस्टिक मैल्ट हो कर खराब हो जाती है. कई बार मौइश्चर उभर आने से भी लिपस्टिक का शेड बदल जाता है.

आईलाइनर

अगर आप चाहती हैं कि आप का आईलाइनर लंबे समय तक चले तो लिक्विड आईलाइनर के बजाय पैंसिल आईलाइनर खरीदें. अगर आप लिक्विड आईलाइनर खरीद रही हैं, तो उसे हवा से बचा कर रखें वरना ड्राई हो सकता है. यदि कभी आईलाइनर सूख जाए तो उसे कुछ सैकंड्स के लिए माइक्रोवेव में रख दें. इस से वह फिर से नौर्मल टैक्स्चर में आ जाएगा.

आईशैडो

आईशैडो को लंबे समय तक सेफ रखना चाहती हैं, तो क्रीमी आईशैडो के बजाय पाउडर बेस्ड आईशैडो खरीदें. वह न तो जल्दी खराब होता है और न ही उस के मैल्ट या ड्राई होने की संभावना रहती है. साफसुथरे और नए ब्रश का इस्तेमाल कर के भी आईशैडो की उम्र को बढ़ा सकती हैं.

फाउंडेशन

फाउंडेशन की उम्र इस बात पर निर्भर करती है कि वह वाटर बेस्ड है या फिर औयल बेस्ड. चूंकि औयल बेस्ड फाउंडेशन में औयल होता है, इसलिए वह जल्दी खराब नहीं होता, जबकि वाटर बेस्ड फाउंडेशन में पानी की मौजूदगी उस के जल्दी खराब होने का कारण है. वैसे दोनों ही फाउंडेशन को फ्रिज में रख कर जल्दी खराब होने से बचाया जा सकता है.

लिप पैंसिल

लिपलाइनर की उम्र बढ़ाने के लिए उसे शार्पनर से शार्प करने के बाद उस की नोक पर थोड़ी सी वैसलीन या फिर हलका सा औलिव औयल लगा दें. ऐसा करने से इस्तेमाल करते वक्त पैंसिल आसानी से मूव करेगी. इस से न तो आप को पैंसिल रगड़ने की जरूरत होगी और न ही उसे बारबार शार्प करने की.

नेलपौलिश

नेलपौलिश अप्लाई करते वक्त उस की बोतल को किसी चीज से कवर कर दें वरना हवा के संपर्क में आने से नेलपौलिश अपनी ऐक्सपायरी डेट से पहले खराब हो सकती है. अगर नेलपौलिश सूख जाए तो उस में थोड़ा सा एसीटोन मिला कर उसे अच्छी तरह हिलाएं. इस से वह पहले की तरह नजर आएगी.

मसकारा

बाकी कौस्मैटिक के मुकाबले मसकारे की उम्र बहुत कम होती है. उस की उम्र बढ़ाने के लिए उसे हवा के संपर्क में न आने दें. इस के लिए मसकारे के ब्रश को बारबार बोतल में डालने और निकालने की भूल न करें. मसकारे के जल्दी खराब होने की एक वजह ऐप्लिकेटर भी है. अगर हर बार आप नए ऐप्लिकेटर का इस्तेमाल करती हैं तो उस की उम्र और भी बढ़ाई जा सकती है.

स्मार्ट आइडियाज

मेकअप प्रोडक्ट्स की उम्र बढ़ाने के कुछ स्मार्ट आइडियाज:

स्पंज नहीं ब्रश यूज करें: फाउंडेशन, ब्लशऔन जैसे मेकअप प्रोडक्ट्स लगाने के लिए स्पंज के बजाय ब्रश का इस्तेमाल करें. स्पंज इस्तेमाल करने पर वह मेकअप को सोख लेता है, जिसे यूज नहीं किया जा सकता, जबकि ब्रश बालों से बनाया जाता है, इसलिए वह मेकअप को सोख नहीं पाता, जिस से आप पूरी तरह से प्रोडक्ट का इस्तेमाल कर पाती हैं.

न्यू कंटेनर का इस्तेमाल करें: कौस्मैटिक प्रोडक्ट्स की सलामती के लिए न्यू कंटेनर का इस्तेमाल भी कर सकती हैं जैसे लिक्विड फाउंडेशन, आईशैडो, लिपग्लौस, ब्लशऔन जैसे लिक्विड प्रोडक्ट्स के आधे हिस्से को एक अलग कंटेनर में निकाल कर रखें और उसे डेली बेसिस पर यूज करें. इस से औरिजिनल बोतल में रखा मेकअप प्रोडक्ट ज्यों का त्यों फ्रैश रहेगा.

पाउडर बेस्ड प्रोडक्ट्स को दें प्राथमिकता: अगर आप कोई मेकअप प्रोडक्ट रोजाना यूज नहीं करने वाली हैं, तो वाटर या क्रीमी बेस्ड मेकअप प्रोडक्ट्स खरीदने के बजाय पाउडर बेस्ड मेकअप प्रोडक्ट्स खरीदें. वाटर और क्रीमी बेस्ड मेकअप प्रोडक्ट की तुलना में पाउडर बेस्ड प्रोडक्ट लंबे समय तक चलता है, जल्दी खराब नहीं होता.

पैक इस्तेमाल के वक्त ही खोलें: अगर आप किसी खास मौके पर लगाने के लिए लिपस्टिक, आईलाइनर या कोई अन्य मेकअप प्रोडक्ट ऐडवांस में ले रही हैं, तो खरीदने के तुरंत बाद उस की पैक को खोलने के बजाय उसी दिन खोलें, जिस दिन आप उसे इस्तेमाल करने वाली हैं. इस से मेकअप प्रोडक्ट की उम्र बढ़ सकती है.

गरम पानी में भिगो दें: मसकारा, लिपग्लौस, लिक्विड लिपस्टिक, लिक्विड आईलाइनर जैसे मेकअप प्रोडक्ट्स अगर ऐक्सपायरी डेट से पहले सूख जाएं, तो उन के ढक्कन अच्छी तरह से बंद कर के गरम पानी से भरे बाउल में कुछ देर के लिए डाल दें. इस से वे मैल्ट हो कर पहले वाले टैक्स्चर में आ जाएंगे.

कूल और ड्राई जगह रखें: कौस्मैटिक्स और स्किन केयर प्रोडक्ट्स को ठंडी और सूखी जगह पर रखें. सीधे सूर्य के प्रकाश के संपर्क में न आने दें. सूर्य की किरणों से क्रीमी कौस्मैटिक प्रोडक्ट्स जैसे लिपस्टिक मैल्ट हो सकती है, तो टोनर जैसे प्रोडक्ट्स ड्राई हो सकते हैं.

कब समझें प्रोडक्ट खराब हो गया है

बदबू: अगर मेकअप प्रोडक्ट से बदबू आ रही है, तो इस का मतलब वह खराब हो चुका है.

लुक: अगर कौस्मैटिक का कलर बदला नजर आ रहा है, उस में मौइश्चर आ गया है, वह पैची और ड्राई दिख रहा है, तो उसे तुरंत बदल दें.

टच: अगर मेकअप प्रोडक्ट बहुत ज्यादा चिपचिपा लग रहा है या फिर बहुत ज्यादा सूखा, तो उसे फेंकने में देरी न करें.

खुद खुश होंगे तभी दूसरों को खुशी दे पाएंगे : प्रियंका खुराना

30 वर्षीय प्रियंका खुराना दिल्ली की पलीबढ़ी हैं. कोलकाता से एमबीए की पढ़ाई की है. फिलहाल जापान की कंपनी में ऐग्जीक्यूटिव डायरैक्टर हैं. 2007 में शादी के बंधन में बंधने वाली प्रियंका 4 साल के बेटे की मां हैं. 2015 में मिसेज इंडिया का खिताब, तो 2016 में मिसेज अर्थ का खिताब अपने नाम किया.

अपने निजी जीवन की भूमिका को निभाते हुए प्रियंका ने किस तरह प्रोफैशनल लाइफ में भी सफलता पाई उन्हीं से जानते हैं:

ब्यूटी कौंटैस्ट में हिस्सा लेने का खयाल मन में कब आया?

जब मैं 16 साल की थी तब मौडल बनना चाहती थी. दिमाग में ब्यूटी कौंटैस्ट में हिस्सा लेने का भी खयाल था. लेकिन पढ़ाई में अच्छी थी, इसलिए पेरैंट्स ने भी पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा. उस के बाद शादी हो गई तो यह खयाल मन से निकल गया. बेटे के जन्म के बाद फिर एक बार जेहन में मौडलिंग का खयाल आया, जिस की वजह मेरा भाई और बेटा था. दरअसल, मेरे भाई को अचानक फोटोग्राफी का शौक चढ़ा और वह फ्री की मौडल चाहता था, तो मैं बन गई. शुरुआत में लगा कि अब क्या ये सब करना सही होगा? इसी बीच मेरा ध्यान अपने बेटे पर गया. इतनी छोटी उम्र में भी हर चीज बड़ी उत्सुकता से करता, बिना उस का अंजाम जाने. तब मुझे लगा क्यों न एक बार मैं भी खुद को मौका दूं. अत: मैं ने कोशिश की तो सफलता मिल गई.

घर और औफिस के काम के साथ फैशन वर्ल्ड में अपनी इमेज को कैसे मैनेज करती हैं?

घर में पत्नी, बहू और मां की भूमिका, औफिस में ऐग्जीक्यूटिव डायरैक्टर और फैशन वर्ल्ड में बतौर मौडल अपनी भूमिका निभाना मेरे लिए बहुत मुश्किल काम नहीं है. जब आप के पास बहुत ज्यादा काम आता है तब आप के अंदर काम करने की क्षमता भी बढ़ जाती है. दूसरी बात मैं जो भी काम करती हूं शतप्रतिशत उसी पर ध्यान केंद्रित करती हूं.

बच्चे की परवरिश करते वक्त किस बात का विशेष ध्यान रखती हैं?

मुझे अपने बेटे को किसी चीज का सौल्यूशन नहीं बताना है, बल्कि उसे ऐसा काबिल बनाना है कि वह खुद सौल्यूशन ढूंढ़ सके. आज बच्चे का इंटैलीजैंट होने से ज्यादा जरूरी इमोशनली स्ट्रौंग होना और हर समस्या का समाधान खुद निकालना है.

अपनी मां की कौन सी खूबी अपने अंदर चाहती हैं?

मेरी मम्मी गणित की टीचर हैं, इसलिए वे सारा काम मैथेडिकल तरीके से करती हैं. वे काफी और्गेनाइज्ड हैं. उन के हर काम में प्रोसैस होता है. उस वक्त मुझे ये चीजें बकवास लगती थीं, लेकिन अब लगता है कि काश यह क्वालिटी मुझ में भी होती तो मेरे लिए इतने सारे कामों को मैनेज करना आसान हो जाता.

परिवार को क्वालिटी टाइम देने में यकीन रखती हैं या फिर क्वांटिटी टाइम में?

पूरा दिन काम में निकल जाता है, लेकिन जैसे ही शाम होती है मैं उसे परिवार के नाम कर देती हूं. शाम अपने बेटे के साथ बिताती हूं. शनिवार और रविवार को परिवार के साथ फिल्म देखना, घूमने जाना पसंद करती हूं.

जो महिलाएं मां बनने के बाद प्रोफैशन को अलविदा कह देती हैं उन्हें क्या सलाह देना चाहेंगी?

हर इनसान यह बात अच्छी तरह जानता है कि उस के लिए क्या सही है. फिर भी मैं कहूंगी कि मां बनने के बाद पूरा 1 साल ईमानदारी से बच्चे को दें. उस के बाद अपने सपनों और ख्वाहिशों को भी पूरा करें. जरूरी नहीं कि आप उन्हें पूरा ही करें, उस राह पर चलें. ऐसा करने से आप को खुशी होगी.

अपनी सफलता के पीछे किसे देखती हैं?

सफलता उस बुके की तरह है, जो कई रंगबिरंगे फूलों से बनता है. मेरी सफलता के पीछे कई लोग हैं. उन में मेरा परिवार, पति, मेरा बेटा, ससुराल वाले, औफिस के लोग सभी हैं, जिन्होंने हमेशा मुझे सपोर्ट किया और आगे बढ़ने का मौका दिया.

परिवार ने पूरी पूरी मदद की : अनुपमा राग

अनुपमा की खनकदार आवाज का जादू फिल्म और वीडियो अलबम में देखने को मिलता है. उन के साथ सब से खास बात यह है कि वे किसी फिल्मी खानदान से संबंध नहीं रखतीं. इस के बाद भी न केवल गाने लिखती हैं, बल्कि उन्हें स्वर भी देती हैं और ऐक्टिंग भी करती हैं. अनुपमा ने शादी के बाद पति अनुराग सिंह के सहयोग से मुंबई जा कर गायन में कैरियर बनाना शुरू किया. यह उन की आवाज का ही दम था कि कम समय में ही उन के खाते में कई हिट फिल्में आ गईं. अब उन का सोलो अलबम ‘नैना रे’ आने वाला है. इस के अलावा हनी सिंह के साथ भी उन का एक अलबम आने वाला है.

अनुपमा अपने घरपरिवार और सरकारी नौकरी के साथ सब कुछ मैनेज कर रही हैं, जो अपनेआप में एक मिसाल है. पेश हैं, उन के साथ हुई बातचीत के प्रमुख अंश:

परिवार में कोई फिल्मों में नहीं था. ऐसे में अलग दिशा में कैरियर बनाने की कैसे सोची?

लखनऊ के लोरेटो कौन्वैंट से इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई करने के बाद मैं ने अवध गर्ल्स डिग्री कालेज से स्नातक किया. इस के बाद अपना गायन का शौक पूरा करने के लिए भातखंडे संगीत महाविद्यालय जाने लगी. यहां से विशारद करने के बाद गायकी में कैरियर बनाने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री पहुंच गई. यह सरल काम नहीं था. एक गाने की रिकौर्डिंग कई आवाजों के साथ की जाती है. जिस की वौइस क्वालिटी अच्छी होती है और जिसे पब्लिक पसंद करती है उसे ही फिल्म में मौका दिया जाता है. ऐसे में कई बार तो फिल्म में आतेआते गाना रह जाता था. जब गाना फिल्म में आता है तभी पता चलता है कि हमारा गाना इस फिल्म में है.

सफलता का एहसास कब हुआ?

मैं ने क्लासिल गायन सीखा था. फिल्मों में मेरी आवाज में फोक सौंग ज्यादा पसंद किया गया. मुझे वे गाने ही गाने के लिए मिले जो पब्लिक की पसंद के हिसाब से तैयार किए गए थे. मेरी फिल्म ‘बिन बुलाए बराती’ भले ही न चली हो पर मेरा गाया गाना ‘मुन्नी भी मानी शीला भी मानी शालू के ठुमके की दुनिया दीवानी…’ लोगों की जबान पर खूब चढ़ा. फिल्म ‘जिला गाजियाबाद’ में मेरा गाना ‘गाजियाबाद की रानी हूं मैं…’ भी खूब पसंद किया गया. फिल्म ‘गुलाब गैंग’ में ‘रंगी सारी गुलाबी चुनरिया रे…’ गाने में माधुरी दीक्षित का साथ देने के  बाद मेरेकई वीडियो अलबम आ चुके हैं. इन में मीका सिंह और उर्वशी रौतेला के साथ ‘लाल दुपट्टा’, राहत फतेह अली खान, कुणाल खेमू और वर्तिका सिंह के साथ ‘सांवरे’ को लोगों ने खूब पसंद किया. मेरा सोलो वीडियो अलबम ‘नैना रे’ आने वाला है. इस में मैं ने खुद ही गाने लिखे, गाए और ऐक्टिंग की है.

शादी के बाद कैसे संभाला सब कुछ?

2004 में मेरी शादी हो गई. उस समय मैं जौब करने लगी थी. शादी के बाद ही पति अनुराग को पता चला कि मुझे गाने का शौक है. तब वे मुझे इसी क्षेत्र में कैरियर बनाने की सलाह देने लगे. पति के हौसला बढ़ाने के बाद ही मैं ने गायन के रियाज को गंभीरता से लेना शुरू किया. मैं सुबहशाम 2 घंटे रियाज करने लगी. उस समय पति खुद मेरे श्रोता बन जाते थे. इस के बाद मैं मुंबई आनेजाने लगी. यहां का संघर्ष बहुत लंबा नहीं रहा. 2007 में पहला म्यूजिक अलबम ‘रूद्र’, 2009 में म्यूजिक अलबम ‘अर्श’ और 2011 में पहली फिल्म ‘बिन बुलाए बराती’ में गाने का मौका मिला, तो धीरेधीरे पहचान भी बनने लगी.

आप का छोटा बेटा भी है. उसे कैसे संभालती हैं?

हम संयुक्त परिवार में रहते हैं. ऐसे में मेरे पेरैंट्स उसे संभाल लेते हैं. काम के बाद मेरे पास जो समय बचता है उसे बच्चे को देती हूं.

आप स्कैचिंग का भी शौक रखती हैं?

स्कैचिंग ऐसी कला है जिस के जरीए अपने मन की बातें दूसरे तक पहुंचाई जा सकती हैं. मैं जब खाली समय पाती हूं तो पैंसिल से कुछ न कुछ बनाने का प्रयास करती रहती हूं. अब यह लोगों को पसंद आ रहा है.                   

रेव पार्टियों का बढ़ता क्रेज

आज युवाओं में पार्टी देने या लेने का शगल तेजी से बढ़ता जा रहा है. वे बातबात पर पार्टियां आयोजित करते हैं जिन में भरपूर मस्ती होती है. ये पार्टियां देर तक चलती हैं. ऐसी ही एक पार्र्टी है रेव पार्टी. रेव पार्टियों की शुरुआत 20वीं सदी के छठे दशक में लंदन में हुई थी. पहले इस प्रकार की पार्टियां जंगल में आयोजित की जाती थीं, लेकिन 1960 के बाद इन्हें शहर के गुमनाम पबों और गैराजों में आयोजित किया जाने लगा. इस दौरान इन पार्टियों के लिए एक विशेष संगीत तैयार किया गया जिस में इलैक्ट्रौनिक वा-यंत्रों का प्रयोग भी किया गया. जिस का 28, जनवरी 1967 को राउंड हाउस में सार्वजनिक प्रदर्शन किया गया था. 1970 के दशक में यह संगीत काफी लोकप्रिय हुआ था.

1970 में जब कुछ हिप्पी गोआ घूमने आए तो उन के द्वारा गुपचुप तरीके से इन पार्टियों की शुरुआत गोआ के पबों में भी कर दी गई. धीरेधीरे इन पार्टियों में हिप्पियों के साथ कुछ स्थानीय युवा भी जुड़ने लगे, क्योंकि हिप्पियों द्वारा शुरू की गई इन रेव पार्टियों में शराब, ड्रग्स, म्यूजिक, नाचगाना और सैक्स का कौकटैल परोसा जाता था. धीरेधीरे भारत के धनकुबेरों में इन पार्टियों का के्रज बढ़ता जा रहा है. इन पार्टियों का विस्तार मैट्रो शहरों के साथ ही जयपुर, नोएडा व गुड़गांव जैसे शहरों में भी हो चुका है. रेव पार्टी का शाब्दिक अर्थ है मौजमस्ती की पार्टी. रेव का अर्थ मदमस्त और उत्तेजित होना भी है. मदमस्त और उत्तेजित होने के लिए अमीर अपनी गर्लफ्रैंड व बौयफ्रैंड्स के साथ एसिड, एक्सटैसी, हशीश, गांजा, हेरोइन, अफीम, चरस, साथ ही शराब का भी भरपूर प्रयोग करते हैं.

दिल्ली स्थित एक डिएडिक्शन सैंटर की वरिष्ठ डा. अनीता चौधरी का कहना था कि आधुनिक धनकुबेरों की बिगड़ी संतानें रेव पार्टियों के प्रति जनूनी बन रही हैं. यह बात दीगर है कि ड्रग्स लेने से कुछ समय के लिए उत्तेजना और शक्ति बढ़ जाती है. इसलिए वे ड्रग्स लेने के बाद काफी समय तक थिरकते और मटकते रहते हैं, लेकिन ये ड्रग्स युवाओं में आक्रामकता भी पैदा करते हैं. बचपन बचाओ आंदोलन के प्रमुख कैलाश सत्यार्थी की मानें तो हमारे देश के लगभग 19 फीसदी किशोर व युवा किसी न किसी नशे के आदी हैं.

रेव पार्टियों के शौकीन युवा फ्री सैक्स में विश्वास रखते हैं. इसलिए इन पार्टियों में सैक्स है, नशा है, खुमार है और मस्ती के नाम पर अश्लीलता है. इस संस्कृति को दिन के उजाले से नफरत और रात के अंधेरे से बेइंतहा प्यार होता है. कमाओ, ऐश करो और मरो या मारो, इस अपसंस्कृति का मूलमंत्र है. कुछ लोग इसे निशाचर संस्कृति भी कहते हैं.

20वीं सदी के अंत तक केवल कुछ बिगड़े हुए युवा ही रात रंगीन किया करते थे, लेकिन वर्तमान में युवतियां भी ऐश व रात रंगीन करने के इस जश्न में बराबर की भागीदार हैं. रेव पार्टियों की रंगबिरंगी रोशनी और मदहोश करने वाले संगीत में ये आधुनिक युवतियां भी पूरी तरह मदमस्त हो जाती हैं. वे अपने जीवन की सार्थकता उन्मुक्त आनंद और मौजमस्ती को ही मान रही हैं. इन रेव पार्टियों का प्रवेश शुल्क 5 से 10 हजार रुपए तक होता है. इस प्रकार की रेव पार्टियां पांचसितारा होटल, क्लब व आधुनिक फौर्म हाउसों में आयोजित की जाती हैं, जहां पर नृत्य व संगीत के आनंद के साथ ही लेजर तकनीक के जरिए साइकेडेलिक रोशनियों से चकाचौंध पैदा की जाती है और रंगबिरंगे इस माहौल में युवा मैसमेराइज होने लगते हैं.

एक कड़वा सच यह भी है कि इन रेव पार्टियों में जबरदस्त कानफोड़ू म्यूजिक, लाइट शो के साथ ही नशीले पदार्थों का भी भरपूर प्रयोग होता है. इन नशीले पदार्थों में जो सब से फेवरिट और डिमांड वाले हैं वे हैं, एसिड और एक्टैसी. इन्हें लेने के बाद युवा लगातार 8 घंटे तक डांस कर सकते हैं. ये ड्रग्स उन में लगातार नाचने का जनून पैदा करते हैं. इन पदार्थों को लंबे समय तक सैक्स करने के लिए भी युवाओं द्वारा उपयोग में लाया जाता है. इन रेव पार्टियों में धोखे से युवतियों को डेट रेप ड्रग दे कर उन का बलात्कार तक किया जाता है.

चुनाव में मुसलिम संगठनों का रोल

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की भारी जीत को जहां एक ओर नए समीकरण के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर आम मुसलिमों के मन में इस पार्टी को ले कर डर और शक बढ़ता जा रहा है.

सियासी तौर पर मुसलिमों की ताकत कैसे बढ़े, इस पर भी कोई गंभीर बहस होती नहीं दिखाई पड़ रही है. इस वजह से यह सवाल और भी अहम हो रहा है कि क्या आने वाले दिनों में भारत में मुसलिम सियासत का रोल न के बराबर हो जाएगा? क्या उन के बिना भी सियासी पार्टियां सत्ता तक पहुंच सकेंगी?

साल 2014 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश के लैवल पर इस तरह का नमूना देखने को मिला था और साल 2017 के विधानसभा चुनावों में भी कुछ ऐसा ही नजारा दिखाई पड़ा है. यहां मुसलिम बहुल 140 सीटों में 20-30 फीसदी मुसलिम हैं, जिन में से महज 24 सीटों पर मुसलिम उम्मीदवार कामयाब हुए हैं, जबकि 82 सीटें मुसलिम वोटों के बंटने के चलते भारतीय जनता पार्टी के खाते में चली गईं.

यहां बुनियादी सवाल मुसलिम वोटों की ताकत का है. कहा जाता है कि ये जिस तरफ जाएंगे, जीत उसी की होगी, जो इन चुनावों में सचाई से परे साबित हुआ.

बाबरी मसजिद मामले के बाद मुसलिम कांग्रेस से नाराज थे. साथ ही, भाजपा से भी उन की दूरी थी. तीसरा मोरचा उन की पहली पसंद था, लेकिन तीसरे मोरचे की सियासत ज्यादा दिनों तक नहीं चली और मुसलिम वापस कांग्रेस में चले गए.

तब सवाल उठा था कि कांग्रेस में ऐसी क्या तबदीली आई है कि मुसलिम नेतृत्व द्वारा उस को माफ कर उस के हक में मुसलिमों को खड़ा किया जा रहा है?

उस समय ‘टैक्टिकल वोटिंग’ की शब्दावली सामने लाई गई, जिस का मतलब यह था कि जिस सैकुलर पार्टी का उम्मीदवार भाजपा को हराने की ताकत रखता हो, मुसलिम उस के हक में वोट करें. इसे कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा नेगेटिव सोच से ग्रसित वोटिंग कहा गया.

जब इस शब्दावली को मुसलिमों से परिचित कराया गया था, उस समय से ले कर आज तक इस सवाल का जवाब नहीं मिला है कि इस शब्दावली के इस्तेमाल से किस को कितना फायदा हुआ? क्या मुसलिमों की राजनीतिक ताकत बढ़ी या जिस के विरोध में यह मुहिम चलाई गई, उस के हक में माहौल बना? यह एजेंडा किस का था? अगर यह मुसलिम नेतृत्व का था, तो क्या वह इस की नाकामी पर विचार करने के लिए तैयार है? अगर ऐसा नहीं है, तो क्या यह आरोप सही है कि यह भाजपा का एजेंडा है, जिस का शिकार सीधेतौर पर मुसलिम नेतृत्व हुआ है?

जहां तक उत्तर प्रदेश में मुसलिम वोटों के बंटने या कोई असर न छोड़ पाने की बात है, तो यह बात सभी कह रहे हैं कि सैकुलर पार्टियों के चलते मुसलिम वोट बंटे हैं, क्योंकि इन सैकुलर पार्टियों ने मुसलिम बहुल इलाकों से मुसलिमों को अपना उम्मीदवार बनाया था. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों के मुसलिम उम्मीदवार एकदूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में थे और कई जगहों पर तो 4-4 मुसलिम उम्मीदवार मुकाबले में थे, जबकि भाजपा ने किसी भी मुसलिम को टिकट न दे कर अपनी नीति साफ कर दी थी.

इस सूरतेहाल से वोटर समझ नहीं पाए और भाजपा यही चाहती थी कि मुसलिम वोटर कुछ न समझें और उन के वोट बंट जाएं, जिस से उस की जीत पक्की हो सके.

भाजपा इस मिशन में पूरी तरह कामयाब रही. समाज के अलगअलग तबकों को अपने साथ जोड़ते हुए वह उन्हें यह समझाने में कामयाब रही कि अखिलेश मुसलिमपरस्त हैं, मुलायम सिंह यादव कारसेवकों पर गोली चलवा कर अपनी हिंदू विरोधी सोच का परिचय दे चुके हैं. मायावती को भी मुसलिमों का हमदर्द बताया, जिस का सुबूत उन के द्वारा इस चुनाव में एक सौ मुसलिम उम्मीदवारों को टिकट दिया जाना है. भाजपा ही बहुसंख्यक तबके यानी हिंदुओं की रक्षक है, इसलिए उस को मजबूत करना समय की पुकार है.

आल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुसलीमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी पर वोट काटने का आरोप तो नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि उन्होंने सिर्फ 38 उम्मीदवारों को ही टिकट दिया और वे सभी हार गए, जबकि उन्हें 2 हजार से 4 हजार वोट ही मिले. सिर्फ संभल में शफीकुर्रहमान बर्क के पोते को 60 हजार वोट मिले, लेकिन उस की वजह मजलिस नहीं, बल्कि उन के दादा और खुद उन का काम है.

असदुद्दीन ओवैसी इलैक्ट्रौनिक चैनलों पर जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं, वह आपसी भाईचारा बढ़ाने के बजाय झगड़ेफसाद पैदा करने का काम करती है, जिस का फायदा भाजपा को हुआ.

मिसाल के तौर पर उन्होंने एक टैलीविजन चैनल पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए कहा था कि ‘नरेंद्र मोदी हमारे प्रधानमंत्री नहीं हैं.’

संघ परिवार ने इसे हिंदूमुसलिम धु्रवीकरण के लिए जम कर इस्तेमाल किया. इस बयान से बहुसंख्यक समाज में यह पैगाम गया कि मुसलिम अपने अलावा किसी दूसरे की अगुआई को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं. इस ने बहुसंख्यक समाज के वोटरों को भी भाजपा के पाले में आने पर मजबूर कर दिया.

वहीं आजम खां की भी भाजपा की ओर वोट खिसकाने में अहम भूमिका रही. उन्होंने किसी समस्या पर तथ्यों पर आधारित आंकड़ों से नीतिगत बातचीत करने के बजाय ‘बादशाह’ या ‘राजा’ कह कर नरेंद्र मोदी को निशाना बनाया, जिस का वोटरों पर गलत असर पड़ा और लोगों में नरेंद्र मोदी के लिए हमदर्दी पैदा हो गई.

इन चुनावों को ले कर जहां एक ओर सियासी पार्टियां अपनी पूरी ताकत लगाए हुए थीं, वहीं दूसरी ओर मुसलिम संगठन भी इसे बहुत अहम मान रहे थे.

अखबारों में उन के बयान और भाजपा के सत्ता में आने पर संदेहों से लेख भरे थे, जिस से वोटरों को सचेत करते हुए उसे नाकाम करने की बात कही जा रही थी. लेकिन नाकाम करने का क्या तरीका हो, इस पर मुसलिम संगठन कुछ भी बोलने को तैयार नहीं थे, क्योंकि तब उन का सीधा मुकाबला सैकुलर पार्टियों से था.

यही वजह थी कि मुसलिम संगठनों के फैडरेशन ‘आल इंडिया मुसलिम मजलिस ए मुशावरत’ की 3 बैठकें दिल्ली में हुईं. इन में कई मुसलिम संगठनों के पदाधिकारी शामिल हुए थे, पर वे भी किसी एक नतीजे पर नहीं पहुंच सके कि वोटरों से वोट देने के लिए किस पार्टी के हक में अपील की जाए. जबकि इस के पहले जमायत ए इसलामी हिंद, मुशावरत और आल इंडिया मिल्ली काउंसिल सैकुलर पार्टियों के उम्मीदवारों के नामों की लिस्ट जारी कर उन्हें वोट देने की अपील करती थीं. लेकिन तब ये सभी संगठन अपनेअपने लैवल पर काम करते थे, संयुक्त रूप से किसी एक मामले पर सहमत न होने के चलते इस बार वोटरों के विवेक पर छोड़ दिया गया कि वे किसे वोट दें.

सवाल यह है कि अगर असलियत में इतना ही खतरा था, जितना इन संगठनों की ओर से बताया जा रहा था, तो इन संगठनों ने जमीनी लैवल पर कोई सर्वे कर वोटरों का मार्गदर्शन क्यों नहीं किया, जिस से मुसलिम वोटों की ताकत बनी रहती और वे बेअसर नहीं होते?

14वीं लोकसभा और हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में एक यही बात तो समान नजर आती है कि धर्मनिरपेक्ष कही जाने वाली पार्टियों ने भाजपा और संघ परिवार की नीतियों और देश पर पड़ने वाले असर पर ठोस रूप से बात नहीं की और नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने में गुजार दिया.

केंद्र सरकार के 33 महीनों में मुसलिम नेतृत्व की भूमिका को भी देखना बहुत जरूरी है. परंपरा के उलट मुसलिम संगठनों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दूरी बनाए रखी. यह दूरी गुजरात दंगों को ले कर थी. लेकिन क्या मुसलिम संगठनों का यह क्रियाकलाप असदुद्दीन ओवैसी की कही गई बात से मेल नहीं खाता है?

कुछ समय पहले मुसलिम संगठनों की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने के लिए कुछ कोशिश की गई, लेकिन जब यह खबर आम हो गई, तो यह मिशन ठंडा पड़ गया. इस से इस बात की तसदीक होती है कि मुसलिम संगठनों में से कुछ प्रधानमंत्री से मिलने में कोईर् संकोच नहीं करते हैं और उन के सामने मुसलिम समस्याओं का उठाना वे अपना लोकतांत्रिक फर्ज समझते हैं.

इस के साथ ही पीस पार्टी और आल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुसलीमीन (एमआईएम) एकदूसरे को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एजेंट साबित करने में जुटी थीं और उर्दू अखबरों में पूरे पन्ने पर इस बाबत इश्तिहार छपवाए जा रहे थे.

मुसलिमों को परवान चढ़ाने की बात सालों से हो रही थी, लेकिन हैरानी की बात यह थी कि कईर् जगहों पर पीस पार्टी और एमआईएम आपस में टकराती नजर आईं, जिस ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि कैसा मुसलिम नेतृत्व और कैसे इस को परवान चढ़ाना?

इस के अलावा दोनों पार्टियों के कर्ताधर्ता कई आरोपों के घेरे में रहे. एमआईएम पर संघ और भाजपा से निकट होने का आरोप लगता रहा है, वहीं पीस पार्टी के पदाधिकारियों पर यह आरोप लगता रहा है कि वे योगी आदित्य नाथ से हाथ मिलाए हुए हैं. दोनों पार्टियों ने कोई ऐसा बुनियादी मुद्दा नहीं उठाया, जो वोटरों पर खासा असर डाल सके. अब यह तय माना जा रहा है कि हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की अपनी थ्योरी को भाजपा और संघ परिवार बहुसंख्यक के एक बड़े हिस्से को मनवाने में कामयाब हो गया है.

जमायत ए इसलामी हिंद ने एक कदम आगे बढ़ कर यह फैसला लिया कि वह अपनी समस्याओं के लिए प्रधानमंत्री के बजाय राष्ट्रपति से मिलेगी. प्रधानमंत्री जनप्रतिनिधि होता है और इसी वजह से वह जनता के प्रति जवाबदेह होता है. लोकतांत्रिक प्रक्रिया भी यही है, लेकिन जिस तरह से प्रधानमंत्री की अनदेखी की गई, उस ने बहुसंख्यक समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि मुसलिम संगठन एक ही तरह से सोचते हैं. शब्द चाहे जो इस्तेमाल करें, लेकिन उन का मतलब एक ही है.

जमीयत उलेमा ए हिंद के दूसरे धड़े के अध्यक्ष ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की ओर अपना झुकाव दिखा कर भी एक खास तरह का माहौल बनाने में मदद की. इस से लगा कि सभी मुसलिम संगठन और उन के जिम्मेदार रहनुमा ‘भाजपा हटाओ’ की अघोषित राजनति पर काम कर रहे हैं. इस को बहाना बना कर संघ परिवार द्वारा बहुसंख्यकों के दलित और पिछड़े तबके को गोलबंद करने में आसानी हुई.

जो नतीजे आए हैं, उन के लिए क्या मुसलिम नेतृत्व अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है? अगर मुसलिम नेतृत्व सच में गंभीर है, तो उसे चाहिए कि वह ‘भाजपा हटाओ’ एजेंडे पर खुली चर्चा कराए, वरना मुसलिम वोटों की ताकत कैसे बढ़ेगी, यह सवाल अधूरा ही रहेगा.

लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रधानमंत्री से मुसलिम संगठनों द्वारा दूरी बनाए रखना किस ओर संकेत करता है? क्या इस से आम मुसलिम का भला हो पाना मुमकिन है?

पहले छोटे से छोटे मुद्दे को ले कर मुसलिम संगठन प्रधानमंत्री से मिलने को इतने उतावले रहते थे कि अकसर इस की खबरें अखबारों में आती थीं, जबकि सचाई यह थी कि आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार मुसलिम नौजवानों को ले कर जैसे ही मुसलिम जमायतों का प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री से मिलता, उस के 2-3 दिन के अंदर और भी मुसलिम नौजवान गिरफ्तार कर लिए जाते, लेकिन इस आधार पर कभी किसी मुसलिम संगठन ने प्रधानमंत्री से मिलने में संकोच नहीं किया. ऐसे हालात में अब जो माहौल बना है, क्या मुसलिम संगठन उस पर भी कोई सोचविचार करेंगे?     

यह शोर तो बंद होना ही चाहिए

सुबहसुबह अजान से नींद खुल जाने पर गायक सोनू निगम ने  ट्वीट कर हंगामा सा खड़ा कर दिया है. जहां बहुत से लोग इसे मुसलिमों के प्रति बढ़ते भेदभाव की शक्ल दे रहे हैं, वहीं दूसरे हर तरह के धार्मिक शोर को बंद कराने का अवसर ढूंढ़ने लगे हैं.

अजान, कीर्तन, जागरण, भजन आदि से आम आदमी को भरमाए रखने की धर्मों की पुरानी आदत है. वे नहीं चाहते कि उन के भक्त जो अज्ञानता, अंधविश्वासों, चमत्कारों की चाह में धर्म के नाम पर अपनी जेबें भी ढीली करते रहते हैं और मरनेमारने को भी तैयार रहते हैं, बिदक जाएं. इसीलिए सुबहशाम मंदिरों में घंटियां बजाई जाती हैं, गुरुद्वारों से अरदास की आवाजें आती हैं और मसजिदों से अजान की.

सोनू निगम ने सही कहा है कि जब लाउडस्पीकर नहीं थे तब तक जो चाहे चीख कर कुछ भी कर ले, पर ईश्वर की नहीं आदमी की खोज लाउडस्पीकर का इस्तेमाल कर धर्म का प्रचार करना ऐन चुनावों से पहले सड़कों पर नेताओं को वोट देने की गुहार से भी बुरा है.

शांति का हक हरेक को है और यह जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा है. किसी भी तरह का शोर चाहे किसी बरात का हो, शामियाने में बज रहे गाने हों या नेताजी का भाषण केवल उन तक पहुंचे जो उस परिधि में हैं जहां उन के भक्त या समर्थक हैं. बाहर जाने वाले शोर को तो बंद करना ही होगा.

सरकार ने पहले ही गाडि़यों में प्रैशर हौर्न लगाने पर प्रतिबंध लगा रखा है. काफी शहरों में लोगों ने अब आमतौर पर हौर्न बजाना बंद कर दिया है. मंत्रियों की गाडि़यों से सायरन तो बहुत पहले से बंद हो चुके हैं. स्कूलों तक को सामूहिक परेड के समय धीमी आवाज में ही लाउडस्पीकर चलाने की अनुमति है. पार्टी में आप इतने जोर से म्यूजिक बजाएं कि पड़ोसी हल्ला करें, तो आफत आ जाती है.

ऐसे में धर्म को क्लीन चिट नहीं दी जा सकती. धर्म के नाम पर वैसे ही बहुत कुछ अनाचार होता है. कम से कम शांति की हत्या तो न की जाए. माना धर्मों को शांति तो क्या लोगों की हत्याओं पर शर्म नहीं आती पर अंधविश्वासी धर्म के बिचौलिए रात भर या सुबहसुबह तो जीतेजी न मारें.

 

बदनामी से बचने के लिए

विपिन ने रात का खाना अपनी पत्नी कुमकुम के साथ खाया था. खाना खाने के बाद उसे गुड़ खाने की आदत थी. उस ने पत्नी से गुड़ मांगा. कुमकुम पति को गुड़ दे कर टेबल के बरतन समेटने लगी. गुड़ खाते हुए विपिन ने पत्नी से कहा कि वह जरा टहल कर आता है और घर के बाहर निकल गया. रात का खाना खा कर टहलना विपिन की पुरानी आदत थी. कुमकुम घर का काम निपटाने लगी. काम निपटा कर वह बिस्तर पर लेट कर पति का इंतजार करने लगी. यह 8 फरवरी, 2017 की बात है.

विपिन मूलरूप से गांव बेनीनगर, जिला गोंडा, उत्तर प्रदेश का रहने वाला था. उस के पिता का नाम त्रिवेणी शुक्ला था. 27 साल का विपिन कई साल पहले पंजाब के जिला बठिंडा में आ कर बस गया था. वहां उसे बठिंडा एयरबेस के एयरफोर्स स्टेशन में एयरफोर्स कर्मचारियों द्वारा बनाई गई कैंटीन एयरफोर्स वाइव्ज एसोसिएशन में नौकरी मिल गई थी.

इस कैंटीन में ज्यादातर एयरफोर्स के अधिकारियों की पत्नियां ही घरेलू सामान खरीदने आया करती थीं. विपिन सुबह 9 बजे से शाम के 7 बजे तक कैंटीन में रहता था. उस के बाद घर आ कर वह कुछ देर आराम करता. इस के बाद रात का खाना खा कर टहलने निकल जाता. टहलते हुए एयरफोर्स कालोनी का एक चक्कर लगाना उस की दिनचर्या में शामिल था.

एयरफोर्स की कैंटीन में काम करने की वजह से उसे एयरफोर्स कालोनी का स्टाफ क्वार्टर रहने के लिए मिला हुआ था, जिस में वह अपनी पत्नी के साथ रहता था. उन दिनों उस के घर गांव से उस के पिता और चाचा संतोष शुक्ला भी आए हुए थे. बहरहाल बिस्तर पर लेटेलेटे कुमकुम की आंख लग गई. जब उस की नींद टूटी तो विपिन लौट कर नहीं आया था. घबरा कर उस ने घड़ी की ओर देखा.

रात के 12 बजने वाले थे. विपिन अभी तक लौट कर नहीं आया था. पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था. आधे घंटे में वह लौट कर आ जाता था, पर उस रात… कुमकुम उठी और बगल वाले कमरे में गई, जहां सो रहे विपिन के पिता और चाचा को जगा कर उस ने विपिन के अब तक घर न लौटने की बात बताई. वे भी चिंतित हो उठे. इस के बाद सभी विपिन की तलाश में निकल पड़े.

तलाश में पड़ोस के भी 5-7 लोग साथ हो गए थे. पूरी रात ढूंढने पर भी विपिन का कहीं पता नहीं चला. अगले दिन यानी 9 फरवरी, 2017 की सुबह कुमकुम अपने ससुर और चचिया ससुर के साथ कैंटीन पर गई. विपिन वहां भी नहीं था.

इस के बाद उस ने एयरफोर्स के अधिकारियों को विपिन के लापता होने की सूचना दी. उसी दिन कुमकुम ने बठिंडा के थाना सदर की पुलिस चौकी बल्लुआना जा कर विपिन की गुमशुदगी दर्ज करा दी. इस के बाद सभी अपने स्तर से भी विपिन की तलाश करते रहे.  पर उस का कहीं कोई सुराग नहीं मिला.

धीरेधीरे विपिन को लापता हुए एक सप्ताह बीत गया. इस मामले में एयरफोर्स के अधिकारियों ने भी कोई विशेष काररवाई नहीं की थी. पुलिस ने भी इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया था.

हर ओर से निराश हो कर 14 फरवरी, 2017 को कुमकुम बठिंडा के एसएसपी स्वप्न शर्मा के औफिस जा कर उन से मिली और पति के लापता होने की जानकारी दे कर निवेदन किया कि उस के पति की तलाश करवाई जाए.

एसएसपी स्वप्न शर्मा ने उसी समय फोन द्वारा थाना सदर के थानाप्रभारी वेदप्रकाश को आदेश दिया कि मुकदमा दर्ज कर के इस मामले में तुरंत काररवाई करें. इस के बाद पुलिस चौकी बल्लुआना में कुमकुम के बयान नए सिरे से दर्ज किए गए, इस बार कुमकुम ने आशंका व्यक्त की थी कि या तो उस के पति विपिन शुक्ला का अपहरण हुआ है या हत्या कर के लाश कहीं छिपा दी गई है. कुमकुम के इस बयान के आधार पर पुलिस ने विपिन की गुमशुदगी के साथ अपहरण का मुकदमा दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी.

इस के बाद भी विपिन की गुमशुदगी को एक सप्ताह और बीत गया. इन 15 दिनों में पुलिस और एयरफोर्स के अधिकारियों द्वारा ढंग से कोई काररवाई नहीं की गई. इसी का नतीजा था कि विपिन शुक्ला का कोई सुराग इन लोगों के हाथ नहीं लगा. इस बीच कुमकुम एसएसपी स्वप्न शर्मा से 2-3 बार मिल कर गुहार लगा चुकी थी.

पुलिस हर प्रकार से विपिन शुक्ला की तलाश कर के थक चुकी थी. मुखबिरों का भी सहारा लिया गया था. लेकिन उन से भी कोई लाभ नहीं मिला. शहर के बदनाम लोगों से भी पूछताछ की गई, पर नतीजा शून्य ही रहा.

इंसपेक्टर वेदप्रकाश पर एसएसपी स्वप्न शर्मा की ओर से काफी दबाव डाला जा रहा था. इसलिए उन्होंने नए सिरे से जांच करते हुए एयरफोर्स कालोनी के निवासियों और कैंटीन कर्मचारियों से पूछताछ की. इस पूछताछ में उन्हें लगा कि विपिन की गुमशुदगी में कालोनी के ही किसी आदमी का हाथ है.

उन्होंने अपने मुखबिरों को कालोनी वालों पर नजर रखने को कहा. पुलिस और मुखबिर कालोनी में सुराग ढूंढने में लगे थे. अगले दिन यानी 21 फरवरी को वेदप्रकाश ने शैलेश को पूछताछ करने के लिए थाने बुलाना चाहा तो पता चला कि बिना एयरफोर्स अधिकारियों से इजाजत लिए पूछताछ करना संभव नहीं है.

इस पर वेदप्रकाश ने एयरफोर्स के अधिकारियों से इजाजत ले कर सार्जेंट शैलेश से उन्हीं के सामने पूछताछ शुरू की. दूसरी ओर एसएसपी स्वप्न शर्मा के आदेश पर एसपी औपरेशन गुरमीत सिंह और डीएसपी देहात कुलदीप सिंह के नेतृत्व में एक सर्च टीम तैयार की गई, जिस में एयरफोर्स के अधिकारियों सहित 40 जवानों, छोटेबड़े 85 पुलिस वालों और 30 मजदूरों सहित एयरफोर्स के स्निफर डौग एक्सपर्ट की टीम को शामिल किया गया.

इस भारीभरकम टीम ने एयरफोर्स कालोनी में सुबह 9 बजे से सर्च अभियान शुरू करते हुए एकएक क्वार्टर की तलाशी लेनी शुरू की. दूसरी ओर सार्जेंट शैलेश से पूछताछ चल रही थी. पूछताछ में शैलेश ने बताया कि अन्य लोगों की तरह उस की भी विपिन से जानपहचान थी. लेकिन वह उस की गुमशुदगी के बारे में कुछ नहीं जानता. लेकिन थानाप्रभारी के पास कुछ ऐसी जानकारियां थीं, जिन्हें शैलेश छिपाने की कोशिश कर रहा था.

शैलेश से अभी पूछताछ चल ही रही थी कि कालोनी में सर्च अभियान चलाने वाली टीम में शामिल स्निफर डौग भौंकते हुए सार्जेंट शैलेश शर्मा के क्वार्टर में घुस गया. कुत्ते के पीछे पुलिस अफसर भी घुस गए. सार्जेंट शैलेश शर्मा को भी वहीं बुला लिया गया. पूरे क्वार्टर में अजीब सी दुर्गंध फैली थी. जब विश्वास हो गया कि इस क्वार्टर में लाश जैसी कोई चीज है तो पुख्ता सबूत के लिए इलाका मजिस्ट्रैट और तहसीलदार भसीयाना को बुला लिया गया.

सब की मौजूदगी में जब सार्जेंट शैलेश के क्वार्टर की तलाशी ली गई तो वहां से जो बरामद हुआ, उस की किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. वहां का लोमहर्षक दृश्य देख कर पत्थरदिल एयरफोर्स और पुलिस के जवानों के भी दिल कांप उठे. कुछ लोगों को तो चक्कर तक आ गए.

क्वार्टर में लापता विपिन शुक्ला की लाश के 16 टुकड़े पड़े थे, जिन्हें काले रंग की 16 अलगअलग थैलियों में पैक कर के पैकेट बना कर फ्रिज में रखा गया था. लाश के टुकड़े बरामद होते ही सार्जेंट शैलेश ने इलाका मजिस्ट्रैट, तहसीलदार, एयरफोर्स के अधिकारियों और पुलिस के वरिष्ठ अफसरों के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

उस ने बताया कि उसी ने अपनी पत्नी अनुराधा और अपने साले शशिभूषण के साथ मिल कर विपिन शुक्ला की हत्या कर के लाश के टुकड़े कर के फ्रिज में रखे थे. पुलिस ने लाश के टुकडे़ और फ्रिज कब्जे में ले लिया. लाश के टुकड़ों का पंचनामा कर के उन्हें पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया.

अपहरण की धारा 365 के तहत दर्ज इस मुकदमे में योजनाबद्ध तरीके से की गई हत्या की धारा 302, 120बी और लाश को खुर्दबुर्द करने के लिए धारा 201 जोड़ दी गई. सार्जेंट शैलेश और उस की पत्नी अनुराधा को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. इस हत्या का तीसरा आरोपी शशिभूषण फरार हो गया था.

उस की तलाश में पुलिस टीम उत्तराखंड भेजी गई. उसी दिन शाम को यानी 21 फरवरी, 2017 को एसपी औपरेशन गुरमीत सिंह ने प्रैसवार्ता कर इस हत्याकांड के संबंध में विस्तार से जानकारी दी, साथ ही दोनों गिरफ्तार अभियुक्तों शैलेश और अनुराधा को मीडिया के सामने पेश किया.

पुलिस अधिकारियों द्वारा पूछताछ करने पर सार्जेंट शैलेश और अनुराधा ने विपिन शुक्ला की गुमशुदगी से ले कर हत्या करने तक की जो कहानी बताई, वह अवैधसंबंधों और बदनामी से बचने के लिए की गई हत्या का नतीजा थी—

सार्जेंट शैलेश मूलरूप से उत्तराखंड का निवासी था. लगभग 7 साल पहले उस की अनुराधा से शादी हुई थी. उस का एक 5 साल का बेटा है. इन दिनों उस की पत्नी गर्भवती थी.

इस कहानी की शुरुआत 2 साल पहले सन 2014-15 से शुरू हुई थी. 27 साल का विपिन शुक्ला खूबसूरत युवक था. हंसीमजाक करना उस की आदत में था. वह एयरफोर्स की वाइव्ज एसोसिएशन की कैंटीन में काम करता था. इस कैंटीन में एयरफोर्स के अफसरों जवानों की पत्नियां घरेलू सामान खरीदने आती हैं.

सार्जेंट शैलेश की खूबसूरत पत्नी अनुराधा भी यहां से सामान खरीदा करती थी. एक बच्चे की मां अनुराधा काफी खूबसूरत थी. उसे देखते ही शादीशुदा विपिन अपना दिल हार बैठा था. उस ने बात को आगे बढ़ाने के लिए पहल करते हुए अनुराधा से हंसीमजाक और छेड़छाड़ शुरू कर दी.

अनुराधा ने इस का विरोध करते हुए विपिन को काफी खरीखोटी भी सुनाई, पर उस ने उस का पीछा नहीं छोड़ा. धीरेधीरे अनुराधा को विपिन की छेड़छाड़ और हंसीमजाक में आनंद आने लगा. इस से विपिन की हिम्मत बढ़ गई.

पहले दोनों में प्यार का इजहार हुआ, फिर मुलाकातें शुरू हुई. वक्त के साथ दोनों के बीच अवैधसंबंध भी बन गए. उसी बीच अनुराधा गर्भवती हो गई और शादीशुदा होते हुए भी विपिन पर शादी के लिए दबाव डालने लगी. उस का कहना था कि वह अपने पति को छोड़ देगी और विपिन अपनी पत्नी को तलाक दे दे. लेकिन विपिन ने अनुराधा की इस बात को मानने से इनकार कर दिया.

उस बीच शैलेश को भी अपनी पत्नी के विपिन शुक्ला के साथ अवैध संबंध होने और उस के गर्भवती होने की जानकारी मिल गई. उस ने अनुराधा को आड़े हाथों लेते हुए खूब फटकार लगाई. इस बात को ले कर पतिपत्नी के बीच क्लेश भी शुरू हो गया. यह बात पिछले साल की है.

रोजरोज के क्लेश से तंग आ कर शैलेश अनुराधा को अपनी ससुराल उत्तराखंड ले गया और वहां उस ने यह बात अनुराधा के मातापिता और भाई को बताई तो उन्होंने भी अनुराधा को डांटते हुए फौरन विपिन से संबंध खत्म करने को कहा.

शैलेश और अनुराधा कुछ दिन उत्तराखंड रह कर बठिंडा लौट आए. वापस आने के बाद अनुराधा ने विपिन से बातचीत करनी बंद कर दी. बारबार बुलाने पर भी जब अनुराधा ने विपिन से बात नहीं की तो नाराज हो कर वह अनुराधा को बदनाम करने लगा.

वह कालोनी वालों और कैंटीन में काम करने वाले अन्य कर्मचारियों को अपने और अनुराधा के अवैधसंबंधों की कहानियां चटखारे लेले कर सुनाता. इस से सार्जेंट शैलेश और उस की पत्नी अनुराधा की बदनामी होने लगी. शैलेश अपने अधिकारियों और कालोनी वालों से नजर मिलाने में कतराने लगा.

एक दिन शैलेश ने विपिन से मिल कर उसे समझाया, ‘‘देखो शैलेश, गलती चाहे किसी की भी रही हो, अब यह बात यहीं दफन कर दो. पिछली सभी बातों को भूल कर भविष्य में हमें बदनाम करना बंद कर दो.’’

विपिन ने उस समय तो शैलेश की बात मान कर वादा कर लिया, पर वह अपनी बात पर कायम नहीं रह सका. उस की छिछोरी हरकतें जारी रहीं. विपिन जब अपनी हरकतों से बाज नहीं आया और पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा तो शैलेश ने अपने साले शशिभूषण को बठिंडा बुला लिया. शशिभूषण नेवी में नौकरी करता था.

शैलेश के बुलाने पर जब शशिभूषण बठिंडा पहुंचा तो शैलेश, अनुराधा और शशिभूषण ने रोजरोज की इस बदनामी से अपना पीछा छुड़ाने के लिए विपिन का गला घोंट कर दफन करने की योजना बना डाली.

अपनी योजना पर अच्छी तरह सोचविचार कर उसे अमली जामा पहनाने के लिए सब से पहले शैलेश ने अपने अधिकारियों को अपना क्वार्टर बदलने की अर्जी दी. उसे एयरफोर्स कालोनी में क्वार्टर नंबर 214/10 अलाट था. उस ने अधिकारियों को मौजूदा क्वार्टर में कुछ कमियां बता कर नया क्वार्टर अलाट करा लिया.

योजना के अनुसार, नए क्वार्टर में जाने की तारीख 8 फरवरी, 2017 तय की गई. 8 फरवरी को रात का खाना खा कर विपिन अपनी आदत के अनुसार टहलने के लिए निकला तो शैलेश उसे अपने क्वार्टर के पास ही मिल गया. विपिन को देखते ही शैलेश ने कहा, ‘‘यार, मैं तुम्हारे घर ही जा रहा था.’’

‘‘क्यों क्या बात हो गई?’’ विपिन ने हैरानी से पूछा तो शैलेश ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘यार, तुम तो जानते ही हो कि आज मुझे क्वार्टर बदलना है. काफी सामान तो पैक कर चुका हूं. बस कुछ सामान बचा है. तुम चल कर पैक करवा दो. उस के बाद अनुराधा के हाथ की चाय पीएंगे.’’ शैलेश ने यह बात जानबूझ कर कही थी.

सुन कर विपिन झट से तैयार हो गया. शैलेश विपिन को ले कर अपने पुराने क्वार्टर पर पहुंचा. सामान पैक करते हुए विपिन जब नीचे की ओर झुका, तभी उस ने पीछे से विपिन के सिर पर कुल्हाड़ी का भरपूर वार कर दिया. बिना चीखे ही विपिन फर्श पर ढेर हो गया. शशिभूषण ने भी उस की गरदन पर एक वार कर के सिर धड़ से अलग कर दिया.

इस के बाद तीनों ने मिल कर विपिन की लाश को एक बड़े ट्रंक में डाल कर बाहर से ताला लगा दिया और घर के अन्य सामान के साथ लाश वाला ट्रंक भी नए क्वार्टर में ले आए.

विपिन की हत्या करने के बाद जहां शैलेश ने चैन की सांस ली थी, वहीं उसे यह चिंता भी सताने लगी थी कि विपिन की लाश को ठिकाने कैसे लगाया जाए. वह कुछ सोच पाता, उस के पहले ही उसे अगले दिन अपने अधिकारियों से पता चला कि विपिन रात से घर से लापता है. यह सुन कर उस ने लाश ठिकाने लगाने का इरादा त्याग दिया.

उस ने सोचा कि कुछ दिनों में मामला ठंडा हो जाएगा तो इस विषय पर वह सोचेगा. पर विपिन की पत्नी कुमकुम के बारबार एयरफोर्स और पुलिस के अधिकारियों के पास चक्कर लगाने से मामला ठंडा होने के बजाए गरमाता गया.

लाश को ठिकाने लगाना जरूरी था. फरवरी का महीना होने के कारण मौसम बदल रहा था. ज्यादा दिनों तक लाश को रखा नहीं जा सकता था, इसलिए सोचविचार कर शैलेश ने 19 फरवरी को विपिन की लाश के छोटेछोटे 16 टुकड़े किए और उन्हें पौलिथिन की अलगअलग थैलियों में भर फ्रिज में रख दिया.

शैलेश ने सोचा था कि वह किसी रोज मौका देख कर 2-3 थैलियों को बाहर ले जा कर वीरान जगह पर फेंक देगा, जहां कुत्ते या जंगली जानवर उन्हें खा जाएंगे. कुछ टुकडों को जला देगा और कुछ को नाले या गटर में फेंक देगा. लेकिन इस के पहले ही 21 फरवरी को पुलिस ने उसे और उस की पत्नी अनुराधा को गिरफ्तार कर के उस के घर से फ्रिज में रखे लाश के 16 टुकड़े बरामद कर लिए.

अभियुक्त सार्जेंट शैलेश कुमार और अनुराधा को उसी दिन अदालत में पेश कर के थानाप्रभारी वेदप्रकाश ने 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि में शैलेश और अनुराधा की निशानदेही पर उन के घर से हत्या में इस्तेमाल की गई कुल्हाड़ी और मृतक विपिन शुक्ला का मोबाइल बरामद कर लिया गया. पूछताछ और पुलिस काररवाई पूरी कर के दोनों को अदालत में पेश किया गया, जहां से दोनों को जिला जेल भेज दिया गया.

अपनी बेइज्जती का बदला लेने के लिए शैलेश ने जिस तरह अपने दिमाग का इस्तेमाल किया था, वह काबिले तारीफ था. उस की योजना फूलप्रूफ थी. लेकिन लाश ठिकाने लगाने में की गई देर ने उस की पोल खोल दी. बहरहाल अब पतिपत्नी जेल में हैं और इस हत्या के लिए तीसरे दोषी शशिभूषण की पुलिस सरगर्मी से तलाश कर रही है.

बठिंडा के सरकारी अस्पताल के डाक्टरों ने मृतक विपिन की लाश के टुकड़ों का पोस्टमार्टम कर ने से इनकार करते हुए कहा कि तकनीकी कारणों और पुख्ता सबूतों के लिए पोस्टमार्टम फरीदकोट के मैडिकल कालेज में करवाना ठीक रहेगा.

मृतक की पत्नी कुमकुम का आरोप है कि अगर एयरफोर्स और स्थानीय पुलिस सही समय पर काररवाई करती तो उस के पति की लाश इस तरह 16 टुकड़ों में न मिलती. विपिन की लाश 12 दिनों तक सलामत थी. इस के बाद ही हत्यारों ने उस के टुकड़े किए थे.

कुमकुम का यह भी कहना है कि उस के पति के अनुराधा के साथ अवैधसंबंध नहीं थे. हकीकत में शैलेश और अनुराधा विपिन को ब्लैकमेल कर रहे थे. विपिन की हत्या करने से पहले पतिपत्नी दोनों रोजाना शाम को उन के घर आते थे और देर रात तक बैठ कर बातें व हंसीमजाक करते थे. लेकिन 8 फरवरी के बाद वे एक बार भी उन के घर नहीं आए और ना ही विपिन की तलाश में उन्होंने कोई सहयोग किया.      ?

– पुलिस सूत्रों पर आधारित

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें