Download App

डियर माया : कहानी, पटकथा और निर्देशन सब कमजोर

बौलीवुड में कभी मनीषा कोईराला की गिनती अति खूबसूरत व बेहतरीन अदाकारा के रूप में हुआ करती थी. पर कैंसर की बीमारी के चलते वह लंबे समय तक अभिनय से दूर रहीं. अब कैंसर की बीमारी से लड़कर जीत हासिल करने के बाद नई जिंदगी की शुरुआत करते हुए उन्होंने फिल्म ‘‘डियर माया’’ से अभिनय में वापसी की है. जिसे देखकर कहा जा सकता है कि मनीषा कोईराला ने वापसी के तौर पर गलत फिल्म का चयन किया है. कहानी, पटकथा व निर्देशन हर स्तर पर यह कमजोर फिल्म है. फिल्म में किसी भी किरदार को सशक्त तरीके से नहीं गढ़ा गया है. फिल्म का सशक्त पक्ष शिमला की लोकेशन मात्र ही है.

फिल्म की कहानी शिमला की है, जहां दो लड़कियां एना (मदीहा ईमाम) और ईरा (श्रेया चैधरी) जो कि आपस में बहुत गहरी दोस्त हैं, उनके बीच पड़ोस में रहने वाली माया (मनीषा कोईराला) हमेशा चर्चा का विषय रहती हैं. माया हमेशा अपने बड़े से बंगले की चार दीवारी के अंदर कैद रहती हैं. ज्यादातर समय वह घर के अंदर बंद रहकर काले या नीले रंग की पोशाक पहनने वाली गुड़िया बनाती रहती हैं. उन्होंने अपने घर के अंदर काफी पक्षियों को पिंजरे में कैद कर रखा है. जिनकी देखभाल करने के लिए एक बूढ़ी नौकरानी उनके साथ रहती है. माया का जीवन अवसाद से भरा हुआ है. खुशी नाम की कोई चीज नहीं है. एना की मां हमेशा एना को समझाती है कि वह ईरा से दूर रहे. क्योंकि ईरा आत्मकेंद्रित लड़की है, वह सिर्फ अपने बारे में सोचती है. वह कभी भी एना को नुकसान पहुंचा सकती है. पर एना को यह सब गलत लगता है.

एना की मां (इरावती हर्षे) से एना व ईरा को पता चलता है कि माया के पिता की मौत के बाद माया के चाचा ने उसकी मां व उसे इतनी तकलीफें दी थी कि एक दिन माया की मां कहीं चली गयी. उसके बाद माया के चाचा ने उस पर भी अत्याचार किया. माया के चाचा के गुस्से की वजह से सभी डरते थे. माया के चाचा की नजर माया की संपत्ति पर रही, जिसके चलते उन्होंने माया की शादी नही होने दी और माया से कहा कि लड़के ने उसे अस्वीकार कर दिया.

सब कुछ जानने के बाद ईरा व एना निर्णय लेते हैं कि वह माया के जीवन में खुशियां भरेंगे. काफी सोचविचार कर ईरा व एना, माया को देव नामक काल्पनिक युवक के नाम से प्रेम पत्र लिखना शुरू कर देती हैं. इन प्रेम पत्रों में देव लिखता है कि किस तरह वह उन्हें पसंद करने लगा था. पर उसके चाचा ने ही उन्हे मिलने नहीं दिया. वगैरह..धीरे धीरे माया की जिंदगी में बदलाव आने लगता है. पर ईरा को यह बर्दाश्त नही कि सब कुछ एना कर जाए, इसलिए वह भी एक पत्र देव की तरफ से लिखकर उस लिफाफे में भेजती है, जिस पर दिल्ली का पता लिखा है. उसके बाद माया शिमला में अपना घर व सारा सामान बेचकर अपने कुत्तों के साथ दिल्ली पहुंच जाती है. इधर एना परेशान है कि माया दिल्ली में क्या करेंगी.

सारा सच जानकर एना के माता पिता नाराज होकर उसे दिल्ली में होस्टल में रहकर पढ़ने भेज देते हैं. एना अपनी तरफ से माया को तलाशने की कोशिश करती है. छह वर्ष बीत जाते हैं. अंततः वह दिल्ली की दीवारों पर माया की तस्वीर के साथ गुमशुदगी के बारे में पोस्टर चिपका देती है. माया बताती हैं कि उसके साथ दिल्ली में क्या क्या हुआ और आखिर उसे एक देव कैसे मिला.

फिल्म में दो सहेलियों की दोस्ती, बनते बिगड़ते रिश्ते, प्रेम के साथ गुमशुदगी का मसला भी है. मगर सब कुछ बहुत ही सतही स्तर पर है. फिल्म बहुत धीमी गति से आगे बढ़ती है. इंटरवल के बाद तो फिल्म एकदम शिथिल हो जाती है. फिल्म को एडीटिंग टेबल पर छोटा करने की जरुरत थी. अति कमजोर कहानी को बेहतर बनाया जा सकता था. गुमशुदगी के मसले पर काफी कुछ कहा जा सकता था, पर यह फिल्म चुप रहती है. पटकथा व निर्देशन में भी काफी कमियां हैं. माया के शिमला से दिल्ली पहुंचने व गायब रहने का रहस्य भी ठीक से नहीं उभरता. प्रभाव हीन संवाद व गीत फिल्म को स्तरहीन बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखते.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो मनीषा कोईराला ने अपनी तरफ से बेहतर परफार्मेंस देने की कोशिश की है, मगर जब किरदार सही ढंग से न लिखा गया हो, पटकथा कमजोर हो, तो कलाकार भी बेबस हो जाता है. एना की मां के किरदार में इरावती हर्षे ने अच्छा काम किया है. श्रेया चौधरी व मदीहा ने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है.

दो घंटे ग्यारह मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘डियर माया’’ की निर्देशक सुनैना भटनागर तथा कलाकार हैं-मनीषा कोईराला, ईरावती हर्षे, श्रेया चौधरी, मदीहा इमाम व अन्य.

ये 6 दिग्गज हैं टीम इंडिया के कोच के दावेदार

क्या टीम इंडिया को मिलेगा नया कोच? क्या अनिल कुंबले का करार नहीं बढ़ाएगी बीसीसीआई? इन सवालों का जवाब जल्द ही मिलने वाला है क्योंकि खबर है कि 5 बड़े नामों ने टीम इंडिया का कोच बनने के लिए आवेदन दे दिया है.

सूत्रों के मुताबिक टीम इंडिया के पूर्व खिलाड़ी और धमाकेदार ओपनर वीरेंद्र सहवाग ने कोच बनने के लिए आवेदन दिया है. भारत की ओर से वीरेंद्र सहवाग और मौजूदा कोच अनिल कुंबले के अलावा लालचंद राजपूत और डुडा गणेश के नाम शामिल हैं, जबकि साउथ अफ्रीका से रिचर्ड पॉयबस और ऑस्ट्रेलिया के टॉम मूडी ने इस पद के लिए आवदेन किया है.

लालचंद राजपूत और टॉम मूडी ने दूसरी बार इस पोस्ट के लिए ओवदन किया है. जब अनिल कुंबले को कोच बनाया गया था, तब भी ये दोनों आवेदन करने वालों में शामिल थे. बता दें कि इस वक्त कुंबले कोच हैं और टीम इंडिया चैंपियंस ट्रॉफी में हिस्सा लेने के लिए फिलहाल इंग्लैंड में है.

आपको बता दें चैंपियंस ट्रॉफी के बाद टीम इंडिया के कोच अनिल कुंबले का करार खत्म हो रहा है. ऐसी खबरे हैं कि बीसीसीआई अनिल कुंबले का करार आगे नहीं बढ़ाएगी क्योंकि सूत्रों के मुताबिक टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली और दूसरे खिलाड़ी अनिल कुंबले के रवैये से नाराज हैं.

ऐसे होगा कोच का सिलेक्शन

टीम इंडिया के कोच का सिलेक्शन पूरी तरह से टीम इंडिया की एडवाइजरी कमेटी के ऊपर निर्भर है. सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण की नेतृत्व वाली ये कमेटी बाकायदा कैंडिडेट्स का इंटरव्यू लेंगे और उनका भारतीय टीम के लिए बनाए गए प्लान की समीक्षा करेंगे.

चैंपियंस ट्रॉफी 2017 : पहले मैच में ही बन गया रिकॉर्ड

चैंपियंस ट्रॉफी के खिताब की दावेदार मानी जा रही इंग्लैंड ने टूर्नामेंट के पहले ही मैच में बांग्लादेश को 8 विकेट से हरा दिया. जो रूट (नाबाद 133), एलेक्स हेल्स (95) और इयोन मोर्गन (नाबाद 75) की शानदार बल्लेबाजी के दम पर मेजबान इंग्लैंड ने यह मैच जीता. इंग्लैंड ने टूर्नामेंट के पहले मैच में ग्रुप-ए के मुकाबले में बांग्लादेश को मात दी.

केनिंग्टन ओवल मैदान पर खेले गए मैच में बांग्लादेश ने तमीम इकबाल की 128 और मुशफिकुर रहीम की 79 रनों की पारियों की बदौलत निर्धारित 50 ओवरों में छह विकेट के नुकसान पर 305 रन बनाए थे, हालांकि इंग्लैंड ने चुनौतीपूर्ण लक्ष्य को 47.2 ओवरों में दो विकेट खोकर हासिल कर लिया.

पहले मैच का रिकॉर्ड

चैम्पियंस ट्रॉफी के पहले मुकाबले से ही रिकॉर्ड्स बनने और टूटने का सिलसिला भी शुरू हो गया है. ओवल मैदान पर बांग्लादेश से मिले 306 रनों के लक्ष्य को हासिल कर इंग्लैंड की टीम ने चैम्पियंस ट्रॉफी में सबसे बड़े लक्ष्य को हासिल कर रिकॉर्ड बना दिया.

इससे पहले चैम्पियंस ट्रॉफी में सबसे बड़ा लक्ष्य हासिल करने का रिकॉर्ड श्रीलंका के नाम दर्ज था. साल 2013 में इंग्लैंड के खिलाफ ही श्रीलंका ने 294 रन बनाकर जीत हासिल की थी.

जो ने खेली शतकीय पारी

चैंपियंस ट्रोफी के शुरुआती मैच में अपनी नाबाद (133*) शतकीय पारी की बदौलत इंग्लैंड को 8 विकेट से जीत दिलाने वाले जो रूट ने इस पारी से संतुष्टि जताई है.

शतक लगाने के बाद जो रूट ने बताया कि बांग्लादेश द्वारा 306 टारगेट देने के बावजूद भी टीम का ड्रेसिंग रूम विश्वास से भरा था कि टीम आसानी से इस लक्ष्य को हासिल कर लेगी. टीम के सभी खिलाड़ी एक-दूसरे का मनोबल बढ़ा रहे थें.

कप्तान इयोन मॉर्गन ने की जो रूट की तारीफ

इंग्लैंड की टीम ने 306 रन टारगेट को 47.2 ओवर में ही पा लिया, जिसमें जो रूट ने सर्वाधिक 133 रन बनाए. यह जो रूट का वनडे में सबसे बड़ा स्कोर भी है. इस मैच में नाबाद 75 रनों की पारी खेलने वाले इंग्लैंड के कप्तान इयोन मॉर्गन ने जो रूट की तारीफ करते हुए कहा कि वह हमारी टीम का एक्स फैक्टर हैं. जब जो और एलेक्स हेल्स (95) जैसे खिलाड़ी इस तरह का खेल खेलें, तो फिर बड़े टारगेट का पीछा करना आसान हो जाता है.

305 रन इंग्लैंड के लिए कुछ कम रह गए

बांग्लादेश के कैप्टन मशरफे मुर्तजा ने कहा कि 305 रन इंग्लैंड के लिए कुछ कम रह गए, लेकिन उन्होंने शानदार बैटिंग की और उन्होंने हमसे यह मैच छीन लिया. मैच की शुरुआत में हमारे ओपनर्स ने सेट होने में ज्यादा समय लिया और अंत में जब हमारे पास काफी विकेट बचे हुए थे, तब हमें और ज्यादा तेजी से रन बटोरने चाहिए थे. मुर्तजा ने कहा कि हम पहले ही मैच में 8 बल्लेबाजों के साथ खेले और ऐसे में टीम के मेन बोलर्स को और शानदार बॉलिंग करनी होगी.

बेवाच : डूबने से कौन बचाएगा?

एक्शन कामेडी फिल्म ‘‘बेवाच’’ की कहानी इसी नाम के एक लोकप्रिय शो पर आधारित है. मगर अफसोस की बात है कि नब्बे के दशक के इस लोकप्रिय टीवी शो की तुलना इस फिल्म के साथ नहीं की जा सकती. इस फिल्म में एकशन की भरमार है. बंदूकें चल रही हैं. लाशे मिल रही हैं. महिला पात्रों को छाती दिखाना अनिवार्य सा लगता है. गालियां भी हैं. हास्य के नाम पर फूहड़ता के अलावा कुछ नही है. जिसके चलते भारत में ‘वयस्क’ तथा विदशों में यह ‘‘आर’’ श्रेणी की फिल्म है.

विदेशो में समुद्री बीच और उसके किनारे को ‘बेवाच’ कहा जाता है. यह कहानी फ्लोरीडा के एम्राल्ड बे की है. जहां पर ‘लाइफ गार्डस’ यानी कि जीवन रक्षक के रूप में मिच बुचन्नान (द्वायने जान्सन) की टीम कार्यरत है. 500 से अधिक लोगों की जान बचा चुके मिच लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हैं. इस बात से स्थानीय पुलिस अफसर गार्नेर (याहया अब्दुल मस्तीन) और मिच के उच्चाधिकारी कैप्टन थोर्पे (रोब हुबेल) नाराज रहते हैं. एक दिन सुबह सुबह समुद्री बीच पर सैर करते समय हंटले क्लब के सामने मिच को ड्रग्स का एक छोटा सा पैकेट मिलता है. अब हंटले क्लब की मालकिन विक्टोरिया (प्रियंका चोपड़ा) हैं.

इधर ‘लाइफ गार्डस’ का हिस्सा बनने के लिए कई लोग प्रयासरत हैं. इसमें से पूर्व ओलंपिक तैराक मैट ब्राड (जैक इफ्रान) भी हैं, जो कि बेरोजगार हैं. उसे शराब पीने की बुरी लत है. मिच का उच्चाधिकारी जान बूझकर मैट ब्राड को ‘लाइफ गार्ड’ टीम का हिस्सा बनाने के लिए मिच से कहता है. मिच को न चाहते हुए भी रॉनी (जोन बास) और क्विन (अलेक्जेंडर ददारियो) के साथ ब्राड को भी अपनी टीम से जोड़ना पड़ता है. रॉनी की प्रेमिका सी जे पारकर (केली रोहब्राच) भी हैं. जबकि क्विन पर ब्राड फिदा है.

उधर मिच को इस बात का शक हो चुका है कि विक्टोरिया क्लब की आड़ में ड्रग्स का कारोबार चला रही है. जब बीच समुद्र में खड़े याच्ट में आग लग जाती है, तो मिच के आदेश का उल्लंघन कर ब्राड आग में कूदता है, बड़ी मुश्किल से उसे सी जे पारकर बचाती है. जबकि याच्ट पर लगी आग से एक मृत व्यक्ति को लाया जाता है, जिसकी पहचान शहर के एक अधिकारी के रूप में होती है. मिच इस इंसान के शरीर की जांच करना शुरू करता है, तो पुलिस अफसर गार्नेर उसे रोकता है. पुलिस अफसर का तर्क है कि अपराध की जांच करना उसका दायित्व है, जबकि मिच का दायित्व सिर्फ लाइफ गार्ड की ही है. ब्राड भी पुलिस अफसर का साथ देता है. परिणामतः ब्राड तथा मिच का साथ देने वाले अन्य लाइफ गार्डस के लोगों के बीच दुराव पैदा हो जाता है.

विक्टोरिया द्वारा आयोजित पार्टी में ब्राड शराब पीकर बहक जाता है, तब मिच भीड़ के सामने ब्राड का अपमान करता है. दूसरे दिन नशा उतरने पर ब्राड को गलती का अहसास होता है कि वह अपनी बुरी आदतों के चलते ही गरीब हुआ है. वह मिच से माफी मांगकर एक मौका देने के लिए कहता है. मिच उसे माफ कर देता है.

मिच अपनी तरफ से विक्टारिया के खिलाफ जांच कर रहा है. वह एक दिन ब्राड व क्विन को लेकर उस शवग्रह में जाता है, जहां याच्ट से मिली लाश पर विक्टोरिया के आदमी गलत पोस्टमार्टम रिपोर्ट रख रहे होते हैं. सारी बातें क्विन अपने मोबाइल में रिकार्ड कर लेती है, पर ऐन वक्त पर उनकी मौजूदगी उजागर हो जाती है. फिर विक्टोरिया के आदमी यानी कि गुंडे मोबाइल तोड़कर सारे सबूत मिटा देते हैं. मिच पुलिस अफसर के पास पहुंचता है, पर वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं. बल्कि मिच का उच्चाधिकारी उसे नौकरी से बाहर कर ब्राड को मुखिया बना देता है. उसके बाद ब्राड ‘लाइफ गार्डस’ के बाकी सदस्यों के साथ मिलकर विक्टेारिया के खिलाफ लग जाता है, ऐन वक्त पर वह मिच से मदद मांगता है. अंत में विक्टोरिया के ड्रग्स साम्राज्य का खात्मा हो जाता है. मिच को पुनः ‘लाइफगार्डस’ का मुखिया बना दिया जाता है.

कथानक स्तर पर कोई नवीनता नहीं है. बौलीवुड में इस तरह के कथानक पर कई फिल्में बन चुकी हैं. फिल्म में हास्य व एक्शन कुछ भी सही ढंग से नहीं उभरता. वैसे फिल्म को तहस नहस करने में कुछ काम सेंसर बोर्ड ने भी किया है. फिल्म में कोई भी कलाकार सही ढंग से हास्य दृश्यों को नहीं निभा पाया. जैक इफ्रान पटकथा में बंधे हुए नजर आते हैं. क्योंकि वह भी अपने अभिनय का प्रभाव नहीं छोड़ पाते हैं. फिल्म के महिला पात्र तो महज खानापूर्ति के लिए ही हैं. कुछ महिला पात्र तो समुद किनारे बिकनी या अर्धनग्नावस्था में घूमने के लिए नजर आनी ही चाहिए. परिणामतः बेहतरीन कलाकारों की मौजूदगी भी इस फिल्म को बाक्स आफिस पर बुरी तरह से डूबने से कोई नहीं बचा सकता.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो फिल्म ‘‘बेवाच’’ में खलनायक विक्टोरिया के किरदार में प्रियंका चोपड़ा को देखकर तरस आता है कि क्या वह इतना छोटा व घटिया काम करने के लिए ही हौलीवुड फिल्म से जुड़ी हैं. खलनायिका के रूप में उनका किरदार सही ढंग से लिखा ही नहीं गया है, वह सशक्त किरदार के रूप में नहीं उभरता है. उपर से प्रियंका चोपड़ा का अभिनय भी सतही ही है. महज बोल्ड पहनावा व मेकअप ही अभिनय का हिस्सा नहीं होता, यह बात हर अभिनेत्री को याद रखनी चाहिए. इस फिल्म से प्रियंका चोपड़ा के कम से कम भारतीय प्रशंसक तो काफी निराश होंगे.

एक घंटे 56 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘बेवाच’’ का निर्माण इवान रैतमन, मिचाइल बर्क, डगलस ने किया है. जबकि भारत की तरफ से ‘‘वायकाम 18’’ जुड़ा हुआ है. निर्देशक सेठ गोरडन, पटकथा लेखक दमियान शनन व मार्क स्विफ्ट, संगीतकार क्रिस्टोफर, कैमरामैन इरिक स्टीलबर्ग तथा कलाकार हैं-द्वायने जानसन, याह्या अब्दुल मस्तीन, प्रियंका चोपड़ा,  जोन बास, अलेक्जेंडर ददारिया, केली रोहब्राच, रोब हुबेल व अन्य.

इंटरनेट पर वायरल हुआ इस अभिनेत्री का ये हौट वीडियो

सुष्मिता सेन का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है. इस वीडियो को देखने के बाद हर किसी की चाहत है कि काश उसे भी ऐसी टीचर मिले.

गौरतलब है कि बॉलीवुड के अलावा दुनिया भर में फैशन का आइकॉन समझी जाने वाली एक्ट्रेस सुष्मिता सेन का जन्म 19 नवंबर 1975 को हैदराबाद में हुआ था. उनका जन्म एक बंगाली परिवार में हुआ था, लेकिन मूल रूप से हैदराबाद की निवासी हैं. उनके पिता एयरफोर्स में कार्यरत थे और मां ज्वैलरी डिजाइनर थीं. उम्र भले ही 40 की हो गई लेकिन उनकी खूबसूरती आज भी बरकरार है. सुष का नाम बॉलीवुड की बेहतरीन एक्ट्रेसेस में शुमार किया जाता है. उन्होंने बॉलीवुड को कई सुपरहिट फिल्में दी हैं.

सुष्मिता सेन वो शख्सियत हैं जिन्होंने कई मायनों में इतिहास रचा है. मिस यूनिवर्स बनने वाली वह पहली भारतीय महिला हैं. साथ ही वह भारत की पहली महिला हैं जिन्होंने शादीशुदा ना होते हुए भी दो-दो लड़कियों को गोद लिया. इन दिनों वह बड़े पर्दे से गायब हैं, फिर भी वह काफी बिजी हैं. जिंदगी की गुल्लक में खुशियां भरने में सुष्मिता सेन का वक्त गुजर रहा है. हाल ही में टैटू आर्टिस्ट समीर पतंगे ने सुष्मिता की कलाई पर सातवां टैटू बनाया. उन्होंने हिब्रयू भाषा में अक्षर लिखाए हैं जिसका अंग्रेजी में मतलब 'आई एम' होता है.

सुष्मिता देश की पहली एक्ट्रेस हैं जिन्होंने 1994 में महज 19 साल की उम्र में मिस यूनिवर्स का खिताब जीता लिया था. बताया जाता है कि सुष की मां कभी नहीं चाहती थीं कि वे उन्हें हायर एजुकेशन में डालें. लेकिन भला किस्मत का फैसला आखिरकार कौन बदल सकता है. मिस यूनिवर्स बनने के बाद सुष ने बॉलीवुड में अपने करिअर की शुरुआत की.

सुष्मिता की पहली फिल्म 'दस्तक' 1996 में आई. फिल्म में मुकुल देव और शरद कपूर उनके को-स्टार थे. इसके बाद उन्होंने 1999 में आई बीवी नंबर 1 में काम किया जिसके लिए उन्हें फिल्म फेयर में बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का अवॉर्ड मिला. इसके बाद सुष्मिता फिल्म जोर, सिर्फ तुम, हिन्दुस्तान की कसम, फिज़ा, क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलता, वास्तु शास्त्र, मैं हूं ना, मैंने प्यार क्यों किया और नो प्रॉब्लम जैसी फिल्मों में आई.

बताया जाता है कि सुष्मिता के करीब 10 ब्यॉयफ्रेंड के साथ अफेयर चले लेकिन फिर भी अब तक कुंवारी है. उनका नाम, ऋतिक बसीन, फिल्म निर्देशक मुद्दसर अज़ीज, विक्रम भट्ट, अनिल अंबानी, रणदीप हुड्डा, बंटी सचदेवा, बिजनेसमैन संजय नारंग, पाक क्रिकेटर वसीम अकरम आदि से जुड़ा.

शादी नहीं तो क्या सुष्मिता फिर भी दो बच्चों की मां हैं. दरअसल, सुष्मिता ने दो बेटियां को गोद लिया है, जिनका पालन पोषण वे खुद करती हैं. उन्हीं की देख-रेख के चलते सुष्मिता बॉलीवुड में कम सक्रिय हैं.

खैर आप देखिए ये हौट वायरल वीडियो…

क्यों थम नहीं रही नक्सली हिंसा

8 मई को नई दिल्ली में नक्सल प्रभावित 10 राज्यों के मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के सुर पहले के मुकाबले काफी बदले हुए थे. उन की बातों में छिपा विरोधाभास साफसाफ चुगली कर रहा था कि सरकार नक्सली समस्या को सिर्फ एक निरर्थक हिंसा के रूप में देखती है जिस से निबटने के लिए वह बंदूक की कार्यवाही के नाम पर छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में, तैनात अर्धसैनिक बलों का आधुनिकीकरण करेगी.

राजनाथ सिंह के अनुसार, अब जवानों को बायोमीट्रिक और ट्रैकिंग सिस्टम युक्त स्मार्टगन मुहैया कराई जाएंगी, जवानों के जूतों और बुलैटप्रूफ जैकेट्स में भी बुलैटप्रूफ जीपीएस युक्त ट्रैकर लगाने की बात उन्होंने कही. इस से होगा यह कि नक्सली उन्मूलन अभियान का हिस्सा बने सैनिकों की लोकेशंस के पलपल की जानकारी सरकार को मिलती रहेगी. राजनाथ सिंह ने यह भी माना है कि आमतौर पर माओवादी संगठन सुरक्षा बलों से लूटे हथियारों का ही इस्तेमाल करते हैं.

यही तकनीक माओवादी क्यों न हथिया लेंगे, इस का जवाब शायद राजनाथ सिंह के पास न होगा. गृहमंत्री की बात विरोधाभासी और हास्यास्पद है. इस से यह स्पष्ट नहीं हुआ कि माओवादियों को सुरक्षाबलों से हथियार छीनने से रोका कैसे जाएगा.

अब होगा यह कि सुरक्षाबलों को जो स्मार्ट गनें दी जाएंगी वे भी नक्सलियों के काम आएंगी. रही बात ट्रैकर या जीपीएस ट्रैकर की, तो नक्सली इतने बेवकूफ नहीं है कि इन्हें निष्क्रिय या नष्ट करना न जानते हों.  इस से होगा सिर्फ इतना कि जवान कहां लुटे या मारे गए, यह जल्द पता चल जाएगा.  लेकिन नक्सलियों तक पहुंचना पहले की तरह ही दुष्कर काम रहेगा. माओवादियों को आम जनता का बड़ा समर्थन है और उन्हें सेना व पुलिस के पलपल की खबर रहती है.

सम्मेलन की इकलौती अहम बात राजनाथ सिंह का यह मानना था कि नक्सली हिंसा का हल गोलियां नहीं हैं.  फिर क्यों बस्तर में हथियारों और गोलियों की तादाद व सप्लाई बढ़ाई जाएगी, यह समझ से परे है.

असर सुकमा हमले का

नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और सुरक्षा एजेंसियों के आला अफसरों की 8 मई की मीटिंग दरअसल 24 अप्रैल के नक्सली हमले की सरकारी प्रतिक्रिया थी जिस में सीआरपीएफ के 25 जवान मारे गए थे. उक्त घटना सुकमा में घटित हुई थी. 

सुकमा जिला पूरी तरह नक्सली गिरफ्त में है. यहां के बुर्कापाल से दोकनपाल तक बन रही सड़क की सुरक्षा के लिए भारी संख्या में सैन्यबल तैनात हैं. 24 अप्रैल की दोपहर जब जवान खाना खा कर निकले ही थे, तभी नक्सलियों ने बारूदी सुरंग का जोरदार विस्फोट किया और सुस्ताते जवानों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी.

जवानों ने संभलते हुए जवाबी हमला किया. उन के मुताबिक, नक्सलियों की संख्या लगभग 300 थी. पहले के हमलों की तरह यह हमला भी सुनियोजित था जिस में एक घायल जवान शेर मोहम्मद का कहना है कि नक्सलियों ने गांव वालों, जिन में औरतें भी थीं, को आगे किया हुआ था, जिस से जवान जवाबी गोलियां, नक्सलियों की तरह, अंधाधुंध तरीके से नहीं दाग सके. फिर भी, 20 नक्सलियों को मार गिराया गया.

सुकमा के इस नक्सली हमले की वजह भी अहम है. सरकार नैशनल हाइवे क्रमांक 30 पर छत्तीसगढ़ और तेलांगना को जोड़ने के लिए जंगलों के बीच से एक सड़क बना रही है, जिस का नक्सली संगठन विरोध कर रहे हैं. इस के पीछे उन के अपने तर्क हैं. केवल इस ही नहीं, आदिवासी इलाकों में बन रही हर सड़क के निर्माण में नक्सली यथासंभव अड़ंगा डाल रहे हैं. जिस के चलते पिछले 10 सालों से सड़कें कछुआ चाल से बन पा रही हैं और उस के लिए भी काफी संख्या में सैन्यबल तैनात हैं. 

इस हमले में भी जवानों को मारने के बाद नक्सलियों ने उन के हथियार व वायरलैस सैट सरीखा दूसरा सामान भी लूटा और हमेशा की तरह इत्मीनान से चलते बने और बेफिक्र हो गए कि अब लंबे वक्त तक सड़क बनने का काम ठप पड़ा रहेगा. क्योंकि, मानसून के वक्त वैसे ही निर्माणकार्य बंद रहते हैं.

इन जवानों को नक्सली हमले का कोई एहसास या अंदाजा नहीं था. गृहमंत्री ने खुफिया विफलता पर चिंता जताई. लेकिन इस का हल क्या है, दूसरी कई बातों की तरह उन्हें यह भी नहीं मालूम. इस इलाके के आदिवासी सरकार के बजाय नक्सलियों पर ज्यादा भरोसा करते हैं और उन्हें अपना हमदर्द व मददगार मानते हैं. ऐसा क्यों है, यह सवाल भी किसी जवाब का मुहताज नहीं कि बस्तर में तैनात जवान तरहतरह से आदिवासियों को तंग करते हैं, प्रताडि़त करते हैं और उन की औरतों की इज्जत लूटते हैं. दूसरे, खुद आदिवासी भी मानते हैं कि सड़कें बनने से उन का कोई विकास नहीं होने वाला, क्योंकि सरकार की असल मंशा उन्हें जंगलों से खदेड़ने की है.

वह उन से जल, जंगल और जमीन का हक छीन कर पूंजीपतियों व उद्योगपतियों को बेचना चाहती है. ऐसा हुआ तो वे जाएंगे कहां? ऐसे कई सवाल आदिवासियों को परेशान किए हुए हैं, जिन का जवाब सरकार कभी नहीं देती. हां, आश्वासनों की उस के खजाने में कमी नहीं.

सरकार की परेशानी

नक्सली हिंसा रोकना सरकार के वश की बात है नहीं, यह बात वे लोग भी मानने लगे हैं जो नक्सली अभियान या माओवाद को नहीं जानते. सुकमा हमले के बाद सरकार वादों, इरादों और दहाड़ने की रस्म निभाती रही तो आम लोगों ने सोशल मीडिया पर नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह का खूब मजाक बनाया कि इन्होंने निंदा नाम का बम बस्तर में फेंक दिया है, जिस से नक्सली घबरा कर हथियार डाल देंगे.

उलट इस के, नक्सलियों को ले कर सरकार की अपनी मजबूरियां हैं जिन्हें 8 मई की मीटिंग में राजनाथ सिंह ने बताया भी. खुफियातंत्र कमजोर होने के अलावा उन्होंने नक्सलियों की फंडिंग का जिक्र भी किया कि इसे रोके जाने से ही बात बनेगी क्योंकि किसी भी युद्ध को लड़ने में पैसों की भूमिका अहम रहती है. बगैर पैसों के ऐसे अभियान परवान नहीं चढ़ सकते.

नक्सलियों के पास पैसा कहां से आता है दूसरी कई बातों के साथसाथ इस सवाल का ठीकठाक जवाब भी किसी के पास नहीं, सिवा इन अंदाजों और अफवाहों के कि नक्सली वसूली करते हैं और कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां उन की आर्थिक मदद करती हैं, जो बस्तर में अपने पांव जमाना चाहती हैं. इत्तफाक से सुकमा हमले के वक्त ही जम्मूकश्मीर में भी आतंकी हिंसा का तांडव मचा रहे थे जिन के बारे में हर कोई जानता व मानता है कि उन्हें पाकिस्तान से पैसा मिलता है. लेकिन नक्सलियों को विदेशों से कोई आर्थिक सहायता मिलती है, इस बात के प्रमाण तो दूर, कोई चर्चा तक नहीं होती.

दरअसल, सरकार इस बात को हवा दे कर अपनी नाकामी व कमजोरियां ढकना चाहती है कि नक्सलियों को आतंक फैलाने के एवज में विदेशों से मदद मिलती होगी. यह वह दौर है जब दुनियाभर से कम्यूनिस्ट गायब हो रहे हैं. रूस का हाल सामने है और चीन का तो अभी तक नक्सलियों से कोई कनैक्शन होने की बात तक सामने नहीं आई है.

आतंकियों से नक्सलियों की तुलना कर रहे लोगों को भी एहसास है कि ये दोनों समस्याएं भिन्न हैं. नक्सली न तो किसी धर्म को मानते हैं और न ही कर्मकांडों में भरोसा करते हैं. वे मानते हैं कि शोषण अहिंसक तरीके से तो दूर नहीं हो सकता, इसलिए उन के पास हथियार हमेशा रहते हैं.

प्रधानमंत्री या गृहमंत्री ने सुकमा के ताजे हमले के बाद नक्सलियों से बातचीत की कोई पहल नहीं की है तो इस का मतलब साफ है कि सरकार उन्हें राष्ट्रद्रोही मानती है. सिर्फ उन्हें ही नहीं, बल्कि सरकार हर उस शख्स को नक्सली या राष्ट्रद्रोही मानती है जो आदिवासी हितों की बात करता है और उन की मदद करता है. विनायक सेन और सोनी सोरी जैसे समाजसेवी यों ही सरकारी प्रताड़ना के शिकार नहीं हुए थे जो आदिवासी अंचलों में आदिवासियों के हक की बातें कर रहे थे. हर किसी को नक्सली कह कर राष्ट्रद्रोह के आरोप में जेल में ठूंस दिया जाता है, इस बात को रायपुर जेल की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे ने अपने फेसबुक अकाउंट पर विस्तार देते आदिवासियों की परेशानियां भी बयां की तो छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हेंबरखास्त कर दिया.

सरकार पर आदिवासी भरोसा इसलिए भी नहीं करते कि उन्हें इस बात का कहीं ज्यादा अंदाजा है कि सरकार जनता को भरोसे में ले कर ही उन पर अत्याचार करती है. सभ्य और शहरी इलाकों में यह काम दूसरे ढंग से होता है. सरकारी कागजों के आतंक का शिकार हर कोई है.

किसी स्थानीय निकाय का एक तुड़ामुड़ा नोटिस आम लोगों को रुला देने के लिए काफी होता है. अगर किसी को नगरनिगम का यह बेवजह का नोटिस मिल जाए कि आप का मकान नाजायज तरीके से बना हुआ है तो वह बेचारा झट से जेब में पैसे ठूंसठूंस कर दफ्तर की तरफ दौड़ेगा और नेताओं व अफसरों के सामने गिड़गिड़ाएगा कि हुजूर, बचाओ, मेरे साथ ज्यादती हो रही है.

आदिवासी इलाकों में तसवीर उलट है. जहां नक्सलियों के जरिए ही सही, सरकार की हर ऐसी जोरज्यादती, आदिवासी अब बरदाश्त नहीं करते, वे सीधे बंदूक तानने लगे हैं. जान कर हैरानी होती है कि नक्सलियों के डर से बस्तर में घूसखोरी न के बराबर है. वहां के सरकारी मुलाजिम अपनी जान बचाने के लिए काम करें, न  करें, पर घूस मांगने की जुर्रत नहीं कर पाते. इसीलिए वहां परिस्थितियों से बचने के लिए हर सरकारी अफसर मोटी रिश्वत अपने अफसरों व नेताओं को देने को तैयार रहता है.

यह और ऐसी कई बातें सरकार को स्वाभाविक तौर पर नागवार गुजरती हैं, इसलिए उस की नजर में नक्सली राष्ट्रद्रोही हैं, भले ही वे देश को तोड़ने की बात न करें या फिर असहिष्णुता का रोना न रोएं और न ही राष्ट्रगान या तिरंगे का अपमान करें. नक्सलवाद को सरकार ने एक सामूहिक अपराध घोषित कर रखा है.

सरकारपीडि़त नागरिक हर जगह हैं. उन की प्रतिक्रियाएं और विरोध करने के तरीके अलगअलग हैं. समाजसेवी अन्ना हजारे अनशन पर बैठ जाएं, इस से सरकार को ज्यादा परेशानी नहीं होती क्योंकि ऐसे अनशन अपार जनसमर्थन के बाद भी जल्द खत्म हो जाते हैं या दम तोड़ देते हैं. लेकिन अन्ना हजारे जैसे आंदोलनों के वक्त लोगों में वही भड़ास होती है जो नक्सलियों की रगरग में स्थायीरूप से बस गई है. उन का आंदोलन या अभियान तात्कालिक नहीं है, न ही सरकार उसे खत्म कर पा रही. रही बात नक्सलियों द्वारा लूटपाट की, छिटपुट घटनाओं की तो वे मंदिरों व सरकारी दफ्तरों की लूट के मुकाबले कहीं नहीं ठहरतीं. लूट और घूस के मामले में नक्सली सरकारी मुलाजिमों और पंडेपुजारियों की तरह प्रशिक्षित भी नहीं हैं कि इस में वेविविध ता ला पाएं.  वे सिर्फ एक जिद पर अड़े हैं कि आदिवासियों का शोषण बरदाश्त नहीं किया जाएगा, इस के लिए चाहे उन्हें कुछ भी करना पड़े. हालांकि हिंसा को भी कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता.

नक्सलियों की मंशा

नक्सलियों की मंशा या दर्द बेहद साफ है कि जल, जंगल और जमीन पीढि़यों और सदियों से आदिवासियों के हैं, इन्हें उन से विकास की चालाकी के नाम पर छीना न जाए. नक्सलियों का यह नजरिया कि विकास और जंगलों का सीमेंटीकरण आदिवासियों से उन की मौलिकता व संस्कृति छीन लेगा, एकदम गलत भी नहीं ठहराया जा सकता. आदिवासी खुद को बड़े गर्व से देश का मूल निवासी और वास्तविक प्रकृतिप्रेमी मानते हैं तो वे गलत नहीं हैं.  वे जंगलों से बाहर इसलिए भी नहीं आना चाहते कि सभ्य समाज उन से हमेशा से जानवरों सरीखा बरताव करता रहा है.  उन का स्वाभिमान शहरी और सभ्य लोगों से कहीं ज्यादा और पुख्ता है.

रही बात नक्सली हिंसा की, तो उस से जूझने और लड़ने के बजाय पहले नक्सलियों की बात सुनी जानी चाहिए.  उन की हर बात मानी जाए, यह कतई जरूरी नहीं. लेकिन संवादहीनता हिंसा को और बढ़ावा देने वाली साबित हो रही है. ऐसे में सरकार को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी समझते इस बाबत पहल करनी चाहिए. वहीं, इसी संविधान का हवाला अकसर नक्सली भी दिया करते हैं कि इस में वर्णित आदिवासियों के अधिकार उन्हें मिलने चाहिए. नक्सली भले ही हिंसक हों, पर बुद्धिजीवी भी हैं. वे बेहतर समझते हैं कि ईसाई और हिंदू आदिवासियों को अपनेअपने धर्मों में शमिल करने के लिए कुछ भी करगुजरने को तैयार हैं. अगर वे एक बार धर्म के फंदे में फंस गए तो जिंदगीभर उस में छटपटाते रहेंगे. फिर दुनिया की कोई ताकत उन्हें नहीं बचा पाएगी.  नक्सली हिंसा अनर्थ है तो इस का अर्थ भी समझना जरूरी है, तभी बात बन पाएगी. वरना सैनिक और नक्सली यों ही एकदूसरे को मारते रहेंगे और आदिवासी इन 2 पाटों के बीच पिसते रहेंगे. 

वर्षा पर क्यों गिरी बिजली

सरकारें नक्सलियों और आदिवासियों के हमदर्दों में कोई फर्क नहीं करतीं. उन की नजर में हर वह आदमी राष्ट्रद्रोही है जो उस की पोल खोलता है. सुकमा हमले के बाद रायपुर जेल की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे को बरखास्त करने में छत्तीसगढ़ सरकार ने गजब की फुरती दिखाई, निलंबन के कायदेकानूनों को किनारे कर दिया.

वर्षा पर आरोप है कि उन्होंने फेसबुक पर सरकार के खिलाफ टिप्पणियां की जिन में गलत एवं भ्रामक तथ्यों का उल्लेख किया. चूंकि वे अनाधिकृत रूप से कर्तव्य से अनुपस्थित थीं, इसलिए भी उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है. यहां तक बात ठीक थी कि राज्य सरकार ने वर्षा से 32 पृष्ठों में सवाल पूछते उन का स्पष्टीकरण मांगा था.  हैरानी की बात यह है कि जवाब की समयसीमा खत्म होने के पहले ही उन्हें नौकरी से चलता कर दिया गया. जबकि वर्षा ने अपने 376 पृष्ठीय जवाब में कहा है कि उन्होंने सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट और सरकारी दस्तावेजों के हवाले से ही अपनी बात कही है और जवाब देने के पहले ही उन्हें नौकरी से बरखास्त कर दिया गया. जाने क्यों जेल प्रशासन ने प्राथमिक जांच अधिकारी की रिपोर्ट का इंतजार नहीं किया.

वर्षा के पहले भी कई अधिकारी सरकारी ज्यादतियों का शिकार हो चुके हैं. सरकार उन्हें ज्यादा से ज्यादा नौकरी से निकाल सकती है. पर इन से भी बड़ी गाज उन लोगों पर गिरती है जो आदिवासी अंचलों में आदिवासियों के लिए काम कर रहे हैं. राज्य सरकार क्यों वर्षा से घबराई, इस के लिए वर्षा की फेसबुक पर लिखी जो पोस्ट वायरल हुई उसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है. इस से यह पता चलता है कि नक्सली अभियान और अभिप्राय वास्तव में है क्या और उसे क्यों बंदूक के जोर पर गलत ठहराने की नाकाम कोशिश सरकार सालों से कर रही है.

‘‘मुझे लगता है कि एक बार हम सभी को अपना गिरेबान झांकना चाहिए, सचाई खुदबखुद सामने आ जाएगी. घटना में दोनों तरफ मरने वाले अपने देशवासी हैं, भारतीय हैं. इसलिए कोई भी मरे, तकलीफ हम सब को होती है.  लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था को आदिवासी क्षेत्रों में जबरदस्ती लागू करवाना, उन की जल, जंगल, जमीन से उन्हें बेदखल करने के लिए गांव का गांव जलवा देना, आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार, आदिवासी महिलाएं नक्सली हैं या नहीं, इस का प्रमाणपत्र देने के लिए उन का स्तन निचोड़ कर दूध निकाल कर देखा जाना कैसा इंसाफ है.

‘‘टाइगर प्रोजैक्ट के नाम पर आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है जबकि संविधान की 5वीं अनुसूची में शामिल होने के कारण सरकार का कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन को हड़पने का… आखिर ये सबकुछ क्यों हो रहा है. नक्सलवाद खत्म करने के लिए लगता नहीं…सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्हीं जंगलों में हैं जिन्हें उद्योगपतियों व पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है.

‘‘आदिवासी जल, जंगल, जमीन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उन की मातृभूमि है. वे नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उन की बहूबेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उन के घर जला रहे हैं, उन्हें फर्जी केसों में चारदीवारीमें सड़ने को भेजा जा रहा है, तो आखिर वे न्यायप्राप्ति के लिए कहां जाएं. ये सब मैं नहीं कह रही, सीबीआई रिपोर्ट कहती है, सुप्रीम कोर्ट कहता है, जमीनी हकीकत कहती है.

‘‘जो भी आदिवासियों की समस्यासमाधान का प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं चाहे वे मानव अधिकार कार्यकर्ता हों, चाहे पत्रकार, उन्हें फर्जी नक्सली केसों में जेल में ठूंस दिया जाता है. अगर आदिवासी क्षेत्रों में सबकुछ ठीक हो रहा है तो सरकार डरती क्यों है. ऐसा क्या कारण है कि वहां किसी को भी सचाई जानने के लिए जाने नहीं दिया जाता.

‘‘मैं ने स्वयं बस्तर में 14 से 16 वर्ष की मडि़या आदिवासी बच्चियों को देखा था जिन को थाने में, महिला पुलिस को बाहर कर, पूरा नंगा कर प्रताडि़त किया गया था. उन के दोनों हाथों की कलाइयों और स्तनों पर करैंट लगाया गया था जिस के निशान मैं ने स्वयं देखे. मैं भीतर तक सिहर उठी थी कि इन छोटीछोटी आदिवासी बच्चियों पर थर्ड डिगरी टौर्चर किसलिए…मैं ने डाक्टर से उचित उपचार व आवश्यक कार्यवाही के लिए कहा.

‘‘हमारे देश का संविधान और कानून कतई हक नहीं देता कि किसी के साथ अत्याचार करें… इसलिए सभी को जागना होगा. राज्य में 5वीं अनुसूची लागू होनी चाहिए. आदिवासियों का विकास आदिवासियों के हिसाब से होना चाहिए.  उन पर जबदरस्ती विकास न थोपा जाए. आदिवासी प्रकृति के संरक्षक हैं. हमें भी प्रकृति का संरक्षक बनना चाहिए, न कि संहारक. पूंजीपतियों के दलालों की दोगली नीति को समझें… किसानजवान सब भाईभाई हैं. सो, एकदूसरे को मार कर न ही शांति स्थापित होगी और न ही विकास होगा. संविधान में न्याय सब के लिए है…इसलिए न्याय सब के साथ हो.

‘‘हम भी इसी सिस्टम के शिकार हुए…लेकिन अन्याय के खिलाफ जंग लड़े, षड्यंत्र रच कर तोड़ने की कोशिश की गई, प्रलोभनरिश्वत का औफर भी दिया गया. लेकिन

हम ने इन के सारे इरादे नाकाम कर दिए और सत्य की विजय हुई…आगे भी होगी. न हम अन्याय करेंगे और न सहेंगे.’’

नक्सली आंदोलन 1967 से 2017 तक

नक्सलवाद की उम्र 50 साल हो रही है पर इस पर काबू पाने में सरकारें नाकाम रही हैं. इस की वजहें हैं जिन का सीधा संबंध एकतरफा विकास से है. आजादी के बाद आम लोगों और किसानों को उम्मीद बंधी थी कि अब गांवगांव तक सड़क, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और बिजली होगी लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो यह वर्ग मानने लगा कि पैसे वाले देखते ही देखते पैसे वाले होते जा रहे हैं और गरीब और गरीब होता जा रहा है. 

पर तब ऐसा सोचने वाले असंगठित थे. साल 1967 में  बंगाल के एक गांव नक्सलवाड़ी से इस एकतरफा विकास के खिलाफ पहली सशक्त क्रांति हुई थी. इसलिए इस क्रांति का नाम नक्सलवाद पड़ गया. नक्सलवाद के जनक थे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के चारू मजूमदार और कानू सान्याल, जिन की मुलाकात इत्तफाक से जेल में हुई थी.  उन दोनों का मानना था कि किसानों और मजदूरों की दुर्दशा के लिए सरकारी नीतियां और लोकतांत्रिक व्यवस्था जिम्मेदार है.

सशस्त्र हिंसा फैली तो देखते ही देखते शोषित और वंचित लोग नक्सलवाद को लाल सलाम ठोंकने लगे. 50 सालों में नक्सली आंदोलन काफी बदला भी है. आज घोषित तौर पर उन का कोई नेता नहीं है और वे खुद कई दलम (दलों) में बंट गए हैं पर उन का मकसद आज भी ज्यों का त्यों है. कुछ वैचारिक मतभेदों के चलते चारू मजूमदार और कानू सान्याल अलग हो गए थे. चारू मजूमदार की मौत 1972 में ही हो गई थी जबकि कानू सान्याल ने साल 2010 में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली थी.

उम्मीद से कम वक्त में नक्सलवाद पश्चिम बंगाल से होता आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड और ओडिशा में फैला. आज हालत यह है कि आंशिक और पूरी तरह से नक्सलप्रभावित राज्यों की संख्या 10 और जिलों की संख्या 190 है.फर्क इतना है कि कहीं नक्सली गतिविधियां न के बराबर हैं तो कहीं उम्मीद से ज्यादा हैं. 

आज के नक्सली किसी राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित नहीं रह गए हैं और न ही पहले की तरह लोकतंत्र को कोसते हैं.  इस की एक बड़ी मिसाल आदिवासी क्षेत्रों में भाजपा को मिलती सफलता है जो 20 साल पहले आदिवासी वोटों के लिए तरस जाती थी. कम्यूनिस्ट विचारधारा के होते हुए भी नक्सली आमतौर पर धार्मिक संगठनों को तंग नहीं करते.

अब नक्सलियों का असल मकसद उन सरकारी योजनाओं में अड़ंगा डालना है जो उन्हें जंगलों को खत्म करती लगती हैं. सड़कें बनेंगी तो आदिवासी जंगलों से बेदखल हो जाएंगे और जंगलों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा हो जाएगा.  नक्सली अब इसी आशंका में सोते और जागते हैं और जब भी मौका मिलता है, हिंसा को अंजाम दे देते हैं. सरकार ने नक्सलप्रभावित इलाकों को छावनी सा बना दिया है जिस से नक्सलियों को खास चिढ़ है.

उधर, आदिवासी भी सैन्यबलों से परेशान हैं. इसलिए वे नक्सलियों का साथ देते हैं. हर तरह की सूचना नक्सलियों के पास कैसे पहुंच जाती है, यह किसी को नहीं पता और न ही यह कि आम आदिवासी कैसे नक्सलियों को फंडिंग करता है. उलट इस के, सरकार या किसी और को तो रत्तीभर भी नहीं मालूम कि नक्सली किस जगह से अपनी मुहिम को अंजाम देते हैं, अब उन का नेता कौन है और आगे वे क्या करेंगे.

नक्सली हिंसा के अर्थों और अनर्थ से दूर सिरदर्द की बात सरकार के लिए यह है कि वह भले ही लोकतंत्र व समानता का राग अलापती हो, लेकिन अभी तक वह आदिवासियों का भरेसा नहीं जीत पाई है. यह बात बस्तर सहित दूसरे नक्सलप्रभावित राज्यों में साफसाफ दिखती भी है कि अभी तक आदिवासी अंचलों का अपेक्षित विकास नहीं हुआ है. नक्सली इस बात के लिए सरकार को ही जिम्मेदार मानते हैं.

हिंसा की छोटीबड़ी वारदातें होती रहेंगी, नक्सली दहशत कायम रहेगी, बेगुनाह आदिवासी मारे जाते रहेंगे और उन के साथ में जवान भी. लेकिन सरकार कुछ नहीं कर पाएगी. ऐसे में हल क्या है और कैसे होगा, यह कोई नहीं सोचता. सरकार भी हिंसा का जवाब हिंसा से दे कर नक्सलियों को उकसाती ही लगती है.  अब थोक में बेरोजगार आदिवासी युवा और औरतें नक्सली संगठनों में शामिल हो रहे हैं क्योंकि सरकार उन्हें शिक्षा व रोजगार नहीं दे पा रही.

वन बैल्ट वन रोड

चीन ने 30 देशों के प्रमुखों और लगभग 100 देशों के प्रतिनिधियों को जमा कर के वन बैल्ट वन रोड का जो सपना परोसा है वह सदियों की कूटनीति में अनूठा है और एशिया के देश का दुनिया की अर्थव्यवस्था के केंद्र में आ जाना है. एशिया के सब से बड़े देश चीन ने पिछले 40 सालों में अभूतपूर्व उन्नति की है और अब वह अपने लिए बाजार ढूंढ़ रहा है और अपना प्रभुत्व जमाना चाह रहा है.

वन बैल्ट वन रोड से चीन, रूस, मंगोलिया, पाकिस्तान, यूरोप के अधिकांश देशों को सड़कमार्ग, रेलमार्ग से जोड़ा जाएगा और जलमार्ग से अफ्रीका तक पहुंच होगी. आजकल इन देशों के संबंध अपने पड़ोसियों तक से अच्छे नहीं हैं क्योंकि न रेलें हैं न सड़कें हैं जो एकदूसरे को जोड़ती हैं. जहां रास्ते हैं वहां भी सीमा पर फौजों और कस्टम वालों ने दीवारें खड़ी कर रखी हैं.

प्राचीन रेशम मार्ग, जिस के माध्यम से चीन का रेशम यूरोप जाता था और वहां का सोनाचांदी वापस आता था, अब पुनर्जीवित किया जा रहा है. रूस, टर्की, पाकिस्तान, मंगोलिया तो इस सपने से बहुत खुश हैं क्योंकि उन्हें चीनी सामान और सस्ता मिलेगा और वे अपना कच्चा माल चीनी कारखानों तक पहुंचा सकेंगे.

1940-45 में जिस संयुक्त राष्ट्र संघ की कल्पना विश्व युद्ध के दौरान की गई थी उस में केवल कागजी घोड़े दौड़े थे. आज संयुक्त राष्ट्र संघ यानी यूनाइटेड नेशंस का दुनियाभर में प्रभाव है. पर जमीन पर कहीं यूनाइटेड नेशंस नहीं दिखता. चीन का वन बैल्ट वन रोड सपना अगर साकार हुआ तो दिखेगा. दुनिया के100 से ज्यादा देशों में सड़कें, गैस या तेल के पाइप, बंदरगाह, रेललाइनें दिखेंगी. यह केवल कौन्फ्रैंसरूमों का सपना नहीं है, जमीनी है.

इन मार्गों के किनारेकिनारे सैकड़ों नए शहर बसेंगे, कारखाने बनेंगे जो कच्चा माल खपाएंगे, तैयार माल इधरउधर भेजा जाएगा. अमेरिका के घटते विश्वव्यापी प्र्रभाव को भरने को चीन इतनी तेजी से  आएगा, इस की उम्मीद न थी.

भारत को इस से अलग रहना पड़ा है क्योंकि चीनपाकिस्तान मार्ग उस इलाके से जा रहा है जिसे भारत अपना मान रहा है. भारत को यह भी लग रहा है कि चीन पाकिस्तान, नेपाल व म्यांमार के सहारे  उसे घेर रहा है. भारत ने श्रीलंका व बंगलादेश को कोशिश कर के रोका है पर वे ज्यादा दिन रुकेंगे, ऐसा नहीं लगता क्योंकि अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जरमनी आदि भी उस के खिलाफ नहीं हैं और वे, चीन के इस सपने में अपने बेरोजगारों के लिए नए अवसर देख रहे हैं. एशिया के अंदरूनी देशों में बड़े बाजार हैं, जो आज कटे हुए हैं. वे अमीर देशों से जुड़ना चाह रहे हैं.

भारत के पास ईरान, इराक, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, बंगलादेश, म्यांमार, थाईलैंड, इंडोनेशिया, कंबोडिया, वियतनाम, मलयेशिया को जोड़ने का अवसर है पर हमारे नेता इतने अंतर्मुखी हैं कि उन्हें पूजापाठों से ही फुरसत नहीं है. उन्होंने चीन का जो विरोध किया, वह जरूरी है, पर पर्याय भी बनाना था जो बना नहीं सके.

चीन प्रति व्यक्ति आय में हर साल 500-600 अमेरिकी डौलर जोड़ रहा है, उस के नेता इस प्रगति का लाभ दूसरों से शेयर भी कर रहे हैं. भारत तो योग के निर्यात को सफल मान कर धन्य होता दिख रहा है. जिस भारत ने कभी बौद्ध धर्म के सहारे पूरे एशिया पर धाक जमाई थी उस का धर्म ही आज सब से बड़ी जंजीर बना हुआ है.

धार्मिक कारणों से ही भारत को पाकिस्तान से बैर रखना पड़ रहा है और इसी वजह से वन बैल्ट वन रोड प्रयास सिर्फ चीन का रह गया वरना यह सिल्क रोड और स्पाइस रूट सामूहिक रूप से भारत व चीन का हो सकता था और ये दोनों एशियाई देश दुनियाभर पर वैसे राज कर सकते थे जैसे इंगलैंड व अमेरिका ने किया था.

सास नहीं मां बनें

आज सुहानी जब औफिस में आई तो उखड़ीउखड़ी सी दिख रही थी. 2 वर्ष पूर्व ही उस का विवाह उसी की जाति के लड़के विवेक से हुआ था. विवाह क्या हुआ, मानो उस के पैरों में रीतिरिवाजों की बेडि़यां डाल दी गईं. यह पूजा है, इस विधि से करो. आज वह त्योहार है, मायके की नहीं, ससुराल की रस्म निभाओ. ऐसी ही बातें कर उसे रोज कुछ न कुछ अजीबोगरीब करने पर मजबूर किया जाता.

समस्या यह थी कि पढ़ीलिखी और कमाऊ बहू घर में ला कर उसे गांवों के पुराने रीतिरिवाजों में ढालने की कोशिश की जा रही थी. पहनावे से आधुनिक दिखने वाली सास असलियत में इतने पुराने विचारों की होगी, कोई सोच भी नहीं सकता था.

बेचारी सुहानी लाख कोशिश करती कि उस का अपनी सास से विवाद न हो, फिर भी किसी न किसी बहाने दोनों में खटपट हो ही जाती. सास तो ठहरी सास, कैसे बरदाश्त कर ले कि बहू पलट कर जवाब दे व उसे सहीगलत का ज्ञान कराए.

सो, बहू के बारे में वह अपने सभी रिश्तेदारों से बुराइयां करने लगी. यह सब सुहानी को बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा था. और तो और, उस के पति को भी उस की सास ने रोधो कर और सुहानी की कमियां गिना कर अपनी मुट्ठी में कर रखा था. नतीजतन, पति से भी सुहानी का रोजरोज झगड़ा होने लगा था.

हमारे आसपास में ही न जाने ऐसे कितने उदाहरण होंगे जिन में सासें अपनी बहुओं को बदनाम करती हैं और सभी रिश्तेदारों को अपने पक्ष में करने की कोशिश में सारी जिंदगी बहुओं की बुराई करने में बिता देती हैं.

एटीएम न मिलने का दुख

12 और 8 वर्षीय बेटियों की मां योगिता कहती हैं, ‘‘शादी होते ही जब मैं ससुराल गई तो मेरी सास ने तय कर रखा था कि पढ़ीलिखी बहू है, नौकरी तो करेगी ही और उस की तनख्वाह पर उन्हीं का ही हक होगा. लेकिन मेरे पति ने मुझे लेटेस्ट कंप्यूटर कोर्स करना शुरू करवा दिया. उन का कहना था कि अभी विवाह के कारण तुम अपनी पुरानी नौकरी छोड़ कर आई हो, नया कोर्स कर लोगी तो आगे भी नौकरी में फायदा रहेगा. मैं ने उन की बात मान कर कोर्स करना शुरू कर दिया.

पूरे दिन मेरी सास घर के बाहर ही रहतीं, उन्हें घूमनेफिरने का बहुत शौक है. मैं सुबह नाश्ते से ले कर रात का डिनर तक सब संभालती. उस के अलावा कंप्यूटर क्लास भी जाती और उस की पढ़ाई भी करती. घर में साफसफाई के लिए कामवाली आती थी. सास मुझे ताने दे कर कहती कि क्या जरूरत है कामवाली की, तुम नौकरी तो कर नहीं रही हो. कभी कहतीं जब नौकरी करो तो ही सलवार सूट पहनो. अभी रोज साड़ी पहना करो.

हमारी आर्थिक स्थिति उच्चमध्यवर्गीय थी. सो, मुझे समझ नहीं आया कि कामवाली और पहनावे का नौकरी से क्या ताल्लुक. लेकिन मैं ने कामवाली को नहीं हटाया. सास रोज किसी न किसी तरह मेरे काम में कमी निकाल कर उलटेसीधे ताने मारतीं. मुझे तो समझ ही न आया कि वे ये सब क्यों करती हैं.

मेरे पति से वे आएदिन अपनी विवाहित बेटी की जरूरतों को पूरा करने के लिए पैसे मांगती रहतीं. मेरे पति धीरेधीरे सब समझने लगे थे कि मम्मी की पैसों की डिमांड बढ़ती जा रही है. यदि हम अपने घर में कुछ नया सामान लाते तो वे झगड़ा करतीं और देवर के विवाह की जिम्मेदारी हमें बतातीं.

ऐसा चलते एक वर्ष बीत गया और तो और, मुझ से कहतीं, ‘अभी बच्चा पैदा मत करना.’ जबकि मेरी उम्र 29 वर्ष हो गई थी. मुझे समझ ही न आता कि यह कैसी सास है जो अपनी बहू को बच्चा पैदा करने पर रोक लगाती है.

मुझे हर बात पर टोकतीं और पति के साथ मुझे समय भी न बिताने देतीं. जैसे ही पति दफ्तर से घर आते, वे हमारे कमरे में आ कर बैठ जातीं.

एक दिन जब उन्होंने मुझे किसी बात पर टोका तो मैं ने भी पलट कर जवाब दिया. तो वे गुस्से में आगबबूला हो गईं और बोलीं, ‘‘नौकरी भी नहीं की तू ने, न जाने पढ़ीलिखी भी है कि नहीं, यदि करती तो तनख्वाह मुझे थोड़ी दे देती तू.’’

इतना सुन कर मुझे हकीकत समझते देर न लगी और मैं ने भी पलट कर कहा, ‘‘यही प्रौब्लम है न आप को, कि तनख्वाह नहीं आ रही. इसलिए घर की सारी जिम्मेदारी उठाने पर भी आप मुझे चैन से नहीं रहने देतीं. घर की कामवाली बना रखा है. माफ कीजिए आप को बहू नहीं, एटीएम मशीन चाहिए थी. वह न मिली तो आप मुझे चौबीसों घंटों की नौकरानी की तरह इस्तेमाल कर रही हैं. बेटा पूरी कमाई आप के हाथ में देदे और बहू चौबीसों घंटे आप की चाकरी करे.’’

बस, उसी दिन के बाद से उन्होंने मेरे देवरननद को मेरे खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया. रिश्तेदारों से जा कर कहने लगीं, बहू को आजादी चाहिए, इसलिए बच्चा भी पैदा नहीं करती. मेरे ससुर को भी झूठी पट्टी पढ़ा कर मेरे खिलाफ कर दिया. कल तक जो ससुर मेरे पढ़ीलिखी होने के साथ घरेलू गुणों की तारीफ करते न थकते थे, अब मुझे बांझ पुकारने लगे थे.

रोजरोज के झगड़ों से परेशान हो कर मेरे पति ने अलग घर ले लिया और किसी तरह उन से पीछा छुड़ाया. अब हम उन्हें हर महीने पैसे दे देते हैं, वे चाहे जैसे रहें. उन्हें सिर्फ पैसा चाहिए, वे न तो मेरी बेटियों से मिलना चाहती हैं और न ही मैं उन की सूरत देखना चाहती हूं. बस, मेरे पति कभीकभी उन से मां होने के नाते, मिल लेते हैं.

संयुक्त परिवार नहीं चाहिए

25 वर्षीया रीता कहती है, ‘‘मेरे विवाह के समय मेरे पति विदेश में रहते थे. सो मैं भी विवाह होते ही उन के साथ चली गई. 2 वर्षों बाद जब हम अपने देश लौट आए और सास के साथ रहे, तब 2 महीने भी मेरी सास ने मुझे चैन से न रहने दिया. सारे दिन अपनी तारीफ करतीं और मुझे नीचा दिखाने की कोशिश करतीं. सब से पहले उन्होंने कहा कि मैं जींस और वैस्टर्न कपड़े न पहनूं क्योंकि आसपास में कई रिश्तेदार रहते हैं. मैं ने उन की वह  बात मान ली. लेकिन हर बात में बेवजह टोकाटाकी देख कर ऐसा लगता जैसे उन्हें हमारा साथ में रहना नहीं भाया.

‘‘जब तक बेटा विदेश में काम कर उन्हें पैसे देता था, सब ठीक था. लेकिन जैसे ही हम यहां आए, न जाने कौन सा तूफान आ गया. वे बारबार मेरे ससुर की आड़ में मुझे ताने देतीं. मेरे ससुर सीधेसादे रिटायर्ड बुजुर्ग हैं. उन से भी वे खूब झगड़ा करतीं. मैं फिर भी चुप रहती क्योंकि मैं जानती थी कि वे ससुर से भी बेवजह झगड़ा कर रही हैं, यदि मैं बीच में कुछ बोलूंगी तो वे मुझ से झगड़ना शुरू कर देंगी.

‘‘लेकिन हद तो तब हो गई जब मैं ने एक दिन खाना बना कर परोसा और वे मेरे हाथ के बने खाने में कमी निकाल कर मुझे नीची जाति का कहने लगीं. जबकि मैं और मेरे पति एक ही ब्राह्मण जाति के हैं. तो मैं ने भी पलट कर कह दिया, ‘आप ही मुझे लेने बरात ले कर आए थे तो मैं यहां आई हूं, तब मेरी जाति नजर नहीं आई आप को?’

‘‘बस, अगली ही सुबह जैसे ही मेरे पति औफिस गए, वे कहने लगीं, ‘‘मैं ने चावल में रखी कीटनाशक गोली खा ली है.’’ पहले तो मैं समझी नहीं, लेकिन मेरे ससुर भी मुझे कोसने लगे और कहने लगे कि डाक्टर को बुलाओ. तो मैं ने अपनी पति को फोन किया. वे बोले कि मम्मी को अस्पताल ले कर जाओ. मैं उन्हें अस्पताल ले कर गई और वहां भरती करवाया.

‘‘इस बीच, मैं ने अपनी जेठानी को भी फोन कर बुला लिया था, जो उसी शहर में ही अलग रहती थीं. क्योंकि मैं जान गई थी कि वे मेरे से ज्यादा अनुभवी हैं और मैं ने यह भी सुन रखा था कि सास के बुरे व्यवहार के कारण ही वे अलग रहने लगी थीं.

‘‘मेरी जेठानी ने वहां आ कर मुझे बताया कि यह पुलिस केस बनेगा तो मैं बहुत घबरा गई और मेरी आंखों से आंसू बह निकले. तब तक मेरे पति दफ्तर से छुट्टी ले कर अस्पताल पहुंच गए, उस से पहले अस्पताल वालों ने पुलिस को खबर कर दी थी कि आत्महत्या की कोशिश का केस आया है. मेरी जेठानी ने पुलिस से बात कर मामला सुलझा दिया.

‘‘नजदीकी रिश्तेदार यह खबर सुनते ही अस्पताल में जमा हो गए. मेरे ससुर ने सभी से कहा कि सासबहू का रात को झगड़ा हुआ. सब ने सोचा कि नई बहू बहुत खराब है और मेरे पति ने भी मुझे डांटा कि मम्मी से रात को उलझने की क्या जरूरत थी. सब से बुरी बात तो यह हुई कि जब अस्पताल में टैस्ट हुए और रिपोर्ट आई तो मालूम हुआ कि उन्होंने कोई कीटनाशक गोली नहीं खाई थी. यह सब मुझे बदनाम करने के लिए किया गया एक ड्रामा था ताकि मैं आगे से उन के सामने पलट कर जवाब देने की हिम्मत ही न करूं.

‘‘आज मैं, अपने पति के साथ विदेश में ही रहती हूं. लेकिन जब भी भारत आती हूं, अपनी सास से नहीं मिलना चाहती.’’

रीता ने जब मुझे यह सब बताया तो वह आंसुओं में डूबी हुई थी और अपनी जेठानी का बहुत धन्यवाद कर रही थी. लेकिन अपनी सास के लिए उस के मन में नफरत के सिवा कुछ भी नहीं था.

सारी सासें एक सी

योगिता और रीता के किस्सों से मुझे अपनी एक चाइनीज सहेली की याद आई. उस चाइनीज सहेली का नाम है ब्रेंडा. वह शंघाई की रहने वाली थी और मलयेशिया में नौकरी करने गईर् थी. वहीं उसे एक रशियन लड़के से प्यार हो गया और दोनों ने विवाह भी कर लिया. विवाह को 6 वर्ष बीते और उस के पति का तबादला भारत में हो गया. उस का पति होटल इंडस्ट्री में कार्यरत था.

मेरी ब्रेंडा से मुलाकात हुई और हम सहेलियां बन गईं. हम दोनों अंगरेजी में ही बात किया करते थे.

3 वर्ष हम साथ रहे और उस ने मुझे अपनी सास से होने वाले झगड़ों के बारे में बताया. मैं आश्चर्यचकित थी कि क्या विदेशी सासें, जो देखने में बहुत मौडर्न लगती हैं, भी बुरा व्यवहार करती हैं? तो उस ने कहा, ‘‘यस, देयर आर सम ड्रैगन लेडीज हू कीप डूइंग समथिंग दिस ओर दैट टू स्पौयल अवर इमेज ऐंड शो देयर सैल्फ गुड’’ यानी कि कुछ महिलाएं ड्रैगन के समान बुरी होती हैं, जो अपनेआप को भली दिखाने के लिए हमारा नाम खराब करती रहती हैं. वह मुझे शंघाई और मलयेशिया की सासों के और भी बहुत किस्से सुनाया करती.

जब वह भारत में भी थी, उन 3 वर्षों में एक बार उस की रशियन सास भारत में उस के घर आईं और 2 महीने तक उस के साथ रहीं. उन दिनों ब्रेंडा रोज ही घर में सास द्वारा किए गए बुरे व्यवहार के किस्से सुनाया करती. साथ ही, उस ने यह भी बताया कि अपार्टमैंट में जो दूसरे रशियन लोग हैं, जिन से उस के पति की अच्छी दोस्ती भी है, उन से उस की सास ने उस के बारे में बहुत बुराइयां की.

उस के बाद ब्रेंडा कहती थी कि मैं अपनी मदर इन ला को भारत बुलाना ही नहीं चाहती. वे दूर रहें तो अच्छा है.

सुहानी, रीता, योगिता और ब्रेंडा सभी के किस्से सुन कर ऐसा लगता है कि यह यूनिवर्सल ट्रुथ है कि सास खाए बिना रह सकती है, पर बोले बिना नहीं.

कैसे पटेगा एकतरफा सौदा

सासबहू के रिश्ते में मधुरता की उम्मीद के साथ कोईर् भी पिता अपनी बेटी को दूसरी महिला के हाथ में सौंप देता है, जोकि उस की बेटी की मां की उम्र की होती है. इस में वह क्यों उस बहू के साथ बराबरी का कंपीटिशन बना लेती है. या यों कहिए कि देने के सिवा सिर्फ लेने का सौदा तय करना चाहती है. और यदि वह न मिले तो उसे सरेआम बदनाम करती है ताकि वह दुनिया की नजरों में अपनेआप को बेचारी साबित कर सके. क्योंकि वह एक नई लड़की के घर में कदम रखते ही घर में बरसों से चलती आई रामायण को महाभारत में बदल देती है, और सिर्फ स्वयं ही नहीं, घर के अन्य सदस्यों समेत उस पर चढ़ाई करने लगती  है?

इसी बात पर एक बार ब्रेंडा ने कहा था, ‘‘एक्चुअली, शी यूज टू बी द क्वीन औफ द हाउस, नाऊ शी कैन नौट टोलरेट एनीबडी एल्स इन द हाउस.’’ यानी कल तक सास ही घर की रानी होती थी, सारा राजपाट उसी का था, अब वह किसी और को घर में राज करते कैसे बरदाश्त करे.’’ शायद ब्रेंडा ने सही ही कहा था, लेकिन क्या इस रिश्ते में खींचातानी की जगह प्यार व मिठास नहीं भरी जा सकती?

यदि गहराई से सोचा जाए तो इस मिठास के लिए सास को राजदरबार की रानी की तरह नहीं, एक मालिन की तरह का व्यवहार करना चाहिए. जिस तरह से मालिन नर्सरी से लाए नए पौधे उगा कर, उन्हें सींच कर हरेभरे पेड़ में बदल देती है, उसी तरह से अगर सास भी पराएघर से आई बेटी को अपने घर की मिट्टी में जड़ें फैलाने के लिए खादपानी व धूप का पूरा इंतजाम कर दे तो बहूरूपी वह पौधा हराभरा हो सकेगा और निश्चित रूप से मीठे फल मिलेंगे ही.        

 

तलाक पर खुल कर बोलें बच्चों से

अकसर मातापिता तलाक लेते समय और इस प्रक्रिया के दौरान बच्चों से बातचीत करने से बचते हैं. जिस का उस पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और इस सदमे से वे कई बार ताउम्र डिस्टर्ब रहते हैं. थेरैपिस्ट, एजुकेटर और लेखक एलिसन जोंस कहती हैं कि अपने बच्चों से तलाक संबंधी बातों को न छिपाएं, उलटा उन से खुल कर बात करें. हो सकता है उस समय वह नाराज या निराश दिखें लेकिन भविष्य में मातापिता के संबंध विच्छेदन की इस पीड़ा से उबर जाएंगे.

इस विषय पर बच्चों से क्या बात करें, इस पर वे कुछ टिप्स भी देती हैं.

–       तलाक की बात करते समय माता और पिता दोनों साथ में बच्चों का सामना करें.

–       तलाक लेने की वजहों और शादी के बाद आने वाली समस्याओं को बच्चों के सामने खुल कर रखें.

–       उन को झूठी तसल्ली देने के बजाय उन्हें बताएं कि वे भी दुखी हैं.

–       तलाक के बाद बच्चे कहां रहेंगे और क्याक्या बदल जाएगा, इस पर भी उन से बातचीत करें.

–       उन की पढ़ाई, खानेपीने से ले कर स्कूल के तमाम कार्यक्रम उन से साझा करें

एलर्जी की समस्याएं

एलर्जी को ले कर आम लोगों को सटीक जानकारी न होने के चलते गलतफहमियां हो जाती हैं. ये गलतफहमियां बाद में स्वास्थ्य के लिए खतरा तक बन जाती हैं. इंडियन मैडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डा. के के अग्रवाल से जानिए एलर्जी से जुड़ी समस्याओं के सटीक जवाब.

मैं अकसर धूप में निकलने से बचती हूं. जब भी निकलती हूं, मेरी त्वचा में जलन सी होने लगती है. अचानक त्वचा पर लाल चकत्ते से पड़ने लगते हैं. क्या करना चाहिए?

हो सकता है कि आप की त्वचा प्रकाश के प्रति अधिक संवेदनशील हो. ऐसी समस्या होने पर, पराबैगनी विकिरण या दृश्य प्रकाश की उपस्थिति में त्वचा प्रतिक्रिया कर बैठती है. बाह्य या आंतरिक कारकों के आधार पर इस समस्या

को इडियोपैथिक फोटोडर्मेटोसिस या फोटोडर्मेटोसिस 2 प्रमुख श्रेणियों में बांटा जा सकता है. इस की कुछ अन्य श्रेण्यिं हैं– फोटोएक्सेसरबैटेड डर्मेटोसिस व फोटोसैंसिटिव जैनोडर्मेटोसिस. इस से बचाव के लिए आप धूप में निकलने से बचिए और जाना ही पड़े तब एंटीएलर्जिक दवा लें. इस के लिए आप को त्वचा विशेषज्ञ से परामर्श भी लेना चाहिए.

*

मैं 21 वर्षीय कालेज स्टूडैंट हूं. पिछले कुछ सप्ताह से घर से बाहर निकलने पर मेरी आंखों में जलन होने लगती है और वे लाल हो जाती हैं. धूप का चश्मा लगाने और आंखें नियमित रूप से धोने के बाद भी समस्या बनी हुई है. इस से छुटकारा कैसे पाऊं?

जो लक्षण आप ने बताए हैं, उस के हिसाब से तो यह आंखों की एलर्जी है. इसे एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस भी कहते हैं. यह एलर्जी तब सक्रिय होती है जब कोई जलन पैदा करने वाला तत्त्व आंखों के संपर्क में आता है. ऐसे तत्त्वों को एलर्जन कहते हैं, और जब शरीर इन के खिलाफ प्रतिक्रिया करता है, तब एलर्जी महसूस होती है. अपने नेत्रों को साफ पानी से नियमित रूप से धोएं. यदि समस्या फिर भी बनी रहे तब कोई एंटीएलर्जी गोली लीजिए. अपने साथ एक नरम और गीला कपड़ा ले कर

बाहर निकलें.

*

मुझे 6 माह का गर्भ है और मुझे परागकणों से एलर्जी है. क्या एलर्जी की यह समस्या मेरे शिशु को भी हो सकती है?

सभी एलर्जी मां से शिशु तक नहीं पहुंचती हैं. कुछ शिशुओं को एलर्जी हो सकती है, भले ही उन के परिवार में अन्य किसी को न हो.

*

मेरे घर पर एक कुत्ता है. कई बार उस के साथ खेलने से मुझे छींकें आने लगती हैं या गले में घरघराहट सी महसूस होती है. उसे छूने के बाद मैं हाथ भी धो लेता हूं, पर कोई फर्क नहीं पड़ता. हम अपने कुत्ते को प्रतिदिन नहलाते हैं और उस की साफसफाई का भी पूरा ध्यान रखते हैं. मैं उस के बिना नहीं रह सकता, क्या करूं?

अस्थमा या नाक में एलर्जी की समस्या वाले बच्चों एवं युवाओं में एलर्जन सांस में चले जाने से तत्काल प्रतिक्रिया होती है. घर के अंदर मौजूद एलर्जन्स, जैसे कि धूल में रहने वाले कीटाणु, बिल्ली, कुत्ते या काकरोच के साथ कुछ अन्य एलर्जीकारक तत्त्व अस्थमापीडि़तों को बहुत समस्या पैदा करते हैं.

जिन घरों में पालतू जानवर न हों, वहां अत्यधिक स्वच्छता रख कर और रूम एयर क्लीनर का प्रयोग कर के पशुओं से होने वाली एलर्जी को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. परंतु घर में यदि जानवर मौजूद हों, तो फिर साफसफाई का भी कोई असर नहीं होता है.

*

मेरी बेटी 1 साल की है और हाल ही में मैं ने उस की खुराक में अंडे शामिल किए हैं. लेकिन, 2 बार ऐसा हुआ है कि जबजब मैं ने उसे अंडा खाने में दिया, उस की त्वचा पर चकत्ते उभर आए. क्या उसे अंडे से एलर्जी है?

शिशुओं और छोटे बच्चों में दूध के बाद सब से ज्यादा एलर्जी अगर किसी अन्य भोज्य पदार्थ से होती है तो वह है मुर्गी का अंडा. एलर्जी का संदेह होने पर तत्काल वह भोज्य पदार्थ बच्चे की खुराक से हटा देना चाहिए. हालांकि, बच्चे के लिए अंडा एक संपूर्ण आहार माना जाता है.

बेकरी उत्पादों, डबल रोटी, क्रीम फिलिंग, कस्टर्ड, कैंडी, डब्बाबंद सूप, कैसरोल्स, फ्रौस्ंिटग, आइसक्रीम, लौलीपौप, मार्शमैलो, मार्जिपैन, पास्ता, सलाद ड्रैसिंग्स, मांस आधारित भोजन जैसे कि मीट बौल्स या मीट लोफ आदि में अंडा एक आवश्यक सामग्री के रूप में मौजूद रहता है. कई अध्ययनों में पाया गया है कि 66 से 88 प्रतिशत ऐग एलर्जी वाले लोग अत्यधिक गरम किए या बैक्ड एग उत्पादों की एलर्जी को बरदाश्त कर जाते हैं.

*

सुबह उठने के बाद मुझे बारबार छींकें आती हैं. ऐसा अकसर 2 घंटे तक चलता है और यह बहुत परेशान करने वाली बात है. इस के बाद मैं पूरे दिन एकदम ठीक रहता हूं. सुबह को ही ऐसा क्यों होता है?

चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से देखें तो इस के कई कारण हो सकते हैं. एलर्जी पैदा करने वाले संभावित कारणों से अपनेआप को दूर रख सकते हैं. अन्यथा, आप को प्रतिदिन एक एंटीएलर्जी टैबलेट लेनी पड़ सकती है. सौंफ के बीज अच्छे एंटीऔक्सीडैंट होते हैं और आप इन का लाभ हर्बल टी का सेवन कर के ले सकते हैं. सौंफ वाली चाय एलर्जी को रोकती है. भाप को सांस में अंदर खींच कर भी आप इस समस्या से कुछ हद तक छुटकारा पा सकते हैं.        

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें