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चीन में प्रदर्शित होगी ‘ट्यूबलाइट’!

जब से आमिर खान की फिल्म ‘‘दंगल’’ ने चीन में जबरदस्त सफलता बटोरी है, तब से भारतीय फिल्मकारों की निगाहें चीन पर टिक गयी हैं. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि भारत चीन युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘‘ट्यूबलाइट’’ चीन में प्रदर्शित होगी या नहीं? बहरहाल, सलमान खान भी चाहते हैं कि उनकी फिल्म ‘‘ट्यूबलाइट’’ चीन में प्रदर्शित हो.

जब फिल्म ‘‘ट्यूबलाइट’’ के ही संदर्भ में सलमान खान से मुलाकात हुई, तो हमने उनसे पूछा कि ‘ट्यूबलाइट’ को वह चीन में प्रदर्शित करना चाहेंगे? इस सवाल पर सलमान खान ने कहा, ‘‘जी हां! हम चाहते हैं. इसके लिए बातचीत जारी है. चीन का बाजार बड़े स्तर पर भारतीय फिल्मों के लिए खुला है. पर चीन का सिस्टम बहुत अलग है. वहां पर गैर चीनी यानी कि विदेशी फिल्में ज्यादा प्रदर्शित नहीं होती. हर वर्ष 34-35 फिल्में ही प्रदर्शित हो सकती हैं. इसी के चलते हम अपने देश में पहले फिल्म प्रदर्शित करते हैं, उसके बाद चीन में प्रदर्शित करते हैं. इसके अलावा चीन में यह सिस्टम है कि बॉक्स ऑफिस कलेक्शन का एक बड़ा हिस्सा वहां की सरकार ले जाती है, उसके बाद के हिस्से में से निर्माता और वितरक को हिस्सा मिलता है. पर वहां बाजार बड़ा है. करीबन 25 हजार सिनेमाघर हैं. ऐसे में वहां पर फिल्म का प्रदर्शित होना लाभ ही देता है.’’

तलाक के बाद परेशान लोगों की दास्तान

भरतपुर, राजस्थान के रहने वाले ओमी पटवारी अपनी पटवारी की नौकरी के समय में ही जयपुर में रहने लगे थे. जब उन का एकलौता बेटा अजय शादी के लायक हुआ, तो उन के साले की पत्नी रतन देवी ने उन्हें सीकर में रहने वाले महावीर राम की बड़ी बेटी मोना दिखाई. महावीर राम रोज कमा कर खाने वाले गरीब आदमी थे, लेकिन उन की बेटी मोना उन्हें पसंद आ गई. ओमी पटवारी ने बगैर दहेज लिए ही उन की बेटी से शादी कर दी थी.

मोना ने शादी के कुछ दिन बाद ही ससुराल में अपनी मनमानी शुरू कर दी. मोना और उस के पिता महावीर राम ने ओमी पटवारी और उन के परिवार के लोगों की इस भलमनसाहत को उन की कमजोरी समझ लिया. महावीर राम ने भी ओमी पटवारी के सामने अपनी मनमानी शर्तें रखनी शुरू कर दीं. जब उन्होंने इन की शर्तों को मानने से इनकार कर दिया, तो महावीर राम ने उन पर दहेज के लिए अपनी बेटी को परेशान करने का मामला पुलिस में दर्ज कराने की धमकी देना शुरू कर दिया.

महावीर राम की ये बातें जब उन के छोटे भाइयों और रिश्तेदारों ने सुनीं, तो उन्होंने उन्हें खूब समझाया कि ओमी पटवारी जैसे सज्जन रिश्तेदार के साथ ऐसा सुलूक न करें. लेकिन महावीर राम ने उन की इन बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया. उन्होंने ओमी पटवारी से मुंहमांगा पैसा ले कर आपसी रजामंदी के आधार पर उन के बेटे से अपनी बेटी का तलाक करा दिया. तलाक लेने के बाद महावीर राम अपने रिश्तेदारों और समाज में ऐसे बदनाम हुए कि न तो उन की उस तलाकशुदा बेटी का कहीं कोई रिश्ता हो पाया है और न ही उन के छोटे बेटे और बेटी का रिश्ता हो पाया, जबकि उन के तीनों छोटे भाइयों के सभी बच्चों की शादी हो चुकी है.

जब महावीर राम अपने तीनों छोटे भाइयों के बच्चों की शादी के बाद उन के बच्चों को मांबाप बनते हुए देखते हैं, तो अपनी बेटी मोना के तलाक की भूल पर दुखी होने लगते हैं. इस दुख से वे बीमार रहने लगे हैं. वे अब सभी लोगों से यही कहने लगे हैं कि शादी के बाद बेटी को उस की ससुराल में दुख मिले या सुख, उसे ससुराल में ही रह कर अपनी शादीशुदा जिंदगी बितानी चाहिए. तलाक लेने के बाद बेटी की जिंदगी बरबाद हो जाती है, फिर कहीं पर आसानी से उस की शादी नहीं हो पाती है. लोग उस पर तरहतरह के आरोप लगाने लगते हैं, जिस के चलते उस के छोटे भाईबहनों की भी शादी नहीं हो पाती है. आगरा, उत्तर प्रदेश की 23 साला फिल्म हीरोइन जैसी भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने वाली शालिनी की शादी 2 साल पहले जयपुर के प्रताप नगर हाउसिंग बोर्ड में रहने वाले एक खातेपीते घर के बेटे प्रदीप से हुई थी.

शादी के कुछ दिन बाद ही आगरा से शालिनी के बौयफ्रैंड भी उस की ससुराल में उस से मिलने आने लगे थे. ससुराल के लोग जब उन के बारे में शालिनी से पूछते, तो वह उन के बारे में उन से यही कहती थी कि वे रिश्ते के भाई हैं.

शालिनी के इस जवाब को सुन कर ससुराल वालों को उन के आने पर कोई एतराज नहीं होता था, लेकिन एक दिन जब शालिनी की 20 साला ननद नेहा ने शालिनी के कमरे की खिड़कियों के परदे में से उसे अपने एक तथाकथित भाई के साथ बिस्तर पर नाजायज संबंध बनाते देखा, तो उस ने चुपके से यह सब अपनी मां प्रतिभा को भी दिखा दिया. कई घंटों के बाद जब शालिनी का वह रिश्तेदार भाई वहां से गया, तो उस की सास प्रतिभा ने उसे खूब फटकारा. अपनी सास की इस फटकार पर शर्मिंदा होने के बजाय वह उन से बोली, ‘‘यह सब तो आजकल चलता रहता है. आप की बेटी भी तो अपने बौयफ्रैंड के साथ इस तरह की मौजमस्ती करती होगी?’’

अपनी बहू की इस बात को सुन कर सास प्रतिभा ने उस से कुछ कहना मुनासिब नहीं समझा. शाम को जब प्रदीप घर आया, तो उन्होंने अपनी बहू की इन बातों को उसे बताया, तो उस ने शालिनी की खूब पिटाई की.

अपने पति से मार खाने के बाद शालिनी उसी दिन उन से नाराज हो कर अपने मायके आगरा चली गई. वहां जा कर शालिनी ने अपने मांबाप को बताया कि उस का पति उस से देह धंधा कराना चाहता है. इस बारे में जब वह अपने सासससुर से कहती है, तब वे लोग भी उसे अपने बेटे की बात मानने को कहते हैं. अपनी बेटी के इस आरोप को सच मान कर शालिनी के मांबाप ने उस की ससुराल के लोगों को दहेज के लिए उन की बेटी को परेशान करने व उसे देह धंधा करवाने को मजबूर करने का आरोप लगा कर उन के खिलाफ केस करने की धमकी दी, तो उन्होंने उन्हें उन की बेटी की करनी के बारे में बताया. लेकिन वे लोग अपनी बेटी को गलत मानने को तैयार नहीं हुए. तब प्रदीप ने उन्हें मुंहमांगा पैसा दे कर शालिनी से तलाक लेने में ही अपनी भलाई समझी.

तलाक के बाद शालिनी अपने दोस्तों के साथ मौजमस्ती करने लगी. वह उन के साथ होटलों में भी जाने लगी. एक बार जब वह पुलिस के छापे में पकड़ी गई, तब उस के घर वाले जान पाए थे कि उस की ससुराल वाले उस पर जो आरोप लगा रहे थे, वे सही थे, लेकिन उन्होंने उस समय उन्हें गलत समझ कर उन पर ही आरोप लगा कर उस का तलाक करा दिया.

जेल से लौटने के बाद शालिनी को उस के घर वालों ने भी अपने पास रखने से इनकार कर दिया. अब शालिनी अपने उन दोस्तों से भी परेशान हो चुकी है, क्योंकि वे उस के साथ मौजमस्ती तो करना चाहते हैं, मगर कोई उसे बीवी नहीं बनाना चाहता.

लड़कियों को शादी के बाद ससुराल वालों को मानसम्मान दे कर अपनी जिंदगी बितानी चाहिए. जराजरा सी बातों पर नाराज हो कर तलाक की कार्यवाही कर के अपने पति से अलग होने से उन की भी बदनामी होती है.              

शाकाहारी बन गई हैं सनी लियॉन

क्या आप ये बात जानते हैं कि ‘पोर्न स्टार’ से बॉलीवुड में अपनी जगह बना चुकी हॉट और ग्लैमरस अभिनेत्री सनी लिओन अब वेजिटेरियन हो चुकी हैं. पिछले साल के अक्टूबर महीने से, वे पूरी तरह शाकाहारी बन चुकी हैं और अब ‘पीपल फॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स’, यानि ‘पेटा’ के साथ जुड़ चुकी हैं.

'विश्व पर्यावरण दिवस' पर यानि कि 5 जून को उन्होंने एक पोस्टर ‘स्पाइस अप योर लाइफ गो वेजिटेरियन’ का अनावरण किया और कहा कि मुझे कोई समस्या नहीं है कि मैंने नॉनवेज छोड़ दिया है, मैं पंजाबी परिवार से हूं और मैंने बचपन से ही कई प्रकार के शाकाहारी व्यंजन खाए हैं. मैं जब एनिमल स्लॉटर देखती हूँ तो बहुत दुःख होता है. स्लॉटर हाउस से प्लेट तक पहुँचने में उनकी पीड़ा को मैंने महसूस किया है. उन्हें भी जीने का हक है, हम उन्हें मारकर पृथ्वी के पर्यावरण बैलेंस को बिगाड़ रहे है.

इतना ही नहीं कई बार मैंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो में देखा है कि कैसे लोग जानवरों को यातना देते है और इसे देखकर वे खुश होते है. मुझे बड़ा ताज्जुब होता है कि आखिर वे ऐसा कैसे करते है? ऐसे लोग ही आगे चलकर कठोर अपराधी बन जाते है. मैं सोच नहीं सकती कि कैसे कोई मनुष्य ऐसा बन सकता है. इसलिए मैंने ये संकल्प लिया है.

सनी के हिसाब से शाकाहारी व्यंजन से व्यक्ति अधिक खुश और तनाव मुक्त रह सकता है. वह कहती है कि मैंने देखा है कि शाकाहारी बनने से मेरी लाइफस्टाइल और स्वास्थ्य दोनों अच्छे हो गए है. मैं पहले से अधिक उर्जावान महसूस करती हूं. ये सही है कि मांसाहारी व्यक्ति का शाकाहारी बनना मुश्किल होता है, लेकिन भारत में कई तरह की सब्जियां पायी जाती हैं. ऐसे में मुझे नॉनवेज छोड़ने में कोई मुश्किल नहीं हुई और ये बहुत ही आसान था. अब तो मुझे अमेरिका जाने पर अधिक समस्या आती है. वहा भी मैं इंडियन फूड खोजती हूं.

ये सही नहीं कि शाकाहारी होने से आप में विटामिन और मिनरल्स की कमी होती है. मैं अपनी डाइट में सोयाबीन्स और टोफू अधिक लेती हूं, ताकि मेरे शरीर में प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा में कोई कमी न हो. अपने वजन को सही रखने के लिए में अधिक क्रीम और वसायुक्त खाना नहीं खाना चाहती. शाकाहारी व्यंजन मेरे लिए सबसे बेस्ट आप्शन होता है और मैं गर्मियों के मौसम में अधिक तरल पदार्थ का सेवन करती हूं.

सनी लियॉन अपनी प्रतिज्ञा पर अटल हैं और इस अवसर पर सभी से कहना चाहती है कि आप शाकाहारी बने और जीवों को जीने दे. हम आप को बता दें कि सनी इससे पहले भी स्ट्रीट डॉग्स और कैट्स को सहारा देने के लिए एक कैम्पेन में शामिल हुयी थी, जिसमें उन्होंने ये अनुरोध किया था कि डॉग्स और कैट्स को ‘स्टरलाईज’ करवा दें, ताकि बर्थ पर कंट्रोल किया जा सके और उन्हें कई बिमारियों से भी बचाया जा सकें.

दलितों से खानेपीने में भी भेदभाव

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने इस बार न के बराबर प्रचार किया था, लेकिन जितना किया उस में अपनी जिंदगी से ताल्लुक रखती एक अहम बात यह बताई थी कि राजनीति के शुरुआती दिनों में जब वे गांवगांव घूमते मुचैराह गांव पहुंचे थे, तो वहां उन्होंने छोटी जाति वालों का दिया गुड़ खा लिया था. इस पर उन के गांव वालों ने उन का और उन के परिवार का बहिष्कार कर दिया था. बाद में ग्राम प्रधान की दखलअंदाजी के चलते मामला आयागया हो गया था.

यह दीगर बात है कि मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री रहते कभी इस अहम वाकिए का जिक्र नहीं किया, लेकिन तकरीबन 40 साल बाद गांवदेहातों और एक हद तक शहरों से भी इस तरह

की छुआछूत बंद हो गई है, यह न तो मुलायम सिंह यादव कह सकते हैं और न ही बसपा प्रमुख मायावती ही दावा कर सकती हैं, फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तो किसी तरह की उम्मीद करना ही बेकार है.

दरअसल, जातिगत छुआछूत व भेदभाव और जोरजुल्म धर्म की देन हैं. नेता तो इस के तवे पर अपनी रोटियां सेंकते हैं. साल 2016 में नेताओं में तो होड़ सी लग गई थी कि कौन दलितों के घर जा कर ज्यादा से ज्यादा खाना खाता है. इस में भी खास मुकाबला भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बीच था. दोनों ने ही दलितों के घर जा कर खाना खाया था और यह जताने की कोशिश की थी कि वे ही दलितों के सच्चे हमदर्द हैं.

दलितों के घर जा कर उन की औरतों के हाथ का बना खाना खा कर की जाने वाली सियासत इस लिहाज भी गौर करने के काबिल है कि ऊंची जाति वाले नेता ही दलितों के घर गए.

दूसरी बात यह कि आज भी गांवदेहातों में दलितों के साथ दूसरी ज्यादतियों के साथसाथ खानेपीने में भी भेदभाव किया जाता है, जिस से उन में उन के दलित यानी शूद्र और पिछले जन्म के पापी होने का डर भरा रहे.

मायावती, रामविलास पासवान या कोई और दलित नेता किसी दलित के घर जा कर खाना खाता, तो ज्यादा तो क्या तनिक भी हल्ला नहीं मचता.

दूसरे लफ्जों में कहें, तो हल्ला इसलिए मचता है कि ऊंची जाति वाले नेता दलितों के घर जा कर खाना खाते हैं यानी उन पर एहसान करते हैं. ठीक वैसे ही जैसे राम ने एक दलित औरत शबरी के दिए जूठे बेर खा कर उस पर एहसान किया था.

हो जाता है धर्म भ्रष्ट

दलित के घर गुड़ खाने पर मुलायम सिंह यादव के परिवार का बहिष्कार सैफई गांव में हुआ था, यह बात कतई हैरानी की नहीं है. ऐसा आज भी इफरात से होता है कि दलित के घर खाना तो दूर की बात है, ऊंची जाति वाले उन के सामने पड़ने से भी कतराते हैं, क्योंकि धार्मिक किताबों में लिखा है कि सुबहसुबह उन का चेहरा देखने से धर्म भ्रष्ट हो जाता है.

मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में एक महल्ला है, जिस का नाम साहू महल्ला है. अब से तकरीबन 20 साल पहले तक इस बड़े शहर के लोग सुबहसुबह इस महल्ले से हो कर नहीं गुजरते थे, क्योंकि सुबह साहू यानी तेलियों का चेहरा देखने से दिन अच्छा नहीं गुजरता, यह माना जाता है. साहू या तेली जाति पूरी तरह से अछूतों की जमात में नहीं आती है, बल्कि उस की गिनती पिछड़े तबके में होती है.

आज उसी जबलपुर समेत देशभर के लोग सुबहसुबह जब टैलीविजन देखते हैं, तो उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा देखने में परहेज नहीं होता, उलटे देशभर में लोग उन के पैर पड़ते हैं.

हालांकि लोगों के दिलोदिमाग में बैठी छुआछूत की हकीकत केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान ही यह कहते हुए बताई थी कि चूंकि वे छोटी जाति के हैं और प्रधानमंत्री बन गए हैं, तो कइयों को यह नागवार गुजरता है.

इधर देहातों में आलम यह है कि अगर कोई दलित सामने पड़ जाए, तो ऊंची जाति वाले नाकभौं सिकोड़ लेते हैं. हर गांव में बिजली और सड़क आ जाने के बाद भी दलित महल्ले अलग हैं, क्योंकि दलितों को ऊंची जाति वालों के बराबर रहने का हक आज भी नहीं है.

विदिशा के पास के एक गांव ढोलखेड़ी में अब एक ही ब्राह्मण परिवार बचा है, जिस के एक नौजवान का कहना है कि आज भी उस के पिता या चाचा को मजबूरी में अगर दलित महल्ले से हो कर गुजरना पड़ता है, तो वे घर आ कर नहाते हैं.

इस नौजवान के मुताबिक, जब ऊंची जाति वालों के यहां तेरहवीं होती है, तो छोटी जाति वालों को पूजापाठ की जगह से बहुत दूर बैठा कर खाना खिलाया जाता है, जिस से भगवान का और ऊंची जाति वालों का धर्म भ्रष्ट न हो.

दलितों को खाना तो अलग दूर बैठा कर खिलाया ही जाता है, पर इस पर भी शर्त यह है कि दलित अपने बरतन अलग से लाएं, जिस से उन के जूठे बरतन धोने का पाप ऊंची जाति वालों को न लगे.

गांवों में तेरहवीं में पूरे गांव को न्योता देना आम बात है, जिस में छुआछूत की नुमाइश खुलेआम होती है. अपने बराबरी वालों को तंबू में बैठाया जाता है, पर दलितों को दूर रखा जाता है.

दलित क्यों ऊंची जाति वालों के यहां तेरहवीं में खाना खाने जाते हैं, यह हालांकि अलग बहस की बात है, पर भोपाल के नजदीक बैरसिया के रहने वाले एक दलित मंशाराम की मानें, तो यह रिवाज पीढि़यों से चला आ रहा है. अगर वे उन के यहां न जाएं, तो उन पर और ज्यादा जुल्म ढाए जाते हैं.

बात अजीब है, पर है सच कि जिस के पीछे मंशा यह है कि दलितों को बेइज्जत करने और उन्हें उन के दलितपन का एहसास कराने का कोई मौका ऊंची जाति वाले नहीं छोड़ते.

तेरहवीं में तो बुलाते हैं, पर यही ऊंची जाति वाले शादीब्याह में दलितों को आमतौर पर नहीं बुलाते, क्योंकि यह शुभ और मांगलिक काम होता है.

दलित अगर महंगी शादी करें, तो भी आएदिन बवाल मचने की खबरें देशभर से आती रहती हैं. दलित दूल्हों के घोड़ी पर चढ़ने को ले कर हर कहीं उन्हें मारापीटा जाता है और डरायाधमकाया भी जाता है.

फर्क सियासत और धर्म में

धर्म के नाम पर दलितों पर जोरजुल्म करने की बीमारी कभी दूर होगी, ऐसा लग नहीं रहा. इस की वजह सियासत कम धर्म ही ज्यादा है.

नामी नेता दलितों के घर जा कर खाना खाते हैं, उन की मंशा भले ही सियासत की हो, पर कभी किसी शंकराचार्य या धर्मगुरु ने क्यों इस तरह की सुर्खियां बटोरने की कोशिश नहीं की?

इस सवाल का जवाब साफ है कि ऐसे लोग ही छुआछूत, भेदभाव और जातिगत अत्याचार बनाए रखना चाहते हैं. अगर वे भी नेताओं की तरह दिखावे के लिए ही सही दलितों के यहां खाना खाने लगेंगे, तो पंडों की दुकानें बंद हो जाएंगी, जो धर्म के नाम पर ही चलती हैं.

अमित शाह या राहुल गांधी के दलितों के घर खाना खाने पर मायावती तिलमिला कर कहती हैं कि खाना खाने के बाद वे घर जा कर नहाए थे, तो यह इलजाम सियासी हो सकता है, लेकिन हकीकत में मायावती एक सच भी कह रही होती हैं कि अभी भी सवर्ण किस हद तक दलितों से बैर रखते हैं.

यह वह दौर है, जब भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दलित होने के माने बदलने की कोशिश, जिसे साजिश कहना बेहतर होगा, रच रहे हैं कि पैसे वाले दलितों को ऊंची जाति का मान लिया जाए. इस से हिंदुओं की तादाद भी बढ़ेगी और पंडों को अच्छीखासी दक्षिणा भी मिलेगी.

इन की मंशा अगर वाकई समाज और देश से छुआछूत और जातिगत भेदभाव मिटाने की होती, तो ये पहले भीमराव अंबेडकर की तर्ज पर धार्मिक किताबें जलाने की बात करते, क्योंकि आदमी को आदमी न मानने का रोग आया तो इन्हीं किताबों से है.

दरअसल, भगवा ब्रिगेड को एक बड़ा डर यह सता रहा है कि अगर पढ़ेलिखे और पैसे वाले दलितों को वक्त रहते अपने पाले में नहीं लाया गया, तो ये लोग ऊंची जाति वालों को ही अछूत बना कर अपना एक अलग समाज बना लेंगे.

इस वजह से ऊंची जाति वाले अछूत और अल्पसंख्यक हो जाएंगे यानी इनसानियत या धर्म नहीं, बल्कि अलगथलग पड़ जाने का डर और दक्षिणा का लालच अब ऊंची जाति वालों को मजबूर कर रहा है कि वे अपना मन मारते हुए कुछ दलितों का हाथ थामें, लेकिन ऐसा सच में नहीं हो रहा है, बल्कि दिखावे के लिए ज्यादा हो रहा है, क्योंकि हजारों सालों से ऊंची जाति वाला होने का गरूर दूर होने में भी हजारों साल लग जाएंगे, इसलिए कुछ फीसदी पैसे वाले दलितों को घेरा जा रहा है, जिस से गरीब दलितों को लतियाया जा सके.  

क्यों आगे बढ़ाई गई जीएसटी बिल लागू करने की तारीख?

भारत के केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कल यानि कि 5 जून, सोमवार को कहा कि वस्तु एवं सेवा कर या जीएसटी को 1 जुलाई से इसे लागू करने की तिथि को आगे बढ़ाने का कोई कारण नहीं है. यह एक सरल अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था है. जेटली ने एक मीडिया चैनल से बात करते हुए कहा कि, "इस संबंध में सभी प्रक्रियात्मक मामलों में निर्णय लिए जा चुके हैं, तेजी से पंजीकरण की प्रक्रिया चल रही है. ऐसे में, मैं इसे एक जुलाई से लागू करने के लक्ष्य को पूरा नहीं करने का कोई कारण नहीं देखता हूं."

पश्चिम बंगाल के वित्तमंत्री अमित मित्रा ने एक जुलाई से जीएसटी लागू करने की व्यावहारिकता पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि वस्तु एवं सेवा कर नेटवर्क (जीएसटीएन) अभी पूरी तरह से तैयार नहीं है. हालांकि जेटली ने कहा कि दूसरे राज्यों के वित्तमंत्री मित्रा की राय से सहमत नहीं हैं.

11 जून को परिषद की अगली बैठक में कर दरों में बदलाव के लिए मिले विभिन्न अनुरोधों और सुझावों पर विचार किया जाएगा. जीएसटी का विकास दर पर किसी नकारात्मक असर से इनकार करते हुए अरुण जेटली ने कहा कि शुरुआत में इसे लागू करने के दौरान कुछ परेशानियां आ सकती हैं, लेकिन वास्तव में तो इससे निर्धारित आधार और कर आधार में बढ़ोतरी होगी. जीएसटी परिषद ने सभी वस्तुओं और सेवाओं की करों की दरों का निर्धारण कर लिया है.

जेटली के अनुसार जीएसटी के अंतर्गत सभी चीजों पर एक समान कर व्यावहारिक नहीं है. लक्जरी, सिन उत्पाद और खाद्य पदार्थ सभी को एक ही दर की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि , "यह असली प्रणाली है और जटिल नहीं है. हमने आम आदमी के इस्तेमाल के सभी खाद्य पदार्थो पर करों की दर शून्य रखी है."

अश्विन ने खोला राज, वीरू को पसंद नहीं थी टीम मीटिंग

पूर्व भारतीय खिलाड़ी वीरेंद्र सहवाग खेल के अपने अलग ही अंदाज के लिए जाने जाते थें. टीम चाहे कैसी भी स्थिति में हो, वीरू हमेशा ही तेज रन बनाते थें और धुआंधार शुरुआत देते थें. अब सहवाग के बारे में एक और खुलासा हुआ है.

भारतीय स्पिनर रवि. अश्विन ने एक कार्यक्रम के दौरान बताया कि सहवाग को टीम मीटिंग बिल्कुल भी पसंद नहीं थी, बल्कि एक बार उन्होंने मीटिंग में कुछ ऐसा कहा कि हर कोई चौंक गया. अश्विन ने स्टैंड अप कमीडियन विक्रम के शो 'What the duck 2' के पहले एपिसोड के लिए शूटिंग करते हुए विक्रम से ही यह बात कही.

2011 विश्वकप का एक किस्सा बताते हुए अश्विन ने कहा, सहवाग कभी भी टीम मीटिंग को पसंद नहीं करते थे और न ही कभी वह उस तरह खेलना चाहते थें जैसा टीम चाहती थी. उन्हें किसी रणनीति के तहत खेलना पसंद नहीं था.

2011 में एक बार टीम मीटिंग से पहले सहवाग ने कोच (गैरी कर्स्टन) से कहा था कि मीटिंग में उन्हें कुछ कहना है. सब उम्मीद कर रहे थे कि सहवाग शायद मैच की रणनीति के बारे में कुछ कहेंगे लेकिन सहवाग ने क्रिकेट से हटकर एक्स्ट्रा पास की बात की.

सहवाग ने कहा कि हर प्लेयर को छह पास मिलने चाहिए जबकि सिर्फ तीन ही मिलते हैं. सहवाग ने यह भी कहा कि टॉस होने से पहले सभी खिलाड़ियों से पास मिलने चाहिए. उन्होंने बिना पास मिले मैच न खेलने की धमकी भी दी.

अश्विन ने आगे कहा, 'सिर्फ दो मिनट की मीटिंग में भी सहवाग अक्सर हिस्सा लेना पसंद नहीं करते थे. इस मीटिंग में कोच कुछ कहते थे, उसके बाद कैप्टन धोनी एक दो बातें कहते थे.'

जानिए क्या छुपा है किसी और की फोन गैलरी में!

आजकल लगभग सभी मोबाइल उपयोग करने वाले लोग स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं. इस फोन में हमारा लगभग पूरा पर्सनल डेटा होता है, जिसमें तस्वीरें और वीडियो, चैट्स और ऑडियो मौजूद होते हैं. इसे सुरक्षित रखने के लिए सभी फोन्स और उपयोगकर्ता लॉक का यूज करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस लॉक को एक सिंपल ट्रिक के जरिए खोला जा सकता है. अगर आपको हमारी बात पर यकीन नहीं है, तो आप खुद ये ट्रिक ट्राय कर सकते हैं..

तो जानिए कैसे अनलॉक करें फोटो गैलरी –

1. ये ट्रिक हर तरह के ऐप लॉक पर काम करती है. इसके लिए सबसे पहले फोन की सेटिंग्स में जाएं और ऐप्स पर टैप करें.

2. जब फोन की स्क्रीन पर ऐप की लिस्ट ओपन हो जाएगी, तब ऐप लॉक वाले ऐप पर टैप करें. ऐसा करते ही आपके फोन में ऐप लॉक या CM Security जो भी ऐप हो, उस पर क्लिक करें.

3. इसके बाद आपके सामने एक विंडो ओपन होगी, जिसमें ऐप का वर्जन, अनइंस्टॉल समेत कई ऑप्शन दिए गए होंगे. इसमें आप FORCE STOP पर टैप कर दें.

4. अब आपके फोन स्क्रीन पर एक मैसेज आएगा, जिसे आपको OK करना है. जैसे ही यह ऐप बंद हो जाएगी और आपके फोन में लगे सारे ऐप लॉक्स भी बंद हो जाएंगे और आप आराम से किसी के भी फोन की गैलरी में जाकर तस्वीरें और वीडियो देख सकते हैं.

5. यहां हम आपको बता देना चाहते हैं कि ये ट्रिक तभी काम करेगी, जब उस यूजर के फोन के होम स्क्रीन में लॉक और सेटिंग्स लॉक न हो. इस ट्रिक का इस्तेमाल आप ऐप लॉक का पैटर्न भूल जाने पर भी कर सकते हैं.

हर फिल्म ‘बाहुबली’ या ‘जंगल बुक’ नहीं हो सकती : रितेश देशमुख

बहुमुखी प्रतिभा के धनी रितेश देशमुख अपने पिता स्व.विलासराव देशमुख की ही तरह हमेषशा शांत और धैर्य रखने वाले इंसान हैं. फर्क इतना है कि उनके पिता राजनीति में थे और वे अभिनेता हैं. रितेश देशमुख ने फिल्म ‘‘तुझे मेरी कसम’’ से साल 2003 में अपने अभिनय करियर की शुरूआत की थी. चौदह सालों के अभिनय करियर में उनकी पहचान हास्य फिल्मों तक ही सीमित होकर रह गयी है, जबकि मराठी में वे अलग तरह की सिनेमा बना रहे हैं. इन दिनों वह फिल्म ‘‘बैंक चोर’’ को लेकर चर्चा में आए हैं. उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश :

आप अपने करियर को किस मुकाम पर पाते हैं?

– मैं इस तरह से कभी सोचता ही नहीं. मैं तो हमेशा काम करने में यकीन रखता हूं. फिलहाल मुझे अच्छा काम करने का अवसर मिल रहा है. हिंदी फिल्मों में अभिनय कर रहा हूं, तो वही अपनी मातृभाषा मराठी में फिल्मों निर्माण कर रहा हॅूं. फिलहाल मेरा सारा ध्यान फिल्म ‘‘बैंक चोर’’ की तरफ है, जो कि 16 जून को प्रदर्शित होगी.

बैंक चोरी के साथ हास्य वाली फिल्म आपने पहली बार की हैं?

– कॉमेडी में भी कई जोनर हैं, मुझे हर जोनर काम करना है. ये सच है कि अब तक मैने ‘बैंक चोरी’ जैसी फिल्म नहीं की हैं. इसका कॉन्सेप्ट भी बहुत अलग है. तीन युवक बैंक में चोरी करने के लिए घुसते हैं, लेकिन सब कुछ गलत हो जाता है. बैंक के बाहर पुलिस व मीडिया इकट्ठा हो जाती है. अब इनका पकड़ा जाना तय है. ऐसी परिस्थिति में तीनों तनाव से गुजरते हैं और उस वक्त जो ह्यूमर निकलता है, वो इस फिल्म की खासियत है. इसमें स्लैपस्टिक या शारीरिक कॉमेडी नही है.

इस फिल्म में मुंबई और दिल्ली पर कटाक्ष है. जब हिंदी भाषियों की वजह से कोई समस्या खड़ी होती है, तो चंपक कहता है कि तुम दिल्ली वाले ऐसे ही हो और जब चंपक की वजह से मामला गड़बड़ होता है, तो वो कहता है कि तुम मुंबई वाले ऐसे ही गलती करते हैं. इनके बीच इसी बात पर झगड़ा होता रहता है. दिल्ली व मुंबई के बीच जो डिबेट है, वह हमेशा और हर वर्ग के बीच चलता रहता है. लोकल ट्रेन में बैठे, तो वहां भी चर्चा होगी. मुंबई व दिल्ली की कमियों व खूबियों की भी चर्चा होती है. हां पर ये फिल्म दिल्ली या मुंबई के बारे में नहीं है, बल्कि बैंक चोरी को लेकर है.

आपका किरदार?

– मैने मुंबई में रहने वाले मराठी भाषी मध्यम वर्गीय युवक चंपक चिपलुनकर का किरदार निभाया है, जो डरपोक और बहुत ही ज्यादा इमोशनल है. कुछ मजबूरियों के चलते वह बैंक के अंदर चोरी करने पहुंचता है. सादगी भरा किरदार है. चंपक जैसे लोग हमारे आस पास मौजूद हैं. ‘‘बैक चोर’’ में पहले कपिल शर्मा अभिनय करने वाले थे, पर बाद में उनकी जगह आप इस फिल्म से जुड़े.

ऐसें क्या कलाकार के बदलने पर फिल्म की पटकथा व चरित्र में कोई बदलाव किया जाता है?

– मेरी समझ के अनुसार चरित्र व पटकथा में कुछ तो बदलाव किए जाते हैं. जब कपिल शर्मा यह फिल्म कर रहे थे, उस वक्त इसमें दिल्ली और मुंबई वाली बातचीत नहीं थी, पर कुछ फिल्में ऐसी भी होती हैं, जिनमें कलाकारों के बदलने पर पटकथा में बदलाव की जरुरत नहीं होती है.

आगे और किस तरह की फिल्में करना चाहते हैं?

– मैं हॉरर जोनर में फिल्में करना चाहता हूं. मैने ‘डरना जरुरी है’ में एक एपीसोड किया था.

आप मल्टीस्टारर फिल्मों में ज्यादा सहज होते हैं?

– ऐसा नही है. सब कुछ पटकथा पर निर्भर करता है. हर फिल्म में एक से अधिक कलाकार होते ही हैं. अच्छे कलाकार मिलने लगते हैं, तो फिल्म में चरित्र बढ़ जाते हैं और फिल्म मल्टीस्टारर बन जाती है. बशर्ते इन कलाकारों को फिल्म का कंटेंट सशक्त लगे. कोई भी अच्छे कलाकार हमेशा रोचक व उत्साहित करने वाली फिल्में ही करते हैं.

साल 2004 से अब तक सिनेमा में आए बदलाव को आप किस तरह से देखते हैं?

– काफी बदलाव साफ नजर आ रहा है. अब काफी प्रतिभाशाली लोग सिनेमा से जुड़ रहे हैं. नए निर्देशक, लेखक व कलाकार जुड़ रहे हैं. अब हर तरह का सिनेमा बनने लगा है. ‘पिंक’ व ‘एअरलिफ्ट’ जैसी फिल्में बन रही है.

हिंदी में हम अभी भी बहुत बड़े बजट की फिल्में नहीं बना पा रहे हैं, जबकि ‘जंगल बुक’ जैसी बड़े बजट की हॉलीवुड फिल्में भारत आकर कमायी कर जाती हैं?

– देखिए, ‘जंगल बुक’ का बजट हजार करोड़ है. हम अभी सौ से 150 करोड़ के बजट की फिल्में बना रहे हैं. इससे अधिक बजट की फिल्में बनाना मुश्किल है, क्योंकि सवाल ये होता है कि फिल्म की लागत वसूल कैसे होगी? ‘जंगल बुक’ ने भी भारत में सौ करोड़ से ज्यादा नहीं कमाए, पर उसने पूरे विश्व में कमायी की. अब ‘बाहुबली’ आयी है. ‘दंगल’ से चीन का बाजार खुला, पर चीन में कम फिल्में ही दिखायी जा सकती हैं. हर फिल्म ‘बाहुबली’ या ‘जंगल बुक’ नहीं हो सकती. स्टार कलाकार बड़े बजट की फिल्मों की लागत वसूल करवा सकते हैं.

आप पूर्णरूपेण कमर्शियल और कॉमेडी फिल्मों में अभिनय करते हैं, मगर जब खुद फिल्म का निर्माण करते हैं तो सीरियस सब्जेक्ट चुनते हैं. ऐसा क्यो?

– मैने पहले ही कहा कि अभिनेता के तौर पर मैं वे फिल्में चुनता हूं, जिनका ऑफर मेरे पास आता है, जबकि निर्माता की हैसियत से मैं स्वयं फिल्म की कहानी चुनता हूं. कहानी के चयन से लेकर फिल्म पूरी होने तक हर विभाग पर मेरा अपना निर्णय होता है. मैने मराठी भाषा में ‘बालक पालक ’ व ‘येलो’ जैसी फिल्में बनायी. ‘येलो’ या ‘बालक पालक’ जैसी फिल्में हिंदी में बने और मुझे ऑफर दिया जाए, तो मैं बेशक उनमें अभिनय करना पसंद करुंगा.

‘‘बालक पालक’’ को हिंदी में बनाने के बारे में नहीं सोचा?

– मराठी भाषा में जो फिल्म बनती हैं, अब वो हिंदी में भी सफल हो, ये जरुरी नहीं है. चार बच्चों की कहानी को थिएटर भी नहीं मिलेंगे. हिंदी फिल्मों का डायनेमिक कुछ अलग है.

मराठी में किस तरह की फिल्में बना रहे हैं?

– एक फिल्म ‘माउली’ बना रहे थे, पर इसकी पटकथा तय नहीं कर पाए. हम अभी एक फिल्म बना रहे हैं – ‘‘फास्टर फेनी’’, जो पूरी हो गयी है. इसके अलावा हम छत्रपती शिवाजी महाराज पर एक फिल्म बनाने वाले हैं. इसमें शिवाजी का किरदार मैं निभाने वाला हूं. इसके अलावा भी एक फिल्म बनाने पर विचार कर रहा हूं.

आप सोशल मीडिया पर किस तरह की बातें करते हैं?

– हम अपने प्रशंसकों के सवालों के जवाब देते रहते हैं. कुछ सवाल ऐसे होते हैं, जिनके हम जवाब नही देना चाहते तो उसे नजरंदाज कर जाते हैं. मैं उन चीजों के बारे में बात करता हूं, जिससे मेरा संबंध हो या जिसकी मुझे जानकारी हो. हमें किसी फिल्म का ट्रेलर पसंद आता है, तो उसे हम ट्वीटर वगैरह पर पोस्ट करते हैं. कोई इंसान बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल करता है, तो उसके बारे में भी हम लिखते हैं.

“जिंदगी का हिस्सा बन चुका है सोशल मीडिया”

यूं तो दूसरे बॉलीवुड कलाकारों की तरह परवीन डबास भी सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं. मगर वह पूरी तरह से से सोशल मीडिया के पक्षधर भी नहीं है. सोशल मीडिया को लेकर उनकी सोच दूसरों से काफी अलग है.

हमसे खास बातचीत करते हुए परवीन डबास ने सोशल मीडिया को लेकर साफ शब्दों में कहा, ‘‘मैं सोशल मीडिया पर इतना व्यस्त नहीं रहता कि भोजन करते समय पहले उसका फोटो खींचकर उसे सोशल मीडिया पर डालूं. मेरी राय में जिंदगी जीना भी बहुत जरुरी है. सोशल मीडिया के माध्यम से जिंदगी नहीं जीना चाहिए. कुछ लोग हर समय मोबाइल से चिपके रहते हैं. पर अब सोशल मीडिया जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. पर जिसे जिस चीज से खुशी मिलती है, वह उसे अंजाम दे. मैं रोकने वाला कौन? पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह आपके हाथ में है कि आप क्या डाल रहे हैं. सोशल मीडिया पर ओवर स्मार्ट बनना नुकसान देता है.’’

सोशल मीडिया पर क्या पोस्ट करना पसंद करते हैं?

कभी सोशल कमेंट्री, कभी जिस चीज के बारे में सशक्त ढंग से सोचता हूं, उसे भी पोस्ट करता हूं, कभी कुछ फोटो.

ये टेलीविजन कलाकार हैं कई तरह की कंट्रोवर्सी का हिस्सा

इश्कबाज फेम नकुल मेहता के लिए ये वीकेंड काफी खतरनाक रहा. खासकर तब जब ओला कैब ड्राइवर ने उनसे फिजिकल होने की कोशिश की. यहां हम आपको बताते हैं पूरा मामला. हुआ यूं कि नकुल को जाने के लिए ओला कैब से जाना बेहतर लगा.

लेकिन इसके आगे जो हुआ वो आपको हैरान कर देगा. अचानक उनके पास से गुजरती हुई गाड़ी को गलत तरीके से टर्न लेता हुआ देख, कैब के ड्राइवर ने गलत भाषा का इस्तेमाल शुरू कर दिया.

इस पर नकुल ने ड्राइवर को ऐसा करने से रोका तो, ड्राइवर नकुल से भी बदतमीजी से बात करने लगा. मामला इतना आगे बढ़ गया कि उश ड्राइवर ने नकुल को गाड़ी ना चलाने की धमकी दे डाली और इतना ही नहीं इसके साथ गाड़ी से उतर जाने के लिए भी कह दिया.

नकुल ने कहा कि वे दूसरी ओला आने तक गाड़ी में ही इंतजार करेंगे, लेकिन ड्राइवर इस बात के लिए भी राजी नहीं हुआ और उसने नकुल को तुरंत गाड़ी से बाहर निकल जाने के लिए कहा और नकुल के साथ हाथापाई करने की कोशिश भी की. ये जानकारी नकुल ने अपने ट्विटर अकाउंट पर दी है. इसके साथ ओला कैब सेंटर से उन ड्राइवर के खिलाफ कड़े कदम उठाने के लिए भी कहा है.

नकुल ने अपने ट्विटर अकाउंट फालोवर्स से ड्राइवर के बारे में अपडेट करते हुए ट्वीट किया कि सपोर्ट करने के लिए शुक्रिया ओला कैब ड्राइवर को सस्पेंड कर दिया गया और पैसा भी वापस कर दिया गया है.

टीवी एक्टर्स कई बार सेट से बाहर कई तरह की कंट्रोवर्सीज का हिस्सा रहे हैं. तो यहां देखिए उनकी कुछ झलक…

देवोलिना भट्टाचार्जी

देवोलिना यानी कि साथ निभाना साथिया की गोपी बहू को स्टार परिवार अवॅार्ड में एंट्री लेने से पहले उनसे एंट्री कार्ड के लिए पूछा गया.वह सबसे पहले इसे लेकर नाराज हो गई. बाद में अपना मीडिल फिंगर दिखाकर वहां से चली गई.

रतन राजपूत

संतोषी माता के शो की शूटिंग के दौरान रतन राजपूत ने अपने शो की टीम के लाइटमैन पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया था. शुरू में शो के निर्माताओं ने इस पर ध्यान नहीं दिया. रतन ने कड़ा रुख अपनाते हुए शो की शूटिंग पर जाना बंद कर दिया था. बाद में मामले का निपटारा किया गया.

दलजीत कौर

अपने पति शालीन भनोट के साथ निजी संबंध को लेकर दलजीत कौर विवादों में रही. उन्होंने शालीन पर खुद के साथ बुरे बर्ताव का आरोप लगाया था. शालीन ने इस पर कभी खुल कर टिप्पणी नहीं की, जबकि दलजीत ने अपनी निजी जिंदगी पर हमेशा बात की.

जिया मानिक

टीवी की इस पुरानी गोपी बहू को मुंबई के एक हुक्का बार में पुलिस रेड का सामना करना पड़ता था. इसे लेकर काफी विवाद हुआ था. बाद में जिया ने जाहिर किया कि वह अपनी मां के साथ वहां पर गई थी. उन्हें उस जगह के बारे में कोई अंदाजा नहीं था.

रुचा गुजराती

टीवी पर अक्सर रुचा निगेटिव किरदार में अधिक दिखाई दी हैं, लेकिन असल जिंदगी में उन्हें कई निगेटिव लोगों का सामना करना पड़ा. उन्होंने अपने सास-ससुर पर घरेलू हिंसा और मानसिक परेशानी का आरोप लगाया था.

गौहर खान

एक रियलिटी शो की लाइव शूटिंग के दौरान गौहर खान पर भीड़ में खड़े मोहम्मद नाम के एक शख्स ने तमाचा जड़ दिया था. गिरफ्तार होने के बाद मोहम्मद ने कहा था कि वह गौहर के कपड़ो से नाखुश थे.

निया शर्मा

टेलीविजन की बहू निया शर्मा के एक म्यूजिक वीडियो रिलीज ने सोशल मीडिया पर एक विवाद को जन्म दे दिया. लोकप्रिय शो जमाई राजा से निया शर्मा ने एंटरटेनमेंट की दुनिया में लोकप्रियता हासिल की.

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