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किसान ने बनाई कंपोस्ट टर्निंग मशीन

हरियाणा के पानीपत जिले के सींख गांव के किसान जितेंद्र मलिक की पढ़ाई के वक्त खेती के कामों में दिलचस्पी कम ही रही, लेकिन पढ़ाई में भी उन का मन ज्यादा नहीं लगा. उन्होंने दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी. उन्होंने साल 1995 में गांव में सफेद बटन मशरूम की खेती शुरू की. साल 2005 तक तो जैसेतैसे मशरूम की उपज ली, मगर काम में उत्साह महसूस नहीं हो रहा था. रोजरोज मजदूरों की समस्या रहती थी. उसी बीच उन्होंने ‘खुंबी कंपोस्ट मिक्सचर मशीन’ बना डाली. मशीन को ट्रैक्टर के पीछे जोड़ कर ट्रायल किया तो मनचाही सफलता हाथ नहीं लगी. फिर से वे अनमने मन से खेती में जुट गए, मगर कसक थी कामयाब होने की.

कुछ अरसे बाद रोजरोज की परेशानियों से पीछा छुड़ाने के लिए जितेंद्र ने फिर से मशरूम की मशीन बनाने की सोची. इस बार भाई ने हिम्मत बंधाई. 15 दिनों में मशीन बनाने से जुड़े सभी उपकरणों को जुटाया. मशीन तैयार की और ट्रायल किया. सब कुछ सही हुआ. अगले साल मशीन में कुछ मामूली से बदलाव किए, जो अब तक कायम हैं. तब मशीन बनाने में 2 लाख रुपए खर्च हुए थे.

कैसे काम करती है यह मशीन

जितेंद्र ने मशीन को ‘कंपोस्ट टर्निंग मशीन’ नाम दिया है. यह मशीन खाद डालने पर पड़ी हुई सभी गांठों को खोल देती है. इन गांठों को तोड़ने के लिए छत में एक जाली भी लगाई है, जिस के संपर्क में आने से कंपोस्ट की गांठें टूट जाती हैं. यह अंदरूनी परत को बाहर और बाहरी परत को अंदर की तरफ फेंकने का काम भी करती है, जिस से अमोनिया की निकासी में बहुत सहायता मिलती है. इस मशीन से क्वालिटी कंपोस्ट तैयार होता है. मजदूरों की तादाद कम हुई है और उत्पादन बढ़ गया है. यह अकेली मशीन 50 मजदूरों के बराबर का काम 1 दिन में करती है. इस मशीन द्वारा मात्र 60 मिनट में 300 क्विंटल के करीब कंपोस्ट टर्न होता है. शुरू में कंपोस्ट पूरी तरह भीगता नहीं था, अब पाइप चलाने पर फुहारे से पानी मिल जाता  है. मशीन को चलाना भी काफी आसान है. यह बिजली और डीजल दोनों से चल सकती है.

उन्होंने हाल ही में एक नई मशीन भी बनाई है, जिस की लागत करीब सवा 3 लाख रुपए है. पहले वाली मशीन तैयार कंपोस्ट को सीधे एक ही लाइन में रखती जाती थी, अब यह नई मशीन कंपोस्ट को मनचाही जगह दाएंबाएं रखती है. यह कंपोस्ट को ट्राली में भी लोड कर सकती है, ताकि उसे दूसरी जगह ले जाया जा सके. यह नई मशीन जेसीबी का काम भी कर लेती है. इस मशीन से न सिर्फ पैदावार बढ़ेगी, बल्कि खर्च भी कम होगा. जो काम पहले 40-50 मजदूरों से होता था, अब महज 10 मजदूरों से ही हो जाता है.

मानसम्मान

अपने नवाचारों के लिए जितेंद्र को कई मानसम्मान भी मिले हैं. उन्हें ‘राष्ट्रीय फार्म इन्नोवेटर मीट’ 2010 में आईसीएआर ने मैसूर के केवीके में सम्मान प्रदान किया. हरियाणा के चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय ने उन्हें 3 बार सम्मानित किया. सोलन के मशरूम निदेशालय ने भी उन्हें सम्मान दिया. जितेंद्र को नेशनल इन्नोवेशन फाउंडेशन का 3 लाख रुपए का द्वितीय राष्ट्रीय पुरस्कार महामहिम राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा राष्ट्रपति भवन में 7 मार्च, 2015 को ‘कंपोस्ट टर्निंग मशीन’ बनाने के लिए दिया गया. बीकानेर के राजस्थान पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय में 9-10 मार्च को देशभर के कृषक वैज्ञानिकों, प्रगतिशील किसानों व विशेषज्ञों के राष्ट्रीय मंथन कार्यक्रम में उन्हें ‘खेतों के वैज्ञानिक’ सम्मान से नवाजा गया.

मशीन की ज्यादा जानकारी के लिए किसान निम्न पते पर संपर्क कर सकते हैं:

गांवपोस्ट : सींख, तहसील : इसराना, जिला : पानीपत (हरियाणा). मोबाइल नंबर 09813718528.

गड़हनी साग

घास प्रजाति का गड़हनी साग गरीब आदिवासियों की थाली में सब से स्वादिष्ठ सागभाजी  है. वे इसे बाजार से नहीं, बल्कि मुफ्त में नदीनालों के किनारों से लाते  हैं और सागभाजी बना कर चावल या रोटी के साथ मजे से खाते  हैं.

यह उन का सब से प्रिय सागभाजी है. अब तो इस सागभाजी को आदिवासियों की देखादेखी और भी लोग खाने लगे  हैं. घास पतवार के  रूप में गड़हनी साग झारखंड के पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूमि के नमी वाले स्थानों पर पाया जाता है. यह साग खेतों में नहीं उपजाया जाता, बल्कि यह अन्य सब्जीभाजी लगे खेतों में अपनेआप उग आता  है. इस की पैदावार के  स्थान उथली नदी, नालों के किनारे, सब्जीभाजी लगे खेत, कुएं व तालाब के किनारे वगैरह  हैं. यह साग मुख्य रूप से पानी वाले स्थानों पर होता  है. गड़हनी साग के डंठल में दाएंबाएं चारों तरफ से पत्तियां निकली होती  हैं. इस में फूल नहीं होता. इस की लंबाई 7 से 8 इंच के करीब होती  है. इस का डंठल बाल पेन के रीफिल से थोड़ा ही मोटा होता  है और पत्तियां 1 इंच से बड़ी नहीं होतीं. डंठल हलके हरे रंग का होता है, जबकि इस की पत्तियां गहरे हरे रंग की होती हैं. इस की जड़ मिट्टी और पानी दोनों में होती  है, लेकिन पानी इस के लिए जरूरी है. इस की जड़ मिट्टी के बगैर भी बढ़ती  है, लेकिन पानी के बिना यह तुरंत मुरझा जाता  है.

आम शहरी लोग गड़हनी साग से अनजान होने के कारण अपने खानपान में इसे शामिल नहीं करते, इसलिए यह बाजारों में नहीं बिकता  है. सच तो यह  है कि इस के बारे में आदिवासियों के अलावा कोई जानता ही नहीं  है. यह साग खाने में काफी स्वादिष्ठ होता है. जैसे चौलाई का साग बनाया जाता है, उसी तरह से इसे भी बनाया जाता  है. पहले इसे नाखूनों से तोड़ा जाता है, फिर धो कर काट लिया जाता  है. काटने के बाद सरसों का तेल कड़ाही में गरम कर के मेथी की छौंक लगाई जाती है, फिर गड़हनी साग को कड़ाही में डाल  फ्राई किया जाता  है. फ्राई करते समय यह साग पानी छोड़ता है, जिसे कड़ाही में ही सुखा दिया जाता है. पकने के बाद इसे कड़ाही से निकाल कर एक कटोरे में ले कर इस में थोड़ा कच्चा तेल, नमक और कटी हरी मिर्च मिलाते हैं.

इस प्रकार यह खाने के लिए तैयार हो जाता है. इस का स्वाद चने के साग जैसा ही लगता  है, लेकिन थोड़ा अलग सा लगता है. इसे भात यानी चावल के साथ सान कर खाया जा सकता  है. कुछ लोग इसे दालभात के साथ भी खाते  हैं. रोटी के साथ खाने में यह और भी स्वादिष्ठ लगता  है. गड़हनी साग सेहत के लिहाज से भी काफी लाभदायक होता  है. इसे खाने से आंखों की रोशनी बरकरार रहती है, खून का संचार सही रहता  है, पेट ठंडा रहता  है, कब्ज नहीं होता, सिर के बाल नहीं झड़ते  हैं और न ही जल्दी सफेद होते हैं. यह सच है कि इसे खाने वाले आदिवासी लोगों की आंखों पर चश्मा नहीं चढ़ता और न ही वे गंजे होते  हैं.

फ्लोरीकल्चर:फूलों सा खिलता कारोबार

फूलों की मांग आज के समय में दिनबदिन बढ़ती ही जा रही है. खुशी के हर मौके पर फूलों का इस्तेमाल बहुत ही जरूरी हो गया है. यही वजह है कि सुबह सब से जल्दी और रात में देर तक फूलों की ही दुकानें खुली मिलती हैं. लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए फूलों का करोबार देश से ले कर विदेशों तक में फैला हुआ है.

फूलों के पौधे कम समय में ही तैयार हो जाते हैं, जिस से फूलों का कारोबार मुनाफे का जरीया बन गया है. आने वाले समय में भी फूलों के बढ़ते कारोबार से फूलों की खेती और इस से जुडे़ दूसरे काम बड़े कारोबार के रूप में निखरेंगे. भारत के अलावा कीनिया, इजराइल, कोलबिंया, फ्रांस, जापान और जर्मनी फूलों के सब से बड़े निर्यातक देश हैं.

भारत के कर्नाटक प्रदेश में फूलों की खेती सब से ज्यादा होती है. देश में फूलों की पैदावार का 75 फीसदी हिस्सा कर्नाटक में ही होता है. फूलों के कारोबार की मांग साल दर साल 25 से 30 फीसदी के हिसाब से बढ़ती जा रही है. फूलों के निर्यात में भारत का हिस्सा बहुत ही कम है. भारत में जमीन, जलवायु और कई तरह के फूलों की पैदावार के चलते फूलों के कारोबार की संभावना बहुत है. इसी वजह से फ्लोरीकल्चर नई विधा के रूप में उभर कर सामने आई है.

फ्लोरीकल्चर का संबंध फूलों की खेती से होता है. इस में फूल और फूलदार पेड़ों की खेती और उस के व्यावसायिक इस्तेमाल के बारे में जानकारी मिलती है. फूलों की खपत ताजे फूलों के साथसाथ परफ्यूम, फार्मा और सौंदर्य सामग्री बनाने वाली कंपनियों में होती है. फूलों के बढ़ते कारोबार ने फ्लोरीकल्चर में कैरियर के नए रास्ते भी खोल दिए हैं. फ्लोरीकल्चर की जानकारी हासिल कर के स्वरोजगार को भी बढ़ाया जा सकता है. फ्लोरीकल्चर में फूलों के कारोबार से जुड़ी हुई हर तरह की जानकारी दी जाती है, जो फूलों से जुड़े हुए कारोबार को बढ़ाने में मदद करती है.

फूलों से रोजगार

फूलों के कारोबार से कैरियर को नया आयाम दिया जा सकता है. फ्लोरीकल्चर से जानकारी हासिल करने के बाद अपना छोटा रोजगार चलाया जा सकता है. फूलों के कच्चे माल को बेचने का कारोबार हो सकता है. फ्लोरीकल्चर से डिगरी लेने के बाद सरकारी और प्राइवेट सेक्टर में नौकरी मिलने की ढेर सारी संभावनाएं हो जाती हैं. इस डिगरी को लेने के बाद लैंडस्कैप डिजाइनर, हार्टिकल्चर थेरेपिस्ट, ग्राउंड कीपर्स और फ्लोरल डिजाइनर के रूप में काम मिलने लगता है. इस के अलावा खेत बागान प्रबंधक, सुपरवाइजर और विशेषज्ञ के रूप में भी नौकरी की जा सकती है.

फूलों की सजावट अलगअलग समय पर अलगअलग तरह से होती है. जिन लोगों को इस की जानकारी होती है, उन की भी अच्छी डिमांड होती है. फूलों की नर्सरी लगाने, खुशबूदार पौधों और लैंडकेपिंग के बारे में जानकारियां देने का काम भी किया जा सकता है. फ्लोरीकल्चर  में फूलों और कलियों का उत्पादन, डिजाइनिंग, बुके बनाना, झालर वाले फूलदार पौधे उगाना जैसी तमाम जानकारियां दी जाती हैं.

इस में फूलों की खेती की पूरी जानकारी दी जाती है. फूलों की चुनाई की जानकारी भी फ्लोरीकल्चर में मिलती है.

बदलते समय में घर व आफिस में हरियाली को अच्छे इंटीरियर के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है. लोग बागबानी में भी रुचि रखने लगे हैं. इस से बागबानी, आफिस, घर, पार्क और कार्यालय वगैरह की सजावट करने के लिए सलाह देने का काम भी किया जा सकता है. कई बड़ी कंपनियां इस तरह के लोगों को नौकरी पर भी रखती हैं.

फ्लोरीकल्चर की पढ़ाई

फ्लोरीकल्चर के क्षेत्र में कैरियर बनाने के लिए ऐसे मेहनती लोगों की जरूरत होती है, जो नेचर के करीब होते हैं और खेती के काम करना चाहते हैं. फ्लोरीकल्चर विषय में डिगरी की उपलब्धता नहीं है. इस के लिए एग्रीकल्चर में गे्रजुएट या बीएससी इन एग्रीकल्चर का चुनाव किया जा सकता है.

बायोटेक्नोलाजी में भी एग्रीकल्चर का दखल बढ़ गया है. जीव विज्ञान से 12वीं कक्षा की परीक्षा पास करने के बाद बीएसएसी और उस के बाद एमएससी इन हार्टीकल्चर परीक्षा पास की जा सकती है. एमएससी हार्टीकल्चर में फूलों, फलों और सब्जियों के बारे में बताया जाता है. कम समय में जानकारी हासिल करने के लिए अलगअलग स्कूलकालेजों के द्वारा डिप्लोमा कोर्स भी किए जा सकते हैं. इलाहाबाद एग्रीकल्चरल विश्वविद्यालय, इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश), चंद्रशेखर आजाद एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय कानपुर (उत्तर प्रदेश), चौधरी चरण सिंह एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय हिसार, इंडियन एग्रीकल्चर रिर्सच इंस्टीट्यूट कृषि अनुसंधान भवन नई दिल्ली, कालेज आफ एग्रीकल्चर पूना और फारेस्टी रिसर्च विश्वविद्यालय देहरादून जैसी तमाम जगहों से एग्रीकल्चर कोर्स कराए जाते हैं. पालीटेकनिक स्कूल आफ हार्टीकल्चर जूनागढ़, एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय जूनागढ़ और डिपार्टमेंट आफ बाटनी हिसलाय कालेज नागपुर जैसी जगहों से डिप्लोमा कोर्स भी किए जा सकते हैं.

40फीसदी बढ़ रहा फूलों का कारोबार 

शादी का मंडप हो या किसी के स्वागत की तैयारी, फूलों की सजावट सब से जरूरी होती है. रोज के कामकाज में फूलों की सजावट का ज्यादा इस्तेमाल होने से तरहतरह के फूलों की मांग बढ़ गई है. अब सजवाट और लाइट के हिसाब से अलगअलग रंगों के फूलों की मांग बढ़ गई है. इसी वजह से तरहतरह के देशी और विदेशी फूलों की खेती करने वालों की तादाद बढ़ गई है. पहले किसान गेंदा और गुलाब की खेती तक ही अपने को सीमित रखते थे, मगर अब नएनए फूलों की मांग बढ़ने से रंगबिरंगे विदेशी फूलों की खेती भी लाभदायक हो गई है. जो फूल लोकल बाजार में नहीं मिलते हैं, वे बडे़ शहरों और विदेशों तक से मंगाए जाते हैं. अपने देश के भी बहुत सारे किसान विदेशों में फूलों को भेजते हैं.  जनवरी से ले कर दिसंबर तक हर महीने में कोई न कोई खास दिन जरूर होता है, जिस में बहुत सारे लोग एकदूसरे को बधाई देते हैं. बधाई देने के लिए फूलों के बुके से अच्छा दूसरा कुछ नहीं होता है. इस के अलावा जन्मदिन या अन्य मौकों पर शुभकामना संदेश देने के लिए भी फूलों के गुलदस्ते बहुत काम के होते हैं.

जिस तरह से फूलों की बाजार में मांग बढ़ी है,उसी के मुताबिक फूलों की खेती का दायरा भी बढ़ गया है. किसानों के लिए फूलों की खेती चमकते सोने के समान हो गई है. देशी फूलों के साथसाथ अब बहुत सारे विदेशी फूलों की खेती भी भारतीय किसानों ने करनी शुरू कर दी है. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और आसपास के जिलों की बात करें, तो रायबरेली, हरदोई, कन्नौज, बाराबंकी और कानपुर में गुलाब, गलोडियस, रजनीगंधा और जरबेरा जैसे फूलों की खेती होती है. इस के अलावा उत्तराखंड से बहुत सारे फूल आते हैं. दिल्ली और बेंगलूरू की फूल मंडियों से बहुत सारे देशी और विदेशी फूल मंगवाए जाते हैं. इन फूलों में तमाम तरह की किस्में होती हैं. फूलों की डिमांड का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शादीविवाह के सीजन में मंडी से फूल गायब हो जाते हैं. फूलों की खेती करने वाले तमाम किसान महसूस कर रहे हैं कि फूलों का बढ़ता कारोबार उन के लिए सुनहरा भविष्य ले कर आया है.

दीपिका की बदलापुर

श्रीराम राघवन की फिल्म ‘बदलापुर’ काफी सराही गई थी. इस रिवेंज ड्रामा में अभिनेता वरुण धवन और नवाजुद्दीन सिद्दीकी की जुगलबंदी काफी बढि़या थी. अब इस फिल्म के निर्माता फिल्म का सीक्वल प्लान कर रहे हैं. पर इस बार फिल्म में वरुण और नवाज को नहीं देख सकेंगे क्योंकि पार्ट-2 में नई टीम कास्ट की जा रही है. निर्देशक इस सीक्वल के लिए दीपिका पादुकोण को साइन कर रहे हैं. दीपिका पादुकोण को इस फिल्म में साइन करने की एक वजह यह भी कि इस फिल्म के निर्माता दिनेश विजान की लगभग सभी फिल्मों में दीपिका नजर आई हैं, इसलिए वे उन की पहली पसंद हैं.

‘कौकटेल’, ‘लव आजकल’ और ‘फाइडिंग फैनी’ जैसी फिल्मों में वे दिनेश के साथ काम कर चुकी हैं. इतना ही नहीं, दिनेश विजान की बतौर डायरैक्टर पहली फिल्म ‘राबता’ में भी दीपिका ने आइटम सौंग किया है. जिस तरह से ‘कहानी’ फिल्म के सीक्वल में विद्या बालन को बदला लेते हुए दिखाया गया था, शायद वैसे ही दीपिका ‘बदलापुर’ के इस भाग में बदला लेती दिखेंगी.

मल्लिका की बोल्डनैस

मल्लिका शेरावत ने कान फैस्टिवल में मौजूद हौलीवुड सैलिब्रिटीज को बोल्ड अदाओं से अपना दीवाना बना दिया. उन्होंने जौर्ज होब्का के डिजाइन किए गाउन के बोल्ड लुक से रैड कारपेट पर हलचल मचाई जबकि मानव तस्करी पर दी अपनी स्पीच से वे चर्चा में भी बनी रहीं.

मल्लिका ने मानव तस्करी अपराधियों पर मुकदमा चलाने की आवश्यकता पर जोर दिया और लोगों को इस अनैतिक व अमानवीय व्यवहार के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए प्रेरित किया.

गौरतलब है कि कुछ समय पहले मल्लिका को पैरिस में उन के अपार्टमैंट ब्लौक के बाहर 3 नकाबपोश घुसपैठियों ने कथित तौर पर पीटा और लूट लिया था.

इस घटना के बाद मल्लिका ने एक साक्षात्कार में कहा कि हर जगह लाखों महिलाएं, बच्चे आपराधिक हमलों के जोखिम में है. ऐसी घटना किसी के साथ कहीं भी कभी भी घट सकती है. इस के लिए मैं पैरिस शहर को कुसूरवार नहीं ठहराती. उन्होंने बताया कि इस घटना के बाद मेरे पास एक उम्रदराज महिला आई और बड़े ही विनम्र भाव से पूछा कि ‘मैं ठीक हूं’. उन्हें इस हमले की कहीं से जानकारी मिली थी. यह दिल को छूने वाला अपनापन था.

ई-परिवहन प्रणाली से आधा हो जाएगा किराया

देश में परिवहन क्षेत्र में नई क्रांति आ रही है. सरकार पैट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों की जगह वैकल्पिक ऊर्जा का इस्तेमाल करने पर जोर दे रही है. इस के तहत हाल ही में सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने महाराष्ट्र के नागपुर में इलैक्ट्रिक बैटरी से संचालित 200 बस, टैक्सी, आटो और आटोरिकशा को हरी झंडी दिखाई.

इस से पहले बाजार में ई-रिकशा आ चुके हैं और इस से सचमुच देश के हर कोने में क्रांति का माहौल है. साइकिल रिकशों की संख्या घट गई है. यह ठीक है कि गरीब के समक्ष रोटी का संकट पैदा हुआ है लेकिन शारीरिक श्रम की जो पराकाष्ठा साइकिल रिकशे के रूप में देखने को मिलती थी, सरेआम उस की धज्जियां अब नहीं उड़ेंगी.

यह बदलाव है और बदलते समय के अनुसार इस तरह के बदलाव आवश्यक हैं. नागपुर देश का पहला शहर बन गया है जहां बैटरी संचालित परिवहन सेवा की शुरुआत हो गई है. यह शुरुआत महिंद्रा ऐंड महिंद्रा तथा टैक्सी सेवा देने वाली कंपनी ओला के सहयोग से की गई है.

नितिन गडकरी ने कहा कि इस सेवा के लिए शहर में 4 चार्जिंग स्टेशन बनाए गए हैं. इन से फास्ट चार्जिंग तथा सामान्य चार्जिंग होगी. फास्ट चार्जिंग से बैटरी डेढ़ घंटे में तथा सामान्य चार्जिंग से 7 घंटे में चार्ज होगी. उन का कहना था कि वे जल्द ही 2 लाख बैटरी चालित बस शुरू करेंगे. इस के लिए जापान की एक कंपनी से बात चल रही है. ई-परिवहन व्यवस्था से जहां प्रदूषण नहीं होगा वहीं दावा किया जा रहा है कि इस से किराया आधा रह जाएगा. लोग अब नागपुर में पैट्रोल पंप की जगह ई-चार्जिंग स्टेशन खोलने की मांग करने लगे हैं.

जियो के कारण दूरसंचार कंपनियों को भारी घाटा

मोबाइल फोन सेवाप्रदाता कंपनी रिलायंस जियो इन्फोकौम लिमिटेड ने अपने ग्राहकों की संख्या बढ़ाने के लिए पिछले वर्ष इंटरनैट डेटा निशुल्क देने की शुरुआत की और यह सेवा वह इस वर्ष मार्च तक उपभोक्ताओं को देता रहा. इस के कारण उस के ग्राहकों की संख्या करोड़ों में बढ़ी है लेकिन दूरसंचार कंपनियों को इस का भारी खमियाजा उठाना पड़ा है.

पिछले वित्त की आखिरी तिमाही में मोबाइल फोन सेवाप्रदाता कंपनियों को इस के कारण 37 हजार 284करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ा. घाटे के कारण बड़ी कंपनियों को अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. उस से पहले की तिमाही में यह घाटा 44,754 करोड़ रुपए का था. दिसंबर के बाद जियो की सेवा से ग्राहक कुछ कम संतुष्ट नजर आ रहे थे, इसलिए अन्य कंपनियों की सेवाओं की तरफ कई ग्राहकों ने रुख किया.

टैलीकौम बाजार में जियो के चलते जबरदस्त प्रतिस्पर्धा आई और कंपनियों ने कम दाम पर डाटा सेवा ग्राहक को उपलब्ध कराई है. इस से देश में मोबाइल नैटवर्क का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है. हर हाथ में स्मार्टफोन आया है जिस से स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियों की खूब कमाई हुई है.

सेमीफाइनल से पहले ही जादू कर रहे हैं युवी, देखें वीडियो

इंग्लैंड में खेले जा रहे चैंपियंस ट्रॉफी के दूसरे सेमीफाइनल मैच में आज बांग्लादेश का मुकाबला टीम इंडिया के साथ होगा. इस मैच में जो भी टीम जीतेगी वह फाइनल में पाकिस्तान से भिड़ेगी, क्योंकि कल खेले गए पहले सेमीफाइनल मुकाबले में इंग्लैंड को हराकर पाकिस्तान पहले ही फाइनल में प्रवेश कर चुका है.

बांग्लादेश के खिलाफ टीम इंडिया का जादू चलेगा या नहीं, यह मैच शुरू होने के बाद पता चलेगा, लेकिन उससे पहले युवराज सिंह ने एक 'जादू' कर सबको चौंका दिया है. जी हां, युवराज ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो शेयर किया है, जो इंटरनेट पर काफी वायरल हो रहा है.

इस वीडियो में युवराज 'जादू' करते नजर आ रहे हैं. दरअसल, वीडियो में युवराज ऑटोमैटिक दरवाजे के साथ इस तरह की एक्टिंग कर रहे हैं, जैसे वह जादू दिखा रहे हों. शायद वह इस वीडियो के जरिए फैंस और टीम के साथी खिलाड़ियों की टेंशन दूर कर उनका मनोबल बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.

वीडियो में दिख रहा है कि युवराज प्रैक्टिस सेशन से लौटकर ड्रेसिंग रूम के अंदर जा रहे हैं. ड्रेसिंग रूम के गेट में सेंसर लगा हुआ है. वह युवराज के कदमों की धमक से वह खुल जाती है. वहीं युवराज इस तरह से एक्टिंग करते हैं मानो वह जादू कर रहे हैं तभी दरवाजा खुल रहा हो. वह अंदर जाने के बाद एक बार फिर से बाहर आते हैं और उसी एक्टिंग को दोहराते हैं.

मालूम हो चैंपियंस ट्रॉफी के अब तक के तीन मुकाबलों में युवराज सिंह की बल्लेबाजी अच्छी रही है. आज के मैच में युवराज अपना 300वां वनडे मैच खेलेंगे. पाकिस्तान के खिलाफ मैच में उन्होंने शानदार अर्धशतक जमाया था और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मैच में भी उन्होंने विराट कोहली के साथ मिलकर अच्छी साझेदारी की थी.

सिर मुंडवा कर बने बौस

अभिनेता राजकुमार राव अपने किरदारों से चौंकाते रहते हैं. इस बार वे अपना सिर मुंडवा कर सब को चौंका रहे हैं.

फिल्म ‘शाहिद’ और ‘अलीगढ़’ में अपनी अदाकारी का लोहा मनवा चुके राजकुमार दरअसल बालाजी प्रोडक्शन हाउस की एक वैब सीरीज में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का किरदार अदा कर रहे हैं. इस किरदार को करने के लिए उन्होंने मेकअप की मदद लेने के बजाय अपना आधा सिर गंजा कर लिया है ताकि वे उन की तरह दिख सकें.

इस सीरीज में अभिनेत्री पत्रलेखा भी उन के साथ काम करेंगी. ये वही पत्रलेखा हैं जो उन के साथ फिल्म‘सिटीलाइट’ में काम कर चुकी हैं. फिल्म का निर्देशन हंसल मेहता करेंगे. राजकुमार राव अकसर अपनी फिल्मों में अपने किरदार के लिए काफी तैयारी करते हैं, लेकिन इस बार उन्होंने जो किया है उसे करने के लिए कम ही ऐक्टर तैयार होते हैं.

मामू के सहारे इमरान

आमिर खान के भांजे व अभिनेता इमरान खान ने बड़े जोरशोर से 2008 में फिल्म ‘जाने तू या जाने न’ से अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा था. मगर उन का कैरियर गति नहीं पकड़ पाया. 2008 से 2013 के बीच उन्होंने 12 फिल्मों में अभिनय किया. मगर इन में से एक भी फिल्म उन्हें स्टार नहीं बना सकी.

18 सितंबर, 2015 को प्रदर्शित फिल्म ‘कट्टी बट्टी’ में वे कंगना रानौत के साथ नजर आए थे. इस फिल्म की बौक्स औफिस पर ऐसी दुर्गति हुई कि निखिल आडवानी ने अपनी दूसरी फिल्म में इमरान खान को लेने का इरादा छोड़ दिया.

अब इमरान खान ने अभिनय से तोबा कर ली है. पिछले 2 वर्षों से वे घर पर बैठ कर फिल्म की पटकथा पर काम करते रहे. अब वे अपनी लिखी पटकथा वाली फिल्म का निर्देशन करने वाले हैं, जिस का निर्माण कोई और नहीं, बल्कि उन के मामा यानी कि आमिर खान करेंगे.

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