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तो ये है चैंपियंस ट्रॉफी 2017 में खेल रही 8 देशों की पूरी टीम

एक जून से चैंपियंस ट्रॉफी का आगाज हो रहा है. ‘मिनी वर्ल्ड कप’, ‘वर्ल्ड कप से पहले वार्म अप टूर्नामेंट’, ‘सर्वश्रेष्ठ का टेस्ट’ जैसी पहचान रखने वाले इस टूर्नामेंट का अपना इतिहास रहा है. और जैसे जैसे टूर्नामेंट करीब आ रहा है इसका रोमांच बढ़ता जा रहा है.

बात अगर पिछले आईआईसी चैंपियंस ट्रॉफी की करें तो ये साल 2013 में इंग्लैंड में ही खेली गई थी जिसका विजेता भारत रहा था.

1 जून से 8 जून तक इंग्लैंड में होने वाले आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी के लिए 8 देशों ने अपनी टीमों की घोषणा की है। इसमें पाकिस्तान, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, न्यूजीलैंड, साउथ अफ्रीका, श्रीलंका और बांग्लादेश की टीमें शामिल हैं। इन टीमों को दो ग्रुप में बांटा गया है. जानें किस ग्रुप में कौन सी टीम है.

किस ग्रुप में कौनसी टीम

ग्रुप ए

ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, इंग्लैंड और न्यूजीलैंड

ग्रुप बी

भारत, पाकिस्तान, साउथ अफ्रीका और श्रीलंका

आईए अब एक नजर डालते हैं उन आठों टीमों पर, जो 2017 के चैंपियंस ट्रॉफी के खिताब के लिए भिड़ेंगी.

ग्रुप ए की टीम

इंग्लैंड

इयोन मॉर्गन की कप्तानी में मेजबान टीम खिताब जीतने उतरेगी. तेज गेंदबाज मार्क वुड की छह महीने बाद टीम में वापसी हुई है, साथ ही डेविड विली ने भी फिट हो कर टीम में जगह बना ली है.

टीम

इयोन मॉर्गन (कप्तान), मोईन अली, जॉनी बेयरस्टो, जैक बॉल, सैम बिलिंग्स, जोस बटलर, एलेक्स हेल्स, लियाम प्लंकेट, आदिल राशिद, जो रूट, जेसन रॉय, बेन स्टोक्स, डेविड विली, क्रिस वोक्स, मार्क वुड

कब, कहां और किसके साथ होगा मैच

इंग्लैंड बनाम बांग्लादेश : 1 जून, लंदन

इंग्लैंड बनाम न्यूजीलैंड : 6 जून

इंग्लैंड बनाम ऑस्ट्रेलिया : 10 जून, बर्मिंघम

न्यूजीलैंड

कीवी टीम में तीन चोटिल खिलाड़ियों कोरी एंडरसन, एडम मिल्न और मिचेल मैक्लेनेघन की वापसी हुई है. केन विलियमसन टीम के कप्तान होंगे और टीम इंग्लैंड में शानदार प्रदर्शन करना चाहेगी.

टीम

केन विलियमसन (कप्तान), कोरी एंडरसन, ट्रैंट बोल्ट, नील ब्रूम, कोलिन डे ग्रैंडहोम, मार्टिन गप्टिल, टॉम लाथम, मिचेल मैक्लेनेघन, एडम मिल्न, जिमी नीशम, जीतन पटेल, ल्यूक रोंकी, मिचेल सेंटनर, टिम साउदी और रॉस टेलर

कब, कहां और किसके साथ होगा मैच

न्यूजीलैंड बनाम ऑस्ट्रेलिया : 2 जून, बर्मिंघम

न्यूजीलैंड बनाम इंग्लैंड : 6 जून, कार्डिफ

न्यूजीलैंड बनाम बांग्लादेश : 9 जून, कार्डिफ

बांग्लादेश

मशरफे बिन मुर्तजा की कप्तानी में 2006 के बाद बांग्लादेश 2017 चैंपियंस ट्रॉफी में उतरेगी. टीम में तेज गेंदबाज शफीउल इस्लाम को जगह मिली है. पिछले साल घरेलू लीग में हैमस्ट्रिंग इंजरी के बाद से शफीउल इंटरनेशनल क्रिकेट से बाहर थे.

टीम

तमीम इकबाल, सौम्य सरकार, इमरुल कैस, मुशफिकुर रहीम, शाकिब अल हसन, महमूदुल्लाह, शब्बीर रहमान, मुसद्दिक हुसैन, मेहदी हसन, सुनजामुल इस्लाम, मशरफे बिन मुर्तजा, मुस्तफिजुर रहमान, तस्कीन अहमद, रुबेल हुसैन, शफीउल इस्लाम

कब, कहां और किसके साथ होगा मैच

बांग्लादेश बनाम इंग्लैंड : 1 जून, द ओवल

बांग्लादेश बनाम ऑस्ट्रेलिया : 5 जून, द ओवल

बांग्लादेश बनाम न्यूजीलैंड : 9 जून, कार्डिफ

ऑस्ट्रेलिया

ऑस्ट्रेलिया ने 15 सदस्यीय टीम की घोषणा की, जिसमें उनका सबसे मजबूत पक्ष गेंदबाजी विभाग नजर आ रहा है. चयनकर्ताओं ने मिचेल स्टार्क और जोश हेजलवुड की मदद करने के लिए जेम्स पैटिंसन और पैट कमिंस को चयन किया है जबकि ऑलराउंडर जेम्स फॉकनर को बाहर का रास्ता दिखाया है.

टीम

स्टीव स्मिथ (कप्तान), डेविड वॉर्नर (उप-कप्तान), पैट कमिंस, आरोन फिंच, जॉन हैस्टिंग्स, जोश हेजलवुड, ट्रेविस हेड, मोइसेस हेनरिकेस, क्रिस लिन, ग्लेन मैक्सवेल, जेम्स पैटिंसन, मिचेल स्टार्क, मार्कस स्टोइनिस, मैथ्यू वेड और एडम जम्पा

कब, कहां और किसके साथ होगा मैच

ऑस्ट्रेलिया बनाम न्यूजीलैंड :  2 जून, एजबेस्टन

ऑस्ट्रेलिया बनाम बांग्लादेश : 5 जून, द ओवल

ऑस्ट्रेलिया बनाम इंग्लैंड : 10 जून, एजबेस्टन

ग्रुप बी की मैच

भारत

विराट कोहली की कप्तानी वाली 15 सदस्यीय टीम में रोहित शर्मा की वापसी हुई है. केएल राहुल चोटिल होने के कारण टीम से बाहर चल रहे हैं और उन्हीं की जगह रोहित ने चोट के बाद वापसी की है. अमित मिश्रा को इस टीम में जगह नहीं मिली.

टीम

विराट कोहली (कप्तान), एमएस धोनी, रोहित शर्मा, शिखर धवन, अजिंक्य रहाणे, युवराज सिंह, मनीष पांडे, केदार जाधव, हार्दिक पांड्या, रविन्द्र जडेजा, रविचन्द्रन अश्विन, मोहम्मद शमी, भुवनेश्वर कुमार, उमेश यादव, जसप्रीत बुमराह

कब, कहां और किसके साथ होगा मैच

भारत बनाम पाकिस्तान : जून 4, बर्मिंघम

भारत बनाम श्रीलंका : जून 8, लंदन

भारत बनाम साउथ अफ्रीका : जून 11, लंदन

पाकिस्तान

विकेटकीपर सरफराज अहमद की अगुवाई वाली टीम को चैंपियंस ट्रॉफी में ग्रुप बी में रखा गया है. टीम पिछली बार ग्रुप चरण से आगे नहीं गई थी, इस बार वह अपना प्रदर्शन सुधारना चाहेगी. पूर्व कप्तान अजहर अली और अनुभवी बल्लेबाज उमर अकमल टीम में शामिल किया गया.

टीम

सरफराज अहमद (कप्तान), अजहर अली, अहमद शहजाद, मोहम्मद हफीज, बाबर आजम, शोएब मलिक, उमर अकमल, फकहार जमां, इमाद वसीम, हसन अली, फहीम अशरफ, वहाब रियाज, मोहम्मद आमिर, जुनैद खान और शादाब खान

कब, कहां और किसके साथ होगा मैच

पाकिस्तान बनाम भारत : 4 जून, बर्मिंघम

पाकिस्तान बनाम साउथ अफ्रीका : 7 जून, बर्मिंघम

पाकिस्तान बनाम श्रीलंका : 12 जून, कार्डिफ

दक्षिण अफ्रीका

एबी डिविलियर्स टीम की कमान संभालेंगे जबकि केशव महाराज को पहली बार वन-डे टीम में शामिल किया गया है. स्टेन के लंबे समय तक तेज गेंदबाजी जोड़ीदार रहे मोर्ने मोर्केल की टीम में वापसी हुई है.

टीम

एबी डिविलियर्स (कप्तान), हाशिम अमला, क्विंटन डी कॉक(विकेटकीपर), जेपी ड्यूमिनी, फाफ डू प्लेसिस, डेविड मिलर, क्रिस मॉरिस, वेन पार्नेल, एंडील फेहलुकवायो, कगिसो रबाडा, इमरान ताहिर, ड्वेन प्रिस्टोरियस, केशव महाराज, फरहान बेहरदीन, मोर्ने मोर्केल

कब, कहां और किसके साथ होगा मैच

साउथ अफ्रीका बनाम श्रीलंका : 3 जून, द ओलव

साउथ अफ्रीका बनाम पाकिस्तान :7 जून, एजबेस्टन

साउथ अफ्रीका बनाम भारत : 11 जून, द ओवल

श्रीलंका

हाल ही में चोट से लौटे एंजेलो मैथ्यूज को टीम की कप्तानी दी गई है. तेज गेंदबाज लसिथ मलिंगा को भी टीम में शामिल किया गया है. लंबे समय से चोटिल रहने के कारण वह टीम से बाहर चल रहे थे.

टीम

एंजेलो मैथ्यूज (कप्तान), उपुल तरंगा, निरोशन डिकवेला, कुसल परेरा, कुसल मेंडिस, चमारा कापुगेदेरा, असेला गुनारात्ने, दिनेश चंडीमल, लसिथ मलिंगा, सुरंगा लकमल, नुवान प्रदीप, नुवान कुलसेकरा, तिसारा परेरा, लक्षण संदकन, सीकुगे प्रसन्ना

कब, कहां और किसके साथ होगा मैच

श्रीलंका बनाम साउथ अफ्रीका : 3 जून, लंदन

श्रीलंका बनाम भारत : 8 जून, लंदन

श्रीलंका बनाम पाकिस्तान : 12 जून, कार्डिफ

सारा अफरीन खान की कश्मीर यात्रा

इन दिनों हर भारतीय की जुबान पर कश्मीर छाया हुआ है. कुछ लोग कश्मीर की वादियों की खूबसूरती की चर्चा करते नहीं थकते. कुछ लोग कश्मीर में बिगड़ते हालात पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं, तो वहीं टीवी अदाकारा सारा अफरीन खान इस बात से खुश व उत्साहित हैं कि उनके करियर की दूसरी बालीवुड फिल्म ‘‘सरगोशियां’’ 1989 के बाद कश्मीर में दिखायी जाने वाली पहली फिल्म बनी है. वह बताती हैं-‘‘हमारी फिल्म ‘सरगोशियां’ को हाल ही में कश्मीर घाटी में प्रदर्शित किया गया, उस वक्त मैं भी वहां पर मौजूद थी. मेरे लिए यह पल गौरव का पल था. क्योंकि 1989 के बाद कश्मीर घाटी में पहली बार किसी बालीवुड फिल्म का प्रदर्शन हुआ, जिसमें मैंने भी अभिनय किया है. हमारी फिल्म देखकर वहां के लोगों ने बहुत अच्छी व सकारात्मक प्रतिक्रिया दी. लोग भावुक हो गए थे. क्योंकि यह फिल्म आतंकवाद पर नहीं है, बल्कि यह फिल्म इंसानी रिश्तों, कश्मीर की खूबसूरती व इंसानों के अंदर की खूबसूरती की बात करती है. हमारी यह फिल्म देखने के लिए फारुख अब्दुल्ला भी आए हुए थे.’’

सारा अफरीन खान के लिए यह पहली कश्मीर यात्रा नहीं थी. वह कई बार कश्मीर जा चुकी हैं. खुद सारा अफरीन खान बताती हैं-‘‘यह मेरी चौथी कश्मीर यात्रा रही. पहली बार मैं कश्मीर एडवेंचरस यात्रा पर गयी थी. तब मैं पांच दिन तक हाउसबोट पर रूकी थी. मैंने मछलियां पकड़ने से लेकर घुड़सवारी तक की थी. फिर हम पांच दिन के ट्रैकिंग पर लद्दाख गए थे.’’

वह आगे कहती हैं-‘‘हमने फिल्म की शूटिंग कश्मीर में ही की है. इस दौरान हमें कश्मीर बहुत खूबसूरत लगा. लोगों ने हमारा गर्मजोशी के साथ स्वागत किया था. शूटिंग के दौरान वहां के लोगों की हमें पूरी मदद मिली थी. उनके लिए मेरे दिल में खास जगह बन चुकी है. कश्मीर में शूटिंग करना सपना पूरे होने जैसा रहा. वैसे भी मुझे ठंडा प्रदेश ज्यादा पसंद हैं. कश्मीर तो स्वर्ग है. मैं तो हर दिन सुबह उठकर निडरता पूर्वक जागिंग करती थी. मुझे कहीं से भी कश्मीर रिस्की या खतरनाक नहीं लगा.’’

सुलगता सहारनपुर

उत्तरप्रदेश के सहारनपुर जिले में सुलग रही जातीय आग बुझ नहीं रही है. पिछले 12 दिनों जिले के एक के बाद एक 3 गांव हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़ की चपेट में आ चुके हैं. कथित प्रशासनिक सतर्कता के बावजूद 2 लोग मारे जा चुके हैं और दो दर्जन से अधिक घायल हैं. हिंसा प्रभावित इलाकों में दहशत इस कदर हावी है कि पुलिस जवानों की गश्त के बावजूद लोग डरे हुए हैं.

मौजूदा विवाद की शुरुआत 5 मई को शब्बीरपुर गांव में अंबेडकर की प्रतिमा लगाए जाने से हुई. इस गांव के ठाकुर समुदाय ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस के लिए प्रशासन से अनुमति नहीं ली गई. विवाद में दलितों के घर फूंक दिए गए और विरोध में आए पक्ष के एक युवक की मौत हो गई. इस के बाद नजदीक के गांव शिमलाना में ठाकुर समुदाय के लोगों द्वारा महाराणा प्रताप जयंती कार्यक्रम का जुलूस निकाला जा रहा था तो दलित युवकों ने विरोध किया. यहां से पूरा मामला जातीय हिंसा में बदल गया.

जुलूस को ले कर बात बढी तो ठाकुर समुदाय के लोगों ने दलितों के यहां तोड़फोड़ की. धीरेधीरे हिंसा की आग मिर्जापुर और  बड़गांव में भी पहुंच गई. इस दौरान भीम आर्मी सामने आई और हजारों दलितों ने प्रशासन के खिलाफ ठाकुरों का पक्ष लेने का आरोप लगाते हुए 21 मई को दिल्ली के जंतर मंतर पर इकट्ठा हो कर प्रदर्शन किया. दो साल पहले बनी भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आजाद ने शब्बीरपुर में दलितों पर हमले के विरोध में रैली आयोजित की थी. भीड़ ने दलितों के 25 घर जला दिए थे.

दिल्ली में रैली के दो दिन बाद इसी गांव में ठाकुर समुदाय ने दलितों पर फिर हमला कर दिया. इस हिंसा में करीब 20 दलित जख्मी हो गए और सरसवा गांव का 25 साल का आशीष मेघराज नाम का युवक मारा गया. उसे सहारनपुर जिला अस्पताल में मृत घोषित कर दिया गया. मुख्य चिकित्सा अधिकारी बीएस सोढी ने बताया कि मेघराज को चाकू का गहरा घाव लगा था. दलित घायलों को ले कर कई एंबुलेंस गाड़ियां आईं . अस्पताल के बाहर बड़ी तादाद में गांव के दलित लोगों ने इकट्ठा हो कर हमले का विरोध जताया.

23 मई को बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती शब्बीरपुर गांव गईं, जहां दलितों के घर जला दिए गए थे. वह पीड़ित लोगों से मिलीं. उन्होंने रैली की. इस रैली में शब्बीरपुर समेत सहारनपुर के कई गांवों के लोग आए थे. रैली में शामिल कई लोगों ने बताया कि शब्बीरपुर और सहारनपुर के बीच कई जगह उन पर हमले किए गए.

अस्पताल के दो इमरजेंसी वार्डों में घायलों का इलाज चल रहा है. लाडवा गांव के भीम आर्मी के एक सदस्य शिवम खेवडिया के अनुसार दोनों वार्डों में भर्ती कम से कम 8 दलितों पर हमले हुए. इन में से एक वार्ड में भर्ती सहारनपुर जिले के हलालपुर गांव के टिंकु कुमार से मुलाकात हुई. उसे कई जगह चोटें आई हैं और सिर पर घाव है. उस ने बताया कि उसे कई टांके लगे हैं. वह मायावती का भाषण सुनने अपने दो दोस्तों के साथ मोटरसाइकिल पर गया था. जब वे वापस लौट रहे थे तब ठाकुरों के लोगों ने उन पर हमला कर दिया. उन्हें अंभेता चंद गांव के पास रोका गया और लाठियों से बुरी तरह मारनेपीटने लगे. वे लोग ‘महाराणा प्रताप की जय’ और ‘वंदेमातरम’ के नारे लगा रहे थे.

टिंकु कुमार के बेड के पास उस का दोस्त नरसिंह भी सिर में चोट और चेहरे पर घाव से पीड़ित था. नरसिंह ने बताया कि उस के मुंह पर मुक्के मारे गए. उस के पिता राजकुमार बेड के पास बैठे थे. वह रैली में नहीं गए थे. राजकुमार ने बताया कि उन्होंने बेटे को चेताया कि वह रैली में नहीं जाए. वह किसी अनहोनी से पहले ही भयभीत थे.

सरसावा कस्बे का बालेश कुमार भी इसी वार्ड में भर्ती था. उस ने बताया कि उस पर चंदरपुर के पास हमला हुआ. मैं रैली से वापस जा रहा था. उसी समय लोगों के एक ग्रुप ने हमला कर दिया. वे मुझे पीटने लगे और मुझ पर चाकू से हमला करने की कोशिश की. दूसरे इमरजेंसी वार्ड में इलाज करा रहे शब्बीरपुर गांव के इंदरपाल [50] ने बताया कि करीब 10 लोगों के एक समूह ने उन पर हमला किया, जो उन के ही गांव के थे. वह 5 मई के हमले में हुए नुकसान के कारण मायावती को सुनने गया था. मेरे परिवार ने और दोस्तों ने हमले में सब कुछ खो दिया. अब हम चाहते हैं कि हमारी नेता मायावती मदद और मुआवजे के लिए प्रशासन पर दबाव बनाए.

अस्पताल के बाहर पुलिस पर गुस्साए प्रदर्शनकारी ‘यूपी पुलिस हाय हाय’ और ‘योगी सरकार, नहीं चलेगी’ के नारे लगा रहे हैं. शाम के समय प्रदर्शनकारियों की भीड़ बढ रही है. पुलिस उन्हें रोकने की कोशिश कर रही है पर प्रदर्शनकारी और घायलों के दोस्त लोग इमरजेंसी वार्ड में घुस रहे हैं. पुलिस उन्हें इमरजेंसी वार्ड से बाहर निकाल रही है. एक गुस्साया दलित जोर से चिल्ला रहा है, ‘तुम साले भगवा पुलिस ने ठाकुरों की मदद की है इस में.’ भीम आर्मी के कई सदस्य वार्ड में घुसने की असफल कोशिश कर रहे हैं. दलितों के घेरे को एक आदमी संबोधित कर कहने लगा, ‘अगर कोई वीडियो बनाते हुए देख लिया तो फोन तोड़ दो उस का.’ भीड़ में शामिल भीम आर्मी के एक व्यक्ति ने मेरा फोन एक  तरफ करते हुए कहा कि कृपया समझिए, आप मीडिया के लोग हमें वीडियो में नक्सलवादी बताते हैं.

भीम आर्मी के खेवडिया कहते हैं कि मई से सहारनपुर की घटनाओं को ले कर मीडिया पुलिस के बताए अनुसार पक्षपात रवैया अपना रहा है. आप देख सकते हैं अस्पताल के बाहर क्या हो रहा है. अस्पताल के बार एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि हिंसा इसलिए भड़की क्योंकि रैली में जा रहे दलित लोग हाथों में पत्थर ले कर विरोधी समुदाय के घरों में फेंक रहे थे. जब यह खबर ठाकुरों के पास पहुंची तो वे इकट्ठे हो कर रैली से लौट रहे लोगों पर हमला करने लगे. उन्होंने अपना बदला लिया.

सहारनपुर के बीएसपी कार्यकर्ता दीपक कुमार कहते हैं कि पुलिस हमले की झूठी अफवाह फैला रही है. सहारनपुर के अन्याय से दलित समुदाय गुस्साया हुआ जरूर था पर उन में से किसी ने भी  बहनजी की रैली के मौके पर किसी पर पत्थर फेंकने की मूर्खता नहीं की. दीपक कुमार ने कहा कि मायावती जब राज्य की मुख्यमंत्री थीं तब पुलिस इतनी मनुवादी नहीं थी. पुलिस मनुस्मृति की इतनी अनुयायी नहीं थी पर मौजूदा सरकार के अंतर्गत है.

बीएसपी का एक अन्य कार्यकर्ता कहता है कि आज के बाद मुझे लग रहा है कि पिछड़ी जातियों को इकट्ठा कर के इस स्थिति में बदलाव हो सकता है. दलित बहुजन को इकट्ठा करने का काम केवल भीम आर्मी कर रही है. भीम आर्मी के सुखविंदर कहते हैं कि कब तक हम बर्दाश्त करेंगे. हर समय हम यहां जातिवाद की सच्चाई सुनते हैं और अपने हक के लिए खड़े होते हैं. ये ठाकुर हम पर फिर हमला करते हैं. भीम आर्मी के लोग दिल्ली केंद्र सरकार से अपील करने गए थे कि वह सहारनपुर की हिंसा को रोके.

हिंदुत्व राजनीति के परिणाम सामाजिक संबंधों में इस वीभत्स तरीक से घटित होते दिख रहे हैं. इस तरह भाजपा की हिंदुत्व की सोशल इंजीनियरिंग की राजनीति विभाजनकारी साबित हो रही है जो न सामाजिक एकता न सामंजस्य स्थापित कर पा रही है.

मैदान में नहीं दिखेगा फुटबॉलर मेस्सी का जलवा!

स्पेन के सुप्रीम कोर्ट ने कर चोरी के मामले में लियोनेल मेस्सी की 21 महीने की जेल और 20 लाख 25 हजार डॉलर जुर्माने (करीब 15 करोड़ रुपये) की सजा बरकरार रखी है. हालांकि सर्वश्रेष्ठ फुटबॉलरों में शुमार मेस्सी को स्पेन के कानून के तहत शायद ही जेल जाना पड़े.

दस साल पुराना मामला

अर्जेटीना के फुटबॉलर मेस्सी और उनके पिता जॉर्ज होरासियो मेस्सी को जुलाई 2016 में करीब 40 लाख यूरो कर बचाने के लिए बेलिजे, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड और उरुग्वे की कंपनियों के इस्तेमाल का दोषी पाया गया था. यह कर 2007-09 के दौरान मेस्सी को तस्वीरों के इस्तेमाल से होने वाली कमाई पर लगाया गया था. बार्सिलोना से खेलने वाले मेस्सी ने इस धोखाधड़ी में सजा के खिलाफ अपील की थी.

मेस्सी ने आय छिपाई

पांच बार के फीफा के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुने गए 29 साल के मेस्सी पर प्रायोजकों डानोने, एडिडास, पेप्सी-कोला, प्रॉक्टर एंड गैम्बल और कुवैती खाद्य कंपनी के साथ अनुबंधों के आधार पर मिले करोड़ों रुपये की आय और टैक्स जानकारी छुपाने का आरोप है. जहां अदालत ने मेस्सी की सजा बरकरार रखी वहीं उनके पिता की सजा इस आधार पर कम करके 15 महीने कर दी कि फुटबॉलर ने आयकर अधिकारियों के पास धोखाधड़ी से बचाई रकम जमा करा दी.

कैसे की टैक्स चोरी

मामला 2007 से 2009 के बीच का है. इस दौरान मेस्सी ने कमाई का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों में रखा और टैक्स नहीं चुकाया. जून, 2015 में यह मामला सामने आया.

फर्जी कंपनियों का इस्तेमाल

मेस्सी और उनके पिता जार्ज को 41 लाख 60 हजार यूरो टैक्स से बचाने के लिए कई फर्जी कंपनियों के उपयोग का दोषी पाया गया.

मेस्सी की दलील

पैसे से जुड़े सारे मामले पिता देखते हैं. मुझे कुछ भी नहीं पता नहीं कि कमाई का प्रबंधन कैसे किया जाता था.

कोर्ट का पक्ष

कोर्ट ने कहा कि आपकी बात मान भी ली जाए तो आपको इस बारे में जरूर पता होगा कि अपनी आय पर कितना कर चुकाना है. मेस्सी 2005 से स्पेन के नागरिक हैं.

मेस्सी के बाद रोनाल्डो पर भी गिरी गाज

टैक्स चोरी मामले में मेस्सी के बाद क्रिस्टियानो रोनाल्डो के फंसने की खबर है. स्पेन के टैक्स अधिकारियों का मानना है कि रियल मेड्रिड फुटबॉल क्लब के लिए खेलने वाले पुर्तगाल के करिश्माई खिलाड़ी क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने 2011 से 2013 के बीच अपने इमेज अधिकारों को गलत ढंग से दशार्कर टैक्स में 80 लाख यूरो (89.5 लाख डॉलर) की धोखाधड़ी की है.

अगर यह बात साबित हो जाता है कि रोनाल्डो ने प्रशासनिक त्रुटि की है, तो उन्हें 80 लाख यूरो का भुगतान करना होगा और साथ ही और भी जुमार्ना देना होगा. अगर खिलाड़ी आपराधिक मामले के दोषी साबित पाए जाते हैं, तो उन्होंने जब अपराध किया था तब से लेकर प्रति वर्ष (2011, 2012, 2013) तीन साल तक चार माह कारावास की सजा सुनाई जा सकती है.

बेहद हॉट है तमन्ना का ये वीडियो

फिल्मी बाहुबाली के पहले भाग में जिस अवंतिका की सुंदरता पर फिदा होकर बाहुबली पर्वत को पार कर लेता है, उसी अवंतिका यानी तमन्ना की खूबसूरती के आजकल इंटरनेट पर खूब चर्चे हैं.

बाहुबली फिल्म के पहले भाग में बाहुबली और अवंतिका की कैमिस्ट्री में डायरेक्टर ने तमन्ना की खूबसूरती को बेहद सलीके और सादगी से पेश किया था. वे इस फिल्म में बेहद खूबसूरत लग रही थी.

लेकिन इन दिनों तमन्ना का एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है, जिसमें वो बहुत ही हॉट अंदाज में नजर आ रही हैं.

मुंबई की रहने वाली इस पंजाबी कुड़ी को बचपन से ही ऐक्टिंग का शौक था. वे 12 साल की उम्र से थिएटर करने लगी थीं. उनके स्कूल में एक प्रोड्यूसर के बच्चे भी पढ़ते थे. जब उस प्रोड्यूसर ने उन्हें स्कूल के सालाना जश्न में देखा तो अपनी अगली फिल्म में ले लिया. इस तरह तेरह साल की उम्र में ही उन्हें अपनी पहली फिल्म मिली. फिल्म का नाम था 'चांद सा रोशन चेहरा' (2005).

बारहवीं क्लास तक पढ़ीं तमन्ना के करियर में उनकी पहली तीन फिल्मों के बॉक्स ऑफिस पर दम तोड़ने के बाद डायरेक्टर शेखर कमुला की 'हैपी डेज' (2007) से बदलाव आया. कॉलेज लाइफ पर बनी इस फिल्म ने उन्हें आंध्र प्रदेश के युवा दिलों की धड़कन बना डाला. उनका फलसफा है कि काम करते रहो. इस पर अमल करते हुए वे तमिल और तेलुगु फिल्मों में अभिनय कर आगे बढ़ती रहीं. नतीजा आज वे तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री की चहेती बन गई हैं.

तेलुगु के सभी बड़े स्टार्स के साथ काम कर चुकी हैं. चिंरजीवी के बेटे राम चरण तेजा (रच्छा), चिरंजीवी के छोटे भाई पवन कल्याण (कैमरामैन गंगा तो रामबाबू), अलु अर्जुन (बदरीनाथ), जूनियर एनटीआर (ऊसरावेली), नागार्जुन के बेटे नागा चैतन्य (100 परसेंट लव) और अब प्रभास.

तमन्ना के लिए हैदराबाद का शुरुआती सफर आसान नहीं रहा. उस समय उन्हें न तेलुगु और न ही तमिल आती थी. तमन्ना ने ट्यूटर रखकर दोनों भाषाएं सीखीं. बचपन से ही श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित को रोल मॉडल मानने वाली तमन्ना योग करती हैं और इंडियन फूड की शौकीन हैं. फिल्में देखना, डांसिंग और बुक्स पढ़ने का उन्‍हें शौक है. कम ही लोग जानते हैं कि उन्हें शायरी करने और पतंगें उड़ाने में भी मजा आता है.

उनका ड्रीम रोल है, संजय लीला भंसाली का डायरेक्शन हो और रितिक रोशन उनके हीरो हों. हर कलाकार की तरह नेशनल अवॉर्ड जीतना उनकी चाहत है.

ताकि शरीर बना रहे साफ और स्वच्छ

गरमी का मौसम हानिकारक पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने (डिटौक्स) के लिए एकदम उपयुक्त समय होता है, क्योंकि इन दिनों ताजा और्गैनिक फलों और सब्जियों की काफी उपलब्धता होती है. शरीर से हानिकारक पदार्थों को बाहर निकालना बेहद जरूरी है. कुछ फलों की मदद से अपने शरीर को साफ करने में मदद मिल सकती है. ये शरीर को स्वस्थ और तरोताजा बना सकते हैं:

– गरमी के मौसम में डिटौक्स के लिए तरबूज सब से अच्छा खा-पदार्थ है. इस से शरीर में काफी क्षारीय गुणों वाले तत्त्व बनते हैं और इस में काफी मात्रा में साइट्रोलाइन होता है. इस से आर्जिनिन बनने में मदद मिलती है, जिस से शरीर में अमोनिया एवं अन्य हानिकारक तत्त्व बाहर निकलते हैं. इस के साथ ही तरबूज पोटैशियम का भी अच्छा स्रोत है, जो हमारी डाइट में सोडियम की मात्रा को संतुलित करता है और सफाई के दौरान हमारी किडनियों को भी सपोर्ट करता है.

– नीबू लिवर के लिए बेहतरीन उत्तप्रेरक है और यह यूरिक ऐसिड और अन्य हानिकारक रसायनों को घुला देता है. यह शरीर को क्षारीय बनाता है. इस तरह से यह शरीर के पीएच को संतुलित करता है.

– शरीर से हानिकारक तत्त्वों को निकालने में खीरा भी काफी मददगार होता है. इस में पानी की काफी मात्रा होती है, जिस से मूत्र प्रणाली में गतिशीलता आती है. 1/2 कप कटे खीरे में केवल 8 कैलोरी होती है.

– अमीनो ऐसिड प्रोटीन युक्त पदार्थों में पाया जाता है. हानिकारक तत्त्वों को शरीर से निकालने की प्रक्रिया के लिए यह बहुत आवश्यक है.

– सब्जियों को भाप में पकाने या हलका फ्राई करना अच्छा विकल्प है, क्योंकि इस से पोषक तत्त्वों का क्षय नहीं होता है.

– हानिकारक तत्त्वों को शरीर से बाहर निकालने के लिए कुछ हलकेफुलके व्यायाम करें. डिटौक्सिंग के दौरान यह जरूरी है कि आप अलकोहल और कैफीन से दूर रहें.

– पुदीने की पत्तियां गरमी में ठंडक का एहसास देती हैं. ये खाने को ज्यादा प्रभावी तरीके से पचाने में मदद करती हैं और लिवर, पित्ताशय और छोटी आंत से पित्त के प्रवाह में सुधार लाती हैं व आहार वसा को विघटित करती हैं.

– पोलिफेनोल्स युक्त हरी चाय का खूब सेवन करें, क्योंकि यह शक्तिशाली ऐंटीऔक्सिडैंट का काम करती है.

– कैफीन से दूर रहें, क्योंकि यह शरीर को पोषक तत्त्वों को अवशोषित करने में अड़चन खड़ी करती है. शराब का सेवन न करें, क्योंकि यह रक्तप्रवाह में आसानी से अवशोषित होती है और शरीर के हर हिस्से को प्रभावित करती है.

– खूब पानी पीएं. पुरुषों को प्रतिदिन कम से कम 3 लिटर और महिलाओं को करीब 2.2 लिटर पानी पीना चाहिए. पानी महत्त्वपूर्ण अंगों से हानिकारक तत्त्वों को बाहर निकालता है और पोषक तत्त्वों को कोशिकाओं तक पहुंचाता है.

– अपने आहार में फाइबरयुक्त भोजन की मात्रा बढ़ाएं. फाइबरयुक्त आहार प्रतिरोधक प्रणाली के नियमन में अहम भूमिका निभाता है. इस की वजह से कार्डियोवैस्क्यूलर बीमारी, मधुमेह, कैंसर और मोटापे का खतरा कम होता है.

– तय मात्रा में लेकिन नियमित तौर पर दूध का सेवन करें. दूध में पोषक तत्त्वों की प्रचुरता होती है, जो हड्डियों के लिए खासतौर पर जरूरी हैं. यह हमारे शरीर से अशुद्ध चीजों को बाहर निकालने के दौरान शरीर को मजबूत बनाता है.

– प्रतिदिन सुबह गरम पानी में नीबू और शहद मिला कर पीएं. यह पाचनतंत्र को सक्रिय करता है और कब्ज से दूर रखने में मदद करता है.

– विटामिंस महत्त्वपूर्ण पोषक हैं, जिन का शरीर अपनेआप पर्याप्त मात्रा में उत्पादन नहीं कर सकता. इसलिए आहार में विटामिंस संतुलित मात्रा में होने जरूरी हैं.

शरीर से हानिकारक तत्त्वों को निकालने में सोने की भी अहम भूमिका होती है. जब हम एक बच्चे की तरह सोते हैं तो सभी कोशिकाओं और ऊतकों में समुचित औक्सीजन का संचार होता है. औक्सीजन की उपलब्धता सभी आवश्यक अंगों को अच्छी तरह चलाने में मदद करती है. यह त्वचा को कोमल एवं आंखों को चमकदार बनाती है.

जलयुक्त डिटौक्स उपाय

– एक ठंडा, छिला व बीजयुक्त तरबूज का गूदा बाहर निकालें. इस में कटे अदरक के साथ 4 आइसक्यूब्स मिलाएं और सेवन करें.

– तरबूज और पुदीना मिश्रित पानी.

– खीरा और नीबू मिश्रित पानी.

– स्ट्राबैरी, खीरा, नीबू और पुदीना मिश्रित पानी.

– डिटौक्स आइस्ड ग्रीन टी

– सोनिया नारंग, पोषण विशेषज्ञा, ओरिफ्लेम इंडिया

 

टौप 7 लेटैस्ट ट्रैंडी इयररिंग्स

ज्वैलरी बौक्स में यों तो नैकपीस से ले कर फिंगर रिंग्स तक के लिए खास जगह होती है, लेकिन जो बात इयररिंग्स में होती है वह किसी और में नहीं. तभी तो कितनी भी ज्वैलरी पहन लें, लेकिन जब तक इयररिंग्स न पहने जाएं, शृंगार अधूरा नजर आता है. इन दिनों कौन से इयररिंग्स फैशन में इन हैं, जानने के लिए बात की वौयला ज्वैलरीज के ज्वैलरी डिजाइनर मनोज भार्गव से:

स्टड इयररिंग्स

कुंदन, पोल्की, जैमस्टोन, पर्ल, डायमंड जैसे मैटीरियल से बने स्टड इयररिंग्स आप इंडियन वियर के साथसाथ वैस्टर्न वियर पर भी पहन सकती हैं. ये स्माल साइज से ले कर ह्यूज साइज और हैवी से ले कर लाइट वेट में भी उपलब्ध हैं. सिंपल और सौफिस्टिकेटेड लुक के लिए स्माल साइज के पर्ल, जैमस्टोन या डायमंड के स्टड इयररिंग्स खरीदें. बोल्ड ऐंड ब्यूटीफुल लुक के लिए ह्यूज साइज के गोल्डन, कौपर, कुंदन या पोल्की स्टड इयररिंग्स को अपनी पहली पसंद बनाएं.

अभिनेत्रियों में इयररिंग्स का क्रेज

बौलीवुड दीवा भी इन ट्रैंडी इयररिंग्स की दीवानी हैं. दीपिका पादुकोण, विद्या बालन, अनुष्का शर्मा, प्रियंका चोपड़ा, करीना कपूर खान, सोनम कपूर, बिपाशा बसु जैसी कई ऐक्ट्रैसेज चांदबालियों के साथसाथ ओवरसाइज झुमके, शैंडिलियर, टैसल इयररिंग्स पहने कई फिल्म और इवैंट्स में नजर आ चुकी हैं. आप भी अपनी फैवरिट ऐक्ट्रैस के फैवरिट इयररिंग्स को अपना स्टाइल स्टेटमैंट बना सकती हैं.

चांदबालियां

फिल्म ‘रामलीला’ के बाद पौपुलर हुई चांदबालियां आज भी फैशन में इन हैं. इन्हें आप इंडियन वियर जैसे साड़ी, सूट, लहंगाचोली के साथसाथ इंडोवैस्टर्न वियर जैसे साड़ी गाउन, स्कर्ट, प्लाजो आदि के साथ भी  पहन सकती हैं. हाफ के साथ ही फुल चांदबालियों में भी ढेरों वैराइटी मिल जाएगी. कलर्स के साथसाथ मैटीरियल में भी फर्क मिलेगा. अगर आप चांदबालियां पहन कर अपनी खूबसूरती में चार चांद लगाना चाहती हैं, तो बालों को खुला छोड़ने के बजाय अपर या लो बन बना लें.

शैंडिलियर इयररिंग्स

अगर आप ह्यूज इयररिंग्स पहनने की शौकीन हैं तो शैंडिलियर (झूमर) इयररिंग्स को अपने ज्वैलरी बौक्स में खास जगह दें. ये ऊपर से टौप्सनुमा और नीचे से झूमरनुमा होते हैं, इसलिए इन्हें शैंडिलियर इयररिंग्स कहते हैं. इन्हें आप इंडियन, वैस्टर्न और इंडोवैस्टर्न वियर के साथ भी पहन सकती हैं. इंडियन और इंडोवैस्टर्न वियर के साथ पहनने के लिए गोल्ड, सिल्वर या कौपर और वैस्टर्न वियर के साथ पहनने के लिए डायमंड या पर्ल से बने शैंडिलियर इयररिंग्स खरीदें.

टैसल इयररिंग्स

टैसल (गुच्छेदार) इयररिंग्स ऊपर से टौप्स या हुकनुमा होते हैं और इन के नीचे की ओर गुच्छे में एक ही तरह की कई लटकनें होती हैं, इसलिए इन्हें टैसल इयररिंग्स कहा जाता है. ये खासकर वैस्टर्न वियर के साथ पहने जाते हैं, लेकिन इंडियन वियर को ध्यान में रख कर बनाए गए गोल्ड प्लेटेड टैसल इयररिंग्स भी काफी पसंद किए जा रहे हैं. झुमकों और शैंडिलियर इयररिंग्स के मुकाबले ये काफी हलके होते हैं. खास मौकों के साथ ही इन्हें रैग्युलर दिनों में भी पहन सकती हैं.

ड्रौप इयररिंग्स

बहुत ज्यादा हैवी या बहुत ज्यादा लाइट वेट इयररिंग्स के बीच का कुछ ट्राई करना चाहती हैं तो ड्रौप इयररिंग्स को अपनी पहली पसंद बना सकती हैं. ड्रौप यानी बूंद के आकार (ऊपर से पतले और नीचे से हैवी लुक वाले) के ये इयररिंग्स इंडियन औरवैस्टर्न दोनों आउटफिट के साथ पहन सकती हैं. ये टौप्स के साथ ही हुकनुमा भी मिलते हैं. मीडियम से ले कर ह्यूज साइज के और गोल्डन, सिल्वर से ले कर डायमंड, पर्ल के ड्रौप इयररिंग्स भी मार्केट में उपलब्ध हैं.

ओवरसाइज झुमके

झुमके कभी आउट औफ फैशन नहीं होते, कभी झुमकीझुमके (छोटे साइज के झुमके) के स्टाइल में तो कभी अलगअलग मैटीरियल और कलर के चलते ये हमेशा फैशन में रहते हैं. वैसे इन दिनों ओवरसाइज झुमके डिमांड में हैं. ट्रैडिशनल फंक्शन से ले कर शादी जैसे अवसर पर भी इन्हें काफी पहना जा रहा है. गोल्ड से ले कर औक्साइड, सिल्वर, पर्ल और मल्टी कलर्स में भी ये उपलब्ध हैं. इन्हें सलवारसूट, कुरती, साड़ी, लहंगाचोली जैसे इंडियन वियर के साथ पहन सकती हैं.

औक्सिडाइज इयररिंग्स

इन दिनों औक्सिडाइज इयररिंग्स भी काफी डिमांड में हैं. औक्साइड मैटीरियल होने की वजह से ये इंडियन, वैस्टर्न और इंडोवैस्टर्न वियर के साथ भी सूट करते हैं. पार्टी, फंक्शन जैसे मौकों के साथसाथ रोजाना भी इन्हें पहना जा सकता है, बशर्ते इन का चुनाव करते वक्त इन के आकार और वजन पर ध्यान दें. चांदबालियां, झुमके, शैंडिलियर, ड्रौप और स्टड इयररिंग्स भी औक्साइड मैटीरियल में उपलब्ध हैं.

लट्ठमार गौ गैंग

देशभर में गौ रक्षकों के लट्ठमार गैंग पैदा हो गए हैं, जो दूध देने वाले जानवरों को बचाने के नाम पर खुल्लमखुल्ला कानून हाथ में ले कर मारपीट व हत्याएं कर रहे हैं. पशु पालन, जो खेतीकिसानी और गांवों का एक बड़ा रोजगार है, अब इन गौ गैंगों का शिकार होने लगा है और लाखों परिवार रातदिन डर में रहते हैं कि न जाने कब क्या हो जाए. जानवर दूध ही नहीं देते, उन का मांस, चमड़ी, हड्डियां सब आमदनी का हिस्सा हैं और फिर भी जानवर पालने वाले बेहद गरीब और दानेदाने को मुहताज रहते हैं. इन पर गौ गैंगों का काला साया इन की थोड़ी सी आमदनी को भी रोक कर इन घरों को भूखा मारने को उतारू है.

अफसोस इस बात का है कि इन गौ गैंगों की नेतागीरी कोई ब्राह्मणबनिया नहीं करते. वे तो केवल पीछे से इन्हें बचाव का वादा कर के मनमानी करने की छूट दे रहे हैं, ताकि इन गौ गैंगों की लगीबंधी आमदनी बन जाए और जानवरों के व्यापार में जानवरों के इंस्पैक्टरों के साथसाथ घंटी लगाए लोगों को भी हिस्सा मिलने लगे. गौ गैंग पहले तो गायों के नाम पर ही वसूली करते थे, पर अब चूंकि गायों का लेनदेन बंद सा हो गया है, वे दूसरे जानवरों के कारोबार पर भी मांसरहित देश बनाने की जुगत में रोकटोक करने लगे हैं. जानवर खेतीबारी और गांवों के जिंदा रहने के लिए जरूरी हैं, पर इन जानवरों की सिर्फ सेवा करी जाए या इन्हें पूजा ही जाए, इस से गांवों का काम नहीं चल सकता. सिर्फ दूध बेचने से जो आमदनी होगी, वह किसानों और गांवों के व्यापार को जिंदा रखने के लिए काफी नहीं है. जानवर का आखिर तक इस्तेमाल जरूरी है.

सदियों से कुछ जानवरों की पूजा की जाती रही है, पर यह पूजा सिर्फ ऊंची जातियां करती थीं और नीची जातियां इन्हीं पूजने वाले जानवरों के साथ मनमाना और जरूरी इस्तेमाल करने को आजाद थीं. अगर सदियों पहले कुछ जानवरों को मारने या दूसरे इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई होती, तो इन की प्रजाति खत्म हो चुकी होती, क्योंकि इन्हें कोई नहीं पालता. आज भी गाय को दान में लेने वाले गायों को दुहते हैं, पर पहले और बाद में उन का कोई खयाल नहीं रखते. पिंजरापोल बना कर नाटक करा जाता है कि गायों की सेवा करी जा रही है, पर असल में वे कमाई के साधन हैं. जानवर गांवों और कसबों के ही नहीं, शहरों की भी अर्थव्यवस्था के अहम हिस्से हैं और इन की चाबी गौ गैंगों को दे देना एक नया माफिया पैदा करता है.

अगर इरादा ही गौ गैंगों के नाम पर पार्टी के कार्यकर्ताओं की फौज तैयार करना है तो बात दूसरी है, पर यह देश के विनाश का काम करेगा, विकास का नहीं. कुछ दिन लोग डर कर या धर्म के नाम पर अंधे हो कर पेट काट कर इस नौटंकी को तालियां पीट कर सराहेंगे, पर जल्दी ही असलियत सामने आ जाएगी कि यह स्कीम कितनी महंगी है. जैसे पहले लाल सलाम वालों ने कारखानों की घेराबंदी की थी, जिस का नतीजा देश के कारखानों के इलाकों के मरघटों में तबदील हो जाने पर हुआ, वैसे ही गौ गैंग सब से निचले स्तर के छोटे गरीब व असहाय चार पैसे कमाने वालों के भूखे पेटों को भुखमरी की कगार पर खड़ा कर देंगे. 

घुड़दौड़ : एक अनूठी प्रतियोगिता

फिल्मों में घुड़सवारी या घोड़े दौड़ाते  हीरोहीरोइन को देख कर मन में घुड़सवारी का शौक तो जरूर जागता है. ऐसा नजारा लाइव भी है, जिस में घोड़े रेस लगा कर एकदूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते हैं ताकि वे खुद पर सवार प्रतियोगी को जिता सकें.

दुनियाभर में न केवल इंसानों की प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं बल्कि जानवरों के शोज व प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया जाता है ताकि कुछ हट कर होने के कारण ज्यादा ऐंटरटेनमैंट हो सके.

क्या है हौर्स रेस प्रतियोगिता

हौर्स रेस आज की नहीं बल्कि पुराने समय से चली आ रही प्रतियोगिता है, जिसे लोगों ने हमेशा पसंद किया है. यह एक ऐसा खेल है, जिस में प्रतियोगिता के लिए चयनित घोड़ों पर सवार प्रतियोगी घोड़ों को दिशानिर्देश देते हुए बिना गिरे औरों से पहले अपने लक्ष्य तक पहुंचने की कोशिश करते हैं.

इस में सिर्फ एक ही टास्क नहीं बल्कि विभिन्न तरह के टास्क होते हैं, जिन्हें विभिन्न राउंड्स के रूप में पूरा कर अपना गोल अचीव करना होता है. इस में विभिन्न राउंड्स होते हैं. किसी राउंड में एक ही नस्ल के घोड़े भाग लेते हैं, किसी राऊंड में उन्हें बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ना होता है, तो किसी राउंड में निश्चित दूरी को कम समय में तय करना होता है. किसी में अलगअलग ट्रैक पर दौड़ना होता है. फिर इसी के आधार पर बैस्ट परफौर्मर को विजेता घोषित किया जाता है. इस प्रतियोगिता में दुनियाभर से लोग भाग लेने आते हैं.

संभल कर आगे बढ़ना जरूरी

जब भी हम कभी हिल स्टेशन घूमने जाते हैं, वहां हौर्स राइडिंग का लुत्फ उठाना नहीं भूलते. भले ही हमें राइडिंग आती हो या नहीं, लेकिन यह सोच कर ट्राई जरूर करते हैं कि साथ में हमें संभालने वाला और घोड़े को कंट्रोल करने वाला है.

जब यही बात प्रतियोगिता के लिए आती है तब वहां न तो कोई संभालने वाला होता है और न ही गिरने पर उठाने वाला. वहां सबकुछ खुद ही हैंडिल करना होता है, इसलिए यहां थोड़ा संभल कर कदम रखना जरूरी होता है. सो इस के लिए प्रशिक्षण लेना जरूरी हो जाता है.

घोड़े पर बैठने से पहले अच्छी तरह सोच लें कि आप को घोड़े पर सवार होना व उसे आगे बढ़ने के लिए ठीक तरह से संकेत देना आता हो. इस के लिए जरूरी है कि आप अपने घोड़े के साथ सभी जरूरी तैयारी कर लें यानी उस के साथ ऐसी दोस्ती गांठें कि जब आप उस पर बैठें तो उसे एहसास हो जाए कि यही मेरा मालिक है जिसे जिताना है. इस में दोनों के स्किल्स और दोनों का ही प्रशिक्षित होना जरूरी है.

प्रशिक्षण

घोड़ों का ट्रेनिंग प्रोग्राम रेस की अवधि पर निर्भर करता है. घोड़े की परफौर्मैंस में आनुवंशिक कारण, ट्रेनिंग, उम्र वगैरा का अहम रोल होता है. घोड़े की प्रजाति पर भी उस की फिटनैस निर्भर करती है. इस के अलावा जब उसे ट्रेनिंग दी जाती है, तो उस के आनुवंशिक कारणों को भी ध्यान में रखा जाता है. ट्रेनिंग के दौरान उस के खानेपीने, उसे चोट न लगे इन चीजों का खासतौर से ध्यान रखा जाता है, क्योंकि  चोट लगने से घोड़े की सीखने की क्षमता प्रभावित होती है.

हौर्स रेसिंग के प्रकार

फ्लेट रेसिंग : इस में घोड़े सीधी या फिर अंडाकार बनी सतह पर तेजी से दौड़ते हुए आगे बढ़ते हैं. इस में थरोब्रैड, क्वार्टर, अरबी, पेंट और एप्पालूसा नामक नस्ल के घोड़े इस्तेमाल किए जाते हैं.

जंप रेसिंग : इसे आप एक तरह से खतरों का खेल कह सकते हैं, क्योंकि इस में घोड़े ऊंचाई से जंप करते हुए आगे बढ़ते हैं. इस में थरोब्रैड जैसी नस्ल के घोड़े प्रयोग में लाए जाते हैं.

हारनैस रेसिंग : इस रेस में जब घुड़सवार घोड़े को मंदगति से खींचता है, तो वह धीरेधीरे अपने कदम आगे बढ़ाता है. इस में स्टैंडर्ड नस्ल के घोड़ों का प्रयोग होता है.

एंडुरैंस रेसिंग : इस रेस में बाकी रेसों की तुलना में डिस्टैंस ज्यादा होता है.

हौर्स रेसिंग इन इंडिया

देश में होर्स रेसिंग का खेल 200 साल पुराना है. यहां पहली रेसकौर्स चेन्नई (तत्कालीन मद्रास) में 1777 में आयोजित की गई थी. इस तरह के आयोजनों के लिए यहां 6 टर्फ क्लब हैं, बैंगलुरु टर्फ क्लब साल में 2 बार, मई से अगस्त और नवंबर से अप्रैल के महीनों में रेसिंग प्रतियोगिताओं का आयोजन करता है.

हैदराबाद टर्फ क्लब जुलाई से अक्तूबर और नवंबर से फरवरी के बीच प्रोग्राम आयोजित करता है. इस के अलावा रौयल कलकत्ता टर्फ क्लब, नवंबर से अप्रैल और जुलाई से अक्तूबर के बीच, रौयल वैस्टर्न इंडिया टर्फ क्लब मुंबई में नवंबर से मई के बीच और पूना में जुलाई से नवंबर के बीच, मैसूर रेस क्लब अगस्त से अक्तूबर के बीच व दिल्ली टर्फ क्लब मई से अगस्त के बीच हौर्स रेसिंग प्रतियोगिता का आयोजन करते हैं.

इसी तरह इस वर्ष मार्च में साउथवैस्ट के इंगलैंड के ग्लूस्टरशायर शहर में चैल्टेनहैम फैस्टिवल हौर्स रेसिंग का आयोजन किया गया, जिसे सब ने खूब ऐंजौय किया.

दर्शक कैसे ऐंजौय करते हैं

हौर्स राइडिंग का लुत्फ सिर्फ घुड़सवार ही नहीं उठाता बल्कि देखने वाले भी उसे ऐसे अनुभव करते हैं जैसे वे खुद मैदान में हों. इतना ही नहीं वे रेस शुरू होने से पहले शर्त लगाने में भी पीछे नहीं रहते. इस से उन्हें खेल देखने में और मजा आता है, क्योंकि जीतने वाले को प्राइज जो मिलता है. इतना ही नहीं दर्शकों की शो के प्रति ऐक्साइमैंट का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे शो शुरू होने के काफी देर पहले ही प्रतियोगिता स्थल पर पहुंच जाते हैं ताकि किसी भी कीमत पर शो मिस न होने पाए और वे हर ऐडवैंचर को अपनी आंखों से देख पाएं. आखिर घुड़दौड़ के प्रति इतना दीवानापन जो है.

खतरे भी कम नहीं

यह खेल बहुत रोमांचक होता है, इस में घोड़े और घुड़सवार दोनों को ही टास्क के दौरान चोट लगने का डर रहता है, क्योंकि कई बार घोड़ा कुछ ज्यादा ही तेजी से जंप लगाने के कारण खुद तो गिरता ही है साथ ही अपने घु़ड़सवार को भी गिरा देता है. ऐसे में चोट वगैरा न लगे इसलिए दोनों का ही प्रशिक्षण लेना जरूरी होता है.

बाकी प्रतियोगिताओं की तरह घुड़दौड़ भी अपनी तरह की एक अलग प्रतियोगिता है जिसे घु़ड़सवार से ले कर दर्शक तक सभी ऐंजौय करते हैं.        

आतंक के ग्लैमर में फंसा सैफुल्ला

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान जिस तरह से मध्य प्रदेश पुलिस की सूचना पर लखनऊ में आतंकी सैफुल्ला मारा गया, उसे राजनीतिक नफानुकसान से जोड़ कर देखना ठीक नहीं है. सैफुल्ला की कहानी से पता चलता है कि हद से अधिक धार्मिक दिखने वाले लोगों के पीछे कुछ न कुछ राज अवश्य हो सकता है.

धर्म के नाम पर लोग दूसरों पर आंख मूंद कर भरोसा कर लेते हैं. ऐसे में धर्म की आड़ में आतंक को फैलाना आसान हो गया है. अगर बच्चा आक्रामक लड़ाईझगड़े वाले वीडियो गेम्स और फिल्मों को देखने में रुचि ले रहा है तो घर वालों को सचेत हो जाना चाहिए. यह किसी बीमार मानसिकता की वजह से हो सकता है.

मातापिता बच्चों को पढ़ालिखा कर अपने बुढ़ापे का सहारा बनाना चाहते हैं. अगर बच्चे गलत राह पर चल पड़ते हैं तो यही कहा जाता है कि मातापिता ने सही शिक्षा नहीं दी. जबकि कोई मांबाप नहीं चाहता कि उस का बेटा गलत राह पर जाए. हालात और मजबूरियां सैफुल्ला जैसे युवाओं को आतंक के ग्लैमर से जोड़ देती हैं.

धर्म की शिक्षा इस में सब से बड़ा रोल अदा करती है. धर्म के नाम पर अगले जन्म, स्वर्ग और नरक का भ्रम किसी को भी गुमराह कर सकता है. सैफुल्ला आतंकवाद और धर्म के फेर में कुछ इस कदर उलझ गया था कि मौत ही उस से पीछा छुड़ा पाई. कानपुर के एक मध्यमवर्गीय परिवार का सैफुल्ला भी अन्य युवाओं जैसा ही था.

सैफुल्ला का परिवार उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर की जाजमऊ कालोनी के मनोहरनगर में रहता था. उस के पिता सरताज कानपुर की एक टेनरी (चमड़े की फैक्ट्री) में नौकरी करते थे. उन के 2 बेटे खालिद और मुजाहिद भी यही काम करते थे. उन की एक बेटी भी थी. 4 बच्चों में सैफुल्ला तीसरे नंबर पर था.

सैफुल्ला के पिता सरताज 6 भाई हैं, जिन में नूर अहमद, ममनून, सरताज और मंसूर मनोहरनगर में ही रहते थे. बाकी 2 भाई नसीम और इकबाल तिवारीपुर में रहते है. सैफुल्ला बचपन से ही पढ़ने में अच्छा था. जाजमऊ के जेपीआरएन इंटरकालेज से उस ने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की थी. इंटर में उस ने 80 प्रतिशत नंबर हासिल किए थे.

सन 2015 में उस ने मनोहरलाल डिग्री कालेज में बीकौम में दाखिला लिया. इसी बीच उस की मां सरताज बेगम का निधन हो गया तो वह पूरी तरह से आजाद हो गया. घरपरिवार के साथ उस के संबंध खत्म से हो गए. उसे एक लड़की से प्रेम हो गया, जिसे ले कर घर में लड़ाईझगड़ा होने लगा.

सैफुल्ला के पिता चाहते थे कि वह नौकरी करे, जिस से घरपरिवार को कुछ मदद मिल सके. पिता की बात का असर सैफुल्ला पर बिलकुल नहीं हो रहा था. जब तक वह पढ़ रहा था, घर वालों को कोई चिंता नहीं थी. लेकिन उस के पढ़ाई छोड़ते ही घर वाले उस से नौकरी करने के लिए कहने लगे थे. जबकि सैफुल्ला को पिता और भाइयों की तरह काम करना पसंद नहीं था.

वह कुछ अलग करना चाहता था. अब तक वह पूरी तरह से स्वच्छंद हो चुका था. सोशल मीडिया पर सक्रिय होने के साथ वह आतंकवाद से जुड़ने लगा था. फेसबुक और तमाम अन्य साइटों के जरिए आतंकवाद की खबरें, उस की विचारधारा को पढ़ता था.

यहीं से सैफुल्ला धर्म के कट्टरवाद से जुड़ने लगा. ऐसे में आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन के कारनामे उसे प्रेरित करने लगे. टीवी और इंटरनेट पर उसे वीडियो गेम्स खेलना पसंद था. इन में लड़ाईझगड़े और मारपीट वाले गेम्स उसे बहुत पसंद थे.

शार्ट कौंबैट यानी नजदीकी लड़ाई वाले गेम्स उसे खास पसंद थे. वह यूट्यूब पर ऐसे गेम्स खूब देखता था. इस तरह की अमेरिकी फिल्में भी उसे खूब पसंद थीं. यूट्यूब के जरिए ही उस ने पिस्टल खोलना और जोड़ना सीखा.

कानपुर में रहते हुए सैफुल्ला कई लोगों से मिल चुका था, जो आतंकवाद को जेहाद और आजादी की लड़ाई से जोड़ कर देखते थे. वह आतंक फैलाने वालों की एक टीम तैयार करने के मिशन पर लग गया. फेसबुक पर तमाम तरह के पेज बना कर वह ऐसे युवाओं को खुद से जोड़ने लगा, जो आर्थिक रूप से कमजोर थे. सैफुल्ला ऐसे लोगों के मन में नफरत के भाव भी पैदा करने लगा था. उस का मकसद था युवाओं को खुद से जोड़ना और आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन की राह पर चलते हुए भारत में भी उसी तरह का संगठन खड़ा करना. युवाओं को वह सुविधाजनक लग्जरी लाइफ और मोटी कमाई का झांसा दे कर खुद से जोड़ने लगा था. 

कानपुर में लोग सैफुल्ला का पहचानते थे, इसलिए इस तरह के काम के लिए उस का कानपुर से बाहर जाना जरूरी था. आखिर एक दिन वह घर छोड़ कर भाग गया. घर वालों ने भी उस के बारे में पता नहीं किया. उस ने इस के लिए उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ को चुना. वहां मुसलिम आबादी भी ठीकठाक है और प्रदेश तथा शहरों से सीधा जुड़ा हुआ भी है. इन सब खूबियों के कारण लखनऊ उस के निशाने पर आ गया.

नवंबर 2016 में सैफुल्ला लखनऊ के काकोरी थाने की हाजी कालोनी में बादशाह खान का मकान 3 हजार रुपए प्रति महीने के किराए पर ले लिया. यह जगह शहर के ठाकुरगंज इलाके से पूरी तरह से सटी हुई है, जिस से वह शहर और गांव दोनों के बीच रह सकता था. यहां से कहीं भी भागना आसान था.

बादशाह खान का मकान सैफुल्ला को किराए पर पड़ोस में रहने वाले कयूम ने दिलाया था. वह मदरसा चलाता था. बादशाह खान दुबई में नौकरी करता था. उस की पत्नी आयशा और परिवार मलिहाबाद में रहता था. मकान को किराए पर लेते समय उस ने खुद को खुद्दार और कौम के प्रति वफादार बताया था.

सैफुल्ला ने कहा था कि वह मेहनत से अपनी पढ़ाई पूरी करने के साथ अपनी कौम के बच्चों को कंप्यूटर की शिक्षा देना चाहता है. अपने खर्च के बारे में उस ने बताया था कि वह कम फीस पर बच्चों को कंप्यूटर के जरिए आत्मनिर्भर बनाने का काम करता है.

इसी से सैफुल्ला ने अपना खर्च चलाने की बात कही थी. उस की दिनचर्या ऐसी थी कि कोई भी उस से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था. अपनी दिनचर्या का पूरा चार्ट बना कर उस ने कमरे की दीवारों पर लगा रखा था. वह सुबह 4 बजे उठ जाता था. खुद को फिट रखने के लिए. वह पांचों वक्त नमाज पढ़ता था. कुरआन के अनुवाद तफ्सीर पढ़ता था. वह पूरी तरह से धर्म में रचबस गया था. हजरत मोहम्मद साहब के वचनों हदीस पर अमल करता था. अपना खाना वह खुद पकाता था. दोपहर 3 बजे उस का लंच होता था. शरीयत से जुड़ी किताबें पढ़ता था. रात 10 बजे तक सो जाता था.

रमजान के दिनों में वह पूरी तरह से उस में डूब जाता था. वह बिना देखे कुरआन की हिब्ज पढ़ता था. वह खुद को पूरी तरह से मोहम्मद साहब के वचनों पर चलने वाला मानता था. उसे करीब से देखने वाला समझता था कि इस से अच्छा लड़का कोई दुनिया में नहीं हो सकता. हाजी कालोनी के जिस मकान में सैफुल्ला रहता था, उस में कुल 4 कमरे थे. मकान के दाएं हिस्से में महबूब नामक एक और किराएदार अपने परिवार के साथ रहता था. बाईं ओर के कमरे में महबूब का एक और साथी रहता था. इस के आगे दोनों के किचन थे. दाईं ओर का कमरा खाली पड़ा था और उस के आगे भी बाथरूम और किचन बने थे. असल में बादशाह खान ने अपने इस मकान को कुछ इस तरह से बनवाया था कि कई परिवार एक साथ किराए पर रह सकें. कोई किसी से परेशान न हो, ऐसे में सब के रास्ते, स्टोररूम और बाथरूम अलगअलग थे. मकान खुली जगह पर था, इसलिए चोरीडकैती से बचने के लिए सुरक्षा के पूरे उपाय किए गए थे. सैफुल्ला ने किराए पर लेते समय इन खूबियों को ध्यान में रखा था और उसे यह जगह भा गई थी.

सैफुल्ला को यह जगह काफी मुफीद लगी थी. जैसे यह उसी के लिए ही तैयार की गई हो. वह समय पर किराया देता था. अपने आसपास वालों से वह कम ही बातचीत करता था. ज्यादा समय वह अपने कंप्यूटर पर देता था. इस में वह सब से ज्यादा यूट्यूब देखता था, जिस में आईएसआईएस से जुड़ी जानकारियों पर ज्यादा ध्यान देता था.

7 मार्च, 2017 को भोपाल-उज्जैन पैसेंजर रेलगाड़ी में बम धमाका हुआ. वहां पुलिस को बम धमाके से जुड़े कुछ परचे मिले, जिस में लिखा था, ‘हम भारत आ चुके हैं—आईएस’. यह संदेश पढ़ने के बाद भारत की सभी सुरक्षा एजेंसियां और पुलिस सक्रिय हो गई. ट्रेन में हुआ बम धमाका बहुत शक्तिशाली नहीं था, जिस से बहुत ज्यादा नुकसान नहीं हुआ था.

पर यह संदेश सुरक्षा एजेंसियों और सरकार की नींद उड़ाने वाला था. पुलिस जांच में पता चला कि यह काम भारत में काम करने वाले किसी खुरासान ग्रुप का है, जो सीधे तौर पर आईएस की गतिविधियों से जुड़ा हुआ नहीं है, पर उस से प्रभावित हो कर उसी तरह के काम कर रहा है. यह खुरासान ग्रुप तहरीके तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) का एक हिस्सा है, जो आईएस से जुड़ा है.

मध्य प्रदेश पुलिस ने जब पकड़े गए 3 आतंकवादियों से पूछताछ की तो कानपुर की केडीए कालोनी में रहने वाले दानिश अख्तर उर्फ जफर, अलीगढ़ के इंदिरानगर निवासी सैयद मीर हुसैन हमजा और कानपुर के जाजमऊ के रहने वाले आतिश ने माना कि वे 3 साल से सैफुल्ला को जानते हैं. वह उन्हें वीडियो दिखा कर कहता था, ‘एक वे हैं और एक हम. कौम के लिए हमें भी कुछ करना होगा.’

उन्होंने बताया था कि सैफुल्ला का इरादा भारत में कई जगह बम विस्फोट करने का है. इस जानकारी के बाद पुलिस को सैफुल्ला की जानकारी और लोकेशन दोनों ही मिल गई थी. इस के बाद पुलिस ने दोपहर करीब ढाई बजे सैफुल्ला के घर पर दस्तक दी. लखनऊ की पुलिस पूरी तरह से अलर्ट थी. उस के साथ एटीएस के साथ एसटीएफ भी थी.

सैकड़ों की संख्या में पुलिस और दूसरे सुरक्षा बलों ने घर को घेर लिया था. आसपास रहने वालों को जब पता चला कि सैफुल्ला आतंकवादी है और मध्य प्रदेश में हुए बम विस्फोट में उस का हाथ है तो सभी दंग रह गए. सुरक्षा बलों ने पूरे 10 घंटे तक घर को घेरे रखा. वे सैफुल्ला को आत्मसमर्पण के लिए कहते रहे, पर वह नहीं माना.

घर के अंदर से सैफुल्ला पुलिस पर गोलियां चलाता रहा. ऐसे में रात करीब 2 बजे पुलिस ने लोहे के गेट को फाड़ कर उस पर गोलियां चलाईं. तब जा कर वह मरा. पुलिस को उस के कमरे के पास से .32 बोर की 8 पिस्तौलें, 630 जिंदा कारतूस, 45 ग्राम सोना और 4 सिमकार्ड मिले.

इस के साथ डेढ़ लाख रुपए नकद, एटीएम कार्ड, किताबें, काला झंडा, विदेशी मुद्रा रियाल, आतिफ के नाम का पैनकार्ड और यूपी78 सीपी 9704 नंबर की डिसकवर मोटरसाइकिल मिली. इस के अलावा बम बनाने का सामान, वाकीटाकी फोन के 2 सेट और अन्य सामग्री भी मिली.

पुलिस को उस के कमरे से 3 पासपोर्ट भी मिले, जो सैफुल्ला, दानिश और आतिफ के नाम के थे. आतिफ सऊदी अरब हो आया था. बाकी दोनों ने कोई यात्रा इन पासपोर्ट से नहीं की थी. सैफुल्ला का ड्राइविंग लाइसेंस और पासपोर्ट मनोहरनगर के पते पर ही बने थे, जहां उस का परिवार रहता था.

सैफुल्ला के आतंकी होने और पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारे जाने की खबर जब उस के पिता सरताज अहमद को मिली, तब वह समझ पाए कि उन का बेटा क्या कर रहा था. पुलिस ने जब उन से शव लेने और उसे दफनाने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि सैफुल्ला ने ऐसा कोई काम नहीं किया कि उस का जनाजा निकले.

वह गद्दार था. उस के शव को ले कर वह अपना ईमान खराब नहीं करेंगे.  इस के बाद पुलिस ने सैफुल्ला को लखनऊ के ही ऐशबाग कब्रगाह में दफना दिया था.

सैफुल्ला की कहानी किसी भी ऐसे युवक के लिए सीख देने वाली हो सकती है कि आतंक की पाठशाला में पढ़ाई करना किस अंजाम तक पहुंचा सकता है. ऐसे शहरी या गांव के लोगों के लिए भी सीख देने वाली हो सकती है, जिन के आसपास रहने वाला इस तरह धार्मिक प्रवृत्ति का हो.

आतंकवाद का ग्लैमर दूर से देखने में अच्छा लग सकता है, पर उस का करीबी होना बदबूदार गंदगी की तरह होता है. धर्म के नाम पर दुकान चलाने वाले लोग मासूम युवाओं को गुमराह करते हैं. सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले लोगों को प्रभावित करना आसान होता है.

ऐसे में जरूरत इस बात की है कि युवा और उन के घर वाले होशियार रहें, जिस से उन के घर में कोई सैफुल्ला न बन सके. बच्चे आतंकवादी नहीं होते, उन्हें धर्म पर काम करने वाले कट्टरपंथी लोग आतंक से जोड़ देते हैं. पैसे कमाने और बाहुबली बनने का शौक बच्चों को आतंक के राह पर ले जाता है.     

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