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गर्त में गरीबों की पार्टियां

हाल के चुनावों में गरीबों के नाम पर वोट लेने वाली पार्टियों का उत्तर प्रदेश, दिल्ली और उत्तराखंड में बुरा हाल हुआ है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का राज भी अब खतरे में है. कम्यूनिस्ट पार्टियों का हाल तो पहले ही बुरा हो चुका है. महाराष्ट्र में अंबेडकर के नाम पर बनी पार्टियों की जरा सी भी पहचान नहीं बची है.

इस की वजह यह रही है कि गरीबों का नाम ले कर उन्हें सपने दिखाने वाली पार्टियां उन की उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाईं. इस देश के गरीब को पेट भर खाने के अलावा इज्जत और सुरक्षा भी चाहिए और ये पार्टियां दोनों ही नहीं दे पाईं. बहुजन समाज पार्टी भी बुरी तरह बेकार साबित हुई. बिहार में अभी इन पार्टियों का राज है, पर वह ज्यादा टिक नहीं सकता.

गरीबों को इज्जत दिलाने के लिए उन में सामाजिक बदलाव की जो जरूरत है, उस पर ये पार्टियां बिलकुल ध्यान नहीं दे रहीं. गरीबों को जातपांत, रस्मों, शराब, गंदगी, पढ़ाई की कमी, कम उम्र में शादी, दिखावे में कर्ज ले कर खर्च करने जैसे कांटों का सामना हर रोज करना पड़ता है. पार्टियां गरीबों के वोट तो चाहती हैं, पर उन्हें सदियों से बने गढ़ों में से निकालने के लिए हाथ नहीं बढ़ाना चाहतीं.

गरीब जनता को बस राशन या गैस ही नहीं चाहिए, उसे जिंदगी जीने के सही उसूलों की जानकारी भी चाहिए और ओझाओं, गुनियों, पंडितों, मौलवियों के अलावा उन के पास कोई और कैसा भी रास्ता दिखाने वाला नहीं होता. गरीबों की हमदर्द पार्टियों के पास मौका था कि वे यह काम भी कर लें, ताकि गरीबों की हर तरह की दोस्त व सलाहकार बन सकें, पर उन्होंने सत्ता में आते ही सत्ता का फायदा उठाना शुरू कर दिया. जिन की सेवा करनी चाहिए थी, उन्हें अपनी सेवा में लगा लिया.

कांग्रेस ने महात्मा गांधी के जमाने में कुछ ऐसे काम किए थे, जिन का फायदा नेहरूइंदिरा परिवार ने 70 साल उठाया है, पर बाकी पार्टियों ने ऐसा कुछ नहीं करा. भारतीय जनता पार्टी ने धर्म के नाम पर घरघर में घुसपैठ कर ली और गरीब को पटा लिया कि वह जैसा है, भाग्य की देन मान कर हमेशा की तरह सहता रहे. हां, वोटों के बदले में उस ने इन्हें कुछ छोटे नएनए देवीदेवता गढ़ कर दे दिए, जिन्हें पूज कर गरीब अपनी गरीबी को खत्म करने के बहकावे में आ गए हैं.

गरीबों को जब तक कामकाजी, मेहनती और नया करने लायक नहीं बनाया जाएगा, तब तक यह देश नहीं सुधर सकता. हम ज्यादा हैं, इसलिए हमें दुनिया भाव देती है, ताकि उस के सामान को यहां बेचा जा सके और गरीबों को झुनझुनों से खुश रखा जा सके. ठीक वही जो गरीबों की पार्टियां कर रही हैं.

छलनी जिस्म और पोंगापंथ का ठहाका

बिहार की राजधानी पटना के पुराने इलाके पटना सिटी के रानीपुरबेगमपुर ब्लौक के बभनगांवा गांव के सावित्रीसत्यवान मंदिर के पास हर साल अप्रैल के महीने में अंधविश्वास का एक मेला लगता है ‘पंजर भोकवा’ के नाम से मशहूर इस मेले में अंधभक्तों का जमावड़ा लगता है और पोंगापंथ का जम कर नंगा और खूनी नाच चलता है. पोंगापंथियों का जत्था लोदीकटरा, हरनाहा टोला और नून का चौराहा से नाचतेगाते निकलता है. कई महल्लों से घूमता हुआ यह जत्था सावित्रीसत्यवान मंदिर पहुंचता है.

इस जत्थे में शामिल लोगों में कोई अपनी जीभ के बीचोंबीच धारदार चाकू घुसा कर नाच रहा होता है, तो कोई पेट में नुकीली बरछी घोंप कर उछलकूद कर रहा होता है. कोई बांहों में तीर घुसेड़ कर अपने सिर को गोलगोल घुमा रहा होता है, तो कोई अपने गालों में खंजर चुभो कर ठहाके लगा रहा होता है. भगवान को खुश करने के नाम पर अपने जिस्म के कई हिस्सों में धारदार हथियारों को चुभाने का पाखंड खुल कर चलता है. मर्द अपने जिस्म के अलगअलग हिस्सों में तीर और चाकू जैसी धारदार चीजें घोंप कर पागलों के अंदाज में नाचते हैं और औरतें गीत गा कर उन के अंधविश्वास को बढ़ावा देती हैं.

कानून और प्रशासन को ठेंगा दिखाने वाले इस मेले को हर साल कराया जाता है और परंपरा की दुहाई दे कर प्रशासन और पुलिस भी पोंगापंथियों की मदद करती है यानी उन के लिए रास्ता साफ करती चलती है. सड़कों और गलियों में लगे जाम से पुलिस वालों का कोई लेनादेना नहीं होता है. पुलिस और प्रशासन के अफसर धर्म और अंधआस्था के नाम पर चुपचाप पाखंड के इस तमाशे को सालों से देखते आ रहे हैं.

इस मेले के पीछे अंधविश्वास से भरी एक कहानी बताई जाती है कि राजा ध्रुतसेन के बेटे सत्यवान ने अपने पिता का राजपाट छीनने के बाद अपनी पत्नी सावित्री के साथ बभनगांवा गांव में आ कर कुछ दिन बिताए थे. उसी की याद में ‘पंजर भोकवा’ मेला कराया जाता है.

हैरान करने वाली बात यह है कि नुकीली चीजों को जिस्म में घुसा कर मर्द लहूलुहान हो जाते हैं और उन की बीवियां अपने पति की लंबी उम्र के लिए दुआएं मांगती हैं.

ऐसे लोगों से बात करने पर साफ हो जाता है कि उन के दिमाग में अंधविश्वास का अंधकार किस कदर बना हुआ है. इन जाहिलों को शायद पता ही नहीं है कि आज तकनीकी रूप से तरक्की करती दुनिया के बीच ऐसे ही लोग तरक्की में रोड़ा बने हुए हैं. ये लोग पोंगापंथ के चक्कर में फंस कर उसे बढ़ावा देने में लगे हुए हैं.

पिछले 19 सालों से ‘पंजर भोकवा’ मेले में भाग ले कर अपनी देह में बरछी और तीर घोंप कर नाचने वाला सकलदेव राय बताता है कि भगवान को खुश करने के लिए वह ऐसा करता है. शरीर में बरछी घुसाने के बाद भी न दर्द महसूस होता है और न ही खून निकलता है.

अपनी जीभ में चाकू घोंप कर नाचने वाला 42 साल का काशीनाथ बताता है कि वह पिछले 12 सालों से यह कर रहा है और आज तक उसे कोई परेशानी नहीं हुई.

जीभ, पसली, होंठ, कान, नाक, पेट, हथेली, उंगली, जांघ वगैरह में तीर, बरछी, चाकू वगैरह घोंप कर अंधविश्वास के नशे में नाचते लोगों को देख कर दिल दहल उठता है. शरीर के कई हिस्सों में लटके तीरों और चाकुओं को देख कर सिर चकरा जाता है. पोंगापंथ की घुट्टी पीने के बाद पागलपन की हद पार करने वालों के दिमाग के इलाज की जरूरत है.

मशहूर डाक्टर दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि शरीर के किसी भी हिस्से में छोटी सी सूई या कील चुभ जाती है, तो इनसान चीख पड़ता है, लेकिन ‘पंजर भोकवा’ मेले में अंधविश्वास के नाम पर अंधे लोग तीरचाकू, लोहे की छड़ और बरछी शरीर में घोंप लेते हैं और हंसतेनाचते रहते हैं. यह दिमागी दिवालियापन के अलावा कुछ नहीं है.

बाबाओं के कहने पर ऊपर वाले को खुश करने के इस मेले में ज्यादातर जाहिल लोग ही शामिल होते हैं, जिन्हें आसानी से धर्म की घुट्टी पिलाई जा सकती है.

हर साल 14 से 16 अप्रैल तक ‘पंजर भोकवा’ मेला कराया जाता है. इन 3 दिनों के दौरान तंत्रमंत्र, झाड़फूंक, ओझाई के नाम पर बाबाओं और ओझाओं का मजमा लगता है. भूतप्रेत झाड़ने और डायन को पकड़ने का जम कर ड्रामा चलता है. खुलेआम तीर, भाला, छुरा, बरछी, तलवार, कटार वगैरह का प्रदर्शन किया जाता है और पुलिस प्रशासन भी आंखों पर पट्टी बांध कर अंधविश्वास को बढ़ावा देने में लगा रहता है.

अपने शरीर में धारदार चीजें चुभाने वालों का मानना है कि ऐसा करने से रुपएपैसे के साथसाथ सुखशांति मिलती है, पर ऐसे पागलपन में साल दर साल शामिल होने वाले अब भी गरीबी से जूझ रहे हैं. यह बात उन लोगों की समझ में नहीं आती है और न ही दूसरों के समझाने से वे समझने की कोशिश करते हैं.                           

आरक्षण का हल है दूसरी जाति में शादी

पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में यह साफ किया था कि अगर कोई आरक्षित कोटे यानी दलित या आदिवासी मांबाप किसी सामान्य जाति के बच्चे को गोद लेते हैं, तो उस बच्चे से आरक्षण प्रमाणपत्र का फायदा छीना नहीं जा सकता. हाईकोर्ट की जज जयश्री ठाकुर ने साफ किया कि इस बात का कोई सुबूत नहीं है कि फरियादी ने अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र गलत तरीके से हासिल किया था. दरअसल, एक मामले में फरियादी रतेज भारती ने अदालत को बताया था कि उस का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में साल 1967 में हुआ था. उस के पैदा होने के तुरंत बाद उस की मां की मौत हो गई थी.

रतेज भारती जब 10 साल का था, तब उसे रामदासिया जाति के पतिपत्नी ने गोद ले लिया था. इस बाबत बाकायदा कानूनी गोदनामा तैयार कराया गया था. साल 1992 में आरक्षित समुदाय के मांबाप की औलाद होने की बिना पर रतेज भारती ने आरक्षण का प्रमाणपत्र बनवाया था. 2 साल बाद ही उस ने इस प्रमाणपत्र की बिना पर सरकारी नौकरी भी हासिल कर ली थी. लेकिन जनवरी, 2014 में सरकार ने यह कहते हुए रतेज भारती को नौकरी से निकाल दिया था कि चूंकि उस का गोद लिया जाना जायज नहीं है, इसलिए वह आरक्षित जाति के प्रमाणपत्र पर नौकरी करने का हकदार नहीं है.

रतेज भारती ने हिम्मत नहीं हारी और अदालत का दरवाजा खटखटाया. 2 दफा उस के जाति प्रमाणपत्र की जांच हुई और दोनों ही बार वह सही पाया गया. लिहाजा, हाईकोर्ट ने उस की नौकरी बहाली का हुक्म जारी कर दिया.

कोई गड़बड़झाला नहीं

इस फैसले से एकसाथ कई अहम बातें उजागर हुईं कि आरक्षण गोद लिए गए बच्चे का हक है यानी दलित समुदाय के मांबाप ऊंची जाति वाले बच्चे को गोद लें, तो बच्चा ठीक वैसे ही आरक्षण का हकदार होता है, जैसे गोद लेने वाले मांबाप की जायदाद में वह हकदार हो जाता है और उसे दूसरे कई हक व जिम्मेदारियां भी मिल जाती हैं. यह तो रतेज भारती के दलित मांबाप की दरियादिली थी कि जब उस अनाथ को कोई सहारा नहीं दे रहा था, तब उन्होंने उसे गोद ले कर उस की परवरिश की और पढ़ाईलिखाई की जिम्मेदारी उठाई यानी गोद लेते ही रतेज भारती ब्राह्मण से दलित ह गया.

संविधान बनाने वालों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आारक्षण से ताल्लुक रखते ऐसे मामले भी सामने आएंगे, इसलिए उन का ध्यान इस तरफ नहीं गया कि गोद लिए बच्चे की हालत पर भी गौर किया जाए, चाहे फिर वह सवर्ण मांबाप द्वारा गोद लिया गया दलित बच्चा हो या फिर दलित मांबाप द्वारा गोद लिया गया सवर्ण बच्चा. इसी तरह संविधान में यह भी साफसाफ नहीं लिखा है कि अगर एक दलित नौजवान सवर्ण लड़की से शादी करता है, तो उन की औलाद को आरक्षण का फायदा मिलेगा या नहीं. इसी तरह कोई सवर्ण नौजवान दलित लड़की से शादी करता है, तो उस की औलाद को आरक्षण का फायदा मिलेगा या नहीं.

इस तरह के सैकड़ों मुकदमे देशभर की अदालतों में चल चुके हैं, जिन में से ज्यादातर में फैसला यह आया है कि अगर दलित और सवर्ण लड़का या लड़की शादी करते हैं, तो उन की औलाद को आरक्षण का फायदा मिलेगा. ऐसे मामलों में हालांकि अदालतों को भी फैसला लेना आसान काम नहीं होता, खासतौर से उस हालत में जब पिता सवर्ण और मां दलित हो. चूंकि बच्चे का नाम और जाति पिता से चलते हैं, इसलिए कुछ मामलों में अदालतों ने सवर्ण पिता की दलित पत्नी से हुई औलाद को आरक्षण देने में हिचकिचाहट भी दिखाई है.

यह तय है कि कानून मानता है कि बच्चे की परवरिश किस माहौल में हुई है. यह बात ज्यादा अहम है, बजाय इस के कि वह किस जाति में पैदा हुआ है. अगर कोई ब्राह्मण या दूसरे सवर्ण मांबाप दलित बच्चे को गोद लेते हैं, तो उन की परवरिश का माहौल बदल जाता है और उसे जातिगत जोरजुल्म व उन परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ता, जिन से दलित बच्चे रूबरू होते हैं.

ऐसे मामले बहुत कम तादाद में अदालतों में जाते हैं, इसलिए थोड़ाबहुत बवाल उन पर सुनवाई और फैसले के वक्त मचता है, फिर सब भूल जाते हैं कि खामी क्या है और इस का हल क्या है.

शादी है जरूरी

दलितों और सवर्णों के बीच आरक्षण को ले कर हमेशा से ही बैर रहा है, पर बीते 4 सालों में यह उम्मीद से ज्यादा बढ़ा है, तो इस की एक वजह सियासी भी है, जिस के तहत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अकसर आरक्षण पर दोबारा सोचविचार की बात कहता रहता है. इस से दलितों व आदिवासियों को लगता है कि ऊंची जाति वालों की पार्टी भारतीय जनता पार्टी की सरकार उन से आरक्षण छीनना चाहती है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में दलितों ने भाजपा को भी वोट दिए, तो ऐसा लगा कि बारबार की घुड़की के चलते दलित तबका डर गया है और भाजपा को चुनने की उस की एक वजह यह भी है कि वह उन के वोट ले ले, पर आरक्षण न छीने.

कांग्रेस भी यही बात कहती रही थी कि आरक्षण व्यवस्था को बनाए रखना है, तो उसे वोट दो. हालांकि इस बाबत उस का तरीका दूसरा था. इन सियासी दांवपेंचों से परे एक अहम सामाजिक सच यह भी है कि अगर ऊंची और नीची जाति वाले आपस में शादी करने लगें, तो क्या हर्ज है. इस से या तो आरक्षण खत्म हो जाएगा या फिर हमेशा के लिए बना रहेगा, जिस का फायदा दोनों तबकों की नई नस्ल को मिलेगा. बजाय फिर से कोई आयोग बनाने के लिए सरकार यह फैसला ले ले कि ऊंची और नीची जाति वाले अगर आपस में शादी करें, तो उन की औलाद का आरक्षण सलामत रहेगा, तो देश की तसवीर बदल भी सकती है.

दूसरा फायदा इस से जातिवाद को खत्म करने का मिलेगा. जिस सामाजिक समरसता की बात भाजपा और संघ कर रहे हैं, वह असल में दलितों के साथ नहाने या उन के साथ बैठ कर खाना खाने से पूरी नहीं हो जाती. दूसरी जाति में बड़े पैमाने पर शादियां आपसी बैर खत्म कर सकती हैं यानी रोटी के साथसाथ बेटी के संबंध भी इन दोनों तबकों के बीच बनने चाहिए. रोजमर्रा की जिंदगी के अलावा सोशल मीडिया पर ऊंची और नीची जाति वाले आरक्षण को ले कर एकदूसरे पर इलजाम लगाते रहते हैं और आरक्षण की समस्या के तरहतरह के हल भी सुझाते रहते हैं.

ऊंची जाति वालों का हमेशा से कहना रहा है कि नाकाबिल लोग सरकारी नौकरियों में घुस कर उन का हक मार रहे हैं, जबकि दलित समुदाय के लोग कहते हैं कि सदियों से उन पर जाति की बिना पर जुल्म ढाए जाते रहे हैं, क्योंकि वे धार्मिक और सामाजिक लिहाज से दलित और निचले हैं. अब अगर उन की तरक्की हो रही है, वे भी पढ़लिख कर सरकारी नौकरियों में आ कर अपनी दशा सुधार रहे हैं, तो हल्ला क्यों? यह तो उन का संवैधानिक हक है. रतेज भारती दलित मांबाप के साथ खुश हैं. जातपांत का बंधन एक गोदनामे से टूटा, तो शादियों के जरीए वह बड़े पैमाने पर भी टूट सकता है. इस बाबत सोशल मीडिया पर बड़े दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण ढंग से ऐसे सुझाव दिए जा रहे हैं:

* अगर आरक्षण खत्म करना है या फिर उसे आर्थिक आधार पर लागू करना है, तो यह बहुत मामूली काम है.

* आरक्षण का फायदा ले कर जितने दलित बेहतर सामाजिक हालात में आ चुके हैं, उन का यज्ञोपवीत यानी जनेऊ संस्कार करा कर उन्हें ब्राह्मण जाति में शामिल कर लिया जाए. इस से वे आरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगे.

* फिर उतनी ही तादाद में गरीब ब्राह्मणबनिए, जो आरक्षण का फायदा लेना चाहते हैं, दलितों में अपने बेटेबेटियों की शादी करें, उन के साथ खाना खाएं, उन के साथ रोटीबेटी का रिश्ता बना कर दलित हो जाएं और आरक्षण का फायदा लें. ऐसा लगातार हर साल होते रहना चाहिए.

* हर कोई आरक्षण चाहता है, तो आजादी के इतने सालों बाद भी चल रही जाति प्रथा का जहर भी तो ले.

* जिस माली आधार पर आरक्षण छीने जाने की वकालत हो रही है, उसे सामान्य जाति का ब्राह्मणबनिया होने का हक भी तो दीजिए, क्योंकि आरक्षण से बाहर होने के बाद तो वे सामान्य जाति में होने का हक तो रखते हैं.

* गरीब ब्राह्मण आरक्षण तो ले, पर जैसा कि धार्मिक किताबों में कहा गया है कि ब्रह्मा के मुंह से पैदा हुए थे, तो इंसाफ नहीं हुआ. दलित कलक्टर और आरक्षण छोड़ देने के बाद भी दलित हो, यह कौन सा इंसाफ हुआ?

* हर दलित ब्राह्मण हो कर आरक्षण के दायरे से बाहर आना चाहेगा. यह बात और है कि कोई भी सवर्ण जाति वाला नीची जाति वालों में महज आरक्षण के लिए बेटी की शादी नहीं करने वाला.

इन बातों पर गौर किया जाना चाहिए, जो देश और समाज से जातिवाद को खत्म करने में कारगर हो सकती हैं. ये सुझाव एक चुनौती भी हैं कि क्या ऊंची जाति वाले वाकई ऐसा चाहते हैं या आरक्षण खत्म कर फिर से नीची जाति वालों को दबाए रखने के लिए उन पर पहले की तरह जुल्म ढाते रहेंगे?      

अय्याशी में डूबा कारोबारी

देश भर में क्रिकेट व अन्य खेलों का सामान बनाने के लिए प्रसिद्ध शहर जालंधर (पंजाब) के उपनगर लाजपतनगर की कोठी नंबर 141 में प्रसिद्ध करोड़पति बिजनैसमैन जगजीत सिंह लूंबा का परिवार रहता था. उन के सीमित परिवार में 60 वर्षीय पत्नी दलजीत कौर, 42 वर्षीय बेटा अमरिंदर सिंह उर्फ शंटू, बहू परमजीत कौर उर्फ पम्मी, 20 वर्षीय पोता शानजीत सिंह, मनजीत सिंह और पोती आशीषजीत कौर थीं. जगजीत लूंबा बड़े सज्जन एवं दयालु प्रवृत्ति के इंसान हैं. धनवान होने के बावजूद भी उन्हें किसी चीज का घमंड नहीं था. शहर में उन की जगजीत ऐंड कंपनी नाम से बहुत बड़ी फर्म है, जिस के अंतर्गत 2 पैट्रोल पंप, सर्विस स्टेशन और एक बहुत बड़ी मैटल ढलाई की फैक्ट्री है, जिस में कई फर्नेस लगे हैं. अमरिंदर सिंह उर्फ शंटू अपने पिता के साथ कारोबार संभालने में उन की मदद करता था. दलजीत कौर भी कभीकभार पति और बेटे की मदद के लिए पैट्रोल पंपों पर चली जाती थीं. तीनों बच्चे अभी पढ़ रहे थे. बड़ा पोता शानजीत सिंह एपीजे कालेज जालंधर का छात्र था. कुल मिला कर लूंबा परिवार सुखचैन से अपना जीवन निर्वाह कर रहा था.

23 फरवरी, 2017 की शाम करीब 4 बजे की बात है. दलजीत कौर अपने ड्राइंगरूम में परमजीत कौर उर्फ पम्मी और खुशवंत कौर उर्फ नीतू के साथ बैठी चाय पी रही थीं. खुशवंत कौर परमजीत कौर के पति के दोस्त बलजिंदर सिंह की पत्नी थी. दोनों के आपस में पारिवारिक संबंध थे. बलजिंदर की भी जालंधर के लक्ष्मी सिनेमा के पास मैटल ढलाई की फैक्ट्री थी.

अमरिंदर सिंह उर्फ शंटू की शादी के बाद से परमजीत कौर और खुशवंत कौर के बीच गहरी दोस्ती हो गई थी. इसी कारण वह हर रोज शाम के समय उस से मिलने उस के घर आ जाया करती थी. पिछले कई दिनों से दलजीत कौर की कमर में दर्द हो रहा था. शायद उम्र का तकाजा था. वह रोज शाम के ठीक 4 बजे फिजियोथैरेपी करवाने के लिए डाक्टर के यहां जाती थीं.

पर उस दिन खुशवंत कौर के आ जाने पर उन्होंने डाक्टर के यहां जाना कैंसिल कर दिया था. तीनों बच्चे शाम 4 से 6 बजे तक ट्यूशन पढ़ने चले जाते थे. मतलब आम दिनों में 4 से 6 बजे तक यानी 2 घंटे पम्मी घर में अकेली होती थी. उस दिन पम्मी की बेटी ट्यूशन चली गई थी.

बेटा शान जब ट्यूशन पढ़ने जाने के लिए निकलने लगा तो पम्मी ने कहा, ‘‘बेटा शान, तुम्हारे पापा का फोन आया था. उन्होंने कहा है कि तुम अपने छोटे भाई के साथ जा कर अवतारनगर रोड पर स्थित कार की दुकान पर एजेंट से मिलो. वह आज तुम्हारे पसंद की जीप खरीदवाएंगे.’’

‘‘ठीक है मम्मी.’’ शान ने मां की बात सुन कर कहा और छोटे भाई मनजीत को ले कर कार से अवतारनगर की तरफ चला गया.  दरअसल शान कई दिनों से अपने लिए जीप खरीदवाने की जिद कर रहा था.

तीनों महिलाएं चाय की चुस्कियां लेते हुए आपस में बतिया रही थीं कि तभी डोरबेल बजी. घंटी बजते ही पम्मी ने चाय का प्याला टेबल पर रखा और दरवाजे पर जा कर दरवाजा खोला तो सामने 2 आदमी खड़े थे. बिना कुछ कहे ही उन्होंने पम्मी को भीतर की ओर धक्का दे कर दरवाजा बंद कर दिया.

इस से पहले कि पम्मी कुछ समझ पाती, उन दोनों में से एक ने अपनी कमर से पिस्तौल निकाली और पम्मी को निशाना बना कर एक के बाद एक 3 गोलियां चला दीं. पम्मी को तो चीखने का अवसर भी नहीं मिला और वह फर्श पर गिर गई. गोलियों की आवाज सुन कर दलजीत कौर ड्राइंगरूम से बाहर आईं. बहू की हालत देख कर वह चिल्लाईं, ‘‘ओए मार दित्ता जालमा.’’

उन के साथ ही खुशवंत कौर भी कमरे से बाहर आ गई थी. माजरा समझ दोनों हमलावरों पर झपट पड़ीं. उन की इस हरकत से हमलावर घबरा गए. खुशवंत कौर दोनों में से एक से गुत्थमगुत्था हो गई. दलजीत कौर दूसरे आदमी से भिड़ गईं, जिस के हाथ में पिस्तौल था.

पिस्तौल वाले हमलावर ने दलजीत कौर से खुद को छुड़ाने के लिए उन पर गोली चला दी. इस के बाद दूसरे आदमी ने खुशवंत कौर को काबू करने के लिए अपने हाथ में थामा पेचकस उस की गरदन में पूरी ताकत से घुसेड़ दिया. उसी समय पिस्तौल वाले ने उस पर भी गोली चला कर मामला खत्म कर दिया.

तीनों औरतों की हत्या कर दोनों हमलावरों ने चैन की सांस ली और ड्राइंगरूम से निकल कर लौबी में आ गए. लौबी में रखे फ्रिज के पीछे टंगी चाबियों में से उन्होंने एक चाबी उठाई और घर के पिछवाड़े आ कर कोठी के बैक साइड वाला दरवाजा खोल कर निकल गए. मात्र 6-7 मिनट में वे 3 हत्याएं कर के आराम से चले गए थे.

दूसरी ओर जीप देखने के बाद शाम सवा 5 बजे शंटू जब अपने दोनों बेटों के साथ कोठी पर आया तो मुख्य दरवाजा भीतर से बंद मिला. काफी खटखटाने के बाद भी जब अंदर से कोई आहट नहीं सुनाई दी तो किसी अनहोनी की आशंका से परेशान हो कर बापबेटों ने धक्के मार कर दरवाजा तोड़ दिया. इस के बाद सामने का दृश्य देख कर उन के होश उड़ गए. शंटू चीखने लगे, ‘‘मार गए…मार गए… बीजी को मार गए.’’

बच्चे भी मदद के लिए उन के साथ चीखने लगे थे. चीखपुकार सुन कर पड़ोसी जमा हो गए. उन में खुशवंत कौर का बेटा अर्शदीप भी था. मां की लाश देख कर वह भी जोरजोर से रोने लगा. पड़ोसियों की मदद से तीनों को नजदीक के प्राइवेट अस्पताल ले गया. पौश कालोनी में दिनदहाड़े हुई 3 हत्याओं की खबर जंगल में लगी आग की तरह शहर भर में फैल गई. लोगों में दहशत भर गया. कोई इसे आंतकवादी घटना बता रहा था तो कोई आपसी रंजिश. किसी ने पुलिस को फोन कर दिया था. डा. अमनप्रीत सिंह ने मुआयना करने के बाद दलजीत कौर और खुशवंत कौर को मृत घोषित कर दिया. पुलिस केस था, इसलिए अस्पताल से भी पुलिस को सूचना दे दी गई.

परमजीत कौर की हालत नाजुक थी. उस के दिल की धड़कनें काफी धीमी थीं. उस की जान बचाने के लिए डाक्टरों ने उसे वेंटीलेटर पर रख दिया.

खबर मिलते ही थाना डिवीजन नंबर-4 के थानाप्रभारी प्रेम सिंह और थाना डिवीजन नंबर-6 के थानाप्रभारी गुरवचन सिंह दलबल सहित घटनास्थल पर पहुंच गए.

लाजपतनगर इलाका पहले थाना डिवीजन नंबर-6 में था, पर बाद में उसे थाना डिवीजन नंबर-4 में शामिल कर दिया गया. घटनास्थल पर पहुंचने के बाद पुलिस को पता चला कि सब लोग अस्पताल गए हैं तो थानाप्रभारी ने कोठी पर 2 सिपाही तैनात कर इंसपेक्टर प्रेम सिंह के साथ अस्पताल पहुंच गए. डाक्टर परमजीत को बचाने की कोशिश कर रहे थे पर उस की हालत में सुधार नहीं हो रहा था. फिर रात 9 बजे के करीब उस ने दम तोड़ दिया.

अस्पताल में पता चला कि जिन तीनों महिलाओं को गोली मारी गई थी, उन की मौत हो चुकी है. उन की लाशें कब्जे में ले कर पुलिस ने शंटू के बयान दर्ज किए और उन्हीं की ओर से भादंवि की धारा 302, 307, 452, 34 और 25, 27 आर्म्स एक्ट के तहत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर तीनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए राजकीय अस्पताल भेज दिया.

मामला करोड़पति बिजनैसमैन के परिवार में हुई 3 हत्याओं का था, इसलिए खबर मिलते ही पुलिस कमिश्नर (जालंधर) अर्पित शुक्ला सहित पुलिस के तमाम अधिकारी अपनेअपने लावलश्कर के साथ लाजपतनगर की कोठी नंबर-141 पर पहुंच गए. कोठी के ड्राइंगरूम में खून फैला था. क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम और फिंगरप्रिंट विशेषज्ञ मौके से सबूत ढूंढने का प्रयास कर रहे थे.

घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण करने के बाद पुलिस अधिकारियों को लगा कि हत्याएं लूटपाट के इरादे से नहीं की गईं, क्योंकि कोठी का सारा कीमती सामान अपनी जगह पर यथावत था. एक जगह कुरसियां और चाय के बरतन जमीन पर गिरे पडे़ थे, जिस से अनुमान लगाया गया कि वहां संघर्ष हुआ होगा.

हत्यारे जिस तरह कोठी के पीछे का दरवाजा खोल कर निकले थे, उस से यही अनुमान लगाया गया कि वह लूंबा परिवार के परिचित रहे होंगे, जिन का कोठी में आनाजाना रहा होगा. क्योंकि वह दरवाजा अकसर बंद रहता था और उस की चाबी फ्रिज के पीछे टंगी रहती थी. उन का मकसद केवल परमजीत कौर उर्फ पम्मी और उस की सास दलजीत कौर की हत्या करना था.

चश्मदीद गवाह न रहे, इसलिए उन्होंने कोठी में मौजूद खुशवंत कौर को भी मार दिया था. शंटू ने पुलिस को बताया था कि उस के परिवार की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. पुलिस मामले की जांच में जुट गई. पुलिस को पता चला कि उस कोठी में 4 नौकरानियां काम करती थीं.

सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक 3 नौकरानियां बरतन झाड़ूपोंछा, कपड़े धोने आदि का काम कर के अपने घर चली जाती थीं. एक नौकरानी रीतू लगभग 3, साढ़े 3 बजे की चाय बनाने के बाद घर जाती थी. पुलिस ने चारों नौकरानियों और उन के पतियों से गहन पूछताछ करने के साथ उन की पारिवारिक कुंडली को भी खंगाला.

क्योंकि अकसर बड़े घरों में होने वाली ऐसी वारदातों के पीछे किसी न किसी नौकर का हाथ होता है. पर ये सब बेकसूर पाए गए. पुलिस को घटनास्थल से 2 खाली कारतूस मिले थे, जबकि तीनों मृतक महिलाओं पर 7 गोलियां चलाई गई थीं, इस का मतलब यह था कि शेष 5 गोलियां मृतकों के शरीर में रह गई थीं.

अगले दिन डा. चंद्रमोहन, डा. प्रिया और डा. राजकुमार के पैनल ने तीनों लाशों का पोस्टमार्टम किया. एक्सरे और पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार, दलजीत कौर को कुल 3 गोलियां मारी गई थीं, जिस में से एक गोली उन के दिल के पास और एक सिर में फंसी थी. परमजीत कौर को भी 3 गोलियां लगी थीं, जिन में एक गोली उस के माथे के ठीक बीचोबीच लगी थी और एक खोपड़ी और एक बाजू में फंसी हुई थी. इस के अलावा उस के शरीर पर चोटों के 6 निशान पाए गए थे.

खुशवंत कौर के सिर में एक गोली उस की कनपटी से हो कर खोपड़ी में फंस गई थी. उस की गरदन में 16 सेंटीमीटर लंबा एक पेचकस भी फंसा हुआ था. पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने तीनों लाशें परिजनों को सौंप दीं. उन के अंतिम संस्कार में शहर के अनेक व्यापारी, गणमान्य व्यक्तियों के अलावा हजारों लोग शामिल हुए थे.

पुलिस को अमरिंदर सिंह उर्फ शंटू से पूछताछ करनी थी, इसलिए अंतिम संस्कार के बाद पुलिस ने उसे थाने बुला लिया. उस समय वहां वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी मौजूद थे. थानाप्रभारी ने उस का मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले कर चैक किया तो पता चला कि उस की सारी काल डिटेल्स डिलीट की हुई थी. उस का फोन नंबर सर्विलांस पर लगाने के बाद संबंधित फोन कंपनी से उस के नंबर की काल डिटेल्स हासिल की गई.

काल डिटेल्स की जांच में पुलिस को कई फोन नंबर संदिग्ध मिले. उन नंबरों के बारे में शंटू से पूछताछ की गई तो इस तिहरे हत्याकांड का खुलासा हो गया.

मामले का 24 घंटे में खुलासा होने पर पुलिस अधिकारियों ने राहत की सांस ली. हत्याकांड की साजिश में शामिल तेजिंदर कौर उर्फ रूबी नाम की महिला की गिरफ्तारी के लिए एक टीम फगवाड़ा भेज दी.

उस की गिरफ्तारी के बाद पुलिस कमिश्नर अर्पित शुक्ला ने उसी शाम प्रैसवार्ता कर पत्रकारों को बताया कि लाजपतनगर के तिहरे हत्याकांड के साजिशकर्ता और कोई नहीं, बल्कि अमरिंदर सिंह उर्फ शंटू और उस की प्रेमिका तेजिंदर कौर उर्फ रूबी है. इन दोनों अभियुक्तों ने पत्रकारों के सामने हत्या की कहानी बयान कर दी. इस सनसनीखेज तिहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी—

जगजीत सिंह लूंबा की सारी कंपनियां दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रही थीं. वह बड़े बिजनैसमैन थे, इसलिए उन का समाज में एक अलग ही रुतबा था. अमरिंदर सिंह उर्फ शंटू और उस की पत्नी परमजीत कौर में बड़ा गहरा प्यार था. शंटू और जगजीत सिंह सुबह एक साथ घर से निकलते थे. जगजीत सिंह का अधिकांश समय पैट्रोल पंपों पर गुजरता था, जबकि शंटू स्वतंत्र रूप से फैक्ट्री को देखता था. दोनों ने अपनेअपने काम बांट रखे थे, पर सारे कारोबार का लेखाजोखा जगजीत ऐंड कंपनी में होता था.

लूंबा परिवार की बरबादी के दिन की शुरुआत उस समय हो गई थी, जब सन 2013 में उन की कंपनी में तेजिंदर कौर उर्फ रूबी ने बतौर हैड एकाउंटैंट का कार्यभार संभाला. इस के पहले जगजीत ऐंड कंपनी में उस का पति सुखजीत बतौर कैशियर काम करता था. सुखजीत सिंह रूबी का नाम का ही पति था. क्योंकि उस पर सुखजीत सिंह का कोई नियंत्रण नहीं था.

अपना जीवन कैसे जीना है, इस बात के फैसले रूबी खुद लेती थी और उस में वह किसी का भी दखल बरदाश्त नहीं करती थी. कुल मिला कर वह एक आजाद खयाल महिला थी. कालेज के दिनों में ही रूबी ने तय कर लिया था कि वह भारत छोड़ कर विदेश जाएगी, जहां खूब दौलत कमा कर अपनी जिंदगी का लुत्फ उठाएगी.

इस के लिए उस ने कोई भी कीमत चुकाने का फैसला कर लिया था, पर विदेश जाने के लिए उस के पास पर्याप्त धन नहीं था. आखिर उस ने स्कौलरशिप ले कर आस्ट्रेलिया जाने का फैसला लिया. बारहवीं करने के बाद रूबी ने कंप्यूटर एजूकेशन में डिप्लोमा किया. इस के बाद उस ने सन 2009 में आईईएलटीएस की परीक्षा दी.

इस परीक्षा के तहत विदेश में नौकरी करने के लिए इच्छुक लोगों का अंगरेजी भाषा का टेस्ट लिया जाता है. फिर इस में मिले स्कोर बैंड के आधार पर उसे वीजा देने का फैसला लिया जाता है. इस परीक्षा में रूबी का स्कोर बैंड 5.5 आया. यह स्कोर बैंड अंगरेजी भाषा के मामूली उपयोगकर्ता का होता है, इसलिए कम स्कोर बैंड आने पर रूबी को आस्ट्रेलिया का वीजा नहीं मिला.

रूबी ने हिम्मत नहीं हारी. उस ने एक बार फिर आईईएलटीएस की परीक्षा दी. इस बार उसे 6.5 स्कोर बैंड प्राप्त हुए. यह स्कोर बैंड सक्षम उपयोगकर्ता का माना जाता है. पर उसे कम से कम 7 बैंड की जरूरत थी. इस बार भी वीजा न मिलने पर उस की विदेश जाने की इच्छा पूरी नहीं हो सकी. उसी दौरान उस की शादी सुखजीत सिंह से हो गई.

सुखजीत सिंह एक शरीफ युवक था. रूबी उसे ज्यादा महत्त्व नहीं देती थी. बातबात पर वह उस से क्लेश करती थी. क्लेश से बचने के लिए वह शांत रहता था. रूबी पति के साथ जालंधर के सोढल चौक पर किराए के मकान में रहती थी. पर अपनी महत्त्वाकांक्षा के चलते उस ने विदेश जाने का इरादा नहीं छोड़ा था.

वह किसी ऐसे आदमी की तलाश में थी, जो उस पर ढेर सारी दौलत लुटाए और उस के सपने पूरे करे. इस बीच उस की नौकरी अच्छे वेतन और अन्य सुविधाओं के साथ जगजीत ऐंड कंपनी में लग गई थी. इस नौकरी को उस ने अपने सपने पूरे करने का जरिया बना डाला था.

अमरिंदर सिंह उर्फ शंटू पहली ही मुलाकात में तेजिंदर कौर उर्फ रूबी का दीवाना हो गया था. रूबी भी अपने बौस की नजरों को ताड़ गई थी. यही तो वह चाहती थी. जिस आदमी की उसे तलाश थी, वह तलाश उस की पूरी हो गई थी.

शंटू किसी भी तरह रूबी को हासिल करना चाहता था. इस के लिए उस ने रूबी को तमाम सुविधाएं देने के साथ अपनी निजी सचिव बना लिया. अब वह हर समय शंटू के साथ रहती थी. दोनों एकदूसरे का शिकार करने पर तुले थे, पर तीर चलाने में पहल कोई नहीं कर रहा था.

रूबी को सरप्राइज देने के लिए शंटू ने जालंधर के रामामंडी क्षेत्र में एक कोठी खरीदी और उस की चाबी रूबी को देते हुए कहा, ‘‘आज से तुम इस कोठी में रहोगी. यह तुम्हारे लिए है.’’

रूबी की खुशी का ठिकाना न रहा. क्योंकि उस ने सोचा भी नहीं था कि शंटू इतनी जल्दी उस की झोली में आ गिरेगा. उसी शाम उस नई कोठी में रूबी के सामने जब शंटू ने प्यार का इजहार किया तो रूबी को जैसे मनचाही मुराद मिल गई. इसी दिन का तो उसे इंतजार था. दोनों ने ही उस दिन अपनी इच्छा पूरी की. इस के बाद रूबी पति को छोड़ कर शंटू द्वारा दी गई कोठी में रहने लगी.

शंटू का भी अधिकांश समय रूबी के साथ उसी नई कोठी में गुजरने लगा. घर पर काम का बहाना बना कर वह रूबी की बांहों में पड़ा रहता. 3 साल कब गुजर गए, पता ही नहीं चला और न ही उन के संबंधों की बात किसी को कानोकान पता चली. पर अवैध संबंध कभी न कभी खुल ही जाते हैं.

दिसंबर, 2016 में परमजीत कौर को अपने पति और रूबी के नाजायज संबंधों की भनक लग गई. इस बारे में जब उस ने शंटू से पूछा तो वह साफ मुकर गया. पर परमजीत के पास पुख्ता सबूत थे. उस ने यह बात अपनी सास दलजीत कौर को बताई. फिर एक दिन वह अपनी ननद और सास को ले कर रामामंडी वाली कोठी पर पहुंची.

रूबी कोठी में ही थी. तीनों ने मिल कर रूबी की खूब बेइज्जती की और उसे धक्के मार कर कोठी से बाहर कर अपना ताला लगा दिया. शंटू को जब इस बात का पता चला तो उसे अपने घर वालों पर बड़ा गुस्सा आया. घर आ कर उस ने खूब झगड़ा किया और पिता जगजीत सिंह से साफ कह दिया, ‘‘मैं पम्मी से तलाक ले कर रूबी से शादी कर के उसे इस घर की बहू बनाना चाहता हूं.’’

‘‘तेरी मति मारी गई है क्या, जो इस उम्र में पागलों जैसी बातें कर रहा है. शांति से अपने बीवीबच्चों के साथ रह.’’ जगजीत सिंह ने डांटा.

जगजीत सिंह और दलजीत कौर ने बेटे को बहुत समझाया, पर शंटू तो रूबी के मोहजाल में इस कदर जकड़ा था कि वह किसी भी सूरत में उस से दूर होने को तैयार नहीं था. शंटू की ससुराल वालों और अन्य रिश्तेदारों ने यह बात सुनी तो सभी उन की कोठी पर आ गए.

सभी ने शंटू को फटकार लगाते हुए समझाया, तब कहीं जा कर यह मामला शांत हुआ. उस समय सभी बड़ेबूढ़ों के दबाव में आ कर शंटू शांत हो गया, पर दिनरात वह पम्मी से पीछा छुड़ा कर रूबी से ब्याह रचाने के बारे में सोचता रहता था. वह इस बात को अच्छी तरह समझ गया था कि एक म्यान में 2 तलवारें नहीं रह सकतीं यानी पम्मी के रहते हुए वह रूबी को कभी इस घर की बहू नहीं बना सकता.

शंटू के पैट्रोल पंप पर कुछ समय पहले तक गांव ढिलवां निवासी विपिन नौकरी करता था. विपिन अपराधी प्रवृत्ति का था. उस पर कई मुकदमे चल रहे थे. एक दिन अचानक रास्ते में शंटू की मुलाकात विपिन से हो गई. गाड़ी रोक कर उस ने विपिन को अपने साथ बिठा लिया. शंटू ने उसे अपने और रूबी के रिश्ते के बारे में बता कर कहा, ‘‘पम्मी के रहते रूबी को अपना बनाना असंभव है. तू बता पम्मी का इलाज कैसे किया जाए?’’

‘‘जी, मैं क्या बताऊं?’’ विपिन ने असमंजस में कहा, ‘‘आप किसी वकील से सलाह ले लो.’’

‘‘नहीं, पम्मी का बड़ा सीधा इलाज है.’’ शंटू ने कहा.

‘‘वह क्या जी?’’ विपिन ने हैरानी से पूछा.

‘‘पम्मी का काम तमाम कर दे. न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी.’’ शंटू ने सुझाव दिया.

‘‘ठीक है जी, हटा देते हैं रस्ते से.’’ विपिन अब पूरी बात समझ गया था. मुद्दे पर आते हुए उस ने कहा, ‘‘पर यह काम मैं अकेला नहीं कर सकूंगा. दूसरे बदले में कितने रुपए मिलेंगे?’’

‘‘पहले तू आदमी का इंतजाम कर ले, रुपयों की बात तभी कर लेंगे.’’ शंटू ने कहा.

अगले ही दिन विपिन ने गांव सरहाल कलां चब्बेवाल निवासी अमृतपाल को शंटू से मिलवाया. उस का बड़ा भाई विदेश में नौकरी करता था. वह भी मलेशिया में नौकरी करता था. 3 साल नौकरी कर के वह 6 महीने पहले ही घर लौटा था. यहां आ कर उस ने पैट्रोल पंप के शेड बनाने का काम शुरू कर दिया था.

उसी दौरान उस की मुलाकात विपिन से हुई थी. अमृतपाल साफसुथरी छवि वाला आदमी था, पर पैसों की वजह से उसे लालच आ गया. उस ने इस काम के लिए 15 लाख रुपए मांगे. सौदेबाजी के बाद मामला 8 लाख रुपए में तय हो गया. शंटू ने उसी समय विपिन को 1 लाख 40 हजार रुपए एडवांस दे दिए. इन रुपयों से विपिन और अमृतपाल उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद गए और वहां से किसी से एक पिस्तौल और गोलियां खरीद लाए.

शंटू ने अपनी पत्नी परमजीत कौर उर्फ पम्मी की हत्या की सुपारी अपनी प्रेमिका रूबी के कहने पर दी थी. हत्या की योजना बन जाने के बाद शंटू ने विपिन और अमृतपाल को अपनी कोठी का पूरा नक्शा समझाते हुए एकएक बात बारीकी से समझा दी कि कैसे उन्हें कोठी में दाखिल होना है और कैसे हत्या करनी है. उस के बाद फ्रिज के पीछे टंगी पिछले दरवाजे की चाबी से ताला खोल कर बाहर निकल जाना है.

शंटू ने विपिन और अमृतपाल को अपने घर के सभी सदस्यों की भी पूरी जानकारी दे दी थी कि कौन किस वक्त कहां होता है. हत्या करवाने के लिए शंटू ने शाम 4 से 5 बजे का टाइम तय किया था. क्योंकि वह जानता था कि उस समय परमजीत कौर कोठी में अकेली होती है.

21 फरवरी, 2017 को शंटू की योजनानुसार विपिन और अमृतपाल उस की कोठी नंबर 141 पर पहुंचे. उन्होंने यह कह कर घर में लगे सीसीटीवी कैमरों के कनेक्शन काट दिए कि शंटू भाई ने कहा है कि इन पुराने कैमरों की जगह अब नए मौडर्न कैमरे लगाए जाएंगे. इसी बहाने वे कोठी के अंदरूनी भाग को पूरी तरह देखसमझ आए. अगले दिन 22 फरवरी, 2017 को दोनों फिर से कोठी पर गए और वहां रखा डिजिटल वीडियो रिकौर्डर और मौनीटर भी उठा लाए.

23 फरवरी, 2017 की शाम करीब 4 बजे दोनों फिर कोठी पर पहुंचे और अपनी योजनानुसार इस हत्याकांड को अंजाम दे कर चुपचाप निकल गए. बात केवल परमजीत कौर उर्फ पम्मी की हत्या करने की हुई थी. इसलिए विपिन और अमृतपाल दलजीत कौर और खुशवंत कौर की हत्या नहीं करना चाहते थे, लेकिन हालात ऐसे बन गए कि उन्हें उन की भी हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

शंटू को इस बात की आशंका बिलकुल नहीं थी कि उस की मां की भी मौत हो सकती है. वह अपनी मां से बेहद प्यार करता था. इस का उसे बहुत पश्चाताप है. रिमांड के दौरान पूछताछ करते समय वह अपनी मां को बारबार याद कर के रोने लगता था. उसे इस बात का अफसोस है कि उस की अय्याशियों और बेवजह की हठधर्मी से उस के परिवार का विनाश हो गया.

विपिन और अमृतपाल फरार हो गए थे. उन की तलाश में पुलिस की एक टीम दिल्ली और गाजियाबाद भी गई, पर वे पुलिस के हाथ नहीं लग सके. पुलिस ने अमरिंदर सिंह उर्फ शंटू और तेजिंदर कौर उर्फ रूबी को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया है. कथा लिखे जाने तक विपिन और अमृतपाल गिरफ्तार नहीं हो सके थे.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

डिजिटल बैंकिंग के इन फायदों से अंजान होंगे आप

आज की रफ्तार भरी जिंदगी में जब सीमित समय में ही हमें सब काम निबटाने होते हैं तो ऐसे में प्रत्येक मिनट का महत्त्व होता है. इसी भागादौड़ी के बीच यदि बैंक जाना पड़े तो आधा दिन तो चुटकियों में निकल जाता है.

ऐसे में डिजिटल बैंकिंग ने ग्राहकों को बड़ी राहत दी है. डिजिटल बैंकिंग या औनलाइन बैंकिंग के जरीए आप मिनटों में पैसों का लेनदेन, लोन के लिए आवेदन व अन्य बैंक संबंधित कई काम निबटा सकते हैं. और तो और यह सब करते वक्त न ही आप का समय बरबाद होता है और न ही आप को इस के लिए किसी प्रकार का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है.

एक नजर डिजिटल बैंकिंग की बारीकियों और फायदों पर

क्या है डिजिटल बैंकिंग?

डिजिटल बैंकिंग का मतलब है तकनीक की मदद से बैंक को ग्राहकों तक पहुंचाना. खाता खुलवाने से लेनदेन तक करने में तकनीक का इस्तेमाल डिजिटल बैंकिंग कहलाता है. इस में इंटरनैट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग, एटीएम आदि शामिल हैं. सरल शब्दों में कहें तो डिजिटल बैंकिंग का अर्थ है तकनीक की मदद से आप का बैंक हमेशा आप के साथ रहता है और कभी भी उस की सेवाओं का फायदा उठा सकते हैं.

कम या न के बराबर लागत

बैंक की शाखाओं पर अपनी सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए बैंकों को कर्मचारी संसाधनों पर काफी खर्च करना पड़ता है. ऐसे में प्रति लेनदेन ग्राहकों से बैंकों द्वारा 40 लिए जाते हैं. पैसे का यही लेनदेन जब आप एटीएम से करते हैं, तो यह लागत 18 से 20 हो जाती है. हालांकि जब आप लेनदेन के लिए डिजिटल बैंकिंग का सहारा लेते हैं, तो लागत बहुत कम या फिर न के बराबर हो जाती है.

ज्यादा ब्याज और सस्ता कर्ज

डिजिटल बैंकिंग के माध्यम से यदि ग्राहक कोई निवेश योजना लेते हैं, तो बैंक अकसर उस पर ज्यादा ब्याज उपलब्ध कराते हैं. इस का कारण यह है कि डिजिटल बैंकिंग बैंकों की लागत को कम कर देती है, जिस का फायदा वे ग्राहकों को दे देते हैं. उसी प्रकार औनलाइन लोन के लिए आवेदन करने पर बैंक ग्राहकों को सस्ती दरों पर लोन भी उपलब्ध करा देते हैं.

समय की बचत

बैलेंस चैक करना हो, पैसे भेजने हों, क्रैडिट कार्ड की लिमिट बढ़वानी हो, बिल का भुगतान करना हो, लोन के लिए आवेदन या फिर बैंकों द्वारा उपलब्ध कराई जा रही विभिन्न निवेश योजनाओं के बारे में कोई सूचना हासिल करनी हो, डिजिटल बैंकिंग की मदद से आप यह सब काम सैकंडों में घर बैठे ही कर सकते हैं. जबकि इसी काम के लिए यदि आप को बैंक जाना पडे़, तो समय काफी बरबाद होता है. आप को बैंक के कई चक्कर लगाने पड़ सकते हैं.

इस में कोई संदेह नहीं कि डिजिटल बैंकिंग ने लोगों की जिंदगी को आसान बनाया है, मगर इस में की गई थोड़ी सी भी लापरवाही आप को भारी नुकसान पहुंचा सकती है. जब आप बैंक की शाखा में जा कर बैंकिंग सेवाओं का फायदा उठाते हैं तो आप की सूचना को सुरक्षित करने की जिम्मेदारी बैंक की होती है पर जैसे ही आप डिजिटल बैंकिंग का इस्तेमाल करते हैं तो आप अपने जोखिम पर इन सेवाओं का फायदा उठाते हैं. ऐसे में कुछ बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है.

– साइबर कैफे में जा कर आप औनलाइन बैंकिंग न करें. हैकर्स ऐसे ही मौकों की तलाश में रहते हैं. अत: अपने पर्सनल कंप्यूटर से डिजिटल बैंकिंग करें.

– आप जिस कंप्यूटर से डिजिटल बैंकिंग करें उस में ऐंटीवायरस का होना बेहद जरूरी है. हैकर्स अकसर वायरस के जरीए ग्राहकों का अकाउंट हैक कर लेते हैं.

– अपने औनलाइन, मोबाइल बैंकिंग के पासवर्ड को न तो किसी को बताएं और न ही इसे ऐसी जगह लिख कर रखें जिस से किसी और की नजर उन पर पड़े.

– यदि आप को औनलाइन भुगतान करना हो तो साइबर कैफे में जाने के बजाय अपने पर्सनल कंप्यूटर से करें. भुगतान करने के दौरान क्रैडिट कार्ड या डैबिट कार्ड की जानकारी किसी वैबसाइट पर सेव न करें.

– यदि आप मोबाइल बैंकिंग करते हैं तो इस के लिए बैंकों के ऐप्लिकेशन डाउनलोड कर लें जो काफी सुरक्षित होते हैं. बैंकिंग करने के बाद ऐप्लिकेशन को बंद कर उस से लौग आउट होना न भूलें.

– अकसर लोगों के पास लौटरी जीतने और विभिन्न औफर के ईमेल आते हैं, जिन में उन से उन के अकाउंट नंबर व अन्य पासवर्ड जैसी जानकारी मांगी जाती है. ऐसे ईमेल का कभी जवाब न दें और न ही ऐसे ईमेल को चैक करें.

– कई हैकर्स और साइबर अपराधी कस्टमर केयर कर्मी बन कर ग्राहकों से उन के अकाउंट से संबंधित जानकारी मांगते हैं. ऐसा कोई फोन आने पर आप अपने अकाउंट से संबंधित जानकारी उपलब्ध न कराएं. बैंक कभी भी आप से इस प्रकार की सूचना, खासतौर पर पासवर्ड आदि नहीं मांगते.

– डिजिटल बैंकिंग के दौरान यदि आप को अपने खाते में किसी भी प्रकार की अनियमितता नजर आए तो इस की जानकारी फौरन अपने बैंक को दें.

जब ‘टेस्ट मैच’ में लगा खाने का तड़का

खेल एक ऐसा माध्यम है जो आपको स्वस्थ और तंदरुस्त बनाता है. लेकिन आज खेल का दायरा सिर्फ खेल तक ही सिमित नहीं है बल्कि यह मनोरंजन का साधन बन गया है. और जब बात क्रिकेट की हो तो क्या कहना. आधुनिक क्रिकेट को ‘क्रिकेटेनमेंट’ की उपाधि देना गलत नहीं होगा. क्रिकेट की बढ़ती लोकप्रियता ने इसे मनोरंजन का नया साधन बना दिया है.

आज क्रिकेट के सिर्फ नए प्रारूप और नियम से ही नहीं बल्कि कई चैट शो और इंटरव्यू के जरिए क्रिकेटर्स लोगों का मनोरंजन करते हैं. कुछ ऐसी ही कोशिश की है लाइफस्टाइल चैनल लिविंग फूड्ज ने. इस चैनल पर पिछले महीने शुरू हुए चैट शो ‘टेस्ट मैच’ (Taste Match) क्रिकेटर्स की जिंदगी से जुड़ी कई राज खोल रहा है.

भारत के बेहद पसंदीदा स्पोर्ट्स आइकॉन संदीप पाटिल ने ‘टेस्ट मैच’ के जरिये टीवी पर डेब्यू किया था. शो का टैगलाइन ‘खिलाड़ी वही खेल नया’ शो के साथ पूर्ण न्याय करता है. इस शो में आपको आपके पसंदीदा खिलाड़ी का मजेदार और रोमांचक अंदाज देखने मिलता है. ‘टेस्ट मैच’ के जरिये आप उनके और करीब पहुंच जाते हैं. क्रिकेटर्स अपनी जिंदगी से जुड़ी हर छोटी बड़ी बात साझा करते हैं जैसे उनकी पसंदीदा डिश, मोस्ट मेमोरेबल मोमेंट, क्रिकेट करियर आदि.

टेस्ट मैच में संदीप के साथ कई क्रिकेट खिलाड़ी शामिल हुए. हाल ही में पाटिल ने इरफान पठान, हरभजन सिंह, अजय जडेजा, रोहित शर्मा जैसे कई दिग्गज खिलाड़ी से बातचीत की और उनसे जुड़ी रोचक बातें बताई. आइए आपको बताते हैं इन दिग्गजों की जिंदगी से जुड़ी कई अनकही पहलुओं के बारे में.

कपिल हैं इन दो खिलाड़ियों की प्रेरणा

एवरग्रीन कपिल देव, टर्बनेटर हरभजन सिंह और इरफान पठान के इंसपिरेशन हैं. दोनों ही कपिल को अपनी प्रेरणा मानते हैं.

बिरयानी है फेवरिट डिश

इनफान को खाने में बिरयानी पसंद है तो वहीं हरभजन को घर का खाना.

खाने से बीवी को करते हैं इम्प्रेस

अजय जडेजा एक बेहतरीन कुक हैं. वह अकसर ही अपनी बीवी को इम्प्रेस करने के लिए हेल्दी और टेस्टी ब्रेकफास्ट तैयार करते हैं.

किचन में मचाया कोहराम

आईपीएल 10 के विजयी टीम मुंबई इंडियंस के कप्तान रोहित शर्मा फ्रेंच फुटबॉलर जिनेडिन जिडान के साथ खेलना चाहते हैं. क्रिकेट के भगवान सचिन से उन्हें प्रेरणा मिलती है.

किचन की यादों को साझा करते हुए रोहित ने ऑमलेट बनाते वक्त हुए किचन डिसास्टर के बारे में बताया. उन्हें फ्राइड अंडे बहुत पसंद है.

कुछ ऐसे ही रोचक बातों को जानने के लिए देखें ये वीडियो.

श्वेता त्रिपाठी को हटा मेघा ने बनाई जगह

इन दिनों टीवी सीरियलों में भी कलाकारों की अदला बदली बड़ी तेजी से हो रही है. सूत्रों के अनुसार ‘लाइफ ओ के’’ टीवी चैनल पर प्रसारित होने के लिए इन दिनों बदले की भावना वाले नाटकीय सीरियल ‘‘इंतकाम एक मासूम का’’ का निर्माण किया जा रहा है. इस सीरियल में अभिनय करते हुए एक तरफ सविता प्रभुणे तीन वर्ष बाद छोटे परदे पर वापसी करने जा रही हैं, वहीं इस सीरियल से श्वेता त्रिपाठी को हटाकर मेघा गुप्ता को जोड़ा गया है. सूत्रों के अनुसार पहले इस सीरियल में अहम भूमिका श्वेता त्रिपाठी निभा रही थी, लेकिन अचानक उनके नखरे ऐसे बढ़े कि निर्माता व चैनल ने उनकी छुट्टी कर दी. सूत्रों के अनुसार मेघा गुप्ता तो जनवरी माह में सिद्धांत कार्णिक के साथ विवाह रचाने के बाद से अभिनय से दूरी बनाए हुए थी. लेकिन जैसे ही उन्हे सीरियल ‘‘इंतकाम एक मासूम का’’ का आफर मिला, उन्होंने इसे लपक लिया. इस सीरियल में अविनाश सचदेव, मानव गोयल व रिक्की पटेल भी अभिनय कर रहे हैं.

जब हमने मेघा गुप्ता से बात की, तो मेघा गुप्ता ने कहा-‘‘मेरे करियर में अब तक इस तरह का किरदार निभाने का अवसर मुझे पहली बार मिला है. इसमें मैं पहली बार साड़ी पहने हुए नजर आउंगी. मेरे करियर का यह पहला किरदार है, जब मैं नकारात्मक किरदार निभा रही हूं. हम इसकी शूटिंग मथुरा में करने जा रहे हैं.’’

कान्स : दीपिका व सोनम के शीतयुद्ध के बीच फंसी ऐश्वर्या राय बच्चन

‘‘कान्स अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह’’ के गलियारे से भारतीय अभिनेत्रियों खासकर सोनम कपूर व दीपिका पादुकोण को लेकर जिस तरह की खबरें आ रही हैं, उससे लोगों की जबान पर एक ही सवाल है कि भारतीय अभिनेत्रियों के लिए उनका आपसी शीतयुद्ध अहम है या भारत देश की प्रतिष्ठा? कान्स के गलियारों से जो खबरें मिल रही हैं, उससे तो यही बात उभरकर आ रही है कि इन अभिनेत्रियों ने अपने आपसी शीतयुद्ध के चलते भारत की प्रतिष्ठा पर हथौड़ा चला दिया.

वास्तव में अंतरराष्ट्रीय ब्यूटी प्रोडक्ट ‘‘लारियल’’ के साथ कई भारतीय अभिनेत्रियां जुड़ी हुई हैं. कान्स इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में ऐश्वर्या राय बच्चन सहित कई भारतीय अभिनेत्रियां ‘‘लारियल’’ की ही वजह से रेड कारपेट पर शिरकत करती आयी हैं. अब तक इंटरनेशनल प्रोडक्ट ‘लारियल’ को भारतीय अभिनेत्रियों के नखरे नहीं सहन करने पड़े थे. पर पहली बार उनके सामने भारतीय अभिनेत्रियों की खूबसूरती के पीछे का काला सच सामने आ गया.

इस बार ‘कान्स इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ के दौरान कान्स में लारियल से जुड़ी व जुड़ी रही ऐश्वर्या राय बच्चन, दीपिका पादुकोण व सोनम कपूर की मौजूदगी के चलते इनके नखरे ‘लारियल’ को सहन करने पड़े और सूत्रों के अनुसार इसका कारण बना दीपिका पादुकोण व सोनम कपूर के बीच चल रहा ‘शीतयुद्ध’.

लारियल हर वर्ष अपने भारतीय ब्रांड अम्बेसडरों के साथ ‘‘कान्स’’ में विज्ञापन फिल्म की शूटिंग करता आया है. 2016 में ‘‘कान्स इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’’ के दौरान ‘लारियल पेरिस’’ ने अपने लिपिस्टिक कलेक्शन के प्रचार के लिए ऐश्वर्या राय बच्चन और सोनम कपूर पर एक विज्ञापन फिल्म फिल्मायी थी.

इस बार जब ऐश्वर्या राय बच्चन, दीपिका पादुकोण व सोनम कपूर ‘‘लारियल’’ प्रोडक्ट की ब्रांड अम्बेसेडर व टीम का हिस्सा होने की वजह से ‘‘कान्स इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’’ में रेड कारपेट का हिस्सा बनी. तो इस मौके पर लारियल ने इन तीनों भारतीय कलाकारों के साथ एक विज्ञापन फिल्म की शूटिंग करने की बात सोची.

लारियल के इस प्रस्ताव पर ऐश्वर्या राय बच्चन ने हामी भरते हुए कहा कि वह उन्हे शूटिंग की तारीख व समय बता दें, उन्हे कोई समस्या नहीं है. मगर सूत्रों पर यकीन किया जाए, तो सोनम कपूर और दीपिका पादुकोण ने अपने बीच चल रहे शीत युद्ध के चलते एक साथ शूटिंग करने से साफ इंकार कर दिया. उन्होंने कह दिया कि उनकी शूटिंग अलग अलग करें, फिर भले उसे जोड़कर परदे पर एक साथ दिखाएं. जब यह बात लारियल वालों ने ऐश्वर्या राय बच्चन को बतायी, तो ऐश्वर्या राय को अहसास हुआ कि सोनम व दीपिका के आपसी शीत युद्ध के बीच वह पिस रही हैं. पर वह किसी से भी कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं है. इसलिए वह चुप रहीं.

बहरहाल, एक अंग्रेजी वेब साइट के अनुसार अब लारियल वाले तीनों के साथ अलग अलग शूटिंग कर फिर उसे डिजीटली एडीटिंग टेबल पर एक साथ मिलाने की योजना पर काम करने जा  रहे हैं.

रंगभेद पर बंटता समाज

दिल्ली के निकट नोएडा में अफ्रीकी बच्चों या अमेरिका में यूनाइटेड एअरलाइंस का एक चीनी मूल के यात्री को घसीट कर हवाईर्जहाज से उतारना रंगभेद की गहरी अंधेरी गुफाओं में रह रहे लोगों की असल सोच का प्रदर्शन करता है. भारत में थोड़े से गोरे रंग के लोगों को नौकरियों, शादियों, नेतागीरी में इतनी ज्यादा प्राथमिकता मिल जाती है कि गहरे रंग के प्रति हमारी सोच बेतुकी होती जाती है और सांवलों व कालों के प्रति नाराजगी साफ झलकने लगती है.

गोरा रंग न तो योग्यता का प्रतीक है न शराफत का और न ही कुशलता का. त्वचा का रंग मैलानिन की देन है, जिस का व्यक्ति के व्यवहार पर कोई असर नहीं पड़ता, पर सदियों से वर्ण यानी रंग का जंजाल हमारे सिर पर भी उसी तरह मंडरा रहा है जैसे अमेरिका, चीन, जापान आदि में. हर समाज में गोरों की पूछ होती है. अमेरिका में प्रसिद्ध गायक माइकल जैक्सन ने तो तरहतरह के उपाय कराए कि वह गोरा दिखे. इसी चक्कर में उस ने न जाने क्या लिया कि उस की असामयिक मौत हो गई.

भारत में इसी रंगभेद पर उन सितारों को ले कर विवाद चल रहा है, जो गोरे रंग की क्रीम के विज्ञापनों में नजर आते हैं. इस में इन सितारों या क्रीम उत्पादकों को नाहक घसीटा जा रहा है, क्योंकि बीमारी विज्ञापनों की देन नहीं, सामाजिक सोच की है.

गोरी लड़कियों को कुशल न होने पर भी सिरआंखों पर रखो और सांवलियों को दुत्कारो तो गोरा होने की कोशिश हरकोई करेगा ही. अगर मांग है, तो ही पूर्ति होगी. दोष समाज का है, आम औरतों का है, सासों का है, मांओं का है कि वे त्वचा का रंग देखती हैं और उसी आधार पर गुण तय कर लेती हैं. पुरुष इस मामले में उदार नहीं पर चूंकि उन का वास्ता बहुत तरह के लोगों से पड़ता है, उन्हें आदत पड़ जाती है कि लोगों को उन की आदत से पहचानें, त्वचा से नहीं.

अपना शरीर मनचाहा बनाने का हक भी हरेक के पास है. मोटा पतला होने की कोशिश करे, लंबी नाक वाली नाक की सर्जरी करवाए, छोटे स्तनों वाली बैग्स डलवाए, झुर्रियों वाली बोटोक्स के इंजैक्शन लगवाए, ये हक हैं लोगों के पास और इन के बारे में जानकारी प्राप्त करने का हक भी है. रंगभेद को बढ़ावा दे रहे हैं इस के लिए युवतियों को उन उत्पादनों से बेखबर न करें जो रंग सुधारने की कोशिश करती हैं. सितारों या उत्पादकों को नाहक ब्यूटी और मेकअप से अपनेआप को सजाने के हक के विवाद में उलझा रहे हैं.

ये उलझाने वाले तो कल को कहेंगे कि बाल भी न बनवाए जाएं, झांइयों के लिए क्रीम न लगाएं, मर्द दाढ़ी न बनवाएं.                 

बैस्ट मौम जैसा टैग है ही नहीं : मोनिका ओसवाल

2 बेटियों की मां 44 वर्षीय मोनिका ओसवाल ने 2004 में कार्यकारी निदेशक के रूप में मोंटे कार्लो कंपनी का कार्यभार संभाला. यह उन की रचनात्मकता और हट कर सोचने की क्षमता ही थी जिस की बदौलत मोंटे कार्लो एक सफल फैशन ब्रैंड बनकर उभरा. व्यवसायी होने के साथसाथ मोनिका कवि और कलाकार भी हैं. जल्द ही मोनिका की कविताओं का संग्रह आने की उम्मीद है.

मोनिका अपने काम में इसलिए सफल हैं क्योंकि इन्होंने कपड़ों की क्वालिटी और ग्राहकों की संतुष्टि को अपनी कंपनी का मोटो बनाया है. आइए जानते हैं कि वे कैसे कंपनी के साथ अपनी बेटियों के सुखद भविष्य की भी योजनाएं बनाती हैं:

फैशन इंडस्ट्री में आने की प्रेरणा कैसे मिली?

फैशन आत्म अभिव्यक्ति से संबंधित है. वस्त्रों का रंग और स्टाइल आकर्षक हो तो उन्हें पहनने वाले का व्यक्तित्व भी निखर उठता है. खुद की अभिव्यक्ति को पूर्ण करने की इच्छा ने ही मुझे इस इंडस्ट्री में प्रवेश करने को प्रेरित किया.

आप की नजर में बैस्ट मौम बनने के लिए क्या जरूरी है और पति की तरफ से कितनी सपोर्ट मिलती है?

बैस्ट मौम जैसा कोईर् टैग वास्तव में है ही नहीं. एक मां हमेशा अपनी मां, परिस्थितियों व अनुभवों से सीखती रहती है. अगर आप का बच्चा आप से एक मां के रूप में, एक बहन के रूप में, एक भाई या फिर एक अभिभावक के रूप में बात करने की इच्छा रखता है, तब आप को यह पता होना चाहिए कि उस से कैसे बात करनी है, उसे कैसे समझाना है. हां, जहां तक पति के सहयोग का सवाल है, तो उन का सहयोग मुझे हमेशा मिला है.

अपने बच्चों के लिए आप एक सख्त मदर हैं या कूल?

मैं समय के अनुरूप सख्त भी होती हूं और जब जरूरत नहीं पड़ती तो शांत रहती हूं और बच्चों को प्यार से समझाती हूं. मेरा मानना है कि बच्चे जैसेजैसे बड़े होते हैं, उन्हें चीजों को खुद समझने और जानने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए. लेकिन इस दौरान मातापिता भी जरूरत पड़ने पर बच्चों को समयसमय पर सहीगलत के बीच फर्क करना समझाते रहें.

महिला होने के नाते क्या किन्हीं समस्याओं का सामना करना पड़ा?

मुझे कभी किसी तरह की बंदिश का सामना नहीं करना पड़ा. मूल रूप से यह इच्छा की लड़ाई है. अगर आप जीवन में कुछ पाना चाहते हैं, तो उस का सही तरीका आप को पता होना चाहिए. तभी आप उसे पाने में सफल हो पाएंगे. एक महिला के रूप में मेरे लिए ऐसी कोई अड़चन कभी नहीं रही.

घरपरिवार और बच्चों के साथ काम कैसे मैनेज करती हैं?

जब आप अपने काम से प्यार करते हैं और अपने परिवार के प्रति भी समर्पित रहते हैं तब अपनेआप संतुलन बन जाता है. अपनी प्राथमिकताओं को आगे रखें और योजना बना कर काम करने की कोशिश करें. सारे काम आसानी से हो जाएंगे. मैं अपने काम से प्यार करती हूं, इसलिए मुझे हमेशा समर्थन मिलता है. मैं कभी कमजोर नहीं पड़ती.

इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभाते हुए भी अपने अंदर के कलाकार व लेखक को कैसे जिंदा रखा?

महत्त्वपूर्ण यह है कि आप क्या, क्यों और कैसे करना चाहते हैं? मुझे शब्दों से खेलना अच्छा लगता है. जो मेरे पास है, जिस पर मुझे विश्वास है, जो मैं महसूस करती हूं और आसपास जो भी देखती हूं उसे कलम के जरीए पन्नों पर उतार देती हूं. जब तक मैं इसे पूरा नहीं करती शब्द मुझे झकझोरते रहते हैं. यही वजह है कि मेरे अंदर का कलाकार और लेखक कभी मरता नहीं.                    

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