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नदी की राजनीति पर अंधविश्वासों के पुल

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की यह खासीयत है कि वे ऐसा कुछ न कुछ करते रहते हैं जिस से लोगों का ध्यान बंटा रहे और वे राजकाज पर जरूरत से ज्यादा सवाल न करें. यह ऐसा, कुछ धार्मिक ही क्यों होता है? इस का जवाब बेहद साफ है कि इस से अंधविश्वास फलतेफूलते हैं, पंडेपुजारी उन की स्तुति करते रहते हैं और मामला चूंकि धर्म का होता है, इसलिए उन की मंशा पर विपक्ष भी उंगली नहीं उठा पाता जो खुद अधार्मिक या नास्तिक कहलाने से बचने के चक्कर में राज्य से लुप्त होता जा रहा है.

इस साल उन्होंने वाकई एक ऐतिहासिक काम नर्मदा नदी की यात्रा का कर डाला जिसे नाम दिया गया ‘नमामि देवी नर्मदे.’ कहने को तो इस यात्रा का मकसद नदी संरक्षण, पर्यावरण वगैरा थे पर 148 दिन, 3,344 किलोमीटर इस लंबी यात्रा के दौरान जगहजगह 90 विधानसभा क्षेत्रों में पूजापाठ और आरती होती रहीं. नर्मदा यात्रा में भीड़ लाई भी गई थी और खुद भी आई थी, जिस ने तबीयत से नर्मदा का पूजापाठ करते यात्रा के साथ चल रहे पंडेपुजारियों के पांव छुए और दानदक्षिणा भी दी.

नदियां पंडेपुजारियों के लिए कैसे वरदान हैं, यह सच इस यात्रा से फिर समझ आया कि क्यों हिंदू धर्मग्रंथों  में नदियों की महिमा चमत्कारिक ढंग से गाई गई है. ऐसी कोई भी नदी नहीं है जिस के बारे में यह न लिखा गया हो कि इस में डुबकी लगाने से पाप धुलते हैं और मोक्ष मिलता है.

धर्म पर राजनीति करने के सीधे आरोप से बचने के लिए शिवराज सिंह ने एक ऐसा धार्मिक इवैंट और कर डाला जिसे वे 2018 के चुनाव में भुनाएंगे. नर्मदा यात्रा की ब्रैंडिंग में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी और जितने सैलिब्रिटीज बुला सकते थे, बुलाए जो फिल्म, खेल, कला सहित राजनीति से भी थे. इन में एक चर्चित नाम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी है.

तारीफ पर तारीफ

गंगा हो या गाय, कुरसी पर जमे रहने के लिए नेताओं का राजनीतिक स्वांग पूरे शबाब पर है. नमामि देवी नर्मदे सेवायात्रा के बहाने हुए राजनीतिक प्रौपेगेंडा को समझना जरूरी है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मध्य प्रदेश के मंडला जिले के शहपुर कसबे में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की चर्चित नमामि देवी नर्मदे यात्रा की तारीफ में जो कसीदे गढ़े उन्हें सुन लोगों का दिल भर आया कि लो, हमारे यशस्वी सीएम इतने होनहार और विद्वान हैं और एक हम मूढ़ हैं कि सूबे की कानून व्यवस्था को कोसते रहते हैं. अब जब सारी समस्याएं मां नर्मदा की पूजा, अर्चना, वंदना और आराधना से ही हल होनी हैं तो बेकार के गिलेशिकवे क्यों? यह तो अधार्मिकता है. इस से बचना चाहिए और अब तो योगीजी तक कह रहे हैं कि शिवराज ने जो इतिहास गढ़ा, वह बेमिसाल है. अब उत्तर प्रदेश में गंगा का उद्धार भी इसी तरह किया जाएगा. इस सेवायात्रा की तारीफ करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों की दर्जनों हस्तियां मध्य प्रदेश बुलाई जा चुकी हैं पर आदित्यनाथ की बात अलग हट कर थी. वे जिज्ञासा का विषय हैं जिन की मांग इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी ज्यादा है, इसलिए उन के लिए खासतौर से भीड़ इकट्ठा की गई थी.

योगी तारीफ ही करेंगे, इस का अंदाजा हर किसी को था. पर हद से ज्यादा करेंगे, यह कम ही लोगों ने सोचा था. 5 महीनों तक नर्मदा किनारे तारीफों के दौर चले. अपनी तारीफ सुनने के लिए शिवराज सिंह ने जनता का करोड़ों रुपया फूंक डाला. फिर भी उन का जी नहीं भर रहा है. ऐसा लग रहा है कि जब तक खुद नर्मदा मैया मानव अवतार में प्रकट हो कर अपने इस पुत्र को चिरकाल तक राज करने का आशीर्वाद नहीं दे देंगी, वे मानेंगे नहीं. यह और बात है कि आजकल ऐसे चमत्कार होते नहीं. शिवराज की भक्ति और आस्था यह कर डाले, तो किसी को खास हैरानी भी नहीं होगी.

आदित्यनाथ योगी हैं, वे बेहतर समझते हैं कि धर्म और पंडेपुजारियों का धंधा नदीपहाड़ के इस खेल से ही फलताफूलता है, इसलिए शिवराज ठीक कर रहे हैं. भाजपा की सवर्णों और दलितों को एकसाथ साधने की राजनीति के लिए यह जरूरी भी है कि अंबेडकर जयंती भी धूमधाम से मनाई जाए और परशुराम जयंती भी, जिस से चारों वर्णों के लोग खुश रहें. आधा घंटे शिवराज, नर्मदा और मध्य प्रदेश की कल्याणकारी योजनाओं की आरती गाने के बाद योगी ने उत्तर प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकार को कोसा कि वह बड़ी निकम्मी और भ्रष्टाचारी थी, इसलिए अब जनता ने उन्हें चुना. उन्होंने फिर एक जरूरी काम, नरेंद्र मोदी की तारीफ की जिस के बगैर इन दिनों कोई भी भाजपा जलसा मान्य नहीं.

आदित्यनाथ, शिवराज सिंह से जूनियर हैं, इस बात का उन्होंने पूरा ध्यान रखा. वे खुद को शिवराज का छोटा भाई अप्रत्यक्ष बताते रहे पर उत्तर प्रदेश को मध्य प्रदेश का बड़ा भाई बताया. भाईचारे और तारीफ पर तारीफ का खेल खत्म हुआ तब जानकारों को समझ आया कि आदित्यनाथ अभी शिवराज के मुकाबले कच्चे खिलाड़ी हैं और भाषणकला में भी पिछड़े हैं. ये कमजोरियां ऐसे ही समारोहों से दूर होंगी.

महाकौशल इलाके में हासपरिहास इस बात पर भी हुआ कि यह तो भाजपा के कांग्रेसीकरण की शुरुआत है. अगर ये दोनों भाई वाकई एक हो गए तो पार्टी के कई दादाओं की मुश्किल हो जाएगी.

उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने चहेते योगी की हर गतिविधि पर बेहद बारीक नजर रखे हुए हैं क्योंकि उत्तर प्रदेश में वोट उन के नाम पर मिला है, आदित्यनाथ के नाम पर नहीं. उलट इस के, मध्य प्रदेश में वोट शिवराज के नाम पर डलते हैं और उन्हीं के नाम पर डलते रहें, नमामि देवी नर्मदे इसी मुहिम का नतीजा है. मध्य प्रदेश के संक्षिप्त प्रवास से योगी आदित्यनाथ को यह मंत्र जरूर मिल गया है कि कुरसी पर जमे रहने के लिए प्रौपेगेंडा जरूरी है फिर चाहे वह गंगा के नाम पर हो या गाय के नाम पर जिन का मकसद लोगों को उलझाए रखना होता है. देखना दिलचस्प होगा कि योगी धर्म अब का कौन सा तत्त्व चुनते हैं.

अंधविश्वास की हद

जब देशभर में नर्मदा यात्रा का मुकम्मल हल्ला मच गया तो उस के समापन के लिए शिवराज सिंह चौहान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बुला डाला. नरेंद्र मोदी की व्यस्तता के चलते यात्रा का समापन 4 दिन बढ़ा दिया गया. इस तरह यह यात्रा 11 मई की जगह 15 मई को खत्म हुई. इस से उस का खर्च और बढ़ा जिस की चिंता शिवराज सिंह ने नहीं की. हद तब हो गई जब नरेंद्र मोदी के हवाई जहाज के लिए नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक में नया हैलीपैड बनवाया गया. जानकार हैरान थे कि जब पहले से ही हैलीपेड मौजूद है तो नया हैलीपैड बनवाने का औचित्य क्या है.

जल्द ही इस सवाल का जवाब भी मिल गया कि दरअसल, अब तक जो भी नेता हवाईयात्रा के जरिए नर्मदा नदी को लांघ कर आया है, उसे इस जुर्रत की कीमत कुरसी गंवा कर चुकाना पड़ी है. इस अंधविश्वास को बनाए रखने के लिए शिवराज सिंह ने नया हैलीपैड ही बनवा डाला. हैरत की बात तो यह भी है कि अपनी कुरसी बचाए रखने के लिए उन्होंने अपने 10 साल से भी ज्यादा के मुख्यमंत्रित्व काल में कभी भी उड़नखटोले के जरिए नर्मदा को नहीं लांघा. सियासी गलियारों में यह चर्चा होती रही कि बात सच है क्योंकि अभी तक जिनजिन नेताओं ने यह रिवाज तोड़ा है, नर्मदा मैया ने उन की कुरसी डुबो दी. इस बाबत जो नाम गिनाए गए, उन में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई सहित अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा, विद्याचरण शुक्ल और भैरोसिंह शेखावत प्रमुख हैं. पर इन से भी ज्यादा अहम नाम उमा भारती का लिया गया.

उमा भारती अब से 13 साल पहले मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं लेकिन उन्हें अपने पद से 21 अगस्त, 2004 को इस्तीफा देना पड़ा था. तब किसी ने नहीं कहा था कि चूंकि वे नर्मदा नदी के ऊपर से उड़ी थीं, इसलिए कुरसी गई. तब हुआ यह था कि उमा ने कर्नाटक के हुबली शहर में सांप्रदायिक भाषण दिया था और वहां के विवादित धर्मस्थल ईदगाह मैदान पर तिरंगा फहराया था. उस मैदान पर हिंदू और मुसलमान दोनों ही अपना हक जताते रहे हैं. साल 1994 में उमा पर हुबली में भड़काऊ भाषण देने, धार्मिक उन्माद फैलाने और तिरंगे के अपमान के कुल 13 मामले दर्ज हुए थे.

अदालत ने उन्हें दोषी करार देते उन के खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी कर दिया तो मजबूरी में उन्हें पद छोड़ना पड़ा और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की कुरसी बाबूलाल गौर के पास से होती हुई चमत्कारिक तरीके से शिवराज सिंह चौहान को मिल गई. इन्होंने शायद अपनी धर्मबहन के जाने की वजह पहले ही जान ली थी कि वे हुबली वारंट के चलते नहीं, बल्कि नर्मदा को फांदने के जुर्म में गई थी. नरेंद्र मोदी को नर्मदा की बेरहमी या नाराजगी का शिकार न होना पड़े, इसलिए नया हैलीपैड इस तरह बनवाया कि उन्हें नर्मदा के ऊपर से हो कर न गुजरना पड़े. इस अंधविश्वास के बारे में जिस ने भी सुना, वह नर्मदा के एक और चमत्कार के सामने नतमस्तक हो गया.

अंधविश्वास लोगों की सनातनी कमजोरी है पर शिवराज सिंह की तो कुछ ज्यादा ही है जो वे अशोकनगर जाने से कतराते हैं, जहां के बारे में यह बात कुख्यात है कि वहां जो भी मुख्यमंत्री आया, वह ज्यादा दिनों तक कुरसी पर टिक नहीं पाया.

राज्य में 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर एक धार्मिकयात्रा का ड्रामा कर रहे शिवराज सिंह चौहान दरअसल धार्मिक पूर्वाग्रहों और कुंठा के शिकार हैं. इसलिए वे अब जरूरत से ज्यादा धर्मकर्म करने लगे हैं. वरना कभी उन की छवि एक विकासशील और कल्याणकारी योजनाएं बनाने वाले युवा नेता की हुआ करती थी. उन की छवि अब पूरी धार्मिक हो गई है तो उन पर तरस आना स्वभाविक बात है.

तरस इसलिए कि उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का हाल सामने है जिन्हें कोई गंगा या दूसरा देवी, देवता नहीं बचा सका. हरीश रावत भी शिवराज सिंह की तरह अंधविश्वास की नदी में गलेगले तक डूब गए थे. हालत तो यह तक हो गई थी कि उन्होंने संजीवनी बूटी ढूंढ़ने के लिए एक टीम गठित कर करोड़ों रुपए फूंक डाले थे. पर जब उत्तराखंड के नतीजे सामने आए तो कांग्रेस औंधेमुंह लुढ़की पड़ी थी और वे 2 सीटों से चुनाव हारे थे.

जनता की उम्मीदों और गुस्से के सामने तमाम टोनेटोटके, अंधविश्वास और तंत्रमंत्र लोकतंत्र में फ्लौप साबित होते हैं. इस के बाद भी नेता सबक नहीं लेते, तो यह उन की कमजोरी और जनता के प्रति उन का अविश्वास ही माना जाएगा.                

बलात्कार : कानून के साथ सोच भी बदले

सामूहिक बलात्कार नारी अस्मिता को तोड़ने के लिए होते हैं. स्त्री को भोग और दान समझने की प्रवृत्ति इस को बढ़ावा देने का काम करती है. ऐसे मामलों में समाज औरत को ही दोषी मानता है.

अहल्या से ले कर द्रौपदी तक तमाम उदाहरण धर्मग्रंथों में मौजूद हैं. वर्तमान समाज में फूलन देवी, बिलकीस बानो और निर्भया जैसे बहुत सारे ऐसे मामले हैं. इन तमाम घटनाओं के बाद भी समाज की सोच में बदलाव नहीं आता दिख रहा है. बलात्कार जैसे अपराध को कम करने के लिए सिर्फ सख्त कानून बनाने भर से काम नहीं चलेगा बल्कि समाज को अपनी सोच भी बदलनी होगी.

दिल्ली में निर्भया बलात्कार और हत्याकांड के मामले में अदालत का फैसला मील का पत्थर माना जा सकता है. निर्भया कांड ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था. यह ऐसा मामला था जिस ने अदालत से ले कर देश की संसद तक को जनता की पीड़ा को सुनने के लिए झकझोर कर रख दिया था. हजारों लोगों ने निर्भया को ले कर संसद का घेराव किया.

संसद ने जहां इस कांड के बाद नाबालिग अपराध को नए सिरे से परिभाषित किया वहीं निचली अदालत से ले कर ऊपरी अदालत तक हर जगह एकजैसा ही फैसला दिया गया.

निर्भया को ले कर केवल दिल्ली में ही धरनाप्रदर्शन नहीं हुए, पूरे देश में तमाम सामाजिक संस्थाओं ने जनता को आगे कर के निर्भया के दर्द का साझा किया. 2012 से हर 16 दिसंबर को निर्भया दिवस के रूप में याद किया जाता है.

5 वर्षों के बाद इस मामले में बड़ी अदालत का फैसला आया और अपराधियों को फांसी की सजा सुनाई गई. यह सच है कि न्यायपालिका ने अपनी जिम्मेदारी निभाई है. अब बाकी समाज के सामने जिम्मेदारी निभाने का वक्त है. अदालत का यह फैसला तभी सफल होगा जब लोग इस से सबक लेंगे. बलात्कार केवल कानून से जुड़ा मसलाभर नहीं है. समाज का दायित्व सब से बड़ा है. सब से जरूरी है कि समाज से उस मानसिकता को खत्म किया जाए जिस के कारण बलात्कार जैसे कांड होते हैं. मात्र कानून से इस सामाजिक बुराई और अपराध की प्रवत्ति को खत्म नहीं किया जा सकता.

नहीं बदल रही धर्म की सोच

सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए सब से पहले उस से जुड़ी सोच को खत्म करने की जरूरत है. सामाजिक बुराई समाज से तब तक खत्म नहीं हो सकती जब तक उस से जुड़ी मानसिकता खत्म नहीं हो जाती. इस के लिए जरूरी है कि महिलाओं को बराबरी का हक दिया जाए. धर्म के नाम पर महिलाओं को जिस तरह से पीछे ढकेला जाता है, उस सोच को खत्म किया जाए.

हमारे देश में प्रगतिशील न्याय व्यवस्था तो है पर अभी भी धर्म का शिकंजा इतना मजबूती से गले में पड़ा है कि हमें इस से छुटकारा नहीं मिल पा रहा है. हम खुद को प्रगतिशील कहते हैं पर हमारा समाज प्रगतिशील नहीं है. बलात्कार कई बार पुरुषवादी सत्ता को कायम रखने के लिए किया जाता है.

कबीलाई संस्कृति के दौर में बदला लेने के लिए औरत पर हमला किया जाता था. रामायण से ले कर महाभारत और अन्य धार्मिक ग्रंथ इस बात के गवाह हैं. महाभारत में द्रौपदी को भरी सभा में अपमानित करना ऐसी ही पुरुषवादी सत्ता की सोच थी जो विरोधियों से बदला लेने के लिए द्रौपदी को दांव पर लगा देती है. लड़ाई कौरव और पांडवों के बीच थी. पांडवों को अपमानित करने के लिए द्रौपदी को दांव पर लगाया गया.

रामायण में भी ऐसे कई उदाहरण हैं. राम को सबक सिखाने के लिए सीता का अपहरण और सूर्पणखा को सबक सिखाने के लिए उस की नाक को काटना पुरुषवादी सत्ता के ही उदाहरण हैं. नाक काटना औरत के लिए अपमान का द्योतक था. यह सिलसिला आधुनिक समाज में भी कायम है. ऐसी सोच बदलने की जरूरत है. बदला देने के लिए औरत का अपमान बंद होना चाहिए. औरत का अपमान बंद होने से अपराध में कमी आएगी.

आज अगर किसी को सबक सिखाना है तो उस की औरत को अपमानित किया जाता है. बड़े अपराधों की बात को दरकिनार भी कर दिया जाए तो हम रोज ऐसे काम करते हैं जो औरतों के लिए अपमान का कारण बनते हैं. लड़ाईझगड़े में ऐसी गालियों का प्रयोग करते हैं जो औरतों से जुड़ी होती हैं. गाली हम पुरुष को देते हैं पर वह होती महिलाओं के लिए है. महिलाओं को जिस तरह से रोजमर्रा की जिंदगी में अपमान सहन करना पड़ता है उसे कानून से नहीं, समाज में सुधार लाने से ही दूर किया जा सकता है.

हावी है पुरुषवादी सोच

सामूहिक बलात्कार की घटनाएं पुरुषवादी सोच को जाहिर करती हैं. ऐसे ज्यादातर मामले सबक सिखाने जैसी प्रवृत्ति को भी दिखाते हैं. गुजरात दंगों में बिलकीस बानो का मसला ऐसा ही बड़ा मसला था. जिस में गर्भवती बिलकीस बानो का बलात्कार होता है. उस के गर्भ में पल रहे बच्चे को पेट से निकाल कर पत्थर पर पटक कर मार दिया गया. उस के परिवार के साथ बलात्कार और हत्या जैसा अपराध किया गया.

ऐसे तमाम उदाहरण मौजूद हैं जहां पर सबक सिखाने के लिए औरतों के साथ ऐसे जघन्य अपराध होते हैं. जातीय हिंसा और भेदभाव की घटनाओं में ऐसे उदाहरण देखने को मिलते रहते हैं. उत्तर प्रदेश में कई साल पहले बेहमई कांड हुआ था. जहां फूलन देवी के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ. उस के बाद फूलन देवी दस्यू सरगना बनीं और अपने साथ हुए अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंने सामूहिक नरसंहार किया.

फूलन देवी बाद में संसद की सदस्य भी बनीं. उन पर फिल्म से ले कर तमाम तरह की किताबें भी लिखी गईं. फूलन की ही तरह निर्भया मसले ने भी पूरे देश को झकझोर दिया. 1981 के फूलन देवी बलात्कार कांड से ले कर 2012 में निर्भया कांड तक एकजैसे ही हालात देखने को मिले. जिस से यह लगता है कि तमाम तरह के कानूनी झगड़ों और फैसलों के बाद भी समाज अपना दायित्व निभाने में सफल नहीं हो सका है.

गुजरात दंगों की बिलकीस बानो को भी देखें तो यही सामने आता है. इन प्रमुख तीनों घटनाओं की पृष्ठभूमि भले ही अलगअलग हो पर हालात एकजैसे ही थे. बलात्कार केवल नारी अस्मिता से जुड़ा है. पुरुष अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिए इस तरह का कृत्य करते हैं.

बलात्कार में दोषी पुरुष होता है पर सजा अधिकतर औरत को ही मिलती है. गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या के साथ धोखा देने का काम इंद्र ने किया था लेकिन गौतम ऋषि ने सजा इंद्र के बजाय पत्नी अहल्या को दी, उस को पत्थर की शिला में बदल दिया.

औरतों को ही दोषी मानना

बलात्कार की शिकार औरतों के लिए समाज में मानसम्मान हासिल करना बहुत मुश्किल काम होता जा रहा है. लखनऊ की रहने वाली देविका (बदला नाम) के साथ उस के भाई और पिता ने बलात्कार किया. देविका ने इस की शिकायत उस समय के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से की. इस के बाद पिता और भाई को जेल हो गई. उस की मां और दूसरे भाई ने उसे सहयोग करने के बजाय घर से निकाल दिया. देविका एक शेल्टरहोम में रहने लगी. सरकार से मिली सहायताराशि से उस ने ब्यूटीपार्लर खोल लिया.

देविका कहती है, ‘‘मुझे ब्यूटीपार्लर के लिए दुकान मिलनी मुश्किल थी. जब लोगों को पता चलता था कि मैं बलात्कार की शिकार हूं, लोगों का व्यवहार बदल जाता है. बड़ी मुश्किल से ब्यूटीपार्लर के लिए जगह मिली.’’

देविका 27 साल की है. वह अपनी शादी का घर बसाना चाहती है. इस के लिए उस ने कई बार प्रयास भी किया. जैसे ही लोगों को यह पता चलता है कि वह रेप विक्टिम है, लोग शादी करने से मुकर जाते हैं. ऐसे मसले एक नहीं, कई हैं. बात केवल बलात्कार की शिकार लड़कियों की ही नहीं है. अगर लड़की से छेड़छाड़ की बात शादी के समय पता चलती है तो लोग उस से भी बचना ही चाहते हैं. बलात्कार और छेड़छाड़ जैसी घटनाएं औरतों के चरित्र से जोड़ कर देखी जाती हैं.

असल में ये आपराधिक घटनाएं हैं. इन को अपराध की घटनाओं के रूप में ही देखा जाए तो मसले आसानी से सुलझ सकते हैं. इस तरह की घटनाओं में न केवल लड़कियों की ही गलती मानी जाती है बल्कि उन से ही उम्मीद की जाती है कि वे अच्छे से कपड़े पहनें. ठीक तरह से रहें. देर रात घर से बाहर न निकलें.

कौमार्य का दबाव

समाज के दबाव के चलते कई बार मातापिता अपने बच्चों, खासकर लड़कियों, को टोकाटाकी करते हैं. जिसे वे अपने ऊपर दबाव मानती हैं. असल में मातापिता इस तरह की टोकाटाकी इसलिए करते हैं चूंकि लड़कियों के ऐसे शिकार होने से वे सामाजिक रूप से दबाव में आ जाते हैं. लड़की के लिए ऐसी घटनाएं लांछन की तरह होती हैं, जिसे समाज भूलता नहीं. ऐसे में लड़की का आने वाला जीवन प्रभावित हो जाता है.

आज के दौर में भी शादी से पहले लड़कों को इस बात की चिंता होती है कि उस की होने वाली पत्नी का कौमार्य सुरक्षित है या नहीं. अगर शादी के बाद सुहागरात में लड़के को यह पता चलता है कि उस की पत्नी का कौमार्य सुरक्षित नहीं है, सुहागरात में रक्तस्राव नहीं हुआ तो लड़की के चरित्र पर उंगली उठ जाती है. कई बार इस तरह की शंका से दांपत्य जीवन प्रभावित हो जाता है.

धर्म नारी के निजी मामलों में दखल करता है. जिस से सब से अधिक परेशानी का सामना महिलाओं को करना पड़ता है. महिलाओं के कपड़ों से ले कर रहनसहन और आचारविचार को तय करने का काम धर्म के ठेकेदार करते हैं. जिस से यह लगता है कि वह औरतों को अपने जाल में उलझा कर रखना चाहता है. बात केवल एक धर्म की ही नहीं है, हर धर्म में महिलाओं को हाशिए पर रखा जाता है. जबकि, यह दिखावा बारबार किया जाता है कि धर्म महिलाओं को इज्जत देता है.

असल में वह महिलाओं को बराबर का हक नहीं देता. धर्म के ठेकेदारों को यह लगता है कि अगर महिलाओं को बराबरी का हक मिल गया तो वे धर्म के आडंबर से बाहर हो जाएंगी, जिस से धर्म की उन की सत्ता खतरे में पड़ जाएगी.

तीन तलाक को ले कर केंद्र की भाजपा सरकार ने कदम उठा कर यह दिखाने की कोशिश की है कि इस से मुसलिम औरतों के हालात बदल जाएंगे. तीन तलाक की ही तरह से हिंदू और दूसरे समुदाय की महिलाओं के मुद्दे भी हैं जिन में तलाक लेना बहुत मुश्किल काम होता है. ऐसे में बहुत तरह के दांपत्य अपराध होते हैं.

कई बार तलाक चाहने वाली महिलाएं अपने पतियों पर ही गलत तरह से सैक्स करने या सैक्स के नाम पर परेशान करने जैसे आरोप लगा कर तलाक लेने की बात कहती हैं. अगर तलाक लेने की प्रक्रिया को सरल कर दिया जाए तो बहुत तरह की परेशानियों से बचा जा सकता है. बहुत सारे दहेज के मुकदमों की वजह तलाक का जल्द न मिलना होता है.

एकदूसरे का सम्मान करें

दांपत्य में पत्नी को तमाम तरह के व्रत करने के लिए कहा जाता है, जिस के जरिए औरतों को सिखाया जाता है कि उन के लिए पति ही परमेश्वर है, उसे भगवान की तरह मानसम्मान देना चाहिए. असल में आज इस बात को समझाने की जरूरत है कि पतिपत्नी दोनों बराबर हैं. दोनों को एकदूसरे का मानसम्मान करना चाहिए. जब तक एकदूसरे का सम्मान नहीं होगा, दांपत्य में तनाव, झगड़े और अपराध खत्म नहीं होंगे.

शादी के पहले और शादी के बाद महिलाओं की आजादी का सम्मान जरूरी है. बलात्कार और छेड़छाड़ जैसी घटनाएं एक दुर्घटना मात्र हैं. इन को ले कर महिलाओं के जीवन पर दबाव नहीं डालना चाहिए. ऐसी महिलाओं को जब सामान्य मान कर समाज में सही स्थान दिया जाएगा तभी सही मानो में निर्भया कांड के बाद आए फैसले से बदलाव हो सकेगा. कानून के साथ समाज को अपनी सोच बदलने की जरूरत है. 

इन का कहना है

बलात्कार केवल महिलाओं के शरीर पर ही अपना असर नहीं डालता, वह महिलाओं के दिमाग पर भी असर डालता है. महिला को लगता है कि अब उस के लिए समाज में कोई जगह नहीं बची है. उसे समाज गलत निगाहों से देखेगा. घरपरिवार के लोग भी यह नहीं मानते कि उस की गलती नहीं रही होगी. ऐसे में सब से जरूरी है कि कानून के साथ समाज भी पीडि़ता के साथ खड़ा हो. अभी यह देखा जाता है कि इस तरह की घटनाओं की शिकार महिलाओं को अलगथलग रह कर जीवन गुजारना पड़ता है. दूसरी ओर जहां भी वह अपनी बात रखने जाती है लोग उस को सौफ्ट टारगेट समझने की कोशिश करते हैं. जिस संवेदनशीलता की उम्मीद समाज से होनी चाहिए, पीडि़ता के साथ वह नहीं होती है.      

– अनुपमा सिंह, अनुपमा फाउंडेशन, लखनऊ

औरतों के प्रति होने वाले अपराध के मामलों में कानून में लगातार सुधार हुआ है. इस से अब यह उम्मीद जगी है कि कानून के पास आने पर औरतों को सही न्याय मिलेगा. यह सच है कि न्याय जितना जल्दी मिलना चाहिए, नहीं मिल रहा है. इस की कई वजहें हैं. विरोधी पक्ष न्याय व्यवस्था की खामी का लाभ उठा कर फैसले में देरी करवाता है. अभी भी अपराध के बाद होने वाली पुलिस की विवेचना बहुत वैज्ञानिक आधार पर नहीं होती. जिस से अपराधी को लाभ मिलता है. निर्भया कांड में दिल्ली पुलिस ने बहुत ही अच्छी तरह से विवेचना की है, जिस से अपराधियों को सही दंड मिल सका. इस तरह हर मामले में विवेचना शुरू हो जाए तो न्याय मिलने में समय नहीं लगेगा.          

– श्वेता तिवारी, अधिवक्ता, लखनऊ

आमतौर पर महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध को ले कर महिलाओं को ही दोषी ठहरा दिया जाता है, यह गलत है. फैशन, फिल्म, औरतों के कपड़े किसी भी तरह के महिला अपराध के लिए जिम्मेदार नहीं होते हैं. यह सोच धर्मवादी और पुरुषवादी सत्ता समझाने की कोशिश करती है. मीडिया भी कईर् बार ऐसी घटनाओं के लिए औरतों को ही दोष देता है. निर्भया कांड में भी यह तर्क दिया गया कि उसे रात में अकेले अपने दोस्त के साथ जाने की क्या जरूरत थी. इस तरह के तर्क देने से गलत संदेश जाता है. अपराधियों को अपने बचाव का मौका मिलता है. ऐसे मामलों में दोषियों का सामाजिक बहिष्कार होना जरूरी है.   

– रिचा शर्मा, अभिनेत्री, मुंबई

आज के समय में केवल घर के बाहर ही नहीं, घर के अंदर भी महिलाओं के साथ ऐसे हादसे पेश आने लगे हैं जहां उन को शारीरिक व मानसिक रूप से शोषण का शिकार होना पड़ता है. हमारे पास ऐसे तमाम केस आए जिन में युवा विधवा औरतों के साथ घर में शारीरिक शोषण होता है. जब ये औरतें हालात के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश करती है तो उन को तरहतरह से परेशान किया जाता है. एक घर में बड़े बेटे की पत्नी की मृत्यु के बाद छोटे बेटे की पत्नी के साथ दोनों भाइयों के संबंध रखने की शिकायत आई. मसला बड़े घर का था तो काफी प्रयास के बाद सुलह हो सकी. जिन औरतों के बच्चे नहीं होते, वे तो दूसरी शादी कर भी सकती हैं पर बच्चों के होने के बाद दूसरी शादी भी संभव नहीं रह जाती. ऐसे में समाज को अपनी सोच बदलनी चाहिए, तभी हालात में सुधार हो सकेगा. 

– अजय पटेल, समाजसेवी, वाराणसी

 

 

हवाईयात्रा के दौरान अभद्रता पर एकतरफा नियम क्यों?

सरकार सस्ती दर पर नागरिकों को हवाईसेवा उपलब्ध कराने के लिए देश के सभी बेकार पड़े हवाईअड्डों की मरम्मत करने में जुटी है. नागरिक उड्डयन मंत्री अशोक गणपति राजू का कहना है कि अप्रैल तक 33 क्षेत्रीय हवाईअड्डों को विमानसेवा के लिए तैयार किया जा चुका है. सरकार की इस महत्त्वाकांक्षी योजना से देश के छोटे शहरों के लोगों को भी सस्ती दर पर हवाईसेवा का लुत्फ उठाने का अवसर मिलेगा. यह मौका उन्हीं यात्रियों के लिए होगा जो यात्रा के दौरान चालकदल के सदस्यों के साथ अच्छा बरताव करेंगे. अभद्र व्यवहार करने वाले यात्रियों पर हवाईसेवा के लिए 3 माह से 2 साल तक के लिए प्रतिबंध लगाया जा सकता है. यात्रियों को विमानयात्रा के दौरान किस तरह का व्यवहार करने से बचना है, नागरिक विमानन मंत्रालय ने इस के लिए एक सूची तैयार की है. सूची में 3 तरह के व्यवहार का उल्लेख है जिन का उल्लंघन करने पर 3, 6 महीने तथा 2 साल तक के लिए विमानसेवा के इस्तेमाल पर रोक लगाई जा सकती है.

सरकार ने यह कदम हाल में शिवसेना सांसद रवींद्र गायकवाड़ द्वारा एअर इंडिया के विमान में अभद्र व्यवहार किए जाने के कारण उठाया है.

सरकार को यात्रियों से अच्छे व्यवहार की उम्मीद जरूर करनी चाहिए क्योंकि विमानन सेवा का देश में तेजी से प्रसार हो रहा है. लेकिन विमानन कंपनी की तरफ से जो अभद्र व्यवहार किया जाए, इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है. इस के अलावा कई मामलों में किसी यात्री के साथ व्यक्तिगत रंजिश या जानबूझ कर इन श्रेणियों में शामिल किया जा सकता है. नियम बनाते समय इस पर भी सरकार की तरफ से कोई ध्यान नहीं दिया गया है.

वहीं, विमान सेवाएं समय पर सेवा नहीं दे पाती हैं तो इस स्थिति में यात्रियों के साथ किए जाने वाले व्यवहार पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए. सरकार नियम बनाए लेकिन उन को संतुलित बनाने पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है.

नई ऊंचाई पर शेयर बाजार, सारे रिकौर्ड तोड़े

बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई के सूचकांक ने 10 मई को नया रिकौर्ड बनाया. मानसून की अच्छी बौछारों व मौसम विभाग के पूर्वानुमानों ने सूचकांक को नई ऊंचाई दी और यह मनोवैज्ञानिक स्तर से आगे की छलांग लगा कर पहली बार 30,248 अंक के पार पहुंच गया जबकि निफ्टी 9,500 अंक के करीब पहुंच गया. इस से पहले बीएसई के सूचकांक में मई की शुरुआत में ज्यादा उत्साह नहीं दिखा, हालांकि मुनाफा वसूली के माहौल के बीच बाजार में मजबूती का रुख रहा.

फ्रांस में यूरोपीय संघ के समर्थक युवा नेता इमैनुअल मैक्रोन के राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने से भी एशियाई बाजारों में सकारात्मक रुख देखने को मिला और इन सब का प्रभाव बीएसई पर भी नजर आया. विदेशी बाजारों में सकारात्मक संकेत के कारण मुनाफा वसूली का दबाव बाजार पर ज्यादा प्रभावी नहीं हुआ, और बाजार मजबूती पर रहा.

इसी बीच, भारतीय विनिमय और प्रतिभूति बोर्ड ने वार्षिक शुल्क नहीं चुकाने वाली 161 कंपनियों की ट्रेडिंग पर रोक लगा दी. इस से बाजार में कुछ हलचल मची लेकिन सूचकांक उस के बावजूद मजबूत स्थिति में रहा. शेयर सूचकांक 30 हजार के मनोवैज्ञानिक स्तर से कुछ नीचे जरूर रहा लेकिन इस अवधि में बाजार मामूली रूप से प्रभावित नजर आया. 

सैंसर बोर्ड का रवैया अशिक्षितों जैसा : अलंकृता श्रीवास्तव

विवादित फिल्म ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ की निर्देशिका अलंकृता श्रीवास्तव दिल्ली की हैं. उन्हें बचपन से ही फिल्मों का शौक था. उन के इस शौक को प्रोत्साहन उन के मातापिता से मिला, जिन्होंने हर काम में उन्हें आजादी दी. पढ़ाई पूरी कर वे मुंबई आईं और पिछले 13 वर्षों से यहीं अकेले रह रही हैं.

स्पष्टभाषी और साहसी अलंकृता की फिल्म को सैंसर बोर्ड के सर्टिफिकेशन का इंतजार है. इस फिल्म के निर्माता प्रकाश झा हैं. सर्टिफिकेशन न मिलने की वजह से परेशान निर्माता, निर्देशक ने कानून का दरवाजा खटखटाया है. यह फिल्म ट्रिपल तलाक और महिलाओं की आजादी को छीनने वालों पर एक तमाचा है, जिसे सैंसर बोर्ड किसी भी हालत में रिलीज नहीं करना चाहता. फिर भी अलंकृता अपनी छाप छोड़ रही हैं.

इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा कहां और किस से मिली, इस सवाल पर वे कहती हैं, ‘‘दिल्ली में मैं ने अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी कर पत्रकारिता में स्नात्तकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की. फिर मैं फिल्म ‘गंगाजल’ के लिए टे्रनी बन कर मुंबई आई. मैं ने प्रकाश झा को उस फिल्म के लिए असिस्ट किया. पहली फिल्म से मैं ने बहुतकुछ सीखा.

‘‘इस के बाद चीफ असिस्टैंट बनी, ‘अपहरण’ आदि फिल्में की. इस के बाद मैं ने कुछ छोटी फिल्में अकेले की. और फिर ‘राजनीति’ फिल्म में असोसिएट निर्देशक बन गई. इस तरह धीरेधीरे आगे बढ़ती गई. इस के बाद मैं ने ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ के विषय पर काम करना शुरू किया. इसे लिखने में थोड़ा समय लगा. प्रकाश झा ने इस कहानी को पढ़ कर एक बार में पसंद किया. 2014 से मैं इस फिल्म पर काम करती रही हूं. अब फिल्म तो बन गई है, लेकिन रिलीज नहीं हो पा रही है.’’

इस विषय को चुनने को ले कर उन की जिंदगी के कई निजी अनुभव भी रहे हैं. उन के मुताबिक, ‘‘मैं एक भारतीय महिला हूं. मुझे भी कई बंदिशों का सामना करना पड़ता है. मुझे वह आजादी नहीं मिलती जो मिलनी चाहिए. उस आजादी की चाहत बहुत तीव्र है और लगता है कि मैं खुल कर जी नहीं रही हूं. हालांकि मेरा परिवार मुझे पूरी आजादी देता है, परिवार वालों ने कभी कोई काम करने से नहीं रोका.

‘‘मैं सालों से मुंबई में अकेली रहती हूं. कभी उन्होंने यह नहीं कहा कि शादी कर लो. ऐसे में जिन्हें इतनी आजादी नहीं है, समाज उन्हें हर काम करने से मना करता है, वे कैसे जीती होंगी? मैं उन महिलाओं की दुनिया में जा कर उसे महसूस करना चाहती थी और उन के अंदर जो आजादी की चाहत होती है, उसे ही दिखाने की कोशिश की है. यह फिल्म किसी वर्गविशेष के लिए नहीं है, बल्कि सभी महिलाओं के लिए है.’’

वे आगे अपना एक अनुभव साझा करते बताती हैं, ‘‘12 साल की उम्र में मुझे सैक्सुअल हैरेस्मैंट का सामना करना पड़ा था. मैं दिल्ली के एक पार्क में सैर करने गई थी. 2 लोग मेरे पास आए, मुझे पकड़ना चाहा. मैं चिल्लाई और भाग खड़ी हुई. तब मुझे लगा कि अब मैं औरत बन चुकी हूं और आसपास कुछ गलत है, मैं आजाद घूम नहीं सकती. उस दिन तो मैं ने अपनेआप को बचा लिया, पर मेरी मासूमियत खो चुकी थी. इस से पहले मुझे कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ था. लेकिन इस घटना के बाद मैं सतर्क हो चुकी थी.’’

फिल्म के शीर्षक में बुर्का शब्द एक खास समुदाय की ओर इशारा करता है, क्या वजह रही इस शीर्षक को चुनने की? इस पर अलंकृता कहती हैं, ‘‘यह शीर्षक सांकेतिक है, जिस में दिखाया गया है कि आप महिला को दबाने की कितनी भी कोशिश करें, पर उन के अंदर जो ख्वाहिशें हैं, वे कभी नहीं मरतीं. यह केवल किसी खास समुदाय नहीं, बल्कि सभी समुदायों की महिलाओं को ले कर चुना गया है.

‘‘असल में हमारे समाज में महिलाओं के लिए जो भूमिका निर्धारित की गई है, उस के लिए सोच लिया गया है कि वे केवल एक बेटी, मां या सास बन कर ही खुश हैं, असल में यह पुरुषों की गलत सोच है. उस भूमिका में वे खुश नहीं, वे उस से निकल कर कुछ और करना चाहती हैं. उन्हें अपनी जिंदगी के किसी निर्णय को लेने की चाहत, अपने शरीर की चाहत जो उन का अपना है, ऐसे किसी भी बात को समाज की जोरजबरदस्ती से दबाया नहीं जा सकता. हमारी फिल्म में यही सब ही दिखाने की कोशिश की गई है.

पुरुषप्रधान समाज में किसी महिला को अपने मन के भाव व्यक्त करने का हक नहीं होता. पहले महिलाओं को जानकारी कम थी, लेकिन अब वे भी नए माहौल में जीना चाहती हैं’’

फिल्म को विदेशों में इतने पुरस्कार मिल रहे हैं, फिर यहां क्या समस्या है? इस पर वे बताती हैं, ‘‘सैंसर बोर्ड ने खुद ही कह दिया है कि यह महिला प्रधान फिल्म है. उस के हिसाब से पुरुष प्रधान मानसिकता में इस फिल्म की कोई अहमियत नहीं है. सैंसर बोर्ड के सदस्यों का रवैया अशिक्षित लोगों के जैसा है. आज के समय के हिसाब से वे बात नहीं करते. वे इसे एक राजनीति का रूप देते हैं.

फिल्मों में सैक्स दृश्य तो बहुत होते हैं, लेकिन वे सभी पुरुषों को संतुष्ट करने के हिसाब से होते हैं, जैसे कि आइटम सौंग, डबल मीनिंग जोक्स या संवाद. लेकिन एक महिला अगर कहानी अपने नजरिए से कहना चाहे तो उसे दिखाने की इजाजत नहीं देते, क्योंकि ये सब उन पुरुषों

को अनकंफर्टेबल बनाता है और वे सर्टिफिकेशन करने से घबराते हैं. अभी तो फिल्म कोर्ट में गई है और मैं कोशिश कर रही हूं कि फिल्म वहां से पास हो जाए.’’

महिला निर्देशक का पुरुषप्रधान इंडस्ट्री में काम करना कितना मुश्किलभरा होता है? इस पर वे कहती हैं, ‘‘कठिन अवश्य है और अगर विषय अलग हो तो और भी अधिक मुश्किल होती है. मुझे पता है कि मेरा रास्ता भी कठिन है, पर मैं ने इसे खुद चुना है. जो भी कहानी मुझे प्रेरित करेगी, मैं उसे अवश्य करूंगी. अंत तक लड़ूंगी, मुझे अपनी बात कहनी ही है.’’

वे आगे कहती हैं, ‘‘महिलाएं अपनी इच्छाओं को दबाएं नहीं, बल्कि खुल कर जिएं और किसी भी प्रताड़ना का डट कर मुकाबला करें.’’

बदन गुनगुना गया

तुम ने मुझे छुआ तो बदन जगमगा गया

कोई जला चराग, सहन जगमगा गया

ये फूल कौन सा तेरे माथे पे खिल गया

गुजरे इधर से तुम जो, चमन महमहा गया

इस दर पे तेरा नाम हवाओं ने लिखा था

खुशबू के बोझ से ये बदन थरथरा गया

इतनी थी आरजू कि मेरे दर पे वो रुकें

आए जो मुकाबिल तो कदम डगमगा गया

चलते हो धूप में कभी साए में बैठ लो

देखो तो किस तरह ये बदन तमतमा गया

हम ने तो उस परी से कोई बात भी न की

किस के ये बोल थे कि बदन गुनगुना गया.

 

– राकेश भ्रमर

बच्चों के मुख से

मेरी सहेली राजश्री के साढ़े 3 साल का बेटा उपार्जित अपने मामा की शादी में गया. शादी की रस्मों को उस ने बड़े ध्यान से देखा. एक दिन स्कूल जाने के लिए आनाकानी कर रहा था तो उस की मम्मी ने समझाया कि पढ़लिख कर बड़ा आदमी बनना है तो स्कूल जाना पड़ेगा. यह सुन कर उपार्जित तपाक से बोला, ‘‘मुझे बड़ा नहीं बनना है. बड़ा हो गया तो आप मेरी शादी कर दोगी. मेरे कपड़े उतार कर पटरे पर बिठा कर सब लोग मेरे शरीर पर तेल लगाएंगे.’’ उस की भोली बातें सुन कर सब को हंसी आ गई.     

मंजू अग्रवाल रिमा

*

मेरी बेटी अरूनांशी 5 साल की है. वह अभी एलकेजी कक्षा में पढ़ती है. उस के जन्मदिन के लिए मैं केक बना रही थी. केक की आइसिंग करने में मुझे थोड़ा समय लग गया. इस पर उस ने मुझ से पूछा, ‘‘मम्मी, आप को केक बनाने में इतना टाइम क्यों लग रहा है?’’ मैं ने कहा, ‘‘बेटा, किसी चीज को सुंदर बनाने में समय लगता है.’’

कुछ दिनों बाद मेरी बेटी की हिंदी की नोटबुक में रिमार्क लिखा आया, ‘स्लो इन राइटिंग’.

मैं ने जब उस से कहा, ‘‘बेटा, आप की नोटबुक में टीचर ने ‘स्लो इन राइटिंग’ क्यों लिखा है? आप समय पर कक्षा कार्य नहीं करती हो?’’

बेटी तपाक से बोली, ‘‘मम्मी, मैडम को कौन समझाए कि सुंदर लिखने में टाइम लगता है.’’

एक पाठिका

*

मेरा 7 वर्षीय बेटा मोहक बहुत ही शरारती व चंचल है. हमारे घर में मेरी ननद की शादी में कई तरह के व्यंजन बनाए गए थे. बाकी मिठाइयां तो खत्म हो गईं पर गुलाबजामुन बहुत ज्यादा बच गए थे. काफी सारे गुलाबजामुन हम ने परिचितों एवं पड़ोसियों के यहां बांट दिए. घर पर भी नाश्ते, लंच और डिनर के समय गुलाबजामुन खिलाए जा रहे थे.

एक शाम को खाना बनाते समय मैं ने अपनी सासूमां से पूछा, ‘अम्मा, सब्जी क्या बनानी है?

सासूमां कुछ जवाब देतीं, उस से पहले मोहक तपाक से बोला, ‘‘मम्मी, गुलाबजामुन की सब्जी बना लो.’’

मोहक की बात सुन कर हम सभी की हंसी नहीं रुकी.      

पुष्पलता शर्मा

घरेलू उत्पादों के इस्तेमाल के लिए बने राष्ट्रीय नीति

सरकार घरेलू उत्पाद को बढ़ावा देने की नीति पर तेजी से काम कर रही है. इस के लिए हाल में राष्ट्रीय इस्पात नीति को मंत्रिमंडल ने मंजूरी प्रदान की है. इस से पहले राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति बनाई गई जिसे भी संसद से मंजूरी मिल चुकी है. लोकसभा में यह नीति व्यापक विचारविमर्श के बाद पारित हुई है.

अब सरकार इस्पात के लिए राष्ट्रीय नीति बना रही है. इसे घरेलू स्तर पर तैयार किया जा सकेगा. लेकिन सवाल यह है कि घरेलू स्तर पर तैयार होने वाले इस्पात के लिए नीति क्यों बनाई जा रही है? निविदाओं में घरेलू इस्पात के इस्तेमाल पर जोर देने के लिए सरकार को विवश क्यों होना पड़ रहा है? इन का सीधा जवाब यही है कि आयात किए जाने वाले स्टील की तुलना में देश में तैयार होने वाला इस्पात गुणवत्ता के लिहाज से कमजोर है.

कम गुणवत्ता वाला इस्पात कौन और क्यों तैयार किया जा रहा है, इस पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है. भ्रष्टाचार निश्चितरूप से इस की बुनियाद में है और उस पर नकेल कसे जाने की आवश्यकता है. कई बार घरेलू उत्पाद ज्यादा अच्छे होते हैं लेकिन उपभोक्ता उस के महंगा होने के कारण देश में कचरा बढ़ा रहे चीनी सामान की तरफ ज्यादा आकर्षित होता है.

चीनी सामान कीमत के लिहाज से राहत देने वाला है लेकिन वह टिकाऊ बिलकुल नहीं है, फिर भी पूरा देश चीनी सामान खरीद रहा है और उस की बिक्री ने घरेलू उत्पादों का कारोबार ठप कर दिया है. सरकार को चाहिए कि वह घरेलू सामान की गुणवत्ता बढ़ाने और उस के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए भी नीति बनाए ताकि देश में कचरा पैदा करने वाले हलकेफुलके चीनी माल की खरीद पर रोक लगाई जा सके.

अब फ्रिज, टीवी जैसे सामान भी मंगाएं औनलाइन

ब्रैंडेड सामान की खरीद के लिए बड़े मौल या अच्छे शोरूम में जाने का समय नहीं है, तो लोग औनलाइन सेवाप्रदाता कंपनियों की सेवा ले कर अपनी यह जरूरत भी पूरी कर लेते हैं. महानगरों में यह सेवा लोगों के पास समय की कमी के कारण अत्यंत लोकप्रिय है. नतीजतन, औनलाइन बाजार के खिलाड़ी अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं.

स्नैपडील, फ्लिपकार्ट तथा अमेजौन जैसी न जाने कितनी बड़ी कंपनियां इस कारोबार में लगी हैं. इस से बाजार में जबरदस्त प्रतिस्पर्धा आई है. इसी प्रतिस्पर्धा के लिए फ्लिपकार्ट ने 1 साल में अपना कारोबार सौ फीसदी बढ़ाने के लिए फ्रिज जैसे बड़े सामान की औनलाइन डिलीवरी करने की योजना बनाई है. इस के तहत सैमसंग के साथ समझौता किया गया है और ग्राहक को टीवी, फ्रिज, कूलर आदि औनलाइन उपलब्ध कराया जाएगा.

ग्राहक को पसंद का सामान औनलाइन बुक कराना है, कंपनी यह सामान उस के घर पर पहुंचा देगी. फ्लिपकार्ट को टक्कर देने और अपना कारोबार 1 साल में 30 फीसदी तक बढ़ाने के लिए औनलाइन सेवा देने वाली दूसरी कंपनी अमेजौन अपने वेयरहाउस जैसे साधन स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है. इस से बाजार में भारी स्पर्धा आएगी. ग्राहक को जरूर उस का फायदा मिलेगा. लेकिन गलीमहल्लों के कारोबार पर इस का नकारात्मक असर भी पड़ेगा.

बड़ी कंपनियों की एजेंसी ले कर गलीमहल्ले में खुली दुकानों की तुलना में औनलाइन मिलने वाला फ्रिज निश्चितरूप से सस्ता होगा और ग्राहक को सुरक्षित घर पर मिलेगा तो स्थानीय डीलर के पास जाना कोई पसंद नहीं करेगा. औनलाइन बाजार अब महानगरों और बड़े शहरों से आगे निकल कर जिला मुख्यालयों तक पहुंच गया है. जो जिला मुख्यालय यातायात के अच्छे नैटवर्क से जुड़े हैं, वहां यह सेवा तेजी से फैल रही है. शायद वह समय भी दूर नहीं होगा जब दोपहिया वाहन भी कागजी कार्यवाही के साथ उपभोक्ता को घर पर ही मिलें.

यह भी खूब रही

मेरे देवर मुझ से बहुत मजाक करते हैं. एक दिन मैं ने राजमा बनाया. सभी को खाना खिलाने के बाद कुछ राजमा बच गया. मैं ने अपने देवर को हंसी का पात्र बनाने की ठान ली. इसलिए बचे राजमा को खूब गरम कर उस में एक चम्मचभर मिर्च डाल दी. इस के बाद मैं अपने कमरे में चली गई. थोड़ी देर में ही मेरा देवर आया और उस ने कटोरी उठा कर राजमा खाना शुरू कर दिया. गरम और मिर्चें लगने से वह घबरा गया. फिर वह आआ, सीसी करने लगा. उस की हालत देख कर हम सब हंसने लगे.  

दीपा गुलाटी

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हम पतिपत्नी यह मानते हैं कि अपनी आय का कुछ प्रतिशत जरूरतमंदों को देना चाहिए. हम वर्ष में 6 साडि़यां और कुछ कंबल जरूरतमंदों को देते हैं. हम ने 6 साडि़यां खरीदी थीं. एक अपनी कामवाली सविता को दी. वह प्रसन्न हो गई. निकट ही उस का गांव था जहां जरूरतमंद परिवार थे. एक रविवार को हम उसे कार में बैठा कर उस के गांव ले गए. कार हम ने झोंपडि़यों के सामने रोकी. 4-5 परिवार आश्चर्यवश बाहर आ गए. सविता को देख कर सब मुसकराए. मेरी पत्नी ने 1-1 साड़ी 5 परिवारों की महिलाओं को दी. सब साड़ी ले कर बहुत खुश हुईं.

2 महिलाओं ने मेरी पत्नी से कहा, ‘‘इस बढि़या साड़ी के लिए धन्यवाद. अब यह बताइए कि वोट किस पार्टी को देना है?’’ हम पतिपत्नी चकित रह गए. हम ने सोचा भी नहीं था कि चुनाव निकट हैं और वोट के लिए उम्मीदवार उपहारों की बौछार करते हैं निजी स्वार्थ के लिए.

सत्य स्वरूप दत्त

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घटना मेरे एक रिश्तेदार के विवाह की है. विवाहपंडाल के गेट के अंदर एक गुब्बारे वाला आ कर खड़ा हो गया. वह आसपास खड़े छोटे बच्चों को गुब्बारे देने लगा. कई बच्चों ने सुंदर आकृति वाले महंगे गुब्बारे ले लिए. उन्हें ले कर जैसे ही बच्चे आगे बढ़ने को हुए, गुब्बारे वाले ने बच्चों के मातापिता से उन की कीमत मांग ली. यह देख कर वे हैरान रह गए. उन में से कुछ के चेहरे देखने लायक थे.

कुछ लोग यही समझ बैठे थे कि अनेक शादियों में बच्चों को लुभाने वाली अनेक चीजें, जैसे जोकर, झूले, गेम्स या पौपकौर्न आदि लोग रखते है, वैसे ही गुब्बारे भी मुफ्त (फ्री) हैं. लोगों की नाराजगी देख कर गुब्बारे वाले ने पैसे ले कर जल्दी ही बाहर जाने में भलाई समझी.       

सिद्धांत कुमार

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