इच्छा का कोई मूल्य नहीं रह गया था, इसलिए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने दोबारा राष्ट्रपति बनने की बाबत अनिच्छापूर्वक अनिच्छा जता दी. साथ ही, एक तुक की बात यह कह डाली कि खासतौर से मीडिया को सत्तापक्ष से सवाल करना चाहिए, तभी वास्तविक लोकतंत्र संरक्षित रह सकता है.

प्रणब दा के इस आग्रह में आक्रोश, पीड़ा, व्यथा, सलाह, भड़ास आदि सबकुछ था क्योंकि मीडिया अब सवाल और तर्क कम करता है, सरकार का प्रचार ज्यादा करता है. हर कोई जानता है कि सरकार को अपनी बात कहने को ढेरों माध्यम हैं पर सब से ज्यादा पसंद किया जाता है मीडिया के जरिए इश्तिहारों वाला जरिया, जिस की कीमत तले दबा मीडिया बेचारा होते हुए पाठकों व दर्शकों की नजर में शंकास्पद भी होता जा रहा है

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