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सवा 2 लाख एटीएम मशीनों से हो रही है निकासी

देश में एटीएम आधारित बैंकिंग कारोबार परवान चढ़ रहा है. एटीएम से निकासी की दर लगातार बढ़ रही है. एटीएम से लोग किस कदर अपना काम चला रहे हैं, इस का प्रमाण नोटबंदी के दौरान एटीएम पर लगी लोगों की लंबी कतारें रही हैं. महानगरों में किस एटीएम पर पैसा आया है, यह सूचना आग की तरह फैलती थी और देखते ही देखते एटीएम के बाहर लोगों की लंबी कतारें लग जाती थीं.

सरकार ने एटीएम की निकासी पर कुछ शुल्क बढ़ा दिए हैं और नई शर्त लगा दी है. इस के बावजूद लोगों की एटीएम से निकासी का उत्साह कम नहीं हुआ है. यह आम आदमी के लिए बड़ी सुविधा है. बैंकों को इस से बड़ी राहत मिली है. इसलिए वे इस सुविधा पर शुल्क बढ़ा कर कमाई भी करने लगे हैं और एटीएम की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है.

पिछले वर्ष मार्च से इस मार्च तक देश में 10 हजार से ज्यादा नए एटीएम लगाए गए हैं. एक आंकड़े के अनुसार, मार्च 2016 में देश में कुल एटीएम की संख्या 2 लाख 12 हजार 61 थी जो इस साल बढ़ कर 2लाख 22 हजार 475 हो चुकी है. पिछले वर्ष दिसंबर तक देश में एटीएम की संख्या बढ़ कर 2 लाख 19हजार 793 तक पहुंच चुकी थी. बैंकों ने उस के बाद रफ्तार पकड़ी है.

दरअसल, एटीएम कार्ड आम जरूरत की चीज बन गई है. लोगों के जेब में नकदी के बजाय एटीएम कार्ड होता है. चूंकि एटीएम हर जगह उपलब्ध हैं, इसलिए लोग नकदी रखने का जोखिम नहीं उठाते और जहां जरूरत पड़ती है एटीएम का इस्तेमाल करते हैं. बैंकर एटीएम की संख्या बढ़ाते जा रहे हैं जो डिजिटल इंडिया के लिए महत्त्वपूर्ण पड़ाव बन रहा है.

जीएसटी को ले कर तीखे हैं शेयर बाजार के तेवर

बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई में धूम मची है और मई के आखिरी पखवाड़े में भी सूचकांक 31,000 अंक के मनोवैज्ञानिक स्तर के पार ही रहा. नैशनल स्टौक एक्सचेंज में भी धूम रही और इस का सूचकांक रिकौर्ड स्तर को पार कर गया.

शेयर बाजार को लगातार ही पंख लग रहे हैं और वह मई में नई ऊंचाई की तरफ तेजी से बढ़ता रहा. नई कर प्रणाली जीएसटी को ले कर श्रीनगर में जैसे ही जीएसटी परिषद की बैठक के सकारात्मक कदमों की खबर मिलती रही, शेयर बाजार कुलांचे मारता गया. इस बीच पाकिस्तान के साथ तनाव बढ़ने से बाजार में थोड़ी गिरावट आई लेकिन यह ज्यादा देर नहीं रही और सूचकांक फिर नए रिकौर्ड की तरफ रुख कर गया. जानकारों का कहना है कि बाजार के तेवर जीएसटी को ले कर तीखे हैं और आने वाले समय में बाजार फिर नए रिकौर्ड बना सकता है.

सभी मेमोरी कार्ड में है खूबी, जानिए आपके लिए क्या है परफेक्ट

स्मार्टफोन खरीदने के बाद अक्सर लोग मेमोरी कार्ड भी खरीद ही लेते हैं. इससे ना सिर्फ उन्हें स्टोरेज बढ़ाने में मदद मिल जाती है बल्कि तस्वीरें और वीडियो अपने लैपटॉप या कम्प्यूटर में ट्रांसफर करने में भी आसानी होती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जो मेमोरी कार्ड आप खरीद रहे हैं वो अपके फोन के लिए सही है भी या नहीं.

मेमोरी कार्ड खरीदना कई बार एक परेशान करने वाला काम होता है क्योंकि बाजार में इतने प्रकार के मेमोरी कार्ड उपलब्ध हैं कि उनमें से सही कार्ड का चयन मुश्किल हो जाता है. बाजार में यह कार्ड अलग-अलग साइज, कैपेसिटी, क्लास और स्पीड के साथ उपलब्ध हैं. इनमें से कई मोबाइल फोन में फिट होते हैं और कुछ केवल कैमरे के लिए होते हैं. आपका ये जान लेना बहुत जरूरी है कि कैसे आप अपने फोन के लिए परफेक्ट मेमोरी कार्ड चुन सकते हैं.

तीन साईज और कैपेसिटी अलग-अलग

मेमोरी कार्ड तीन साईज में आते हैं जिन्हें ‘फुल’, ‘मिनी’ और ‘माइक्रो’ के नाम से जाना जाता है. इनकी स्टोरेज कैपेसिटी 2 जीबी से लेकर 2 टीबी(टेराबाइट) तक हो सकती है. इनमे से फुल साइज वाले कार्ड ज्यादातर डिजिटल कैमरा, ऑडियो रिकॉर्डर के लिए उपयोग किए जाते हैं. जबकि माइक्रो एसडी कार्ड आजकल हर मोबाइल में यूज किए जाते हैं. मेमोरी कार्ड की कैपेसिटी के अलावा यह भी देखना जरूरी होता है कि आपका कैमरा या फोन कितनी कैपेसिटी के कार्ड को सपोर्ट करता है.

कैपेसिटी के भी प्रकार, क्या लें

कैपेसिटी की बात करें तो इसमें भी अलग-अलग प्रकार हैं और उसी के हिसाब से मोमोरी कार्ड भी उपलब्ध हैं. यह तीन प्रकार के होते हैं, SD, SDHC, SDHX. आम एसडी कार्ड की कैपेसिटी 2जीबी तक होती है जबकि 4 जीबी से 32 जीबी तक की कैपेसिटी वाले कार्ड SDHC कार्ड होते हैं. इससे ज्यादा कैपेसिटी के लिए SDHX कार्ड आता है जो 32जीबी से 2टीबी तक की क्षमता वाला होता है. वैसे किसी भी स्मार्टफोन के लिए 8 जीबी से 32 जीबी तक का कार्ड काफी होता है.

स्पीड पर दें ध्यान

मेमोरी कार्ड की कैपेसिटी के बाद अब आती है इसकी स्पीड की बात. ज्यादातर लोग मेमोरी कार्ड खरीदते समय इस बात पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते कि उसकी स्पीड क्या है. किसी भी मेमोरी कार्ड की स्पीड इस पर लिखी होती है और उससे यह पता चलता है कि यह कितनी तेजी से किसी कम्प्यूटर या लैपटॉप में इसके अंदर सेव किए गए डेटा को ट्रांसफर करता है. आज ज्यादातर कार्ड ‘क्लास 4’, ‘क्लास 6’ और ‘क्लास 10’ के आते है.

अगर आपका उपयोग साधारण है तो आप कोई भी कार्ड चुन सकते हैं लेकिन अगर आप एचडी क्वालिटी के वीडियो और फोटो ले रहे हैं तो आपके लिए क्लास 4 या क्लास 6 का मेमोरी कार्ड सही रहेगा. क्लास 10 का मेमोरी कार्ड उनके लिए परफेक्ट होगा जो हाई रिजॉल्यूशन के वीडियो बनाते हैं.

इन बातों पर दें ध्यान

  1. कोई भी मेमोरी कार्ड खरीदने से पहले यह तय करें की आपकी जरूरत कैसी है.
  2. आपको कार्ड का प्रयोग करते समय कितनी स्पीड से डाटा प्रोसेस करना है.
  3. आपका बजट कितना है.
  4. कार्ड के साथ वारंटी कितने समय की दी जा रही है.

फोन मेमोरी खाली करते समय अपनाएं ये आसान तरीके

स्मार्टफोन हर कोई इस्तेमाल करता है. यूजर्स अपने फोन में अपनी निजी फाइल्स, फोटो, वीडियो और डॉक्यूमेंट्स को सेव करके रखते हैं. इसके लिए उन्हें फोन में ज्यादा स्पेस की आवश्यकता होती है. कई यूजर्स को फोन में कम मैमोरी की प्रॉब्लम का सामना करना पड़ता है क्योंकि उनके फोन में एसडी कार्ड नहीं होता. इस परेशानी के चलते यूजर्स ऐप्स इंस्टॉल करने में भी असमर्थ रहते हैं. हालांकि, अगर यूजर चाहें तो लो मेमोरी की इस प्रॉब्लम को खूद सॉल्व कर सकते हैं. इसके कुछ आसान से तरीके हैं.

क्लियर कैश डाटा

फोन में स्पेस खाली करने का सबसे अच्छा तरीका कैश को क्लियर करना है. इसके लिए यूजर्स को सेटिंग्स में जाना होगा. फिर स्टोरेज में जाकर ऐप्स पर टैप करना होगा. इसके बाद हर ऐप को ओपन करें और Clear Data और Clear Cache के ऑप्शन पर क्लिक कर दें. इसके अलावा फोन की इंटरनल मैमोरी के कैश को भी क्लियर करना आवश्यक होता है.

गूगल फोटोज का उपयोग

अगर आपके फोन में एसडी कार्ड का ऑप्शन नहीं है तो आप अपनी फोटोज को गूगल फोटोज में मूव कर सकते हैं. गूगल यूजर्स को 15 जीबी का फ्री क्लाउड स्पेस देती है. इसमें 16 एमपी साइज वाली फोटोज और एचडी वीडियो को सेव कर सकते हैं.

लाइट ऐप्स का इस्तेमाल

सभी के फोन में फेसबुक, मैसेंजर और यूट्यूब समेत कई ऐप्स मौजूद होते हैं. इन ऐप्स और इनके अपडेट्स से फोन की मैमोरी काफी हद तक भर जाती है. आपको बता दें कि इन सभी ऐप्स का प्ले स्टोर पर लाइट वर्जन भी मौजूद है. लाइट वर्जन फोन की इंटरनल मैमोरी में कम स्पेस लेते हैं.

क्लाउड स्टोरेज का उपयोग

अगर आपके फोन की इंटरनल मैमोरी भर जाती है तो आप क्लाउड स्टोरेज देने वाले ऐप्स जैसे Dropbox, OneDrive और Google Drive में अपना डाटा सेव कर सकते हैं. यहां डाटा बिल्कुल सुरक्षित रहता है. यहां पर डॉक्यूमेंट्स को अलग-अलग फोल्डर बनाकर अरेंज किया जा सकता है.

पुराना डाटा करें डिलीट  

कई बार हम फोटोज या वीडियो डाउनलोड करके भूल जाते हैं. ये डाटा फोन की मैमोरी लगातार भरता रहता है. ऐसे में इन्हें डिलीट करना एक बेहतर ऑप्शन है. इससे आपके फोन की मैमोरी में स्पेस बन जाएगा.

ऐप्स को करें एसडी कार्ड में ट्रांसफर

अगर आपके पास एसडी कार्ड है तो आप फोन में मौजूद ऐप्स को उसमें मूव कर सकते हैं. क्योंकि ये सभी फोन की इंटरनल मैमोरी में सेव होती हैं. इसके लिए सेटिंग्स में जाकर स्टोरेज में जाएं और फिर ऐप्स पर टैप करें. इसके बाद Move to card पर टैप कर दें. आपको बता दें कि जो ऐप्स में प्री-इंस्टॉल्ड होती हैं या रजिस्टर्ड होती हैं उन्हें मूव नहीं किया जा सकता है.

क्रिकेट मैदान को जंग का मैदान न बनाएं

क्रिकेट को धर्म समझने वाले इस देश में खेलप्रेमियों के लिए क्रिकेट हमेशा से एक भावनात्मक पहलू रहा है. लेकिन जब भारत और पाकिस्तान के बीच मुकाबला हो तो यह उफान और तेज हो जाता है. पान की गुमटी,चाय की दुकान, घर, औफिस, चौराहों आदि जगहों पर यह चर्चा अपने शबाब पर होती है.

इस बात को खेल के ठेकेदार और राजनेता भांप चुके हैं. जैसे ही भारत और पाकिस्तान के बीच मैच खेलने की बारी आती है तो राजनेताओं और खबरिया चैनलों को एक मुद्दा मिल जाता है और इस पर बहसबाजी शुरू हो जाती है. खबरिया चैनलों में विशेषज्ञों और राजनेताओं के बीच गरमागरम बहस शुरू हो जाती है.

माहौल ऐसा तैयार कर दिया जाता है कि सब की जबान पर यही होता है कि चाहे कुछ भी हो पर पाकिस्तान के साथ मैच हारना नहीं. इस का मनोवैज्ञानिक असर खिलाडि़यों पर भी देखने को मिलता है.

शायद इसीलिए 18 जून तक चलने वाला आईसीसी चैंपियंस ट्रौफी के लिए इंगलैंड रवाना होने से पहले भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली गुस्सा हो गए.

कप्तान साहब का गुस्सा होने का कारण यों था कि प्रैस कौन्फ्रैंस के दौरान एक पत्रकार ने विराट कोहली से पूछ लिया कि मौजूदा घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए क्या पाकिस्तान के खिलाफ मैच खेलना सही होगा? विराट का जवाब था कि इस बारे में आप क्या सोचते हैं? फिर पत्रकार ने कहा कि देश आप का विचार जानना चाहता है तो विराट ने जवाब दिया कि इस से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आप पहले ही इस बारे में अपनी राय बना चुके हैं.

दोनों देशों के बीच होने वाले क्रिकेट मैच अब राष्ट्रीय पूर्वाग्रह के शिकार हो चुके हैं. ऐसे में खेलों का अपना मूल उद्देश्य शांति, सद्भाव व मैत्री वगैरा से भटक कर बदले की भावना से ओतप्रोत देखने को मिलता है.

सीमा पर जो तनाव हमेशा दिखता है वही अब दोनों देशों के मैच के दौरान 22 गज की पिच पर नजर आने लगा है. खिलाडि़यों पर दर्शकों का दबाव साफ दिखाई देता है. मैदान में दोनों देशों के खिलाड़ी तीखी नोकझोंक करते दिखाई देते हैं. मैदान में जितनी नोकझोंक दोनों देशों के खिलाड़ी करते हैं उतनी अन्य टीमों के साथ कहीं नहीं होती.

दरअसल, हारजीत के माने इतने बड़े कर दिए जाते हैं कि भारतीय खिलाडि़यों पर दबाव पड़ना स्वाभाविक है. पाकिस्तानी खिलाडि़यों के साथ भी ऐसा ही होता है. पाकिस्तान में तो भारत से मैच हारने के बाद खिलाडि़यों की सुरक्षा बढ़ा दी जाती है. यहां तक कि उस समय के कप्तान को कप्तानी तक गंवानी पड़ जाती है. जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए.

खेल को खेल की तरह लेना चाहिए. कम से कम खिलाडि़यों को तो इस बात पर अमल करना चाहिए. भारतीय कप्तान भले ही यह कह रहे हों कि पाकिस्तान के खिलाफ मैच सिर्फ खेल का हिस्सा होता है पर खिलाडि़यों के चेहरों पर मैदान में यह दिख जाता है. ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि पाकिस्तान को दुनियाभर में आतंक की फैक्टरी माना जाता है.

आए दिन पाकिस्तान सीमापार से घुसपैठ कराता रहता है. कभी सैनिकों को तो कभी निर्दोषों को आतंकवादी अपना शिकार बनाते हैं. हरदिन सीमापार से घुसपैठ और गोलीबारी की लड़ाई भारत को लड़नी पड़ रही है और ऐसी ही लड़ाई यदि खेल के मैदान में बौल और बल्ले के बीच लड़ी जाए, यह ठीक नहीं, क्योंकि खेल खेल है इसे रण का मैदान बनाना उचित नहीं है.

हालांकि, यह सिलसिला चलता रहेगा. यह आज से नहीं वर्षों से होता आया है. राजनेताओं का काम राजनीति करना है. अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो उन की दुकान बंद हो जाएगी. वे तो चाहते ही हैं कि कोई एक जरिया मिले जिसे मुद्दा बना कर राजनीति की रोटियां सेंकी जाएं. फिलहाल तो क्रिकेट मैच उन्हें बड़ा मुद्दा मिल गया है.

इसी तरह खेल कारोबारी इसे तुरंत लपकना चाहते हैं. वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि दोनों देशों के मुकाबले में पैसों की बरसात पक्की है.

खेलों के जरिए लोगों की भावनाएं भड़काने से फायदा न खिलाड़ी को होता है न खेल को. विराट का यह कहना कि सबकुछ पहले से तय है, एक खिलाड़ी का आत्मविश्वास नहीं बल्कि उस की खीज बयां करती है. 

लोकतांत्रिक कमजोरी घूसखोरी

जल संसाधन महकमे के चतुर्थ श्रेणी के एक मुलाजिम नामदेव नागले को अपनी बेटी की शादी के लिए पैसों की जरूरत थी. इस बाबत उन्होंने अपने जीपीएफ के पैसे निकालने के लिए फौर्म भरा. उन्हें 1 लाख 65 हजार रुपए की राशि मंजूर भी हो गई पर अड़ंगा डाल दिया एक क्लर्क रमाशंकर मौर्य ने कि बगैर 4 हजार रुपए की घूस लिए वह यह राशि जारी नहीं करेगा.

इस पर नामदेव का बड़बड़ाना लाजिमी था क्योंकि एक महीने बाद मई में उन की बेटी की शादी थी. यह जानते हुए भी कि जीपीएफ का पैसा उन का हक है, वे मन मार कर रिश्वत देने को तैयार हो गए.

अप्रैल के पहले हफ्ते में नामदेव नागले ने घूस के एक हजार रुपए एडवांस में दे भी दिए और रमाशंकर के आगे गिड़गिड़ाए कि राशि खाते में आते ही बाकी 3 हजार रुपए भी दे देंगे. पर इस बाबू को तजरबा था कि घूस देने के मामले में लोग इतने ईमानदार नहीं होते कि काम हो जाने के बाद बकाया रकम दे दें, इसलिए वह अंगद के पांव की तरह अड़ गया कि बाकी पैसे दो, तभी भुगतान होगा.

इस पर हैरानपरेशान नामदेव के बेटे राजू ने लोकायुक्त पुलिस में शिकायत कर दी. 6 अप्रैल को रमाशंकर भोपाल के जुबली गेट पर पहुंचा तो लोकायुक्त पुलिस ने उसे राजू से घूस लेते रंगे हाथों धर लिया.

बेअसर खबरें

इस और ऐसी खबरों का कोई असर अब किसी पर पड़ता हो, ऐसा कतई नहीं लगता. देशभर में रोजाना सैकड़ों लोग घूस लेते पकड़े जाते हैं. इस से लगता यह है कि घूसखोरी को एक सामाजिक मंजूरी मिल चुकी है.

किसी भी सरकारी दफ्तर में छोटेबड़े काम के लिए चले जाइए, बगैर घूस दिए कुछ नहीं होता. काम जायज हो या नाजायज, नजराना तो देना ही पड़ता है. जाहिर है हर रोज लाखोंकरोड़ों रुपए सरकारी मुलाजिम घूस खाते हैं और किसी का कुछ खास नहीं बिगड़ता. थोड़ाबहुत हल्ला तब जरूर मचता है जब किसी छोटे मुलाजिम के पास से उस की हैसियत और औकात से ज्यादा जायदाद बरामद होती है.

तब भी लोग पहले की तरह यह नहीं कहते कि घूसखोरी बढ़ रही है, बल्कि इस बात पर हैरानी जताते हैं कि एक चपरासी के पास करोड़ों की जायदाद निकली या फिर 30-35 हजार रुपए महीने की पगार वाले बाबू के घर छापे में इतने किलो सोना, इतनी जमीनें, इतना नकदी और इतनी गाडि़यां मिलीं. क्या जमाना आ गया है.

जमाना धीरेधीरे होते यह आ गया है कि घूसखोरी को लोगों ने तथाकथित भाग्य की तरह स्वीकार लिया है. इस का अब बड़े पैमाने पर कोई विरोध नहीं होता. जाहिर है बातबात पर भड़कने वाले आम लोगों ने घूसखोरों और घूसखोरी के सामने हथियार डाल दिए हैं. लोगों ने घूसखोरी को एक तरह से सरकारी मुलाजिमों का हक मान लिया है. हां, इस की रकम पर जरूर वे मुलाजिमों से चखचख करते हैं, बाजार की जबां में कहें तो मोलभाव करते हैं. बावजूद यह जानने के कि हर महकमे में हरेक काम का दाम फिक्स है. बस, सरकार इस की दरों की लिस्ट नहीं टांग सकती क्योंकि इस में कानून आडे़ आता है.

इन कानूनों को भी कोई नहीं कोसता क्योंकि इन्हीं नियमकायदे व कानूनों की वजह से सरकारी मुलाजिमों को घूस मिलती है. कानून की चौखट पर इंसाफ के लिए सिर रगड़ने लोग जाएं तो वहां भी तारीखों के लिए घूस जरूरी है. पटवारी से अपनी ही जमीन का खसरा नक्शा चाहिए तो घूस, पुलिस में रिपोर्ट लिखानी है तो घूस, अपनी ही जमीन पर मकान बनवाने की इजाजत चाहिए तो नगर पालिका या नगर निगम में घूस, अस्पताल में इलाज चाहिए तो भी घूस, और तो और, सरकार को टैक्स चुकाना हो तो भी घूस देनी पड़ती है.

घूस देना अब अक्लमंदी का दूसरा नाम हो गया है. आम लोग कितने समझदार हो गए हैं, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब भी वे अपने किसी काम के लिए घर से सरकारी दफ्तर जाते हैं तो काम के मुताबिक जेब में रुपए रख कर ले जाते हैं कि कम से कम इतने तो लगेंगे ही.

नौबत तो यहां तक आ गई है कि किसी डर या दूसरी वजह के चलते घूस लेने से मुलाजिम इनकार कर दें तो लोग उस को कोसने लगते हैं कि काइयां है जो काम करने से इस तरह मना कर रहा है. लिहाजा, वे अपनी पेशकश बढ़ाते जाते हैं कि अच्छा हजार की जगह 2 हजार दे दूंगा पर मुफ्त में ईमानधरम और कायदेनियमों से काम हो जाएगा, यह मजाक मत करो.

उधर, लेने वाला मन ही मन झल्लाता है कि एक तो ईमानदारी से काम करें और ऊपर से इन के नखरे भी बरदाश्त करो कि नहीं, घूस तो हम देंगे ही. यानी घूस लेना ही नहीं, बल्कि घूस देना भी लोगों की आदत में शुमार हो चला है. इसलिए घूसखोरी की खबरों से किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगती. उलटे, यह तसल्ली हो जाती है कि घूस के जरिए काम अभी भी हो रहे हैं, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं.

अक्लमंद आदमी घूस पर गुस्सा नहीं करता और न ही एतराज जताता. वह मशवरा देता और लेता है कि अजी खामखां परेशान हो रहे हो, जा कर बाबू की टेबल पर हजारपांच सौ रुपए पटक दो, काम चुटकियों में हो जाएगा. ऐसा होता भी है. इस के अलावा घूस देने वाला कह उठता है कि कितना भला आदमी है बेचारा, कुछ ले कर ही सही, काम तो कर दिया. वरना कुछ मुलाजिम तो घूस लेने से ही इनकार कर दिल तोड़ देते हैं.

यहां से आई बीमारी

घूसखोरी का रोजमर्राई जिंदगी का हिस्सा बन जाना हैरत की बात नहीं है. बातबात में मंदिरों और पंडों के जरिए भगवान को घूस देने का तरीका आदमी बचपन से ही सीख जाता है.

जिस देश में सवा रुपए मंदिर में चढ़ा देने से बेटे को नौकरी मिल जाती हो और 11 रुपए की दक्षिणा में बेटी की शादी हो जाती हो, उस देश में घूसखोरी कतई छानबीन का मसौदा नहीं. धर्म ने लोगों को उस की पैदाइश के साथ ही सिखा दिया था कि कोई काम बगैर दिए नहीं होता. जेब में चढ़ाने के लिए पैसा हो, तो कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी के ठीक होने में भी घूस चल जाती है पर इस में जरा सी खोट यह है कि ऐसे काम होने की कोई गारंटी नहीं क्योंकि ऊपर वाले के दफ्तर (दरबार) में रोज लाखोंकरोड़ों अर्जियां लगती हैं. अब यह समय की बात है कि वह किस की सुनता है.

सच्चा हिंदुस्तानी वह नहीं है जो फख्र से भारतमाता की जय बोले, बल्कि वह

है जो इस सच से वाकिफ हो कि फख्र घूसखोरी पर किया जाना है. पंडित भी बच्चे का राशिफल मुफ्त में निकाल कर नहीं देता, फिर सरकारी नौकरी हासिल करने के लिए बिना धर्मस्थलों में पैसा चढ़ाने से काम हो जाएगा, यह सोचना भी गुनाह है.

अब कौन शरीफ आदमी भला गुनाह का पाप अपने सिर लेना चाहेगा, इसलिए वह दानपत्र में हलाल और हराम दोनों की कमाई ठूंसता रहता है और बेफिक्र हो जाता है कि अब कुछ नहीं बिगड़ने वाला. ऊपर वाले तक चढ़ावा पहुंचा दिया है.

जहां भगवान और उस के दलाल तक घूसखोर हों वहां सरकारी मुलाजिमों से पाकसाफ होने की उम्मीद करना वाकई उन के साथ ज्यादती है जो दिनभर घूस बटोरते हैं. और फिर वे शाम को घर जातेजाते उस का कुछ हिस्सा मंदिर, मसजिद, चर्च या गुरुद्वारे में दे आते हैं. इस तरह घूस का पैसा भी घूमफिर कर ऊपर वाले तक पहुंच जाता है. इसलिए मानने में ही भलाई है कि सबकुछ ऊपर वाले का है, वह अपनी मरजी से लेता और देता है. इसलिए घूस पर हायहाय करने के बजाय उस की जयजयकार करना बेहतर है.

नामदेव नागले जैसे शिकायती लोग जागरूक नहीं, बल्कि नास्तिक होते हैं. इसलिए रमाशंकर मौर्य जैसे मुलाजिम पकड़े जाते हैं. यह दीगर बात है कि इन में से 80 फीसदी घूस दे कर छूट भी जाते हैं. इस से लोगों में भगवान के लिए भरोसा और बढ़ता है.

धर्म से यह बीमारी सरकारी दफ्तरों तक पसर गई है, इसलिए किसी को अपने कानूनी हक की चिंता नहीं. उलटे लोगों को इस बात की खुशी रहती है कि 51 रुपए के प्रसाद और 51 हजार रुपए के डोनेशन से बच्चों को अच्छे स्कूल में दाखिला मिल गया. बड़ा हो कर जरूर वह भी काबिल अफसर बनेगा यानी ईमानदारी और मेहनत की कमाई को हाथ नहीं लगाएगा. इस तरह घूस, घूस नहीं एक इन्वैस्टमैंट है.

दावे भी बेअसर

आजादी के बाद जब लोकतंत्र वजूद में आया तो मुफ्त की कमाई का एक और जरिया बन गया जिस का नाम रखा गया सरकार. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को कुरसी संभालते ही समझ आ गया था कि महान भारत के लोग भक्त टाइप के हैं. चढ़ावा उन की नसनस में भरा हुआ है, इसलिए क्यों न इस गंगा का रुख सरकारी दफ्तरों की तरफ मोड़ दिया जाए.

देखते ही देखते मंदिरों के बराबर ही सरकारी दफ्तर भी चढ़ावे से मुटाने लगे. मंदिरों में पंडे थे तो दफ्तरों में बाबू और अफसर थे. एक जगह घूसखोरी का काम खुलेआम श्रद्धा और आस्था से होता था. दूसरी जगह चोरीछिपे टेबल के नीचे से होने लगा. धीरेधीरे इतना खुलापन और बेशर्मी आने लगी कि जज के सामने बैठा बाबू तारीख दे कर लाखों बनाने लगा और इंसाफ करने वाले जज साहब बेचारगी या मरजी से यह गुनाह होते देखते रहे.

दूसरे महकमों में भी यह रिवाज लागू हो गया. बड़े साहब इस पाप की कमाई

को हाथ नहीं लगाते, उन्हें शंकराचार्य या महामंडलेश्वर कहने में हर्ज नहीं. छोटा साहब या बाबू पुजारी बन घूस समेटने लगा और बंगले यानी मठ में हिस्सा पहुंचाने लगा. इस सिस्टम में वक्तवक्त पर बदलाव होते रहे जिस पर हल्ला कभी नहीं मचा. जो भी सिस्टम सरकारी मुलाजिमों ने बना दिया, उसे लोगों ने खुशीखुशी अपना लिया.

जब नास्तिकों की तादाद बढ़ने लगी तो सरकारों और नेताओं को चिंता होने लगी. लिहाजा, उन्होंने घूस देने जैसे पुण्य काम को जुर्म घोषित कर दिया. कहा जाने लगा कि घूस लेना और देना दोनों अपराध हैं. इस लिहाज से पूरा देश और सवा अरब की आबादी बगैर कुछ किएधरे मुजरिम हो गई और किसी के मन में पाप का डर नहीं रह गया कि सिर्फ वही पापी है.

इस तरह घूसखोरी को मंजूरी मिल गई पर जब उस की इंतहा हो गई तो अन्ना हजारे जैसे समाजसेवियों ने इस का विरोध भी किया. इस बात पर धरनेप्रदर्शन और आंदोलन हुए तो लोगों को यह खुशफहमी भी हो आई कि अब सचमुच की क्रांति आ रही है जो घूसखोरी बंद करवा कर ही छोड़ेगी.

नोटबंदी से कम नहीं हुई

अन्ना के आंदोलन का असर सिर्फ सियासी हुआ जिस से 2 नए अवतार या देवता नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल पुजने लगे. कांग्रेसी संप्रदाय के मुखिया मनमोहन सिंह को लोगों ने चलता कर दिया. यह बड़ा सुनहरा दौर था जब लोगों को लग रहा था कि अब कोई समस्या नहीं रही.

2014 के लोकसभा चुनावप्रचार में नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार को कोसतेकोसते इस वादे के साथ सत्ता पर काबिज हो गए कि वे घूसखोरी से छुटकारा दिलाएंगे. लोगों ने बेमन से उन पर भरोसा किया और अब पछता रहे हैं कि वे भी वैसे ही निकले क्योंकि दीगर समस्याओं सहित घूसखोरी ज्यों की त्यों है.

नरेंद्र मोदी समझ रहे थे कि लोगों का भरोसा उम्मीद से कम वक्त में उन पर से उठ रहा है तो उन्होंने नोटबंदी लागू कर दी और कहा कि इस से आतंकवाद, भ्रष्टाचार सहित घूसखोरी भी बंद हो जाएगी. इस बाबत उन्होंने पूरा ब्योरा भी पेश किया कि ऐसा कैसे होगा.

लेकिन जिस तरह धर्म की दुकान कभी बंद नहीं होती, वैसे ही घूसखोरी की दुकान भी चल रही है और आज शान से चल रही है. लोगों ने घूस देना और लेना छोड़ा नहीं. बाबुओं की ताकत नोटबंदी से कम नहीं हुई. 8 महीनों में कुछ नहीं हुआ. नोटबंदी का गुबार आ कर गुजर गया पर घूसखोरी का बाजार चमक रहा है.

इस सरकार के पास भी आतंकवाद और नक्सली हिंसा की तरह घूसखोरी का कोई इलाज नहीं है. जो अब तक हुआ, वह नीमहकीमी साबित हुआ. ऐसे में अपनी बेवकूफी पर पछताते लोगों ने फिर घूसधर्म अपनाने में ही भलाई समझी. अब सबक लेते लोग सालोंसाल घूसखोरी के बारे में चूं भी नहीं करेंगे तो यह उन की गलती भी है और मजबूरी भी जिस के जिम्मेदार एक हद तक वे खुद भी हैं जो अपनी परेशानियों को वादों के ठेकेदारों को बेच कर बेफिक्र हो जाते हैं.     

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ग्रैंडपेरैंट्स का साथ जरूरी

एक शाम को सैर पर निकली तो पार्क के एक कोने में कुछ नन्हेंमुन्हे बच्चे आपस में बातें कर रहे थे. उन की नटखट हरकतें और मीठी आवाज ने बरबस ही मेरा ध्यान उस ओर आकर्षित कर लिया. एक बच्चा कह रहा था, ‘फ्रैंड्स, मेरी दादी के मोबाइल में ढेर सारे गेम्स हैं. जब मैं बिना नखरे किए सारा दूध पी लेता हूं तो दादी मुझे अपने मोबाइल में गेम्स खेलने देती हैं.’ दूसरे ने कहा, ‘मेरी नानी मुझे जब तक 5-6 कहानियां नहीं सुनाती हैं, मैं तो सोता ही नहीं हूं.’

तभी एक प्यारी सी बच्ची इतराते हुए बोल पड़ी, ‘अरे, तेरी दादी के पास तो सिर्फ गेम्स हैं पर मेरी दादी के मोबाइल में  तो गेम्स के साथसाथ ढेर सारे गाने भी हैं. जब मैं बोर होने लगती हूं तो दादी गाने लगा देती हैं और मैं डांस करने लग जाती हूं. अगर उस समय दादाजी होते हैं तो वे अपने मोबाइल से मेरा डांसिंग पोज में फोटो ले कर पूरे घर को दिखाते हैं. तब बहुत मजा आता है.’ उन की भोलीभाली बातों ने सहसा मुझे मेरे बचपन की याद दिला दी जब हम चारों भाईबहन दादीनानी की कहानियां सुनते हुए मीठी नींद में सो जाया करते थे. उन कहानियों को सुनते समय हम उन से न जाने कितने ऊलजलूल तरह के प्रश्न किया करते थे तथा उन प्रश्नों के जवाब भी हमें बड़े प्यार से मिल जाया करते थे. उस जमाने में शायद बचपन में हर मर्ज की एक दवा नजर आती थी, अपनी समस्या को ग्रैंडपेरैंट्स के साथ शेयर करना. पर कभीकभी दादाजी से थोड़ा डर भी लगता था.

आज भागदौड़ की जिंदगी में अधिकांश बच्चे अपने मम्मीपापा के साथ दादादादी या नानानानी से दूर रहते हैं और पूरे साल में चंद दिनों के लिए ही उन से मिल पाते हैं. हमारी जीवनशैली और जमाना चाहे कितना भी बदल जाए पर हमारी तरह हमारे बच्चों को भी ग्रैंडपेरैंट्स की जरूरत है. आइए बात करते हैं कुछ बच्चों और बड़ों से कि उन की जिंदगी में ग्रैंडपेरैंट्स अहम क्यों हैं.

लाड़प्यार की अनुभूति

कुश्ती के शौकीन 50 वर्षीय दीपक शरण का कहना है, ‘‘सचमुच दादादादी या नानानानी शब्द के साथ एक लाड़प्यार और अपनेपन की अनुभूति जुड़ी होती है. ऐसी बात नहीं है कि मम्मीपापा बच्चों को प्यार नहीं करते पर दादादादी का लाड़प्यार कुछ खास ही होता है. मैं ने सुबहशाम ब्रश करना, सही ढंग से चप्पल पहनना और कसरत करना सब अपने दादाजी से ही सीखा है.’’

28 साल की मालविका अपने लंबे बालों को लहराते हुए कहती है, ‘‘मेरे इतने सुंदर और स्वस्थ बालों का राज मेरी दादी हैं, जिन्होंने न केवल मुझे अपने बालों की सही ढंग से देखभाल करना सिखाया बल्कि पत्रपत्रिकाओं से कई तरह के हेयरस्टाइल सीख कर मुझे सजाया भी है.’’

एक उच्च पुलिस अधिकारी मानते हैं कि उन्हें बचपन की कईर् ऐसी बातें याद हैं जो उन्होंने अपने ग्रैंडपेरैंट्स से सीखीं और जो आज उन की कामयाबी का  हिस्सा बन चुकी हैं. वे कहते हैं कि आज के एकल परिवार के जमाने में जिन बच्चों को अपने दादादादी, नानानानी के साथ रहने का मौका मिला हुआ है, वे कुछ बने या न बनें पर एक बेहतर इंसान अवश्य बनेंगे.

सुरक्षित होने का एहसास

हम में से शायद ही कोई ऐसा होगा जो बचपन में गलती करने पर पापामम्मी की डांटफटकार से बचने के लिए अपने ग्रैंडपेरैंट्स की गोद में न छिपा हो. कई बार मातापिता के कामकाजी होने से बच्चों के कोमल हृदय में इस तरह की गांठें भी पड़ जाती हैं कि मम्मीपापा इतने व्यस्त रहते हैं कि मेरे लिए उन के पास टाइम ही नहीं बचता है. पर घर में इन बुजुर्गों के रहने से बच्चों को अकेलापन महसूस नहीं होता और उन के मन में सहज ही सुरक्षा का भाव आ जाता है. बच्चों के साथसाथ उन के मातापिता भी चिंतामुक्त रहते हैं कि बच्चे घर में किसी अपने के पास हैं. कई लोगों का मानना है कि बुजुर्ग वटवृक्ष के समान होते हैं जिन की छत्रछाया में रहना एक सुखद अनुभव कराता है.

एक प्रसिद्ध कहावत है, मूलधन से सूद ज्यादा प्यारा होता है. इस संबंध में रिटायर्ड जनरल चड्ढा का कहना है, ‘‘सचमुच ग्रैंडपेरैंट्स को अपने ग्रैंडचिल्ड्रेन से ज्यादा लगाव महसूस होता है. शायद इसलिए कि बुढ़ापा बचपन की पुनरावृत्ति माना जाता है.’’ अपने अनुभव के आधार पर वे कहते हैं, ‘‘अपने बच्चों के समय पर जब आप दादानाना बनने की उम के होते हैं तब तक रिटायरमैंट का समय आ जाता है. जिम्मेदारियां ज्यादा होती हैं तथा समय की कमी रहती है, चाहते हुए भी समय निकालना संभव नहीं होता. जिम्मेदारियां भी काफी हद तक कम हो जाती हैं. तब तक समय, अनुभव तथा धैर्य भी पर्याप्त मात्रा में हमारे अंदर आ जाता है. ऐसे में बच्चों की बातें सुनना, उन की मासूम परेशानियों को समझना और उन के साथ खेलना बहुत सुकून देता है.’’

निर्मला देवी, जो रिटायर्ड प्रिंसिपल हैं, का मानना है कि आज के पेरैंट्स की दिनचर्या इतनी व्यस्त होती है कि उन्हें खुद भी समय में बंधना पड़ता है और वे बच्चों को भी रूटीन में बांधना चाहते हैं. ऐसे में ग्रैंडपेरैंट्स का साथ होना बच्चे के विकास में काफी लाभदायक सिद्ध होता है.

ब्रिटेन में हुए एक शोध ने प्रमाणित कर दिया है कि बच्चों के प्रारंभिक विकास के लिए परिवार के बड़ेबुजुर्गों का सान्निध्य बहुत जरूरी होता है. विशेषज्ञ मानते हैं कि डिप्रैशन होने का खतरा उन बच्चों में ज्यादा होता है जो एकल परिवार में रहते हैं. मनोवैज्ञानिकों का भी मानना है कि बड़े या संयुक्त परिवार का अर्थ होता है चौबीसों घंटे हर किसी का साथ. इस स्थिति में बच्चों के मन में अकेलेपन और असुरक्षा की भावना उत्पन्न नहीं होती है. टैंशन या परेशानी के समय भी किसी न किसी का साथमिल जाता है, जो उन्हें डिप्रैशन में आने की विषम परिस्थिति से बचाता है. जिन बच्चों को अपने बुजुर्गों से ज्यादा लगाव होता है वे बच्चे अपेक्षाकृत अधिक लविंग, केयरिंग और आत्मविश्वास से भरे होते हैं.

तलमेल जरूरी

बाल संस्था से जुड़ी आशा किरण का मानना है कि बच्चे दादादादी या नानानानी के नजदीक रह कर उन के पास बैठ कर सहज रूप में पीठ पर, सिर पर प्यारदुलार से हाथ फेरते हुए किस्से कहानियों, अनुभवों और बतरस का मजा लेते हुए जानेअनजाने जितना सीख सकते हैं, उतना पुस्तकों, शिक्षकों, टीवी के कार्यक्रमों और अपने व्यस्त मातापिता से नहीं सीख सकते. ग्रैंडपेरैंट्स के पास अनुभव और ज्ञान का खजाना होता है. अपने अनुभवों के आधार पर ही कभी वे एक दोस्त की तरह बच्चों के साथ राजदार बनते हैं तो कभी उन की परेशानियों में काउंसलर की भूमिका निभाते हैं.

परिवार, मातापिता और बच्चों के खुद के बचपन से जुड़ी कई रोचक और ज्ञानभरी बातें बच्चों को बुजुर्गों से ही ज्ञात होती हैं. साथसाथ रहने से पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच एक सामंजस्य स्थापित होता है जो दोनों पीढि़यों के लिए आनंदायक, लाभदायक व सुखमय साबित होता है. बच्चे प्यारदुलार के साथ जो कुछ बड़ेबुजुर्गों से सीखतेसमझते हैं वे उन के भावी जीवन के संतुलित विकास में सहायक साबित होता है.

दूसरा पहलू भी

हर तथ्य  के 2 पहलू होते हैं. ऐसे में यहां भी स्थिति कभीकभी विपरीत भी हो जाती है. पुरानी परंपराओं के कट्टर समर्थक तथा सिर्फ अपने विचारों व आदर्शों को ही उचित मानने वाले ग्रैंडपेरैंट्स के साथ रहने पर पेरैंट्स तथा बच्चों को कई बार कईमुश्किल स्थितियों से भी गुजरना पड़ता है. सब से प्रमुख कारण है बच्चों के पालनपोषण को ले कर टकराव की स्थिति का होना. बच्चों के पालनपोषण के तरीके में समयसमय पर या पीढ़ीदरपीढ़ी कुछ न कुछ बदलाव होते रहते हैं. जो तरीके कुछ समय पूर्व सही थे, वे गलत हो सकते हैं. या गलत तरीके, सही माने जा सकते हैं. ऐसे में बुजुर्गों और मातापिता के बीच इस विषय पर मतभेद भी उत्पन्न हो जाता है.

3 साल की बेटी की मां ज्योति को अपनी सास से इस बात पर अनबन हो जाती है कि बच्ची की मालिश बेबी औयल से हो या सरसों तेल से अथवा शाकाहारी खाना खिलाया जाए या मांसाहारी. आदर्श, परंपरा, संस्कार आदि बातों में बुजुर्गों को लगता है कि उन का अनुभव सही है. सो, बच्चों के मामले में वे सही हैं और पेरैंट्स को उन की बात माननी चाहिए. जबकि मातापिता बच्चों को बदलते समय की धारा व माहौल के अनुसार ढालने की छूट भी देना चाहते हैं. इस कारण कई बार कितने मातापिता बच्चों को ग्रैंडपेरैंट्स के पास छोड़ने के बजाय किसी हौबी क्लास में भेजना या आया अम्मा के पास रखना ज्यादा बेहतर समझते हैं.

होना यह चाहिए कि ग्रैंडपेरैंट्स और पेरैंट्स आपस में खुल कर बातचीत करें और ग्रैंडपेरैंट्स भी इसे अन्यथा न लें. कई बार बुजुर्गों के ज्यादा प्यारदुलार का बच्चे नाजायज फायदा भी उठाने लगते हैं. वे अपनी हर बात मनवाने के लिए दादादादी या नानानानी का सहारा लेना शुरू कर देते हैं. ऐसे में पेरैंट्स और ग्रैंडपेरैंट्स दोनों को आपसी अंडरस्टैंडिंग बना कर इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए ताकि बच्चे की जिद और मनमाने व्यवहार का नियंत्रण में रखा जा सके.

कई लोगों से बातचीत करने पर सब ने यह स्वीकार किया कि दुनिया कितनी भी बदल जाए, ग्रैंडपेरैंट्स के मन में बच्चों की खुशी ही सर्वोपरि होती है चाहे वह खुशी अपने बच्चों की हो या फिर बच्चों के बच्चों की. सो, अगर विचारों में थोड़ेबहुत मतभेद भी हों तो भी इस बात को नहीं भूलें कि बच्चे दूर हों या पास, ग्रैंडपेरैंट्स और ग्रैंडचिल्ड्रेन हमेशा एकदूसरे के लिए खास होते हैं.

मुहूर्त से महंगी होती शादियां

हर हिंदू एक मुहूर्त में पैदा होता है जो मरने तक तो दूर, मरने के बाद भी उस का पीछा नहीं छोड़ता. घर में बच्चा पैदा हुआ नहीं कि मांबाप सीधे पंडितपुरोहितों के पास भागते हैं. वह अपने पोथी पन्नों में ग्रहनक्षत्रों की चाल देख कर उस बच्चे के पैदा होने के समय से जोड़ कर जन्मपत्री में उस की शादी, कैरियर और उम्र तक का ब्योरा लिख डालता है. एवज में यजमान की हैसियत के मुताबिक दक्षिणा खीसे में डाल कर उस की मूर्खता पर मुसकराते भगवान को मन ही मन धन्यवाद देता है कि हे प्रभु, अच्छा मुहूर्त का चलन चलाया जिस से बैठेबिठाए मेरी और मेरे परिवार की रोजीरोटी चल रही है.

लगता नहीं कि हिंदुओं के शिक्षित और आधुनिक हो जाने के दावे में कोई दम या सच है क्योंकि अधिकांश यानी 95 फीसदी हिंदू आज भी मुहूर्त की गुलामी ढो रहे हैं.

हर साल की तरह 2017 की शुरुआत में ही लोगों को पंडों या भगवान की तो नहीं, लेकिन मीडिया की कृपा से यह खबर घर बैठे मिल गई थी कि साल 2017 में इतने दिन शादी के मुहूर्त के हैं. विवाह मुहूर्तों का यह ब्योरा सहूलियत के लिए बारह महीनों और त्योहारों के हिसाब से भी परोसा गया था कि जनवरी में इतने दिन शादी के मुहूर्त हैं और फरवरी में इतने. फिर होली तक इतने दिनों का विराम है.

इस के बाद फलां राशि में सूर्य के प्रवेश के बाद शादियां शुरू होंगी. होलाष्टक और खरमास तक शादियां नहीं होंगी. फिर कुछ महीनों के लिए, देवतागण चूंकि शादियां कराकरा कर थकहार गए होंगे, सो जाएंगे. लेकिन चिंता करने या घबराने की कोई बात नहीं. वे हर साल की तरह तयशुदा वक्त देवउठनी ग्यारस पर जागेंगे और फिर शादियां शुरू हो जाएंगी. इस तरह सालभर में शुभविवाह मुहूर्त इतने दिनों के हैं.

आम लोगों के साथसाथ व्यापारियों के अलावा बड़ीबड़ी कंपनियां भी विवाह मुहूर्त देख कर ही आने वाले लेनदेन का खाका खींचती हैं और अपनी व्यापारिक नीतियां तय करती हैं. संसद में पेश होने वाले देश के सालाना बजट की चर्चा

10-15 दिनों में खत्म हो जाती है लेकिन शादियों के मुहूर्त की बात सालभर चलती रहती है. सर्राफा व्यापारी, वस्त्रोद्योग, मैरिज गार्डन वालों से ले कर ब्यूटीशियंस, कैटरर और पंडित तक विवाह मुहूर्त को ले कर चौकन्ने रहते हैं. वजह, सभी के लिए शादियों का सीजन तबीयत से पैसा कमाने वाला साबित होता है.

कल्पना करें, अगर शादियां बजाय 55-60 दिनों के सालभर चलतीं, तो क्या होता. होता यह कि शादियां सस्ती हो जातीं, जिस से आम लोगों का पैसा बचता. यह मुहूर्त की मार ही है कि एक शादी का औसत खर्च अब 15 लाख रुपए आने लगा है. लोग शादी के दिनों में भागादौड़ी करते यह कहते नजर आने लगे हैं कि शादियां अब महंगी होने लगी हैं या दूसरे शब्दों में महंगाई को कोसते नजर आते हैं.

जबकि सच, महंगाई का ज्यादा बढ़ना नहीं, बल्कि शादियों का कुछ सीमित और विशेष यानी मुहूर्त वाले दिनों में ही होना है. पंडों के विवाह मुहूर्त के जाल में कैसेकैसे आम लोग फड़फड़ाते नजर आते हैं, इसे समझने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि शादियां महंगी क्यों होती जा रही हैं और इन पर खर्च किए गए पैसे कैसे बरबादी का शिकार होते हैं.

धर्म की गुलामी

पंडों और उन के मठाधीशों द्वारा जारी किए गए मुहूर्त वाले दिनों में ही होने की मजबूरी के चलते शादियों की लागत बढ़ती जा रही है. अब वह जमाना गया जब आप घर से शादी कर लेते थे क्योंकि अब घर बहुत छोटे हो चले हैं. इसलिए मैरिज गार्डन या बैंक्वेट हौल जाना पड़ता है जहां 4-5 सौ लोगों का एक दिन का ही खानेपीने व ठहरने का खर्च 8-10 लाख रुपए बैठता है. जबकि हकीकत में इस का वास्तविक खर्च 3-4 लाख रुपए भी नहीं होता.

शादियों के सीजन में हर चीज के दाम बढ़ जाते हैं. औफ सीजन में जो मैरिज गार्डन, होटल, हौल या धर्मशाला आधे से भी कम दाम में मिल जाते, उन के भाव दोगुने हो जाते हैं. यही हालत कैटरिंग से ले कर बैंड वालों तक की है. ये लोग भी जानते हैं कि अभी जो कमा लिया, वही सालभर काम आएगा. इसलिए शादी करनेकराने वालों की जेब पर वे रहम नहीं खाते.

कोई नहीं सोच पाता कि सारे फसाद की जड़ मुहूर्त है, जिसे ढोने के जिम्मेदार हम खुद हैं, क्योंकि हम धर्म के गुलाम हैं और शादी उसी के बताए मुताबिक करते हैं.

शादियों के सीजन में बाजार की रौनक, जिसे मूर्खों की भीड़ कहना ज्यादा बेहतर होगा, देखते बनती है. ज्वैलरी और कपड़ों की दुकानों व शोरूम्स में लोग लाइन में लग कर खरीदारी करते नजर आते हैं और खुशीखुशी ज्यादा दाम चुकाते हैं.

आजकल शादियां पहले की तरह सालों पहले तय नहीं होतीं, बल्कि बदलती जीवनशैली के चलते 3-4 महीने और कभीकभी तो 15 दिन पहले ही तय होती हैं. इसलिए खरीदारी के मामले में लोगों के पास ज्यादा विकल्प नहीं होते और न ही किफायत बरतने का मौका मिल पाता. हड़बड़ाए लोगों के दिलोदिमाग में शादी की तारीख यानी मुहूर्त कब्जा जमाए बैठा रहता है.

शादी से जुड़े तमाम कारोबारियों की यह कम दिलचस्पी की बात नहीं कि साल के 60-65 दिनों में ही वे सालभर का पैसा कमा लेते हैं. बाकी 3 सौ दिन वे इत्मीनान से अगले साल के मुहूर्त देख कारोबार बढ़ाने व ज्यादा से ज्यादा कमाने की जुगत लगाते रहते हैं.

इन व्यापारियों को ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता. असल दोषी वे पंडे हैं जो मुहूर्त निकालते हैं और उन से भी ज्यादा दोषी वे लोग हैं जो विभिन्न धार्मिक कारणों के चलते पंडों के बताए मुहूर्त में ही शादी करते हैं. वे यह नहीं चाहते कि कोई उन्हें अंधविश्वासी और रूढि़वादी कहे, यानी मानसिकता कुछ और है पर वे दिखाना कुछ और चाहते हैं.

ग्रंथों का निर्देश

पारस्कर गृह्य सूत्र, आश्वलायन गृह्य सूत्र, गर्ग संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण, धर्मसिंधु, मुहूर्त चिंतामणि जैसे ग्रंथों में विवाह के शुभदिन, शुभमुहूर्त का विवरण दिया गया है.

गर्ग संहिता में लिखा है, ‘‘प्रारंभ में सर्वाधिक मंगलकारी गणेश का पूजन किया जाता है तथा उन का प्रतीक धर्मग्रंथों में निर्दिष्ट नियमों के अनुसार शुभमुहूर्त में विवाह मंडप में स्थापित किया जाता है.’’

वीर मित्रोदय संहिता में निर्देश है, ‘‘विवाह के मास में, किसी शुभदिन कन्या वरण करना चाहिए.’’

नारद स्मृति के अनुसार, ‘‘शुभ समय में वधू के पिता को प्रसन्नतापूर्वक कन्या के विवाह की स्वीकृति देनी चाहिए. वर के पिता को शुभदिन सुसज्जित वधू का गृहप्रवेश कर सत्कार करना चाहिए और सौभाग्य तथा संतति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए.’’

गृह्य सूत्रों में ज्योतिष विचार बताए गए हैं, जिन के अनुसार, विवाह सूर्य के उत्तरायण में होने पर, मास के शुक्ल पक्ष में किसी शुभदिन किया जाना चाहिए.

‘मुहूर्त चिंतामणि’ के ‘नवांशुलग्नेषु विवाहे फलानि’ अध्याय में लिखा है,

लग्ने हि सर्वे शुभराश्यश्च शुभेक्षिता वाज्य युता: शुभा: स्यु:.

नवांशकास्तौलिनृयुग्युवत्यश्यापा-भाग: शुभदो न चान्ये.

अर्थात विवाह शुभलगन, राशि और नवांश में शुभफलदायक रहता है.

तुलामिथुनकन्यांशा धनुर्स्द्धासंयुता:

एते नवांशा शुभदा यदि नांत्यांशका: खलु.

(मुहूर्त चिंतामणि)

यानी किसी भी लगन में धनु, तुला, मिथुन, कन्या अथवा मीन के नवांश में यदि कन्या का विवाह हो, तो वह अवश्य पतिव्रता होती है.

सुदती सौभाग्यवती प्रहसितवदना च मीनांशे.

अर्थात मीन नवांश में विवाह कन्या का विवाह होने से सौभाग्यवती होती है.

वर्गोत्तमं विनांत्यांशो विवाहे न शुभप्रद:.

वर्गोत्तयश्चेदंत्यांश: पुत्रपौत्रादिवृद्धिय:

(मुहूर्त चिंतामणि)

अर्थात कन्या का विवाह विहित नवांश में भी वर्गोंतम को छोड़ कर अंतिम नवांश में करना नहीं चाहिए. अंतिम नवांश में कोई दोष नहीं. इस में पुत्रपौत्रादि की वृद्धि होती है.

आगे लिखा है,

दारिद्रय बधिरतनौ दिवांशलगने वैधत्यं.

शिभुकरणं निशांधलग्ने.

पंङ्वंगे निखिलधनानि नाशमीयु:

सर्वत्रधिपगुरुदृष्टिर्भिनंदोष:

अर्थात् बधिर लग्न में विवाह हो तो दरिद्रता रहती है. दिवांध लग्न में विवाह हो तो कन्या विधवा होती है. रात्र्यंध लग्न में संतान की मृत्यु होती है. पंगु लग्न में विवाह हो तो वरकन्या की समस्त संपत्ति नष्ट हो जाती है. सर्वत्र लग्न का स्वामी और बृहस्पति देखते हों तो दोष नहीं है.

संस्कृत ग्रंथों में शुभ की महिमा को बारबार बताया गया है क्योंकि यह शुभ तो ब्राह्मणगुरु ही बता सकते हैं. राजा या उस के सहायक अथवा राज्य के श्रेष्ठी बिना ब्राह्मणगुरु की अनुमति के कोई कार्य न कर लें, इसलिए इन ग्रंथों में बारबार शुभकाल की बात की गई है, जिसे आज की तथाकथित शिक्षित मगर वास्तव में कूपमंडूक जनता सिरमाथे पर रख कर समय, पैसा और शक्ति बरबाद करती है.

मुहूर्त की बाध्यता क्यों

आखिर क्यों तर्कशील और पढ़ेलिखे लोग भी पंडों के बताए मुहूर्त में शादी करते हैं, इस सवाल का जवाब बेहद साफ है कि मुहूर्त एक धार्मिक आतंक है. कहा यह जाता है कि अगर वर व वधू का खुशहाल दांपत्य चाहिए तो शुभमुहूर्त में ही शादी करनी चाहिए. इस बात के पक्ष में पंडे ढेरों तर्क और उदाहरण धाराप्रवाह दे डालते हैं.

पंडों के इस व्याख्यान का हकीकत से कोई वास्ता न पहले था, न अब है कि ग्रहनक्षत्र राशि के अनुसार प्रभाव डालते हैं और कार्यसिद्धि के लिए जरूरी है कि उन की दशा व चाल देख कर ही शादी की जाए. चूंकि सभी धर्म के गुलाम हैं, इसलिए बगैर तर्क किए सारी बातें मान लेते हैं और उस की फीस भी देते हैं.

दरअसल, हम ने मान लिया है कि दूसरी कई बातों की तरह विवाह भी एक धार्मिक संस्कार है और वरवधू खुशहाल जिंदगी जिएं, इस बाबत पंडों के बताए मुहूर्त के मुताबिक शादी करने में हर्ज क्या है. आज नहीं तो कल, शादी कभी तो करना ही है, लिहाजा शुभमुहूर्त में ही क्यों न की जाए जो खुशहाल जिंदगी की धार्मिक गारंटी है. जिस के तहत पत्नी हमेशा सौभाग्यवती रहेगी और पतिपत्नी एक नहीं, बल्कि सात जन्मों तक एकदूसरे का साथ निभाएंगे.

इस धारणा या तर्क के चिथड़े अदालतों में उड़ते देखे जा सकते हैं. तलाक के करोड़ों मुकदमे अदालतों में चल रहे हैं. इन में से अधिकांश यानी 95 फीसदी ने पंडों के बताए शुभमुहूर्त में ही शादी की होती है. फिर यह नौबत क्यों, कि पतिपत्नी तनाव ले कर पेशी दर पेशी मुहूर्त की सजा भुगत रहे होते हैं.

कोई पंडित इस का सटीक जवाब नहीं दे पाता और देगा भी तो वह भी मुहूर्त की तरह बेसिरपैर का ऊटपटांग होगा कि मंगल की दशा बदल गई थी, जन्मपत्री सही नहीं थी, या यह कि फिर किसी ऊपरी हवा ने अपना कारनामा दिखा दिया है. अगर शुभमुहूर्त में की गई शादियां शुभ ही साबित होने की गारंटी होतीं तो समाज में विधवाओं व विधुरों की खासी तादाद नहीं दिखनी चाहिए थी.

चालाकी की यह हद ही है कि शादी टूटने पर भी धर्म के धंधेबाज उस से भी पैसा कमाने से बाज नहीं आते. कोई भी अखबार उठा लें, ऐसे बाबाओं और ज्योतिषियों के विज्ञापन मिल ही जाएंगे जो दांपत्य कलह को सुलझाने का दावा करते हैं. ये ठीक वैसे ही गारंटेड होते हैं जैसे शादी के वक्त पंडा धर्मग्रंथों का हवाला दे कर भावी दंपती के सुखों की गारंटी जन्मपत्री के गुणों को मिला कर देता है.

साफ है कि मुहूर्त का सुख या सौभाग्य से कोई ताल्लुक है नहीं. यह पतिपत्नी की आपसी समझ और सामंजस्य पर निर्भर है कि वे एकदूसरे को समझते और उन की इच्छाओं व भावनाओं का सम्मान करते कैसे हुए दांपत्य की गाड़ी चलाते हैं.

धर्म के नाम पर जो लोग थोड़ेबहुत गाल बजा लेते हैं, वे यह कहते हैं कि दरअसल पहले भारत कृषि प्रधान देश था, आवागमन के साधन और रास्ते नहीं थे, इसलिए शादी के मुहूर्त ऐसे वक्त में निकाले जाने का रिवाज पड़ गया जब लोग फुरसत में रहें और आराम से शादी कर लें.

दरअसल, धार्मिक मान्यताएं और निर्देश, जो अव्यावहारिक व अवैज्ञानिक हैं, पंडों की दुकानें हैं, को नकारने की हिम्मत अभी भारतीय समाज में आई नहीं है. विवाह मुहूर्त की मिसाल लें, तो नामी कारोबारी घरानों व सैलिब्रिटीज से ले कर आम लोग भी मुहूर्त में ही शादी करते हैं और खूब ठगे जाते हैं.

पंडित ही क्यों

मुहूर्त का सीधा सा मतलब शादी कराने वाले पंडित की मौजूदगी है, जो व्यापारियों की तरह शादियों के सीजन में सालभर का पैसा कमा लेता है और बाकी दिनों में दूसरे कर्मकांडों से भी चांदी काटता है.

जो धर्म आधारित शादी करेंगे वे जिंदगीभर पूजापाठ से लगे रहेंगे. उन के बच्चे होंगे तो जन्मपत्री के लिए भागेभागे पंडों के पास आएंगे और पूर्वजों का श्राद्ध भी उन्हीं से करवाएंगे. यह बात पंडे खूब समझते हैं, इसलिए वे मुहूर्त की मार्केटिंग करते रहते हैं.

लाख टके का सवाल यह भी है कि शादी में पंडा ही क्यों? शादी धर्म का विषय षड्यंत्रपूर्वक इसलिए बनाए रखा गया है कि जिंदगीभर यजमान को निचोड़ा जा सके. अगर लोग शादी रजिस्ट्रार के यहां या औफ सीजन में कराने लगेंगे तो सीधेसीधे पंडों की मुफ्त की मलाई का इंतजाम खत्म हो जाएगा.

यह खत्म न हो, इसलिए तरहतरह से मुहूर्त का महत्त्व बताया जाता रहता है. मीडिया के जरिए उस का प्रचारप्रसार किया जाता रहता है. तरहतरह के धार्मिक कृत्य शादी के दौरान कराए जाते हैं, जिन में कथा, यज्ञ, हवन के साथसाथ दर्जनों स्थानीय रीतिरिवाज भी शामिल हैं.

शादी एक कानूनी अनुबंध है, यह अदालत में जा कर समझ आता है जब अलगाव या तलाक की नौबत आ जाती है. यहां आ कर समझ आता है कि पंडित की भूमिका एक गवाह भर की थी जो वादी और प्रतिवादी की शादी का प्रमाण होता है. हालांकि ये प्रमाण आजकल फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी के जरिए भी सहज उपलब्ध हो जाते हैं.

राज्य सरकारें भी विभिन्न योजनाओं के तहत शादी करवाती हैं तो मुहूर्त में ही करवाती हैं. यहां भी थोक में पंडे बैठे नजर आते हैं. कई समारोहों में तो एक पंडित ही दर्जनों शादियां करवा देता है. यानी अलगअलग राशियां, ग्रहनक्षत्रों की चाल वगैरा ठगी की बातें हैं. अगर ऐसा नहीं होता, तो फिर कैसे सामूहिक विवाहों में एक ही तरह के मंत्रोच्चारण और पूजापाठ से काम चल जाता है.

अगर प्रमाण या गवाही के लिए ही शादी में पंडित चाहिए तो सरकार को चाहिए कि वह सामूहिक विवाहों में पंडों की जगह उस के कर्मचारी तैनात करे जो शादी का प्रमाणपत्र मंडप में ही दें. सप्त पदी यानी अग्नि के समक्ष सात फेरों के बारे में भी गंभीरता से सोचा जाना चाहिए कि इस ड्रामे से क्या हासिल होता है. सीधेसीधे सरकारी अधिकारी सर्टिफिकेट दे दें कि फलां राम की शादी फलां सीता से हुई. और वही एक सामाजिक व कानूनी प्रमाण हो.

कोई गारंटी नहीं

पैसे बचाने के लिए जरूरी है कि औफ सीजन यानी बिना मुहूर्त वाली शादियों को हर स्तर पर प्रोत्साहन दिया जाए. इस से मैरिज गार्डन, होटल, बैंड वाले और कैटरर सहित शादीव्यवसाय से जुड़े दूसरे घटकों को भी फायदा ही होगा क्योंकि उन के साधन लगातार इस्तेमाल होंगे और ये लोग पंडों की तरह अलाल, मुफ्तखोर व ठग कहलाने से बच जाएंगे. बेमौसम यानी बिना मुहूर्त की शादियां इस लिहाज से भी जरूरी हैं कि 15 लाख रुपए की शादी अगर 6-7 लाख रुपए में हो जाए तो शादी का बचा पैसा जरूर वरवधू की नई गृहस्थी के काम आ सकता है.

हां, अगर पंडा इस बात की गारंटी दे कि उस के बताए शुभमुहूर्त में की गई शादी टूटेगी नहीं, या कोई हादसा नहीं होगा, तो जरूर उस की बात मान लेनी चाहिए पर उसी सूरत में जब वह यह बात लिख कर देने को तैयार हो और दंपती के नुकसान की भरपाई की गारंटी भी लेने को तैयार हो. ऐसा हो पाएगा, इस पर हां कहने की कोई वजह नहीं, क्योंकि लोग हर अच्छीबुरी बात को क्रमश: भाग्य और भगवान का आशीर्वाद या कोप मानते हुए उसे प्रसाद की तरह ग्रहण कर लेते हैं.

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जीएसटी कानून : क्या कालेधन पर लगेगी रोक?

गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स यानी जीएसटी कानून को देश के कर ढांचे में सुधार का एक बहुत बड़ा कदम माना जा रहा है. सरकार का मानना है कि एक देश, एक कर वाले जीएसटी कानून से कर चोरी रुकेगी, महंगाई कम होगी और कर ढांचे से उत्पीड़न व कानूनी केस कम होंगे.

जीएसटी को इस तरह प्रचारित किया जा रहा है मानो इस के लागू होते ही समूचे देश में नैतिकता कायम हो जाएगी. इस बिल में लिखित हर नियमकायदे को गीता का श्लोक मान कर लोग बड़ी श्रद्धा, ईमानदारी, सत्य भाव से पालन करते हुए टैक्स अदा करने लगेंगे. बेईमानी खत्म हो जाएगी. टैक्स अधिकारी ईमानदार की प्रतिमूर्ति बन जाएंगे. सवाल है कि जो दावे किए जा रहे हैं  क्या जीएसटी लागू होने के बाद वे वास्तव में खरे उतरेंगे?

जीएसटी है क्या

जीएसटी एक अप्रत्यक्ष कर कानून है. यह एक एकीकृत कर है जो वस्तुओं एवं सेवाओं दोनों पर लगेगा. जीएसटी लागू होने पर पूरा देश एक एकीकृत बाजार में तबदील हो जाएगा और ज्यादातर अप्रत्यक्ष कर जैसे केंद्रीय उत्पाद कर, सेवा कर, वैट, मनोरंजन कर, विलासिता कर, लौटरी टैक्स जैसे 25 से अधिक कर जीएसटी में समाहित हो जाएंगे. इस से समूचे भारत में एक ही कर लगेगा.

वैसे, संविधान के मुताबिक केंद्र और राज्य सरकारें संविधान में दी गई सूचियों के अनुसार अपने हिसाब से वस्तुओं और सेवाओं पर टैक्स लगा सकती हैं. पर इस कानून को लाभदायक मान कर सारे राज्य सहमत हो गए हैं कि करों के जंजाल से शायद देश को मुक्ति मिल जाए.

आज अगर कोई कंपनी या कारखाना एक राज्य में अपने उत्पाद बना कर दूसरे राज्य में बेचता है तो उसे कई तरह के टैक्स दोनों राज्यों को चुकाने होते हैं जिस से उत्पाद की कीमत बढ़ जाती है.

जीएसटी एक जुलाई से लागू करने की पूरी तैयारी है. जीएसटी परिषद ने 500 सेवाओं और 1,200 से ज्यादा वस्तुओं की कर की दरें तय की हैं. उस ने कर की दरों के 5,12,18 और 28 प्रतिशत के 4 स्लैब निर्धारित किए हैं. इन में कई वस्तुओं के महंगी होने की आशंका है तो कई के सस्ती होने के दावे किए गए हैं.

ताजा मीट, अंडा, दूध, दही, शहद, फल, सब्जियां, आटा, बेसन, बटर मिल्क, ब्रैड, नमक, बिंदी, स्टांप, किताबें, अखबार, चूडि़यां, सिंदूर, हैंडलूम आइटम जैसी चीजों के अलावा दैनिक जरूरतों के सामान को इस कर के दायरे से बाहर रखा गया है. पेंट और सीमेंट सस्ता होंगी. सिगरेट, ब्रैंडेड ज्वैलरी, ट्रक जैसे व्यावसायिक वाहन महंगे होंगे. एसी, रैफ्रीजरेटर, टीवी, वाश्ंिग मशीन, महंगे होंगे जबकि स्मार्टफोन, छोटी कारें सस्ती होंगी. शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं कर मुक्त रहेंगी. फोन बिल, इंश्योरैंस व अन्य वित्तीय सेवाओं और ब्रैंडेड कपड़ों पर टैक्स बढे़गा. एसी रेल टिकट पर 5 प्रतिशत टैक्स लगेगा. इकोनौमी श्रेणी की विमानसेवा सस्ती जबकि बिजनैस क्लास महंगी होगी. रेस्तरां में खाना महंगा होगा. पूजा सामग्री, मैडिकल उपकरण भी सस्ते होंगे.

इन के अलावा क्रीम, मिल्क पाउडर, पैक्ड सब्जियां, कौफी, चाय, पिज्जा ब्रैड, कैरोसिन, कोयला, दवाएं, ब्रैंडेड पनीर, साबूदाना जैसी वस्तुओं को 5 प्रतिशत टैक्स के दायरे में रखा गया है. मिठाई, खा- तेल, चीनी भी इसी टैक्स स्लैब में होंगी. हेयर औयल, टूथपेस्ट, साबुन जैसी वस्तुओं पर 18 प्रतिशत टैक्स लगेगा.

शराब पूरी तरह से जीएसटी से बाहर रहेगी यानी इस पर टैक्स लगाने के लिए राज्य सरकारें स्वतंत्र होंगी. पैट्रोल, एलपीजी और रसोई गैस को भी जीएसटी से बाहर रखने का फैसला लिया गया. केंद्र और राज्य दोनों मिल कर इन पर टैक्स लगाते रहेंगे.

महंगाई पर असर

जीएसटी के 3 अंग होंगे, केंद्रीय जीएसटी, राज्य जीएसटी और इंटीग्रेटेड जीएसटी. केंद्रीय और इंटीग्रेटेड जीएसटी केंद्र लागू करेगा जबकि राज्य जीएसटी राज्य सरकारें लागू करेंगी. शराब, सिगरेट पर अधिक टैक्स लगेगा. सरकार को उम्मीद है कि इस से महंगाई 2 फीसदी कम होगी.

यह संविधान में 122वां संशोधन है. इसे भारत में टैक्स सुधारों को ले कर आजादी के बाद से अब तक का सब से महत्त्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन माना जा रहा है.

बताया गया है कि कुछ सामान ऐसे हैं जिन्हें इन दरों के भी दायरे से बाहर रखा गया है. कुछ अन्य मामलों में म्युनिसिपल कौर्पोरेशन जैसी स्थानीय संस्थाएं भी कर थोप सकती हैं. इस तरह देश में अप्रत्यक्ष करों की समान दर की दिशा में जीएसटी आधाअधूरा कदम है.

आंकड़ों के अनुसार, देश के करीब 132 करोड़ लोग सेवाओं और वस्तुओं पर सिर्फ एक तरह का टैक्स देंगे.  मुख्यरूप से वस्तुओं की बिक्री पर कर लगाने का संवैधानिक अधिकार राज्य सरकार और वस्तुओं के उत्पादन व सेवाओं पर कर लगाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है. इस कारण देश में अलगअलग प्रकार के कर लागू हैं. कंपनियों और छोटे व्यवसायों के लिए विभिन्न प्रकार के कर कानूनों का पालन करना मुश्किल होता है.

जीएसटी लागू होने से केंद्र को तो फायदा होगा पर राज्यों को इस बात का डर था कि उन्हें नुकसान होगा क्योंकि इस के बाद वे कई तरह के टैक्स नहीं वसूल पाएंगे जिस से उन की कमाई कम हो जाएगी.

जीएसटी बिल पर कांग्रेसी राज के दौरान काम शुरू हुआ था. यह बिल लोकसभा में मई 2015 में पारित हो गया था पर राज्यसभा में इस बिल को पास कराने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ी. इस के लिए केंद्र सरकार को कई संशोधन करने पड़े.

कांग्रेस ने शुरू में विरोध किया था पर कुछ संशोधनों के बाद वह सहमत हो गई. कांग्रेस ने बिल को समर्थन तब दिया जब सहमति बनाने के लिए जीएसटी बिल में कुछ बड़े बदलाव किए गए. इन में 1 प्रतिशत इंटरस्टेट ट्रांजैक्शन टैक्स हटाया गया है. मूल विधेयक में राज्यों के बीच व्यापार पर 3 साल तक 1 प्रतिशत अतिरिक्त टैक्स लगाना था.

विवादों का फेर

बदलाव के बाद अब राज्यों को 5 वर्षों तक 100 प्रतिशत नुकसान की भरपाई की जाएगी. पहले 3 साल तक 100 फीसदी, चौथे साल 75 फीसदी और 5वें साल में 50 फीसदी भरपाई का प्रावधान है.

विवाद सुलझाने के लिए नई व्यवस्था की गई है जिस में राज्यों की आवाज बुलंद होगी. पहले विवाद सुलझाने की व्यवस्था मतदान आधारित थी जिस में दोतिहाई वोट राज्यों के और एकतिहाई केंद्र के पास थे. विधेयक में जीएसटी के मूल सिद्धांत को परिभाषित करने वाला एक नया प्रावधान जोड़ा जाएगा जिस में राज्यों और आम लोगों को नुकसान नहीं होने का भरोसा दिलाया जाएगा.        देश के ज्यादातर राज्य जीएसटी के समर्थन में हैं. देश के कई राज्यों को अपनीअपनी विधानसभाओं में इसे पास कराना होगा.

दुनिया के कई देशों में इस तरह की कर व्यवस्था है. यह करीब 165 देशों में है. इन में फ्रांस, जरमनी, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, स्वीडन, डेनमार्क जैसे देश हैं पर ये सभी देश छोटे हैं चाहे अमीर हों. मोदी सरकार के सामने 2 साल में जीएसटी को समुचित तरीके से लागू कराने की चुनौती है. कालेधन और बेनामी संपत्ति के कानूनों का असर अभी तक दिखना शुरू नहीं हुआ है. नवंबर 2016 में सरकार ने हजार और 5 सौ रुपए के नोट बंद करने का फैसला लिया था.

नोटबंदी से आर्थिक विकास पर भले ही फर्क न दिखा हो पर सूक्ष्म व लघु उद्योगों की हालत बिगड़ी है. बैंकों का एनपीए एक लाख करोड़ रुपए बढ़ा है और बड़े कर्जदारों से कर्जवसूली नहीं हो पाई है. आर्थिक विकास के साथ रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं बढ़ रहे हैं. देश में हर साल करीब एक करोड़ युवा पढ़ाईर् पूरी कर के नौकरी की तलाश में जुट जाते हैं. सरकार का हर साल 1 से 2 करोड़ रोजगार देने का वादा फिलहाल हकीकत से दूर नजर आ रहा है.

कर व्यवस्था

रोजगार वृद्धि में रुकावट का एक बड़ा कारण कर व्यवस्था भी माना जाता है. हमारे यहां जौबलैस ग्रोथ के कारणों में बताया जाता है कि जीडीपी में बड़ी हिस्सेदारी वाले सर्विस सैक्टर जैसे कई क्षेत्रों में नौकरियों की वृद्धि का अनुपात समान नहीं है. मैन्युफैक्चरिंग, कृषि जैसे अधिक रोजगार देने वाले क्षेत्र अर्थव्यवस्था की गति के हिसाब से पीछे हैं. जीडीपी में भारतीय मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी केवल 16 प्रतिशत है जबकि चीन में यह 35 प्रतिशत है.

छोटे व खुदरा व्यापारियों के संगठन सरकार से माल एवं सेवा कर के तहत विभिन्न वस्तुओं की दर पर पुनर्विचार करने की मांग कर रहे हैं. बौलीवुड भी जीएसटी के विरोध में उतर रहा है. शराब और रीयल एस्टेट को जीएसटी के दायरे से बाहर रखे जाने के चलते सरकार पर राजनीतिबाजों और प्रभावशाली लोगों की लौबी के दबाव में काम करने के आरोप लग रहे हैं.

आईटी कंपनियों को नुकसान होने का अंदेशा है. वर्कफोर्स से ले कर उत्पादन की लागत तक सब बढ़ जाएगी.

दरअसल, जीएसटी का जितना प्रशंसागान हो रहा है उतना फायदा होगा नहीं. बिचौलिए खत्म नहीं होंगे. टैक्स ज्यादा है तो चोरी रुकेगी नहीं. अगर कर कम होता तो गुंजाइश कम रहती.

सिनेमा चाहे थिएटर में जा कर देखें या घर पर, दोनों ही जगह 18 प्रतिशत टैक्स लगने से पायरेसी का धंधा बढे़गा.

जीएसटी के दायरे में वे दुकानदार भी आएंगे जो वर्तमान में नकद में माल बेचते हैं और ऐक्साइज व वैट चुकाने से बचते हैं. जब आप टैक्स नहीं देते हैं तो वस्तु या सेवा की कीमत टैक्स के बराबर कम हो जाती है. यह बात हर ग्राहक जानता है. आमतौर पर दुकानदार उस से यही कहता है कि पक्का बिल चाहिए तो टैक्स चुकाना होगा और बिल की राशि उतनी ही बढ़ जाएगी.

जीएसटी के अमल में आने पर अब इस पर रोक लगेगी तब महंगाई दर का बढ़ना तय है. आखिर यह टैक्स जनता की जेब से ही तो जाएगा.

देश के तमाम राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एक बाधारहित प्लेटफौर्म पर लाना इतना आसान नहीं होगा. रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया, रिटर्न फाइलिंग, मौनीटरिंग और सैटलमैंट जैसी व्यवस्था पुख्ता करना टेढ़ी खीर होगा. टैक्स चोरी पर नियंत्रण के लिए स्पष्ट तंत्र नहीं है.

टैक्स चोरी कैसे हो सकती है? माल आपूर्तिकर्ता कर का भुगतान बिल के अनुसार करेगा, न कि माल की वास्तविक आपूर्ति के हिसाब से. माल आपूर्ति और इनवौयस में अंतर किए जाने की बेईमानी बढे़गी. सरकार के लिए इस पर अंकुश लगाना मुश्किल होगा.

मान लीजिए एक व्यापारी ने ट्रक में माल भरने से पहले खाली ट्रक का वजन कराया. फिर 20 टन माल भरवा दिया लेकिन बिल में उस ने 15 टन ही दर्शाया है. अब वह 5 टन माल का टैक्स बचा लेगा. अगर माल तुलवाया गया और बेईमानी पकड़ में आ गई तो भी वह ऊपर के माल पर इंस्पैक्टर को घूस दे कर कर चोरी से बच जाएगा. सरकार यहां क्या कर लेगी? ऐसे में इंस्पैक्टर राज बढ़ जाएगा. इसे रोक पाना सरकार के सामने पहले की तरह चुनौती होगी.

जाली बिलों का चलन बढ़ जाएगा. सरकार को लगता है कि जीएसटी लागू होने से गलत लोग बाजार से खुद ही बाहर हो जाएंगे, पर ऐसा होगा नहीं. पाप करेंगे, तो दानपुण्य कर के बचने के उपाय भी तो हैं. चोरी, बेईमानी हमारी रगरग में बसी हुई है.

अर्थशास्त्रियों के अनुसार, जीएसटी लागू होने से नए घर खरीदने की कीमत बढ़ जाएगी और घर खरीदने वालों में कमी आएगी. जानकार कह रहे हैं कि जीएसटी एक भ्रम है. एक कर के नाम पर 2 तरह के कर, एक सैंट्रल टैक्स और दूसरा राज्य टैक्स लगेगा. इन के अलावा एक इंटरस्टेट जीएसटी भी लागू हो सकता है. इस के नियमों के बारे में अभी साफतौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता.

जीएसटी का मतलब यह नहीं है कि यह कानून प्रकृति के डीएनए की तरह होगा कि हर पीपल का पेड़ एकजैसा होगा. इसे अफसरों ने बनाया है और अफसरशाही ने पंडों की तरह गलती होने पर यहां भी चढ़ावे का दस्तूर बनाया हुआ है.

यहां तो लोग घोर धार्मिक होते हुए भी धर्म के बताए रास्ते पर नहीं चलते. अगर चलते तो कालाधन, करचोरी, बेईमानी, चोरी होती ही नहीं. इस से चोरी, बेईमानी, भ्रष्टाचार, कालेधन पर रोक बदस्तूर जारी रहेगी. क्या जिन देशों में ऐसी कर व्यवस्था है वहां ईमानदारी का राज स्थापित हो गया है?

राजा के राजधर्र्म से ले कर राज कर्मचारियों की बेईमानी को रोकने के लिए सैकड़ों साल पहले लिखी गईं चाणक्य नीति से ले कर कौटिल्य की अर्थनीति तक की सीख के बावजूद करों को ले कर न व्यापारियों, न जनता और न ही राज की बेईमानी रुक पाई है.

जीएसटी से भी ऐसा नहीं लग रहा है. हां, चाणक्य नीति, कौटिल्य नीति के बाद अब जीएसटी बिल मोदी नीति के रूप में जरूर शुमार हो जाएगा.  

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वक्त जाता रहा

नाकामियों को अपनी संवारते ही रहे हम

खंडहरों में जिंदगी तलाशते ही रहे हम

उठते रहे हैं अकसर तूफां बीती यादों के

सुबहशाम यादों को बुहारते ही रहे हम

न की परवा किसी ने रत्तीभर भी हमारी

मारे दर्द के दिनरात कराहते ही रहे हम

अपनी मदद को कोई इक बार भी न आया

पुकारने को तो सब को पुकारते ही रहे हम

जब वक्त पड़ा हम पर, सब मुंह मोड़ बैठे

रिश्तों की पोटली को संभालते ही रहे हम.

       – हरीश कुमार ‘अमित’

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