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मीडिया विमर्श

इच्छा का कोई मूल्य नहीं रह गया था, इसलिए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने दोबारा राष्ट्रपति बनने की बाबत अनिच्छापूर्वक अनिच्छा जता दी. साथ ही, एक तुक की बात यह कह डाली कि खासतौर से मीडिया को सत्तापक्ष से सवाल करना चाहिए, तभी वास्तविक लोकतंत्र संरक्षित रह सकता है.

प्रणब दा के इस आग्रह में आक्रोश, पीड़ा, व्यथा, सलाह, भड़ास आदि सबकुछ था क्योंकि मीडिया अब सवाल और तर्क कम करता है, सरकार का प्रचार ज्यादा करता है. हर कोई जानता है कि सरकार को अपनी बात कहने को ढेरों माध्यम हैं पर सब से ज्यादा पसंद किया जाता है मीडिया के जरिए इश्तिहारों वाला जरिया, जिस की कीमत तले दबा मीडिया बेचारा होते हुए पाठकों व दर्शकों की नजर में शंकास्पद भी होता जा रहा है

मजाक बनता मुकदमा

अरविंद केजरीवाल पर अरुण जेटली द्वारा दायर मानहानि का मुकदमा अब जौली एलएलबी पार्ट थ्री होता दिख रहा है. अरुण जेटली ने केजरीवाल पर 10 करोड़ रुपए की मानहानि का एक और मुकदमा ठोक दिया है जिस का श्रेय बचाव पक्ष यानी केजरीवाल के वकील रामजेठमलानी को जाता है. जीतना है तो गुस्सा दिलाओ के सिद्धांत पर चलते जेठमलानी खुद दूसरी पेशी पर गच्चा खा गए और ऐसा कुछ बोल गए जिस पर अदालत ने भी एतराज कर दिया.

वकालत में तजरबे की बड़ी अहमियत होती है लेकिन जेठमलानी ने गैरजरूरी जोश दिखाया तो नुकसान मुवक्किल का होना तय दिख रहा है, जिस की बाबत वकील कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. अपवादस्वरूप ही मुवक्किल वकील को कठघरे में खड़ा कर पाते हैं कि तुम्हारी वजह से मुकदमा हारे. कानून के छोटेबड़े जानकार मानहानि के इस मुकदमे के बारे में कह रहे हैं कि इस में भी आखिरकार कटना तो खरबूजे को ही पड़ेगा.

 

उम्र को मात देती हौसलों की उड़ान

पंकज त्रिपाठी और पत्रलेखा अभिनीत शौर्ट फिल्म ‘एल’ (एल फौर लर्निंग) मात्र डेढ़ मिनट में महिला सशक्तीकरण पर वह प्रभावोत्पादक टिप्पणी कर जाती है जो अब तक ढेरों सरकारी योजनाएं और नेताओं के छद्म वादोंभरे भाषण नहीं कर पाए.

किस्सा कुछ यों है. मिडिल क्लास फैमिली को करीने से संभालती एक महिला को साइकिल चलानी नहीं आती. जब वह अपने पति से साइकिल चलाना सिखाने के लिए कहती तो वह उस का उपहास करते हुए कहता कि इस उम्र में यह क्या नया शौक चढ़ा है, लोग देखेंगे तो हंसेंगे. पति से मिले मीठे इनकार के बाद जब वह अपने बच्चे की साइकिल ले कर पार्क में खुद ही सीखने की कोशिश करते हुए लड़खड़ाती है तो उस के बेटे को अपने दोस्तों के सामने काफी शर्मिंदगी होती है.

घर आ कर वह अपनी मां से उस की साइकिल दोबारा न छूने की हिदायत देता है. घर में अपने पति और बेटे के हतोत्साहित करते इन रवैयों से वह हार नहीं मानती और अंत में घर का सारा काम निबटा कर दोनों को बताए बगैर वह अपने ही दम पर साइकिल सीखने निकल पड़ती है.

सतही तौर पर देखें तो लगता है कोई बड़ी बात नहीं है. साइकिल तो कोई भी चला सकता है. लेकिन साइकिल का इस्तेमाल यहां प्रतीकात्मक तरीके से हुआ है. सिर्फ साइकिल ही नहीं, आज की महिला जब भी कोई नया काम सीखना चाहती है या फिर किसी पुरानी कमतरी से उबरना चाहती है तो उसे समाज से प्रोत्साहन के बजाए उपहास और उलाहना ही मिलता है. समाज की बात क्या करें, खुद के परिवार में भाई, बहन, पिता या पति भी महिलाओं को घर पर बैठने की हिदायत दे कर उन्हें कुछ नया सीखने से दूर रखते हैं.

याद कीजिए, श्रीदेवी की फिल्म ‘इंग्लिश विंग्लिश.’ इस फिल्म में संभ्रांत परिवार का किस्सा था. जहां घर में सब अंगरेजी बोल लेते हैं सिवा शशि गोडबोले के. उस की इस कमतरी पर पति और बच्चे तक उसे जलील करने का मौका नहीं छोड़ते. आखिर में उसे भी खुद ही पहल करनी पड़ती है. वह अपने दम पर बगैर अपनी उम्र की परवा किए इंग्लिश कोचिंग क्लास में न सिर्फ दाखिला लेती है बल्कि इंग्लिश सीख कर अपना खोया आत्मविश्वास भी हासिल करती है.

हौसला और हुनर उम्र के मुहताज नहीं

फिल्म ‘इंग्लिश विंग्लिश’ की शशि गोडबोले और ‘एल’ की मिडिल क्लास वाइफ जैसी न जाने कितनी महिलाएं हैं हमारे देश में जिन में कइयों को कार ड्राइविंग करनी है, कई पाइलट बन कर प्लेन उड़ाना चाहती हैं, कोई अंतरिक्ष में जाना चाहती है तो किसी को शूटर बना है. किसी का सपना है कि वह एवरेस्ट की चढ़ाई करे तो कोई शादी के बाद मौडलिंग करना चाहती है.

किसी को डांस का शौक है तो कोई सिंगर बनना चाहती है. किसी को दंगल में धोबीपछाड़ लगानी है तो कोई अपनी अधूरीछूटी पढ़ाई को पूरा कर के डाक्टर या टीचर बनना चाहती है. लेकिन सब अपने परिवार की जिम्मेदारियां निभाने में कहीं पीछे छूट गईं. लेकिन जब आज वे फिर से अपने अधूरे ख्वाबों के परवाजों को पंख देना चाहती हैं तो समाज और परिवार उन्हें उम्र का हवाला दे कर उड़ने से रोकता है. कहता है कि इस उम्र में अब काहे जगहंसाई करवाओगी. चुपचाप घर में बैठो और बच्चे पालो.

जिन के हौसलों में दम होता है वे इन अड़चनों को आसानी से पार करने के लिए उम्र और अपनों के हतोत्साहन को रौंदते हुए न सिर्फ अपने सपनों को पूरा करती हैं बल्कि समाज और महिलाओं को यह संदेश भी दे जाती हैं कि हौसला और हुनर उम्र के मुहताज नहीं होते.

इस देश में कई मिसालें हैं जब महिलाओं की उम्र जान कर उन्हें कमजोर अांकने की गलती की गई. उन्होंने अपने साहस, लगन और बहादुरी से नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया. उन्होंने साबित कर दिया कि अगर कुछ करने का जज्बा हो तो आप शिखर पर पहुंच सकते हैं. आइए मिलते हैं कुछ ऐसी ही महिलाओं से, जो प्रेरणा हैं हम सब के लिए.

101 साल की गोल्ड मैडलिस्ट धावक

24 अप्रैल को जब 101 वर्षीय एक महिला ने उम्र को मात देते हुए अमेरिकन मास्टर्स टूर्नामैंट में भारत की तरफ से गोल्ड मैडल जीता तो देखने वाले दांतों तले उंगली दबा कर रह गए. यह महिला कोई और नहीं, बल्कि भारतीय धावक मान कौर थीं जो 101 साल की उम्र में यह कारनामा कर दुनिया को बता रही हैं कि उम्र को बहाना बनाना छोड़ो और कर डालो जो भी हासिल करना है.

आश्चर्य की बात तो यह है कि मान कौर ने 93 वर्ष की उम्र से दौड़ना शुरू किया था. जिस उम्र में अधिकतर महिलाएं अपने बुढ़ापे का हवाला दे कर कभी नातीपोतों के साथ समय गुजारती हैं या फिर बिस्तर पर पड़ेपड़े मौत का इंतजार करती हैं, उस उम्र में मान कौर 100 मीटर की दौड़ पूरी करती हैं. पिछले साल भी उन्होंने इसी प्रतियोगिता में गोल्ड जीता था.

न्यूजीलैंड के औकलैंड शहर में आयोजित स्पर्धा में मान कौर ने 100 मीटर रेस में यह मैडल जीता है. मान ने अपने कैरियर में यह 17वां गोल्ड मैडल हासिल किया है. मान ने 1 मिनट 14 सैकंड्स में यह दूरी तय की, जो उसेन बोल्ट के 64.42 सैकंड के रिकौर्ड से कुछ सैकंड ही कम है. उसेन बोल्ट ने 2009 में 100 मीटर की रेस में यह रिकौर्ड कायम किया था. न्यूजीलैंड के मीडिया में ‘चंडीगढ़ का आश्चर्य’ कही जा रहीं मान कौर के लिए इस स्पर्धा में भाग लेना ही सब से बड़ा लक्ष्य था.

मान कौर कहती हैं कि उम्र की ढलान में अपने सपनों को दफन करना ठीक नहीं है. हम किसी भी उम्र में खेल सकते हैं. महिलाओं को खेलों में आना चाहिए, इस के लिए खानपान पर नियंत्रण रखना चाहिए. बढ़ती उम्र में चलतेफिरते रहने से बीमारियां दूर होती हैं. इस प्रतिस्पर्धा में मान की ऊर्जा अन्य प्रतिभागियों के लिए प्रेरणास्रोत बन गई. इस से पहले उन्होंने भाला फेंक और शौट पुट में भी मैडल जीते थे. दुनियाभर के मास्टर्स खेलों में मान कौर अब तक 20 मैडल अपने नाम कर चुकी हैं.

80 साल में निशानेबाजी

मान कौर अगर 101 साल की उम्र में ऐथलीट हो सकती हैं तो वहीं 80 साल की दादियां भी हैं जो इस उम्र में निशानेबाजी का हुनर दिखा रही हैं. बागपत के जोहड़ी गांव जाएंगे तो आप को स्थानीय लोगों से यहां की निशानेबाज दादियों के दिलचस्प किस्से सुनने को मिलेंगे.

इस गांव में 81 साल की चंद्रो तोमर और 76 साल की प्रकाशी तोमर ने उस वक्त निशाना साधना सीखा जब लोगों के हाथ कांपने लगते हैं, नजर कमजोर पड़ने लगती है. आज दोनों दुनियाभर में अपने इसी कारनामे की वजह से मशहूर हैं. निशानेबाज बनने की इन की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है.

चंद्रो तोमर के मुताबिक, वे अपनी पोती सेफाली को वर्ष 2002 में निशाना लगाना सिखवाने गई थीं. पड़ोस में शूटिंग रेंज खुली थी. लड़के निशाना लगा रहे थे. तो उन्हें लगा कि इस में कौन सी बड़ी बात है. बस, फिर क्या था, उन्होंने भी बंदूक उठाई और मार दिया 10 मीटर के टारगेट पर. छर्रा सटीक निशाने पर लगा. सब लोग उन्हें ही देखने लगे. वहां के ट्रेनर भी यह देख कर ताज्जुब करते रहे.

कुछ दिनों बाद उन्होंने अपनी देवरानी प्रकाशी तोमर से भी निशानेबाजी सीखने के लिए कहा. एक से भले दो. अब दोनों जेठानीदेवरानी तड़के उठ कर पहले साफसफाई, खानापीना और चारासानी करतीं, फिर निकल पड़तीं बंदूक चलाने.

घर वालों ने खूब हंसी उड़ाई. बाहर वालों ने खूब मजाक बनाया. लेकिन उन्होंने सिर्फ अपने मन की सुनी और आज उन का परिवार और पूरा गांव उन पर गर्व करता है. अगर 80 साल की उम्र में ये दादियां निशानेबाज बन सकती हैं तो दुनिया की कोई भी

औरत किसी भी उम्र में कुछ भी कर सकती है. हौसला है अगर, तो दुनिया का कोई काम नामुमकिन नहीं हो सकता है.

फिटनैस का हौआ

उम्र को मात दे कर किस तरह हौसलों का शिखर पार किया जाता है, इस के 2 बड़े उदाहरण हैं. एक तरफ तेलंगाना से बेहद आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से ताल्लुक रखती सिर्फ 13 साल की उम्र की मामलावत पूर्णा अपनी लगन से सब से कम उम्र की महिला पर्वतारोही बनने का गौरव हासिल करती है तो दूसरी तरफ प्रेमलता अग्रवाल हैं जो एवरेस्ट फतह करने वाली अब तक भारत की सब से उम्रदराज महिला हैं. उन्होंने उपलब्धि 48 साल की उम्र में हासिल की.

अब यह खिताब अपने नाम करने की कोशिश 52 साल की संगीता एस बहल कर रही हैं. पर्वतारोहण का शौक संगीता के लिए ज्यादा पुराना नहीं है. उन्होंने लगभग 47 साल की उम्र में पहली बार किलिमंजारो पर चढ़ाई की.

वे 2011 में संगीता किलिमंजारो, 2013 में एलब्रस, 2014 में विंसन, 2015 में अंकाकागुआ और कोसियुस्जको शिखर फतह कर चुकी हैं. 2015 में उत्तरी अमेरिका के डेनाली पर्वत पर वे दुर्घटना का शिकार हुईं. चढ़ाई के दौरान उन का घुटना टूट गया जिस के बाद सर्जन ने उन्हें पर्वतारोहण छोड़ने की सलाह दी. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और इसे एक चुनौती की तरह लिया. उन का घुटना दोबारा जोड़ा गया. कई महीनों तक फिजियोथेरैपी ली. और उन की हिम्मत देखिए, चोट लगने के 6 महीने से भी कम समय में वे अंकाकागुआ पर्वत पर थीं.

उन की जगह कोई और होता तो आसानी से हार मान जाता और अपनी चोट व फिटनैस का हवाला दे कर घर बैठ जाता लेकिन जिसे कुछ करने की बेचैनी और जनून होता है वह हार नहीं मानता बल्कि औरों के लिए मिसाल बन जाता है.

कई बार महिलाएं या पुरुष यह सोच कर अपने कैरियर या सपने को पूरा करने में सकुचाते हैं कि अब उम्र हो गई है या फिर शरीर साथ नहीं देता. कम ही ऐसे होते हैं जो बढ़ती उम्र और फिटनैस से जुड़ी चुनौतियों का मजबूती से सामना कर कामयाबी हासिल कर पाते हैं.

महू के गोल्फर मुकेश कुमार ऐसे ही अपवाद हैं. उन्होंने 51 साल की उम्र में एशियन टूर जीत कर किसी उम्रदराज खिलाड़ी द्वारा विश्वस्तरीय गोल्फ टूर्नामैंट जीतने का रिकौर्ड अपने नाम किया है. कुछ साल पहले तक मुकेश भीतर से इतने मजबूत नहीं थे. उन्हें लगता था कि युवा खिलाडि़यों की तरह लंबे हिट लगाना अब उन के बस की बात नहीं. लगातार प्रैक्टिस और उस से मिले आत्मविश्वास के बल पर मुकेश को यह सफलता मिली.

अक्षमता पर भारी दृढ़ इरादे

इरादा पक्का हो तो अक्षमता की हर खाई लांघी जा सकती है. यह कर दिखाया बहराइच की पुष्पा ने. दिव्यांग पुष्पा सिंह हाथों से अक्षम हैं लेकिन उन्होंने इसे कभी भी इस अक्षमता को अपने पैशन के आड़े नहीं आने दिया. वे अपने पैरों से लिखती हैं. जब वे पीसीएस लोअर की परीक्षा देने पहुंचीं तो उन

की हिम्मत देख कर सभी हैरान रह गए. पुष्पा स्कूल टीचर हैं, लेकिन उन का सपना प्रशासनिक अधिकारी बनने का है. प्रशासनिक अधिकारी बन कर पुष्पा समाज में बदलाव लाना चाहती हैं.

अभिनेत्री सुधा चंद्रन ने भी तब हार नहीं मानी थी जब एक दुर्घटना में उन की एक टांग काटनी पड़ी थी. मशहूर नृत्यांगना के लिए पैरों की क्या अहमियत होती है, इसे सिर्फ एक डांसर ही समझ सकता है. सुधा की हिम्मत ही थी कि उन्होंने कृत्रिम पैर के साथ न सिर्फ अपने डांस और अभिनय के जनून को जिंदा रखा बल्कि फिल्म ‘नाचे मयूरी’ में नृत्य प्रतिभा से सब को सकते में डाल दिया.

पैरा ओलिंपिक प्रतियोगिताओं में देखिए, किस तरह से दिव्यांग खिलाड़ी अपनी लगन और प्रैक्टिस से दुनियाभर के खेलों में अपने देश का नाम रोशन कर रहे हैं.

शादी के बाद एक नई शुरुआत

कई बार महिलाओं के सपने इस बात पर दम तोड़ देते हैं कि अब वे मां बन गई हैं और शरीर में वह बात नहीं रही जो शादी से पहले होती है. जबकि यह तथ्य बिलकुल फुजूल है. हैल्थ एक्सपर्ट मानते हैं कि शादी के बाद या मां बनने के बाद एक औरत का शरीर कमजोर नहीं होता बल्कि और मजबूत हो जाता है.

उत्तर प्रदेश के मथुरा की ताइक्वांडो चैंपियन नेहा की कहानी उन महिलाओं के लिए एक प्रेरणा है जो शादी के बाद यह मान लेती हैं कि उन का कैरियर ही खत्म हो गया है. नेहा ने न सिर्फ शादी के बाद पढ़ाई की, बल्कि अपनी मेहनत के दम पर नैशनल ताइक्वांडो प्रतियोगिता में गोल्ड मैडल भी हासिल किया. अगर नेहा शादी के बाद ताइक्वांडो चैंपियन हो सकती है तो कोई भी महिला शादी के बाद जो चाहे, वह कर सकती है.

दरअसल, शादी के बाद एक नई शुरुआत हो सकती है अपना हर वह हुनर आजमाने के लिए, जो शादी के पहले किन्हीं कारणों से अधूरा रह गया था. केरल की 70 वर्षीय दिलेर और जुझारू मीनाक्षी अम्मा को ही देख लीजिए. इस उम्र में औरतें अपने नातीपोतों के साथ

घर पर अपना बुढ़ापा गुजारती हैं जबकि मीनाक्षी अम्मा मार्शल आर्ट कलारीपयटूट का निरंतर अभ्यास करती हैं.

कलारीपयटूट तलवारबाजी और लाठियों से खेला जाने वाला केरल का एक प्राचीन मार्शल आर्ट है. इस कला में वे इतनी पारंगत हैं कि अपने से आधी उम्र के मार्शल आर्ट योद्घाओं के छक्के छुड़ाने का दम रखती हैं.

वे कहती हैं, ‘‘आज जब लड़कियों के देररात घर से बाहर निकलने को सुरक्षित नहीं समझा जाता और इस पर सौ सवाल खड़े किए जाते हैं, कलारीपयटूट ने उन में इतना आत्मविश्वास पैदा कर दिया है कि उन्हें देररात भी घर से बाहर निकलने में किसी प्रकार की झिझक या डर महसूस नहीं होता.’’ उन्हें प्रतिष्ठित नागरिक पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है.

फैसला होने से पहले क्यों हार मानूं

उपरोक्त महिलाओं की उपलब्धिभरे आंकड़े और मिसालोंभरे प्रेरणादायक किस्से इस तथ्य को पुष्ट कर रहे हैं कि उत्साह, लगन, संकल्प बना रहे तो किसी भी उम्र या स्थिति में कोई भी हुनर सीखा और उस में निपुण हुआ जा सकता है. कुछ पाने की तमन्ना हो, सकारात्मक सोच हो तो हम अपने जीवन को सफल व सार्थक बना सकते हैं. फिर चाहे पति, पिता और बेटे सपोर्ट करें या उपहास करें, महिलाओं को जो करना है उन्हें करने से कोई नहीं रोक सकता.

उम्र को थामना किसी के भी वश में नहीं है, इसलिए बढ़ती उम्र का हवाला दे कर अपने सपनों को बीच राह में छोड़ना तार्किक नहीं है. इन तमाम महिलाओं की तरह अपनी हर अक्षमता, उम्रदराजी, हालात और मजबूरियों के पहाड़ों को पार कर के ही महिला सशक्तीकरण के नए आयाम रचे जा सकते हैं. और इस चुनौती में अगर घर, समाज, परिवार उपहास करता है, राह में कांटे बिछाता है तो बिना किसी के सहारे भी आप अकेली काफी हैं.

‘फैसला होने से पहले, मैं भला क्यों हार मानूं. जग अभी जीता नहीं है, मैं अभी हारा नहीं हूं…’ ये पंक्तियां इशारा करती हैं कि हमें लोग क्या कहेंगे और इस उम्र में हम क्या करेंगे, जैसे बहानों को पीछे छोड़ कर तब तक संघर्ष और मेहनत करो जब तक अपनी मंजिल न पा लो.                    

सफलता के उम्रदराज उदाहरण

–       महात्मा गांधी 45 वर्ष की उम्र के बाद ही एक क्रांतिकारी नेता के रूप में उभर कर सामने आए थे.

–       दादा भाई नौरोजी 61 वर्ष की उम्र में कांग्रेस के सभापति बने.

–       यूनानी नाटककार साफाप्लाज ने 90 वर्ष की उम्र में अपना प्रसिद्घ नाटक औडीपस लिखा था.

–       कवि मिल्टन 44 वर्ष की उम्र में अंधे हो गए थे. 50 वर्ष की उम्र में ‘पैराडाइज लास्ट’ लिखी.

–       जरमन कवि गेटे ने अपनी प्रसिद्घ कृति ‘फास्ट’ 80 वर्ष की उम्र में लिखी थी.

– 92 वर्षीय अमेरिकी दार्शनिक जानडेवी ने 60 वर्ष की उम्र में दर्शन के क्षेत्र में प्रवेश किया.

– जौर्ज बर्नाड शा 93 वर्ष की अवस्था में भी खूब साहित्य लिखते थे.

–       दार्शनिक वैनदित्तो क्रोचे 80 वर्ष की अवस्था में भी नियमित रूप से 10 घंटे काम करते थे.

–       कांट को 74 वर्ष की अवस्था में उन की एक रचना के आधार पर दर्शन के क्षेत्र में प्रतिष्ठा मिली.

–       विश्वविजय के अभियान पर निकलते समय सिकंदर की उम्र मात्र 20 वर्ष की थी

ऐसा भी होता है

16 साल से ले कर 20 साल की उम्र के हम लोग करीब 15-20 साथी एक ही महल्ले के थे. जब भी हम लोग कहीं खेलनेकूदने आतेजाते थे, साथ ही जाया करते थे. एक बार बरसात के दिनों में गंगा स्नान को गए. बाढ़ आई हुई थी. पानी में नहाते समय हम लोग छुआछुआई का खेल खेलने लगे. इस खेल में एक साथी चोर होता है, वह बाकी साथियों को छूने की कोशिश करता है और जब वह किसी साथी को छू देता है, तब वह चोर हो जाता है.

पानी में डूबतेतैरते हुए उस से सब दूर भागते थे ताकि वह हम लोगों को छू न सके. जो साथी चोर बना हुआ था, वह भी डूब कर तैरते हुए किसी को छूना चाहता था. इसी तारतम्य में उसे एक मुरदे की गरदन पकड़ में आ गई. वह बहुत खुश हुआ कि मैं ने किसी साथी की गरदन पकड़ ली है. ज्यों ही पानी के अंदर से ऊपर आया, अपने हाथ में मुरदे का चेहरा देख कर डर गया और चिल्लाया, ‘‘अरे, बाप रे मुरदा.’’ हम सभी लोग यह देख कर बाहर निकले और अपनेअपने कपड़े ले कर दूसरे घाट पर जा कर बदले और कान पकड़ा कि अब यह खेल कभी नहीं खेला जाएगा. हुआ यह था किसी दूसरे गांव के लोग जल्दी ही मुरदा फेंक कर गए थे, इसलिए वह इसी तरह अभी पानी में पड़ा था.     

कैलाश राम गुप्ता

*

ईंटों से भरे ट्रक के ड्राइवर ने हमारी गली में स्थित मेनहोल का ढक्कन, पानी की पाइपलाइन व एक घर में वर्षा के पानी की निकासी के लिए लगाए हुए प्लास्टिक के पाइप तोड़ दिए. समाज के प्रति लोगों की संवदेनहीनता देखो कि गली में खड़े लोग बातें तो करते रहे कि  मेनहोल में कोई बच्चा न गिर जाए परंतु उन्होंने ट्रक ड्राइवर को नहीं पकड़ा जिस ने वहां ईंटों की गाड़ी अनलोड की, न ही उस की कहीं शिकायत दर्ज करवाई.

कुछ दिनों के बाद जब मैं ने उस ट्रक ड्राइवर से इस बारे में बात क ी तो वह बड़े गुस्से में बोला, ‘‘भई, जब उन लोगों को कोई तकलीफ नहीं है, तो तू क्यों इस झमेले में फंस रहा है.’’ मैं समझ गया था कि कोई भी पड़ोसी किसी से बिगाड़ना नहीं चाहता है, इसलिए सब चुप थे. ऐसे में मैं भी क्या करता. बात ज्यादा न बढ़े इसलिए चुप कर के घर आ गया.      

प्रदीप गुप्ता

इन्हें आजमाइए

– सगाई या शादी की पार्टीज में पीच, ग्रे और पीकौक ब्लू जैसे रंगों के एथनिक परिधान पहनने चाहिए. फंक्शन करीबी रिश्तेदार का हो तो साड़ी या लहंगे में से साड़ी अच्छा विकल्प है. फौर्मल पार्टीज में भारी एंब्रौयडरी वाले परिधान पहनने से बचें.

– गरमी में काजल लगाने से पहले आंखों के आसपास बर्फ लगा लें और बर्फ के पानी को अपनेआप सूखने दें, इस से आप का काजल फैलेगा नहीं.

– अगर आप को किसी प्रकार की एलर्जी है तो तरबूज के रस में काला नमक डाल कर पीने से एलर्जी दूर हो जाती है.

– अगर आप खाना खाने के बाद कौफी पीते हैं तो पेट की सभी परेशानियां खत्म हो जाती हैं, साथ ही खाना भी पच जाता है.

– गुनगुने पानी में एक चम्मच नीबू का रस थोड़ी सी अजवायन और काला नमक डाल कर पीने से भी पेटदर्द में राहत मिलती है.

– एक चम्मच नीबू का रस एक चम्मच मूली का रस और एक चम्मच दही मिला कर लगाने से सनबर्न कम हो जाता है.

– आइपैंसिल को शार्प करने से पहले फ्रिज में रख कर ठंडा कर लें. ऐसा करने से पैंसिल लीड टूटेगी नहीं.

यह भी खूब रही

मेरे परिचित के यहां शादी थी. हम लोग निमंत्रणपत्र पर अंकित निश्चित तारीख न देख पाए, कार्ड काफी पहले मिला था. कार्ड घर में ही कहीं इधरउधर रख दिया था. सिर्फ रविवार दिन याद था. यह नहीं याद आ पा रहा था कि शादी 3 की या 13 की है. हम लोग 3 तारीख को खूब तैयारी के साथ घर से वहां जाने के लिए निकले. उन के  घर पर एकदम सन्नाटा था. शाम का वक्त था. कोई सजावटरोशनी भी नहीं थी. हमें संदेह होने लगा. यह पछतावा भी हो रहा था कि काश, फोन से निश्चित तारीख पूछ लेनी चाहिए थी. हम सब धीरे से वापस होने लगे तो उस घर के एक बुजुर्ग व्यक्ति वहीं पास में मिल गए. हम लोग तो सकपका गए. उन के पूछने पर सचाई बताई तो वे बहुत हंसे और वापस अपने घर ले कर आए. उन के परिवार के लोग भी यह सब बात जान कर हंसने लगे और सही तारीख बताई.

मायारानी श्रीवास्तव

*

मैं और मेरा भाई होस्टल में रह कर पढ़ाई कर रहे थे. मां और पिता घर पर थे. हमारे पड़ोस में एक परिवार रहने आया. परिवार में पतिपत्नी और 2 बच्चियां थीं. बड़ी बच्ची 5 साल की थी. उस बच्ची को ऊटपटांग सवाल पूछने की आदत थी. एक दिन वह मेरी मां के साथ रसोई में बातें कर रही थी. उस ने हौरलिक्स का डब्बा देखा और बोली, ‘‘यह कौन खाता है?’’ उस के सवाल पर मां को हंसी आई और उन्होंने कहा, ‘‘मेरे बच्चे खाते हैं.’’

मां के जवाब पर वह बहुत हैरान हुई और अजीब सा चेहरा बना कर बोली, ‘‘आप के बच्चे कहां हैं, उन्हें अपने पास क्यों नहीं बुलातीं, उन को प्यार कौन करता होगा?’’ उस ने जिस मासूमियत से यह बात कही और जो भाव उस के चेहरे पर थे, वह देख कर मेरी मां अपनी हंसी रोक न पाईं.      

नीतू पाठक

*

मैं ने अपनी भाभी को एक बार मजाक मेें कह दिया कि तुम भाई से बहुत लड़ती हो. वे इस बात का बुरा मान गईं. उन को मनाने के उद्देश्य से मैं ने उन के विवाह की वर्षगांठ पर चंद पंक्तियां वाट्सऐप कर दीं- ‘‘लड़तेझगड़ते कट गए 28 साल आज भी मेरी भाभी के टमाटर जैसे लाल हैं गाल.’’

अपनी प्रशंसा पढ़ वे बहुत खुश हुईं और उन पंक्तियों को उन्होंने अपने सभी मित्रों को फौरवर्ड कर दिया.

डा. अनिता राठौर ‘मंजरी’

झूठ न बोलो

जब नजरें मिलीं तो तुम ने नजरों को फेरा

पर रहरह, फिरफिर और रुकरुक कर देखा

चेहरे पे अनजाने से थे भाव

तुम ने लाख छिपाए भाव

मगर नजरों में तो बात वही थी

महफिल में अनजाना सा था व्यवहार

तुम्हारी बातों में मेरा जिक्र न आया

तुम चेहरे पर भी कोई शिकन न लाए

पर जिन गजलों को छेड़ा तुम ने

लफ्जों में तो बात वही थी

वही राहें थीं जानी और पहचानी

जिन राहों पे कभी की थी हम ने मनमानी

तुम्हारा हर मोड़ पर रुकना और ठहरना

फिर बोझिलता के साथ कदम बढ़ाना

बुझाबुझा सा एहसास वही था

तुम्हारा यों नजरें फेरना माना जायज

तुम्हारे लफ्ज बेगाने थे यह भी माना जायज

राह बदलना, चलो वो भी सब जायज

मगर यह झूठ न बोलो साथी

तुम को मुझ से प्यार नहीं था

तुम ने नजरें जब फेरी थीं आंसू थे उन में

लफ्ज भी तुम्हारे थे दर्दभरे और सहमे

राहें जब बदलीं तब रुकरुक कर देख

यह सच तुम न छिपा सके थे

तुम को मुझ से प्यार बहुत था.

 

– जयश्री वर्मा

 

अंतर की आस

सपनों में अपने न मिलते

अपनों में सपने न मिलते

मिल जाते हैं यदि कहीं तो

भूखे मिलते प्यासे मिलते

लालच से किसी ग्रास में

नयनों के ही कहीं पास मैं

अपनों से मिलने की ललक हो

सपनों के खिलने की झलक हो

जीवन बन जाए सब का उपवन

सिर के ऊपर अपना फलक हो

अनचाही सी किसी प्यास में

नयनों के ही कहीं पास मैं

अपने तो अपने ही होते

कुछ सपने भी अपने होते

बिन सपने कुछ बात न बनती

अपनों बिन अपनी क्या गिनती

मन के सच्चे इस प्रयास में

नयनों के ही कहीं पास मैं.

       

– जितेंद्र मोहन भटनागर

 

साहिर लुधियानवी और अमृता प्रीतम के रोमांस की कहानी ‘गुस्ताखियां’

हॉलीवुड से फुर्सत पाकर अब प्रियंका चोपड़ा बतौर फिल्म निर्माता क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में बना रही हैं, और खबर है कि बॉलीवुड में भी बहुत जल्द सक्रिय होने जा रही हैं. जल्द ही वह अमृता प्रीतम के किरदार में नजर आएंगी. साहिर लुधियानवी और अमृता प्रीतम के रोमांस की कहानी फिल्म ‘गुस्ताखियां’ शुरू होने जा रही है.

संजय लीला भंसाली निर्मित इस फिल्म का निर्देशन जसमीत केरीन कर रही हैं. करीब चार साल पहले साहिर लुधियानवी पर फिल्म बनाने की चर्चा शुरू हुई थी. उस समय फरहान अख्तर को साहिर का किरदार निभाना था, लेकिन संजय लीला भंसाली के जुडने और प्रियंका चोपड़ा के अमृता प्रीतम बनने के बाद सब कुछ बदल गया है. हालांकि फिल्म का निर्देशन जसमीत ही कर रही हैं, लेकिन साहिर लुधियानवी का किरदार इरफान खान करेंगे.

विदेशों में अपने नाम का डंका बचा चुकी प्रियंका अब सोशल मीडिया की भी क्वीन है. प्रियंका सोशल मीडिया की सबसे पसंदीदा अभिनेत्री बन गई हैं. विदेशी मीडिया से प्राप्त रिपोर्ट के मुताबिक प्रियंका को फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर, यू ट्यूब और गूगल प्लस में सबसे ज्यादा लोकप्रिय मना गया है.

इन फिल्मी हस्तियों की लोकप्रियता का आधार उनके सोशल एंगेजमेन्ट्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हफ्ते में बड़ी फॉलोवर्स और सब्सक्राइबर्स की संख्या के आधार पर बनाया गया है.

प्रियंका को ट्विटर पर सक्रियता के आधार पर नंबर वन की रैंक मिली है. इस सूची में दूसरे नंबर पर ड्वेन जॉनसन हैं, जिन्होंने प्रियंका के साथ फिल्म बेवॉच में काम किया था. तीसरे नंबर पर अमरीका के जाने माने कॉमेडियन केविन हार्ट हैं. इस सूची में जक एफ्रोन, जिनेफर लोपेज, विन डीजल और गेल गाडोट भी शामिल हैं.

ऐसे बढ़ाइए अपने हर महीने की आय

हर रोज बढ़ रही महंगाई और ऊपर से कई प्रकार के बढ़ते हुए खर्च आपकी कमर जरूर तोड़ रहे हैं. ऐसे में आपको लगता होगा कि काश कोई ऐसे साधन हों, जहां से हर महीने कुछ एक्‍स्‍ट्रा पैसा आता रहे और आपके हर महीने का बजट भी बना रहे और इनकी मदद से आप अपनी लाइफस्‍टाइल को भी बेहतर बनाते रहें.

हम यहां किसी साइड बिजनेस की बात नहीं कर रहे हैं, और न ही किसी ‘वर्क फ्रॉम होम’ की. यहां हम बात कर रहे हैं, आपकी सैलरी में से ही कुछ निवेश करने की, जिन्‍हें करने के बाद आप हर महीने अपने खाते में धन प्राप्‍त कर सकते हैं.

सरकारी स्‍कीम

सरकारी योजनाएं इसलिये सबसे ज्‍यादा लोग पसंद करते हैं, क्‍योंकि इसमें कोई जोखिम नहीं होता है. ऐसे में सबसे बेहतर विकल्‍प डाक घर या फिर स्‍टेट बैंक ऑफ इंडिया है. इन दोनों में से कहीं भी जाकर आप मासिक आय के प्‍लान ले सकते हैं. जैसे यदि आप 4.5 लाख रुपए का निवेश करते हैं तो उसमें आपको 3000 रुपए प्रति माह मिलेंगे. इसमें सबसे खास बात ये है कि ऐसी योजनाओं में आपको आयकर सेक्‍शन 80 सी के तहत कर में छूट भी मिलेगी.

इसके लिये आप किसी भी पोस्‍ट ऑफिस में जायें और उनसे मासिक आय योजना के बारे में पूछें या जाकर पता करें. विस्‍तार से सारी चीजें पढ़ने के बाद आप योजना को लें. इसमें आपको 6 से 9 प्रतिशत तक की ब्‍याज दर से धन प्राप्त होता है. खास बात ये है कि कई सारे बैंकों के प्‍लान भी डाकघर की योजनाओं के आगे फेल हो जाते हैं. यो मासिक आय वाली स्‍कीम एसबीआई समेत कई अन्य बैंकों में भी उपलब्‍ध है.

फंड स्‍कीम्स

म्‍यूचुअल फंड स्‍कीम्स कई सारे बैंकों द्वारा मुहैया करायी जाती है. लेकिन इसमें हमेशा रिस्‍क बना रहता है और पैसा डूबने का डर आपको हमेशा सताता रहेगा. इसलिये बेहतर होगा आप जब भी म्‍यूचुअल फंड में पैसा लगायें, तो साथ ही कुछ सरकारी या गैरसरकारी इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर बॉन्‍ड्स भी ले लें, ताकि आपको होने वाला रिस्‍क कम से कम रहे.

म्‍यूचुअल फंड्स में ब्‍याज दर 10 से 15 प्रतिशत के बीच घटती-बढ़ती रहती है. यह निर्भर करता है कि बाजार का रुख, क्या चल रहा है. लेकिन, हां अगर बाजार का रुख अच्‍छा है तो आपको 15 प्रतिशत की ब्‍याज दर तक पैसा मिल सकता है वो भी हर माह.

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