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दिशाहीन होते किशोर

आज का किशोर यानी कल का वयस्क दिशाहीन हो रहा है. ठीक है मानसूनी बादल कब कहां कितने बरसेंगे मालूम नहीं रहता पर बरसेंगे तो सही, यह पक्का रहता है पर आज हमारे किशोरों को नहीं मालूम कि कल क्या होगा. इस के जिम्मेदार किशोर नहीं हैं, वे नेता हैं जो अपना राग अलापते रहते हैं, वे अफसर हैं जो मेज थपथपाते रहते हैं, वे मुल्लापंडे हैं जो घंटेघडि़याल खड़काते रहते हैं, शिक्षा के दुकानदार हैं जो सारा समय पैसा सिर्फ पैसा कमाते रहते हैं.

कल के युवाओं, आज के किशोरों को सही जमीन न देने की गलती आज के वयस्क, नीति निर्धारक कर रहे हैं और अफसोस यह है कि उन के कुकर्मों की सजा अगली पीढ़ी भुगतेगी. चीन की पिछली पीढ़ी ने मेहनत की, अगले कल की सोची और 1960 तक दुनिया का सब से गरीब देश आज सब से ज्यादा फैलने वाला देश बन गया है. चीनी युवाओं की कर्मठता है कि वे अफ्रीका, बंगलादेश, पाकिस्तान, थाईलैंड, म्यांमार में ही नहीं पूर्वी यूरोप के देशों में सड़कें, पुल, बांध, रेलें, स्टेडियम बना रहे हैं.

ठीक है बोलने की आजादी चीन में नहीं है पर भई, भारत में भगवा गमछाधारियों ने कौन से हमारे लिए  यहां छोड़ी है. हमारे किशोरों तक को या तो उन्होंने अपनी भाषा बोलने वाला तोता बना दिया या पुलिस भेज कर विरोध करने वालों को डरा दिया.

समाज का निर्माण नई सोच से होता है जो समाज सदियों से गोबर और गंद के गड्ढे में फंसा हो, उसे जिस नए पल की तलाश है वह किशोरों के मन में पैदा होती है पर हम ने उन किशोरों को या फिर तो मोबाइल पकड़ा दिए या मौजमस्ती की राह दिखा दी. स्कूलों में अब वादविवाद प्रतियोगिताएं नहीं होतीं, स्पैलिंग बी (मधुमक्खी) जैसी निरर्थक प्रतियोगिता ज्ञान के नाम पर होती हैं.

किशोरों को औब्जैक्टिव परीक्षा के नाम पर अपनी बात कहने की आदत सुधारने से हटा दिया है. अब उन्हें सिर्फ हां या न कहना आता है, बुलैट प्वाइंट से अपनी बात समझाने का पाठ पढ़ा डाला. झंडे फहराने से काम नहीं चलता, न ही जस्टिन बीबर की म्यूजिकल इवनिंग में थिरकने से कुछ बनता है.

किशोरों को नई हवा का आनंद लेने दें. हर बारिश, हर मानसून एक नई उमंग ले कर आता है. उस की भीनी सुगंध का आनंद हो, बारिश का पानी सीवर के पानी में मिल कर सड़ांध न मारे यह देखना जरूरी है. 

विश्वास का एहसास है प्यार : उर्मिला महंता

सिने जगत में आ रहे बदलाव के चलते अब बौलीवुड में तेजी से न सिर्फ नईनई प्रतिभाएं आ रही हैं बल्कि वे अपनी प्रतिभा के बल पर अपने लिए एक नया मुकाम भी बना रही हैं. इन्हीं प्रतिभाओं में से एक हैं उर्मिला महंता.

पूर्वोत्तर की उर्मिला महंता की नई फिल्म ‘विराम’ ने हाल ही में ‘कान्स इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल’ में धूम मचाई है. महज 4 साल के अंदर उर्मिला महंता तमिल, तेलुगू व असमिया फिल्मों के अलावा ‘मांझी द माउंटेनमैन’, ‘अकीरा’ सहित कई हिंदी फिल्मों में भी अपने अभिनय का जलवा बिखेर चुकी हैं. वे तमिल फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अदाकारा का पुरस्कार भी हासिल कर चुकी हैं, जबकि उन की 2 असमी फिल्में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुकी हैं.

इस के अलावा इन दिनों वे ईरानी फिल्मकार मजीदमजीदी की फिल्म ‘बियांड द क्लाउड’ भी कर रही हैं. उन्हें जहानु बरुआ के भतीजे मंजुल बरुआ निर्देशित फिल्म ‘अंतरीन’ के लिए प्राग इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिल चुका है. ‘विराम’ और ‘अंतरीन’ फिल्में जुलाई में प्रदर्शित होंगी. प्रस्तुत हैं, उन से हुई बातचीत के मुख्य अंश:

अभिनय के प्रति आप का रुझान कैसे हुआ?

मैं मूलत: गुवाहाटी के नजदीक सोनपुर की रहने वाली हूं. मेरे पिता कालेज के दिनों में थिएटर से जुड़े हुए थे, जबकि मेरे चाचा आज भी शौकिया थिएटर करते हैं. इस तरह कहीं न कहीं मेरे खून में भी अभिनय का कीड़ा है. असम में साहित्य, कला व संगीत का माहौल है. इसलिए जब स्कूल की छुट्टियां हुआ करती थीं, तो हमें स्कूल की तरफ से इस तरह की गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए कहा जाता था. हम भी छुट्टियों में थिएटर वर्कशौप करते थे.

मुझे बचपन से ही टीवी देखना काफी पसंद है. इस के अलावा मैं बचपन से ही स्टेज शो करने लगी थी. मुझे थिएटर में काफी पुरस्कार मिले. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से शिक्षा हासिल करने वाले तमाम लोगों के साथ काम करते हुए मैं ने अभिनय की शिक्षा हासिल की. मैं ने ‘पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट’ से अभिनय की ट्रेनिंग ली.

जब मैं 2008 में पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट में प्रथम वर्ष की छात्रा थी, तभी गोआ में अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फैस्टिवल में जाने का मौका मिला, वहीं मुझे पहली तमिल फिल्म ‘वजहक्कू इन 18/9’ मिली.

इस फिल्म के निर्देशक बालाजी शक्थिवेल से गोआ में मुलाकात हुई. तमिल रोमांचक फिल्म ‘वजहक्कू इन 18/9’ की शूटिंग की. इस में मैं ने झोंपड़पट्टी में रहने वाली और घरों में जा कर काम करने वाली युवती ज्योति का किरदार निभाया. मुझे ‘सीमा अवार्ड फौर बैस्ट डिब्यूटैंट’ और श्रेष्ठ नवोदित अभिनेत्री का अवार्ड मिला. यह 2012 की बात है. इस के बाद मैं बैंगलुरु में रहने लगी. उस के बाद मुझे पीछे मुड़ कर देखने की आवश्यकता नहीं पड़ी. हिंदी में मैं ने ‘मांझी : द माउंटेनमैन’ व ‘अकीरा’ जैसी फिल्में की हैं.

फिल्म ‘अकीरा’ को बौक्स औफिस पर सफलता नहीं मिली. इस का नुकसान किसे हुआ?

इस फिल्म में मैं लीड रोल में नहीं थी. इसलिए मुझ पर इस का कोई प्रभाव नहीं पड़ा. हम तो क्राफ्ट कला और कंटैट पर यकीन करते हैं. हमारे लिए यह बात असरदार होती है कि हमारी परफौर्मैंस फिल्म में कैसी रही.

मैं आभारी हूं उन लोगों की जिन्होंने हर फिल्म में मेरी परफौर्मेंस की तारीफ की. मैं ने हमेशा अपनी तरफ से अच्छी परफौर्मैंस दी, जिस से निर्मातानिर्देशक खुश हुए. दर्शकों ने भी मेरे अभिनय को सराहा, तभी तो मुझे ‘विराम’ फिल्म में हीरोइन का रोल मिला, जो ‘कान्स फिल्म फैस्टिवल’ में नए निर्देशकों के प्रतियोगिता खंड में सराही गई.

आप का कैरियर किस दिशा में जा रहा है?

मुझे लगता है कि मेरा कैरियर सही दिशा में आगे बढ़ रहा है, यह तो आप भी जानते हैं कि बौलीवुड में आप की योजना काम नहीं करती. मेरी सोच यही है कि मेरे हिस्से अच्छे किरदार, अच्छी कहानियां, अच्छी फिल्में आएं. मैं उन्हें बेहतर तरीके से करते हुए लोगों का विश्वास जीतते हुए आगे बढ़ती रहूं. एक न एक दिन मुझे अपना मुकाम मिल जाएगा.

आप तमिल व क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों में बतौर हीरोइन काम कर रही हैं, पर हिंदी फिल्मों में सैकंड लीड कर रही हैं. ऐसा क्यों?

मैं हीरोइन बनने के मकसद से ही मुंबई आई थी, पर कई  बार हमारे पास जिस तरह की फिल्मों के औफर आते हैं उन्हीं में से हम चुनते हैं. केतन मेहता ने जब मुझे फिल्म ‘मांझी : द माउंटेनमैन’ का औफर दिया, तो इस में राधिका का सैकंड लीड होने के बावजूद मैं इनकार नहीं कर पाई, क्योंकि पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट में तो मैं ने केतन मेहता की फिल्मों को देख कर अभिनय करना सीखा. मैं उन की बहुत बड़ी फैन हूं. ऐसे में मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं उन को मना कर सकूं. मैं अपनेआप को लक्की मानती हूं कि मुझे केतन मेहता और ए मुरूगदास जैसे निर्देशक के साथ काम करने का मौका मिला. ‘विराम’ व ‘चकल्लसपुर’ सहित कई फिल्मों में मैं हीरोइन के रोल में हूं.

फिल्म ‘विराम’ में आप का किरदार क्या है?

यह एक ऐसी लड़की की कहानी है, जो कई तरह की परिस्थितियों का सामना कर एक मुकाम हासिल करती है. इसलिए इस फिल्म का नाम ‘विराम’ है. यह मेरे किरदार मातुल की यात्रा है. परिस्थितियों के अनुसार मातुल के शेड्स बदलते हैं. परिस्थितियों से जूझतेजूझते मातुल एक जगह आ कर रुक जाती है. फिर कई किरदार मातुल की यात्रा को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं. उसे विराम दिलाते हैं.

बौलीवुड में ऐक्सपोजर बहुत होता है. आप इस के लिए खुद को कितना सहज पाती हैं?

मेरे हिसाब से ये सब किरदार की मांग पर निर्भर करता है. यदि आप महज नंगापन परोसना चाहते हैं, तो मैं दूर से ही हाथ जोड़ लेती हूं, लेकिन यदि यह किरदार की मांग है या उस वजह से किरदार व कहानी में कोई बड़ा बदलाव आना है और उसे बड़ी शालीनता के साथ चित्रित किया जाना है, तो मुझे इस से परहेज नहीं है. लेकिन बौलीवुड में दोगलापन ज्यादा है. युवक अपने शरीर की नुमाइश करें तो लोग उन की प्रशंसा करते हैं, लेकिन युवती ऐसा करे तो उसे बुरा कहा जाता है. ऐसा क्यों? इस तरह की मानसिकता मेरी समझ से परे है.

आप की जिंदगी का वह कौन सा पड़ाव था, जब आप की जिंदगी में बदलाव आया?

पहले मैं प्रोफैशनल अभिनेत्री नहीं बनना चाहती थी, लेकिन जब मुझे अभिनय से प्यार हुआ, तो मैं एक अच्छी अदाकारा बन गई. परिवार वालों के प्यार व सहयोग से ही मैं अभिनय के क्षेत्र में आगे बढ़ रही हूं. मेरे चेहरे पर मुसकराहट लाने का काम मेरे परिवार वाले ही करते हैं.

जब आप असम जाती हैं, तो वहां लोग किस तरह आप के साथ पेश आते हैं?

मुंबई आने से पहले मैं असम में स्टेज शो करती थी, इसलिए असम में मेरा चेहरा जानापहचाना है. आज मैं असम की उभरती कलाकार हूं, जब मैं वहां पहुंचती हूं तो उन्हें खुशी होती है. उन्हें लगता है कि हमारे परिवार का कोई सदस्य अभिनय के क्षेत्र में सफलता बटोर रहा है. वे मुझे आगे बढ़ने के लिए उत्साहित करते हैं. सभी यही कहते हैं, ‘उर्मिला, तुम मेहनत करो, आगे बढ़ो, हमारा प्यार तुम्हारे साथ है.’ उन्हें इस बात की खुशी है कि कल तक जिस असम को अलगथलग रखा जाता था, आज उसे्र मुख्यधारा में ला कर सिनेमा व संगीत से जोड़ा जा रहा है. आज बौलीवुड और संगीत के क्षेत्र में पूर्वोत्तर के लोग हावी हैं. अभिनय में कम लोग हैं. आदिल हुसैन, सीमा विश्वास के बाद अब हम नई पीढ़ी के कुछ कलाकार अलग मुकाम बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं.

आप को नहीं लगता कि सीमा विश्वास व आदिल हुसैन से ले कर आप तक पूर्वोत्तर भारत के किसी भी कलाकार को बौलीवुड में वह मुकाम नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था?

देखिए, आदिल हुसैन ने बौलीवुड में अपनी जगह बना ली है. मुझे तो यही लगता है कि वे खुद हीरो वाली फिल्में नहीं चुनते हैं. मेरी राय में आप हर फिल्म में हीरो हों, तभी स्थापित कलाकार कहलाएं, ऐसा जरूरी नहीं है. आदिल हुसैन को अभी 2 फिल्मों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है. वह हौलीवुड की फिल्में भी कर रहे हैं.

आप की रुचि क्या है?

मैं ने संगीत की कोई ट्रैनिंग नहीं ली है, पर संगीत में मेरी काफी रुचि है. मैं गाती भी हूं. मुझे नृत्य करना भी पसंद है. क्लासिकल संगीत सुनना मुझे ज्यादा पसंद है. मुझे पेंटिंग का भी शौक है.

किस तरह की किताबें पढ़ना पसंद करती हैं?

मैं रोमांटिक उपन्यास व साहित्यिक किताबें पढ़ती हूं.

इस के अलावा आप कौनकौन सी फिल्में कर रही हैं?

हिंदी में संजय मिश्रा के साथ एक फिल्म कर रही हूं. इस में मैं लीड रोल में हूं. मजीदमजीदी की फिल्म ‘बियांड क्लाउड’ की शूटिंग पूरी हो चुकी है. आर बालकी की फिल्म ‘पैडमैन’ की शूटिंग पूरी की है.

मजीद मजीदी के साथ फिल्म करने को ले कर क्या कहेंगी?

मैं ने मजीद मजीदी की फिल्म देख कर ही अभिनय की शिक्षा ली है. मैं ने कभी सोचा भी नहीं था कि मुझे उन के साथ काम करने का मौका मिलेगा. मजीदमजीदी के साथ काम करना मेरी बड़ी उपलब्धि है.

आप को मजीद मजीदी की फिल्म ‘बियांड द क्लाउड’ कैसे मिली?

इस फिल्म के कास्टिंग डायरैक्टर हनी त्रेहान ने मुझे बुला कर औिडशन लिया. फिर मजीद मजीदी से मुलाकात करवाई. इस में हीरोहीरोइन वाला मामला नहीं है. उन्होंने मेरा स्क्रीन टैस्ट भी लिया. फिर मेरा चयन भी हो गया. यह मेरे लिए बड़ी उपलब्धि है.

सब जानते हैं कि मजीद मजीदी चरित्र के अनुरूप ही कलाकारों का चयन करते हैं. मजीद मजीदी कहते हैं कि यदि उन की फिल्म में कलाकार सिर्फ कुछ समय के लिए आ कर खड़ा होता है, तो भी कहानी में उस की अहमियत होती है.

आप ने असमी में भी काफी फिल्में कीं?

यह मेरी मातृभाषा है. मैं ने आखिर में असमी फिल्में कीं. पहले तमिल, तेलुगू, मलयालम व हिंदी फिल्में कीं. पिछले 2 साल में मैं ने 5 असमी फिल्में कीं, जिन में से ‘कथांडी’ को सर्वश्रेष्ठ असमी फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. इस में आदिल हुसैन व सीमा विश्वास भी थीं. इस फिल्म को कई इंटरनैशनल अवार्ड मिले. इस साल मेरी 2 असमी फिल्में रिलीज होने वाली हैं, जिन में एक फिल्म निर्देशक मंजुल बरुआ की ‘अंतरीन’ है. इस फिल्म के लिए मुझे ‘प्राग इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल’ में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिल चुका है. मंजुल बरुआ, जहानु बरुआ के भतीजे हैं.

दोस्ती बरकरार रखने के लिए क्या प्रयास करती हैं?

जब 2 इंसान सच्चे होते हैं, तो उन के बीच प्यार, दोस्ती हमेशा बनी रहती है. मुझे लगता है कि अच्छी दोस्ती वही है, जहां हम अपने दोस्त या सहेली से कोई अपेक्षा नहीं रखते. दोस्तों में आपसी समझ हमेशा रहती है. हम बचपन के दोस्त हैं, तो वह दोस्ती टूट नहीं सकती.

प्यार के माने?

मेरे लिए प्यार के माने विश्वास का एहसास है, जोकि मातापिता व दोस्त किसी से भी हो सकता है. मेरे लिए प्यार सिर्फ एक पुरुष व स्त्री के बीच का संबंध नहीं है. प्यार में कोई शर्त व बनावटीपन नहीं होना चाहिए. लोगों के बीच सच्चा प्यार हो तो वे चाहे जितनी दूर रहें, पर प्यार का एहसास कम नहीं होता.

इन दिनों हर जगह नारी सशक्तिकरण की बातें हो रही हैं. इस बारे में क्या सोचती हैं?

मेरी राय में नारी हमेशा से सशक्त रही है. नारी अबला कभी नहीं रही. ऐसे में आज हम ‘नारी सशक्तिकरण’ की बातें क्यों कर रहे हैं, यह सवाल मेरी समझ से परे है. मगर औरतों के साथ आज भी वही हो रहा है, जो सदियों से होता आया है.              

खरीदारी सीखें, लूट से बचें

कुछ साल पहले टैलीविजन पर एक विज्ञापन आता था, जिस में एक बच्चा दुकानदार से शुद्ध नमक मांगता है, लेकिन दुकानदार उसे बच्चा समझ कर साधारण नमक थमा देता है, जिसे देख कर बच्चा तुरंत दुकानदार से कहता है, ‘‘शुद्ध नहीं समझते क्या… मुझे शुद्ध नमक ही चाहिए.’’

इस विज्ञापन में जिस तरह से बच्चे को जागरूक दिखाया गया है उसी तरह आज के किशोरों को भी जागरूक होने की जरूरत है, क्योंकि अकसर किशोर जब खरीदारी के लिए जाते हैं तब न तो मोलभाव करते हैं और न ही जांचपड़ताल. बस, दुकानदार को बताया कि क्या चाहिए और ले कर चल दिए. कई किशोर तो ऐसे भी होते हैं जो  खरीदारी के समय भी अपने फोन पर ही व्यस्त रहते हैं. कुछ किशोरों को तो इतनी जल्दी रहती है कि देखते भी नहीं कि दुकानदार ने क्या दिया है और उन्हें क्या चाहिए था, जिस की वजह से दुकानदार उन्हें आसानी से बेवकूफ बना लेते हैं, कभी ज्यादा पैसे वसूल लेते हैं, तो कभी खराब सामान दे कर अपना फायदा कर लेते हैं, इसलिए जरूरी है कि किशोर खरीदारी की कला सीखें ताकि जब कोई उन्हें लूटने की कोशिश करे तो समझदारी से निबट सकें.

सस्ते के चक्कर में न पड़ें

किशोर सस्ते के चक्कर में बेवकूफ बन जाते हैं, उन्हें लगता है कि इतने कम दाम में क्या मिलता है इसलिए एक नहीं बल्कि 2-3 खरीद लेते हैं. बाद में जब इस्तेमाल होता है तब अफसोस होता है. ऐसे में न सिर्फमम्मी की डांट सुननी पड़ती है बल्कि सारी पौकेटमनी भी खत्म हो जाती है. इसलिए जरूरी है कि खरीदारी करते समय सस्ती चीजों पर न टूट पड़ें, बल्कि अच्छी तरह जांचपड़ताल कर के ही सामान खरीदें.

खुद पर करें भरोसा

जब खरीदारी के लिए किसी दुकान पर जाते हैं तो दुकानदार कई तरह के लुभावने औफर देने के साथसाथ प्यार भरी बातें भी करने लगता है. जैसे ले कर जाओ, तुम पर अच्छा लगेगा, तुम्हारी उम्र के सारे टीनएजर्स यहीं से सामान खरीदते हैं. आज तक किसी तरह की शिकायत नहीं आई.

ऐसे में अधिकांश किशोर दुकानदार की बातों में आ जाते हैं, उन्हें समझ नहीं आता कि उन के लिए क्या अच्छा है और उन्हें क्या करना चाहिए, दुकानदार से ज्यादा जरूरी है कि खुद पर भरोसा करें और अपनी चौइस को प्राथमिकता दें न कि दुकानदार के आश्वासन को.

जल्दबाजी न दिखाएं

कई बार किशोर खरीदारी के लिए जाते हैं तो दुकान में घुसते ही कहने लगते हैं, ‘‘अंकल, प्लीज जल्दी दे दो, टाइम नहीं है.’’

आप के ऐसा कहते ही दुकानदार जल्दी में सब से महंगा प्रोडक्ट देता है और अगर आप थोड़ा सस्ता दिखाने के लिए कहते हैं तो उस के पास जो सब से सस्ता व खराब होता है आप के सामने रख देता है. दुकानदार को पता होता है कि आप जल्दी में ज्यादा मीनमेख तो निकालेंगे नहीं, बस चुपचाप ले लेंगे, इसलिए हड़बड़ी के बजाय समय दे कर सामान खरीदें.

फ्रैंड्स के साथ जाएं

कोशिश करें कि जब शौपिंग करने जाएं तो अपने फ्रैंड्स के साथ जाएं, क्योंकि कोई साथ होने पर दुकानदार भी एक बार जरूर सोचता है. अगर आप पसंद करने में कहीं फंसते हैं तो फ्रैंड्स आप की मदद करते हैं, अपना विचार भी देते हैं. ऐसा भी हो सकता है कि आप के फ्रैंड्स को कोई ऐसी दुकान पता हो जहां अच्छा सामान कम दाम पर मिलता हो.

जांचपड़ताल करें

ऐसा न करें कि दुकान में घुसें और सामान ले कर बाहर निकल जाएं. अगर आप को उस चीज के बारे में पहले से पता है तो ठीक है, लेकिन अगर आप नई चीज खरीद रहे हैं तो खरीदने से पहले 2-3 दुकानों में पता जरूर कर लें. इस से आप को वैराइटी के साथसाथ प्राइज व क्वालिटी का भी अंदाजा हो जाएगा.

मोलभाव करना भी सीखें

दुकानदार ने जितना बताया है उतनी कीमत पर ही न खरीद लें, मोलभाव जरूर करें. यह न सोचें कि मम्मी ने तो जोड़ कर पैसे दिए ही हैं, फिर क्या मोलभाव करना. यह जरूरी नहीं है कि जितना मूल्य लिखा है उतने पर ही खरीदना पड़ेगा. आप एमआरपी पर मोलभाव कर सकते हैं. यह दुकानदार पर निर्भर करता है कि वह एमआरपी से कितने कम पर आप को देता है.

दूसरों की देखादेखी न करें

ऐसा न करें कि किसी दूसरे को खरीदते देख आप भी वही खरीदने लगें. जरूरी नहीं है कि सामने वाले की जो जरूरत हो वही आप की भी हो इसलिए अपनी जरूरत और बजट के अनुसार सामान खरीदें.

ओवर ऐक्साइटमैंट न दिखाएं

अगर दुकानदार आप को कोई ऐसा सामान दिखाए जो आप को एक नजर में पसंद आ जाए या आप जैसा ढूंढ़ रहे थे वह एकदम वैसा ही हो, तो एकदम से खुश न हों, क्योंकि आप ऐसा करते हैं तो इस से दुकानदार निश्चित रूप से दाम ज्यादा बताएगा, इसलिए नौर्मल व्यवहार करें.

खुद को डरासहमा न दिखाएं

खुद को भोलाभाला व मासूम न दिखाएं बल्कि कौन्फिडैंटली प्रेजैंट करें. अगर आप खुद को मासूम दिखाते हैं तो दुकानदार आप को आसानी से बेवकूफ बना सकता है इसलिए स्मार्ट खरीदार बनें.

बेकार की खरीदारी न करें

किशोरों की आदत होती है कि वे सोचते हैं यह भी ले लेता हूं, वह भी ले लेता हूं, जरूरत तो पड़ ही जाएगी. ऐसा न करें बल्कि आप को जिस चीज की जरूरत है वही खरीदें.

कीमत का रखें खास ध्यान

बाजार में आप के सामने कोई सामान बिक रहा है तो वह कितने में बिक रहा है, इस की जानकारी जरूर रखें. फिर रेटलिस्ट से उसे मिलाएं, इस से आप को उस की सही कीमत का अंदाजा लगाने में आसानी होगी. कई बार आप खूबसूरत फैंसी पैकिंग के पैसे दे रहे होते हैं इसलिए ऊपरी खूबसूरती पर न जाएं बल्कि क्वालिटी देखें.

अपना बजट तय करें

यह थोड़ा मुश्किल है लेकिन बजट तय करना ठीक रहता है इस से आप अतिरिक्त खर्च से बचते हैं और कंट्रोल में रहते हैं. आप को जिस चीज की जरूरत है उसे ही खरीदें, फालतू खर्च न करें.

एटीएम कार्ड न सौंप दें

आप अपना एटीएम कार्ड कभी भी दुकानदार को न सौंपें कि वह ही पिन नंबर वगैरा डाल ले. पता चला वह ज्यादा अमाउंट डाल दे और आप को पता ही न चले. इस के साथ ही जब भी डिजिटल पेमैंट करें तब थोड़ी सावधानी बरतें, जैसे वौलेट द्वारा भुगतान करने पर ट्रांजैक्शन पूरा न हो, तो तुरंत दोबारा न करें. क्योंकि कई बार सर्वर स्लो होने के कारण ट्रांजैक्शन पूरा होने में समय लग सकता है.

औनलाइन सर्च कर के जाएं

जब किसी चीज की खरीदारी के लिए जाएं तो औनलाइन सर्च कर लें. इस से एक अंदाजा लग जाता है कि किस प्राइज में चीजें बिक रही हैं, क्या खासीयत है. आमतौर पर औनलाइन में प्रोडक्ट की पूरी जानकारी दी रहती है जिसे आप आराम से पढ़ सकते हैं, लेकिन अगर दुकानदार के भरोसे रहते हैं तो वह वही दिखाएगा जिस में उस का प्रौफिट होगा और हां, रिव्यू पढ़ना न भूलें. रिव्यू से आप को पौजिटिव व नैगेटिव दोनों पहलुओं के बारे में पता चलता है जिस से खरीदने में आसानी होती है.

बिल जरूर लें

अधिकांश किशोरों की आदत होती है कि वे जल्दीजल्दी में बिल नहीं लेते और अगर ले भी लेते हैं तो दुकान से बाहर निकलते ही फाड़ कर फेंक देते हैं. ऐसा न करें, क्योंकि अगर आप के पास बिल नहीं होगा तो दुकानदार रिटर्न करने में आनाकानी कर सकता है कि बिना बिल के सामान वापस नहीं लेगा इसलिए बिल जरूर लें. एक बात का अवश्य ध्यान रखें कि बिल पक्का हो, जिस पर दुकान का नाम लिखा हो व मुहर लगी हो.      

12वीं के बाद कैरियर विकल्प

12 वीं की परीक्षा कैरियर के लिए एक निर्णायक आधार होती है, क्योंकि इस के बाद ही छात्र कैरियर की राह पर अग्रसर होते हैं. प्राय: 12वीं की परीक्षा देने के बाद छात्रों के सामने आगे की पढ़ाई और कैरियर के चुनाव को ले कर बड़ी उलझन रहती है.

कैरियर का चुनाव छात्रों की पसंद, योग्यता और रुचि के साथसाथ बदलती रोजगार की संभावनाओं पर निर्भर करता है. 12वीं में आप ने जिस क्षेत्र की पढ़ाई की है उस के अनुसार आप की कैरियर संभावनाएं निम्न हैं :

कौमर्स स्ट्रीम में कैरियर औप्शंस

कौमर्स का क्षेत्र रोजगार की विशाल संभावनाओं से भरा पड़ा है. 12वीं के बाद बीकौम की डिग्री का औप्शन उज्ज्वल भविष्य का सपना साकार करता है तो एमकौम की डिग्री से सक्सैस की और अधिक ऊंचाई हासिल की जा सकती है.

एमकौम के बाद यदि पीएचडी कर ली जाए तो कालेज और यूनिवर्सिटीज में टीचिंग कैरियर के अतिरिक्त विभिन्न इंस्टिट्यूट्स में रिसर्च स्कौलर्स के रूप में भी रोजगार के अवसर उपलब्ध होते हैं. साथ ही राष्ट्रीयकृत बैंकों में भी जौब की काफी संभावनाएं हैं.

चार्टर्ड अकाउंटैंट का क्षेत्र कौमर्स उम्मीदवारों के लिए विशेष प्रतिष्ठा का क्षेत्र माना जाता है, जिस का क्रेज समय के साथ कभी फीका नहीं पड़ा है. चार्टर्ड अकाउंटैंसी के कोर्स को 10+2 या फिर ग्रैजुएशन के बाद किया जा सकता है और दोनों ही स्थितियों में यह कोर्स 10 महीने का होता है.

चार्टर्ड फाइनैंशियल एनालिस्ट का पद भी कौमर्स स्टूडैंट्स के लिए काफी पौपुलर औप्शन है. एक चार्टर्ड फाइनैंशियल एनालिस्ट की मुख्य जिम्मेदारियों के रूप में फाइनैंशियल अकाउंटिंग, सिक्योरिटी इवैल्यूएशन, प्रोजैक्ट प्लानिंग, मैनेजमैंट अकाउंटिंग, इन्वैस्टमैंट अकाउंटिंग, वेंचर कैपिटल मैनेजमैंट और क्रैडिट रेटिंग का मैनेजमैंट करना होता है. कौमर्स के छात्रों के लिए कंपनी सेक्रैटरी की जौब भी कम आकर्षक नहीं है.

साइंस स्ट्रीम में कैरियर की संभावनाएं

साइंस स्ट्रीम परंपरागत रूप से प्रतिभाशाली छात्रों का क्षेत्र माना जाता है, क्योंकि मैथमैटिक्स, फिजिक्स, कैमिस्ट्री, बायोलौजी और अन्य ऐडवांस्ड साइंस की शाखाओं में हार्ड और रैगुलर पढ़ाई की आवश्यकता होती है.

इस के अतिरिक्त साइंस का क्षेत्र काफी विस्तृत है. कंप्यूटर साइंस से ले कर फिजिक्स, कैमिस्ट्री, बायोलौजी, बायोटैक्नोलौजी, इंजीनियरिंग, मैडिकल, एस्ट्रोनौमी, एविएशन आदि में कैरियर की संभावनाएं बनती हैं.

10+2 के बाद साइंस के किसी मुख्य विषय के साथ बीएससी की डिग्री प्राप्त करने के लिए हायर ऐजुकेशन शुरू की जा सकती है. साथ ही सामान्य रूप में फिजिक्स, कैमिस्ट्री, बायोलौजी, जियोलौजी, कंप्यूटर साइंस इत्यादि के चुनाव के साथ बीएससी की पढ़ाई जनरल औप्शन है.

इन सभी मास्टर डिग्रियों के लिए आगे पढ़ाई जारी रखी जा सकती है. फिर अपने सब्जैक्ट्स में पीएचडी की डिग्री के साथ कालेज और यूनिवर्सिटीज में टीचिंग की संभावना रहती है.

परंपरागत रूप से इंजीनियरिंग और मैडिकल का क्षेत्र भी साइंस स्टूडैंट्स के लिए सदाबहार है. मैडिकल में एमबीबीएस की डिग्री से ले कर बीडीएस, बीफार्मा, डीफार्मा और नर्सिंग के कोर्स में जौब की भरपूर संभावनाएं हैं. एमबीबीएस का कोर्स ह्यूमन एनाटोमी का होता है, जो प्राय: साढ़े 5 साल का होता है जिस में एक वर्ष का इंटर्नशिप का कोर्स भी शामिल होता है जो एक तरह से मैडिकल के क्षेत्र का अपरैंटिसशिप जैसा ही होता है.

इसी क्षेत्र में मास्टर डिग्री प्राप्त कर मैडिकल कालेज और हौस्पिटल में टीचिंग जौब पाई जा सकती है.

मैडिकल के क्षेत्र में स्पैशलाइजेशन के बाद गायनेकोलौजी (स्त्री रोग विज्ञान), डर्मेटोलौजी (स्किन प्रौब्लम स्पैशलाइजेशन), अनेस्थोलौजी (संवेदनाहरण विज्ञान), ओप्थोमोलौजी (नेत्र रोग विज्ञान), आर्थोपेडिक्स (हड्डी विज्ञान), पेडियाट्रिक्स ( शिशु रोग विज्ञान), सर्जरी, आब्सटेट्रिक्स (प्रसूति रोग विज्ञान), कार्डियोलौजी, न्यूरोसाइंस और कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्र अवेलेबल हैं.

बीडीएस का कोर्स डैंटल सर्जरी के लिए होता है जोकि इंटर्नशिप के साथ 5 वर्ष का है.

वेटरेनरी साइंस के रूप में भी साइंस के छात्र कैरियर तलाश सकते हैं, क्योंकि एनिमल डिजीजेज और सर्जरी का क्षेत्र भी कम आकर्षक नहीं है.

बायोटैक्नोलौजी का क्षेत्र काफी नया है और ढेर सारी संभावनाओं से भरा है.

कैरियर के रूप में इंजीनियरिंग में जौब प्रोस्पैक्टस की काफी संभावनाएं रहती हैं. इंजीनियरिंग में प्रवेश के लिए फिजिक्स, कैमिस्ट्री और मैथमैटिक्स के साथ 10+2 पास किया होना चाहिए. इंजीनियरिंग में प्रवेश के लिए आईआईटी देश भर के छात्रों के लिए सब से प्रीमियर और फेवरिट इंस्टिट्यूट माना जाता है.

आर्ट्स में कैरियर

आर्ट्स में 10+2 पास करने के बाद किसी मेजर सब्जैक्ट के साथ बीए की डिग्री एक अच्छे कैरियर की शुरुआत मानी जाती है. लैंग्वेज और लिटरेचर, रिलिजन, फिलौसफी, इकोनौमिक्स, सोशियोलौजी, साइकोलौजी, ऐंथ्रोपोलौजी, हिस्ट्री, जियोग्राफी ऐसे कई अन्य विषयों के साथ ग्रैजुएशन की डिग्री प्राप्त की जा सकती है. इस के साथ ही इन विषयों में पोस्टग्रैजुएशन की डिग्री कैरियर के कैनवास को और विस्तृत बना देती है.

यदि इन सब्जैक्ट्स के साथ पीएचडी की डिग्री हासिल की जाए तो कैरियर में आगे बढ़ने के लिए एक लौंचिंग प्लेटफौर्म मिल जाता है. यूजीसी द्वारा नैट की परीक्षा क्लियर करने के साथ कालेज और यूनिवर्सिटी में टीचिंग फैकल्टी में कैरियर बनाया जा सकता है.

आर्ट्स से पोस्टग्रैजुएशन करने के बाद बीएड कर यानी पोस्ट ग्रैजुएट टीचर के रूप में भी कैरियर की शुरुआत की जा सकती है.

साइकोलौजी से पोस्टग्रैजुएट करने वालों के लिए काउंसलर की जौब आज की तनाव भरी जिंदगी के लिए अनिवार्यता के रूप में उभर कर आई है. इकोनौमिक्स ग्रैजुएट और पोस्टग्रैजुएट छात्रों के लिए बैंकों में कई प्रकार के जौब्स हैं. इकोनौमिक्स और स्टेटिस्टिक्स में ग्रैजुएट्स के लिए इंडियन इकोनौमिक सर्विसेज और इंडियन स्टैटिस्टिकल सर्विसेज में जौब्स की अपार संभावनाएं हैं.

मार्केटिंग में इकोनौमिक्स स्टूडैंट्स की डिमांड बड़ी तेजी से बढ़ रही है. इनफौर्मेशन टैक्नोलौजी का तेजी से विकास हो रहा है, साथ ही आर्ट्स बैकग्राउंड वाले छात्र मीडिया, जर्नलिज्म, कानून इत्यादि क्षेत्रों में भी कैरियर बना सकते हैं.

नौन ट्रेडिशनल कैरियर औप्शंस

इन परंपरागत कैरियर औप्शंस के अतिरिक्त 12वीं के बाद कई अन्य क्षेत्रों में भी कैरियर बनाया जा सकता है :

रिज्यूमे राइटिंग बिजनैस : नौकरी की तलाश करते लोगों को हमेशा एक प्रोफैशनल रिज्यूमे की जरूरत होती है. रिज्यूमे राइटिंग बिजनैस के माध्यम से क्लाइंट्स से औनलाइन पेमैंट प्राप्त कर उन को रिज्यूमे ड्राफ्ट औनलाइन पोस्ट किया जा सकता है. आवश्यक सुधार के साथ फिर उस रिज्यूमे को क्लाइंट को मेल कर सकते हैं. रिज्यूमे राइटिंग की क्वालिटी पर आप की फीस की क्वांटिटी भी निर्भर करती है.

वैब डिजाइनिंग बिजनैस : इनफौर्मेशन टैक्नोलौजी के तेजी से प्रसार के साथ वैबसाइट के निर्माण के बिजनैस का भी बड़ी तेजी से प्रसार होता जा रहा है और इस टास्क में टैक्निकल ऐक्सपर्ट, क्रिएटिव आर्ट ऐक्सपर्ट के अतिरिक्त सब्जैक्ट ऐक्सपर्ट्स के लिए भारी मात्रा में जौब्स की संभावनाएं उपलब्ध हैं.

ऐजुकेशन इंस्टिट्यूट तथा कोचिंग संस्थानों के साथसाथ सभी बिजनैसमेन अपनी वैबसाइट बनवाते हैं तथा उस के माध्यम से अपने प्रोडक्ट्स और सर्विसेज की सूचना अपने क्लाइंट्स को देते हैं और इस की एवज में आप एक अच्छीखासी मासिक आय अर्जित कर सकते हैं.

फ्रीलांस राइटिंग : यदि आप की लेखन में रुचि है व आप को लिखने की कला आती है तो आप को एक अच्छा राइटर बनने से कोई रोक नहीं सकता. आप प्रकाशित होने वाले सभी समाचारपत्रों तथा मैगजींस का इंटरनैट पर अध्ययन करें. पत्रपत्रिकाओं में लेख लिख कर अच्छी आय अर्जित कर सकते हैं.

कंटेंट राइटिंग : इसे वैबसाइट या वैब कंटेंट राइटर भी कहते हैं. कंटैंट राइटर वैबसाइट पर विषयवस्तु लिखता है और उस से संबंधित सूचनाएं प्रदान करता है. यदि आप एक अच्छे लेखक हैं और भाषा पर आप की कमांड है तो आप कंटैंट राइटर के रूप में एक लुकरेटीव प्रोफैशन की शुरुआत कर सकते हैं.

ईबुक मार्केटिंग इंटरनैट बिजनैस : आज डिजिटल युग में ईबुक के बिजनैस का बड़ा बोलबाला है. आज प्रिंट में बुक्स पढ़ने के बजाय सभी लैपटौप पर या टैबलेट्स पर किसी फेवरिट बुक को पढ़ना चाहते हैं इस कारण ईबुक्स की फैसिलिटी उपलब्ध कराना और उस की मार्केटिंग करना एक अच्छा बिजनैस साबित हो सकता है.

आप अपनी वैबसाइट्स पर ईबुक से रिलेटेड सूचनाओं को सेल कर सकते हैं, प्रमोट कर सकते हैं और ईबुक को बेच सकते हैं.

ब्लौग राइटिंग : ब्लौग शब्द वैबलौग का संक्षिप्त रूप है. यह वर्ल्ड वाइड वैब पर एक सूचना के आदानप्रदान की वह साइट है जिस पर संदेश पोस्ट किए जाते हैं. ब्लौग लेखन व्यक्तिगत रूप से डायरी लेखन जैसा ही होता है, जिस में कोई ब्लौगर अपनी दिनचर्या लिख कर पोस्ट करता है, जो दुनिया के लाखों लोगों के बीच पहुंच जाता है. आप किसी भी क्षेत्र की जानकारी इस में दे सकते हैं.

आधुनिक युग में ब्लौगिंग की लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए यह माना जाता है कि ब्लौग लिखना एक कला है, एक प्रोफैशनल आर्ट है तथा सब से बढ़ कर एक व्यावसायिक स्किल है, जिस के लिए पूर्व में गहन तैयारी की जरूरत होती है.         

जहाज का पंछी

राजस्थान के कंजर समुदाय के बारे में लोगों की राय अच्छी नहीं है. धारणा यह है कि कंजर आमतौर पर अपराधी होते हैं. इस जाति का हालांकि अपना एक अलग इतिहास है, पर उस से वास्ता न रखते हुए लोग यही मानते हैं कि अपराधी प्रवृत्ति के कंजर मेहनत के बजाय लूटपाट कर के गुजारा करते हैं. इस जाति के पुरुष नशे में धुत रहते हैं और औरतें बांछड़ा जाति की तरह देहव्यापार करती हैं. ये लोग असभ्य, अशिक्षित और जंगली हैं, इसलिए सभ्य समाज इन से दूर ही रहता है.

हालांकि यह पूरा सच नहीं है, लेकिन एक हद तक बात में दम इस लिहाज से है कि कंजरों को कभी आदमी समझा ही नहीं पाया और न ही इन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की कोई उल्लेखनीय कोशिश ही की गई.

राजस्थान के जिला बूंदी के एक गांव शंकरपुरा में जन्मी कंजर युवती पिंकी की दास्तान दुखद और फिल्मी सी है. पिंकी बेइंतहा खूबसूरत थी, पर उस की बदकिस्मती यह थी कि जब वह 15 साल की हुई तो मांबाप का साया सिर से उठ गया. लेकिन वह लावारिस कहलाने से इसलिए बच गई, क्योंकि उस के पिता ने 2 शादियां की थीं. जब सगे मांबाप की मौत हो गई तो सौतेली मां ने उसे सहारा दिया.

सौतेली मां के पास भी स्थाई आमदनी का कोई जरिया नहीं था, इसलिए वह पिंकी को साथ ले कर शंकरपुरा में ही रहने वाले अपने भाई राजा उर्फ ठेला के घर ले गई. इस तरह पिंकी को छत तो मिल गई, पर प्यार नहीं मिला. सौतेले मामा राजा के घर की भी माली हालत ठीक नहीं थी. जैसेतैसे खींचतान कर तीनों का गुजारा होता था. कई बार तो फांकों की भी नौबत आ जाती थी.

15 साल की पिंकी पर यौवन कुछ इस तरह मेहरबान हो गया था कि जो भी उसे देखता, बस देखता ही रह जाता. कंजरों में उस की जितनी खूबसूरत लड़कियां कम ही होती हैं. वह लोगों की चुभती निगाहों से नावाकिफ नहीं थी. हालांकि पिंकी कहने भर को पढ़ीलिखी थी, पर समझ उस में जमाने भर की आ गई थी.

सौतेले मामा के घर का माहौल पिंकी को रास नहीं आ रहा था, इसलिए अकसर उसे अपने मांबाप की याद आती रहती थी, जिन्होंने उसे ले कर ढेरों सपने संजोए थे. खुशी क्या होती है, यह पिंकी सौतेले मामा के घर आ कर भूल सी चुकी थी. जहां अभाव था, रोज की जरूरतों को ले कर मारामारी थी और उन्हें पूरा करने के लिए ढेर सारे समझौते करने पड़ते थे. एकलौती अच्छी बात यह थी कि सौतेली मां और मामा उस पर अत्याचार नहीं करते थे.

कुछ दिनों की तंगहाली के बाद पिंकी ने महसूस किया कि अब घर में पैसा आने लगा है. इस का मतलब यह नहीं था कि पैसा बरसने लगा था, बल्कि यह था कि अभाव कम हो चले थे और जरूरतें पूरी होने लगी थीं. अब किसी चीज के लिए तरसना नहीं पड़ता था.

पैसा कहां से और कैसे आ रहा है, यह पता करने के लिए पिंकी को कहीं दूर नहीं जाना पड़ा. गांव और आसपास के कुछ रसूखदार पैसे वाले लोगों का उस के घर आनाजाना शुरू हो गया था.

उन लोगों के आते ही सौतेली मां उन के साथ एक कमरे में बंद हो जाती और 4-6 घंटे बाद जब उन के जाने पर बाहर निकलती तो उस का जिस्म भले ही निढाल होता, पर चेहरे पर रौनक होती थी. यह रौनक उन पैसों की देन थी, जो उसे शरीर बेच कर मिलते थे. पिंकी अब पहले सी नासमझ और मासूम नहीं रह गई थी. वह इस सब का मतलब समझने लगी थी.

अब कभीकभी बड़ीबड़ी कारें भी सौतेली मां को लेने आती थीं. 3-4 दिन बाहर रह कर वह लौटती तो उस के पास नोटों की गड्डियां होती थीं. इस पर पिंकी को गुस्सा और तरस दोनों आता था कि क्या जरूरत है देह बेचने की, तीनों मिल कर मेहनतमजदूरी कर के इतना कमा सकते हैं कि इज्जत से गुजारा कर सकें. उसे इस माहौल में घुटन सी होने लगी थी. अब वह कोठेनुमा इस घर से आजाद होने की सोचने लगी थी. पर यह आसान काम नहीं था. शंकरपुरा के बाहर की दुनिया इस से जुदा नहीं होगी, यह भी पिंकी की समझ में आने लगा था. कहीं भाग जाना या चले जाना उस के वश की बात नहीं थी.

आनेजाने वाले ग्राहकों की नजरें पिंकी के खिलते यौवन पर पड़ने लगी थीं. इस से वह और घबरा जाती थी कि कहीं ऐसा न हो कि उसे भी देहधंधे की दलदल में धकेल दिया जाए. हालांकि अभी तक मां या मामा की तरफ से इस तरह की कोई बात नहीं की गई थी, पर उस का डर अपनी जगह स्वाभाविक था क्योंकि अकसर मामा खुद मां के लिए ग्राहक ढूंढ कर लाता था.

कोई 3 साल पहले एक दिन राजा ने बताया कि अब उसे ग्वालियर के रेशमपुर,जो बदरपुरा के नाम से जाना जाता है, में रहने वाले मौसा के यहां जाना है, जो उसे वहां कोई अच्छा काम दिला देंगे. मुद्दत से आजादी के लिए छटपटा रही पिंकी ने जब यह खबर सुनी तो खुशी से झूम उठी कि चलो अब जिंदगी रास्ते पर आ जाएगी. वह ग्वालियर में मेहनत कर के कमाएगी, इसलिए वह झट से राजी हो गई. जल्द ही मामा ने उसे मौसा के पास ग्वालियर पहुंचा दिया.

ग्वालियर में 4 दिन भी चैन से नहीं गुजरे थे कि मौसा, जिस का नाम पान सिंह उर्फ पप्पू था, ने अपना असली रूप दिखा दिया. अपनी बेटी समान पिंकी से यह कहते उसे कतई शरम नहीं आई कि अब उसे यहां रह कर धंधा करना होगा.

अब पिंकी को समझ में आया कि क्यों कुछ दिनों से मामा उस से नरमी से पेश आ रहा था. लेकिन जब धंधा ही करवाना था तो उसे यहां ला कर क्यों छोड़ा गया. यह काम तो वह गांव में भी करवा सकता था. यह बात पिंकी की समझ में तुरंत नहीं आई. चूंकि वह इस पेशे में नहीं आना चाहती थी, इसलिए वह पान सिंह के आगे हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाई कि उस से यह पाप न करवाया जाए.

उस के गिड़गिड़ाने का पान सिंह पर कोई असर नहीं हुआ, उलटे उस ने पिंकी को बताया कि उस का मामा उसे 9 लाख रुपए में बेच गया है. यह सुन कर पिंकी के होश फाख्ता हो गए. अब उस की समझ में आ गया कि सौतेली मां और मामा ने किस्तों में पैसा कमाने के बजाय एकमुश्त मोटी रकम कमा ली है. अपनी किस्मत पर वह खूब रोई.

भागने या बचने का कोई रास्ता उसे दिखाई नहीं दिया, इसलिए वह पान सिंह के इशारों पर नाचने लगी. रोज ग्राहक आते थे, जिन से पान सिंह अच्छे पैसे वसूल कर के उसे उन के साथ कमरे में बंद कर देता था. ग्राहक उसे तबीयत से नोचतेखसोटते थे और पूरी कीमत वसूल कर चलते बनते थे. धीरेधीरे पिंकी को पता चला कि उस इलाके के ज्यादातर मकानों में यही काम होता है.

पिंकी को अहसास हो गया कि उस की जिंदगी की यही नियति है. गांव में रहते वह सपने देखा करती थी कि उस की शादी हो गई है और उस का एक अच्छाखासा देवता समान पति है, जिस के लिए वह सुबहशाम खाना बनाती है, उस के कपड़े प्रैस करती है और उस का खूब ध्यान रखती है. वह भी उसे खूब प्यार करता है.

लेकिन यहां रोज एक नए मर्द से उस की शादी होती थी, जो प्यार के नाम पर 2-4 घंटे में अपनी जिस्मानी प्यास बुझा कर चलता बनता था. कभीकभी पिंकी को अपने जिस्म से घिन आती थी. शरीर ही नहीं, बल्कि उसे तो अपनी आत्मा से भी घिन आने लगी थी, पर वह कुछ कर नहीं सकती थी.

पान सिंह के लिए वह टकसाल या नोट छापने की मशीन थी, जो रोज हजारों रुपए उगलती थी. एवज में उसे अच्छा खानापानी, कपड़े और कौस्मेटिक का सामान मिलता था. वह एक ऐसी कठपुतली थी, जिस की डोर रिश्ते के इस मौसा पान सिंह की अंगुलियों में बंधी थी.

ग्वालियर में रहते पिंकी ने हजारों ग्राहकों को निपटाया. कुछ ही महीनों में वह एक माहिर कालगर्ल या वेश्या बन गई. उस के भीतर की भोलीभाली अल्हड़ लड़की वक्त से पहले ही एक तजुर्बेकार औरत में तब्दील हो गई. वह खुद इस बदलाव को महसूस कर रही थी, पर दिल की बात साझा करने के लिए कोई साथी नहीं था. एक ऐसे मर्द की चाहत उसे हमेशा रहती थी, जो ग्राहक न हो, शरीर से परे उसे एक औरत समझे. पर इस धंधे में आमतौर पर ऐसा नहीं होता इसलिए वह ऐसी बातें सोचने से भी घबराने लगी थी.

लेकिन पिंकी की यह गलतफहमी गलत साबित हुई कि 16-17 साल की उम्र में ही उस ने दुनिया देख ली है. एक दिन पान सिंह ने उसे नागपुर की 2 मशहूर तवायफों बंटी और परवीन के हाथों 15 लाख रुपए में बेच दिया. यह सौदा कब और कैसे हो गया, पिंकी को इस की हवा भी नहीं लगी. देहव्यापार के जिस धंधे की महज साल भर में ही वह खुद को प्रोफेसर समझने लगी थी, वह उस की नर्सरी क्लास था.

चूंकि पिंकी जवान थी और शरीर अभी तक कसा हुआ था, इसलिए परवीन ने ठोकबजा कर पान सिंह को 15 लाख रुपए दे दिए. पान सिंह ने उसे बेच कर 6 लाख रुपए का मुनाफा तो कमाया ही, इस से भी ज्यादा उस ने साल भर में उस से ग्राहकों के जरिए कमा लिए थे.

इस तरह पिंकी औरेंज सिटी के नाम से मशहूर नागपुर चली गई. ग्वालियर से नागपुर के रास्ते भर में उस की समझ में आ गया था कि एक तवायफ की जिंदगी में न कोई अहसास होता है न जज्बात. वह दलालों की जायदाद होती है, इस से आगे या ज्यादा कुछ नहीं.

नागपुर की गंगाजमुना गली देहव्यापार के लिए उसी तरह जानी जाती है, जैसे मुंबई का रेडलाइट इलाका कमाठीपुरा. परवीन वहां की जानीमानी तवायफ थी. उस की जानपहचान देश भर की देहमंडियों के कारोबारियों और दलालों से थी. इस गली में दाखिल होते ही पिंकी को अहसास हो गया कि उमराव जान जैसी फिल्मों में कुछ गलत नहीं दिखाया गया था. जो कुछ बदलाव आए हैं, वे लोगों को दिखते नहीं या लोग जानबूझ कर उन से वास्ता नहीं रखते. ये एक ही सिक्के के  2 पहलू हैं.

नागपुर आ कर पिंकी को लगा कि इस से बेहतर तो ग्वालियर ही था, क्योंकि परवीन की सरपरस्ती में उसे कई बार लगातार 20 ग्राहकों को निपटाना पड़ता था. परवीन जल्द से जल्द पान सिंह को दिए 15 लाख रुपए उस की चमड़ी से वसूल लेना चाहती थी. यहां की कालगर्ल्स के बीच भद्दे हंसीमजाक होते थे, जिन से शुरू में तो पिंकी परहेज करती रही, लेकिन बाद में उसे लगा कि एकाकीपन से बचने के लिए इसी माहौल का हिस्सा बन जाना बेहतर है.

परवीन की उम्र और जिस्म दोनों ढलान पर थे, फिर भी वह जितना हो सकता था, अपना शरीर बेचती थी. पर बुढ़ापे की सुरक्षा के लिए वह अब लड़कियों की खरीदफरोख्त भी करने लगी थी. एक तरह से उस का रोल कोठों की मौसियों सरीखा था, जो लड़कियों से जरूरत के मुताबिक नरमी और सख्ती दोनों से पेश आना जानती हैं.

परवीन के यहां सुबह से ही ग्राहक आने लगते थे. यहां देश के हर इलाके के लोग आते थे, जिन में से कुछ शौकिया तो कुछ आदी थे. इन लोगों और दलालों की भाषा में पिंकी नया माल थी, इसलिए उस की पूछपरख और कीमत ज्यादा थी. वह एक मशीन की तरह उठती थी और बुत की तरह जब वक्त मिलता, सो जाती थी.

पिंकी की समझ में अच्छी तरह आ गया था कि उस की हालत जहाज के उस पंछी जैसी है, जो बीच समुद्र में है. जहाज से उड़ कर पंछी कितनी भी दूर चला जाए, कोई ठौरठिकाना न मिलने पर उसे झख मार कर जहाज पर ही वापस आना है.

अब सब कुछ उस के सामने खुली किताब की तरह था. जिस दिन परवीन अपने 15 के 50 लाख बना लेगी, उस दिन उसे 10-20 लाख रुपए में किसी और के हाथ बेच देगी. यह किस्मत की बात होगी कि तब वह कहां जाएगी, हैदराबाद, मुंबई, पुणे या फिर कोलकाता. जल्दी ही वह गंगाजमुना गली की ऐसी रौनक बन गई थी, जिस की खुद की जिंदगी स्याह थी.

भागने का खयाल भी इन बदनाम गलियों में किसी गुनाह से कम नहीं होता. इसलिए पिंकी आजादी के सपने नहीं देखती थी. पर उस का एक राजकुमार वाला सपना अभी भी टूटा नहीं था. शायद कालगर्ल्स की जिंदगी का सहारा यही सपना होता है, मकसद भी, जिस के बारे में वही बेहतर जानती हैं.

ऐसी फिल्मी और किताबी बातें सोचतेसोचते वे बूढ़ी हो जाती हैं और फिर खुद की जैसी दूसरी मजबूर और वक्त की मारी लड़कियों को इस दलदल में धकेल कर धंधा करवाने लगती हैं, जिस से बुढ़ापा चैनसुकून और आराम से कट सके. उन के इस लालच या स्वार्थ से कितनी लड़कियों का सुकून और चैन छिन जाता है, वे उस से कोई वास्ता नहीं रखतीं.

नागपुर आने के बाद पिंकी ने साफ महसूस किया था कि उस पर कई मर्दानी नजरों का सख्त पहरा रहता है. वे नजरें सीसीटीवी कैमरों की तरह हैं, जो खुद मुश्किल से दिखते हैं, पर उन की नजर दूर तक रहती है. वहां से भागने की कोशिश करने वाली लड़कियों का कितना बुरा हश्र हुआ, इस के किस्से इतने डरावने तरीके से सुनाए जाते थे कि कोई लड़की ऐसा सोच भी रही हो तो वह खयाल दिलोदिमाग से निकालने में ही अपनी भलाई समझे.

कुछ ही दिनों में पिंकी ने परवीन का इतना भरोसा जीत लिया था. अब उस की निगरानी पहले जैसी नहीं होती थी. उसे नियमित और भरोसेबंद ग्राहकों के साथ अकेला छोड़ा जाने लगा था. लेकिन ग्राहक के साथ कहीं बाहर जाने की इजाजत अभी भी उसे नहीं थी.

एक दिन विपिन पांडे नाम का ग्राहक उस के पास आया तो पिंकी को वह वही शख्स लगा, जिस के सपने वह ग्वालियर आने के पहले से देख रही थी. विपिन में कई बातें ऐसी थीं, जो पिंकी को भा गई थीं. वह आम ग्राहकों की तरह उस पर टूट नहीं पड़ा था. उस ने कोई जल्दबाजी भी नहीं दिखाई थी. पहली बार में ही दोनों के बीच लंबी बातचीत हुई, जिस से पिंकी को लगा कि विपिन का औरतों को देखने का नजरिया दूसरों से अलग है. उस दिन पहली बार पिंकी का दिन किसी 22 साल की लड़की की तरह धड़का तो वह सिर से ले कर पांव तक सिहर उठी. उस की समझ में नहीं आया कि यह क्या हो रहा है.

विपिन जाने लगा तो पिंकी मायूस हो उठी. वह अपने मजबूर दिल को संभाल नहीं पाई. उस ने विपिन का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘फिर आना.’’

पेशे से ड्राइवर विपिन छिंदवाड़ा के एक प्रतिष्ठित परिवार का बेटा था. छिंदवाड़ा से नागपुर तक का कोई 2 घंटे का रास्ता है, जिसे अब विपिन पिंकी के लिए नापने लगा था. वह अकसर पिंकी के पास जाने लगा तो पिंकी ने उसे अपनी जिंदगी की कहानी विस्तार से सुना दी, जो राजस्थान के बूंदी जिले के गांव शंकरपुरा से ग्वालियर होते हुए नागपुर के बदनाम इलाके गंगाजमुना गली के उस कोठे पर आ कर खत्म होती थी.

प्यार अकेली पिंकी को ही नहीं हुआ था, बल्कि विपिन भी उस से प्यार करने लगा था. यह प्यार ठीक वैसा ही था, जो सन 1991 में प्रदर्शित महेश भट्ट की देहव्यापार पर बनी फिल्म ‘सड़क’ में दिखाया गया था. इस फिल्म में नायक संजय दत्त टैक्सी ड्राइवर होता है और मजबूरी की मारी एक कालगर्ल पूजा भट्ट से प्यार कर बैठता है. इस फिल्म में महारानी वाली भूमिका सदाशिव अमरापुरकर ने निभाई थी,जो खूब चर्चित रही थी.

यहां तो कदमकदम पर महारानियां थीं, लेकिन प्यार भी कहां आसानी से हार मानता है. पिंकी और विपिन ने तय कर लिया था कि भाग कर शादी कर लेंगे और कहीं भी बस जाएंगे. अच्छी बात यह थी कि विपिन हिम्मत वाला युवक था, जो दूसरों की तरह बदनाम गलियों और इलाकों के गुंडों और दलालों से नहीं डरता था.

विपिन के प्यार में डूबी पिंकी भूल गई थी कि तवायफ को प्यार करने की इजाजत न बाजार देता है और न समाज. फिर किसी से शादी कर के गृहस्थी बसाना तो कालगर्ल्स के लिए ख्वाब जैसी बात होती है.

पिंकी जानती थी कि रसूख वाली परवीन के हाथ बहुत लंबे हैं और उस के संबंध कुछ रसूखदार लोगों से भी हैं. गुंडे और दलाल पालना तो कोठों की परंपरा है, जिन का काम यही होता है कि कोई लड़की कोठों की परंपरा को तोड़ कर भागने की कोशिश न करे और करे तो उस का इतना बुरा हाल करो कि वह दूसरी लड़कियों के लिए सबक बन कर रह जाए.

नागपुर में सालों से कोठा चला रही परवीन सिर्फ एक बार ही पीटा एक्ट के तहत गिरफ्तार हुई थी. इस से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह इस कारोबार की कितनी सधी हुई खिलाड़ी थी. कई पुलिस वालों से उस के दोस्ताना संबंध थे.

एक दिन परवीन का सारा सयानापन और तजुरबा धरा रह गया, जब उस के पिंजरे से पिंकी नाम की एक मैना अपने तोते विपिन के साथ भाग निकली. वह 3 मार्च की दोपहर थी, जब हमेशा की तरह विपिन ग्राहक बन कर आया. वह समय परवीन के नहाने का होता था, इसलिए वह विपिन और पिंकी को कमरे में छोड़ कर नहाने चली गई.

दरअसल, भागने की योजना पिंकी और विपिन पहले ही बना चुके थे. पिंकी ने विपिन को बताया था कि गहमागहमी और दलालोंगुंडों की मौजूदगी के चलते रात में भागना कतई मुमकिन नहीं है, इसलिए दिन का समय इस के लिए ठीक रहेगा. उस समय बाजार के ज्यादातर लोग और लड़कियां सोई रहती हैं.

पिंकी भागी तो परवीन तिलमिला उठी. न केवल परवीन, बल्कि देहव्यापार से जुड़े तमाम लोग हैरान रह गए. चंद घंटों में ही पिंकी के भागने की खबर आग की तरह देहव्यापार के राष्ट्रीय बाजार में फैल गई. फिर तो परवीन के गुर्गों ने उसे शिकारी कुत्तों की तरह ढूंढना शुरू कर दिया.

2 दिलों में प्यार का जज्बा एक बार पैदा हो जाए तो उसे रोका नहीं जा सकता. यही पिंकी और विपिन के साथ हुआ था. दोनों ज्यादा दूर नहीं भागे. उन्होंने नागपुर से 100 किलोमीटर दूर मुलताई के कोर्ट में शादी कर ली. मुलताई बैतूल जिले की तहसील है, आदिवासी बाहुल्य यह शहर ताप्ती नदी के किनारे बसा है.

मुद्दत बाद पिंकी को नरक से छुटकारा मिला था. वह तो हार मार चुकी थी, लेकिन विपिन की मर्दानगी और मोहब्बत ने उसे नई जिंदगी दी, इसलिए वह उसे दिल ही दिल में देवता का दरजा दे चुकी थी. किसी तवायफ को जीवनसंगिनी बनाने का फैसला भी कोई आम आदमी नहीं कर सकता.

दूसरी ओर परवीन घायल शेरनी की तरह अपनी शिकस्त और लापरवाही पर तिलमिला रही थी. उस ने ग्वालियर में बैठे पान सिंह की भी खिंचाई की और देश भर के नएपुराने अड्डों पर खबर पहुंचा दी कि पिंकी कहीं दिखाई दे तो तुरंत इस की सूचना नागपुर दी जाए. परवीन की टीम ढूंढती भी रही और हाथ भी मलती रही कि आखिरकार दोनों को जमीन निगल गई या आसमान खा गया.

मुलताई में शादी करने के बाद विपिन पिंकी को भोपाल ले आया. भोपाल के पौश इलाके शिवाजीनगर में उस के मौसा प्रकाश शर्मा रहते हैं, जो सीआईडी के एडीजी कैलाश मकवान के स्टाफ में दारोगा हैं.

विपिन जब पिंकी को ले कर उन के घर पहुंचा तो वह चौंके कि यह कैसी शादी है. इस पर विपिन ने उन्हें बताया कि उस ने नागपुर की रहने वाली पिंकी से लवमैरिज की है. चूंकि मातापिता पिंकी को सहज स्वीकार नहीं करेंगे, इसलिए वह उन दोनों को पनाह दे दें. कुछ दिनों बाद हालात ठीक हो जाएंगे तो वह खुद छिंदवाड़ा जा कर मांबाप को सच बता देगा.

विपिन ने प्रकाश को यह नहीं बताया था कि पिंकी कौन है. प्रकाश शर्मा को पत्नी के भांजे पर दया आ गई और कुछ सोच कर उन्होंने दोनों को अपने घर रहने की इजाजत दे दी. मौसा के इस फैसले से दोनों खुशी से झूम उठे कि उन की अभी तक की कवायद बेकार नहीं गई. चूंकि इन का प्यार सच्चा है, इसलिए मौसाजी भी आसानी से मान गए. जल्द ही विपिन ने खुद के लिए किराए का मकान ढूंढ लिया.

प्रकाश शर्मा के घर उन की पत्नी कविता और बेटा गौरव रहते थे. उन की बेटी रूपाली की शादी हो चुकी है. गौरव भोपाल के कैरियर कालेज से ग्रैजुएशन कर रहा था. जब ठिकाना मिल गया तो जुगाड़ू विपिन ने खुद के लिए एक ट्रैवल एजेंसी में नौकरी भी ढूंढ ली. शिवाजीनगर में सरकारी क्वार्टरों और बंगलों की भरमार है, लिहाजा वहां का माहौल आमतौर पर शांत ही रहता है. पिंकी यह सब देख कर हैरान थी कि दुनिया इतनी अच्छी है, जिस में इतने अच्छे लोग भी रहते हैं.

2 हफ्ते में ही पिंकी ने अपने मौसेरे सासससुर का दिल जीतने में कोई कसर नहीं छोड़ी. सिर पर पल्लू रखे वह आदर्श बहू की तरह रहती थी और कोशिश करती थी कि घर के सारे कामकाज खुद निपटा डाले. यह वह जिंदगी थी, जो पिंकी का सपना थी.

घरगृहस्थी पिंकी ने पहली बार देखी थी. देवर गौरव भाभी के इर्दगिर्द मंडराता रहता था. हालांकि पिंकी को परवीन का खौफ सताता रहता था, पर प्रकाश शर्मा के पुलिस में होने की वजह से वह खुद को महफूज समझ रही थी. इस के अलावा यहां मिल रहे लाड़प्यार के चलते वह अपनी पुरानी जिंदगी को भी भूलने लगी थी.

23 मार्च की सुबह रोजाना की तरह प्रकाश शर्मा अपने औफिस चले गए. विपिन भी अपनी ड्यूटी पर जा चुका था. जिस ट्रैवल एजेंसी में उसे नौकरी मिली थी, उस ने उस की ड्यूटी प्रदेश के रसूखदार मंत्री रामपाल सिंह के बंगले पर लगा रखी थी. वह भी शिवाजीनगर में ही रहते थे.

कालेज जाने को तैयार बैठे गौरव का टिफिन किचन में तैयार कर रही पिंकी उस समय चौंकी, जब उसे बाहर गाडि़यों के रुकने की आवाज सुनाई दी. वह कुछ सोचसमझ पाती, उस के पहले ही ड्राइंगरूम से मौसिया सास कविता और देवर गौरव के चीखने की आवाजें उसे सुनाई दीं.

पिंकी को समझते देर नहीं लगी कि परवीन के गुर्गे उसे सूंघते हुए यहां तक आ पहुंचे हैं. लिहाजा वह दूसरे दरवाजे से भाग निकली. उस घर में जहां वह 20 दिनों तक एक आदर्श बहू की तरह रही, में क्या हो रहा है यह उसे कुंछ घंटों बाद पता चला.

वहां एक भयानक हादसा अंजाम ले चुका था. पिंकी का यह अंदाजा गलत साबित हुआ कि देहव्यापार की दुनिया के दलाल और खतरनाक गुंडे उसे ढूंढ नहीं पाएंगे. अगर जैसेतैसे ढूंढ भी लिया तो मौसा ससुर प्रकाश शर्मा के पुलिसकर्मी होने के चलते कुछ नहीं कर पाएंगे.

उस दिन एक टवेरा और एक स्कौर्पियो प्रकाश शर्मा के घर के बाहर आ कर रुकी. एकदम फिल्मी स्टाइल में धड़ाधड़ 14 लोग उन में से निकले, जिन में 4 महिलाएं भी थीं. सभी सीधे उन के घर में दाखिल हो गए. वे लोग विपिन और पिंकी को ढूंढ रहे थे. एकाएक कुछ लोगों को आया देख कविता और गौरव हकबका गए कि ये लोग कौन हैं और क्या चाहते हैं.

पिंकी के बारे में उन से पूछा गया, जिस का मतलब दोनों समझ नहीं पाए. आगंतुकों ने पूरा घर छान मारा, पर पिंकी नहीं मिली. वे गौरव और कविता को मारने लगे. दोनों चिल्लाए तो आसपड़ोस के लोग इकट्ठा हो गए. माजरा क्या है, यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था. आखिर इतनी सुबहसुबह शिवाजीनगर जैसे शांत इलाके में कुछ गुंडेबदमाश एक पुलिस वाले के घर घुस कर गदर क्यों मचा रहे हैं.

बदमाशों ने गौरव को काबू कर के गाड़ी में बिठाया और जातेजाते कविता को धमकी दे गए कि विपिन को भेज कर अपने बेटे को ले आना. उन के जाते ही न केवल शिवाजीनगर, बल्कि पूरे भोपाल में कोहराम मच गया कि दिनदहाड़े एक पुलिस वाले का बेटा अगवा कर लिया गया.

मामला खुद के विभाग के मुलाजिम का था, इसलिए पुलिस तुरंत हरकत में आ गई. गाडि़यों के नंबर चूंकि एक किशोर ने नोट कर लिए थे, इसलिए उस का काम एक हद तक आसान हो गया था. भोपाल के चारों तरफ नाकाबंदी कर दी गई. जल्दबाजी में बदमाश गौरव के मोबाइल से बेखबर थे, इसलिए उस के जरिए पुलिस को उन की लोकेशन मिल रही थी.

घर पर हुए इस हादसे की खबर मिलते ही प्रकाश और विपिन अपनी ड्यूटी छोड़ कर आ गए. इस के बाद विपिन के सच बताने पर सारी कहानी सामने आई कि उन बदमाशों का मकसद क्या था. मामला वाकई गंभीर था, जिस में बदमाश गौरव को किसी भी तरह का नुकसान पहुंचा सकते थे. इसलिए पुलिस के सामने यह चुनौती पेश आ गई कि कैसे भी गौरव को सकुशल उन के चंगुल से छुड़ाया जाए.

गौरव के मोबाइल की लोकेशन से पता चला कि बदमाशों की गाडि़यां नरसिंहगढ़ और कुरावरमंडी की ओर जा रही हैं. यह रास्ता राजगढ़ होते हुए राजस्थान की तरफ जाता है. पुलिस वालों ने फुरती दिखाते हुए कुछ ही घंटों में नरसिंहगढ़ और कुरावर के बीच मलावर थाने के पास बदमाशों की गाडि़यों को घेर लिया, जो बदमाशों के लिए अप्रत्याशित था.

खुद को घिरा देख कर बदमाशों ने गौरव को गाड़ी से धकेल कर भागने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो पाए. गौरव को पुलिस ने अपनी गाड़ी में बिठाया और कुछ दूर जा कर बदमाशों को समर्पण करने पर मजबूर कर दिया.

गिरफ्तार हुए अपराधियों में पिंकी के मौसा पान सिंह के अलावा रामसिंह, हर्ष, राहुल, चेन सिंह, मंगल सिंह और हरीश ग्वालियर के थे. जबकि आशा, मौसमी और विचाराम राजस्थान के थे. नागपुर के जो लोग पकड़े गए थे, उन के नाम मोहम्मद सादिक, जगन, कविता और प्रवीण थे.

जाहिर है देहव्यापार से जुड़े 3 राज्यों के दलाल एकजुट हो कर पिंकी और विपिन को पागल कुत्तों की तरह ढूंढ रहे थे. आखिर उन्होंने देश भर में फैले नेटवर्क के जरिए विपिन के बारे में सारी जानकारियां जुटा ही ली थीं.

पकड़े गए लोगों को भोपाल ला कर पुलिस ने इन की मेहमाननवाजी की तो पूरा सच सामने आ गया. गौरव पर उन्होंने अपना गुस्सा गाड़ी में बैठाते ही निकालना शुरू कर दिया था. उसे खूब मारा गया था. जब उस ने विरोध करने की कोशिश की तो उसे जान से मारने की धमकी दी गई.

गौरव की समझ में सिर्फ इतना ही आया कि वे विपिन भैया और पिंकी भाभी के बारे में बातें कर रहे थे. गौरव को कोई गंभीर चोट नहीं आई थी, फिर भी ऐहतियातन उस का मैडिकल कराया गया, जो कानूनन भी जरूरी था.

जब सब कुछ साफ हो गया तो सुनने वाले हैरत में पड़ गए. यह एक अलग तरह की प्रेमकथा थी, जिस के चलते प्रकाश शर्मा के परिवार पर खतरे के बादल मंडराए थे. लेकिन अंत भला तो सब भला की तर्ज पर बात आईगई हो गई. आखिर बदमाशों को जेल में ठूंस दिया गया. इस के बाद पुलिस टीमें नागपुर, ग्वालियर और राजस्थान गईं.

विपिन के बयान और मंशा से सामने आया कि उस ने एक मजबूर लड़की को गंदगी के दलदल से निकाल कर अपनाया था. वह उस से प्यार करता है और करता रहेगा. समाज के कुछ कहनेसुनने की परवाह उसे नहीं है. विपिन ने माना कि वे लोग बहुत खतरनाक हैं और उस की व पिंकी की जान भी ले सकते हैं. पर अब वह किसी से नहीं डरेगा.

विपिन की मंशा पिंकी को समाज में सम्मान दिलाने की है. इस में वह कितना कामयाब होगा, कह पाना मुश्किल है, क्योंकि कोई भी समाज तवायफ को नहीं अपनाता. उस के प्रति नजरिया कैसा होता है, यह हर कोई जानता है. फिर भी कई लोग विपिन की पहल का स्वागत कर रहे हैं, इसलिए वह अभी भी पिंकी का हाथ मजबूती से थामे हुए है.

निश्चित रूप से विपिन सच्चा मर्द है और शाबाशी का हकदार भी, जिस ने पिंकी को गृहिणी बना कर जीने का सपना पूरा किया और अभी भी आने वाली दिक्कतों से दृढ़ता से जूझ रहा है.

फेसबुकिया प्यार

रात को घर के सारे काम निपटा कर रीतू फेसबुक खोल कर चैटिंग करने बैठती तो दूसरी ओर विनोद औनलाइन मिलता, जैसे वह पहले से ही रीतू का इंतजार कर रहा होता. उस से चैटिंग करने में विनोद को भी बड़ा आनंद आता था. रीतू की प्यार भरी बातों से विनोद की दिन भर की थकान दूर हो जाती थी. वह एक प्राइमरी स्कूल में सहायक अध्यापक था. वहां छोटेछोटे बच्चों को पढ़ाने में उस का दिमाग व शरीर थक जाता था, रीतू से चैटिंग कर के वह तरोताजा महसूस करता था.

विनोद की पत्नी मायके गई हुई थी, इसलिए घर की तनहाई उसे काटने दौड़ती थी. ऐसे में उसे रीतू से भरपूर चैटिंग करने का समय मिल जाता था. रीतू भी चैटिंग द्वारा एक हफ्ते में ही विनोद से काफी घुलमिल गई थी. उस दिन भी वह उस से चैटिंग कर रहा था, तभी उस के मोबाइल की घंटी बज उठी. उस ने पूछा, ‘‘हैलो, कौन?’’

‘‘हैलो…विनोदजी, मैं रीतू बोल रही हूं. वही रीतू, जिस से आप चैट कर रहे हो.’’ दूसरी तरफ से कहा गया.

  ‘‘अरे रीतूजी आप, आप को मेरा नंबर कहां से मिल गया?’’ खुश हो कर विनोद ने पूछा.

‘‘लगन सच्ची हो और दिल में प्यार हो तो सब कुछ मिल जाता है, नंबर क्या चीज है.’’ रीतू ने कहा.

बड़ी मीठी आवाज थी रीतू की. उस से बातें करते हुए विनोद को बहुत अच्छा लग रहा था, इसलिए उस ने चैटिंग बंद कर के पूछा, ‘‘रीतूजी, आप रहती कहां हैं?’’

‘‘वाराणसी में.’’ रीतू ने कहा.

‘‘वाराणसी में आप कहां रहती हैं?’’

‘‘सिगरा में.’’

‘‘रीतूजी, आप करती क्या हैं?’’

‘‘मैं एक नर्सिंगहोम में नर्स हूं.’’

‘‘आप तो नौकरी के साथ समाजसेवा भी कर रही हैं. आप मैरिड हैं या..?’’

‘‘हां, मैं मैरिड हूं और आप..?’’ रीतू ने पूछा.

‘‘शादी तो मेरी भी हो चुकी है, लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या?’’

‘‘कुछ खास नहीं, दरअसल पत्नी मायके गई है, इसलिए घर में उदासी छाई है.’’

‘‘ओह, मैं तो अनहोनी समझ कर घबरा गई थी. विनोदजी, सही बात तो यह है कि मेरी शादी हुई जरूर है, पर पति के होते हुए भी मैं अकेली हूं. मेरी स्थिति तो उस धोबी की तरह है, जो पानी में खड़ा होते हुए भी प्यासा रहता है.’’ कहतेकहते रीतू उदास हो गई.

रीतू की वेदना सुन कर विनोद का भी अंतरमन आहत सा हो गया था. बातचीत के बाद दोनों ने वाट्सऐप से एकदूसरे को अपनेअपने फोटो भेज दिए. रीतू बहुत सुंदर थी. गोलमटोल चेहरे पर बड़ीबड़ी कजरारी आंखें, पतलेपतले होंठ, लंबेघने घुंघराले केश. उस की मोहिनी सूरत पर विनोद मुग्ध हो गया.

अब वह रोजाना रीतू से बातें करने के लिए बेचैन रहने लगा था. मोबाइल पर जो बात वह उस से खुल कर नहीं कह पाता था, उसे फेसबुक पर चैटिंग के दौरान कह देता था. विनोद को रीतू ने बताया था कि उस का पति मनोहरलाल शराबी है.

वह जुआ भी खेलता है और शराबियों के साथ आवारागर्दी करता है. रात को नशे में झूमता हुआ घर आ कर झगड़ा और गालीगलौज कर के सो जाता है.

रीतू को जो वेतन मिलता, उसे भी वह छीन लेता था. न देने पर उसे मारतापीटता था. मार के डर से वह अपना सारा वेतन उसे दे देती थी.

रीतू विनोद से अपनी कोई बात नहीं छिपाती थी. इस तरह विनोद को रीतू से अपनापन सा हो गया था. एक रात विनोद ने फोन कर के पूछा, ‘‘क्या कर रही हो?’’

‘‘तुम्हारी याद में बेचैन हूं और तुम से मिलने के लिए तड़प रही हूं. और तुम..?’’ उस ने भी विनोद से पूछा.

‘‘मेरी भी वही हालत है.’’ विनोद ने कहा.

‘‘जब ऐसी बात है तो मेरे पास आ जाओ न, दोनों का ही अकेलापन दूर हो जाएगा.’’

रीतू की बात सुन कर विनोद के शरीर में तरंग सी उठने लगी. मन की बेचैनी बढ़ गई. उस ने कहा, ‘‘मेरे आने का क्या फायदा, घर पर तुम्हारा पति मनोहर जो है.’’

‘‘तो क्या हुआ, तुम आओ तो सही. मैं कह दूंगी कि तुम मेरे मौसेरे भाई हो. वैसे भी वह कल गांव जा रहा है. गांव से लौटने में उसे 2-4 दिन तो लग ही जाएंगे. परसों इतवार है. तुम कल जरूर आ जाओ. ऐसा मौका जल्दी नहीं मिलेगा. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’

रीतू का फोन कटा तो विनोद की बेचैनी बढ़ गई. वह रात भर करवटें बदलता रहा. जबकि पत्नी से उस की रोज ही बातें होती थीं. वह भी आने के लिए उसे बारबार फोन कर रही थी. पत्नी की मां सीरियस बीमार न होती तो वह कब की आ गई होती.

विनोद की स्थिति उस चटोरे जैसी हो गई थी, जिसे बाहर के भोजन के सामने घर का भोजन फीका लगता है. फिर रीतू का मदभरा अतृप्त यौवन कहां हमेशा मिलने वाला था. विनोद की यही सोच उसे मदहोश किए जा रही थी. लिहाजा मन बना कर वह रविवार को रीतू से मिलने वाराणसी पहुंच गया. रीतू के बताए पते पर पहुंचने में उसे कोई दिक्कत नहीं हुई. थोड़ीबहुत परेशानी हुई तो उस ने रीतू से फोन कर के रास्ता पूछ लिया.

रीतू के घर आते हुए विनोद के मन में जो डर और झिझक थी, वह उस से मिल कर खत्म हो गई. उस समय उस के मन में एक सवाल यह था कि न जान न पहचान, केवल फेसबुक की दोस्ती ही तो है, कहीं उस के साथ कोई छलकपट न हो. उसी पल उस ने यह भी सोचा कि यदि ऐसा होता तो इस तरह खुल कर रीतू अपनी वेदना उस से न कहती.

इन्हीं सब उलझनों में पड़े विनोद ने जब रीतू के घर की घंटी बजाई तो रीतू न केवल तुरंत बाहर आई, बल्कि स्वागत करती हुई वह उस का हाथ पकड़ कर अंदर ले गई. उस के इस व्यवहार से उस के मन में जो डर था, वह पूरी तरह से दूर हो गया.

दूसरी मंजिल पर जहां रीतू रहती थी, वह 2 कमरों का सैट था. पूरा मकान करीने से सजा हुआ था, जिसे देख कर विनोद का मन खिल उठा. रीतू उस से मिल कर आनंदविभोर हो उठी थी. घर में रीतू को अकेली पा कर उस से आलिंगनबद्ध कर वह निहाल हो गया था. खातिरदारी और उस से लिपट कर बात करतेकरते दिन ढलने लगा तो विनोद ने इशारा करते हुए कहा, ‘‘रीतू, चलो अब बैडरूम में चलते हैं. क्योंकि मुझे वापस भी जाना है.’’

‘‘कहां वापस जाना है. आज रात तुम्हें मेरे साथ रहना होगा. फिर पता नहीं कब मिलना हो?’’ कह कर विनोद को आलिंगनबद्ध किए हुए रीतू उसे बैडरूम में ले गई.

डबलबैड पर दोनों सट कर लेट गए. विनोद उस के अंगों से खेलने लगा. वह उसे निर्वस्त्र करने लगा तो रीतू ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘इतनी भी क्या जल्दी है.’’

कमरा ट्यूबलाइट की दूधिया रौशनी से भरा हुआ था. इस से पहले कि विनोद कुछ और करता, पता नहीं कहां से मनोहर उस कमरे में आ टपका. उसे देखते ही विनोद सकपका गया. वह विनोद को घूरते हुए बोला, ‘‘तू कौन है रे, जो मेरे घर में आ कर मेरी पत्नी के साथ दुष्कर्म कर रहा है.’’

विनोद की तो जैसे सिट्टीपिट्टी बंध गई, उस का सारा रोमांस गायब हो गया. रीतू अपनी साड़ी ओढ़ कर एक कोने में सिमट गई. मनोहर ने पहले तो विनोद को खूब लताड़ा. फिर लातघूंसों से उस की पिटाई करते हुए पुलिस को फोन लगाने लगा.

विनोद उस के पैर पकड़ कर पुलिस न बुलाने की भीख मांगते हुए बोला, ‘‘मनोहरजी, इस में मेरी कोई गलती नहीं है. रीतू ने ही फेसबुक पर मुझ से दोस्ती कर के यहां बुलाया था.’’

‘‘चुप कमीने, मैं कुछ नहीं जानता. फेसबुक पर दोस्ती कर औरतों को प्रेमजाल में फांस कर रंगरलियां मनाने वाले, आज तेरी खैर नहीं है. जब पुलिस का डंडा पड़ेगा, तब सारा नशा उतर जाएगा.’’ कह कर वह फिर फोन मिलाने लगा.

‘‘नहीं मनोहरजी, मुझे छोड़ दो. मेरा भी परिवार है. मेरी सरकारी नौकरी है. मुझे पुलिस के हवाले करोगे तो मैं बरबाद हो जाऊंगा.’’ कह कर वह उस के पैरों पर गिर पड़ा.

विनोद के काफी हाथपैर जोड़ने पर मनोहर ने कहा, ‘‘अपनी इज्जत और नौकरी बचाना चाहता है तो अभी 2 लाख रुपए देने होंगे. नहीं तो मैं तुझे पुलिस के हवाले कर दूंगा.’’

कह कर मनोहर ने कमरे में लगा वीडियो कैमरा हाथ में ले कर उसे दिखाते हुआ कहा, ‘‘तेरी सारी हरकत इस कैमरे में कैद है, इसलिए पैसे जल्द दे दे, नहीं तो…’’

‘‘इतने पैसे मैं अभी कहां से लाऊं. मेरे पास तो अभी केवल 70 हजार रुपए हैं.’’ कह कर 2-2 हजार के 35 नोट पर्स से निकाल कर उस ने मनोहर के सामने रख दिए.

क्रोध से लाल होता हुआ मनोहर बोला, ‘‘70 हजार..? यह भी रख ले. 2 लाख कह दिया तो उतने ही चाहिए. नहीं तो जेल जाने की तैयारी कर ले.’’

विनोद गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘आप मुझ पर दया कीजिए भैया, मैं घर जा कर बैंक से पैसे निकाल कर कल आप को दे दूंगा.’’

‘‘बहाना कर के भागना चाहता है तू, मुझे मूर्ख समझता है क्या. अभी मेरे साथ एटीएम चल.’’ कह कर वह पास की मार्केट स्थित एटीएम बूथ पर ले गया और 24 हजार रुपए निकलवा लिए. इस से ज्यादा वह निकाल नहीं सकता था, क्योंकि नोटबंदी के बाद बैंकों ने नियम ही ऐसा बना दिया था.

24 हजार रुपए अपने पास रख कर मनोहर ने विनोद को चेतावनी दी, ‘‘1 लाख 6 हजार रुपए तू जल्द दे जाना, वरना यह वीडियो मेरे पास है. यह तुझे कभी भी जेल पहुंचा सकता है.’’

विनोद वहां से चला गया और अगले दिन अपने दोस्त से 1 लाख 6 हजार रुपए उधार ला कर उस ने मनोहर को दिए, तब मनोहर ने कैमरे से वह वीडियो डिलीट की.

वीडियो डिलीट होने पर विनोद ने राहत की सांस ली. इस फेसबुकिया प्यार ने विनोद को मानसिक रूप से तो परेशान किया ही, साथ ही 2 लाख रुपए भी पल्ले से देने पड़े. इस फेसबुकिया प्यार को वह जिंदगी भर नहीं भुला पाएगा.      

न फंसें विज्ञापनों के भ्रामक जाल में

16 वर्षीय सान्या अपने चेहरे के सांवलेपन और पिंपल्स से बहुत परेशान थी. उस ने अनेक उपाय किए पर कोई फायदा न हुआ. फिर उस ने टीवी पर एक ब्यूटी क्रीम का विज्ञापन देखा, जिस में चेहरे को गोरा व बेदाग बनाने की बात कही जा रही थी. विज्ञापन से प्रभावित हो कर सान्या ने भी वह क्रीम औनलाइन और्डर कर दी.

क्रीम की डिलीवरी पा कर सान्या खुश थी. उसे लग रहा था कि अब जल्द ही वह गोरी व बेदाग त्वचा की मलिका हो जाएगी. क्रीम पर लिखे निर्देशानुसार रात को सान्या ने कुछ दिन क्रीम लगाई. लेकिन इस से सान्या का पूरा चेहरा लाल होने लगा था और पूरे चेहरे पर जलन और खुजली मचने लगी.

अब सान्या को पछतावा हो रहा था कि क्यों उस ने बिना सोचेसमझे विज्ञापन के झांसे में आ कर इतनी बड़ी मुसीबत मोल ले ली. सान्या जैसे अनेक किशोर विज्ञापन से आकर्षित हो कर कोई भी प्रोडक्ट खरीद लेते हैं और धोखा खा जाते हैं. बदले में उन के पास सिवा पछतावे के कोई और उपाय नहीं बचता.

औनलाइन शौपिंग : धोखे की गुंजाइश ज्यादा

रोहन कई दिन से अपने लिए आईपैड खरीदने की सोच रहा था, लेकिन सभी आईपैड उस के बजट से बाहर थे. ऐसे में एक दिन इंटरनैट पर उस ने औनलाइन एक आईपैड देखा, जो उस के बजट में मिल रहा था. रोहन ने बिना सोचेसमझे आईपैड और्डर कर दिया.

जब आईपैड आया तो पता चला कि उस की कोईर् गारंटीवारंटी नहीं थी. साथ ही आईपैड की मैन्यूफैक्चरिंग डेट भी बहुत पुरानी थी. शायद इसीलिए उसे वह आईपैड मार्केट रेट से कम दाम में मिल गया था. सस्ते के चक्कर में आ कर रोहन को पुराने आईपैड से ही काम चलाना पड़ा.

इसी तरह कई औनलाइन फैशन साइट्स पर आकर्षक ड्रैसेज बहुत कम कीमत पर मिलने का विज्ञापन दिया जाता है और किशोर विज्ञापन के झांसे में आ कर औनलाइन शौपिंग कर लेते हैं, लेकिन जब ड्रैस उन के सामने आती है तो न तो ड्रैस का कलर वह होता है जो विज्ञापन में दिखाया गया होता है और न ही उस का फैब्रिक.

इसलिए औनलाइन शौपिंग करते समय सिर्फ विज्ञापनों के वादों पर न जाएं बल्कि पूरी तरह जांचपड़ताल करने के बाद ही शौपिंग करें और साथ ही अगर औनलाइन शौपिंग में कैश औन डिलीवरी का औप्शन हो तो वही लें ताकि आप डिलीवरी के बाद प्रोडक्ट की जांचपरख कर ही पेमैंट करें.

विज्ञापन और सेहत से खिलवाड़

टीवी पर दिखाए जाने वाले कई विज्ञापनों में दिखाया जाता है कि फलांफलां टौनिक पीने से आप की हाइट बढ़ जाएगी और फलां जूस पीने से आप का वजन कम हो जाएगा और आप किसी फिल्मी स्टार की भांति स्लिमट्रिम और फिट दिखने लगेंगे. ऐसे विज्ञापनों के झांसे में आने से बचें और बिना डाक्टर की सलाह के कोई हैल्थ टौनिक न लें.

किशोरावस्था में लड़कों को बौडी बनाने की और लड़कियों को खूबसूरती बढ़ाने और मैंटेंड फिगर पाने की चाहत होती है, जिस के चलते वे विज्ञापनों के झांसे में आ जाते हैं और सेहत से खिलवाड़ कर बैठते हैं. जहां पैसे की तो बरबादी होती ही है, सेहत पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.

एक के साथ एक फ्री का लालच

कई बार किशोर किसी मौल या शौपिंग स्टोर में जाते हैं और वहां जा कर एक के साथ एक फ्री या बाय वन गैट टू फ्री के झांसे में आ जाते हैं और बिना जरूरत का सामान भी खरीद लाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि स्कीम में  उन्हें सस्ता सामान मिल रहा है जबकि यह कंपनियों की स्ट्रेटजी होती है. वे अपना सामान निकालने के लिए ऐसी युक्तियां रचते हैं, वह प्रोडक्ट मार्केट में आउटडेटेट हो चुका होता है इसलिए ऐसा सामान खरीदने से बचें.

तंत्र मंत्र यंत्र के धोखे

वे किशोर छात्र जो पढ़ाई में कमजोर होते हैं परीक्षा में सफलता पाने के लिए देर रात आने वाले रत्नों, मंत्रों और यंत्रों के विज्ञापनों के झांसे में आ जाते हैं जो दावा करते हैं कि उक्त रत्न को धारण करने से उन्हें परीक्षा में सफलता मिलेगी.

ये विज्ञापन वास्तव में सिर्फ छलावा होते हैं जो अपना धंधा चमकाने के लिए किशोरों को मेहनत की राह से भटकाते हैं जिन के भरोसे रह कर छात्र अपनी पढ़ाई छोड़ कर रत्नों के जरिए सफलता पाने की आस में रहते हैं, लेकिन जब परीक्षा परिणाम आता है तो उन के सामने वास्तविकता आती है.

इसलिए अपनी मेहनत और लगन पर विश्वास रखें और ऐसे अंधविश्वास भरे विज्ञापनों के भ्रामक जाल से बचें.

पेरैंट्स की सलाह लें

कोई भी शौपिंग करने से पहले पेरैंट्स की सलाह लें. सिर्फ विज्ञापनों में दिखाए गए वादों पर भरोसा न करें, क्योंकि विज्ञापनों में सिर्फ प्रोडक्ट की खूबियों को उजागर किया जाता है, सब अच्छाअच्छा दिखाया जाता है. अगर विज्ञापन में कोई उत्पाद आप को पसंद आता भी है तो उसे खरीदने से पहले किसी ऐसे व्यक्ति की राय लें जिस ने वह उत्पाद प्रयोग किया हो यानी विज्ञापन के दिखावों पर न जाएं अपनी अक्ल लगाएं.       

औनलाइन खरीदारी में किशोर सरताज

अश्विन के डैडी का आज बर्थडे था. घर में मौम ने पार्टी की सारी तैयारियां कर दी थीं. कोचिंग के सभी फ्रैंड्स भी आने शुरू हो गए थे. डैडी के औफिस कलीग्स भी आ गए थे. सब ने मस्ती में केक काटा और जम कर रीमिक्स गानों पर डांस किया. फिर बारी आई गिफ्ट देखने की. अश्विन के डैडी ने सब के बारीबारी से गिफ्ट खोल कर देखे और देने वालों को थैंक्स कहा.

हालांकि उन के मन में बारबार यही बात आ रही थी कि हर साल अश्विन सब से पहले उन्हें गिफ्ट देता है, लेकिन इस बार उस के गिफ्ट का कोई अतापता नहीं है. वे इसी उधेड़बुन में थे कि अचानक डोरबैल बजी. उन्होंने जा कर दरवाजा खोला तो पाया कि उन के नाम एक बौक्स डिलीवर हुआ है. उन्होंने कुतुहलवश बौक्स को खोल कर देखा तो उन की खुशी का ठिकाना न रहा. दरअसल, बौक्स में एक कार्ड था, जिस में उन्हें बर्थ डे विश करने के साथ अश्विन ने उन की पसंद का मोबाइल फोन गिफ्ट किया था. यह वही मोबाइल था जो वे कई महीनों से लेना चाह रहे थे, लेकिन उस की औनलाइन सेल के चलते वे ले नहीं पा रहे थे. चूंकि अश्विन औनलाइन खरीदारी में ऐक्सपर्ट था और उस का उस पोर्टल में अकाउंट था, जहां उस फोन की सेल होनी थी, लिहाजा उस ने चुपचाप उसे बुक करवा कर उन के बर्थडे के दिन सरप्राइज गिफ्ट दिया.

औनलाइन खरीदारी में माहिर किशोर

अश्विन की तरह आज के हर किशोर को तकनीकी दुनिया के हर बाजार से खरीदारी करनी आती है. स्नैपडील, फ्लिपकार्ट, अमेजौन, शोपोहालिक, माइमार्केट जैसे तमाम औनलाइन पोर्टल किशोरों के स्मार्टफोन में वन क्लिक पर इन्सटौल्ड होते हैं. सूई से ले कर मोटरबाइक, मोबाइल से ले कर किताब तक, कोई भी चीज लेने के लिए आज का किशोर दुकान या बाजार के धक्के नहीं खाता. वह तो सब से पहले लौंच हुए प्रोडक्ट का रिव्यू पढ़ता है, उस के रेट की तुलना करता है, फिर सब से ज्यादा डिस्काउंट में उसे खरीद कर पैसे बचाता है.

औनलाइन खरीदारी आज के दौर में बड़ा विकल्प बन कर उभरा है. डिजिटल मार्केट के इस प्रतिस्पर्धी दौर में सब से सस्ता देने की होड़ लगी है, लेकिन अभिभावकों को तकनीकी तौर पर इतनी जानकारी न होने के कारण वे उन्हीं दामों पर सामान खरीदते रहते हैं, लेकिन किशोर तो हर प्रोडक्ट पर 2.5त्न का डिस्काउंट ले कर ही औनलाइन शौपिंग करते हैं.

जिम्मेदार खरीदारी किशोरों की

रवि के घर गुप्ता जनरल स्टोर से पूरे महीने का राशन एक बार में ही खरीदने का चलन है. हर महीने सामान की लिस्ट जाती है और गुप्ताजी 8 हजार का बिल सामान के साथ भेज देते हैं.

एक दिन रवि ने सामान की लिस्ट निकाल कर ग्रोसरी बेचने वाली कई वैबसाइट्स पर जा कर जब इन्हीं सामानों की कीमतें देखीं तो पता चला दूध, घी, तेल, चीनी, मैदा और दालों से ले कर कोल्डड्रिंक व नमकीन आदि में 5-10त्न का डिस्काउंट था. इतना ही नहीं 5 हजार रुपए से ज्यादा कीमत का सामान खरीदने पर 500 रुपए की कीमत का वाउचर भी मिल रहा था, जिसे कभी भी कैश कराया जा सकता था.

रवि ने यह बात अपने मम्मीपापा को बताई तो पहले वे हिचके, लेकिन जब रवि ने कैश औन डिलीवरी का विकल्प बताया तो उन्हें राहत महसूस हुई. सहमति मिलते ही उन्होंने सारा सामान रवि के अकाउंट से और्डर कर दिया और उन्हें लगभग 1,500 रुपए की बचत हुई. औनलाइन खरीदारी और स्मार्टफोन की ऐक्सपर्टनैस ने रवि जैसे कई किशोरों को औनलाइन खरीदारी का जिम्मेदार यूजर बनाया है.

बिल पेमैंट से ले कर रेस्तरां बिल तक

औनलाइन खरीदारी के मामले में आजकल किशोर इतने समझदार हो गए हैं कि कहीं रेस्तरां में डिनर करने भी जाते हैं तो फूड पांडा सरीखी ऐप्लिकेशन से होटल का बिल पे करते हैं और ऐप्स में चल रही 50त्न डिस्काउंट या बाई वन गैट वन फ्री का फायदा उठा कर मोटी बचत करते हैं.

पेटीएम जैसी ऐप्लिकेशन के जरिए किशोर बिजली, मोबाइल व पानी का बिल भर कर मम्मीपापा की न सिर्फभागदौड़ बचाते हैं बल्कि इन ऐप्स में ट्रांजैक्शन के बाद मिलने वाले प्रोमोशन कोड के जरिए अगले भुगतान में भी काफी बचत पा जाते हैं. इतना ही नहीं कई किशोर मूवी टिकट भी उन्हीं ऐप्स के जरिए बुक कराते हैं जिन में एक टिकट के साथ दूसरा फ्री मिलता है जबकि अन्य लोग टिकट खिड़की की लंबी लाइनों में लग कर पूरी कीमत पर टिकट खरीदते हैं.

औनलाइन खरीदारी में उस्ताद किशोर बड़ी समझदारी से अपना व घर में काम आने वाला हर सामान सस्ते दामों व भारी छूट में खरीदते हैं तो इस के पीछे उन की समझ व औनलाइन विकल्पों की जानकारी है.

अभिभावक आज भी टिकट खिड़की से पूरी कीमत पर यात्रा के रिजर्वेशन टिकट खरीदते हैं जबकि किशोर अपने स्मार्टफोन पर आईआरसीटीसी समेत कई ऐप्लिकेशंस इस्तेमाल करते हैं जिन के हर टिकट खरीद पर या क्रैडिट या डैबिट कार्ड से पेमैंट करने पर अच्छा डिस्काउंट भी मिलता है.

समझदारी भी, होशियारी भी

अकसर बड़ेबुजुर्ग किशोरों को समझाते हैं कि औनलाइन खरीदारी करने से बचना चाहिए, क्योंकि अकसर औनलाइन धोखाधड़ी की खबरें अखबारों में पढ़ने को मिलती रहती हैं. वैसे उन का सतर्क रहना व चिंता करना गलत नहीं है. कई बार किशोर भी जरा सी सावधानी से चूकने पर औनलाइन ठगी का शिकार हो सकते हैं. कई बार जिस वैबसाइट पर हम अपनी खरीदारी की पेमैंट कर अपनी बैंकिंग जानकारियां शेयर करते हैं, वह वैबसाइट सुरक्षित न होने के चलते हैकर्स के पास आप की जानकारियां पहुंच जाती हैं. इसलिए औनलाइन खरीदारी करते वक्त किशोरों को सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है.

इस में कोई दो राय नहीं कि आज का किशोर घर में इस्तेमाल होने वाला हर सामान औनलाइन खरीद कर बड़ेबड़ों को आश्चर्य में डाल देता है और पैसों की बचत में योगदान भी देता है. कई बार वह सारी तकनीक अपने मम्मीपापा को सिखा कर उन का भी काम आसान कर देता है ताकि वे भी अपनी किताबें, चश्मे, कपड़े से ले कर घर का फर्नीचर तक सब सामान औनलाइन खरीदारी के जरिए कम कीमत पर घर बैठे मंगा सकें. इसलिए औनलाइन शौपिंग के सरताजों की जिम्मेदार खरीदारी के लिए उन की एप्रीशिएशन या प्रोत्साहन बनती है.                  

औनलाइन खरीदारी की राह में ऐसे बचें धोखों से

–       हमेशा औफिशियल व औथेंटिक पोर्टल से खरीदारी करें.

–       बड़े डिस्काउंट की चाह में जरूरत से ज्यादा न खरीदें.

–       बैंकिंग संबंधी जानकारी असुरक्षित पोर्टल्स पर शेयर न करें.

–       अपने मोबाइल में शौपिंग ऐप्स को पासवर्ड सहित सेव करें.

–       स्मार्टफोन में हमेशा एंटीवायरस का इस्तेमाल करें.

–       कभी भी औनलाइन क्वालिटी की जांच किए बिना भुगतान न करें.

–       हर लेनदेन व खरीदारी की इन्फौर्मेशन स्टेट्स अपने पास रखें.

–       भुगतान संबंधी अड़चनों पर सारा लेनदेन विवरण सुरक्षित रखें.

–       डिजिटल वौलेट में बड़ी रकम इस्तेमाल न करें.

इन मोबाइल ऐप्स से समझे GST

1 जुलाई से GST (Goods and service tex) लागू हो गया है. हर तरफ इसकी ही चर्चा चल रही है. यहां हम आपको कुछ ऐसी ऐप्स बता रहे हैं जो GST को समझने के लिए ही बनाई गई हैं.  इनकी मदद से आप GST को आसानी से समझ सकते हैं. ये आपको GST से रिलेटेड अपडेट भी सेंड करेंगी. इसमें एक हिंदी ऐप भी है जो GST से संबधित पूरी जानकारी हिंदी में देगी.

GST Rule

यहां आपको GST से रिलेटेड रूल और न्यूज मिलेंगी. इसके साथ ही GST के रेट्स किस सेक्टर में क्या होंगे ये भी पता चल जाएगा. यहां भारत सरकार की कुछ लिंक भी दी गई हैं. इसकी खास बात GST Calculator है, जो आपको कुछ क्लिक में  बताता है कि आपको कितना GST Tax पे करना होगा.  यह ऐप भी 4 या उसके ऊपर के एंड्रॉइड पर काम करता है.

GST Bill India Hindi

इस ऐप पर आपको GST Bill की पूरी जानकारी हिंदी में मिलेगी. इसके साथ ही आप यहां से ऑनलाइन टैक्स भी भर सकते हैं. इस ऐप पर आपको check Tax Credit Balance Live, Check Status of Application जैसे फीचर्स भी मिलेंगे. यह ऐप 4 या उसके ऊपर के एंड्रॉइड वर्जन पर काम करता है.

GST India (Updated Acts/Rules)

इस ऐप पर यूजर्स को GST से जुड़ी हर अपडेट न्यूज और आर्टिकल के जरिए मिलेगी. यहां यूजर्स को अपडेट एक्ट और रूल्स की जानकारी भी मिलेगी. यहां भी GST Calculator दिया गया है. जो नई कीमतों के बारे में बताता है. अगर आपके फोन में 4 या उसके ऊपर का एंड्रॉइड सिस्टम है तभी ये ऐप काम करेगा.

CBEC GST

यह ऐप Central Board of Excies and Customs (CBEC) ने बनाई है. इस ऐप से GST संबधित सारी जानकारी मिलती है. रूल्स रेगुलेशन के साथ ही इसमें CBEC से हेल्पडेस्क के जरिए कॉन्टैक्ट कर सकते हैं. यह ऐप 4 या उसके ऊपर के एंड्रॉइड वर्जन पर काम करता है.

GST Connect-GST Act, Rules & Rates by CAclubindia

इस ऐप को ऑफलाइन भी एक्सेस किया जा सकता है. इस ऐप पर टॉप एक्सपर्ट के आर्टिकल्स हैं. यहां आपको सभी क्वेश्चन के आंसर मिलेंगे. यह ऐप 4 या उसके ऊपर के एंड्रॉइड वर्जन पर काम करता है.

क्या! टीम में धोनी की जगह लेना चाहते हैं पांड्या

टीम इंडिया के हरफनमौला हार्दिक पांड्या अब फिनिशर की रोल में आने का मन बना चुके हैं. वेस्टइंडीज के खिलाफ पांचवें और अंतिम वनडे मैच से पहले हार्दिक ने बेखौफ क्रिकेट खेलने का वादा दोहराया. उन्‍होंने कहा कि चौथे मैच में विफल रहने के बावजूद वे टीम इंडिया के लिए फिनिशर का रोल निभाने के लिए तैयार हैं.

भारतीय टीम में लंबे समय से एमएस धोनी फिनिशर का रोल निभाते आए हैं. गौरतलब है कि चौथे वनडे में हार्दिक ऐसे समय पर आउट हो गए थे जब टीम को उनकी जरूरत थी. भारत को जब 31 गेंद में 29 रन की दरकार थी जब पांड्या (21 गेंद में 20 रन) पेवेलियन लौट गए और भारत को अंतत: 11 रन से शिकस्त का सामना करना पड़ा.

पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने विकेट पर रुकने का जज्‍बा दिखाया लेकिन उनकी अर्धशतकीय पारी न केवल बेहद धीमी रही बल्कि वे आखिरी क्षणों में आउट भी हो गए.

धोनी के साथ साझेदारी के बारे में पूछने पर हार्दिक पांड्या ने कहा कि उन्हें विश्वास था कि वे 190 रन के लक्ष्य को हासिल कर लेंगे. उन्‍होंने कहा, 'ईमानदारी से कहूं तो धोनी के साथ बातचीत काफी सामान्य थी. हम दोनों के पास जो क्षमता है उससे हम पारी को आगे बढ़ाना चाहते थें और फिर लक्ष्य हासिल करतें. अधिकांश समय हम 29 गेंद में 31 रन बना लेते लेकिन हम मैच खत्म नहीं कर पाए. मैं टीम के लिए मैच खत्म करने के लिए स्वयं का समर्थन करता हूं और ये सभी चीजें सीखने का हिस्सा हैं. अंतिम मैच में हम बिना किसी डर के खेलेंगे. पिछला मैच उन मैचों में से था जब चीजें आपके पक्ष में नहीं होती.'

पांड्या को बड़े छक्के जड़ने के लिए जाना जाता है लेकिन मैच की स्थिति के अनुसार उन्होंने धैर्यपूर्ण पारियां भी खेली हैं. पांड्या के अनुसार कप्तान विराट कोहली ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में दबाव से निपटने में उनकी मदद की है.

उन्‍होंने कहा, ' कप्‍तान विराट कोहली ने काफी मदद की. मुझे याद है कि जब मैंने इंग्लैंड के खिलाफ 43 गेंद में 40 रन बनाकर मैच खत्म किया तो उस दिन विराट ने मुझे कहा कि अंतराष्ट्रीय क्रिकेट 'कॉपी-पेस्ट' की तरह है और आपको अपने प्रदर्शन को दोहराना होगा. मैं इन सभी चीजों को दिमाग में रखता हूं. खिलाड़ियों पर उसका काफी प्रभाव है.'

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