Download App

क्या करें जब आग लग जाए

यों तो सालभर देशभर में कहीं न कहीं से भयानक आग लगने की खबरें आती रहती हैं लेकिन गरमी के मौसम में आग लगने के हादसों की तादाद बढ़ जाती है. इस साल अप्रैल में आग लगने की 2 दर्जन बड़ी घटनाएं हुईं जिन में सब से ज्यादा दिल दहला देने वाला हादसा मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के हर्रई ब्लौक के गांव बारगी में हुआ.

22 अप्रैल की शाम 4 बजे चिलचिलाती धूप में बारगी गांव के सैकड़ों लोग राशन की दुकान के सामने लाइन में लगे थे. यह राशन की दुकान ठीक वैसी ही है, जैसी देशभर में होती हैं कि एकाधदो कमरे राशन की सहकारी दुकान चलाने वाला किराए पर ले लेता है. इन में बांटा जाने वाला अनाज और राशन के दूसरे आइटम ठूंसठूंस कर भरे रहते हैं. एक तरह से राशन की इन सस्ती दुकानों को छोटेमोटे गोदाम कहना ज्यादा बेहतर होगा.

बारगी में गांव वालों को बांटने के लिए कैरोसिन का तेल इस दिन आया था. यह खबर आग की तरह गांवभर में फैली तो देखते ही देखते तेल लेने वालों की भीड़ इकट्ठी हो गई. बाहर लाइन लगी तो दुकानदार भीतर अनाज बांटने लगा. चूंकि कैरोसिन चाहने वालों की तादाद ज्यादा थी, इसलिए दुकानदार ने दरवाजे पर कैरोसिन का ड्रम रख लिया. जिन्हें अनाज चाहिए था वे दुकान के भीतर रह गए और जिन्हें कैरोसिन चाहिए था वे बाहर लाइन में खड़े हो गए.

सैकड़ों लोगों को उन की मांग के मुताबिक कैरोसिन का तेल बांटने में देर लग रही थी. लाइन में लगे गांव वालों में से किसी ने आदतन बीड़ी सुलगा ली और पीने के बाद आदत के मुताबिक ही उस का ठूंठ फेंक दिया. इसी दौरान एक और गांव वाले ने बीड़ी सुलगा कर तीली फेंकी तो वह कैरोसिन के ड्रम के पास जा गिरी. कैरोसिन ने आग पकड़ी तो देखते ही देखते हाहाकार मच गया.

बचने के बजाय फंसे

कैरोसिन ने आग पकड़ी तो भगदड़ मच गई. बाहर लाइन में खड़े लोग तो खुले की तरफ जान बचाने के लिए भाग गए पर जो लोग अंदर कमरे में बंद थे, उन की हालत चूहेदानी में फंसे चूहे जैसी हो गई थी. आग अंदर तक फैली और अनाज के बारदानों तक जा पहुंची. अंदर फंसे लोगों में से किसी को नहीं सूझा कि क्या करे.

हरेक की हर मुमकिन कोशिश खुद की जान बचाने की थी. इस से हुआ उलटा, कि जरा से कमरे से भागादौड़ी के चलते इनेगिने लोग ही बाहर आ पाए और 13 लोग आग की भेंट चढ़ गए यानी जिंदा जल मरे.

मंजर यह था कि महज 5 मिनट में ही आग ने पूरी दुकान को अपनी गिरफ्त में ले लिया. भीतर वाले कमरे में रखा सामान और अनाज के बारदाने भी जलने लगे तो छोटा सा कमरा धुंए से भर गया. नतीजतन, वहां मौजूद लोगों का दम भी घुटने लगा. जान बचाने के लिए लोगों को कुछ नहीं सूझा तो वे बारदानों के ऊपर चढ़ गए पर वहां भी आग की लपटों ने उन का पीछा नहीं छोड़ा.

हादसे के गवाह रहे एक घायल मनोज कुमार मालवीय का कहना है कि उसे और दूसरे लोगों को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें. बाहर निकलने के लिए एक ही दरवाजा था और लोग उस की तरफ भाग रहे थे. चूंकि कैरोसिन या खाने वाला तेल फर्श पर फैल गया था, इसलिए लोग उस पर से फिसलने लगे थे. इस आपाधापी और भागादौड़ी में कुल 4 लोग ही बाहर निकल पाए.

आग जब शबाब पर आई तो 200 लिटर से भरे ड्रमों में से भड़ामभड़ाम की आवाजें आने लगीं जिस से लोग और दहशत से भर उठे. देखते ही देखते सोसाइटी की दुकान का यह कमरा श्मशान घाट बन गया. बाहर खड़े चिल्लाते लोग बेबसी से मौत का यह मंजर देखते रहे, जिसे शायद ही वे जिंदगीभर भुला पाएं.

आग के इस हादसे की खबर भी आग की तरह फैली और जिलेभर से फायरब्रिगेड आईं. दुकान की दीवार तोड़ कर आग बुझाई गई पर जब तक जो होना था वह हो चुका था.

बच सकते थे

मनोज की बातों से जाहिर होता है कि घबराए लोगों ने वही गलती की जो आमतौर पर ऐसे हादसों के वक्त लोग करते हैं वह थी भगदड़ मचा कर पहले भागने की.

लोग चाहते थे तो एकएक कर बाहर निकल सकते थे पर हर एक को अपनी जान की पड़ी थी, इसलिए भीतर फंसे लोगों में से कोई नहीं बच सका. मरने वालों में 5 औरतें भी थीं.

साफ दिख रहा है कि लोग आग से कम, भगदड़ से ज्यादा मरे. हो यह रहा था कि लोग एकदूसरे को धकिया कर पहले बाहर निकलने के लिए दरवाजे की तरफ भाग रहे थे और आगेवाले पीछे वालों को धक्का दे रहे थे. इस गफलत में कोई बाहर नहीं निकल पाया और आग ने उन्हें बख्शा नहीं.

यह ठीक है कि हमारे देश में आग और दूसरी कुदरती आफतों से बचने के लिए कोई ट्रेनिंग नहीं दी जाती है जो कि अब आग की बढ़ती घटनाओं को देख जरूरी लगने लगी है.

छिंदवाड़ा की आग के बाद हफ्तेभर में ही अकेले मध्य प्रदेश के ही भोपाल, इंदौर, मंडला और बैतूल में लगी आग से 6 लोग और मारे गए.

इंदौर में पटाखों की दुकान में आग लगी तो भोपाल में रिहायशी इलाके सोनागिरि की एक बिल्ंिडग को आग ने अपनी गिरफ्त में ले लिया. बैतूल और मंडला में खेतखलिहानों में आग लगी थी. यानी आग से कहीं कोई महफूज नहीं है, वह बंद और खुली दोनों जगहों में लग सकती है.

खुली जगहों मसलन, मैदान, खेत और खलिहान में आग से बचने के मौके ज्यादा होते हैं लेकिन बंद जगहों में समझदारी से ही अपनी जान बचाई जा सकती है.

ऐसे बचें हादसे से

जिस तेजी से आग लगने के हादसे बढ़ रहे हैं, उन से लगने लगा है कि लोगों को खुद अपना बचाव करना आना चाहिए जिस से ऐसे बुरे वक्त में वे अपनी और औरों की जान बचा पाएं. इस के लिए इन बातों को ध्यान में रखना चाहिए-

–       अगर यंत्र का इस्तेमाल करना न आता हो तो आसपास देखें कि शायद कोई ऐसी चीज मिल जाए जिस आग पर फेंक देने से उसे रोका जा सके. मसलन, रेत या पानी, ये चीजें अगर मिल जाएं तो इन्हें तुरंत तेजी से आग पर फेंकना चाहिए पर अगर आग बिजली के तारों या शौर्ट सर्किट की वजह से लगी दिखे तो उसे बुझाने के लिए पानी का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. इस से करंट लगने का डर बना रहता है.

–       आजकल तकरीबन हर जगह आग बुझाने के अग्निशामक यंत्र रखे जाते हैं, पर अफसोस की बात यह है कि इन्हें चलाना हर कोई नहीं जानता. इसलिए नजदीकी फायर ब्रिगेड दफ्तर से इन्हें चलाने का तरीका सीखने में हर्ज नहीं, क्योंकि पता नहीं, कब कहां ऐसी नौबत आ जाए.

–       आग में फंसने पर ऊपर के कपड़े उतार कर फेंक देना चाहिए क्योंकि ये जल्दी आग पकड़ते हैं. इन के जरिए ही शरीर जलता है और बचने का मौका नहीं मिल पाता.

–       आग कहीं से भी उठती दिखे, तुरंत बिजली के खटकों और हो सके तो मेनस्विच को बंद कर देना चाहिए क्योंकि बिजली के तार जल्द आग पकड़ते हैं.

–       आग कहीं भी, कैसे भी लगे, उस से धुआं जरूर फैलता है. इसलिए रूमाल, गमछा, दुपट्टा जो भी मिले, उस से मुंह ढक लेना चाहिए ताकि दम न घुटे.

–       आग कपड़ों तक आ जाए तो जमीन पर लेट कर लुढ़कना चाहिए. इस से आग बुझने में मदद मिलती है. चादर, कंबल या दूसरा बड़ा कपड़ा मिल जाए तो उसे शरीर पर लपेट लेना चाहिए. फिल्मों में अकसर इसी तरह आग से जलते आदमी को बचाते हुए दिखाया जाता है.

–       किसी बड़ी इमारत में आग लगे तो भागने के लिए लिफ्ट के बजाय सीढि़यों का इस्तेमाल करना चाहिए.

–       आग जहां से उठती दिखे, उस के आसपास की चीजों को हटा देना चाहिए क्योंकि उन से आग को फैलने का मौका मिलता है.

छिंदवाड़ा के बारगी गांव के हादसे से एक बात साफ और उजागर यह हुई कि लोगों ने समझ खो दी थी. अगर पीछे वाले, आगे वाले लोगों को दरवाजे से बाहर निकल जाने देते तो उन्हें भी अपनी जान बचाने का मौका मिल सकता था. आगे वाले की तो जान बच ही जाती.

बीड़ी और जलती तीली फेंकने वाले तो गुनहगार हैं ही, लेकिन जब आग लग ही गई थी तो लोग सब्र का दामन न छोड़ते, समझ से काम लेते तो हादसा इतना भयानक नहीं होता.

जलने पर यह करें

–       आग में थोड़ा जलें या ज्यादा, बेहतर यह होता है कि जब तक जलन कम न हो, तब तक आप जख्म पर ठंडे पानी का छोटा कपड़ा रखें.

–       जहां आग लगी है वहां की खिड़कियां खोलने की कोशिश करनी चाहिए.

–       जली हुई जगह पर चूना, हलदी या टूथपेस्ट न लगाएं, इस से घाव ठीक नहीं होता, उलटे डाक्टर को  घाव साफ करने में परेशानी पेश आती है.

–       जली हुई जगह पर पानी डालने से जख्म गहरा नहीं हो पाता.

–       तुरंत ऐंबुलैंस को फोन करें.

एहतियात जरूरी

आग अकसर लापरवाही से लगती और फैलती है. बागरी गांव में लोग जलती बीड़ी या तीली नहीं फेंकते तो एक बड़े हादसे और 13 मौतों से बच सकते थे. अगर ये एहतियात बरती जाएं तो आग लगने की घटनाओं को रोका जा सकता है-

–       आग लगने के आधे से ज्यादा हादसे बिजली के तारों और शौर्ट सर्किट होने के चलते होते हैं. गरमी में बिजली की खपत ज्यादा होती है, इसलिए बिजली के तारों पर जोर ज्यादा पड़ता है और वे जलने लगते हैं.

        इसलिए बेहतर यह होता है कि घटिया किस्म के बिजली के तारों का इस्तेमाल न किया जाए, हमेशा ब्रैंडेड तार ही इस्तेमाल किए जाएं.

–       झुग्गीझोंपडि़यों और कच्चे मकानों में आमतौर पर सीधे खंबे से बिजली ले ली जाती है, यह बेहद जोखिम वाला काम है, इस से बचना चाहिए. मकान

चूंकि कच्चे होते हैं और उन में लकड़ी, घासफूस वगैरा का ज्यादा इस्तेमाल होता है, इसलिए बिजली के तारों से आग लगने का खतरा ज्यादा रहता है.

–       हर दूसरेतीसरे साल में घर की बिजली फिटिंग की जांच कराते रहना चाहिए और खराब व गले तारों को हटवा देना चाहिए.

–       आमतौर पर घरों में बिजली का एक ही मेनस्विच रखा जाता है जिस पर बिजली का सारा लोड पड़ता है. इस से उस के जलने का खतरा बना रहता है. इस से बचने के लिए 2 मेनस्विच लगवाने चाहिए.

–       इलैक्ट्रिक और इलैक्ट्रौनिक आइटमों में जरा सी भी खराबी आ जाने पर उन की रिपेयरिंग करवानी चाहिए.

–       एसी, फ्रिज, कंप्यूटर, टीवी, टुल्लू पंप और ओवन जैसे आइटमों

के लिए पावरस्विच लगवाना चाहिए. साधारण खटके से चलाने पर वे जल्द गरम होते हैं और आग लगने का खतरा बढ़ जाता है.

–       रात को सोने से पहले गैस सिलैंडर की नौब बंद कर देनी चाहिए.

–       घर में बेवजह की रद्दी व कचरा नहीं रखना चाहिए, ये आइटम जल्द आग पकड़ते हैं.

–       खेतखलिहानों में सूखी घास, लकडि़यां आदि महफूज जगह पर रखनी चाहिए और नरवाई

में आग नहीं लगानी चाहिए. गांवदेहातों में आजकल आग नरवाई लगाने से ज्यादा लग रही है, इसलिए इसे कानूनी जुर्म भी घोषित कर दिया गया है.

इन बातों पर अमल किया जाए तो आग से बचा जा सकता है. बेहतर तरीका यह है कि आग से बचाव पर ध्यान दिया जाए वरना आग लगने में देर नहीं लगती.   

तलाक तलाक तलाक

3 तलाक के मामले में देश के उच्चतम न्यायालय में बाहर मीडिया व मंचों पर चली बहस से इतना साफ है कि मुसलिम समुदाय न तो महिलाओं को बराबर के अधिकार देने को तैयार है न ही उस की औरतों को अपने अधिकारों की चिंता है. मुसलिम औरतों की तरफ से हिंदू वकील, विचारक, लेखक ही तर्क प्रस्तुत करते नजर आए क्योंकि मुसलिम कानूनों में सुधारों की बात करना भी इसलाम में एक कुफ्र है.

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इसलाम में आदमियों और औरतों को इस कदर बांधे रखा गया है कि आज 21वीं सदी में उन्हें 7वीं सदी के कानूनों का हवाला दे कर हड़काया जा सकता है. जो भी एक बार इस धर्म का अनुयायी हो गया वह एक तरह से वनवे रोड पर जा पहुंचा जहां न तो अलग रास्ता ढूंढ़ा जा सकता है, न लौटा जा सकता है.

यह बात और धर्मों में नहीं है, ऐसा नहीं है. आजकल हिंदू कट्टरवाद भी बुरी तरह पनप रहा है और कुछ देशों में कट्टर ईसाई धर्म के लौटने के संकेत दिख रहे हैं. एक समय तीनोंचारों धर्म इस कदर अनुयायियों को बांधे रखते थे कि मौत से ही छुटकारा मिलता, चाहे वह खुद गले लगाई जाए या धर्र्म के कट्टर लोग दें.

सर्वोच्च न्यायालय में बहस में नए विचारों और अधिकारों की विवेचना कम हुई है. सरकारी पक्ष हिंदू प्रतिछाया लिए हुए रहा पर यही पक्ष अपना रुख बदल लेगा, अगर मामला हिंदू रीतिरिवाजों का होगा. अगर कल कोई यह कहना शुरू कर दे कि गंगा में नहाना, गंगा के साफ पानी को पीना संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ है तो वही सरकारी अटौर्नी जनरल आस्था का राग अलापने लगेंगे. आज वे मुसलिम औरतों के मौलिक अधिकारों को 3 तलाक का विरोधाभासी मान रहे हैं पर दिल से नहीं, राजनीति से.

औरतों को ही नहीं, पुरुषों को भी बराबरी के अधिकार मिलें, यह जरूरी है. पर सामाजिक अधिकारों को देने का उत्तरदायित्व सरकार का नहीं. शादियां वर्ण, गोत्र, कुंडली मिला कर न हों, इस के लिए कानून नहीं बन सकता, सुप्रीम कोर्ट नहीं जा सकते. इसे लोगों को खुद छोड़ना होगा.

3 तलाक पर सुप्रीम कोर्ट चाहे कुछ भी कहे, उस से जमीनी हकीकत पर कुछ असर न होगा. अगर असंवैधानिक भी हुआ तो भी धड़ल्ले से दुरुपयोग होगा.

वन बैल्ट वन रोड : चीन का चक्रवर्ती विकास का सपना

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया में अमेरिका और सोवियत संघ ही 2 महाशक्तियां थीं. दोनों के बीच हमेशा शीतयुद्ध चलता रहता था. मगर सोवियत संघ के टूटने और चीन के शक्ति के रूप में उदय के बाद दुनिया का शक्ति संतुलन बदल गया है. नए समय में अमेरिका और चीन महाशक्तियां हैं. चीन महाशक्ति की हैसियत पाने के बाद अपने तेवर दिखा रहा है. इसलिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विकास का नाटक कर रहा है मगर उस का मकसद पुरानी महाशक्तियों की तरह दुनियाभर में अपना एकछत्र साम्राज्य स्थापित करना है.

वन बैल्ट वन रोड (ओबीओआर) ऐतिहासिक रेशम मार्ग (सिल्क रूट) की तर्ज पर एशिया, यूरोप और अफ्रीका को सड़कें, रेलमार्ग और जलमार्ग से जोड़ने की चीन की अपनी महत्त्वाकांक्षी योजना है जो इस सदी में अंतराष्ट्रीय व्यापार में जबरदस्त उछाल लाएगी. इसे ले कर चीन ने पिछले  दिनों 2 दिनों का अंतर्राष्ट्रीय शिखर सम्मेलन किया जिस की दुनियाभर में धूम मची हुई थी. आखिर क्यों न हो, अरबोंखरबों डौलर जो लगे हैं इस परियोजना में.

सम्मेलन में 29 देशों के राष्ट्राध्यक्ष, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस, विश्व बैंक के प्रैसिडैंट जिम योंग किम, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की मैनेजिंग डायरैक्टर क्रिस्टीन लगार्ड के अलावा 130 देशों के अधिकारी, उद्योगपति, फाइनैंसर और पत्रकारों ने  हिस्सा लिया. भारत के बेहद करीबी दोस्त माने जाने वाले रूस ने भी इस सम्मेलन में भाग लिया. चीन का ऐसा दावा है कि सड़क रास्तों से दुनिया के कई देशों को एकसाथ जोड़ने से इन देशों के बीच कारोबार को बढ़ाने व इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने में मदद मिलेगी.

क्या है परियोजना

चीन की दुनिया के 65 देशों को इस प्रोजैक्ट से जोड़ने की योजना है. जिन में धरती की आधी से ज्यादा करीब 4.4 अरब आबादी रहती है. इस प्रोजैक्ट में कई सड़कमार्गों, रेलमार्गों और समुद्रमार्गों से देशों को जोड़ने का प्रस्ताव है. प्रोजैक्ट के पूरा होने में करीब 30 से 40 साल लग सकते हैं.

सवाल उठता है कि ‘वन बैल्ट वन रोड’ परियोजना आखिर है क्या? इसे न्यू सिल्क रूट नाम से भी जाना जाता है. देखा जाए तो ओबीओआर एक ही परियोजना नहीं है, बल्कि 6 आर्थिक गलियारों की मिलीजुली परियोजना है, जिस में रेलवेलाइन, सड़क, बंदरगाह और अन्य आधारभूत ढांचे शामिल हैं. ओबीओआर में 3 जमीनी रास्ते होंगे जिन की शुरुआत चीन से होगी.

पहला मार्ग मध्य एशिया और पूर्वी यूरोप के देशों की ओर जाएगा. इस से चीन की पहुंच किर्गिस्तान, ईरान, तुर्की से ले कर ग्रीस तक हो जाएगी. दूसरा मार्ग मध्य एशिया से होते हुए पश्चिम एशिया और भूमध्य सागर की ओर जाएगा. इस रास्ते से चीन, कजाकिस्तान और रूस तक जमीन के रास्ते कारोबार कर सकेगा. तीसरा मार्ग दक्षिण एशियाई देश बंगलादेश की तरफ जाएगा. साथ ही, पाकिस्तान के सामरिक रूप से महत्त्वपूर्ण बंदरगाह ग्वादर को पश्चिमी चीन से जोड़ने की योजना पर काम चल ही रहा है.

इस के अलावा, चीन से एक जलमार्ग थाईलैंड, मलयेशिया होते हुए सिंगापुर और हिंद महासागर की ओर जाएगा. इस तरह सड़क, रेल और बंदरगाहों के जाल बुनने के लिए चीन करीब 60 लाख करोड़ रुपए से अधिक की रकम उपलब्ध कराएगा. दुनियाभर में कुल कारोबार का तकरीबन 90 फीसद हिस्सा अभी समुद्री रास्तों से हो कर जाता है. यह सीधेसीधे द्विपक्षीय आदानप्रदान होता है.

यानी अगर सऊदी अरब से तेल चीन ले जाना हो तो जहाज समुद्री रास्ते से चीन पहुंचेगा और ऐसा बहुत कम होता है कि रास्ते में पड़ने वाले किसी और देश को इस व्यापारिक सौदे का फायदा हो.

ओबीओआर से उन देशों को भी लाभ पहुंचेगा जिन के रास्तों से माल गुजरेगा. इस परियोजना से व्यापार के लिए समुद्री रास्तों पर निर्भरता कम हो जाएगी और जहां तक अहमियत का सवाल है तो इस से वैश्विक कारोबार की तसवीर बदल जाएगी क्योंकि, समुद्री रास्तों से कारोबार पर अभी अमेरिका का दबदबा है. 900 अरब डौलर की लागत से चीन कई नए अंतर्राष्ट्रीय रूट बनाना चाहता है. वन बैल्ट वन रोड नाम के अभियान के तहत बीजिंग ये सब करेगा.

विकास की दौड़

भारत इस सम्मेलन से अलग ही रहा. कई आर्थिक विशेषज्ञ भारत को इस के खिलाफ आगाह कर रहे हैं. कहा जा रहा है कि भारत ऐसा कर के दुनिया की आर्थिक विकास की दौड़ में पिछड़ जाएगा. लेकिन भारत को चीन के इरादे नेक नहीं लगते.

सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि सभी देशों को एकदूसरे की संप्रभुता और भूभागीय एकता का सम्मान करना चाहिए. भारत ने पाक अधिकृत कश्मीर से हो कर गुजरने वाले इस विवादित आर्थिक गलियारे को ले कर चिंताओं के चलते इस फोरम का बहिष्कार किया था. भारत ने करीब 50 अरब डौलर से ज्यादा की लागत वाले सीपीईसी (चाइना पाकिस्तान इकोनौमिक कौरिडोर) को ले कर अपनी संप्रभुता संबंधी चिंताओं के चलते सम्मेलन में हिस्सा नहीं लिया.

शी जिनपिंग ने कहा कि वन बैल्ट वन रोड पहल सदी की परियोजना है, जिस से पूरी दुनिया के लोगों को लाभ होगा. चीन के राष्ट्रपति ने देश के दृष्टिकोण के बारे में कहा, ‘‘हमें सहयोग का एक खुला मंच तैयार करना चाहिए और एक खुली वैश्विक अर्थव्यवस्था के रूप में बढ़ना व बरकरार रखना चाहिए.’’ सिल्क रोड फंड का गठन 2014 में किया गया, जिस का मकसद बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की आर्थिक मदद करना था.

इस परियोजना के जरिए चीन अपनेआप को उदार दानदाता के तौर पर पेश कर रहा है. जो गरीब देशों की हालत पर तरस खा कर उन्हें सस्ती दरों पर कर्ज दे रहा है. लेकिन असलियत कुछ और है. पिछले कुछ वर्षों में चीनी माल की मांग में कमी आई है. इस मांग को फिर बढ़ाने के लिए उसे नए बाजार की जरूरत है. ओबीओआर से नया बाजार उपलब्ध करा कर चीन अपनी अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकना चाहता है. इसलिए यह सारी परियोजना बहुत फुलप्रूफ तरीके से तैयार की गई है. यह चीन के लिए ‘चित भी मेरी पट भी मेरी, सिक्का मेरे बाप का’ वाली कहावत को चरितार्थ करती है.

यह सही है कि चीन गरीब देशों को अरबों डौलर का कर्ज देगा. इस कर्ज से गरीब देश अपने यहां सड़कें, पुल, पोर्ट और हवाईअड्डे बनाएंगे. मगर यह सारा काम चीनी कंपनियां ही करेंगी यानी कर्ज का पैसा चीन के पास ही लौट आएगा. इस कारण चीन घाटे में नहीं होगा, असल में उसी का ही व्यापार बढ़ेगा. फिर जिन देशों में वह बुनियादी ढांचा बनाएगा, उन पर कुछ हद तक उस का वर्चस्व बढ़ जाएगा.

इस का सब से बड़ा उदाहरण तो पाकिस्तान है. लोग तो उसे चीन का 29वां राज्य कहने लगे. पाकिस्तान में बन रहे ग्वादर रोड की रक्षा के नाम पर वहां चीनी विमान और अन्य हथियार भी तैनात होने लगे हैं. यानी पाकिस्तान में चीन की सैनिक उपस्थिति बढ़ी है.

चीन के लिए समस्या तब पैदा होगी जब कर्ज डूबने लगेगा तो क्या होगा? कर्ज देने वालों में चीन के 2 प्रमुख बैंक हैं, चाइना डैवलपमैंट बैंक और ऐक्सपोर्टइंपोर्ट बैंक औफ चाइना. दोनों एशिया, मध्यपूर्व और अफ्रीका के कई देशों को 200 अरब डौलर का कर्ज दे चुके हैं. लेकिन जैसेजैसे प्रोजैक्ट आगे बढ़ेगा, वैसेवैसे जोखिम भी बढ़ता जाएगा. बैंक, लेनदारों और देनदारों के बीच का समीकरण बेहद अहम हो जाएगा. ऐक्सपोर्टइंपोर्ट बैंक औफ चाइना चाहता है कि हर देश के लिए कर्ज की सीमा निर्धारित की जाए.

बैंक के उप गवर्नर सुन पिंग कहते हैं, ‘‘कुछ देशों को अगर हम ने बहुत ज्यादा कर्ज दिया तो ऋण की स्थिरता पर सवाल उठ सकते हैं.’’

कागजों से निकल कर प्रोजैक्ट जैसे ही जमीन पर शुरू होगा, वैसे ही व्यावहारिक परेशानियां सामने आएंगी. वन बैल्ट वन रोड के तहत आने वाले 1,676 प्रोजैक्ट्स को चीन की सरकारी संस्थाएं फाइनैंस कर रही हैं.

इस प्रोजैक्ट के तहत बहुत ही बड़ा ठेका चीन कम्यूनिकेशन कंस्ट्रक्शन ग्रुप को मिला है, अकेले 40 अरब डौलर का ठेका. ग्रुप को 10,320 किलोमीटर लंबी सड़कें, 95 गहरे बंदरगाह, 10 एयरपोर्ट, 152 पुल और 1,080 रेलवे प्रोजैक्ट्स पूरे करने हैं. यानी चीन सूद समेत कर्ज भी वसूलेगा और उस की कंपनियों को निर्माण के दौरान होने वाला फायदा भी मिलेगा.

ओबीओआर को मांग में कमी से जूझ रहे चीन के स्टील, सीमेंट सहित अन्य उद्योगों के लिए बाजार तलाशने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है. यही नहीं, इस से चीन के उत्पादों के लिए कम विकसित बाजारों के रास्ते भी खुल जाएंगे. दूसरी तरफ इस के दायरे में आने वाले कई देश अस्थिरता के दौर से गुजर रहे हैं और इस से जुड़े किसी भी प्रोजैक्ट के असफल रहने पर पूरे प्रोजैक्ट के धराशायी होने की आशंका है.

ओबीओआर और सीपीईसी को ले कर भारत यों ही चिंतित नहीं है. चीनपाकिस्तान आर्थिक कौरिडोर कश्मीर के उस हिस्से से हो कर गुजरेगा जो पाकिस्तान के कब्जे में है, भारत इसे हमेशा से अपना अभिन्न अंग मानता रहा है. पाकिस्तान आतंकवादियों को ट्रेनिंग दे कर भारत में भेज कर दशकों से छद्म युद्ध चला रहा है.

उधर चीन, पाकिस्तान को लंबे वक्त से समर्थन देता रहा है. ओबीओआर के चलते दक्षिण एशिया में चीनी सेना का दखल भी बढ़ेगा, जो भारत को कतई मंजूर नहीं है. हालांकि चीन का कहना है कि सीपीईसी का भारतपाकिस्तान सीमा विवाद से कोई लेनादेना नहीं है, लेकिन इस से भारत की चिंताओं को दरकिनार नहीं किया जा सकता. चीन ओबीओआर को ले कर साझा विकास की बात कर रहा है और उस का कहना है कि भारत को भी इस में अहम भूमिका निभानी चाहिए.

यह परियोजना यूरोप, एशिया और अफ्रीका के बीच एक पुल की तरह काम करेगी. यूरोप विकास के चरम पर है, जबकि एशिया और अफ्रीका के ज्यादातर देश विकासशील या अविकसित हैं. इस परियोजना से जहां यूरोप को एशिया और अफ्रीका का बाजार मिलेगा, वहीं एशिया और अफ्रीका को यूरोप की तकनीक सुलभ होगी. इस से दुनिया एकसूत्र में बंध जाएगी. पूर्व और पश्चिम में अमीरगरीब का अंतर कम करने में मदद मिलेगी और तरक्की के रास्ते पर चलने से आतंकवाद जैसे दानव से भी मुक्ति मिलने की उम्मीद की जा सकती है.

चीन का ओबीओआर मूर्तरूप ले सका तो वह एशिया और यूरोप के लिए बूस्टर डोज साबित होगा. इस जनवरी में झिझिआंग राज्य से एक मालगाड़ी 1,200 किलोमीटर की दूरी और 9 देशों से गुजर कर लंदन पहुंची. समुद्रीमार्ग से लगने वाले समय से आधे समय में उस ने माल पहुंचाया. ऐसी मिसालें बढ़ीं तो उस से व्यापार को प्रोत्साहन मिलेगा. परियोजना निर्माण के दौरान लोगों को बड़े पैमाने पर रोजगार मिलेगा. इस से चीन के नेतृत्व में कई देशों का एक ऐसा समूह बनेगा जिस के आर्थिक हित आपस में जुड़े होंगे.

इस परियोजना के पीछे चीन के कई आंतरिक कारण हो सकते हैं. मगर उस के तमाम उद्देश्य चीन की अंतर्राष्ट्रीय नेतृत्व की आकांक्षा के साथ जुड़े हुए हैं. चीन को 21वीं सदी की आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्वयं को स्थापित करना है. युआन को विश्वमुद्रा बनाना है. डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका की सिर्फ अपने हितों का विचार कर नीतियां बनाने और वैश्वीकरण व मुक्त व्यापार को रोकने की कोशिश का लाभ चीन उठा रहा है. चीन ने वैश्वीकरण  का झंडा अब अपने कंधों पर उठाया है और ओबीओआर परियोजना शुरू की है.

परियोजना के विरोधी चीन की मंशा पर शक करते हैं. दुनियाभर के तमाम देशों को डर है कि चीन इस परियोजना के जरिए दुनिया पर अपना आर्थिक साम्राज्यवाद थोपना चाहता है. इस परियोजना के कार्य में चीन के मजदूर, चीन का पैसा, चीन की तकनीक और दुनियाभर में चीन के सैनिकों का फैलाव भी होगा. ऐसे में इस परियोजना के अंतर्गत आने वाले देशों पर चीन अपना मालिकाना हक जताएगा. यह ठीक उसी तरह का हो सकता है, जैसा 19वीं सदी में ब्रिटेन ने अपना साम्राज्य बढ़ाया था.

दुनिया की दूसरी सब से बड़ी आर्थिक महाशक्ति चीन, सड़क मार्गों पर अपना दबदबा बनाना चाहता है. अमेरिका और चीन के बीच चल रही होड़ में इस से चीन को फायदा होगा. बता दें कि ज्यादातर समुद्रीमार्गों पर अभी भी अमेरिका का एकतरफा वर्चस्व है. इस को देखते हुए चीन अपना खास जोर सड़कमार्गों को विकसित करने में लगाएगा जिस से वह अमेरिका को कारोबार में टक्कर दे सके.

कुछ अर्थशास्त्री इसे उस मार्शल प्लान की तर्ज पर देख रहे हैं, जिस ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका को दुनिया का सुपरपावर बना दिया, लेकिन यह उस से भी बड़ा प्रोजैक्ट है. अगर कीमत के लिहाज से देखा जाए तो आज की कीमत के हिसाब से अमेरिका का मार्शल प्लान 130 अरब डौलर का था, जबकि चीन का प्रोजैक्ट इस से कई गुना ज्यादा बड़ा यानी 10 खरब डौलर का है.

शी जिनपिंग ने इसे प्रोजैक्ट औफ द सैंचुरी बताया है. एक ऐसी योजना जो उस खाली जगह को भरेगी जो ट्रंप के दौर में अमेरिका फर्स्ट की पौलिसी के तहत अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से अमेरिका के पैर पीछे खींचने से बन गई है. चीन इस के जरिए दुनिया की अर्थव्यवस्था पर अपनी पकड़ और गहरी करने की कोशिश में है.

चीन इस बात से बेहद दुखी है कि इस परियोजना को भारत का समर्थन नहीं मिल रहा है. इसलिए  वह इस दलील के साथ भारत को मनाने की कोशिश कर रहा है कि अभी वह प्रगति की दौड़ में शामिल हो सकता है, बाद में वह केवल मूकदर्शक भर रह जाएगा.

चीनी स्टेट मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने कहा, ‘‘वन बैल्ट वन रोड के चीन के प्रस्ताव को दुनियाभर से जबरदस्त समर्थन मिल रहा है. ऐसे में अगर भारत  ओबीओआर से खुद को अलग रखना चाहता है तो उस के पास इंटरनैशनल स्तर पर चीन के बढ़ते दबदबे को देखते रह जाने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचेगा.’’

कश्मीर के चलते भारत-पाक के बीच विवाद रहा है. इस के चलते नई दिल्ली ने क्षेत्र में इन्वैस्टमैंट करने से दूरी बना कर रखी है. हालांकि, भारत के लिए इस बात में फर्क जानना भी जरूरी है कि उस का कमर्शियल इन्वैस्टमैंट किस बात में हैं और कहां उस की संप्रभुता पर असर पड़ रहा है.

भारत के पड़ोसी देश नेपाल, बंगलादेश ने चीन के साथ हाल ही में करार किया है. वे इस प्रोजैक्ट में शामिल हो रहे हैं. वहीं श्रीलंका, म्यांमार भी शिखर सम्मेलन के दौरान इस प्रोजैक्ट से जुड़ने की इच्छा जता चुके हैं. पाकिस्तान पहले से ही चीन का अहम सहयोगी बना बैठा है. लेकिन भारत ने इस का बहिष्कार किया.

भारत का इस से दूर रहना कितना वाजिब है? इस मुद्दे पर आर्थिक मामलों के जानकार एम के वेणु कहते हैं, ‘‘वन बैल्ट वन रोड कौन्फैं्रस में न जाने का भारत का रुख थोड़ा सा विरोधाभासी है. विरोधाभासी इसलिए क्योंकि भारत 3 दिन पहले तक यह कहता रहा है कि हमें इस बात पर नाराजगी है कि इस परियोजना का एक हिस्सा पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर

से गुजरता है, जिसे सीपैक यानी चाइना- पाकिस्तान कौरिडोर कहते हैं और जो ग्वादर पोर्ट तक जाता है. अगर आप तार्किक रूप से देखें तो 3-4 दशकों पहले चीन ने इसी इलाके से होता हुआ काराकोरम हाईवे भी बनाया था. भारत को उस पर भी आपत्ति थी क्योंकि यह इलाका कश्मीर मसले के तहत विवादित है. इस के बावजूद भारत ने चीन से बहुत अच्छे संबंध बनाए रखे हैं.

‘‘आप देखें तो पिछले 20 सालों में दोनों देशों के बीच 20 गुना व्यापार बढ़ा है. ऐसे में, फिर भारत सीपैक को ले कर अपनी आपत्ति जता रहा है. यह पूरा प्रोजैक्ट 900 अरब डौलर का है जिस में 30-40 देश शामिल हैं. इस में यूरोप भी है, सैंट्रल एशिया भी और ईस्ट एशिया भी है. दक्षिण एशिया से श्रीलंका और नेपाल हैं. भूटान के अलावा सभी दक्षिण एशियाई देश इस में अपनी इच्छा से भाग ले रहे हैं. ऐसे में भारत को भी किसी हद तक इस में शामिल होना चाहिए. साथ ही, वह अपनी आपत्ति भी रखे कि यह विवादित इलाके से जा रहा है.’’

सीमा विवाद

वहीं, भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस मुद्दे पर बयान जारी कर कहा है कि कोई भी देश ऐसे प्रोजैक्ट को स्वीकार नहीं कर सकता जो संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की उस की चिंताओं को नकारता हो. भारत की इस बात में दम है कि कोई देश संप्रभुता की कीमत पर ऐसी परियोजना में शामिल नहीं हो सकता. चीन ने स्वयं कश्मीर की जमीन पर कब्जा किया हुआ है और पाक अधिकृत कश्मीर में वह चीनपाकिस्तान कौरिडोर बना रहा है. चीन के साथ सीमा विवाद तो सुलझने का नाम भी नहीं ले रहा हालांकि दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी हैं. ऐसे में चीन के आश्वासनों को गंभीरता से नहीं लिया जा सकता.

चीन प्रचार जो भी करे, उस का एक मकसद दक्षिण एशियाई देशों के बीच भारत के दबदबे को कम करना है. इस मंसूबे में बहुत हद तक वह कामयाब हो भी गया है. भूटान को छोड़ कर भारत के सभी पड़ोसी देश चीन की परियोजना से जुड़ गए हैं. इन हालात में भारत के सभी पड़ोसी देशों पर चीन की पकड़ और मजबूत हो जाएगी.

वैसे बहुत से आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन द्वारा ओबीओआर के बारे में

की जा रही घोषणाएं कितनी ही नाटकीय और धमाकेदार क्यों न हों मगर उन पर अमल करना आसान नहीं है. इस परियोजना से अगले 4-5 सालों में एशिया और यूरोप का आर्थिक नक्शा बदल जाएगा, यह सोचना सपनों की दुनिया में रहना है. इस परियोजना को मूर्तरूप लेने में अभी 15-20 साल लगेंगे. इतने लंबे समय तक इस परियोजना को खींचने की राजनीतिक और आर्थिक क्षमता चीन की सरकार और बैंकों में है क्या, यह वक्त ही बताएगा. ओबीओआर के समुद्र मार्ग पर साउथ एशिया सी के विवाद का साया होगा. साउथ एशिया सी को ले कर चीन का जापान समेत कई देशों के साथ विवाद है. प्रोजैक्ट के लिहाज से एक बड़ा खतरा सुरक्षा का भी है. सीपीईसी के लिए तालिबान और बलूच समेत कई आतंकी संगठन भी बड़ा खतरा बन सकते हैं. सो, रेशम मार्ग इतना रेशमी नहीं होगा.

भारत, जापान का चीन को जवाब

चीन की वन बैल्ट वन रोड यानी ओबीओआर योजना को चुनौती देने के लिए भारत और जापान ने कदम उठाने शुरू कर दिए हैं. भारत व जापान मिल कर, ईरान, श्रीलंका, बंगलादेश, आग्नेय एशिया और अफ्रीका में व्यूहरचनात्मक दृष्टि से अहम ऐसी कई मूलभूत सुविधा परियोजनाएं हाथ में लेने वाले हैं. एशियाप्रशांत क्षेत्र से ले कर अफ्रीका तक फ्रीडम कौरिडोर विकसित करने की दोनों देशों की योजना का यह अहम पड़ाव है, ऐसा माना जा रहा है. इसे चीन के ओबीओआर को टक्कर देने वाली योजना के तौर पर देखा जा रहा है. साथ ही, दोनों देशों ने अफ्रीका और एशिया के देशों में कई अहम परियोजनाओं में निवेश करने को भी तैयार हैं.

चीन के साम्राज्य के सपने

अफीम युद्धों से पहले चीन दुनिया की सब से बड़ी आर्थिकशक्ति था और आज उस के नेता शी जिनपिंग उसे फिर वही स्थान दिलाना चाहते हैं. चीन पर किसी विदेशी ने लंबा राज नहीं किया है. यूरोप के देशों ने बहुत कोशिश की पर व्यापार का हक मांगने के अलावा वे ज्यादा कुछ न कर पाए.

चीन के नेता चीनी प्रतिव्यक्ति आय, जो 8,000 डौलर है, को वर्ष 2021 तक 10,000 डौलर पर पहुंचा देंगे. भारत की प्रतिव्यक्ति आय केवल 1,700 डौलर है. चीन केवल बड़ी शक्ति नहीं बनना चाहता, वह सब से बड़ी शक्ति बनना चाहता है. और जिस तरह से उस के नेता ओबीओआर से यूरोप और एशिया पर छा रहे हैं, कोई आश्चर्य नहीं कि उस का यह सपना सच हो जाए.

1839 से 1949 तक 100 साल चीन बुरे दौर से गुजरा है. लेकिन अब, वह एक नया इतिहास रचने की तैयारी में है. अमेरिका ने डोनाल्ड ट्रंप जैसा मूर्ख राष्ट्रपति चुन कर चीन का काम आसा

चीन ने नेपाल के सड़क रेल निर्माण प्रस्ताव को स्वीकारा

ओबीओआर को ले कर चल रही रस्साकशी के बीच चीन ने भारत को चिढ़ाने के लिए नेपाल की ओर से इस परियोजना के तहत सड़क और रेलमार्गों के निर्माण के लिए दिए गए प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है. बताया जा रहा है कि चीन अपनी अतिमहत्त्वाकांक्षी परियोजना ओबीओआर के तहत नेपाल में सड़क और रेलमार्गों के निर्माण में भारी निवेश करेगा. हालांकि, भारत ने अभी हाल ही में ओबीओआर परियोजना के तहत दक्षिण एशियाई देशों में सड़क और रेलमार्गों के निर्माण के लिए चीन की ओर से किए जा रहे प्रयासों से खुद को अलग रखने को ले कर स्थिति स्पष्ट कर दी है.

भारत को शामिल करने के लिए चीन का सीपीईसी का नाम बदलने का प्रस्ताव

वन बैल्ट वन रोड योजना में भारत को शामिल कराने के लिए चीन ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी सीपीईसी का नाम बदलने का प्रस्ताव रखा था जिसे विदेश मामलों के विशेषज्ञ चीन के नए दांव के रूप में देख रहे हैं. विदेश मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि चीन इस प्रस्ताव के जरिए भारत का रुख भांपना चाहता है. यही कारण है कि चीन ने सीपीईसी का नाम बदलने का प्रस्ताव देने के साथ ही भारत-पाकिस्तान के सीमा विवाद में नहीं पड़ने की भी बात कही है.

गौरतलब है कि चीन कई बार भारत से ओबीओआर में शामिल होने की अपील करता रहा है. हालांकि भारत ने इसी योजना के तहत बनने वाले सीपीईसी के पाक अधिकृत क्षेत्र से गुजारने के कारण अपना लगातार विरोध दर्ज कराया है.

पूर्व विदेश सचिव सलमान हैदर के मुताबिक, ओबीओआर में भारत को शामिल कराने की चीन की यह पहली कोशिश नहीं है. नया यह है कि इस बार उस ने सीपीईसी का नाम बदलने और भारत-पाकिस्तान सीमा विवाद में नहीं पड़ने की बात कही है. 

जीवन की मुसकान

मैं अपनी बेटी व उस के 2 बच्चों के साथ देहरादून ऐक्सप्रैस के स्लीपर क्लास से कोटा जा रही थी. दिल्ली स्टेशन पर कब मेरे पर्स की जिप खोल कर अंदर से मेरा छोटा पर्स निकाल लिया गया, मुझे पता ही नहीं चला. छोटे पर्स में पैसों के अलावा हमारे टिकट भी थे. जब ट्रेन में अपनी बर्थ का मिलान करने के लिए पर्स खोला तो हम सकते में आ गए. ट्रेन चल पड़ी थी. आसपास के सहयात्रियों को हमारे टिकट न होने का पता चल गया था. तभी टीटीई टिकट चैक करने आया. मैं ने उसे पूरी बात बताई तो वह  कहने लगा, ‘‘आप के टिकट खो गए हैं. दूसरा टिकट बन सके, इतने पैसे आप के पास नहीं हैं. इन बच्चों को न भी गिनें तो आप दोनों के देहरादून से टिकट बनाने होंगे.’’

हमें परेशान देख कर वह फिर बोला, ‘‘मेरे पास जो लिस्ट है, उस में मैं मार्क कर देता हूं कि टिकट चैक हो गए हैं. पर अगर काउंटर चैकिंग हो तो आप को कहना होगा कि टिकट चैक होने के बाद पर्स गुम हुआ है.’’ मैं ने शंका जताई कि ऊपरनीचे सब मुसाफिरों को मालूम है कि टिकट नहीं हैं. टीटीई ने फिर कहा, आप चिंता न करें और बैठ जाएं.’’

हमें अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था. अजीब सी उलझन लिए हम सकुशल घर पहुंचे. रेलवे वालों के करप्शन की कितनी ही बातें हमारे लिए झूठ साबित हुईं.   

मनोरमा दयाल

*

हम गरमी की छुट्टियों में मामा के घर तोशाम गए थे. एक दिन हमारे मामा के बच्चे ट्यूशन पढ़ने जा रहे थे, तब मेरी छोटी बहन, जो 3 साल की थी, चुपके से उन के पीछे चली गई. किसी को भी पता नहीं चला कि वह पीछे आ रही है. वे लोग तो अपनी जगह पर चले गए पर मेरी बहन रस्ता भटक गई. घर पर सब उसे ढूंढ़ढूंढ़ कर परेशान हो रहे थे. तभी 2 नवयुवक गली में आवाज लगाते हुए आए, ‘‘यह बच्ची किस की है?’’ हम ने आवाज सुन कर देखा तो पाया कि वह हमारी बहन थी. उन लोगों ने बताया कि यह उन्हें मंदिर में मिली, वह रो रही थी. उन लोगों ने मंदिर में कई लोगों से पूछा पर किसी ने बच्ची को नहीं पहचाना. इसलिए उन्होंने उसे ले कर पूरे शहर का चक्कर लगाने का फैसला लिया.

आज की दुनिया में ऐसे लोग बहुत कम हैं जो दूसरों के लिए इतना करते हैं. आज उन लोगों की वजह से हमारी बहन हमारे साथ है. इस बात को 2 साल हो चुके हैं पर आज भी उन अनजान लोगों के प्रति दिल श्रद्धा से भर उठता है.

एक पाठक

सफर अनजाना

हम दिसंबर में जबलपुर गए. ट्रेन अपने कसबे से दूर जिला लुधियाना से थी जो मौसम व कोहरे की वजह से 16 घंटे लेट थी. सफर मुझे अपनी बेटी के साथ करना था. गाड़ी के इंतजार में मेरे पति 10 घंटे इंतजार कर के घर वापस लौट गए. दोपहर से रात हो गई.

विश्रामगृह में न जाने कितने यात्री आए, समयसमय पर प्रस्थान करते गए. मगर हम मांबेटी वहीं बैठे रहे क्योंकि गाड़ी मध्यरात्रि 1 बजे के करीब आने वाली थी.

हमारे पास सामान बहुत था. एक तो लंबा इंतजार, ऊपर से बैठेबैठे थकावट, और अभी कम से कम गाड़ी का 36 घंटे का सफर करना था. बड़ी कोफ्त हो रही थी. पिछले 2 घंटों से 2-3 अनजान पुरुष बातें करतेकरते हमें भी आंखों ही आंखों में टटोल रहे थे.

हमें कुछ घबराहट भी थी कि इस अनजान शहर में कुछ अप्रिय न घटित हो जाए. फिर भी हम ने मन कड़ा किया हुआ था किसी भी हालत से दोचार होने के लिए. हमें देख एक आदमी, जो शायद किसी और राज्य से था, जानबूझ कर मुझ से कहने लगा, ‘‘मैडम, आप अकेले जा रही हैं? समय बड़ा खराब है. यह आप की बेटी है?’’

मैं ने जब ‘हां’, कहा तो वह और बातों में उलझाने लगा कि आप कहां जा रही है, क्यों जा रही हैं आदि.

तभी मुझे एक तरकीब सूझी. मैं ने अपनी 25 वर्षीय बेटी की तरफ इशारा कर के उस से कहा, ‘‘दरअसल, मेरी बेटी ने आईपीएस की परीक्षा उत्तीर्ण की है. हम इस की मैडिकल परीक्षा हेतु दिल्ली जा रहे हैं. वहीं से इसे तैनाती एरिया में भेजा जाएगा.’’

जबकि मेरी बेटी साइंस अध्यापिका है, मगर उस के व्यक्तित्व व कदकाठी से वह व्यक्ति गलतफहमी में आ गया. यह सुन कर वह थोड़ा सकपका सा गया कि यह तो भावी पुलिस अध्यक्षा है. फिर तो उस के बातचीत करने का लहजा भी एकदम बदल गया.

वह हम से थोड़ी दूरी बना कर सम्मानपूर्वक तरीके से बैठ कर बड़ी इज्जत से बातें करने लगा. जब गाड़ी प्लेटफौर्म पर आई तो वह हमारा समान भी डब्बे तक छोड़ आया.

मेरे एक झूठ ने शायद कुछ अप्रिय क्षणों को अवतरित होने से पहले ही मिटा दिया. हम सुरक्षित भी रहे और सम्मानपूर्वक भी.

आज भी उस यात्री विश्रामगृह की याद आते ही होंठों पर मंद मुसकान थिरक उठती है.      

कुलविंदर कौर वालिया

अपने कपड़े उतारकर मरीजों का इलाज करती है ये लेडी डॉक्टर, वीडियो वायरल

धरती पर डॉक्टर को भगवान का रूप माना जाता हैं, डॉक्टरों को लेकर समाज में एक छवि बनी हुई हैं. लेकिन, अब ये छवि धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं. इलाज के रोज नये-नये तरीके आ रहे हैं. पश्चिमी देशों में चिकित्सीय सुविधायें काफी अच्छी हैं. हालांकि, इसके साथ ही वहां नई-नई बीमारियां सामने आ रही हैं. जिनके इलाज के लिए अलग-अलग तौर-तरीके अपनाये जा रहे हैं. मेडिकल साइंस लगातार तरक्की कर रहा हैं लेकिन, हमारे देश में अस्पतालों की स्थिति को देखकर कहा जाता हैं कि भगवान न करे कि किसी को भी अस्पताल जाना पड़े.

डॉक्टर का जिक्र होने पर आपके मन एक छवि बनती हैं. सफ़ेद कोट पहने हुए एक शख्स जिसके गले में स्टेथोस्कोप लटकता रहता हैं. लेकिन, ये फीमेल डॉक्टर इस छवि के एकदम विपरीत हैं. वह अपने कपड़े उतारकर मरीजों का इलाज करती है.

जी हां, हम आपको ऐसे ही एक डॉक्टर के बारे में बताने जा रहे है. जिससे मिलने के लिए लोग कतार लगाए खड़े रहते हैं. हो भी क्यों न ये डॉक्टर लोगों का बिना कपड़े पहने इलाज जो कर रही है. अमेरिका के न्यूयॉर्क में रहने वाली 24 वर्षीय साराह व्हाइट एक डॉक्टर हैं. यह एक मनोचिकित्सक है. ये डॉक्टर अस्तपाल में आए पुरुषों का इलाज करते वक्त निर्वस्त्र हो जाती हैं.

सराह व्हाइट का ये वीडियो तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा हैं. वो अपने मरीजों खासकर पुरुष मरीजों का इलाज करते वक्त अपने सारे कपड़े उतार देती हैं. साराह का दावा हैं कि वो इस थेरेपी के जरिये मर्दों की यौन कुंठा बाहर निकालती हैं.

इलाज का ये तरीका मरीजों को खूब पसंद आ रहा हैं. यह डॉक्टर मरीजो की थेरेपी करती है जो मरीजो को काफी पसंद आ रही है और वह एक सेशन की कीमत 7000 रुपए लेती है. यह खबर जबसे फैलने लगी है, उसके बाद से इलाज करवाने के लिए भीड़ जमा होनी शुरू हो गयी है. इस फीमेल डॉक्टर ने इलाज करने का एक नया तरीका अपनाया है.

साराह के मुताबिक वह दुनिया के महान चिकित्सक फ्रायड की थ्योरी के अनुरुप इलाज कर रही हैं. आपको बता दें कि साराह निर्वस्त्र थेरेपी से इलाज ऑनलाइन करती हैं. मरीजों के इलाज के लिए वह वेबकैम का इस्तेमाल करती हैं. मरीज से बात करते-करते वो अपने सारे कपड़े उतार देती हैं. वो दावा करती हैं कि मर्दों के अंदर दबी हुई यौन कुंठा को बाहर निकालती हैं. इस थेरेपी के जरिये वह मरीजों के साथ बहुत जल्द अंतरंग संबंध बना लेती हैं. जिसके कारण मरीज खुलकर अपनी दबी हुई इच्छाओं को जाहिर करते हैं.

पहली बार कैमरे के सामने आई सोनम गुप्ता, दिया इंटरव्यू

अभी पिछले साल दिसंबर में भारत देश में नोटों को लेकर लहर दौड़ रही थी. हर कहीं नोटों की कमीं थी, तो कहीं लोग 500 और 1000 के नोट पानी में फेंक रहे थे, तो कहीं लोग अपने नोटों को लेकर बैंक के सामने लाइन में खड़े थे. किसी के पास टाइम नहीं था. आजकल के युवा भी अपनी गर्लफ्रैंड और ब्वॉयफ्रैंड को भूलकर बैंक और एटीएम की लाइन में खड़े थे.

लेकिन इन सबके बीच एक आशिक ऐसा था जिसको ना बैंकों से मतलब, ना पुराने और नये नोटों से मतलब. यहां तक की उसके लिये तो ये सारे नोट एक कागज के टुकड़े के समान हैं. आप समझ ही गये होंगे हम किसकी बात कर रहे हैं, जी हां हम सोनम गुप्ता के आशिक की बात कर रहे हैं. उसके हाथ जो नोट लगा उसने सोनम गुप्ता की बेवफाई का कच्चा चिठ्ठा नोट पर खोल दिया, लेकिन अब सोनम भी चुप नहीं बैठी है. हाल ही में फेसबुक पर उसका वीडियो जारी किया है.

शायद सोनम गुप्ता को अपने आशिक की ये बात अच्छी नहीं लगी और उसने अपनी बेवफाई के इल्जाम को झूठा करने का फैसला ले ही लिया. इंटरनेट पर ये वीडियो अपलोड किया गया है. जिसमे सोनम गुप्ता अपनी बेवफाई का सबूत देती है.

वीडियो में देखा गया है सोनम इंटरव्यू के दौरान काफी भावुक होती दिखती है और बताती है कि उसके कारण उसके घर वाले कितने हैं परेशान. वायरल वीडियो में सोनम अपनी परेशानियों का जिक्र करते हुए रोती दिखी, साथ ही सोनम का कहना है कि उनके पापा कहते हैं कि उनकी बेटी के कारण उनकी बदनामी हुई है. ऐसा सोचकर कभी-कभी उनका मन सुसाइड करने का मन करता है.

सोनम ने कहा है कि देश में पता नहीं कितनी सोनम हैं जिनकी बदनामी हुई है. ऐसा कभी नहीं करना चाहिए. वीडियो मे सोनम गुप्ता के आशिक रवि भी सोनम गुप्ता से माफी मांगते हुऐ दिखे. उनका मानना ये है कि उनको नहीं पता था कि उसका इतना बड़ा प्रभाव पड़ेगा. पर इस बात पर सोनम ने उनको माफ नहीं किया.

सोनम ने इंटरव्यू में कहा कि किसी के नाम से मजाक नहीं बनाना चाहिए, इसी वीडियो में सोनम ने मुन्नी बदनाम हुई और शीला जैसे गानों के बारें मे भी लड़कियों को हो रही परेशानी के बारे में बताया.

मैं तो सिर्फ अच्छा काम करना चाहता हूं : शिव पंडित

रेडियो जॉकी, मॉडलिंग, विज्ञापन फिल्में, आईपीएल का संचालन से लेकर ‘‘शैतान’’,‘बॉस’, ‘मंत्रा’ सहित एक दर्जन फिल्मों व पांच टीवी सीरियलों में अभिनय कर शिव पंडित ने काफी पापड़ बेले हैं. पर अफसोस की बात यह है कि अभिनय की तारीफ होने के बावजूद उन्हें कलाकार के तौर पर व्यावसायिक सफलता नहीं मिली है. इन दिनों वह ‘नेट फ्लिक्स’ के माध्यम से 135 देशो में दिखायी जा रही ‘गे’ की त्रिकोणीय प्रेम कहानी वाली फिल्म ‘‘एल ई ओ वी’’ में भी उनके अभिनय को काफी सराहा जा रहा है.

अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताएं?

मेरे पिता सरकारी नौकर हैं, तो कई जगह तबादले होते रहे हैं. मैं दिल्ली, चंडीगढ़, कर्नाटक कई जगह रह चुका हूं. कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद मुझे रेडियो मिर्ची में रेडियो जॉकी की नौकरी मिली. इसलिए मैं मुंबई आ गया. दो साल तक मैंने रेडियो मिर्ची में काम किया. फिर टीवी पर कुछ विज्ञापन फिल्में की. फिर मैंने टीवी पर सीरियल ‘एफआईआर’ में अभिनय किया. मैंने आईपीएल को हॉस्ट किया. तो मेरे साथ चीजें अपने आप हो रही थी, जो सही लग रहा था, मैं करता चला जा रहा था. आईपीएल के बाद मुझे फिल्म ‘शैतान’ में अभिनय करने का मौका मिल गया. ‘शैतान’ की वजह से ही मैं आज ‘बॉस’ में रोमांटिक लीड कर पाया हूं. अब तक दस-बारह फिल्में कर चुका हूं. मेरी एक तमिल फिल्म ‘‘लीलाय’’ अंतरराष्ट्रीय जगत में धूम मचा चुकी है.

आपको जो सफलता मिलनी चाहिए थी,वह अब तक नहीं मिली?

फिल्म ‘शैतान’ के समय मुझे दर्शकों का बहुत प्यार मिला था. उसकी वजह से मुझे बिग बजट व्यावसायिक फिल्म ‘‘बॉस’’ में अक्षय कुमार, डैनी, रोनित राय व मिथुन चक्रवर्ती के साथ काम करने का अवसर मिला, मगर इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर आपेक्षित सफलता नहीं पायी. वास्तव में जब हम फिल्म साइन करते हैं या जब फिल्म बन रही होती है, तब तो हमें पता नहीं होता कि यह फिल्म सफल होगी या नहीं. हम सिर्फ अपना पूरा प्रयास करते हैं, वही हमने किया था. पर कभी कुछ चल जाता है? कुछ नहीं चलता है. वैसे आज कल जिंदगी में आप देखेंगे, तो पाएंगे कि हर क्षेत्र में लोग धैर्य खो रहे हैं. अग्रेसन बढ़ रहा है. इसलिए आज की तारीख में सफलता से ज्यादा यात्रा महत्वपूर्ण हो गयी है. पिछले दिनों ‘मंत्रा’ को काफी सराहा गया. अब ‘नेटफ्लिक्स’ पर प्रसारित हो रही फिल्म ‘एल ई ओ वी’ को 135 देशों के दर्शक पसंद कर रहे हैं. मेरी राय में अच्छी कमर्शियल फिल्म का इंतजार करने की बजाय जो अच्छी फिल्में मिलें, वह करनी चाहिए. मेरी अभिनय यात्रा अच्छी चल रही है.

आपने क्या सोचकर ‘‘गे’’ की प्रेम कहानी वाली फिल्म ‘‘एल ई ओ वी’’ की?

मेरे हिसाब से कलाकार के तौर पर अलग-अलग फिल्में करना बहुत जरुरी होता है. मैं किसी एक ढर्रे पर नहीं बंधना चाहता. मैं वह काम करना चाहता हूं, जिसकी प्रशंसा पूरे विश्व में हो. मैं सिर्फ अच्छी फिल्में करना चाहता हूं.

‘‘गे’’ समुदाय से जुड़े लोगों के प्रति पहले आपका नजरिया क्या था. क्या उस नजरिए में अब बदलाव आया?

मेरे कई दोस्त ‘गे’ हैं. पर मुझे अपने और उनमें कोई अंतर नहीं महसूस होता. हमारी दोस्ती में उनका सेक्सुअल स्टेटस मायने नहीं रखता. मैं उन्हें उनके व्यक्तित्व से जज करता हूं. इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद बहुत अच्छे संदेश मिल रहे हैं. लोग कह रहे हैं कि पहली बार भारत में ऐसी फिल्म बनी है, जिसमें ‘गे’ समुदाय से जुड़े लोगों की खिल्ली नहीं उड़ायी गयी है. यह फिल्म ‘गे’ समुदाय को लेकर एक परिपक्व व सकारात्मक दृष्टिकोण रखती है.

किसी फिल्म का चयन करते समय क्या सोचते हैं?

मैं सोचता नही हूं. जो ऑफर आते हैं, उनमें से बेहतर करने की कोशिश करता हूं. मैं चाहता हूं कि मेरी फिल्में लोगों को पसंद आएं. लोग मुझे एक बेहतरीन कलाकार के रूप में पहचाने. इसलिए यही कोशिश है कि अलग-अलग फिल्मों में अलग-अलग किरदार निभाउं. मुझे 24 घंटे काम करना है. मुझे एक्शन करना है. कॉमेडी करना है. ट्रेजिडी करना है. इसी तरह मुझे हर निर्देशक के साथ काम करना है. अनुराग बसु, विजय नांबियार, दिबाकर बनर्जी, अनुराग कश्यप जैसे निर्देशकों के साथ काम करना चाहता हूं. मैं तो सिर्फ अच्छा काम करना चाहता हूं.

क्या भारत में इंटरनेट पर फिल्म देखने वालों की संख्या थिएटर में जाकर फिल्म देखने वालों से अधिक है?

भारत में इंटरनेट पर फिल्म देखने वालों की संख्या कम नही है. हम तो एक नया बदलाव लाने का काम कर रहे हैं. कलाकार व रचनात्मक इंसान के तौर पर हमारा दायित्व बनता है कि हम ज्यादा से ज्यादा रचनात्मक काम करें. हम दर्शकों को ज्यादा से ज्यादा बेहतर कटेंट परोसें. हमने ‘लव’ के माध्यम से भारतीय सिनेमा को विश्व स्तर पर पहुंचाया है.

निर्देशकों की तुलना कैसे करेंगे?

फिल्म इंडस्ट्री में काम करने की खूबी यही है कि हमें हर तरह के और हर वर्ग के लोगों के साथ काम करने का अवसर मिलता है. और आपका अनुभव आपकी यात्रा में मदद करता है. अब मेरा आत्म विश्वास बढ़ा है.

क्या आपको गैर फिल्मी परिवार का होने का नुकसान उठाना पड़ रहा है?

फिल्मी परिवार से जुड़े लोगों के बच्चों को पहले ब्रेक मिलना आसान होता है, पर अंततः उन्हें भी अपनी प्रतिभा को साबित ही करना पड़ता है. दर्शक को इस बात से कोई मतलब नही होता कि आप स्टार पुत्र हैं या नहीं, उसके लिए आपकी परफार्मेंस मायने रखती है.

युवराज की फील्डिंग पर जहीर ने उठाए सवाल

टीम इंडिया के पूर्व तेज गेंदबाज जहीर खान ने अपने दोस्त और टीम इंडिया के मिडल ऑर्डर की शान युवराज सिंह से उनकी फील्डिंग को लेकर सवाल पूछा है. जहीर ने पूछा कि युवराज तुम मेरी तरह फील्डिंग क्यों कर रहे हो?

दरअसल युवराज ने इन दिनों जहीर के ट्वीट को लेकर सवाल पूछा था. जहीर ने श्रीलंका बनाम बांग्लादेश मैच पर एक ट्वीट किया था. इस ट्वीट में जहीर ने श्रीलंका और पाकिस्तान के बीच खेले गए रोमांचक मैच के सूरतेहाल पर एक ट्वीट किया था. इस ट्वीट पर युवराज ने अपने दोस्त से एक सवाल पूछ लिया.

जहीर के इस ट्वीट पर युवराज ने पंजाबी में इस पूर्व बाएं हत्था तेज गेंदबाज से पूछा, ' ओह तू बड़े ट्वीट कर रहा आजकल कि गल (क्या बात है)?'

युवी की इस पर चुटकी पर जहीर ने अपने इस दोस्त को कहा, 'मैं भले ही तुम्हारी तरह ट्वीट कर रहा हूं युवराज, लेकिन तुम मेरी तरह फील्डिंग क्यों कर रहे हो? हाहाहा'

बता दें कि जहीर खान अपनी स्टीक लाइन लेंथ और स्विंग के लिए भले ही मशहूर रहे हैं, लेकिन वह औसत दर्जे के फील्डर थें. जहीर अपने दोस्त युवी से चाहते हैं कि वह अपनी साख के मुताबिक ही अच्छी फील्डिंग करें. 

महिला बचत खाचा या सामान्य बचत खाता, क्या है बेहतर

अगली बार जब आप बैंक जाएं तो बैंक कर्मी से एक बार महिला बचत खाते के बारे में जरूरी पूछिएगा. आपको जानकर हैरानी होगी कि महिला बचत खाता एक सामान्य बचत खाते की तुलना में ज्यादा फायदेमंद रहता है. यह खाता कैश बैक रिवार्ड के साथ ही कई मायनों में फायदेमंद रहता है. महिला बचत खाते से जुड़ी हर कुछ खास बातें.

यह बचत खाता विशेषतौर पर महिलाओं के लिए ही तैयार किया गया है. यह खास कैशबैक रिवार्ड के साथ ही इस खाते पर कई अन्य आकर्षक ऑफर की पेशकश करता है, जो महिलाओं की दैनिक जरूरतों को पूरा करते हैं.

हालांकि अगर आप भी अपनी पत्नी के लिए यह विशेष महिला बचत खाता खुलवाने जा रहे हैं, तो एक बार अच्छे से सोच विचार कर लें कि आपको यह खाता खुलवाना चाहिए या नहीं. आपको सोचना चाहिए कि क्या सही मायनों में सामान्य बचत खाते की तुलना में महिला बचत खाता बेहतर रहेगा या नहीं. ICICI, HDFC, Kotak Mahindra और RBL जैसे कई बैंक महिलाओं के लिए इस तरह के विशेष खाते की सुविधा कराते हैं.

किसके लिए है ये खाता बेहतर

महिला बचत खाता विशेष तौर पर उन महिलाओं के लिए फायदेमंद रहेगा, जो बचत खाते पर ज्यादा से ज्यादा लाभ पाने की तलाश में रहती हैं. साथ ही इन खातों में उतना ही न्यूनतम बैलेंस रखने की जरूरत होती है जितना की सामान्य बचत खाते के लिए होती है.

कैसे खोला जाएगा खाता

महिला बचत खाते (Woman's savings account) को एक महिला या तो व्यक्तिगत तौर पर खोल सकती है या फिर इसे ज्वाइंट होल्डिंग के मामले में इसे प्राइमरी होल्डर के तौर पर खोला जा सकता है. इन खातों में काफी सारे रिवार्ड के साथ ही कस्टमाइज फीचर्स की पेशकश की जाती है और इनमें डेबिट कार्ड लिंक्ड होता है.

इस खातों में क्यों है विशेष ऑफर की पेशकश

एक महिला बचत खाते के अंतर्गत कुछ ऐसी सेवाओं की पेशकश की जाती है जो समान्य बचत खाते में नहीं दी जाती हैं. कोटक महिंद्रा बैंक अपने सिल्क-महिला बचत खाते के अंतर्गत होम बैंकिंग सर्विस की पेशकश करता है. इसके अंतर्गत खाताधारक कैश पिकअप, कैश डिलीवरी, चेक/ ड्राफ्ट डिलीवरी आदि जैसी सेवाओं का आनंद ले सकते हैं. हालांकि यह सेवा सिर्फ चुनिंदा शहरों में ही है.

HDFC बैंक 1 लाख रुपए तक का एक्सीडेंटल हॉस्पिटलाइजेशन कवर और 10 लाख रुपए तक का एक्सीडेंटल डेथ कवर देता है. वहीं आरबीएल महिला बचत खाते के अंतर्गत देश के किसी भी एटीएम से अनगिनत बार कैश निकासी की सुविधा देता है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें